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स्वाहा

"शादी के दो साल बाद कृष्णकांत के यहां लड़का पैदा हुआ। उसका नाम इन्द्रजीत रखा गया। इन्द्रजीत के जन्म ने

सावनपुर की हवेली पर मातम की चादर बिछा दी। जबकि तुम्हारे मां-बाप बहुत खुश थे।" "हा, भाई के नाम पर चौको मत। तुम्हारा एक सगा भाई इस दुनिया में मौजूद है। वह इन वक्त कहां व किस हालात में यह बाद में जान सकोगी। फिलहाल यह सुनो कि इन्द्रजीत के जन्म ने तुम्हारे चाचा के गान में कैसी आग भर दी।

उसके सारे टोने टोटके बेकार गए।"

." इन्द्रजीत बहुत ही बुद्धिमान लड़का था। दस बारह साल की उम्र तक पहुंच-पहुंचते उसने बहुत कुछ सीख लिया। तैराकी, घुड़सवारी, ड्राईविंग, कुश्ती, निशानेबाजी, उसकी उठान भी बहुत अच्छी थी। वह बारह साल की उम्र मे भी चौदह, 'पन्द्रह साल का लगता था। और तुम्हारे पिता कृष्णकांत की पसन्द के विपरीत उसे दिहात की जिन्दगी से बहुत लगाव था। उसका बस नहीं चलता था कि वह सावनपुर में ही स्थाई रूप से आ रहे। इन्द्रजीत ने यह भी बहुत जल्द जान लिया था कि उसके चाचा ने अपने बड़े भाई के सीधेपन से खूब फायदा उठाया था। इन्द्रजीत जान गया था कि उसके बाप की जमीन-जायदाद कितनी है।"

"और... फिर, जव रमाकांत ने इन्द्रजीत को सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित हो उठा और लगा विभिन्न तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उते कोई खतरा न था क्योंकि वह चौब्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुंच रहा था। मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था अगर उसे फौरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।'

"खलनायिकी फितरत वाले रमाकांत का शातिर दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को लेकर विभिन्न मंसूबों पर सोच-विचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इस तकदीर अपना खेल खेल रही थी। रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकांत के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और वारिस दुनिया में आ गया।"

" और वह तुम थीं। बारह वर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकांत के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए।

कृष्ण कांत को बेटी की बहुत ख्याहिश थी। उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई।"

"तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकांत के तेवर बदलने लगे थे। और इन तेवरों को कृष्णकांत भलीभांति समझ रहे थे। इन्द्रजीत जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से धड़कने लगता। वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे लेकिन दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अंदेशे से उठते थे और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यूं जब इन्द्रजीत अपने बॉडीगार्डो के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकांत की आंखों में किसी कांटे की तरह चुभ जाता।"

" और फिर अन्ततः तुम्हारे चाचा रमाकांत ने एक मंसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है। रमाकांत का छोटा बेटा विजय हालांकि इन्द्रजीत से उस में बड़ा था, लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्टता थी। सावनपुर में वे जहां भी जाते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शौक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुंचा तो हमेशा की तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम वन गया। "

" रमाकांत ने इस बार सारी योजना बना रखी थी। इन्दजीत के दोनों बॉडीगार्डो को दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह-सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चेचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने के लिए निकला - तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बॉडीगार्ड गहरी नींद सो रहे हैं, बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रातभर ताश खेलते रहे होंगे। पर इन्द्रजीत को शिकार पर अपने इन बॉडीगार्डों की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोड़कर शिकार पर निकल गया।"

" और फिर.... अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं। तुम अंदाजा लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी। भई, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी। यह खुशखबरी कृष्णकांत को पूरे

बारह साल बाद मिली थी। जब नर्स ने एक फूल सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थे इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीं हुई थी। तुम्हारे पिता को लड़कियां बहुत पसन्द थीं। वह तुम्हारे जन्म को बड़ी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेकिन वक्त ने
 
कुछ और ही गुल खिला दिया।"

"एक अच्छी खबर के बाद फौरन ही एक दूसरी बुरी खबर मिली और यह बुरी खबर थी तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के बारे में, और यह खबर लेकर आया था रमाकांत का बड़ा बेटा सूरज । "

"उस वक्त जब तुम्हारा बाप तुम्हारे जन्म की खुशखबरी किसी को सुनाने को बेताब था ऐन उस वक्त सूरज अचानक ही तुम्हारे बाप के सामने आकर खड़ा हो गया था। उसका सिर झुका हुआ था और चेहरे पर वहशत बरस रही थी। ..कृष्णकांत उसकी सूरत देखकर अपनी खुशी भूल गए। उन पर धर्राहट व्याप्त हो गई। तत्काल ही उनके दिमाग में जो पहला ख्याल आया था कि उनके भाई रमाकांत का देहान्त हो गया है। लेकिन रमाकांत भला आसानी से मरने वाली चीज कहां था। यह खबर तुम्हारे चाचा के बजाय तुम्हारे भाई के बारे में थी।”

सूरज... ने बड़े नाटकीय अंदाज में अपना सिर उठाया... बाई फैलाई और तुम्हारे पिता से लिपट कर बेतहाशा रो पड़ा। और रोते-रोते बोला-

"ताया जी, हमारे भाई को डाकू उठा ले गये।"

यह खबर सुनकर कृष्णकांत की जहन में सन्नाटा उतर गया। घबराकर ही पूछा “किस भाई को...?" "हमारे भाई, इन्द्रजीत को...।" सूरज ने अपनी भीगी पलकें पौंछते हुए कहा।

"इस तरह अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो अच्छी-बुरी खबरें एक साथ मिली और उनका हाल हुआ सो हुआ। लेकिन जब तुम्हारे चाचा रमाकांत को यह खबर मिली कि बड़े भाई के यहां बारह साल के बाद बच्ची ने जन्म लिया है तो वह खुशी जो इन्द्रजीत को डाकुओं द्वारा उठाए जाने की वजह से हुई थी- दिल में तीर बनकर चुभ गई।

"उसने अपने तोर पर जायदाद का वारिस को मिटाने की कोशिश की थी। लेकिन ऊपर वाले ने उसकी कोशिश को नाकाम बना दिया था। वह बड़े शैतानी मिजाज का आदमी था उसके दिमाग में जो शैतानी आ जाती थी उसे निकालना फिर आसान न होता। जायदाद के लालच ने उसको अंधा कर दिया था। उसके दिमाग में यह बात बैठ चुकी थी कि जायदाद के मालिक यानी तुम्हारे पिता कृष्णकांत को कुछ नहीं कहना है। क्योंकि वह तो खुद ही मौत के करीब होता जा रहा था। कितने बरस और जीता। और जायदाद के वारिसों को छोड़ना नहीं है। ताकि लाठी भी न टूटे और जितने भी सांप राह में आएं मर जाएं। और उस पर कोई उंगली भी नहीं उठा सके।"

"तुम्हार भाई इन्द्रजीत के साथ क्या हुआ? जंगल में उसका अपहरण किसने किया और किसने करवाया.... वो कहां पहुंचा और उस पर क्या बीती? अगर मौका मिला तो यह सब बाद में बताऊंगा, फिलहाल तुम अपने बोरे में जान लो । एक बेनाम सी खटक जो तुम्हारे पिता के दिल में होती रहती थी... और कई अनजाने अन्देशे से जो उनके दिमाग में सिर उठाते रहते थे... इन्द्रजीत के अपहरण ने उन्हें सच साबित कर दिखाया था। वह नहीं चाहते थे कि इन्द्रजीत सावनपुर जाए लेकिन वह लड़का मानता ही नहीं था। आखिर नतीजा सामने आ गया। अब वह अपने भाई की तरफ से शंकित हो गए। उन्हें अन्दाजा हो गया कि रमाकांत क्या चाहता है। लेकिन समस्या यह थी कि वह उनका भाई था बिना सबूत के वह उससे कुछ नहीं कह सकते थे।"

"तुम्हारे पिता बिना प्रमाण के उसकी तरफ उंगली उठाने को तैयार न थें और रमाकांत ऐसा शातिर था कि सबूत छोड़ता न था । तुम्हारे भाई को खत्म करवा के वह बहुत खुश था कि अपनी राह का सबसे बड़ा कांटा निकाल फेंका है। लेकिन तुम्हारे जन्म ने उसके सपनों को खाक में मिला दिया था और यह उसे बर्दाश्त न था । "

"सो उसने अपने दिमाग की कमान में साजिश का एक तीर और चढ़ाया और अब तुम उसके निशाने पर थीं। लेकिन वो जानता था जिस लड़की को निशाना बनाने जा रहा है उसका नाम शीना है जो अपने आप में चीते की खसलत रखती है।"

"जिस नाम को सुनकर तुम बार-बार चौंकती हो। यह अर्थपूर्ण लेकिन प्यारा-सा नाम वास्तव में तुम्हारे दादा सर निहाल चंद को बहुत पसन्द था। वह प्राय: कहा करते थे कि अगर मेरी कोई लड़की हाती तो में उसका नाम शीना रखता। भगवान ने उन्हें कोई लेटी न दी। जब तुमने जन्म लिगा तो तुम्हारे पिता को अपनी पिता की कृष्णा याद आई और इन्होंन तुम्हारा नाम शीना रख दिया।

लेकिन... यह प्यार भरा नाम चल न सका। हालात ने ऐसा पलटा खाया कि तुम्हारा नाम बदलकर रेखा रख दिया गया।
 
इस तरह तुम अपने असली नाम के बारे में कुछ न जान सकी। यह नाम बस कुछेक जहनों में ही सुरक्षित रह गया।"

"तुम्हारे पिता कृष्णकांत अपने भाई की तरफ से शंकित तो हो ही चुके थे, लेकिन उनकी फितरी शराफत ने कोई सीधा व सख्त कदम न उठाने दिया। वह जालिम की बजाय मजलूम बनना पसन्द कर लेते थे। वह मुंह पर जवाबी थप्पड़ मारने की बजाये अपना दूसरा गाल पेश करने के आदी थे।"

" हर कोई उसे समझा रहा था कि तुम्हारा भाई हस्ती मिटाकर, जमीन जायदाद पर कब्जा कर लेना चाहता । इन्द्रजीत

● को भी उसने गायब करवा दिया है और अब उसके बाद शीना का नम्बर है। होशियार हो जाओ। लेकिन जवाब में वह हंसकर कहते - " अरे नहीं ऐसा कैसे हो सकता है?" "लेकिन ऐसा हो रहा था। तुम्हारी मां, तुम्हें जन्म देने के बाद, मुश्किल से तीन माह ही जिन्दा रह सकी। उन्हें अपने इन्द्र से बहुत मुहब्बत थी। उसके गुम होने की खबर ने ही उन्हें दुनिया से बेगाना कर दिया था। कृष्णकांत जब भी

घर लौटते वह बस एक ही सवाल पूछती "मेरा इन्द्र कहां है?"

"तुम्हारे पिता कृष्णकांत कोई छोटे-मोटे आदमी न थे। असीमित असरों रसूख था उनका फिर रुपये पैसे की भी कोई कमी न थी। पुलिस ने सावनपुर के जंगलों का और उस इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा लेकिन इन्द्रजीत का कोई सुराग न मिला। उसका कुछ पता लगता भी कैसे उसे डाकुओं ने उठाया ही कहां था। बहरहाल इन्द्रजीत न मिला, न उसके बारे में कोई खबर मिली और न ही उसकी लाश मिली। तुम्हारी मां अपने बेटे की याद में होश गंवा बैठी और फिर अन्ततः तीन माह की अवधि में तड़प-तड़प कर मर गई। आखिरी सांस लेते बक्त एक फ्रेम की हुई तस्वीर उनके पर रखी हुई थी यह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत की तस्वीर थी। बेटे इन्द्र की गुमशुदगी और सारिका की मौत ने तुम्हारे बाप को हिलाकर रख दिया। वह बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो गए थे। अब उन्हें तुम्हारी चिन्ता दिन-रात खाए जाती थी। कुछ इसके इशारे मिले थे जिससे यह जाहिर होता था कि रमाकांत अब तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है । "

"सो अब सबसे बड़ी समस्या यही सामने थी कि तुम्हारी जिन्दगी कैसे सुरक्षित रखी जाए। तुम्हारे पिता नहीं चाहते थे कि तुम्हारी जान भी, जायदाद की बलिवेदी पर चढ़ा दी जाए। वह तुम्हें तुम्हारे चाचा की पहुंच से और हाथों से हमेशा के लिए महफूज कर लेना चाहते थे। सो उन्होंने एक प्लानिंग की और खूब थी उनकी प्लानिंन। "

"तुम्हारे पिता के एक बहुत अच्छे दोस्त थे रामदास रामदास अम्बाला में रहते थे। उन्होंने रामदास को फोन करके दिल्ली बुलवा लिया। उन्हें सारे हालात बताए और उनसे विनती की कि वह तुम्हें अपने साथ ले जाएं और अपनी बेटी बनाकर तुम्हारी परवरिश करें। उनकी समस्या जमीन-जायदाद की न थी... तुम्हारी जिन्दगी की थी। कृष्णकांत की चिन्ता यही थी कि उन्हें अपनी बेटी की जिन्दगी बचानी हे अगर यह बच गई तो बड़ी होकर अपना हक खुद हासिल कर लेगी और अगर यह मर गई तो फिर जायदाद किस काम की। बेटा पहले ही गायब कर दिया गया था और वह खुद बुढ़ापे के आगन में था । "

"तुम उस वक्त तीन माह की थी जब जुम्हें रामदास के साथ अम्बाला रवाना कर दिया गया। यह काम बड़ी होशियारी और पूरी गोपनियता के साथ किया गया था। रामदास अपनी पत्नी के साथ ओए थे। वे तुम्हें लेकर सकुशल अम्बाला पहुंच गए तो उन्होंने तुम्हारे पिता को यह सूचना दे दी। तुम्हारी कुशलता को सूचना मिलते ही तुम्हारे बाप ने एक खबर तुम्हारे चाचा को भिजवा दी। और यह खबर थी तुम्हारी मौत की। यह खबर सुनकर तुम्हारा चाचा झूम उठा। वह तुम्हारे खून से अपने हाथ से बच गया था। अब उसकी राह में कोई पत्थर न था....कोई दीवार न थी । "

"तुम्हारी मौत की खबर पाकर रमाकांत अपनी बीवी के साथ दुःखी शक्ल बनाए तुम्हारे पिता की कोठी पहुंचा। यह - जग दिखावा भी तो जरूरी था। वह मुश्किल से शाम तक रुका। उसे तो सावनपुर लौटने की जल्दी थी। वह रात को अपनी हवेली में पहुंचकर घी के दीये जलाना चाहता था । "

"तुम्हारे पिता का नाटक सफल रहा। रमाकांत के वहमों-गुमान में भी यह बात न आ सकी कि उसके सीधे से भाई ने उसे खुला फरेब दे दिया है, वह बहुत खुश था। दोनों वारिसों से उसे छुटकारा मिल चुका था। बस, भाई रह गया था तो उसका क्या था, पर वह भी तो असली तोर पर जमीन-जायदाद, हवेली और बागों से दूर था, बहुत दूर। जब तक जीता है, जिये। उसके बेटे दिल्ली जाते तो वे अपने ताया से कुछ न कुछ झाड़ ही लाते थे।"

"संक्षेप में, यह कि तुम मरकर भी अम्बाला में परवरिश पाने लगीं। नाम शीना से बदलकर रेखा रख दिया गया। रामदास तुम्हारे हुए गए और यूं बरसों तक तुम्हें मालूम न हो सका कि रामदास तुम्हारे असली पिता नहीं। "
 
"अम्बाला में तुम रामदास के धराने में पली-बड़ी... शिक्षा प्राप्त की। यहां के कॉलेज में ग्रेज्यूएशन किया। इस बीच तुम्हारे पिता कई बार अम्बाला आकर तुम्हें देख गए थे। तुम्हें उन्हें रामदास के अभिन्न घनिष्ट मित्र की हैसियत से जानती थी। मैट्रिक पास करने के बाद पहली बार तुम दिल्ली गई- रामदास और उनके घर वालों के साथ तुम अपने बाप कृष्णकान्त के ही मेहमान बनकर रहे थे। और इस बीच अपने प्रति कृष्णकान्त के अति स्नेह और असाधारण व्यवहार से तुम्हारे दिल में कई संदेह उपजे । उनके पिता तुल्य लाड-प्यार व अपनत्व ने तुम्हें कुछ सोचने को विवश कर दिया था। कुछ संदेह दूर कर दिए कि कृष्णकांत चूंकि परिवारहीन अकेले व्यक्ति थे इसलिए वह तुम्हें बेटियो की तरह चाहने लगे थे।"

"फिर ग्रेज्यूएशन के बाद जब तुम दूसरी बार दिल्ली गई तो पहले की तरह ही रामदास की फैमिली भी साथ थी। रामदास एक सच्चे और वचन के पक्के इन्सान थे। उन्होंने तुम्हारे सिलसिले में जो वचन दिया था उसे पूरी इमानदारी से निभाया। इस बार वह जब तुम्हें लेकर दिल्ली पहुंचे तो दिल में बड़ी बेकली-सी थी। वह चाहते थे कि अब तुम्हारे पिता के बारे में बता दिया जाए। संयोग से अब तुम्हारे भी यही चाहते थे कि इस राज से पर्दा हटा दिया जाए। दुनिया वालों के सामने नहीं...बल्कि अपनी हद तक...।"

"यूं रात को एकान्त में अपने कमरे में बुलाकर रामदास ने तुम्हारा हाथ तुम्हारे पिता के हाथ में दे दिया और कहा कि यह तुम्हारे असली पिता हैं। बस इतना ही बताया और यह बता कर तुम्हें एक कठिन परीक्षा में डाल दिया। तुम्हारे दिल में एक अनूठी-सी पीड़ा ने जन्म लिया। विश्वास अविश्वास के हिंडोले पर सवार, इस पीड़ा के साथ ही तुमने सोता कि अगर तुम्हारे पिता कृष्णकांत हैं तो फिर वे क्या हालात थे जिनसे बेबस हो रामदास ने तुम्हें बाप बनकर पाला? और इस भेद से वे दोनों ही पर्दा उठाने का तैयार न थे।"

"और इसी रात एक हादसा पेश आया। मुकद्दर का लिखा - रामदास को दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुंच-पहुंचते वह स्वर्ग सिधार गए।"

"अब तुम्हारे अम्बाला लौटने का कोई सवाल नहीं था। तुम्हें दिल्ली रोक लिया गया। दुनिया वालों का यही बताया

गया कि तुम यहां एम. ए. ज्वाईन करना चाहती हो, सो इसलिए तुम्हें यहां रोक लिया गया है। "

“मगर अब एक और समस्या उठ खड़ी हुई। तुम्हारी शक्ल और तुम्हारा रंग-रूप तुम्हारी मां सारिका से बहुत मिलता है और बढ़ती उम्र के साथ-साथ यह समानता गहरी होती जा रही थी कुछ झलक तुममें तुम्हारे पिता की भी है। कृष्णकांत के घर में जो भी तुम्हें देखता वह देखता ही रह जाता। और तब वह बरबस ही सारिका का जिक्र किए बिना न रहता।"

"ऐसे में एक बार तुम्हारा चाचाजाद दीपक किसी काम से दिल्ली आया । उसने तुम्हें देखा तो बस देखता ही रह गया। उसे फौरन ताई याद आई। सावनपुर लोटकर उसने इस बात का जिक्र अपने बाप से किया। रमाकांत फौरन ही अपनी बीवी के साथ दिल्ली पहुंच गया और आशा विपरीत दो-तीन दिन अपने भाई के यहां मेहमान रहा। "

"एक रात जब सब खाना खाने में व्यस्त थे तो रमाकांत की नजरें बार-बार तुम्हारी तरफ उठ रही थीं, इन नजरों को तुम्हारे पिता भी महसूस कर रहे थे लेकिन वह खामोशी से खाना खाने में मस्त थे। तब रमाकांत तुम्हारे पिता से सम्बोधित हुआ, बोला- भाई जी ! यह आपके दोस्त की बेटी तो हूँ-ब-हूँ हमारी स्वर्गीय भाभी पर गई है। कमाल की समानता है, यह तो आपकी बेटी लगती है...।"

"तुम्हें हालांकि यह हकीकत बता दी गई कि तुम कृष्णकांत की बेटी हो लेकिन साथ ही तुम्हें यह बात एक रहस्य ही बनाए रखने को भी कहा गया था। तुम्हें बता दिया गया था कि यह भेद खुल जाने से तुम्हारी जान को खतरा हो सकता है। इसलिए तुम अपने चाचा की इस बात पर चौंकी जरूर, लेकिन खामोश बैठी रहीं। "

" रमाकांत की इस बात ने कृष्णकांत को भीतर तक दहला दिया था। उन्हें यही लगा था कि शैतान रमाकांत ने तुम्हें उनकी बेटी के रूप में पहचान लिया है। उन्होंने तुरन्त निर्णय लिया कि वह शीघ्र ही तुम्हें कोठी से कहीं और भेज देंगे क्योंकि रमाकांत के मनहूस साये से तुम्हें बचाना जरूरी था । "

"सो उन लोगों के विदा होते ही तुम्हारे पिता ने फौरन बलदेव राज को फोन किया। बलदेव राज ही एक ऐसा शख्त था जिस पर इस मामले में भरोसा किया जा सकता था। बलदेव राज से तुम्हारे पिता की दूर की रिश्तेदारी थी और दोस्ती भी थी। वह तुम्हारे पिता के रेस्टोरेन्ट में रोज ही आते थे। लेकिन आज उन्होंने बलदेव राज को अपनी मॉडल टाऊन वाली कोठी में बुलवाया। उन्होंने उससे जरूरी विचार-विमर्श किया। कृष्णकांत ने हर वह बात जो तुम्हारे बारे में
 
बताई जा सकती थी, बता दी। हर राज से पर्दा हटा दिया। बलदेव राज को भी खतरे का अहसास हुआ और वह तुम्हें तुरन्त ही अपने घर ले गए। "

"मॉडल टाऊन से तुम्हारा बलदेव राज के यहां शिफ्ट कर जाना सुकून बख्श था लेकिन यह सुकून ज्यादा समय तक बना न रह सका। तुम्हारे तीनों कजन और तुम्हारे चाचा अपने काम से दिल्ली आते-जाते रहते थे। एक शाम जब तुम करोल बाग में घूम रही थी तो तुम्हारे चाचा-चाची ने तुम्हें देख लिया और तुम्हें देखते ही उन्हें सांप सूध गया। "

"वे दोनों शापिंग करना भूल गए और सीधे मॉडल टाऊन पहुंचे। शाम का वक्त था तुम्हारे पिता रेस्टोरेन्ट जाने को तैयार हो रहे थे वह अपने रेस्तरां में हर शाम दो-तीन घंटे बैठा करते थे। यहां बैठकर वह बिजनेस से ज्यादा अपने दोस्तों में वक्त गुजारते थे। उन्होंने रेस्तरां जाने का प्रोग्राम कैन्सिल कर उसने भाई-भाभी का स्वागत-सत्कार किया। उन्हें मालूम हुआ कि वे लोग सुबह से दिल्ली आए हुए हैं और रात को वापस लौट जाने का इरादा था लेकिन अब वे एक रात वही रहकर कल सुबह वापस जाएंगे।"

फिर रात खाने की मेज पर बातों ही बातों में तुम्हारे चाचा ने तुम्हें करोल बाग में देखे जाने का जिक्र किया और अपनी भारी मूछों को सहलाते हुए बोले-

"भाई जी ! वह तो बिल्कुल आपकी बेटी लगती है। वह यहां से क्यों चली गई है। उसे अपने पास रखिये ना...।"

"देखने-सुनने में यह एक सादा-सा वाक्य था लेकिन इन शब्दों के पीछे जो जहरीले इरादे छिपे हुए थे उनका अहसास करके तुम्हारे पिता सूखे पत्ते की तरह कांपने लगे। उन्होंने सोचा कि अब तुम्हारा दिल्ली में रहना खतरे से खाली नहीं है । "

" रमाकांत के जाने के बाद तुम्हारे पिता घबराए हुये बलदेव राज के धर शक्तिनगर पहुंचे। सलाह-मशविरा हुआ, तय पाया कि तुम्हें फौरन बंगलौर भेज दिया जाए, और यूं दृम एक साल पहले दिल्ली से बंगलोर आ गई...! और अपने खुद यह हालात तुमसे भी छुपे हुए नहीं हैं...।"

"हमारा ख्याल है कि हमने तुम्हारी जिन्दगी से सम्बन्धित महत्वपूर्ण सवालों का जवाब दे दिया। हमने तो वे राज भी बता दिए हैं जो पिता ने तुमसे छिपाकर रखे है। वह तुमसे बेपनाह मुहब्बत हैं। तुम्हारी जिन्दगी बचाने के लिए उन्होंने जो कुछ किया वह शायद ही कोई बाप अपनी बेटी के साथ कर सके। अच्छा, हम चलते है। हमें गया वक्त न समझना हम वापस ओयेंगे।"

फिर एक अनहोनी हुई ! बड़ा अजीब हुआ। रेखा की नजरें अभी आखिरी शब्दों पर ही थी कि लफ्ज उड़ने लगे और देखते ही देखते वह पेज ऐसा साफ-सफेद हो गया जैसे उस पर कुछ लिखा था ही नहीं ।

रेखा की यह दास्तान काफी लम्बी थी। पॉकेट डायरी के बीस-बाईस पृष्ठों तक फैली हुई रेखा ने जल्दी-जल्दी पृष्ठ

उल्टे लेकिन अब किसी भी पेज पर कुछ नहीं था।

एक शब्द, कोई एक वाक्य तक नहीं लिखा था। वह डायरी पहले की तरह कोरी हो गई थी।
 
रेखा उस डायरी को पकड़े कितनी ही देर तक हैरान-परेशान सी बैठी रही। सोचती रही।

डायरी में लिखे हालात में से बहुत-सी बातें वह पहले से ही जानती थी। पर फिर भी डायरी का लिखा, लुप्त होने के वाद भी अपने पीछे बहुत से सवाल छोड़ गया था।

रेखा की जिन्दगी क्या थी एक अनूठी अविश्वसनीय दास्तान अपनी ही जिन्दगी के बहुत से रहस्य रेखा पर खुल गए वह बहुत कुछ जान गई थी। शायद सब कुछ।

लेकिन कहां ? अभी भी तो बहुत कुछ रहस्य के पर्दों के पीछे था। उसका भाई कहां था? उसके साथ क्या बीती ? इस वारे में रेखा कुछ नहीं जान पाई थी। रेखा को इंतजार करने को कहा गया था।

अपने चाचा रमाकांत का चेहरा बार-बार रेखा की नजरों के सामने आ रहा था। इस धूर्त व लालची शख्स ने उसके बाप की जिन्दगी में कैसा जहर घोल दिया था। सारी पुश्तैनी जायदाद पर उसका कब्जा था। फिर भी उसे सुकून न था। बड़े भाई की शराफत से नाजायज फायदा उठाकर वो हर चीज पर कब्सा करता चला जा रहा था। वह शैतान इस बात से अनजान था कि किस्मत उसके साथ क्या खेल रही है। जो दूसरों के लिए गड्ढे खोदते हैं अन्तत: वही गड्ढे उनके लिए बर्बादी का सबव वन जाते हैं। हर जुल्म का अंजाम होता है, हर रात का एक सवेरा होता है।

रेखा सोच रही थी कि उसके पिता न अपने आप पर किस कदर जुल्म किया था... अपनी बेटी की जिन्दगी बचाने के लिए 'अपने बुढ़ापे में अकेले जिन्दगी गुजारना मंजूर कर लिया था और अपनी बेटी को बुरी नजर और मात से दूर रखा।

रेखा का दिल भर आया।

"मेरे बाप... मेरे महान् बाप... मैं आपकी महानता को सिर नवाती हूँ। आपके प्यार की ऋणी हूँ। आपकी भावनाएं पूजनीय रहीं, निस्वार्थ रहीं। लेकिन मुझे आपसे एक शिकायत भी है। आपने मुझे अपना हमराज क्यों नहीं बनाया। यही सोचा होगा आपने कि अगर मुझे हालात मालूम हो गए तो मैं परेशान हो जाऊंगी। उलझ जाऊंगी ओर यह भी मुमकिन है कि राज को राज न रख सकूं और दुश्मन जो मेरी जान के पीछे था ना जाने कब वार कर जाए। यही सोचा होगा न आपने । "

रेखा जज्बात की रौ में सोचती चली गई-

"एक बाप के नाते तो आपने ठीक सोचा-लेकिन मुझसे मेरी सोचें छान ती. मुझे पने फर्ज से दूर रखा। औलाद का भी तो कोई हक होता है... काई फर्ज बनता है। आपने अब तक अपना फर्ज निभाया। अब... अब मैं अपना फर्ज निभाऊंगी। मेरा इन्तजार कीजिए। मैं आ रही हूँ। में एक-एक को देख लूंगी। जुल्मों-जबर की इस कहानी पर अब मेरी ही मर्जी का "दी एण्ड " लगेगा। अपनी जमीन का एक टुकड़ा भी किसी के कब्जे में न जाने दूंगी। अब बेचिन्त हो जाएं। मैं अपने भाई को तलाश करूंगी। आप अगर बूढ़े हो गरा हैं तो क्या हुआ? मै तो जवान हूँ। लड़की हूँ तो क्या हुआ... मैं आपको लड़का बनकर दिखाऊंगी। आपकी शीना बनकर दिखाऊंगी। अब आपको किसी से डरने की जरूरत नहीं है...।"

रेखा बहुत देर तक ऐसी ही बातें सोचती रही।

उसे अपने बाप पर बहुत तरस आ रहा था और अपने निर्दयी चाचा पर बेहद गुस्सा । वह कितनी ही देर तक यूं पैचों ताव खाती रही और फिर एक दृढ़ इरादे के साथ उठी ।

उसने फैसला कर लिया था कि वह दिल्ली जाएगी।

वह अब तक बड़ी खामोश से हर एक का हर फैसला मानती आ रहा थी। लेकिन अब उसने सोच लिया था कि किसी की बात नहीं मानेगी.... वही करेगी जो उसके दिल में आएगा। उसके दिल में तूफान उठ रहे थे और अब तूफानों पर बाध बांधने का उसका कोई इरादा नहीं था।

अंकल बलदेव राज ने उसे मना किया था कि वह भूलकर भी दिल्ली कभी फोन न करे।

जब भी फोन करेंगे वो खुद ही करेंगे। अंकल की इस हिदायत पर वह मन ही मन मुस्करा वह निर्णायक अंदाज में
 
उठी। साईड टेबिल पर रखे फोन को उठाकर बैड पर रखा और फिर बड़े इत्मीनान से अंकल वलदेव राज के घर का नम्बर मिलाने लगी।

नम्बर लगा और उधर घन्टी बजने लगी।

घन्टी बजती रही और कई घटियां बजने के बावजूद किसी ने रिसीवर न उठाया तो वह चिन्तित ही उठी। यह बात वह अच्छी तरह जानती थी कि इस वक्त अंकल बलदेव घर पर नहीं होंगे-कॉलेज गए होंगे। लेकिन घर में घर के दूसरे लोगों को तो होना चाहिए था। पर अब यही लग रहा था कि घर में कोई नहीं है।

कहीं गलत नम्बर न मिल गया हो? यही सोचकर उसने दोबारा नम्बर मिलाया, पर व्यर्थ घन्टी बजती रही और रिसीवर किसी ने नहीं उठाया।

निराशा हो रेखा ने फोन उठाकर यथास्थान पर रख दिया। उसके जहन में अब तक उद्विग्नता सी थी। वह उड़कर दिल्ली पहुंच जाना चाहती थी। वह अपने बाप के चरणों में बैठकर उन्हें बताना चाहती थी कि वह हर उस भेद को जान गई है जो उससे आज तक छिपाया गया है और अब उसके दिल में लावा उबल रहा है वह अपने निर्दयी चाचा को किसी कीमत पर भी नहीं बखोगी। वह उसे शूट कर देगी।

रेखा ने इसी बेचैनी के आलम में बैड पर अपना तकिया ठीक किया फिर डायरी उठाकर लेट गई। वह डायरी को तकिये के नीचे रखकर कुछ देर आंखें बन्द करके लेट जाना चाहती थी। डायरी को तकिये तले रखने से पहले उसने ऐसे ही उसके पृष्ठों को पलटकर देखा और उसे डायरी के पेजों के बीच सुर्खी-सी महसूस हुई।

उसका दिल अचानक ही तेजी से धड़कने लगा।

उसने जल्दी-जल्दी, एक-एक पन्ना पलटकर वह पेज निकाला।

उस पेज पर छोटा सा अठन्नी के बराबर सुर्ख धब्बा था, बिल्कुल ताजा खून का डायरी बन्द होने की वजह से यह खून दूसरे पृष्ठ पर भी लग गया था। और पेज की पीठ पर भी झलक आया था।

यह खून कहां से आया?

वह इस खून को देखकर सहम गई। तब अचानक उसके दिल में जानलेवा ख्याल आया। लंकिन अपने हम प्रलयंकारी ख्याल को तुरन्त ही अपने जहन से झटक दिया।

नहीं ऐसा नहीं ही सकता। यह उसके बाप का खून नहीं हो सकता। वह यह भी नहीं समझ पा रही थी कि खून को देखकर उसे अपने बाप कृष्णकांत का ख्याल ही क्यों आया।

यह ख्याल जिस तरह भी आया, बहरहाल उसे बेचैन कर गया। उसकी रूह में कांटे भर गए। वह अपनी निगाहें खून के उस धब्बे से हटा नहीं पाई। फिर देखते ही देखते वह खून सूखने लगा। और कुछ ही देर में उस पेज से मिटकर लुप्त झे गया। वह पेज अब फिर निकल साफ था। साफ और सफेद ।

रेखा न डायरी के पेजों पर दोवारा तेजी से नजर डाली, लेकिन डायरी अब फिर से सादा हो चुकी थी।

उसने डायरी तकिये के नीचे रखी और फोन सरका एक बार फिर अंकल बलदेव के नम्बर मिलाने लगी। इस बार भी. उधर घंटी बजी निरन्तर बजती रही लेकिन कॉल किसी ने रिसीव नहीं की।

रेखा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने कुछ सोच अमर के ऑफिस का नम्बर लगाया।

कॉल अमर ही ने रिसीव की थी। अमर की आवाज पहचानकर वह बोली-

"भाई, मैं बोल रही हूँ रेखा!"

"जी, रेखा खैरियत?"

" खैरियत ही है। आप मेरा एक काम कर दे भैया । में फोरन दिल्ली जाना चाहती हूँ-आप किसी भी फ्लाईट से मेरी
 
सीट कम्फर्म करा दें।"

"सीट तो मिल जाएगी लेकिन यह आपको खड़े पांव दिल्ली जाने की क्या सूझी ?" अमर ने पूछा ।

"बस, मेरा जी बहुत घबरा रहा है। मैं फौरन दिल्ली जाना चाहती हूँ।" रेखा ने दृढ़ तथा निर्णायक स्वर में अपनी बात दोहराई थी।

"ठीक है। आप तैयारी करें-में किसी को भेजता हूँ एजेन्ट के पास। "

"थैंक्स, पैया ?" रेखा ने रिसीवर को कान से हटाया।

"हैलो!" अमर जल्दी से बोला ।

"जी... जी...?" रेखा ने रिसीवर फिर कान से लगा लिया।

"आपने मौसी से बात कर ली हैं। उन्होंने आपको अकेले जाने की परमीशन दे दी है न?"

"नहीं, भैया! मौसी से मैंने अभी बात नहीं की है, अभी नीचे जाकर उन्हें बताती हूँ। उन्हें राजी करती हूँ। आप मेरे टिकट का इन्तजाम करें...।"

"ठीक है, मैं करता हूँ। इंतजाम होते ही तुम्हें फोन करूंगा।"

"ओ० के० भैया! वन्स अगेन थैंक्स !" रेखा ने कहा और फिर रिसीवर रखकर एक गहरा सांस लिया।

अब उसे गंगा मौसी से बात करनी थी।

रेखा नीचे पहुंची तो उसने माया को किचन में वयस्त पाया। किचन में झांककर वह गंगा मौसी के कमरे की तरफ बढ़ गई। गंगा मौसी चश्मा लगाए कोई उपन्यास पढ़ रही थीं। रेखा दबे पांव चलती हुई उसके निकट पलंग पर आ बेटी। गंगा मौसी उसे देखकर मुस्करा दी उपन्यास कट करते बोली-

"सौकर आ रही हों?"

"नहीं, मौसी!" रेखा अपनी उदासी छिपा नहीं पा रही थी।

"रेखा! खैर तो है, बेटी!" मौसी जरा सम्भल कर बैठ गई। "हाय!" मौसी ने अपना हाथ सोने पर रखते हुए पूछा- "कब...क्यों...?"

"मौसी ! मैंने अमर को फोन करके प्लेन का टिकट मंगवाया है। में दिल्ली जाना चाहती हूँ।"

" आज ही। चाहे जिस भी फ्लाईट से हो सके। "

"यह कैसे हो सकता है...!" मौसी फिक्रमंद दिखने लगी "तुम जानती हो कि तुम्हारे अंकल बलदेव ने क्या कह रखा है । "

"मैं जानती हू।" रेखा बोली- "यही ना कि मुझे यहां से कहीं जाने न दिया जाए।"

"हा यही ।" मोसी का लहजा उलझा उलझा था।

"मौसी !" रेखा बदस्तुर शांत सहज भाव में बोली- "यह अंकल बलदेव मेरे बारे में फैसला करने वाले कौन हैं?"

"यह तम किस प्रकार की बातें कर रही हो?"

"मौसी, आप मेरे बारे में कुछ नहीं जानतीं। काश! आप मेरे बारे में कुछ जानती होती या मैं ही आपको सब कुछ बता सकती...।"
 
"मैं समझी नहीं...।"

"दिल्ली से लौटकर सब समझा दूंगी, मौसी।" रेखा ने यह मौसी की तसल्ली के लिए कह दिया था। क्योंकि यह तो वह खुद भी नहीं जानती थी दिल्ली से वापस भी आएगी या नहीं।

गंगा मौसी एक बहुत ही प्यारी व सहृदय महिला थी। रेखा को उनसे लगाव हो गया था खुद गंगा उस पर क्या कम जान छिड़कती थी । रेखा जानती थी कि दिल्ली जाने के बाद वह मौसी की बहुत 'मिस' करेगी।

रेखा ने मौसी को ज्यादा बहस करने का मौका नहीं दिया न उन्हें कुछ बताया। लगभग तीन बजे अमर का फोन आया। उसने वताया कि शाम की फ्लाईट सं रेखा की सीट रिजर्व हो गई है।

गंगा मौसी की परेशानी बड़ी ही थी। रेखा के इस प्रोग्राम ने उन्हें विचलित कर दिया था।

बलदेव राज ने जिन्दगी में पहली बार उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपी थी। वह इस जिम्मेदारी को बाखूबी निभा भी रही थी। वह रेखा का बहुत ख्याल रखती थी। ऐस ही जैसे एक मां अपनी जवान बेटी का ख्याल रखती है। रेखा ने भी उन्हें कभी परेशान न किया था। रेखा खुद भी एक शालीन, आज्ञाकारी और सुलझी हुई लड़की थी।

और इस सुलझी हुई लड़की के दिमाग में अचानक यह क्या ख्याल समाया था कि वह अचानक दिल्ली जाने पर तुल

गई थी। अब तो सीट भी कन्फर्म हो गई थी। और वह ऊपर अपना सूटकेस तैयार कर रही थी।

इस बीच गंगा मौसी, अपने तोर पर बलदेव राज को कई बार फोन लगा चुकी थी। मगर उधर कोई उठा ही नहीं रहा था। यही लगता था घर बंद है और वे सब कहीं चले गए हैं।

गंगा मौसी कितनी देर से अपने पलंग पर पांव लटकाये बैठी थी। दिल बेचैन था। यह बलदव का फौरन हालात से

आगाह करना चाहती थी पर उनसे सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता नहीं मिल रही थी।

फिर अपनी इसी चिन्ता में वह एकाएक जाने क्या सोच मुस्करा दी। बड़ी फीकी-सी मुस्कन थी। बलदेव और वह तो शायद एक नदी के दो भिन्न किनारे थे। दोनों ने ही यूं ही एक-दूसरे के साथ लेकिन एक-दूसरे से दूर... पूरी जिन्दगी गुजार दी थी। आज प्रयलोपरान्त सम्बन्ध स्थापित नहीं हो रहे थे उनकी जिन्दगी भी ऐसे गुजर गई थी। बिना तार मिले।

गंगा मौसी र्का नजरें बार-बार फोन की तरफ उठ रही थीं और उनकी वर्तमान परेशानी में अपने अतीत के

भूले-बिसरे अहसास एक कसक बन उभर रहे थे।

बड़ी ही विचित्र सी मनोदशा का शिकार थी अब वह ।

तभी एकाएक फोन की घन्टी बजी। उन्होंने एकदम से हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।

"हैलो! कौन है?" जाने किस अहसास के वशीभूत ही उन्होंने तड़पकर पूछा था ।

" बलदेव ! आप कहां हैं? मैं कब से आपको कान्टेक्ट करने की कोशिश कर रही हूँ।”

“मैं मॉडल टाऊन गया हुआ था कृष्णकांत के यहां। मैं मौका निकालकर घर आया हूँ। ताकि तुम्हें फोन कर सकूं।" "आप इतने परेशान क्यों हैं?" गंगा मौसी ने तेजी से पूछा- "कुशलता तो है?"

"वहुत बुरी खबर है, गंगा ।" उधर से बड़े ठण्डे और गहरे सांस की आवाज आई।

"हे भगवान! क्या हुआ?" गंगा मौसी का दिल धक्क से रह गया।

"रेखा कहां है। उसे बुलाओ और जितनी जल्दी हो सके दिल्ली भेज दो।"

"आखिर क्यों...? तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। क्या हुआ है।”
 
"गंगा! रेखा के पापा अब नहीं रहे हैं। उन्हें किसी ने कत्ल कर दिया है।"

बड़ी ही धमाका खेज खबर थी।

"हे प्रभु!" गंगा मौसी ने अपना दिल पकड़ लिया, फिर खुद को सम्भालते बोली--बलदेव, यह कैसा विचित्र संयोग है...।"

"कैसा संयोग ?"

"रेखा खुद दिल्ली जाने के लिए तड़प रही है। शाम की फ्लाईट से उसकी सीट बुक हो चुकी है। और इस वक्त वह अपना सामान पैक कर रही है। मैं दरअसल इसी सिलसिले में फोन पर तुमसे बात करना चाहती थी कि उसे दिल्ली भेजूं या न भेजू?"

बलदेव राज ने गहरी सांस ली। बोला "दिल को दिल से राह होती है गंगा! उसे आने दो मैं एयरपोर्ट पर रिसीव कर लूंगा। अब मुझे यह मशविरा दो कि उसके बाप की मौत की सूचना उसे अभी दे दूं या उसके दिल्ली पहुंचने के बाद... 1"

"मुझे तो लगता है कि उसे अपने बाप की मौत की इत्तला मिल चुकी है। "

"वह कैसे...?" बलदेव हैरान हुआ था।

"यह तो नहीं जानती। लेकिन यह उसका अचानक ही दिल्ली के लिए रवाना होने का फैसला करना और उसकी उदास बेचैन हालत इस बात का सबूत हैं कि उसके दिल ने इस हादसे को किसी न किसी तरह महसूस कर लिया है।"

" हैरत की ही बात है।" बलदेव राज धड़बड़ाया। फिर बोला "खैर, तुम ऐश करना गंगा कि चलते वक्त उसके इस अहसास को और गहरा कर देना। ताकि यहां मुझसे यह हौलनाक खबर सुन कोई गहरा शॉक न लगे। तब तक वह खुद को ऐसी किसी भी खबर के लिए सम्भाल चुकी होगी।"

"ठीक है। मैं उसे बता दूंगी कि आपका फोन आया था और आप उसे रिसीव करने एयरपोर्ट पर मौजूद होंगे...।"

"मैं रखता हूँ...।" बलदेव राज ने कहा और रिसीवर रख दिया।

और फिर...!

शाम को जब रेखा घर से रवाना होने लगी तो गंगा मौसी ने उसे गले से लगाकर बस इतना ही कहा-

"तुम्हारी यह बेचैनी और एकदम से दिल्ली जाने का फैसला... मेरा तो दिल बैठा जा रहा है बेटी! कभी-कभी दिल अज्ञात अन्देशों के कारण ही फैसला करता है। भगवान न करे, तुम्हारी यह बेचैनी भी कुछ ऐसी ही हो। अपने दिल की गवाही पर तुम दिल्ली जा रही हो ता इस दिल को काबू में रखना। हौंसले से काम लेना। शायद वहां पहुंचकर तुम्हें कोई बुरी खबर सुनने को मिले।"

"में बुरी से बुरी खबर सुनने के लिए भी तैयार हूँ मौसी ! मुझमें बड़ा हौसला है। आप चिन्तित न हों।" यह कहकर रेखा, अमर के साथ गाड़ी में बैठ गई।

और गाड़ी ने एयरपोर्ट का रुख किया।
 
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