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एक फाईव स्टार होटल ग्रीन पैलेस था, जिसके एक कमरे में सुमित अवस्थी अपनी हार का गम मना रहा था। सामने ब्लैक डॉग की एक बोतल खुली पड़ी थी, जिसमें से आधी बोतल वह खाली कर चुका था। अपने पिताजी के डर से न तो वह घर गया और न ही अपने फार्म हाउस। अचानक उसके फ़ोन पर रिंग बजने लगी। उसने फ़ोन उठा कर स्क्रीन पर नंबर देखा, फिर फ़ोन को साइलेंट मोड पर डाल दिया।
“किसका फ़ोन था गुरु?” एक चेले ने पूछा।
“मेरे बाप का फ़ोन है। साले ने जीना हराम कर दिया है। सुबह से दस बार फ़ोन कर चुका है।” गुस्से में भुनभुनाते हुए सुमित बोला।
“फ़ोन तो उठा लो गुरु।”
“गाली सुनने का शौक नहीं हैं मुझे।” बड़बड़ाता हुआ सुमित बोला।
“गुरु, मुझे समझ में नहीं आता। इतने वोटर हमारे पास थे, फिर हम चुनाव हार कैसे गये? बाज़ी तो हमारे पक्ष में थी।” हैरानी दिखाते हुए एक चमचा बोला।
“अपने साथ गेम हो गया चंदू, जिन स्टूडेंट को अपने फार्म हाउस पर लाये थे, उन कमीनों ने खाया-पीया अपना और वोट दिया चंद्रेश को।” उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
“खैर, यह तो वक़्त-वक़्त की बात है। हार-जीत तो लगी ही रहती है।” उसके चेले का सिर सहमति से हिला।
“सुना है चंद्रेश मल्होत्रा जीत की पार्टी दे रहा है।” सुमित ने घूँट भरते हुए कहा।
“सही सुना है, क्यों पूछ रहे हो गुरु?”
“भाई, जीत की बधाई तो देने जाना पड़ेगा।” सुमित अवस्थी रहस्मय ढंग से मुस्कुराया।
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होटल चन्द्रावती पैलेस अपनी भव्यता के लिये फेमस था और आज तो ज्यादा जगमगा रहा था। हर ओर सजावट का विशेष ध्यान दिया गया था। जगह-जगह गमले रखे हुए थे। खाने में हर तरह का आईटम था। पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी हर तरह के व्यंजन रखे हुए थे। एक तरफ फास्ट फ़ूड के स्टॉल लगे हुए थे। एक काउंटर अलग से आइसक्रीम का लगा हुआ था। वेटर शानदार ड्रेस पहने हुए प्लेट उठाए घूम रहे थे, जिसमें भुने काजू और ड्राई फ्रूट रखे हुए थे।
ड्रिंक का अलग से बंदोबस्त था। कुल मिला कर पार्टी को भव्यता देने की पूरी कोशिश की गयी थी। आखिर चंद्रेश मल्होत्रा भी पैसे वाली पार्टी थी। उसने विशेष रूप से कह रखा था कि किसी भी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिये। लोग खाने-पीने में व्यस्त थे, तभी चंद्रेश ने भीतर कदम रखा। ब्राउन कलर के सूट में ब्राउन ही कलर के जूते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। रंग-बिरंगी फूलो वाली टाई उसके गले में फब रही थी। वह आते ही स्टेज पर पंहुचा और ताली बजा कर सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया।
“दोस्तो, आज दोहरी ख़ुशी का दिन है। एक तो आप ने मुझे विजयी बनाया, दूसरा मैं आप सबको एक सरप्राइज देना चाहता हूँ। कॉलेज ख़त्म करने के बाद मैं वंशिका अरोड़ा, को वंशिका मल्होत्रा बनाने वाला हूँ। प्लीज एन्जॉय दा पार्टी।” कह कर वह मंच से उतर गया।
वहाँ धीमे-धीमे म्यूजिक बजने लगा। तभी वंशिका ने प्रवेश किया। वह सफ़ेद ड्रेस में अप्सरा लग रही थी। लोग उन दोनों को बधाइयाँ देने लगे। दोनों खुले दिल से बधाई कबूल कर रहे थे। वंशिका बहुत खुश थी कि उसे चंद्रेश जैसा जीवन-साथी मिल रहा था। अपनी ख़ुशी जाहिर कर रही थी।
ये घोषणा सुनते ही सबसे ज्यादा दुःख निशा को हुआ। उसके दिल में तूफ़ान उठ रहा था, लेकिन वह किसी को बता नहीं सकती थी। उसका बस चलता तो वह वंशिका को विष दे देती, लेकिन अपने आप पर काबू कर वह ऊपर से खुश होने का दिखावा कर रही थी। वह चाहती थी, किसी तरह जोड़ी टूट जाये। तभी हाल में शानदार गुलदस्ता लेकर सुमित अवस्थी ने प्रवेश किया। उसके साथ उसके चेले-चपाटे भी थे। सुमित अवस्थी सीधा चंद्रेश के पास पहुँचा और गुलदस्ता उसके हाथ में देकर बोला, “जीत की बहुत-बहुत बधाई सरकार, साथ में आपकी होने वाली शादी की भी।”
चंद्रेश ने शांत स्वर में मुस्कुराते हुए बधाई कबूल की और उसे पार्टी में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया।
“हम तो बिन बुलाये मेहमान हैं भाई।” हँसते हुए सुमित बोला।
“नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है। जीत तो आपकी वजह से मिली है। आप नहीं हारते, तो हम कैसे जीतते।”
सुमित कट कर रह गया। प्रत्यक्ष में वह मुस्कुरा दिया और पार्टी से विदा हो गया।
निशा को एक ही तरीका दिख रहा था। चंद्रेश और वंशिका को अलग करने का वह था।
सुमित अवस्थी एक नाम निशा कें जहन में हिलोरे मार रहा था। चंद्रेश और वंशिका को कोई अलग कर सकता था तो वह सुमित अवस्थी और सुमित वैसे ही चंद्रेश मल्हौत्रा और वंशिका पर खार खाता था। निशा को लगा चंद्रेश और वंशिका की जोड़ी सुमित अवस्थी के कारण ही टूटेगी।
सुमित अवस्थी कुछ सोचते हुए निशा मंद-मंद मुस्कुरा पड़ी।
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“मेरे बाप का फ़ोन है। साले ने जीना हराम कर दिया है। सुबह से दस बार फ़ोन कर चुका है।” गुस्से में भुनभुनाते हुए सुमित बोला।
“फ़ोन तो उठा लो गुरु।”
“गाली सुनने का शौक नहीं हैं मुझे।” बड़बड़ाता हुआ सुमित बोला।
“गुरु, मुझे समझ में नहीं आता। इतने वोटर हमारे पास थे, फिर हम चुनाव हार कैसे गये? बाज़ी तो हमारे पक्ष में थी।” हैरानी दिखाते हुए एक चमचा बोला।
“अपने साथ गेम हो गया चंदू, जिन स्टूडेंट को अपने फार्म हाउस पर लाये थे, उन कमीनों ने खाया-पीया अपना और वोट दिया चंद्रेश को।” उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
“खैर, यह तो वक़्त-वक़्त की बात है। हार-जीत तो लगी ही रहती है।” उसके चेले का सिर सहमति से हिला।
“सुना है चंद्रेश मल्होत्रा जीत की पार्टी दे रहा है।” सुमित ने घूँट भरते हुए कहा।
“सही सुना है, क्यों पूछ रहे हो गुरु?”
“भाई, जीत की बधाई तो देने जाना पड़ेगा।” सुमित अवस्थी रहस्मय ढंग से मुस्कुराया।
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होटल चन्द्रावती पैलेस अपनी भव्यता के लिये फेमस था और आज तो ज्यादा जगमगा रहा था। हर ओर सजावट का विशेष ध्यान दिया गया था। जगह-जगह गमले रखे हुए थे। खाने में हर तरह का आईटम था। पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी हर तरह के व्यंजन रखे हुए थे। एक तरफ फास्ट फ़ूड के स्टॉल लगे हुए थे। एक काउंटर अलग से आइसक्रीम का लगा हुआ था। वेटर शानदार ड्रेस पहने हुए प्लेट उठाए घूम रहे थे, जिसमें भुने काजू और ड्राई फ्रूट रखे हुए थे।
ड्रिंक का अलग से बंदोबस्त था। कुल मिला कर पार्टी को भव्यता देने की पूरी कोशिश की गयी थी। आखिर चंद्रेश मल्होत्रा भी पैसे वाली पार्टी थी। उसने विशेष रूप से कह रखा था कि किसी भी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिये। लोग खाने-पीने में व्यस्त थे, तभी चंद्रेश ने भीतर कदम रखा। ब्राउन कलर के सूट में ब्राउन ही कलर के जूते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। रंग-बिरंगी फूलो वाली टाई उसके गले में फब रही थी। वह आते ही स्टेज पर पंहुचा और ताली बजा कर सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया।
“दोस्तो, आज दोहरी ख़ुशी का दिन है। एक तो आप ने मुझे विजयी बनाया, दूसरा मैं आप सबको एक सरप्राइज देना चाहता हूँ। कॉलेज ख़त्म करने के बाद मैं वंशिका अरोड़ा, को वंशिका मल्होत्रा बनाने वाला हूँ। प्लीज एन्जॉय दा पार्टी।” कह कर वह मंच से उतर गया।
वहाँ धीमे-धीमे म्यूजिक बजने लगा। तभी वंशिका ने प्रवेश किया। वह सफ़ेद ड्रेस में अप्सरा लग रही थी। लोग उन दोनों को बधाइयाँ देने लगे। दोनों खुले दिल से बधाई कबूल कर रहे थे। वंशिका बहुत खुश थी कि उसे चंद्रेश जैसा जीवन-साथी मिल रहा था। अपनी ख़ुशी जाहिर कर रही थी।
ये घोषणा सुनते ही सबसे ज्यादा दुःख निशा को हुआ। उसके दिल में तूफ़ान उठ रहा था, लेकिन वह किसी को बता नहीं सकती थी। उसका बस चलता तो वह वंशिका को विष दे देती, लेकिन अपने आप पर काबू कर वह ऊपर से खुश होने का दिखावा कर रही थी। वह चाहती थी, किसी तरह जोड़ी टूट जाये। तभी हाल में शानदार गुलदस्ता लेकर सुमित अवस्थी ने प्रवेश किया। उसके साथ उसके चेले-चपाटे भी थे। सुमित अवस्थी सीधा चंद्रेश के पास पहुँचा और गुलदस्ता उसके हाथ में देकर बोला, “जीत की बहुत-बहुत बधाई सरकार, साथ में आपकी होने वाली शादी की भी।”
चंद्रेश ने शांत स्वर में मुस्कुराते हुए बधाई कबूल की और उसे पार्टी में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया।
“हम तो बिन बुलाये मेहमान हैं भाई।” हँसते हुए सुमित बोला।
“नहीं भाई, ऐसी बात नहीं है। जीत तो आपकी वजह से मिली है। आप नहीं हारते, तो हम कैसे जीतते।”
सुमित कट कर रह गया। प्रत्यक्ष में वह मुस्कुरा दिया और पार्टी से विदा हो गया।
निशा को एक ही तरीका दिख रहा था। चंद्रेश और वंशिका को अलग करने का वह था।
सुमित अवस्थी एक नाम निशा कें जहन में हिलोरे मार रहा था। चंद्रेश और वंशिका को कोई अलग कर सकता था तो वह सुमित अवस्थी और सुमित वैसे ही चंद्रेश मल्हौत्रा और वंशिका पर खार खाता था। निशा को लगा चंद्रेश और वंशिका की जोड़ी सुमित अवस्थी के कारण ही टूटेगी।
सुमित अवस्थी कुछ सोचते हुए निशा मंद-मंद मुस्कुरा पड़ी।
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