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हिन्दी सेक्सी कहानियाँ

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थोड़ा दर्द तो होगा ही"*-*-*-*-*-*-*-*-*

कॉलेज के दिनों से ही मेरा एक बहुत ही अच्छा दोस्त था जिसका नाम सुरेश था। हम दोनों के बीच बहुत ही अच्छी समझ थी, दोनों को जब भी मौका मिलता तो हम चुदाई कर लिया करते थे। जितनी बार भी हम चुदाई करते, सुरेश किसी नए और अलग तरह के आसन के साथ चुदाई करता था।

आप कह सकते हैं कि हमने कामसूत्र के लगभग सभी आसनों में चुदाई की, यहाँ तक कि उसकी शादी के बाद भी हम दोनों को जब भी समय और मौका मिलता हम चुदाई किया करते थे।

मुझे आज भी याद है कि एक बार मैं उसके सामने नंगी हो कर उसको उकसा रही थी, तभी उसने मेरे सामने अपनी मुठ मार कर अपना सारा वीर्य मेरे चेहरे और मेरे मम्मों पर छिड़क दिया।

मैंने तब तक कभी भी गाण्ड नहीं मरवाई थी। एक बार एक रात को ब्लू फिल्म देखने के बाद मुझे भी गाण्ड मरवाने की इच्छा हुई। चूँकि मैं जानती थी कि गाण्ड मरवाने के साथ साथ दर्द भी सहन करना होगा इसलिए मैं असमंजस में थी। फिर मैंने निर्णय किया कि मैं अपनी यह इच्छा सुरेश से ही पूरी करूँगी क्योंकि उसका लण्ड तो साढ़े छः इंच लंबा है परंतु उसके लण्ड की मोटाई कोई दो इंच ही है।

साथ ही मैं आश्वस्त थी कि चाहे कुछ भी हो जाए सुरेश मुझे कभी कोई तकलीफ नहीं पहुँचाएगा।

एक बार जब उसकी पत्नी अपने मायके गई हुई थी तो हमने जानवरों की तरह बहुत जोरदार चुदाई की। चुदाई के बाद जब हम दोनों बिस्तर में लेटे हुए आराम कर रहे थे तब सुरेश ने मुझे सहलाते हुए मेरी गाण्ड मारने की इच्छा जाहिर की। हालाँकि मैं भी चाहती थी कि वह मेरी गाण्ड मारे परंतु तब तक भी मन में कुछ संकोच था।

अब चूँकि मैं सुरेश पर विश्वास करती थी इसलिए मैंने सब कुछ उस पर छोड़ने का फैसला कर लिया। उसने मुझे घोड़ी की तरह बनने को कहा और मैं बिस्तर पर अपने हाथों और घुटनों के बल घोड़ी की तरह बन गई। सुरेश ने मेरी कुँवारी गाण्ड का निरीक्षण करना शुरू कर दिया। कभी वो मेरे मम्मे दबाता, कभी मेरी कमर सहलाता और कभी मेरी गाण्ड को सहलाता चूमता।

फिर उसने मेरी गाण्ड को चाटना शुरू कर दिया। उसके एक हाथ की उँगलियाँ मेरी चूत के होठों को और दूसरे हाथ की उँगलियाँ मेरी गाण्ड के छेद को सहला रहीं थी। मैं जानती थी कि वो सिर्फ अभी सब तरफ से देख रहा है परंतु इसके बाद मेरी गाण्ड को चुदना ही है।

"छोड़ दो मुझे सुरेश....!" मैंने उसको कहा।

"चिचियाना बंद करो शालिनी !" उसने जोर से कहा,"तुम भी जानती हो कि तुम भी मज़ा लेने वाली हो।"

असल में उसका मेरी गाण्ड को देखने का तरीका ही मेरी चूत और मेरी गाण्ड को गरमाने के लिये बहुत था और यह तो सुरेश को दिखाने के लिये सिर्फ एक दिखावा था कि मैं बहुत ही डरी हुई हूं परंतु उसका लण्ड अपनी गाण्ड में लेने के लिये मैं भी बेताब थी।

चूँकि मैं जानती थी कि एक बार उसका लण्ड मेरी गाण्ड में घुस गया तो वह प्यार से मेरी गाण्ड नहीं मारेगा क्योंकि थोड़ी देर पहले ही उसने मेरी चूत को बहुत क्रूरता से चोदा था और अभी तक मेरी टांगों में हल्का सा दर्द था।

तभी सुरेश ने मेरी चूत से अपनी उँगलियाँ बाहर निकाल कर कहा,"तुम अभी भी उत्साहित हो शालिनी?"

मैं उत्साहित थी क्योंकि उसकी उँगलियाँ मेरी चूत को चोद रहीं थी। लेकिन मैं अभी तक गाण्ड मरवाने के लिए आश्वस्त नहीं थी इसलिए मैंने सिर्फ एक आह सी अपने मुँह से निकाली।

तब वो बाथरुम में गया और तेल की शीशी लेकर आया और बहुत सा तेल अपनी उँगलियों में लगाने लगा,"देखो शालिनी, तुमको थोड़ा सा तो झेलना पड़ेगा और चूँकि तुम मेरी सबसे खास दोस्त हो इसलिए मैं तुमको दर्द नहीं दे सकता।" सुरेश ने अपनी एक ऊँगली मेरी गाण्ड के छेद में डालते हुए कहा।

उसने ठीक कहा था, मुझे दर्द नहीं हुआ पर जैसे ही उसकी ऊँगली का स्पर्श मेरी गाण्ड के अंदर हुआ मैं चिंहुक उठी।

और जैसे ही सुरेश ने अपनी ऊँगली थोड़ी और अंदर तक डाली मेरे मुँह से थोड़ी अजीब सी आवाज़ निकली और मैंने अपनी गाण्ड को जोर से हिलाया। मुझे उसकी वह ऊँगली भी अपनी गाण्ड में बहुत बड़ी लग रही थी और मैं सोच रही थी कि उसका लण्ड मेरी तंग गाण्ड में कैसे घुसेगा और कितना दर्द करेगा।

उसकी ऊँगली से भले मेरी गाण्ड में ज्यादा दर्द नहीं हुआ पर उसका लण्ड तो ऊँगली से ज्यादा लंबा और मोटा था। उसने धीरे अपनी ऊँगली मेरी गाण्ड में अंदर बाहर करनी शुरू कर दी ताकि मेरी गाण्ड नर्म और अभ्यस्त हो जाए।

मैंने अपना चेहरा तकिये में दबा लिया और कराहने लगी।

"आराम से ! बस अब तुमको मज़ा आने लगेगा शालिनी।" सुरेश ने कहा।

जैसे ही अपनी दूसरी ऊँगली भी मेरी गाण्ड में डाली, मैं फिर से चिंहुक उठी और उससे दूर होने की कोशिश करने लगी पर सफल नहीं हो सकी। अबकी बार मैं जोर से चिल्ला उठी और तकिये को अपने दाँतों से काटने लगी। अब मेरी कुंवारी गाण्ड के लिया दर्द सहना बहुत कठिन हो गया था क्योंकि मैं जानती थी कि उसका लण्ड मेरी गाण्ड के लिये मोटा है और मैं उसको सहन नहीं कर पाऊँगी।

पर सुरेश रुका नहीं और अपनी दोनों उँगलियों को मेरी गाण्ड के अंदर-बाहर करता रहा ताकि मेरी गाण्ड का छेद कुछ खुल जाए।

अब उसने अपने लण्ड पर तेल लगाना शुरू किया और फिर अपने लण्ड के सिरे को मेरी गाण्ड के छेद पर रगड़ने लगा तो मैं बहुत ही उत्सुकता से उसके लण्ड का अपनी गाण्ड में घुसने का इंतज़ार कर रही थी परंतु उसने अपना लण्ड मेरी ऊपर उठी हुई गाण्ड की अपेक्षा मेरी चूत में डाल दिया। मैं खुशी के मारे जोर जोर से अपने को पीछे की ओर धकेलने लगी ताकि उसके लण्ड का पूरा मज़ा ले सकूँ।

कुछ धक्कों के बाद उसने अपना लण्ड मेरी चूत में से बाहर निकाल लिया और मेरी गाण्ड के छेद पर रख कर धक्का देने लगा।

जैसे ही उसके लण्ड का सिरा मेरी गाण्ड में घुसा, मैं जोर से चिल्लाई और उससे दूर जाने की कोशिश करने लगी परंतु उसने मेरी कमर से मुझे पकड़ लिया और मैं उसकी मज़बूत गिरफ्त से छूट नहीं पाई। उसके लण्ड के सिरे ने मेरी गाण्ड के छेद को उसकी उँगलियों से भी ज्यादा खोल दिया था। हालाँकि उसका लण्ड तेल और मेरे चूत के रस से बहुत ही चिकना था परंतु फिर भी मुझे दर्द हुआ।

मैंने उसको छोड़ देने को कहा परंतु सुरेश ने मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और मेरी गाण्ड के छेद को अपने दोनों हाथों से और खोल कर अपना लण्ड मेरी गाण्ड में डालने में लगा रहा।

जैसे ही उसका लण्ड थोडा सा और अंदर गया तो मैंने अपनी गाण्ड के छेद को अपने पूरे जोर से भींच लिया ताकि उसका लण्ड बाहर निकाल जाए पर सुरेश ने मेरी गाण्ड पर धीरे धीरे चपत मारनी शुरू कर दी और चपत मारते हुए कहा कि मैं अपनी गाण्ड को ढीला छोड़ दूँ।

जैसे ही मैं गाण्ड के छेद को हल्का सा ढीला किया उसका लण्ड और अंदर तक घुस गया। अब उसने मेरी कमर को अपने मज़बूत हाथों से पकड़ लिया और एक ही झटके में बाकी का लण्ड मेरी कुंवारी गाण्ड में घुसेड़ दिया।

मेरी चीख निकल गई, लगा कि जैसे जान ही चली जायेगी।

तब थोड़ी देर तक सुरेश ने कोई हरकत नहीं की, केवल मेरी गाण्ड और पीठ को सहलाता रहा और फिर उसने पूछा,"क्या बहुत दर्द हो रहा है? लण्ड बाहर निकाल लूँ क्या?"

मुझे दर्द तो बहुत हो रहा था परंतु मैं जानती थी कि सुरेश अपना लण्ड किसी भी हाल में मेरी गाण्ड से बाहर नहीं निकालेगा। इसलिए तकिये में अपना मुँह दबा कर सिर्फ कराहती रही। थोड़ी देर के बाद सुरेश ने अपना लण्ड धीरे-धीरे बाहर निकालना शुरू किया तो मुझे लगा कि शायद अब मैं छूट जाऊंगी पर वह सिर्फ एक खुशफ़हमी थी। कोई आधे से ज्यादा लण्ड बाहर निकलने के बाद उसने फिर से लण्ड मेरी गाण्ड में डालना शुरू

कर दिया।

मैंने सुरेश को कहा- मुझे बहुत दर्द हो रहा है !

तब सुरेश ने कहा कि अब वो धीरे धीरे करेगा और जैसे ही उसने अपना लण्ड मेरी गाण्ड में दुबारा डालना शुरू किया तो ऊपर से और तेल डालने लगा।

तेल डालने से मेरी गाण्ड का छेद और भी ज्यादा चिकना हो गया और अब उसका लण्ड आराम से गाण्ड के अंदर घुस रहा था। चार पाँच बार उसने बड़े ही धीरे धीरे अपना लण्ड मेरी गाण्ड में अंदर-बाहर किया और फिर मेरी पीठ ओर गाण्ड को सहलाते हुए सुरेश ने पूछा,"अब भी बहुत दर्द हो रहा है क्या शालू?"

पहले जहाँ मुझे दर्द हों रहा था, वहीं अब मुझे भी मज़ा आ रहा था और अब मैं भी गाण्ड मरवाने का आनन्द ले रही थी। मैंने अपनी पूरी शक्ति से अपनी गाण्ड को सुरेश की तरफ धकेला और कहा,"बस ऐसे धीरे धीरे ही करना इससे दर्द नहीं होता !"

"ठीक है तो मैं रुक जाता हूँ और अब तुम आगे पीछे हो कर अपने आप से गाण्ड मरवाओ !" सुरेश ने कहा।

सुरेश ने मेरी कमर को पकड़ लिया ताकि लण्ड बाहर ना निकल जाए और मैंने धीरे धीरे से अपने आप को आगे पीछे करना शुरू कर दिया। कुछ देर के बाद जैसे सुरेश का संयम टूट गया और उसने कहा,"बस शालिनी, अब मेरी बारी है। अब मैं अपने तरीके से तुम्हारी गाण्ड मारूँगा।"

सुरेश ने एक जोरदार धक्का मारा तो मैं समझ गई कि अब गाण्ड की असली चुदाई का समय आ गया है।

सुरेश ने मुझे अपना मुँह तकिये में दबाने को कहा और जैसे ही मैंने अपनी गर्दन नीचे की ओर की, उसने अपनी गति बढ़ानी शुरू कर दी और अब जोर जोर से मेरी कमर को पकड़ कर धक्के देने लगा। मेरी आह निकल रही थी।

धीरे धीरे मैंने अपना एक हाथ अपने नीचे किया और अपनी चूत के होठों को छुआ। मुझे जैसे बिजली का झटका लगा। फिर मैंने अपनी हथेली अपनी चूत पर रगड़नी शुरू कर दी। अब मैं पूरी तरह से गाण्ड मरवाने का मज़ा ले रही थी और तकिया में मुँह दबाए चिल्ला रही थी। और सुरेश अब अपने असली रंग में मेरी गाण्ड मार रहा था।

"चोदो और जोर से चोदो ! सुरेश मेरी गाण्ड को चोदो ! सुरेश ओहहहह ओहहहह!!!! मैं झड़ने वाली हूँ सुरेश!!!" मैं जोर से चिल्लाई और झड़ने लगी।

अब सुरेश भी क्रूरता से मेरी गाण्ड में अपना लण्ड अंदर-बाहर कर रहा था। एक बार फिर उसने अपना लण्ड अपनी पूरी शक्ति से मेरी गाण्ड में धकेल दिया और मेरी गाण्ड को जोर से दबाते हुए उसमें ही झड़ने लगा। उसका गर्म-गर्म वीर्य मेरी गाण्ड में भर रहा था। तब वो मेरे ऊपर ही गिर पड़ा उसका लण्ड अभी भी मेरी गाण्ड में ही था और हम दोनों हांफ रहे थे।

"देखा?" सुरेश ने मेरी पीठ को चूमते हुए कहा,"मैंने कहा था ना शालिनी कि तुमको बहुत मज़ा आएगा !"

मैं हल्के के कराही, मेरी गाण्ड अभी भी उसके ढीले होते हुए लण्ड की चुदाई से दर्द कर रही थी।

उस रात उसने कुल तीन बार मेरी गाण्ड मारी और अगले दो दिनों तक मेरी टांगों और गाण्ड में दर्द होता रहा।
 


जब मस्ती चढ़ती है तो

दोस्तों मैं बरखा एक शादीशुदा औरत हूँ। मैंने शादी से पहले अपनी मौसी के संग मज़े किये। फिर मेरी शादी हो गई और मैंने शिमला जाकर अपने पिया संग हनीमून भी मनाया। जिंदगी बहुत खुशहाल मोड़ पर थी और मैं अपने पिया संग एक मस्त जिंदगी जी रही थी। मेरे पति अजय भी मुझे बहुत प्यार करते हैं। उनके प्यार की निशानी मेरी बेटी है। मेरे पति मेरी हर ख्वाहिश को पूरा करते है और मैं भी उनको बहुत प्यार करती हूँ।

पर कुछ बातें इंसान के हाथ में नहीं होती...

बात तब की है जब मेरी ननद रजनी कुछ दिनों के लिए मेरे पास रहने आई और फिर जैसे सब कुछ बदल गया। रजनी के बारे में बता दूँ। रजनी मेरी बड़ी ननद यानि मेरे पति की बड़ी बहन है, शादीशुदा है और दो बच्चों की माँ है। अगर शारीरिक बनावट की बात करें तो सुन्दर है और शरीर भी भरा भरा सा है, बड़ी-बड़ी चूचियाँ और मोटी सी गाण्ड उसकी सुंदरता पर चार चाँद लगाते हैं, बेहद आकर्षक भी है और सेक्सी भी। उसका ज्यादा समय सेक्स के बारे में बातें करने में ही बीतता है।

अजय यानि मेरी पति को अपनी कम्पनी के काम से एक महीने के लिए बाहर जाना पड़ा तो मैंने रजनी को अपने पास बुला लिया। क्यूँकि एक तो मेरी बेटी अभी छोटी थी और मैं अकेली भी थी। रजनी आ गई और एक दो दिन ऐसे ही बीत गए।

पर एक रात...

मैं रात को पेशाब करने के लिए उठी तो रजनी अपने बिस्तर पर नहीं थी। मैंने पहले तो सोचा कि वो भी पेशाब करने गई होगी पर जब बाथरूम में जाकर देखा तो वो वहाँ नहीं थी। मैं पेशाब करके अंदर आई तो मुझे रसोई से कुछ आवाज आई। ध्यान से सुना तो ये किसी की मस्ती भरी सिसकारियाँ थी। मैं डर गई पर फिर मैंने हिम्मत करके रसोई में जाकर देखा तो यह रजनी थी जो एक बैंगन को अपनी चूत में घुसा कर अंदर-बाहर कर रही थी। उसकी आँखें बंद थी और वो पूरी तन्मयता से अपनी चूत में बैंगन अंदर-बाहर कर रही थी। उसे तो मेरे आने का भी पता नहीं लगा था।

मैं वहीं खड़ी उसको देखती रही। मुझे तभी मौसी का वो लकड़ी वाला मस्त कलंदर याद आ गया जिसने मुझे पहली बार सेक्स का अनुभव करवाया था। मैं सोच में डूबी हुई थी की रजनी की मस्ती भरी आह ने मुझे जगाया। रजनी झड़ चुकी थी और वो अब उस बैंगन को चाट रही थी जो कुछ देर पहले उसकी चूत की गहराई नाप रहा था।

"जीजी...(हमारे राजस्थान में ननद को जीजी कह कर बुलाते हैं)"

रजनी ने एकदम चौंक कर आँखें खोली।

"जीजी... आप यह क्या कर रही थी?"

"वो...वो...?

रजनी थोड़ी हकला गई। उसका हकलाना देख कर मेरी हँसी छूट गई।

"अरे जीजी.. बहुत खुजली हो रही है चूत में...? हमारे ननदोई सा चोदे कौनी के तमने?"

मुझे हँसता देख कर रजनी भी कुछ सामान्य हुई और वो भी हँस पड़ी और बोली- भाभी... इस निगोड़ी चूत को लण्ड लिए बिना सब्र ही नहीं होता। जब तक लण्ड से एक बार चुदवा न लूँ तब तक तो नींद ही नहीं आती !

"पर मेरी रानी अब तो इस चूत से दो दो बच्चे निकाल चुकी है अब भी यह शांत नहीं हुई?"

"पता नहीं भाभी? पर बस रहा ही नहीं जाता। तुम्हारे ननदोई जी भी अब चोद नहीं पाते हैं सही से तो रसोई के बैंगन खीरे और मूली से ही काम चला रही हूँ।"

मेरी हँसी छूट गई। रजनी भी अब उठ खड़ी हुई थी। हम दोनों ऐसे ही बातें करते करते अपने बिस्तर पर आ गए और बहुत देर तक हम दोनों ऐसे ही सेक्सी बातें करते रहे। रजनी की सेक्सी बातें सुन कर मेरी चूत में भी खुजली होने लगी थी। ऊँगली से सहला सहला कर मैंने भी अपनी चूत को किसी तरह शांत किया और फिर हम सो गए।

सुबह उठ कर हम दोनों ने मिल कर नाश्ता तैयार किया और एक साथ बैठ कर खाने लगे।

तभी घर के बाहर सब्जी वाले ने आवाज लगाई,"आलू ले लो... बैंगन ले लो... खीरा ले लो..."

आवाज सुनते ही हम दोनों जोर से हँस पड़ी।

मैंने रजनी से पूछ लिया- जीजी... ले कर आऊँ क्या मोटा सा खीरा रात के लिए?

वो भी बेशर्मी से हँस कर बोली- फिर तो दो लेना, एक मेरे लिए और एक तुम्हारे लिए !

दिन में भी रजनी ज्यादातर सेक्स की ही बातें करती रही। तो बातों बातों में मैंने रजनी को अपनी और मौसी की दास्तान सुना दी। रजनी मेरी बात सुन कर मस्त हो गई और बार बार लकड़ी के मस्त कलंदर के बारे में पूछने लगी। मैंने टालने की बहुत कोशिश की पर रजनी नहीं मानी। तब मैंने अपने संदूक में से अपना पहला प्यार अपना लाडला मस्त कलंदर निकाल कर रजनी को दिखाया। बेचारा मेरी शादी के बाद एक बार भी प्रयोग में नहीं आया था।

"हाय भाभी... यह तो बहुत मस्त है... देखो तो तुम्हारे ननदोई के लण्ड से भी मोटा और लम्बा...!"

"ह्म्म्म !" मैंने हामी भरी।

रजनी ने उसको ऐसे मुँह में लेकर चाटा जैसे असली लण्ड हाथ में आ गया हो। रजनी तो उसको अपनी साड़ी के ऊपर से ही चूत पर रगड़ने लगी। देख कर मेरी फिर से हँसी छूट गई। रजनी वहीं सोफे पर टाँगें फैला कर लेट गई और अपनी साड़ी ऊपर करके पेंटी के बराबर में से मस्त कलंदर को चूत पर रगड़ने लगी।

"जीजी, क्यों तड़प रही हो... साड़ी उतार कर अच्छे से डाल लो इसे अपनी चूत में !" मैंने कहा।

रजनी तो जैसे मेरी इसी बात का इन्तजार कर रही थी। उसने झट से अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार कर एक तरफ़ फैंक दिया और पेंटी भी उतार दी। मैंने तब पहली बार रजनी की चूत देखी। अच्छे से चुदी हुई रजनी की चूत बहुत मस्त लग रही थी। मुझे मौसी के साथ बिताए दिन याद आ गए और मैं रजनी की टांगों के पास जाकर बैठ गई। रजनी मस्ती के मारे मस्त कलन्दर को अपनी चूत पर रगड़ रही थी और सिसकारियाँ भर रही थी।

तभी मैंने रजनी के हाथ से डण्डा ले लिया और एक हाथ से रजनी की चूत सहलाने लगी। रजनी की चूत पानी छोड़ रही थी। मैंने दो उँगलियाँ रजनी की तपती हुई चूत में डाल दी। रजनी की चूत पूरी गीली हो चुकी थी।

"भाभी... अब जल्दी से यह मूसल डाल ना मेरी चूत में... जल्दी कर मेरी जान !"

रजनी डण्डा अपनी चूत में लेने को बेचैन थी। मैंने भी तेल लगा कर डंडा रजनी की चूत में घुसा दिया और अंदर-बाहर करने लगी। ऐसा करने से मेरी चूत में कीड़े रेंगने लगे थे। मैं अब लकड़ी के मस्त कलन्दर से रजनी की चूत चोद रही थी और रजनी ने भी आहें भरते-भरते मेरी साड़ी जांघों तक ऊपर उठा दी और मेरी चूत पर हाथ फेरने लगी। मेरी चूत भी पानी से लबालब हो गई थी।

रजनी दो ऊँगलियाँ मेरी चूत में पेल रही थी। मेरे बदन में भी मस्ती की लहर दौड़ रही थी। मैं झट से रजनी के ऊपर आ गई और मैंने अपनी चूत रजनी के मुँह के सामने कर दी। अब हम दोनों 69 की अवस्था में थीं।

मैं रजनी की चूत मस्त कलंदर से चोद रही थी और अब रजनी ने भी अपनी जीभ मेरी चूत के मुहाने पर टिका दी थी। रजनी मस्ती में भर कर मेरी चूत चाट रही थी, मुझे मस्त कर रही थी और मैं भी पूरी मस्त होकर मस्त कलंदर को रजनी की चूत के अंदर-बाहर कर रही थी।

रजनी की सीत्कारें और मेरी मस्ती भरी सिसकारियाँ कमरे में गूंज रही थी और माहौल को और मस्त कर रही थी।

लगभग बीस मिनट की धमाचौकड़ी के बाद रजनी की चूत अकड़ी और झमाझम बरस पड़ी। रजनी को परम-आनन्द बहुत तेज़ी से मिला था, ढेर सारा पानी छोड़ा था रजनी की चूत ने।

इधर मेरी चूत में भी रजनी की जीभ ने कमाल कर दिया और मेरी चूत भी मस्त होकर बरस पड़ी और ढेर सारा पानी रजनी के मुँह पर फेंक दिया। रजनी सारा पानी चाट गई तो मैंने भी डण्डा बाहर निकाल कर अपनी जीभ रजनी की चूत पर लगा दी और चाट चाट कर पूरी चूत साफ़ कर दी।

हम दोनों थक कर चूर-चूर हो रही थी और नंगी ही बिस्तर पर लेट गई। मुझे तो खैर पहले भी लेस्बियन सेक्स का मज़ा पता था पर रजनी ने शायद यह सब पहली बार किया था। वो तो इस मस्ती से इतनी खुश हुई कि बहुत देर तक वो डण्डे को अपनी चूत में डाल कर ही लेटी रही।

उसके बाद रजनी करीब बीस-पच्चीस दिन मेरे साथ रही और हर रोज हमने भरपूर मज़ा लिया।

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उसके बाद मेरे पति वापिस आ गए। आते ही मैंने उन्हें उलहाना दिया और अकेले छोड़ कर जाने के लिए थोड़ा सा झूठ-मूठ का झगड़ा भी किया। पर उस रात अजय ने पूरी रात असली लण्ड से मेरी चूत का पोर-पोर मसल दिया और मेरा सारा गुस्सा ठण्डा कर दिया। उस रात रजनी दूसरे कमरे में मेरे लकड़ी के मस्त कलन्दर के साथ मस्ती करती रही।

अगले दिन मेरे पति के जाने के बाद रजनी ने मेरे साथ एक बार फिर मस्ती की और मस्त कलन्दर को अपने साथ ले जाने के लिए पूछा। मैं देना तो नहीं चाहती थी पर जब रजनी बोली कि तुम्हारे ननदोई सा का अब सही से खड़ा नहीं हो रहा है और मुझे बैंगन खीरे से काम चलाना पड़ता है तो मैंने देने के लिए हाँ कर दी। उसी शाम को ननदोई सा आ गए रजनी को लेने और अगली सुबह वो रजनी को लेकर चले गए।

जिंदगी फिर से अपने पुराने रस्ते पर आ गई थी।

मुझे छोटी बच्ची को सँभालने और घर का काम करने में परेशानी हो रही थी और इस कारण अजय भी ड्यूटी के लिए लेट हो जाते थे कभी कभी। मैंने अजय को एक नौकर रखने के लिए कहा तो अजय ने जरुरत को ध्यान में रखते हुए हामी भर दी। पर एक समस्या थी की नौकर किसे रखें। बाहर के आदमी पर विश्वास करने का मन नहीं मान रहा था क्योंकि एक दो घटना मेरे शहर में हो चुकी थी और टी वी पर भी अक्सर ख़बरें आती रहती थी।

काफी सोच समझ कर फैसला किया कि मेरे पति के गाँव से किसी नौकर को शहर बुला लिया जाए। मेरे पति इस मकसद से गाँव में गए और जब अगले दिन वो वापिस आये तो एक बीस इक्कीस साल का नौजवान उनके साथ था।

मैं उसको जानती थी , यह राजकुमार था जिसको सभी प्यार से राजू कहते थे। वह मेरे पति के घर के पास ही रहता था और गाँव में मेरी ससुराल में ही घर का काम करता था।

मैं बहुत खुश हुई कि ठीक है , घर का ही एक आदमी मिल गया। हमने राजू को अपने घर के पीछे का एक कमरा रहने के लिए दे दिया। राजू ने आते ही घर का सारा काम संभाल लिया। अब मैं तो सिर्फ उसकी थोड़ी बहुत मदद कर देती थी नहीं तो सारा काम वो ही करता था। काम खत्म करने के बाद हम अक्सर गाँव की बातें करने लगते समय बिताने करने के लिए। पर सब कुछ मर्यादा में ही था।

जिंदगी चल रही थी पर जैसा मैंने बताया कि पता नहीं जिंदगी कब कौन सा रंग बदल ले।

कुछ दिन बाद होली का त्यौहार था और सभी जानते हैं कि कितना मस्ती भरा त्यौहार है यह। हमारे राजस्थान में तो होली पर बहुत मस्ती होती है।

होली वाले दिन सुबह जल्दी नाश्ता करके सब होली खेलने के लिए इकट्ठे हुए। मेरे पति के एक-दो दोस्त भी आये और मुझे रंग कर चले गए। कुछ देर बाद मेरे पति को भी उनके दोस्त अपने साथ ले गए। राजू आज सुबह से बाहर था। कुछ देर बाद जब आया तो वो पूरी मस्ती में था , आते ही बोला- भाभी.... अगर आप बुरा न मानो तो क्या मैं आपको रंग लगा सकता हूँ?

वो मुझे भाभी ही कहता था। वो मेरे ससुराल का था और मेरे देवर की तरह था तो मैं उसको हाँ कर दी। मेरा हाँ करना मुझे भारी पड़ गया क्योंकि मेरी हाँ सुनते ही राजू रंग लेकर कर मुझ पर टूट पड़ा और मुझे रंग लगाने लगा।

मैं कहती रही- आराम से ! आराम से !

पर राजू ने मेरे बदन पर रंग मल दिया।

रंग लगाते लगाते राजू के हाथ कई बार मेरी चूची और मेरी गाण्ड पर भी लगा जिसे मैंने तब महसूस नहीं किया पर जब वो रंग लगा कर हटा तो अपने कपड़ों की हालत देख कर मेरा मन बेचैन हो गया क्योंकि मेरी चूचियाँ पूरी रंग से सराबोर थी। मेरे पेट पर भी रंग लगा था और मेरी साड़ी भी अस्त-व्यस्त हो चुकी थी।

राजू के हाथ का एहसास अब भी मेरे बदन के ऊपर महसूस हो रहा था। उसने मेरी चूचियाँ कुछ ज्यादा जोर से मसल दी थी।

लगभग बारह बजे तक ऐसे ही मस्ती चलती रही। राजू ने भांग पी ली थी जिस कारण उस पर होली का नशा कुछ ज्यादा ही चढ़ा हुआ था और उसने कम से कम तीन-चार बार मुझे रंग लगाया। मैं मना करती रही पर वो नहीं माना।

करीब एक बजे मैंने राजू को नहा कर दोपहर का खाना तैयार करने के लिए कहा। मैं भी अब नहा कर अपना रंग छुड़वाने की तैयारी करने लगी।

कुछ देर बाद मैं नहा कर कपड़े बदल कर रसोई में गई तो देखा राजू अभी वहाँ नहीं आया था। मैं उसको बुलाने के लिए उसके कमरे की तरफ गई तो वो अपने कमरे के बाहर खुले में ही बैठ कर नहा रहा था।

मैंने आज पहली बार राजू का बदन देखा था। गाँव के दूध-घी का असर साफ़ नजर आ रहा था। राजू का बदन एकदम गठीला था। उसके पुट्ठे अलग से ही नज़र आते थे। होते भी क्यों ना ! गाँव के लोग मेहनत भी तो बहुत करते हैं तभी तो उनका बदन इतना गठीला होता है।

बदन तो अजय का भी अच्छा है पर शहर की आबो-हवा का असर नजर आने लगा है। पर ना जाने क्यों मुझे राजू का बदन बहुत आकर्षक लगा। कुछ देर मैं उसके बदन को देखती रही पर उसने शायद मुझे नहीं देखा था। तभी मैं उसको आवाज देते हुए उसके पास गई और थोड़ा सा डाँटते हुए बोली- तू नहाया नहीं अभी तक... ? दोपहर का खाना नहीं बनाना है क्या?

" भाभी पता नहीं तुमने कैसा रंग लगाया है छूट ही नहीं रहा है... अगर बुरा ना मानो तो मेरी पीठ से रंग को साफ़ करने में मेरी मदद करो ना !"

मैं कुछ देर सोचती रही और फिर अपने आप को उसके बदन को छूने से नहीं रोक पाई और बोली- लया साबुन इयाँ दे... यो मेरो रंग है इया कौनी उतरेगो !

राजू मेरी बात सुन कर हँस पड़ा और मैं बिना कुछ कहे साबुन उठा कर राजू की पीठ पर लगाने लगी।अचानक साबुन फिसल कर नीचे गिर गया और जब मैं उसको उठाने के लिए झुकी तो मेरी नज़र राजू के कच्छे में बने तम्बू पर पड़ी। शायद मेरे स्पर्श से राजू का लण्ड रंगत में आ गया था और सर उठा कर कच्छे में खड़ा था। तम्बू को देख कर ही लग रहा था की अंदर बहुत भयंकर चीज होगी।

मेरे अंदर अब कीड़े रेंगने लगे थे। मैं राजू को जल्दी नहा कर आने का कह कर अंदर चली गई और अपने कमरे में जाकर अपनी चूत सहलाने लगी। मुझे अब अजय या मस्त कलंदर की बहुत जरुरत थी पर दोनों ही इस समय मेरे पास नहीं थे।

मन बहुत बेचैन हो रहा था कि तभी अजय की गाड़ी की आवाज आई।

ये रंग से सराबोर होकर वापिस आये थे। मैंने इन्हें नहाने के लिए कहा पर इन्होंने मुझे पकड़ कर मुझे फिर से रंग लगा दिया। कुछ देर की हँसी मजाक के बाद ये नहाने जाने लगे तो मैंने कहा- मेरा क्या होगा ?

तो इन्होने मुझे पकड़ कर बाथरूम में खींच लिया।

मैं कहती रही कि बाहर राजू है पर इन्होंने मेरी एक ना सुनी। दिल तो मेरा भी बहुत कर रहा था सो मैं भी जाकर इनके पास खड़ी हो गई। हमने एक दूसरे के कपड़े उतारे और फ़व्वारे के नीचे खड़े होकर नहाने लगे।

नहाते नहाते जब बदन एक दूसरे से रगड़े तो चिंगारी निकली और मैं वही बाथरूम में चुद गई।

ऐसा नहीं था कि मैं बाथरूम में नहाते नहाते पहली बार चुदी थी पर आज राजू का लण्ड देख कर जो मस्ती चढ़ी थी उसमे चुदवाने से और भी ज्यादा मज़ा आया था या यूँ कहो कि आज जितना मज़ा पहले कभी अजय ने मुझे नहीं दिया था।

इस होली ने मेरी नियत खराब कर दी थी। अब मेरा बार बार दिल करता था राजू का लण्ड देखने को।अब मैं भी इस ताक में रहती कि कब राजू का लण्ड देखने को मिले। वो घर के पिछवाड़े में पेशाब करता था तो मैं अब हर वक्त नजर रखती कि कब वो पेशाब करने जायगा। जब वो पेशाब करते हुए अपना लण्ड बाहर निकालता और उसमे से मोटी मूत की धार निकलती मेरी चूत चुनमुना जाती। मेरे कमरे की खिड़की से पिछवाड़े का सारा नज़ारा दिखता था। मेरे कमरे की खिड़की के शीशे में से अंदर का नहीं दिखता था पर बाहर का सब कुछ नज़र आता था। राजू का लण्ड देखने के बाद रात को अजय से चुदवाते हुए भी राजू का लण्ड दिमाग में रहता और चुदाई में भी और ज्यादा मज़ा आता।

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होली वाले दिन साबुन लगवाने के बाद अब राजू मेरे से कुछ ज्यादा खुल गया था। अब वो मेरे साथ भाभी देवर की तरह मजाक करने लगा था और कभी कभी तो द्विअर्थी शब्दों का भी प्रयोग करने लगा था। अब वो अक्सर मुझे साबुन लगाने के लिए बोल देता और मैं भी ये मौका ज्यादातर नहीं छोड़ती थी।

ऐसे ही एक दिन साबुन लगाकर जब मैं वापिस मुड़ी तो साबुन के पानी से फिसल कर गिर गई और मेरे कूल्हे पर चोट लग गई। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने मुझे दस पन्द्रह दिन का पूर्ण आराम बता दिया। कूल्हे की हड्डी खिसक गई थी।

अजय काम से इतनी लम्बी छुट्टी नहीं ले सकता था। और राजू ने भी अजय को बोला कि वो पूरा ध्यान रखेगा तो अजय ने ऑफिस जाना बंद नहीं किया।

पर तभी एक जरूरी काम से अजय को टूर पर जाना पड़ा और तभी एक मुश्किल आन पड़ी कि मेरी माहवारी शुरू हो गई।मैंने अजय को अपनी दिक्कत बताई तो उसने छुट्टी लेने की कोशिश की पर काम जरूरी होने के कारण छुट्टी नहीं मिली। मैं तो बिस्तर पर से उठ नहीं सकती थी तो अब नैपकिन कैसे बदलूंगी।

नित्यकर्म के लिए भी मुझे बहुत दिक्कत थी। जब अजय थे तो वो मुझे सहारा देकर बाथरूम में बैठा देते थे और पेशाब तो मुझे बिस्तर पर बैठे बैठे ही करना पड़ता था। पर अजय के जाने के बाद कैसे होगा यह भी एक बड़ी दिक्कत थी।

अजय ने रजनी को बुला लिया पर वो भी एक दिन से ज्यादा नहीं रुक सकती थी क्यूँकि उसके ससुराल में कुछ कार्यक्रम था। खैर रजनी को छोड़ कर अजय चले गए।

रजनी भी अगली सुबह मेरा नैपकिन बदल कर चली गई। अब घर पर मैं मेरी मुनिया और सिर्फ राजू थे। दोपहर को मुझे नैपकिन बदलने की जरुरत महसूस होने लगी क्यूंकि माहवारी बहुत तेज हो गई थी।

मैंने राजू को व्हिस्पर के पैड लाने के लिए भेजा। वो जब लेकर आया तो मैंने लेटे लेटे ही पुराना पैड निकाल कर दूसरा पैड लगा लिया। पर पुराने गंदे नैपकिन का क्या करूँ , यह सोच कर मैं परेशान हो गई।

मैंने राजू से एक पोलिथिन मंगवा कर उसमें डाल कर पैड बाहर कूड़ादान में डाल कर आने के लिए दे दिया।

राजू बार बार पूछ रहा था- इसमें क्या है...

तो मेरी हँसी छूट गई।

मेरी एक समस्या कुछ देर के लिए तो खत्म हो गई पर दूसरी शुरू हो गई बाथरूम जाने वाली।

पर राजू ने यहाँ भी मेरी बहुत मदद की। वो मुझे अपनी बाहों में उठा कर बाथरूम में ले गया और मुझे अंदर बैठा कर बाहर इन्तजार करने लगा। उसके बदन का एहसास और उसकी बाहों की मजबूती का एहसास आज मुझे पहली बार हुआ था सो मैं अंदर ही अंदर रोमांचित हो उठी। इसी तरह उसने अगले चार दिन तक मेरी खूब सेवा की।

मैं उसकी मर्दानगी और उसके सेवा-भाव के सामने पिंघल गई थी।

चार दिन के बाद अजय वापिस आये और उन्होंने एक सप्ताह की छुट्टी ले ली और मेरी खूब सेवा की। मैं ठीक हो गई।

पर अब घर का माहौल कुछ बदला बदला सा था। अब मैं अजय के जाने के बाद देर-देर तक राजू के साथ बैठी रहती और बातें करती रहती। कुछ दिन के बाद ही बातें सेक्सी रूप लेने लगी। पर हम खुल कर कुछ नहीं बोलते थे। बस ज्यादातर दो अर्थों वाले शब्दों का प्रयोग करते थे।

करीब दो महीने ऐसे ही निकल गए।

एक दिन मैं जब नहाने जा रही थी तो राजू बोला- भाभी अगर जरुरत हो तो क्या मैं आपकी पीठ पर साबुन लगा दूँ ?

मैं कुछ नहीं बोली और चुपचाप नहाने चली गई।

वापिस आई तो राजू रसोई में खाना बनाने की तैयारी कर रहा था। मैंने नहाने के बाद मैक्सी पहनी हुई थे जो मेरे बदन पर ढीली ढीली थी। मैं गीले बदन ही रसोई में चली गई और कुछ तलाश करने लगी। जैसे ही मैंने ऊपर से सामान उतारने के लिए हाथ ऊपर किये राजू ने एकदम से मुझे बाहों में भर लिया और बेहताशा मेरी गर्दन और मेरे कान के आस-पास चूमने लगा।

मैंने थोड़ा सा छुड़वाने की कोशिश की तो उसके हाथ मेरे बदन पर और जोर से जकड़ गए और उसने अपने एक हाथ से मेरी चूची को ब्रा के ऊपर से ही पकड़ कर मसल दिया। मैं हल्का विरोध करती रही पर मैंने उसको रोका भी नहीं।

मैं तो खुद कब से समर्पण करने के मूड में थी। यह तो राजू ने ही बहुत समय लगा दिया।

कुछ देर बाद ही मैंने विरोध बिलकुल बंद कर दिया और अपने आप को राजू के हवाले कर दिया।

राजू ने भी शायद देर करना उचित नहीं समझा और मेरी मैक्सी को मेरे बदन से अलग कर दिया। अब मैं सिर्फ ब्रा और पेंटी में राजू की बाहों में थी। राजू मेरे नंगे बदन को बेहद उत्तेजित होकर चूम और चाट रहा था। राजू ने अपनी मजबूत बाहों में मुझे उठाया और अंदर कमरे में ले गया। वहाँ मुझे बिस्तर पर लिटा कर मेरे ऊपर छा गया। मेरे बदन का रोम रोम राजू ने चूम डाला।

राजू की बेताबी मुझे बदहवास कर रही थी। मैं मस्त होती जा रही थी। मेरी सिसकारियाँ और सीत्कारें निकल रही थी।

" आह... राजू... यह क्या कर दिया रे तुमने? इतना वक्त क्यों गंवा दिया रे बावले... बहुत तड़पाया है तूने अपनी भाभी को... मसल डाल रे.. आह.." मैं मदहोशी की हालत में बड़बड़ा रही थी।

राजू ने मेरे बदन पर बची हुई ब्रा और पैंटी को भी मेरे बदन से अलग कर दिया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। वो जीभ से मेरे होंठों को चाट रहा था और मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में दबा कर चूम रहा था। अब मेरे हाथ भी राजू के कपड़े उतारने की कोशिश करने लगे। राजू जैसे समझ गया कि मैं क्या चाहती हूँ और उसने खड़े होकर अपने सारे कपड़े उतार फेंके।

कच्छा निकालते ही राजू का काला सा लण्ड निकल कर मेरे सामने तन कर खड़ा हो गया। राजू का मूसल आज मैंने पहली बार इतनी नजदीक से देखा था। नंग-धडंग राजू मेरे पास बिस्तर पर आकर बैठ गया और मेरी चूचियों से खेलने लगा। मेरा हाथ भी अपने आप राजू के लण्ड पर पहुँच गया और सहलाने लगा। राजू का लण्ड सच में अजय के लण्ड से ज्यादा मोटा और लम्बा था। और सच कहूँ तो राजू का लण्ड अजय के लण्ड से ज्यादा कड़क लग रहा था।

राजू मेरी चूचियाँ मुँह में लेकर चूस रहा था और मैं मस्ती के मारे आहें भर रही थी।

" आह... मेरे राजा.... चूस ले रे... ओह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है रे... जोर जोर से चूस रे.."

राजू मुझे चूमते-चूमते नीचे की तरफ बढ़ रहा था और मेरी चूचियों की जोरदार चुसाई के बाद अब वो जीभ से मेरे पेट और नाभि के क्षेत्र को चूम और चाट रहा था जो मेरे बदन की आग में घी का काम कर रहा था। मेरा बदन भट्ठी की तरह सुलगने लगा था और मैं राजू का लण्ड बार बार अपनी ओर खींच रही थी।

राजू का लण्ड लकड़ी के डण्डे की तरह कड़क था। राजू चूमते-चूमते मेरी जांघों पर पहुँच गया और उसने अपने होंठ मेरी चूत पर रख दिए।

मेरे सुलगते बदन से चिंगारियाँ निकलने लगी... मेरी सीत्कारें और तेज और तेज होती जा रही थी या यूँ कहें कि मैं मस्ती के मारे चीखने लगी थी।

मेरी चीखें बंद करने के लिए राजू ने अपना लण्ड मेरे मुँह में डाल दिया। मैं मस्ती के मारे राजू का लण्ड चूसने लगी। अब चीखें निकलने की बारी राजू की थी। पाँच मिनट की चुसाई के बाद मेरी चूत अब लण्ड मांगने लगी थी और मेरा अपने ऊपर काबू नहीं रहा था।

मैंने राजू को पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया। राजू मेरी बेताबी समझ चुका था। उसने अपना लण्ड मेरी चूत पर लगाया और एक जोरदार धक्का लगा दिया। हालाँकि मैं पूरी मस्ती में थी पर फिर भी धक्का इतना दमदार था कि मेरी चीख निकल गई। राजू ने मेरी चीख पर कोई ध्यान नहीं दिया और एक और दमदार धक्का लगा कर अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में स्थापित कर दिया।

दूसरा धक्का इतना जोरदार था कि लण्ड सीधा मेरी बच्चेदानी से जा टकराया और मैं बेहोश होते होते बची।

फिर तो राजू ने अपनी जवानी का पूरा जोश दिखा दिया और इतने जोरदार धक्कों के साथ मेरी चुदाई की मेरे बदन का रोम-रोम खिल उठा , मेरा पूरा बदन मस्ती के हिंडोले में झूले झूल रहा था। मैं गाण्ड उठा-उठा कर राजू का लण्ड अपनी चूत में ले रही थी।

" फाड़ दे मेरे राजा... अपनी भाभी की चूत को फाड़ डाल... ओह्ह्ह आह्ह चोद और जोर से चोद... मैं तो आज से तेरी हो गई मेरे राजू... चोद मुझे जोर.. से... ओह्ह आह्हह्ह सीईईईई आह्हह्ह...."

" जब से आया तब से तेरी चूत चोदने को बेताब था ! साली ने इतना वक्त लगा दिया चूत देने में...आह्हह्ह बहुत मस्त है भाभी तू तो.... ये ले एक खा मेरा लण्ड अपनी चूत में.."

हम दोनों मस्त होकर चुदाई में लगे थे और करीब पन्द्रह बीस मिनट के बाद मेरी चूत दूसरी बार झड़ने को तैयार हुई तो राजू का बदन भी तन गया और उसका लण्ड मुझे अपनी चूत में मोटा मोटा महसूस होने लगा। राजू के धक्के भी अब तेज हो गए थे।

और फिर राजू के लण्ड से गाढ़ा-गाढ़ा गर्म-गर्म वीर्य मेरी चूत को भरने लगा। वीर्य की गर्मी मिलते ही मेरी चूत भी पिंघल गई और बरस पड़ी और राजू के अंडकोष को भिगोने लगी। हम दोनों झमाझम झड़ रहे थे। हम दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाहों में जकड़ रखा था जैसे एक दूसरे में समा जाना चाहते हों।

कुछ देर ऐसे ही लेटे रहने के बाद मैं उठी और मैंने राजू का लण्ड और अपनी चूत दोनों को कपड़े से साफ़ किया। मेरा हाथ लगते ही राजू का लण्ड एक बार फिर सर उठा कर खड़ा होने लगा और कुछ ही पल में फिर से कड़क होकर सलामी देने लगा। मैं उठकर जाना चाहती थी पर राजू ने फिर से बिस्तर पर खींच लिया और अपना लण्ड एक बार फिर मेरी चूत में घुसा दिया और एक बार फिर जबरदस्त चुदाई शुरू हो गई।

तब से आज तक पता नहीं कितनी बार राजू ने मेरी चुदाई की... पति के जाने के बाद घर का काम खत्म होते ही राजू और मैं कमरे में घुस जाते और फिर बदन पर कपड़े बोझ लगने लगते हैं। फिर तो दो तीन घंटे हम दोनों नंग-धडंग बिस्तर पर सिर्फ और सिर्फ लण्ड चूत के मिलन का आनन्द लेते हैं.. और यह सब आज भी चल रहा है...

मेरी ननद भी अब राजू से चुदवा चुकी है। उसका भी जब दिल करता है वो मेरे घर आ जाती है और फिर दोनों राजू के लण्ड के साथ एक साथ मस्ती करती हैं। राजू का लण्ड भी इतना मस्त है कि कभी भी उसने हमें निराश नहीं किया। वो तो हर समय मुझे चोदने के लिए खड़ा रहता है।
 
राजा का फ़रमान

मैं वृंदा पहली बार अपना एक स्वप्न प्रस्तुत कर रही हूँ, मुझे अक्सर इस तरह के स्वप्न आते हैं !

और मैंने आज तक किसी को इनके बारे में नहीं बताया है, आज पहली बार बहुत हिम्मत करके लिखने का प्रयास कर रही हूँ !

इस स्वप्न में मैं एक ऐसे देश में पहुँच गई हूँ जहाँ का राजा बहुत ही क्रूर और कामोत्तेजित है, उसके देश में लड़कियाँ जैसे ही जवान होती हैं, उन्हें राजा के पास एक महीने के लिए भेज दिया जाता है और वो उनका कामार्य भंग करता है, उन्हें भोगता है और एक महीने बाद उन्हें अपने घर वापिस भेज देता है।

यदि कोई लड़की उसके बाद माँ बनती है, तो उसकी महल में वापसी राजा की रखैल के रूप में होती है वो वहाँ बच्चे को जन्म देने और चालीस साल पार करने के बाद दासी बन कर रहती है, जो कोई परिवार अपनी बेटी को राजा से भोग लगवाने नहीं भेजता, उसकी बेटी उठवा ली जाती और उसकी बाज़ार में बोली लगवाई जाती, जो उसे खरीदता वो सबके सामने उसे चोदता, खसोटता और उसे अपनी नोकरानी बना कर रखता अपने ख़ास आदमियों से उसे चुदाता और जब मन भर जाता तो फिर किसी को बेच देता!!

इस तरह जब मैंने वहाँ कदम रखा तो बहुत से मर्द मुझे बेचैन निगाहों से देखने लगे मेरे आसपास मंडराने लगे कोई मेरी गाण्ड छूकर चला जाता तो कोई फबतियाँ कसता यह कहते हुए कि आज तुझे रखैल नहीं, अपनी रानी बनाऊँगा।

एक ने तो हद ही कर दी, पीछे से आते हुए मेरी अन्तःचोली कपड़ों के भीतर से ही खोल दी !!! वहाँ कहीं जाकर चोली फिर से बंद करने की जगह नहीं थी तो मैं कुछ आगे बढ़ी, चलने से मेरी चूचियाँ हिलने लगी, तो एक आदमी सामने से आया और कहने लगा- तुम से नहीं संभल रही तो मैं थाम लूँ !!

उस पर मैंने उस आदमी पर हाथ उठा दिया, उसने हाथ पकड़ लिया और मुझे अपनी और खींच कर दूसरे हाथ से मेरी चूचियाँ मसल दी।

तभी वहाँ खड़े भूखे मर्द मेरी और बढ़ने लगे और बोले- आओ, इसे राजा के पास ले जाते हैं ! खूब बड़ा इनाम मिलेगा !

और सभी मुझे पकड़ कर राजा के दरबार में ले गए, दरबार बहुत बड़ा था, वहाँ बहुत सी दासियाँ थी, सभी दासियाँ अधनंगी थी, आते जाते मंत्री, तंत्री, रक्षक उन दासियों को छेड़ रहे थे, उनका बदन मसल रहे थे, बहुत कामुक माहौल था।

राजा ने सुनवाई शुरू की तो एक रखैल राजा की गोद में आ बैठी। राजा ने उसके बदन से सारे कपड़े उतार दिए और सुनवाई करते करते अपना लण्ड चुसवाने लगा।

सभी मंत्री इतनी सारी नंगी औरतों को देख कर अपना लण्ड अपने हाथों से मसल रहे थे।

तभी मेरी सुनवाई की बारी आई, बाहर हुई घटना विस्तार में बताई गई।

सब कुछ सुनकर राजा ने पूछा- इतना गुरूर किस बात का तुझे लड़की...? आखिर ऐसा क्या है तेरे पास? ये चूचियाँ? यह गाण्ड? यह चूत? ये तो हर औरत के पास होती है और इस देश में औरतों की कमी नहीं ! मेरी एक आवाज़ पर यहाँ चूतों की कतार लग जाती है।

तभी वो अपनी रखैल को चूमने लगा और उसने अपनी रखैल को कुछ इशारा किया और ताली बजाई।

रखैल उसके पैरों के पास लेट गई और हवा में टांगें करके उसने अपनी टांगें खोल के चूत उसके सामने पेश कर दी। देखते ही देखते बीस-पच्चीस रखैलें आई और अपनी टांगें खोल कर हर मंत्री के सामने चूत पेश करने लगी !!

मंत्रियों के मसलते लण्ड फुफकारने लगे, और सभी ने रखैलो की चूतों में अपने अपने लण्ड घुसा दिए और चुदाई करने लगे।

राजा ने पूछा- अब बोल लड़की !

मैं शर्म से पानी पानी हुए जा रही थी, मैंने राजा से जबान लड़ाई- आप यह सब क्यों कर रहे हैं...?

राजा बोला- ताकि तुझे तेरी औकात पता लगे कि तुम औरतें सिर्फ मर्दों से चुदने और चूसने-चुसवाने के लिए पैदा होती हो ! हाथ उठाने के लिए नहीं, और अगर हाथ उठ भी जाता है तो भी लण्ड के लिए उठना चाहिए...!!!

कहते हुए राजा ने फैसला सुनाया- आज से लेकर कल इसी समय तक तेरी लगातार चुदाई होगी और वो भी भरे महल में..!!!

राजा: सिपाहियो ले जाओ इस लड़की को और तैयार करो हमारे लिए ! इसकी अक्ल तो हम ठिकाने लगायेंगे, आजकल बहुत पर निकल आए हैं इन रांडों के !!

मुझे महल में ले जाया गया और स्नानघर में ले जाकर एक तालाब में कपड़ों समेत धकेल दिया गया। फिर सिपाही भी नंगे हो अन्दर उतर आए और मेरे बदन को धोने के बहाने मसलने लगे।

एक ने मेरी चूत में ऊँगली डाल दी, एक ने गाण्ड में अंगूठा घुसा दिया और हाथों की उंगलियों और हथेलियों से मेरी गोल-गोल गाण्ड को मसल कर मज़े लेने लगा।

एक ने मेरे चूचे दबोच लिए और एक मेरा दाना हिला हिला के मुझे तड़पाने लगा।

मेरे मुँह से आनन्द भरी आहें निकलने लगी।

तभी एक ने मेरे मुँह में दो उंगलियाँ डाल दी, कोई भी अपने औजार का प्रयोग नहीं कर रहा था, क्यूंकि सबको पता था कि मैं राजा का माल हूँ, और मुझ में मुँह मारना यानि जान से हाथ धोना !

तभी राजा अन्दर आया और मुझे 5-6 सिपाहियों के बीच कसमसाता देख मजे लेने लगा। मैं आँखें बंद कर आहें भर रही थी, मेरी अन्तर्वासना जाग चुकी थी, आँखों में कामवासना भर चुकी थी।

तभी जाने अनजाने मेरे हाथ एक सिपाही के लण्ड तक जा पहुँचे, सिपाही झेंपते हुए पीछे हो गया यह सोच कर कि राजा को पता लगा तो लण्ड कटवा देंगे!

मैं चुदने को तड़पने लगी।

तभी राजा ने सिपाहियों को जाने का इशारा किया और मेरी कामतन्द्रा टूट गई।

राजा पानी में उतर आया और उसने मेरे कंधे पर जोर से काट खाया, मेरा खून निकलने लगा और मुझे अपनी ओर खींचा...

राजा : मैं जानता हूँ कि तू अब खुद के काबू में भी नहीं है...

मैं : जा जा ! तुझ में इतनी हिम्मत नहीं कि किसी औरत का सतीत्व बिना उसकी मर्जी के तोड़ सके ! इतनी हिम्मत होती तो क्या औरतों पर जुल्म करता? उन्हें मजबूर करके अपनी रखैल बनाता? अपने फरमान से प्रजा को दुखी करता?? नहीं, तू तो एक नपुंसक है, जब तेरी कोई भी पत्नी माँ नहीं बन सकी तो तूने बाहरी औरतों का शोषण किया, तेरे जैसा बुज़दिल और बेगैरत इन्सान मैंने आज तक नहीं देखा..!!

राजा : मैं बेगैरत..? मैं बुज़्दिल..? तो तू क्या है? रण्डियो की रानी? जब सिपाही तुझे मसल कुचल रहे थे, तब कहाँ था तेरा सतीत्व..!!!

मैं : वो तेरे आदेश का पालन कर रहे थे और अगर मैं साथ न देती तो तू उनका क़त्ल करवा देता ! मेरी वजह से किसी बेक़सूर की जान जाये, यह पाप मैं अपने सर नहीं ले सकती..!!

राजा : अच्छा !!!

यह कहते ही राजा ने मेरी चूचियों पर से कपड़ा नीचे सरका दिया। मैंने बिन कंधे का टॉप पहना था और ब्रा तो रास्ते में ही खुल चुकी थी, सो चूचियाँ उसके सामने झूलने लगी और राजा की आँखों में लालच आने लगा...

उसने मेरी चूचियाँ थामने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए, मैं दो कदम पीछे हो गई, राजा भी देखते ही देखते आगे आ गया।

मेरे मन में एक तरकीब सूझी, राजा जैसे ही और आगे बढ़ा, मैंने पानी के अन्दर ही उसके लण्ड पर दबाव बनाया, राजा मन ही मन खुश हो रहा था, तभी उसकी शरारत भरी मुस्कान, दर्द भरी कराह में बदल गयी, मैंने उसका लण्ड जो मरोड़ दिया था।

राजा लण्ड पकडे वहीं खड़ा रहा और मैं वहाँ से भाग निकली।

राजा ने मेरे पीछे सैनिक लगा दिए, मैं एक शयनकक्ष में जा घुसी, शयन कक्ष खाली था, मैंने परदे उतार कर जल्दी से अपना बदन ढका, और एक मूरत के पीछे छिप गई।

तभी दरवाजे पे दस्तक हुई...

सिपाही: महारानी जी, यहाँ कोई स्त्री आई है..??

मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था सो मैंने जवाब दिया.. अगर जवाब न देती तो वो सिपाही अन्दर चला आता .!!!

मैं कमरे के भीतर से : नहीं यहाँ कोई नहीं आया, तुम जाओ हम कुछ देर विश्राम करना चाहते हैं..!!

सिपाही: महारानी जी, क्षमा करें, महाराज का आदेश है...!!!

तब तक मैंने महारानी के वस्त्र पहन लिए थे और खिड़की की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई और थोड़ा सा घूँघट भी निकाल लिया..

मैं : ठीक है, आ जाओ..

सिपाही कमरे में घुसा और कमरा तलाशने लगा, मेरे पास आया और सर झुका कर कहने लगा- क्षमा कीजिए महारानी जी ! यहाँ कोई नहीं है..!!

सिपाही के जाते ही मैं भी रानी के वेश में कमरे से बाहर निकली, ताज्जुब की बात तो यह थी कि कहीं पर भी कच्छी और ब्रा नाम की चीज़ नहीं थी, मैं महारानी के वस्त्रों में तो थी पर अन्दर से एकदम नंगी

! मेरे चूचे चलते-भागते हिल रहे थे, कि तभी मैं एक जगह जाकर छुपी..... और पकड़ ली गई।

जगह थी "वासना गृह"

वहाँ राजा नग्नावस्था में था, उसके आसपास उसकी बहुत सी रखैलें थी, एक की चूची एक हाथ में दूसरी की चूची दूसरे हाथ में, तीसरी छाती पर बैठी चूत चटवा रही थी, चौथी टट्टे चाट रही थी, पांचवी लण्ड

एक बार गाण्ड में लेती फिर उछल कर चूत में लेती।

परदे के पीछे से देख देख कर मैं अपना घाघरा उठा कर ऊँगली करने लगी, महारानी के कंगनों की आवाज़ से मैं पकड़ी गई।

राजा ने आपातकाल बैठक बुलाई, राज्य के सभी मर्दों को न्योता दिया गया, राजा नग्न अवस्था में ही बैठक में आया...

राजा ने फरमान सुनाया- इस लड़की ने मुझसे चुदने से इनकार किया है, इसलिए इसकी इसी दरबार में बोली लगेगी, ऐसी बोली जैसी आज तक किसी की नहीं हुई होगी। इस बोली के बाद इसका इसी सभा में चीरहरण होगा, उसके बाद यह रखैल तो क्या किसी की दासी बनने के लायक भी नहीं रह जाएगी, इसके चीर और यौवनहरण के बाद इसकी चूत और गांड सिल दी जाएगी, चूचे और जबान काट लिए जायेंगे। और हाँ, बोली लड़की की नहीं उसकी जवानी की लगेगी, चूचे, गाण्ड, गदराया बदन, जांघें, बाहें, होंठ, बगलें जिस्म के हर हिस्से की बोली लगेगी..!!!

यह सुन कर तो मेरे होश उड़ गए..

अब और क्या होना बाकी है मेरे साथ...?

मुझे मन ही मन डर लग रहा था..!!!

यह सुन सभा में ख़ुशी से शोरगुल होने लगा, लोग ठहाके लगाने लगे, फबतियाँ कसने लगे, भीड़ में से आवाज़ आई- आज मज़ा आयेगा ! मैं अभी घर से अशर्फ़ियाँ उठा लाता हूँ !

Cont.
 
मेरी तो हवा निकल रही थी कि अब जाने आगे मेरे साथ क्या होने वाला है, इससे पहले जो हुआ वो कम था क्या...!!!

कि अचानक आवाज़ आई..

राजा : बोली ठीक 15 मिनट बाद आरम्भ होगी ताकि आप सभी इस समय में इसके जिस्म का मुआयना कर लें और अपने हिसाब से बोली लगायें..!!!

मेरे जिस्म से कपड़े फाड़ कर फिंकवा दिए गए, लोगों की तो मौज हो गई।

तभी एक मंत्री ने राजा से अनुरोध किया- महाराज, क्या हम इसे छूकर देख सकते हैं? ताकि हमें भी भरोसा हो जाये कि जो माल हम खरीद रहे हैं उसमें किसी बात की कमी तो नहीं..!!!

राजा : ठीक है छू लो !! आखिर ग्राहक को भी पता होना चाहिए कि जिस चीज की वो कीमत दे रहा है वो असल में क्या है और कैसा है..!!! हा ह़ा हा हा !!

मंत्री मेरी तरफ बढ़ चला, तो भीड़ से आवाज़ आई- मंत्री जी छुइएगा नहीं ! कहीं पानी न छोड़ दे राण्ड..!!!

एक और आवाज़ आई- और अगर छू भी रहे हैं जनाब, तो मसल डालियेगा ! और हाँ ! जिस्म का कोई अंग ना रहने पाए..!!!

यह सुन कर लोग ठहाके लगाने लगे..

मैं नंगी खड़ी पानी-पानी हो रही थी, मुझे अब तक केवल पाँच लोगो ने छुआ था, राजा और उसके सिपाहियों ने और अब छठे की बारी थी।

वो आया और आते ही उसने मेरे केशों में हाथ फेरा, फिर अचानक से बालों को खींच कर उसने मुझे धक्का दिया और भीड़ की तरफ मुँह करके बोला- क्यों कैसी रही?

सभी लोगों ने उसे वाह-वाही दी।

फिर वो मेरी तरफ बढ़ा, दोनों हाथों से मेरे चूचे थाम कर बोला- बहुत गरम माल है ! ऐसा लग रहा है कि हाथों में पिघल रहा है !

और मेरे चूचे बेदर्दी से मसलने लगा। चूचे पकड़ कर उसने यकायक मुझे अपनी ओर खींचा और मेरी गाण्ड पर ज़ोरदार तमाचे लगाने शुरू कर दिए, कहने लगा- नीचे से भी कड़क है !

फिर उसने मुझे ज़मीन पर धकेल दिया और दो सिपाही बुलवा कर मेरी टांगें हवा में खुलवा दी, मेरी चूत की फांकें खोल कर बोलने लगा- अरे कोई चोदो इस राण्ड को ! वरना पानी बहा बहा कर पूरा महल अपने काम रस से भर देगी...!!!

भीड़ से आवाज़ आई- हम भी तो उसमें डूबना चाहते हैं !

तभी महामंत्री ने एलान किया- बोली शुरू की जाये !

पहली बोली महाराज की।

महाराज ने कहा- सबसे पहले होंठो की बोली, एक सौ सोने की अशर्फियाँ !

बोली बढ़ते-बढ़ते 2500 अशर्फियों तक पहुँची और फिर मेरे होंठ आखिरकार बिक गए, किसी साहूकार ने खरीदे थे।

साहूकार आगे आया और मेरे होंठो पर चूमने लगा, भरा दरबार मेरी लुट ती हुई इज्ज़त देख रहा था, मेरे होंठ चूसते हुए उसने अपनी जबान मेरे मुँह में डाल दी और मेरी गर्दन पकड़ ली।

सभी लोगों के मुँह में पानी आ रहा था, लार टपक रही थी।

फिर मेरी बगलों की बोली हुई, जिन्हें 1500 अशर्फियों में दो भाइयों ने खरीदा।

दोनों अपना लण्ड झुलाते, मेरे दोनों तरफ आ गए और दोनों ने अपने अपने लण्ड मेरी बगलों में घुसा दिए और घिसने लगे।

उधर साहूकार ने भी अपने फनफ़नाता लण्ड निकाला और सर की तरफ खड़े हो मेरा चेहरा अपनी ओर करते हुए अपना लण्ड मेरे मुंह में पेल दिया...

अब मेरे जिस्म पर तीन लण्ड थे।

फिर मेरे चूचों की बोली शुरू हुई।

महामंत्री ने मेरे चूचे 5000 अशर्फियों में खरीद लिए और आकर मेरी कमर पर बैठ मेरे चूचे चूसने लगे।

फिर मेरे हाथों की बोली लगी।

दो व्यपारियो ने मेरे हाथ खरीदे और अपने अपने लण्ड मेरे हाथों में मुठ मराने के लिए दे दिए।फिर बोली लगी मेरी गांड की !

दस हज़ार अशर्फियों में गाण्ड भी बिक गई।

गाण्ड का फूल कोमल था, उसे एक बलिष्ठ पहलवान ने खरीदा था।

वो आया और मुझे अपने नीचे सीधा करके लेटा लिया। इस तरह कि मेरा चेहरा छत की तरफ हो।

अब मुझ पर सात लण्ड सवार थे, दो हाथों में, दो बगलों में, एक चूचों में, एक मुँह में और एक गाण्ड में !

और अब बारी राजकुमारी चूत की थी !

वो इतने लण्डों की वजह से रस चो चो कर बेहाल थी।

मैं जल्दी ही अपनी चूत में एक मोटा ताज़ा लौड़ा लेना चाहती थी।

मेरी इज्ज़त तो लुट ही चुकी थी, मैं सबके सामने नंगी हुई अलग अलग जगह से चुद रही थी, मैं खुद पर अपना नियंत्रण खो चुकी थी।

इतने मर्द मेरे जिस्म से लिपटे थे, मैं इसी सोच में थी कि मुझे सुनाई पड़ा- इसकी चूत आपकी हुई !

मैंने मुँह से साहूकार का लण्ड निकाला और चेहरा उठा कर इधर-उधर देखा तो क्या देखती हूँ,

चूत राजा ने खरीदी थी, वो भी दस-बीस हज़ार में नहीं, पूरे एक लाख अशर्फियों में !

राजा आया, जो कि पहले से नंगा था, आकर मेरे ऊपर चढ़ गया और मेरी चूत में अपना लण्ड घुसाने की नाकाम कोशिश करने लगा...

उधर मेरा मुँह लण्ड खा-खा कर थक चुका था...कि साहूकार ने अपना काम रस छोड़ दिया, मेरे मुँह में भर दिया और उठ कर पूरी कामलीला देखने लगा..

मेरी बगलों से लंड-रस बह रहा था, चूचो पर महामंत्री जी अपने हाथों से घुन्डियाँ घुमा कर मुझे मीठी सी टीस दे रहे थे, हाथ वाले लण्ड, मैं अभी भी जोर जोर से हिला रही थी, और पहलवान मेरी गाण्ड फाड़ रहा था।

उस पर चोट खाए राजा ने जोर से एक झटका मारा और मेरी चूत फाड़ डाली।

मेरी चूत से खून नहीं निकला तो राजा बोला- तू तो खेली-खाई है, तो भी तेरे इतने नखरे हैं... ये ले ...!!!

कह कर उसने एक और ज़ोर से झटका मारा.... एक मीठी सी आह के साथ एक .. तैरती सी तरंग मेरे जिस्म में फ़ैल गई।
 
अब तो गाण्ड का दर्द भी जा चुका था... ऐसा लग रहा था जैसी दुनिया भर का समंदर मेरी दो टांगों के बीच समा गया है।

सभी मंत्रिगण मेरे हाल देख कर मुठ मार रहे थे...

महामंत्री मेरे चूचे और जोर से मसल मसल के दाँतों से काटने लगे...

मैं कराह रही थी.. आःह्ह्ह आआह्ह्ह्ह से दरबार गूँज रहा था...

मेरी आहें.. राजा और पहलवान को लुभा रही थी कि तभी राजा अपने हाथ से मेरी चूत का दाना छेड़ने लगा..

मैं तड़प उठी...

मैंने अपने हाथ से एक लण्ड छोड़ राजा के हाथ पर हाथ रख दिया और जोर-जोर से भींचने लगी.. राजा के हाथ को अपने दाने पर दबाने लगी..

तभी मंत्री जी ने अपना काम रस मेरे चूचों पर छोड़ दिया... और जिस्म से हट गए..

उन्होंने हटते ही मेरे होंठों पे ज़ोरदार चुम्मा दिया और बोले-. तू कमाल की है... अगर राजा का चूचे काटने का फरमान नहीं होता तो शायद में तेरे चूचे चूसने, दबाने के लिए तुझे हमेशा के लिए अपने पास रख लेता...

तभी साहूकार पिनियाते हुए आया और बोला- इसके होंठ मेरे हैं... तू क्यों चूम रहा है..?

महामंत्री बोला- अरे सबसे पहले तो तूने ही मुँह मारा है इस पर.. तू हट गया तो मैंने भी मार लिया अपना मुँह ! अब कुआँ चाहे किसी का भी हो, कुआँ पानी तो हर किसी को पिलाता है ना...?

दोनों व्यापारियों की भी पिचकारी छूटने लगी थी, दोनों ने मेरे चेहरे पर पिचकारी दे मारी.. और बोले- चाट इसको... नहीं तो फिर से मुठ मारेगी तू हमारी...

मेरी हालत.. सचमुच की रांडों जैसी हो गई थी कि तभी पहलवान छूटने लगा और दोनों हाथों से मेरे चूचों पर जो माल गिरा था उसे मेरे चूचों पर मसलने लगा...

महामंत्री खड़े खड़े तमाशा देख रहा था.. कि कराहट से मेरा मुँह खुल गया है...

तभी राजा मेरे ऊपर आया और मेरे होंठो को उसने अपने मुँह में भर लिया, काटने-खसोटने लगा...

तभी पहलवान झड़ने लगा और उसने सारा रास मेरी गाण्ड में ही छोड़ दिया...

उसका लण्ड छोटा होकर मेरी गाण्ड से बाहर आ गया..

अब राजा को मौका मिल गया.. वो तो पहले से ही मुझ पर सवार था..

अब मेरे जिस्म पर वो हक़ ज़माने लगा, कभी मेरे चूचे मसलता, कभी मेरे मुँह में हाथ डाल देता..

वो मेरी जवानी लूट रहा था और मैं कुछ नहीं कर पा रही थी..

इतने में उसने पहलवान को मेरे नीचे से हटने का मौका दिया..

अब मैं कालीन पर और राजा मेरी चूत में घुसा बैठा था...

वो अब मेरी गाण्ड में दो ऊँगलियाँ घुसाने लगा.. और मैं मदमस्त हुई अपनी जवानी का रस लुटा रही थी..

कि तभी अचानक राजा ने लण्ड निकाल कर मेरी गाण्ड में पेल दिया...

राजा अब झड़ने वाला था... राजा ने एक झटके से अपना लण्ड फिर मेरी चूत में पेला और झड़ने लगा...

आगे बढ़ कर मेरे होंठ चूसने लगा... उसने मेरी चूचक मसले ... और मेरे अन्दर ही झड़ गया... उसके बाद वो मुझ पर से हट गया ..

उसने सिपाहियो को मुझे खड़ा करने को बोला..

मैं कामरस में भीगी हुई थी, मेरे से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था..

जैसे तैसे मैं सिपाहियो के सहारे खड़ी हुई।

हवा में कामरस की खुशबू मुझे और चुदने को मजबूर कर रही थी...

सभी मर्द मुझ पर हंस रहे थे, मेरी बेबसी का मजाक बना रहे थे, राजा ठहाके लगा रहा था...

कि तभी मुझ पर जोर से पानी फेंका गया..

मेरी आधी बेहोशी चूर चूर हो गई, मेरे जिस्म से काम रस हट गया..

मेरा गोरा जिस्म सबकी निगाहों में चमकने लगा..

मेरे गीले बाल मेरी चूचियों को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे..

मेरे थरथराते होंठ पानी से भीग कर कई लण्डों को आमंत्रित कर रहे थे...

मेरी चमकती गाण्ड चुद कर और चौड़ी हो गई थी...

मेरी हालत देखने लायक थी...

सभी सभासद मेरा आँखों से बलात्कार कर रहे थे..

मैंने अपने हाथों से अपने लाल चूचों और बहती चूत को छिपाने की कोशिश की..

कि तभी दो सिपाही आए और मेरे जिस्म से मेरे हाथों को अलग कर अलग अलग दिशा में थाम लिया।

मैं नंगी खड़ी जमीन में गड़े जा रही थी..!!

सब मंत्री खड़े होकर मुझ पर थूकने लगे.. और ठहाके लगा कर हंसने लगे...

एक सिपाही दो लट्ठ लेकर आया, मोटे-मोटे लट्ठ, जो लंड से कई गुना बड़े और मोटे थे।

एक मेरी चूत में और दूसरा मेरी गाण्ड में घुसा दिया गया..

दर्द के मारे मैं चिल्लाने लगी...

तभी एक कसाई को बुलवाया गया.. ताकि वो मेरे चूचे और ज़बान काट सके..

कसाई अपने औज़ारों की धार तेज कर रहा था..

वो मेरे करीब आया और काटने के लिए उसने अपनी कटार उठाई..

कि तभी पीछे से आवाज़ आई..

राजा : रुको ...!!!

सभी सभासद बातें बनाने लगे..- यह क्या हो गया .. चिकने बदन पर राजा फिसल गया...!!!

राजा : इस लड़की ने जितना दर्द सहना था, सह चुकी... और ऐसा नहीं कि इसने सिर्फ दर्द सहा... इसने सिपाहियों के हाथों से मसले जाने पर आहें भी भरी.. और अपनी चूत की मादक सुगंध सूंघ कर यह भी चुदने को बेताब हुई.. इससे यह साबित होता है कि लड़की में जिस्म का गुरूर जरूर है.. पर यदि इसे ठीक ढंग से गर्म किया जाये तो यह 8-10 लड़कियों का मज़ा एक ही बार में दे सकती है... इसलिए मैं इसकी चूत, गाण्ड सिलने का आदेश वापिस लेता हूँ और लड़की पर छोड़ता हूँ कि वो मेरी सबसे प्यारी रखैल बनना चाहती है या गली मोहल्ले में नंगी घूमने वाली रंडी? या फिर किसी टुच्चे की रखैल बन कर अपनी जवानी बर्बाद करना चाहती है और नौकरानी बने रहना चाहती है सारी ज़िन्दगी..!!!

मैं राजा के हाथ लुट चुकी थी और कई मर्द मुझे अब भोग चुके थे... राजा की बाकी दासियों की तरह मैं भी उसके लण्ड की दीवानी हो चुकी थी..

इसलिए मैंने उसकी रखैल बन कर रहना मंज़ूर किया।

अब राजा हर रात मेरे साथ गुज़ारता, मैं हर वक़्त नंगी रहती...मेरी अन्तर्वासना हर समय जागृत रहती...

राजा जब आता, तब मुझे चोदता...

मेरे जीवन में अब वासना.. काम .. चुदाई.. लंड के सिवा कुछ नहीं रह गया था...

समाप्त !!!!

कैसा लगा मेरा स्वप्न.
 
भाभी ने मुझसे और भी कई तरीकों से .........

उस समय तक मेरे लण्ड पर बाल उग आए थे। मैं अक्सर रात को अपने बिस्तर पर नंगा लेट कर अपने लण्ड के बालों को सहलाया करता था एवं अपने लण्ड को खड़ा कर उसे सहलाता रहता था।

एक रात मैं अपने लण्ड को सहला रहा था। उसमे मुझे बहुत आनंद आ रहा था। अचानक मैंने जोर जोर से अपने लण्ड को अपने हाथ से रगड़ना शुरू किया। मुझे ऐसा करना बहुत अच्छा लग रहा था। अचानक मेरे लण्ड से मेरा माल निकलने लगा। उत्तेजना से मेरी आँखे बंद हो गई। ५-६ मिनट तक मुझे होश ही नहीं रहा। ये मेरा पहला मुठ था। इसके पहले मुझे इसका कोई अनुभव नहीं था। मैंने बाथरूम में जा कर अपने लण्ड को धोया और बिस्तर पे आया तो मुझे गहरी नींद आ गई।

अगली सुबह मैं अपने कमरे से बाहर निकला तो देखा कि भइया अपने ऑफिस के लिए तैयार हो रहे हैं। उनकी शादी हुए २ साल हो गए थे। भाभी मेरे साथ बहुत ही घुली मिली थी। मैं अपनी हर प्रोब्लम उनको बताया करता था। मेरे माता-पिता भी हमारे साथ ही रहते थे। थोड़ी देर में भईया अपने ऑफिस चले गए। पिता जी को कचहरी में काम था इस लिए वो १० बजे चले गए। मेरे पड़ोस में एक पूजा का कार्यक्रम था सो माँ भी वहां चली गई।

मैंने देखा कि घर में मेरे और भाभी के अलावा कोई नहीं है। मैं भाभी के कमरे में गया। भाभी अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी। मैं उनके बगल में जा कर लेट गया। मेरे लिए ये कोई नई बात नहीं थी। भाभी को इसमें कोई गुस्सा नहीं होता था। भाभी ने करवट बदल कर मेरी कमर के ऊपर अपना पैर रख कर अपना बदन का भार मुझे पे डाल दिया और कहा- क्या बात है राजा जो आप कुछ परेशान लग रहे हैं?

भाभी अक्सर मेरे साथ ऐसा करती थी।

मैंने कहा- भाभी कल रात को कुछ गजब हो गया, आज तक मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ था।

भाभी ने पूछा- क्या हुआ?

मैंने कहा- कल रात को मेरे लण्ड से कुछ सफ़ेद सफ़ेद निकल गया, मुझे लगता है कि मुझे डाक्टर के पास जाना होगा।

भाभी ने मुस्कुरा के पूछा- अपने आप निकल गया?

मैंने कहा- नहीं ! मैं अपने लण्ड को सहला रहा था तभी ऐसा हुआ।

भाभी ने कहा- राजा बाबू ! अब आप जवान हो गए हो, ये सब तो होगा ही ! लगता है कि मुझे देखना होगा।

भाभी ने अपना हाथ मेरे लण्ड के ऊपर रख दिया तथा धीरे धीरे इसे दबाने लगी। इससे मेरे लण्ड खड़ा होने लगा।

भाभी बोली- जरा दिखाइए तो सही !

मैं कुछ नहीं बोला। मैंने धीरे से अपने पैन्ट का बटन खोल दिया। भाभी ने मेरे पैन्ट को नीचे की ओर खींचा और उसे पूरी तरह उतार दिया। अब मैं सिर्फ़ अंडरवियर में था।

भाभी अंडरवियर के ऊपर से ही मेरा लण्ड को सहला रही थी, बोली- क्या इसी से कल रात को सफ़ेद सफ़ेद निकला था?

मैंने कहा- हाँ !

भाभी ने कहा- अंडरवियर खोलिए !

मैंने कहा- क्या भाभी जी ! आपके सामने मैं अपना अंडरवियर कैसे खोल सकता हूँ?

भाभी बोली- अरे जब आप मेरे को अपनी पूरी समस्या नहीं बतायेंगे तो मैं कैसी जानूंगी कि आपको क्या हुआ है? और मुझे क्या शरमाना? अपनों से कोई शरमाता है भला? जब आपके भइया को मेरे सामने अपने कपड़े खोलने में कोई शर्म नहीं है तो फिर आप क्यों शरमाते हैं?

मैं इस से पहले कि कुछ बोलता भाभी ने मेरा अंडरवियर पकड़ कर अचानक नीच खींच लिया। मेरा लण्ड तन के खड़ा हो गया।

भाभी ने मेरे लण्ड को अपने हाथ से पकड़ लिया और कहा- अरे राजा बाबू ! आप तो बहुत जवान हो गए हैं।

भाभी मेरे लण्ड को पकड़ कर सहला रही थी। मेरे लण्ड से थोड़ा थोड़ा पानी निकलने लगा। अचानक भाभी मेरे को जकड़ कर नीचे की तरफ़ घूम गई। इस से मैं भाभी के शरीर पर चढ़ गया। भाभी का शरीर बहुत ही मखमली था। भाभी ने मुझसे कहा - मुझे चोदियेगा?

मैं कहा- मैं नहीं जानता।

भाभी ने मेरे शरीर को पकड़ लिया और कहा- मैं सीखा देती हूँ, मेरा ब्लाउज खोलिए।

मैंने भाभी का ब्लाउज खोल दिया। भाभी का चूची एकदम सफ़ेद सफ़ेद दिख रहा था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि भाभी का चूची इतना सफ़ेद होगा। मैं भाभी के चूची को ब्रा के ऊपर से ही सहलाने लगा।

भाभी ने कहा- ब्रा तो खोलिए तब ना मज़ा आएगा।

मैंने भाभी का ब्रा भी खोल दिया। अब भाभी की समूची चूचियाँ मेरे सामने तनी हुई खड़ी थी। मैंने दोनों हाथो से भाभी की चूचियों को पकड़ लिया और कहा- क्या मस्त चूचियाँ है आपकी भाभी?

मैं भाभी के चुचियों को धीरे धीरे दबा रहा था । अचानक भाभी ने कहा- मेरी साड़ी खोलिए ना ! तब और भी मज़ा आएगा।

मैंने एक हाथ से भाभी की साड़ी को खोल दिया। भाभी अब सिर्फ़ पेटीकोट में थी। फ़िर मैंने भाभी को कहा- क्या पेटीकोट भी खोल दूँ?

भाभी बोली - हाँ।

मैंने बैठ कर भाभी के पेटीकोट का नाड़ा खोला और झट से उतार फेंका। अब मेरे सामने जो नजारा था, मैं उसकी कल्पना सपने में भी नहीं कर सकता था। भाभी की बुर एकदम सफ़ेद सी थी। उस पर घने घने बाल भी थे। मैं भाभी की बुर को देख रहा था। कितनी बड़ी बुर थी। बुर के अन्दर लाल लाल छेद दिख रहा था।

मैंने भाभी को कहा- आपके भी बाल होते हैं?

भाभी सिर्फ़ मुस्कुराई। भाभी बोली - छू कर तो देखिये।

मैं भाभी की बुर को धीरे धीरे छूने लगा। भाभी की बुर के बाल एक तरफ़ कर के मैं उसे फैला के देखने की कोशिश करने लगा कि इसका छेद कितना बड़ा है। मुझे उसके अन्दर छेद तो नजर आ रहा था पर भाभी से ही मैंने पुछा- भाभी ये छेद कितना बड़ा है?

भाभी ने कहा- ऊँगली डाल के देखिये न?

मैंने बुर में ऊँगली डाल दी। मैं अपनी ऊँगली को भाभी के बुर में चारों तरफ़ घुमाने लगा। बहुत बड़ी थी भाभी की बुर। मैं बुर से ऊँगली निकाल के भाभी के शरीर पर लेट गया। भाभी ने अपने दोनों पैर को ऊपर उठा के मेरे ऊपर से घुमा के मुझे लपेट लिया। मैंने भाभी के शरीर को जोर से पकड़ लिया।

मेरी साँसे बहुत तेज़ हो गई थी। मेरी पूरी छाती भाभी की चूचियों से रगड़ खा रही थी। भाभी ने मेरे सर को पकड़ के अपने तरफ़ खींचा और अपने होंठों को मेरे होंठों से लगा दिया।

मैं भी समझ गया कि मुझे क्या करना है? मैं काफी देर तक भाभी के होठो को चूमता रहा। चूमते चूमते मेरे शरीर में उत्तेजना भरती गई। मैं भाभी के होंठ छोड़ कर कुछ नीचे आया और भाभी की चूची को मुँह में ले कर काफ़ी देर तक चूसता रहा।

भाभी सिर्फ़ गर्म साँसें फेंक रही थी। फिर भाभी अचानक बैठ गई और मुझे बिस्तर पर सीधा लिटा दिया। मैं लेट कर भाभी का तमाशा देख रहा था। भाभी ने मेरे लण्ड को पकड़ कर सहलाना शुरू किया। वो मेरे लण्ड के सुपाड़े को ऊपर नीचे कर रही थी। मैं पागल हुआ जा रहा था।

भाभी ने अचानक मेरे लण्ड को अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगी। मेरा पूरा लण्ड मुंह में घुसा लिया। मैं एकदम से उत्तेजित हो गया।

मैंने भाभी को कहा- भाभी प्लीज ऐसा मत कीजिये !

लेकिन भाभी नहीं मानी। वो मेरे लण्ड को अपने मुंह में पूरा घुसा कर मज़े से चूस रही थी। अचानक मेरे लण्ड से माल निकलने लग गया। मेरी आँखें बंद हो गई। मैं छटपटा गया। मेरा सारा माल भाभी के मुंह में गिर रहा था लेकिन भाभी ने मेरे लण्ड को अपने मुंह से नहीं निकाला। और मेरा सारा माल भाभी पी गई।

२-३ मिनट के बाद मुझे होश आया। देखा भाभी मेरे शरीर पर लेटी हुआ है और मेरे होठों को चूम रही है। भाभी बोली- अरे वाह राजा जी ! अभी तो खेल बांकी है। अब जरा मुझे चोदिये तो सही।

मैं बोला- क्या अभी भी कुछ बांकी है? अब क्या करना है मुझे?

भाभी बोली- आप क्या करना चाहते हैं?

मैं बोला- जिस तरह से आपने मेरे लण्ड को चूसा उसी तरह से मैं भी आपके बुर को चूसना चाहता हूँ।

भाभी ने बिस्तर पे लेट कर अपनी दोनों टांगें अगल-बगल फैला दी। अब मुझे भाभी की बुर की एक एक चीज साफ़ साफ़ दिख रही थी। मैंने नीचे झुक कर भाभी के बुर में अपना मुँह लगा दिया। पहले तो बुर के बालों को ही अपने मुंह से खींचता रहा। फ़िर एक बार बुर के छेद पर अपने होंठ रख कर उसका स्वाद लिया।

बड़ा ही मज़ा आया। मैं और जोर से भाभी के बुर को चूसने लगा। चूसते चूसते अपनी जीभ को भाभी के बुर के छेद के अन्दर भी घुसा दिया। भाभी को देखा तो वो अपनी आँख बंद कर के यूँ कर रही थी जैसे कि कोई दर्द हो रहा है।

तभी भाभी की बुर से हल्का हल्का पानी के तरह कुछ निकलने लगा। मैंने उसका स्वाद लिया तो मुझे कुछ नमकीन सा लगा।

थोड़ी ही देर में मेरा लण्ड तन के खड़ा हो गया था। मैं भाभी के होठ को चूमने के लिए जब उनके ऊपर चढ़ा तो मेरा लण्ड उनकी बुर से सट गया। भाभी ने मेरे लण्ड को अपने हाथ से पकड़ लिया और कहा- राजा जी अब मुझे चोदिये न !

मैंने कहा- अभी भी कुछ बाकी रह गया है क्या?

भाभी धीमे से मुस्कुराई और कहा- अभी तो असली मज़ा बाकी है !

मैंने कहा- आप ही बताइए कि मैं क्या करुँ?

भाभी बोली- अब आप अपने लण्ड को मेरी बुर में डालिए।

मैंने कहा- इतना बड़ा लण्ड आपकी बुर के इतने छोटे से छेद में कैसे घुसेगा? भाभी बोली- आप डालिए तो सही !

भाभी ने अपने दोनों पैरों को और फैलाया। और मेरे लण्ड को पकड़ के अपने बुर के छेद के पास ले आई और बोली- घुसाइए !

मैंने संदेहपूर्वक अपने लण्ड को उनकी बुर के छेद में घुसाना शुरू किया।

ये क्याऽऽऽ?

मेरा सारा का सारा लण्ड उनकी बुर में घुस गया। मुझे बहुत ही मज़ा आया। भाभी को देखा तो उनके मुंह से सिसकारी निकल रही थी। मैंने झट से अपने लण्ड को उनकी बुर से बाहर निकाल लिया। भाभी ने कहा- यह क्या किया?

मैंने कहा- आपको दर्द हो रहा था ना?

वो बोली- धत ! आपके भइया तो रोज़ मुझे ऐसा करते हैं, इसमें दर्द थोड़े ही होता है, इसमें तो मज़ा आता है ! चलिए ! डालिए फ़िर से अपना लण्ड मेरी बुर के छेद में।

मैं इस बार अपने लण्ड को अपने आप से ही पकड़ कर भाभी के बुर के छेद के पास ले गया और पूरा का पूरा लण्ड उनकी बुर में घुसा दिया। भाभी के मुंह से एक बार फ़िर सिसकारी निकली। मैं उनकी बुर में अपना लण्ड डाले हुए १ मिनट तक पड़ा रहा। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या करना है। मैं अपने दोनों हाथो से भाभी के चुचियों से खेलने लगा।

भाभी बोली- खेल शुरू कीजिये ना।

मैं बोला- अब क्या करना है?

भाभी बोली- चोदना शुरू कीजिये ना !

मैं बोला- अभी भी कुछ बाकी है? अब क्या करुँ?

भाभी बोली- मेरे बुध्धू राजा बाबू ! अपने लण्ड को धीरे धीरे मेरी बुर में ही आगे पीछे कीजिये।

मैं बोला- मैं समझा नहीं।

भाभी बोली- अपनी कमर को आगे पीछे कर के अपने लण्ड को मेरी बुर में आगे पीछे कीजिये।

मैंने ऐसा ही किया। अपने कमर को आगे पीछे कर के लण्ड को भाभी के बुर में अन्दर बाहर करने लगा। भाभी का शरीर ऐंठने लगा।

मैं बोला- निकाल लूँ क्या भाभी?

भाभी बोली - नही ! और जोर से चोदिये।

मैंने भाभी की कमर को अपने हाथ से पकड़ लिया और अपने लण्ड को उनकी बुर में आगे पीछे करने लगा। मुझे अब इसमें काफ़ी मजा आ रहा था। मेरा लण्ड उनकी बुर से रगड़ा रहा था। मैं पागल सा होने लगा।

५ मिनट तक करने के बाद देखा कि भाभी की बुर से पानी निकल रहा था। भाभी अब निढाल सी हो रही थी। मैंने भाभी के शरीर पर लेट कर उनकी चुदाई जारी रखी।

भाभी बोली- जल्दी जल्दी कीजिये राजा जी !

मैं बोला- कितनी देर तक और करुँ?

वो बोली- मेरा तो माल निकल गया है, आपका माल जब तक नहीं निकलता तब तक करते रहिये।

मैंने और जोर जोर से उनको चोदना जारी कर दिया। उनका सारा शरीर मेरे चुदाई के हिसाब से आगे पीछे हो रहा था। उनकी चूचियां भी जोर जोर से हिल हिल कर ऊपर नीचे हो रही थी। मुझे ये सब देखने में बहुत मज़ा आ रहा था। मैं सोच रहा था कि ये चुदाई का खेल कभी ख़तम ना हो।

तभी मुझे लगा कि मेरे लण्ड से माल निकलने वाला है। मैं भाभी को बोला- भाभी मेरा लण्ड से माल निकलने वाला है।

भाभी बोली- लण्ड को बुर से बाहर मत निकालिएगा। सब माल बुर में ही गिरने दीजियेगा।

मैंने उनको चोदना जारी रखा। १५-२० धक्के के बाद मेरे लण्ड से माल निकलना शुरू हो गया। मेरी आँख जोर से बंद हो गई। मैंने अपने लण्ड को पूरी ताकत के साथ भाभी की बुर में धकेलते हुए उनके शरीर को कस के पकड़ के उनको लिपट कर उनके ही शरीर पर गिर गया, बोला- भाभी, फ़िर माल निकल रहा है।

भाभी ने मुझे कस के पकड़ के मेरे कमर को पीछे से पकड़ कर अपने तरफ़ नीचे की ओर खींचने लगी। २ मिनट तक मुझे कुछ होश नहीं रहा।

आँख खुली तो देखा मैं अभी भी भाभी के नंगे शरीर पे पड़ा हूँ। भाभी मेरे पीठ को सहला रही थी। मेरे लण्ड से सारा माल निकल के भाभी के बुर में समां चुका था। मेरा लण्ड अभी भी उनके बुर में ही था। मैं उनके चूची पर अपने सीने के दवाब को बढ़ते हुए कहा- क्या इसी को चुदाई कहते हैं?

भाभी बोली - हाँ, कैसा लगा?

मैंने कहा- बहुत मज़ा आता है ! क्या भईया आपको ऐसे ही करते हैं?

वो बोली- हाँ, लगभग हर रात को !

मैं कहा- क्या अब मुझे आप चोदने नहीं दोगी?

वो बोली- क्यों नहीं? रात को भइया की पारी और दिन में तुम्हारी पारी।

मैंने कहा- ठीक है।

भाभी बोली- जब तुम्हें मौका नहीं मिले अपने हाथ से ही लण्ड को सहला लेना और माल निकाल लेना।

मैंने कहा- ठीक है। उसके बाद मैंने अपना लण्ड को उनकी बुर से निकाला। भाभी ने उसे अपने हाथ में लिया और कहा कि रोज़ इसमें तेल लगाया कीजिये। इस से ये और भी बड़ा और मोटा होगा।

भाभी के बुर को मैं फ़िर से सहलाते हुए पुछा- मुझे नहीं पता था कि इस के अन्दर इतना बड़ा छेद होता है।

भाभी बोली- सुनिए, कल आप अपने लण्ड के बाल को शेव कर लीजियेगा। मैं भी आज रात को शेव कर लूंगी।

तब कल फिर आपको चोदने के और भी तरीके बताऊँगी। और हाँ ! यह बात किसी को बताइयेगा नहीं।

इसके बाद भाभी ने मुझसे और भी कई तरीकों से अपनी चुदवाई कराई। आज तक किसी को इस बात का नहीं चला।
 
श्रेया के साथ

मेरा नाम संजय है। पंजाब के जालंधर शहर का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र 24 साल है, रंग साफ़, दिखने में अच्छा हूँ। लण्ड का आकार भी ठीक-ठाक है, वैसे कभी नापा नहीं। मैं यहाँ भारत में अकेला रहता हूँ, मेरी मम्मी-पापा विदेश में रहते हैं। मैंने कंप्यूटर में डिग्री की है। डिग्री पूरी करने के बाद मैंने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। दरअसल मैं एक कंप्यूटर प्रोफेसर बनना चाहता हूँ इसलिए सोचा क्यों ना स्कूल से शुरुआत की जाए।

उस स्कूल में मुझे नौवीं से बारहवीं तक के बच्चों को कंप्यूटर सिखाना था। सभी कक्षाओं में लड़के और लड़कियों की संख्या तक़रीबन बराबर बराबर ही थी। लड़कियाँ एक से बढ़कर एक सुंदर और चालू थी। दरअसल एक तो जिस शहर में पढ़ाता हूँ वहाँ पर लड़कियाँ बहुत फ्रेंक हैं, दूसरे उस स्कूल में सब प्रौढ़ अध्यापक हैं। इसलिए जब लड़कियों ने मुझे अपने अध्यापक के रूप में देखा तो सब बहुत खुश हो गई।

स्कूल काफी बड़ा था और कक्षाओं में बच्चे भी काफी थे लेकिन कंप्यूटर लैब में कंप्यूटर 12 ही थे। इसलिए मुझे एक एक कक्षा को 2 भागों में बांटकर पढ़ाने के लिए कहा गया।

और यहीं से मेरे गंदे दिमाग ने काम कर दिया। मैंने हर कक्षा के लड़कों को अलग और लड़कियों को अलग से कंप्यूटर सिखाना शुरू किया।

इससे मेरा यह डर निकल गया कि अगर मैं किसी लड़की से छेड़खानी करूँगा तो कम से कम कोई मेरी शिकायत नहीं करेगा क्योंकि हर लड़की पहले ही दिन से मुझे बड़ी वासना भरी निगाह से देख रही थी।

असली मजा शुरु हुआ तीसरे दिन से।

अब सब लड़कियाँ बड़ी सजधज कर, मेकअप करके आने लगी थी। उस दिन बारिश हो रही थी और शनिवार था। हर कक्षा में बच्चे बहुत कम आये थे और एक दो अध्यापक भी छुट्टी पर थे इसलिए मुझे बोला गया कि मैं बारहवीं कक्षा के बच्चों का टेस्ट ले लूँ।

लड़के तो 2 ही आये थे और लड़कियाँ 12-13 आई थी। मैंने उनको एक कतार में बिठाया और कुछ प्रश्न हल करने के लिये दे दिये।

एक लड़की कतार के आखिर में बैठी थी, उसका नाम श्रेया था, वो बार बार मेरी ही तरफ़ देख रही थी। जब भी मैं उसे देखता तो मुस्कुराने लगती।

मैंने सोचा कि पहले इसी पर कोशिश करता हूँ।

मैं चलते चलते उसके पीछे आया। वो एक स्टूल पर बैठी थी। उसके पीछे से गुजरते हुए मैंने उसकी पीठ पर हाथ फ़ेर दिया। वो एकदम से कांप गई पर बोली कुछ नहीं। जब मैंने उसे घूम कर देखा तो वो फ़िर से मुस्कुराने लगी।

मैं समझ गया कि रास्ता साफ़ है।

थोड़ी देर बाद मैं फ़िर से घूमते हुए उसके पीछे आया और इस बार उसकी पीठ पर हाथ फ़ेरने के साथ ही धीरे से उसका एक मुम्मा भी दबा दिया।

वाह ! मजा आ गया।

मैंने पहली बार किसी लड़की को छेड़ा था। ऐसे ही मैंने उसको दो-तीन बार छेड़ा।

वो बुरी तरह से कांप रही थी। इससे मुझे लगा कि यह भी अभी कुंवारी है।

मैंने सोचा कि क्यों ना इसे घर पर बुलाया जाये !

पर कैसे?

अचानक मेरे दिमाग में एक तरकीब आई। मैंने कक्षा में सबको कह दिया कि जिसको लैक्चर समझ में नहीं आया वो मेरे घर पर आकर समझ सकता है।

यह बात कहने के साथ साथ मैं उसे देख भी रहा था।

श्रेया बहुत खुश हुई।

उसे खुश देखकर मैं भी खुश था कि शायद वो घर पर आ ही जाए।

कक्षा खर्म करने के बाद मैं लाईब्रेरी में जाकर बैठ गया। उस वक्त लाईब्रेरी में मेरे सिवा सिर्फ़ एक लाईब्रेरियन था जो दूसरे सैक्शन में बैठा किताबें सैट कर रहा था।

तभी श्रेया लाईब्रेरी में आई, वो शायद मुझे ही ढ़ूंढ़ रही थी।

वो मेरे पास आकर बोली- सर, मैं और मेरी सहेली श्वेता आपके घर पर आकर आपके साथ कुछ टॉपिक्स डिस्कस करना चाहती हैं।

मैं- ठीक है। पर अच्छा होगा कि तुम अकेली ही आओ क्योंकि मेरे पास एक ही कम्प्यूटर है। अगर तुम अकेले आओगी तो तुम्हेंअच्छे से समझा दूँगा।

ऐसा कहते कहते मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फ़ेर दिया। उसका चेहरा एकदम लाल हो गया और उसने हाँ में सिर हिलाया और चलने लगी।

अभी वो दरवाजे पर ही थी कि मैंने उसे आवाज लगाई- श्रेया !

श्रेया- जी?

मैं- कल भी स्कर्ट पहन कर आना।

और वो शरमा कर भाग गई।

अगले दिन एक बजे तक सब नौकर अपना-अपना काम निबटाकर चले गए। मैंने भी दुबारा से नहा-धो कर लोअर और टी-शर्ट पहन ली। मैंने जानबूझ कर लोअर के नीचे अंडरवियर नहीं पहना।

ठीक 1:25 पर घण्टी बजी। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, मैं तो एकदम से सुन्न ही रह गया। ऐसे लगा जैसे एक परी मेरे सामने खड़ी है। वो सफ़ेद स्कर्ट और नीली टी-शर्ट में थी, उसकी स्कर्ट पैरों तक लम्बी थी, टी-शर्ट में उसके मम्मे एकदम मस्त लग रहे थे, जी कर रहा था कि अभी पकड़ कर दबा दूँ। उसके होंठ एकदम रसीले लग रहे थे। अचानक उसने एक चुटकी बजाई तो मैं जैसे नींद से जागा।

वो बोली- अंदर आऊँ या नहीं?

मैं- माफ़ करना। आओ ! आओ !

वो अंदर आ गई। मैंने उसे सोफ़े पर बिठाया और उसके लिए पानी लेकर आया।

वो बोली- अरे सर, आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं !

मैं- कोई बात नहीं।

उसने पानी पिया। पानी पीते हुए भी वो मेरी तरफ़ ही देख रही थी। पानी पिलाने के बाद मैं उसे अपने बैडरूम में ले गया जहाँ मेरा कम्प्यूटर रखा था।

वो कम्प्यूटर के सामने वाली स्टूल पर बैठ गई और मैं भी उसके साथ ही उसके बाएँ वाली स्टूल पर बैठ गया। उसे समझाते समझाते कभी मैं उसकी जांघ पर हाथ रख देता तो कभी धीरे से उसके मम्मे को छेड़ देता।

कुछ देर बाद मैंने जानबूझ कर अपने हाथ में पकड़ी हुई पैंसिल नीचे फ़ेंक दी और उसे उठाते वक्त ्जानबूझ कर पेंसिल की नोक उसकी स्कर्ट के नीचे कर दी, इससे पेंसिल के साथ साथ उसकी स्कर्ट भी ऊपर उठ गैइ और उसकी गोरी मखमली जांघे उघड़ कर मेरे सामने आ गई। मैंने उसकी टांगों पर हाथ फ़िरा दिया तो उसकी आँखें बन्द हो गई और उसने शरमा कर अपनी स्कर्ट नीचे कर ली।

कुछ देर ऐसे ही मैं किसी ना किसी बहाने उसे छेड़ता रहा।

कुछ देर बाद मैं खड़ा होकर उसके पीछे आया और उसके कंधों पर अपने दोनों हाथ रख दिए। उसने आँखें बंद कर ली और होंठों पर जीभ फ़िराने लगी। थोड़ी देर बाद मैं हाथ उसके दोनों मम्मों पर ले आया और धीरे धीरे दबाने लगा। 2-3 मिनट बाद वो भी सिसकारियाँ सी भरने लगी।

कुछ देर बाद मैंने उसका चेहरा पीछे घुमाया और उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए।

वाह ! मजा आ गया, ऐसा लगा जैसे मेरे मुँह में शरबत घुल गया हो।

दस मिनट तक मैं ऐसे ही उसके होंठ चूसता रहा। कुछ देर बाद मैंने अपने मुँह में एक कैंडी रख ली और फ़िर से उसे किस करना शुरु कर दिया। किस करते हुए मैं उसके मम्मे भी दबा रहा था। धीरे धीरे मैं कैंडी को हमारे होंठों के बीच ले आया और उसे तब तक चूमता रहा जब तक कैंडी खत्म ना हो गई।

थोड़ी देर बाद जब मैंने उसे छोड़ा तो वो मजाक करते हुए बोली- अरे, कैंडी कहाँ गई?

मैं- अभी बताता हूँ।

और मैंने फ़िर से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए।

चुम्बन करते हुए मैं उसके पीछे ही खड़ा था। मम्मे दबाते और लगातार चुम्बन करते हुए मैंने उसे खड़ा किया और उसी अवस्था में चलता हुआ मैं बिस्तर पर बैठ गया। उसे मैंने अपनी गोद में बिठा लिया। उस वक्त भी उसकी मेरी तरफ़ पीठ ही थी। मैं उसके मम्मे दबाता रहा और वो सिसकारी भरती रही।

कुछ देर बाद मैंने उसके होंठ छोड़े और बिस्तर पर लेट गया और उसको भी अपने ऊपर ही लिटा लिया। लोअर में मेरा लण्ड खड़ा उसकी गाण्ड में घुसने की कोशिश सी कर रहा था। उसको भी बहुत मजा रहा था।

कुछ देर बाद मैंने उसके मम्मे छोड़े और लेटे लेटे ही दोनों हाथ उसकी स्कर्ट में डाल दिए। लेकिन मैंने उसकी चूत को नहीं छेड़ा। पहले मैंने उसकी दोनों जांघों को सहलाना शुरु किया। 2-3 मिनट तक मैं उसकी जांघों को सहलाता रहा।

कुछ देर बाद मैंने अपना एक हाथ उसकी पैंटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर पर रखा तो ऐसे लगा जैसे भट्टी पर हाथ रख दिया हो। उसकी चूत तप रही थी और वो भी बुरी तरह से कांप रही थी।

जब मैंने एक उंगली उसकी पैंटी के अन्दर सरका कर उसकी चूत का जायजा लिया तो पाया कि उसकी चूत पर एक भी बाल नहीं था, एकदम फ़ूल की तरह कोमल थी उसकी चूत। कुछ कुछ गीली भी थी। मैं एक ही उंगली से धीरे धीरे उसकी चूत को सहलाता रहा।

जब मैंने चूत को हल्के से दबाया तो उसमे से कुछ पानी निकल आया जिससे मेरी पूरी उंगली गीली हो गई। मैंने वो उंगली उसके मुँह में डाल दी, वो उसको चाटने लगी। फ़िर तो बस यही सिलसिला चल निकला। 4-5 मिनट तक ऐसा ही चलता रहा, मैंने उसे खूब उसकी चूत का रस चटवाया।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे बिस्तर पर सीधा करके लिटा दिया। मैं उसके ऊपर सीधा लेट गया और उसके होंठों पर चूमने लगा। 3-4 मिनट चुम्बन करने के बाद मैं बैठ गया और अपना सिर उसकी स्कर्ट के अंदर डाल दिया।

धीरे धीरे मैं उसकी दोनों टांगों को चाटने लगा और अपने हाथों से उसकी जांघों को सहलाने लगा। उसका पूरा शरीर बुरी तरह से कांपने लगा, वो सिसकारियों पर

सिसकारियाँ भर रही थी।

धीरे धीरे मैं थोड़ा ऊपर आया और उसकी जांघें चाटने लगा। साथ साथ मैं उसके मम्मे भी दबा रहा था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने दुनिया भर का नशा कर लिया हो। एक

तो उसका पूरा बदन फ़ूल की तरह कोमल था, दूसरे उसकी चूत के रस की मदहोश करने वाली खुशबू आ रही थी। थोड़ी देर बाद मैंने अपनी जीभ उसकी पैंटी के ऊपर से ही चूत पर फ़िरानी शुरु कर दी। जैसे जैसे मैं अपनी जीभ फ़िरा रहा था, वैसे वैसे उसकी उसकी सिसकारियाँ भी तेज हो रही थी।

थोड़ी देर बाद मैंने उसकी पैंटी दांतों से नीचे की और उसकी चूत पर हल्के से चूमा फ़िर अपने दोनों हाथ नीचे ले जाकर उसकी पैंटी को नीचे करके घुटनों तक उतार दिया और उसकी चूत को मैंने अच्छी तरह से निहारा, एकदम गुलाब जामुन की तरह लग रही थी, चूत का दाना बुरी तरह से फ़ड़फ़ड़ा रहा था।

धीरे धीरे मैंने अपनी जीभ उसके दाने के आसपास फ़िरानी शुरु की और दाने के आसपास जो पानी था वो चाटने लगा। उसने अपनी दोनों टांगों को स्कर्ट पहने-पहने ही मेरे सिर के इर्द-गिर्द लपेट दिया और अपने हाथों से मेरे सिर के बालों को जोर जोर से खींचने लगी।

मैंने अपना पुरा मुँह खोला, जीभ सीधी की और मुँह उसकी चूत पर लगा दिया।

और यह क्या?

उसका पूरा शरीर ऐसे कांपने लगा जैसे बिजली का झटका लग गया हो और वो झर झर झड़ने लगी। सारे का सारा पानी मेरे मुँह में ही गया।

वाह! क्या स्वाद था। एक दम खट्टा सा।

हम दोनों एक दम नशेड़ी लग रहे थे, हम दोनों की आँखें बंद थी।

थोड़ी देर बाद मैंने अपना सिर बाहर निकाला। अभी मैं सीधा भी नहीं हुआ था कि उसने मुझे खींच कर अपने ऊपर गिरा लिया और पागलों की तरह चूमने लगी। साथ ही साथ वो अपनी गाण्ड को उठाकर स्कर्ट के ऊपर से ही मेरे लण्ड पर रगड़ रही थी। मैंने अपनी लोअर नहीं उतारी थी फ़िर भी मुझे इतना मजा आ रहा था कि क्या बताऊँ।

कुछ देर की चूमाचाटी के बाद मैंने बिस्तर पर खड़े होकर अपनी लोअर उतार दी। टी-शर्ट नहीं उतारी क्योकि सुना है कि सारे कपड़े उतार कर सेक्स करने का मजा नहीं आता। उसकी भी मैंने सिर्फ़ पैंटीही उतारी, स्कर्ट और टी-शर्ट नहीं उतारा। फ़िर मैं बेड पर बैठ गया और उसे अपनी गोद में बिठा लिया। वो एक दम फ़ुल की तरह हल्की थी। मैंने उसकी गाण्ड पर हाथ रख कर उसे ऊपर उठाया और अपने लण्ड पर बैठा लिया। पर लण्ड उसकी चूत में जा ही नहीं रहा था क्योंकि वो कुँवारी थी।

मैंने उसे बोला- मैं तेल की शीशी लेकर आता हूँ। अगर ऐसे ही डाल दिया तो तुम्हें बहुत दर्द होगा।

श्रेया - सर, अब कंट्रोल नहीं होता। अब ऐसे ही डाल दीजिए।

ऐसा कहते कहते वो खुद ही मेरे लण्ड पर बैठ कर जोर लगाने लगी। तो मैंने भी उसकी गाण्ड पकड़ कर जोर का धक्का दिया। आधा इंच लण्ड उसके अंदर था। वो चीखने लगी। पर मैं रुका नहीं। चार पाँच झटकों में पूरा लण्ड उसकी चूत के अंदर डाल दिया। उसका चीख चीख कर बुरा हाल था। थोड़ी देर बाद वो सामान्य हुई तो मैंने उसकी गाण्ड को उठाकर धक्के देने शुरु कर दिए।

उसे भी अब मजा आ रहा था, वो चिल्ला रही थी- और तेज सर, और तेज ! आह…… मजा आ रहा है, फ़क मी सर, फ़क मी।

उसे चोदते चोदते मैंने उसका एक मम्मा अपने मुँह में ले लिया और उसे बुरी तरह चूसने लगा। उसने अपनी टी-शर्ट नीचे कर ली। यानि मेरा सिर अब उसकी टी-शर्ट के अंदर था। धक्के लगाते लगाते मैंने अपनी एक ऊँगली उसकी गाण्ड में डाल दी। उसकी एक चीख निकल गई पर वो रुकी नहीं ओर ना ही मैं रुका। मैं धक्के पर धक्का लगा रहा था। उसकी चूत के पानी और खून से मेरी जांघें भर चुकी थी। पर इससे मुझे बहुत आनन्द आ रहा था।

12-13 मिनट के बाद वो तीसरी बार झड़ी। अब वो रुकने की प्रार्थना करने लगी। मैंने सोचा कि अब अगर रुक गया तो मैं कैसे झड़ुँगा? तो मैंने उसे चोदते चोदते ही बिस्तर की चादर के नीचे से एक बबल गम निकाली और रैपर समेत ही उसके मुँह में डाल दी। वो मुझे मेरे एक दोस्त ने दी थी। उससे शरीर की सारी गर्मी कुछ मिनटों में ही निकल जाती है। पर उसे लगा कि ये पहले की तरह ही कोई आम कैंडी है। वो उसे मजे ले लेकर चबाने लगी। एक मैंने अपने मुँह में भी डाल ली क्योकि मैं मजे का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहता था।

थोड़ी देर बाद हम दोनों का शरीर पूरी तरह लाल हो गया। वो भी अब मुझसे ज्यादा जोर से धक्के लगाने लगी और साथ साथ चिल्ला भी रही थी- ओह, फ़क मी, हेल्प मी, सर। आई लव यू सर।

नीचे उसका झड़ झड़ कर बुरा हाल था। चादर भी गीली हो गई। आखिर के समय तो हम दोनों जैसे मशीन ही बन गए थे। मैं भी उस समय उसे चोदते चोदते तीन बार झड़ा। उसके झड़ने की तो कोई गिनती ही नहीं थी। जैसे ही मैं चौथी बार झड़ा तो मैंने उसे बेड पर लिटाया और खुद उसके ऊपर गिर प्ड़ा। उस गीले बेड पर लेटने के बाद भी हम दोनों गहरी नींद में सो गए।

एक घण्टे बाद मेरी आँख खुली। वो अभी भी सो रही थी। मैंने उसे जगाया और बड़ी मुश्किल से उसे खड़ा किया। उसकी चूत सूज कर सेब बन चुकी थी। किसी तरह उसे सहारा देकर मै बाथरुम में लेकर आया। बाथरुम में हम दोनों ने इकट्ठे ही पेशाब किया और फ़िर इकट्ठे ही नहाए। फ़िर मैंने चादर भी धो दी।

उसके बाद हम दोनो ने काफ़ी के दो दो मग पिए।

फ़िर मैं उसे बाहर तक छोड़ने आया और बोला- अगली बार अपनी सहेली को भी लेते आना। हम दोनों मिलकर उसे कम्प्यूटर सिखाएंगे।

उसने जोर से मेरे होंठो पर चूमा और बाय करती हुई चली गई।
 
कैसीमेरीदीवानगी

मेरी उम्र तेतीस साल है, इस उम्र में भी मेरा अंग-अंग खिला हुआ है, अभी भी मेरे जिस्म से जवानी वाली खुशबू निकलती है।

मैं जन्म से एक गाँव की हूँ, अपनी चालाक माँ की तरह मैं एक बहुत चालाक लड़की निकली थी, लड़के क्या मुझे फ़ंसाएँगे, मैं उनको अपने जाल में फ़ंसाना जानती हूँ। मैं अभी-अभी एक बच्चे की माँ बनी हूँ, दस महीने पहले !

मेरा चुदना स्कूल से चालू हो गया था, संस्कार ही वैसे थे, पापा के विदेश जाने के बाद और फिर चाचा भी पीछे-पीछे विदेश च्ले गए। पीछे मटरगश्ती के लिए दो बला की खूबसूरत बीवियाँ छोड़ गए मेरे बापू और चाचू यानि मेरी माँ और चाची ! खर्चा वहाँ से आता था लेकिन बिस्तर यहीं किसी और के संग सजाती थी दोनों !

वैसे तो मैं काफ़ी छोटी थी जब एक लड़के ने मुझ पर हाथ फेरा था, तब मेरी छाती पर नींबू थे, उसका नहीं मेरा कसूर था, फिल्में देखदेख मेरा भी मन फ़िल्मी बन गया था। वो बेचारा तो मुझसे भागता था मगर मैं उसके पीछे पड़ गई हाथ धोकर, जब उसका जवाब नहीं मिला तो एक दिन मैं उसके घर चली गई। वो मेरा पड़ोसी था, अकेला घर था, मैंने उसका कालर पकड उसको खींचा और कहा- लड़का है या पत्थर? एक लड़की तुझे खुद प्यार करना चाहती है और तू है कि बस देखता ही नहीं?

" तुम अभी बहुत छोटी हो!"

" कौन कहता है? कहाँ हूँ छोटी?"

उठक र उसके होंठ चूम लिए और बोली- देखो, मुझे सब कुछ पता है कि लड़का लड़की को क्या करता है।

मैंने उसकी टी शर्ट उतार दी, वो गुस्सा होने लगा तो मैंने फ्रॉक उठाकर कहा- यह देखो यहाँ भी बाल आने लगे हैं!

मैं बिनापैन्टीकेथी।

" तू पागल हो गई क्या?"

मैंने ज़बरदस्ती उससे हाथ फिरवाया लेकिन बाद में वो बहुत पछताता रहा कि क्यूँ उसने मेरी पतंग की डोर छोड़ी। वो मुझे हवा में उड़ाना चाहता था लेकिन मैं औरों से उड़ने लगी थी।

धीरे धीरे नींबू अब अनार बन गए, वो भी रसीले ! मैं खुले आम लड़कों को लाइन देती थी, सभी मेरी इस अदा के दीवाने बन गए। कुछ ही दिनों में अनारों के आम बन गए वो भी तोतापरी, क्यूं कि तोतापरी आगे से तिरछे होते हैं, मेरे चूचूक भी तोतापरी बन गए थे।

हम तीन सहेलियाँ थी, जब अकेली बैठती तो एक दूसरी की स्कर्ट उठवाकर चूतों को देखती। गुड़िया और कम्मो की चूत मेरी चूत से थोड़ी अलग थी, उनकी झिल्ली बाहर दिखने लगी थी, वहीं मेरी झिल्ली लटकती नहीं थी।

तभी हमारे स्कूल में मर्द स्पोर्ट्स टीचर आये, पहले हमेशा कोई औरत ही उस पोस्ट पर आती थी।

उस को नई-नई नौकरी मिली थी, बहुत खूबसूरत था, स्मार्ट था, हम लड़कियों ने उसका नाम चिपकू डाल दिया क्योंकि वो किसी न किसी मैडम से बतियाता रहता था।

उधर मैं उस पर जाल फेंकने लगी, उसको अपनी जान बनाने के लिए ! मैं स्टुडेंट, वो टीचर था लेकिन मेरी ख़ूबसूरती उस पर हावी पड़ने लगी, वो जान गया था कि मैं उस पर फ़िदा हुई पड़ी हूँ। हमारा स्कूल सिर्फ लड़कियों का था, वो अभी नया था इसलिए भी और वैसे भी अपनी रेपो बनानी थी तो वो मुझसे दूरी बनाकर रख रहा था मगर मुझे उस पर मर मिटना था, कच्ची उम्र की मेरी नादान दीवानगी ने मेरे दिमाग पर पर्दा डाल रखा था।

लेकिन वो भी मुझे चाहता है, यह मैं जानती थी। छुटी के वक़्त वो सबसे बाद में हाजरी लगाता था।

एक दिन जब सारे टीचर चले गये, मैं तब भी अपनी क्लास में बैठी रही, जब वो स्पोर्ट्स रूम बंद करके आया, मैं क्लास से निकली। मुझे देख वो थोड़ा हैरान हुआ।

" गुड आफ्टरनून सर!" मैंने कहा।

उसने भी जवाब दिया। स्कूल में और कोई नहीं था, मैं उसकी इतनी दीवानी हो गई थी कि मैं उसके पीछे दफ़्तर में चली गई।

" तुम घर क्यूँ नहीं जाती?"

" आप जब सब जानते हैं तो फिर यह सवाल क्यूँ?"

" देख, मैं यहाँ नया हूँ, क्यूँ मेरी बदनामी करवाना चाहती है सबके सामने?"

" कौन है यहाँ? और आप बताओ, कभी स्कूल टाइम मैंने आपको कुछ कहा है?"

मैंने अपना बैग परे रख दिया, उसके करीब गई, बिल्कुल सामने उनके कंधे को पकड़ते हुए उनके सीने से लग गई।

वो परेशान हो गया था, मैंने दोनों बाहें अब कस दी। मेरी जवानी का दबाव पड़ता देख वो पिंघलने लगा, उसने भी मेरी पीठ पर हाथ रख लिए, उसके हाथ रेंगने लगे थे।

मेरी दीवानगी मालूम नहीं कैसी है, हालाँकि यह मेरा ऐसा दूसरा अवसर था।

मैंने अपने अंगारे सेत पर हे होंठ उसके होंठ पर लगाए तो वो और पिंघल गया, उसने अपना हाथ मेरी कमीज़ में घुसा दिया और मेरे एक मम्मे को दबाया।

यह पहली बार था कि मेरे मम्मा दबाया गया, मैंने उसके सर पर दबाव डाला अपने मम्मों पर ताकि वो मेरे मम्मे चूसे और निप्पल चूसे।

वो वैसा ही करने लगा, उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने लौड़े पर रख दिया। किसी आहट सुन अलग हुए, मैं प्रिंसिपल के निजी वाशरूम में घुस गई और वो वहीं बैठ रजिस्टर कर पन्ने पलटने लगा।

वो स्कूल का चौकीदार था, जब वो गया तो हम वहाँ से निकले और उसने अपना कमरा दुबारा खोला, मैं भाग कर उस में घुस गई।

उसने मुझे बिठाया और खुद बाहर गया, जाकर चौकी दार से कहा कि दफ्तर वगैरा बंद करदे, मैं अपना थोड़ रजिस्टर का काम पूरा करके जाऊँगा।

वो वापिस आया, मैंने दोनों बाहें उसके गले मेंडा लदी और उसके होंठ चूमने लगी। उसने मेरी शर्ट उतार और फिर ब्रा को खोला, मेरे दोनों मम्मों को चूसने लगा।

मैंने भी उसकी जिप खोलदी, उसने बाकी काम खुद किया, लौड़ा निकाल लिया, पहली बार जोबन में पहला लौड़ा पकड़ा और वहीं बैठकर चूसने लगी।

बहुत सुना था लौड़ा चुसाई के बारे में ! सर का लौड़ा था भी मस्त ! खूब चूसा और फिर टांगें खोल दी। ये सब बातें भाभी से सुनी थी, अपनी कज़न भाभी से !

जब सर ने झटका दिया, मेरी चीख निकल गई लेकिन मैंने खुद को संभाल लिया। यह फैसला मेरा था, मुझे मालूम था कि पहली बार दर्द होगा, उसके बाद मजा ही आता है और मर्द मुट्ठी में आ जाता है।जल्दी मुझे बहुत मजा आने लगा।

उस दिन जब मैं स्कूल से निकली तो बहुत खुश थी। मैं कलि से फूल बन गई थी और अपनी दीवानगी की हद पूरी कर ली थी। अपनी सर को पटाने वाली जिद पूरी की !
 
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