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Guest
इतनी अच्छी कर लेती है। दोनों ही एरक-दूसरे की दक्षता से प्रभावित हुए थे। इन्द्रजीत ने इस घुड़सवारी का बड़ा लुत्फ लिया।
अब वे दोनों धीरे-धीरे घोड़े दौड़ाते हुए साथ-साथ चल रहे थे। दोनों बातें कर रहे थे।
इन्द्रजीत फिर दिल्ली की चर्चा ले बैठा था। वह कह रहा था- "क्या ख्याल है, नयना! मैं आज शाम को दिल्ली चला जाऊं...?"
"शाम को नहीं... कल सुबह जाना। एक दिन तो और रूको मेरे पास और फिर आज तुम्हारे दो जोड़े और सिलकर आ जाएंगे।"
"कपड़ों की फिक्र है। इन्द्र बोला।
"तुम्हें नहीं है लेकिन मुझे तो है। मैं तुम्हारे मां-बाप के सामने शमिन्दा नहीं होना चाहती।"
नयना के अपनत्व पर इन्द्र मुस्करा दिया और उसने कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि उसका घोड़ा एकदम भड़क उठा। उसने आनन-फानन में रफ्तार पकड़ ली। पलक झपकते ही वह हवा से बातें करने लगा।
इन्द्रजीत की समझ में भी नहीं आया कि यह क्या हुआ? वह अगर घुड़सवारी का माहिर न होता तो घोड़े के अचानक बेकाबू होने पर धूल चाट रहा होता। घोड़े की पीठ पर सम्भलकर उसन घोड़े को रोकने की यथा सम्भव कोशिश की थी लेकिन रुकना तो दूर की बात, घोड़े ने अपनी रफ्तार भी कम नहीं की थी। इन्द्रजीत की लगाम खींचने की सारी कोशिशें निष्फल रही थीं।
सामने जंगल था। घोड़ा देखते ही देखते जंगल में प्रवेश कर गया।
इन्द्रजीत के घोड़े ने भड़ककर जैसे ही रफ्तार पकड़ी तो नयना ने फौरन अपने घोड़े को ऐड लगाई। लेकिन उसका घोड़ा अड़ियल बन गया। वो चलकर ही न दिया। और फिर जब नयना ने बड़े गुस्से में ऐडी मारी तो घोड़ा पलटकर दौड़ने लगा। नयना ने बड़ी कठिनाई से उसे रोका। उसने घोड़े का रुख मोड़ा और दोबारा ऐड लगाई तो इस बार घोड़ा जंगल की तरफ बढ़ लिया। नयना धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाती गई। कुछ ही देर के बाद वह भी जंगल में प्रवेश कर गई थी।
इन्द्रजीत का घोड़ा इस बीच जाने कहां से कहां निकल गया था।
नयना ने अपने घोड़े को रोका और जंगल का जायजा लेने लगी। जंगल में सन्नाटा था। इन्द्रजीत का कहीं पता नहीं था।
घोड़े की टापों के ताजा निशान नजर आ रहे थे। नयना उन निशानों पर निगाह रखे अपना घोड़ा दौड़ाने लगी। पर थोड़ा अन्दर जाने के बाद ये निशान गायब हो गए थे क्योंकि यहां जमीन पक्की थी।
नयना परेशान हो गई। घोड़े के सूमों के निशान गायब थे। जंगल में कोई रास्ता या पगडंडी किस्म की चीज नहीं थी
कि वह उसी पर चल पड़ती। अब महज अनुमान से ही आगे बढ़ना था। नयना अनुमान से ही एक तरफ बढ़ ली, पर
काफी दूर तक जाने के बाद उसे कोई सुराग नहीं मिला।
वह वापस पलटी और अब उसने एक दूसरी दिशा में सफर शुरु किया। इस बार वह रुक-रुककर इन्द्रजीत को पुकारती भी जा रही थी। लेकिन जंगल में जानवरों और पक्षियों की आवाजों के अलावा सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं मिल रहा था।
नयना हैरान और परेशान थी कि इन्द्रजीत आखिर कहा गया। घोड़ा किसी वजह से बेकाबू हो गया था तो उसने अब तक उस पर काबू पा लिया होगा। उसे वापस आ जाना चाहिये था। इन्द्रजीत के घुड़सवारी के अंदाज से इस बात का यकीन तो था ही कि वह कोई अनाड़ी घुड़सवार नहीं। नयना को अपने छोड़े पर भी हैरत थी कि वह क्यों अचानक पलटकर भाग निकला था। उसकी इस हरकत पर नयना को बहुत गुस्सा था। वह सोच रही थी कि इस थोड़े को गोली मरवा देगी। इस घोड़े ने उसे इन्द्र के सामने शर्मिन्दा करके रख दिया था।
अब वे दोनों धीरे-धीरे घोड़े दौड़ाते हुए साथ-साथ चल रहे थे। दोनों बातें कर रहे थे।
इन्द्रजीत फिर दिल्ली की चर्चा ले बैठा था। वह कह रहा था- "क्या ख्याल है, नयना! मैं आज शाम को दिल्ली चला जाऊं...?"
"शाम को नहीं... कल सुबह जाना। एक दिन तो और रूको मेरे पास और फिर आज तुम्हारे दो जोड़े और सिलकर आ जाएंगे।"
"कपड़ों की फिक्र है। इन्द्र बोला।
"तुम्हें नहीं है लेकिन मुझे तो है। मैं तुम्हारे मां-बाप के सामने शमिन्दा नहीं होना चाहती।"
नयना के अपनत्व पर इन्द्र मुस्करा दिया और उसने कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि उसका घोड़ा एकदम भड़क उठा। उसने आनन-फानन में रफ्तार पकड़ ली। पलक झपकते ही वह हवा से बातें करने लगा।
इन्द्रजीत की समझ में भी नहीं आया कि यह क्या हुआ? वह अगर घुड़सवारी का माहिर न होता तो घोड़े के अचानक बेकाबू होने पर धूल चाट रहा होता। घोड़े की पीठ पर सम्भलकर उसन घोड़े को रोकने की यथा सम्भव कोशिश की थी लेकिन रुकना तो दूर की बात, घोड़े ने अपनी रफ्तार भी कम नहीं की थी। इन्द्रजीत की लगाम खींचने की सारी कोशिशें निष्फल रही थीं।
सामने जंगल था। घोड़ा देखते ही देखते जंगल में प्रवेश कर गया।
इन्द्रजीत के घोड़े ने भड़ककर जैसे ही रफ्तार पकड़ी तो नयना ने फौरन अपने घोड़े को ऐड लगाई। लेकिन उसका घोड़ा अड़ियल बन गया। वो चलकर ही न दिया। और फिर जब नयना ने बड़े गुस्से में ऐडी मारी तो घोड़ा पलटकर दौड़ने लगा। नयना ने बड़ी कठिनाई से उसे रोका। उसने घोड़े का रुख मोड़ा और दोबारा ऐड लगाई तो इस बार घोड़ा जंगल की तरफ बढ़ लिया। नयना धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाती गई। कुछ ही देर के बाद वह भी जंगल में प्रवेश कर गई थी।
इन्द्रजीत का घोड़ा इस बीच जाने कहां से कहां निकल गया था।
नयना ने अपने घोड़े को रोका और जंगल का जायजा लेने लगी। जंगल में सन्नाटा था। इन्द्रजीत का कहीं पता नहीं था।
घोड़े की टापों के ताजा निशान नजर आ रहे थे। नयना उन निशानों पर निगाह रखे अपना घोड़ा दौड़ाने लगी। पर थोड़ा अन्दर जाने के बाद ये निशान गायब हो गए थे क्योंकि यहां जमीन पक्की थी।
नयना परेशान हो गई। घोड़े के सूमों के निशान गायब थे। जंगल में कोई रास्ता या पगडंडी किस्म की चीज नहीं थी
कि वह उसी पर चल पड़ती। अब महज अनुमान से ही आगे बढ़ना था। नयना अनुमान से ही एक तरफ बढ़ ली, पर
काफी दूर तक जाने के बाद उसे कोई सुराग नहीं मिला।
वह वापस पलटी और अब उसने एक दूसरी दिशा में सफर शुरु किया। इस बार वह रुक-रुककर इन्द्रजीत को पुकारती भी जा रही थी। लेकिन जंगल में जानवरों और पक्षियों की आवाजों के अलावा सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं मिल रहा था।
नयना हैरान और परेशान थी कि इन्द्रजीत आखिर कहा गया। घोड़ा किसी वजह से बेकाबू हो गया था तो उसने अब तक उस पर काबू पा लिया होगा। उसे वापस आ जाना चाहिये था। इन्द्रजीत के घुड़सवारी के अंदाज से इस बात का यकीन तो था ही कि वह कोई अनाड़ी घुड़सवार नहीं। नयना को अपने छोड़े पर भी हैरत थी कि वह क्यों अचानक पलटकर भाग निकला था। उसकी इस हरकत पर नयना को बहुत गुस्सा था। वह सोच रही थी कि इस थोड़े को गोली मरवा देगी। इस घोड़े ने उसे इन्द्र के सामने शर्मिन्दा करके रख दिया था।