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दिल्ली के एयरपोर्ट पर अंकल बलदेव रेखा के प्रतीक्षक थे।
रेखा के गेट से बाहर निकलते ही वह उसकी तरफ लपके। उनका जी चाहा कि वह रेखा से लिपट कर रो पड़े। कृष्णकांत रिस्तेदार के अलावा बलदेव राज का बहुत प्यारा दोस्त था ओर आने वाली उसके इस दोस्त का खून थी । उसे लिपटाकर न रोते नो फिर किसे लिपटाकर रोते ।
बलदेव राज की हालात बुरी हो रही थी। उसने अपने आप को सम्भाला और रेखा के सिर पर हाथ रखकर उसे - हल्का-सा गले से लगाया और बोले-
"कैसी हो रेखा ?"
रेखा ने जवाव देने के बजाय उनकी आंखों में झांका और बड़े संजीदा लहजे में पूछा- "मेरे पापा की मौत कैसे हुई?"
यह सुनकर बलदेव राज हड़बड़ा ही तो गया। यह तो यही सोच कर परेशान और हलकान होता रहा था कि वह रेखा को उसके बाप की मौत की खबर किन शब्दों में और कैसे देगा। लेकिन रेखा तो जैसे उस मंजिल से आगे निकल चुकी थी। तो क्या गंगा ने उसे सब कुछ बता दिया?
"तुम्हारी गंगा मौसी ने तुम्हें क्या बताय?" उसने धीमे स्वर में पूछा था।
"खाला ने तो मुझे कुछ भी नहीं बताया। यह भी नहीं कि मेरे पापा मर चुके हैं।" बड़ा अजीब-सा लहजा था रेखा का
हो " फिर तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि तुम्हारे पापा का देहान्त हो चुका है?"
"देहान्त नहीं...खून कहिये खून...! मेरे पापा का खून हुआ है।" रेखा बड़े ही रहस्यमय अन्दाज के साथ बोली थी।
"आह...!" अंकल बलदेव राज का मुंह मारे हैरत के खुल गया, "आओ चलो रास्ते में तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। "
रेखा के पापा कृष्णकांत मॉडल टाऊन वाली अपनी कोठी में अकेले रहते थे। अब उनकी उम्र भी किसी का मुकाबला या विरोध करने वाली नहीं थी। उनकी हत्या कर देना कोई कठिन काम नहीं था। कोठी में उनके साथ सिर्फ एक नौकर और नौकरानी ही तो थे। दोनों मियां-बीवी थे और कृष्णकांत के बहुत पुराने मुलाजिम थे। घनश्याम और राधा की ही बेटी थी जो शादीशुदा थी। रात को अचानक उन्हें अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की सूचना मिली तो वे कृष्णकांत से इजाजत लेकर अपनी बेटी के घर शाहदरा चले गए। उनकी बेटी अस्पताल से घर पहुंच चुकी थी।
बसा यह रात ही कयामन की थी हत्यारा शायद घात लगाए बैठा था। सुबह को दूध वाले ने बैल बजाई। कोठी का फाटक खटखटाया और कोई बाहर न निकला तो उसे फिक्र हुई, क्योंकि ऐसा आज तक नहीं हुआ था। उसने बराबर वाली कोठीवालों को बताया, जब लोगों ने गेट के अन्दर कूदकर देखा तो कोठी का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और कृष्णकांत खून से लथपथ पड़े थे। उनके दांए हाथ मे रिवॉल्वर दबा हुआ था।
कातिल ने इसे आत्महत्या का केस बनाने की कोशिश की थी। गोली कनपटी में लगी थी। गोली बहुत करीब से चलाई गई थी। वाई कनपटी में सुराख हो गया था और गोली अन्दर ही कहीं फंस गई थी। हत्यारे स बस यही चूक हो गई थी। सुराख बाईं तरफ था, जबकि उनका रिवॉल्वर उनके दांए हाथ में पकड़ा हुआ था।
प्रारम्भिक तफतीश से ही यह बात साफ हो गइ थी कि कृष्णकांत साहब ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उन्हें मारा गया- है। कृष्णकान्त उम्रदराज बूढे जरूर थे। लेकिन उम्र के लिहाज से उनका स्वास्थ्य ईष्या योग्य था। फिर उनके आत्महत्या करने की कोई वजह भी सामने नहीं थी। ऐसे में उन्हें आलाहत्या करने की जरुरत ही क्या थी?
अपने बाप की हत्या की कहानी दूरकर रेखा गुमसुम हो गई। वह तो जैसे पत्थर की होकर रह गई था। बलदेव अंकल उसे रास्ते भर सांत्वना देते रहे... समझाते रहे। वह खामोशी से सब सुनती रही और खाली खाली निगाहों से अंकल को देखती रही।
मॉडल टाऊन की बह कोर्टा जहां कृष्णकांत की हत्या हो गई थी- रिश्तेदारों, प्रियजनों व शुभचिन्तको से भरी हुई थी। रेखा के चाचा रमाकांत का पूरा परिवार मौजूद था और उनका नाटक जारी था।
रेखा के गेट से बाहर निकलते ही वह उसकी तरफ लपके। उनका जी चाहा कि वह रेखा से लिपट कर रो पड़े। कृष्णकांत रिस्तेदार के अलावा बलदेव राज का बहुत प्यारा दोस्त था ओर आने वाली उसके इस दोस्त का खून थी । उसे लिपटाकर न रोते नो फिर किसे लिपटाकर रोते ।
बलदेव राज की हालात बुरी हो रही थी। उसने अपने आप को सम्भाला और रेखा के सिर पर हाथ रखकर उसे - हल्का-सा गले से लगाया और बोले-
"कैसी हो रेखा ?"
रेखा ने जवाव देने के बजाय उनकी आंखों में झांका और बड़े संजीदा लहजे में पूछा- "मेरे पापा की मौत कैसे हुई?"
यह सुनकर बलदेव राज हड़बड़ा ही तो गया। यह तो यही सोच कर परेशान और हलकान होता रहा था कि वह रेखा को उसके बाप की मौत की खबर किन शब्दों में और कैसे देगा। लेकिन रेखा तो जैसे उस मंजिल से आगे निकल चुकी थी। तो क्या गंगा ने उसे सब कुछ बता दिया?
"तुम्हारी गंगा मौसी ने तुम्हें क्या बताय?" उसने धीमे स्वर में पूछा था।
"खाला ने तो मुझे कुछ भी नहीं बताया। यह भी नहीं कि मेरे पापा मर चुके हैं।" बड़ा अजीब-सा लहजा था रेखा का
हो " फिर तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि तुम्हारे पापा का देहान्त हो चुका है?"
"देहान्त नहीं...खून कहिये खून...! मेरे पापा का खून हुआ है।" रेखा बड़े ही रहस्यमय अन्दाज के साथ बोली थी।
"आह...!" अंकल बलदेव राज का मुंह मारे हैरत के खुल गया, "आओ चलो रास्ते में तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। "
रेखा के पापा कृष्णकांत मॉडल टाऊन वाली अपनी कोठी में अकेले रहते थे। अब उनकी उम्र भी किसी का मुकाबला या विरोध करने वाली नहीं थी। उनकी हत्या कर देना कोई कठिन काम नहीं था। कोठी में उनके साथ सिर्फ एक नौकर और नौकरानी ही तो थे। दोनों मियां-बीवी थे और कृष्णकांत के बहुत पुराने मुलाजिम थे। घनश्याम और राधा की ही बेटी थी जो शादीशुदा थी। रात को अचानक उन्हें अपनी बेटी के एक्सीडेन्ट की सूचना मिली तो वे कृष्णकांत से इजाजत लेकर अपनी बेटी के घर शाहदरा चले गए। उनकी बेटी अस्पताल से घर पहुंच चुकी थी।
बसा यह रात ही कयामन की थी हत्यारा शायद घात लगाए बैठा था। सुबह को दूध वाले ने बैल बजाई। कोठी का फाटक खटखटाया और कोई बाहर न निकला तो उसे फिक्र हुई, क्योंकि ऐसा आज तक नहीं हुआ था। उसने बराबर वाली कोठीवालों को बताया, जब लोगों ने गेट के अन्दर कूदकर देखा तो कोठी का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और कृष्णकांत खून से लथपथ पड़े थे। उनके दांए हाथ मे रिवॉल्वर दबा हुआ था।
कातिल ने इसे आत्महत्या का केस बनाने की कोशिश की थी। गोली कनपटी में लगी थी। गोली बहुत करीब से चलाई गई थी। वाई कनपटी में सुराख हो गया था और गोली अन्दर ही कहीं फंस गई थी। हत्यारे स बस यही चूक हो गई थी। सुराख बाईं तरफ था, जबकि उनका रिवॉल्वर उनके दांए हाथ में पकड़ा हुआ था।
प्रारम्भिक तफतीश से ही यह बात साफ हो गइ थी कि कृष्णकांत साहब ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उन्हें मारा गया- है। कृष्णकान्त उम्रदराज बूढे जरूर थे। लेकिन उम्र के लिहाज से उनका स्वास्थ्य ईष्या योग्य था। फिर उनके आत्महत्या करने की कोई वजह भी सामने नहीं थी। ऐसे में उन्हें आलाहत्या करने की जरुरत ही क्या थी?
अपने बाप की हत्या की कहानी दूरकर रेखा गुमसुम हो गई। वह तो जैसे पत्थर की होकर रह गई था। बलदेव अंकल उसे रास्ते भर सांत्वना देते रहे... समझाते रहे। वह खामोशी से सब सुनती रही और खाली खाली निगाहों से अंकल को देखती रही।
मॉडल टाऊन की बह कोर्टा जहां कृष्णकांत की हत्या हो गई थी- रिश्तेदारों, प्रियजनों व शुभचिन्तको से भरी हुई थी। रेखा के चाचा रमाकांत का पूरा परिवार मौजूद था और उनका नाटक जारी था।