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स्वाहा

दिल्ली के एयरपोर्ट पर अंकल बलदेव रेखा के प्रतीक्षक थे।

रेखा के गेट से बाहर निकलते ही वह उसकी तरफ लपके। उनका जी चाहा कि वह रेखा से लिपट कर रो पड़े। कृष्णकांत रिस्तेदार के अलावा बलदेव राज का बहुत प्यारा दोस्त था ओर आने वाली उसके इस दोस्त का खून थी । उसे लिपटाकर न रोते नो फिर किसे लिपटाकर रोते ।

बलदेव राज की हालात बुरी हो रही थी। उसने अपने आप को सम्भाला और रेखा के सिर पर हाथ रखकर उसे - हल्का-सा गले से लगाया और बोले-

"कैसी हो रेखा ?"

रेखा ने जवाव देने के बजाय उनकी आंखों में झांका और बड़े संजीदा लहजे में पूछा- "मेरे पापा की मौत कैसे हुई?"

यह सुनकर बलदेव राज हड़बड़ा ही तो गया। यह तो यही सोच कर परेशान और हलकान होता रहा था कि वह रेखा को उसके बाप की मौत की खबर किन शब्दों में और कैसे देगा। लेकिन रेखा तो जैसे उस मंजिल से आगे निकल चुकी थी। तो क्या गंगा ने उसे सब कुछ बता दिया?

"तुम्हारी गंगा मौसी ने तुम्हें क्या बताय?" उसने धीमे स्वर में पूछा था।

"खाला ने तो मुझे कुछ भी नहीं बताया। यह भी नहीं कि मेरे पापा मर चुके हैं।" बड़ा अजीब-सा लहजा था रेखा का

हो " फिर तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि तुम्हारे पापा का देहान्त हो चुका है?"

"देहान्त नहीं...खून कहिये खून...! मेरे पापा का खून हुआ है।" रेखा बड़े ही रहस्यमय अन्दाज के साथ बोली थी।

"आह...!" अंकल बलदेव राज का मुंह मारे हैरत के खुल गया, "आओ चलो रास्ते में तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। "

रेखा के पापा कृष्णकांत मॉडल टाऊन वाली अपनी कोठी में अकेले रहते थे। अब उनकी उम्र भी किसी का मुकाबला या विरोध करने वाली नहीं थी। उनकी हत्या कर देना कोई कठिन काम नहीं था। कोठी में उनके साथ सिर्फ एक नौकर और नौकरानी ही तो थे। दोनों मियां-बीवी थे और कृष्णकांत के बहुत पुराने मुलाजिम थे। घनश्याम और राधा की ही बेटी थी जो शादीशुदा थी। रात को अचानक उन्हें अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की सूचना मिली तो वे कृष्णकांत से इजाजत लेकर अपनी बेटी के घर शाहदरा चले गए। उनकी बेटी अस्पताल से घर पहुंच चुकी थी।

बसा यह रात ही कयामन की थी हत्यारा शायद घात लगाए बैठा था। सुबह को दूध वाले ने बैल बजाई। कोठी का फाटक खटखटाया और कोई बाहर न निकला तो उसे फिक्र हुई, क्योंकि ऐसा आज तक नहीं हुआ था। उसने बराबर वाली कोठीवालों को बताया, जब लोगों ने गेट के अन्दर कूदकर देखा तो कोठी का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और कृष्णकांत खून से लथपथ पड़े थे। उनके दांए हाथ मे रिवॉल्वर दबा हुआ था।

कातिल ने इसे आत्महत्या का केस बनाने की कोशिश की थी। गोली कनपटी में लगी थी। गोली बहुत करीब से चलाई गई थी। वाई कनपटी में सुराख हो गया था और गोली अन्दर ही कहीं फंस गई थी। हत्यारे स बस यही चूक हो गई थी। सुराख बाईं तरफ था, जबकि उनका रिवॉल्वर उनके दांए हाथ में पकड़ा हुआ था।

प्रारम्भिक तफतीश से ही यह बात साफ हो गइ थी कि कृष्णकांत साहब ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उन्हें मारा गया- है। कृष्णकान्त उम्रदराज बूढे जरूर थे। लेकिन उम्र के लिहाज से उनका स्वास्थ्य ईष्या योग्य था। फिर उनके आत्महत्या करने की कोई वजह भी सामने नहीं थी। ऐसे में उन्हें आलाहत्या करने की जरुरत ही क्या थी?

अपने बाप की हत्या की कहानी दूरकर रेखा गुमसुम हो गई। वह तो जैसे पत्थर की होकर रह गई था। बलदेव अंकल उसे रास्ते भर सांत्वना देते रहे... समझाते रहे। वह खामोशी से सब सुनती रही और खाली खाली निगाहों से अंकल को देखती रही।

मॉडल टाऊन की बह कोर्टा जहां कृष्णकांत की हत्या हो गई थी- रिश्तेदारों, प्रियजनों व शुभचिन्तको से भरी हुई थी। रेखा के चाचा रमाकांत का पूरा परिवार मौजूद था और उनका नाटक जारी था।
 
हां, भाई के गम में रमाकांत की बुरी हालत थी। उस पर बार-बार गशी के दौरे पड़ रहे थे। उसके बेटे उसे संभाल रहे थे।

"पापा! यह क्या कर रहे हैं?" बड़ा बेटा कई बार पूछ चुका था।

पर रमाकांत तो जानता था किए यह नौटंकी जरुरी है। वैसे भी उसे बलदेव राज की अनुपस्थिति खल रही थी। रमाकांत अपने तोर पर ही सोच रहा था। उसे इसी बात की फिक्र हो रही थी कि बलदेव राज इस वक्त कहां है और . किसे लेने गया है। रमाकांत दो आंसू बहाकर बाजी जीत लेना चाहता था। सावनपुर की जायदाद तो उसके कब्जे में थी ही अब मॉडल टाऊन की यह कोठी और रेस्टोरेन्ट भी उनका वाला था। क्योकि अपने बड़े भाई कृष्णकांत का वारिस अब वही तो था।

उसकी शातिर मंसूबाबन्दीं आखिर कामयाब हो गई थी और वह अपनी इस कामयाबी पर जितना भी खुश होता कम था। लेकिन यह वक्त तो रोने का था और वह रो रहा था। सिसक-सिसक कर रो रहा था। रह-रह कर बिलख रहा था।

अंकल बलदेव राज की पढ़ाई हुई पट्टी के मुताबिक- रेखा खामोशी से औरतों में एक तरफ जाकर बैठ गई। चेहरा दुषट्टे से ढका हुआ था।

अर्थी उठाई जाने से पहले मरने वाले का चेहरा दिखाया गया। शव कमरे में रखा था।

दिवंगत के चरण स्पर्श करने वाले, आखिरी बार उनका चेहरा देखने वाले एक दरवाजे में प्रदेश करके चेहरा देखते हुए दूसरे दरवाजे से निकल रहे थे।

जब घर की औरतों की बारी आई तो रेखा भी उन औरतों में शामिल थी। वह शव के निकट पहुंचते ही अपने हवास गंवा बैठी। सोचा-समझा सब कुछ भूल कर वह अपने बाप के शव पर झुक गई और चींख मारकर रोने लगी। वर्षा उसके साथ थी जो उस सम्भालने की कोशिश कर रही थी।

तभी दरवाजे पर रमाकांत दिखाई दिया। बह शायद रेखा की चींख सुनकर आगे बढ़ आया था।

औरतें उसे देखकर इधर-उधर होने लगीं। रमाकांत विलाप करती रेखा के पास पहुंचकर झुका और उसके भंद्दे और खुरदरे हाथ की गिरफ्त रेखा के नर्म-कोमल हाथ पर मजबूत होती गई।

बिलखती हुई रेखा एकदम खामोश हो गई।

उसने पहले आपने हाथ को और फिर हाथ पकड़ने वाले को देखा, फिर बड़े ही सर्द लहजे में वोली- "चाचा रमाकांत ! अपना गन्दा हाथ परे कर लो।"

रमाकांत से इस अंदाज में और इस तरह बात करने वाला ओज तक पैदा न हुआ था। वह तो सावनपुर का हुक्मरान था। ऊंचा बोलना तो दूर की बात थी लोग सामने सिर उठाकर बात नहीं करते थे। तो फिर यह आज... आज किसकी शामत आई। बोलने वाली का न सिर्फ अन्दाज सख्त था बल्कि जो शब्द उसने उगले थे, वे शब्द नहीं थे, तीर थे, जो रमाकांत के दिल में जा फंसे थे।

रमाकांत धूर्त इन्सान था ऐसा शातिर नौटंकीबाज जो सांप को लाठी तोड़े बिना मारना जानता था। इस लड़की ने जो कहा वह उसने अच्छी तरह सुन लिया था। सुन लिया था और यह अंदाजा भी लगा लिया था कि बोलने वाली यकीनन कोई चीज है। जो उसने उसका नाम लेकर इतनी बड़ी बात यूं आसानी से कह दी थी।

पर मौके की नजाकत का अहसास था रमाकांत को उसने अपना हाथ फौरन हटा लिया जैसे किसी गलतफहमी में ही उसने रेखा का हाथ पकड़ लिया हो। उसके हाथ छोड़ते ही रेखा सीधी खड़ी हो गई। उसने कनखियों से रमाकांत की तरफ देखा । रमाकांत बड़े गौर से उसी

के चेहरे को देख रहा था। फिर रेखा वहां रुकी नहीं औरतों को हटाते हुए अन्दर चली गई।

रमाकांत ने आदतन ही अपनी भारी पूंछों पर हाथ फेरा ओर पलट लिया।
 
किसी और औरत ने रेखा की बात सुनी हो न सुनी हो... लेकिन वर्षा ने तो बह सब भली-भांति सुन लिया था । वर्षा

हैरान रह गई थी। वह रेखा की हकीकत से अनजान थी, वह तो उसे अंकल रामदास की बेटी ही समझती थी। यह वर्षा । अंकल बलदेव राज की भांजी थी। बहन के विधवा हो जाने के बाद बलदेव राज ने दोनों मां-बेटी को अपने

पास बुला लिया था, अब वहीं उन दोनों के अभिभावक और संरक्षक थे। वर्षा बदहवास हो उठी थी, वह तेजी से

अपने मामू की तलाश में निकली, वह इस खतरनाक बात को अपने मामू के कानों तक पहुंचा देना चाहती थी।

इधर रमाकांत को भी बलदेव राज की तलाश थी। वह जानना चाहता था कि आखिर यह गुस्ताख लड़की है कौन?

अगर बलदेव राज की बेटी है तो उसका कृष्णाकांत के शव से लिपटकर रोने का क्या मतलब? यह अब तक कहा थी? इतनी देर से क्यों पहुची? और सबसे बड़ा जवाब-तलब सवाल तो यह था कि उसने, उसे इस कद्र नफरत से हाथ हटाने को क्यों कहा? यानी कि रमाकांत रेखा को लेकर परेशानी का शिकार था।

रमाकांत से पहले वर्षा ने अपने मामू को खोज लिया था, वह बलदेव राज को एक कोने में ले गई और उन्हें सारा

माजरा कह सुनाया। बलदेव राज परेशान हो उठा।

"तुम रेखा को मेरे पास लेकर आओ।" वह इतना ही कह सका था।

वर्षा पलट ली थी। बलदेव राज बेचैनी से उसकी इंतजार करने लगा। फिर कुछ ही देर बाद रेखा, वर्षा के साथ आती नजर आई। सफेद दुपट्टे में उसने अपना आधा चेहरा ढक रखा था। अंकल बलदेव राज ने इधर-उधर देखा और फिर कुछ सोचकर तेजी से सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ बढ़ गया। वर्षा और रेखा भी उसके पीछे वहां गई। कृष्णकांत का नौकर घनश्याम अपनी बीवी राधा के साथ कोठी में ही था।

" हा क्या हुआ?" बलदेव राज ने पूछा।

"वर्षा आपको बता चुकी है।" रेखा ने भावहीन स्वर में जवाब दिया।

"तुम्हे ऐसा नहीं कहना चाहिये था। मैंने पूरे रास्ते तुम्हें इतना समझाया भी...।"

"उसने मेरा हाथ पकड़ लिया था। में बस अपना गम भी भूल गई और उस पर बरस पड़ी।" रेखा ने सफाई पेश की।

" हैरत है उसने जवाब में कुछ न कहा । "

" अच्छा हुआ कि वह कुछ न बोला। वर्ना मैं भी उसे बता देती कि मैं कौन हूँ?"

"वह बहुत चालाक है।" बलदेव राज हाथ मलते बोला- "तुम खुद पर काबू न रख पाई और अपने पापा के शव से लिपटकर रोने लगीं। उसे उसकी खबर मिली तो वह फौरन वहां पहुंचा। उसने हाथ पकड़कर ठाना चाहा कि तुम से पूछ सके कि तुम कौन हो? लेकिन तुम्हारे दुस्साहत ने उसके होश उड़ा दिये। यह... यह ठीक नहीं हुआ है बेटी । अब उसका शक यकीन में बदल चुका होगा और वह तुम्हारी तलाश में तो है ही...।" बलदेव राज ने अंदाजा लगाया था जो बिल्कुल ठीक था।

"मैं उससे कब तक छिपूंगी?" रेखा बोली। यह सवाल भी था और रेखा का वह संकल्प भी जो वह कर चुकी थी।

"तुम नहीं जानती हो वह कितना संगदिल और कूर आदमी है।" अंकल बलदेव ने उसे समझाने की कोशिश की।

"मैं उससे ज्यादा संगदिल और क्रूर बन जाऊंगी।" रेखा ने समझने से इंकार कर दिया।

"हम कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।" बलराज दबी जुबान में बोला "जायदाद के कागजात और वसीयत हमारे वकील के पास मौजूद हैं। कल वकील साहब यहां आएंगे। वसीयत सबके सामने पढ़कर सुनाई जाएगी। मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पापा की 'विल' में क्या है? मैं खड़े होकर ऐलान कर दूंगा कि कृष्णकांत का वारिस कौन है। खैर, यह तो कल की बात है। फिलहाल, मैं चाहता हूँ कि तुम वर्षा और उसकी मम्मी के साथ अभी घर चली जाओ। मैं तुम लोगों के पहुंचने का इंतजाम को देता हूँ। आओ, मेरे साथ।"

बलदेव राज क्वार्टर से बाहर निकल आया। उसने रेखा को अपनी बहन और भांजी के साथ अपनी गाड़ी में अपने घर
 
को रवाना कर दिया। ड्राईवर उन्हें गाड़ी में चुपचाप निकाल ले गया था। यह काम इतनी तत्परता व गोपनियता के

साथ हुआ कि वह गुस्ताख लड़की जो शव से लिपटी विलाप कर रही थी- अब यहां मे क्रोठी नहीं है। उन्हें रवाना कर, बलदेव राज ने राहत की सांस ली थी। शुक्र था कि रेखा ने उसकी बात खामोशी से मान ली थी।

जाने से इंकार नहीं किया था।

बलदेव राज ने अंदर आते ही अर्थी उठाए जाने का इशारा किया। यूं रमाकांत को उससे बात करने का मौका नहीं . मिला। श्मशान घाट पर अन्तिम क्रियाकर्म में रात के आठ बज मए और वहां से निकलते ही बलदेव राज ने अपने घर का रुख किया। पहले उसका इरादा रात को मॉडल टाऊन वाली कोठी पर ही रहने का था लेकिन इन बदली हुई परिस्थितियों में उसने रमाकांत से दूर ही रहना उचित समझा था।

और फिर, अगले दिन खानदान के बड़े-बुजर्गों के बीच वकील साहब ने वसीयत खोलकर पड़ी। इस बसीयत के अनुसार मॉडल टाऊन की कोठी व मालरोड का रेस्टोरन्ट रेखा के नाम किया गया था। सावनपुर की जमीन-जायदाद का हकदार रेखा के भाई इन्द्रजीत को ठहराया गया था। यह भी स्पष्ट कर दिया गया था इन्द्रजीत के न मिलने पर सूरत में रेखा ही जायदाद के उस हिस्से की स्वामिनी हीगीं।

यह वसीयत रमाकांत के सिर पर किसी पत्थर की तरह लगी। वह यह वसीयत सुनते ही किसी बावले कत्ते की तरह काटने को दौड़ा। उसने वसीयत की नकल फाड़कर पुज-पुर्जे कर दी और फुफकारता हुआ कोठी से निकल गया।

बलदेव राज को अब रेखा की फिक्र थी। रमाकांत अब बावला हो चुका था, वह किसी भी वक्त रेखा को काट सकता था। अंकल बलदेव राज ने पहला काम यही किया कि जो भी फ्लाईट उपलब्ध हो सकी उससे ही रेखा को बंगलौर वापस भेज दिया। यूं बह चौबीस घन्टे के अन्दर वापस बंगलौर पहुंच गई।

रेखा वापस नहीं जाना चाहती थी। अंकल बलदेव उसे स्वर्गीय बाप की कसम देकर ही उसे वापस भेज सका था।

बलदेव राज ने उसे समझाया था रेखा बेटी! तुम्हारे बाप ने तुम्हारी जिन्दगी बचाने को ही अपनी जिन्दगी नर्क बना ली थी। तुम्हारी जिन्दगी की हिफाजत के लिए ही तुम्हें मरा घोषित कर दिया था। पूरी जिन्दगी तुम्हारे लिए तरसते रहे। लेकिन अपनी हसरतों व मुहब्बत के लिए तुम्हें मौत में धकेलना पसन्द न किया। अब तुम चाहती हो कि में तुम्हें अपनी जान खतरे में डालने की इजाजत दे दूं। तुम्हें भोड़ियों की भेंट चढ़ा दूं। वह मुझे तुम्हारा अभिभावक गार्जियन बनाकर गए हैं। भगवान न करे तुम्हें कुछ हो गया हूँ उनकी आत्मा किस कदर तड़पेगी। रेखा, तुम्हें तुम्हारे स्वर्गीय बाप की कसम, तुम्हें वापस बंगलौर जाना होगा। तुम्हारी तरफ से कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए में यहां मौजूद हूँ। तू इत्मीनान रख मेरे होते हुए तुमसे तुम्हारा हक कोई नहीं छीन सकता। "

और इसका जवाब रेखा ने यूं दिया था- "ठीक है, अंकल में चली जाती हूँ। लेकिन यह बात में अच्छी तरह जानती हूँ कि मेरे भाई इन्द्र का अपहरण मेरे इस चाचा रमाकांत ने ही किया है और मेरा विश्वास है कि इन्द्र जिन्दा है, और रमाकांत ही के कब्जे में है। अंकल मैं जमीन-जायदाद पर लानत भेजती हूँ मुझे अपना भाई चाहिये। मैं उन्हें ढूंढ़ना चाहती हूँ। अगर वह मुझे मिल गए तो मैं यहां से यहां तक एक-एक को देख लूंगी।"

"रेखा बेटी! मैं इस मामले में तुम्हारी हर मुमकिन मदद करने को तैयार हूँ। भगवान ने चाहा तो इन्द्रजीत भी जरूर आएगा। तुम फिक्र न करो। अच्छा जाओ फ्लाईट का वक्त हो रहा है। अपना ख्याल रखना...।" बलदेव राज ने रेखा को गले लगा कर भावभीनी विदाई दी थी।

"बॉय अंकल...!" रेखा की आंखें भर आई। वह अपने आंसू पीते हुए तेजी से रनवे की तरफ बढ़ गई थी।

रेखा जहाज में पहुंचकर पेचो-ताव खाती रही।

उसे एक तरफ अपने बाप की मौत का शहीद सदमा था तो दूसरी तरफ इस बात का दुःख था कि वह कायरों की तरह वहां से जान बचाकर भाग आई थी। अंकल बलदेव ने उसके साथ बड़ा जुल्म किया था। ख्वामखाह पापा की कसम दी। ऐसे में उसे दिल्ली छोड़नी ही थी।

वह दिल्ली छोड़ आई थी। जालिमों और साजिशों के लिए खुला मैदान छोड़ दिया था।

चाचा रमाकांत के प्रति तो उसके दिल में ऐसा आक्रोश था कि जी चाहता था कि फौरन जहाज से छलांग लगाकर
 
सावनपुर पहुंचे और अपने चाचा रमाकांत पर गोलियों की बरसात करके उसे सचमुच की छलनी बना दे।

काश! वह लड़का होती तो अंकल बेलदेव यूं भयभीत होकर उसे बंगलौर रवाना हर्गिज न करते। वह इस वक्त अपने बाप की कोठी में होती और वहां बैठकर दुश्मनों के खिलाफ प्लानिंग कर रही होती।

इन्हीं बिफरी सोचों के दौरान उसने खुद को बहलाया, सोचा- कोई बात नहीं है। वह लड़की होकर भी ऐसे दुस्साहस दिखाएगी कि रमाकांत के होश उड़ जाएंगे। अपने चाचा के होश तो उसने उस वक्त उड़ा दिए थे जब चाचा ने उसका . हाथ पकड़ा था। उसकी डांट सुनकर वह कैसा भीगी बिल्ली बन गया था।

इस अहसास ने रेखा को बड़ा सुकून बख्शा।

बहरहाल रेखा बंगलौर पहुंची तो उसे रिसीव करने को एयरपोर्ट पर अमर मौजूद था।

अमर का उदास चेहरा देखकर ही रेखा को याद आयी कि वह दिल्ली से अपने बाप का क्रियाकर्म करके आ रही है। रेखा करीब आई तो अमर धीमे से बोला-

"बड़ा अफसोस हुआ, रेखा !"

"हां, भैया! मैं बड़ा अनूठा नसीब लिखाकर लाई हूँ। सब खत्म हो गया, भाई! सब ! रेखा की आखों में आसू चमकने लगे।

"रेखा, कुछ खत्म नहीं हुआ। हम इन्सानों की जिन्दगियां एक-दूसरे के पास प्रभु की अमानत हैं। जो देता है वही लेने का भी हक रखता है। उसने अपना हक इस्तेमाल कर लिया। अब आपको सब करना होगा।" अमर ने उसे ढांढस देने की कोशिश की।

रेखा कुछ न बोली! जवाब देती भी तो क्या?

"मैं गाड़ी लेकर आता हूँ। तुम यहीं रहो।"

अमर चला गया। रेखा वहीं बरामदे के गेट पर अमर का इंतजार करने लगी। अमर गाड़ी लेकर आया तो रेखा यह देखकर चकित रह गई कि पिछली सीट पर गंगा मौसी भी मौजूद थीं। गाड़ी रुकी तो उन्होंने दरवाजा खोल बाहर आना चाहा, लेकिन रेखा ने उन्हें गाड़ी से उतरने का मौका नहीं दिया। रेखा गाड़ी में समा गई तो बैठे-बैठे ही गंगा मौसी से लिपट गई। उसकी सिसकियां बंध गई।

अमर ने घूमकर तसल्ली देते हुए कहा- "रेखा, प्लीज! रोयें नहीं। "

फिर उसने गाड़ी से उतरकर रेखा का सामान डिग्गी मैं रखा। फिर स्टेयरिंग पर आ बैठा। इस बीच रेखा ने खुद को सम्भाल लिया था और अपनी तरफ का दरवाजा भी बन्द कर लिया था। अमर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

रेखा सारे रास्ते गंगा मौसी के कन्धे पर अपना सिर रखे बैठी रही और गंगा मौसी बड़े दुलार और प्यार से ही उसके सिर पर अपना हाथ फेरती रही।

दे घर पहुंचे और यहां भी रेखा रात गए तक गंगा मौसी के कमरे में बैठी रही। रेखा ने अपनी जिन्दगी का सारा कच्चा चिट्ठा गंगा मौसी के सामने खोल दिया।

रेखा की जिन्दगी एक पहेली और एक सिर दर्द बनकर रह गई थी। उसकी रहस्यमय जिन्दगी अब खुद उसके लिए

एक बोझ बन गई थी। रेखा ने फैसला किया कि अब वह पहेली बनकर न रहेगी और अपने हर हमदर्द के सामने

अपनी हकीकते जाहिर कर देगी।

अमर जो रेखा के बारे में कुछ भी नहीं जानता आज की रात वह भी सब कुछ जान गया था। यह भी समझ गया था कि अब रेखा को अत्याधिक सुरक्षा की जरूरत है। रेखा की आपबीती ने अमर को उलझा भी दिया था।

रात के लगभग तीन बजे जब रेखा अपने कमरे में जाने के लिए उठी तो गंगा मौसी ने उसका हाथ पकड़ बैठा लिया, बोली- " अब ऊपर जाकर क्या करोगी। यहीं सो जाओ।"

"हा, मौसी यही बेहतर रहेगा।" अमर बोल उठा और फिर खुद कमरे से निकल गया।

अमर के जाने के बाद गंगा मौसी ने दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। रेखा उनके बाजू पर सिर रखकर लेट गई और जल्दी ही नींद को गोद में पहुंच गई।
 
वह रात रेखा ने गंगा मौसी के कमरे में ही गुजारी।

सुबह जब रेखा की आख खुलीं तो, गंगा मौसी नहा-धोकर मन्दिर जाने के लिए तैयार थी।

रेखा को जाग गई देख मौसी मुस्कराते हुए बोली "जाग गई बेटी! शायद लाईट जलाने से आंख खुल गई है तुम्हारी । लाइट ऑफ कर दूं।"

"नहीं, मौसी!" वह पलंग से उतर आई थी "मैं अपने कमरे में जाती हूँ।"

" जैसी तुम्हारी मर्जी ।" मौसी चली गई।

रेखा ऊपर अपने कमरे में आ गई। उसने भी नहा धोकर मन्दिर जाने का मन बनाया था। ताकि मन को शान्ति प्राप्त हो सके। पर वह अपने कमरे में पहुंची तो नींद फिर जोर मारने लगी। वह यह सोचकर थोड़ी देर लेट जाऊं फिर उठकर नहाती हूँ-लेटी तो ऐसी सोई कि सुबह नौ बजे आंख खुलीं।

। फिर लगभग साढ़े नौ बजे वह नहा-धोकर बाथरूम से निकली तो माया को अन्दर आते देखा।

"आओ माया । कैसे आई?" रेखा ने भारी मन से पूछा था। उसकी उदासी दूर नहीं हुई थी। दिलो-दिमाग पर एक बोझ सा था।

"आपका नाश्ता यहीं ले आऊं बीबी?" वो शायद यही पूछने आई थी।

"नहीं, मैं नीचे ही आ रही हूँ नाश्ता मौसी के कमरे में करूंगी।" फिर रेखा जब गंगा मौसी के कमरे में पहुंची तो उसने देखा कि मौसी अखवार देख रही थी। वह मौसी के निकट आ बैठी।

"साढ़े आठ बजे के करीब बलदेव राज का फोन आया था। मैंने तुम्हें दिखलाया तो तुम सो रही थी, सो तुम्हें उठाना

उचित नहीं समझा। फिर बलदेव राज ने भी तुम्हें उठाने से मना कर दिया। बलदेव ने बताया है कि तुम्हारे चाचा अपने

परिवार के साथ वापस जा चुका है। जाते-जाते वह बलदेव को धमकियां दे गया है।"

" किस किस्म की धमकी ?" रेखा ने पूछा।

"यही कि वह बलदेव राज पर मुकदमा दायर करेगा कि रेखा उसके बड़े भाई कृष्णकांत की असली बेटी नहीं है और यह सारा स्वांग बलदेव राज ने रचाया है ताकि मॉडल टाऊन वाली कोठी और रेस्टोरेन्ट पर कब्जा कर सके। "

"अंकल बलदेव तो यह सुनकर परेशान हो गए होंगे?"

" अरे नहीं तुमने बलदेव राज को क्या समझा है। वह भी अपनी ही किस्म का बड़ा निडर और जिद्दी इन्सान है, शरीफ और नेकदिल है लेकिन उस वक्त तक जब तक सामने वाला भी शराफल दिखाए।"

"काश! मेरे पापा भी ऐसे ही होते । शरीफों के लिए शरीफ और बदमाशों के लिए बदमाश।"

"तुम अपने पिता की क्या बात करती हो, वह तो बहुत ही प्यारे इंसान थे, देवता थे देवता! शरीफों के लिए तो शरीफ थे ही बदमाशों के लिए भी शरीफ थे। मैं तुम्हारे पिता को बड़े सम्मान की निगाह से देखती हूँ। आज के इस फरेबी दौर में ऐसे लोग ढूंढे नहीं मिलते....।" गंगा मौसी ने बड़ी श्रद्धा से कहा।

ये बातें चल ही रही थीं कि माया नाश्ता ले आई।

"बड़ी देर कर दी तुमने माया।"

"बड़ी बीबी ! सब कुछ ताजा बनाकर लाई हूँ। इसलिए थोड़ी देर हो गई।" उसने ट्रे बैड पर रखनी चाही।

"नीचे कालीन पर ।" रेखा ने उसे टोका और फिर व्यंजनों से भरी ट्रे को देखते हुए बोली- "भई यह कितने लोगों का नाश्ता बना डाला तुमने?"
 
स्वाहा "सिर्फ आपके लिए जी।" माया ने मासूमियत से कहा। गंगा मौसी बोल उठी- "ज्यादा कहां है कर लो। तुमने रात को भी मुश्किल से दो निवाले खाए थे।"

रेखा ने नाश्ता किया और फिर ऊपर अपने कमरे मैं चली आई।

उसका सूटकेस अभी तक बंद पड़ा था। सूटकेस खोलकर उसने अपने कपड़े निकाले और उन्हें अलमारि में रख दिया। सूटकेस में सबसे नीचे वह डायरी रखी थी। रेखा वह डायरी अपने साथ दिल्ली ले गई थी। दिल्ली उसने ...जिज्ञासावश ही डायरी कई बार खोलकर देखी थी लेकिन कुछ लिखा नजर नहीं आया था।

रेखा चाहती थी कि उसे पापा के बारे में कोई इशारे मिलें कि उनकी हत्या किसने की है? लेकिन डायरी सादा व साफ ही रही थी। उसने डायरी को कैसों के बीच रखनी चाही पर तभी उसने ऐसे ही डायरी के पृष्ठों पर नजर डाली और अब उसके हैरत की सीमा न रही।

उसे डायरी में कुछ पेज लिखे नजर आए।

वह फौरन पलटी और बैड पर बैठ गई। फिर ख्याल आया दरवाजा खुला हुआ है। उसने जल्दी से दरवाजा बन्द किया और फिर बैड पर बैठकर डायरी का वह लिखा हुआ पृष्ठ पढ़ने लगी, लिखा था-

"हम जानते हैं कि तुम क्या जानना चाहती हो। हम तुम्हें बताते हैं कि तुम्हारे पापा कृष्णकांत को किसने कत्त किया

है। वाक्य में जवाब यह है कि रमाकांत ने हां तुम्हारा चाचा ही तुम्हारे पापा का कातिल है।"

" रमाकांत उस दिन शाम को सावनपुर से दिल्ली पहुंचा था। वह पूरे इंतजाम से आया था। तुम्हारे पापा न उस शाग और रात के अपने सारे प्रोग्राम कैन्सिल कर दिए थे और अपने रसोइये घनश्याम को हुक्म दिया था कि वो रमाकांत की मर्जी का खाना पकाए ? खाने इत्यादि से निवृत होकर जब कृष्णकांत वाहर लॉन में टहल रहे थे तो तब घनश्याम ने उसे अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की खबर दी। यह सूचना उसे फोन पर मिली थी कि बेटी घर से अस्पताल पहुंच चुकी थी। धनश्याम ने बेटी को देखने जाने की इजाजत चाही जो कृष्णकांत ने फौरन दे दी और साथ ही पांच सौ रुपये भी इसथत कर दिए। घनश्याम अपनी बीवी के साथ चला गया। उनके ताने के बाद तुम्हारे चाचा ने कहा-

"भाई साहब, आईए! आपसे कुछ बातें करनी हैं।"

कृष्णकांत उसे अपने साथ लाउन्ज में ले आए और अपनी बड़े बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गये। वह प्रायः टी० वी० अपनी इसी कुर्सी पर बैठकर देखते थे। वह कुर्सी पर बैठ गए और उसने रमाकांत से पूछा।

"हां, कहो! क्या वात करनी है?"

जवाब में रमाकात ने अपने ब्रीफकेस में से एक फाईल निकाली और उन्हें थमा दी और बोला- "भाई साहब, आप इन कागजात को पढ़ना चाहे तो पढ़ लें और ना पढ़ना चाहें तो भी कोई हज नहीं है। आपको इन पर दस्तखत करने हैं। और हर सूरत में करने हैं।"

भाई के इस अंदाज पर वह चौंके। उसे सिर उठाकर देखा और पूछा- "क्या मतलव है तुम्हारा?"

"भाई साहब! मतलब यह है कि अब मुझसे आपकी मौत का इंतजार नहीं होता। जो जायदाद मुझे आपकी मति के बाद नसीब होगी- मैं चाहता हूँ कि वह मुझे आपकी जिन्दगी में ही मिल जाए तो अच्छा है....।"

"ओह! तो ये जमीनों के कागजात हैं?"

"जी, ये तमाम जायदाद के कागजात हैं। आपके दस्तखतों के बाद यह सब कुछ मेरा हो जाएगा।" " तुमने यह कैसे समझ लिया कि तुम कहोगे और मैं इन कागजात पर दस्तखत कर दूंगा।"

"भाई साहब! आप इस जायदाद का क्या करेंगे? कहां ले जाएगें।"

"इस जायदाद के वारिस मौजूद हैं।"
 
मौजूद हैं।" रमाकांत ने दोहराया "क्या एक से ज्यादा हैं?"

तुम्हारा चाचा यह सुनकर परेशान हुआ था।

"हां दो हैं। "

"कौन-कौन? जरा हम भी तो सुने...हमें भी ता पता चले।"

"मेरा बेटा इन्द्रजीत वह राक दिन जरूर वापस आएगा।"

" और दूसरा ?" रमाकांत ने पूछा।

" दूसरे वारिस का मेरे मरने के बाद तुम्हें पता चलेगा।"

रमाकांत ने फौरन ही कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना ब्रीफकेस खोला और रिवॉल्वर निकालकर कृष्णकांत पर तान लिया और बोला-

"चलो, तो फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।"

"यह क्या बेहुदगी है। तुम पागल हो गए हो क्या? इस जायदाद के लिए तुम अपने बड़े भाई की जान लोगे? " "जायदाद चीज ही ऐसी है, क्या करु?"

"तुम जानते हो कि मेरी जमीनें जिन्दगी भर तुम्हारे कब्जे में रही हैं। मैने कभी तुमसे हिसाब तक नहीं मांगा। फिर भी तुम मेरी जान के पीछे हो ।"

"तो फिर का दीजिए ना साईन ताकि तुम्हारे हिस्से की जायदाद पूरी तरह से मेरी हो जाए। तुम्हें आखिर जरूरत ही

क्या है पैसे की ? रेस्तरां से आपको अच्छी खासी आमदनी है आपके आगे कोई औलाद भी नहीं है। मेरा तो भरा-पूरा

परिवार है। "

"मेरा इन्द्रजीत लापता है-मरा नहीं...।"

"किस खुशफहमी में हैं आप। इन्द्र अब इस दुनिया में नहीं है। "

कृष्णकांत ने उसे घूरते हुए पूछा- "तुम यह कैसे कह सकते हो?"

"आज मैं आपको राज की बात बताए देता हूँ। तुम्हारे बेटे इन्द्र को जंगल से मेरे आदमियों ने उठाया था और उसे जहां पहुंचाया था आज तक वहां से कोई वापरा नहीं लौटा।"

कृष्णकांत आपा खो बैठा, बोला- “कमीने तूने मेरे बेटे को मार दिया। मैं तेरा खून पी जाऊंगी।" वह कागजात कों फौरन जमीन पर फैककर उठने लगे तो रमाकांत ने आगे बढ़कर रिवॉल्वर उनकी कनपटी पर रख दिया।

"भाई साहब! ज्यादा जोश में आने की जरूरत नहीं है। होशमंदी का सबूत दीजिए और खामोशी से कागजात पर दस्तखत कर दीजिए...।"

"किसी कीमत पर नहीं...।"

तुम्हारे पिता ने इस क्रूर व्यक्ति र्का आंखों में आंखे डाल दीं और बोले- "कमीने! जलील! चलाओ गोली।”

"यह लो...।" रमाकांत ने एक सेकेन्ड का भी इंतजार नहीं किया। उसने गोली चला दी।

और इस गोली ने कुछेक क्षणों में ही तुम्हारे पिता का काम तमाम कर दिया। यह रिवॉल्वर तुम्हारे पिता का ही था। वह रिवॉल्वर उसने कृष्णकांत के दांए हाथ में थमाया....कागजात समेटे और बड़े इत्मीनान से कोठी का गेट बन्द करके वहां से निकल गया और रातों-रात सावनपुर पहुंच गया।
 
रमाकांत वास्तव में पूरी योजना बनाकर आया था। उसने घर के नौकर घनश्याम को धमकी और दौलत की चमक से खरीद लिया था। वो मियां-बीबी उसके इशारे पर ही चले गए थे।

उसकी बेटी का एक्सीडेन्ट नहीं हुआ था।

हालांकि कत्ल की इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, लेकिन अगर धनश्याम और उसकी बीबी को पुलिस के हवाले कर दिया जाए ती वे रमाकांत की आमद उसकी धमकी और एक लाख रुपये की पेशकश के बारे में बताने में ज्यादा देर नहीं लगाएंगे। वह एक लाख रुपया भी बरामद हो जाएगा जो रमाकांत ने घनश्याम को दिया है। रमाकांत ने यह निर्णायक योजना इसलिए बनाई थी कि वह मामले को आर-पार करने आया था और पार करके चला गया था।

अच्छा हम चलते हैं-हमें गया वक्त न समझना... हम फिर आएंगे।

यह सब डायरी में लिखा था। रेखा को उसकी उलझन का जवाब मिल गया था।

और फिर वही हुआ । रेखा अन्तिम शब्दों पर नजर डाल रही थी कि शब्द हल्के होने शुरु हो गये थे। देखते ही देखते यह सब लिखा हुआ आंखों से ओझल हो गया। डायरी फिर कोरी की कोरी रह गई।

रेखा का ख्याल था कि यह हत्या उसके चाचा ने किसी भाड़े के कातिल से कराई होगी। लेकिन यहां तो मामला और

ज्यादा संगीन था। यह कत्ल चाचा ने अपने हाथों से किया था।

रेखा के दिल में अपने चाचा के प्रति रोप बढ़ता गया। लंगड़े प्रेत ने एक अति महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया था कि पूरी जिन्दगी साथ निभाने वाला नौकर बिक गया था। पर यह कोई ऐसी हैरत में डालने वाली बात नहीं थी। जब दौलत जायदाद के लिए भाई ने भाई की इस निर्ममता से हत्या कर दी तो किसी गैर का लालच में आना क्या मायने रखता था।

रेखा ने सोचा कि उसे इस सूरते-हाल से फौरन अंकल बलदेव को आगाह करना चाहिए ।

पर समस्या यह थी कि वह उन्हें अपनी इस जानकारी ऊं स्रोत क्या बताएगी। यह तो बता नहीं सकी थी कि उसके पास एक ऐसी डायरी है जिसमें उसकी जिन्दगी के रहस्य सुलझ कर आ जाते हैं और फिर वह शब्द खुद-ब-खुद ही मिट भी जाते है।

यह विश्वास करने लायक बात भी न थी। किसी को बताएगी तो खुद का ही मजाक उड़वायेगी। सुनने वालों ने तो यही कहना था बाप की मौत के सदमें ने उसके दिमाग को प्रभावित किया है। यह लड़की रो में बह गई है... पागल हो गई है।

पर रेखा को विश्वास था कि अंकल बलदेव उसकी बात पर जरूर ध्यान देंगे। पुलिस खोजबीन कर रही है और

पुलिस ने नौकर को भी यकीनन अपनी तफ्तीश में शामिल किया होगा।

रेखा के जहन में जाने क्या ख्याल आया कि उसकी आंखों को चमक बढ़ गई। उसने अंकल बलदेव से फोन पर दिल्ली के मॉडल टाऊन वाली कोठी पर बात करने का फैसला किया क्योंकि अंकल बलदेव के वहीं होने की सम्भावना थी।

पर वहां का फोन नम्बर रेखा के पास नहीं था।

यह सोचकर कि इस बाबत गंगा मौसी से बात करनी चाहिए- रेखा नीचे चली आई। गंगा मौसी कालीन पर बैठी सोफे से पीठ लगाए कोई पत्रिका पढ़ रही थीं।

"आओ, बेटी बैठो।"

"मौसी, बदलेव अंकल से बात करनी है।"

"पर अपने धर पर वह कहां होंगे?"
 
रमाकांत वास्तव में पूरी योजना बनाकर आया था। उसने घर के नौकर घनश्याम को धमकी और दौलत की चमक से खरीद लिया था। वो मियां-बीबी उसके इशारे पर ही चले गए थे।

उसकी बेटी का एक्सीडेन्ट नहीं हुआ था।

हालांकि कत्ल की इस वारदात का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, लेकिन अगर धनश्याम और उसकी बीबी को पुलिस के हवाले कर दिया जाए ती वे रमाकांत की आमद उसकी धमकी और एक लाख रुपये की पेशकश के बारे में बताने में ज्यादा देर नहीं लगाएंगे। वह एक लाख रुपया भी बरामद हो जाएगा जो रमाकांत ने घनश्याम को दिया है। रमाकांत ने यह निर्णायक योजना इसलिए बनाई थी कि वह मामले को आर-पार करने आया था और पार करके चला गया था।

अच्छा हम चलते हैं-हमें गया वक्त न समझना... हम फिर आएंगे।

यह सब डायरी में लिखा था। रेखा को उसकी उलझन का जवाब मिल गया था।

और फिर वही हुआ । रेखा अन्तिम शब्दों पर नजर डाल रही थी कि शब्द हल्के होने शुरु हो गये थे। देखते ही देखते यह सब लिखा हुआ आंखों से ओझल हो गया। डायरी फिर कोरी की कोरी रह गई।

रेखा का ख्याल था कि यह हत्या उसके चाचा ने किसी भाड़े के कातिल से कराई होगी। लेकिन यहां तो मामला और

ज्यादा संगीन था। यह कत्ल चाचा ने अपने हाथों से किया था।

रेखा के दिल में अपने चाचा के प्रति रोप बढ़ता गया। लंगड़े प्रेत ने एक अति महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया था कि पूरी जिन्दगी साथ निभाने वाला नौकर बिक गया था। पर यह कोई ऐसी हैरत में डालने वाली बात नहीं थी। जब दौलत जायदाद के लिए भाई ने भाई की इस निर्ममता से हत्या कर दी तो किसी गैर का लालच में आना क्या मायने रखता था।

रेखा ने सोचा कि उसे इस सूरते-हाल से फौरन अंकल बलदेव को आगाह करना चाहिए ।

पर समस्या यह थी कि वह उन्हें अपनी इस जानकारी ऊं स्रोत क्या बताएगी। यह तो बता नहीं सकी थी कि उसके पास एक ऐसी डायरी है जिसमें उसकी जिन्दगी के रहस्य सुलझ कर आ जाते हैं और फिर वह शब्द खुद-ब-खुद ही मिट भी जाते है।

यह विश्वास करने लायक बात भी न थी। किसी को बताएगी तो खुद का ही मजाक उड़वायेगी। सुनने वालों ने तो यही कहना था बाप की मौत के सदमें ने उसके दिमाग को प्रभावित किया है। यह लड़की रो में बह गई है... पागल हो गई है।

पर रेखा को विश्वास था कि अंकल बलदेव उसकी बात पर जरूर ध्यान देंगे। पुलिस खोजबीन कर रही है और

पुलिस ने नौकर को भी यकीनन अपनी तफ्तीश में शामिल किया होगा।

रेखा के जहन में जाने क्या ख्याल आया कि उसकी आंखों को चमक बढ़ गई। उसने अंकल बलदेव से फोन पर दिल्ली के मॉडल टाऊन वाली कोठी पर बात करने का फैसला किया क्योंकि अंकल बलदेव के वहीं होने की सम्भावना थी।

पर वहां का फोन नम्बर रेखा के पास नहीं था।

यह सोचकर कि इस बाबत गंगा मौसी से बात करनी चाहिए- रेखा नीचे चली आई। गंगा मौसी कालीन पर बैठी सोफे से पीठ लगाए कोई पत्रिका पढ़ रही थीं।

"आओ, बेटी बैठो।"

"मौसी, बदलेव अंकल से बात करनी है।"

"पर अपने धर पर वह कहां होंगे?"
 
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