S
StoryPublisher
Guest
"अर्रे....." लड़की हैरत से बोली....."तुम तो इस समय बुद्धिमानों जैसी बातें कर रहे हो....."
"पोलीस तो गधों को भी फ्रेंच बोलने पर मजबूर कर देती है...." मूर्ख ने ठंडी साँस ली....."तुम ने मुझे बड़ी मुसीबत मे फँसा दिया....."
"तुम खुद ही क्यों बोल पड़े थे.......बूढ़ा कह रहा था."
"हां........बस बोल ही पड़ा था.......सितारे अच्छे थे......ना बोलता तो तुम लोग किसी दूसरी तरह फसाने की कोशिश करते और मैं इस समय जैल मे होता.......क्यों?"
"स्कीम तो यही थी शायद......" लड़की मुस्कुराइ.
"और तुम इस पर खुश हो रही हो?" मूर्ख ने गुस्सा भरे ढंग से पुछा.
"मेरी समझ मे नहीं आता कि तुम्हें किस प्रकार संतुष्ट कर सकूँगी. मगर पहले तुम मुझे अपने बारे मे बताओ.....कि ये पागलपन नहीं है कि तुम अपने बचाव की चिंता करने की बजाए उन्हीं लोगों से आ भिड़े हो जो तुम्हें फसाना चाहते थे. तुम से बहुत बड़ी मूर्खता हुई है."
"अक्सर इस से भी बड़ी मूर्खता होती रहती है..............अच्छा तो तुम्हें विश्वास था कि मैं फाँसी का फँदा अपनी ही गर्दन मे डाल लूँगा?"
"वो बहुत चालाक हैं.....मैं तो कहती हूँ कि इस तरह भाग निकलने मे भी कोई चाल रही होगी. अब वो शायद ये देखना चाहते हैं कि तुम अकेले हो या तुम्हारे साथ भी कोई गिरोह है. तुम ने ये समझ कर बूढ़े का पिछा किया था कि वो अंजान है.......हलाकी वो ये देखना चाहता था कि उसकी ताक मे है कॉन..............आहा.....ज़रा बताओ तो वो संदेश क्या था जो तुम ने उसके किसी साथी की जेब से उड़ा लिया था?"
"संदेश नहीं शायरी........" वो ठंडी साँस लेकर बोला...."सुर्ख ज़ुल्फो की छाओ मे सुर्ख गर्दन ही मुनासिब रहेगी...."
"ओ माइ गॉड........" लड़की अचानक भयभीत दिखाई देने लगी. "उस संदेश का मतलब यही हो सकता है कि मुझे ज़बाह कर दिया जाए....."
"मगर वो संदेश था किस के लिए? वो आदमी उसे कहाँ ले जाता?"
"ये बताना कठिन है......" लड़की किसी सोच मे पड़ गयी.
मूर्ख उसे टटोलने वाली नज़रों से देख रहा था. लड़की खामोश रही. फिर मूर्ख ने पुछा.
"हीरे कहाँ हैं?"
"मैं नहीं जानती. ये मामला मेरी समझ मे ही नहीं आ सका. मुझ से केवल इतना ही कहा गया था कि मैं किसी को उसके कॉटेज तक ले जाउ. खुद भीतर जाउ.....फिर वापस आकर कहूँ कि मैं अपना काम कर चुकी हूँ....."
"तुम्हें अंदर जाकर क्या करना था?"
"कुच्छ भी नहीं......मुझ से तो कहा गया था कि वो उस समय कॉटेज मे होगा ही नहीं. मैं कुच्छ देर रुक कर वापस आ जाउ. ये सोच भी नहीं सकती थी कि वो इस तरह क़तल कर दिया जाएगा. आज का अख़बार देखने के बाद ही पूरी साज़िश मेरी समझ मे आ सकी है. परसों रात तूफान आ गया था. बूढ़ा ठीक उसी टाइम मेरे कॉटेज मे आया था जब मुझे वहाँ से चलना था. उसने कहा कि अब तूफान के कारण स्कीम दूसरी रात पर टाल दी गयी है. मैं अब सो जाउ. मैने खुदा का शूकर अदा किया कि अब इस तूफान मे बाहर नहीं निकलना पड़ेगा. चैन से सो गयी. लेकिन फिर एकदम सुबह सवेरे ही मुझे उठा दिया गया कि मैं सरदार गढ़ चली जाउ और उस समय तक दुबारा कॅंप का रुख़ ना करूँ जब तक कि ऐसा निर्देश ना मिले. सरदार गढ़ मे भी उनके कयि ठिकाने हैं."
"हुन्न्ं....." इमरान ने कुच्छ सोचते हुए सर हिलाया. फिर उसकी आँखों मे देखता हुआ बोला...."गोरो का सरगना कॉन है?"
"हो सकता है बूढ़ा ही सरगना हो.....क्योंकि वो जो काम भी हम से लेता है....उनके मकसद से अच्छी तरह परिचित होता है."
"क्या मतलब?"
"उन्ह.....समझने की कोशिश करो.....मतलब ये की वो हम से केवल काम लेता है. हम किसी काम के उद्देश्य से परिचित नहीं होते हैं. हमे तो उसकी हवा भी नहीं लगने दी जाती. अक्सर ऐसा होता है कि उन कामों के परिणाम से हम किसी हद तक मामले का अंदाज़ लगा लेते हैं. उदाहरण के तौर पर अपना केस ले लो. जब अपाहिज मर गया और अख़बारों मे उसके बारे मे खबरें आईं तब मुझे पता चल सका कि तुम्हें फाँसने का क्या मकसद था."
"क्या मकसद था....?"
"अर्रे.......यही कि अपाहिज की हत्या का आरोप तुम्हारे सर पर डाल दिया जाता."
"मगर कैसे?" इमरान ने झल्लाए हुए लहज़ा मे कहा....."अगर मैं अपना मूह बंद रखता...."
"तुम्हें बार बार मूर्ख कहते हुए भी उलझन होती है. तोड़ा खोपड़ी का इस्तेमाल करो. जब तुम उस मंज़िल से गुज़रे ही नहीं तो कैसे कह सकते हो कि उस समय परिस्थिति क्या होती. या कोई तुम्हें उसी समय वहीं देख लेता जब मैं कॉटेज मे घुसती और तुम बाहर मेरा इंतेज़ार कर रहे होते. फिर अगली सुबह क्या होता......जब उसकी लाश मिलती. मैं भी वहाँ से हटा दी जाती. फिर तुम रो रो कर कहते कि तुम्हें कोई लड़की वहाँ ले गयी थी. मगर किसे विश्वास होता? तुम्हारे सामने फाँसी का फँदा होता."
"अर्रे बाप रे...." इमरान उच्छल कर अपनी गर्दन सहलाने लगा और लड़की हंस पड़ी. फिर अचानक गंभीर होकर बोली...."फिर वो मुझे भी रास्ते से हटा देते क्योंकि मैं खुद को छुपा ना सकती.....केवल इस कारण पोलीस मेरी तलाश मे भी है कि मैं तुम्हारे साथ देखी गयी थी. इस तरह पोलीस तुम्हें पकड़ लेती और मुझे ना पा सकती. फिर वही होता जो अभी कह चुकी हूँ. लेकिन एक बात समझ मे नहीं आई."
वो चुप होकर कुच्छ सोचने लगी फिर बोली "डावर सच मच था कॉन?"
"ये भी तुम्हीं बता सकोगी...."
"मैं क्या जानू.....मैं जानना चाहती हूँ. वो साड़ी & सोंस का ट्रॅवेलिंग एजेंट था. लेकिन साड़ी वाले उसे अपाहिज के रूप मे नहीं जानते थे......और वास्तव मे अपाहिज था भी नहीं........फिर आख़िर वो दोहरी ज़िंदगी क्यों गुज़ार रहा था. अगर वो पहली बार उस रूप मे लोगों को मिला होता तो कहा जा सकता था कि चोरी के बाद पोलीस से बचने केलिए अपाहिज बना होगा."
"मेरी गर्दन काटने केलिए अपाहिज बना था." इमरान झल्ला कर बोला. "अभी ये मत सोचो कि वो अपाहिज क्यों था."
"फिर तुम ही बताओ कि क्या सोचूँ? मैं तो बड़ी मुसीबत मे फँस गयी हूँ...."
इमरान खामोश होकर कुच्छ सोचने लगा. फिर बोला..."क्या ये चोरों और हत्यारों का गिरोह है?"
"मैं आज तक नहीं समझ सकी कि ये किस प्रकार के लोगों का गिरोह है."
"मैं अपना पैदाइशी मूर्ख होना स्वीकार करता हूँ....फिर क्यों उल्लू बना रही हो?"
"विश्वास करो मैं नहीं जानती."
"क्या डावर की हत्या उन हीरों केलिए नहीं हुई थी?"
"हो सकता है कि यही बात रही हो.....काश तुम समझ सकते.....हम सब बुरी तरह फँस गये हैं. अब इस जाल से किसी तरह नहीं निकल सकते."
"मैं समझा नहीं.....तुम क्या कहना चाहती हो."
"तो सुनो........लंबी कहानी है. हम सब शांति प्रिय नागरिक थे. तुम जानते ही होगे कि इंसान ज़िंदगी की एकरूपता से उकता जाता है......और परिवर्तन केलिए क्या कुच्छ नहीं कर बैठता. ऐसे पल भी आते हैं जब गंभीरता की कल्पना से भी डर लगने लगता है. हम आठ दोस्तों ने एक क्लब बनाया था और खाली समय मे दिन भर की बोरियत दूर करने केलिए तरह तरह की हरकतें करते थे. अक्सर कोई अजनबी भी हमारी शरारतों का शिकार हो जाता था. लेकिन शरारातें ऐसी नहीं होतीं कि कोई बुरा मान जाता. वो अजनबी भी कुच्छ समय केलिए हमारी दिलचस्पीयों मे शामिल हो जाता. कहने का मतलब ये है कि हम कभी क़ानून की सीमा से बाहर कदम नहीं निकालते थे. क्लब की स्थापना का मकसद केवल मनोरंजन था.
एक दिन ये बूढ़ा पता नहीं कहाँ से आ फँसा. ये भी हमारी एक शरारत का शिकार हुआ था. फिर उसने हम से रिक्वेस्ट किया कि हम उसे भी क्लब का मेंबर बना लें. आदमी बहुत ज़िंदा-दिल साबित हुआ था. इसलिए हमें क्या आपत्ति हो सकती थी. कुच्छ दिनों बाद हम ने महसूस किया कि वो तो हम सबों से तेज़ है. नित नयी नयी शरारतों के प्रोग्राम बड़ी सफाई और बुद्धिमानी से बनाता. धीरे धीरे वो हम सबों पर छाता चला गया. और कुच्छ दिन बीतने पर हम सब महसूस करने लगे की शरारतों के बहाने हम सब से काई गैर क़ानूनी हरकतें भी हो चुकी हैं. हम मे से कोई भी ऐसा नहीं था जिसके हाथ अंजाने मे कभी ना कभी क़ानून को ना तोड़ा हो.......और बूढ़े के पास हमारे खिलाफ क्लियर प्रूफ थे. वो किसी भी समय हमारी गर्दने फँसा सकता था.
अब हम उसके इशारों पर नाचने लगे. क्लब एक ऐसे गिरोह मे बदल गया जिस का सरगना वो बूढ़ा था. अब हमे काम के बदले उस से पैसे भी मिलते हैं. लेकिन हम उसके जाल से किसी भी तरह नहीं निकल सकते. वो कहता है कि उसी समय तक सुरक्षित है जब तक उसके अधीन ज़िंदगी जीवन गुज़ारते रहें. उस से अलग होने की कोशिश ही हमें जैल का दरवाज़ा दिखा देगा. हम मजबूर हैं. जैल जाना कॉन पसंद करेगा?"
"अच्छा तो वो लोग जिन्होने मुझ पर हमला किया था तुम्हारे उसी क्लब के मेंबर थे?"
"बिल्कुल नहीं......वो तो बड़े ख़तरनाक लोग थे. पहले भी कयि बार उन्हें देख चुकी हूँ. पता नहीं और भी कितने लोग हैं जिन्हें मैं नहीं जानती. वो बूढ़े ही केलिए काम करते हैं. हम तो केवल दस हैं लेकिन हम से कभी धिन्गा-मुष्टि किस्म के काम नहीं लिए गये."
"क्या मुझ पर पहले ही से तुम लोगों की नज़र थी?"
"नहीं......तुम से रंडोंली मुलाकात हुई थी. राजधानी से कॅंप आते समय सच मुच गाड़ी खराब हो गयी थी. उस समय तो मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं वहाँ क्यों बुलाई गयी हूँ? कॅंप मे पहुच कर बूढ़े की स्कीम मालूम हुई थी. मैने सोचा कि इस काम केलिए तुम जैसा अहमाक़ बहुत मुनासिब साबित होगा. लेकिन सच बताओ.....क्या तुम सच मच अहमाक़ हो?"
"अब अहमाक़ कहा तो थप्पड़ मार दूँगा." इमरान नथुने फूला कर बोला...."मैं अहमाक़ नहीं हूँ....."
इमरान थोड़ी देर खामोश रहा फिर नरम लहजे मे बोला...."बस अक्सर ये होता है कि मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है......समझ मे नहीं आता कि किस बात के जवाब मे क्या कहना या करना चाहिए.......ओके लीव इट......ये बताओ कि अब तुम ने अपने बारे मे क्या सोचा है?"
"अगर बुद्धि भ्रष्ट ना हो गयी हो तो तुम्हीं कुछ बताओ.....लेकिन....ये बताओ कि क्या तुम्हें पता था कि मैं इस समय उसी इमारत मे लाई जाउन्गि......ये गुफा वहाँ से अधिक दूर तो नहीं लग रहा."
"हम इस समय हॉलिडे कॅंप के निकट ही हैं. इमारत भी हॉलिडे कॅंप से अधिक दूर नहीं है. उसको चूँकि मुझे फाँसना था इसलिए उस ने इतने घुमाव फिराव वाला रास्ता चुना था."
"एनीवे.......अब वो लोग तुम्हारी तलाश मे होंगे......मैं फिर कहती हूँ कि उनके इस तरह निकल भागने मे भी कोई ना कोई चाल ज़रूर होगी."
"बूढ़े का नाम क्या है?"
"शातिर..........अजीब बेतुका नाम है. वो कहता है कि शायर हूँ और शातिर 'तखल्लुस' है. हम सब उसे शातिर ही के नाम से जानते हैं. चंदे की दलाली करता है."
"पर्मनेंट रेसिडेन्स कहाँ है."
"पोलीस तो गधों को भी फ्रेंच बोलने पर मजबूर कर देती है...." मूर्ख ने ठंडी साँस ली....."तुम ने मुझे बड़ी मुसीबत मे फँसा दिया....."
"तुम खुद ही क्यों बोल पड़े थे.......बूढ़ा कह रहा था."
"हां........बस बोल ही पड़ा था.......सितारे अच्छे थे......ना बोलता तो तुम लोग किसी दूसरी तरह फसाने की कोशिश करते और मैं इस समय जैल मे होता.......क्यों?"
"स्कीम तो यही थी शायद......" लड़की मुस्कुराइ.
"और तुम इस पर खुश हो रही हो?" मूर्ख ने गुस्सा भरे ढंग से पुछा.
"मेरी समझ मे नहीं आता कि तुम्हें किस प्रकार संतुष्ट कर सकूँगी. मगर पहले तुम मुझे अपने बारे मे बताओ.....कि ये पागलपन नहीं है कि तुम अपने बचाव की चिंता करने की बजाए उन्हीं लोगों से आ भिड़े हो जो तुम्हें फसाना चाहते थे. तुम से बहुत बड़ी मूर्खता हुई है."
"अक्सर इस से भी बड़ी मूर्खता होती रहती है..............अच्छा तो तुम्हें विश्वास था कि मैं फाँसी का फँदा अपनी ही गर्दन मे डाल लूँगा?"
"वो बहुत चालाक हैं.....मैं तो कहती हूँ कि इस तरह भाग निकलने मे भी कोई चाल रही होगी. अब वो शायद ये देखना चाहते हैं कि तुम अकेले हो या तुम्हारे साथ भी कोई गिरोह है. तुम ने ये समझ कर बूढ़े का पिछा किया था कि वो अंजान है.......हलाकी वो ये देखना चाहता था कि उसकी ताक मे है कॉन..............आहा.....ज़रा बताओ तो वो संदेश क्या था जो तुम ने उसके किसी साथी की जेब से उड़ा लिया था?"
"संदेश नहीं शायरी........" वो ठंडी साँस लेकर बोला...."सुर्ख ज़ुल्फो की छाओ मे सुर्ख गर्दन ही मुनासिब रहेगी...."
"ओ माइ गॉड........" लड़की अचानक भयभीत दिखाई देने लगी. "उस संदेश का मतलब यही हो सकता है कि मुझे ज़बाह कर दिया जाए....."
"मगर वो संदेश था किस के लिए? वो आदमी उसे कहाँ ले जाता?"
"ये बताना कठिन है......" लड़की किसी सोच मे पड़ गयी.
मूर्ख उसे टटोलने वाली नज़रों से देख रहा था. लड़की खामोश रही. फिर मूर्ख ने पुछा.
"हीरे कहाँ हैं?"
"मैं नहीं जानती. ये मामला मेरी समझ मे ही नहीं आ सका. मुझ से केवल इतना ही कहा गया था कि मैं किसी को उसके कॉटेज तक ले जाउ. खुद भीतर जाउ.....फिर वापस आकर कहूँ कि मैं अपना काम कर चुकी हूँ....."
"तुम्हें अंदर जाकर क्या करना था?"
"कुच्छ भी नहीं......मुझ से तो कहा गया था कि वो उस समय कॉटेज मे होगा ही नहीं. मैं कुच्छ देर रुक कर वापस आ जाउ. ये सोच भी नहीं सकती थी कि वो इस तरह क़तल कर दिया जाएगा. आज का अख़बार देखने के बाद ही पूरी साज़िश मेरी समझ मे आ सकी है. परसों रात तूफान आ गया था. बूढ़ा ठीक उसी टाइम मेरे कॉटेज मे आया था जब मुझे वहाँ से चलना था. उसने कहा कि अब तूफान के कारण स्कीम दूसरी रात पर टाल दी गयी है. मैं अब सो जाउ. मैने खुदा का शूकर अदा किया कि अब इस तूफान मे बाहर नहीं निकलना पड़ेगा. चैन से सो गयी. लेकिन फिर एकदम सुबह सवेरे ही मुझे उठा दिया गया कि मैं सरदार गढ़ चली जाउ और उस समय तक दुबारा कॅंप का रुख़ ना करूँ जब तक कि ऐसा निर्देश ना मिले. सरदार गढ़ मे भी उनके कयि ठिकाने हैं."
"हुन्न्ं....." इमरान ने कुच्छ सोचते हुए सर हिलाया. फिर उसकी आँखों मे देखता हुआ बोला...."गोरो का सरगना कॉन है?"
"हो सकता है बूढ़ा ही सरगना हो.....क्योंकि वो जो काम भी हम से लेता है....उनके मकसद से अच्छी तरह परिचित होता है."
"क्या मतलब?"
"उन्ह.....समझने की कोशिश करो.....मतलब ये की वो हम से केवल काम लेता है. हम किसी काम के उद्देश्य से परिचित नहीं होते हैं. हमे तो उसकी हवा भी नहीं लगने दी जाती. अक्सर ऐसा होता है कि उन कामों के परिणाम से हम किसी हद तक मामले का अंदाज़ लगा लेते हैं. उदाहरण के तौर पर अपना केस ले लो. जब अपाहिज मर गया और अख़बारों मे उसके बारे मे खबरें आईं तब मुझे पता चल सका कि तुम्हें फाँसने का क्या मकसद था."
"क्या मकसद था....?"
"अर्रे.......यही कि अपाहिज की हत्या का आरोप तुम्हारे सर पर डाल दिया जाता."
"मगर कैसे?" इमरान ने झल्लाए हुए लहज़ा मे कहा....."अगर मैं अपना मूह बंद रखता...."
"तुम्हें बार बार मूर्ख कहते हुए भी उलझन होती है. तोड़ा खोपड़ी का इस्तेमाल करो. जब तुम उस मंज़िल से गुज़रे ही नहीं तो कैसे कह सकते हो कि उस समय परिस्थिति क्या होती. या कोई तुम्हें उसी समय वहीं देख लेता जब मैं कॉटेज मे घुसती और तुम बाहर मेरा इंतेज़ार कर रहे होते. फिर अगली सुबह क्या होता......जब उसकी लाश मिलती. मैं भी वहाँ से हटा दी जाती. फिर तुम रो रो कर कहते कि तुम्हें कोई लड़की वहाँ ले गयी थी. मगर किसे विश्वास होता? तुम्हारे सामने फाँसी का फँदा होता."
"अर्रे बाप रे...." इमरान उच्छल कर अपनी गर्दन सहलाने लगा और लड़की हंस पड़ी. फिर अचानक गंभीर होकर बोली...."फिर वो मुझे भी रास्ते से हटा देते क्योंकि मैं खुद को छुपा ना सकती.....केवल इस कारण पोलीस मेरी तलाश मे भी है कि मैं तुम्हारे साथ देखी गयी थी. इस तरह पोलीस तुम्हें पकड़ लेती और मुझे ना पा सकती. फिर वही होता जो अभी कह चुकी हूँ. लेकिन एक बात समझ मे नहीं आई."
वो चुप होकर कुच्छ सोचने लगी फिर बोली "डावर सच मच था कॉन?"
"ये भी तुम्हीं बता सकोगी...."
"मैं क्या जानू.....मैं जानना चाहती हूँ. वो साड़ी & सोंस का ट्रॅवेलिंग एजेंट था. लेकिन साड़ी वाले उसे अपाहिज के रूप मे नहीं जानते थे......और वास्तव मे अपाहिज था भी नहीं........फिर आख़िर वो दोहरी ज़िंदगी क्यों गुज़ार रहा था. अगर वो पहली बार उस रूप मे लोगों को मिला होता तो कहा जा सकता था कि चोरी के बाद पोलीस से बचने केलिए अपाहिज बना होगा."
"मेरी गर्दन काटने केलिए अपाहिज बना था." इमरान झल्ला कर बोला. "अभी ये मत सोचो कि वो अपाहिज क्यों था."
"फिर तुम ही बताओ कि क्या सोचूँ? मैं तो बड़ी मुसीबत मे फँस गयी हूँ...."
इमरान खामोश होकर कुच्छ सोचने लगा. फिर बोला..."क्या ये चोरों और हत्यारों का गिरोह है?"
"मैं आज तक नहीं समझ सकी कि ये किस प्रकार के लोगों का गिरोह है."
"मैं अपना पैदाइशी मूर्ख होना स्वीकार करता हूँ....फिर क्यों उल्लू बना रही हो?"
"विश्वास करो मैं नहीं जानती."
"क्या डावर की हत्या उन हीरों केलिए नहीं हुई थी?"
"हो सकता है कि यही बात रही हो.....काश तुम समझ सकते.....हम सब बुरी तरह फँस गये हैं. अब इस जाल से किसी तरह नहीं निकल सकते."
"मैं समझा नहीं.....तुम क्या कहना चाहती हो."
"तो सुनो........लंबी कहानी है. हम सब शांति प्रिय नागरिक थे. तुम जानते ही होगे कि इंसान ज़िंदगी की एकरूपता से उकता जाता है......और परिवर्तन केलिए क्या कुच्छ नहीं कर बैठता. ऐसे पल भी आते हैं जब गंभीरता की कल्पना से भी डर लगने लगता है. हम आठ दोस्तों ने एक क्लब बनाया था और खाली समय मे दिन भर की बोरियत दूर करने केलिए तरह तरह की हरकतें करते थे. अक्सर कोई अजनबी भी हमारी शरारतों का शिकार हो जाता था. लेकिन शरारातें ऐसी नहीं होतीं कि कोई बुरा मान जाता. वो अजनबी भी कुच्छ समय केलिए हमारी दिलचस्पीयों मे शामिल हो जाता. कहने का मतलब ये है कि हम कभी क़ानून की सीमा से बाहर कदम नहीं निकालते थे. क्लब की स्थापना का मकसद केवल मनोरंजन था.
एक दिन ये बूढ़ा पता नहीं कहाँ से आ फँसा. ये भी हमारी एक शरारत का शिकार हुआ था. फिर उसने हम से रिक्वेस्ट किया कि हम उसे भी क्लब का मेंबर बना लें. आदमी बहुत ज़िंदा-दिल साबित हुआ था. इसलिए हमें क्या आपत्ति हो सकती थी. कुच्छ दिनों बाद हम ने महसूस किया कि वो तो हम सबों से तेज़ है. नित नयी नयी शरारतों के प्रोग्राम बड़ी सफाई और बुद्धिमानी से बनाता. धीरे धीरे वो हम सबों पर छाता चला गया. और कुच्छ दिन बीतने पर हम सब महसूस करने लगे की शरारतों के बहाने हम सब से काई गैर क़ानूनी हरकतें भी हो चुकी हैं. हम मे से कोई भी ऐसा नहीं था जिसके हाथ अंजाने मे कभी ना कभी क़ानून को ना तोड़ा हो.......और बूढ़े के पास हमारे खिलाफ क्लियर प्रूफ थे. वो किसी भी समय हमारी गर्दने फँसा सकता था.
अब हम उसके इशारों पर नाचने लगे. क्लब एक ऐसे गिरोह मे बदल गया जिस का सरगना वो बूढ़ा था. अब हमे काम के बदले उस से पैसे भी मिलते हैं. लेकिन हम उसके जाल से किसी भी तरह नहीं निकल सकते. वो कहता है कि उसी समय तक सुरक्षित है जब तक उसके अधीन ज़िंदगी जीवन गुज़ारते रहें. उस से अलग होने की कोशिश ही हमें जैल का दरवाज़ा दिखा देगा. हम मजबूर हैं. जैल जाना कॉन पसंद करेगा?"
"अच्छा तो वो लोग जिन्होने मुझ पर हमला किया था तुम्हारे उसी क्लब के मेंबर थे?"
"बिल्कुल नहीं......वो तो बड़े ख़तरनाक लोग थे. पहले भी कयि बार उन्हें देख चुकी हूँ. पता नहीं और भी कितने लोग हैं जिन्हें मैं नहीं जानती. वो बूढ़े ही केलिए काम करते हैं. हम तो केवल दस हैं लेकिन हम से कभी धिन्गा-मुष्टि किस्म के काम नहीं लिए गये."
"क्या मुझ पर पहले ही से तुम लोगों की नज़र थी?"
"नहीं......तुम से रंडोंली मुलाकात हुई थी. राजधानी से कॅंप आते समय सच मुच गाड़ी खराब हो गयी थी. उस समय तो मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं वहाँ क्यों बुलाई गयी हूँ? कॅंप मे पहुच कर बूढ़े की स्कीम मालूम हुई थी. मैने सोचा कि इस काम केलिए तुम जैसा अहमाक़ बहुत मुनासिब साबित होगा. लेकिन सच बताओ.....क्या तुम सच मच अहमाक़ हो?"
"अब अहमाक़ कहा तो थप्पड़ मार दूँगा." इमरान नथुने फूला कर बोला...."मैं अहमाक़ नहीं हूँ....."
इमरान थोड़ी देर खामोश रहा फिर नरम लहजे मे बोला...."बस अक्सर ये होता है कि मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है......समझ मे नहीं आता कि किस बात के जवाब मे क्या कहना या करना चाहिए.......ओके लीव इट......ये बताओ कि अब तुम ने अपने बारे मे क्या सोचा है?"
"अगर बुद्धि भ्रष्ट ना हो गयी हो तो तुम्हीं कुछ बताओ.....लेकिन....ये बताओ कि क्या तुम्हें पता था कि मैं इस समय उसी इमारत मे लाई जाउन्गि......ये गुफा वहाँ से अधिक दूर तो नहीं लग रहा."
"हम इस समय हॉलिडे कॅंप के निकट ही हैं. इमारत भी हॉलिडे कॅंप से अधिक दूर नहीं है. उसको चूँकि मुझे फाँसना था इसलिए उस ने इतने घुमाव फिराव वाला रास्ता चुना था."
"एनीवे.......अब वो लोग तुम्हारी तलाश मे होंगे......मैं फिर कहती हूँ कि उनके इस तरह निकल भागने मे भी कोई ना कोई चाल ज़रूर होगी."
"बूढ़े का नाम क्या है?"
"शातिर..........अजीब बेतुका नाम है. वो कहता है कि शायर हूँ और शातिर 'तखल्लुस' है. हम सब उसे शातिर ही के नाम से जानते हैं. चंदे की दलाली करता है."
"पर्मनेंट रेसिडेन्स कहाँ है."