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हंग्री वुल्फ गेम (इंसान या भूखे भेड़िए ) complete

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रौनक, मनु का कॉलर पकड़ते..... "कमीने ये सब तुम्हारा किया कराया है.... तुम ने ही उस शिप को डूबा दिया...... ये तुम दोनो भाई का ही प्लान है. मैं तुम दोनो को कोर्ट तक ले जाउन्गा... तुम्हे जैल करवाउन्गा. तुम्हारे गंदे इरादे कभी कामयाब नही होंगे"....

मानस..... अर्रे सर लालच तो आप सब का ही सिखाया है. जैसा आप ने कहा वैसा ही हो मेरी ये दुआ रहेगी, पर उसके लिए आप के पास प्रूफ और पैसा होना चाहिए. बिन पैसे तन-तन गोपाला रे भाई. वैसे मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि, बड़े प्यार से आप सब अपनी पूरी संपत्ति यहाँ दे कर जाने वाले हैं....

राजीव..... सड़क का कोई आदमी हूँ जो तुम्हारे जाल से निकल ना पाऊँ, जिस प्रॉपर्टी के लिए तुम दोनो ने पूरा सड़ायंत्र रचा वो प्रॉपर्टी मैं तुम्हारे नाम कभी नही होने दूँगा..... तुम्हे जो करना था वो कर चुके, नाउ इट'स और टर्न....

मानस...... दम है बॉस, आप के डाइलॉग और पंच कमाल के हैं... वैसे प्रॉपर्टी बचाने से याद आया..... मनु ने आप के घर 6 दिन पहले एक लव लेटर भिजवाया था शायद आप उस लेटर के बारे मे नही सोच रहे......

रौनक और राजीव सोचने लगे मानस की बात पर.... उन्हे ध्यान आया, उस लेटर का जिसमे सॉफ लिखा गया था..... "कंपनी अपनी सेक़ुरिटी के लिए सभी लोन लिए पार्ट्नर्स के अकाउंट का स्टेट्मेंट चाहती है... ताकि सेक़ुरिटी रहे कंपनी का पैसा डूबा नही"....

जैसे ही उन्हे ये ध्यान आया, सब के सब सिर पकड़ कर बैठ गये..... चिल्लाने और कौतूहल का महॉल हो गया..... सभी लोग पागल से हो गये..... ऐसा लग रहा था जैसे अभी हे दोनो भाई का कतल कर देंगे....

मनु..... "चिल्ला लो... चिल्ला लो... पर चिल्लाने से कुछ नही होगा. अब देखा जाए तो तुम्हारे पास कोई ऑप्षन नही.... मेरा कहा मानो और अपनी पार्ट्नरशिप परीसेंटेज और पूरी प्रॉपर्टी , एस.एस ग्रूप के नाम कर दो. वरना कल स्टेट्मेंट ना मिला तो लीगल आक्षन के तहत कंपनी तुम से पैसे वसूलेगी... और इधर का 10000 करोड़ वो अलग से देना होगा"....

"इसलिए मेरे शुभ-चिंतकों, और एस.एस ग्रूप के मालिक बन'ने का ख्वाब देखने वालों मित्रों... कलेजे पर पत्थर रखो और अपनी संपत्ति एस.एस ग्रूप को दे कर मुझ से क्लीन चिट ले लो... ये आखरी बार कह रहा हूँ, वरना तुम्हारी कंपनी तो मेरे नाम हो ही जाएगी पर 10000 करोड़ का नुकसान नही भर पाओगे".

सदमा सा था उन सब के लिए. हर चीज़ इतने प्लान से किया गया था, कि कोई चारा नही छोड़ा था मनु ने उन दोनो के लिए.... 10000 करोड़ पहले से डेट हो गये थे, उपर से उनके हिस्से के शेर की कोई वॅल्यू नही बची जिसे शो कर के कंपनी को ये बता सके कि दिया हुआ लोन सुरक्षित है और वो सारे पैसे वापस कर सकते हैं.....

कोसते हुए सब ने वही किया जैसा मनु ने चाहा....... "तुम दोनो भाई याद रखना, जिस मूलचंदानी नाम के नीचे तुम ने मुझे धोका दिया है वो फॅमिली कभी तुम्हारी नही हो सकती.... उपर वाला सब देख रहा है... वो ज़रूर इंसाफ़ करेगा"

मनु........

"हा हा हा हा..... इसे तुम उपर वाले का इंसाफ़ ही समझ सकते हो.... हरा इंसान हर वक़्त भगवान को ही इंसाफ़ करने कहता है. लेकिन आज का भगवान मैं ही हूँ और मैने इंसाफ़ कर दिया. दुखी मत हो, मैं इतना निर्दयी भगवान भी नही. सुना है अपना नुकसान हो तो बुरा लगता है पर दूसरे का नुकसान देखने मे बड़ा मज़ा आता है.... इसलिए कल काया के बर्थदे मे आ जाना... जैसे आज तुम्हारे उपर से छत और नीचे से ज़मीन गयी, वैसे ही कल उनकी बारी होगी"....

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जिन्हे जीत की सौगात मिलनी थी, वो हार रहे थे.... और जिन्हे हराना था वो जीत रहे थे. बाकियों पर बिजली गिरनी शुरू हो चुकी थी... अब बारी घर की थी.

हर्षवर्धन और अमृता शिप डूबने की सारी चिंता, मनु और मानस के ज़िम्मे छोड़, काया के बर्तडे की तैयारियों मे लगे हुए थे....

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शाम के वक़्त....

मूलचंदानी हाउस मे सभी गेस्ट जमा हो गये थे. लूटे पिटे उनके पार्ट्नर्स भी पहुँच चुके थे, लेकिन सभी अपने लूटने-पिटने की खबर पर चुप्पी साधे हुए थे....

केक काटने के बाद ही, हर्षवर्धन ने एक ज़रूरी घोषणा उसी वक़्त कर दी, काया और अखिल की शादी की बात. काया का बर्तडे भी एक लंबा इंतज़ार था एस.एस ग्रूप के लिए, क्योंकि इसी दिन सम्शेर मूलचंदनी अपने बिज़्नेस असोसीयेट्स को ले कर एक ज़रूरी घोषणा करने वाले थे.

हर्षवर्धन के अनाउन्समेंट के बाद, शम्शेर ने भी स्टेज के माइक को संभाला.....

"आप सब को बड़ी ही बे-सबरी से आज के दिन का इंतज़ार था. मैं बहुत खुश हूँ, एस.एस ग्रूप की तरक्की और उसकी बागडोर मनु के हाथ मे देख कर. हां बीते दिन मे कुछ अप्रिय घटना हुई थी, हमारा एक कंटेनर शिप डूब गया था... पर इन सब से कोई घबराने की बात नही है, क्योंकि ऩफा या नुकसान तो बिज़्नेस मे लगा रहता है, बस ज़रूरत है कि बुरे वक़्त मे सम्भल कर उस बुरे वक़्त को अच्छा कैसे किया जाए".....

"मैं अपने पोते और एस.एस ग्रूप के मॅनेजिंग डाइरेक्टर को यहाँ बुलाना चाहूँगा, जो कंपनी की नये पॉलिसी को ले कर चर्चा करेंगे".

मनु स्टेज पर आ कर.....

"आप सब को मेरा नमस्कार... आज की ज़रूरी घोषणाओं मे सब से पहले ज़रूरी घोषणा ये है कि मेरे दादू की अब उमर हो चुकी है इसलिए अब उन्हे उनकी सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त किया जाता है"....

"कंपनी के बाकी पार्ट्नर्स ने अपनी कंपनी मनु मूलचंदानी यानी कि मेरे नाम कर दिया है, इसलिए अब उनके लिए किसी पॉलिसी की ज़रूरत है ही नही"

"मेरे पापा की बिज़्नेस यूनिट भी अब मेरे नाम हो गयी है, क्योंकि उनकी वजह से कंपनी ने मानस की शिप्पिंग कंपनी को बहुत बड़ा जुर्माना पे किया है.... और पॉलिसी के मताबिक, ओन रिस्क और बेनिफिट क्लॉज़ मे यदि कंपनी का कोई यूनिट बाहर किसी को सपोर्ट करता है, और उसकी वजह से नुकसान होता है तो वो आदमी डिसीजन के लायक नही".

"नुकसान का अमाउंट कन्सर्निंग कंपनी को देने के बाद, उस पार्ट्नर की कंपनी को मर्ज किया जाएगा .... और उस कंपनी की वॅल्यू लगा कर ... नुकसान के बाद का रेस्ट अमाउंट पार्ट्नर्स को पे कर दिया जाएगा... यदि नुकसान का अमाउंट कंपनी की वॅल्यू से ज़्यादा है तो रेस्ट अमाउंट उस से वसूल किया जाएगा, यही लॉ है".

"यहाँ तो पापा की शिप्पिंग कंपनी की वॅल्यू से 1000 करोड़ ज़्यादा का नुकसान हुआ है. खैर मेरे पापा हैं इसलिए वसूली मे केवल इनकी प्रॉपर्टी जाएगी... पापा पेपर रेडी है साइन कर देना... और बाकी का माफ़ किया जाता है."

मनु की घोषणा सुन कर तो सम्शेर और हर्षवर्धन के पाँव तले से ज़मीन ही खिसक गयी.

 
इधर पार्टी मे आई जिया मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, क्योंकि आज मनु के हाथ कंपनी लगी, तो कल ये सब कुछ नताली के पास आ जाएगा.....

इधर सूकन्या भी काफ़ी खुश हो चुकी थी, क्योंकि जैसा मनु शुरू से बोलता आ रहा था.... "एक दिन वो पूरी कंपनी अपने नाम कर लेगा"... आज सच हो गया था....

मनु अपनी घोषणा के आखरी शब्द कहते हुए....

"और अंत मे मैं शुक्रगुज़ार हूँ अपनी बुआ सूकन्या का, जिन्होने अपनी कंपनी हमारे ग्रूप के नाम कर दी... कंपनी की सारी पॉलिसी डिक्लेर हो गयी, अब आप सब पार्टी एंजाय कर सकते है"

सब के सब शॉक्ड.... सूकन्या तो ऐसे दौड़ी मनु की ओर की मानो उसका खून कर देगी..... "मैने कब तुम्हे अपनी कंपनी दी कमीने, जो तू ये अनाउन्स्मेंट कर रहा है"

मनु, धीमे से सूकन्या के कान मे.... "जैसे आप ने मानस की कंपनी मेरे नाम करवाई थी फ्रॉड करवा कर ठीक वैसे ही, और चारा बनी आप की बेटी"...

सूकन्या आग बाबूला होती.... "मैने सिर्फ़ कोन्सेंट लॅटर साइन किया था"

मनु.... कितनी भोली हैं... जब तक आप ने उन पेपर्स को क्रॉस चेक किया तब तक तो कोन्सेंट लॅटर ही था, पर जब आप आँख मूंद कर उस पर बड़े ड्रामा के साथ सिग्नेचर कर रही थी, तब वो अग्रीमेंट पेपर बन गया. वो क्या है ना आप के वकीलों ने इसमे बहुत मदद किया... अब पता चला, किसी से धोका कर के संपत्ति लेने से कैसा लगता है ... पार्टी एंजाय कीजिए.....

गहमा-गहमी से भरा था महॉल, सारे लूटे पिटे लोग एक ओर हो कर बस मनु को ही देख रहे थे, और मनु उन्हे देख कर हंस रहा था....

हर्षवर्धन.... हमने पुरानी बातें भुला कर तुम्हे बेटा कहा, और तुमने हमारे साथ ऐसा किया...

अमृता.... तुझे हमारी दौलत चाहिए थी तो बोल कर ले लेता. तुम सब के साथ जो मैने किया उसके बदले मे ये गया भी तो कोई मलाल नही, बस कभी-कभी आ कर मिलते रहना. छोड़ो हर्ष, ये हमारे बुरे काम का नतीजा है जिसका फल हमे मिला. भूल गये हम भी कभी इन दोनो भाई को ऐसा ही देखना चाहते थे...

भावुक पल थे ये अमृता के लिए और काया अपनी माँ के दर्द को समझ गयी.... वो अपनी माँ को सहारा देती हुई मनु से कही.... "माँ को कोई मलाल नही है भैया, आप को मुबारक हो ये सारी संपत्ति, कुछ छोड़ा है वैसे जिस से हम कुछ दिन गुज़ारा कर लें... या आप की कंपनी मे कोई काम हो तो वही दे दीजिए"

रजत.... देखा आख़िर इस नाजायज़ ने अपनी औकात दिखा ही दिया.... मैं शुरू से जब चिढ़ता था इस पर तो मुझे ही थप्पड़ मारे गये... अब चलो यहाँ से... मुझे नही रहना किसी के अहसान के तले....

कुछ लोग भावुक हो रहे थे, तो कुछ लोग मनु को गालियाँ दे रहे थे.... महज चन्द दीनो मे ही बहुत से लोगों की दुनिया उजड़ गयी...... अमृता की बात सुन कर मनु को थोड़ा अखरा, पर वो खुद को संभालते हुए बस मुस्कुराता ही रहा....

मनु.... आप सब का हो गया हो तो आप सब जा सकते हैं.... कोई भी मुझ से किसी भी तरह का उम्मीद ना रखे, क्योंकि सब मिल कर जो मेरे साथ करना चाहते थे, वही मैने आप सब के साथ किया...

अब कोई कर भी क्या सकता था... सब के सब मुँह लटकाए मूलचंदानी हाउस से निकलने लगे.... पीछे जब सब मुड़े तो लोग बस अपनी आखें मसलते ही रह गये... जैसे कोई अचम्भा घटा हो.... हैरानी से सब की आखें बड़ी हो चुकी थी... मनु और मानस तो जैसे सुन्न ही पड़ गये थे....

आखों के सामने हर्षवर्धन की पहली पत्नी, मनु और मानस की माँ काव्या खड़ी थी, जिसे देख कर सब आश्चर्य से पागल हो रहे थे. सब क्या रिक्ट करे, कैसे रिक्ट करे किसी को कुछ समझ मे ही नही आ रहा था...

तभी जैसे उस महॉल मे रोबदार आवाज़ गूँजी.... ऐसा लगा जैसे कोई लेडी दबंग की आवाज़ गूँज़ रही हो.... "क्यों उम्मीद नही किया था क्या, मैं जिंदा भी हो सकती हूँ.... और शाबाश मेरे बेटों... तुमने तो सब को सड़क पर ला दिया.... अब तुम दोनो को इनाम देने की बारी है, दिल जीत लिया मेरा".....

 
काव्या आगे बढ़ कर मनु और मानस के पास पहुँची... दोनो भाइयों के बीच खड़ी हो कर कहने लगी.... "तो मेरे होनहार बेटों... ये है तुम दोनो का इनाम... पेश है असली मनु और मानस. तुम दोनो भाइयों ने जो भी किया उसे देखते हुए मैं ये सोच रही हूँ कि, अब तुम्हे भी तुम्हारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त किया जाए"...

पहले तो अपनी माँ को जिंदा देख कर दोनो भाइयों की आखों मे आसू थे, पर अब उसकी बात सुन'ने के बाद दोनो के दिल मे जैसे कोई दर्द उठा हो....

मानस.... मोम, ये आप ही हो ना.... आप जिंदा हो... क्यों इतने दिन तक आप दूर रही हम से... क्यों खुद को हम से दूर रखा. और आप ये कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही है... मैं ही तो हूँ आप का बड़ा बेटा मानस....

मनु.... मोममम्म... कुछ तो कहो मोम... ऐसे चुप क्यों हो....

काव्या..... ठीक है मैं ही कहती हूँ.... एस.एस ग्रूप के संस्थापक मिस्टर. शम्शेर जी आप मेरी बातों को कन्फर्म करेंगे, या मैं डीयेने टेस्ट करवा दूं कि कौन असली मनु और मानस है....

शम्शेर..... कोई टेस्ट की ज़रूरत नही है, काव्या ठीक कह रही है, ये दोनो असली मनु और मानस नही हैं....

क्या ड्रामा चल रहा था, किसी के कुछ समझ मे नही आ रहा था... पहले तो मनु और मानस ने पूरी कंपनी धोके से अपने नाम करवा ली. बाद मे कई साल पहले मरी हुई एक औरत जिंदा हो जाती है. और उस औरत का कहना है कि ये दोनो मनु और मानस है ही नही.... बलकी उसके साथ आए दो लड़के हैं मनु और मानस.

पूरा नाटकिया महॉल हो चुका था वहाँ का. जितने पार्ट्नर्स थे, उन्हे तो बहुत खुशी हो रही थी, पर नताली और जिया को झटके पर झटका लग रहा था.... नताली ने हर संभव कोसिस की ये साबित करने की कि असली वही दोनो हैं और नकली वाले को काव्या असली कह रही....

पर कोई भी हथकंडे ये साबित नही कर पाए कि वही दोनो असली हैं. काव्या ने वहाँ से सब को धूतकार कर भगाया.... मनु और मानस सब कुछ जीतने के बाद भी एक हारे हुए खिलाड़ी साबित हुए और वो भी वहाँ से चल दिए.... जाते-जाते काया पलट कर एक बार मनु को देखी और उसके गले लग कर रोती हुई कहने लगी.... "भाई धोका, धोका होता है, जैसा आप ने सब के साथ किया वैसा हे आप के साथ भी हो गया. बाकी आप से कोई गिला नही"

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अगले दिन सुबह... अखिल के घर....

अखिल.... साला ये तुम लोगों का फॅमिली ड्रामा समझ मे नही आता... बालाजी टेलिफील्म्स की कोई सीरियल दिखा रहे हो क्या, जिसमे मरा हुआ करेक्टर जी जाता है. वारिस अनाथ हो जाते हैं, और जिनको कोई नही जानता वो पूरा मालिक.

मनु.... सर फटा जा रहा है मेरा. मैं खुश होऊँ या रोऊँ मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा....

मानस.... 4 साल दर-दर की ठोकर खाई मैने, सिर्फ़ इस बात का पता लगाने के लिए की मेरी माँ को किसने मारा. और आज वही माँ कहती है हम उनके बच्चे नही.... ऐसा कैसे हो सकता है...

अखिल.... असली गेम तो तेरा दादा खेल गया, जिसने काव्या की बात पर अपनी हामी भर दी....

मनु.... बकवास मत बोल, वो मेरी माँ है इज़्ज़त से नाम ले....

अखिल.... देख भाई अपनी पोलीस की नौकरी है, और अपनी सोच बिल्कुल क्लियर रहती है....

मनु.... ज़रा हमे भी बताओ तुम्हारी सोच. बताओ इस वक़्त तुम्हारी सोच क्या कह रही है....

अखिल.... देख भाई, तुम्हारी माँ के ऐसा करने के पीछे ज़रूर कोई वजह रही होगी... अब, जब तक उस से बात ना कर लिया जाए, किसी भी नतीजे पर नही पहुँच सकते. मजबूरी भी हो सकती है या प्लॅनिंग भी....

मानस..... इस बात का भी पता अभी चल जाएगा.... चल मनु चलते हैं मोम के पास और उन से पूछते हैं, आख़िर उन्होने ऐसा क्यों कहा.....

 
मूलचंदानी हाउस....

मनु को ले कर मानस पहुँच गया मूलचंदानी हाउस. लेकिन एक रात मे ही वहाँ का नज़ारा बदला हुआ था. गेट का वॉचमन चेंज. जैसे ही दोनो भाई अंदर घुसे वो वाचमेन धूतकारते हुए पूछने लगा..... "कहाँ मुँह उठाए हुए चले आ रहे हो दोनो"

मानस तो उसे मारने ही वाला था, पर मनु ने रोक लिया...... "अंदर जा कर बोलना मनु और मानस आए हुए हैं"...

वॉचमन वहीं से फोन लगाया.... और उधर से शायद अंदर भेजने को कहा गया हो. उस वॉचमन ने सॉरी कहते हुए दोनो को अंदर जाने के लिए कहा.

दोनो हे अपने सवालों का जबाव लेने तेज-तेज कदम बढ़ते अंदर पहुँचे. जैसे ही दोनो हॉल मे पहुँचे..... काव्या का लाया हुआ मानस ज़ोर से चिल्लाया..... "साले बाहरूपीए, तेरी अंदर आने की हिम्मत कैसे हुई".

तभी पिछे से आवाज़ आई.... "किट्टू तुम ऑफीस जाओ... और तुम दोनो बैठो, ऐसे खड़े क्यों हो. तुम्हारा ही घर है".

किट्टू चला जाता है, और काव्या उन दोनो के पास बैठ जाती है. रोनी सी सूरत बनाए काव्या कहने लगती है.... "कल जो तुम दोनो के साथ मैने किया उसके लिए मुझे माफ़ कर देना मेरे बच्चो. मैं मजबूर थी"

मानस..... मोम आप मायूस क्यों होती हैं. हम आप के बच्चे हैं, हमे काट भी दोगि तो गम नही, पर मर तो तब गये जब आप ने कहा हम आप के बच्चे नही"

मनु.... हां मोम, नही चाहिए ये दौलत, नही चाहिए ये रुतवा. आप जिसे चाहो दे दो, पर फिर कभी ना कहना कि हम आप के बच्चे नही....

महॉल काफ़ी गमगिन हो गया था.... सब अपनी-अपनी बातें बोल कर खामोश हो गये. तभी उस खामोश से महॉल मे काव्या के अट्टहास भरी हसी की आवाज़ आने लगी. वो ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी. मनु और मानस दोनो आश्चर्य से उस की ओर देखने लगे....... "क्या हुआ तुम दोनो काफ़ी हैरान दिख रहे हो"

काव्या की बात पर दोनो को और भी ज़्यादा हैरानी हो गयी. दोनो लगातार काव्या को ही देखे जा रहे थे. तभी फिर से काव्या बोली......

"मैं काव्या हूँ. यदि मेरी हिस्टरी नही जानते तो जान लो, जहाँ मैं होती हूँ, वहाँ मेरा ही सिक्का चलता है. तुम दोनो गंदी नली के कीड़े, तुम्हे क्या लगता है मैं झूठ बोल रही थी, या मैं मजबूर थी कल रात, जो तुम दोनो सच का पता लगाने चले आए".

"तुम्हे क्या लगा, शम्शेर ने प्रॉपर्टी पाने के लिए मेरी बात का समर्थन किया. ओह्ह्ह्ह ! मैं तो भूल ही गयी तुम दोनो के मन मे तो अभी कई सवाल होंगे" ????....

"जैसे कि...... उस वक़्त हुआ क्या था, मैं मरी नही तो थी कहाँ ? तुम दोनो मेरे बच्चे कैसे नही ? शम्शेर ने मेरी बातों का समर्थन क्यों किया.... वगेरह-वगेरह"

 
"हां एक बात तो मैं बताना ही भूल गयी तुम्हे मानस.... वो जो रेप का इल्ज़ाम लगा था ना तुम पर उसके पिछे और किसी का हाथ नही, बल्कि मेरा ही हाथ था. अब तुम दोनो सोच रहे होगे कि आख़िर ये सब मैने क्यों किया... कैसे किया"

"इट'स ऑल अबाउट "दा सेक्स गेम" बेबी.... और सब इसी गेम के शिकार है यहाँ"....

ये कहानी तब की है जब शम्शेर शहर आया था. गाँव की ज़िंदगी को अलविदा कह कर सहर मे अपना बड़ा नाम करने. किसी भी बिज़्नेस के लिए एक तन्द्रुस्त दिमाग़ और पैसे की ज़रूरत होती है, और शम्शेर के पास दोनो था.

और उसी वक़्त बना था ये एस.एस ग्रूप ऑफ कंपनीज़. अजीब सी कहानी रही है इस कंपनी की. शुरू से उलझी सी. शम्शेर के पिता और उसके 3 दोस्त. प्रॉपर्टी बेचते वक़्त शम्शेर के पिता ने अपने दोस्तों की भी प्रॉपर्टी बिकवा दिया और हो गये इस ग्रूप के 4 पार्ट्नर.

शम्शेर चालाक था, उसने शुरू से ही कंपनी की पूरी कमान अपने हाथ मे रखी और उसका हुकुम मानो पत्थर की लकीर. एस.एस ग्रूप उम्मीद से बढ़ कर तरक्की कर रही थी, और इसका पूरा क्रेडिट जाता था शम्शेर को.

ज़िंदगी भी कितनी अजीब है. मैं, काव्या मेहरा, भिखारियों के घर पैदा हुई. सपनो की उड़ान उँची पर सब कमीने उस उड़ान को रोकने की तक मे रहते. लेकिन मैने भी अपना घर सिर्फ़ इसलिए नही छोड़ा कि मैं हार जाऊ. आइ हॅड टू विन अट एनी कॉस्ट.

काव्या रॉड्स टू हर ड्रीम.....

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साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
फ्लेशबॅक ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

देल्ही की एक शाम, काव्या अपने चचेरे भाई के रूम पर आ धमकी......... सोमिल मेहरा एक कॉलेज स्टूडेंट था और देल्ही मे ही फ्लॅट ले कर रहता था. किस्मत भी कितनी अजीब थी, जिस वक़्त काव्या, सोमिल के घर पहुँची, उसका खास दोस्त यानी कि हर्षवर्धन भी वहाँ बैठ कर सिगरेट पी रहा था.....

सोमिल.... यार उस नयी लड़की को देखा, कैसी पटाखा लग रही थी... कसम से मेरा ईमान डोल गया....

हर्ष.... हरी-भरी जवानी है वो पूरी.... साला तू तो प्ले बॉय है, खाएगा उसे... कुछ मेरे लिए भी तो छोड़ दे....

"उक्खुउऊउ... उखुऊऊुउउ" गले से खाँसी निकालती हुई काव्या रूम के अंदर पहुँची. काव्या को देख कर सोमिल हड़बड़ा कर सिगरेट को पिछे बुझा दिया, और हर्ष बड़े गौर से काव्या को ही निहारे जा रहा था.... "ये कौन सी नयी चिड़िया फसा ली क्या सोमिल ने"

हर्ष, ललचाई हुई नज़रों से देखते हुए..... "ये कौन है"

सोमिल, धीमे से बुदबुदाते..... "साले वो मेरी कज़िन है"........... काव्या इस से मिलो, ये है मेरा दोस्त हर्षवर्धन मूलचंदानी, और हर्ष ये है मेरी कज़िन काव्या.

दोनो मे "हाई-हेलो" हुआ फिर सोमिल...... "काव्या यहाँ अचानक देल्ही कैसे आना हुआ".

काव्या..... भैया अकेली घर पर क्या करती. करनाल मे तो कोई काम भी नही था, इसलिए यहाँ देल्ही आ गयी, सोचा अपने दम पर कुछ करूँ.

सोमिल.... और तू अपने दम पर क्या करने का सोच कर आई है. किस ने कहा तुम से कि काम करो. चलो लौट जाओ वापस.

काव्या..... हुह !!! आप मुझे अपने पास नही रख सकते तो कोई बात नही, मैं कहीं और चली जाउन्गी, लेकिन मैं यहाँ कुछ करने के इरादे से आई हूँ और कुछ बन कर ही रहूंगी....

सोमिल फिर भी काव्या को जाने के लिए बोलता रहा, इसी बीच हर्षवर्धन इन के बीच बोलने लगा...... "सोमिल किसी की महत्वकांक्षा को ऐसे नही रोकते. तुझ मे ये ऑर्तोडॉक्स वाली फीलिंग कब से आ गयी. वैसे आप मिस काव्या कुछ सोचा है, क्या करना है आप को.

काव्या..... काम क्या करना है वो तो सोचा नही है, पर भले काम मुझे छोटा से शुरू करना पड़े, लेकिन एक दिन मैं उस जगह के टॉप पोज़िशन पर पहुँच कर रहूंगी.

हर्ष.... दट'स नाइस. आइ लाइक युवर कॉन्फिडेन्स. आप जैसे आगे बढ़ने वालों की ही ज़रूरत है मेरी कंपनी मे. ये है हमारे ऑफीस का कार्ड, कल सुबह आप ऑफीस पहुँच जाना इंटरव्यू के लिए.

काव्या.... यहीं पर आप इंटरव्यू ले लो ना, पास हुई तो कल से सीधा जाय्न कर लूँगी.

सोमिल..... जी नही, ये अपनी कंपनी मे कुछ भी नही. ये बस ज़रिया है और तुम्हारी इंटरव्यू इसके पापा लेंगे......

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नेक्स्ट डे मॉर्निंग.....

काव्या एक आलीशान ऑफीस के वेटिंग लाउंज मे इंतजार कर रही थी. टॉप पोज़ीशन पर पहुचने की इक्षा तो कल ही जाहिर कर चुकी थी, अभी इस ऑफीस को देख कर बस यही सोच रही थी कि एक दिन ये पूरा ऑफीस और ये पूरा स्टाफ उसी के लिए काम करेगा.....

एमडी ऑफीस का कॉल और काव्या को अंदर बुलाया जाता है. शम्शेर के लिए ये पहला ऐसा मौका था, जब वो किसी लड़की से इतना प्रभावित हुआ था. पर्सनल अस्सिटेंट, यानी पी.ए की नौकरी पक्की हो गयी थी, और काव्या काम सीखने मे लग गयी.

भले ही काव्या को काम सीखने मे समय लग गया हो, पर वहाँ के महॉल को मुट्ठी मे करने मे टाइम ना लगा. इतनी प्रचंड थी वो ऑफीस मे, कि हर कोई उसके नाम से थर्रा जाता. ऐसा लग रहा था पूरे ऑफीस पर उसने अपना कब्जा जमाया हुआ हो.

काव्या की नज़र अब एक नौकर से मालिक बन'ने की ताक मे थी. इसलिए जब भी उसे मौका मिलता हर्षवर्धन पर डोरे डालने लगती. लेकिन इन सब से परे हर्षवर्धन ने कभी काव्या के उपर ध्यान नही दिया, क्योंकि वो अमृता से प्यार करता था और काव्या ठहरी उसके सब से खास दोस्त की बहन.

काव्या का दिमाग़ तब चटक गया जब उसे हर्षवर्धन और अमृता की शादी की खबर मिली. काव्या के सारे अरमान जैसे हवा हो गये हो. मालकिन बन'ने का सपना जैसे चूर-चूर हो गया हो.

लेकिन काव्या तो काव्या थी. बहुत ही दूर दृष्टि और संयम से काम लेने वाली. काव्या इस शादी को टाल नही सकती थी क्योंकि अमृता की शादी से ना केवल दो परिवार आपस मे जुड़ रहे थे, बल्कि दो उद्योगपति भी आपस मे अपने इंडस्ट्री को जोड़ रहे थे.

हां लेकिन काव्या की मशा बिल्कुल छिपि हुई थी, और पूरे सुचारू रूप से काम कर रही थी. शादी से कुछ दिन पहले हे काव्या ने ऐसा चक्कर चलाया कि हर्षवर्धन शादी के महज 2 दिन बाद विदेश रवाना हो गया.

इधर काव्या ऑफीस मे धीरे-धीरे अपना सिकंजा शम्शेर पर कसने लगी. गले लग जाना, शम्शेर से चिपकना और उसे इनडाइरेक्ट सिड्यूस करना शुरू हो चुका था. पहले-पहले तो शम्शेर इन सारी बातों को अनदेखा करता रहा, लेकिन एक कौतूहल मन उसका भी था जो एक लड़की के स्पर्श पर कर मचल जाता.

यदि सिर्फ़ शम्शेर के बदन मे काव्या के हाथ पाँव लगते तो बात अलग थी, पर काव्या जब भी शम्शेर के गले लगती, अपने स्तनों को ऐसे उसके सीने से चिपकाती, कि शम्शेर के अहसास जाग जाते थे. और जब वो गले लग कर हट'ती, तो उसकी कातिल सी अदा शम्शेर को घायल कर जाती.

वक़्त के साथ शम्शेर का झुकाव भी धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था. यूँ तो वो काबू मे ही रहता था, पर अंदर से वो पूरा बेकाबू था. काव्या, शम्शेर को पूरी तरह . रही थी और शम्शेर पूरी तरह तड़प रहा था.

काव्या का पूरा जाल बिच्छ चुका था, और बस अब उस मे शम्शेर के फँसने की बारी थी. काव्या बड़े ही शातिराना तरीके से . बाँधे बस शम्शेर के फँसने का इंतज़ार कर रही थी. शायद वक़्त भी उस के साथ था, और मौका भी हाथ लग गया.

उस वक्त अमृता के गर्भ मे उसका पहला बच्चा पल रहा था, जिसके जन्म पर शम्शेर खुशियाँ मना रहा था. सारे ऑफीस स्टाफ की दो दिन की छुट्टी थी, और जश्न का महॉल. उसी दौरान मुंबई की एक पार्टी का अर्जेंट डील फस गया. कांट्रॅक्ट साइन करना ज़रूरी था और सारे लोग छुट्टी पर, अंत मे शम्शेर के साथ काव्या गयी उस मीटिंग को अटेंड करने.

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