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का आभास कुछेक मिनट ही पहले हो जाता तो राजू मदारी की जगह इस खेमे में योगी दयाल की लाश पड़ी होती ।
राजू मदारी कोई मामूली चीज न था। वह अपने घमण्ड में मारा गया। उसके दिमाग में यह घमण्ड आ गया था कि इस वक्त दूर-दूर तक उससे बड़ा तांत्रिक कोई नहीं जो उसके मुकाबले पर आ सके। उसके किए जादू को तोड़ सके। लेकिन कभी-कभी यूं भी होता है कि हाथी को चींटी पछाड़ जाती है।
और फिर सूरतेहाल ऐसी सहज कहां थी जैसी योगी दयाल और इन्द्रजीत समझ रहे थे।
राजू मदारी इस दुनिया से चला तो गया था लेकिन जाते-जाते भी एक करतब दिखा गया था। वह मदारी जो था। उसने देवा काली दाह को पुकार लिया था। इस तरह इन्द्रजीत आकाश से गिरकर खजूर में आ अटका था, बल्कि सीधा पाताल में चला गया था और यह बात उसे मालूम थी न योगी दयाल को ।
बहरहाल, वह रात इन्द्रजीत ने योगी दयाल के साथ उसके खेमे में ही गुजारी ड्राईवर रघुवीर को सुबह वहीं आना था
और फिर शाम राजकुमारी नयना को इन्द्रजीत से मिलने नहर के पुल पर आना था। नयना ने इन्द्रजीत से कहा था कि
वह अपना सामान लेकर और बस्ती को अलविदा कहकर आए क्योंकि नयना उसे अपने साथ बहराम नगर लेकर
जाना चाहती थी। सुबह... निश्चित समय पर ही ड्राईवर रघुवीर आ पहुंचा। उसने उन दोनों को इकट्ठे देखा तो खुशी से झूम उठा। उसे शायद इन्द्रजीत के यहा मिलने की आशा नही थी।
"साहब जी...।" वह इन्द्रजीत से बोला- "आपको यहां देखकर बहुत खुशी हुई। इसका मतलब है कि योगी महाराज ने अपना चमत्कार दिखा दिया है...।"
"हां, रघुवीर ! उस जालिम का खात्मा हो चुका है।" इन्द्रजीत ने बताया ।
"वह है कहां?"
"जंगल में पड़ा है और अब तक तो शायद उसकी लाश पानी हो चुकी होगी।"
"फिर तो आपको यहां रुकने की जरूरत ही नहीं है। आप इसी वक्त मेरे साथ चलिये। योगी महराज को इनकी बस्ती में छोड़कर हम बहराम नगर हवेली में चले जाएंगे। राजकुमारी जी वहां प्रतीक्षक बैठी हैं। आपको साथ देखेंगी तो वह हर चिन्ता से मुक्त हो जाएंगी।" रघुवीर ने सुझाव दिया, जिसे इन्द्रजीत ने फौरन मान लिया।
यूं भी इन्द्रजीत का दिल बहुत घबरा रहा था वह इस इलाके से दूर निकल जाना चाहता था।
योगी दयाल ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा उसे जीप में डाला और यूं वे तीनों तुरन्त ही बहराम नगर की तरफ रवाना हो गए।
वे दोपहर तक बहराम नगर गये। योगी दयाल को उसकी बस्ती में छोड़ा और सुधीर इन्द्रजीत के साथ बहराम नगर राजा की हवेली में पहुंचा।
इस हवेली को देखकर इन्द्रजीत को अपनी सावनपुर वाली हवेली याद आ गई और उसके अपने चाचा रमाकात का
ख्याल तो आना ही था।
उसके चाचा रमाकांत ने उसे कक्त करवाने की कोशिश की थी। और इस वाक्य को गुजरे कई साल हो गये थे। यानी कि रमाकांत अब तक मुतमूईन और आश्वस्त हो चुका होगा कि अब उसकी राह में कोई काटा नहीं रहा। उस शैतान ने जाने उसकी गुमशुदगी के बारे में उसके मां-बाप को क्या कहानी सुनाई होगी। वे बचार तो परेशान हो गये होंगे।
रमाकांत के प्रति रोष की एक लहर, आज बरसों बाद इन्द्रजीत को उत्तेजित कर गई थी।
उसने सोचा अब कोई समस्या नहीं है। वह अब बच्चा नहीं रहा है... ज्यादा मजबूत, ज्यादा ताकतवर और ज्यादा अनुभवी हो चुका है। वह एक-एक को देख लेगा। पर...।
फिलहाल तो राजकुमारी नयना उसके सामने खड़ी थी उसे अभी तो उसे देखना था ।
राजू मदारी कोई मामूली चीज न था। वह अपने घमण्ड में मारा गया। उसके दिमाग में यह घमण्ड आ गया था कि इस वक्त दूर-दूर तक उससे बड़ा तांत्रिक कोई नहीं जो उसके मुकाबले पर आ सके। उसके किए जादू को तोड़ सके। लेकिन कभी-कभी यूं भी होता है कि हाथी को चींटी पछाड़ जाती है।
और फिर सूरतेहाल ऐसी सहज कहां थी जैसी योगी दयाल और इन्द्रजीत समझ रहे थे।
राजू मदारी इस दुनिया से चला तो गया था लेकिन जाते-जाते भी एक करतब दिखा गया था। वह मदारी जो था। उसने देवा काली दाह को पुकार लिया था। इस तरह इन्द्रजीत आकाश से गिरकर खजूर में आ अटका था, बल्कि सीधा पाताल में चला गया था और यह बात उसे मालूम थी न योगी दयाल को ।
बहरहाल, वह रात इन्द्रजीत ने योगी दयाल के साथ उसके खेमे में ही गुजारी ड्राईवर रघुवीर को सुबह वहीं आना था
और फिर शाम राजकुमारी नयना को इन्द्रजीत से मिलने नहर के पुल पर आना था। नयना ने इन्द्रजीत से कहा था कि
वह अपना सामान लेकर और बस्ती को अलविदा कहकर आए क्योंकि नयना उसे अपने साथ बहराम नगर लेकर
जाना चाहती थी। सुबह... निश्चित समय पर ही ड्राईवर रघुवीर आ पहुंचा। उसने उन दोनों को इकट्ठे देखा तो खुशी से झूम उठा। उसे शायद इन्द्रजीत के यहा मिलने की आशा नही थी।
"साहब जी...।" वह इन्द्रजीत से बोला- "आपको यहां देखकर बहुत खुशी हुई। इसका मतलब है कि योगी महाराज ने अपना चमत्कार दिखा दिया है...।"
"हां, रघुवीर ! उस जालिम का खात्मा हो चुका है।" इन्द्रजीत ने बताया ।
"वह है कहां?"
"जंगल में पड़ा है और अब तक तो शायद उसकी लाश पानी हो चुकी होगी।"
"फिर तो आपको यहां रुकने की जरूरत ही नहीं है। आप इसी वक्त मेरे साथ चलिये। योगी महराज को इनकी बस्ती में छोड़कर हम बहराम नगर हवेली में चले जाएंगे। राजकुमारी जी वहां प्रतीक्षक बैठी हैं। आपको साथ देखेंगी तो वह हर चिन्ता से मुक्त हो जाएंगी।" रघुवीर ने सुझाव दिया, जिसे इन्द्रजीत ने फौरन मान लिया।
यूं भी इन्द्रजीत का दिल बहुत घबरा रहा था वह इस इलाके से दूर निकल जाना चाहता था।
योगी दयाल ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा उसे जीप में डाला और यूं वे तीनों तुरन्त ही बहराम नगर की तरफ रवाना हो गए।
वे दोपहर तक बहराम नगर गये। योगी दयाल को उसकी बस्ती में छोड़ा और सुधीर इन्द्रजीत के साथ बहराम नगर राजा की हवेली में पहुंचा।
इस हवेली को देखकर इन्द्रजीत को अपनी सावनपुर वाली हवेली याद आ गई और उसके अपने चाचा रमाकात का
ख्याल तो आना ही था।
उसके चाचा रमाकांत ने उसे कक्त करवाने की कोशिश की थी। और इस वाक्य को गुजरे कई साल हो गये थे। यानी कि रमाकांत अब तक मुतमूईन और आश्वस्त हो चुका होगा कि अब उसकी राह में कोई काटा नहीं रहा। उस शैतान ने जाने उसकी गुमशुदगी के बारे में उसके मां-बाप को क्या कहानी सुनाई होगी। वे बचार तो परेशान हो गये होंगे।
रमाकांत के प्रति रोष की एक लहर, आज बरसों बाद इन्द्रजीत को उत्तेजित कर गई थी।
उसने सोचा अब कोई समस्या नहीं है। वह अब बच्चा नहीं रहा है... ज्यादा मजबूत, ज्यादा ताकतवर और ज्यादा अनुभवी हो चुका है। वह एक-एक को देख लेगा। पर...।
फिलहाल तो राजकुमारी नयना उसके सामने खड़ी थी उसे अभी तो उसे देखना था ।