बुरी तरह घबराई हुई रुक्मणी देवा से चिपक जाती है वो रोये जा रही थी और देवा को उसकी जान बचाने के लिए शुक्रिया पे शुक्रिया कहती जा रही थी।
देवा;मालकिन चलिये घर चलते हैं।
रुक्मणी;देवा के साथ कार में जाके बैठ जाती है।
देवा अगर तुम आज वक़्त पर नहीं आते तो पता नहीं क्या हो जाता।
देवा;कुछ नहीं होता मालकिन आपको लगा होगा की मै कपडे लेने में वयस्त हो गया हूँ ।नही मालकिन आपकी जान मेरे लिए अपनी जान से भी ज़्यादा कीमती है।
ये भोलेपन में कहे गए शब्द रुक्मणी के दिल में हलचल मचाने के लिए काफी थे।
अब दोनों के बीच की ख़ामोशी ख़त्म हो चुकी थी और दोनों एक दूसरे से हँस हँस के बातें करने लगते है।
देवा;मालकिन एक बात पुछो।
रुक्मणी; पुछो।
देवा;आप डॉ के पास क्यों गई थी।?आपकी तबियत ख़राब है क्या ?
रत्ना; अब तुमसे क्या छुपाना देवा।
सच बात तो ये है की तुम्हारे मालिक मुझसे शादी करके फँस गए है मै उन्हें सन्तान का सुख नहीं दे सकती । देवा मुझ जैसे अभागन को कितने प्यार से रखते है तुम्हारे मालिक। तुम नहीं जानते वरना उनके जगह कोई और होता तो कबका मुझे छोड चूका होता।
रुक्मणी के चेहरे पे उदासी आ जाती है।
देवा;अरे मालकिन आप भी न ऐसे उदास उदास बिलकुल अच्छी नहीं लगती।
इन्सान को मरते दम तक हिम्मत नहीं छोड़नी थी।
जहां चाह वहां राह मिलते है मालकिन।
रुक्मणी;हम तुम बातें बहुत अच्छे करते हो देव।
देवा;मालकिन मेरी एक बात मानोगी आप।
रुक्मणी;हाँ ज़रूर बोलो क्या बात है।
देवा;मालकिन एक बार आप मेरे साथ उस दूसरी डॉ के पास चलेंगे। आपको पता है मेरी बहन को बहुत आराम मिला था वहाँ।।वो बार बार पेट में दर्द से तड़प उठती थी पर जबसे उस डॉ के पास से इलाज करवा के लाया हूँ उसका दर्द ग़ायब हो गया है।
बस मेरी खातिर एक बार आप उस डॉ के दवा लेके देख लीजिये।
कार से उतर कर रुक्मणी देवा को अंदर चल के चाय पीने के लिए कहती है।पर देवा जल्द से जल्द घर जाना चाहता था वो जो कपडे लाया था वो ममता और रत्ना को देना चाहता था।
देवा;मालकिन मै बाद में चाय पी लूँगा अभी मुझे घर जाना है उसके चेहरे की ख़ुशी रुक्मणी पढ़ लेती है वो देवा को जाने देती है और खुद हवेली के अंदर चली जाती है।
रानी;अपने रूम में अभी भी नंगी पडी हुए थी मालिश से उसका बदन और ज़्यादा अकड गया था । चूत की नसें उसे खींची खींची महसूस हो रही थी।
रुक्मणी; सीधा अपने कमरे में चले जाती है वो थकान महसूस कर रही थी। वो बिस्तर पे लेट जाती है।
बदन में थकान थी पर ऑखों में नींद दूर दूर तक नहीं थी । बार बार दिमाग में कुछ देर पहले हुए हादसा घूम रहा था । उसका दिल बार बार उसे एक ही बात याद दिला रहा था की अगर सही वक़्त पे देवा वहां नहीं आता तो पता नहीं क्या हो जाता।
वो अपनी ऑंखें बंद कर लेती है की तभी देवा का चेहरा उसके ऑंखों के सामने आ जाता है।
देवा;के वो शब्द अब भी रुक्मणी के कानो में गूंज रहे थे की मेरी जान से ज़्यादा मुझे आपकी जान प्यारी मालकिन।
रुक्मणी के चेहरे पे हलके से मुसकान आ जाती है।
आखीर जब कोई अपनी जान से ज़्यादा दूसरे की जान की परवाह करे तो ऐसे आदमी पे भला किसे प्यार नहीं आयेगा।
देवा;अपने घर की तरफ जा रहा था रास्ते में पदमा का घर पडता था।
वो अभी अभी नहा के आँगन में आई थी और अपने बाल सुखा रही थी।
की उसकी नज़र देवा पे पडती है वो फ़ौरन देवा को आवाज़ देती है।
देवा;मुस्कराता हुआ पदमा के बारामदे में आ जाता है।
देवा;क्या बात है काकी क्यों बुलाया मुझे।
पदमा;शहर से आ रहा है न तु।
देवा;हाँ अभी अभी लौटा हूँ बस घर ही जा रहा था।
पदमा;यहाँ आना कुछ देर मेरे पास बैठ।
देवा;नहीं काकी मै ज़रा जल्दी में हूँ।
पदमा;जल्दी तो मुझे भी है देवा। बस थोड़ी देर।
देवा; काकी मै बाद में आ जाऊंगा ।
अभी चलता हूँ ये कहके देवा जैसे ही घर की तरफ पैर आगे बढाता है।
पदमा;ज़ालिम अपनी पदमा को छोड के कहाँ जा रहा है ज़रा आम का रस तो पी ले।
देवा;के मुंह में बड़े बड़े आम देख के पानी तो आ रहा था पर घर जाने की जल्दी उसे बहुत थी। वो रत्ना और ममता के चेहरे देखना चाहता था जब वो अपने अपने कपडे देख के उछल पडेंगी।
पदमा;आगे बढ़ती है।
क्या हुआ देवा पेट भर गया या भूख नहीं है।
देवा;दोनों बातें नहीं है काकी आप बात समझ नहीं रही हो।
पदमा;देवा के हाथ में के कपडो के बैग खीच के एक तरफ रख देती है।
कबसे देख रही हूँ तू बडे नखरे कर रहा है ।
पहले तो लेने के लिए बड़ा उतावला हो रहा था अब देने वाली तैयार है तो तू सता रहा है।
देवा;पदमा को कुछ कहता उससे पहले पदमा देवा के ऊपर टूट पड़ती है और उसे घास पे अपने ऊपर गिरा देती है।
पदमा;देवा बहुत तड़प रही हूँ रे कुछ करता क्यों नहीं ये कैसी आग तूने बदन में लगा दिया है मेरे।जितना बुझाने की कोशिश करती हूँ भडकती जाती है। कुछ कर देवा अपनी पदमा को फिर से पीस दे अपने नीचे।
देवा;पदमा की ऑखों में उतरे नशे को देख चूका था। वो पदमा के ब्रैस्ट मसलता हुआ उसके होंठों पे अपने होंठ रख देता है और उसके नीचले होंठ को काटने लगता है। गलप्प गलप्प ........
पदमा;अपना हाथ नीचे की तरफ करके देवा के पेंट की ज़िप खोलने लगती है पर देवा उसका हाथ पकड़ लेता है।
देवा;नहीं अभी नहीं बाद में।
पदमा;बौखला जाती है और देवा को अपने ऊपर से धक्का दे देती है।
देवा;क्या हुआ काकी नाराज मत हो।
पदमा;अपने घर के कमरे में जाते हुए।
चला जा यहाँ से और दूबारा मुझे अपनी सुरत मत दिखाना। अगर दिखाई भी दिया न तो मुझसे बुरा कोई नहीं होंगा ।
ये कहके पदमा घर का दरवाज़ा अंदर से बंद कर देती है।
हिम्मत राव;रुक्मणी के पेशानी पे चुमता हुआ रानी के कमरे की तरफ चला जाता है।
रानी के रूम में किसी को आने की परमीशन नहीं थी रुक्मणी को भी नही।
सिर्फ हिम्मत राव कही भी आ जा सकता था।
एक बार रुक्मणी ऐसे ही किसी काम से उसके रूम में चली गई थी तो उस बात पे रानी ने इतना हंगामा किया थी की उस दिन से रुक्मणी ने कान पकड़ी थी की आज के बाद कभी भी रानी के रूम में नहीं जाएंगी।
यही वजह थी की रानी अपने रूम में किसी भी हालत में सोई रहती थी। बस पदमा साफ़ सफाई करने उसके रूम में जाया करती थी।
रानी;बिस्तर पे नंगी सोई हुई थी उसे अभी अभी नींद लगी थी।
हिम्मत राव;रानी को ऐसी हालत में देख राल टपकाने लगता है और आगे बढ़ के रानी की चूत के पास बैठ जाता है।
वो बड़े गौर से रानी की चिकने चूत को देखने लगता है।
कुछ देर देखने के बाद वो रानी के चूत के दोनों लिप्स को अपने उँगलियों से मसलने लगता है और उसे दबोच लेता है।
रानी नींद से जाग जाती है।
आह बापू क्या करते हो उन्हह।
हिम्मत राव;कुछ भी तो नहीं बिटिया बस देख रहा हूँ।
रानी;अपनी चूत के दाने को सहलाने लगती है उसकी चूत में तो काफी देर से जलन हो रही थी।
हिम्मत राव;क्या हुआ रानी दर्द हो रहा है कही पे।
रानी;हाँ बाबू यहाँ।
हिम्मत राव;अरे बिटिया पहले क्यों नहीं बोली तू कहे तो मलहम लगा दुं।
रानी;कोई ज़रूरत नहीं कुछ लगाने की मरहम दर्द कम करने के लिए लगता है।