• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

स्वाहा

इतनी अच्छी कर लेती है। दोनों ही एरक-दूसरे की दक्षता से प्रभावित हुए थे। इन्द्रजीत ने इस घुड़सवारी का बड़ा लुत्फ लिया।

अब वे दोनों धीरे-धीरे घोड़े दौड़ाते हुए साथ-साथ चल रहे थे। दोनों बातें कर रहे थे।

इन्द्रजीत फिर दिल्ली की चर्चा ले बैठा था। वह कह रहा था- "क्या ख्याल है, नयना! मैं आज शाम को दिल्ली चला जाऊं...?"

"शाम को नहीं... कल सुबह जाना। एक दिन तो और रूको मेरे पास और फिर आज तुम्हारे दो जोड़े और सिलकर आ जाएंगे।"

"कपड़ों की फिक्र है। इन्द्र बोला।

"तुम्हें नहीं है लेकिन मुझे तो है। मैं तुम्हारे मां-बाप के सामने शमिन्दा नहीं होना चाहती।"

नयना के अपनत्व पर इन्द्र मुस्करा दिया और उसने कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि उसका घोड़ा एकदम भड़क उठा। उसने आनन-फानन में रफ्तार पकड़ ली। पलक झपकते ही वह हवा से बातें करने लगा।

इन्द्रजीत की समझ में भी नहीं आया कि यह क्या हुआ? वह अगर घुड़सवारी का माहिर न होता तो घोड़े के अचानक बेकाबू होने पर धूल चाट रहा होता। घोड़े की पीठ पर सम्भलकर उसन घोड़े को रोकने की यथा सम्भव कोशिश की थी लेकिन रुकना तो दूर की बात, घोड़े ने अपनी रफ्तार भी कम नहीं की थी। इन्द्रजीत की लगाम खींचने की सारी कोशिशें निष्फल रही थीं।

सामने जंगल था। घोड़ा देखते ही देखते जंगल में प्रवेश कर गया।

इन्द्रजीत के घोड़े ने भड़ककर जैसे ही रफ्तार पकड़ी तो नयना ने फौरन अपने घोड़े को ऐड लगाई। लेकिन उसका घोड़ा अड़ियल बन गया। वो चलकर ही न दिया। और फिर जब नयना ने बड़े गुस्से में ऐडी मारी तो घोड़ा पलटकर दौड़ने लगा। नयना ने बड़ी कठिनाई से उसे रोका। उसने घोड़े का रुख मोड़ा और दोबारा ऐड लगाई तो इस बार घोड़ा जंगल की तरफ बढ़ लिया। नयना धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाती गई। कुछ ही देर के बाद वह भी जंगल में प्रवेश कर गई थी।

इन्द्रजीत का घोड़ा इस बीच जाने कहां से कहां निकल गया था।

नयना ने अपने घोड़े को रोका और जंगल का जायजा लेने लगी। जंगल में सन्नाटा था। इन्द्रजीत का कहीं पता नहीं था।

घोड़े की टापों के ताजा निशान नजर आ रहे थे। नयना उन निशानों पर निगाह रखे अपना घोड़ा दौड़ाने लगी। पर थोड़ा अन्दर जाने के बाद ये निशान गायब हो गए थे क्योंकि यहां जमीन पक्की थी।

नयना परेशान हो गई। घोड़े के सूमों के निशान गायब थे। जंगल में कोई रास्ता या पगडंडी किस्म की चीज नहीं थी

कि वह उसी पर चल पड़ती। अब महज अनुमान से ही आगे बढ़ना था। नयना अनुमान से ही एक तरफ बढ़ ली, पर

काफी दूर तक जाने के बाद उसे कोई सुराग नहीं मिला।

वह वापस पलटी और अब उसने एक दूसरी दिशा में सफर शुरु किया। इस बार वह रुक-रुककर इन्द्रजीत को पुकारती भी जा रही थी। लेकिन जंगल में जानवरों और पक्षियों की आवाजों के अलावा सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं मिल रहा था।

नयना हैरान और परेशान थी कि इन्द्रजीत आखिर कहा गया। घोड़ा किसी वजह से बेकाबू हो गया था तो उसने अब तक उस पर काबू पा लिया होगा। उसे वापस आ जाना चाहिये था। इन्द्रजीत के घुड़सवारी के अंदाज से इस बात का यकीन तो था ही कि वह कोई अनाड़ी घुड़सवार नहीं। नयना को अपने छोड़े पर भी हैरत थी कि वह क्यों अचानक पलटकर भाग निकला था। उसकी इस हरकत पर नयना को बहुत गुस्सा था। वह सोच रही थी कि इस थोड़े को गोली मरवा देगी। इस घोड़े ने उसे इन्द्र के सामने शर्मिन्दा करके रख दिया था।
 
फिर उसने खुद को सम्भाला और इन्द्रजीत के बारे में सोचने लगी।

यह हादसा और उस पर अपने घोड़े की प्रतिक्रिया, उसे सामान्य साधारण नहीं ला रही थी। अज्ञात से भय और अन्देशे जहन में उठने लगे थे। उसे इन्द्रजीत की चिन्ता सता रही थी। इन्द्रजीत को अगर कुछ हो गया तो वह कहीं की न रहेगी। बर्बाद हो जाएगी।

वह अब पागलों की तरह ही जंगल में घोड़ा दौड़ा रही थी।

रह-रह कर अपने इन्द्र को पुकार रही थी।

घोड़ा दौड़ाते दौड़ाते और उसे आवाजें देते-देते, वह अचानक एक जगह रुक गई। सामने एक पेड़ की जड़ में, एक पत्थर पर, इन्द्रजीत की कमीज पड़ी थी।

नयना का दिल धक्क से रह गया। वह फौरन घोड़े-से कूदी और भागती हुई पेड़ के नीचे पहुंची। उसने बड़ी बेकरारी के साथ उस कमीज उठाकर देखा। कमीज बिल्कुल साफ-सुथरी थी। उस पर किसी भी प्रकार का कोई दाग-धब्बा नहीं था। यही लगता था जैसे कमीज इन्द्रजीत ने खुद ही उतारकर उस पत्थर पर डाल दी हो।

लेकिन इन्द्रजीत कहां गया? घोड़ा कहीं भी नजर नहीं आ रहा था। नयना ने आस-पास का इलाका छान मारा लेकिन कोई सुराग न मिला।

उसने इन्द्र की कमीज अपने गले से बांध ली और घोड़े पर सवार हो गई। वह अब फिर घोड़े पर सवार हो उसे ढूंढ रही थी... आवाजें दे रही थी।

नयना ने चलते-चलते कलाई घड़ी पर निगाह डाली। जंगल

में भटकते हुए उसे लगभग दो घन्टे हो चुके थे और इन्द्रजीत का कुछ पता नहीं था।

यूं ही भटकते वह एकाएक चौंक पड़ी। उसे अपने सामने एक चार फुट ऊंचा एक चबूतरा नजर आया था। चबूतरा पत्थरों से बनाया गया था और अनुमान से वह छः फुट लम्बा और छ: फुट चौड़ा था। इस चबूतरे आस-पास जगह साफ थी।

जंगल में इस चबूतरे के निर्माण का क्या मकसद हो सकता है। यह समझ मे नहीं आया।

चबूतरा ऐसा साफ-सुथरा था कि लगता था कि जैसे अभी-अभी झाडूं दी गई हो।

चबूतरे पर खड़े होकर नयना ने इन्द्रजीत को जोर-जोर से आवाजें दीं पर कोई जवाब नहीं मिला। फिर उसने चबूतरे से उतरकर आस-पास का इलाका छान मारा।

इन्द्रजीत तो नहीं मिला, हां उसका घोड़ा मिल गया था। घोड़ा एक पेड़ तले सिर झुकाये खड़ा था। अब स्थिति और भी संगीन हो गई थी।

घोड़ा मौजूद था और इन्द्रजीत का कहीं कुछ पता नहीं था। नयना बेचारी कैसे जान सकती थी कि उसके इन्द्रजीत पर क्या बीत गई। उसने तो आखिरी वक्त में उसके घोड़े को भड़ककर सरपट दौड़ते और इस जगंल में दाखिल होते देखा था।
 
इन्द्रजीत पर जो बीती थी वह कम रहस्यमय और अविश्वसनीय न थी ।

जंगल में दाखिल होने से पहले इन्द्रजीत ने बहुत कोशिश की थी कि वह किसी तरह घोड़े पर काबू पा ले। उसे घुड़सवारी के जितने गुर आते थे उसने सभी आजमा डाले थे। लेकिन घोड़ा था कि काबू में नहीं आ रहा था। घो बेलगाम हो गया था जैसे। जोरों से लगाम खिंचने पर घोड़े का मुंह खून खून हो रहा था लेकिन उसने हार नहीं मानी थी।

घोड़ा सरपट दौड़ता रहा और जंगल में चला गया।

इन्द्रजीत ने लगाम ढीली छोड़ दी। और कोई चारा जो नहीं रहा था। उसे अंदाजा हो गया था कि घोड़ा अपने आपे में नहीं है। उसने घोड़े को उसकी मर्जी पर छोड़ दिया था। वह जानता था कि नयना उसके पीछे आ रही होगी। सो उसने नयना के मार्गदर्शन के लिए ही अपनी कमीज उतारकर एक जगह फेंक दी थी।

पर फिर आगे जाकर छोड़ा अचानक ही और खुद ही एक जगह रुक गया।

वह एकाएक ही अपने अगले पैरों पर खड़ा हो गया और यूं अपना सन्तुलन बनाए नहीं रख सका और गिर गया। इन्द्रजीत अगर फौरन ही उसकी पीठ पर से कूद न गया होता तो उसका घोड़े तले ही दब जाना निश्चित था।

घोड़े से कूदकर इन्द्रजीत जब सीधा खड़ा हुआ तो उसने अपने सामने एक चबूतरा देखा !

इस पर एक लाल कालीन बिछा हुआ था, जिसके बीचों-बीच बैठा हुआ था, जिसकी पीठ इन्द्रजीत की तरफ थी। इस घने जंगल में यह पत्थर का पक्का चबूतरा...उस पर सुर्ख कालीन और कालीन पर चादर में लिपटी एक मानव काया । विचित्र रहस्यमय नजारा था।

इन्द्रजीत धीरे-धीरे चबूतरे के निकट पहुंचा और उस चादर ओढ़े बैठे वजूद से सम्बोधित होते बोला- "कौन हो

तुम...?"

इन्सानी आवाज सुनकर उस वजूद में हरकत हुई और वो चादर आड़े-ओढ़े ही उठकर खड़ा हो गया। फिर इन्द्रजीत की तरफ घूमा और चादर अपने सिर से सरका दी।

रेशमी चादर, उसके रेशमी बदन से फिसलकर चबूतरे पर आ गिरी।

वह एक गौरवपूर्ण खूबसूरत औरत थी और अब उसके शरीर पर लिबास नाम की कोई चीज न थी। भरे-भरे बदन की यह निर्वस्व नवयौवना ! इन्द्रजीत इस प्रलंयकारी दृश्य की ताव न ला सका, उसने फौरन ही अपना मुंह दूसरी तरफ लिया।

"अरे, यह लज्जा कैसी? शर्माते क्यों हों?" वह हंसकर बोली। उसकी आवाज में मिठास थी और शोखी भी और फिर उसकी हंसी, जैसे वीणा के तार झनझना उठे हों, मेरी तरफ देखो, मेरे समीप आओ...।"

"यह... यह क्या तमाशा है?" इन्द्रजीत थूक निगलते बोला।

" तमाशे तो तुम दिखाते रहे हो, मेरे जादूगर ! मैंने तो कोई तमाशा नहीं दिखाया...।" वह एक शोख अदा के साथ लहराई और अपना खूबसूरत हाथ आगे बढ़ाये, बड़ी हसरत से बोली, "आओ, ऊपर आ जाओ...।"

उसका और कोमल हाथ बढ़ा का बढ़ा रह गया। इन्द्रजीत ने कोई तवज्जो नहीं दो। उसका तो दिमाग चकराया हुआ था। यह बात तो उसकी कल्पना में भी नहीं थी कि इस भरे जगल में कोई कयामत यूं उसके सामने आ जाएगी और कयामत भी ऐसी कि जो उस पर टूट पड़ने को तत्पर थी। नख-शिख से एक खुली दाद बनी उसके सामने खड़ी थी। और उसका समूचा वजूद ही जैसे कुछ मांग रहा था।

इन्द्रजीत ने झुकी निगाहों के साथ ही जैसे गुहार की। "क्या यह सम्भव कि तुम अपने पैरों में पड़ी चादर को अपने सिर पर रख लो... पहले की भांति ही ओढ़ लो उसे ।
 
" शर्मीले... मूर्ख! यह कहकर वह कयामत झुकी पैरों में पड़ी चादर उठाई और सिर से पांव तक अपना प्रलयंकारी यौवन छुपा लिया। फिर प्यार भरी नजरों से इन्द्रजीत को निहारते हुए बोली-"लो अब ऊपर आ जाओ।"

इन्द्रक्रीत कालीन बिछे चबूतरे पर चढ़ गया। उसने खुद को सम्भाल लिया था। बोला- “हा, अब कहो।" बैठो...!" यह कहकर वह स्वयं भी बैठ गई।

"कौन हो तुम..?" कालीन पर बैठते हुए पूछा था इन्द्रजीत ने ।

"तुम क्या समझते हो अपने आपको... बहुत सुन्दर हो... जिसका दिल चाहोगे तोड़कर गुजर जाओगे।" उस रूपसी के तेवर एकाएक बिगड़ गए थे।

"मैं किसी का दिल नहीं तोड़ा।" उसका आशय न समझते हुए भी इन्द्र ने सफाई दी। "कटारी के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है।" रूपसी ने इशारा किया।

इन्द्रजीत चौंका। उसने तेजी से पूछा- "तुम कटारी को कैसे जानती हो? अपने बारे में बताती क्यों नहीं। तुम कौन हो?"

"मैं तो राजू मदारी के बारे में भी जानती हूँ। उसका हत्यारा कौन हैं बता सकते हो?"

"मैं नहीं हूँ ।" इन्द्रजीत ने मुर्दा लहजे में कहा।

"तुम नहीं हो तो फिर और कौन है?" रूपसी के लहजे में सख्ती भर आई थी, "राजू मदारी ने अपने घर में तुम्हें इतने प्यार से रखा... इस कद्र मुहब्बत दी। तुम्हें अपने इल्म सिखाये। तुम्हारी जान बचाई। और... तुमने उसके साथ क्या किया...। उसकी बेटी का अपमान। उसका दिल तोड़ा। उसकी मुहब्बत को न समझा। फिर राजू मदारी के विश्वास को ठेस पहुंचाई। धोखे से उसकी हत्या करवा दी। राजू मदारी तुम्हारा मोहसिन तुम्हारा जीवनदाता था। तुमने अपने परोपकारी और हितैषी के साथ ऐसा व्यवहार किया। बोली, क्यों...?".

"उसने मुझे गुलाम बना लिया था। मुझ पर कब्जा कर रखा था।" इन्द्रजीत जैसे सफाई दी।

"यह क्यों भूल जाते हो कि उसने तुम्हारी जान बचाई थी। अगर उसने ऐसा न किया होता तो आज तुम कहां होते?"

" इसके लिए मैं उसका शुक्रगुजारू था। मैंने उसकी बहुत सेवा की। उसका चाकर बनकर रहा...!"

"सेवा...? उसकी हत्या करवा के...।" वह विषाक्त लहजे में बोली "वाह! क्या सेवा की है तुमने उसकी।"

"आखिर तुम हो कौन?" इन्द्रजीत असहाय सा बोला।

"मेरे जादूगर ! मैं तुम्हारी सजा हूँ... एक खूबसूरत सजा...।" उस रूपसी ने अजीब-सा अदाज अपना लिया था। और जाने क्या था उसके स्वर में कि इन्द्रजीत ने अपनी रगों में एक सर्द लहर दौड़ गई महसूस की।

उसने अपने सूख चले होठों पर जिव्हा फेरी और पूछा- "कहा से आई हो?"

"मुझे देवा काली ने भेजा है।"

"कौन देवा काली?"

"वही देवा काली, जिसे राजू मदारी ने आपने अन्तिम क्षणों में, अपनी सहायता के लिए रुकाग था तो उस समय में देवा काली के चरणों में बैठी थी। राजू मदारी की पुकार सुनकर देवा काली ने मुझे इशारा किया। उसके आदेश पालन में मैं राय मदारी की सहायता को गई। लेकिन समय बीत चुका था। मैं राजू मदारी को बचा नहीं सकी। मरते हुए उसकी इच्छा थी कि उसकी मौत का प्रतिशोध लिया जाए कि उसके साथ धोखा करने वाले को बख्शा न जाए। सो तुमने सुन लिया कि मैंने योगी दयाल की क्या दुर्गत बनाई। वो अपनी जान से गया। अब तुम्हारी बारी है। मैं तुम्हें मारूंगी नहीं। इसलिए कि मैं स्वयं तुम पर मर गई हूँ। अब तुम सिर्फ मेरे लिए जीवित रहोगे। मेरे होकर रहोगे, मेरी
 
कैद में रहोगे...।"

" और अगर मैं तुम्हारी कैद में न रहना चाहूँ तो...।"

"बात तुम्हारे चाहने की नहीं है मेरे चाहने की है।" वह हंसी, उसकी हंसी में व्यंग्य था ।

"लेकिन में किसी और को चाहता हूँ। उसी की कैद में रहना चाहता हू।" इन्द्रजीत ने अपने दिल की कही। """ अब भूल जाओ उसको।" वह इन्द्रजीत को गहरी नजरों से देखते हुए बोली- “मैं जानती हूँ वो आ रही है। तुमने उसे रास्ता दिखाने के लिए अपनी कमीज राह में फेंक दी हैं और वह स्वयं तुम्हें ढूंढ़ते हुए अंततः इस चबूतरे तक पहुंच जाएगी लेकिन उसके आते ही यहा कुछ नहीं रहेगा।"

"ओह! अच्छा हुआ कि यह तो मालूम हो गया कि नयना आखिरकार यहां तक पहुंच जाएगी। अब में यहां से नहीं हिलूंगा । यहीं बैठा रहूँगा। उसके आने की इंतजार करुगा...।" इन्द्रजीत ने निर्णायक लहजे में कहा।

"क्या चाहते हो.... तुम्हारी नयना को अंधा कर दूं ताकि वह यहां तक कभी पहुंच ही न सके।" उस रूपसी ने यह बात बेहद सर्द और निर्मम लहजे में कही थी।

"कोई खास अमल जानती हो क्या?" इन्द्रजीत ने विषय बदलते हुए पूछा।

"इस जंगल में एक नर्म आरामदायक कालीन पर बैठे हो। इसके बाद भी तुम्हे किसी अमल का सबूत चाहिये....?".

"मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूँ?"

"मेरा नाम बकाल है।"

"बकाले ... यह क्या नाम हुआ भला।" इन्द्रजीत सचमुच ही उलझ गया था।

"बकाल का अर्थ है -रेगिस्तान की शहजादी ।" उसने मुस्कराते हुए बताया- "क्या में तुम्हें बकाल दिखाई नहीं देती? रेगिस्तान की शहजादी नजर नहीं आती?"

इंद्रजीत उसकी इस बात का क्या जवाब देता। वह निसन्देह ही एक बेहद सुन्दर आकर्षक युवती थी की पूरी एक साप्न सुन्दरी। उस पर उठने वाली नजर मुश्किल से ही झुकती थी। अब वह मरुस्थल की शहजादी थी या पहाड़ों की मलिका थी यह इन्द्रजीत की समस्या नहीं थी। इन्द्रजीत की समस्या तो केवल यही थी कि नयना किसी भी तरह यहां तक पहुंच जाये और उसकी लेकर निकल जाए। हालात की इस अप्रणाशित करवट ने इन्द्रजीत की खोपड़ी घुमा दी थी। वह खौफजदा होने छत हद तक चिन्तित हो उठा था।

बकाल ने अब और अधिक स नष्ट करना उचित न समझा। वह शीघ्र अतिशीघ्र अपनी कारफई पूरी कर लेना चाहती थी। वह जानती थी कि नयना को यहां तक पहुंचने में बहुत देर लगेगी। फिर भी वह खामखाह की उलझनों में नहीं पड़ना चाहती थी।

उसने इन्द्रजीत को मादक नज्ञीली निगाहों से देखा। बेहद मनमोहक अंदाज में मुस्कराई और फिर शहद से मीठे लहजे

में बोली-

"इन्द्र ! मेरा एक काम करो। "

"हां, बोलो...।" इन्द्रजीत स्वयं को निर्भय साबित करना चाहता था और इसमें वह काफी हद तक सफल भी नजरं आ रहा था।

"तुम्हारा घोड़ा कहां है?" बकाल ने पूछा।

"निकट ही है- वह उधर उन पेड़ों के झुण्ड में है।" इन्द्र ने बताया ।

"जाओ, उसकी दुम का एक बाल ले आओ।" बकाल ने बड़ी विचित्र फरमाईश की।
 
"बाल...? क्या करोगी?" इन्द्र उछल ही तो पड़ा था।

"तुम तो बड़े जादूगर हो तुम्हें तो मालूम होगा।" उसने हंसकर कहा ।

"नहीं मैं नहीं जानता। मैंने आज तक घोड़े के बाल से कोई चमत्कार नहीं दिखाया।"

"अच्छा, फिर जाओ, लेकर आओ। मैं आज तुम्हें एक जबरदस्त तमाशा दिखाती हूँ अगर पसंद आया और तुम सीखना चाहोगे तो तुम्हे सिखा भी दूंगी।" बकाल ने उसे अपनी चमकती-प्यासी आँखो से देखते हुए कहा

"इन्द्रजीत चबूतरे से उतर गया। वह उन पेड़ों के झुण्ड की तरफ बड़ा गया, जहा उसका घोड़ा खड़ा था। वह घोड़े के निकट तो उसके दिमाग में एक छन्नाका-सा हुआ। उसने सोचा कि क्यो न मौके का फायदा उठाए और घोड़े पर सवार होकर निकल ले। यह बकाल उसका कुछ न कर सकेगी बस देखती ही रहेगी। पर फिर यह ख्याल भी आया कि अगर वह यहां से निकल गया तो नयना को कैसे पाएगा। जब तक कि वह जंगल से बाहर निकलेगा, तब तक तो नयना यहां पहुंच जाएगी। फिर यह मायावी बकाल उसे भला कहां छोड़ेगी। फिर यह जाने नयना की क्या हालत करे, हो सकता

है उसे अंधा ही बना दे। हां अभी उसे कुछ देर सब्र करना चाहिये। उसे देखना चाहिये कि वह घोड़े के बाल का क्या

करती है? कैसा तमाश दिखाना चाहती है। हो सकता है तब तक नयना उसे तलाश करते हुए यहां तक पहुंच जाए।

नयना के ख्याल से इन्द्रजीत के दिल में दुस्साहस दिखाने का ख्याल निकल गया।

इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि नयना के साथ मिलकर वह शायद इस बकाल की बच्ची को ठिकाने लगा सके। इन्द्रजीत घोड़े की दुम का बाल तोड़ वापस बकाल के पास पहुंचा।

"यह लो ।' बाल, बकाल के सामने लहराते हुए बोला था वह।

बकाल ने बाल ले लिया फिर दोनों हाथों से पकड़कर खींचकर देखा। खासा लम्बा और मजबूत बाल था। वह बाल

थामे इन्द्रजीते की तरफ बड़ी । बोली-

"मेरे जादूगर ! आज मैं तुम्हें एक ऐसा जादू दिखाती हूँ कि तुम जिन्दगी भर याद रखोने। तुम का जैसा मैं कहू वैसा ही करते जाओ।"

"ठीक है आज्ञा दो-क्या करना है?" इन्द्रजीत ने दिलचस्पी दिखाई।

"पहले मैं तुम्हारे हाथ पीछे करके इस बाल से बांधूगी। फिर टांगों और उसके बाद तुम्हारे पूरे जिस्म पर इस बाल को दूंगी।” इन्द्रजीत हंस दिया- "देवी जी, आप भूल रही हैं कि यह घोड़े की दुम का बाल है कोई रस्सी नहीं है। इससे तुम मेरे

हाथ ही बांध सको तो यही बहुत है।"

"तुम तो बस मेरा कमाल देखते जाओ और मुझे दाद देते जाओ। लाओ, अपने हाथ लाओ।"

इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ उसके सामने कर दिये।

"अपने हाथ पीछे करो...।" बकाल ने कहा और फिर यूं उसके हाथ पीछे करके एक खास अंदाज में बांध दिये।

बैठ जाओ।

इन्द्रजीत बैठ गया तो उस मायावी रूपसी ने उसके दोनों हाथ उस बाल से कस दिये। इन्द्रजीत हैरान-परेशान देखता रहा कि वह बोल इतना लम्बा कैसे हो गया। बाल था कि शैतान की आत की तरह खिंचता ही चला जा रहा था। हाथ-पांव बांधने के बाद, बकाल ने उसके पैरों के दोनों अंगूठे मिलाकर उन पर बाल लपेटना शुरु किया और फिर उसने इतने से बाल को इतना लम्बा किया कि उसने उसी बाल को इन्द्र के जिस्म के गिर्द भी लपेट दिया। और इससे भी बड़ी हैरत की बात तो यह थी कि उसने इन्द्रजीत को उस बाल से इस तरह कस दिया था कि अब इन्द्र अपने बदन को हिला भी नहीं सकता था।
 
बकाल ने उसे एक करवट से लिटा दिया था और कहकहे लगाकर हसने लगी।

"क्या हुआ? यह यूं पागलों की तरह क्यों हंस रही हो?" अपनी असहाय मुद्रा पर बल खाते पूछा था इन्द्रजीत ने

"हसू न फिर क्या करू, मुझे आशा नहीं थी कि तुम इतनी आसानी से मेरे जाल में फंस जाओगे।" "मैं समझा नहीं।" इन्द्रजीत की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

"तुमने देखा कि एक छोटा-सा घोड़े का बाल मेरे हाथों में किस कदर लम्बा हो गया।"

"हां, निसंदेह यह तो एक चमत्कार है।"

"मैंने जो चमत्कार कर दिखाया है उसका तो तुम्हें अंदाजा ही नहीं है।"

"कुछ बताओ तो समझ में आये।" इन्द्रजीत अब भीतर ही भीतर सहमा जा रहा था।

"यह घोड़े का बाल, किसी मजबूत रस्सी से कम नहीं बल्कि इसे तो कांटेदार रस्सी कहना चाहिये। अब तुम मेरी इच्छा के बिना इस बन्दिश से आजाद नहीं हो सकते।" वह बड़े ही रहस्यमय स्वर में बोली थी।

अज्ञात आशंकाएं इन्द्रजीत को दहलाने लगी- "यह क्या मजाक है।" उसने हिम्मत जुटाकर पूछा।

"यह मजाक नहीं, बल्कि एक संगीन हकीकत है। जरा आजाद होने को कोशिश तो करो।" बकाल ने चहकते हुए कहा।

इन्द्रजीत करवट के बल लेटा था। उसके हाथ उसकी पीठ पर बंधे हुए थे। पांव भी बंधे हुए थे और फिर वह घोड़े का

बाल उसके पूरे बदन पर लिपटा हुआ था। उसने खुद को आजाद कराने की कोशिश करते हुए अपने हाथों का

घुमाया... जोर लगाया... झटका... और तब उसे एकाएक तीव्र पीड़ा का अहसास हुआ।

यही लगा था उसे, जैसे घोड़े की दुम का वह बाल उस्तरे की धार बनकर उसके मांस में उतर गया हो।

दर्द को पीते, इन्द्रजीत ने फिर अपने पैरों को जुम्बिश दी। यहां भी बाल तेज धार की तरह चुभा । वह अपने बदन के जिस भाग को भी हरकत देता... घोड़े का बाल जहा भी कसाव लेता वह की बजाय तेज धार हथियार की तरह गोश्त में घुस जाता खून छलकने लगता।

कल ने सही कहा था। वह घोड़े का बाल, लोहे का बहुत बारीक तार बन गया था। ऐसा तार जो न टूट सकता था। ना खुल सकता हैं। बल्कि जोर आजमाई पर शरीर को किसी ब्लेड की तरह काट सकता था।

"यह क्या किया तुमने?" वह चीख ही तो उठा था ।

"कुछ नहीं, अपनी पकड़ में लिया है।" वह खनकती हुई आवाज में बोली।

"देखो, मुझे आजाद कर दो। मुझे अपने घर जाना है। अपने मां-बाप से मिलना है।" इन्द्रजीत की गुहार किसी भयभीत बच्चे जैसी ही थी।

"अब तुम किसी से नहीं मिल सकते। तुम्हारी सारी मुलाकातें बंद । "

"तुम क्या करना चाहती हों इस तरह तो में मर जाऊंगा...।"

"यह जिम्मेदारी मेरी है मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगी।" वह लुप्त लेती मुस्कान के साथ बोली- "तुम अगर मर गए तो फिर दण्ड कौन भुगतेगा।"

"अच्छा, मेरे शरीर को तो मुक्त कर दो बेशक हाथ-पांव बंधे रहने दो...।"

"फिलहाल यह भी सम्भव नहीं।" बकाल ने बड़ी रुखाई के साथ कहा ।

"फिर... फिर क्या सम्भव है। कुछ बताओं तो सही । "

" मैं तुम्हें तुम्हारी आबादी से दूर लिए जाती हूँ।" बकाल ने सुझाव रखा।

"आखिर कहां?" "

"अपने इलाके में, अपनी आबादी में, एक नई दुनिया में...।"

"वहां डेझ क्या करना होगा?”

"एक को भला क्या करना होता है। तुम कैद काटोगे। कैद-ए-तन्हाई (एकान्त की कैद )," वह होंठ सिकोड़ते हुए बोली।

"मुझे नयना से तो मिल लेने दो जो तुम्हारे कथनानुसार अब यहां पहुंचने ही वाली होगी।"

"बस अब अपना मुंह बंद कर लो बहुत सुन ली मैंने तुम्हारी बक-बक।" वह एकदम तैश में आ गई। आंखों में एकाएक ही वीरानी और निर्ममता नजर आने लगी थी। वह उठकर खड़ी हो गई।
 
इन्द्रजीत फटी-फटी आंखों से बकाल को देखने लगा।

यह मायावी रूपसी अब न जाने क्या करने जा रही थी।

काल से नीचे उतर आई। उसने इन्द्रजीत की टांगे घसीट कर उसे किया और फिर उसके दोनों पैरों के अंगूठे थाम लिए।

बकाल के अंगूठे पकड़ते ही इन्द्रजीत पर मादकता-सी छाने लगी उसकी रगों में नशा सा उतरने लगा और अपनी यह अवस्था उसे जानी-पहचानी सी लगी और उसे याद आया कि हवेली में मेहमान खाने के अपने कमरे में भी वो इसी मनोस्थिति का शिकार रह चुका है। यह कोमल, स्पर्श यह मादकता, वैसी ही थी, वैसी ही आनन्दप्रद और नशीली । यानी कि बकाल वहां भी मौजूद थी।

उफ! आखिर यह कब से उसके पीछे है।

इन्द्रजीत चाहता था कि वह इस बारे में बकाल से कुछ पूछे... सवाल करे... लेकिन अब उसमें जैसे कुछ बोलने का सामथ्र्य कहा रही थी।

वह उस पर छाती जा रही थी। उसके में अंगूठा से पिण्डलियों पर, वहां से ऊपर, और ऊपर उसकी आंखें बंद लगीं। उसके समूचे बदन में ही लहरें उठ रही थीं। जज्बात का ज्वार-भाटा चढ़ता जा रहा था। यह वासना का ही तो वेग था। यह तो शरीरों के संगम का ही उफान तो था धुंआ-सा बिखर रहा था। एक घटा-सी छा रही थी।

वह खुद को डूबता - सा महसूस कर रहा था। जहन अंधकारमय होता जा रहा था। कानों में हवाओं का शोर था । आनन्दप्रद सिसकियां-सी सुनाई दे रही थीं।

हरारत भरी मांसल देह का बोझ अब वह जैसे जागते अहसास से अपने ऊपर महसूस कर रहा था। बकाल के बदन की महक इस नशे को बढ़ा रही थी। इन्द्रजीत को किसी हिंडौले पर महसूस कर रहा था। बकाल ही थी जो उसे इस हिडौंले पर ले उड़ी थी।

अनूठा था यह सुलगती ख्याहिशों का संगम, बकाल का चेहरा दहकता अंगारा बन था और अब इन्द्रजीत भी जैसे राजी राजी उसके इस खेल उसका साथ दे रहा था। रहस्य की परतें उधड़ रही थीं और इन्द्रजीत हकीकतों को समझ रहा था। बकाल वह तूफान थी जो इन्द्रजीत को अपने आचल में लिए उठा-गिरा रही थी।

विश्वास नहीं होता था कि कोमल-सी बकाल में ऐसा आवेश भी भरा हो सकता है। मुद्राएं बदलती रही थी। इन्द्रजीत भी जैसे सबकुछ भूल वासना के बवंडर में आन फंसा था। बकाल अब बायें सहती उस पर बिछी थी। यह तो जैसे अपनी हर कोशिश के साथ, अपना वजूद इन्द्रजीत में मिटा देना चाहती थी।

बकाल अपनी मर्जी से खेली, खूब खेली, पर इस खेल के निर्णायक क्षण भी तो निश्चित थे। अंत वही हुआ जो होता

है। बदलियां टकराई... कोंधी और फिर बरसात हो गई। बरसात इतनी हुई कि इन्द्रजीत ने खुद को भीतर तक भीगा महसूस किया । व्याकुलता के शोलों को भी भक्क से बुझा

गई थी यह बरसात ।

शोले ठण्डे पड़ गये। आग बुझी तो धुंआ-सा फैलता चला गया। और फिर मन-मस्तिष्क पर सन्नाटा व्याप्त हो गया। इन्द्रजीत ने खुद को इस सीमा रेखा पर बिखरा महसूस किया।

अजीब बीते थे ये क्षण जैसे कोई सपना।

खुद से बलात्कार का यह अहसास आनन्दप्रद ही था।

इन्द्रजीत अपने होश गंवा बैठा था और फिर जब उसने होश सम्भाले तो उसे अत्याधिक कमजोरी का अहसास हुआ। यही लग रहा था जैसे किसी ने उसके भीतर का सबकुछ निचोड़ लिया हो। इस खेल में ऐसी कमजोरी के बारे मैं तो कभी नहीं सुना था। पर कमजोरी थी। वह खुद को कमजोर और निचुड़ा-निचुड़ा-सा महसूस कर रहा था।
 
उसने बड़ी मुश्किल से अपनी आंखें खोलीं।

ऊपर निगाह की तो न आकाश नजर आया न पेड़। उसे ऊपर किसी झोंपड़ी की छत नजर आ रही थी। वह कालीन ही पर लेटा हुआ था पर उसके हाथ-पैर बंधे न थे। यह अहसास होते उसे देर न लगी थी कि वह चित्त लेटा हुआ था और उसके हाथ कमर के नीचे दबे हुए नहीं थे, बल्कि पहलू में थे। पैरों की बन्दिशे भी खुली हुई थी। उसका जिस्म भी आजाद था।

. स्वय को बंधन मुक्त महसूस करके उसे खुश हुई क्योंकि घोड़े के बाल की वह जकड़न बहुत ही कष्टदायक थी।

राहत के इन क्षणों में वह अपनी शारीरिक कमजोरी को भी भूल गया और उसने चकित भाव से इस बदले-बदले माहौल का जायजा लिया। वह स्वतन्त्र था बंधन मुक्त था लेकिन अब न वह जंगल था, न वह चबूतरा था... और न ही वह होशरुबा मायावी बकाल था तो सिर्फ कमजोरी से बंद होती आंखें ।

इन्द्रजीत ने देखा कि वह एक छोटी-सी गोल झोपड़ी में था जिसका छोटा-सा दरवाजा था। इस दरवाजे से धूप अंन्दर

आ रही थी। उसे बाहर का दृश्य नजर नहीं आ रहा था। उठने की उसमें शक्ति न थी। वह यू ही निश्चल-साकत पड़ा

रहा।

वह नहीं जानता था कि वहां कैसे पहुंचा। उसे बस इतना ही याद था कि मायावी बकाल ने उसकी टांगे घसीटकर उसके दोनों पैरों के अंगूठे पकड़ लिये थे। और उस पर एक अजीब-सी कैफियत छाती चली गई थी। और फिर उसने उसी बेखुदी में वह भोगा था जिसे परमानन्द का नाम दिया गया था। तृप्तियां बटोरी थीं उसने और अब बेहद कमजोरी महसूस कर रहा था।

कुछ ऐसे ही अनुभव उसे हवेली में भी हुये थे। वहां भी वह किसी हरारती देह द्वारा निचौड़ा गया था। क्या वह बलात्कार का शिकार था? क्या बकाल ऐसे ही काम सुख की रसिया थी। हवेली में तो वह खुद ही अपनी पिलाहट देख घबरा रहा था। इस सनातन सुख- दौहन का ऐसा परिणाम तो नहीं होता।

बहरहाल, जो कुछ भी था उस खेल के बाद अब इन्द्रजीत स्वयं को एक नई जगह पा रहा था। एक छोटी-सी झोपड़ी

में शायद, जैसा कि बकाल ने कहा था, वो उसे अपने इलाके, अपनी आबादी में ले आई थी... किसी नये जहान में।

इन्द्रजीत ने सोचा कि वह बाहर जाकर देखे कि तह कहां आ गया है। उसने उठने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ-पैरों का तो जैसे दम निकला आ था। ऐसी निर्बलता थी- यूं महसूस हो रहा था जैसे वह बरसो का बीमार हो।

वह महज अपनी गर्दन उठाकर रह गया।

इस तरह गर्दन उठाना भी तो उस पर भारी पड़ा था। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था। और सिर में दर्द की एक ऐसी टीस उठी थी कि वह तड़पकर रह गया था। वह अपनी गर्दन गिराकर बुरी तरह हांफने लगा था।

अभी उसकी आयु ही क्या थी । वह उन्नीस-बीस बरस का एक कड़ियल जवान था। लेकिन इस वक्त उसकी हालत देखकर उस पर तरस ही खाया जा सकता था।

वह निश्चल और बेहरकत पड़ा काफी देर तक लम्बे-लम्बे सांस लेता रहा। तब कहीं जाकर उसका सास काबू में आया लेकिन जान अभी नहीं आई थी। उसने झोपड़ी के भीतर एक निरीक्षण करती नजर डाली। झोपड़ी में एक तरफ एक छोटी-सी मेज थी। उस पर कुछ ढ़का हुआ रखा था। मेज के नीचे बने पायदान पर काला कपड़ा तह किया हुआ रखा था। शायद कोई चादर इत्यादि थी, मेज के बराबर में एक सुराही थी, जिस पर एक कटोरा ढका हुआ था। इस मेज और सुराही के अलावा इस झोपड़ी में कोई और चीज नहीं थी अलबत्ता कालीन जरूर बिछा आ था।

इन्द्रजीत उठकर बाहर जाना चाहता था। लेकिन कई धन्टे बीत जाने के बाद भी उसमें इतनी शक्ति नहीं थी। उसका गला सूखा रहा था कांटे से पड़ रहे थे। वह उठकर सुराही से पानी पीना चाहता था। लेकिन उसकी हिस्मत नहीं पड़ रही थी। जब दो-तीन घन्टे गुजर जाने के बाद भी उससे उठा न गया तो उसने सुराही तक कालीन पर लुढ़कते हुए ही पहुचने की सोची। सुराही ज्यादा दूर न थी। मुश्किल से पांच-छ: फुट के फासले पर

यह सोचकर उसने अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करके अपना बांया हाथ घुमाकर कालीन पर रखा। फिर धीरे- करवट ली। यह करवट लेते ही जैसे उसकी जान निकल गई थी। पर फिर इसी तरह वह करवटें बदलकर लुढ़कता
 
हुआ किसी न किसी तरह सुराही तक पहुंच गया।

उसने थोड़ा-सा उठकर सुराही के ऊपर उल्टा रखा कटोरा उतारा और उसे नीचे कालीन पर रखकर एक हाथ में सुराही झुकाई । पानी से लबालब भरी हुई थी। जरा-सा ही झुकाने पर उसमें पानी छलक पड़ा। कलकल की आवाज के साथ पानी कटोरे में गिरने लगा।

कटोरा भरने के करीब हुआ तो उसने सुराही सीधी कर दी। और हांफते हुए लेट गया। कुछ देर बाद जब सांस संयत . हुई तो उसने फिर जरा-सा उठकर कटोरा उठाया और अपने मुंह से लगा लिया।

पानी का पहला घूंट किसी छुरी की तरह उसके गले में उतरता चला गया था। वह जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। पानी

ठण्डा था और मीठा भी था।

पानी पीकर उसे बड़ा सुकून महसूस हुआ। कुछ ताकत भी बहाल होती हुई ।

वह कुछ देर आंखे बन्द कर खामोशी से लेटा रहा। फिर उसने मेज का सहारा लेकर उठना शुरू किया। कोशिश करके मेज से कमर टिकाकर बैठ गया। फिर उसने मेज पर ढकी रखी ट्रे पर से कपड़ा हटाया। इस ट्रे में उसके लिए खाना और अंगूर थे।

इन्द्रजीत ने अंगूर के गुच्छे से दो-चार अंगूर तोड़कर खाए । अंगूर बेहद रसीले और मीठे थे। वह धीरे-धीरे सारे अंगूर

खा गया। अंगूरों ने उसके कमजोर शिथिल शरीर को काफी ताकत बख्शी थी।

अब वह मेज की तरफ करके बैठ गया। उसने खाना खाया और फिर पानी पीकर लेट गया। खाना भी उसने खून छककर खाया था। उस पर खाने का खुमार चढ़ने लगा। वह शीघ्र ही नींद की आगोश में चला गया।

और फिर...जब उसकी आंख खुली तो सूर्य अस्त होने का वक्त हो चुका था। अब वह अपने आप को बहुत बेहतर

महसूस कर रहा था। वह हिम्मत करके धीरे-धीरे खड़ा हो गया। खड़े होते वक्त उसकी आंखों के आगे अन्धेरा अन्धेरा

जरूर आया मगर वह किसी तरह अपने आप को सम्भाले रहा। फिर वह एक-एक कदम जमाकर उठाता हुआ

झोंपड़ी के दरवाजे की तरफ बढ़ा।

झोपड़ी का दरवाजा छोटा था और उससे बाहर निकलने के लिए काफी झुकना पड़ा था। जब वह बाहर निकलकर सीधा खड़ा हुआ तो बाहर का माहौल देखकर आश्चर्यचकित रह गया।

सामने जहां तक निगाह जाती थी रेगिस्तान था । रेत के ऊंचे-नीचे टीले दूर तक फैले हुए थे।

दूर क्षितिज पर सूरज की बड़ी-सी टिकिया लाल अंगारा बनी हुई थी। दूर तक न कोई पेड़ था, न आदम, न आदमजाद ! इस विस्तुत रेगिस्तान में बस वही एक झोपड़ी थी।

इन्द्रजीत को जाने कहां लाकर छोड़ दिया गया था।

बड़ी अनोखी अनूठी थी यह कैद ! इस झोंपड़ी को छोड़कर अगर वह फरार होना भी चाहता तो कहां जाता। इस तपते रेगिस्तान में हर दिशा में रास्ता होने के बावजूद उसे रास्ता नहीं मिलना था। वह भटक भटक कर भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता। यहां तो उसे ना सिर्फ एक छत का साया उपलब्ध था बल्कि खाना-पानी और सोने के

लिए कालीन भी मौजूद था। यानी उसे ऊंची श्रेणी की कैद दी गई थी। बहरहाल, उसकी पहली समस्या तो अपनी ताकत पाने की थी। कमजोरी दूर हो वह हाथ पैर हिलाने लायक हो जाये और फिर अगर यहा से निकलने का कोई रास्ता दिखाई दिया तो वह फरार खेने की कोशिश कर सकता था।

इन्द्रजीत अभी डूबते को देखता हुआ यह सब सोच रहा था कि सहसा वातावरण में सनसनाहट सी हुई। हवा का एक तेज झोका-सा महसूस हुआ। और कोई उसके सिर पर से गुजरता हुआ आगे चला गया।

अभी अन्धेरा नहीं फैला था। उसके सिर पर से जो पक्षी गुजरा था वह उल्लू था। कुछ दूर जाने के बाद वह पलटा और अब फिर वह सीधा इन्द्रजीत की तरफ आ रहा था। इन्द्रजीत सहमे से अंदाज में उसे देखता रहा। निकट आकर जब उस उल्लू ने अपने पंजे निकालकर उस पर झपटने की कोशिश की तो न जाने कहां से इन्द्रजीत में ऐसी ताकत
 
Back
Top