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हीरों का फरेब:
इमरान ने कार रोक दी. दूसरी कार ने कुच्छ इसी तरह रास्ता रोक रखा था कि उसके अलावा और कोई चारा ही नहीं था. जोसेफ ने पिच्छली सीट से किसी बुड्ढे सारस की तरह गर्दन उठाई और वाइंड स्क्रीन से बाहर देखने लगा.
गाड़ी सड़क पर तिर्छि खड़ी थी और कोई उसके नीचे चित लेटा हुआ शायद अचानक आ गयी खराबी को दूर करने की कोशिश कर रहा था. उसकी टाँगें दिखाई दे रही थी.
इमरान ने शायद नीचे उतरने ही के इरादे से खिड़की पर हाथ रखा था कि अचानक जोसेफ भर्रायि हुई आवाज़ मे बोला....."खबरदार बॉस......टाँगें देख कर....."
इमरान ने पलट कर उल्लुओं की तरह आँखे नचाई और जोसेफ हकलाया...."म्म....मतलब की................देखो ना बॉस......पैरों मे हाइ हील वाले सॅंडल हैं."
"हुआ करें...." इमरान लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला...."नीली पॅंट्स भी तो है....गालों पर दाढ़ी भी ज़रूर होगी...."
"बॉस......फॉर गॉड सेक.....हाइ हील...."
"मूह बंद कर...." उसने थप्पड़ मारने वाले ढंग से हाथ चलाया और जोसेफ बोखला कर एक तरफ हट गया.
अब इमरान अपनी कार से उतर कर दूसरी गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था. गाड़ी अधिक दूर भी नहीं थी. नीले पॅंट्स वाली टाँगों मे हरकत हुई.....और फिर पूरा शरीर गाड़ी के नीचे से निकल आया.
ये एक लड़की थी. उमर 20 और 25 के बीच रही होगी. अच्छी शकल भी थी.....और तंदुरुस्त भी. ब्राउन जॅकेट और ब्लू पॅंट्स मे अच्छी जच रही थी.
"गाड़ी ग़लत खड़ी की है मैने...." उसने मुस्कुराकर बिंदास ढंग से कहा.
इमरान के चेहरे पर पूरी मूर्खता छायि हुई थी. उसने बोखलाए हुए ढंग से उत्तर दिया...."ज्ज...जी नहीं....एकदम नहीं.....बिल्कुल नहीं......"
"केवल इसलिए ये ग़लती की थी........कि कोई शरीफ आदमी अपनी कार रोक कर मेरी मदद करे...."
"ज़रूर करेगा......ज़रूर करेगा....."
"तो फिर कीजिए मदद.....मैं होलिडे कॅंप जा रही थी. यहाँ ये मुसीबत आ पड़ी. समझ मे नहीं आता क्या करूँ."
"ओह्हो...." इमरान खुश हो कर बोला. "वहीं तो मुझे भी जाना है...." लेकिन फिर उस ने मूह लटका लिया.....ऐसा लग रहा था जैसे अचानक कयि समस्याएँ आ पड़ी हों.
"क्या सोचने लगे आप....?" लड़की कुच्छ देर बाद बोली.
"किसी दूसरे शरीफ आदमी का इंतेज़ार करना पड़ेगा...." उस ने ठंडी साँस लेकर कहा.
"क्यों?"
"एक से दो शरीफ भले होते हैं....हो सकता है वो कोई अच्छा सजेशन दे सके. मेरी समझ मे तो नहीं आता कि क्या करना चाहिए...."
"थोड़ा एंजिन देख लीजिए...."
इमरान ने तेज़ी से आगे बढ़ कर बोनट उठाया और एंजिन पर सरसरी नज़र डाल कर बोला. "ठीक तो है."
"क्या ठीक है?"
"एंजिन...."
"कमाल करते हैं आप भी....फिर स्टार्ट क्यों नहीं होती..."
"पता नहीं आप क्या चाहती हैं...." इमरान अपने चेहरे पर उलझन के भाव पैदा करके बोला.
"माइ गॉड्ड...." वो उसे घूरती हुई बोली......"इतनी सी बात आपकी समझ मे नहीं आई? अरे मैं
अपनी कार सहित होलिडे कॅंप जाना चाहती हूँ. वहाँ एक गेरेज़ भी है.....गाड़ी की मरम्मत हो
सकेगी."
"उफ्फॉ....तो पहले क्यों नहीं बताया था?" इमरान ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया.
ये इमरान की गाड़ी थी इसलिए उसमे तरह तरह के जुगाड़ की चीज़ें होनी ही थीं. ये उसके पेशे मे आने
वाली चीज़ें थीं. लेकिन रस्सी?
उसका ये सफ़र केवल एंटरटेनमेंट केलिए था. कुच्छ दिन सकून से गुज़ारने केलिए होलिडे कॅंप जा
रहा था. इसलिए रस्सी साथ लिए फिरने का सवाल कहाँ था. लेकिन उसने गाड़ी की डिकी से काफ़ी
मज़बूत रस्सी का एक लच्छा निकाला. हो सकता है कभी किसी ज़रूरत केलिए वहाँ डाला गया हो जो
आज तक पड़ा रह गया हो.
एनीवे.....उसके हाथ मे रस्सी का लच्छा देख कर लड़की का चेहरा चमक उठा.
"जोसेफ...." इमरान रस्सी हिलाता हुआ बोला....."नीचे आओ..."
जोसेफ गाड़ी से उतर आया लेकिन उसके ढंग से नहीं लगता था कि उसे इमरान का ये रवैया पसंद आया
हो.
"बॉस.....धोका भी हो सकता है." उसने धीरे से कहा.
"चलो..." इमरान उसे धक्का देकर आगे बढ़ाता हुआ बोला और लड़की को इशारा किया कि वो अपनी गाड़ी
मे बैठ जाए. लड़की ने अंदर बैठ कर स्टेरिंग संभाल लिया.
फिर उस समय तक खामोश बैठी रही जब तक इमरान उसकी कार के अगले हिस्से मे रस्सी के फंदे डालता
रहा. लेकिन जैसे ही दूसरा सिरा जोसेफ की कमर से लपेटने लगा वो बोखला कर बोली...."अर्रे अर्रे.....ये
क्या?"
साथ ही जोसेफ ने भी भर्रायि हुई आवाज़ मे कहा...."ये क्या कर रहे हो बॉस....?"
लेकिन इमरान ने किसी को भी उत्तर दिए बिना गिरह लगा दी और फिर जोसेफ के कंधे थपकता हुआ
बोला...."होलिडे कॅंप......सरपट...."
"ये क्या कर रहे हैं आप?" लड़की झुंजला कर गाड़ी से उतर आई.
"निश्चिंत रहिए...." इमरान मूर्खों की तरह बोला..."बहुत होशियार है.....मूह से एंजिन की आवाज़
भी निकालेगा और हॉर्न भी देगा......बस आप स्टेरिंग संभाले रहिए...."
"ये नामुमकिन है बॉस...." जोसेफ ने क्रोध भरे स्वर मे कहा...."कोई औरत मुझे ड्राइव नहीं कर
सकती..."
"क्यों शामत आई है? अगर मुझे गुस्सा आ गया तो तुम्हें मक्खियाँ और चीटी भी ड्राइव
करेंगी...."
"आप अजीब आदमी हैं...." लड़की गर्दन झटक कर बोली...."अरे रस्सी का दूसरा सिरा अपनी गाड़ी मे
क्यों नहीं बाँध लेते?"
इमरान ने आँखें निकालीं. फिर किसी सोच मे पड़ गया. फिर चिंतित स्वर मे बोला...."मगर ये कैसे
संभव है.....मेरी गाड़ी आप की गाड़ी के पिछे है. इस तरह तो हम फिर शहर ही वापस पहुच
जाएँगे. क्यों जोसेफ....?"
"मैं कुच्छ नहीं जानता...." जोसेफ गुर्राया...."मेरी बुद्धि का सत्यानाश होकर रह गया है. कोई
ढंग की बात नहीं सोच सकता."
"मैं कहती हूँ आप की अकल कहाँ है?" लड़की हाथ नचा कर बोली....."क्या आप अपनी गाड़ी आगे नहीं
ला सकते?"
"आअन्न....हान्ं....वाहह..." इमरान उच्छल पड़ा. "ये ठीक है......पहले क्यों नहीं बताया..."
फिर जोसेफ ने ज़ोर लगा कर उसकी गाड़ी इस तरह एक तरफ हटाई कि दूसरी गाड़ी को आगे बढ़ाने केलिए
काफ़ी जगह निकल आई.
इमरान ने कार रोक दी. दूसरी कार ने कुच्छ इसी तरह रास्ता रोक रखा था कि उसके अलावा और कोई चारा ही नहीं था. जोसेफ ने पिच्छली सीट से किसी बुड्ढे सारस की तरह गर्दन उठाई और वाइंड स्क्रीन से बाहर देखने लगा.
गाड़ी सड़क पर तिर्छि खड़ी थी और कोई उसके नीचे चित लेटा हुआ शायद अचानक आ गयी खराबी को दूर करने की कोशिश कर रहा था. उसकी टाँगें दिखाई दे रही थी.
इमरान ने शायद नीचे उतरने ही के इरादे से खिड़की पर हाथ रखा था कि अचानक जोसेफ भर्रायि हुई आवाज़ मे बोला....."खबरदार बॉस......टाँगें देख कर....."
इमरान ने पलट कर उल्लुओं की तरह आँखे नचाई और जोसेफ हकलाया...."म्म....मतलब की................देखो ना बॉस......पैरों मे हाइ हील वाले सॅंडल हैं."
"हुआ करें...." इमरान लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला...."नीली पॅंट्स भी तो है....गालों पर दाढ़ी भी ज़रूर होगी...."
"बॉस......फॉर गॉड सेक.....हाइ हील...."
"मूह बंद कर...." उसने थप्पड़ मारने वाले ढंग से हाथ चलाया और जोसेफ बोखला कर एक तरफ हट गया.
अब इमरान अपनी कार से उतर कर दूसरी गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था. गाड़ी अधिक दूर भी नहीं थी. नीले पॅंट्स वाली टाँगों मे हरकत हुई.....और फिर पूरा शरीर गाड़ी के नीचे से निकल आया.
ये एक लड़की थी. उमर 20 और 25 के बीच रही होगी. अच्छी शकल भी थी.....और तंदुरुस्त भी. ब्राउन जॅकेट और ब्लू पॅंट्स मे अच्छी जच रही थी.
"गाड़ी ग़लत खड़ी की है मैने...." उसने मुस्कुराकर बिंदास ढंग से कहा.
इमरान के चेहरे पर पूरी मूर्खता छायि हुई थी. उसने बोखलाए हुए ढंग से उत्तर दिया...."ज्ज...जी नहीं....एकदम नहीं.....बिल्कुल नहीं......"
"केवल इसलिए ये ग़लती की थी........कि कोई शरीफ आदमी अपनी कार रोक कर मेरी मदद करे...."
"ज़रूर करेगा......ज़रूर करेगा....."
"तो फिर कीजिए मदद.....मैं होलिडे कॅंप जा रही थी. यहाँ ये मुसीबत आ पड़ी. समझ मे नहीं आता क्या करूँ."
"ओह्हो...." इमरान खुश हो कर बोला. "वहीं तो मुझे भी जाना है...." लेकिन फिर उस ने मूह लटका लिया.....ऐसा लग रहा था जैसे अचानक कयि समस्याएँ आ पड़ी हों.
"क्या सोचने लगे आप....?" लड़की कुच्छ देर बाद बोली.
"किसी दूसरे शरीफ आदमी का इंतेज़ार करना पड़ेगा...." उस ने ठंडी साँस लेकर कहा.
"क्यों?"
"एक से दो शरीफ भले होते हैं....हो सकता है वो कोई अच्छा सजेशन दे सके. मेरी समझ मे तो नहीं आता कि क्या करना चाहिए...."
"थोड़ा एंजिन देख लीजिए...."
इमरान ने तेज़ी से आगे बढ़ कर बोनट उठाया और एंजिन पर सरसरी नज़र डाल कर बोला. "ठीक तो है."
"क्या ठीक है?"
"एंजिन...."
"कमाल करते हैं आप भी....फिर स्टार्ट क्यों नहीं होती..."
"पता नहीं आप क्या चाहती हैं...." इमरान अपने चेहरे पर उलझन के भाव पैदा करके बोला.
"माइ गॉड्ड...." वो उसे घूरती हुई बोली......"इतनी सी बात आपकी समझ मे नहीं आई? अरे मैं
अपनी कार सहित होलिडे कॅंप जाना चाहती हूँ. वहाँ एक गेरेज़ भी है.....गाड़ी की मरम्मत हो
सकेगी."
"उफ्फॉ....तो पहले क्यों नहीं बताया था?" इमरान ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया.
ये इमरान की गाड़ी थी इसलिए उसमे तरह तरह के जुगाड़ की चीज़ें होनी ही थीं. ये उसके पेशे मे आने
वाली चीज़ें थीं. लेकिन रस्सी?
उसका ये सफ़र केवल एंटरटेनमेंट केलिए था. कुच्छ दिन सकून से गुज़ारने केलिए होलिडे कॅंप जा
रहा था. इसलिए रस्सी साथ लिए फिरने का सवाल कहाँ था. लेकिन उसने गाड़ी की डिकी से काफ़ी
मज़बूत रस्सी का एक लच्छा निकाला. हो सकता है कभी किसी ज़रूरत केलिए वहाँ डाला गया हो जो
आज तक पड़ा रह गया हो.
एनीवे.....उसके हाथ मे रस्सी का लच्छा देख कर लड़की का चेहरा चमक उठा.
"जोसेफ...." इमरान रस्सी हिलाता हुआ बोला....."नीचे आओ..."
जोसेफ गाड़ी से उतर आया लेकिन उसके ढंग से नहीं लगता था कि उसे इमरान का ये रवैया पसंद आया
हो.
"बॉस.....धोका भी हो सकता है." उसने धीरे से कहा.
"चलो..." इमरान उसे धक्का देकर आगे बढ़ाता हुआ बोला और लड़की को इशारा किया कि वो अपनी गाड़ी
मे बैठ जाए. लड़की ने अंदर बैठ कर स्टेरिंग संभाल लिया.
फिर उस समय तक खामोश बैठी रही जब तक इमरान उसकी कार के अगले हिस्से मे रस्सी के फंदे डालता
रहा. लेकिन जैसे ही दूसरा सिरा जोसेफ की कमर से लपेटने लगा वो बोखला कर बोली...."अर्रे अर्रे.....ये
क्या?"
साथ ही जोसेफ ने भी भर्रायि हुई आवाज़ मे कहा...."ये क्या कर रहे हो बॉस....?"
लेकिन इमरान ने किसी को भी उत्तर दिए बिना गिरह लगा दी और फिर जोसेफ के कंधे थपकता हुआ
बोला...."होलिडे कॅंप......सरपट...."
"ये क्या कर रहे हैं आप?" लड़की झुंजला कर गाड़ी से उतर आई.
"निश्चिंत रहिए...." इमरान मूर्खों की तरह बोला..."बहुत होशियार है.....मूह से एंजिन की आवाज़
भी निकालेगा और हॉर्न भी देगा......बस आप स्टेरिंग संभाले रहिए...."
"ये नामुमकिन है बॉस...." जोसेफ ने क्रोध भरे स्वर मे कहा...."कोई औरत मुझे ड्राइव नहीं कर
सकती..."
"क्यों शामत आई है? अगर मुझे गुस्सा आ गया तो तुम्हें मक्खियाँ और चीटी भी ड्राइव
करेंगी...."
"आप अजीब आदमी हैं...." लड़की गर्दन झटक कर बोली...."अरे रस्सी का दूसरा सिरा अपनी गाड़ी मे
क्यों नहीं बाँध लेते?"
इमरान ने आँखें निकालीं. फिर किसी सोच मे पड़ गया. फिर चिंतित स्वर मे बोला...."मगर ये कैसे
संभव है.....मेरी गाड़ी आप की गाड़ी के पिछे है. इस तरह तो हम फिर शहर ही वापस पहुच
जाएँगे. क्यों जोसेफ....?"
"मैं कुच्छ नहीं जानता...." जोसेफ गुर्राया...."मेरी बुद्धि का सत्यानाश होकर रह गया है. कोई
ढंग की बात नहीं सोच सकता."
"मैं कहती हूँ आप की अकल कहाँ है?" लड़की हाथ नचा कर बोली....."क्या आप अपनी गाड़ी आगे नहीं
ला सकते?"
"आअन्न....हान्ं....वाहह..." इमरान उच्छल पड़ा. "ये ठीक है......पहले क्यों नहीं बताया..."
फिर जोसेफ ने ज़ोर लगा कर उसकी गाड़ी इस तरह एक तरफ हटाई कि दूसरी गाड़ी को आगे बढ़ाने केलिए
काफ़ी जगह निकल आई.