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"शादी के दो साल बाद कृष्णकांत के यहां लड़का पैदा हुआ। उसका नाम इन्द्रजीत रखा गया। इन्द्रजीत के जन्म ने
सावनपुर की हवेली पर मातम की चादर बिछा दी। जबकि तुम्हारे मां-बाप बहुत खुश थे।" "हा, भाई के नाम पर चौको मत। तुम्हारा एक सगा भाई इस दुनिया में मौजूद है। वह इन वक्त कहां व किस हालात में यह बाद में जान सकोगी। फिलहाल यह सुनो कि इन्द्रजीत के जन्म ने तुम्हारे चाचा के गान में कैसी आग भर दी।
उसके सारे टोने टोटके बेकार गए।"
." इन्द्रजीत बहुत ही बुद्धिमान लड़का था। दस बारह साल की उम्र तक पहुंच-पहुंचते उसने बहुत कुछ सीख लिया। तैराकी, घुड़सवारी, ड्राईविंग, कुश्ती, निशानेबाजी, उसकी उठान भी बहुत अच्छी थी। वह बारह साल की उम्र मे भी चौदह, 'पन्द्रह साल का लगता था। और तुम्हारे पिता कृष्णकांत की पसन्द के विपरीत उसे दिहात की जिन्दगी से बहुत लगाव था। उसका बस नहीं चलता था कि वह सावनपुर में ही स्थाई रूप से आ रहे। इन्द्रजीत ने यह भी बहुत जल्द जान लिया था कि उसके चाचा ने अपने बड़े भाई के सीधेपन से खूब फायदा उठाया था। इन्द्रजीत जान गया था कि उसके बाप की जमीन-जायदाद कितनी है।"
"और... फिर, जव रमाकांत ने इन्द्रजीत को सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित हो उठा और लगा विभिन्न तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उते कोई खतरा न था क्योंकि वह चौब्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुंच रहा था। मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था अगर उसे फौरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।'
"खलनायिकी फितरत वाले रमाकांत का शातिर दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को लेकर विभिन्न मंसूबों पर सोच-विचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इस तकदीर अपना खेल खेल रही थी। रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकांत के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और वारिस दुनिया में आ गया।"
" और वह तुम थीं। बारह वर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकांत के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए।
कृष्ण कांत को बेटी की बहुत ख्याहिश थी। उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई।"
"तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकांत के तेवर बदलने लगे थे। और इन तेवरों को कृष्णकांत भलीभांति समझ रहे थे। इन्द्रजीत जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से धड़कने लगता। वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे लेकिन दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अंदेशे से उठते थे और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यूं जब इन्द्रजीत अपने बॉडीगार्डो के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकांत की आंखों में किसी कांटे की तरह चुभ जाता।"
" और फिर अन्ततः तुम्हारे चाचा रमाकांत ने एक मंसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है। रमाकांत का छोटा बेटा विजय हालांकि इन्द्रजीत से उस में बड़ा था, लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्टता थी। सावनपुर में वे जहां भी जाते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शौक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुंचा तो हमेशा की तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम वन गया। "
" रमाकांत ने इस बार सारी योजना बना रखी थी। इन्दजीत के दोनों बॉडीगार्डो को दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह-सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चेचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने के लिए निकला - तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बॉडीगार्ड गहरी नींद सो रहे हैं, बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रातभर ताश खेलते रहे होंगे। पर इन्द्रजीत को शिकार पर अपने इन बॉडीगार्डों की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोड़कर शिकार पर निकल गया।"
" और फिर.... अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं। तुम अंदाजा लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी। भई, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी। यह खुशखबरी कृष्णकांत को पूरे
बारह साल बाद मिली थी। जब नर्स ने एक फूल सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थे इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीं हुई थी। तुम्हारे पिता को लड़कियां बहुत पसन्द थीं। वह तुम्हारे जन्म को बड़ी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेकिन वक्त ने
सावनपुर की हवेली पर मातम की चादर बिछा दी। जबकि तुम्हारे मां-बाप बहुत खुश थे।" "हा, भाई के नाम पर चौको मत। तुम्हारा एक सगा भाई इस दुनिया में मौजूद है। वह इन वक्त कहां व किस हालात में यह बाद में जान सकोगी। फिलहाल यह सुनो कि इन्द्रजीत के जन्म ने तुम्हारे चाचा के गान में कैसी आग भर दी।
उसके सारे टोने टोटके बेकार गए।"
." इन्द्रजीत बहुत ही बुद्धिमान लड़का था। दस बारह साल की उम्र तक पहुंच-पहुंचते उसने बहुत कुछ सीख लिया। तैराकी, घुड़सवारी, ड्राईविंग, कुश्ती, निशानेबाजी, उसकी उठान भी बहुत अच्छी थी। वह बारह साल की उम्र मे भी चौदह, 'पन्द्रह साल का लगता था। और तुम्हारे पिता कृष्णकांत की पसन्द के विपरीत उसे दिहात की जिन्दगी से बहुत लगाव था। उसका बस नहीं चलता था कि वह सावनपुर में ही स्थाई रूप से आ रहे। इन्द्रजीत ने यह भी बहुत जल्द जान लिया था कि उसके चाचा ने अपने बड़े भाई के सीधेपन से खूब फायदा उठाया था। इन्द्रजीत जान गया था कि उसके बाप की जमीन-जायदाद कितनी है।"
"और... फिर, जव रमाकांत ने इन्द्रजीत को सिर उठाते देखा तो वह चिन्तित हो उठा और लगा विभिन्न तरकीबें सोचने। उसके साजिशी दिमाग में साजिशें पकने लगी। अपने भाई से उते कोई खतरा न था क्योंकि वह चौब्वन साल का हो चुका था और अपनी जिन्दगी के अन्तिम चरण में पहुंच रहा था। मगर किशोर इंद्रजीत तो उसकी निगाह में वह डाकू था जो घर की दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था अगर उसे फौरन ही न रोका गया तो उसका घर में घुस आना यकीनी था।'
"खलनायिकी फितरत वाले रमाकांत का शातिर दिमाग बड़ी तेजी से काम कर रहा था। वह तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को लेकर विभिन्न मंसूबों पर सोच-विचार कर रहा था। उधर तुम्हारा चाचा अपना जाल बुनने में व्यस्त था तो इस तकदीर अपना खेल खेल रही थी। रमाकांत किसी भी तरह कृष्णकांत के इकलौते वारिस से छुटकारा चाहता था कि एक और वारिस दुनिया में आ गया।"
" और वह तुम थीं। बारह वर्ष बाद, भगवान ने कृष्णकांत के घर में एक बार फिर खुशियों के दीप रोशन कर दिए।
कृष्ण कांत को बेटी की बहुत ख्याहिश थी। उसकी यह ख्वाहिश आखिर तुम्हारी मोहिनी सूरत में पूरी हो गई।"
"तुम्हारे भाई इन्द्रजीत ने जब से सावनपुर के चक्कर लगाने शुरू किये थे, तब से ही रमाकांत के तेवर बदलने लगे थे। और इन तेवरों को कृष्णकांत भलीभांति समझ रहे थे। इन्द्रजीत जब भी सावनपुर जाता कृष्ण कांत का दिल अज्ञात भय से धड़कने लगता। वह अपने बेटे को जाने से नहीं रोकते थे लेकिन दिल से चाहते थे कि वह सावनपुर न जाए। उनके दिल में अंदेशे से उठते थे और अपने अज्ञात खौफ से पेशेनजर उन्होंने इन्द्रजीत के साथ दो ट्रेण्ड बॉडीगार्ड भेजने शुरू कर दिए थे। यूं जब इन्द्रजीत अपने बॉडीगार्डो के साथ हवेली के सामने जीप से उतरता तो रमाकांत की आंखों में किसी कांटे की तरह चुभ जाता।"
" और फिर अन्ततः तुम्हारे चाचा रमाकांत ने एक मंसूबा बना ही लिया कि उसे क्या करना है। रमाकांत का छोटा बेटा विजय हालांकि इन्द्रजीत से उस में बड़ा था, लेकिन उसकी इन्द्रजीत से घनिष्टता थी। सावनपुर में वे जहां भी जाते इकट्ठे जाते । इन्द्रजीत को अपने बाप की तरह शिकार का शौक था। एक बार जब वह सावनपुर पहुंचा तो हमेशा की तरह तीतर के शिकार का प्रोग्राम वन गया। "
" रमाकांत ने इस बार सारी योजना बना रखी थी। इन्दजीत के दोनों बॉडीगार्डो को दूध में अफीम मिलाकर दे दी गई और सुबह-सवेरे जब इन्द्रजीत अपने चेचरे भाई विजय और दूसरे नौकरों के साथ शिकार पर जाने के लिए निकला - तो हवेली के फाटक पर उसे सूचना दी गई कि उसके दोनों बॉडीगार्ड गहरी नींद सो रहे हैं, बार-बार उठाये जाने पर भी नहीं उठे हैं । इन्द्रजीत ने सोचा शायद दोनों रातभर ताश खेलते रहे होंगे। पर इन्द्रजीत को शिकार पर अपने इन बॉडीगार्डों की जरूरत भी नहीं थी। वह उन दोनों को सोता छोड़कर शिकार पर निकल गया।"
" और फिर.... अस्पताल में तुम्हारे पिता को दो खबरें मिलीं। तुम अंदाजा लगा सकती हो कि वे दो खबरें क्या रही होंगी। भई, पहली खबर तो तुम्हारे बारे में थी। यह खुशखबरी कृष्णकांत को पूरे
बारह साल बाद मिली थी। जब नर्स ने एक फूल सी बच्ची पैदा होने की सूचना तुम्हारे बाप को दी तो यह खबर सुनकर वह मारे खुशी के नाचने ही तो लगे थे इतनी खुशी तो उन्हें तुम्हारे भाई इन्द्रजीत के जन्म पर भी नहीं हुई थी। तुम्हारे पिता को लड़कियां बहुत पसन्द थीं। वह तुम्हारे जन्म को बड़ी धूमधाम से मनाना चाहते थे लेकिन वक्त ने