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हो जाए अगर दिल दीवाना

जयशर्मा अपना कप ट्रे में रखकर बोले—“अरे, आप रोईये नहीं. मेरा इरादा आपको आपकी बेटी से दूर करना नहीं हैं. हम दिल से चाहते हैं, डॉली आपके साथ बहुत खुश रहें. डॉली दिल की बुरी नहीं हैं. हमारे घर आने के बाद इन तीन दिनों में उसका नटखटपन देखकर लगता हैं, जैसे अभी तक वो दस–पन्द्रह साल की बच्ची हैं और मेरे तीनों बच्चों के साथ तो ऐसे घुलमिल गई, जैसे पता नहीं, कब से जान–पहचान हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी दोनों ने अपनी आँखें पोंछकर डॉली के बचपन को याद करते हुए डॉली की बहुत सी बातें जयशर्मा को बताई.

सेठ साँवरमल बागड़ी बहुत सी बातें बताने के बाद बोले—“ऐसी थी डॉली. डॉली हमारे जीवन में इतनी खुशियाँ लेकर आई, हमें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ, हमारा बेटा नहीं हैं. हम एक बेटी के माँ–बाप बनकर बहुत खुश थे. फिर इसकी बहुत शिकायतें आने लगी. डॉली गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हैं, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करती हैं. बड़ों को बैईज्जत करती हैं. और भी बहुत सी शिकायतें. अपनी इकलौती बेटी को बिगड़ते देखकर हम डर गए और उसे बिगड़ने से बचाने के लिए बहुत सख्त हो गए. हमने सोचा, कहीं ज्यादा लाड़–प्यार देकर हम डॉली को बिगाड़ ना दें. लेकिन डॉली तो दिन बा दिन और ज्यादा खराब होती गई. कॉलेज में आने के बाद गलत लड़के–लड़कियों की संगत में आकर शराब पीने लगी. रात–रात भर घर से बाहर घूमने लगी. फिर इस लड़के रंगीला के चक्कर में पड़ गई. हमने बहुत समझाया, ये लड़का ठीक नहीं हैं. लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी. फिर जो कुछ हुआ, सब आपके सामने हैं.”

राजलक्ष्मी—“एक इकलौती बेटी, वहीं जब सीधे मुँह बात ना करें. तो माँ–बाप के मन पर क्या गुजरती हैं ? ये सिर्फ वहीं माँ–बाप समझ सकते हैं, जिनके साथ ऐसा हुआ हो.”

जयशर्मा—“होता क्या हैं ? कभी–कभी हम समझ नहीं पाते, हमें क्या करना चाहिए ? आपकी सारी बातें सही हैं. आप भी सभी माँ–बाप की तरह अपनी बच्ची का भला ही सोचते हो. लेकिन डॉली को सही रास्ते पर चलाने के लिए आपने तरीके गलत अपनाए. चाहे लाड़–प्यार हो, चाहे सख्ती हो. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा हो जाए तो वो नुकसान करता हैं. आप लोगों के मन में एक डर आ गया, कहीं इकलौती बच्ची हाथ से निकल ना जाए और इस चक्कर में आप लोग घबराकर कुछ ज्यादा सख्त हो गए. परिणाम ये हुआ, डॉली को आपसे मिलने वाली डांट और आपसे होने वाली पिटाई की कोई परवाह ही नहीं रही.”

राजलक्ष्मी—“तो आप ही बताईए, इकलौती बेटी का ये हाल देखकर हम क्या करते ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब ये क्या कर रही थी ? वो भी आपको पता ही हैं. टीवी में खबरें आई. सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी. बाप की पगड़ी उछालने में कोई कसर बाकि नहीं रखी.”

मिनी सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आई और जयशर्मा के पास आकर सोफे पर बैठ गई.

जयशर्मा ने सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“देखिये, कई बार क्या होता हैं ? बच्चे हमारे पास आकर बोलते हैं, मम्मी या पापा, हमें आपसे कुछ कहना हैं. हम तिलमिलाकर बोलते हैं, क्या हैं ? तेरी बात बाद में पहले ये काम कर. हमेशा हमें परेशान करते हो. इस बार क्या गलती की हैं तूने ? बहुत सारे माँ–बाप अपने बच्चों के साथ इस तरीके से बात करते हैं, जैसे बच्चे नहीं हैं, भेड़–बकरी हैं. बच्चे अपने दिल की बात कहने के लिए माँ–बाप के पास आते हैं, तो माँ–बाप को चाहिए, प्यार से बच्चों की बात सुनकर बच्चों को प्यार से समझाए. लेकिन समझाना तो बहुत दूर की बात हैं. बहुत से माँ–बाप बच्चों के साथ सीधे मुँह बात तक नहीं करते. ये सच्चाई हैं. बच्चे नादान हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे कुछ समझते ही नहीं. अरे…जब माँ–बाप बच्चों को कुछ समझाएगें, तभी तो बच्चे समझेगें. कोई दूसरा थोड़े ही आएगा, हमारे बच्चों को समझाने के लिए.”

मिनी—“और सबसे बड़ी गलती होती हैं, बच्चे बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें, ये सोचना. अपने आप तो बच्चे बोलना भी नहीं सीखते. बोलना भी सिखाना पड़ता हैं. फिर हम ये कैसे सोच लेते हैं, बड़े होकर बच्चे अपने आप समझदार हो जाएँगें ?”

जयशर्मा—“और माँ–बाप के बच्चों की बात नहीं सुनने का फायदा गलत लोग उठाते हैं. माँ–बाप तो अपने बच्चों की बात सुनकर बच्चों को कुछ समझाना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि बच्चे मुर्ख हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे नासमझ हैं, बच्चों को समझाने का कोई फायदा नहीं हैं. बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें. लेकिन गलत लोग बच्चों की बात सुनकर बच्चों को गलत बातें बहुत अच्छी तरह प्यार से समझा देते हैं और बच्चे खुशी–खुशी गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. यहीं आपकी डॉली के साथ हुआ हैं.”

मिनी—“और हाँ, बच्चों को डरा–धमकाकर या पिटाई करके तो हम कभी बच्चों को सही रास्ते पर नहीं चला सकते. जब तक बच्चों के मन में हमारा डर होता हैं, तब तक बच्चे चोरी–छिपे गलतियाँ करते हैं और जब बच्चों के मन से डर निकल जाता हैं, फिर बच्चे किसी की परवाह किये बिना मनमानी करने लगते हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“शायद आपकी बात ठीक हैं. ऐसी गलतियाँ तो हमसे भी हुई हैं. लेकिन मनुष्य क्या करें ? जीवन में घर–परिवार भी होता हैं. रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती हैं. कारोबार देखना भी जरूरी हैं. जीवन में इतनी भागदौड़ होती हैं, कभी–कभी हम भविष्य पर विचार नहीं कर पाते.”

मिनी—“देखिये, जीवन में सब कुछ जरूरी हैं, इसलिए हमें सभी बातों में संतुलन बनाकर करना चाहिए. जब हम किसी एक बात पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देते हैं और दूसरी बात को हल्के में ले लेते हैं, तब संतुलन बिगड़ जाता हैं.”

राजलक्ष्मी—“आपकी बात सही हैं. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ? हम तो बेटी को अपना जीवन बर्बाद करते देखकर कुछ समझ नहीं पाए और जो बातें आप लोग बता रहे हैं, वो सारी गलतियाँ हम कर बैठे हैं. अब तो अगर आप लोग कहो, तो हम डॉली से माफ़ी माँग लेते हैं.”

जयशर्मा—“अरे, कैसी बातें कर रही हैं आप ? ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं हैं. डॉली को प्यार और अपनेपन की जरूरत हैं, डांट और डंडे से पिटाई की जरूरत नहीं हैं. आप लोग बस उसे प्यार और अपनापन दो. माफ़ी–वाफ़ी की कोई जरूरत नहीं हैं.”

मिनी—“डांट और पिटाई से बच्चों को डराने की जगह हमें बच्चों को हर एक समझाने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे फिर कभी नहीं बिगड़ते. बस हमारे समझाने का तरीका ऐसा हो, कि बच्चों को हमारी बातें भाषणबाजी या लेक्चरबाजी ना लगे.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, डांट और डंडे से पिटाई तो बहुत कर चुके हैं और उसका परिणाम भी देख लिया हैं.”

मिनी—“अब पुरानी बातें भूल जाईये, भाई साहब. जो होना था, वो तो हो गया. उस पर अफ़सोस करने से कुछ नहीं मिलने वाला.”

जयशर्मा—“और हाँ, इस बार उस लड़के के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके डॉली ने कुछ गलत नहीं किया. अगर इन घटिया और बेकार लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग इसी तरह बिना किसी डर के किसी ना किसी मासूम को अपना शिकार बनाते रहेंगे. फोर एग्लामपल ये घटिया लड़के, ये बेकार आदमी लड़कियों और महिलाओं के शरीर पर वहाँ कुछ गलत हरकत करते हैं, जहाँ लड़की या महिला को बताने में शर्म महसुस होती हैं. पहली बात तो हैं, ज्यादातर लड़कियाँ और महिलाएँ कुछ बोलती ही नहीं हैं, बस चुपचाप सहन करती हैं. अगर कोई हिम्मत वाली लड़की या महिला बोलकर विरोध करें, तो ये घटिया और बेकार लोग कहते हैं, बताओ जरा, हमने किया क्या हैं ? लड़की या महिला शर्म के कारण सब कुछ साफ़–साफ़ नहीं बता पाती और ये घटिया लोग लड़की या महिला को गलत साबित करके हँसते हुए निकल जाते हैं. लड़कियों और महिलाओं का ये शर्म करके चुप रहना ही, इन घटिया लोगों की ताकत हैं. जिस तरह डॉली ने हिम्मत करके उस लड़के की एक–एक गलत और गन्दी बात पूरी डिटेल के साथ फेसबुक पर पोस्ट की हैं. अगर हर लड़की और हर महिला इसी तरह घटिया और गन्दे लोगों की हर बात कोई शर्म किये बिना सबको बताने लगे, तो इन घटिया और बेकार लोगों के मन में भी एक डर पैदा होगा. और ऐसा सिर्फ वहीं लड़की कर सकती हैं, जो बहुत अच्छी हो, जो खुद गलत ना हो. जो लड़कियाँ खुद जान–बुझकर लड़कों के चक्कर में फँसती हैं, वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए हमें डॉली जैसी अच्छी और हिम्मत वाली लड़कियों की मदद करनी चाहिए. ताकि दूसरी अच्छी लड़कियों को भी गलत लोगों के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत मिले.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ये सब कहने की बातें हैं, जयशर्मा जी. हम रोज भुगत रहे हैं.”

जयशर्मा—“आप इसलिए भुगत रहे हो, क्योंकि आपकी और आपकी बेटी की कोई गलती ना होते हुए भी आप लोग खुद को गलत मानते हो.”

मिनी—“और भाई साहब, कहने वाले तो टीवी पर राज के साथ इनका नाम आने के बाद हमें भी बोल रहे हैं. लेकिन हम उन कहने वालों को सही और सटीक जवाब देते हैं. उनसे पूछते हैं, गलत करने वाला बुरा होता हैं या जिसके साथ गलत हुआ हो, वो बुरा होता हैं ? जो अच्छे और समझदार लोग हैं, वो हमारी बात समझ जाते हैं और गलत लोग इसलिए नहीं समझते, क्योंकि उनको गलत रास्ते पर ही चलना हैं.”

जयशर्मा—“हाँ, बिल्कुल.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन लोगों के मुँह तो फिर भी बन्द नहीं होते ना.”

जयशर्मा—“देखिये साँवरमल जी, डॉली ने किसी को धोखा दिया नहीं हैं. डॉली ने किसी से धोखा खाया हैं. तो फिर आप क्यों शर्मिन्दगी महसुस करते हो ? अगर डॉली गलत रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चल रही हैं, तो आप बस उसकी मदद करो. अगर लोग आपके सामने कुछ बोलते हैं, तो उनको जवाब दो. हाँ, पहले कुछ वजह थी, कुछ कारण थे, इसलिए हमारी बेटी भटक कर गलत रास्ते पर चली गई. और हमारी बेटी भटक गई थी, बिगड़ी नहीं थी. हमारी बेटी ने किसी का बुरा नहीं किया. हमारी बेटी के साथ बुरा हुआ था. लेकिन अब उसने सही रास्ता पकड़ लिया हैं. इसके बाद दुनिया कुछ भी कहें, दुनिया की परवाह मत करो. लोग कुछ ना कुछ तो कहते ही हैं और इन कहने वालों का कोई ईलाज नहीं हैं. जब हमारी शादी हुई थी, उस वक्त हमें भी लोग बहुत कुछ कहते थे. मुझे कहते थे, ये जयशर्मा तो अन्टी का दीवाना हैं. मिसेज को कहते थे, मिनी ने एक बच्चे को फँसा लिया. और भी बहुत कुछ कहते थे. लेकिन हमें पता था, हमने कुछ भी गलत नहीं किया. अपने घरवालों की मरजी से, सारे रीति–रिवाजों के साथ शादी करके हम पति–पत्नी बने हैं. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो करने दो. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, तो हम क्यों लोगों को सफाई देते फिरे ? हाँ, हमारे सामने कुछ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी. यहीं बात मैं आप लोगों से कहूँगा, पहले जो होना था, वो हो गया. अब आगे से पुरानी गलती नहीं दोहराएँगें. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो उनको करने दो. लोगों को बातें करके खुश हो लेने दो.”

राजलक्ष्मी—“लेकिन भाई साहब, लड़की के बारे में ये सब जानने के बाद लड़की से कौन शादी करता हैं ? आपकी बातें सारी ठीक हैं, लेकिन दुनियादारी और समाज को भी तो देखना पड़ता हैं.”

मिनी—“हाँ, आपकी बात सही हैं. लेकिन दुनिया में अच्छे और समझदार लोग भी बहुत हैं. जो लोग डॉली की नासमझी के कारण की हुई गलती को माफ़ करके डॉली की अच्छाईयाँ देखेंगे, उनको कोई प्रोब्लम नहीं होगी, डॉली को अपने घर की बहू बनाने में.”

जयशर्मा—“और अभी आप लोग डॉली की शादी के बारे में मत सोचो. वो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं, इसमें उसकी मदद करो. अभी उसे हम सबके साथ की जरूरत हैं. शादी हो जाएगी, टाइम आने पर.”

मिनी—“और इस बार तो किस्मत अच्छी थी, जो डॉली के पास पैसे नहीं थे. राज को वो बस स्टैण्ड पर बैठी मिल गई और राज उसे अपने साथ ले आया. वरना वो तो ये शहर छोड़कर कहीं ओर जा रही थी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—“हे भगवान………”

जयशर्मा—“अब छोड़ो, इन सब बातों को. आपको अगर डॉली को कैद ही करना हैं, तो उसे प्यार और अपनेपन की जंजीर में बाँध कर अपने दिल के कमरों में कैद कीजिये. किसी को कैद करने के लिए सबसे अच्छी चीज होती हैं, प्यार और अपनेपन की जंजीर. जब हम किसी को प्यार और अपनेपन की जंजीरों में बाँध लेते हैं, फिर वो खुद ही कभी इन जंजीरों से आजाद नहीं होना चाहता.”

राजलक्ष्मी—“ठीक हैं, भाई साहब. आपकी ये बात हम जरूर ध्यान में रखेंगे. लेकिन डॉली को बुला तो दीजिये. पाँच दिन से आँखें तरस गई, उसे देखने के लिए.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, उस पर हाथ उठाकर हम अन्दर ही अन्दर कितना रोते हैं ? ये हम ही जानते हैं. जब से वो घर से गई, हमारा तो खाना–पीना सब छुट गया.”

जयशर्मा—“ओह…फिर तो आज का खाना आप हमारे यहाँ ही डॉली के साथ बैठकर खाओ.”

राजलक्ष्मी—“नहीं–नहीं, भाई साहब.”

मिनी—“नहीं–नहीं क्या ? कोई बहाना नहीं चलेगा. अब आप लोगों ने खाना खाए बगैर जाने की जिद की, तो हम डॉली को भी नहीं ले जाने देगें.”

जयशर्मा—“अब इनके सामने मेरी भी नहीं चलती. पहले ही बता देता हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी मुस्कुराकर बोले—“ठीक हैं.”

मिनी सोफे से उठकर बोली—“आप लोग बातें करो. मैं खाने की तैयारी करती हूँ.”

राजलक्ष्मी खड़ी होते हुए बोली—“चलिये, मैं भी आपकी कुछ मदद कर दूँ.”

मिनी—“अरे, आप बैठिये, आपकी बेटी हैं ना. मदद के लिए. वो अब हमारे घर की सदस्य बन गई हैं.”

राजलक्ष्मी वापस बैठ गई. मिनी खाना बनाने में मदद के लिए डॉली और सृष्टी को बुलाने सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.

सवा तीन महिने बाद आठ अक्टूबर, रविवार को शाम के पाँच बजे डॉली और राज एक पार्क में आकर एक बैंच पर बैठ गए.

राज—“तो गाड़ी लाने से मना कर दिया क्या तुम्हारे मम्मी–पापा ने ?”

डॉली—“नहीं यार, वो तो खुद कहते हैं, जब गाड़ी हैं, तो बस में क्यों जाती हो ?”

राज ने मजाकियाँ लहजे में कहा—“वहीं तो ! तुम्हारा असली घर तो तुम्हारी गाड़ी थी और तुमने वहीं लानी बन्द कर दी.”

डॉली—“मजाक मत करो.”

राज ने हँसकर कहा—“अच्छा–अच्छा, लेकिन तुमने गाड़ी लाना बिल्कुल ही बन्द क्यों कर दिया ? जब कहीं आना–जाना हो, तब तो ले आया करो.”

डॉली—“नहीं, बिल्कुल बन्द थोड़े ही किया हैं. पापा के साथ ऑफ़िस आना–जाना गाड़ी से ही करती हूँ. कभी मम्मी को कहीं ले जाना हो और ड्राईवर ना हो, तो गाड़ी ले जाती हूँ. बस पहले की तरह फालतू में गाड़ी ले जाना बन्द कर दिया. पापा से पॉकेट–मनी की जगह सैलरी लेती हूँ और उस सैलरी से अपना खर्च चलाती हूँ. जब मैं अपनी कमाई पर गाड़ी मैनेज करने लायक हो जाऊँगी, फिर ले लूँगी गाड़ी.”

राज—“चलो, अच्छी बात हैं. और तुम्हारे ऑफ़िस में स्टाफ के लोग तुम्हें क्या कहते हैं ? सिर्फ डॉली या डॉली मैडम ?”

डॉली—“दोनों.”

राज—“एक महीना हो गया, तुम्हें जॉब करते हुए ?”

डॉली—“नहीं, पिछले महिने पन्द्रह से ही जॉइन किया था.”

राज—“तो कौनसी जॉब ज्यादा अच्छी लगी ? सेठ जी के पास या तुम्हारे पापा के पास ?”

डॉली—“हम्म…जॉब के हिसाब से सोचा जाए, तो पापा के पास ज्यादा सही हैं. वैसे जय अंकल के पास ज्यादा अच्छा लगता था.”

राज—“हम्म…अभी नई–नई हो ना वहाँ. धिरे–धिरे वहाँ भी मन लग जाएगा.”

डॉली—“अरे, मन तो लग गया. लेकिन वहाँ पापा और एक–दो लोगों के सिवा कोई मेरे काम पर ध्यान ही नहीं देता.”

राज—“कोई बात नहीं, जो लोग ध्यान देते हैं, उनसे हेल्प ले लिया करो.”

डॉली—“फिर भी यार, थोड़ा अजीब सा लगता हैं. मैं तो यहाँ जय अंकल के पास ही जॉब करना चाहती थी. लेकिन जय अंकल ने कहा, जब तुम्हारे पापा का इतना बड़ा बिजनेस हैं, तो हमारे पास जॉब क्यों कर रही हैं ? पहले तो मैनें बोल दिया, वहाँ कोई मेरे काम पर ध्यान नहीं देगा, बस पापा के कारण सब तारीफ करेंगे और मेरी हाँ में हाँ मिलाएँगें. लेकिन पिछले महिने जब पापा की तबीयत खराब हुई, तो जय अंकल और मिनी अंटी ने कहा, तुम्हारे होते हुए इस उम्र में तुम्हारे पापा अकैले सारा बिजनेस संभालते हैं, ये अच्छा नहीं लगता. अगर तुम अभी उनका बिजनेस जॉइन नहीं करना चाहती, तो उनके पास जॉब कर लो. पॉकेट मनी लेना तो तुमने पहले ही बन्द कर दिया हैं. जो सैलरी हम तुम्हें देते हैं, वहीं सैलरी अपने पापा से ले लेना. इस तरह तुम सेल्फ डिपेन्ड भी रहोगी और अपने पापा की मदद भी कर दोगी. दूसरी जगह नौकरी करने से कोई ज्यादा आत्मनिर्भरता थोड़े ही आ जाती हैं, वो तो इन्सान पर निर्भर करता हैं. और फिर आगे चलकर तुम्हें अपने पापा का बिजनेस ही तो संभालना हैं. तुम वहाँ जॉब करोगी तो अनुभव मिलेगा. हमारा तो ज्वैलरी का बिजनेस हैं. हमारे पास जॉब करोगी तो बाद में तुम्हारे पापा का बिजनेस जॉइन करने के लिए तुम्हें शुरू से दुबारा मेहनत करनी पड़ेगी. इसलिए अपने पापा के पास जॉब करो और उनका सहारा बनो. तुम काबिल लड़की हो, अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करो.”

राज—“सेठ जी और मिनी मैडम की बातें तो बिल्कुल सही हैं. और अब तो तुम्हारी अपने मम्मी–पापा के साथ चल रही सारी प्रोब्लम भी खतम हो गई. इसलिए तुम्हें भी अपना फर्ज निभाना चाहिए.”

डॉली—“हाँ, इसलिए तो मैनें जय अंकल और मिनी अंटी की बात मानकर पापा के साथ ऑफ़िस जाना शुरू कर दिया.”

राज—“ये भी सही हैं. वैसे तुम खुश हो ना, अब अपनी जिन्दगी में ?”

डॉली—“खुश ! मैं तो बहुत खुश हूँ. अब तो मेरे मम्मी–पापा मेरा इतना ख्याल रखते हैं, बस पूछो मत. उनका प्यार देखकर मुझे बहुत अफ़सोस होता हैं. काशः मैं पहले ही सुधर जाती.”

राज—“अफ़सोस क्यों करती हो ? जब सब कुछ ठीक हो गया हैं, तो खुश रहो और अपने मम्मी–पापा को भी खुश रखो.”

डॉली—“हाँ, और सब कुछ ठीक जय अंकल, मिनी जी और तुम्हारे कारण हुआ.”

राज—“मैनें क्या किया ? मैनें तो बस उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कहा था. सब कुछ किया तो तुमने ही हैं और फिर सेठ जी और मैडम ने तुम्हारे घर की प्रोब्लम सुलझा दी, तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाकर.”

डॉली—“हाँ, जय अंकल और मिनी अंटी का ये एहसास तो मैं कभी नहीं भूलूगीं. लेकिन मेरे बारे में उनको सब बताया तो तुमने ही था ना.”
 
राज—“बताने से क्या होता हैं ? वो बहुत अच्छे और भले लोग हैं. उन्होंने ने तो बहुत लोगों का भला करके लोगों की दुःख भरी जिन्दगी में खुशियाँ भरी हैं.”

डॉली—“हाँ, इसीलिए तो वो लोग भी बहुत सुखी हैं.”

राज—“हाँ, लेकिन बहुत से लोगों ने उनकी अच्छाई का गलत फायदा भी उठाया हैं. कई लोग दुःखी और परेशान होने का नाटक करके उनके पैसे लेकर भाग गए. फिर भी उन्होंने अच्छाई का रास्ता नहीं छोड़ा, ये बड़ी बात हैं.”

डॉली—“अच्छे लोगों की यहीं तो पहचान हैं. वो बुरा होने पर भी नहीं बदलते.”

राज—“हाँ, ये तो हैं. वैसे तुमने अपने मॉम–डेड को मम्मी–पापा कहना कैसे शुरू कर दिया ?”

डॉली हँसकर बोली—“बस ऐसे ही. जब मैं कॉलेज में आई, तो मेरे सब फ्रैंड्स अपने मम्मी–पापा को मॉम–डेड कहते थे, वहीं से मुझे भी आदत पड़ गई. अब तुम, सृष्टी, अँकुश, संयम, अंकित सब अपने मम्मी–पापा को मम्मी–पापा बोलते हो, तो मेरी भी यहीं आदत हो गई.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

डॉली—“अच्छा एक बात बताओ. ये मिनी अंटी जयशर्मा अंकल से दो–तीन साल बड़ी हैं क्या ?”

राज ने हँसकर कहा—“दो–तीन साल नहीं, मिनी मैडम चार साल और तीन महिने बड़ी हैं सेठ जी से. मिनी मैडम का जन्मदिन छब्बीस(26) अप्रेल को आता हैं और सेठ जी का जन्मदिन पच्चीस(25) जुलाई को आता हैं.”

डॉली—“ओह………”

राज—“क्या हुआ ?”

डॉली—“कुछ नहीं, आमतौर पर पति की उम्र पत्नी से ज्यादा होती हैं ना, इसलिए पूछा.”

राज—“हाँ, लेकिन इनकी लव–मैरिज हुई थी. और इनकी लव–स्टोरी भी बहुत अनोखी हैं.”

डॉली—“तुम्हें पता हैं, उनकी लव–स्टोरी ?”

राज—“हाँ.”

डॉली—“तो मुझे भी बताओ ना.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“उनके घर जाकर मिनी मैडम या सेठ जी से पूछ लेना.”

डॉली—“नहीं, उनसे पूछने में मुझे अजीब लगेगा. तुम बताओ ना.”

राज ने हँसकर कहा—“अच्छा, ठीक हैं. बताता हूँ. सेठ जी का पुराना घर हैं ना, जहाँ अब सेठ जी के छोटे भाई रहते हैं.”

डॉली—“हाँ.”

राज—“उसी गली में सेठ जी के घर से चार–पाँच घर छोड़कर मिनी मैडम की बुआ का घर हैं. मैडम की बुआ तो अब दुनिया से चली गई. बुआ के दो बेटे हैं. एक तो मैडम दो–तीन साल छोटे हैं, दूसरे छः या सात साल छोटे हैं.”

डॉली—“हम्म…”

राज—“मिनी मैडम बचपन से, छोटी थी तब से ही, साल में कई बार अपनी बुआ के घर आया करती थी. बुआ के घर आती थी, तो बुआ के बच्चों के साथ खेलती भी थी, बुआ के बच्चों के साथ बाहर गली में जाकर दूसरे बच्चों के साथ भी खेलती थी.”

डॉली—“फिर जय अंकल कैसे मिले, मिनी जी से ?”

राज—“फिर सेठ जी जब चार–पाँच साल के हुए तो वो भी घर से बाहर गली में आने लगे, खेलने के लिए. सेठ जी की मिनी मैडम के भाईयों के साथ दोस्ती हो गई. फिर जब मैडम बुआ के घर आती थी, तब सेठ जी भी मैडम के साथ खेलते थे. इस तरह खेल–खेल में खेलते–खेलते सेठ जी और मिनी मैडम की दोस्ती हुई.”

डॉली—“हम्म………ऐसे तो बचपन में बहुत सारे बच्चों की दोस्ती होती हैं.”

राज—“हाँ, उस टाइम सेठ जी पाँच–सात(5–7) साल के थे और मिनी मैडम आठ–दस(8–10) साल की थी. दोस्ती होने के बाद सेठ जी मैडम का इंतजार करते थे, कब मिनी बुआ से मिलने आए और उसके साथ खेलूँ ? उधर अपने शहर में मिनी मैडम भी इंतजार करती थी, कब बुआ के घर जाऊँ और जय के साथ खेलूँ ?”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………फिर आगे क्या हुआ ?”

राज—“फिर पढ़ाई–लिखाई के चक्कर में मिनी मैडम का बुआ के घर आना कम हो गया. पहले मैडम हर महिने दो–चार दिन के लिए आती थी, फिर दो–तीन महिने में एक–दो बार दो–चार दिन या पाँच–सात दिन के लिए आने लगी. धिरे–धिरे वक्त गुजारता रहा और पन्द्रह–सोलह(15–16) साल की उम्र होने के बाद मिनी मैडम का बाहर गली में खेलना–कूदना कम हो गया. लेकिन सेठ जी अभी ग्यारह–बारह(11–12) साल के बच्चे थे, उनको जैसे ही पता चलता मिनी आई हैं, वो मैडम की बुआ के घर पहुँच जाते और मिनी मैडम को अपने साथ खेलने के लिए कहते. मिनी मैडम मना कर देती.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी मैडम को बताते, मैनें तुम्हें कितना याद किया ? फिर मिनी मैडम से पूछते, तुम्हें मेरी याद नहीं आती क्या ? तुमने यहाँ आना कम क्यों कर दिया ? दोनों में इस तरह की बातें होती.”

डॉली—“फिर मिनी जी क्या कहती थी ?”

राज—“कहना क्या हैं ? मिनी मैडम को अपने बचपन के दोस्त सेठ जी की बातें बहुत अच्छी लगती. फिर मिनी मैडम सेठ जी को समझाती, अब मैं बड़ी हो गई हूँ. अब ऐसे गली में, मिट्टी में खेलना अच्छा नहीं लगता. फिर सेठ जी कहते, लेकिन मेरा तो तुम्हारे साथ खेलने का बहुत मन करता हैं. मुझे तो तुम्हारी और मेरी सारी बातें याद हैं. बचपन में खेलते–खेलते हर रोज अपनी लड़ाई होती थी, तुम मुझे पीट देती थी, मैं रोने लगता था, फिर तुम पहले हँसकर मेरा मजाक उड़ाती थी, फिर मुझे मनाती थी, फिर हम साथ–साथ खेलते थे.”

डॉली ने हँसकर कहा—“मिनी अंटी, जय अंकल को पीटती थी.”

राज—“हाँ.”

डॉली—“तुम्हें कैसे पता ?”

राज—“अक्सर बताते रहते हैं. बहुत बार मैं उनके पास बैठा होता हूँ, तब वो आपस में एक–दूसरे के साथ अपने बचपन की बातें करते हैं. इस तरह मुझे भी पता चल जाता हैं.”

डॉली—“हम्म…फिर मिनी जी कुछ नहीं कहती थी ?”

राज—“फिर अब मिनी मैडम बचपन की तरह गली में जाकर मिट्टी में खेल तो सकती नहीं थी. पहले की तरह हर महिने बुआ के घर भी नहीं आ सकती थी. लेकिन सेठ जी की बातें सुनकर मैडम को भी बचपन की सारी बातें याद आती और घर जाने के बाद मिनी मैडम को सेठ जी बहुत याद आते. इसलिए मिनी मैडम ने बातचीत का एक तरीका निकाला, ताकि सेठ जी के साथ उनकी दोस्ती चलती रहे.”

डॉली—“क्या तरीका निकाला ?”

राज—“लैटर. खत. चिट्ठी.”

डॉली—“ओह………कबूतर जा–जा, पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ.”

राज ने हँसकर कहा—“हाँ, उस वक्त अब की तरह मोबाइल वगैरह तो थे नहीं. इसलिए मिनी मैडम ने सेठ जी को चिट्ठी लिखना और वो डाक टिकट लगाकर पोस्ट करना, लाल रंग के डिब्बे में खत डालना. जो भी तरीका हैं, खत भेजने का. वो सब सीखा दिया. फिर सेठ जी और मिनी मैडम एक–दूसरे को चिट्ठियाँ लिखने लगे. सेठ जी और मिनी मैडम दोनों एक–दूसरे के खतों को छुपाकर नहीं रखते थे. घर में चिट्ठी के बारे में कोई पूछता था, तो घरवालों को चिट्ठी दिखा देते थे. घरवाले चिट्ठी पढ़ते थे, तो चिट्ठियों में वहीं बचपन वाली हँसी–मजाक और खेलकूद की बातें होती थी. दोनों एक–दूसरे की पढ़ाई–लिखाई के बारे में पूछ लेते थे, एक–दूसरे का हाल–चाल पूछ लेते थे, एक–दूसरे के घरवालों का हाल–चाल पूछ लेते थे. चिट्ठियों में ये साधारण बातें पढ़कर सेठ जी और मिनी मैडम के घरवालों ने सोचा, दोनों बचपन में साथ खेलते थे, बचपन की बातें याद तो आती ही हैं. फिर जयशर्मा तो अभी बच्चा हैं, बच्चों को अपने साथ खेलने वालों से लगाव होता ही हैं. इसलिए खतों के जरिये बातें करते हैं. इस तरह की बातें सोचकर दोनों के घरवालों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और कोई रोक–टोक नहीं लगाई. इस तरह चिट्ठियों में बातें करते–करते सेठ जी और मिनी मैडम की दोस्ती मजबुत होती चली गई.”

डॉली—“फिर अंकल जब बड़े हुए, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा ?”

राज—“नहीं, साधारण बातें लिखते थे. कोई प्यार–मोहब्बत वाली बात तो लिखते नहीं थे. इसलिए किसी ने कुछ नहीं कहा. दो–चार महिनों से जब मिनी मैडम अपनी बुआ के घर आती थी, तो दोनों की मुलाकात हो जाती थी. दोनों की चिट्ठियाँ पढ़ने के कारण सबको मालूम था, दोनों के मन में एक–दूसरे के लिए कुछ गलत नहीं हैं. इसलिए किसी ने मिलने–जुलने से भी नहीं रोका.”

डॉली—“अच्छा, फिर ?”

राज—“फिर जब मिनी मैडम की उम्र अठारह–उन्नीस(18–19) साल की हुई, तो मैडम के घरवाले मैडम के लिए लड़का देखने लगे. उस टाइम तक सेठ जी चोदह–पन्द्रह(14–15) साल के हो गए थे. मिनी मैडम अपनी बुआ के घर आकर जब सेठ जी से मिली, तो बातों–बातों में मिनी मैडम ने सेठ जी से कहा, मेरे घरवाले मेरे लिए लड़का देख रहे हैं. जैसे ही उनको मेरे लिए कोई अच्छा लड़का पसन्द आया, फिर उसके साथ मेरी शादी हो जाएँगी और शादी के बाद हमारी बातचीत बन्द.”

डॉली—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

राज—“सेठ जी ने कुछ नहीं कहा. बस मिनी मैडम की शादी के बाद मिनी मैडम के साथ बातचीत बन्द होने वाली बात सुनकर सेठ जी उदास हो गए. फिर यहाँ से शुरुआत हुई, सेठ जी और मैडम के प्यार की.”

डॉली—“कैसे ?”

राज—“सुनती जाओ, पता चल जाएँगा. मिनी मैडम दो–तीन दिन बाद जब बुआ के घर से वापस अपने शहर में अपने घर जाने से पहले सेठ जी से मिलने आई, तो सेठ जी ने मैडम से कहा, तुम मुझसे शादी कर लो. फिर हमारी बातचीत कभी बन्द नहीं होगी.”

डॉली हँसकर बोली—“अरे वाह………फिर मिनी जी ने क्या कहा ?”

राज—“मिनी मैडम भी तुम्हारी तरह हँसकर बोली, तुम अभी बहुत छोटे हो और शादी में लड़की की उम्र कम और लड़के की उम्र ज्यादा होनी चाहिए. अगर तुम उम्र में मेरे बराबर होते या मुझसे बड़े होते, तो फिर मैं तुमसे शादी जरूर कर लेती.”

डॉली—“ओह…फिर क्या हुआ ?”

राज—“होना क्या था ? सेठ जी फिर से मायूस हो गए. मिनी मैडम अपने शहर वापस चली गई. सेठ जी मन में सोचने लगे, काश, मैं उम्र में मिनी से बड़ा होता. ये मिनी मुझसे पहले क्यों पैदा हो गई ? अगर मिनी मेरे दुनिया में आने के बाद दुनिया में आती, तो मैं मिनी से शादी करके हमेशा मिनी के साथ रह पाता.”

डॉली—“फिर ?”
 
राज—“फिर कुछ दिन परेशान और उदास रहने के बाद सेठ जी ने यहाँ–वहाँ, इधर–उधर, छोटे–बड़े, कुँवारे–शादीशुदा, नारी–पुरुष, अपने आस–पास के बहुत से लोगों से पूछा, कि शादी में लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा होना जरूरी हैं क्या ? और अगर जरूरी हैं, तो क्यों जरूरी हैं ? अगर शादी में पत्नी उम्र में पति से बड़ी हो, तो क्या प्रोब्लम होती हैं ? बहुत से लोगों से इस तरह के सवाल–जवाब करने के बाद भी किसी से सेठ जी को कोई सही और जायज जवाब नहीं मिला.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी ने शादी में पति बड़ा और पत्नी छोटी क्यों होती हैं ? इसके बारे में पढ़ा. आखिर में सबसे पूछने और सब पढ़ने के बाद परिणाम ये निकला, कि प्रोब्लम तो कुछ भी नहीं हैं, बस लोगों ने ही अपनी मनमर्जी से ये नियम बनाया हैं.”

डॉली—“फिर क्या किया, अंकल ने ?”

राज—“फिर सेठ जी ने यहीं बातें सुजाना मैडम को समझाना शुरू किया. सारी बातें सोच–समझकर चार–छः महिने बाद मिनी मैडम सेठ जी की बातों से सहमत हो गई. सेठ जी की बातों से सहमत होने के बाद मिनी मैडम ने कहा, तुम्हारी बातें बिल्कुल सही हैं. लेकिन फिर भी हमारी शादी नहीं हो सकती. क्योंकि तुम अभी सिर्फ सोलह(16) साल के हो. जब तक तुम शादी के लायक होओगे, तब तक तो मेरी शादी हो चुकी होगी.”

डॉली—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

राज—“फिर सेठ जी की आँखों में आँशू आ गए और सेठ जी ने रोते–रोते कहा, मैं समझ गया. तुम मुझसे शादी करना ही नहीं चाहती. मैं तुमसे शादी करने के लिए इतनी कोशिश कर रहा हूँ और तुम हर बार मुझे बहला–फूसलाकर मना कर देती हो. तुम अपने घरवालों को बोल नहीं सकती, कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो ? जब मैं इक्कीस साल का हो जाऊँगा, फिर कर लेगें शादी.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर इस बात पर मिनी मैडम और सेठ जी में बहुत बार झगड़े हुए. लेकिन झगड़ते–झगड़ते आखिर में मिनी मैडम को भी सेठ जी से प्यार हो ही गया. फिर सेठ जी मिनी मैडम के दिल पर छा गए. मिनी मैडम भी सेठ की दीवानी हो गई और दोनों एक–दूसरे के प्यार में पागल हो गए.”

डॉली—“फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर मिनी मैडम ने कहा, जब तक तुम इक्कीस साल के नहीं हो जाते, मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर अपनी शादी टालती रहूँगी. लेकिन तुम अपने वादे से पलट मत जाना. सेठ जी ने कहा, तुम्हारी कसम ! मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा. तुम्हारे सिवा किसी ओर से शादी के बारे में सोचूँगा भी नहीं. इस तरह सेठ जी और मिनी मैडम ने प्यार के वादे कर लिए, प्यार की कसमें खा ली. इसके बाद मिनी मैडम के लिए जब भी कोई रिश्ता आता, तो मैडम कोई ना कोई बहाना बनाकर शादी से मना कर देती. लेकिन मिनी मैडम जब बाईस–तैईस(22–23) साल की हुई, तो एक लड़का मैडम के घरवालों को इतना पसन्द आया, कि मिनी मैडम के घरवालों ने मैडम के मना करने के बाद भी मिनी मैडम का रिश्ता कर दिया.”

डॉली—“ओह………फिर ?”

राज—“फिर मिनी मैडम ने सेठ जी से कहा, मुझे माफ़ कर दो. मैनें बहुत कोशिश की, लेकिन मेरे घरवालों ने जबरदस्ती रिश्ता कर दिया. सेठ जी ने बेवफाई के इल्जाम लगाकर कहा, मुझे तो पहले ही पता था, तुम्हें मुझसे शादी करनी ही नहीं हैं. मिनी मैडम ने कहा, अब तुम चाहे जो मरजी इल्जाम लगाओ. लेकिन मैं मजबूर हूँ.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी सबकी परवाह छोड़कर सीधे मिनी मैडम के घर चले गए और मैडम के घरवालों को सब सच–सच बता दिया, कि मिनी और मैं एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. एक–दूसरे के बिना नहीं रह सकते. एक–दूसरे से शादी करना चाहते हैं. लेकिन मेरी उम्र कम हैं, इसलिए दो–ढ़ाई साल रूक जाओ.”

डॉली—“अरे वाह………मतलब जय अंकल शुरू से ही बहुत हिम्मत वाले हैं.”

राज—“वो तो हैं. और मिनी मैडम भी कम नहीं हैं. वो भी शुरू से ही ऐसी हैं.”

डॉली—“हम्म………फिर ?”

राज—“फिर मिनी मैडम के घरवालों ने पहले तो सेठ जी का मजाक उड़ाया. फिर मिनी मैडम ने भी सेठ जी का पूरा साथ दिया और कहा, जय सच बोल रहा हैं.”

डॉली—“फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर जब सेठ जी नहीं माने, तो मिनी मैडम के घरवालों ने सेठ जी को थप्पड़ मारकर धक्के देकर भगा दिया और मिनी मैडम ने सेठ जी को बचाने की कोशिश की, तो उनको भी थप्पड़ मारे. सेठ जी ने फिल्मी स्टाइल में कहा, मिनी, हम हार नहीं मानेगे.”

डॉली—“फिर क्या किया, अंकल ने ?”

राज—“फिर सेठ जी ने उँगली टेढ़ी करके घी निकालने की सोची. सेठ जी ने उस लड़के का पता लगाया, जिसके साथ मिनी मैडम का रिश्ता पक्का हुआ था. पता लगाकर सेठ जी पहुँच गए उस लड़के के शहर. और वहाँ जाकर उस लड़के की पूरी रिश्तेदारी में ये खबर फैला दी, मिनी का जयशर्मा नाम के लड़के के साथ चक्कर चल रहा हैं. लड़के वालों तक जब खबर पहुँची, तो उन्होंने मिनी मैडम के साथ अपने लड़के की शादी करने से मना कर दिया.”

डॉली—“फिर मिनी जी के घरवाले मान गए, अंकल से मिनी अंटी की शादी के लिए ?”

राज—“अभी कहाँ ? अभी तो और भी प्रोब्लम हुई थी. उस लड़के के घरवालों ने तो मिनी मैडम को बहू बनाने से मना कर दिया, लेकिन मिनी मैडम को तो तुमने देखा ही हैं. मिनी मैडम अभी पचास(50) साल की उम्र में भी कितनी खूबसूरत हैं, तो उस टाइम तैईस(23) साल की उम्र में तो और भी अच्छी लगती होगी. तो मिनी मैडम की खूबसूरती देखकर वो लड़का मैडम पर लट्टू हो गया था. उसने अपने घरवालों से कहा, एक बार इस मिनी से मेरी शादी करवा दो और दो–चार महिने इसके साथ रहने दो. फिर चाहे तलाक करवा देना.”

डॉली—“उफ्फ………वो तो बहुत ही घटिया और गन्दा लड़का था. अच्छा हुआ, मिनी अंटी की उससे शादी नहीं हुई.”

राज—“हाँ, उस लड़के की ये बात किसी तरह सेठ जी को मालूम हो गई. फिर सेठ अपने चार–पाँच दोस्तों को लेकर गए और पीट–पीटकर उसकी हड्डी–पसली एक कर आए. फिर उस लड़के के घरवालों ने सोचा, इस मिनी ने शादी किये बिना ये हाल करवा दिया. शादी के बाद पता नहीं क्या–क्या करेगी ? और अपने लड़के को मिनी मैडम और मिनी मैडम के घरवालों से पूरी तरह दूर कर लिया.”

डॉली—“बहुत अच्छा किया उस लड़के के साथ, अंकल ने.”

राज—“हाँ, वो इसी लायक था. फिर ये सब होने के बाद जब सेठ जी और मिनी मैडम की मुलाकात हुई, तो सेठ जी ने मिनी मैडम से कहा, मुझे माफ़ कर देना. तुम्हारी बदनामी तो बहुत हुई हैं. लेकिन दूसरा कोई रास्ता नहीं था. मिनी मैडम ने कहा, माफ़ी मत माँगो. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी सहन कर सकती हूँ.”

डॉली—“फिर इसके बाद क्या हुआ ?”

राज—“फिर सेठ जी ने धिरे–धिरे मिनी मैडम के सारे रिश्तेदारों में ये बात फैला दी, कि मिनी का जयशर्मा के साथ चक्कर चल रहा हैं. इसलिए मिनी मैडम के घरवालों को मिनी मैडम के लिए कोई लड़का नहीं मिल रहा था. जैसे–तैसे किसी तरह कोई लड़का मिलता, तो सेठ जी वहाँ पहुँचकर किसी ना किसी तरीके से अपने और मिनी मैडम के चक्कर की बातें फैला देते. इस तरह मिनी मैडम के घरवाले मिनी मैडम की शादी नहीं कर पा रहे थे.”

डॉली—“फिर अंकल ने मिनी जी के घरवालों को कैसे मनाया ?”

राज—“मिनी मैडम के घरवालों को मनाने से पहले सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी. मिनी मैडम की बुआ ने सेठ जी के घरवालों को बता दिया था, कि आपके लड़के को समझाओ, वो मेरी भतीजी की जिन्दगी खराब कर रहा हैं. एक–दो बार मिनी मैडम के घरवाले भी सेठ जी के घरवालों से झगड़ा करके गए. फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी को समझाया, अभी तो तू छोटा हैं. अभी तो तेरी शादी की उम्र ही नहीं हुई. वो लड़की तेरे से बड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र की लड़की का चक्कर छोड़. जवाँनी के जोश में दुनिया से अलग चलने की कोई जरूरत नहीं हैं. सेठ जी ने पहले प्यार से अपने घरवालों को समझाने की कोशिश की. लेकिन सेठ जी के घरवाले नहीं माने. फिर सेठ जी ने साफ़–साफ़ बोल दिया, शादी तो सिर्फ मिनी से ही करूँगा, मैं मिनी के इलावा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सोचा, इस उम्र में प्यार का भूत चढ़ता ही हैं. इससे पहले कि जयशर्मा प्यार के चक्कर में कुछ उल्टा–सीधा करें, जयशर्मा की शादी कर देते हैं. शादी के बाद प्यार का भूत अपने आप उतर जाएँगा.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी के बहुत मना करने के बाद भी सेठ जी का रिश्ता कर दिया. सेठ जी ने अपने घरवालों से कहा, अभी तो मैं बीस साल का ही हूँ. जब मैनें मिनी से शादी करने का कहा, तब तो बोल रहे थे, अभी तेरी शादी की उम्र ही नहीं हैं. लेकिन सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी की एक नहीं सुनी. बस जल्दी से जल्दी सेठ जी की शादी करने में लग गए.”

डॉली—“फिर अंकल ने अपनी शादी कैसे रोकी ?”
 
राज—“नहीं रोक पाए शादी.”

डॉली—“मतलब, अंकल ने किसी और से शादी कर ली ?”

राज—“हाँ, सेठ जी ने शादी से पहले अपने ससुराल वालों को सब सच–सच बता दिया, कि मैं किसी और से प्यार करता हूँ और उसी से शादी करना चाहता हूँ. आप लोग अपनी बेटी की शादी मेरे साथ मत करो. लेकिन सेठ जी के ससुराल वालों ने भी सेठ के प्यार को बचपना और नादानी समझकर जवाँनी का जोश समझ लिया और सेठ जी की धन–दौलत देखकर सब कुछ जानते हुए भी अपनी बेटी की शादी सेठ जी के साथ कर दी. सेठ जी के ससुराल वालों ने सोचा, एक बार शादी हो जाए, शादी के बाद सब भूल जाएँगा. अब लड़कों को इस उम्र में कोई ना कोई लड़की तो पसन्द आ ही जाती हैं. इस एक बात के लिए इतना अच्छा लड़का हाथ से क्यों जाने दें ?”

डॉली—“ओह………फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर सेठ जी की शादी होने के बाद मिनी मैडम की बुआ और मिनी मैडम के घरवालों ने मिनी मैडम से कहा, देख, जिसके लिए तू पागल हो रही हैं, उसने तो शादी कर भी ली. तू बैठी रह उसके इंतजार में कुँवारी.”

डॉली—“फिर मिनी जी ने क्या कहा ?”

राज—“मिनी मैडम ने अपने घरवालों से कुछ नहीं कहा. जब सेठ जी शादी के बाद मिनी मैडम से मिलने उनके शहर गए, तब मिनी मैडम बहुत दुःखी होकर सेठ जी से बहुत नाराज हुई और सेठ जी को बोली, झूठे, मक्कार, धोखेबाज, बेवफा. मैं तेरे प्यार में इतनी तकलीफ सहन कर रही हूँ. हर रोज अपने घरवालों से ताने सुनती हूँ. तुम्हारे कारण बदनाम होकर अपने घरवालों की पिटाई सहन करके भी तुमसे ही प्यार करती हूँ और तुमने किसी और से शादी कर ली. सेठ जी ने कहा, तुम चाहे जो मरजी कह लो. लेकिन मेरे प्यार पर शक मत करो. मैं दिल से अपनी पत्नी सिर्फ तुम्हें ही मानता हूँ. उस लड़की के साथ मेरी शादी जरूर हुई हैं, लेकिन मैं दिल से उसको अपनी पत्नी नहीं मानता. शादी को दो महिने हो गए, रोज उसके साथ सोता हूँ, लेकिन कभी उसको हाथ भी नहीं लगाया. मिनी मैडम ने गुस्से में कहा, तो लगा लो ना. मुझे शादी के सपने दिखाकर शादी तो तुमने उससे ही की.”

डॉली—“ओह…फिर अंकल ने कैसे समझाया मिनी जी को ?”

राज—“सेठ जी उस वक्त मिनी मैडम को नहीं समझा पाएँ. मिनी मैडम सेठ जी को बहुत सी बातें सुनाने के बाद नाराज होकर अपने घर चली गई और सेठ जी वापस अपने शहर आ गए. फिर सेठ जी की शादी होने के चार–पाँच महिने बाद सेठ जी की पत्नी ने अपने मायके जाकर अपने घरवालों से कहा, जब जयशर्मा ने आप लोगों को शादी से पहले सारी बात सच–सच बताई थी, फिर भी आप लोगों ने उसके साथ मेरी शादी क्यों करवाई ? आप लोगों ने जयशर्मा के साथ मेरी शादी तो करवा दी, लेकिन जयशर्मा मुझे अपनी पत्नी मानता ही नहीं हैं. वो हर रात मेरे साथ सोता जरूर हैं, लेकिन शादी के बाद से अब तक जयशर्मा ने कभी गलती से भी मेरी तरफ देखा तक नहीं.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सेठ जी के ससुराल वालों ने कहा, ऐसे कैसे पत्नी नहीं मानता ? सारे समाज के सामने, सारे रीति–रिवाजों से शादी हुई हैं. कोई मजाक थोड़े ही हैं. हम ईंट से ईंट बजा देगें उनकी.”

डॉली—“ओ माई गॉड, पहले सब कुछ जानने के बाद भी शादी कर दी और फिर कहते हैं, ईंट से ईंट बजा देगें.”

राज—“हाँ, ऐसा भी होता हैं.”

डॉली—“फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर पहले तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के आपस में बहुत झगड़े हुए. सेठ जी ने कहा, भाड़ में जाओ, लड़ते रहो, मरते रहो, मुझे मतलब नहीं हैं. मैनें तो बहुत समझाया था, लेकिन आप लोग नहीं माने. अब भुगतो, मैं तो उसको अपनी पत्नी नहीं मानता. मेरे लिए तो वो पराई नारी हैं.”

डॉली—“फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर जब लड़ने–झगड़ने से कोई फायदा नहीं हुआ, तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों ने मिलकर सेठ जी को समझाने का फैसला किया. सबने मिलकर सेठ जी को समझाया, कि शादी कोई खेल या मजाक नहीं हैं. इस लड़की के साथ तेरी शादी हो गई हैं. अब यहीं तेरी पत्नी हैं. इसलिए ये बचपना छोड़ और सही रास्ते पर आजा.”

डॉली—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

राज—“सेठ जी ने कहा, यहीं सारी बातें तो शादी से पहले मैं आप सबको समझा रहा था. कि शादी कोई खेल या मजाक नहीं हैं. मैं मन से किसी और को अपनी पत्नी मानता हूँ, इस लड़की के साथ मेरी शादी मत करो. लेकिन किसी ने भी मेरी एक नहीं सुनी. सब बोल रहे थे, जवाँनी का जोश हैं. एक बार जयशर्मा की शादी हो जाए, फिर सब भूल जाएँगा. जिसके साथ मैं शादी करना चाहता हूँ, उसके लिए तो मेरी उम्र कम हैं और जिसके साथ मैं शादी नहीं करना चाहता, उसके साथ बीस साल की उम्र में ही फेरे करवा दिये.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर सबने मिलकर सेठ जी को थोड़ा और समझाया, कहाँ तू अपने से चार साल बड़ी लड़की के चक्कर में पड़ा हैं. जरा सोचकर देख, वो तेरे से पहले बुढ़ी हो जाएँगी. लोग तेरा मजाक उड़ाएँगें. इसलिए मुर्खता छोड़ और समझदारी से काम ले. ये लड़की तेरे से डेढ़–दो साल छोटी, तेरे बराबर की हैं. इसके साथ तेरी जोड़ी बहुत अच्छी हैं.”

डॉली—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

राज—“फिर सेठ जी ने आस–पास खड़े कुछ लोगों के उदाहरण देकर कहा, मजाक उड़ाने वाले तो किसी ना किसी तरीके से मजाक उड़ाते ही हैं. जब किसी बुढ़े आदमी को जवाँन पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, इस नारी ने या तो किसी लालच में इस बुढ़े से शादी की हैं या फिर इस नारी में कोई कमी हैं, जिसके कारण इस नारी को कोई अपनी उम्र का पति नहीं मिला. जब किसी काले–कलूटे या साँवले आदमी को सुन्दर दिखने वाली गौरी पत्नी के साथ देखने हैं, तो बोलते हैं, पता नहीं, क्या देखकर इस सुन्दर नारी ने इस काले–कलूटे साँवले आदमी को पति बनाया. जब किसी गौरे रंग के सुन्दर आदमी को काली–कलूटी या साँवली पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, इस आदमी में जरूर कोई ना कोई कमी हैं, इसलिए इतना सुन्दर होने के बाद भी इस काली–कलूटी या साँवली नारी को पत्नी बनाया. और रही बात मिनी के मुझसे चार साल बड़ी होने की, तो वो सिर्फ चार साल बड़ी हैं. कोई चालीस–पचास साल की नारी नहीं हैं, जो वो जल्दी बुढ़ी हो जाएँगी और मैं जवाँन रह जाऊँगा. फिर ये बात तो जब लड़के अपने से चार–पाँच साल या आठ–दस साल छोटी लड़की से शादी करते हैं, तब भी लागू होनी चाहिए. जब पति उम्र में पत्नी से ज्यादा बड़ा होता हैं, तब वो भी तो पत्नी से पहले बुढ़ा हो जाता हैं. उस वक्त जवाँन और खूबसूरत दिखने वाली पत्नी को भी शर्म महसुस हो सकती हैं, एक बुढ़े को अपना पति कहते हुए.”

डॉली—“हम्म………फिर अंकल की इस बात क्या जवाब दिया सबने ?”

राज—“क्या जवाब देते ? वहीं घिसे–पिटे दकियानूसी जवाब. दुनिया क्या पागल हैं ? लोग क्या मुर्ख हैं, जो समाज के बनाए हुए नियमों के हिसाब से चल रहे हैं ?”

डॉली—“हम्म…जब कोई जवाब नहीं होता, तो आखिर में यहीं बोला जाता हैं.”

राज—“हाँ, या फिर बोलते हैं, धर्म की बात पर सवाल–जवाब करना पाप हैं, हराम हैं.”

डॉली—“हम्म………फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के बहुत समझाने के बाद भी जब सेठ जी नहीं माने और खुदखुशी की धमकी देने लगे, तो सेठ जी के ससुराल वालों ने चार–पाँच महिने बाद सेठ जी से अपनी बेटी का तलाक करवा लिया.”

डॉली—“फिर अंकल के घरवाले मान गए ?”

राज—“नहीं, फिर सेठ जी के घरवाले सेठ जी की दूसरी शादी के बारे में सोचने लगे. सेठ जी ने गुस्से में आकर कहा, अब भी अक्ल नहीं आई. क्यों हमारी जिन्दगियाँ खराब करने पर तूले हो ? मैं सिर्फ मिनी को अपनी पत्नी मानता हूँ और मैं उसके सिवा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा. चाहे मेरी जितनी मरजी शादियाँ करवा दो.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर आखिरकार सेठ जी के घरवाले सेठ जी के प्यार के सामने झूक गए. फिर सेठ जी के घरवालों ने मिनी मैडम के घरवालों से मिलकर सेठ जी और मिनी मैडम की शादी की बात की. मिनी मैडम के घरवालों ने चार–पाँच महिने तक नाटकबाजी की. फिर आखिर में मिनी मैडम के घरवालों ने भी सेठ जी और मिनी मैडम के प्यार के सामने हार मान ली. तब जाकर सेठ जी और मिनी मैडम की शादी हुई.”

डॉली—“उफ्फ………मिनी अंटी उम्र में अंकल से चार साल बड़ी हैं. प्रोब्लम तो बस यहीं थी ना ?”

राज—“हाँ, मिनी मैडम उम्र में सेठ जी से बड़ी हैं. सिर्फ इसलिए सेठ जी और मिनी मैडम को इतनी परेशानी और इतने दुःख झेलने पड़े.”

डॉली—“हम्म…लेकिन खुशी की बात ये हैं, कि आखिर में जीत प्यार की हुई.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, वो तो हुई. सेठ जी ने मिनी मैडम से कहा था, मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा और जब सेठ जी और मिनी मैडम की शादी हुई, तब सेठ जी की उम्र इक्कीस(21) साल और मिनी मैडम की उम्र पच्चीस(25) साल थी. इस तरह सेठ जी ने अपना वादा निभा दिया.”

डॉली—“हम्म…लेकिन एक वादा टूट गया.”

राज—“कौनसा ?”

डॉली—“अंकल ने कहा था, वो मिनी जी के सिवा किसी और से शादी नहीं करेगें. लेकिन अंकल के घरवालों ने जबरदस्ती उनकी शादी कर दी. तो अंकल का मिनी जी के सिवा किसी और से शादी नहीं करने का वादा टूट गया ना.”

राज—“वो शादी सिर्फ कहने के लिए शादी थी. जब सेठ जी ने उस लड़की को दिल से अपनी पत्नी माना ही नहीं. उसके साथ सो कर भी कभी उसको हाथ तक नहीं लगाया. तो फिर उस शादी का क्या मतलब ? अगर सेठ जी ने उस लड़की को पत्नी का दर्जा दे दिया होता, तो वो लड़की अपने मायके वालों से शिकायत नहीं करती. फिर ना तो सेठ जी के ससुराल वाले उस लड़की से सेठ जी का तलाक करवाते और ना ही फिर सेठ जी और मिनी मैडम की शादी हो पाती. इस तरह सेठ जी ने उस लड़की से शादी होने के बाद भी उस लड़की को अपनी पत्नी नहीं माना, तभी तो सेठ जी और मिनी मैडम की शादी हुई.”

डॉली—“हम्म………ये तो हैं. अगर अंकल उसे पत्नी का दर्जा दे देते, तो वो जैसे–तैसे अंकल के साथ एडजस्ट कर लेती. लेकिन अंकल से अलग नहीं होती.”

राज—“हाँ, दिल से तो सेठ जी ने सिर्फ एक मिनी मैडम को ही अपनी पत्नी माना हैं और आज तक सिर्फ मिनी मैडम के ही दीवाने हैं. अब सेठ जी छियालिस(46) साल हो गए हैं और मिनी मैडम पचास(50) साल की हो गयी हैं. अगले महिने पच्चीस नवम्बर को उनकी शादी के पच्चीस साल पूरे हो जाएँगें.”

डॉली—“ओह…ग्रेट ! इसे कहते हैं, सच्चा प्यार. शादी के इतने साल बाद भी दोनों एक–दूसरे के साथ बहुत खुश हैं. वरना ज्यादातर लोगों का प्यार तो शादी होने के कुछ साल बाद ही खतम हो जाता हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“अरे अब सेठ जी ना मोटे, ना पतले, एकदम तंदरुस्त. उस पर इतने स्मार्ट और हैंडसम हैं, क्लीन शेव होकर बिल्कुल हीरो की तरह चकाचक रहते हैं. मिनी मैडम साड़ी पहने या सूट पहने, हर ड्रेस में बिल्कुल परी जैसी लगती हैं. अच्छी हेल्थ, कसावट भरा गोलमटोल सेहतमंद और तंदरुस्त शरीर. उनको देखकर लगता हैं, जैसे सुन्दरता की देवी हो, खूबसूरती का दूसरा नाम. तो प्यार कम कैसे हो ?”

डॉली—“अरे नहीं, बहुत से आदमी पत्नी चाहे कितनी भी सुन्दर हो, फिर भी बाहर वाली महिलाओं के पीछे भागते हैं और ऐसी महिलाएँ भी होती हैं, जो पति चाहे कितना भी स्मार्ट और हैंडसम हो, फिर भी किसी दूसरे आदमी के साथ चक्कर चलाती हैं.”

राज—“हम्म…ऐसा तो मैनें भी बहुत देखा हैं.”

डॉली—“तभी तो ! जय अंकल और मिनी अंटी का प्यार देखकर मैं तो उनकी जबरदस्त फैन हो गई हूँ.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…मैं तो हर मामले में उनका फैन हूँ.”

डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा—“कभी उनसे पूछना चाहिए, शादी के पच्चीस साल बाद भी इतना प्यार ? इसका राज तो बताओ ?”

राज ने हँसकर कहा—“हाँ, तो जब उनके घर जाओ, तब पूछ लेना.”

डॉली—“मुझे पिटना थोड़े ही हैं, जो उनसे पूछू.”

राज—“लो, इसमें पिटने वाली क्या बात हैं ? मैं पूछ लूँगा.”

डॉली—“वो नाराज नहीं होगे ?”

राज—“नाराज क्यों होगें ?”

डॉली—“तुम उनसे हैंसबेंड–वाईफ के रिलेशन के बारे में पूछोगें, उनका बुरा नहीं लगेगा क्या ?”

राज—“दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए. फिर सही और जायज बात पूछने पर कोई नाराज नहीं होता. मैं सेठ जी और मिनी मैडम की अपने मम्मी–पापा की तरह इज्जत करता हूँ. इसलिए मैं उनके बारे में या उनके साथ ऐसी कोई बात नहीं करूँगा, जो मुझे नहीं करनी चाहिए.”

डॉली—“तुम बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ ?”

राज—“जरूर पूछो.”

डॉली—“हम्म…तुम अपनी मम्मी पूछ लेते इस बारे में ?”

राज—“अगर मेरी मम्मी की सोच–समझ मिनी मैडम जैसी होती, तो जरूर पूछ लेता. लेकिन मेरी मम्मी अलग माहौल में पली–बढ़ी हैं, उनकी सोच अलग हैं. बाकि जो सही बात हैं और जो जायज बात हैं, उसके बारे में किसी से भी बात करने में कोई बुराई नहीं हैं. बस इतना ध्यान रखो, जिसके साथ हम बात कर रहे हैं, उसके दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए. किसी से बात करने से पहले ये कन्फर्म करना बहुत जरूरी हैं.”

डॉली—“ओके. लेकिन अपने मम्मी–पापा से इस बारे में बहुत कम लोग बात करते हैं.”

राज—“यहीं तो सारी प्रोब्लम की जड़ हैं. सेठ जी और मिनी मैडम ने यहीं बातें तो तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाई हैं. जन्म के बाद बच्चा सबसे पहले अपने मम्मी–पापा के पास ही रहता हैं, इसलिए जिन्दगी की हर बात के बारे में बच्चों को मम्मी–पापा जितनी अच्छी तरह समझा सकते हैं, उतनी अच्छी तरह दूसरा कोई नहीं समझा सकता. बस दो बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी हैं. पहला तो ये कि हम खुद सही हो, वरना जो माँ–बाप खुद गलत रास्ते पर चल रहे हो, वो अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोके, तो बच्चे मन में कहेंगे, खुद तो सब कुछ कर रहे हैं और हमें रोक रहे हैं.”

डॉली—“हाँ, ये तो होता ही हैं.”

राज—“इसी तरह जो लड़का खुद लड़कियों के साथ रिलेशन बनाता हो, वो लड़का जब अपनी बहन को रोकेगा, तो बहन मुँह से बोलकर कहे या ना कहे, मन में यहीं सोचेगी, वाह भाई, खुद तो लड़कियाँ पटा–पटाकर सब कुछ कर रहा हैं और मुझे पटने से रोक रहा हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“मैं ऐसी कुछ लड़कियों को जानती भी हूँ.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“ये तो नोर्मल बात हैं. ऐसा लड़कों में भी होता हैं. जो लड़की खुद लड़कों को बेवकूफ बनाती हो, वो लड़की अगर अपने भाई को बुरी लड़कियों से दूर रहने के लिए समझाएँ, तो भाई भी यहीं सोचेगा, वाह बहन, खुद तो लड़की होकर सब कुछ कर रही हैं और मैं लड़का हूँ, फिर भी मुझे रोक रही हैं.”

डॉली—“हाँ.”

राज—“इसलिए कोई भी बात कहने या समझाने के लिए सबसे पहले तो खुद का सही और अच्छा होना बहुत जरूरी हैं. वरना हमारी बात का असर नहीं होगा. इसके बाद कोई भी बात कहने या समझाने का तरीका सही होना भी बहुत जरूरी हैं. तुम्हारे मम्मी–पापा बहुत अच्छे हैं. उनकी बहुत इज्जत हैं. वो किसी भी तरह का कोई गलत काम नहीं करते. लेकिन उनका तुम्हें सही रास्ते पर चलाने का तरीका गलत था. कुछ माँ–बाप जरूरत से ज्यादा प्यार देकर बच्चों को बिगाड़ देते हैं. तुम्हारे मम्मी–पापा ने जरूरत से ज्यादा सख्ती करके तुम्हें बिगाड़ दिया.”

डॉली—“नहीं, वो इतने सख्त भी नहीं थे. मैं ही शरारतें बहुत ज्यादा करती थी और फिर मैनें उनको परेशान और दुःखी भी बहुत किया हैं.”

राज हैरान होकर बोला—“क्या बात हैं ? आज तो मम्मी–पापा को सही और खुद को गलत बताया जा रहा हैं.”

डॉली—“अब यार, सच तो यहीं हैं. मैं खुद ही बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी. फिर वो क्या करते ?”

राज—“चलो, अब कौन कितना सही था और कौन कितना गलत ? इसका तोलमोल नहीं करना. लेकिन ये देखकर बहुत अच्छा लगा, अब तुम बहुत खुश हो और खुद की गलतियाँ देख रही हो. जब इन्सान खुद की गलतियाँ तलाश करना शुरू कर दें, तब वो दूसरी सबसे अच्छी आदत पकड़ लेता हैं.”

डॉली—“और पहली सबसे अच्छी आदत कौनसी हैं ?”

राज—“पहली मतलब सबसे ज्यादा अच्छी आदत हैं, खुद की बुराईयों को खतम करना शुरू कर देना. क्योंकि बहुत सारे लोगों को मालूम होता हैं, कि उनमें क्या बुराई हैं ? और वो उस बुराई का रोना तो रोते रहते हैं, लेकिन उस बुराई को खतम करने की कोशिश नहीं करते.”

डॉली—“हम्म………लेकिन मैं अब अपनी एक–एक बुराई को जड़ से खतम कर दूँगी. ताकि मेरे कारण मेरे मम्मी–पापा को कहीं शर्मिन्दा ना होना पड़े.”

राज ने तालियाँ बजाते हुए कहा—“आज तो तुम्हारी हर एक बात लाजवाब हैं.”
 
डॉली हँसकर राज के हाथ पकड़कर राज को तालियाँ बजाने से रोककर बोली—“अब बस करो. मुझे ज्यादा हवा में मत उड़ाओ.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“वैसे, तुम्हें खुश देखकर बहुत अच्छा लग रहा हैं.”

डॉली—“लेकिन यार, एक प्रोब्लम हैं ?”

राज—“अब क्या प्रोब्लम रह गई ?”

डॉली—“मम्मी–पापा मेरी शादी को लेकर परेशान रहते हैं.”

राज—“बच्चों के शादी के लायक होने के बाद सारे माँ–बाप अपने बच्चों की शादी के लिए परेशान रहते हैं. जब कोई अच्छा लड़का मिलेगा, तुम्हारी शादी भी हो जाएँगी.”

डॉली—“प्रोब्लम तो यहीं हैं. मैं अब शादी करना नहीं चाहती.”

राज—“क्यों ? अभी तक बॉयफ्रैंड दिल से गया नहीं क्या ?”

डॉली—“अरे, वो तो कब का चला गया. अगर वो दिल से नहीं जाता, तो उसकी सारी करतूत फेसबुक पर पोस्ट थोड़े ही करती.”

राज—“फिर शादी क्यों नहीं करना चाहती ?”

डॉली—“बस ऐसे ही. अब शादी से विश्वास उठ गया हैं. और फिर शादी करना ही जिन्दगी का मकसद थोड़े ही हैं. अपने मम्मी–पापा के साथ जिन्दगी गुजार लूँगी. वैसे भी अब जाकर मुझे मम्मी–पापा का प्यार मिला हैं. शादी करके मैं उनसे दूर नहीं जाना चाहती.”

राज—“हाँ, तो शादी के बाद उनको अपने साथ रख लेना. जिसके साथ शादी करो, उसको शादी से पहले बोल देना, कि शादी के बाद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हारे साथ ही रहेंगे.”

डॉली—“नहीं, यार. एक तो ऐसा लड़का और ऐसा ससुराल मिलेगा नहीं. दूसरा मेरे मम्मी–पापा भी बेटी की शादी के बाद बेटी के साथ रहने के लिए नहीं मानेंगे.”

राज—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो सेठ जी और मिनी मैडम समझा देगें. और लड़का भी मिल जाएँगा. बस तुम सारी बातें शादी से पहले क्लियर कर लेना.”

डॉली हँसकर बोली—“तुम्हें मेरे बारे में सब पता हैं, फिर भी ऐसी बातें करते हो. पहली बात तो ये कि कोई अच्छा लड़का मुझसे शादी करेगा नहीं और अगर कोई अच्छा लड़का मुझ पर रहम खाकर दया करके मुझसे शादी के लिए तैयार हो भी गया, तो जब मैं अपनी शर्तें रखूँगी, तो उसका पहला जवाब यहीं होगा, कि एक तो मैं गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन में रहने के बाद भी तुझसे शादी कर रहा हूँ और तू मेरा एहसास मानने की जगह मेरे सामने शर्तें रखकर रही हैं.”

राज—“तुम अभी तक वहीं अटकी हुई हो. सबने तुम्हें इतनी बार तो समझा दिया, कि तुमने किसी का बुरा नहीं किया, तुम्हारे साथ बुरा हुआ हैं. हो गई गलती इन्सान को पहचानने में. तो अब क्या करे ? जिन्दगी भर रोते रहें. और बहुत सी लड़कियाँ तो आजकल सोच–समझकर जान–बुझकर रिलेशन में रहती हैं. कई फिल्म–एक्ट्रेस, टीवी–एक्ट्रेस नाम–पैसा, दौलत–शौहरत सब कुछ होने के बाद भी पहले लिव–इन–रिलेशन में रहती हैं, फिर धोखा खाने के बाद खुदखुशी करती हैं. बहुत सी साधारण घरों की लड़कियाँ आजकल सिर्फ इंजॉयमेंट के लिए रिलेशन बनाती हैं. तुम तो उन सबसे बहुत अच्छी हो. तुम्हारी जिन्दगी में तो कुछ प्रोब्लम थी, इसलिए भटक गई.”

डॉली—“फिर भी जैसे अच्छी लड़की को अच्छा लड़का मिलना चाहिए. उसी तरह किसी अच्छे लड़के को मेरे जैसी लड़की नहीं मिलनी चाहिए.”

राज—“तुम्हारे अन्दर क्या कमी हैं ? जो तुम्हें अच्छा लड़का नहीं मिलना चाहिए ?”

डॉली—“छोड़ो ये बात. जब मैं शादी करना ही नहीं चाहती, तो तुम ये सब मुझे क्यों समझा रहे हो ?”

राज—“लेकिन अगर किसी को तुमसे प्यार हो जाए और वो तुम्हारे साथ जिन्दगी गुजारने चाहे तो ?”

डॉली—“मुझसे किसी को प्यार नहीं हो सकता, सिर्फ हमदर्दी हो सकती हैं. जैसे तुम्हें प्यार के नाम पर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द नहीं, फिर भी तुम मेरे दोस्त बन गए. दोस्त बनने तक ठीक हैं. लेकिन मैं नहीं चाहती, कोई हमदर्दी के कारण मुझसे शादी करें.”

राज मन में सोचने लगा कि अभी इसे कुछ मत बोल. ये अपने पापा के बिजनेस में उनकी मदद करना चाहती हैं. इसे वहीं करने दें. आज नहीं तो कल, ये जरूर बिजनेस में कामयाबी हासिल करेगी. तू उस वक्त तक का इंतजार कर और खुद को इसके लायक बना. वरना अभी अगर तूने इसे शादी के लिए मना भी लिया तो शादी के बाद तू इसे खुश रख पाएँगा ? माना कि इसके माँ–बाप पहले इसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे. लेकिन उन्होंने कभी इसे किसी चीज की कमी नहीं रहने दी. इसे जो चाहिए था, इसके माँगने से पहले इसे दिया.

डॉली ने राज को सोच में खोया देखकर कहा—“क्या हुआ ?”

राज—“नहीं, कुछ नहीं.”

डॉली ने राज के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, तुम मेरे लिए परेशान मत हो. मैं शादी के बिना भी बहुत खुश हूँ. अच्छा, अब मैं चलती हूँ. बहुत देर हो गई, घर से आए.”

राज—“ठीक हैं.”

राज और डॉली बैंच से खड़े होकर पार्क से बाहर चले गए.

अगले दिन नौ अक्टूबर, सोमवार को सुबह के पौने दस बजे नाश्ता करने के बाद राज ने सीढियाँ उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर जयशर्मा का केबिन खोला और अलमारी में रखे पचास नेकलेस लेकर केबिन से बाहर आकर नेकलेस अपने टेबल पर रखकर अपने टेबल की कुर्सी पर बैठकर नेकलेस चैक करने लगा.

पाँच मिनट बाद सीढियाँ उतरते हुए जयशर्मा बेसमेंट में आए और राज के पास आकर बोले—“ये कल चैक किये नहीं थे क्या ?”

राज—“नहीं, ये पचास रह गए थे.”

जयशर्मा—“चल ठीक हैं, कर ले. अच्छा, सुन ! आज मैं और अँकुश तो चार–पाँच दिन के लिए बैंगलोर जा रहे हैं. मैडम, सृष्टी और संयम यहीं हैं. तो तुम जब तक हम वापस ना आए, तब तक यहीं घर पर ही सो जाना.”

राज—“ठीक हैं.”

जयशर्मा अपने केबिन की तरफ मुड़कर केबिन में जाकर पूजा करने लगे. राज अपने काम में लग गया.

कुछ देर बाद स्टाफ के अन्य लोग भी आने लगे और एक–दूसरे को गुड मॉर्निंग बोलकर अपने–अपने टेबल पर अपने–अपने काम में लग गए.

राज सारा दिन डॉली के बारे में सोचते हुए खोया–खोया सा रहा.

रात के ग्यारह बजे खाना खाने के बाद राज सोफे पर बैठकर टीवी देख रहे सृष्टी और संयम के साथ बैठा हुआ था.

मिनी किचन का काम खतम करके किचन से बाहर आकर बोली—“चलो, अब ग्यारह बज गए. अपने–अपने कमरे में जाकर सोओ. राज, तुम इस कमरे में सो जाना.”

सृष्टी और संयम सोफे से खड़े होकर सीढियाँ चढ़ते हुए ऊपर जाकर अपने–अपने कमरे में चले गए.

मिनी ने टीवी बन्द करके राज को सोच में डूबा देखकर कहा—“राज.”

राज ने खड़े होकर कमरे की तरफ जाते हुए मुस्कुराकर कहा—“सॉरी मैडम.”

मिनी—“रूकना जरा.”

राज मिनी की तरफ मुड़कर बोला—“हाँ.”

मिनी राज के पास आकर बोली—“क्या बात हैं ? मैं आज सुबह से देख रही हूँ. तुम कहीं ओर ही खोये हुए हो.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं, कहीं खोया नहीं हूँ. बस आपको लग रहा हैं.”

मिनी ने राज का बाजू पकड़कर राज को सोफे पर बिठाकर राज के पास बैठते हुए कहा—“मैं सब समझ रही हूँ. चलो यहाँ बैठो और बताओ, क्या बात हैं ? क्या सोच रहे हो ?”

राज ने कहा—“कुछ सोच नहीं रहा. बस डॉली की बातें याद आ रही हैं.”

मिनी मुस्कुराकर बोली—“ओह………तो ये बात हैं.”

राज—“नहीं, मैडम. वैसी बात नहीं हैं. लेकिन इन छः महिनों में उससे बहुत अच्छी दोस्ती हो गई हैं. अब पिछले एक महिने से उससे मिलना–जुलना कम हो गया. हफ्ते में बस संडे के दिन मिलने आती हैं. कल उससे मिला था, तो वहीं बातें याद आ रही थी.”

मिनी—“हम्म…मैं समझ रही हूँ. क्या कह रही थी वो ?”

राज—“कह तो कुछ नहीं रही थी. बस इधर–उधर की बातें कर रहे थे. और हाँ, कल मैनें उसे आपकी और सेठ जी की प्रेम–कहानी बताई.”

मिनी ने हँसकर कहा—“अच्छा ! फिर क्या कहा उसने ? कैसे पागल लोग हैं ? बचपन में खेल–खेल में लड़ते–लड़ते प्यार कर बैठे.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं–नहीं, वो तो आपकी प्रेम–कहानी सुनकर आपकी फैन हो गई. बोली, मैं तो उनकी जबरदस्त फैन बन गई हूँ.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, इस बहाने हम भी खुश हो लेगें. हमारे भी दो–चार फैन हैं.”

राज—“आपके फैन तो होने ही चाहिए. आपकी शादी हुए पच्चीस साल होने वाले हैं, लेकिन आपका और सेठ जी का प्यार देखकर लगता हैं, बस दो–चार साल पहले ही शादी हुई होगी. वरना ज्यादातर पति–पत्नी का प्यार शादी होने के पाँच–सात साल बाद ऐसे गायब होता हैं, जैसे ज्वैलरी पहनने के कुछ महिनों बाद ज्वैलरी से पॉलिस गायब हो जाती हैं.”

मिनी हँसकर बोली—“देखो, जो लोग एक–दूसरे से आकर्षित होकर एक–दूसरे से प्यार करते हैं, उनका प्यार तो शादी के बाद इसलिए खतम होता हैं, क्योंकि वो सिर्फ एक–दूसरे को पाने के लिए शादी करते हैं और जब शादी का मकसद सिर्फ एक–दूसरे को पाना हो, तब शादी करके एक–दूसरे को पाने के बाद प्यार खतम हो जाता हैं. फिर होती हैं, एक–दूसरे में कमियाँ निकालकर हमेशा एक–दूसरे से शिकायतें.”

राज—“ये बात तो सही हैं, मैडम. लेकिन कुछ लोगों को तो सच में प्यार होता होगा. शादी के बाद उन सच्चे प्यार वालों में अनबन और झगड़े कैसे शुरू हो जाते हैं ?”

मिनी—“उनका मैं कैसे बताऊँ ? कोई ना कोई वजह हो जाती हैं. सबकी जिन्दगी के बारे में तो हम नहीं जानते ना. इसके इलावा दूसरों को खुश देखकर दूसरों की खुशियों से जलने वाले भी बहुत होते हैं. ऐसे जलने वाले लोग भी कभी दूसरों के घर में गलतफ़हमी पैदा करके, कभी दूसरों के घर में किसी को भड़काकर, दूसरों के घर उजाड़ते रहते हैं. ऐसे लोग बहुत तरह के अलग–अलग तरीके अपनाते हैं. अब हमने तो कभी किसी का बुरा सोचा नहीं, इसलिए क्या–क्या करते हैं, कैसे–कैसे टोटके लगाते हैं ? हमें तो पता नहीं.”

राज—“हाँ, मैडम. छोड़ो इन बेकार लोगों की बातें. आप तो ये बताओ. आपने सेठ जी को अब तक अपना दीवाना कैसे बना रखा हैं ? वरना पति चाहे कैसा भी हो, पत्नी तो पराये आदमी के बारे में नहीं सोचती. हालांकि आजकल बहुत सी नारी गलत रास्ते पर चल रही हैं. फिर भी आदमी तो यहाँ–वहाँ पराई नारी के पास कुछ ज्यादा ही भटकते हैं. लेकिन सेठ जी तो आपके सिवा किसी ओर को देखते भी नहीं. ये सेठ जी पर आपने ऐसा कौनसा जादू किया हैं ?”

मिनी ने हँसकर कहा—“अरे, तुम लोग भी ना, बस. मैनें उन पर कोई जादू नहीं किया. उल्टा उन्होंने जरूर मुझ पर कोई जादू कर रखा हैं, जो शादी के इतने साल बाद भी, उनसे कुछ दिन दूर रहने पर सब सुना–सुना लगने लगता हैं.”

राज—“नहीं, मैडम. प्यार बनाए रखने का भी कोई ना कोई तरीका तो होता ही हैं. कल डॉली भी यहीं कह रही थी. मैनें कहा, जब घर आओ, तब सेठ जी और मैडम से पूछ लेना. वो बोली, मुझे शर्म आती हैं. मैनें कहा, चलो, मैं ही पूछ लूँगा.”

मिनी—“हम्म………ज्यादा तो मालूम नहीं. मैं मेरी जो सोच हैं, वो बता देती हूँ. देखो, हर इन्सान को नई और ताजा चीजें बहुत पसन्द आती हैं. नये डिजाईन के कपड़े, नई और ताजा सब्जी, कोई नई इलेक्ट्रॉनिक चीज. यहाँ तक की मार्केट में कोई नया मोबाइल हैंडसेट आता हैं, तो वो भी सबको अच्छा लगता हैं और पुराने वाला बेकार लगने लगता हैं. चाहे कुछ भी हो, इन्सान को कोई भी नई और ताजा चीज दिखाई देती हैं, तो इन्सान उसकी तरफ आकर्षित होकर उसे पाना चाहता हैं. यहीं बात दो इन्सानों के बीच भी होती हैं, खासकर नारी और पुरुष में. बस इसी बात को ध्यान में रखकर मैनें खुद को पुरानी नहीं होने दिया और हर तरह से खुद को नई और ताजा बनाकर रखने की कोशिश की हैं, शायद इसलिए तुम्हारे सेठ जी का प्यार बिल्कुल वैसा ही बना हुआ हैं, जैसा पहले था. और तुम्हारे सेठ जी ने भी खुद को नया और ताजा बनाकर रखा हैं, इसलिए वो भी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. दूसरी महिलाओं की तरह मुझे कभी उनसे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती. मेरे हिसाब से पति–पत्नी के रिश्ते में प्यार और अपनेपन का एहसास बनाए रखने के लिए इन्सान को जरूरत के हिसाब से लिमिट में रहकर खुद में बदलाव करते रहना चाहिए. लेकिन कुछ लोग तो खुद को बदलते नहीं हैं और कुछ लोग खुद को बहुत ज्यादा बदल लेते हैं. शायद यहीं प्रोब्लम हैं, जिसके कारण प्यार में कमी आ जाती हैं. अगर बैलेन्स बनाकर खुद को पुराना या पुरानी ना होने दे, तो प्यार कभी कम नहीं होता. फोर एग्जामपल तुम इमेजिन(कल्पना) करके देखो, अगर मैं पुराने टाइम की महिलाओं की तरह रहूँ तो कैसी लगूँगी ?”

राज ने इमेजिन किया, भारी–भरकम गहनें पहनकर पूरी तरह राजस्थानी पहनावे में लम्बा घूँघट निकालकर खड़ी मिनी मैडम.

मिनी ने आगे कहा—“और अगर बिल्कुल ही बोल्ड हो जाऊँ तो कैसी लगूँगी ?”

राज ने इमेजिन किया, जींस–टीशर्ट में खड़ी मिनी मैडम, कटिंग वाली साड़ी पहनकर खड़ी मिनी मैडम.

मिनी राज को खोया देखकर बोली—“क्या हुआ ? सच में इमेजिन कर रहे हो क्या ?”

राज ने मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाते हुए कहा—“नहीं मैडम, आप अभी जैसे साड़ी और सुट पहनकर रहते हो, वहीं बेस्ट हैं.”

मिनी ने हँसकर राज के माथे पर चांटा मारकर कहा—“अच्छा, मतलब इमेजिन कर लिया. चलो, जब इमेजिन कर ही लिया, तो फिर ये बताओ. तुम्हारी इमेजिनेशन में मैं कैसी लग रही थी ?”

राज ने शर्माकर कहा—“रहने दीजिए.”

मिनी—“अरे, बताओ तो ?”

राज ने मुस्कुराते हुए कहा—“पहले तो मैडम, वो पड़ौस में सेठानी जी हैं ना. जो भारी–भरकम गहनों से लदी हुई पुराने स्टाइल में रहती हैं, उनका ख्याल आया.”

मिनी ठहाका लगाकर हँसने के बाद बोली—“अच्छा, फिर ?”

राज—“फिर ये पड़ौस के मालपाणी जी की वाईफ हैं ना, जो उम्र में आपसे बड़ी हैं, फिर भी जींस–शर्ट, जींस–टीशर्ट पहनती हैं, उनका ख्याल आया और फिर फिल्मों में दीपिका पादूकोन और प्रियंका चौपड़ा जिस तरह की साड़ी पहनकर आती हैं, वो ख्याल आया.”

मिनी खिलखिलाकर हँसने के बाद अपनी हँसी रोककर बोली—“उफ्फ………अब तुम्हीं बताओ, अगर मैं इनमें से कोई स्टाइल अपनाकर तुम्हारे सेठ जी के सामने जाऊँ, तुम्हारे सेठ जी हिल नहीं जाएँगें ?”

राज—“हाँ, समझ गया मैडम, आपने टाइम के हिसाब से खुद में बदलाव किया, लेकिन बदलाव उतना ही किया, जितने बदलाव की जरूरत हैं.”

मिनी—“हाँ, हर बात एक लिमिट तक ही अच्छी लगती हैं. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा होने लगे, तो बस वहीं से प्रोब्लम शुरू हो जाती हैं. जैसे तुम्हारे सेठ जी बहुत बार कुछ ना कुछ बोलकर मुझे छेड़ते हैं, मैं भी उनके साथ बात कर लेती हूँ. अब अगर मैं इनके साथ बातें नहीं करूँगी, तो ये कोई दूसरी नारी तलाश करने लगेगें, जिसके साथ ये खुलकर ऐसी बातें कर सकें. इसलिए मैं ही इनके साथ सभी तरह की बातें कर लेती हूँ. ताकि ये ऐसी बातें करने के लिए कोई दूसरी नारी तलाश ना करें. लेकिन अगर मैं ज्यादा बातें करूँगी, तो ये कहेंगे, मिनी तो बिल्कुल ही बेशर्म हो गई. फिर ये कोई अच्छी शर्म–लिहाज करने वाली नारी तलाश करने लगेगें. इसलिए इनको किसी ओर के पास जाने से रोकने के लिए मैं लिमिट में रहकर हल्की–फुल्की बातें करती हूँ. लेकिन ये मुझे बेशर्म ना समझे, इसलिए ज्यादा बातें नहीं करती.”

राज—“हाँ, मैडम. मैं भी फिर आपकी तरह लिमिट में रहकर खुद को हमेशा नया और ताजा बनाकर रखूँगा, ताकि मेरी शादी के बाद मेरी वाईफ किसी ओर को तलाश ना करें.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…बहुत अच्छी बात हैं. अब बताओ, तुम्हारे दिमाग में क्या उलझन चल रही हैं ?”

राज—“मैडम, आप तो फिर से वहीं पर आ गई.”

मिनी—“और जब तक तुम बताओगे नहीं, मैं बार–बार वहीं आती रहूँगी.”

राज चुपचाप सर झूकाकर बैठा रहा.

मिनी—“अच्छा, ठीक हैं. हम कौनसे तुम्हारे अपने हैं ? तुम हमारे पास जॉब करते हो, इसका ये मतलब थोड़े ही हैं, हम तुमसे तुम्हारी हर बात पूछे.”
 
राज मन में बोला कि उफ्फ………कैसी ड्रामेबाज मैडम हैं ? लेकिन बहुत अच्छी हैं. वरना अपने पास जॉब करने वालों से इतना अपनापन कौन रखता हैं ? बस कोई मैडम की इस अच्छाई का गलत फायदा ना उठाए.

राज—“मैडम, आप भी अच्छी तरह जानती हो, मैं आपको और सेठ जी को अपने मम्मी–पापा की तरह मानता हूँ.”

मिनी—“झूठ ! अगर ऐसा होता तो क्या तुम अपनी परेशानी हमसे शेयर नहीं करते ? तुम्हारा चेहरा देखकर साफ़ पता चल रहा हैं, तुम किसी गहरी सोच में डूबे हो.”

राज—“एक उलझन हैं तो सही. लेकिन………”

मिनी—“लेकिन क्या ?”

राज—“लेकिन पाँच साल पहले भूख से तड़पकर जब मैं कचरे में से फल उठाकर खा रहा था. हर कोई मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहा था. कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था. उस वक्त आपने आकर मेरी आँखों से बहते आँशू पोंछे और मुझे अपने साथ घर ले आयी. फिर सेठ जी ने ये जॉब दे दी. कुछ दिन घर में भी रखा.”

मिनी—“ओहो………हमने कुछ नहीं किया. तुम बहुत अच्छे हो, तुम बहुत समझदार हो, तुम मेहनती, ईमानदार और काबिल हो, इसलिए तुम अपनी ईमानदारी और काबिलियत से हमारे पास जॉब कर रहे हो. समझे बेवकूफ. यू ही हमें ऊपर वाली हवा में उड़ाते रहते हो.”

राज—“नहीं मैडम, जो सच हैं, वो सच हैं. इन पाँच सालों में आपने और सेठ जी ने मुझे बहुत प्यार और अपनापन दिया. सृष्टी, अँकुश और संयम ने छोटे भाई–बहनों की तरह मुझे बहुत इज्जत दी. इसलिए अब आप सभी से दूर जाने का मन नहीं कर रहा. अब तो आप लोग कहो, कि मुझे सैलरी नहीं दोगे, तब भी मैं फ्री में सारी जिन्दगी आपके पास जॉब कर सकता हूँ.”

मिनी—“तुम असली बात बताओ, क्या हैं ?”

राज ने झिझकते हुए कहा—“मैडम………”

मिनी—“हाँ, बोलो.”

राज ने एक सांस में कहा—“मैडम, मैं खुद का काम करना चाहता हूँ. लेकिन ये जॉब छोड़ने का मन नहीं कर रहा.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“ओहो, ये तो बहुत अच्छी बात हैं. अब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही हैं. जैसे पाँच साल पहले तुम अपने मम्मी–पापा, अपने भाई–भाभी, बहन, अपना घर, अपने दोस्त, अपना शहर छोड़कर यहाँ आए थे. अब आगे तुम कुछ ओर करना चाहते हो, इसलिए जॉब तो छोड़नी पड़ेगी.”

राज—“लेकिन मैडम, आप लोगों को बुरा लगेगा ना. इसे कचरे में से उठाकर लाए, जॉब दी, इतने एहसान किये. अब थोड़े पैसे आते ही ये छोड़कर जा रहा हैं.”

मिनी—“हे…भगवान………क्या–क्या सोचता हैं ? ये लड़का. कचरे में से उठाकर लाए, एहसान किये. मन कर रहा हैं, एक चांटा लगाऊँ तुम्हें. हमने तुम पर कोई एहसान नहीं किये. तुम जॉब करते हो, इसलिए सैलरी देते हैं. ऑवर–टाइम करते हो, संडे को आते हो, इसलिए खाना खिलाते हैं. तुम मेहनत और ईमानदारी से नौकरी करते हो, तुम बहुत अच्छे हो, इसलिए जब तुम्हारे पास रहने की जगह नहीं होती, तो अपने घर में रख लेते हैं. इसमें एहसान कैसा हैं ?”

राज—“मैडम………”

मिनी—“वाह रे वाह ! गधे………अब ये सब बातें अपने दिमाग से निकाल दो. इनके बैंगलोर से आते ही मैं इस बारे में इनसे बात करती हूँ. और हाँ, अब ये मत कहना. हम तुम्हें खुद का काम शुरू करने में मदद करके एक और एहसान कर रहे हैं. तुमने पाँच साल तक लगन और मेहनत से पूरी ईमानदारी के साथ हमारे पास जॉब की हैं, इसलिए हम तुम्हारी थोड़ी सी हेल्प करेगें.”

राज ने सोफे से नीचे होकर मिनी के पैरों को हाथ लगाकर मिनी के सामने अपना सर झूकाकर कहा—“मुझे माफ़ कर दो, मैडम. मैं आपके प्यार और अपनेपन को एहसान का नाम देकर बहुत छोटा कर रहा था. मैं भूल गया था, माँ कभी अपने बच्चे पर एहसान नहीं करती.”

मिनी ने खड़ी होते हुए राज को उठाकर गले लगाकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, बेटे की जगह माँ के पैरों में नहीं, माँ के दिल में होती हैं. और मुझे पता हैं, तुम ये खुद का काम अपने लिए नहीं, डॉली के लिए शुरू कर रहे हो. शादी के बाद डॉली को उसी तरह रखने के लिए, जैसे वो साँवरमल जी के घर में रही हैं.”

राज ने मिनी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया.

मिनी राज के गाल पर प्यार से चांटा मारकर मुस्कुराते हुए बोली—“हम तो उसी दिन समझ गए थे, जब एक दिन डॉली से ना मिलने का कारण तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ गया था और परेशान होकर दूसरे दिन अंकित के साथ कुछ खाये–पीये बिना भूखे पेट उसे ढूंढने निकल गए. हम तो बस ईंतजार कर रहे थे, तुम कब कहते हो ?”

राज शर्माकर नजरें चुराते हुए इधर–उधर देखने लगा.

मिनी ने मुस्कुराहट बरकरार रखते हुए कहा—“चलो, अब वो फालतू बातें दिमाग से निकालो और डॉली के सपने देखो. जाओ सो जाओ”

राज मुस्कुराता हुआ सामने के कमरे में चला गया और मिनी मुस्कुराते हुए हॉल की लाइट बन्द करके अपने बैडरूम में चली गई.

तेरह दिन बाद बाईस अक्टूबर, रविवार को सुबह के ग्यारह बजे जयशर्मा के घर की छत पर सृष्टी, अँकुश और संयम के साथ राज कैरम बोर्ड खेल रहा था.

मिनी छत पर आकर बोली—“राज, नीचे तुम्हारे अंकल बुला रहे हैं.”

राज बोला—“क्या मैडम, मैं जीतने वाला हूँ और आप बुलाने आ गई.”

मिनी—“अरे, नीचे तो आओ. डॉली के पापा भी तुम्हें बुला रहे हैं.”

सृष्टी ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब तो भईया जरूर जाएँगें.”

राज मुस्कुराते हुए खड़ा होकर मिनी के साथ सीढिया उतरते हुए नीचे चलने लगा.

नीचे हॉल में सोफे पर सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयशर्मा सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे. मिनी नीचे आकर जयशर्मा के पास बैठ गई. राज सामने आकर खड़ा हो गया.

जयशर्मा—“इधर आओ, तुम भी बैठो.”

राज जयशर्मा के पास आकर बैठ गया.

जयशर्मा ने राज के कंधे पर हाथ रखकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“राज से आप पहले भी कई बार मिल चुके हैं. राज को पाँच साल हो गए मेरे पास जॉब करते हुए, ये बहुत अच्छा लड़का हैं. हम अपने बच्चों में और राज में कोई फर्क नहीं समझते. अभी दिवाली पर राम–राम वाले दिन राज के घरवालों से भी मैनें बात की हैं. उन्होंने कहा, आप जो ठीक समझें, राज के लिए फैसला कर सकते हैं. इसलिए मैनें आज आपसे राज के बारे में बात की. हमें पता हैं, राज और डॉली एक–दूसरे को पसन्द करते हैं और मुझे पूरा विश्वास हैं, राज डॉली को बहुत खुश रखेगा.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अगर डॉली भी राज को पसन्द करती हैं, तो मुझे कोई आपति नहीं हैं और फिर जिस लड़के ने हमारी बेटी को मुश्किल वक्त में संभाला, हमारी बेटी के लिए उससे अच्छा लड़का कहाँ मिलेगा ? आप लोगों के साथ–साथ इस लड़के का भी बड़ा योगदान हैं, हमारे घर में फिर से खुशियाँ लाने में.”

राज ने खड़े होकर मिनी को साइड में बुलाकर कहा—“मैडम, यहाँ तो मेरी और डॉली की शादी की बात हो रही हैं. आपने मुझे बताया क्यों नहीं ?”

मिनी—“क्यों हम तुम्हारी शादी की बात नहीं कर सकते ?”

राज—“कर सकते हो, मैडम. आप मेरे लिए कोई भी फैसला कर सकते हो.”

मिनी—“फिर क्या प्रोब्लम हैं ? उस दिन तुमने खुद कहा था ना. तुम्हें डॉली से प्यार हो गया हैं.”

राज—“हाँ, लेकिन अभी शादी. अभी तो मेरा काम भी शुरू नहीं हुआ.”

मिनी—“काम तो कल से शुरू हो ही रहा हैं. तुम्हारे अंकल ने तुम्हें ऑफ़िस दिलवा दिया हैं.”

राज—“लेकिन………”

सोफे पर बैठे जयशर्मा ने कहा—“अरे, क्या बात हैं ? हमें भी बताओ.”

मिनी ने मुड़कर कहा—“राज कह रहा हैं, अभी तो मैनें अपना काम भी शुरू नहीं किया.”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“इधर आ.”

मिनी और राज जयशर्मा के सामने आए.

जयशर्मा—“अब बता क्या बात हैं ? यहाँ सब अपने घर के ही तो हैं. हम हैं, डॉली के मम्मी–पापा हैं, जो भी बात हैं, खुलकर कहो.”

राज ने मिनी की तरफ देखा.

मिनी—“हाँ–हाँ, बताओ.”

राज—“सेठ जी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहता.”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“अरे आज के आज तुम्हारे फेरे थोड़े ही करवा रहे हैं. आज सिर्फ बात कर रहे हैं. अभी तो तुम्हारे घरवालों को यहाँ बुलाकर साँवरमल जी मिलवाएँगें, फिर सब मिलकर आगे की बात पक्की करेंगे. आज तो मैनें सिर्फ बात की हैं. आखिरी फैसला तो तुम्हारे घरवाले और डॉली के घरवाले ही करेगें.”

राज—“नहीं, सेठ जी. वो बात नहीं हैं. मैं चाहता हूँ, शादी से पहले मैं डॉली को खुश रखने के लायक बन जाऊँ.”

जयशर्मा—“डॉली को खुश रखने लायक तो तुम हो ही. इसलिए तो मैनें शादी की बात की.”

राज—“लेकिन सेठ जी, पहले मैं अपना काम जमाकर, घर संभालने लायक तो हो जाऊँ.”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“देखो, घर तो तुम मेरे पास जॉब करके भी संभाल सकते हो और अब तो कल से तुम्हारा खुद का ऑफ़िस होगा. तुम खुद का बिजनेस शुरू कर रहे हो. सृष्टी और अँकुश भी तुम्हारी हेल्प के लिए तुम्हारे पास आ जाएँगें. अब तो कोई प्रोब्लम ही नहीं होनी चाहिए. फिर भी अगर कोई दिक्कत या परेशानी आती हैं, तो हम बैठे हैं. तुम क्यों टेन्शन ले रहे हो ?”

राज—“सेठ जी, अगर आपकी इजाजत हो तो मैं अंकल जी से एक बात पूछ सकता हूँ ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“आराम से पूछो, बेटा.”

राज—“मुझे बस यहीं पूछना था, अगर ये सब प्रोब्लम नहीं होती, तब मैं आपसे आकर कहता, कि मैं डॉली से शादी करना चाहता हूँ, तो आप मुझे क्या कहते ?”

किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया.

राज—“शायद आप कहते, रिश्ते हैसियत देखकर जोड़े जाते हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन अब तो हम ऐसा नहीं सोचते, फिर तुम क्यों सोच रहे हो ?”

राज—“मैं भी ऐसा नहीं सोचता. लेकिन जब डॉली मुझसे मिलने आती थी, तब वो आपकी दिलवाई हुई गाड़ी लेकर आती थी. सुबह मुझे घर से ऑफ़िस लेकर आती थी, शाम को ऑफ़िस से घर लेकर जाती थी. हम घंटों तक गाड़ी बैठे बातें करते हैं. अब मेरा सपना हैं, शादी के बाद जब डॉली आपसे मिलने, आपके घर जाए, तो वो मेरी दिलाई हुई गाड़ी लेकर जाए. मुझे ज्यादा अरबपति–खरबपति नहीं बनना, बस शादी से पहले डॉली के लिए एक घर और एक गाड़ी खरीद लूँ. बस इतना ही मेरा सपना हैं.”
 
राजलक्ष्मी ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन ये सपना तो शादी के बाद तुम दोनों मिलकर भी पूरा कर सकते हो ?”

राज—“अंटी जी, सपना तो शादी के बाद भी पूरा हो सकता हैं. लेकिन मैं खुद को देखना चाहता हूँ, मैं डॉली को खुश रखने के लायक हूँ या नहीं. वरना शादी के बाद अगर मैं घर और गाड़ी नहीं खरीद पाया, तो डॉली को जो हैं, जैसा हैं, उसी में एडजस्ट करना पड़ेगा. मैं नहीं चाहता, कि वो एडजस्ट करें.”

मिनी ने मुस्कुराकर जयशर्मा से कहा—“जय, अब क्या कहना हैं, आपको ?”

जयशर्मा—“अब मैं क्या कहूँ ? लड़की के मम्मी–पापा बैठे हैं. लड़का सामने हैं. लड़के ने अपनी बात रख दी.”

राज—“एक बात और भी हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“बताओ.”

राज—“डॉली अब खुश तो हैं, लेकिन वो खुद को किसी के लायक नहीं समझती. वो सोचती हैं, वो रिलेशन में रहकर अब किसी अच्छे इन्सान की पत्नी बनने के लायक नहीं रही. इसलिए अगर अभी मैं उससे शादी करूँगा, तो वो सोचेगी, मैं उस पर दया करके या उस पर तरस खाकर हमदर्दी के कारण उससे शादी कर रहा हूँ. इसलिए आप पहले उसको आपके बिजनेस में कामयाबी हासिल कर लेने दीजिये. वो आपके ऑफ़िस में जॉब कर रही हैं. धिरे–धिरे उसे बिजनेस की बारीकियाँ सीखाकर आपकी तरह एक कामयाब बिजनेस वूमेन बनाइए. फिर हर कोई उसके साथ अपना नाम जोड़ना चाहेगा. उस वक्त मैं भी लग जाऊँगा, लाइन में.”

राजलक्ष्मी—“बेटा, बातें तो तुम्हारी बहुत अच्छी हैं. लेकिन हमारी भी उम्र हो गई. पता नहीं कब बुलावा आ जाए. इसलिए मरने से पहले डॉली का घर बसा हुआ देखना.”

राज राजलक्ष्मी के पास आकर बोला—“अंटी जी, आप ऐसी बातें क्यों सोच रही हैं ? माना कि भविष्य हमारे बस में नहीं हैं. लेकिन फिर भी हमें अपना भविष्य अच्छा बनाने की कोशिश तो करनी चाहिए ना. सेठ जी और मिनी मैडम कहते हैं, अगर हम कोशिश करेगें, तो या हमारी कोशिश सफल होगी, या हमारी कोशिश असफल होगी. लेकिन अगर कोशिश ही नहीं करेगें, फिर तो सफलता के बारे में सोचना ही बेकार हैं. इसलिए आप ये सब मत सोचो, बस अपना आशिर्वाद दो, ताकि हम अपने छोटे–छोटे सपने पूरे कर सकें.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“चलो, जब बच्चे इतना सोच रहे हैं, तो हम भी उनकी मदद करें.”

राजलक्ष्मी ने राज के सर पर हाथ रखकर कहा—“ठीक हैं. भगवान करें, जल्दी ही तुम अपने सारे सपने पूरे करो.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“बस आप सबसे एक रिक्वेस्ट और हैं.”

मिनी ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब क्या रिक्वेस्ट रह गई ?”

राज—“जब तक मैं इस शहर में एक घर और एक गाड़ी ना खरीद लूँ. तब तक आप सब हमारी आज की बातों के बारे में डॉली को कुछ मत बताना.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वो क्यों ?”

राज—“क्योंकि मैनें और डॉली ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात नहीं कही. अब पता नहीं मुझे घर और गाड़ी खरीदने में दो साल लगे या पाँच साल लगे. हो सकता हैं, दस साल लग जाए. इस बीच डॉली की जिन्दगी में कोई और आ गया, तो मैं उसे अपने प्यार के बंधन में बाँधकर रोकना नहीं चाहता.”

जयशर्मा—“अरे, ये क्या बात हुई ?”

राज—“बस सेठ जी, आप ही लोगों से सीखा हैं, प्यार में बँधन नहीं होना चाहिए. प्यार में एक–दूसरे की खुशी के लिए जीना चाहिए. अगर प्यार में सच्चाई हैं, तो प्यार, प्यार करने वालों को खुद ही खींचकर एक–दूसरे के पास कर देगा.”

कुछ पल के लिए सभी चुप होकर गंभीर हो गए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं. हम नहीं बताएँगें. अपने दिल की बात तुम खुद ही डॉली को बताना.”

राज ने सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी, जयशर्मा और मिनी के पैर छूकर मुस्कुराते हुए कहा—“अब मैं ऊपर चला जाऊँ.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

राज सीढिया चढ़ते हुए ऊपर जाने लगा. मिनी जयशर्मा के पास सोफे पर आकर बैठ गई. सब लोग छत पर जा रहे राज की तरफ़ देखने लगे.

सात साल बाद सात अक्टूबर, सोमवार को सुबह के दस बजे उम्र में तैंतीस(33) साल का हो चुका राज हाथ में ऑफ़िस–बैग लिए अपने ऑफ़िस के अन्दर आकर स्टाफ के लोगों को गुड मॉर्निग बोलते हुए अपने केबिन में आकर राज ने बैग टेबल पर रखा और अपनी चेयर पर बैठ गया.

राज मन में सोचने लगा कि सपने देखना बहुत आसान हैं. लेकिन सपने पूरे करना बहुत मुश्किल हैं. सात साल पहले मैनें कितनी आसानी से बोल दिया था, शादी से पहले डॉली के लिए एक घर और गाड़ी खरीदना चाहता हूँ. उस वक्त लगा था, दो–तीन साल की बात हैं. घर और गाड़ी तो यू आ जाएँगें. लेकिन जिन्दगी की दूसरी उलझनों के कारण ये छोटा सा सपना पूरा करने में सात साल लग गए. चलो, ये भी सही हैं. आखिर सपना पूरा तो हुआ.

राज ने अपने बैग से मोबाइल निकालकर सेठ साँवरमल बागड़ी को कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाया.

उम्र में छियासठ(66) साल के हो चुके सेठ साँवरमल बागड़ी अपने घर के बरामदे में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मोबाइल बजने पर उन्होंने जेब से मोबाइल निकालकर कॉल रिसींव किया.

राज—“नमस्ते, अंकल जी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“नमस्ते, बेटा. कैसे हो ?”

राज—“बस आपके आशिर्वाद से मैं बिल्कुल ठीक हूँ. आप और अन्टी जी कैसे हैं ?”

साँवरमल बागड़ी—“हम भी ठीक हैं.”

राज—“और डॉली ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“डॉली भी बिल्कुल ठीक हैं. लेकिन वो तो ऑफ़िस चली गई. हर वक्त बस काम में ही उलझी रहती हैं.”

राज—“ये तो बहुत अच्छी बात हैं. अच्छा, मैनें आपको एक गुड न्यूज देने के लिए फोन किया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“बताओ फिर जल्दी से.”

राज—“डेढ़ साल पहले मैनें घर बनाने के लिए एक जमींन खरीदी थी. वहाँ अब घर बनकर पूरा हो गया हैं. कल गृह प्रवेश हैं और कल मैं एक गाड़ी भी खरीद रहा हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ओहो………बहुत–बहुत बधाई हो. मैं तो कब से इस दिन का इंतजार कर रहा हूँ.”

राज—“सब आप बड़ों का आशिर्वाद हैं. मैं चाहता था, कल आप पूरे परिवार के साथ हमारे घर आए और अपना आशिर्वाद दें. मैनें सेठ जी और मिनी मैडम को भी बुलाया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं. हम जरूर आएँगे.”

राज—“अच्छा, अंकल जी. रखता हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं, बेटा.”

सेठ साँवरमल बागड़ी के कॉल कटने के बाद राज अपने काम में लग गया.

अगले दिन आठ अक्टूबर, मंगलवार को दोपहर एक बजे राज के घर में पूजा होने के बाद खाना खाकर बाकि सभी मेहमानों के विदा होने के बाद राज के माता(उम्र–59 साल)–पिता(उम्र–61 साल), भाई(उम्र–39 साल)–भाभी(उम्र–38 साल), बहन(उम्र–36 साल)–जीजाजी(उम्र–38 साल), जयशर्मा(उम्र–53 साल)–मिनी(उम्र–57 साल), सेठ साँवरमल बागड़ी–राजलक्ष्मी(उम्र–65 साल) घर के हॉल में बैठकर बातें कर रहे थे. बाहर से राज और उम्र में तैईस(23) साल का हो चुका संयम आए.

राज—“आप सबने खाना खा लिया ?”

राज के पिता—“हाँ, हम सब ने खा लिया. अब तुम भी खा लो.”

संयम मिनी के पास बैठते हुए बोला—“राज भईया तो डॉली दीदी के साथ खाना खाएँगें. कब से उसे ढूंढ रहे हैं और वो नजर आकर गायब हो जाती हैं.”

सभी हँसने लगे.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वो बाहर लोन में बैठी हैं. जाओ, उसे भी बुला लो.”

राज बाहर जाने लगा.

मिनी—“अरे सुनो.”

राज रूककर मुड़ते हुए बोला—“हाँ.”

मिनी—“अब तो तुम्हारा सपना पूरा हो गया. आज बोल दो, डॉली को अपने दिल की बात.”

राज मुस्कुराकर बोला—“नहीं, फिर कभी.”

संयम उठकर बाहर जाते हुए बोला—“ओहो, मैं ही बोलकर आता हूँ. वरना ये तो सात साल और लगा देगें.”

राज संयम के दरवाजे के पास आते ही संयम का बाजू पकड़कर बोला—“अरे रूक. मैं खुद ही बोल दूँगा.”

जयशर्मा—“तो फिर जाओ और बोलो. वरना आज हम बोल देगें.”

राज—“सेठ जी.”

मिनी—“क्या सेठ जी ? यहाँ हम तुम्हारी और डॉली की शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं और तुम दोनों ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात भी नहीं बोली.”

संयम बाहर जाते हुए—“मैं बोल ही आता हूँ.”

राज संयम को पकड़कर बोला—अरे रूक जा रे… मैं बोलता हूँ.”

सभी लोग खड़े होकर राज को बाहर डॉली के पास जाने के लिए कहने लगे.

राज शर्माता हुआ बाहर जाने लगा.

संयम भी राज के साथ आने लगा.

राज—“अरे, तुम रूको यहीं.”

संयम—“क्यों आप बिना बोले वापस आ गए तो ?”

राज मुड़कर बोला—“मैडम.”

मिनी—“क्या मैडम ? ठीक ही तो बोल रहा हैं. हम सब यहाँ खिड़की में से देख रहे हैं. तुम जाकर बोलो, वरना हम बोल देगें.”

राज—“ठीक हैं.”

राज बाहर आकर लोन में आया. उम्र में पैंतीस(35) साल की हो चुकी डॉली अपने में ही खोई हुई बैंच पर बैठी थी.

राज मन में सोचने लगा कि ये प्यार का इज़हार करना भी कितना मुश्किल हैं. समझ में नहीं आ रहा, जब शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं, तो इज़हार करने के लिए क्यों बोल रहे हैं ?
 
राज ने मुड़कर खिड़की की तरफ देखा. सभी राज को डॉली से अपने प्यार का इज़हार करने के लिए इशारे से कहने लगे.

राज डॉली की तरफ मुड़कर बैंच पर बैठते हुए बोला—“अरे, कहाँ खोई हुई हो ? मैं तुम्हें अन्दर ढूंढ रहा था और तुम यहाँ बैठी हो.”

डॉली चौककर बोली—“अरे, कहीं नहीं. बस यू ही आकर बैठ गई. बहुत अच्छा लोन बनवाया हैं, तुमने.”

राज—“तुम्हें पसन्द आया, ये ज्यादा अच्छा लगा. अच्छा, एक बात बताओ. तुमने अपनी शादी के बारे में क्या सोचा हैं ?”

डॉली—“पहले भी कितनी बार बता चुकी हूँ. मुझे शादी नहीं करनी.”

राज—“हम्म………………लेकिन तुम्हारे मम्मी–पापा ने तुम्हारी शादी के लिए कुछ सपने देखे होगे, कुछ अरमान सजा रखे होगे और पहले तो तुम कहती थी, रिलेशन में रह चुकी लड़की से कोई अच्छा लड़का शादी क्यों करेगा ? या तो वो अच्छा नहीं होगा या फिर वो तरस खाकर दया करके शादी करेगा. लेकिन अब तो तुम कामयाब बिजनेस वूमेन हो. पिछले पाँच साल से सारा बिजनेस अकैले संभाल रही हो. तुम्हारे पापा की तरह तुमने भी इन सात सालों में बहुत नाम कमा लिया. अब तो तुमसे शादी करने वालों की लाइन लगी हुई हैं.”

डॉली मुँह बनाकर बोली—“मुझे तो शादी नहीं करनी, लेकिन तुम क्यों अब तक कुँवारे घूम रहे हो ? तुम तो शुरू से ही बहुत अच्छे हो और अब तो तुमने खुद की कम्पनी भी शुरू कर ली. नाम भी तुमने बहुत कमा लिया और लड़कियों की लाइन तो तुम्हारे लिए भी लगी हुई हैं. फिर भी तुम कुँवारे घूम रहे हो और वो अंकित तुमसे छोटा हैं, उसके दो बच्चे हो गए.”

राज—“अभी तो तुमने कहा, तुम्हें तो शादी करनी ही नहीं हैं. जब तुम शादी नहीं करोगी तो फिर मेरी शादी कैसे हो सकती हैं ?”

डॉली—“अरे, ये क्या ? मेरी शादी से तुम्हारी शादी का क्या कनेक्शन ?”

राज—“तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी. और मुझे शादी तुमसे करनी हैं. बस यहीं कनेक्शन हैं.”

डॉली हैरान होकर राज की तरफ देखते हुए बोली—“क्या बोले ? जरा फिर से बोलकर दिखाओ.”

राज मन में सोचने लगा कि कमाल हैं, आज जैसे–तैसे करके मुँह से बात निकली और इसे सुनाई देना बन्द हो गया.

डॉली—“अरे, बोलो ना.”

राज— “तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी. और मुझे शादी तुमसे करनी हैं. बस यहीं कनेक्शन हैं.”

डॉली मुँह फुलाते हुए बोली—“तो पहले क्यों नहीं कहा ?”

राज—“पहले तुमने कभी पूछा ही नहीं.”

डॉली—“लेकिन तुम्हें तो रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द ही नहीं थी ना.”

राज ने डॉली का हाथ पकड़कर कहा—“रिलेशन बनाने में और किसी धोखेबाज के चक्कर में आकर मुर्ख बनकर रिलेशन बनाने में फर्क होता हैं.”

डॉली ने राज के हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा—“लेकिन मैं अब अपने मम्मी–पापा की मरजी के बिना कुछ नहीं करती. पता नहीं, मम्मी–पापा हमारी शादी के लिए मानेगें या नहीं ?”

राज हँसने लगा.

डॉली हैरान होकर बोली—“क्या हुआ ?”

राज जोर से हँसने लगा.

डॉली—“ये पागलों की तरह हँसते ही रहोगे या बताओगे ? कि क्या हुआ ?”

राज ने अपनी हँसी रोककर कहा—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो मैनें सात साल पहले ही पटा लिया था. वो तो अन्दर हमारी शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं. वो देखो, पीछे खिड़की में.”

डॉली ने खड़ी होकर पीछे मुड़कर कहा—“आप लोगों को सब पता था, पहले से ?”

सभी लोग हँसते हुए घर से बाहर लोन में आ गए. राज बैंच से खड़ा हो गया. सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी डॉली के पास आए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब जो लड़का खुद की खुशी से ज्यादा तुम्हें खुश रखने के बारे में सोचता हैं. उसे हम नापसन्द कैसे कर सकते हैं ?”

राजलक्ष्मी—“हम तो सात साल पहले ही मान गए थे. लेकिन राज ने कहा, वो शादी से पहले तुम्हें खुश रखने लायक बनना चाहता हैं.”

डॉली—“और आप दोनों ने मुझे बताया भी नहीं ?”

राज ने स्टाईल से कहा—“अरे डॉली, बड़ों की बात बच्चे नहीं समझते.”

डॉली राज की तरफ आते आए बोली—“तुम रूको, अभी समझाती हूँ, तुम्हें तो.”

राज डॉली से बचने के लिए इधर–उधर होने लगा. सभी उनको देखकर हँसने लगे. राज डॉली से बचकर भाग गया और डॉली राज के पीछे–पीछे भाग गई.

छत्तीस दिन बाद पच्चीस नवम्बर, सोमवार को दोपहर दो बजे गाजे–बाजे के साथ दुल्हा बनकर राज डॉली के घर बारात लेकर आया. बहुत धुमधाम से डॉली और राज की शादी सम्पन्न होने के बाद शाम के आठ बजे दुल्हन बनी हुई डॉली राज के साथ राज के घर अपने ससुराल जाने के लिए अपने पिता के घर से विदा हुई.

गाड़ी चलते हुए कुछ दूर आने के बाद गाड़ी में पिछली सीट पर बैठी डॉली ने अपने पास बैठे राज से कहा—“तुमसे एक बात कहूँ ?”

राज—“हाँ, जितनी मरजी बातें कहो.”

डॉली—“अगर तुम मेरे लिए ये घर और गाड़ी नहीं भी बना पाते, तब भी मैं हर हाल में तुम्हारे साथ सारी जिन्दगी गुजार लेती.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, मालूम हैं.”

डॉली—“जब मालूम हैं, तो फिर ये शादी से पहले घर और गाड़ी का सपना पूरा करने की बात बोलकर सात साल इंतजार क्यों किया ?”

राज—“वो इसलिए क्योंकि प्यार का मतलब दूसरों से समझौता करवाना नहीं होता. कि मैं तो ऐसा हूँ, अगर प्यार हैं, तो इसी हाल में एडजस्ट करो. खुद को दूसरों के लायक बनाना ही सच्चा प्यार हैं. जैसे तुम मेरे लिए अपनी हाई–फाई लाइफ़ छोड़कर मेरे साथ किराये के कमरों या किराये के घरों में रहने के लिए तैयार थी. अब अगर तुम्हारे इस प्यार का फायदा उठाक उस वक्त मैं तुमसे शादी कर लेता, तो ये खुदगर्जी होती. इसलिए मैनें शादी से पहले खुद को तुम्हारे लायक बनाया. तुम्हारी जो गलत आदतें थी, गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालना, शराब पीकर घूमना–फिरना, उन सारी गलत बातों को तुम्हारी जिन्दगी से दूर करना ठीक हैं, लेकिन तुम्हारी जिन्दगी बदलकर तुम्हें एडजस्ट करने के लिए कहना सही नहीं होता.”

डॉली—“लेकिन अब अगर ऐसा कोई टाइम आ जाए, जब हमें एडजस्ट करना पड़े तो ?”

राज—“मजबुरी एक अलग बात हैं. जान–बुझकर किसी को दलदल में लाना अलग बात हैं. ऐसे तो मुझे लड़के और लड़की का शादी किये बिना साथ रहना भी पसन्द नहीं हैं. लेकिन मजबुरी थी, बुरा टाइम था, इसलिए मैनें दो रातें तुम्हारे साथ गुजारी. हालांकि हमने एक–दूसरे को उस इरादे से हाथ भी नहीं लगाया, फिर भी देखने–सुनने वाले तो वहीं सब सोचते हैं.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………”

राज ने गंभीर होकर कहा—“लेकिन मेरी एक शिकायत तुमसे अभी तक बनी हुई हैं.”

डॉली हैरान होकर बोली—“कैसी शिकायत ?”

राज—“छोड़ो, क्या फायदा कहने से ? अब तो शादी भी हो गई. आज सुहागरात भी हो जाएँगी.”

डॉली ने उदास होकर कहा—“प्लीज, बताओ. क्या बात हैं ?”

राज—“अरे, ये क्या ? तुम तो उदास हो गई. चलो फिर बता ही देता हूँ. जब तुम पहली बार मुझे मिली थी, उस वक्त तुमने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर बहुत बार आई लव यू बोला था. एक गाना भी गा दिया. पुलिसवालों से शिकायत करके पुलिसवालों को भी बता दिया. लेकिन उसके बाद आज हमारी शादी हो गई, फिर भी तुमने एक बार भी मुझे आई लव यू नहीं बोला.”

डॉली मुस्कुराकर बोली—“तुमने भी तो नहीं बोला.”

राज—“मुझे तो बोलना नहीं आता.”

डॉली—“ओह………तो फिर पहले बोलना सीखो, फिर आकर मुझे बोल देना. जब तुम मुझे बोलोगें, उस वक्त मैं भी तुम्हें बोल दूँगी.”

राज—“हत तेरे की. इससे अच्छा तो मैं भी तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह होता. एक आई लव यू बोलने में इतने नखरे ?”

डॉली—“ओहो, आई लव यू राज–आई लव यू राज–आई लव यू राज–आई लव यू राज.”

राज मुस्कुराते हुए डॉली के गाल पर किस करके बोला—“आई लव यू टू डॉली.”

डॉली मुस्कुराकर राज के गले लग गई.

ड्राईविंग करता हुआ उम्र में इक्कतीस(31) साल का हो चुका अंकित बोला—“अरे भाई, मैं भी बैठा हूँ. घर तो आ जाने दे. फिर कर लेना, जितना मरजी प्यार. इतने सालों से तुझे बोल रहा था, करले शादी–करले शादी. तब तो कहता रहा, नहीं यार, मैं इंतजार करूँगा. अब गाड़ी में शुरू हो गए. घर पहुँचने का भी इंतजार नहीं हो रहा.”

राज सीधा बैठकर बोला—“जब बहुत लम्बे इंतजार या बहुत मुश्किलों के बाद दो दिल मिलते हैं, फिर इंतजार नहीं होता.”

अंकित—“हम्म………समझता हूँ. और डॉली जी, अब आप राज को भी ड्राईंविग सीखा देना.”

डॉली—“तो तुमने क्यों नहीं सिखाई ड्राईविंग ? एक साल हो गया, तुम्हें ड्राईविंग इंस्टीटयूट खोले हुए. अब तक तो सीखा देते.”

अंकित ने हँसकर कहा—“इंस्टीटयूट तो राज ने ही मदद करके खुलवाया हैं, सब इसका ही हैं. लेकिन मैनें सोचा, जो बात आपसे सीखने में हैं, वो मुझसे सीखने में कहाँ होगी ? अब आप सीखा देना, आराम से प्यार करते–करते.”

अंकित के साथ राज और डॉली भी हँसने लगे. गाड़ी अपनी स्पीड से बढ़ती हुई चल रही थी.

शादी होने के पाँच दिन बाद तीस नवम्बर, शनिवार को सुबह के दस बजे पहले से बड़ा और आलिशान हो चुके नारायण के दो मंजिला घर सामने आकर राज के साथ बैठी ड्राईविंग करती हुई डॉली ने गाड़ी रोककर बन्द की.

राज और डॉली गाड़ी से उतरकर नारायण के घर की तरफ आने लगे.

दरवाजे पर खड़े उम्र में अड़तीस(38) साल के हो चुके नारायण ने अपनी पत्नी से कहा—“राज और डॉली आ ग्या.”

राज नारायण के पास आकर नारायण से गले मिला.

नारायण—“म तने ही अडीकन लाग रयो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.)

राज—“थाने केयो तो हो, एक बारी ब्याह गो सारो काम हो जावे, फेर आराम उ आवागा.”(हिन्दी अनुवाद : आपको कहा तो था, एक बार शादी के सारे रस्म–रिवाज हो जाए, फिर आराम से आएगें.)

नारायण—“चालो, अब तो सब आछी तरया होग्यो, सगळो काम ?”(हिन्दी अनुवाद : चलो, अब तो सब अच्छी तरह हो गए, सारे रीति–रिवाज ?)

राज—“सारो की अठैई गेट पर ही पूछ ले. मायने आण बई ना केई.”(हिन्दी अनुवाद : सब कुछ यहीं गेट पर ही पूछ लो. अन्दर आने के लिए मत कहना.)

नारायण हँसकर बोला—“अरे, सॉरी–सॉरी. आ मायने आ. आजा बाई.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, सॉरी–सॉरी. आओ अन्दर आओ. आओ बहन.)

राज और डॉली नारायण के पीछे–पीछे अन्दर आए. नारायण की उम्र में छ्त्तीस(36) साल की हो चुकी पत्नी किचन से बाहर आकर डॉली से गले मिली. चारों बैठकर आपस में बातें करने लगे.

शाम के चार बजे बैडरूम में बैठकर नारायण की पत्नी के साथ बातें कर रही डॉली को बाहर नारायण के साथ सोफे पर बैठे राज ने आवाज़ देकर कहा—“अब चले, डॉली. सेठ जी और मिनी मैडम ने भी बुलाया हैं.”

डॉली नारायण की पत्नी के साथ बैडरूम से बाहर आते हुए बोली—“हाँ, चलते हैं.”

राज ने खड़े होकर नारायण से कहा—“अच्छा, नारायण भाई जी.”

नारायण खड़ा होकर बोला—“हाँ, ठीक हैं.”

नारायण और नारायण की पत्नी राज और डॉली को गाड़ी तक छोड़ने आए. राज ड्राईवर के पास वाली सीट पर बैठा और डॉली ड्राईविंग सीट पर बैठ गई.

डॉली—“आपके बच्चे नहीं दिखे ? स्कूल गए हैं क्या ?”

नारायण की पत्नी—“बच्चे तो आपकी शादी से वापस आकर अगले दिन ननिहाल चले गए. वहाँ कल मेरे भाई की शादी हैं.”

डॉली—“फिर आप नहीं गए शादी में ?”

नारायण—“हम भी अब शाम को आठ बजे निकलेगें. राज ने ऐजेन्सी लाइन के काम दिलवाकर तरक्की तो बहुत करवा दी, लेकिन अब टाइम नहीं मिलता. पहले तो रात को दस–ग्यारह बजे तक बैठे रहते थे. कोई ब्याह–शादी होता था, तो दो दिन पहले जाते थे और एक दिन बाद आराम से आते थे. अब तो बस भागते रहो, कोई अंत ही नहीं हैं. परिवार में या रिश्तेदारी में कोई शादी ब्याह होता हैं, तब भी दौड़ते–दौड़ते जाते हैं और काम होते ही वापस भागते हैं.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“अब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही हैं. या तो चैन–सुकून मिलेगा या रूपये–पैसे मिलेंगे. अच्छा फिर मिलेगें.”

नारायण—“हाँ, ठीक हैं.”

डॉली गाड़ी स्टार्ट करके चलाने लगी.

कुछ देर बाद राज ने कहा—“चार तो इसने ही बजा दिये. अब सेठ जी के घर भी काफ़ी टाइम लगेगा. आज तो हनुमानगढ़ नहीं जा पाएँगें. अब तो कल सुबह ही निकलना पड़ेगा.”

डॉली—“हम्म………हनुमानगढ़ अगले हफ्ते चले जाते तो सही रहता.”

राज—“नहीं, अभी ठीक हैं. दो दिन रूककर आ जाएँगें. एक बार सारे परिवार वालों को तुमसे मिलवाना हैं. उसके बाद कोई बुलाएगा तो जाएँगें, वरना क्या करना हैं, वहाँ जाकर ?”

डॉली—“तुम्हारा मन नहीं करता, अब अपने शहर जाने का ?”

राज—“मुझे यहाँ सेठ जी और मिनी मैडम से बहुत प्यार और अपनापन मिला हैं. कभी–कभी जब मैं सोचता हूँ, तो सेठ जी और मिनी मैडम मुझे अपने मम्मी–पापा से बढ़कर लगते हैं. मेरे मम्मी–पापा मुझसे इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि मैं उनका बेटा हूँ. अगर मेरा मेरे मम्मी–पापा से कोई रिश्ता नहीं होता, तो उनको मुझसे कोई मतलब नहीं होता. जैसे किसी अन्जान से किसी को कोई मतलब नहीं होता. लेकिन सेठ जी और मिनी मैडम से कोई रिश्ता नहीं हैं, फिर भी उन्होंने ने मेरे लिए क्या–क्या किया हैं ? सब कुछ तुम्हें पता हैं. आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ उनके ही कारण हूँ. तो ऐसे अपनों को छोड़कर मैं हनुमानगढ़ जाकर क्या करूँ ? मम्मी–पापा, भाई–भाभी, बहन–जीजाजी इन सबको यहाँ बुला लिया. भाई और जीजा जी का अच्छे से बढ़िया काम सैट करवा दिया. अब बाकि परिवार वाले और रिश्तेदारों में से किसी को कोई मदद चाहिए हो तो उनकी मदद करते हैं.”

डॉली—“हाँ, सच में बहुत अच्छे लोग हैं. मुझे तो हैरानी होती हैं, कदम–कदम पर बुरे लोग मिलने वाली इस दुनिया में जय अंकल और मिनी अंटी जैसे लोग भी हैं.”

राज—“हाँ, वैसे तो उनकी जिन्दगी में सब कुछ बहुत अच्छा हैं. उनके तीनों बच्चे सृष्टी, अँकुश और संयम भी उनकी तरह बहुत अच्छे हैं. लेकिन कभी–कभी उनके लिए डर लगता हैं, कहीं उनकी अच्छाईयों का गलत फायदा उठाकर कोई उनके साथ कुछ बुरा ना कर दें.”
 
डॉली—“चिन्ता मत करो. अच्छे लोगों की जिन्दगी में मुश्किलें और परेशानियाँ आ तो सकती हैं, लेकिन ज्यादा देर टिक नहीं सकती. तुमने देखा नहीं, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर कितनी रौनक हैं. वरना इस उम्र में और कुछ नहीं तो, लोग बीमारियों से परेशान रहते हैं. लेकिन जय अंकल और मिनी अंटी को देखो, एकदम फिट, बिल्कुल तंदरुस्त और हेल्थी हैं. मैं तो चार साल पहले सृष्टी की शादी से चार–पाँच दिन पहले उस वक्त हैरान रह गई, जब मैनें देखा, मिनी अंटी पैंतीस किलो गेहूँ से भरी बोरी सर पर उठाकर बिल्कुल आराम से ले आई. जय अंकल भी चालीस किलो तक वजन कितनी आराम से उठा लेते हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“अरे, वो तो मेरे मम्मी–पापा भी आठ–दस साल पहले पचास की उम्र होने तक उठा लेते थे. वो क्या हैं ? पुराने लोगों की कुछ बातें बहुत अच्छी हैं. गरीब लोग तो अब भी मेहनत वाले काम करते हैं, लेकिन बड़े लोग अब नौकर–चाकर रख लेते हैं या फिर भारी काम पैसे देकर करवा लेते हैं. पहले बड़े(पैसेवाले) लोग भी अपने बच्चों से मेहनत वाले भारी काम करवाते रहते थे. अब मेहनत वाले भारी काम करने से भूख भी लगती थी, इसलिए पहले के बच्चे खाना पूरा खाते थे. इससे बच्चों का शरीर भी बढ़िया बन जाता था. जिम जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी.”

डॉली—“हाँ, ये सब तो मेरे मम्मी–पापा भी बताते रहते हैं.”

राज—“पहले ज्यादातर लोग ऐसा करते थे. एक तो उस टाइम अब जितनी सुविधाएँ नहीं थी. दूसरा लोग चाहते थे, कि उनके बच्चे आलसी ना बने, मेहनती बने. सेठ जी और मिनी मैडम ने भी अपने टाइम में मेहनत वाले भारी काम किये हैं. जैसे सर पर उठाकर पानी का मटका लेकर आना, गेहूँ, चावल, अनाज से भरी बोरी सर पर उठाकर लाना. जब मैं सेठ जी के पास जॉब करता था, उस टाइम सेठ जी और मैडम बताया करते थे, कि अपनी जवाँनी में वो पचास–साठ किलो वजन आराम से उठा लेते थे.”

डॉली आँखे ऊपर करके हैरान होते हुए बोली—“बाप रे………पचास–साठ किलो वजन. मेरा तो पन्द्रह–बीस किलो वजन उठाते ही दम निकल जाता हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“इस मामले में हम पुराने लोगों की बराबरी नहीं कर सकते. ये जो पुराने लोग बीमार होते हैं ना. असल में ये लोग अपने गलत खानपान और नशे का कारण बीमार होते हैं. वरना सेठ जी और मिनी मैडम को देखो, उनको घर के मेहनत वाले भारी काम करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं हैं, फिर भी घर के काम तो खुद ही करते हैं. कोई ज्यादा काम हो, तब दूसरों को बुलाते हैं. इससे उनको कभी दवाईयाँ लेने की जरूरत नहीं पड़ी. हर रोज अनार, सेब, केले, संतरे, चीकू, पपीता, आम, सभी फल खाते हैं. खाने में हर रोज बढ़िया हरी सब्जी जरूर बनाते हैं. इस तरह सेठ जी और मिनी मैडम ये सब शरीर को फायदे पहुँचाने वाली चीजें तो हर रोज पेट भरकर खाते हैं और चाट–पकौड़ी, समोसा–कचौरी, चाउमीन–बर्गर, पिज्जा वगैरह हफ्ते–दस दिन में एक या दो बार थोड़ा–बहुत खाते हैं. सबसे बड़ी बात सभी तरह के नशे से पूरी तरह दूर हैं. तो एकदम फिट हेल्थी, सेहतमंद और तंदरुस्त क्यों नहीं होगें ?”

डॉली—“हाँ, ये बात तो बिल्कुल सही हैं.”

राज—“हम्म…और यहीं सब उन्होंने अपने बच्चों को सिखाया हैं. मैं इनके पास आया तो यहीं सब मुझे भी सीखा दिया.”

डॉली ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब मुझे सीखा दिया.”

राज ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब अपने मम्मी–पापा को सीखा दिया.”

डॉली खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“और अब हम दोनों मिलकर यहीं सब अपने बच्चों को सिखाएँगें.”

डॉली को हँसते देखकर राज की हँसी और ज्यादा खिल गई.

शाम के पाँच बजे डॉली ने जयशर्मा के घर के सामने गाड़ी लाकर रोककर बन्द कर दी. राज और डॉली गाड़ी से उतरकर जयशर्मा के घर के दरवाजे पर जूते और सैंडल निकालकर घर के अन्दर आकर सीढियाँ उतरते हुए नीचे बेंसमेंट में आकर केबिन में आए.

जयशर्मा—“अरे, आओ भई आओ.”

राज और डॉली ने मुस्कुराते हुए जयशर्मा के पास आकर जयशर्मा के पैर छुए.

जयशर्मा ने मुस्कुराते हुए दोनों को आशिर्वाद देते हुए कहा—“हमेशा खुश रहो.”

नीचे कारपेट लगे फर्श पर बैठकर ज्वैलरी चैक कर रही मिनी ज्वैलरी छोड़कर खड़ी हुई.

राज और डॉली ने मिनी के पास आकर मिनी के पैर छुए.

मिनी मुस्कुराते हुए बोली—“अरे, बस–बस. हमेशा हँसते–मुस्कुराते खुश रहो.”

जयशर्मा—“इन्हें ऊपर ले जाकर चाय–नाश्ता करवाओ. मैं आता हूँ, थोड़ी देर में.”

मिनी डॉली के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“हाँ, चलो. ऊपर चलते हैं. राज, आ जाओ.”

राज और डॉली मिनी के साथ केबिन से बाहर आकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आकर सोफे की तरफ जाने लगे.

राज—“सृष्टी, जीजाजी(सृष्टी के पति), अँकुश और संयम कहाँ हैं ?”

मिनी—“अँकुश तो तुम्हारी शादी में शामिल होकर अगले दिन अपने ससुराल चला गया. वो पापा बनने वाला हैं ना, उसकी वाईफ का आखरी महीना चल रहा हैं. इसलिए वहाँ बहू के साथ रहेगा तो अच्छा हैं और संयम कल सृष्टी और जवाँई(दामाद) जी के साथ बैंगलोर चला गया. हफ्ते–दस दिन बाद आएँगा.”

मिनी सोफे के पास आकर बोली—“तुम दोनों यहाँ बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय–नाश्ता लाती हूँ.”

डॉली बोली—“चलिए, आपकी हेल्प कर देती हूँ.”

मिनी—“अरे, तुम दोनों शादी के बाद पहली बार घर आए हो. इसमें हेल्प क्या हैं ? बस चाय ही तो बनानी हैं.”

डॉली—“ओहो अंटी, आप भी क्या फॉर्मेलिटी करने लगी ?”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“अरे, राज यहाँ अकेला बैठा रहेगा. अभी तुम बैठो और बातें करो. जब खाना बनाएँगें, तब हेल्प कर देना.”

राज—“नहीं–नहीं, मैं नीचे सेठ जी के पास जा रहा हूँ.”

मिनी—“अच्छा ठीक हैं.”

डॉली मिनी के साथ किचन में चली गई और राज मुड़कर सीढिया उतरते हुए वापस नीचे बेसमेंट में चला गया.

रात को साढ़े दस बजे खाना खाने के बाद सोफे पर बैठी मिनी और डॉली सामने बैठे जयशर्मा और राज सब आपस में बातें कर रहे थे.

राज ने कहा—“अच्छा, सेठ जी. अब हम चलते हैं. साढ़े दस बज गए.”

मिनी—“अरे, साढ़े दस बज गए. बातों–बातों में पता ही नहीं चला. दो मिनट रूको, मैं अभी आती हूँ.”

मिनी खड़ी होकर बैडरूम में गई और दो मिनट बाद हाथ में एक पैकेट लिए वापस आई. जयशर्मा, राज और डॉली खड़े हो गए.

मिनी ने राज और डॉली को पैकेट देते हुए कहा—“ये तुम दोनों के लिए हमारी तरफ से एक छोटा सा तोहफा.”

राज—“मैडम, अब इसकी क्या जरूरत थी ?”

मिनी—“क्यों ? हम तुम्हें गिफ्ट नहीं दे सकते.”

राज ने मुस्कुराकर जयशर्मा की तरफ देखा. जयशर्मा ने अपनी पलकें झपकाकर गिफ्ट लेने का इशारा किया. राज ने कुछ बोले बिना मुस्कुराकर डॉली को पैकेट लेने का इशारा कर दिया और डॉली ने मुस्कुराते हुए पैकेट ले लिया.

राज और डॉली ने जयशर्मा और मिनी के पैर छूए.

जयशर्मा और मिनी एक साथ बोले—“हमेशा खुश रहो और तुम दोनों के प्यार को किसी की नजर ना लगे.”

राज—“अच्छा, मैडम हम चले.”

जयशर्मा—“अरे, पैकेट खोलकर तो देखो, उसमें क्या हैं ?”

डॉली पैकेट खोलकर देखने के बाद बोली—“ये तो हनीमून ट्रिप के टिकट हैं.”

मिनी ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, मुझे पता था, ये राज तो अपने सेठ जी की संगत में कंजूस हो गया हैं. ये तो तुम्हें कहीं लेकर जाएँगा नहीं. इसलिए ये काम भी मैनें ही कर दिया. अब तुम दोनों तीस दिन के लिए घूमने जाओ और जल्दी से खुशखबरी देना.”

राज और डॉली शर्माकर इधर–उधर देखते हुए मुस्कुराने लगे.

मिनी—“चलो, अब घर जाओ. देर हो रही हैं.”

राज ने मिनी और जयशर्मा से कहा—“आपसे एक बात पूछूँ ?”

मिनी—“हाँ, बोलो.”

राज—“पहले तो मैं आपके पास नौकरी करता था. उस वक्त आप लोग कहते थे, मैं मेहनत, लगन और ईमानदारी से नौकरी करता हूँ, उसके बदले में आप भी मेरे लिए कुछ कर देते हो. लेकिन अब पिछले सात सालों में आपकी नौकरी छोड़ने के बाद आपने जो मेरी इतनी मदद की. मुझे खुद का बिजनेस शुरू करवा दिया. शुरू के दो साल बहुत खराब रहे, तो आप लोगों ने मेरे बिजनेस पर पचास लाख से ज्यादा खर्च करके मेरी हेल्प की और ढ़ाई–तीन साल बाद बिजनेस अच्छा चलने लगा, वरना आप लोग और मदद करते. फिर जब मैं आपको आपके पैसे वापस देने आया, तब भी आप लोग ले नहीं रहे थे. मैनें जबरदस्ती आपको आपके पैसे वापस दिये. बिना किसी रिश्ते के आप लोगों का इतना प्यार और अपनापन पाकर मैं हैरान हूँ.”

मिनी ने मुस्कुराते हुए राज के सर पर हाथ रखकर कहा—“एक बार तुमने मुझे माँ कहा था ना. तो माँ के प्यार पर हैरानी कैसी ?”

जयशर्मा—“और जब से तुम हमारे पास आए हो, हमने तुम्हें अपने बच्चों की तरह समझा हैं. अब कहने वाले कहते हैं, हिसाब तो बाप–बेटे का भी होता हैं. लेकिन जब रिश्ता दिल से जुड़ जाए, फिर कोई हिसाब नहीं रहता.”
 
राज—“लेकिन सेठ जी आप लोगों की अच्छाई का बुरे लोग गलत फायदा भी उठा सकते हैं. आपने सृष्टी, अँकुश और संयम को भी आपके सारे गुण दिये हैं. वो तीनों भी बिल्कुल आपकी तरह बहुत अच्छे हैं. बस इसीलिए कई बार आप सबकी चिन्ता हो जाती हैं.”

मिनी ने हँसकर कहा—“बुरे लोग गलत फायदा उठाकर एक बार धोखा दे सकते है, दो बार धोखा दे सकते हैं. फिर वो अपना चेहरा दिखाने लायक नहीं रहते. हमने बहुत से लोगों को उनकी मुसीबत और परेशानियों में मदद की. लेकिन जब उनको मौका मिला, कोई रूपये–पैसे लूटकर भाग गया. कोई ज्वैलरी लूटकर भाग गया. और बहुत से लोगों की गन्दी नीयत भी सामने आई. अब वो लोग कभी हमें अपना चेहरा नहीं दिखा सकते.”

जयशर्मा—“और अगर तुम चाहते, तो तुम भी इस तरह से रूपये–पैसे लूटकर भाग सकते थे. लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया, इसलिए तो तुम बिल्कुल हमारे घर के सदस्य बन गए. हमें ऐसा लगने लगा, जैसे हमारे तीन नहीं, चार बच्चे हैं. रही बात तुम्हारी मदद की. तो जैसे तुम्हें डॉली के आँशूओं में तुम्हारा खाया हुआ धोखा याद आता था. बिल्कुल उसी तरह हमें तुम दोनों के प्यार में अपना प्यार नजर आया. हमें भी कभी तुम्हारी तरह प्यार हुआ था. हमारी कहानी भले ही अलग–अलग हो, लेकिन प्यार का एहसास तो एक जैसा ही होता हैं ना.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, सेठ जी. मेरी धोखा खाकर बुरी हालत हुई थी, इसलिए मैं धोखे का दर्द समझता था. आपको और मैडम को एक–दूसरे से प्यार हुआ था, इसलिए आप लोग हमारा प्यार समझते हो.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

राज—“अच्छा मैडम, हम चलते हैं.”

मिनी—“हाँ, ठीक हैं.”

जयशर्मा और मिनी राज और डॉली को छोड़ने बाहर आए. डॉली ड्राईविंग सीट पर बैठी और राज दूसरी तरफ बैठा. डॉली ने गाड़ी स्टार्ट की और राज के साथ जयशर्मा और मिनी को बाए–बाए बोलकर गाड़ी चलाकर ले गई.

जयशर्मा और मिनी हँसते हुए घर के अन्दर आए. जयशर्मा दरवाजा अन्दर से बन्द करने लगे. मिनी दरवाजे के पास चप्पल उतारकर बैडरूम में आकर बैड पर बैठ गई.

जयशर्मा बैडरूम में आकर मिनी के पास बैठते हुए बोले—“हम्म…आखिरकार राज और डॉली की शादी हो गई.”

मिनी—“हाँ, जिनका प्यार सच्चा हो, उनका मिलन देर–सवेर हो ही जाता हैं.”

जयशर्मा ने एक हाथ मिनी के गले में डालकर दूसरा हाथ मिनी के गाल पर रखकर मिनी के होंठ अपने होंठ के पास लाते हुए मुस्कुराहट के साथ कहा—“हाँ, अब हमारा मिलन भी हो जाए.”

मिनी जयशर्मा से खुद को छुड़ाते हुए बोली—“अरे, अब तो शर्म करो. हम नाना–नानी बन गए हैं और दादा–दादी बनने वाले हैं.”

जयशर्मा फिर से मिनी को अपनी बाहों में समेटकर बोले—“अब ये किसने कहा, कि नाना–नानी और दादा–दादी बनने के बाद प्यार नहीं कर सकते ?”

मिनी जयशर्मा के गले में अपनी बाहें डालकर जयशर्मा से आँखें मिलाते हुई बोली—“कुछ लोग तुम्हें ठरकी बुढ़ा और मुझे बुढ़ी घोड़ी लाल लगाम बोलते हैं ?”

जयशर्मा—“अब बोलने वालों को बोलने दो. अगर बोलने वालों के बारे में सोचते, तो हम मिल ही नहीं पाते. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, फिर बोलने वालों की परवाह क्यों करें.”

मिनी—“मतलब, तुम नहीं मानोगें ?”

जयशर्मा—“क्यों मानू ? और आज तो तुम्हें बिल्कुल नहीं छोड़ सकता.”

मिनी—“क्यों ? आज ऐसा क्या खास हैं ?”

जयशर्मा—“बचपन में तुमने जो मेरी पिटाई की थी, उसका हिसाब बराबर करने के साथ–साथ आज जो तुमने राज और डॉली को हनीमून पर भेजा हैं, वो भी तो तुमसे वसूल करना हैं.”

मिनी खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“तुम नहीं सुधरोगें. चलो, करती हूँ तुम्हारे हिसाब बराबर.”

जयशर्मा मुस्कुराकर मिनी को गले लगाते हुए बोले—“जब बदले में तुमसे प्यार करने का बहाना मिल रहा हैं, तो मैं क्यों सुधरूँ ?”

मिनी जयशर्मा के गले लगकर मुस्कुराते हुए बोली—“और कभी सुधरना भी मत. आई लव यू.”

जयशर्मा बचपन में मिनी से हुई अपनी पिटाई के हिसाब बराबर और मिनी का राज और डॉली को दिया हनीमून ट्रिप वसूल करने के लिए मिनी को बाहों में भरकर जयशर्मा मिनी की बाहों में समाकर जयशर्मा मिनी के साथ बैड पर लेट गए.

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समाप्त
 
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