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स्वाहा

दुश्मनी की वजह से ही उनकी शादी न हो सकी थीं लेकिन उन्होंने अपनी मुहब्बत को रूसवा न होने दिया था।

गंगा मौसी को दिल्ली छोड़ एक लम्बा समय हो चुका था। अपने जीजा के स्वर्ग सिधार जाने के बाद गंगा मौसी स्थाई रूप से अपनी बहन के साथ ही आकर रहने लगी थी और उनकी बहन का एक ही बेटा था अमर बहन भी चल बसी तो अमर और वह अकेले रह गए। गंगा मौसी को विरासत में जो कुछ मिला था वह सब उन्होंने अमर के सुपुर्द कर दिया। अमर कन्सट्रैक्शन के धन्धे में था। बंगले बनाकर बेचता था। वह गंगा मौसी से आठ-दस साल छोटा था और अब चालीस साल के लपेटे में था शादी अमर ने भी नहीं की थी और न ही करने का इरादा रखता था। कहता वह यही था कि मैं शादी नहीं करूंगा लेकिन क्यों नहीं करेगा यह आज तक उसने किसी को नहीं बनाया था।

बताया तो खैर गंगा मौसी ने भी किसी को कुछ नहीं था। वह तो रेखा को फोन पर उनकी द बलदेव अंकल की बातचीत से कुछ-कुछ अंदाजा हुआ था और तब रेखा ने गंगा मौसी से बहुत सारे सवाल किए थे ओर रेखा की जिद पर गंगा मौसी को अंतत अपनी कहानी सुनानी पड़ी थी और यूं रेखा इस प्रेम कहानी की पहली राजदार बनने का सौभाग्य पा सकी थी।

रेखा में ऐसी कोई बात थी ही कि उससे अपने दिल की बात कहने को जी चाहता था और वह खुद ऐसी थी कि अपने दिल की बात किसी को नहीं बताती थी। और इसकी वजह शायद यही थी कि वह किसी को भी अपना हमदर्द व हमराज न पाती थी। यही वजह थी कि उसने अपने भीतर ही अपनी एक दुनिया आबाद कर ली थी।

हां! रेखा जब अकेली होती तो हकीकतन तब भी अकेली न होती थी। सोचों की ख्यालों की एक भीड़ होती थी। वह जागती आंखों से खाब देख रही होती। उसकी कल्पना शीलता, संवेदन शीलता भी बड़ी अनूठी और शक्तिशाली थी। अगर वह टेलीविजन पर हिमपात का, दर्क गिरने का सीन देख रही होती और अगर वह चाहती कि वह खुश इन दृश्यों का हिस्सा बन जाए तो वह अपनी कल्पनाओं के जरिये उन दृश्यों का हिस्सा बन जाती थी। उसे फौरन ही ठण्डक महसूस होने लगती थी।

बहरहाल, आज भी अंकल की फोन काल ने रेखा को उलझा दिया था। उन्होंने रेखा को अभी कुछ और समय यहीं रहने को कहा था। ऐसा क्यों था, यह रेखा नहीं जानती थी। रेखा यह भी नहीं जानती थी कि बलदेव अंकल उसे यहां क्यों छोड़ गए थे और उसकी ख्याहिश के बावजूद उसे दिल्ली क्यों नहीं बुलाते थे? आखिर उनकी क्या समस्या थी? अंकल यह भी नहीं बताते थे बस हंसकर टाल जाते थे या कहते थे अच्छा बताऊंगा-सन करो। "

पर अब तो हालात के रंग ही दूसरे थे।

रेखा को जब से वह सपना दिखाई देना शुरू हुआ था, वह मानसिक रूप से उलझनों का शिकार होकर रह गई थी। उसके दिल का चैन लुट गया था। घटनाएं भी तो होश उड़ाने वाले हो रहे थे वह डरावना खाब-बड़े दादा का लिफाफा - रहस्यमय शख्स का उल्लू दे जाना... उल्लू का खून...खून आलूदा कदमों के निशान... रहस्यमय कमरा... कमरे में जाने की तीव्र इच्छा... कमरे का बन्द न होना...।

दोपहर का खाना खाकरें रेखा अपने बैड पर लेटी हुई यह सब ही सोच रही थी कि सहसा उसके दिल में एक लहर-सी उठी। आंखें बन्द-सी होने लगीं। उसके कानों में जैसे कोई कह रहा था कि चलो रेखा उस रहस्यमय कमरे में चलो।

और यह खवाहिश इतनी तीव्र थी कि रेखा किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह उठ गई।

फिर मंत्र-मुग्ध सी ही वह नीचे पहुंची तो उसे कोई दिखाई नहीं दिया। गंगा मौसी अपने कमरे में थीं और उनका दरवाजा बन्द था। माया भी अपना काम समेटकर अपने कमरे में जा चुकी थी और ऊपर तो घर में कोई था ही नहीं।

रेखा बड़े इत्मिनान से चलती हुई उस रहस्यमय कमरे के सामने पहुंच गई। दरवाजे के हैण्डल पर हल्का दबाव

डालकर उसने दरवाजा खोला।

बंद दरवाजा अभी थोड़ा-सा खुला था कि भीतर से एक मर्दाना आवाज उभरी-

" अभी नहीं, रात को आना...।"

इस आवाज में एक आदेश था नम्रता या निमन्त्रण नहीं था। बड़ी गूंजदार आवाज थी। लहजा अगर सख्त नहीं तो नर्म भी नहीं था। कोई व्यक्ति अपने काम में मग्न तथा व्यस्त हो और आप उसकी एकाग्रता में खलल बनना चाहें तो फिर
 
स्वाहा

इसी तरह के शब्द सुनने को मिलते हैं। यह आवाज सुनकर रेखा को भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था जैसे उसने दरवाजा खोलकर बेजा हस्तक्षेप कर डाला हो।

उसने फौरन दरवाजा बन्द कर दिया।

फिर दरवाजा खुला ही कितना था जितना खुला था उसमें अन्धकार के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आया था।

वह धड़कते दिल से भागती हुई सीढ़ियों तक आई। तेजी से सीढ़ियां घड़ी और अपने कमरे में घुस, धम्म से बैड पर आ बैठी। शुक्र कि किसी ने उसे, उस रहस्यमय कमरे को खोलते और फिर फौरन ही वहां से भागकर आते हुए नहीं देखा था।

रात को उसने दरवाजा खोला था तो दरवाजा खोलते ही बेहद ठण्डी हवा का एक तेज झोंका भीतर से आया था। लेकिन अब इस वक्त ऐसा महसूस नहीं हुआ था। ठण्डी हवा थी न गर्म हवा थी और ना ही वह बू थी जो मुद्दत से बन्द

किसी कमरे में पैदा हो जाती है। इस बार हवा के बजाय आवाज आई थी। बड़ी ही रौबदार आवाज थी।

"अभी नहीं रात को आना...।"

उसने अब तक जब-जब भी इस कमरे के बारे में सोचा था तो यही सोचा था कि इस कमरे में कोई रहस्य नहीं है और इसे महज वहम या अंधविश्वासों के कारण ही बन्द कर दिया गया है, लेकिन अब धीरे-धीरे इस कमरे के रहस्य उस पर खुलते जा रहे थे और अब वह यह सोचने को विवश हो गई थी कि इस कमरे में जरूर कोई बला है। उस मर्दाना आवाज ने हर शक व संदेह को यकीन में बदल दिया था।

बहरहाल, रेखा निश्चय कर चुकी थी कि वह उस कमरे में जाकर रहेगी। यह जानकर रहेगी कि आखिर वहां क्या है? बड़े दादा हरि ओम ने उसके ख्वाब के जवाब में इस कमरे की तस्वीर बनाई थी। साफ इशारा किया था कि उसके भयावह सपने का हल इसी कमरे में हैं।

वह बेचैनी से रात का इन्तजार करने लगी।

अंतत: रात की कालिमा हर तरफ फैली।

आकाश अन्धकारमय था और गहरे काले बदलों से ढका हुआ था। दो बज गए। एक उल्लू इस बंगले के ऊपर से कई बार गुजर चुका था और वो जब गुजरता था तो एक तेज चीख मारता और उसके पंखों की फड़फड़ाहट दूर तक गूंज जाती। इस बंगले के सात चक्कर लगाने के बाद वह रेखा के कमरे की छत पर बैठ गया।

रेखा हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसे यूं महसूस हुआ था जैसे कोई विशाल पक्षी उसके सीने पर आ बैठा हो।

आंख खुली तो उसे अहसास हुआ कि वह जैसे खाब देख रही थी। घड़ी पर नजर डाली, दो बजकर पांच मिनट हुए थे। रात का खाना खाकर वह अपने कमरे में आ गई थी। फिर यह सोचते-सोचते कि वो किस वक्त उस काले कमरे में जाए... उसे नींद ने आ दबोचा था, और अब उसकी आंख खुलीं तो दो से ऊपर का टाईम था।

कमरे में लाईट जल रही थी। दरवाजा बन्द था। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि सीने पर किसी बड़े परिन्दे का

अहसास ख्वाब था, ख्याल था या उसका वहम

खैर, अब वह उठ गई थी। रात को आने की हिदायत उसके कानों में गूंज रही थी। नीचे जाने की ख्याहिश दिल में मचलने लगी थी, जोर पकड़ रही थी। कोई उमे कह रहा था "चलो, नीचे चलो...।"

और फिर वही हुआ, वह किसी सम्मोहित प्राणी की तरह उठी व मंत्र-मुग्ध अंदाज में बाहर निकली और सीढ़ियां उतरने लगी।

बरामदे की लाइट भी प्रकाशमान थी, वह बड़े इत्मीनान से उस रहस्यमय कमरे के दरवाजे पर जा खड़ी हुई। फिर

ताबीज को छुये-छेड़े बिना हैण्डल को हल्का सा घुमाया और दरवाजा खट की आवाज के साथ थोड़ा-सा खुल गया।

वह क्षण भर को ठिठकी रही जैसे अन्दर आने की अनुमति चाहती हो।
 
तभी भीतर से आवाज आई- "अन्दर आ जाओ कब तक दरवाजे पर खड़ी रहोगी ?"

वह फौरन ही दरवाजा खोलकर भीतर समा गई। पर कमरे का दृश्य देखकर उसका ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का सांस नीचे रह गया। उसने तो सोचा तक भी नहीं था कि अन्दर यह सब होगा। उसकी कल्पना में तो यही था कि कमरा अन्दर से बेहद अन्धकार मय होगा क्योकि उसे बताया गया था कि कमरे की दीवारों पर ही नहीं छत पर भी काला रंग करवाया गया है। जगह-जगह जाले लगे होंगे और भीतर बरसों से बन्द कमरे में अन्दर कीड़े-मकोड़े से रहे होंगे। बन्द कैमरे में बू होगी, सीलन होगी। लेकिन यहां का तो नक्शा ही उल्टा था।

जब वह दरवाजा खोलकर अन्दर आई तो उससे कहा गया- "दरवाजा बन्द कर दो...।"

और वह दरवाजा बन्द करके पलटी तो उसने देखा कि कमरे में बेहद रोशनी है-जैसे दिन निकला हो। कमरे में ठीक मध्य में एक ऊंचे-से आसन पर एक शख्त तड़क-भड़क लिबास में बैठा है। कमरे में सुर्ख रंग का मोटा कालीन बिछा हुआ है। वह अधेड़ उम्र व्यक्ति किसी स्टेट का राजा लग रहा था, उसका बैठने का अन्दाज कीमती राजसी पौशाक-स्वस्थ बलिष्ठ जिस्म एक हाथ में सांप की तरह बल खाया 'राजदण्ड'!

रेखा ने धूक निगली, वह इस अनूठे प्रभावशाली व्यक्ति से अपनी निगाहें नहीं हटा पा रही थी।

"आओ, बैठो।" उस शख्स ने आदेशपूर्ण स्वर में कहा।

रेखा अभी सोच ही रही थी कि वह कहां बैठे- "क्योंकि उस कमरे में कुर्सी नाम की कोई चीज नहीं थी। पर तभी अगले ही क्षण उस शख्स के सामने कुछ ही फासले पर मखमल की गद्दी वाला एक स्टूल प्रकट हुआ। उस शख्त ने मुस्कराकर ही इस आसान की तरफ इशारा किया था। रेखा यंत्रवत सी ही बढ़ी और उस स्टूल पर बैठ गई और अब रेखा की नजर उस व्यक्ति के पैरों पर पड़ी, वह नंगे पांव

लाकार उसका एक पैर था।

"तुम चकित हो?"

वह राजसी पौशाक वाले प्रौढ़ शख्त ने बड़ी गर्जदार आवाज मे सवाल किया।

"हां...।" रेखा मुश्किल से ही कह पाई।

"इस कमरे का माहौल देखकर?"

अगला सवाल था।

"हां" रेखा ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।

""जो रात तुम लोगों के लिए रात है, वह रात हम लोगों के लिए दिन है। हमारी रातें प्रकाशमान होती हैं और दिन अन्धेरे, जब तक तुम लोग सो जाते हो तो हम बाहर आते हैं। सर्वत्र हमारा राज्य होता है। "

"आप कौन हैं?" रेखा ने साहस कर पूछा।

"यह में बताना भी चाहूँ तो नहीं बता सकता। समझाना चाहूँ तो भी नहीं समझा सकता। केवल इतना समझ लो कि " तुम्हारे कारण से मुझे आजादी मिली हैं। मैं तुम्हारा आभारी हूँ। कृतज्ञ हूँ।"

"मेरे कारण से?" रेखा आश्चर्यचकित थी- "वह कैसे ...?"..

" न तुम यहां आतीं, न पिन्जरे में वो आता, न खून फैलता और न उस खून में हम गुसल (स्नान) करते।"

"मैं अब भी नहीं समझी। आप क्या कह रहे हैं?" रेखा वास्तव में ही कुछ नहीं समझी थी।

"हम समझा भी नहीं सकते और तुम्हें कुछ समझने की आवश्यकता भी नहीं...।" यह कहकर उसने अपना हाथ फैलाया और उसकी हथेली पर एक किताब नमुदार हुई। यह लो यह हमारी तरफ से एक तुच्छ-सी भेंट हैं। इसे रख
 
लो।

रेखा ने उठकर उसकी हथेली पर रखी किताब ले ली और चाहती थी कि उसे खोलकर देखे कि वह शख्स बोल उठा-

"नहीं, अभी नहीं। अपने कमरे में जाकर देखना । "

"जी, अच्छा। आपका धन्यवाद... 1"

"तब वह अधेड़ उम्र शख्स जो अपने गेटअप व सेटअप से किसी ऐतिहासिक ड्रामे का पात्र लगता था अपनी बलखाती

छड़ी के सहारे उठा और बोला-

" अब तुम जाओ। और हां, कोई आवश्यक नहीं कि हमारे भेद तुम लोगों पर खोलती फिरो मेरी बात समझ गई न तुम...।"

"हो....।" रेखा ने नम्रता से गर्दन हिलाई और वापसी के लिए मुड़ी। और अभी उसने दो ही कदम बढ़ाए होंगे कि कमरे में एकाएक अन्धेरा छा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा।

घुप्प अन्धेरा था और एक विचित्र सी ठण्डक ।

वह दरवाजे के निकट थी, मगर उसे दरवाजा नजर नहीं आ रहा था। उसने जल्दी से टटोलकर दरवाजे का हैण्डल ढूंढा और घुमाया और दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। बाहर का वही माहौल था। उसने पलटकर दरवाजा बन्द किया। दो-तीन लम्बे-लम्बे गहरे सांस लिये।

फिर वह तेजी से कदम उठाती हुई अपने कमरे में आ गई।

और दरवाजा बन्द कर लिया।

रेखा दरवाजा बन्द कर रही थी तो उसे किसी परिन्दे की चींख ओर परों की फड़फड़ाने की तेज आवाज सुनाई दी थी।

पंखों की यह फड़फड़ाहट और चीख सुनकर उसकी निगाहों के सामने पिंजरे वाला उल्लू आ गया था। पिन्जरे में उल्लू का जख्मी होना, बेपनाह खून का बहना, खून से सने पदचिन्ह और फिर उस धायल उल्लू का उड़ जाना।

और इसके साथ ही रेखा को उसके कहे शब्द आए-

"न... तुम यहां आती, न पिन्जरे में वो आता, न खून फैलता और न ही उस खून में हम गुसल करते...!"

क्या था यह सब? यह क्या गोरख धन्धा था? रेखा की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। बहरहाल, वह एक टांग वाला प्रेत खुश था और अपनी आजादी को रेखा से जोड़कर देखता था। अपनी आजादी की खुशी में वो रेखा को एक तोहफा दे गया था।

रेखा ने बैड पर बैठकर उस तोहफे को उलट-पलट कर देखा।

खूबसूरत चमड़े की जिल्द थी और वह कोई किताब न थी बल्कि डायरी थी। बिना लाईनों का सफेद चमकदार कागज । सारे ही पेज साफ तथा सादे थे। उन पर कुछ भी नहीं लिखा गया था। बड़ा विचित्र तोहफा था।

रेखा उलझन व परेशानी का ही शिकार थी। उसने इस डायरी को एक पैकेट निकालकर उसके कवर में रख दिया। वह पॉकेट डायरी सहज ही में इस कवर में आ गई। उसके इस कवर को भी अपनी विडियो कैसेट्स के बीच रख दिया। अब इस डायरी पर आसानी से ही किसी की निगाह नहीं पड़ सकती थी। वैसे भी उसके कमरे में माया के अलावा कोई नहीं आता था और माया को चीजों से खामखाह छेड़छाड़ करने की आदत न थी। कभी-कभार अमर आ जाता था वह भी रेखा के अनुनय पर थोड़ी देर बैकता-गप-शप लगाता और चला जाता। गंगा मौसी तो अपने घुटनों की प्रॉब्लम से ऊपर आती-जाती नहीं थी।

रेखा अब अपने आप को हल्का-फुलका महसूस कर रही थी। तनाव जाता रहा था और उसकी आंखो में नींद उत्तर रही थी। आंखे बोझिल हो रही थीं। बह बिस्तर पर लेटी कि पांच मिनट के अन्दर ही गहरी नींद में थी।
 
और फिर...

सुबह जब रेखा मुंह हाथ धोकर नीबे पहुंची तो गंगा मौसी प्रतिदिन की तरह डायनिंग टेबल पर उसकी प्रतीक्षक थीं। वह उसे देखकर मुस्कराई।

"आओ रेखा...।"

"आ मई मौसी।" रेखा चहकी उन्हें नमस्कार किया व कुर्सी खींचकर उनके निकट बैठ गई। जवाब में गंगा मौसी ने दुआएं दी थी।

"माया कहां है ?" रेखा ने पूछा।

"मैं आ रही है। चाय लेने गई है।"

"मैं आ गई बीबी ।" यह कहते हुए माया कमरे में प्रविष्ट हुई। केतली मेज पर रखी उसे टी-कौजी से ढका और कुर्सी घसीटकर खुद भी बैठ गई ।

जब से रेखा आई थी वह नाश्ते के लिए माया को साथ ही बैठाती थी। मौसी को एतराज हुआ था। लेकिन नेकदिल गंगा मौसी ने रेखा की खुशी के कारण इसे अपनी आन का मसला नहीं बनाया था।

"भाई कहां है?" रेखा ने स्लाईस पर मक्खन लगाते हुए पूछा।

"भाई अपने कमरे में होगा और सो रहा होगा।"

"नाश्ता नहीं करेंगे वह?"

गंगा मौसी ने मुंह बनाते जवाब दिया- “उसने कभी हमारे साथ नाश्ता किया है जा आज करेगा ।"

"" अब मौसी ऐसा भी नहीं हैं कितनी बार तो हमारे साथ नाश्ता किया है उन्होंने।"

"अब रहने भी दो, रेखा । साल में एक-दो बार कर लिया तो क्या इसको बकायदा नाश्ता करना कहते हैं।"

" अच्छा ठहरिये। मैं उन्हें उठाकर लाती हूँ।"

"लीजिये, बन्दा खुद ही आ गया।" अमर ने कमरे में प्रवेश करते कहा। उसने शायद यह बातें सुन ली थीं- "यह मौसी जरूर मेरी बुराईयां कर रही होंगी। "

"भाई, क्या ऐसी-वैसी ... " रेखा हंसकर बोली- "मौसी की लाड भरी बुराईयों का क्या कोई अन्त होता है।”

"माया, अमर के लिए सिके हुए स्लाईस लाने उठ गई।

"मौसी ! यह आप मुझ कुंवारे के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं।" अमर ने शोखी से कहा ।

"तो कर ले ना शादी किसने मना किया है?" मौसी जलकर बोली।

"इन्होंने मना किया है।" अमर ने बड़ी मासूमियत से कहा।

गंगा मौसी समझी कि अमर ने रेखा की तरफ इशारा किया है। वह एकदम चौंक गई। खुद रेखा भी यहीं समझी थी कि इशारा उसी की तरफ है। वह आश्चर्य भरी नजरों से अमर को देखने लगी।

"इन्होंने... किसने?" गंगा मौसी ने तीखे स्वर में पूछा ।

"वो उन्होंने...।" अमर ने कमरे के बाहर की तरफ इशारा किया।

"बाहर कौन है? किसको खड़ा करके आए हो !
 
"ओ हो, मौसी ! इतनी अक्लमंद होकर भी मेरा इशारा नहीं समझीं। वो कमरे वाले महापुरुष ने...।" इतना कह अमर क्षण भर को रुका, मौसी की आंखों में उलझन के भावों को गहराते देख वह आगे बोला- "क्या भूल गई मौसी ? इस घर को खरीदने की दूसरी शर्त यह थी कि इस घर में बच्चे न रहें तो अच्छा है। अब मौसी, मैं अगर शादी कर लेता तो इन आठ सालों में कितने बच्चे आपके दांए बांए खेल रहे होते, तो फिर हम कहां जाते...!"

अमर के इस जवाब पर रेखा, बेअख्तयार मुस्करा दी, बोली- "आप भी कमाल करते हैं भाई। आपने इस कारण अब तकं शादी नहीं की?"

"अरे रेखा, तुम किसकी बातों में आ रही हो।" मौसी बोल उठी- "यह एक नम्बर की चीज है-अमर जिसका नाम है। "

"थैंक गॉड, मौसी ! आपने मुझे दो नम्बर की चीज नहीं कहा। अमर हंस दिया।

"भाई एक बात बताए ।" रेखा ने संजीदगी अपनाई ।

" एक नहीं दो बात पूछे। लेकिन ये बातें शादी के बारे में नहीं होंगी।"

"ठीक है।" रेखा खुलकर मुस्कराई "मैं तो यह पूछ रही थी कि उस रहस्यमय कमरे को कभी किसी ने खोलने की कोशिश की। "

"नहीं, आज तक नहीं।" अमर संजीदा होते बोला "लेकिन यह ख्याल आपके दिल में क्यों आया?"

"बस ऐसे ही...।" रेखा बोली- "हो सकता है यह दरबाजा बन्द ही न हो। क्यों न यह देख लिया जाए कि वह बन्द है या खुला हुआ। अगर खुला हो तो फिर अन्दर जाने की हिम्मत की जाए। आखिर पता तो चले कि बन्द दरवाजे के पीछे क्या है?"

"आपका मतलब है कि वह दरवाजा लॉक्डनहीं है?" अमर ने सीधा सवाल किया।

“हां-हो भी सकता है। क्योंकि आपमें से किसी ने उस दरवाजे के हैण्डल को घुमाने की कोशिश नहीं की है या की है?"

"नहीं की... और वह इसलिए नहीं कि इस बंगले को बनवाने वाले, इसके पिछले मालिक मिस्टर वासूदेव ने इस सिलसिले में हमें सख्ती से मना किया था। इस कमरे की कहानी अब तुम भी जानती हो। हम खामखाह ही कोई मुसीबत क्यों मील लेते। वैसे में इस कमरे को बांधने वाले आमिल रोशन अली के क्वार्टर पर गया था। मालूम हुआ है कि वो अलीगढ़ शिफ्ट कर गए हैं।"

मौसी बोल उठी- "रेखा यह तुम्हारे सिर पर उस कमरे का भूत क्यों सबार है। तुम आखिर क्या करना चाह रही हो। पहले ही इस घर में क्या कम रहस्यमय, समझ में न आने वाली घटनाएं घट रही हैं। उस रात का वाक्या जब भी याद आता है दिल धड़धड़ करने लगता है।"

"अरे, मौसी । आप दिन-ब-दिन इतनी कमजोर दिल क्यों होती जा रही हैं। आप डरे नहीं। मैं करूंगी यह काम !"

रेखा ने दृढ़ स्वर में कहा ।

"शीsss!" गंगा मौसी ने होठों पर उंगली रखकर उसे बोलने से मना किया।

रेखा ने देखा कि माया आ रही है। वह खामोश हो गई। नाश्ता बड़ी बेदिली से हुआ। नाश्ते के बाद जब माया बर्तन समेटकर किचन में चली गई तो रेखा अमर से सम्बोधित हुई। पूछा-

"आप क्या चाहते हैं...?"

"भई, आप जब लेडिज होकर भी दुस्साहस दिखाने को तैयार हैं- फिर मैं तो मर्द हूँ। मैं भला पीछे कैसे हट सकता हूँ।"

रेखा खिल उठी, हर्षित-सी बोली- "ये हुई ना बात तो फिर चलिये चलकर देखते हैं। नेक काम में देर काहे की...!"
 
"रेखा...रेखा....कुछ होश से काम लो। बावली हुई हो क्या?" मौसी हड़बड़ा गई।

"मौसी, जल दरवाजा बंद ही है तो फिर हमारे हाथ लगाने से थोड़े ही खुल जाएगा। हम कोई ताला तोड़कर तो कमरे में घुस नहीं रहे, हम तो सिर्फ हैण्डल घुमाकर देखेंगे अगर ताला खुला हुआ, तो जरा-सा दरवाजा खोलकर देखेंगे।" रेखा बड़े शान्त भाव से बोली थी।

"मौसी अपनी यह रेखा कह तो ठीक रही है।"

"तुम दोनों का दिमाग खराब हो गया है। जो मर्जी आए करो। मैं तो जाती हूँ अपने कमरे में...।" गंगा मौसी अपने घुटनों पर हाथ रखकर उठने लगी। "ठीक है, मौसी। आप चलें अपने कमरे में, हम अभी आकर आपको रिपोर्ट देते हैं।" रेखा भी कुर्सी पीछे खिसकाकर

खड़ी हो गई।

रेखा के दिल में जरा सा भी भय न था। वह जानती थी कि दरवाजा खुला हुआ है और अब उस कमरे में कुछ नहीं है, जो था वह रुख्यत हो चुका है। इसलिए वह निर्भय-सी आगे बढ़ने लगी, अमर उसके पीछे-पीछे था। गंगा मौसी अभी कमरे से निकल नहीं पाई थी।

रेखा व अमर उस रहस्यमय दरवाजे के सामने आकर रुक गए। अमर को हालाकि इस बंगले में शिफ्ट ङ्गा सात अठ साल हो चुके थे मगर उसने आज तक इस दरवाजे को गौर से नहीं देखा था। आज उसने पहली बार इस दरवाजे को बड़े ध्यान से देखा ।

दरवाजा बंद था। वह ताबीज काले कपड़े में सिला हुआ था और नायलोन की काली डोरी उसमें लगी हुई थी। स्टील के हैण्डल में उस काली डोरी को तीन चार बल टेकर ताबीज लटका दिया गया था। डोरी इस तरह हैण्डल के गिर्द लपेटी गई थी कि यह ताबीज गिर नहीं सकता था।

अमर दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ा तो रेखा ने उसे रोक दिया था और खुद आगे बढ़कर हैण्डल पर हाथ रख

दिया।

अमर का दिल धाड़-धाड़ करने लगा। रेखा भी किंचित परेशान हुई थी, इस बीच उसने हैण्डल पर दबाव डालकर उसे घुमाना चाहा। हैण्डल जरा-सा घूमा लेकिन दरवाजा न खुला।

दरवाजा लॉक्ड था।

रेखा ने हैण्डल को दो-तीन बार ऊपर नीचे किया, दरवाजा खोलने के लिए जोर लगाया। लेकिन दरवाजा नहीं खुला। तब वह गहरी सांस लेकर पीछे हट गई। उसे बड़ी हैरत हो रही थी। उसने एक बार नहीं तीन वार मुस टरवाजे को खोला था और उसने जब भई हैण्डल पर हाथ रखा था दरवाजा खुल गया था। वह रात ही को इस कमरे में गई थी उस लंगड़े व्यक्ति से मिली थी जो राजसी पौशाक में था।

"क्या... क्या वह सब उसका भ्रम था? उसकी कल्पनाओं की उड़ान थी। उसके जहन की करिश्मासाजी थी। "

"भाई, आप जरा कोशिश करें...।"

अमर ने आगे बढ़कर हैण्डल पर जोर देकर ऊपर-नीचे किया। मगर दरवाजा नहीं खुला।

खुलता कैसे दरवाजा लॉक्ड था।

"यह लॉक्ड है, रेखा।" अमर बोला।

अब रेखा कैसे कहती अब तक यह दरवाजा लॉक्ड नहीं था। वह तीन बार इस दरवाजे को खोल चुकी है। एक बार तो इस कमरे के अन्दर भी जा चुकी है। वह यह सब नहीं कह सकती थी। वर्ना उसे सचमुच ही पागल समझ लिया जाना था।

रेखा को अब अपने आप पर संदेह होने लगा था। यह उसे क्या हो रहा था। क्या वह किसी दिमागी बीमारी का
 
हो गई थी? इन्ही विफरी सोचो के बीच उसे ध्यान आया कि उस लंगड़े प्रेतराज ने उसे एक तोहफा दिया था।

"मुझे जाकर वह डायरी देखनी चाहिये...?" उसने सोचा था।

"अरे क्या हुआ?" पीछे से गंगा मौसी की आवाज आई। वह धीरे-धीरे चलती अब पहुंची थी और अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ी हुई इन्हें परेशान नजरो से देख रही थी।

"दरवाजा लॉक है, मौसी!" अमर ने उन्हें बताया। "मेरे लिए यह कौन-सी नई बात है। यह बात तो मैं जब से इस घर में आई हूँ जानती हूँ-पिछले सात-आठ सालों से।" मौसी बड़बड़ाती हुई अपने कमरे में चली गई।

फिर अमर ने भी कुछ कहे बिना अपने कमरे का रुख किया। उसे ऑफिस के लिए तैयार होना था।

और अब रेखा दरवाजे के सामने अकेली रह गई थी। उसने ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाए लेकिन दो-चार कदम चलकर वह ठिठकी और वापस पलटी। उसने सोचा एक कर फिर क्यों न दरवाजे को आजमाये ! अब वह अकेली थी सो शायद... ।

उसने बड़ी सावधानी से दरवाजे के हैण्डल पर हाथ रखा...नीचे की तरफ दबाव डाला।

हैण्डल नीचे हो गया, लेकिन दरवाजा न खुला।

दरवाजा वाकई लोक था।

अब वह अपने प्रति चिन्तित हो उठी थी। अब वह विश्वास व अविश्वास जैसी दुविधा में फंसकर रह गई थी। होने या ना होने का दारोमदार अब उस डायरी पर था, जो उसने एक कैसेट कवर में कैसों के बीच छिपाकर रखी थी।

वह तेजी से सीढियां चढ़ती हुई ऊपर पहुंची। दरवाजा बन्द किया और फिर धड़कते दिल से कैसों के रेक की तरफ

बढ़ी।

निकट जाकर उसने पंक्तिबद्ध कैसटों पर निगाह डाली तो उसे वह कैसेट कवर नजर आ गया जिस पर काई लेबल नहीं लगा था। उसने जल्दी से वह कवर बाहर निकाला और उस कवर में रखा डायरी बाहर खींच ली।

चमड़े की जिल्द वाली खूबसूरत डायरी मौजूद थी। रेखा ने आखें बन्द करके भगवान का शुक्रिया अदा किया। अगर यह डायरी न मिलती तो वह अपनी ही नजरों में खुद को पागल मानने को मजबूर हो जाती और यह सोचने को विवश हो जाती कि अब तक जो भी हुआ उसके जहन की कल्पना मात्र ही थी। और अब वह सोच रही थी कि लंगड़े प्रेतराज का तोहफा मौजूद था और उसे यह तोहफा उसी काले कमरे के अन्दर दिया गया था। वह कमरे में किस तरह गई थी ? कमरे का दरवाजा अगर उस वक्त खुला था तो अब किस तरह बन्द हो गया था?

आखिर यह सब क्या रहस्य था?

यही क्या... रेखा की जिन्दगी में तो वैसे भी बहुत से रहस्य थे। उसकी जिन्दगी किसी पहेली से कम न थी। चारों तरफ इशारे ही इशारे थे और इशारों का कोई हल न था। कुछ समझ में नहीं आता था। लोग उसे शीना क्यों कहते थे? देवगत दादा हरि ओम ने उसका असली नाम शीना बताया था। शीना अपने आप में एक रहस्यपूर्ण नाम था।

फिर वह रहस्यमय व्यक्ति 'काला चिराग' "उसने भी उसे शीना ही कहा। रेखा नहीं जानती थी कि उसका यह नाम

किसने रखा, कब रखा? उसने तो जब से होश सम्भाला था अपना नाम रेखा ही सुना था।

उसकी जिन्दगी से जुड़ा एक रहस्य यह भी तो था कि वह जिस घर में पली थी और जिनको अपना मां-बाप समझती रही थी ये उसके मां-बाप न निकले थे। दिल्ली से उसे यहां क्यों भेजा गया? बलदेव अंकल उसे दिल्ली क्यों नहीं बुलाते थे?"

फिर वह रहस्यमय सपना... दादा हरि ओम का लिफाफा... यह काला कथित प्रेतग्रस्त कमरा... एक सिलसिला था सवालों का सवाल ही सवाल थे और जवाब किसी के कसके पास न था
 
रेखा के दिल में एक हूक-सी उठी। काश! कोई ऐसा होता जो उसकी जात से पर्दा उठा सके...जो बता सके कि वह कौन है ? काश कोई बता सकता? बड़ी तीव्र इच्छा थी यह रेखा की... और इन सब बातों के बारे में उसने आज तक नहीं सोचा था।

"कहां से पायेगी वह अपनी 'पहेली जिन्दगी' का हल कौन बताएगा यह सब उसे? वह बेचैनी सी महसूस करने लगी। अजीब सी मानसिक उद्वियता? डायरी उसके हाथ से छूटकर कालीन पर जिर पड़ी। उसने झुककर डायरी उठाई और बैड पर बैठकर यू ही उसके पन्ने खोलकर देखने लगी।

और अब उसने डायरी के कुछ पन्नों पर कुछ लिखा हुआ देखा। वह चौंकी। यह क्या? उसने जब डायरी कवर में रखी तो उसमें कुछ भी लिखा न था । पूर्णत: सफेद-साफ पत्रे देखकर वह तब हैरान हुई थी। पर अब उसी डायरी के कुछ पृष्ठों पर कुछ लिखा नजर आ रहा था। वह इन पन्नों को देखने लगी।

बड़ा ही खूबसूरत सुलेख था। एक-एक शब्द मोतियों की तरह टका हुआ था। यह लेख काली स्याही से लिखा गया

था। रेखा ने पहला पन्ना सामने किया और पढ़ने लगी। लिखा था-

"तुम परेशान क्यों होती हो? हम बताएंगे तुम्हें कि तुम कौन हो? तुम्हें तुम्हारे दिमाग में उठने वाले हर सवाल का जवाब मिलेगा। चलो, पहले अपने बारे में जान लो फिर जो चाहे सवाल कर लेना।'

"तुम्हारे पिता एक बहुत बड़े जमींदार के बेटे थे। तुम्हारे दादा सर निहाल चंद बड़े असरों रसूख के प्रभावशाली आदमी थे। उन्होंने अंग्रेजों से 'सर' का खिताब पाया। बड़े नेक दिल इन्सान थे। सावनपुर में उन्होंने अपने रहने के लिए जो हवेली बनवाई थी वह अपने तर्ज की अनोखी थी। दूर-दूर से लोग इस हवेली को देखने आया करते थे। सर निहाल चंद को देहात की जिन्दगी बहुत पसन्द थी, लेकिन उनके बेटे यानी तुम्हारे पिता कृष्ण कांत ग्रामीण जिन्दगी से एलर्जिक थे, उन्होंने तुम्हारे दादा से जिद्द करके मॉडल टाऊन-दिल्ली में एक कोठी बनवा ली थी। मॉडल टाऊन की उसी कोठी में रहते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। तुम्हारे पिता कृष्ण कांत भी तुम्हारे दादा की तरह ही एक नेक नियत इंसान थे। उन्होंने अपनी जिन्दगी में कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया था और उनकी तुलना में तुम्हारे चाचा रमाकांत ने कभी किसी से सीधे मुंह बात नहीं की थी, नेकी करना और गरीबों के काम आना तो दूर की बात है।"

" रमाकांत एक साजिशी जहन का व्यक्ति था। दो बचपन ही से ऐसा शातिर था कि शरारत खुद करता था लेकिन डांट बड़े भाई यानी तुम्हारे पिता को पड़ती थी और तुम्हारे पिता कृष्ण कांत अपने बड़ेपन में उसे माफ कर दिया करते थे। उन दोनों भाईयों की जिन्दगी भर यही आदत रही। तुम्हारे चाचा ने अपनी खलनायिकी न छोड़ी और तुम्हारे पिता ने अपनी फितरत न बदली...।"

"तुम्हारे दादा सर निहाल चंद की मौत के बाद... उनकी वसीयत के अनुसार जमीन और दूसरी जायदाद का बटवारा हुआ। जायदाद के बटवारे के साथ सावनपुर की हवेली भी बंट गई थी। लेकिन तुम्हारे पिता वाले हिस्से पर भी तुम्हारे चाचा का कब्जा था क्योंकि तुम्हारे पिता को देहाती जिन्दगी पसन्द न थी इसलिए वह कभी-कभार ही सावनपुर का रुख करते थे और फिर अपने बाप की मौत के बाद तो उन्होंने सावनपुर का रुख करना ही छोड़ दिया था। इस तरह जमीन-जायदाद और हवेली नाम तो तुम्हारे पिता कृष्णकांत के ही थी लेकिन वास्तविक कब्जा रमाकांत का ही था।"

"तुम्हारे पिता साल... छ: महीने बाद सावनपुर आकर अपनी जमीनों की आमदनी ले जाया करते थे और सावनपुर कभी रुपये-पैसे की गर्ज से नहीं आते थे। असल में उन्हें शिकार का शौक था। वह यहां शिकार खेलने के लिए जाया करते थे और तुम्हारा चाचा रमाकांत, जमीनों की आमदनी के नाम पर कुछ रकम उनक ब्रीफकेस में रख दिया करता- था। कृष्णकांत ने कभी भी अपने भाई से अपनी जायदाद और आमदन का हिसाब नहीं लिया था। लेकिन रमाकांत बड़े हिसाब-किताब वाला आदमी था। वह बड़ी खूबसूरती से एक-एक पाई का हिसाब रखे हुए था और एक-एक कदम बहुत सोच-समझ और होशियारी से उठा रहा था।"

"तुम्हारे पिता आर्ट की दुनिया के आदमी थे। साहित्य व शेरो-शायरी से लगाव था। खुद भी शेयर कहते थे। पेंटिंग का भी शौक था। अपना शौक पूरा करने के लिग उन्होंने दिल्ली में एक निजी 'गैलरी' खोल रखी थी। इस आर्ट गैलरी के साथ ही उन्होंने एक रेस्तरां भी खोल रखा था। रुपये-पैसे की उनके पास कोई कमी नहीं थी। यह व्यवसाय उन्होंने महज अपने दिल बहलाव के लिए खोल रखे थे।"

"तुम्हारे पिता ने अभी तक शादी नहीं की थी जबकि तुम्हारे चाचा की शादी तुम्हारे दादा की जिन्दगी में ही हो गई
 
थी। उसके तीन बेटे थे। सूरज, दीपक और विजय। "

"तीनों हवेली में दनदनाते फिरते थे उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। "

"तुम्हारे पिता ने अभी तक शादी नहीं की और शादी न करने की कोई खास वजह भी न थी। उनके शुगल व उनकी व्यस्तताएं ही कुछ ऐसी थी कि उन्हें फुरसत न मिलती थी। जिन्दगी बस यूं ही गुजरती जाती थी। तुम्हारे दादा न इस तरफ तवज्जो दिलवाई लेकिन वह बस हंसकर टाल जाते। मां थी नहीं। वह दो बेटों को जन्म देकर कब की परलोक सिधार चुकी थी। अपनी बीवी से सर निहाल चंद को इतनी मुहब्बत थी कि उन्होंने उसके बाद दूसरी शादी करने के बारे में सोचा तक न था और बेटों की शादी में मांओ की दिलचस्पी ज्यादा होती है। वही जिद करके बेटों को शादी के लिए मजबूर कर देती है। यहां कोई जिद करने वाला नहीं था और कृष्णकांत को शादी करने का कोई शौक नहीं था फिर तुम्हारे चाचा तो यही चाहते थे कि बड़ा भाई शादी न करे तो अच्छा ही है कि शादी होगी तो औलाद भी होगी और औलाद होगी तो जमीन-जायदाद भी बंट जाएगी। रमाकांत तो अपने बड़े भाई के सामने शादी के बाद की समस्याओं का रोना रोते, उन्हें शादी से दूर रहने को ही उकसाता रहता था, वह औलाद की मुसीबत कहता था और तुम्हारे बाप को खुशनसीब कहता था कि उन्होंने शादी न करके बड़ी अक्लमंदी का सबूत दिया था और वह हर तरह के जंजाल से बचे हुए हैं।"

“लेकिन बीबी-सच यह है कि किसी के चाहने या न चाहने से भी कभी कुछ होता है। फिर शादी का मामला तो सीधे तकदीर और संजोग से जुड़ा होता है। जब तकदीर इंसान की जिन्दगी में महकते -महकाते खुशगवार लम्हें लाना चाहती है तो वैसे ही संयोग पैदा कर देती है।"

"तुम्हारे पिता कृष्णकांत चालीस साल के होने को आए थे। शादी का ख्याल कभी उनके जहन में आया भी था तो अब इतनी उम्र हो जाने के बाद वह जहन से विल्कुल ही निकल गया था। पर तभी अचानक एक युवती तुम्हारे पिता कई जिन्दगी में आ गई।

तुम्हारे पिता ने अपनी आर्ट गैलरी में एक आर्टिस्ट की चंद पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाई थी। उन्होंने कुछ बहुत ही खास

लोगों को वह प्रदर्शनी देखने को आमन्त्रित किया था। वह युवती सारिका उस प्रदर्शनी में किसी मेहमान के साथ आई

थी। जब उस मेहमान ने सारिका नाम की इस युवती का परिचय तुम्हारे पिता से करवाया तो वह परिचय ही जिन्दगी

भर का सम्बन्ध बन गया। "

"पहली मुलाकात में जैसे दोनों ने जाना कि वे एक-दूसरे के लिए बने हैं। जब दो अजनबी एक-दूसरे को देखकर यह महसूस करने लगें कि हम एक-दूसरे से सदियों से परिचित हैं तो फिर यह मदमाता अहसास एक खुशगवार बंधन में बंध जाता है। वे मिले-मिलते रहे और फिर जल्दी ही उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया।

"तुम्हारे चाचा रमाकांत ने जब यह खबर सुनी तो उन्होंने जाहिरा तो बड़ी खुशी दिखाई, लेकिन अन्दर ही अन्दर उनके सीने पर सौप लौटने लगे। और अगर उसके लिए किसी तोर भी सम्भव होता तो वह यथासम्भव शादी को रोक देता। लेकिन वह बेबसी से हाथ मलता रह गया और तुम्हारे बाप ने शादी कर ली।”

"तुम्हारी मां सारिका, एक बहुत ही सुलझी हुई औरत थी। वह खुद बड़े बाप की बेटी थी। इसलिए धन-दौलत से उसे कोई लगाव नहीं था। उसकी जगह कोई दूसरी औरत होती तो वह अपने पति की विशाल जायदाद और सम्पदा जानकर उस पर अपना कब्जा करने की कोशिश जरूर करती सारिका ने देखा कि उसके पति को पुश्तैनी जमीन-जायदाद से कोई लगाव नहीं है तो उन्होंने भी इस बारे में उनसे कभी कोई बात नहीं की।"

"तुम्हारा चाचा रमाकांत बहुत खुश था क्योंकि शादी को एक साल से ऊपर हो गया था और किसी बच्चे के जन्म की कोई खबर नहीं आई थी। तुम्हारे पिता कृष्णकांत, माडल टाऊन वाली कोठी में सन्तुष्ट - अप्रसन्न जिन्दगी बिता रहे थे। तुम्हारे चाचा ने कई बार उन्हें सावनपुर आने को कहा था लेकिन तुम्हारे पिता वहां जाने से कतराते थे। शादी के तुरन्त बाद बस एक बार ही वह सावनपुर गए थे।

"बहरहाल, अब तुम्हारे चाचा-चाची को बस यही चिन्ता लगी रहती थी कि अगर कृष्णकातं के यहां अगर कोई वारिस आ गया तो क्या होगा? वो नहीं चाहत थे कि हाथों में आई जायदाद वारिस आ जाने के बाद हाथ से निकल जाए। चाचा-चाची ने उन दोनों यानी तुम्हारी मां और बाप पर टोने टोटके भी करवाए। लेकिन बच्चे तो भगवान की देन होते हैं। वे ना किसी के चाहे पैदा होते हैं और न ही किसी के चाहे रोके जा सकते हैं। सृष्टि का स्वामी ही इन्सानों को वारिस दे सकता है।"
 
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