S
StoryPublisher
Guest
जयशर्मा अपना कप ट्रे में रखकर बोले—“अरे, आप रोईये नहीं. मेरा इरादा आपको आपकी बेटी से दूर करना नहीं हैं. हम दिल से चाहते हैं, डॉली आपके साथ बहुत खुश रहें. डॉली दिल की बुरी नहीं हैं. हमारे घर आने के बाद इन तीन दिनों में उसका नटखटपन देखकर लगता हैं, जैसे अभी तक वो दस–पन्द्रह साल की बच्ची हैं और मेरे तीनों बच्चों के साथ तो ऐसे घुलमिल गई, जैसे पता नहीं, कब से जान–पहचान हैं.”
सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी दोनों ने अपनी आँखें पोंछकर डॉली के बचपन को याद करते हुए डॉली की बहुत सी बातें जयशर्मा को बताई.
सेठ साँवरमल बागड़ी बहुत सी बातें बताने के बाद बोले—“ऐसी थी डॉली. डॉली हमारे जीवन में इतनी खुशियाँ लेकर आई, हमें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ, हमारा बेटा नहीं हैं. हम एक बेटी के माँ–बाप बनकर बहुत खुश थे. फिर इसकी बहुत शिकायतें आने लगी. डॉली गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हैं, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करती हैं. बड़ों को बैईज्जत करती हैं. और भी बहुत सी शिकायतें. अपनी इकलौती बेटी को बिगड़ते देखकर हम डर गए और उसे बिगड़ने से बचाने के लिए बहुत सख्त हो गए. हमने सोचा, कहीं ज्यादा लाड़–प्यार देकर हम डॉली को बिगाड़ ना दें. लेकिन डॉली तो दिन बा दिन और ज्यादा खराब होती गई. कॉलेज में आने के बाद गलत लड़के–लड़कियों की संगत में आकर शराब पीने लगी. रात–रात भर घर से बाहर घूमने लगी. फिर इस लड़के रंगीला के चक्कर में पड़ गई. हमने बहुत समझाया, ये लड़का ठीक नहीं हैं. लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी. फिर जो कुछ हुआ, सब आपके सामने हैं.”
राजलक्ष्मी—“एक इकलौती बेटी, वहीं जब सीधे मुँह बात ना करें. तो माँ–बाप के मन पर क्या गुजरती हैं ? ये सिर्फ वहीं माँ–बाप समझ सकते हैं, जिनके साथ ऐसा हुआ हो.”
जयशर्मा—“होता क्या हैं ? कभी–कभी हम समझ नहीं पाते, हमें क्या करना चाहिए ? आपकी सारी बातें सही हैं. आप भी सभी माँ–बाप की तरह अपनी बच्ची का भला ही सोचते हो. लेकिन डॉली को सही रास्ते पर चलाने के लिए आपने तरीके गलत अपनाए. चाहे लाड़–प्यार हो, चाहे सख्ती हो. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा हो जाए तो वो नुकसान करता हैं. आप लोगों के मन में एक डर आ गया, कहीं इकलौती बच्ची हाथ से निकल ना जाए और इस चक्कर में आप लोग घबराकर कुछ ज्यादा सख्त हो गए. परिणाम ये हुआ, डॉली को आपसे मिलने वाली डांट और आपसे होने वाली पिटाई की कोई परवाह ही नहीं रही.”
राजलक्ष्मी—“तो आप ही बताईए, इकलौती बेटी का ये हाल देखकर हम क्या करते ?”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब ये क्या कर रही थी ? वो भी आपको पता ही हैं. टीवी में खबरें आई. सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी. बाप की पगड़ी उछालने में कोई कसर बाकि नहीं रखी.”
मिनी सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आई और जयशर्मा के पास आकर सोफे पर बैठ गई.
जयशर्मा ने सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“देखिये, कई बार क्या होता हैं ? बच्चे हमारे पास आकर बोलते हैं, मम्मी या पापा, हमें आपसे कुछ कहना हैं. हम तिलमिलाकर बोलते हैं, क्या हैं ? तेरी बात बाद में पहले ये काम कर. हमेशा हमें परेशान करते हो. इस बार क्या गलती की हैं तूने ? बहुत सारे माँ–बाप अपने बच्चों के साथ इस तरीके से बात करते हैं, जैसे बच्चे नहीं हैं, भेड़–बकरी हैं. बच्चे अपने दिल की बात कहने के लिए माँ–बाप के पास आते हैं, तो माँ–बाप को चाहिए, प्यार से बच्चों की बात सुनकर बच्चों को प्यार से समझाए. लेकिन समझाना तो बहुत दूर की बात हैं. बहुत से माँ–बाप बच्चों के साथ सीधे मुँह बात तक नहीं करते. ये सच्चाई हैं. बच्चे नादान हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे कुछ समझते ही नहीं. अरे…जब माँ–बाप बच्चों को कुछ समझाएगें, तभी तो बच्चे समझेगें. कोई दूसरा थोड़े ही आएगा, हमारे बच्चों को समझाने के लिए.”
मिनी—“और सबसे बड़ी गलती होती हैं, बच्चे बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें, ये सोचना. अपने आप तो बच्चे बोलना भी नहीं सीखते. बोलना भी सिखाना पड़ता हैं. फिर हम ये कैसे सोच लेते हैं, बड़े होकर बच्चे अपने आप समझदार हो जाएँगें ?”
जयशर्मा—“और माँ–बाप के बच्चों की बात नहीं सुनने का फायदा गलत लोग उठाते हैं. माँ–बाप तो अपने बच्चों की बात सुनकर बच्चों को कुछ समझाना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि बच्चे मुर्ख हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे नासमझ हैं, बच्चों को समझाने का कोई फायदा नहीं हैं. बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें. लेकिन गलत लोग बच्चों की बात सुनकर बच्चों को गलत बातें बहुत अच्छी तरह प्यार से समझा देते हैं और बच्चे खुशी–खुशी गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. यहीं आपकी डॉली के साथ हुआ हैं.”
मिनी—“और हाँ, बच्चों को डरा–धमकाकर या पिटाई करके तो हम कभी बच्चों को सही रास्ते पर नहीं चला सकते. जब तक बच्चों के मन में हमारा डर होता हैं, तब तक बच्चे चोरी–छिपे गलतियाँ करते हैं और जब बच्चों के मन से डर निकल जाता हैं, फिर बच्चे किसी की परवाह किये बिना मनमानी करने लगते हैं.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“शायद आपकी बात ठीक हैं. ऐसी गलतियाँ तो हमसे भी हुई हैं. लेकिन मनुष्य क्या करें ? जीवन में घर–परिवार भी होता हैं. रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती हैं. कारोबार देखना भी जरूरी हैं. जीवन में इतनी भागदौड़ होती हैं, कभी–कभी हम भविष्य पर विचार नहीं कर पाते.”
मिनी—“देखिये, जीवन में सब कुछ जरूरी हैं, इसलिए हमें सभी बातों में संतुलन बनाकर करना चाहिए. जब हम किसी एक बात पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देते हैं और दूसरी बात को हल्के में ले लेते हैं, तब संतुलन बिगड़ जाता हैं.”
राजलक्ष्मी—“आपकी बात सही हैं. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ? हम तो बेटी को अपना जीवन बर्बाद करते देखकर कुछ समझ नहीं पाए और जो बातें आप लोग बता रहे हैं, वो सारी गलतियाँ हम कर बैठे हैं. अब तो अगर आप लोग कहो, तो हम डॉली से माफ़ी माँग लेते हैं.”
जयशर्मा—“अरे, कैसी बातें कर रही हैं आप ? ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं हैं. डॉली को प्यार और अपनेपन की जरूरत हैं, डांट और डंडे से पिटाई की जरूरत नहीं हैं. आप लोग बस उसे प्यार और अपनापन दो. माफ़ी–वाफ़ी की कोई जरूरत नहीं हैं.”
मिनी—“डांट और पिटाई से बच्चों को डराने की जगह हमें बच्चों को हर एक समझाने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे फिर कभी नहीं बिगड़ते. बस हमारे समझाने का तरीका ऐसा हो, कि बच्चों को हमारी बातें भाषणबाजी या लेक्चरबाजी ना लगे.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, डांट और डंडे से पिटाई तो बहुत कर चुके हैं और उसका परिणाम भी देख लिया हैं.”
मिनी—“अब पुरानी बातें भूल जाईये, भाई साहब. जो होना था, वो तो हो गया. उस पर अफ़सोस करने से कुछ नहीं मिलने वाला.”
जयशर्मा—“और हाँ, इस बार उस लड़के के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके डॉली ने कुछ गलत नहीं किया. अगर इन घटिया और बेकार लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग इसी तरह बिना किसी डर के किसी ना किसी मासूम को अपना शिकार बनाते रहेंगे. फोर एग्लामपल ये घटिया लड़के, ये बेकार आदमी लड़कियों और महिलाओं के शरीर पर वहाँ कुछ गलत हरकत करते हैं, जहाँ लड़की या महिला को बताने में शर्म महसुस होती हैं. पहली बात तो हैं, ज्यादातर लड़कियाँ और महिलाएँ कुछ बोलती ही नहीं हैं, बस चुपचाप सहन करती हैं. अगर कोई हिम्मत वाली लड़की या महिला बोलकर विरोध करें, तो ये घटिया और बेकार लोग कहते हैं, बताओ जरा, हमने किया क्या हैं ? लड़की या महिला शर्म के कारण सब कुछ साफ़–साफ़ नहीं बता पाती और ये घटिया लोग लड़की या महिला को गलत साबित करके हँसते हुए निकल जाते हैं. लड़कियों और महिलाओं का ये शर्म करके चुप रहना ही, इन घटिया लोगों की ताकत हैं. जिस तरह डॉली ने हिम्मत करके उस लड़के की एक–एक गलत और गन्दी बात पूरी डिटेल के साथ फेसबुक पर पोस्ट की हैं. अगर हर लड़की और हर महिला इसी तरह घटिया और गन्दे लोगों की हर बात कोई शर्म किये बिना सबको बताने लगे, तो इन घटिया और बेकार लोगों के मन में भी एक डर पैदा होगा. और ऐसा सिर्फ वहीं लड़की कर सकती हैं, जो बहुत अच्छी हो, जो खुद गलत ना हो. जो लड़कियाँ खुद जान–बुझकर लड़कों के चक्कर में फँसती हैं, वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए हमें डॉली जैसी अच्छी और हिम्मत वाली लड़कियों की मदद करनी चाहिए. ताकि दूसरी अच्छी लड़कियों को भी गलत लोगों के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत मिले.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“ये सब कहने की बातें हैं, जयशर्मा जी. हम रोज भुगत रहे हैं.”
जयशर्मा—“आप इसलिए भुगत रहे हो, क्योंकि आपकी और आपकी बेटी की कोई गलती ना होते हुए भी आप लोग खुद को गलत मानते हो.”
मिनी—“और भाई साहब, कहने वाले तो टीवी पर राज के साथ इनका नाम आने के बाद हमें भी बोल रहे हैं. लेकिन हम उन कहने वालों को सही और सटीक जवाब देते हैं. उनसे पूछते हैं, गलत करने वाला बुरा होता हैं या जिसके साथ गलत हुआ हो, वो बुरा होता हैं ? जो अच्छे और समझदार लोग हैं, वो हमारी बात समझ जाते हैं और गलत लोग इसलिए नहीं समझते, क्योंकि उनको गलत रास्ते पर ही चलना हैं.”
जयशर्मा—“हाँ, बिल्कुल.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन लोगों के मुँह तो फिर भी बन्द नहीं होते ना.”
जयशर्मा—“देखिये साँवरमल जी, डॉली ने किसी को धोखा दिया नहीं हैं. डॉली ने किसी से धोखा खाया हैं. तो फिर आप क्यों शर्मिन्दगी महसुस करते हो ? अगर डॉली गलत रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चल रही हैं, तो आप बस उसकी मदद करो. अगर लोग आपके सामने कुछ बोलते हैं, तो उनको जवाब दो. हाँ, पहले कुछ वजह थी, कुछ कारण थे, इसलिए हमारी बेटी भटक कर गलत रास्ते पर चली गई. और हमारी बेटी भटक गई थी, बिगड़ी नहीं थी. हमारी बेटी ने किसी का बुरा नहीं किया. हमारी बेटी के साथ बुरा हुआ था. लेकिन अब उसने सही रास्ता पकड़ लिया हैं. इसके बाद दुनिया कुछ भी कहें, दुनिया की परवाह मत करो. लोग कुछ ना कुछ तो कहते ही हैं और इन कहने वालों का कोई ईलाज नहीं हैं. जब हमारी शादी हुई थी, उस वक्त हमें भी लोग बहुत कुछ कहते थे. मुझे कहते थे, ये जयशर्मा तो अन्टी का दीवाना हैं. मिसेज को कहते थे, मिनी ने एक बच्चे को फँसा लिया. और भी बहुत कुछ कहते थे. लेकिन हमें पता था, हमने कुछ भी गलत नहीं किया. अपने घरवालों की मरजी से, सारे रीति–रिवाजों के साथ शादी करके हम पति–पत्नी बने हैं. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो करने दो. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, तो हम क्यों लोगों को सफाई देते फिरे ? हाँ, हमारे सामने कुछ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी. यहीं बात मैं आप लोगों से कहूँगा, पहले जो होना था, वो हो गया. अब आगे से पुरानी गलती नहीं दोहराएँगें. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो उनको करने दो. लोगों को बातें करके खुश हो लेने दो.”
राजलक्ष्मी—“लेकिन भाई साहब, लड़की के बारे में ये सब जानने के बाद लड़की से कौन शादी करता हैं ? आपकी बातें सारी ठीक हैं, लेकिन दुनियादारी और समाज को भी तो देखना पड़ता हैं.”
मिनी—“हाँ, आपकी बात सही हैं. लेकिन दुनिया में अच्छे और समझदार लोग भी बहुत हैं. जो लोग डॉली की नासमझी के कारण की हुई गलती को माफ़ करके डॉली की अच्छाईयाँ देखेंगे, उनको कोई प्रोब्लम नहीं होगी, डॉली को अपने घर की बहू बनाने में.”
जयशर्मा—“और अभी आप लोग डॉली की शादी के बारे में मत सोचो. वो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं, इसमें उसकी मदद करो. अभी उसे हम सबके साथ की जरूरत हैं. शादी हो जाएगी, टाइम आने पर.”
मिनी—“और इस बार तो किस्मत अच्छी थी, जो डॉली के पास पैसे नहीं थे. राज को वो बस स्टैण्ड पर बैठी मिल गई और राज उसे अपने साथ ले आया. वरना वो तो ये शहर छोड़कर कहीं ओर जा रही थी.”
सेठ साँवरमल बागड़ी ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—“हे भगवान………”
जयशर्मा—“अब छोड़ो, इन सब बातों को. आपको अगर डॉली को कैद ही करना हैं, तो उसे प्यार और अपनेपन की जंजीर में बाँध कर अपने दिल के कमरों में कैद कीजिये. किसी को कैद करने के लिए सबसे अच्छी चीज होती हैं, प्यार और अपनेपन की जंजीर. जब हम किसी को प्यार और अपनेपन की जंजीरों में बाँध लेते हैं, फिर वो खुद ही कभी इन जंजीरों से आजाद नहीं होना चाहता.”
राजलक्ष्मी—“ठीक हैं, भाई साहब. आपकी ये बात हम जरूर ध्यान में रखेंगे. लेकिन डॉली को बुला तो दीजिये. पाँच दिन से आँखें तरस गई, उसे देखने के लिए.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, उस पर हाथ उठाकर हम अन्दर ही अन्दर कितना रोते हैं ? ये हम ही जानते हैं. जब से वो घर से गई, हमारा तो खाना–पीना सब छुट गया.”
जयशर्मा—“ओह…फिर तो आज का खाना आप हमारे यहाँ ही डॉली के साथ बैठकर खाओ.”
राजलक्ष्मी—“नहीं–नहीं, भाई साहब.”
मिनी—“नहीं–नहीं क्या ? कोई बहाना नहीं चलेगा. अब आप लोगों ने खाना खाए बगैर जाने की जिद की, तो हम डॉली को भी नहीं ले जाने देगें.”
जयशर्मा—“अब इनके सामने मेरी भी नहीं चलती. पहले ही बता देता हूँ.”
सेठ साँवरमल बागड़ी मुस्कुराकर बोले—“ठीक हैं.”
मिनी सोफे से उठकर बोली—“आप लोग बातें करो. मैं खाने की तैयारी करती हूँ.”
राजलक्ष्मी खड़ी होते हुए बोली—“चलिये, मैं भी आपकी कुछ मदद कर दूँ.”
मिनी—“अरे, आप बैठिये, आपकी बेटी हैं ना. मदद के लिए. वो अब हमारे घर की सदस्य बन गई हैं.”
राजलक्ष्मी वापस बैठ गई. मिनी खाना बनाने में मदद के लिए डॉली और सृष्टी को बुलाने सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.
सवा तीन महिने बाद आठ अक्टूबर, रविवार को शाम के पाँच बजे डॉली और राज एक पार्क में आकर एक बैंच पर बैठ गए.
राज—“तो गाड़ी लाने से मना कर दिया क्या तुम्हारे मम्मी–पापा ने ?”
डॉली—“नहीं यार, वो तो खुद कहते हैं, जब गाड़ी हैं, तो बस में क्यों जाती हो ?”
राज ने मजाकियाँ लहजे में कहा—“वहीं तो ! तुम्हारा असली घर तो तुम्हारी गाड़ी थी और तुमने वहीं लानी बन्द कर दी.”
डॉली—“मजाक मत करो.”
राज ने हँसकर कहा—“अच्छा–अच्छा, लेकिन तुमने गाड़ी लाना बिल्कुल ही बन्द क्यों कर दिया ? जब कहीं आना–जाना हो, तब तो ले आया करो.”
डॉली—“नहीं, बिल्कुल बन्द थोड़े ही किया हैं. पापा के साथ ऑफ़िस आना–जाना गाड़ी से ही करती हूँ. कभी मम्मी को कहीं ले जाना हो और ड्राईवर ना हो, तो गाड़ी ले जाती हूँ. बस पहले की तरह फालतू में गाड़ी ले जाना बन्द कर दिया. पापा से पॉकेट–मनी की जगह सैलरी लेती हूँ और उस सैलरी से अपना खर्च चलाती हूँ. जब मैं अपनी कमाई पर गाड़ी मैनेज करने लायक हो जाऊँगी, फिर ले लूँगी गाड़ी.”
राज—“चलो, अच्छी बात हैं. और तुम्हारे ऑफ़िस में स्टाफ के लोग तुम्हें क्या कहते हैं ? सिर्फ डॉली या डॉली मैडम ?”
डॉली—“दोनों.”
राज—“एक महीना हो गया, तुम्हें जॉब करते हुए ?”
डॉली—“नहीं, पिछले महिने पन्द्रह से ही जॉइन किया था.”
राज—“तो कौनसी जॉब ज्यादा अच्छी लगी ? सेठ जी के पास या तुम्हारे पापा के पास ?”
डॉली—“हम्म…जॉब के हिसाब से सोचा जाए, तो पापा के पास ज्यादा सही हैं. वैसे जय अंकल के पास ज्यादा अच्छा लगता था.”
राज—“हम्म…अभी नई–नई हो ना वहाँ. धिरे–धिरे वहाँ भी मन लग जाएगा.”
डॉली—“अरे, मन तो लग गया. लेकिन वहाँ पापा और एक–दो लोगों के सिवा कोई मेरे काम पर ध्यान ही नहीं देता.”
राज—“कोई बात नहीं, जो लोग ध्यान देते हैं, उनसे हेल्प ले लिया करो.”
डॉली—“फिर भी यार, थोड़ा अजीब सा लगता हैं. मैं तो यहाँ जय अंकल के पास ही जॉब करना चाहती थी. लेकिन जय अंकल ने कहा, जब तुम्हारे पापा का इतना बड़ा बिजनेस हैं, तो हमारे पास जॉब क्यों कर रही हैं ? पहले तो मैनें बोल दिया, वहाँ कोई मेरे काम पर ध्यान नहीं देगा, बस पापा के कारण सब तारीफ करेंगे और मेरी हाँ में हाँ मिलाएँगें. लेकिन पिछले महिने जब पापा की तबीयत खराब हुई, तो जय अंकल और मिनी अंटी ने कहा, तुम्हारे होते हुए इस उम्र में तुम्हारे पापा अकैले सारा बिजनेस संभालते हैं, ये अच्छा नहीं लगता. अगर तुम अभी उनका बिजनेस जॉइन नहीं करना चाहती, तो उनके पास जॉब कर लो. पॉकेट मनी लेना तो तुमने पहले ही बन्द कर दिया हैं. जो सैलरी हम तुम्हें देते हैं, वहीं सैलरी अपने पापा से ले लेना. इस तरह तुम सेल्फ डिपेन्ड भी रहोगी और अपने पापा की मदद भी कर दोगी. दूसरी जगह नौकरी करने से कोई ज्यादा आत्मनिर्भरता थोड़े ही आ जाती हैं, वो तो इन्सान पर निर्भर करता हैं. और फिर आगे चलकर तुम्हें अपने पापा का बिजनेस ही तो संभालना हैं. तुम वहाँ जॉब करोगी तो अनुभव मिलेगा. हमारा तो ज्वैलरी का बिजनेस हैं. हमारे पास जॉब करोगी तो बाद में तुम्हारे पापा का बिजनेस जॉइन करने के लिए तुम्हें शुरू से दुबारा मेहनत करनी पड़ेगी. इसलिए अपने पापा के पास जॉब करो और उनका सहारा बनो. तुम काबिल लड़की हो, अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करो.”
राज—“सेठ जी और मिनी मैडम की बातें तो बिल्कुल सही हैं. और अब तो तुम्हारी अपने मम्मी–पापा के साथ चल रही सारी प्रोब्लम भी खतम हो गई. इसलिए तुम्हें भी अपना फर्ज निभाना चाहिए.”
डॉली—“हाँ, इसलिए तो मैनें जय अंकल और मिनी अंटी की बात मानकर पापा के साथ ऑफ़िस जाना शुरू कर दिया.”
राज—“ये भी सही हैं. वैसे तुम खुश हो ना, अब अपनी जिन्दगी में ?”
डॉली—“खुश ! मैं तो बहुत खुश हूँ. अब तो मेरे मम्मी–पापा मेरा इतना ख्याल रखते हैं, बस पूछो मत. उनका प्यार देखकर मुझे बहुत अफ़सोस होता हैं. काशः मैं पहले ही सुधर जाती.”
राज—“अफ़सोस क्यों करती हो ? जब सब कुछ ठीक हो गया हैं, तो खुश रहो और अपने मम्मी–पापा को भी खुश रखो.”
डॉली—“हाँ, और सब कुछ ठीक जय अंकल, मिनी जी और तुम्हारे कारण हुआ.”
राज—“मैनें क्या किया ? मैनें तो बस उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कहा था. सब कुछ किया तो तुमने ही हैं और फिर सेठ जी और मैडम ने तुम्हारे घर की प्रोब्लम सुलझा दी, तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाकर.”
डॉली—“हाँ, जय अंकल और मिनी अंटी का ये एहसास तो मैं कभी नहीं भूलूगीं. लेकिन मेरे बारे में उनको सब बताया तो तुमने ही था ना.”
सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी दोनों ने अपनी आँखें पोंछकर डॉली के बचपन को याद करते हुए डॉली की बहुत सी बातें जयशर्मा को बताई.
सेठ साँवरमल बागड़ी बहुत सी बातें बताने के बाद बोले—“ऐसी थी डॉली. डॉली हमारे जीवन में इतनी खुशियाँ लेकर आई, हमें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ, हमारा बेटा नहीं हैं. हम एक बेटी के माँ–बाप बनकर बहुत खुश थे. फिर इसकी बहुत शिकायतें आने लगी. डॉली गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हैं, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करती हैं. बड़ों को बैईज्जत करती हैं. और भी बहुत सी शिकायतें. अपनी इकलौती बेटी को बिगड़ते देखकर हम डर गए और उसे बिगड़ने से बचाने के लिए बहुत सख्त हो गए. हमने सोचा, कहीं ज्यादा लाड़–प्यार देकर हम डॉली को बिगाड़ ना दें. लेकिन डॉली तो दिन बा दिन और ज्यादा खराब होती गई. कॉलेज में आने के बाद गलत लड़के–लड़कियों की संगत में आकर शराब पीने लगी. रात–रात भर घर से बाहर घूमने लगी. फिर इस लड़के रंगीला के चक्कर में पड़ गई. हमने बहुत समझाया, ये लड़का ठीक नहीं हैं. लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी. फिर जो कुछ हुआ, सब आपके सामने हैं.”
राजलक्ष्मी—“एक इकलौती बेटी, वहीं जब सीधे मुँह बात ना करें. तो माँ–बाप के मन पर क्या गुजरती हैं ? ये सिर्फ वहीं माँ–बाप समझ सकते हैं, जिनके साथ ऐसा हुआ हो.”
जयशर्मा—“होता क्या हैं ? कभी–कभी हम समझ नहीं पाते, हमें क्या करना चाहिए ? आपकी सारी बातें सही हैं. आप भी सभी माँ–बाप की तरह अपनी बच्ची का भला ही सोचते हो. लेकिन डॉली को सही रास्ते पर चलाने के लिए आपने तरीके गलत अपनाए. चाहे लाड़–प्यार हो, चाहे सख्ती हो. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा हो जाए तो वो नुकसान करता हैं. आप लोगों के मन में एक डर आ गया, कहीं इकलौती बच्ची हाथ से निकल ना जाए और इस चक्कर में आप लोग घबराकर कुछ ज्यादा सख्त हो गए. परिणाम ये हुआ, डॉली को आपसे मिलने वाली डांट और आपसे होने वाली पिटाई की कोई परवाह ही नहीं रही.”
राजलक्ष्मी—“तो आप ही बताईए, इकलौती बेटी का ये हाल देखकर हम क्या करते ?”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब ये क्या कर रही थी ? वो भी आपको पता ही हैं. टीवी में खबरें आई. सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी. बाप की पगड़ी उछालने में कोई कसर बाकि नहीं रखी.”
मिनी सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आई और जयशर्मा के पास आकर सोफे पर बैठ गई.
जयशर्मा ने सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“देखिये, कई बार क्या होता हैं ? बच्चे हमारे पास आकर बोलते हैं, मम्मी या पापा, हमें आपसे कुछ कहना हैं. हम तिलमिलाकर बोलते हैं, क्या हैं ? तेरी बात बाद में पहले ये काम कर. हमेशा हमें परेशान करते हो. इस बार क्या गलती की हैं तूने ? बहुत सारे माँ–बाप अपने बच्चों के साथ इस तरीके से बात करते हैं, जैसे बच्चे नहीं हैं, भेड़–बकरी हैं. बच्चे अपने दिल की बात कहने के लिए माँ–बाप के पास आते हैं, तो माँ–बाप को चाहिए, प्यार से बच्चों की बात सुनकर बच्चों को प्यार से समझाए. लेकिन समझाना तो बहुत दूर की बात हैं. बहुत से माँ–बाप बच्चों के साथ सीधे मुँह बात तक नहीं करते. ये सच्चाई हैं. बच्चे नादान हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे कुछ समझते ही नहीं. अरे…जब माँ–बाप बच्चों को कुछ समझाएगें, तभी तो बच्चे समझेगें. कोई दूसरा थोड़े ही आएगा, हमारे बच्चों को समझाने के लिए.”
मिनी—“और सबसे बड़ी गलती होती हैं, बच्चे बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें, ये सोचना. अपने आप तो बच्चे बोलना भी नहीं सीखते. बोलना भी सिखाना पड़ता हैं. फिर हम ये कैसे सोच लेते हैं, बड़े होकर बच्चे अपने आप समझदार हो जाएँगें ?”
जयशर्मा—“और माँ–बाप के बच्चों की बात नहीं सुनने का फायदा गलत लोग उठाते हैं. माँ–बाप तो अपने बच्चों की बात सुनकर बच्चों को कुछ समझाना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि बच्चे मुर्ख हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे नासमझ हैं, बच्चों को समझाने का कोई फायदा नहीं हैं. बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें. लेकिन गलत लोग बच्चों की बात सुनकर बच्चों को गलत बातें बहुत अच्छी तरह प्यार से समझा देते हैं और बच्चे खुशी–खुशी गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. यहीं आपकी डॉली के साथ हुआ हैं.”
मिनी—“और हाँ, बच्चों को डरा–धमकाकर या पिटाई करके तो हम कभी बच्चों को सही रास्ते पर नहीं चला सकते. जब तक बच्चों के मन में हमारा डर होता हैं, तब तक बच्चे चोरी–छिपे गलतियाँ करते हैं और जब बच्चों के मन से डर निकल जाता हैं, फिर बच्चे किसी की परवाह किये बिना मनमानी करने लगते हैं.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“शायद आपकी बात ठीक हैं. ऐसी गलतियाँ तो हमसे भी हुई हैं. लेकिन मनुष्य क्या करें ? जीवन में घर–परिवार भी होता हैं. रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती हैं. कारोबार देखना भी जरूरी हैं. जीवन में इतनी भागदौड़ होती हैं, कभी–कभी हम भविष्य पर विचार नहीं कर पाते.”
मिनी—“देखिये, जीवन में सब कुछ जरूरी हैं, इसलिए हमें सभी बातों में संतुलन बनाकर करना चाहिए. जब हम किसी एक बात पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देते हैं और दूसरी बात को हल्के में ले लेते हैं, तब संतुलन बिगड़ जाता हैं.”
राजलक्ष्मी—“आपकी बात सही हैं. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ? हम तो बेटी को अपना जीवन बर्बाद करते देखकर कुछ समझ नहीं पाए और जो बातें आप लोग बता रहे हैं, वो सारी गलतियाँ हम कर बैठे हैं. अब तो अगर आप लोग कहो, तो हम डॉली से माफ़ी माँग लेते हैं.”
जयशर्मा—“अरे, कैसी बातें कर रही हैं आप ? ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं हैं. डॉली को प्यार और अपनेपन की जरूरत हैं, डांट और डंडे से पिटाई की जरूरत नहीं हैं. आप लोग बस उसे प्यार और अपनापन दो. माफ़ी–वाफ़ी की कोई जरूरत नहीं हैं.”
मिनी—“डांट और पिटाई से बच्चों को डराने की जगह हमें बच्चों को हर एक समझाने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे फिर कभी नहीं बिगड़ते. बस हमारे समझाने का तरीका ऐसा हो, कि बच्चों को हमारी बातें भाषणबाजी या लेक्चरबाजी ना लगे.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, डांट और डंडे से पिटाई तो बहुत कर चुके हैं और उसका परिणाम भी देख लिया हैं.”
मिनी—“अब पुरानी बातें भूल जाईये, भाई साहब. जो होना था, वो तो हो गया. उस पर अफ़सोस करने से कुछ नहीं मिलने वाला.”
जयशर्मा—“और हाँ, इस बार उस लड़के के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके डॉली ने कुछ गलत नहीं किया. अगर इन घटिया और बेकार लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग इसी तरह बिना किसी डर के किसी ना किसी मासूम को अपना शिकार बनाते रहेंगे. फोर एग्लामपल ये घटिया लड़के, ये बेकार आदमी लड़कियों और महिलाओं के शरीर पर वहाँ कुछ गलत हरकत करते हैं, जहाँ लड़की या महिला को बताने में शर्म महसुस होती हैं. पहली बात तो हैं, ज्यादातर लड़कियाँ और महिलाएँ कुछ बोलती ही नहीं हैं, बस चुपचाप सहन करती हैं. अगर कोई हिम्मत वाली लड़की या महिला बोलकर विरोध करें, तो ये घटिया और बेकार लोग कहते हैं, बताओ जरा, हमने किया क्या हैं ? लड़की या महिला शर्म के कारण सब कुछ साफ़–साफ़ नहीं बता पाती और ये घटिया लोग लड़की या महिला को गलत साबित करके हँसते हुए निकल जाते हैं. लड़कियों और महिलाओं का ये शर्म करके चुप रहना ही, इन घटिया लोगों की ताकत हैं. जिस तरह डॉली ने हिम्मत करके उस लड़के की एक–एक गलत और गन्दी बात पूरी डिटेल के साथ फेसबुक पर पोस्ट की हैं. अगर हर लड़की और हर महिला इसी तरह घटिया और गन्दे लोगों की हर बात कोई शर्म किये बिना सबको बताने लगे, तो इन घटिया और बेकार लोगों के मन में भी एक डर पैदा होगा. और ऐसा सिर्फ वहीं लड़की कर सकती हैं, जो बहुत अच्छी हो, जो खुद गलत ना हो. जो लड़कियाँ खुद जान–बुझकर लड़कों के चक्कर में फँसती हैं, वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए हमें डॉली जैसी अच्छी और हिम्मत वाली लड़कियों की मदद करनी चाहिए. ताकि दूसरी अच्छी लड़कियों को भी गलत लोगों के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत मिले.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“ये सब कहने की बातें हैं, जयशर्मा जी. हम रोज भुगत रहे हैं.”
जयशर्मा—“आप इसलिए भुगत रहे हो, क्योंकि आपकी और आपकी बेटी की कोई गलती ना होते हुए भी आप लोग खुद को गलत मानते हो.”
मिनी—“और भाई साहब, कहने वाले तो टीवी पर राज के साथ इनका नाम आने के बाद हमें भी बोल रहे हैं. लेकिन हम उन कहने वालों को सही और सटीक जवाब देते हैं. उनसे पूछते हैं, गलत करने वाला बुरा होता हैं या जिसके साथ गलत हुआ हो, वो बुरा होता हैं ? जो अच्छे और समझदार लोग हैं, वो हमारी बात समझ जाते हैं और गलत लोग इसलिए नहीं समझते, क्योंकि उनको गलत रास्ते पर ही चलना हैं.”
जयशर्मा—“हाँ, बिल्कुल.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन लोगों के मुँह तो फिर भी बन्द नहीं होते ना.”
जयशर्मा—“देखिये साँवरमल जी, डॉली ने किसी को धोखा दिया नहीं हैं. डॉली ने किसी से धोखा खाया हैं. तो फिर आप क्यों शर्मिन्दगी महसुस करते हो ? अगर डॉली गलत रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चल रही हैं, तो आप बस उसकी मदद करो. अगर लोग आपके सामने कुछ बोलते हैं, तो उनको जवाब दो. हाँ, पहले कुछ वजह थी, कुछ कारण थे, इसलिए हमारी बेटी भटक कर गलत रास्ते पर चली गई. और हमारी बेटी भटक गई थी, बिगड़ी नहीं थी. हमारी बेटी ने किसी का बुरा नहीं किया. हमारी बेटी के साथ बुरा हुआ था. लेकिन अब उसने सही रास्ता पकड़ लिया हैं. इसके बाद दुनिया कुछ भी कहें, दुनिया की परवाह मत करो. लोग कुछ ना कुछ तो कहते ही हैं और इन कहने वालों का कोई ईलाज नहीं हैं. जब हमारी शादी हुई थी, उस वक्त हमें भी लोग बहुत कुछ कहते थे. मुझे कहते थे, ये जयशर्मा तो अन्टी का दीवाना हैं. मिसेज को कहते थे, मिनी ने एक बच्चे को फँसा लिया. और भी बहुत कुछ कहते थे. लेकिन हमें पता था, हमने कुछ भी गलत नहीं किया. अपने घरवालों की मरजी से, सारे रीति–रिवाजों के साथ शादी करके हम पति–पत्नी बने हैं. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो करने दो. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, तो हम क्यों लोगों को सफाई देते फिरे ? हाँ, हमारे सामने कुछ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी. यहीं बात मैं आप लोगों से कहूँगा, पहले जो होना था, वो हो गया. अब आगे से पुरानी गलती नहीं दोहराएँगें. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो उनको करने दो. लोगों को बातें करके खुश हो लेने दो.”
राजलक्ष्मी—“लेकिन भाई साहब, लड़की के बारे में ये सब जानने के बाद लड़की से कौन शादी करता हैं ? आपकी बातें सारी ठीक हैं, लेकिन दुनियादारी और समाज को भी तो देखना पड़ता हैं.”
मिनी—“हाँ, आपकी बात सही हैं. लेकिन दुनिया में अच्छे और समझदार लोग भी बहुत हैं. जो लोग डॉली की नासमझी के कारण की हुई गलती को माफ़ करके डॉली की अच्छाईयाँ देखेंगे, उनको कोई प्रोब्लम नहीं होगी, डॉली को अपने घर की बहू बनाने में.”
जयशर्मा—“और अभी आप लोग डॉली की शादी के बारे में मत सोचो. वो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं, इसमें उसकी मदद करो. अभी उसे हम सबके साथ की जरूरत हैं. शादी हो जाएगी, टाइम आने पर.”
मिनी—“और इस बार तो किस्मत अच्छी थी, जो डॉली के पास पैसे नहीं थे. राज को वो बस स्टैण्ड पर बैठी मिल गई और राज उसे अपने साथ ले आया. वरना वो तो ये शहर छोड़कर कहीं ओर जा रही थी.”
सेठ साँवरमल बागड़ी ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—“हे भगवान………”
जयशर्मा—“अब छोड़ो, इन सब बातों को. आपको अगर डॉली को कैद ही करना हैं, तो उसे प्यार और अपनेपन की जंजीर में बाँध कर अपने दिल के कमरों में कैद कीजिये. किसी को कैद करने के लिए सबसे अच्छी चीज होती हैं, प्यार और अपनेपन की जंजीर. जब हम किसी को प्यार और अपनेपन की जंजीरों में बाँध लेते हैं, फिर वो खुद ही कभी इन जंजीरों से आजाद नहीं होना चाहता.”
राजलक्ष्मी—“ठीक हैं, भाई साहब. आपकी ये बात हम जरूर ध्यान में रखेंगे. लेकिन डॉली को बुला तो दीजिये. पाँच दिन से आँखें तरस गई, उसे देखने के लिए.”
सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, उस पर हाथ उठाकर हम अन्दर ही अन्दर कितना रोते हैं ? ये हम ही जानते हैं. जब से वो घर से गई, हमारा तो खाना–पीना सब छुट गया.”
जयशर्मा—“ओह…फिर तो आज का खाना आप हमारे यहाँ ही डॉली के साथ बैठकर खाओ.”
राजलक्ष्मी—“नहीं–नहीं, भाई साहब.”
मिनी—“नहीं–नहीं क्या ? कोई बहाना नहीं चलेगा. अब आप लोगों ने खाना खाए बगैर जाने की जिद की, तो हम डॉली को भी नहीं ले जाने देगें.”
जयशर्मा—“अब इनके सामने मेरी भी नहीं चलती. पहले ही बता देता हूँ.”
सेठ साँवरमल बागड़ी मुस्कुराकर बोले—“ठीक हैं.”
मिनी सोफे से उठकर बोली—“आप लोग बातें करो. मैं खाने की तैयारी करती हूँ.”
राजलक्ष्मी खड़ी होते हुए बोली—“चलिये, मैं भी आपकी कुछ मदद कर दूँ.”
मिनी—“अरे, आप बैठिये, आपकी बेटी हैं ना. मदद के लिए. वो अब हमारे घर की सदस्य बन गई हैं.”
राजलक्ष्मी वापस बैठ गई. मिनी खाना बनाने में मदद के लिए डॉली और सृष्टी को बुलाने सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.
सवा तीन महिने बाद आठ अक्टूबर, रविवार को शाम के पाँच बजे डॉली और राज एक पार्क में आकर एक बैंच पर बैठ गए.
राज—“तो गाड़ी लाने से मना कर दिया क्या तुम्हारे मम्मी–पापा ने ?”
डॉली—“नहीं यार, वो तो खुद कहते हैं, जब गाड़ी हैं, तो बस में क्यों जाती हो ?”
राज ने मजाकियाँ लहजे में कहा—“वहीं तो ! तुम्हारा असली घर तो तुम्हारी गाड़ी थी और तुमने वहीं लानी बन्द कर दी.”
डॉली—“मजाक मत करो.”
राज ने हँसकर कहा—“अच्छा–अच्छा, लेकिन तुमने गाड़ी लाना बिल्कुल ही बन्द क्यों कर दिया ? जब कहीं आना–जाना हो, तब तो ले आया करो.”
डॉली—“नहीं, बिल्कुल बन्द थोड़े ही किया हैं. पापा के साथ ऑफ़िस आना–जाना गाड़ी से ही करती हूँ. कभी मम्मी को कहीं ले जाना हो और ड्राईवर ना हो, तो गाड़ी ले जाती हूँ. बस पहले की तरह फालतू में गाड़ी ले जाना बन्द कर दिया. पापा से पॉकेट–मनी की जगह सैलरी लेती हूँ और उस सैलरी से अपना खर्च चलाती हूँ. जब मैं अपनी कमाई पर गाड़ी मैनेज करने लायक हो जाऊँगी, फिर ले लूँगी गाड़ी.”
राज—“चलो, अच्छी बात हैं. और तुम्हारे ऑफ़िस में स्टाफ के लोग तुम्हें क्या कहते हैं ? सिर्फ डॉली या डॉली मैडम ?”
डॉली—“दोनों.”
राज—“एक महीना हो गया, तुम्हें जॉब करते हुए ?”
डॉली—“नहीं, पिछले महिने पन्द्रह से ही जॉइन किया था.”
राज—“तो कौनसी जॉब ज्यादा अच्छी लगी ? सेठ जी के पास या तुम्हारे पापा के पास ?”
डॉली—“हम्म…जॉब के हिसाब से सोचा जाए, तो पापा के पास ज्यादा सही हैं. वैसे जय अंकल के पास ज्यादा अच्छा लगता था.”
राज—“हम्म…अभी नई–नई हो ना वहाँ. धिरे–धिरे वहाँ भी मन लग जाएगा.”
डॉली—“अरे, मन तो लग गया. लेकिन वहाँ पापा और एक–दो लोगों के सिवा कोई मेरे काम पर ध्यान ही नहीं देता.”
राज—“कोई बात नहीं, जो लोग ध्यान देते हैं, उनसे हेल्प ले लिया करो.”
डॉली—“फिर भी यार, थोड़ा अजीब सा लगता हैं. मैं तो यहाँ जय अंकल के पास ही जॉब करना चाहती थी. लेकिन जय अंकल ने कहा, जब तुम्हारे पापा का इतना बड़ा बिजनेस हैं, तो हमारे पास जॉब क्यों कर रही हैं ? पहले तो मैनें बोल दिया, वहाँ कोई मेरे काम पर ध्यान नहीं देगा, बस पापा के कारण सब तारीफ करेंगे और मेरी हाँ में हाँ मिलाएँगें. लेकिन पिछले महिने जब पापा की तबीयत खराब हुई, तो जय अंकल और मिनी अंटी ने कहा, तुम्हारे होते हुए इस उम्र में तुम्हारे पापा अकैले सारा बिजनेस संभालते हैं, ये अच्छा नहीं लगता. अगर तुम अभी उनका बिजनेस जॉइन नहीं करना चाहती, तो उनके पास जॉब कर लो. पॉकेट मनी लेना तो तुमने पहले ही बन्द कर दिया हैं. जो सैलरी हम तुम्हें देते हैं, वहीं सैलरी अपने पापा से ले लेना. इस तरह तुम सेल्फ डिपेन्ड भी रहोगी और अपने पापा की मदद भी कर दोगी. दूसरी जगह नौकरी करने से कोई ज्यादा आत्मनिर्भरता थोड़े ही आ जाती हैं, वो तो इन्सान पर निर्भर करता हैं. और फिर आगे चलकर तुम्हें अपने पापा का बिजनेस ही तो संभालना हैं. तुम वहाँ जॉब करोगी तो अनुभव मिलेगा. हमारा तो ज्वैलरी का बिजनेस हैं. हमारे पास जॉब करोगी तो बाद में तुम्हारे पापा का बिजनेस जॉइन करने के लिए तुम्हें शुरू से दुबारा मेहनत करनी पड़ेगी. इसलिए अपने पापा के पास जॉब करो और उनका सहारा बनो. तुम काबिल लड़की हो, अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करो.”
राज—“सेठ जी और मिनी मैडम की बातें तो बिल्कुल सही हैं. और अब तो तुम्हारी अपने मम्मी–पापा के साथ चल रही सारी प्रोब्लम भी खतम हो गई. इसलिए तुम्हें भी अपना फर्ज निभाना चाहिए.”
डॉली—“हाँ, इसलिए तो मैनें जय अंकल और मिनी अंटी की बात मानकर पापा के साथ ऑफ़िस जाना शुरू कर दिया.”
राज—“ये भी सही हैं. वैसे तुम खुश हो ना, अब अपनी जिन्दगी में ?”
डॉली—“खुश ! मैं तो बहुत खुश हूँ. अब तो मेरे मम्मी–पापा मेरा इतना ख्याल रखते हैं, बस पूछो मत. उनका प्यार देखकर मुझे बहुत अफ़सोस होता हैं. काशः मैं पहले ही सुधर जाती.”
राज—“अफ़सोस क्यों करती हो ? जब सब कुछ ठीक हो गया हैं, तो खुश रहो और अपने मम्मी–पापा को भी खुश रखो.”
डॉली—“हाँ, और सब कुछ ठीक जय अंकल, मिनी जी और तुम्हारे कारण हुआ.”
राज—“मैनें क्या किया ? मैनें तो बस उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कहा था. सब कुछ किया तो तुमने ही हैं और फिर सेठ जी और मैडम ने तुम्हारे घर की प्रोब्लम सुलझा दी, तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाकर.”
डॉली—“हाँ, जय अंकल और मिनी अंटी का ये एहसास तो मैं कभी नहीं भूलूगीं. लेकिन मेरे बारे में उनको सब बताया तो तुमने ही था ना.”