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पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग
पुस्तक में योनि पूजा के बारे में और भी बहुत सारा ज्ञान था तो मैंने कुछ पन्ने पलटे तो उसमे यज्ञ के बारे में बहुत सारा ज्ञान था उसमे से कुछ हिस्सा जो मुझे काफी रोचक लगा निम्न है
प्राचीन काल में भारत भूमि में घर घर यज्ञ होते थे। नित्य यज्ञ के अतिरिक्त कुछ उत्सव,पर्व, त्यौहार आदि विभिन्न अवसरों पर बड़े बड़े यज्ञ होते थे। इसके अतिरिक्त किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अनेक विधि विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किये जाते थे। इस प्रकार के यज्ञों तथा उनके सत्परिमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। उनमें से कुछ वृत्तांत हैं—
कूर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 17
ततः कालेन बलिवैंरोचनिः सर्वगम् यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्च्चयामास सर्वगम्।।46।।
ब्राह्मणान्पूजयामास दत्वा बहुतरं धनम् ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाहं महात्मनः।।47।।
विज्ञायविष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचेदितः आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्।।48।।
भावार्थ—स्वयं दैत्यराज बलि ने यज्ञ से यज्ञरूप विष्णु की पूजा की। पुष्कल धनादि से ब्राह्मणपूजन किया व अनेक ब्रह्मर्षि महात्मादि यज्ञ में गये। स्वयं भगवान विष्णु भारद्वाज के कहने सेवामन रूप धारण कर यज्ञ देश गये। इस प्रकार यज्ञ की महिमा अकथनीय है जिसके कारण जगतपिता विष्णु को भी अभ्यागत रूप में दैत्यराज बलि के द्वार पर जाना पड़ा।
शिव महा पुराण, द्वितीय रुद्र संहिता, युद्ध खंड द्वि. अ.
त्रिपुरासुर तथा उसकी सन्तान, शिवजी की अर्चना करके उनकी कृपा से देवों के लिये अजय हो गये। उन असुरों न यज्ञ की हवि भी देवों से छीन स्वयं भोग करना प्रारम्भ किया। दुःखी,पराजित देवताओं ने शिवजी से कष्ट विनाश के लिए प्रार्थना की। शिव ने कहा−कि त्रिपुरासुरकी सन्तति तो मेरी भक्त है, मैं अपने भक्त जनों का विनाश कैसे कर सकता हूँ? शिवजी नेदेवगणों को विष्णु के पास भेज दिया। विष्णु भगवान ने देवगणों का आर्त विनय सुनकर कहा—
विष्णुरुवाच:—
अनेनैव समादेवा यजध्वं परमेश्वरम्।
पुरत्रय विनाशाय जगत्त्रय विभूतये॥25॥
अर्थ—विष्णु भगवान ने कहा−
ऐसे अवसर पर सदा ही देवों ने यज्ञ द्वारा परमेश्वर की आराधना की है, बिना यज्ञ कियेत्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।
सनत्कुमार उवाचः−
अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देव देवस्य धीमतः। प्रेम्णां ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तु वन्सुराः॥26॥
एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम्॥ यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्ण विधयो मुने॥27॥
ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुस्सहस्रशः॥ भूतसंघा महाकायाः शूलशक्ति गदा युधा॥28॥
ददृशुस्ते सुरास्तान वै भूत संघान सहस्रशः॥ शूलशक्ति गदा हस्तान्दण्डचाप शिला युवान्॥29॥
नानाप्रहरणो पेतान् नाना वेष धरांस्तया॥ कालाग्नि रुद्र सदृशान् कालसूर्योपमांस्तदा॥30॥
दृष्ट्वातानब्रवद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरः स्थितान्॥ भूतान्यज्ञपतिःश्रीमात्रुद्राक्षाप्रतिपालकः॥31॥
विष्णु उवाच:—
भूता शृणत मद्वाक्य देव कारयार्थमुद्यता॥
गच्छन्तु त्रिपुर सद्यर्स्वे हि बलवत्तराः॥32॥
गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भंत्वा दैत्यपुरत्रयम॥
पुनर्यया गता भूता गंतुमर्हथ भूतये॥
शिवमहापुराण द्वितीय रुद्र संहिता छठा खण्ड दू. अ.
अर्थ—यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु की बात सुनकर बुद्धिमान देव एवं देवेन्द्र ने उनको प्रणाम करकेकहा कि हे यज्ञेश्वर! हम ऐसा ही करेंगे। ऐसी स्तुति करके सभी देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञपुरुष का यजन किया यज्ञ कि जो−जो विधान हैं सभी को साँगोपाँग सम्पन्न किया ॥26−27॥
इसके उपरान्त यज्ञ कुण्ड से बड़ा भयंकर, विशाल शरीर धारण किये हजारों भूत के संघ उत्पन्नहो गये, जिनके हाथ, युद्ध करने के लिये शूल, शक्ति , गदा आदि अस्त्र शस्त्र धारण किये हुएथे॥28॥
देवताओं ने देखा कि यज्ञ कुण्ड से हजारों भूतों के समूह हाथ में शूल, शक्ति, गदा, चाप, शिलाआदि प्रहार करने वाले विभिन्न अस्त्र धारण कर विभिन्न रंग, रूप वेष धारण किये, कोईकालाग्नि रुद्र के समान, कोई सूर्य के समान यज्ञपति विष्णु भगवान को प्रणिपात (नमस्कार)करते हुए खड़े हैं, उन्हें देखकर विष्णु भगवान बोले—हे देव—कर्य्य करने के लिये उद्यत तैयार)भूतगणों! मेरी बात सुनो—तुम लोग शीघ्र ही त्रिपुर जाओ और वहाँ जाकर दैत्यों के तीनों पुरोंको जला कर, विध्वंस कर, तोड़ फोड़ कर, फिर तुम लोग जहाँ से आये थे, वहीं चले जाओ।
वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत्॥
सर्वदानानिसददौ पालयामास स प्रजाः॥
पुत्रवद्धर्म कामादीन्दुष्ट निप्रहणे रतः॥
सर्वधर्मपरोलोकः सर्वसस्याचमेदिनी॥
नाकाल मरणश्चासी द्रामे राज्य प्रसासति ॥
आग्नेय, पु. अध्या.10 श्लो. 33, 34
अर्थ—राज्याभिषेक होने के बाद भगवान राजा रामचन्द्र जी ने अपने आत्मा स्वरूप वासुदेवभगवान का अश्वमेध यज्ञों द्वारा यजन किया।
रामचन्द्र जी ने सर्व प्रकार के दान दिये, प्रजा का पुत्र के समान पालन किया, दुष्टों का निग्रहण किया।
इससे भगवान् राम के राज्य में सब लोग धर्म में तत्पर रहते थे।
पृथ्वी सम्पूर्ण शस्यों से युक्त रहती थी। न किसी की अकाल मृत्यु होती थी।
बलि ने संग्राम में इन्द्रादि देवताओं को जीत लिया।
उसके उपरान्त−
श्लोक—
वुभुजे व्याहतैश्वर्य प्रबृद्व श्रीर्महावलः।
इयाज चाश्वमेघैः स प्रीणन तत्परः ॥
नारद पु. अ. 10 श्लोक 31
विश्वजित् यज्ञ करके “बलि ने इन्द्र के राज्य को जीत कर” अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मीऔर महान बल से सम्पन्न हो त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान् की प्रीति केलिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध−यज्ञ किये।
महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये। उन्होंने चोर डाकुओं को यथेष्ट दण्डदेकर शासन में रक्खा और दूसरों का सन्ताप दूर करके अपने को कृतार्थ माना। उसके राज्य कालमें यज्ञों की महिमा से पृथ्वी पर बिना जाते बोये अन्न पैदा होता था और वह फल फूलों सेभरी रहती थी। देवराज इन्द्र उनके राज्य की भूमि पर समयानुसार वर्षा करते थे औरपापाचारियों का अन्त हो जाने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से सुरक्षित रहती थी।
च्यवन ऋषि ने आश्विनी कुमारों का यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उन्होंने देवलोक में सुर दुर्लभऐश्वर्य प्राप्त किया, इसका वर्णन भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है:—
यज्ञभागे प्रवर्त्तेतु शास्त्रोक्ते तु विघानतः।
आगतावश्विनौतत्र आहूतौ च्यवनेनतु॥
भवि. पु. ब्रा. पं. अ. 19 श्लोक 66
अर्थ:—शास्त्रोक्त विधि विधान से यज्ञ में भाग देने पर, च्यवन ऋषि के द्वारा बुलाये गयेअश्विनी कुमार, अपना यज्ञ भाग लेने के लिये, वहाँ यज्ञ स्थली में आये।
जब च्यवन ऋषि का यज्ञ पूर्ण हो गया; देवता अपना अपना भाग ग्रहण कर स्वर्ग चले गये।तदनन्तर च्यवन ऋषि को स्वर्ग में अनन्त सुख−साधन प्राप्त हुए।
अथपश्यद्विमानाभं भवनं देव निर्मितम्।
शैय्यासनवरैर्जुष्टं सर्व काम समृद्धिमत्॥
उद्यानवापिभिर्जुष्टं देवेन्द्रेण समाहृतम्।
गोखण्ड सान्निभंरेजे गृहं तद्भुवि दुर्लभम्॥
दृष्ट्वा तत्सर्वमखिलं सहपत्न्या महामुनिः।
सुदंपरमिकांलेभे इन्द्रञ्च प्रशशंसह॥
भवि. पु. ब्रा. प. अ. 19 श्लोक 80,81,83
अर्थ:—“यज्ञ के पूर्ण होने पर” च्यवन ऋषि ने शय्यासनों से युक्त, सब समृद्धियों से विराजमान,देवताओं से निर्मित विमान के समान शोभा वाले भवन को देखा। बाग वापी इत्यादि से युक्त,इन्द्र के द्वारा लाये गये, गोखण्ड के समान आभा से रञ्जित भवन को देखा, जो पृथ्वी परदुर्लभ है।
पत्नी के सहित सब दृश्यों को देखकर मुनि च्यवन ने परम आनन्द पाया और इन्द्र की प्रशंसा की।
कहानी जारी रहेगी
पुस्तक में योनि पूजा के बारे में और भी बहुत सारा ज्ञान था तो मैंने कुछ पन्ने पलटे तो उसमे यज्ञ के बारे में बहुत सारा ज्ञान था उसमे से कुछ हिस्सा जो मुझे काफी रोचक लगा निम्न है
प्राचीन काल में भारत भूमि में घर घर यज्ञ होते थे। नित्य यज्ञ के अतिरिक्त कुछ उत्सव,पर्व, त्यौहार आदि विभिन्न अवसरों पर बड़े बड़े यज्ञ होते थे। इसके अतिरिक्त किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अनेक विधि विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किये जाते थे। इस प्रकार के यज्ञों तथा उनके सत्परिमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। उनमें से कुछ वृत्तांत हैं—
कूर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 17
ततः कालेन बलिवैंरोचनिः सर्वगम् यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्च्चयामास सर्वगम्।।46।।
ब्राह्मणान्पूजयामास दत्वा बहुतरं धनम् ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाहं महात्मनः।।47।।
विज्ञायविष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचेदितः आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्।।48।।
भावार्थ—स्वयं दैत्यराज बलि ने यज्ञ से यज्ञरूप विष्णु की पूजा की। पुष्कल धनादि से ब्राह्मणपूजन किया व अनेक ब्रह्मर्षि महात्मादि यज्ञ में गये। स्वयं भगवान विष्णु भारद्वाज के कहने सेवामन रूप धारण कर यज्ञ देश गये। इस प्रकार यज्ञ की महिमा अकथनीय है जिसके कारण जगतपिता विष्णु को भी अभ्यागत रूप में दैत्यराज बलि के द्वार पर जाना पड़ा।
शिव महा पुराण, द्वितीय रुद्र संहिता, युद्ध खंड द्वि. अ.
त्रिपुरासुर तथा उसकी सन्तान, शिवजी की अर्चना करके उनकी कृपा से देवों के लिये अजय हो गये। उन असुरों न यज्ञ की हवि भी देवों से छीन स्वयं भोग करना प्रारम्भ किया। दुःखी,पराजित देवताओं ने शिवजी से कष्ट विनाश के लिए प्रार्थना की। शिव ने कहा−कि त्रिपुरासुरकी सन्तति तो मेरी भक्त है, मैं अपने भक्त जनों का विनाश कैसे कर सकता हूँ? शिवजी नेदेवगणों को विष्णु के पास भेज दिया। विष्णु भगवान ने देवगणों का आर्त विनय सुनकर कहा—
विष्णुरुवाच:—
अनेनैव समादेवा यजध्वं परमेश्वरम्।
पुरत्रय विनाशाय जगत्त्रय विभूतये॥25॥
अर्थ—विष्णु भगवान ने कहा−
ऐसे अवसर पर सदा ही देवों ने यज्ञ द्वारा परमेश्वर की आराधना की है, बिना यज्ञ कियेत्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।
सनत्कुमार उवाचः−
अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देव देवस्य धीमतः। प्रेम्णां ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तु वन्सुराः॥26॥
एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम्॥ यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्ण विधयो मुने॥27॥
ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुस्सहस्रशः॥ भूतसंघा महाकायाः शूलशक्ति गदा युधा॥28॥
ददृशुस्ते सुरास्तान वै भूत संघान सहस्रशः॥ शूलशक्ति गदा हस्तान्दण्डचाप शिला युवान्॥29॥
नानाप्रहरणो पेतान् नाना वेष धरांस्तया॥ कालाग्नि रुद्र सदृशान् कालसूर्योपमांस्तदा॥30॥
दृष्ट्वातानब्रवद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरः स्थितान्॥ भूतान्यज्ञपतिःश्रीमात्रुद्राक्षाप्रतिपालकः॥31॥
विष्णु उवाच:—
भूता शृणत मद्वाक्य देव कारयार्थमुद्यता॥
गच्छन्तु त्रिपुर सद्यर्स्वे हि बलवत्तराः॥32॥
गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भंत्वा दैत्यपुरत्रयम॥
पुनर्यया गता भूता गंतुमर्हथ भूतये॥
शिवमहापुराण द्वितीय रुद्र संहिता छठा खण्ड दू. अ.
अर्थ—यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु की बात सुनकर बुद्धिमान देव एवं देवेन्द्र ने उनको प्रणाम करकेकहा कि हे यज्ञेश्वर! हम ऐसा ही करेंगे। ऐसी स्तुति करके सभी देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञपुरुष का यजन किया यज्ञ कि जो−जो विधान हैं सभी को साँगोपाँग सम्पन्न किया ॥26−27॥
इसके उपरान्त यज्ञ कुण्ड से बड़ा भयंकर, विशाल शरीर धारण किये हजारों भूत के संघ उत्पन्नहो गये, जिनके हाथ, युद्ध करने के लिये शूल, शक्ति , गदा आदि अस्त्र शस्त्र धारण किये हुएथे॥28॥
देवताओं ने देखा कि यज्ञ कुण्ड से हजारों भूतों के समूह हाथ में शूल, शक्ति, गदा, चाप, शिलाआदि प्रहार करने वाले विभिन्न अस्त्र धारण कर विभिन्न रंग, रूप वेष धारण किये, कोईकालाग्नि रुद्र के समान, कोई सूर्य के समान यज्ञपति विष्णु भगवान को प्रणिपात (नमस्कार)करते हुए खड़े हैं, उन्हें देखकर विष्णु भगवान बोले—हे देव—कर्य्य करने के लिये उद्यत तैयार)भूतगणों! मेरी बात सुनो—तुम लोग शीघ्र ही त्रिपुर जाओ और वहाँ जाकर दैत्यों के तीनों पुरोंको जला कर, विध्वंस कर, तोड़ फोड़ कर, फिर तुम लोग जहाँ से आये थे, वहीं चले जाओ।
वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत्॥
सर्वदानानिसददौ पालयामास स प्रजाः॥
पुत्रवद्धर्म कामादीन्दुष्ट निप्रहणे रतः॥
सर्वधर्मपरोलोकः सर्वसस्याचमेदिनी॥
नाकाल मरणश्चासी द्रामे राज्य प्रसासति ॥
आग्नेय, पु. अध्या.10 श्लो. 33, 34
अर्थ—राज्याभिषेक होने के बाद भगवान राजा रामचन्द्र जी ने अपने आत्मा स्वरूप वासुदेवभगवान का अश्वमेध यज्ञों द्वारा यजन किया।
रामचन्द्र जी ने सर्व प्रकार के दान दिये, प्रजा का पुत्र के समान पालन किया, दुष्टों का निग्रहण किया।
इससे भगवान् राम के राज्य में सब लोग धर्म में तत्पर रहते थे।
पृथ्वी सम्पूर्ण शस्यों से युक्त रहती थी। न किसी की अकाल मृत्यु होती थी।
बलि ने संग्राम में इन्द्रादि देवताओं को जीत लिया।
उसके उपरान्त−
श्लोक—
वुभुजे व्याहतैश्वर्य प्रबृद्व श्रीर्महावलः।
इयाज चाश्वमेघैः स प्रीणन तत्परः ॥
नारद पु. अ. 10 श्लोक 31
विश्वजित् यज्ञ करके “बलि ने इन्द्र के राज्य को जीत कर” अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मीऔर महान बल से सम्पन्न हो त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान् की प्रीति केलिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध−यज्ञ किये।
महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये। उन्होंने चोर डाकुओं को यथेष्ट दण्डदेकर शासन में रक्खा और दूसरों का सन्ताप दूर करके अपने को कृतार्थ माना। उसके राज्य कालमें यज्ञों की महिमा से पृथ्वी पर बिना जाते बोये अन्न पैदा होता था और वह फल फूलों सेभरी रहती थी। देवराज इन्द्र उनके राज्य की भूमि पर समयानुसार वर्षा करते थे औरपापाचारियों का अन्त हो जाने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से सुरक्षित रहती थी।
च्यवन ऋषि ने आश्विनी कुमारों का यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उन्होंने देवलोक में सुर दुर्लभऐश्वर्य प्राप्त किया, इसका वर्णन भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है:—
यज्ञभागे प्रवर्त्तेतु शास्त्रोक्ते तु विघानतः।
आगतावश्विनौतत्र आहूतौ च्यवनेनतु॥
भवि. पु. ब्रा. पं. अ. 19 श्लोक 66
अर्थ:—शास्त्रोक्त विधि विधान से यज्ञ में भाग देने पर, च्यवन ऋषि के द्वारा बुलाये गयेअश्विनी कुमार, अपना यज्ञ भाग लेने के लिये, वहाँ यज्ञ स्थली में आये।
जब च्यवन ऋषि का यज्ञ पूर्ण हो गया; देवता अपना अपना भाग ग्रहण कर स्वर्ग चले गये।तदनन्तर च्यवन ऋषि को स्वर्ग में अनन्त सुख−साधन प्राप्त हुए।
अथपश्यद्विमानाभं भवनं देव निर्मितम्।
शैय्यासनवरैर्जुष्टं सर्व काम समृद्धिमत्॥
उद्यानवापिभिर्जुष्टं देवेन्द्रेण समाहृतम्।
गोखण्ड सान्निभंरेजे गृहं तद्भुवि दुर्लभम्॥
दृष्ट्वा तत्सर्वमखिलं सहपत्न्या महामुनिः।
सुदंपरमिकांलेभे इन्द्रञ्च प्रशशंसह॥
भवि. पु. ब्रा. प. अ. 19 श्लोक 80,81,83
अर्थ:—“यज्ञ के पूर्ण होने पर” च्यवन ऋषि ने शय्यासनों से युक्त, सब समृद्धियों से विराजमान,देवताओं से निर्मित विमान के समान शोभा वाले भवन को देखा। बाग वापी इत्यादि से युक्त,इन्द्र के द्वारा लाये गये, गोखण्ड के समान आभा से रञ्जित भवन को देखा, जो पृथ्वी परदुर्लभ है।
पत्नी के सहित सब दृश्यों को देखकर मुनि च्यवन ने परम आनन्द पाया और इन्द्र की प्रशंसा की।
कहानी जारी रहेगी