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हंग्री वुल्फ गेम (इंसान या भूखे भेड़िए ) complete

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मनु.... दादू, मुझे पूरी कहानी पता चल गया. कैसे उस ने आप को फसाया, और सारी साजिशे रची. साज़िश एक सेक्स गेम की, और उसके बाद सब की ज़िंदगी उलझ सी गयी.

मनु की बात सुन कर सभी लोग उसे हैरानी से देखने लगे, और शम्शेर ने अपना सिर नीचे झुका लिया. तब अतीत के उस गहरे राज को मनु ने खोला, जिस के बारे मे अब तक किसी को पता भी था. सब लोगों के लिए ये बड़ा हे हैरानी का विषय था.

इस शॉकिंग भरे राज के खुलासे से सब का ध्यान हटाते हुए, शम्शेर ने एक बार फिर मनु से पूछा....... "मनु ये सारा प्लान तुम ने ही बनाया था, क्या किसी लूप से हम अपनी प्रॉपर्टी वापस ले सकते हैं"....

मनु.... दादू मैं तो केवल पिच्छले 6 मंत से प्लान कर रहा हूँ, और उसकी प्लॅनिंग तो 25 साल से भी पुरानी है. आप को क्या लगता है कोई लूप होगा भी तो वो क्या सारी प्रॉपर्टी जाने देगी.... हां पर आप सब कोर्ट मे एक केस फाइल कर सकते हैं, जिसमे पजेशन ये होगा कि, यदि एमडी मनु फ्रॉड था तो उसका सारा लिया डिसीजन भी फ्रॉड माना जाएगा......

मनु की ये बात तो जैसे अंधेरे मे किरण फैलने जैसा था..... मनु अपनी बात कह कर मानस के साथ वहाँ से चला गया. इधर सभी लोगों ने एक अच्छा सा आड्वोकेट हायर करते हुए कोर्ट मे केस फाइल किया. लेकिन सुनवाई के वक़्त जब आया तो सब के सब हैरान रह गये.

काव्या के वॅकिल ने दलील पेश किया कि, "यदि सारे डिसीजन उस फ्रॉड मनु के होते तो बेसक सारे फ़ैसले को निरस्त किया जाए. पर सारे अतॉरिटी सिग्नेचर ओरजिनल मनु ने किया था.... जिस पर कंपनी के चेर्मन मिस्टर. शमशेर के फाइनल सिग्नेचर हैं. इसलिए ये पूरी कंपनी क़ानूनन काव्या मूलचंदानी की है"

काव्या तो पहली ही सुनवाई मे केस जीत गयी.... केस हारने के बाद सब लोग एक बार फिर नताली के घर मे इकट्ठा हुए. शम्शेर सब के सामने हाथ जोड़ कर कहने लगा.....

"मैने बिज़्नेस मे हमेशा दिमाग़ लगाया. कॉंपिटिटर की हर चाल का बखूबी जबाव दिया, लेकिन एक फ्रॉड के दिमाग़ को पढ़ नही पाया, जिस की वजह से आज आप सब को ये दिन देखना पड़ रहा है. पैसा और पॉवेर अब उनके हाथ मे है... इसलिए मेरी एक राई है कि पुरानी बातों को एक ख़तम कहानी मान कर भूल जएए और आप सब एक नयी शुरुआत कीजिए".

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साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
3 दिन बाद .... मूलचंदानी हाउस.....

"भंवरे ने खिलाया फूल, फूल तो ले गया राज कुंवर

भंवरे तू कहना ना भूल, फूल तेरा हो गया इधर उधर"

"व्हाट रब्बिश यू आर सिंगिंग, गार्ड, वॉचमन... सब कहाँ मर गये. धक्के मार कर बाहर निकालो कोई इस कमीने को. हरामजादे तुझ से कही थी ना, दोबारा यहाँ नही दिखना"..... मनु को हॉल मे ज़ोर-ज़ोर से गाते सुन काव्या बाहर आई, और गुस्से मे तमतमाते हुए कहने लगी......

मनु.... सॉरी काव्या जी, यहाँ कोई नही आने वाला. वो क्या है ना सब को मार कर लिटा दिया हूँ बाहर ही...

"क्या, सब को मार कर ज़बरदस्ती घुस आए"..... काव्या गुस्से मे तमतमाती अपने कमरे मे गयी, और गन निकल कर बाहर आई..... "तुझे क्या लगता है, तू यहाँ आएगा, गाना गा कर डराएगा तो मैं डर जाउन्गी. काव्या नाम है मेरा, यहाँ तक पहुँचने के लिए मैने बहुत से पापड बेले हैं. कुत्ते के पिल्ले अब भाग यहाँ से वरना लाश नही मिलेगी तेरी"

मनु.... क्या कह रही हो काव्या, तुम्हे नोटीस नही मिला क्या... ये सारी प्रॉपर्टी वापस मेरे पास चली आई है.

काव्या.... व्हाट, कुत्ते के बच्चे, अपनी गंदी नज़र भी ना डालना मेरी प्रॉपर्टी पर...

मनु..... तेरी बीप की बीप.... वैसे गाली देने का ये स्टाइल कितना प्यारा है ना, थॅंक्स बच्चन सर. अब कान खोल कर सुन ले, जिस जगह पर तू खड़ी है वो अब मेरी जगह है. हां !! लेकिन मैं तुम्हे यहाँ से निकलने को नही कहूँगा. जानती है क्यों, क्योंकि इस घर मे बहुत सी काम वाली बाई की ज़रूरत है.

इतने मे काव्या का बड़ा बेटा उपर से चिल्लाने लगा.... "मोम खड़ी बकवास क्या सुन रही हो, गोली मारो साले को, बाकी हम देख लेंगे".......

"धीचक्योंन्नननननननननननननणणन्" गोली की एक राउंड फाइयर, लेकिन अखिल तब तक काव्या का हाथ उपर हवा मे कर चुका था....

अखिल.... मनु ये सीन फिल्मी हो गया ना, ऐन मौके पर मैने अपने दोस्त की जान बचाई......

मनु.... लव यू..... तू तो मेरा भाई है....

काव्या..... एस.पी, ये तुम्हारा दोस्त है इसका ये मतलब नही कि ये कुछ भी करे और तुम इसका सपोर्ट करो... अरेस्ट दिस बास्टर्ड राइट नाउ.

अखिल.... वाह-वा, वाह-वा, वाह-वा.... मेडम आप की तीखी ज़ुबान कितनी प्यारी है. बड़े शौक से इसे अरेस्ट करूँगा मेडम आप तो जल्दी से एफआइआर लिखवाओ. ना जाने कब से मैं इसे अरेस्ट करने को बेताब हूँ.....

 
काव्या.... हां तो लिखो फिर....

अखिल.... वर्मा जी, एफआइ आर की एक रेजिस्टर दो... हां आप बोलिए मेडम....

काव्या.... ये कमीना फ़ारूद नकली मनु, मेरे घर मे ज़बरदस्ती घुस आया, और मुझ पर जानलेवा हमला किया.... साले पर हाफ मर्डर लगा कर सड़ा दो जैल मे.....

अखिल...... रुकिये, रुकिये... एक मिनट, यहाँ एक छोटा सा क्लरिफिकेशन है....

काव्या.... क्या, बोलो...

अखिल...... आप जो कंप्लेंट लिखा रही हैं, वो तो मनु ने पहले ही आप के खिलाफ लिखवा दिया. हमला के गवाह हम हैं, और आप इसकी प्रॉपर्टी पर खड़ी हैं....

काव्या..... स्टॉप ट्राइ टू मनिपुलेट, कोई भी फ्रॉड इतनी आसानी से मेरी प्रॉपर्टी पर कब्जा नही जमा सकता. और ये बताओ एस.पी कि जब इस फ्रॉड ने कुछ बोला ही नही तो फिर क्या भगवान लिख कर गये, स्टॉप फेव्रिंग हिम.

अखिल..... आप के दूसरे सवाल का जबाव ये है मेडम, कि जब आप ने मनु पर गन तान दी, मैने तभी एफआइआर लिख दिया, अब दोस्त है तो इतना फेवर तो करना ही पड़ेगा. और रहा सवाल कि ये प्रॉपर्टी किस की है तो.... वर्मा जी पेपर दो मेडम जी को....

वर्मा ने उसे पेपर दे दिया. काव्या उस पेपर को देख कर..... "व्हाट, ये मेरा अरेस्ट वार्रेंट क्यों लाए हो".

अखिल.... वर्मा जी, क्या काव्या मेडम का आरेस्ट वार्रेंट भी था हमारे पास....

वर्मा .... हां सर.....

अखिल..... तो पहले बताना था ना. कब से इसे खुला छोड़ रखा है, आरेस्ट करो....

काव्या.... अरेस्ट और मुझे. तुम सब जानते भी हो कि मेरी पहुँच कहाँ तक है. 2 मिनट और तुम सब की वर्दी उतर जाएगी.

अखिल..... अब आप की पहुँच जहाँ तक भी हो, रुकवा सकती हैं तो अपना अरेस्ट रुकवा लीजिए. फिलहाल तो इस वार्रेंट के हिसाब से आप को और आप के बेटों को थाने चलना ही होगा.

मनु..... रुक जा अखिल अभी नही, अभी मेडम का चेहरा नही देख रहा, कितना कन्फ्यूज़ हैं. ज़रा इनके कन्फ्यूषन को भी दूर कर दिया जाए. पार्थ भाई, अब क्या आप बुलाने पर एंट्री मारोगे. आ भी जाओ...

पार्थ अपने साथ परिवहन मंत्री और अग्रॉ शिप्पिंग के ओनर को ले कर हॉल मे पहुँचा. काव्या और उसके बेटे उन सब को देख कर हैरान रह गये. उनके पाँव तले से जैसे ज़मीन ही खिसक गयी हो.... फिर भी काव्या खुद हिम्मत से काम लेती हुई कहने लगी..... "इन सब को मेरे सामने ला कर भी कुछ साबित नही कर पाओगे. ये घर, ऑफीस सारी प्रॉपर्टी मेरी है और मेरी ही रहेगी"

मनु.... अखिल सब को हड़कड़ी पहना कर बिठाओ. इन मेडम ने 3 दिन पहले मेरे कुछ डाउट क्लियर किए थे, आज मैं इनके डाउट क्लियर कर देता हूँ. इन्हे लगता था ये अपने पार्ट्नर्स का नाम नही लेगी तो हमे पता नही चलेगा. अब ज़रा कहानी एक्सप्लेन करने दो, कहीं ससपेन्स मे मर गयी तो इसकी भटकती आत्मा भूत बन कर हमे ही परेशान करेगी.

अखिल, मनु की बात मानते हुए काव्या और उसके बेटों के हाथ मे हथकड़ी पहना कर हॉल मे बिठा दिया. मनु मुस्कुराते हुए अपनी बात रखना शुरू किया.......

 
"काव्या जी, कभी-कभी एक पर्फेक्ट प्लान पर संयोग काफ़ी भारी पड़ता है. हमारे लिए वो संयोग था पार्थ का मिलना. ओह हां आप को तो पार्थ से इंट्रोड्यूस करवाना ही भूल गया, ये वो सीबीआइ ऑफीसर हैं जो संयोग से, अग्रॉ शिप्पिंग के आड़ मे चल रहे अवैध हथियार तस्करी का केस देख रहे थे"

"संयोग ऐसा कि अग्रॉ शिप्पिंग की छानबीन करते हुए, पार्थ और नताली मिल गये और फिर तो कमाल होता चला गया. पहले तुम लोगों का सरपरस्त वो परिवहन मंत्री गया, फिर सिकंजा कसना शुरू हुआ अग्रॉ कंपनी के ओनर के उपर".

"क्या संयोग था ये भी, अग्रॉ शिप्पिंग के ओनर, यानी कि तुम्हारा वो छिपा हुआ पार्ट्नर जब अरेस्ट हुआ तो सारे राज बाहर आ गये. क्या बात है काव्या हॅट्स ऑफ, मान'ना पड़ेगा जीत के लिए तुम किस हद तक गिरी. तुम्हे क्या लगा तुम अचानक से हमारे सामने आई तब हमे पता चला कि तुम जिंदा हो".

"हा हा हा, वो क्या है ना मेडम जी, जीतने वाला जीत की खुशी मे अपने होश खो देता है और वही ग़लती हो गयी तुम से. तुम जिंदा हुई नही करवाई गयी हो. लगता है मेडम अब भी कन्फ्यूज़ हैं, समझ नही पा रही कि आख़िर उस के साथ ये सब हो क्या रहा है".

पार्थ....... मैं अच्छे से समझा देता हूँ.....

"अग्रॉ शिप्पिंग के ओनर के पकड़े जाने के बाद मेरे लिए ये केस क्लोज़ था. अग्रॉ शिप्पिंग के ओनर को अरेस्ट करते ही, हमे लगा हम ने केस सॉल्व कर लिया. लेकिन उस बार-बोले ने अपनी होशियारी मे सिर्फ़ इतना ही कहा कि..... "तुम क्या समझते हो, केवल अग्रॉ शिप्पिंग ही स्मगल करेगी. अब तो ये सारा काम एस.एस शिप्पिंग कॉर्पोरेशन से होगा". फिर वही जो बाकी के टॉप क्रिमिनल्स का जबाव होता है....

"ज़्यादा देर इन जैल की सलाखों के पिछे नही रख पाओगे.... ब्ला-ब्ला-ब्ला"

"केस तो क्लोज़ ही था, पर उसकी बातों से मुझे लगा कि थोड़ी छानबीन और करनी चाहिए, इसलिए केस क्लोज़ नही किया. उस की बात मे दम था, संभावनाएँ थी कि शिप्पिंग की आड़ मे स्मग्ल्लिंग हो, पर एस.एस ग्रूप से. बात थोड़ी अजीब थी. जिस विस्वास से उसने एस.एस शिप्पिंग का नाम लिया मेरे शक की सुई घूम गयी. और फिर इसी संयोग से हमारे आगे का काम शुरू हुआ".

हमने हर बारीकियों पर नज़र रखी, हमने हर पहलुओं पर गौर किया, लेकिन एस.एस शिप्पिंग कंपनी मे कोई ऐसा नही था जो इस एल्लिगल काम को अंजाम दे. खैर हमे लगा वो आदमी गुमराह करने के लिए सिर्फ़ हमे बहला रहा है. मैने केस क्लोज़ कर दिया.

पर काव्या तुम्हारी किस्मत. मैं फ्री बैठा था और तभी मानस पर दीवान के खून का इल्ज़ाम लग गया. मुझे लगा चलो फ्री हूँ तो थोड़ा ये केस भी देख लूँ. जब भी नताली मुझे मनु और मानस के अतीत के बारे मे बताती, मुझे बहुत क्यूरीयासिटी होती..... "आख़िर उस रात इन सब के साथ, हुआ क्या था".

एक जिग्यासा के साथ मैं दीवान मर्डर केस मे इन्वॉल्व हुआ, आंड गेस व्हाट वहाँ मुझे क्या मिल गया. दीवान के कॉल डीटेल मे शिप्पिंग यूनिट के सीईओ नेगी और मनु के नौकर श्रमण का नंबर. हैरानी वाली बात ये थी कि आख़िर ये दोनो उस आदमी के कॉंटॅक्ट मे कैसे रह सकते हैं, जिसका कॉंटॅक्ट ढूँढने के लिए मानस दिन रात एक किए है.....

बस फिर क्या था मेडम, शक का कीड़ा तो हमारे दिमाग़ मे ट्रनिंग के पहले दिन से ही डाल दिया जाता है. दीवान उस वक़्त मरा, जिस वक़्त वो मानस को उस रात की कहानी बताने वाला था... बीती हुई एक ऐसी रात की कहानी जिस मे काव्या मरी थी, और मानस पर रेप का इल्ज़ाम लगा था.

 
यानी दीवान सारी बात जानता था. अब कौन होगा ऐसा जो मनु के घर और ऑफीस मे अपने जासूस लगाए हो, और वो जो कोई भी था, नही चाहता कि उस रात का राज बाहर आए. काव्या जी, आप ने इतना बड़ा गेम प्लान किया था कि हमारे पास सवालों की लंबी लिस्ट थी और शक़ के दायरे मे पूरा एस.एस ग्रूप. लेकिन एक बार भी शक़ आप पर नही गया.....

एक सल्यूट तो बनता है काव्या इस गेम प्लॅनिंग के लिए. क्या दिमाग़ पाया है. जब तुम्हे लगा कि पोलीस दीवान की मौत का पता लगाते हुए नेगी और श्रमण तक पहुँच जाएगी, तुम ने तो सारे शक़ की सुई को हर्षवर्धन और अमृता पर ही घुमा दिया.

"क्या दिमाग़ पाया है, हां.... कमाल बिल्कुल. किसी को ना यकीन करने की कोई वजह ही नही दी, ऐसा खेल रचा जिस मे पूरा शक़ हर्षवर्धन और अमृता के उपर ही जाए. यहाँ तक कि मनु और स्नेहा का वीडियो भी तुम्हारे इशारे पर ही लीक हुआ.... ब्रावो"...

"अब तुम्हारे दिमाग़ मे ये आ रहा होगा कि, कंप्लीट डेड एंड के बाद भी हमे तुम्हारा पता कैसे चला. ये भी एक और संयोग. हम पुख़्ता सबूत इकट्ठा कर रहे थे, इसलिए हमने दो लोगों पर गहराई से छानबीन किया, नेगी और श्रमण...

"श्रमण तो खैर किसी काम का ही नही था. उसे तो बस इतना पता था, कि किसी ने काम कहा और उसे पूरा करना है, बदले मे उसे पैसे मिलेंगे. हालाँकि, नेगी को भी इतनी ही खबर रहती थी, लेकिन अतीत का उसके एक किए कांड ने धीरे-धीरे सारे राज खोल डाले"....

"गूव्ट. शिप्पिंग टेंडर, और नेगी का वो टेंडर लीक, जिसका सीधा फ़ायदा अग्रॉ शिप्पिंग का हुआ और वो टेंडर उसे मिल गया. हमारी कड़ियाँ लिंक हो चुकी थी. अग्रॉ शिप्पिंग के एल्लिगल धंधे मे कोई एस.एस ग्रूप का भी कोई असोसिएट शामिल है".

"अब यहाँ आ कर गुत्थी उलझी थोड़ी सी. क्योंकि जिस वक़्त वो टेंडर लीक हुआ था... हर्षवर्धन विदेश मे था और अमृता को ऑफीस से कोई मतलब ही नही. बस फिर क्या था, हमारे सोचने का नज़रिया थोड़ा चेंज हुआ, हमे लगा कि मनु और मानस की हालत के पिछे कोई तीसरा भी है, जिसने बाद मे हर्षवर्धन और अमृता को अपनी ओर मिलाया होगा".

"फिर क्या था, उस वक़्त के पुराने पन्ने हमने पलटना शुरू किया. और कमाल की बात ये थी, कंपनी से रिलेटेड हर इश्यू मे केवल एक ही नाम सामने आया, और वो था काव्या.... काव्या, काव्या, काव्या..... आख़िर ये काव्या चीज़ क्या थी".....

"फिर क्या था हमने काव्या के अतीत को भी छान डाला. समझ मे आ चुका था कि क्यों हर्षवर्धन और अमृता नफ़रत करते थे मनु और मानस से. लेकिन दोनो को देख कर लगता नही था कि ये दोनो रेप जैसी भी प्लॅनिंग कर सकते हैं. उपर से काव्या जैसा नाम सुसाइड कर ले, उफफफफ्फ़ बात कुछ हजम नही हुई"...

 
"हम फिर पहुँचे उस जगह जहाँ से ये सारा फ़साद शुरू हुआ था. 18 सेप्तेम्बर 1994, मनाली का वो एक घर, जहाँ पर मानस के उपर रेप का इल्ज़ाम लगा था. पोलीस के फाइल मे कुछ तो होगा जो हमारे काम का हो. 18 सेप्तेम्बर 1994 के सारे केस की फाइल हमने मँगवाया. मानस का केस तो था, पर वहाँ कविया के सुसाइड का कोई ज़िक्र नही था. कमाल है ना काव्या के सुसाइड की रिपोर्ट कहीं नही".

"सारी फाइल देखते-देखते हमारी नज़र एक क्लोज़ केस फाइल पर गयी, जिसमे हथियारों की तस्करी के लिए पोलीस ने जाल बिच्छाया था, जिस मे भागते हुए अपराधियों की वॅन का आक्सिडेंट हो गया और सभी मारे गये. कमाल की बात ये थी कि हादसे मे मरने वालों की लिस्ट मे एक लड़की का हुलिया और काव्या का हुलिया, लगभग सेम था. बस दोनो ही फाइल मे कोई तस्वीर नही थी".

"इंटरेस्टिंग, काव्या से जुड़ा एक और नया राज शायद हमारे हाथ लगा था. आर्म्स डीलिंग रोकने और अपराधियों को पकड़ने वाली टीम के ऑफीसर इंचार्ज से मैं मिला... उस ऑफीसर का कहना था कि, जिस वक़्त वो लोग रेड करने मौका-ए-वारदात पर पहुँचे, पोलीस के आक्षन से पहले ही उसके पास वाले घर से एक बाप और बेटी निकली जो आक्षन ले रही पोलीस के सामने खड़े हो कर रेप-रेप चिल्ला रहे थे"....

"पोलीस की टुकड़ी आगे बढ़ नही पाई और मौका देख कर वहाँ से सारे अपराधी फरार होने लगे... लेकिन पोलीस ने भी उनका पिच्छा नही छोड़ा... पिच्छा करते हुए उनकी वॅन का आक्सिडेंट हो गया और वो गहरी खाई मे गिर गये. अगले दिन हमने वहाँ से 7 जाली हुई लाशों की शिनाख्त की, जिस मे 2 फीमेल और 5 मेल थे. हमारी इन्फ़ॉर्मेशन के मुताबिक इतने ही लोग वहाँ होने चाहिए थे"....

"वूव्वववव !!!! ये थे असली कहानी मे ट्विस्ट. रेप का इल्ज़ाम मानस पर सिर्फ़ इसलिए लगा ताकि काव्या वहाँ से भाग सके. एक बार यदि वो पोलीस के हत्थे चढ़ जाती, फिर तो एस.एस ग्रूप भी गया और साथ मे जैल वो अलग से. अब जब इतनी शातिर अपराधी से हमारा पाला पड़ा हो, फिर वो भला मर कैसे सकती है. उपर से सुसाइड तो काव्या ने किया, पर क़ानूनन कोई ज़िक्र नही. मतलब सॉफ था, किसी भी वक़्त कोई भी बहाना कर के काव्या वापसी कर सकती थी".......

"अब जब यकीन हो गया कि काव्या जिंदा है तो बस अब हमे काव्या है कहाँ वो पता लगाना था. अब तो सारी कड़ी जुड़ी हुई थी, और काव्या का पता उसका पार्ट्नर तो ज़रूर जानता होगा.... फिर हमने अग्रॉ शिप्पिंग के ओनर का टूर प्रोग्राम डीटेल निकाला... और कमाल की बात ये थी काव्या हमे घाना मे मिल गयी, एक ड्रग डीलर के रूप मे, जो एक अच्छी ज़िंदगी जी रही थी".

"घाना मे हमारे लिए कोई सर्प्राइज़ नही था, बस हमे ये पता लगाना था कि जब काव्या इंडिया मे वापसी का रास्ता छोड़ कर आई थी, फिर वजह क्या थी उसे घाना मे इतने अरसे तक रुकने की. थोड़े दिन सर्व्लेन्स के बाद पता चला, काव्या घाना मे अपनी लाइफ पूरा एंजाय कर रही थी और बस इंतज़ार कर रही थी कि कब मनु सारी प्रॉपर्टी अपने नाम करवा ले.

"घाना मे ही हमे पता चल चुका था कि मनु और मानस तो असली यहाँ है, और कमाल की बात ये थी कि दोनो हू बहू वैसे ही सिग्नेचर करते थे जैसे यहाँ इंडिया मे ये दोनो भाई. असली और नकली का फ़ैसला करने के लिए हम ने इन दोनो भाई का डीयेने सॅंपल भी लिया..... एक डीयेने शम्शेर और दूसरी डीयेने हर्षवर्धन से मॅच कर गयी. काव्या का पूरा प्लान बिल्कुल क्लियर हो गया था".

"घाना मे अब हमारा क्या काम था. काव्या जी तो लौट कर ही आ रही थी. बस अब हमे काव्या के आने का स्वागत करना था. स्वागत का पहला चरण ये था कि सारी प्रॉपर्टी काव्या को दे कर भी ना दिया जाए, और दूसरी कि जब तक काव्या पहुँचे, उस के खिलाफ पुख़्ता सबूत तैयार हो.

"काव्या के खिलाफ तो अग्रॉ शिप्पिंग का ओनर ही सबूत था, अब बची प्रॉपर्टी, जिस के लालच मे काव्या इंडिया आती. मैने तुरंत नताली को इन्फर्मेशन दिया कि उसे अब आगे क्या करना है... उम्म्म्महह, नताली ... मेरी गर्लफ्रेंड... कमाल ही कर दिया उसने तो. मनु लगता है ये बिज़्नेस की भाषा तुम ही काव्या को समझा सकते हो... क्लियर कर दो कि इसकी प्रॉपर्टी कैसे इसकी नही".....

 
मनु..... छोड़ ना पार्थ, तुम और नताली तो पहुँचे खिलाड़ी निकले. साला बिना मेरी जानकारी के लगभग सारी संपत्ति अपने नाम कर ही चुके थे.

पार्थ..... लेकिन तुम्हारे बिना संभव तो नही था ना मनु. हां हम ने सारे पेपर्स तैयार कर के रखे ज़रूर थे, पर उन पेपर्स पर शम्शेर जी के सिग्नेचर ना होते तो किस काम के वो पेपर्स होते. अब भी वही बात कह रहे हो यार मनु, जब कि तुम जानते हो यदि हमारा धोका देने का भी इरादा होता तो हम नही दे पाते....

मनु.... हां सो तो है... खैर रुक जाओ पार्थ, बेचारी की मेहनत पर जो पानी फिरा उसका फाइनल चेप्टर तो बता दूं.....

"सुनो काव्या, मुझे जब बात पता चली, तब मेरे पाँव तले से ज़मीन खिसक गयी. मुझे खुद से नफ़रत होने लगी, क्योंकि मैं ग़लत के लिए लड़ रहा था, और दूसरों की संपत्ति अपने नाम करने जा रहा था. समस्या जानती हो कहाँ हो गयी, यदि सब को सच बता दिया तो तुम हाथ नही आओगी, और बिना जानकारी के हमे सारी संपत्ति ट्रान्स्फर करनी थी".....

"नताली कमाल की प्लॅनर निकली. क्या कांट्रॅक्ट था वो, 5 दिन मे 45 गॅलेन नाइट्रिक आसिड के सप्लाइ मे चाहिए थे, यदि फैल हुए तो पॅनाल्टी मे मनु के पूरी कंपनी नताली की केमिकल फॅक्टरी के नाम. दादू से कैसे सिग्नेचर लेना है वो मैं जानता था, और भला मुझे क्या ऐतराज़ होता सिग्नेचर करने मे".

"वैसे इस कांट्रॅक्ट को तुम कॅन्सल भी करवा सकती थी, यदि तुम्हारा वॅकिल चिल्ला-चिल्ला कर ये ना कहता कि..... "जितने भी कांट्रॅक्ट हुए वो असली मनु के सिग्नेचर अतॉरिटी से हुए, जिस पर फाइनल मोहर शम्शेर ने लगाया था."...

"भाई अखिल, 25 साल की इसकी मेहनत के फल का फ़ायदा इसे दे दो.... वरना कहेगी कि इतनी मेहनत की हमे फ़ायदा नही मिला".....

अखिल काव्या और उस के बेटों को हथकड़ी पहनाने के साथ-साथ 10% कंपनी के सहरे वॅल्यू वाले बॉन्ड उसके हाथ मे थमा दिए... जिस मे ये लिखा था कि 10% कंपनी मे कभी उन्हे शेर नही मिलेगा, लेकिन सज़ा काट कर आने के बाद 10 दिनो के अंदर वो अपने शेर वॅल्यू को कॅश करा कर अपना हिस्सा ले जा सकते हैं.

कांट्रॅक्ट हाथ मे देख कर काव्या बड़ी हैरानी से मनु को देखने लगी.... मनु....

"बे ईमान नही हूँ, जो तुम्हारे बच्चों का हिस्सा खा जाउ. तुम ने जैसा उन्हे सिखाया उन दोनो ने वही सीखा, पर पैत्रिक संपत्ति पर उनका भी कुछ हक़ है इसलिए ये दे दिया"......

अखिल, काव्या और उसके बेटों को ले जा कर उसकी असली जगह जैल मे डाल दिया.... उसी दिन रात को फिर से महफ़िल जमी मूलचंदानी हाउस मे. मनु ने पहले ही सारे पेपर्स रेडी कर दिया था. एस.एस ग्रूप फिर से खड़ा था, सब को उतना ही हिस्सा जितना पहले था, बस मनु और मानस के 25% बराबर बँट गये पूरी कंपनी के स्टाफ मे.

बहुत ही आश्चर्य भरा पल था जब सब को ये पता चला कि, मनु ने प्रॉपर्टी का 1 रुपया भी नही लिया... चाहता तो सारी संपत्ति खुद रख सकता था, कोई कुछ बिगाड़ नही सकता था. लेकिन उसने ऐसा नही किया.... सारी संपाति उसके मालिकों के हवाले कर के दोनो भाई खाली हाथ चल दिए....

शम्शेर...... मनु, मानस... कहाँ जा रहे हो मेरे बच्चो. हम काव्या से कभी नही बच सकते थे यदि तुम दोनो ना होते.... लौट आओ और सम्भालो अपनी बागडोर. तुम से अच्छा कोई भी एस.एस ग्रूप नही चला सकता...

मनु......

"दादू, जो चीज़ हमारी नही, उसे हम कैसे ले ले. जब मनु और मानस की पहचान ही झूठी है तो फिर और क्या सच होगा. अभी तो पहले हमे अपना एक नाम और एक पहचान बनानी है. और हां जाते-जाते आप सब के लिए एक संदेश..... मुझे उन्ही काम की बेहतर जानकारी है, जिससे मैने एस.एस ग्रूप मे संभाला.... इसलिए बी रेडी फॉर कॉंपिटेशन... सी यू इन दा फील्ड"

एंड

समाप्त

दोस्तो ये कहानी यहीं समाप्त होती है ये कैसी लगी ये कहानी आपको ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

 
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