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दुश्मनी की वजह से ही उनकी शादी न हो सकी थीं लेकिन उन्होंने अपनी मुहब्बत को रूसवा न होने दिया था।
गंगा मौसी को दिल्ली छोड़ एक लम्बा समय हो चुका था। अपने जीजा के स्वर्ग सिधार जाने के बाद गंगा मौसी स्थाई रूप से अपनी बहन के साथ ही आकर रहने लगी थी और उनकी बहन का एक ही बेटा था अमर बहन भी चल बसी तो अमर और वह अकेले रह गए। गंगा मौसी को विरासत में जो कुछ मिला था वह सब उन्होंने अमर के सुपुर्द कर दिया। अमर कन्सट्रैक्शन के धन्धे में था। बंगले बनाकर बेचता था। वह गंगा मौसी से आठ-दस साल छोटा था और अब चालीस साल के लपेटे में था शादी अमर ने भी नहीं की थी और न ही करने का इरादा रखता था। कहता वह यही था कि मैं शादी नहीं करूंगा लेकिन क्यों नहीं करेगा यह आज तक उसने किसी को नहीं बनाया था।
बताया तो खैर गंगा मौसी ने भी किसी को कुछ नहीं था। वह तो रेखा को फोन पर उनकी द बलदेव अंकल की बातचीत से कुछ-कुछ अंदाजा हुआ था और तब रेखा ने गंगा मौसी से बहुत सारे सवाल किए थे ओर रेखा की जिद पर गंगा मौसी को अंतत अपनी कहानी सुनानी पड़ी थी और यूं रेखा इस प्रेम कहानी की पहली राजदार बनने का सौभाग्य पा सकी थी।
रेखा में ऐसी कोई बात थी ही कि उससे अपने दिल की बात कहने को जी चाहता था और वह खुद ऐसी थी कि अपने दिल की बात किसी को नहीं बताती थी। और इसकी वजह शायद यही थी कि वह किसी को भी अपना हमदर्द व हमराज न पाती थी। यही वजह थी कि उसने अपने भीतर ही अपनी एक दुनिया आबाद कर ली थी।
हां! रेखा जब अकेली होती तो हकीकतन तब भी अकेली न होती थी। सोचों की ख्यालों की एक भीड़ होती थी। वह जागती आंखों से खाब देख रही होती। उसकी कल्पना शीलता, संवेदन शीलता भी बड़ी अनूठी और शक्तिशाली थी। अगर वह टेलीविजन पर हिमपात का, दर्क गिरने का सीन देख रही होती और अगर वह चाहती कि वह खुश इन दृश्यों का हिस्सा बन जाए तो वह अपनी कल्पनाओं के जरिये उन दृश्यों का हिस्सा बन जाती थी। उसे फौरन ही ठण्डक महसूस होने लगती थी।
बहरहाल, आज भी अंकल की फोन काल ने रेखा को उलझा दिया था। उन्होंने रेखा को अभी कुछ और समय यहीं रहने को कहा था। ऐसा क्यों था, यह रेखा नहीं जानती थी। रेखा यह भी नहीं जानती थी कि बलदेव अंकल उसे यहां क्यों छोड़ गए थे और उसकी ख्याहिश के बावजूद उसे दिल्ली क्यों नहीं बुलाते थे? आखिर उनकी क्या समस्या थी? अंकल यह भी नहीं बताते थे बस हंसकर टाल जाते थे या कहते थे अच्छा बताऊंगा-सन करो। "
पर अब तो हालात के रंग ही दूसरे थे।
रेखा को जब से वह सपना दिखाई देना शुरू हुआ था, वह मानसिक रूप से उलझनों का शिकार होकर रह गई थी। उसके दिल का चैन लुट गया था। घटनाएं भी तो होश उड़ाने वाले हो रहे थे वह डरावना खाब-बड़े दादा का लिफाफा - रहस्यमय शख्स का उल्लू दे जाना... उल्लू का खून...खून आलूदा कदमों के निशान... रहस्यमय कमरा... कमरे में जाने की तीव्र इच्छा... कमरे का बन्द न होना...।
दोपहर का खाना खाकरें रेखा अपने बैड पर लेटी हुई यह सब ही सोच रही थी कि सहसा उसके दिल में एक लहर-सी उठी। आंखें बन्द-सी होने लगीं। उसके कानों में जैसे कोई कह रहा था कि चलो रेखा उस रहस्यमय कमरे में चलो।
और यह खवाहिश इतनी तीव्र थी कि रेखा किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह उठ गई।
फिर मंत्र-मुग्ध सी ही वह नीचे पहुंची तो उसे कोई दिखाई नहीं दिया। गंगा मौसी अपने कमरे में थीं और उनका दरवाजा बन्द था। माया भी अपना काम समेटकर अपने कमरे में जा चुकी थी और ऊपर तो घर में कोई था ही नहीं।
रेखा बड़े इत्मिनान से चलती हुई उस रहस्यमय कमरे के सामने पहुंच गई। दरवाजे के हैण्डल पर हल्का दबाव
डालकर उसने दरवाजा खोला।
बंद दरवाजा अभी थोड़ा-सा खुला था कि भीतर से एक मर्दाना आवाज उभरी-
" अभी नहीं, रात को आना...।"
इस आवाज में एक आदेश था नम्रता या निमन्त्रण नहीं था। बड़ी गूंजदार आवाज थी। लहजा अगर सख्त नहीं तो नर्म भी नहीं था। कोई व्यक्ति अपने काम में मग्न तथा व्यस्त हो और आप उसकी एकाग्रता में खलल बनना चाहें तो फिर
गंगा मौसी को दिल्ली छोड़ एक लम्बा समय हो चुका था। अपने जीजा के स्वर्ग सिधार जाने के बाद गंगा मौसी स्थाई रूप से अपनी बहन के साथ ही आकर रहने लगी थी और उनकी बहन का एक ही बेटा था अमर बहन भी चल बसी तो अमर और वह अकेले रह गए। गंगा मौसी को विरासत में जो कुछ मिला था वह सब उन्होंने अमर के सुपुर्द कर दिया। अमर कन्सट्रैक्शन के धन्धे में था। बंगले बनाकर बेचता था। वह गंगा मौसी से आठ-दस साल छोटा था और अब चालीस साल के लपेटे में था शादी अमर ने भी नहीं की थी और न ही करने का इरादा रखता था। कहता वह यही था कि मैं शादी नहीं करूंगा लेकिन क्यों नहीं करेगा यह आज तक उसने किसी को नहीं बनाया था।
बताया तो खैर गंगा मौसी ने भी किसी को कुछ नहीं था। वह तो रेखा को फोन पर उनकी द बलदेव अंकल की बातचीत से कुछ-कुछ अंदाजा हुआ था और तब रेखा ने गंगा मौसी से बहुत सारे सवाल किए थे ओर रेखा की जिद पर गंगा मौसी को अंतत अपनी कहानी सुनानी पड़ी थी और यूं रेखा इस प्रेम कहानी की पहली राजदार बनने का सौभाग्य पा सकी थी।
रेखा में ऐसी कोई बात थी ही कि उससे अपने दिल की बात कहने को जी चाहता था और वह खुद ऐसी थी कि अपने दिल की बात किसी को नहीं बताती थी। और इसकी वजह शायद यही थी कि वह किसी को भी अपना हमदर्द व हमराज न पाती थी। यही वजह थी कि उसने अपने भीतर ही अपनी एक दुनिया आबाद कर ली थी।
हां! रेखा जब अकेली होती तो हकीकतन तब भी अकेली न होती थी। सोचों की ख्यालों की एक भीड़ होती थी। वह जागती आंखों से खाब देख रही होती। उसकी कल्पना शीलता, संवेदन शीलता भी बड़ी अनूठी और शक्तिशाली थी। अगर वह टेलीविजन पर हिमपात का, दर्क गिरने का सीन देख रही होती और अगर वह चाहती कि वह खुश इन दृश्यों का हिस्सा बन जाए तो वह अपनी कल्पनाओं के जरिये उन दृश्यों का हिस्सा बन जाती थी। उसे फौरन ही ठण्डक महसूस होने लगती थी।
बहरहाल, आज भी अंकल की फोन काल ने रेखा को उलझा दिया था। उन्होंने रेखा को अभी कुछ और समय यहीं रहने को कहा था। ऐसा क्यों था, यह रेखा नहीं जानती थी। रेखा यह भी नहीं जानती थी कि बलदेव अंकल उसे यहां क्यों छोड़ गए थे और उसकी ख्याहिश के बावजूद उसे दिल्ली क्यों नहीं बुलाते थे? आखिर उनकी क्या समस्या थी? अंकल यह भी नहीं बताते थे बस हंसकर टाल जाते थे या कहते थे अच्छा बताऊंगा-सन करो। "
पर अब तो हालात के रंग ही दूसरे थे।
रेखा को जब से वह सपना दिखाई देना शुरू हुआ था, वह मानसिक रूप से उलझनों का शिकार होकर रह गई थी। उसके दिल का चैन लुट गया था। घटनाएं भी तो होश उड़ाने वाले हो रहे थे वह डरावना खाब-बड़े दादा का लिफाफा - रहस्यमय शख्स का उल्लू दे जाना... उल्लू का खून...खून आलूदा कदमों के निशान... रहस्यमय कमरा... कमरे में जाने की तीव्र इच्छा... कमरे का बन्द न होना...।
दोपहर का खाना खाकरें रेखा अपने बैड पर लेटी हुई यह सब ही सोच रही थी कि सहसा उसके दिल में एक लहर-सी उठी। आंखें बन्द-सी होने लगीं। उसके कानों में जैसे कोई कह रहा था कि चलो रेखा उस रहस्यमय कमरे में चलो।
और यह खवाहिश इतनी तीव्र थी कि रेखा किसी सम्मोहित व्यक्ति की तरह उठ गई।
फिर मंत्र-मुग्ध सी ही वह नीचे पहुंची तो उसे कोई दिखाई नहीं दिया। गंगा मौसी अपने कमरे में थीं और उनका दरवाजा बन्द था। माया भी अपना काम समेटकर अपने कमरे में जा चुकी थी और ऊपर तो घर में कोई था ही नहीं।
रेखा बड़े इत्मिनान से चलती हुई उस रहस्यमय कमरे के सामने पहुंच गई। दरवाजे के हैण्डल पर हल्का दबाव
डालकर उसने दरवाजा खोला।
बंद दरवाजा अभी थोड़ा-सा खुला था कि भीतर से एक मर्दाना आवाज उभरी-
" अभी नहीं, रात को आना...।"
इस आवाज में एक आदेश था नम्रता या निमन्त्रण नहीं था। बड़ी गूंजदार आवाज थी। लहजा अगर सख्त नहीं तो नर्म भी नहीं था। कोई व्यक्ति अपने काम में मग्न तथा व्यस्त हो और आप उसकी एकाग्रता में खलल बनना चाहें तो फिर