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स्वाहा

का आभास कुछेक मिनट ही पहले हो जाता तो राजू मदारी की जगह इस खेमे में योगी दयाल की लाश पड़ी होती ।

राजू मदारी कोई मामूली चीज न था। वह अपने घमण्ड में मारा गया। उसके दिमाग में यह घमण्ड आ गया था कि इस वक्त दूर-दूर तक उससे बड़ा तांत्रिक कोई नहीं जो उसके मुकाबले पर आ सके। उसके किए जादू को तोड़ सके। लेकिन कभी-कभी यूं भी होता है कि हाथी को चींटी पछाड़ जाती है।

और फिर सूरतेहाल ऐसी सहज कहां थी जैसी योगी दयाल और इन्द्रजीत समझ रहे थे।

राजू मदारी इस दुनिया से चला तो गया था लेकिन जाते-जाते भी एक करतब दिखा गया था। वह मदारी जो था। उसने देवा काली दाह को पुकार लिया था। इस तरह इन्द्रजीत आकाश से गिरकर खजूर में आ अटका था, बल्कि सीधा पाताल में चला गया था और यह बात उसे मालूम थी न योगी दयाल को ।

बहरहाल, वह रात इन्द्रजीत ने योगी दयाल के साथ उसके खेमे में ही गुजारी ड्राईवर रघुवीर को सुबह वहीं आना था

और फिर शाम राजकुमारी नयना को इन्द्रजीत से मिलने नहर के पुल पर आना था। नयना ने इन्द्रजीत से कहा था कि

वह अपना सामान लेकर और बस्ती को अलविदा कहकर आए क्योंकि नयना उसे अपने साथ बहराम नगर लेकर

जाना चाहती थी। सुबह... निश्चित समय पर ही ड्राईवर रघुवीर आ पहुंचा। उसने उन दोनों को इकट्ठे देखा तो खुशी से झूम उठा। उसे शायद इन्द्रजीत के यहा मिलने की आशा नही थी।

"साहब जी...।" वह इन्द्रजीत से बोला- "आपको यहां देखकर बहुत खुशी हुई। इसका मतलब है कि योगी महाराज ने अपना चमत्कार दिखा दिया है...।"

"हां, रघुवीर ! उस जालिम का खात्मा हो चुका है।" इन्द्रजीत ने बताया ।

"वह है कहां?"

"जंगल में पड़ा है और अब तक तो शायद उसकी लाश पानी हो चुकी होगी।"

"फिर तो आपको यहां रुकने की जरूरत ही नहीं है। आप इसी वक्त मेरे साथ चलिये। योगी महराज को इनकी बस्ती में छोड़कर हम बहराम नगर हवेली में चले जाएंगे। राजकुमारी जी वहां प्रतीक्षक बैठी हैं। आपको साथ देखेंगी तो वह हर चिन्ता से मुक्त हो जाएंगी।" रघुवीर ने सुझाव दिया, जिसे इन्द्रजीत ने फौरन मान लिया।

यूं भी इन्द्रजीत का दिल बहुत घबरा रहा था वह इस इलाके से दूर निकल जाना चाहता था।

योगी दयाल ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा उसे जीप में डाला और यूं वे तीनों तुरन्त ही बहराम नगर की तरफ रवाना हो गए।

वे दोपहर तक बहराम नगर गये। योगी दयाल को उसकी बस्ती में छोड़ा और सुधीर इन्द्रजीत के साथ बहराम नगर राजा की हवेली में पहुंचा।

इस हवेली को देखकर इन्द्रजीत को अपनी सावनपुर वाली हवेली याद आ गई और उसके अपने चाचा रमाकात का

ख्याल तो आना ही था।

उसके चाचा रमाकांत ने उसे कक्त करवाने की कोशिश की थी। और इस वाक्य को गुजरे कई साल हो गये थे। यानी कि रमाकांत अब तक मुतमूईन और आश्वस्त हो चुका होगा कि अब उसकी राह में कोई काटा नहीं रहा। उस शैतान ने जाने उसकी गुमशुदगी के बारे में उसके मां-बाप को क्या कहानी सुनाई होगी। वे बचार तो परेशान हो गये होंगे।

रमाकांत के प्रति रोष की एक लहर, आज बरसों बाद इन्द्रजीत को उत्तेजित कर गई थी।

उसने सोचा अब कोई समस्या नहीं है। वह अब बच्चा नहीं रहा है... ज्यादा मजबूत, ज्यादा ताकतवर और ज्यादा अनुभवी हो चुका है। वह एक-एक को देख लेगा। पर...।

फिलहाल तो राजकुमारी नयना उसके सामने खड़ी थी उसे अभी तो उसे देखना था ।
 
करवा लिया। खैर, छोड़ो इन बातों को आप जाकर नहा-धो लो मैं आपके लिए कपड़े भिजघाती हूँ। रघुवीर, तुम इन्हें गैस्ट रूम में ले जाओ।"

इन्द्रजीत, रघुवीर के साथ मेहमानखाने में चला गया । इन्द्रजीत को जिस कमरे में ले जाया गया, वरसों बाद इन्द्रजीत को ऐसा खूबसूरत बड़ा कमरा नसीब हुआ था। अब उसे बात-बात पर अपना घर, अपनी हवेली याद आ रही थी। अपने मां-बाप याद आ रहे थे। वह हैरान था कि उसने इतने बरस मां-बाप से दूर आखिर गुजारे कैसे? राजू मदारी के वशीकरण अमल का नतीजा था कि वह अपने मां-बाप को भूल गया था और उसके दिल में राजू मदारी के कच्चे-पक्के मकान के प्रति मुहब्बत भर गई थी। वह उस बस्ती से निकलता ही नहीं चाहता था। और अब मंत्र- पाश से मुक्ति पाते ही वो बारह-तेरह वर्षीय इन्द्रजीत बन गया था। शिकार पर निकलने और अपने कत्ल की साजिश के वाकयात बार-बार उसके दिमाग में घूम रहे थे।

ड्राईवर रघुवीर उसे कमरे में पहुंचाकर चला गया। इन्द्रजीत खूबसूरत गद्देदार बैड पर पसर गया और कपड़ो का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद एक सेविका दो-तीन जोड़े लेकर आ गई। यह राजा साहब के कपड़े थे।

इन्द्रजीत एक जोड़ा लेकर बाथरूम में घुस गया। यह एक आधुनिक तर्ज का पूर्णत: 'सुसज्जित बाथरूम था। नहा-धोकर इन्द्रजीत जब आईने के सामने खड़ा हुआ तो वह खुद को देखकर ही अचम्भित रह गया।

वह क्या से क्या ही गया था।

राजू मदारी के घर में एक छोटा-सा आईना था और वह भी चटखा हुआ। उसमें तो पूरा चेहरा भी नजर नहीं आता था। वह अपना चेहरा भी कहां देख पाता था। उसे तो अपना चेहरा भी टुकड़ों-टुकड़ों में देखना पड़ता था। आज बरसों बाद उसने अपने पूरे वजूद को जाईने में देखा तो वह आपने आप में खो गया।

आईने में इससे पहले वह बारह-तेरह वर्षीय इन्द्रजीत को देखा करता था। आज वह अट्ठारह उन्नीस बरस का था।

उसका उठान तो बचपन ही से अच्छा था जवानी तो कयामत ढाह रही थी। वह उस पर टूटकर बरसी थी।

इन्द्रजीत का लड़कपन गायब हो चुका था। नौजवान इन्द्रजीत उसके सामने था। वह एक बेहद आकर्षक नौजवान बन गया था। कसरती सुडौल बदन - चौड़ा सीना और ऊंचा लम्बा कद सफेद रंगत, चुम्बकीय आंखें...। वह आईने में खुद को हर कोण से देख रहा था और खुश हा रहा था।

इन्द्रजीत को अहसास था कि वह खूबसूरत है लेकिन यह नहीं जानता था कि इस कदर खूबसूरत और स्मार्ट है। आज उसे अपने स्मार्ट और आकर्षक होने का यकीन हो गया।

स्वयं को आईने में देखते-देखते उसे सहसा यह अहसास हुआ कि वह बाथरूम में अकेला नहीं है। इस अहसास के साथ ही उसने अपने कदमों में पड़े तोलिये कों उठाकर फौरन अपने गिर्द लपेट लिया और दरवाजे की तरफ मुड़कर देखा ।

टरवाजा बन्द था।

उसने बाथरूम मं चारों तरफ नजरें घुमाई। बाथरूम में उसके अलावा कोई नहीं था। लेकिन यह अहसास अब भी बना हुआ था कि बाथरूम में उसके अतिरिक्त भी कोई है। इस अहसास से उसके दिन में खौफ सा पैदा हो गया।

उसने जल्दी-जल्दी कपड़े पहने और बाहर निकल आया।

बाहर एक सेविका उसकी प्रतीक्षक थी। उसे देखते ही वह बोली-

"राजकुमारी जी, खाने की मेज पर आपकी प्रतीक्षक है।"

इन्द्रजीत उसके साथ डायनिंग हॉल में पहुंचा। डायनिंग टेविल पर खाना सजासे, नयना उसकी प्रतीक्षक थी। वह उसे देखकर मुस्कराई। राजा साहब के कपड़ों में इन्द्रजीत बिल्कुल एक राजकुमार लग रहा था। नयना की आंखों में चमक भर आई थी। लेकिन वह बोली कुछ नहीं ।

"क्या हुआ? क्यों मुस्करा रही हो? जौकर लग रहा हूँ ना भई मांगे के कपड़ों में बंदा ऐसा ही लग सकता है।"
 
इन्द्रजीत ने हसंते एक कुर्सी खींची और उस पर बैठ गया।

" आप बहुत अच्छे लग रहे हैं। श्रीमान! विल्कुल राजकुमार...।" नयना कहे बिना न रह सकी।

"राजकुमार न सही, छोटा-मोटा जमींदार जरूर हूँ। यह और बात है कि फिलहाल बेजमीन, भूमिहीन हूँ।" इन्द्रजीत प्लेट उठाते हुए बोला।

"निश्चिन्त हो जाओ, इन्द्रजीत में तुम्हें तुम्हारी जमीनें भी दिलवाकर रहूँगी। जरा पिताजी आ जाएं...।" नयना ने

दृढ़ स्वर में कहा। ।

"राजा साहब कहीं गए हुए हैं?" इन्द्रजीत ने पूछा

"आजकल वह पैरिस में...।" नयना ने बताया ।

"पैरिस में...?"

"हां...।" नयना की मुंडी इकरार में हिली। वह आगे बोली- "मेरे डैडी बड़े जिन्दा-दिल हैं। लाईफ इन्जॉय करना कोई उनसे सीखे। खेल-तमाशों के बहुत शौकीन हैं। उनसे वक्त बचता है तो शिकार खेलते हैं। शिकार से दिल भर जाता है तो सैरो-तफरीह को निकल जाते है। आजकल पर्यटन का भूत सवार है...!"

"यह भूत कब उतरेगा...मेरा मतलव है कि...।" इन्द्रजीत ने बात पूरी नहीं की ।

"मैं आपका मतलब समझ गई। " नयना मुस्करा दी "बस, दो-चार दिन में आने ही वाले हैं। "

"बाप पर तो पयर्टन का भूत सवार है चलो मान लिया। लेकिन बेटी पर आजकल कौन सा भूत सवार है?" इन्द्र ने हंसकर पूछा।

"यह जो मेरे सामने बैठा है।" नयना के मुंह से बेजख्तवार निकला।

इन्द्रजीत हंस दिया था। उसने एरक कहकहा गला और बोला- “भई, बहुत खूब...!"

“इन्द्रजीत...।" नयना संजीदगी औढ़ते बोली-"तुम्हें इस हवेली में आरा, मुश्किल से एक डेढ़ बन्टा ही बीता है लेकिन जाने क्यों मुझे यह महसूस ही रहा है जैस तुम यहां बरसों से हो। ऐसा क्यों महसूस हो रहा है मुह..?"

"मैं क्या जाएं...।"

" अच्छा यह बताओ...। क्या तुम्हें कटारी की याद नहीं आती?" जाने, क्या सोचकर पूछा था नयना ने

"वह बेघारी मेरे जंगल से लौटने का इंतजार कर रही होगी। मैंने बताया है ना तुम्हें कि राजू मदारी मुझे जंगल में सिद्धि प्राप्त करने को नहीं ले गया था।"

"तो फिर...?" नयना ने पूछा।

"उसकी मंशा मुझ पर पूणता: अधिकार जमाने की थी। उसने एक ऐसा अमल शक किया था कि अगर वह पूर्ण हो जोता तो मेरी याददाश्त भी गुम हो जाती। मैं एकदम उल्लू बन जाता और वह जो कहता मुझे उसी पर अमल करना पड़ता। यह बात मुझे योगी दयाल ने बताई थी।"

"शुक्र है, इन्द्र ! तुम बच गये।" नयना ने ठण्डी सांस भरी - "खैर में कटारी की बात का रही थी। सुना है वह तुम्हें बहुत चाहती थी?" उसने इन्द्रजीत की तरफ तिरछी निगाहों से देखा ।

"हां यह सच है।" इन्द्रजीत ने कबूला।

"सुना है, वो है भी बहुत खुबसूरत ।"
 
"यह भी सच है।" इन्द्रजीत ने इकरार किया फिर पूछा लेकिन यह बात तुम्हें किसने बताई। तुमने तो उसे देखा नहीं

है।" "हां मैंने तो उसे देखा नहीं देखने की तमन्ना ही रही। वैसे यह सब मुझे रघुवीर ने बताया है। उसने आपकी कटारी को देखा था।"

"तुम कटारी का जिक्र क्यों ले बैठी ही...?" इन्द्रजीत ने शक्ति भाव से पूछा ।

"ऐसे ही...आपको बुरा लग रहा है।"

"बुरा नहीं गैर जरूरी लग रहा है।"

"फिर किसकी बात की जाए।"

" अपनी... केवलं अपनी ...।" इन्द्रजीत ने अपनत्वपूर्ण और निर्णायक लहजे में कहा।

"ओह! तो बताओ मैं क्या हूँ?" उसने पूछा और यह एक बड़ा अजीब सवाल था ।

"तुम जादूगरनी हो।" इन्द्रजीत एकदम बोला।

"अगर मैं जादूगरनी हूँ तो कम आप भी नहीं हैं। आप जादूगर है। बहुत बड़े जादूगर जिसने नयना जैसी विद्रोही अहमी स्वभाव की लड़की का दिल अपनी मुट्ठी में ले सिया...।" और अब इन्द्रजीत ने भी कुछ सोचते हुएं, संजीदा लहजे में पूछ- " नयना, अगर मैं महज एक मदारी का बेटा होता

तो क्या तुब फिर भी मुझे इसी तरह चाहतीं ?"

“वाह! आपने यह क्या सवाल किया?" नयना ने खाना खाते-खाते अपना हाथ खींच लिया।

"खाना तो खाओ।" इन्द्रजीत ने उसे टोक दिया।

"हा खाती हूँ। पहले आपके प्रश्न का उत्तर दे दूं।" नयना गम्भीरता से बोली- "जब आपने मेरे हाथ पर अंगूठी रखो यही वो क्षण था जब मैं आपकी मुहब्बत में गिरफ्तार हुई और जब मैं आपसे मिलने आपकी बस्ती पहुंची तो यह वो क्षण था कि मेरा दिल, मेरी समझ भी मेरी न रही थी और किसी और के कब्जे में चली गई थी। और मैं... मैं बेकरार होकर अपनी रुह की तलाश मे नहर वाले पुल पर चली गई थी। आप... आप स्वयं ही न्याय करें इन्द्रजीत कि इन दोनों ही अवसरों पर मुझे कब मालूम था कि आप किसी बड़े जमींदार के बेटे हैं। या मुझे मालूम था?"

इन्द्रजीत ने उसके इस स्पष्टीकरण का कोई जवाब नहीं दिया। वह उसे मुस्कराकर देखता रहा। वह देख रहा था कि नयना उसके इस सवाल पर खिन्न हो गई है। और उसकी यह खिन्नता उससे छिपी न रही थी, नयना की भावनाएं उससे छिपी न रही थीं। समझ लिया था उसने कि नयना ऐसी प्रेम दीवानी है जो आग में कूदते हुए भी परिणाम के बारे में नहीं सोचती। फिर ऐसी प्रेम दीवानी से इस तरह का सवाल तो उसके जज्बात को ठोस पहुंचाने के बराबर ही था। उसकी चाहत का मजाक उड़ाने के बराबर था।

इन्द्रजीत ने एक छोटा-सा निवाला बनाया और नयना की तरफ बढ़ाने हुए बड़े प्यार से बोला- "लो, यह खा लो। खूबसूरत लोगों की नासज नहीं होना चाहिए... वह बुरे लगते हैं। "

नयना ने मुंह खोला और उसका हाथ पकड़ निवाला अपने मुंह में ले लिया। इन्द्रजीत के इस अपनत्व से ही उसकी

रुष्टता जाती रही थी। वह मुस्कराते हुए बोली-

"मैं नाराज नही हूँ। वो तो आपने बात ही कुछ ऐसी कर दी थी कि....।"

पर इन्द्रजीत ने उसे अपनी बात पूरी नहीं करने दी थी। उसने वैसा ही एक और निवाला बना नयना के मुंह में दे दिया था।

खाने के बाद इन्द्रजीत मेहमान खाने में चला आया। यहां बैठकर उन दोनों ने काफी पी। इन्द्रजीत रात भर का जागा हुआ था। अब भरपेट खाना खाने के बाद उसे नींद बुरी तरह सताने लगी थी। नयना से भी यह छिपा नहीं रहा था। वह इन्द्रजीत को आराम करने को कहकर उसके कमरे से चली गई और जाते-जाते कमरे का दरवाजा बन्द कर गई।

इन्द्रजीत ने उठकर खिड़कियों के पर्दे बराबर किये। कमरे में एक खुशगवार-सा अन्धेरा छा गया। वह बिस्तर के हवाले हो गया और उसकी आंखों में नींद उतरने लगी।

पर तभी...!
 
हां तभी ! तभी "वह" बाथरूम से निकली।

इन्द्रजीत के बैड के करीब आकर उसने उसे बड़े गौर से देखा। इन्द्रजीत ऐसा ही खूबद्रत मर्द था... ऐसे ही आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था कि काई भी हसरतों की मारी उस पर अपना दिल हार सकती थी। इन्द्रजीत की आंखें बन्द थीं। चेहरे पर बड़ा ही प्यारा-सा वाल-सुलभ सुकून था। वह नींद में इतना खूबसूरत लग रहा था कि वह बेकरार हो उठी।

उसने इन्द्रजीत के पैरों की तरफ आकर उसके दोनों अंगूठे पकड़ लिए और फिर वह जैसे धीरे-धीरे उसके शरीर में प्रवेश करने लगी। अंगूठा से पैरों में... पैसे से थिलियो में। फिर... ऊपर और ऊपर... यहा तक की सीने में। इन्द्रजीत इस वक्त पूरी तरह सो नही पाया था। उनीदंगी की सी अवस्था में था। यूं महसूस हुआ जैसे पाँवों के अंगठी

से उसके शरीर में धुंवा-सा भर रहा। उस पर घटा-सी छा रहीं थी। एक नशा... एक मादकता थी जो उस पर छाती जा

रही थी। अजीब एहसास था... अनूठी-सी अनुभूति थी। फिर यह धुआ सा.... यह बादल से... उसके अन्दर ही अन्दर

फैलते और बहुत हुए उसके सीने तक पहुंच गये।

उसक दोनों हाथ उसके सोने पर बंधे हुए थे। तय किसी ने उसे छुआ। एक रेशमी हाथ का सा अहसास उसे अपने हाथ पर हुआ। अब उसने हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू किया। उसके शरीर में विरोध की शुरुआत हुई। उसने चीखना चाहा। वह चीख-चीखकर नयना को ही अपनी सहायता के लिए बुला रहा था।

तभी एक झटका सा लगा और इन्द्रजीत की आंख खुल गई।

उसने गर्दन घुमाकर कमरे का जायजा लिया। कमरे में उसके अपने अलावा कोई और नहीं था।

'वह' बाथरूम में जा चुकी थी।

इन्द्रजीत की समझा में नहीं आया कि यह उसे क्या हुआ था? कि यह किस किस्म की कैफियत थी। यह कैसा अहसास था... कैसी अनुभूति थी। क्या उसने कोई ख्वाब देखा था या यह सब जागते में हुआ है।

अपने हाथ पर किसी कोमल रेशमी हाथ के स्पर्श को वह अब भी महसूस कर रहा था। फिर पांव के अंगूठे से सीने तक एक घटा-सी छाने का अहसास... उसका बरबस ही हनुमान चालीसा पढ़ना... और नयना को सहायता के लिए पुकारना...। सबकुछ ही तो उसके जहन में था। बिल्कुल साफ स्पष्ट था।

शायद वह लेटते ही सो गया था-इन्द्रजीत ने सोचा। और इस सब को एक ख्वाब समझकर उसने अपने जहन को झटका और करवट लेकर सी गया।

वह शीघ्र ही पुरसुकून हो गया था और फिर उस पर नींद छति गई थी।

वह सो गया था।

फिर शाम को, ड्राईवर रघुवीर ने आकर उसे उठाया। सेविका दो बार देखकर जा चुकी थी। वह गहरी नींद सोया हुआ था। तब ही नयना ने ड्राईवर रघुवीर को भेजा था। उसने इन्द्रजीत को बाजू छूकर उसे पुकारा-

“इन्द्रजीत जी... इन्द्रजीत जी...।"

इन्द्रजीत ने आंखें खोल दीं। अलसायी नजरों से उसकी तरफ देखा, पूछा- "क्यों क्या हुआ?"

"शाम हो गई है, साहब जी आप कब तक सोरांगे चाय पी लें। राजकुमारी जी आपका इंतजार कर रही है।"

"ओह...!" इन्द्रजीत की निगाहें वाल क्लॉक की तरफ उठी और वह फौरन उठ गया। वह बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए बोला- "रघुवीर ! तुम रुको में पांच मिनट में आता हूँ। साथ ही चलेंगे।"

इन्द्रजीत बाथरूम में प्रवेश कर गया। उसने अपने चेहरे पर पानी के खूब छपाके मारे मुंह धोते-धोते उसे अचानक अहसास हुआ कि बाथरूम में कोई और रो भी है। और इस ख्याल के साथ ही एक और अहसास उभरा। उसके दिल
 
में एकदम से ही नहाने की इच्छा जागी थी अपनी इस ख्याहिश पर उसे बड़ी हैरत हुई कोई उसे उकसा रहा था, क्यों उकसा रहा है? क्यों, आखिर क्यों? किसी के बाथरूम के भीतर अपने साथ होने का अहसास भी बदस्तुर बना हुआ था। वह कद्र भयभीत हो उठा। यह मुंह धो चुका था सो, फोरन ही बाथरूम से बाहर आ गया।

ड्राइवर रघुबीर कमरे में मोजूद था। उसे देखकर इन्द्रजीत ने सुकून का सांस लिया। इन्द्रजीत ने सोचा कि रघुवीर को

गुसलखान में भेजकर देख, अन्दाजा हो जाएगा कि वह महज उसका वहम था या फिर वाकई अन्दर कोई चीज है।

."रघुचीर! तुम जरा बाथरूम में तो जाओ।"

"साहब जी ! बाथरूम में क्या है?" वह इन्द्रजीत का आदेश सुनते ही कांपने लगा था।

"डरो मत, रघुवीर ! अन्दर कोई भूत-प्रेत नहीं है। तुम अन्दर जाओ। दरवाजा बंद करो और आईने के सामने दो मिनट खड़े होकर बाहर आ जाओ।" इन्द्रजीत ने उसे समझाया।

रघुवीर ना चाहते हुए भी बाथरूम की तरफ बढ़ गया। इन्द्रजीत क इस अजीव आदश से वह घबरा-सा रहा था।

दो मिनट बाद जब वह बाहर आया तो मुस्करा रहा था।

"साहव जी ! आपने तो मुझे डरा ही दिया था। अन्दर तो कुछ नहीं है। "

"मैंने तुमसे कब कहा था कि अन्दर कुछ है।" इन्द्रजीत ने हंसकर कहा ।

"हां आपने कुछ कहा तो नहीं था लेकिन आपके अंदाज से लगा था जैसे अन्दर कुछ है।" रघुवीर झेंपता-सा बोला।

रघुवीर के अन्दर जाने और फिर मुस्कराते हुए बाहर आने से इन्द्रजीत को विश्वास हो गया था कि बाथरूम में किसी के होने का वह अहसास उसका अपना बहम ही था और हकीकत में अन्दर कुछ नहीं था। वरना रघुवीर ने भी उसे महसूस करना था।

डायनिंग टेबिल पर चाय साथ कुछ था। नयना बड़े शोक से बड़े प्यार से उसे एक-एक चीज खिलाती चखाती रही। वे चाय से फारिग दए तो टेलर मास्टर रज्जाक इन्द्रजीत का नाप लेने आ गया। उसने एक पेन्ट-शर्ट अगले दिन सुबह और बाकी जोड़े शाम को देने का वायदा करके चला गया।

इन्द्रजीत अपने घर, दिल्ली, जाने को अधीर हो रहा था। उसने अपनी यह इच्छा नयना पर जाहिर करते हुए कहा-

"नयना! मैं दिल्ली जाना चाहता हूँ।"

"जाओ...।" नयना बोली। और उसके इस संक्षिप्त से जवाब से और उसके लहजे सें इन्द्रजीत यह अन्दाजा न लगा सका कि नयना ने यह नाराज होकर कहा है या खुशी से ।

"कैसे जाऊं...?" इन्द्रजीत ने पूछा।

"तुम्हें रघुवीर छोड़ आएगा। अगर कहो तो में भी साथ चलूं...।"

"नहीं, अभी नहीं...।" इन्द्रजीत फौरन बोला।

" परेशान मत होवो। मैं तुम्हारे साथ घर नहीं जाऊंगी।" नयना बोली- “मेरे अंकल भी वहा रहते। मैं उनके यहां चली जाऊंगी। में उनके यहां जाती रहती हूँ। गोल्फ लिंक में उनकी कोठी है।"

"खैर, ऐसी कोई बात नहीं है।" इन्द्रजीत मुस्कराया- "तुम मेरे साथ मेरे घर भी चल सकती हो। लेकिन मैं चाहता हू कि पहल मैं अपने मां-बाप के साथ यहां आऊं। तब तक राजा साहब भी वापस आ जाएंगे।"

"ठीक है... जैसी तुम्हारी इच्छा।" नयना लापरवाही से बोली।

रात का खाना खाकर वे दोनों बहुत देर तक हवेली के बाग में टहलते रहे। नयना बेहद खुश थी। प्यारी-प्यारी प्यार . भरी बातें... भविष्य के सपने... छेड़छाड़... हंसी-मजाक दूरी मिट चुकी थी, और दोनों यही महसूस करते रहे थे कि
 
जैसे एक-दूसरे को बरसों से जानते हैं।

जब वे दोनों टहल-टहलकर बातें करके थक गए तो नयना उसे उसके कमरे में पहुंचाकर और उसे पहली बार 'विटाई चुम्बन' के साथ शुभ रात्रि कहकर हवेली में चली गई।

इन्द्रजीत भी खुद को बड़ा खुश महसूस कर रहा था।

उसने दरवाजा बन्द कर लिया था, लेकिन चिटकनी नहीं लगाई।

कपड़े बदलकर उसने लाईट और बैड पर लेटकर टांगें फैला लीं और दिल्ली जाने के में सोचने लगा। एकान्त मिक्तें ही वह चाहे अनचाहे अब अपने मां-बाप के ही बारे में सोचने लगता था ।

सोचते-सोचते उसकी आंखें बोझिल हो चलीं। और यूं यह शीघ्र ही नींद की आगोश में था।

उसे नींद आने की देर थी कि...।

तभी "वह" मुस्कराती हुई बाथरूम से बाहर निकली। पहले की ही तरह वह सीधे इन्द्रजीत के बैड के निकट पहुंची और उसने पहले की तरह इन्द्रजीत के पैरों के दोनों अंगूठे पकड़ लिये।

और इसके साथ ही इन्द्रजीत को अचानक ही महसूस हुआ जैसे वह किसी की गिरफ्त में है, कोई उस पर छाया हुआ है। उसके होशो हवास बहाल न थे और वह अर्द्धसुप्त-सी अवस्था में था। चाहता था कि पूरी तरह जाग जाए। अपनी इस कोशिश में वह कामयाब नहीं हो पा रहा था।

एक मदहोशी-सी, बेसुधी-सी उस पर व्याप्त होती जा रही थी। एक रेशमी से स्पर्श का अहसास था। वह जो भी था उस पर पूर्णत: छाया हुआ था। हां, इन्द्रजीत की चेतना...उसका विवेक जैसे मुकम्मल तोर पर उसकी गिरफ्त में था। एक नशा सा था जो बढ़ता जा रहा था। यह मादक क्षण, लम्बे होते जा रहे थे और उसके होश उड़ाते जा रहे थे।

एक अनूठे से आनन्द की अनुभूति और तृप्ति के साथ ही यह खुमार बैठा था। और यह आनन्द और तृप्ति अभिसार के बाद का ही अहसास था। एक मादक अहसास।
 
प्रातः जब इन्द्रजीत की आंख खुली तो उसे बेहद कमजोरी महसूस हो रही थी ।

वह उठा तो उसकी आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। वह फौरन ही उठकर बैड पर बैठ गया। कुछ देर बैठा रहा फिर अपने पैरों पर खड़ा हुआ और धीरे-धीरे चलता हुआ बाथरूम में पहुंचा।

बाथरूम में पहुंचकर जब उसकी नजरें आईने पर पड़ीं तो वह अपना चेहरा देखकर भयभीत हो उठा। चेहरा किसी छिपकली की मानिन्द जर्द हो रहा था।

वह मुंह-हाथ धोकर बाहर निकला तो कमरे के दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक हुई। उसने यह सोचकर कि कोई सेविका

या फिर रघुवीर होगा, कुर्सी पर बैठते हुए आवाज लगाई-

"दरवाजा खुला है।"

दरवाजा थोड़ा-सा खुला। ट्रे में रखे हुए वर्तन बज उठे। इन्द्रजीत की नजर ट्रे पर पड़ी, फिर ट्रे जिसके हाथों में थी

उसके चेहरे की तरफ उठ गई।

"अरे...! वह चौंककर उठ खड़ा हुआ। आने वाली नयना थी, "अरे, तुम...तुमने यह कष्ट क्यों किया, नाश्ता किसी सेविका के हाथ भिजवा देती...।"

"हां ऐसा भी हो सकता था।" नयना अन्दर आ मुस्कराते हुए बोली-और ट्रे मेज पर रख दी।

"तो फिर ऐसा किया क्यों नहीं...?" इन्द्रजीत का स्वर शिकायती था।

"श्रीमान जी, आपको मालूम होना चाहिए कि यह नाश्ता मैंने अपने हाथों से तैयार किया है। फिर सोचा कि जब बनाया है तो फिर सर्व भी स्वयं ही क्यों न किया जाए? बस, यह सोचकर स्वयं ही ट्रे उठा लाई आपको कोई आपत्ति हो तो कहिये...।" नयना ने कनखियों से निहारते हुए कहा ।

"अकारण ही कष्ट किया।" इन्द्रजीत शर्मिन्दा-से लहजे में बोला।

नयना कोई जबाव देना चाहती थी, उसकी नजरें इन्द्र के चेहरे पर पड़ी और वह एकदम घबरा गई- "अरे, यह क्या हुआ आपको...?" वह अपनो नजरें उसके चेहरे से हटा नहीं पा रही थी।

"मैं ऐसे ही लाल पीला होता रहता हूँ...।" इन्द्रजीत ने बात हंसी में उड़ाने की कोशिश की।

"नहीं इन्द्र! मैं मजाक नहीं कर रही हूँ। शीशा देखो जरा जाकर ।"

''शीशा देखकर ही आ रहा ।" इन्द्रजीत ने बदस्तूर हंसते बुए जवाब दिया, "वह कमबख्त मुंह चिढ़ा रहा था।"

“इन्द्रजीत में गम्भीर हूँ... । ""

" गम्भीर हो तो फिर नाश्ते की बात करो...।"

"ठीक है नाश्ता कर लो मैं अभी डॉक्टर को बुलाती हूँ।"

''देखो, ख्वामखाह ही डॉक्टर को न बुला लेना, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। पेशे का जादूगर हूँ इसलिए गिरगिट की तरह रंग बदलता रहा रहता हूँ।" इन्द्रजीत वातालाप को बहुत हल्के से ले रहा था।

" अगर ऐसा ही है तो फिर तो तुम रोज ही मुझे डराया करोगे। "

"नहीं, ज्यादा नहीं। प्रॉमिस!" इन्द्र ने मासूम सूरत बनाकर कहा- "अच्छा लाओ चाय दो...।" इन्द्र ने केतली को आ और उसके मुंह से निकला "यह तो बिल्कुल ठंडी है देवी जी ! इसमें चाय है भी या नहीं...?"

"चाय है, एकदम गर्म । " कहते हुए नयना ने हाथ बढ़ाकर केतली का ढक्कन उठा लिया।
 
आश्चर्य! केतली में चाय नाम की चीज नहीं थी।

"यह क्या?" वह चीखती-सी बोली "चाय कहां गई?"

"चाय कहां जाएगी- केतली में ही है।" इन्द्रजीत अपनी मुस्कान दबाते बोला- "जरा गौर से देखो। " नयना ने केतली को तनिक झुकाकर देखा। चाय केतली में थी और केतली अब गर्म भी महसूस हुई थी।

"कमाल है।" वह बोली- "लेकिन यह किस तरह हुआ भी केतली को ठण्डा और खाली बताया था। मैंने देखा था

खाली ही थी। अब फिर चाय से भरी दिख रही है। चाय कहां चली गई थी ?" "चाय तो कहीं नहीं गई थी और देवी जी यह महज नजरबंदी का खेल था। में जो दिखा रहा था तुम वही देख रही

थीं।"

"यानी कि हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊ ।" नयना ने आंखें दिखाई।

" बिल्ली नहीं, बिल्ला !" इन्द्र कुछ यूं बोला कि नयना अपनी हंसी नहीं दबा पाई।

नाश्ता यूं ही हंसते-हंसते हुआ। नाश्ता करके इन्द्रजीत ने अपने बदन में कुछ जान महसूस की। वह हंस-बोल रहा था। लेकिन हकीकतन चिन्तित और सहमा सा भी था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह एक ही रात में उस पर क्या आफत आ पड़ी थी कि न केवल उसके बदन का खून निचुड़ गया था बल्कि वह बेहद कमजोरी भी महसूस कर रहा था।

नयना को तो उसने मजाक में टाल दिया था लेकिन उसका जहन इस गुत्थी को सुलझाने में लगा हुआ था। इन्द्रजीत रात का ख्वाब याद आया ।

अजीब ख्वाब था वह उस ख्वाब के बारे में सोचकर ही उसे झुरझुरी-सी आ गई।

अभी वे नाश्ते से निपटे ही थे कि रघुबीर, दर्जी रज्जाक के साथ आ पहुंचा। इन्द्रजीत ने पेन्ट-शर्ट पहनकर देखीं। फिटिंग सही थी और सिलाई का भी जवाब नहीं था। इन कपड़ों में इन्द्रजीत बिल्कुल हीरो नजर आने लगा था। मास्टर रज्जाक के जाने के बाद जो पहला सवाल ड्राईवर रघुवीर ने किया वह इन्द्रजीत की रंगत के करे में ही था।

"साहब जी ! आप ऐसे पीले क्यों हो रहे हैं?" उसने चिन्तित स्वर में पूछा था ।

"सुन लिया इन्द्र ! रघुवीर ने क्या कहा है।" नयना बोल उठी-"आप मेरी बात मजाक में उड़ा रहे थे।"

"अरे, कुछ नहीं हुआ मुझ ।" इन्द्रजीत ने लापरवाही से कहा ।

"लेकिन योगी दयाल के साथ जो कुछ हुआ है, बिल्कुल ही अच्छा नहीं हुआ है। बहुत बुरा हुआ है। बहुत ही बुरा । " रघुबीर ने उदास लहजे में कहा।

"क्या हुआ है, रघुवीर ?" नयना और इन्द्र, दोनों ने एक साथ ही पूछा था।

"सुबह ही सुबह मैं योगी दयाल के घर गया था। राजकुमारी जी आपने मुझे जो दस हजार रुपये दिये थे वही पहुंचाने गया था। उसका इनाम उसके घर का दरवाजा खुला हुआ था। मैं बेधड़क अन्दर चला गण-क्योंकि मैं जानता था कि वह घर में अकेला रहता है। मैं उसके कमरे में दाखिल हुआ तो वह मुझे जमीन पर लेटा नजर आया। उसकी आंखें खुली हुई थीं आंखों से आंसू बहकर कानों तक जा रहे थे। उसका पूरा शरीर लकवे का शिकार था। जुबान बंद थी। वह अपनी आंखों को गर्दिश देने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था। मैंने झुककर उससे पूछना चाहा कि यह सब कैसे हुआ? तभी उसकी आंखों में जिन्दगी के टिमटिमाते चिराग बुझ गये। उसकी आंखें रह गई। धड़कन बन्द हो गई, नब्ज थम गई, आंसू रुक गये। मैंने उसकी आंखें बन्द करनी चाहीं लेकिन वह बावजूद कोशिश के बंद नहीं हो सकी। उसके सीने पर किसी पक्षी का पंजा पड़ा हुआ था ।" रघुवीर ने बताया- "ऐसा ही पंजा मैंने राजू मदारी के गले में पड़ा हुआ देखा था।"
 
उल्लू के पंजे का जिक्र सुनकर इंन्द्रजीत चौंक पड़ा। उसनें तेजी से पूछा "कहां है वह पूंजा ?"

"मेरे पास है।" रधुवीर बोला "आपको दिखाने के लिये वह मैं अपने साथ ले आया हूँ। उसने अपनी कमीज की बगली जेब से निकालकर वह पंजा इन्द्रजीत के हाथ पुर रख दिया। इन्द्र को उसे एक नजर देखतें ही अंदाजा हो गया कि वह राजू मदारी के गले बाला ही पंजा है। अब सवाल यह उठता था कि उल्लू का यह पंजा, योगी दयाल के सीने पर कैसे पहुंचा और उस पर लकवे का हमला कैसे हुआ? हमला भी ऐसा कि वह अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठा। अगर यह लकवे का हमला था तो फिर "रात के शंहशाह" का यह पंजा कहां से आया।"

क्या राजू मदारी की बेचैन आत्मा ने उससे प्रतिशोध लिया?

अगर ऐसा ही था तो यह चौंकने वाली बात थी। खतरे की घंटी बजने लगी थी।

खुद इन्द्रजीत के साथ भी तो कुछ कम नहीं हुआ था। रात ही रात में बह हल्दी की तरह पीला झे गया था और कमजोर भी कितनी हो गई थी।

क्या यह एक ही जजीर की दो कड़ियां थीं?

क्या योगी दयाल के बाद राजू मदारी के अगला निशाना- वह खुद होगा?

इन्द्रजीत ज्यों-ज्यों सोचता जा रहा था परेशान होता जा रहा था।

" नयना... यह जो कुछ हुआ है, अच्छा नहीं हुआ है।" रघुवीर नयना के इशारे पर चाय के नई ! बर्तन उठाकर ले गया

तो इन्द्रजीत बोला। उसका स्वर सहमा हुआ था “योगी दयाल को यकीनन राजू मदारी ने ही मारा है।"

"यह बात तुम इतने विशवास के साथ कैसे कह सकते हो?" नयना ने पूछा । "यह उल्लू का पंजा... 1" इन्द्रजीत ने काले धागे में ताबीज की तरह बंधा हुआ उल्लू का पंजा उसकी आंखों के सामने

लहराया- "यह वही पंजा है जो राजू मदारी के गले में पड़ा रहता था। मैं इसे अच्छी तरह पहचानता हूँ...।"

"अब क्या होगा, इन्द्र ?" नयना ने सहमी आवाज में पूछा।

"हालात सुधारने की बजाय, बिगड़ गये लगते हैं, नयना !

हमें बहुत सतर्क रहना होगा।"

"प्रभु रक्षक है-देखा जाएगा...।" नयना में न जाने कहां से अचानक हिम्मत आ गई- "चलो, तुम्हें बहराम नगर की सैर करा...।"

"चलो...।" इन्द्रजीत फौरन तैयार हो गया- "कैसे चलेंगे?" उसने पूछा।

"चाहो तो जीप से चलते हैं और अगर घुड़सवारी का मूड हो तो घोड़ों पर।" नयना बोली। "बरसों हो गये घुड़सवारी किये। चलो, घोड़ों पर चलते हैं।"

"ठीक है। मैं घोड़े कसवाती हूँ। तुम कपड़े बदलकर आओ...।" कहते हुए नयना बाहर निकल गई।

इन्द्रजीत कपड़े बदलकर बाहर पहुंचा तो हवेली के दरवाजे पर दो खूबसूरत घोड़े तैयार थे।

इन्द्र ने अपनी सवारी के लिए मुश्की घोड़ा पसन्द किया नयना सफेद घोड़े पर सवार हो गई।

यूं वे घोड़ों पर सवार होकर निकल लिये।

यह एक हरा-भरा इलाका था। वे दोनों घोड़े दौड़ाते हुये काफी दूर निकल आए थे। बहराम नगर कहीं बहुत पीछे रह. गया था। नयना को अंदाजा नहीं था कि इन्द्रजीत इतना अच्छा घुड़सवार है। इन्द्रजीत ने भी कहां सोचा था कि नयना
 
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