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Adultery गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे

पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग

पुस्तक में योनि पूजा के बारे में और भी बहुत सारा ज्ञान था तो मैंने कुछ पन्ने पलटे तो उसमे यज्ञ के बारे में बहुत सारा ज्ञान था उसमे से कुछ हिस्सा जो मुझे काफी रोचक लगा निम्न है

प्राचीन काल में भारत भूमि में घर घर यज्ञ होते थे। नित्य यज्ञ के अतिरिक्त कुछ उत्सव,पर्व, त्यौहार आदि विभिन्न अवसरों पर बड़े बड़े यज्ञ होते थे। इसके अतिरिक्त किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अनेक विधि विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किये जाते थे। इस प्रकार के यज्ञों तथा उनके सत्परिमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। उनमें से कुछ वृत्तांत हैं—

कूर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 17

ततः कालेन बलिवैंरोचनिः सर्वगम् यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्च्चयामास सर्वगम्।।46।।

ब्राह्मणान्पूजयामास दत्वा बहुतरं धनम् ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाहं महात्मनः।।47।।

विज्ञायविष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचेदितः आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्।।48।।

भावार्थ—स्वयं दैत्यराज बलि ने यज्ञ से यज्ञरूप विष्णु की पूजा की। पुष्कल धनादि से ब्राह्मणपूजन किया व अनेक ब्रह्मर्षि महात्मादि यज्ञ में गये। स्वयं भगवान विष्णु भारद्वाज के कहने सेवामन रूप धारण कर यज्ञ देश गये। इस प्रकार यज्ञ की महिमा अकथनीय है जिसके कारण जगतपिता विष्णु को भी अभ्यागत रूप में दैत्यराज बलि के द्वार पर जाना पड़ा।

शिव महा पुराण, द्वितीय रुद्र संहिता, युद्ध खंड द्वि. अ.

त्रिपुरासुर तथा उसकी सन्तान, शिवजी की अर्चना करके उनकी कृपा से देवों के लिये अजय हो गये। उन असुरों न यज्ञ की हवि भी देवों से छीन स्वयं भोग करना प्रारम्भ किया। दुःखी,पराजित देवताओं ने शिवजी से कष्ट विनाश के लिए प्रार्थना की। शिव ने कहा−कि त्रिपुरासुरकी सन्तति तो मेरी भक्त है, मैं अपने भक्त जनों का विनाश कैसे कर सकता हूँ? शिवजी नेदेवगणों को विष्णु के पास भेज दिया। विष्णु भगवान ने देवगणों का आर्त विनय सुनकर कहा—

विष्णुरुवाच:—

अनेनैव समादेवा यजध्वं परमेश्वरम्।

पुरत्रय विनाशाय जगत्त्रय विभूतये॥25॥

अर्थ—विष्णु भगवान ने कहा−

ऐसे अवसर पर सदा ही देवों ने यज्ञ द्वारा परमेश्वर की आराधना की है, बिना यज्ञ कियेत्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।

सनत्कुमार उवाचः−

अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देव देवस्य धीमतः। प्रेम्णां ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तु वन्सुराः॥26॥

एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम्॥ यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्ण विधयो मुने॥27॥

ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुस्सहस्रशः॥ भूतसंघा महाकायाः शूलशक्ति गदा युधा॥28॥

ददृशुस्ते सुरास्तान वै भूत संघान सहस्रशः॥ शूलशक्ति गदा हस्तान्दण्डचाप शिला युवान्॥29॥

नानाप्रहरणो पेतान् नाना वेष धरांस्तया॥ कालाग्नि रुद्र सदृशान् कालसूर्योपमांस्तदा॥30॥

दृष्ट्वातानब्रवद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरः स्थितान्॥ भूतान्यज्ञपतिःश्रीमात्रुद्राक्षाप्रतिपालकः॥31॥

विष्णु उवाच:—

भूता शृणत मद्वाक्य देव कारयार्थमुद्यता॥

गच्छन्तु त्रिपुर सद्यर्स्वे हि बलवत्तराः॥32॥

गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भंत्वा दैत्यपुरत्रयम॥

पुनर्यया गता भूता गंतुमर्हथ भूतये॥

शिवमहापुराण द्वितीय रुद्र संहिता छठा खण्ड दू. अ.

अर्थ—यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु की बात सुनकर बुद्धिमान देव एवं देवेन्द्र ने उनको प्रणाम करकेकहा कि हे यज्ञेश्वर! हम ऐसा ही करेंगे। ऐसी स्तुति करके सभी देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञपुरुष का यजन किया यज्ञ कि जो−जो विधान हैं सभी को साँगोपाँग सम्पन्न किया ॥26−27॥

इसके उपरान्त यज्ञ कुण्ड से बड़ा भयंकर, विशाल शरीर धारण किये हजारों भूत के संघ उत्पन्नहो गये, जिनके हाथ, युद्ध करने के लिये शूल, शक्ति , गदा आदि अस्त्र शस्त्र धारण किये हुएथे॥28॥

देवताओं ने देखा कि यज्ञ कुण्ड से हजारों भूतों के समूह हाथ में शूल, शक्ति, गदा, चाप, शिलाआदि प्रहार करने वाले विभिन्न अस्त्र धारण कर विभिन्न रंग, रूप वेष धारण किये, कोईकालाग्नि रुद्र के समान, कोई सूर्य के समान यज्ञपति विष्णु भगवान को प्रणिपात (नमस्कार)करते हुए खड़े हैं, उन्हें देखकर विष्णु भगवान बोले—हे देव—कर्य्य करने के लिये उद्यत तैयार)भूतगणों! मेरी बात सुनो—तुम लोग शीघ्र ही त्रिपुर जाओ और वहाँ जाकर दैत्यों के तीनों पुरोंको जला कर, विध्वंस कर, तोड़ फोड़ कर, फिर तुम लोग जहाँ से आये थे, वहीं चले जाओ।

वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत्॥

सर्वदानानिसददौ पालयामास स प्रजाः॥

पुत्रवद्धर्म कामादीन्दुष्ट निप्रहणे रतः॥

सर्वधर्मपरोलोकः सर्वसस्याचमेदिनी॥

नाकाल मरणश्चासी द्रामे राज्य प्रसासति ॥

आग्नेय, पु. अध्या.10 श्लो. 33, 34

अर्थ—राज्याभिषेक होने के बाद भगवान राजा रामचन्द्र जी ने अपने आत्मा स्वरूप वासुदेवभगवान का अश्वमेध यज्ञों द्वारा यजन किया।

रामचन्द्र जी ने सर्व प्रकार के दान दिये, प्रजा का पुत्र के समान पालन किया, दुष्टों का निग्रहण किया।

इससे भगवान् राम के राज्य में सब लोग धर्म में तत्पर रहते थे।

पृथ्वी सम्पूर्ण शस्यों से युक्त रहती थी। न किसी की अकाल मृत्यु होती थी।

बलि ने संग्राम में इन्द्रादि देवताओं को जीत लिया।

उसके उपरान्त−

श्लोक—

वुभुजे व्याहतैश्वर्य प्रबृद्व श्रीर्महावलः।

इयाज चाश्वमेघैः स प्रीणन तत्परः ॥

नारद पु. अ. 10 श्लोक 31

विश्वजित् यज्ञ करके “बलि ने इन्द्र के राज्य को जीत कर” अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मीऔर महान बल से सम्पन्न हो त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान् की प्रीति केलिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध−यज्ञ किये।

महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये। उन्होंने चोर डाकुओं को यथेष्ट दण्डदेकर शासन में रक्खा और दूसरों का सन्ताप दूर करके अपने को कृतार्थ माना। उसके राज्य कालमें यज्ञों की महिमा से पृथ्वी पर बिना जाते बोये अन्न पैदा होता था और वह फल फूलों सेभरी रहती थी। देवराज इन्द्र उनके राज्य की भूमि पर समयानुसार वर्षा करते थे औरपापाचारियों का अन्त हो जाने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से सुरक्षित रहती थी।

च्यवन ऋषि ने आश्विनी कुमारों का यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उन्होंने देवलोक में सुर दुर्लभऐश्वर्य प्राप्त किया, इसका वर्णन भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है:—

यज्ञभागे प्रवर्त्तेतु शास्त्रोक्ते तु विघानतः।

आगतावश्विनौतत्र आहूतौ च्यवनेनतु॥

भवि. पु. ब्रा. पं. अ. 19 श्लोक 66

अर्थ:—शास्त्रोक्त विधि विधान से यज्ञ में भाग देने पर, च्यवन ऋषि के द्वारा बुलाये गयेअश्विनी कुमार, अपना यज्ञ भाग लेने के लिये, वहाँ यज्ञ स्थली में आये।

जब च्यवन ऋषि का यज्ञ पूर्ण हो गया; देवता अपना अपना भाग ग्रहण कर स्वर्ग चले गये।तदनन्तर च्यवन ऋषि को स्वर्ग में अनन्त सुख−साधन प्राप्त हुए।

अथपश्यद्विमानाभं भवनं देव निर्मितम्।

शैय्यासनवरैर्जुष्टं सर्व काम समृद्धिमत्॥

उद्यानवापिभिर्जुष्टं देवेन्द्रेण समाहृतम्।

गोखण्ड सान्निभंरेजे गृहं तद्भुवि दुर्लभम्॥

दृष्ट्वा तत्सर्वमखिलं सहपत्न्या महामुनिः।

सुदंपरमिकांलेभे इन्द्रञ्च प्रशशंसह॥

भवि. पु. ब्रा. प. अ. 19 श्लोक 80,81,83

अर्थ:—“यज्ञ के पूर्ण होने पर” च्यवन ऋषि ने शय्यासनों से युक्त, सब समृद्धियों से विराजमान,देवताओं से निर्मित विमान के समान शोभा वाले भवन को देखा। बाग वापी इत्यादि से युक्त,इन्द्र के द्वारा लाये गये, गोखण्ड के समान आभा से रञ्जित भवन को देखा, जो पृथ्वी परदुर्लभ है।

पत्नी के सहित सब दृश्यों को देखकर मुनि च्यवन ने परम आनन्द पाया और इन्द्र की प्रशंसा की।

कहानी जारी रहेगी
 
पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग

महादानी बलि

शुक्राचार्य ने बलि से यज्ञ कराना आरम्भ किया। उस विश्वजित् यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर,सन्तुष्ट हुए अग्नि ने प्रगट होकर ‘बलि को घोड़ों से जुता हुआ रथ’ दिव्य धनुष, त्रोण एवंअमेद्य कवच प्रदान किये। आचार्य की आज्ञा से उनको प्रणाम करके बलि उस रथ पर सवार हुएऔर उन्होंने स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। इस बार उनका तेज असह्य था। देवगुरु बृहस्पति के आदेश सेदेवता बिना युद्ध किये ही स्वर्ग छोड़ कर भाग गये।

—कल्याण चरितांक पृष्ठ 249

सूत जी वानर वंश का वर्णन करते हुए कहते हैं—

बाली यज्ञ सहस्राणां यज्वा परम दुर्जयः।

—ब्र. पुराण उपा. पा. 3 अ. 7

अर्थ—बाली ने सहस्रों यज्ञों का यजन किया ,इससे वह परम दुर्जेय बन गया।

सूत जी ऋषियों से कथा कहते हैं :—

नहुषस्य महत्मानः पितरं यं प्रचक्षते।

प तेष्ववभृथेप्वेव धर्मशीलो महीपतिः॥24॥

आयुरायभवायाग्र य मस्मिन् सत्रे नरोत्तमः।

शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा॥25॥

सत्रमारेमिरे कर्त्तुपृथ्वीवत्सात्ममूर्त्तयाः॥

वभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्य्य महात्मनाम॥26॥

ब्रह्माण्ड पु. पू. भा. प्र. पा. 1 अ.2

अर्थ:—राजा नहुष ने अपने पूर्वजों का अनुसरण कर अनेकों यज्ञ करके अवभृथ (यज्ञान्त) स्नानकिया यज्ञ करने से राजा में श्रेष्ठ नहुष, शान्त और ब्रह्मविद हो गया। उनकी आयु भी बढ़गयी। ब्रह्मचर्य पालन सहित किये हुए उनके यज्ञों से, पृथ्वी वैसी ही वात्सल्यमयी बन गयीजैसे बच्चों के लिये माता होती हैं।

मारकंडेय पुराण में यज्ञों सम्बन्धी अनेक विवरण और वर्णन प्राप्त होते हैं। राजा इन्द्रद्युम्न केपास इन्द्र नीलमणि द्वारा निर्मित एक बड़ी ही मूल्यवान प्रतिमा थी। इसके खो जाने परराजा को बड़ा दुख हुआ। दुखी होकर वह मृत्यु की गोद में जाने लगा तो विद्वानों ने इस दुख सेनिवृत्ति पाने के लिये एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ के फल स्वरूप राजा को वह खोईहुई मणि अनायास ही प्राप्त हो गई।

एक समय असुर प्रबल हो गए। पूर्ण विश्व को जीत कर स्वर्ग पर भी उन्होंने अपना अधिकारजमा लिया। दैत्यराज ने अपना राज्य स्थायी रखने की इच्छा की और इस हेतु वह इन्द्र के पासगया तथा पूछा ‘हमारा राज्य स्थिर कैसे रहे?’ इन्द्र ने सरल भाव से उन्हें यज्ञ करने का आदेशदिया। असुर यज्ञ परायण हो गए। वे यज्ञ करके शक्ति के अधिकारी बन बैठे और अजेय हो गए।विश्व में असुरों का ही राज्य दिखाई देने लगा देवता लोग निर्बल पड़ गए। स्वर्ग का राज्यउनसे छीन लिया गया।

देवों ने भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने असुरों के पास ऐसे ऐसे दूत भेजे जो असुरों को यज्ञन करने की सलाह दें। उन छद्म दूतों ने बड़ा प्रभावशाली वेश बनाकर असुरों से कहा ‘हरे हरेतुम यह पाप क्यों करते हो। यज्ञ में हिंसा होती है। दैत्यों को यह मत उचित लगा और उन्होंनेअपना जीवन अयज्ञ मय बना लिया जिससे वे तेजहीन हो गए। देवों ने उन यज्ञहीन दैत्यों कोपराजित करके स्वर्ग का राज्य वापिस ले लिया।

स्वायम्भुव मन्वन्तर कल्प के प्रथम मन्वन्तर में देवता अनाहार से क्षीण हो रहे थे। देवों केदुर्बल होने से जगत भी नष्ट होने लगा। तीनलोक−चौदह भुवन इस अवस्था में व्याकुलता कोप्राप्त हो रहे थे।

देवों ने कृपासिन्धु से पुकार की। भगवान तो सदैव से दीनों की पुकार सुनने वाले हैं। महर्षिरुचि की पत्नी आकूति से वे प्रकट हुए। उन्होंने अग्निहोत्र की स्थापना की। उन्हीं के नाम सेअग्निहोत्र यज्ञ कहा जाने लगा। यज्ञ से देवों को भोजन प्राप्त हुआ। उन्हें शक्ति प्राप्त हुईऔर वे विजय प्राप्त करके संसार का कल्याण करने में समर्थ हो गये।

तृणावर्त्त राक्षस के निधन के उपरान्त उसके शरीर के संग श्रीकृष्ण भी मूर्च्छित पड़े थे। उसेलाकर नन्द यशोदा शिशु के प्राण रक्षार्थ यज्ञ करना आवश्यक मानकर यज्ञकर्ता को बुला लाते हैं—वे आकर आश्वासन देते हैं—

माशोकं कुरु हे नन्द हे यशोदे व्रजेश्वरी।

करिष्यामि शिशो रक्षांचिर जीवी भवेदयम्॥50॥

—गर्ग संहिता गो. ख. 1 अ.14 श्लोक 50

अर्थ—हे नन्द! हे व्रजेश्वरी यशोदे! शोक मत करें, मैं शिशु की रक्षा (यज्ञ द्वारा) करूंगा, येचिरंजीवी होंगे।

इत्युक्त्वाद्विजमुख्यास्ते कुशाग्रैर्नपल्लवैः॥

पवित्रकलशैस्तोयैस्ऋग्यजुः सामाजैःस्तवैः॥51॥

परेःस्वस्त्ययनैर्यज्ञं कारयित्वा विधानतः॥

अग्निसंपूज्यविधिवद्रक्षां विदधिरेशिशोः॥52॥

—गर्ग. संहिता गो. ख. 141 श्लोक 51−52

अर्थ− ऐसा कह कर द्विज श्रेष्ठ ने कुश, नव पल्लव, पवित्र जल सहित कलशादि यज्ञ पूजनसामग्री मंगाई और ऋक्, यजुः एवं साम के मन्त्रों से हवन किया, स्वास्ति वाचन किया, इसकेउपरान्त विधिपूर्वक यज्ञ कर्म सम्पन्न करके शिशु का प्राण रक्षण किया। 51−52

बहुलाश्व के पूछने पर नारद जी सूर्यवंश के परि विख्यात राजा मरुत के सुप्रसिद्ध यज्ञ कावर्णन करते हुए कहते हैं—

ब्रह्मरुद्रादयोदेवाः सगणास्तत्रागता।

ऋषयो मुनयः सर्वेतस्य यज्ञं समाययु॥13॥

गर्ग. सं. वि. ख. अ. 1

अर्थ—ब्रह्म, रुद्रादि देवता गण समेत उस यज्ञ में पधारे थे, ऋषि मुनि सभी उस यज्ञ में आये थे।

केपिजीवास्त्रिर्क्या तु न बभूवुर्बुभुक्षिताः॥ सर्वे देवास्तु सोमेनह्यजीर्णमुपागता॥18॥

अर्थ—मरुत के उस महायज्ञ में तीनों लोक के कोई भी प्राणी भूखे नहीं रहे। देवगणों को तोसोमरस पीते−पीते अजीर्ण हो गया।

उग्रसेन जी के पूछने पर व्यास मुनि बताते हैं कि किस कर्म के करने से क्या गति मिलती है।

यज्ञ कर्त्ता शक्रलोके वसते शाश्वतीः समाः॥

दानी चान्द्रमसं लोकं व्रती सौरंव्रजत्यलम॥10॥

गर्ग संहिता वि. ख. 9 अ. 1 श्लोक 10

अर्थ—यज्ञ करने वाला इन्द्रलोक में शाश्वत काल तक निवास करता है, दानी चन्द्रलोक औरव्रती सूर्यलोक को जाता है।

अश्वमेध यज्ञ की प्रशंसा सुनकर उग्रसेनजी श्री कृष्ण भगवान के निकट जाकर कहते हैं—

देवदेव जगन्नाथ जगदीश जगन्मय॥

वासुदेव त्रिलोकेश शृणुश्य वचनं मम॥20॥

मत्युत्रेणच कंसेनबालकाश्च सहस्रशः॥

विनापराधेनहरेमारिताश्चमहासुरैः॥21॥

तस्यमुक्तश्च गोबिन्द कथं भवति पापिनः॥

कस्मिंल्लोके गतःकंसो बालघाती बदस्वमाम्॥22॥

तस्यपापेनाहमपि मीतोऽस्मिजगदीश्वर॥

पुत्रस्य पापेनपिता नरके पतति ध्रुवम्॥23॥

कथितंनारदेनाद्यतच्छृणुप्व जगत्पते॥

विप्रहाविश्वहामोध्नो हयमेधेन शुध्यति॥25॥

—गर्ग संहिता अश्व. ख. 10 अ. 7

अर्थ—उग्रसेन ने श्री कृष्णजी से कहा—हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! हे जगदीश! हे जगन्मय! हेत्रिलोकेश! हे वासुदेव! मेरी बात सुनिये॥20॥ मेरे पुत्र महासुर कंस ने हजारों बालकों की बिनाअपराध के ही हत्या की है, हे गोविंद! उसकी मुक्ति कैसे होगी, यह मुझे कहिये और अभीबालघाती कंस मर कर किस लोक में गया है॥21-22॥ हे जगदीश्वर! उसके पापों से मैं बड़ाभयभीत हूँ, क्योंकि पुत्र के पाप से पिता को अवश्य नरक की यातना भुगतनी पड़ती है॥23॥ हेजगत्पते! नारद ने जो मुझ से कहा है सो सुनिये—उन्होंने कहा है, कि अश्वमेध यज्ञ करने से विप्रहत्यारा गौहत्यारा तथा विश्व को वध करने वाला भी शुद्ध हो जाता है।

कृष्ण के आदेश से राजा उग्रसेन ने महा यज्ञ किया।

यदा यजति यज्ञैश्च तदा शून्या वसुन्धरा।

सर्वा भवति राजानं तदा गच्छतिवै जनः॥

यश्च याति जन स्तस्य यज्ञे राज्ञो महात्मनः॥

किमिच्छकै स्तदा राज्ञा सर्वःसम्पूज्यते तदा॥

वि. ध. पु. अ. 137 श्लोक 1,2,3,4,14,15

अर्थ—जब गंधर्वों ने उपदेश दिया, तब राजा पुरूरवा, अपने नगर में जाकर, अग्नि उपासना मेंतत्पर हुए। धर्म के द्वारा प्रजा का पालन करते हुए बहुत यज्ञों द्वारा यजन किया।

सैकड़ों अश्वमेध, हजारों वाजपेय अतिरात्रि, द्वादशाह यज्ञों द्वारा बार बार यजन करकेसप्तद्वीप समुद्रों वाली पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ, आमानुसिक बल से उसने सम्पूर्ण महीतलको जीता।

दुर्भिक्ष, अकाल मरण, व्याधि ये राजा पुरूरवा के राज्य में कहीं भी किसी को नहीं हुआ, उनकेराज्य में सभी अपने धर्म में तत्पर रहते थे सभी मनुष्य सुखी रहते थे।

जब राजा पुरूरवा यज्ञ करते, तभी शून्य वसुन्धरा सब शस्यों से युक्त हो जाती थी। और जोमनुष्य राजा के पास यज्ञ में जाते थे उनकी इच्छा को पूछकर उसे पूर्ण किया जाता था।

गंगा जी के जाह्नवी कहलाने की कथा बड़ी मनोरंजक है। पूर्व काल में कोशिनी के गर्भ में उत्पन्न सुहोत्र पुत्र ‘जह्नु’ ने सर्वमेध नामक महायज्ञ का आयोजन किया। अपना सर्वस्व उन्होंने यज्ञ में होम किया। इस महायज्ञ के पुण्य प्रताप को देखकर सभी देवता बड़े प्रभावित हुए। गंगाजी तो उन्हें पति रूप में वरण करने के लिए अधीर हो गई। ‘जह्नु’ ने गंगाजी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस पर जह्नु और गंगा जी में मनोमालिन्य पैदा हो गया।देवताओं ने इस मनो मालिन्य को अशोभनीय समझ कर दोनों में यह समझौता करा दिया कि गंगाजी जह्नु के घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। ऐसा ही हुआ। तभी से जह्नु पुत्री होने के कारण गंगा जी का नाम जाह्नवी पड़ा।

जिस प्रकार सीता जी की प्राप्ति जनक द्वारा यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई थी,उसी प्रकार वृषभानु की भी राधिका पुत्री की प्राप्ति, यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई। यह कथा पद्म पुराण में आती है।

वृषभानोर्यज्ञभूमौजातासाराधिकादिवा॥

यज्ञार्थशोधितायांचदृष्टासादिव्यरूपिणी॥ —पद्मपुराण चतुर्थ खंड 41

यज्ञ के लिए शोध की हुई भूमि से वृषभानु को राधिका की प्राप्ति हुई।

बलि ने जब शुक्राचार्य जी से पूछा कि इन्द्र को किस प्रकार जीता जाय।

तेनोक्तं बलये राजञ्जय स्पनन्दन लब्धये।

महायज्ञं कुरुष्वाद्य तेन ते विजयो भवेत्॥

स्क. पु. माहे. खं. अ. 17 श्लोक 280

अर्थ—तो शुक्राचार्य जी ने बलि से कहा, विजयी रथ की प्राप्ति के लिए आज महायज्ञ करो।उस महायज्ञ के करने से तुम्हारी विजय होगी।

इन्द्रद्युम्न ने सहस्र यज्ञ किये और वह इन यज्ञों के साथ−साथ परम पुनीत दिव्यता को प्राप्तकरता गया।

श्लोक:—ततः साहस्रिके यज्ञे वाजिमेधे महीपतिः॥

दिने दिने दिव्य गतिवभूव नृपतिस्तदा॥

स्क. पु. वै. खं. 2 ,प्र. म. 2 अ. 17 श्लो. 101

जब राजा का अन्तिम सहस्रवाँ यज्ञ पूर्ण हुआ तो राजा इंद्रद्युम्न दिन−दिन दिव्यावस्था कोप्राप्त होने लगे।

पराशर मुनि ध्रुव भक्त की कथा कहते जा रहे हैं, उसी क्रम में पुलह मुनि ध्रुव को उपदेश करते हैं।

यो यज्ञ पुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्। तस्मिन्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने॥48॥

अर्थ− जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और यज्ञेश्वर हैं, उन जनार्दन के सन्तुष्ट होने पर ऐसा कौनवस्तु है, जो प्राप्त न हो सकती हो।

ऋषिगण राजा वेणु को यज्ञ करने के लिए समझा रहे हैं। उसने अहंकारवश अपने को ही यज्ञ पुरुषघोषित कर यज्ञादि कर्म बन्द करा दिया है।

दीर्घ सत्रेण देवेश सर्व यज्ञेश्वरं हरिम्।

पूजयिष्यामभद्रन्ते तस्यांशस्ते भविष्यति॥17॥

वि.पु.प्र.अश अध्याय 13

अर्थ—तुम्हारा कल्याण हो, देखो, हम बड़े बड़े, यज्ञों द्वारा जो सर्वयज्ञेश्वर देवाधिपतिभगवान् हरि का पूजन करेंगे उसके फल में से तुमको भी (छठा) भाग मिलेगा।

यज्ञेन यज्ञग्रुषो विष्णुः संप्रीणितो नृप।

अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेवप्रदास्यति॥18॥

श्री वि.पु.प्र.अं.13

अर्थ—हे नृप? इस प्रकार यज्ञों के द्वारा यज्ञ पुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हम लोगों केसाथ तुम्हारी भी सकल कामनायें पूर्ण करेंगे।

यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषाँ राष्ट्रे सपूज्यते हरिः।

तेषा सर्वोप्सतावाप्तिं ददाति नृप भू भृताम्॥18॥

श्री वि.पु.अ.13

अर्थ—हे राजन जिन राजाओं के राज्य में यज्ञेश्वर भगवान् हरि का यज्ञों द्वारा पूजन कियाजाता है, वे उनकी सभी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं।

ऋषियों ने राजा वेन से कहा

देह्यनुज्ञां महाराज माधर्मोयातु संक्षयम्।

हविषाँ परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥25॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 13

अर्थ—हे महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिए, जिससे धर्म का क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगतहवि (यज्ञो में हवन की हुई सामग्री) का ही परिणाम है।

पराशर जी मैत्रेय से कथा कहते जा रहे हैं।

प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः।

हविधानाव्महामान येन खंबर्धिताः प्रजाः॥3॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 14

अर्थ—हे महभाग! हविर्धन से उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनवर्हि एक महान प्रजापति थे,जिन्होंने यज्ञ के द्वारा अपनी प्रजा की बहुत वृद्धि की।

राजा सगर ने और्वमुनि से विष्णु भगवान की उपासना का उपाय और−फल पूछा था, उत्तर मेंऔर्व मुनि कहते हैं।

॥और्व उवाच॥

यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येन जपन्नृप।

निघ्नन्नन्यान्दिनस्त्येनं सर्वमूतोयतोहरिः॥10॥

श्री वि.पु.तृ.अं. अ. 8॥

अर्थ—हे नृप यज्ञों का यजन करने वाला पुरुष उन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करनेवाला उन्हीं का जप करता है और (दूसरों की हिंसा करने वाला उन्हीं की हिंसा करता हैक्योंकि भगवान हरि सर्वभूतमय हैं।

इन्द्र पूजा की तैयारी होते देख कृष्ण भगवान अपने बड़े बूढ़ों से पूछते हैं, उत्तर में नन्द जी कहते हैं।

भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।

पर्जन्यस्सर्व लोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति॥23॥

तस्मात्प्रावृष राजानस्सर्वे शक्रं मुदायुताः।

मखैस्सुरेश मचीन्ति वयमन्ये च मानवाः॥24॥

श्री वि.पु.पं. अं. अ.10

अर्थ—यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवी के जल को सूर्य किरणों द्वारा खींच कर सम्पूर्ण प्राणियोंकी वृद्धि के लिये उसे मेघों द्वारा पृथिवी पर बरसाते हैं।

इसलिए वर्षा ऋतु में समस्त राजा लोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्र की यज्ञों द्वाराप्रसन्नता पूर्वक पूजा किया करते हैं।

पराशर जी केशिध्वज और खाण्डिक्य की कथा कहते जा रहे हैं उसी क्रम में—

इयाजसोऽपि सुवहून्यज्ञाञ्ज्ञान व्यपाश्रयः।

ब्रह्मविद्या मघिष्ठान तर्तुं मृत्यु मविद्यया॥12॥

श्री वि.पु.षष्ठ अं.षष्ठ अ.

अर्थ—केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था, तो भी अविद्या (कर्म) द्वारा मृत्यु को पार करने के लियेज्ञान दृष्टि रखते हुए उसने अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया।

स्कन्द पुराण में यज्ञ भगवान के अवतार का वर्णन है। जिस प्रकार भगवान ने राम, नृसिंह,वाराह, कच्छ, मच्छ आदि के अवतार लिये हैं, उसी प्रकार एक अवतार ‘यज्ञ पुरुष’ का भीलिया है। स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और संसार में सर्वत्र घोरअव्यवस्था फैल गई उस अव्यवस्था के फलस्वरूप, सब लोग नाना प्रकार के कष्ट पाने लगे। इसविपन्नता को दूर करने के लिए भगवान ने यज्ञ पुरुष के रूप में अवतार लेने का निश्चय कियाक्योंकि देवताओं की शक्ति वृद्धि करने के लिए यज्ञ के अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं है।

महर्षि रुचि की पत्नी आकूति के गर्भ से यज्ञ भगवान ने जन्म लिया और उन्होंने संसार भर मेंअग्नि होत्र की लुप्त प्रायः प्रथा को पुनर्जीवित किया। सर्वत्र यज्ञ होने लगे। फलस्वरूपदेवताओं की शक्ति बढ़ी और संसार का समस्त संकट निवारण हो गया।

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यज्ञ से सुसन्तति की प्राप्ति

यज्ञों का आश्चर्यजनक प्रभाव, जहाँ मनुष्य की आत्मा, बुद्धि एवं निरोगता पर पड़ता है वहाँ प्रजनन प्रणाली की भी शुद्धि होती है। याज्ञिकों को सुसंतति प्राप्त होती है। रज वीर्य में जो दोष होते हैं उनका निवारण होता है। साधारण और औषधियों का सेवन केवल शरीर के ऊपरी भागों तक ही प्रभाव दिखाता है पर यज्ञ द्वारा सूक्ष्म की हुई औषधियाँ याज्ञिक स्त्री पुरुषों के श्वाँस तथा रोम कूपों द्वारा शरीर के सूक्ष्म तम भागों तक पहुँच जाती हैं और उन्हें शुद्ध करती हैं। गर्भाशय एवं वीर्य कोषों की शुद्धि में यज्ञ विशेष रूप से सहायक होता है।

जिन्हें संतति नहीं होतीं, गर्भ पात हो जाते हैं, कन्या ही होती है, बालक अल्प जीवी होकर मर जाते हैं वे यज्ञ भगवान की उपासना करें तो उन्हें अभीष्ट संतान सुख मिल सकता है। कई बार कठोर प्रारब्ध संतान न होने का प्रधान कारण होता है, वैसी दशा में भी यज्ञ द्वारा उन पूर्ण संचित प्रारब्ध का शमन हो सकता है।

गर्भवती स्त्रियों को पेट से बच्चा आने से लेकर जन्म होने तक चार बार यज्ञ संस्कारित करन का विधान है ताकि उदरस्थ बालक के गुण, कर्म, स्वभाव स्वास्थ्य रंग रूप आदि उत्तम हो।

गर्भाधान, पुँसवन, सीमन्त, जातक यह चार संस्कार यज्ञ द्वारा होते हैं जिनके कारण बालक पर उतनी छाप पहुँचती है जितनी जीवन भर की शिक्षा दीक्षा में नहीं पड़ती। ऋषियों ने षोडश संस्कार पद्धति का आविष्कार इसी दृष्टि से किया था। उस प्रणाली को जब इस देश में अपनाया जाता था तब घर घर सुसंस्कृत बालक पैदा होता था। आज उस प्रणाली को परित्याग करने का ही परिणाम है कि सर्वत्र अवज्ञाकारी, कुसंस्कारी संतान उत्पन्न होकर माता पिता तथा परिवार के सब लोगों को दुख देती है।

सन्तान उत्पादन के कार्य में यज्ञ का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है। जिनके सन्तान होती है, वे अपने भावी बालकों को यज्ञ भगवान के अनुग्रह से सुसंस्कारी, स्वस्थ, बुद्धिमान, सुन्दर और कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले बना सकते हैं। जिन्हें सन्तान नहीं होती है वे उन बाधाओं को हटा सकते हैं जिनके कारण वे सन्तान सुख से वञ्चित हैं। प्राचीन काल में अनेक सन्तान हीनों को, सन्तान प्राप्त होने के उदाहरण उपलब्ध होते हैं,।

अयोध्या नरेश श्री दशरथ जी विप्रों की अनुमति से राजा ने उस यज्ञ पुरुष के हाथ से खीर लेकर प्रसन्नता से सूँघा और अपनी पत्नी को खाने के लिये दे दिया

रानी ने खीर खाकर पति के गर्भ को धारण किया और समय पूरा होने पर पुत्र उत्पन्न किया

करन्धम के पुत्र अवीक्षित, अवीक्षित के मरुत, जो चक्रवर्ती राजा मुए; जिनको, अंगिरा के पुत्र महायोगी संवर्त्त ने यज्ञ कराया था

इस मरुत के यज्ञ के समान किसी का यज्ञ प्रसिद्ध नहीं है। उनके यज्ञ में सभी पात्र स्वर्ण के थे। इनके यज्ञ में सोमपन करके सुरेन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। अधिकतम दक्षिणा पाकर ब्राह्मण हर्षित हो रहे थे। इस महायज्ञ में मरुद्गण परोसने वाले और विश्वेदेव गण सभासद हुए थे

इक्ष्वाकु आदि पुत्रों के पहिले मनु जी निःसन्तान थे, इसलिये महर्षि वशिष्ठ जी ने उनसे मित्रावरुण का यज्ञ कराया

मनु की भार्या श्रद्धा ने, जो उस यज्ञ में पयोव्रत धारण किये हुई थीं—जो विधिपूर्वक केवल दूध पीकर ही यज्ञ संलग्न थीं, वह होताओं के निकट गयी और उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना की कि आप ऐसा होम करें, जिससे मुझे कन्या उत्पन्न हो

मनु ने भगवान वासुदेव का यज्ञ, सन्तान की कामना से किया। इस यज्ञ को करने से उन्हें दश पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनमें इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे।

राजा दिलीप को सन्तान नहीं होती थी। सन्तान के हेतु वे पत्नी सहित (महर्षि) वशिष्ठ गुरु के आश्रम में रहे। वहाँ वे गुरु की गायें चराते थे और आश्रम के यज्ञीय वातावरण में रह कर निरन्तर औषधि सेवन करते रहते−वैसा यज्ञ धूम्र शरीर में प्रवेश करने के स्वर्णिम अवसर प्राप्त करते थे। इस साधना से दिलीप को बड़ा ही प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ।

पुत्र जन्म के विफल हो जाने से भरत ने पुत्र की कामना से मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उन यज्ञ के अन्त में मरुद्गण ने उन्हें भरद्वाज नामक पुत्र दिया, जिसकी उत्पत्ति बृहस्पति के वीर्य और ममता के गर्भ से हुआ था।

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योनि तंत्र साधना

जिन्हे इस विषय पर कोई भी आपत्ति है वो इस अंश के लिए योनि तंत्र नामक पुष्तक पढ़े

निश्चित तौर पर योनि तंत्र काफी रह्स्य पूर्ण है और गुप्त विद्या है और इसे बिना गुरु की आज्ञा, समर्पण के बिना और सहायता के नहीं करना चाहिए. योनि तंत्र साधना सम्पूर्ण तौर पर योनि पूजा पर ही आधारित है .

योनि तंत्र..... सृष्टि का प्रथम बीज रूप उत्पत्ति योनि से ही होने के कारण तंत्र मार्ग के सभी साधक ‘योनि’ को आद्याशक्ति मानते हैं । लिंग का अवतरण इसकी ही प्रतिक्रिया में होता है । लिंग और योनि के घर्षण से ही सृष्टि आदि का परमाणु रूप उत्पन्न होता है । इन दोनों संरचनाओं के मिलने से ही इस ब्रह्माण्ड और सम्पुर्ण इकाई का शरीर बनता है और इनकी क्रिया से ही उसमें जीवन और प्राणतत्व ऊर्जा का संरचना होता है । यह योनि एवं लिंग का संगम प्रत्येक के शरीर में चल रहा है ।

शक्तिमन्त्रमुपास्यैव यदि योनिं न पुजयेत् । तेषा दीक्षाश्चय मन्त्रश्चय ठ नरकायोपेपधते ।। ७ ।।

अहं मृत्युञ्जयो देवी तव योनि प्रसादतः । तव योनिं महेशनि भाव यामि अहर्निशम् ।। ८ ।।

योनी तंत्र के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का निवास प्रत्येक नारी की योनी में है । क्योंकि हर स्त्री देवी भगवती का ही अंश है । दश महाविद्या अर्थात देवी के दस पूज्नीय रूप भी योनी में निहित है ।अतः पुरुष को अपना आध्यात्मिक उत्थान करने के लिए मन्त्र उच्चारण के साथ देवी के दस रूपों की अर्चना योनी पूजन द्वारा करनी चाहिए । योनी तंत्र में भगवान् शिव ने स्पष्ट कहा है की श्रीकृष्ण, श्रीराम और स्वयं शिव भी योनी पूजा से ही शक्तिमानहुए हैं ।

भगवान् राम, शिव जैसे योगेश्वर भी योनी पूजा कर योनीतत्त्वको सादर मस्तक पर धारण करते थे । योनी तंत्र में कहा गया है क्यों कि बिना योनी की दिव्य उपासना के पुरुषकीआध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है ।

सभी स्त्रियाँ परमेश्वरी भगवती का अंश होने के कारण इस सम्मान की अधिकारिणी हैं । अतः तंत्र साधक हो या फीर आम मनुष्य कभी भी स्त्रियों का तिरस्कार या अपमान नहीं करना चाहिए

मैं काफी लंबे समय के लिए पुस्तक से चिपके हुए थी और विस्तृत यज्ञ प्रक्रियाओं में तल्लीन थी , और उत्सुकता से पुराण से निकाले गए अंशो और छंदों को पढ़ रही थी निम्न अंश मुझे दिलचस्प लगे :

महादेवी पार्वती और भगवान शिव के बीच संवाद: दस महाविद्या, काली, तारा, सोडासी, छिन्नमस्तका, भगलामयी, मातंगी, भुवनेश्वरी, महालक्ष्मी के रूप में योनी तंत्र के तीसरे पटल में सूचीबद्ध हैं और योनी के विभिन्न भागों से जुड़ी हैं। महाविद्या की यह सूची टोडाला तंत्र में भिन्न है।

एक योनि साधक कालिका की पुत्र के तौर पर प्रसिद्ध हो जाता है. देवी योनी का आधार है और नागानंदिनी आप ही योनी में है। काली और तारा योनी चक्र में हैं और छिन्नमस्तका योनि के बालो में हैं । बागलामुखी और मातंगी, योनी के रिम पर हैं। महालक्ष्मी, षोडशी और भुवनेश्वरी योनी के भीतर हैं। योनी की पूजा करके एक निश्चित रूप से शक्ति की ही पूजा की जाती है। महाविद्या, मंत्र और मंत्र की तैयारी योनी की पूजा के बिना सिद्धि नहीं देती है।

योगी को तीन बार फूलो के साथ योनी के सामने झुक कर प्रणाम करना चाहिए, अन्यथा महेश्वरी 1000 जन्मों की पूजा बेकार है। शिव स्पष्ट रूप से गुरु हैं और उनकी साथी देवी का असली रूप है।

रजस्वला योनी के साथ ही युगल होना चाहिए ( अर्थात जिसे मासिक धर्म होता हो ऐसी योनि के साथ ही युगल करना चाहिए )

मेरी सबसे प्रिय, अगर सौभाग्य से कोई ब्राह्मण लड़की का साथी है, तो उस व्यक्ति को उस ब्राह्मण कन्या या स्त्री के योनी तत्व की पूजा करनी चाहिए। अन्यथा, अन्य योनियों की पूजा करें।

देवी आप ही सबसे आगे, योनी के केंद्र में स्तिथ हैं है। इस तरह से पूजा करने से, साधक निश्चित रूप मेरे ही बराबर बन जाता है। अन्यथा ध्यान, मंत्रों का पाठ, उपहार या कुलअमृत देने से कोई फायदा नहीं है ? हे दुर्गा, बिना योनी पूजा के, सभी फल रहित हैं।

कैलाश पर्वत के शिखर पर विराजमान, देवों के देव, समस्त सृष्टि के गुरु, दुर्गा- ने -मुस्कुराते हुए, नागानंदिनी ने पुछा । । महासागर का अनुकंपा, भगवान, 64 तंत्रों का निर्माण हुआ है इनमें से प्रमुख के बारे में मुझे बताइए,।

महादेव ने कहा: सुनो, पार्वती, इस महान रहस्य को। यह आप अपनी स्त्री प्रकृति के कारण है कि आप मुझसे लगातार पूछती है । वैसे तो मुझे इसे छुपाना चाहिए। पार्वती, मंत्र पीठ यन्त्र पीठ तंत्र पीठ और योनी पीठ को छुपा कर रखना चाहिए । इनमें से, निश्चित रूप से मुख्य योनी पीठ है, जो मैं आपको मेरे आपके स्नेह के कारण स्नेह से प्रकट करता हूँ । नागानंदिनी, करीब से और ध्यान से सुनो! हरि, हार और ब्रह्मा ---- सृजन, रखरखाव और विनाश के देवता ---- सभी की उत्पत्ति योनी में हुई है। और इसी से वे शक्तिशाली हुए हैं

यदि किसी व्यक्ति के पास शक्ति मंत्र नहीं है, तो उसे योनी की पूजा नहीं करनी चाहिए। यह मंत्र और नरक से मुक्ति देने वाला है। मैं मृत्युंजय हूँ । सुरसुंदरी, मैं हमेशा अपने हृदय कमल में दुर्गा आपकी ही पूजा करता हूं। यह मन को दिव्य और विराट जैसे भेदों से मुक्त करता है। हे देवी! इस तरह से पूजा करने से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।

एक योनी उपासक को शक्ति मंत्र तैयार करना चाहिए। वह धन, पवित्र, ज्ञान और सर्वज्ञता प्राप्त करता है। वह एक करोड़ कल्प के लिए चार मुख वाला ब्रह्मा बन जाता है।

इस बारे में सिर्फ करने बात करने का कोई फायदा नहीं है । यदि कोई व्यक्ति मासिक धर्म के फूलों के साथ पूजा करता है, तो उसके भाग्य पर भी उसका अधिकार होता है। इस तरह से अधिक से अधिक पूजा करने से वह मुक्त हो सकता है। इस प्रकार की मासिक धर्म के फूलो वाली योनी की पूजा करने का फल, दुख के सागर से मुक्ति देने वाला, जीवन और उन्नत जीवन शक्ति है। जिस योनी से मासिक धर्म का रक्त निकलता है वह पूजा के लिए सर्वथा उपयुक्त है।

एक ऐसी योनी की पूजा न करें, जिसमें कभी मासिक धर्म नहीं हुआ है । अगर हर बार एक कुंवारी कन्या की योनि (जिसका कौमार्य भंग) नहीं हुआ है की पूजा करना संभव न हो तो ऐसे योनि की अनुपस्थिति में किसी युवती या किसी सुंदर महिला की धोनी की , बहन की या महिला की योनि या पुतली की पूजा करें। प्रतिदिन योनी की पूजा करें, अन्यथा मंत्र का उच्चारण करें। योनी पूजा के बिना बेकार पूजा न करें।

पार्वती ने कहा: हे दया का महासागर, योनी, जो कि ब्रह्मांड का सार है, की पूजा किस विधि से की जानी चाहिए? साधक को या आप को किस प्रकार योनी की पूजा करनी चाहिए, और यह पूजा कैसे कृपा करती है? यह मुझसे बोलो! मैं अपनी महान जिज्ञासा के कारण यह सब सुनना चाहती हूं।

महादेव ने कहा: एक योनी की पूजा करने की इच्छा रखने वाला साधक को जो कि ब्रह्मांड का रूप है, उसे स्तंभन होना चाहिए और योनी जो कि शक्ति है उसमे प्रवेश करना चाहिए . योनि महामाया है और लिंग सदाशिव है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता है

इसमें कोई संदेह नहीं है। हे दुर्गा इन पर बली, फूल आदि चढ़ाने चाहिए, यदि इसमें असमर्थ हैं, तो शराब के साथ पूजा करें,।

हे दुर्गा। साधक को योनी क्षेत्र में प्राणायाम और मेरी छह अंगों वाली पूजा करनी चाहिए। योनी के आधार पर मंत्र का 100 बार पाठ करने के बाद, लिंग और योनी को एक साथ रगड़ना चाहिए। मैंने अपने सभी साधकों के लिए आगे बढ़ने का तरीका घोषित किया है।

साधक को स्नान करते समय योनी में टकटकी लगानी चाहिए, तो उसका जीवन फलदायी हो जाता है। इसमें कोई शक नहीं है।

एक को अपनी संगिनी की योनी में, उसकी अनुपस्थिति में ही किसी दूसरी युवती की योनि या फिर किसी कुंवारी की योनि और उसकी अनुपस्थिति में अपनी शिष्य की योनि पर श्रद्धा से टकटकी लगानी चाहिए। योनि के माध्यम से ही आनद और मुक्ति मिलती है । भोग के माध्यम से सुख प्राप्त होता है। इसलिए, हर प्रयास से, एक साधक को भोगी होना पड़ता है । देवी , इस तंत्र को कभी प्रकट न करें! इसे दूसरे के शिष्य को या अघोषित को मत दो। महादेवी, योनी तंत्र मेरे तुम्हारे प्रति प्रेम के कारण मैंने प्रकट किया है ।

बुद्धिमान व्यक्ति को हमेशा योनी के दोष, घृणा या शर्म से बचना चाहिए। जब तक कुलचेरा विधि का उपयोग करके योनी की पूजा नहीं की जाती, तब तक एक लाख साधनाएं भी बेकार हैं।

योनी के किनारे पर अमृत चाटना चाहिए, जिससे किसी के शरीर या निवास स्थान में बुराई निश्चित रूप से नष्ट हो जाती है। इससे सब पाप भी नष्ट हो जाते हैं और अभीष्ट फल प्राप्त होता है

योनि साधना के बिना, सभी साधना व्यर्थ है इसलिए, योनी पूजा करें।

महेसनी, गुरु के प्रति समर्पण के बिना कोई सिद्धि नहीं है।

भगवान शिव नें जो महादेवी पार्वती और भारत के ऋषियों नें जो भी मनुष्य को दिया वो अत्यंत श्रेष्ठ और उच्चकोटि का ज्ञान ही था. जिसमें तंत्र भी एक है. तंत्र में एक दिव्य शब्द है 'योनी पूजा' जिसका बड़ा ही गूढ़ और तात्विक अर्थ है. किन्तु कालान्तर में अज्ञानी पुरुषों व वासना और भोग की इच्छा रखने वाले कथित धर्म पुरोधाओं ने स्त्री शोषण के लिए तंत्र के महान रहस्यों को निगुरों की भांति स्त्री शरीर तक सीमित कर दिया. हालांकि स्त्री शरीर भी पुरुष की भांति ही सामान रूप से पवित्र है. लेकिन तंत्र की योनी पूजा सृष्टि उत्पत्ति के बिंदु को 'योनी' यानि के सृजन करने वाली कह कर संबोधित करता है. माँ शक्ति को 'महायोनी स्वरूपिणी' कहा जाता है. जिसका अर्थ हुआ सभी को पैदा करने वाली. उस 'दिव्य योनी' का यांत्रिक चित्र ही 'श्री यन्त्र' है. वो 'महायोनी' ही 'श्री विद्या' हैं.

योनी तंत्र चर्चा का नहीं प्रत्यक्ष सिद्धि का क्षेत्र है. इसलिए तंत्र की खोज करने वाले रहस्य चित्रों को यथारूप न ले कर उसे 'स्वरुप रहस्यानुसार' समझें. योनी तंत्र सृष्टि उत्पत्ति का परा विज्ञान है. न की स्त्री शरीर का अवयव. 'माँ करुणाकारिणी स्वर्ण सिंहासनमयी कामरूपिणी कामाख्या योनी' ब्रह्माण्ड उत्तपत्ति का प्रतीक हैं व शक्ति उतपत्ति का प्रतीक....वो प्रत्यक्ष विग्रह है. जिसकी तुलना किसी अंग विशेष से करना.......'मातृस्वरूपिनी पराम्बा' का घोर अपमान ही होगा.

मुझे पता ही नहीं चला पुस्तक पढ़ते हुए समय कैसे बीता ,

लगभग पौने नौ बजे जब मैं अपना मुँह धो रही थी तब मास्टर-जी और दीपू फिर से प्रकट हुए .

कहानी जारी रहेगी
 
स्ट्रैप के बिना वाली ब्रा की आजमाईश

मास्टर-जी: मैडम, आपकी सभी ड्रेस तैयार हैं।

मैंने अपना चेहरा तौलिये से पूछ कर सूखा लिया , अपने बालों को हल्के से कंघी किया और फिर मास्टर जी के हाथ से ड्रेस का पैकेट लिया और उसे देखने के लिए बिस्तर पर बैठ गई।

मास्टर-जी भी आगे आकर मेरे बिस्तर पर बैठ गए, दीपू हमारे सामने खड़ा था। मैं अपने भीतर कुछ अजीब महसूस कर रही थी क्योंकि मैंने अपनी साड़ी के नीचे पैंटी नहीं पहनी थी और वो दोनो जिन्होंने मुझे थोड़ी देर पहले मेरे साथ और मेरे नितम्बो के साथ खूब छेड़खानी की थी अब मेरे साथ आ गए थे, हालांकि फिलहाल उन्हें मेरे तथ्य को जानने का कोई मौका नहीं था। मैंने पैकेट खोला तो उसमे अलग रखा हुआ और एक छोटा पारदर्शी पैकेट था।

मैंने चोली और स्कर्ट को निकाला ; दोनों सफ़ेद रंग के थे और कपड़े में वास्तव में मखमली थे l कपड़ो की गुणवत्ता उत्तम थी और मुझे उन्हें छू कर अच्छा लगा। जैसा कि उम्मीद थी कि दोनों मेरे विकसित 28- साल की आयु की फिगर के लिए बहुत छोटे लग रहे थे और साथ ही सभी देख कर मुझे अंदाजा हो गया की मैं उस मिनी पोशाक में बहुत सेक्सी दिखूंगी ।

फिर मैंने दूसरा छोटा पैकेट खोले और जैसा मैंने अनुमानित किया था उसमे मेरे अंडरगारमेंट्स थे। मुझे विशेष रूप से ब्रा में दिलचस्पी थी, क्योंकि यह एक स्ट्रैपलेस किस्म थी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं पहना था, लेकिन उनके सामने उस ब्रा को जांचने में मुझे थोड़ी शर्म महसूस हुई।

मास्टर-जी: मैडम, बेहतर होगा यदि आप आप हर चीज का ट्रायल और आजमाईश कर ले हालाँकि जिस तरह से मैंने माप लिया है मुझे लगता है कि सब ठीक होना चाहिए और कपडे आप पर बिलकुल फिट आएंगे ।

मास्टर जी ने " जिस तरह से मैंने माप लिया है " शब्द मेरी आँखों में देखते हुए कहा। मुझे एक बार फिर याद आ गया मास्टरजी ने कैसे मेरा माप लेते हुए मेरे शरीर के साथ खिलवाड़ किया था. मैंने शर्म के मारे जल्दी से अपनी टकटकी मास्टर जी से हटा दी और टॉयलेट की तरफ चल पडी । चूँकि मैं पेंटीलेस थी , मैंने तेजी से चलने की कोशिश की और मुझे महसूस हुआ कि मेरी भारी गाँड मेरी साड़ी के अंदर ज्यादा ही हिल रही थी ।

मैं: प्लीज़ रुको मास्टर जी।

मास्टर-जी: ज़रूर मैडम।

मैंने शौचालय के दरवाजे को बंद कर दिया और पहले दिन जब समीर मेरे पहने हुए कपडे लेने आया था उसी समस्या का सामना किया था मैंने तुरंत वही समस्या फिर महसूस की। उस दिन मुझे उसे अपने घर से लाये हुए कपड़े देने पड़े थे । चूँकि कपड़े रखने के लिए बाथरूम में कोई हुक या डंडा नहीं था, इसलिए मुझे उन्हें दरवाजे के ऊपर रखना पड़ा था , और मुझे लगा केवल इस उद्देश्य के लिए दरवाजे को फ्रेम (चौखट ) से छोटा बनाया गया था मैंने सोचा ओह्ह फिर से नहीं! ।

जब मैंने अपनी साड़ी को खोलना शुरू किया तो चूँकि कोई और वैकल्पिक व्यवस्था तो थी नहीं इसलिए मुझे अपनी नई महा-यज्ञ पोशाक को दरवाजे के ऊपर ही रखना पड़ा । टॉयलेट का फर्श गीला था इसलिए मुझे दरवाजे के बहुत पास खड़ा होना पड़ा। मैंने साड़ी को खोल कर और निकाल कर दरवाजे के ऊपर रखा और मैंने लगा कि मास्टर जी और दीपक डोर टॉप देख रहे होंगे। वे अब निश्चित रूप से जानते थे कि साडी निकालने के बाद अब मैं केवल शौचालय के अंदर केवल अपने ब्लाउज और पेटीकोट पहने हुई थी।

इसक बाद मैंने जल्दो जल्दी अपने ब्लाउज को खोलना शुरू किया और फिर अपने ब्रा को भी खोल दिया। मेरे बड़े, गोल, युवा स्तन मेरी ब्रा से थोड़ा बाहर निकले और फिर मुक्त हुए। क्योंकि मेरे स्तन अब पूरी तरह से नंगे थे तो स्वाभाविक रूप से मेरे निपल्स कठोर होने लगे।

मैंने अपनी सांस रोक कर दरवाजे की ऊपर रखी हुई अपनी साड़ी के ऊपर अपनी पहनी हुई ब्रा और ब्लाउज को उतार कर रख दिया, जबकि मैं यह अच्छी तरह से जानती थी कि इससे दोनों पुरुषों को अब पता चल जाएगा कि मैं अब टॉपलेस अवस्था में शौचालय में खड़ी थी। तभी !

मास्टर-जी: मैडम, क्या वे कपडे ठीक हैं? क्या आपने उन्हें आजमाया है?

मुझे इस अतिश्योक्तिपूर्ण प्रश्न पर इतनी चिढ़ हुई क्योंकि मैं पूरी तरह से जानती थी कि वे बाहर बैठे देख रहे है कि मैंने दरवाजे के ऊपर से अभी तक कोई नया सिला हुआ कपड़ा नहीं लिया है, इसलिए उन्हें आजमाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। मैं इस समय चुप रही और मैंने एक दूसरी पुकार सुनी, अब दीपक!

दीपक: मैडम, कोई दिक्कत?

मैंने महसूस किया कि वे चाहते थे मैं उन्हें बाथरूम के अंदर से अपनी टॉपलेस हालत में जवाब दू ।

मैं: कृपया मुझे एक मिनट दीजिए।

जैसे ही मैंने जवाब दिया, स्वाभिक प्रतिक्रिया (रिफ्लेक्स एक्शन) के तौर पर , मेरा दाहिना हाथ मेरे दृढ नग्न स्तनो पर एक सुरक्षा कवच के रूप में चला गया।

मास्टर-जी: ठीक है, ठीक है मैडम। पर्याप्त समय लीजिये । मैं आपसे ज्यादा चिंतित और उत्सुक हूं। हा हा हा…

अब मुझे अपने स्तन को ढकने की जल्दी थी और इस जल्दी में मैंने ब्रा और पैंटी को एक तरफ खींचा, जो दरवाजे के ऊपर रखी हुई थी। हालाँकि मैं शौचालय के भीतर काफी सुरक्षित थी , फिर भी मैंने उस अवस्था में मौन रहना ही बेहतर समझा। क्योंकि नयी सिली पैंटी को बाथरूम में रखने की कोई जगह या हुक नहीं थी मैंने अपने दांतों के बीच में नई सिली पैंटी को पकड़ने का फैसला किया, और ब्रा पहनने लगी।

चुकी मैंने आज से पहले कभी भी स्ट्रैप के बिना वाली ब्रा नहीं पहनी तो तो स्ट्रैप के बिना सफ़ेद रंग की ब्रा बिना किसी नियमित पट्टियों के साथ मुझे बहुत अजीब लग रही थी, और ये दर भी सता रहा रहा था कही ये नीचे को लटक कर उतर ना जाए पर चुकी आज तक दत्रे के बिना वाली ब्रा पहनी नहीं थी तो उसे पहनने को इच्छा और उत्सुकता भी बहुत थी और इसलिए मैंने पेटीकोट पहने हुए मेंने केवल पैंटी को अपने मुंह से पकडे रखा और स्ट्रैप के बिना वाली ब्रा को उलट पलट कर देखा !

मैं शुरू में अनिश्चित थी कि इस स्ट्रैपलेस को कैसे पहना जाए, लेकिन यह महसूस किया कि मुझे अपने स्तनों के ऊपर कप को ठीक से फिट करना है और फिर नीचे के हुक को प्लग करना है।

इसमें कुछ समय लगा, लेकिन मैंने अपने दृढ स्तन के ऊपर इस ब्रा की लम्बाई को ठीक से फिट करने में कामयाबी हासिल की और पीछे के तीन हुक लगा दिए । मैंने देखा ब्रा मेरे स्तनों पर पूरी तरह से फिट थी और मैंने उसे खींच कर भी देखा पर वो ढीली हो हैकर अपने जगह से नहीं हिली l

मास्टरजी ने अच्छी क्वालिटी के कपडे और इलास्टिक का प्रयोग किया था और बहुत कुशलता से इसे सिया था .. मैंने मन ही मास्टर मास्टर जी की तारीफ़ की .. और सोचा इस छोटी सी जगह में मास्टर जी निश्चित ही अपनी काबलियत बेकार कर रहे हैं . शहर में वो इस तरह की फिटिंग कपडे और सिलाई के लिए अच्छी कमाई कर सकते हैं . ये उनका निर्णय है उन्हें कहाँ क्या करना है l

फिर मैंने अपने को शीशे में देखा तो मैंने पाया कि मेरे पूरे कंधे स्तनों के ऊपर की ऊपरी छाती और स्तनों के बीच की दरार (क्लीवेज) दिखाई दे रही थीं, लेकिन साथ ही साथ मुझे इस बात पर खुशी हुई कि कपों ने मेरे बड़े गोल दूध-कलशो को इस नयी ब्रा ने पर्याप्त रूप से ढक दिया था।

मुझे इस ब्रा के फैब्रिक से भी बहुत आराम महसूस हुआ, जो बेहद चिकनी और मुलायम थी। मैंने अब जल्दी से अपनी कमर पर से पेटीकोट की गाँठ को खोल दिया और उसे फर्श पर गिरा दिया, और चूँकि मैंने नीचे पैंटी नहीं पहनी हुई थी, मैं अब नीचे पूरी तरह से नग्न हो गई थी ।

मैंने जल्दी से पैंटी को अपने दाँतों से निकाल कर हाथ में लिया और एक-एक करके अपने पैरों को उसमें घुसा दिया। बस, फिर!

मास्टर- जी: मैडम, सॉरी टू इंटरप्ट, लेकिन क्या आप ब्रा को मैनेज कर पायी ? चूंकि यह एक नई किस्म है तो आपको कोई मदद तो नहीं ... l

मैं: हाँ, हाँ। बिलकुल ठीक है।

मास्टर-जी: अच्छा, अच्छा। और क्या आपने पैंटी भी आजमा ली है?

कहानी जारी रहेगी
 
परिधान की आजमाईश

संभवत: पहली बार इस नई पैंटी को पहनकर मेरी आवाज में ख़ुशी झलक रही थी। मुझे और सम्बहव्टा मास्टरजी और दीपू को भी पता था कि मैंने उस समय मैंने अंतर्वस्त्रो के अलावा कुछ भी नहीं पहना हुआ था और उन्हें पहने हुए ही मैं मास्टर-जी को उत्तर दे रही थी ।

इसलिए, मैंने दरवाज़े के ऊपर से महायज्ञ में पहने जाने वाली मिनी स्कर्ट को ज़ोर से खींच कर उतार लिया वो आशा के अनुसार बहुत छोटा थी और उसे पहने के बाद मैंने देखा मेरी संगमरमर जैसी गोरी और केते के तने जैसी चिकनी जांघें पूरी तरह से उजागर हो गईं।

मास्टर-जी: स्कर्ट की फिटिंग कैसी है? ठीक है क्या ?

मुझे पता था कि वो देख रहे थे कि स्कर्ट टॉयलेट के दरवाजे के ऊपर से गायब हो गई थी और मास्टरजी और दीपू ने अनुमान लगाया था कि अब मैंने स्कर्ट पहन ली होगी।

मैं: हम्म।

मास्टर जी: मैडम आप बहुत संतुष्ट लग नहीं रहे हो । विशेष रूप से स्कर्ट के साथ कोई समस्या है क्या ?

मैं: नहीं, नहीं। फिटिंग ठीक है। मैं अभी भी इसकी छोटी लंबाई इसके बारे में चिंतित हूँ ...।

मास्टर-जी: ओहो! मुझे पता है लेकिन इसके बजाय आपको भाग्यशाली महसूस करना चाहिए मैडम।

मैं - ऐसा क्यूँ?

जब मैंने जवाब दिया तब मैं अपनी स्ट्रैपलेस ब्रा के ऊपर चोली पहनने वाली थी ।

मास्टर-जी: महोदया, कुछ साल पहले तक महा-यज्ञ में भाग लेने वाली महिलाओं को ... बिलकुल नंगी रहना पड़ता था!

दीपू: सच में मास्टर-जी?

मैंने सुना कि दीपू अपनी नाक से इस में मजे दार मसाले सूंघ रहा है।

मास्टर-जी: दीपू बेटा, यह एक पवित्र जगह है और आपको इसे अलग कोण से नहीं देखना चाहिए।

दीपक: सॉरी मास्टर-जी।

मास्टर-जी: मुझे भी महा-यज्ञ में आने या उपस्तिथ होने की अनुमति नहीं है, लेकिन मैंने कुछ साल पहले एक महिला को पवित्र कुंड से बाहर आते देखा था क्योंकि उस समय मैं किसी काम के लिए आश्रम आया हुआ था.

दीपू: नंगी?

क्या ? ये नंगी शब्द सुन कर मुझे मिनाक्षी की बात याद आ गयी . ईमानदारी से अब मैं भी अपने भीतर जिज्ञासा महसूस कर रही थी. मैं सोचने लगी, मेरे लिए भविष्य के गर्भ में और क्या क्या है

मास्टर-जी: हाँ दीपू।

दीपू: आपके कहने का मतलब है कि आपने आश्रम के मध्य में मैडम जैसी विवाहित महिला को उस टब से निकलते देखा है? और वो भी बिलकुल नग्न

मास्टर-जी: मैंने तुमसे कहा था दीपू…

दीपू: नहीं, नहीं, मैं तो बस ... उत्सुकतावश पूछ रहा था मास्टर-जी!

मास्टर-जी: मैडम, क्या आपने चोली को आजमाने या पहनने की कोशिश की है?

मास्टर जी की बात सुन कर जैसे मैं अचानक नींद से जाएगी और मैंने चोली पहनना शुरू किया और इस बार मैं काफी चकित थी ब्लाउज मेरे आधे स्तन को उजागर कर रहा था। जैसा कि मैंने ब्लाउज को पहना तो देखा मेरे ब्लाउज की चकोर नेकलाइन ने मेरे दोनों स्तनों को उस तरह से ऊपर से उजागर किया था मानो वो उछल कर बाहर आना चाहते हो. ब्लाउज की ऊपरी खुले हुए चकोर ने मेरी छाती और स्तनों के ऊपरी हिस्सों को खोलकर उजागर कर दिया था और जब मैंने पूरी चोली पहन ली तो मैं यह नोट करते हुए चौंक गयी कि नेकलाइन मेरे ब्रा कप के ठीक ऊपर तक गहरी थी।

इसके अलावा, मेरे ब्लाउज का सबसे ऊपरी हुक भी ठीक से बंद नहीं नहीं हो रहा था, क्योंकि थ्रेड लूप बहुत छोटा था। इसलिए मेरे सफ़ेद स्ट्रैपलेस चोली का एक हिस्सा मेरे ब्लाउज के ऊपर भी दिखाई दे रहा था और साथ ही एक इंच से अधिक स्तनों के बीच की दरार भी ढकी हुई न होकर उजागर थी ।

मैं: मास्टर-जी…

मुझे अपनी समस्या व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं मिले।

मैं: बस एक मिनट।

मास्टर-जी: हां, मैडम?

मैंने बाथरूम से बाहर निकलने का फैसला किया और फिर मास्टर-जी के साथ बातचीत की। ऐसा करने से पहले मैंने टॉयलेट में लगे लाइफ साइज मिरर में अपनी छवि को देखा। कम से कम कहें तो उस पोशाक में बहुत सेक्सी लग रही थी।

मैंने अपने ब्लाउज को थोड़ा समायोजित करने की कोशिश की, लेकिन असफल रही , क्योंकि यह मेरे बड़े प्रचुर ग्लोब पर पूरी तरह से फिट था। मैंने टॉयलेट का दरवाजा खोला और बाहर निकल आयी । उम्मीद के मुताबिक दीपू उस सेक्सी ड्रेस में मुझे देख कर खुश हो गया।

दीपक: ऐ आयी ला! मैडम, आप इस सफेद पोशाक में बहुत अच्छी लग रही हैं।

मैंने उसकी टिप्पणी को नजरअंदाज किया और मास्टर-जी को अपने ब्लाउज के शीर्ष हुक की ओर इशारा किया।

मैं: मास्टर जी, मैं इसे बंद नहीं कर सकी

मास्टर-जी: क्यों? क्या हुआ मैडम?

मैंने उनके सामने ही अपने दोनों हाथों को मेरे वक्षस्थल मध्य तक ले आयी और हुक को हुक के पाश में डालने की कोशिश की, लेकिन फिर से विफल हो गयी , क्योंकि धागे का लूप बहुत छोटा था। ( चोली आगे से बंद होती थी )

मास्टर-जी मेरे पास आए।

कहानी जारी रहेगी
 
परिधान

मास्टर-जी मेरे पास आए।

मास्टर-जी: मैडम, ज्यादा जोर मत लगाओ, धागा टूट जाएगा।

मैंने देखा मास्टरजी मेरे उभरे हुए क्रीम रंग के क्लीवेज और साथ ही साथ उस छोटी सी चोली से मेरे ऊपर को निकलते हुए बूब्स को मेरी टाइट ब्रा के ऊपर से घूर रहे थे ।

मास्टर-जी: मैडम मुझे कोशिश करने दो।

इसके बाद मैंने अपने ब्लाउज के ऊपर से अपने हाथों को हटा दिया, मास्टर-जी के हाथों ने उस छोटे चोली में फसे हुए मेरे आमों को थोड़ा दबाया और मास्टर-जी ने हुक को लूप में डाल दिया और मेरे ब्लाउज के ऊपर के लूप के हुक को बंद कर दिया।

मैं: धन्यवाद मास्टर जी।

मुझे अब थोड़ा बेहतर मह्सूस हुआ क्योंकि मेरी ब्रा अब दिखाई नहीं दे रही थी, हालांकि मेरे बूब्स बहुत ऊपर की तरफ थे ।

मास्टर-जी: मैडम, क्या आपकी ब्रा फिटिंग ठीक है ?

मैं: हाँ ठीक है।

मास्टर-जी: चूंकि यह पट्टियों से रहित ब्रा है आप थोड़ा टाइट महसूस कर रहे होंगी ?

इसलिए यह स्वाभाविक रूप से आप को टाइट लग रही होगी ।

वह मुझे सीधे संकेत दे रहा की यह ब्रा मेरे स्तनों पर टाइट रहनी चाहिए .

मैं : नहीं, मेरा मतलब है ... हाँ, लेकिन ठीक है। लेकिन क्यों ?

मास्टर जी: अगर ढीली होगी तो पट्टियों से रहित ब्रा कभी भी गिर ...

4

मैं : टाइट ही ठीक है

मास्टर-जी: वैसे भी, दीपू, मैडम को उसका एक्स्ट्रा कवर दे दो।

मुझे कुछ हटकर लगा। एक्स्ट्रा कवर? वह क्या होता है ? मुझे याद है कि मैंने क्रिकेट कमेंट्री में उस शब्द को सुना था, लेकिन यहाँ किसी भी तरह से क्या करना है, मुझे कुछ ज्यादा समझ नहीं आया। उसके बाद दीपु ने अपनी जेब से लाल कपड़े के दो छोटे गोल टुकड़े निकाल कर मुझे सौंप दिए।

मैं: यह क्या है? मास्टर-जी: मैडम, देखिए। चूँकि आपकी चोली का कपड़ा और ब्रा बहुत मोटी नहीं है, इसलिए यह आपके अंतरंग भागों के लिए अतिरिक्त आवरण का काम करेगा। मैं "अंतरंग भागों" से निश्चित था कि इसका मतलब मेरे स्तन होना चाहिए। लेकिन ... मैंने फिर से अपने हाथों को देखा।

अतिरिक्त कप होने के लिए दो लाल कपड़े का आकार काफी छोटा था

मेरी ब्रा के अंदर सालने के लिए अतिरिक्त कवर। ? मैं हैरान थी और पुष्टि करने की कोशिश की।

में : मास्टर-जी ... मेरा मतलब है ... मुझे लगता है कि ये अंदर डालने के होगा ।

मास्टर-जी: जाहिर है मैडम।

म e: लेकिन ... लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि वे बहुत छोटे हैं?

मास्टर-जी: क्या आपको बड़े आकार की ज़रूरत है ?!

मास्टरजी ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा।

मैं: हां। मैंने काफी सशक्त ढंग से टिप्पणी की।

मास्टर-जी: लेकिन मैडम, क्या आपको पूरा यकीन है?

मैं अब अच्छी तरह से महसूस कर रही थी कि हमारे संवाद में कुछ लिंक गायब हो गए है ये मेरे समजगने में कुछ रह गया है ।

मैं: मास्टर जी, साफ-साफ बताइए, इनका मतलब क्या है?

मास्टर-जी: मैडम, वास्तव में जैसा कि मैंने कहा, चूंकि आपका ब्रा का फैब्रिक काफी पतला है, इसलिए मैंने आपको वो एक्स्ट्रा कवर दिए हैं जो निप्पल ढकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि आप किसी भी समय अभद्र न दिखें।

मैं मास्टर की बात से सुनकर विशुद्ध रूप से दंग रह गयी । मैं दो पुरुषो के सामने हाथो में निप्पल कवर ले कर जब वो मेरे स्तनों को मेरे कड़े हो चुके निप्पलों को घूर रहे थे और उनके साथ मेरे स्तनों और चुचकों के बारे में साफ तौर पर बात करते हुए इतनी शर्म महसूस हुई कि मैं बस फर्श पर देखती रह गयी ।

मास्टर-जी: मैडम, जब आप ने कहा की आपको अभी और भी बड़े आकार के कवर की आवश्यकता है तो मुझे आश्चर्य हुआ था । हा हा हा ...

मैं अपनी मूर्खता पर तुरन्त टमाटर की तरह लाल हो गयी थी ।

दीपू: मैडम, ये इन्हे चिपकाने वाला पदाथ है, जो अतिरिक्त कवर को अपनेी जगह पर स्थिर रखेगा.

यह कहते हुए कि उसने मुझे एक छोटी होमियोपैथी की शीशे की बोतल दी, जिसमें एक पारदर्शी तरल पदार्थ था।

मास्टर-जी: मैडम, यह चिपचिपा नहीं है, इसलिए आप असहज महसूस नहीं करेंगी , लेकिन इससे अतिरिक्त कवर आपके निप्पल से चिपक जाएगा।

मैं अब केवल एक कमजोर "ठीक" ही बड़बड़ा सकती थी ।

मास्टर-जी: मैडम, तो आपकी स्कर्ट और पैंटी में तो की कोई दिक्कत नहीं है ?

मैंने अपने सिर को संकेत दिया कि वे ठीक हैं।

मास्टर-जी: ठीक है हम चलेंगे फिर मैडम।

मैं: ठीक है मास्टर जी।

मास्टर-जी: मैडम हम आपके सफल महा-यज्ञ की कामना करते हैं।

मैं: धन्यवाद।

मास्टर-जी: मैं दीपू के माध्यम से आपकी अतिरिक्त पैंटी भेजूंगा जिन्हे मैं आपके लिए सिलाई करूंगा।

मैं : अच्छा जी?

मैं: ठीक है। बाय मास्टर-जी।

दीपू और मास्टर-जी विदा हो गए और मैं उस सुपर-हॉट ड्रेस को पहन कर कमरे में खड़ा हो गयी जिसमे मैं किसी हिंदी फिल्म की वैम्प या सेक्सी डांस करने वाली आइटम गर्ल जैसी लग रही थी। मैंने दरवाज़ा बंद किया और वापस टॉयलेट में गयी क्योंकि वहाँ दर्पण था। जैसा कि मैंने अपने उजागर शरीर को देखा,

मैंने अपने मन को आश्रम के पुरुषों के सामने जाने के लिए त्यार करने की कोशिश की।

मैंने एक पल के लिए ये भी सोचा कि अगर मेरा पति अनिल मुझे इस तरह की ड्रेस में देखता तो उस पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा । मुझे यकीन था कि ऐसा होने पर उसके साथ चुदाई का एक गर्म सत्र होगा

महा-यज्ञ का भय मुझ पर अभी भी मंडरा रहा था, उसी के परिणाम से मेरा भाग्य तय होगा। मेरी सास, मेरे पति, मेरे अन्य रिश्तेदार - सभी को सकारात्मक परिणाम का इंतजार है और इसलिए मैं यहाँ आयी थी ।

मैंने सभी कोणों से अपने शरीर को जांचा कीमेरे शरीर कितना ढका हुआ है और कितना ढका हुआ नहीं है और मुझे महसूस हुआ कि उस तरह की पोशाक के साथ खुद को ठीक से ढंकना एक निरर्थक कवायद थी। मैं बेडरूम में वापस चला गयाी और अभी भी निराशाजनक रूप से ये जान्ने की कोशिश कर रही थी था कि अगर मैं बैठती हूं या खड़ी होती हूं तो मैं कैसी लगूंगी और देखने वालो को कैसा लगेगा ।

मुझे लगा इस ड्रेस में मैं केवल अश्लीलता और कामुकता का या फिर किसी कामसूत्र जैसे कंडोम का विज्ञापन कर रही थी और यह महा-यज्ञ परिधान मेरे हिलने डुलने के साथ कामुकता को निश्चित रूप से बढ़ा रहा था। मैं आखिरकार इस परिधान से बाहर निकली और फिर से अपनी साड़ी पहनी।

मैंने अपना रात्रि भोजन किया और बीच में निर्मल आकर मेरी महा-यज्ञ पोशाक (बेशक ब्रा और पैंटी सहित ) को शुद्धिकरण के लिए ले गया . उसने मुझे गुरूजी के पास जानेके लिए रात के 10-30 का समय दिया

कहानी जारी रहेगी
 
रात 10:30:00 बजे। जब मैंने गुरु-जी के कमरे में कदम रखना शुरू किया तो मेरा दिल पहले से ही तेज़ धड़क रहा था और स्वाभाविक रूप से मैं बहुत चिंतित थी , । गुरु-जी के कमरे में प्रवेश करते हुए मैं अपने सामान्य आश्रम के ड्रेस वाली की साड़ी में लिपटी हुई थी। जैसे ही मैंने कमरे का दरवाजा खोला, अंदर धुँआ फैला हुआ था। मैंने देखा गुरु-जी को ध्यान मुद्रा में बैठे हुए थे और वहां कोई और नहीं था।

गुरु-जी: आओ रश्मि । आपके इलाज का आखिरी चरमोत्कर्ष आ गया है।

मैं: जी मतलब गुरु-जी

गुरू-जी : ये सम्भवता आपके इलाज का आखिरी पड़ाव होगा

गुरु जी की भारी आवाज मानो कमरे में गूंज रही थी। उन्होंने पूरी तरह से लाल पोशाक पहन रखी थी; ईमानदारी से मुझे उस सेटिंग में मेरे भीतर डर की अनुभूति हो रही थी।

गुरु-जी: रश्मि , आप लिंग महाराज पर विश्वास रखेो और आत्म-विश्वास रखें ताकि आप इस महा-यज्ञ के फल और प्रसाद के रूप में आपको संतान सुख मिले और आप धन्य हो। मैं इसमें सिर्फ माध्यम बेटी हूँ; महामहिम निश्चित ही आपको अभीष्ट फल प्रदान करेंगे और आपका यज्ञ सफल होगा जय लिंग महाराज!

मैं: जय लिंग महाराज!

मैं कमजोर आवाज में बोली शायद जिसे गुरु-जी ने नोट किया।

गुरु-जी: रश्मि , इतना कमजोर क्यों लग रही हो? आपने अपने उपचार के अधिकांश भाग को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। आपको निश्चित रूप से अधिक सशक्त हो बोलना चाहिए।

मैं: जी गुरु-जी।

गुरु-जी: फिर से कहो, जय लिंग महाराज!

मैंने अपनी सारी उत्सुकता को छोड़ने की कोशिश करते हुए दोहराया।

गुरु-जी: ये बेहतर है रश्मि । अब मैं आपको महा-यज्ञ के बारे में जानकारी देता हूं। आपके लिए सबसे पहली बात है कि सबसे पहले आपको स्नान करना और महा-यज्ञ विधान में शामिल होना। फिर हम यज्ञ प्रारंभ करेंगे।

मैं: ठीक है गुरु-जी।

गुरु-जी: उसके बाद मंत्र है ! फिर आश्रम परिक्रमा ! फिर लंग पूजा ! और जैसा कि आप जानते हैं कि चंद्रमा उर्वरता के भगवान है और इसलिए फिर उनकी पूजा होगी । और अंत में हम योनी पूजा में के बाद महा यज्ञ में शामिल होंगे।

मेरा दिल फिर से धड़कने लगा क्योंकि मैंने ये शब्द सुने हुए थे ? जो किताब मैं यहाँ आने से पहले पढ़ रही थी उसमे भी इनका जिक्र था । तभी समीर और विकास कमरे में दाखिल हुए।

गुरु-जी: आओ, आओ। संपूर्ण यज्ञ प्रक्रिया में रश्मि , आज विकास और समीर आवश्यक रूप से आपके साथ होंगे। और मैं तो निश्चित रूप से वहाँ रहूँगा ही । (आपके लिए )

मैंने उनकी तरफ देखा और वे दोनों मुझे देखकर मुस्कुराए, लेकिन मुझे गुरु-जी ने अंतिम दो शब्द नहीं सुनाए - आपके लिए? तीनों आदमी मुझे देख रहे थे और मुझे उस पर थोड़ी शर्म आई।

समीर : मैडम, आपके कपड़े यहाँ हैं।

मैंने पहले ही देख लिया था कि समीर हाथ में एक पैकेट पकड़े हुए था; अब मुझे एहसास हुआ कि उस पैकेट में मेरे महा-यज्ञ परिधान थे ।

गुरु-जी: विकास आप मीनाक्षी को बुला लीजिये ?

उदय: ज़रूर गुरु-जी।

गुरु-जी: रश्मि मीनाक्षी आपको स्नान करने के लिए ले जायेगी ।

मुझे आश्चर्य हुआ कि गुरु-जी ने मीनाक्षी को क्यों बुलाया। मेरे स्नान से उसका क्या लेना-देना है?

मीनाक्षी: जी गुरु-जी?

गुरु-जी: मीनक्षी रश्मि को स्नान के लिए ले जाओ।

बिना और समय को बर्बाद किए मीनाक्षी ने मुझे उसका अनुसरण करने के लिए उसकी आंखों के माध्यम से संकेत दिया। मैं मीनाक्षी के पीछे पीछे अपने हाथ में ड्रेस का पैकेट लेकर गुरु-जी के पीछे बने हुए अटैच्ड टॉयलेट में घुस गयी । हालाँकि मिनाक्षी बाथरूम में जाने के लिए कुछ ही कदम चली थी फिर भी एक महिला होते हुए भी मेरी आँखें उसकी साड़ी के भीतर उसके भारी नितंबों को मटकते हुए देख आकर्षित हुईं .

फिर मेरे लिए सरप्राइज आया। मैंने देखा कि बाथरूम के अंदर दरवाजा मीनाक्षी बंद कर लिया और वो मेरे साथ बाथरूम के अंदर थी .

मैं: आप ??

मीनाक्षी: हाँ मैडम। मैं तुम्हें महा-यज्ञ के लिए स्नान कराऊँगी और तैयार करूँगी ।

मैंने अपने भाग्य को धन्यवाद दिया कि गुरु-जी ने कम से कम इस उद्देश्य के लिए मीनाक्षी को चुना और किसी पुरुष को नहीं चुना । यह वास्तव में मेरे लिए शर्मनाक होता , क्योंकि मैं गुरु के निर्देश का विरोध नहीं कर सकती थी । उच्च शक्ति के बल्बों के साथ शौचालय अत्यधिक रोशन था और अंदर सब कुछ बहुत उज्ज्वल दिखाई देता था। मैंने नोट किया कि एक बाल्टी गुलाब जल भरा हुआ रखा था और उसके बगल में एक बड़ा साबुन दान रखा हुआ था। एक तौलिया पहले से ही दरवाजे के हुक से लटका हुआ था। मीनाक्षी ने महायज्ञ परिधान का पैकेट मेरे हाथ से ले लिया और चोली, स्कर्ट और मेरे अंडरगारमेंट्स निकाल कर दूसरे हुक पर लटका दिए ।.

मीनाक्षी: क्या आपने ये पहन कर देखें हैं ?

मैं: हाँ, लेकिन वे बहुत उजागर करते हैं ...

मीनाक्षी: आप ठीक कह रही हैं मैडम, लेकिन आपको इस बात से सहमत होना चाहिए कि ये महा-यज्ञ को पूरी तरह से नग्न होकर करने से बहुत बेहतर है, जो महायज्ञ के लिए वास्तविक आदर्श है।

ये सुनकर मैं अपनी जिज्ञासा को छिपा नहीं सकी ।

मैं: क्या सच कह रही ही ? आपने देखा है ?

मीनाक्षी: बेशक मैडम, अबसे तीन-चार साल पहले यह ही प्रथा थी।

मैं: लेकिन, यह तो कुछ ज्यादा हो गया ? इतने पुरुषों के सामने?

मीनाक्षी: मैडम, आपको अपना फोकस लगातार बनाये रखना है। आपको केवल अपने लक्ष्य को देखना चाहिए न कि उसके प्राप्त करने के भौतिक पहलुओं पर। आप को ही सकता है ये लगे आप बहुत बेशर्मी से काम कर रहे थे , लेकिन जब आप मातृत्व हासिल करेंगी तो आपको कोई पछतावा नहीं होगा ये मैं आपके साथ शर्त लगा सकती हूं।

मैं मिनाक्षी को प्रणाम करते हुए बोली आप बिलकुल ठीक कह रहे है गुरु-जी! और बिलकुल उनकी ही तरह लग रही है .

कहानी जारी रहेगी
 
स्नान

उसने सहमति में सिर हिलाया और हम दोनों मुस्कुरायी । जब मैं बात कर रही थी, इस बीच मैंने अपनी साड़ी और ब्लाउज खोल दिया था और अपने ब्रा के हुको खोल कर रही थी। मीनाक्षी ने मेरी ब्रा के हुक पीछे से खोलने में मेरी मदद की और मेरे दोनेो आकर्षक दुग्ध कलश मुक्त हो गए। शौचालय में तेज प्रकाश व्यवस्था से निश्चित रूप से मैं हिचकिचा रही थी, क्योंकि मैं विशेष रूप से एक वयस्क के रूप में, इस तरह के प्रश्मान और उज्वल वातावरण में कभी नग्न नहीं हुई थी.

मुझे दीक्षा का समय याद आ गया जब मैंने इसी शौचालय में स्नान किया था, लेकिन तब मैं अकेली थी, लेकिन इस बार मीनाक्षी मेरे साथ थी। यही शायद मुझे और अधिक विचलित कर रहा था । मुझे तुरंत अपनी शादी के बाद हनीमून का दिन याद आ गया जहाँ होटल में संलग्न बाथरूम में मेरे पति अनिल ने ने मुझे नंगा कर दिया था और हम दोनों एक साथ शावर में नहाए थे । वहाँ भी मैंने स्नान करते समय I शौचालय में प्रकाश बंद करवा अँधेरा कर दिया था लेकिन यहाँ ऐसा प्रकाश था जिसमे जैसे किसी किसी अन्य महिला के सामने व्यापक दिन के उजाले में निर्वस्त्र होना हो।

उस समय तक पूरी तरह से नग्न हो गयी थी और मुझे मीनाक्षी की मेरे बदन पर फिरती हुई आँखों में अपने लिए तारीफ़ और वो साथ में उसको होंठो पर प्रशंसात्मक मुस्कराहट थी ।

मीनाक्षी: मैडम, पहले लिंग महाराज की थोड़ी पूजा करिये और फिर आपको अपने पूरे शरीर को गीला करना पड़ेगा.

यह कहते हुए कि वह खुद प्रार्थना की मुद्रा में आ गयी थी और मैंने भी उसे देख वही किया। मेरी एकमात्र प्रार्थना और कामना निश्चित रूप से गर्भवती होने के लिए थी।

उसके बाद मैंने उसे साबुनदान को खोलते हुए देखा, जो निश्चित रूप से मेरे द्वारा इससे पहले देखे गए किसी भी साबुनदान से बड़ा था। मैंने देखा कि साबुनदान में तीन आइटम थी, एक लिंगा की प्रतिकृति जैसी दिखने वाली लम्बी संरचना, एक तेल की बोतल, और कुछछोटे चौकोर नीले कागज जो लिटमस पैर जिसे दिखते थे . जैसे ही मैंने अपने शरीर पर बाल्टी से पानी डाला, ऊऊऊऊह! यह तो बहुत ठंडा है! कहते हुए लगभग कूद गयी .

पानी बेहद ठंडा था जैसे बर्फ हो।

मीनाक्षी: मैडम, जड़ी-बूटियों और पानी में मिलाए गए रसायनों ने इसे इतना ठंडा बना दिया है, लेकिन आप इससे अन्य बहुत सारे लाभ प्राप्त करते हैं।

मैं: ठीक है, लेकिन इसकी बर्फीली ठंड। ऊऊऊऊह!

जैसे ही मैंने अपने शरीर पर पानी डालना शुरू किया, मैंने मीनाक्षी को साबुनदान से निकली सामग्री के बारे में उल्लेख किया।

मैं: वो मीनाक्षी क्या हैं?

मीनाक्षी: मैडम, यह साबुन है, जैसा कि आप देख सकते हैं ये तेल है, और ये आपके शरीर पर लगाए जाने वाले टैग हैं।

हालांकि अंतिम आइटम के बारे में मैं मुझे कुछ पूरी तरह से समझ नहीं आया , लेकिन इससे पहले कि मैं मीनाक्षी से पूछ पाती , उसने विषय को बदल दिया।

मीनाक्षी: मैडम, नीचे आपके बाल इतने घने दिख रहे हैं। आप अपनी चूत को शेव नहीं करती हो?

उसने मेरी चूत पर हाथ फेरा। अचानक उससे आये इस सवाल पर मुझे थोड़ा अजीब लगा, हालाँकि हम महिलाएँ इन मुद्दों पर आपस में काफी खुलकर चर्चा करती हैं, लेकिन चूंकि मीनाक्षी मेरी कोई दोस्त या रिश्तेदार नहीं थी, इसलिए मुझे शर्म आ रही थी।

मैं नहीं? मेरा मतलब है हाँ, मैं वहां शेव नहीं करती ।

मीनाक्षी: क्या आप इनको ट्रिम (छोटे या काट- छांट ) भी नहीं करती ?

मैं: हाँ, हाँ, हालांकि नियमित रूप से नहीं।

मीनाक्षी: हम्म, फिर यह इतना घना क्यों दिख रहे है!

इसके बाद हम दोनों ने मुस्कुराहट का आदान प्रदान किया।

मीनाक्षी: मैडम, आप अपने आगे के अंगो पर साबुन लगा लीजिये और मैं आपकी पीठ के पीछे लगाने में मदद करती हूँ ।

मैंने उससे साबुन लिया; यह बहुत अजीब लग रहा था, बड़े लंडमुंड के साथ लम्बी शिश्नन के आकार का साबुन ! मैंने अपने शरीर के अग्र भाग पर साबुन लगाना शुरू कर दिया।

मीनाक्षी: आपके स्तन शादी के बाद भी ढलके नहीं है, मैडम।

मैंने अपने शरीर को साबुन लगाते हुए थोड़ा सा शरमायी क्योंकि मीनाक्षी मेरे मदद करने के लिए थोड़ा सा पानी मेरे शरीर पर डाल दिया जिससे साबुन की झाग बनाने में आसानी हुई । मैं जब साबुन लगाने के लिए अपने बदन को हिला रही थी तो मेरे मुक्त स्तनों हिले और झूलने लगे । मिनटों के भीतर मैंने अपनी गर्दन, कंधे, स्तन, पेट और जननांगों पर साबुन लगा लिया । मुझे यह स्वीकार करना होगा कि इस साबुन की खुशबू बहुत ही दिलकश और अनोखी थी।

मीनाक्षी: मैडम मुझे आप अपनी टांगों और पैरो पर साबुन लगाने दो । अन्यथा आपकी नीचे को और झुकना पड़ेगा ।

अगर मुझे अपने पैरों पर साबुन लगाना होता, तो मेरे बड़े स्तन बहुत शर्मनाक तरीके से हवा में लटक जाते और इसलिए मैंने साबुन उसके हाथ में देते हुए अपने दिमाग में उसका शुक्रिया अदा किया। वह मेरी चिकनी, गोरी जांघों पर साबुन फिराने मलने और रगड़ने लगी. मेरी जांघ के क्षेत्र में दूसरे हाथ में स्पर्श, हालाँकि वो मादा हाथ था पर उससे मेरे शरीर के माध्यम से एक गर्म लहर गुजरी! । मेरे पहले से ही सख्त निप्पल कड़े हो गए, क्योंकि मीनाक्षी ने मेरी जाँघों के बीच अपने हाथ सरका दिए थे । उसने मेरी जाँघों, टांगों और पैरों पर पूरी तरह से साबुन लगा कर झाग बना दिया और फिर अज्ञात कारणों से उसने मेरी चूत के क्षेत्र में भी साबुन रगड़ना शुरू कर दिया, हालाँकि वहां मैंने पहले से ही साबुन लगा लिया था !

जब उसने अपनी उंगलियाँ मेरी मोटी रसीली चूत के बालों में घुसा दीं तो मैं घबरा गयी , लेकिन जब उसने मेरे जी-स्पॉट पर स्पर्श किया तो मैंने उस स्पर्श का आनंद जरूर लिया। मीनाक्षी को भी अब मजा आने लगा था और वो मेरी चूत के बालों को ऐसे सहला रही थी जैसे वो सितार बजा रही हो!

कहानी जारी रहेगी
 
स्नान

मैं: ईईआई! तुम ये क्या कर रही हो ?

मीनाक्षी ने मेरी इस अभिव्यक्ति पर बेक़ाबू होकर, ही-ही करती हुई हसने लगी और वह रुक गई और हंसते हुए खड़ी हो गई।

मीनाक्षी: उह! बस उन्हें देखिये !

वो मेरे गोल स्तन के साथ बिल्कुल सट कर खड़ी हो गयी और उसने मेरे गुलाबी निप्पलों की तरफ इशारा किया, जो तब तक अपने पूरे आकार तक बढ़ कर, दो पके हुए अंगूरों की तरह लग रहे थे , और मैं शर्म से लाल हो गयी ।

मीनाक्षी: मैडम, अब आप कृपया पीछे घूमिये ।

मैंने अपनी नंगी पीठ उसकी ओर कर दी और उसने थोड़ा पानी लगाया और मेरी पीठ पर साबुन लगाना शुरू कर दिया। मैंने देखा कि घिसने पर लंग के आकार वाला साबुन बहुत जल्दी से छोटा हो रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे कि एक खड़ा हुआ कठोर लिंग धीरे-धीरे स्खलित होता हुआ शिथिल हो रहा है

मीनाक्षी: मैडम , हमे साबुन को पूरा लगाना है उसके बाद ही बाहर निकालना है।

मैं: है मैं भी देख रही हूँ। यह काफी आसानी से गल रहा है इससे झाग भी बहुत ज्यादा हो बन यही है ।

मीनाक्षी: अरे! ये ऐसी ही सामग्री से बना है ? एक साबुन एक व्यक्ति के स्नान के लिए ही है।

मेरी पूरी पीठ और मम्मों पर साबुन अच्छी तरह से मसलने और मलने के बाद मीनाक्षी मेरी कमर पर पहुँची और साबुन को नीचे की तरफ रगड़ने लगी। उसके फिसलते हाथ मेरे गोल नंगे नितम्बो पर हर तरफ चले गए। मैं अपने नग्न नितंबों पर गोल गोल घूमते हुए हाथों के सहलाने के कारन तेजी से उत्तेजित हो रही थी उसकेबाद मैंने अपने स्तन और निपल्स को दबाने लगी क्योंकि उसके द्वारा मेरे नितम्बो को यो छेड़ने से मैं बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गयी थी ।

चूँकि मैं टॉयलेट में एक महिला के साथ थी, मैंने आराम से अपने बूब्स और निप्पलों को अपने हाथों से दबाने और सहलाने में कोई संकोच महसूस नहीं किया। फिर मैंने महसूस किया की जब मीनाक्षी के हाथ मेरे चूतड़ों को सहला रहा थे तो उसकी उंगलिया नेरी गांड के छेद को भी बीच बीच में छु रही थी ।

मैं: ईसससस ?

उसके स्पर्श ने उत्कृष्ट उत्तेजना उतपन्न की ।

मीनाक्षी: मैडम, बस एक मिनट? हाँ, अब बस खत्म होने ही वाला हैं ।

वो मुझसे थोड़ा दूर हो गयी और मैंने अपने नग्न शरीर पर एक बार फिर पानी डालना शुरू कर दिया फिर मैंने अपने शरीर से झाग को पानी डाल कर हटाना और रगड़ कर निकालना शुरू कर दिया। इस तरह एक-दो मिनट के भीतर मेरा स्नान समाप्त हो गया और उसने मुझे तौलिया सौंप दिया। तौलिया में से भी अच्छी सुगंध आ रही थी और मैंने खुद को सुखाते हुए गहरी सांस ली। पूरे शौचालय उस साबुन की मनमोहक खुशबू से भर गया था और मैंने खुद को रात के उस समय (11 बजे) तरोताजा महसूस किया .

मैं अपनी ब्रा और पैंटी दरवाजे के हुक से उतारने ही वाली थी कि तभी मीनाक्षी ने बीच में टोक दिया।

मीनाक्षी: मैडम, कृपया प्रतीक्षा करें। पहले मैं आपके शरीर को तेल लगा देती हूँ ।

हालांकि मैं तेल लगाना पूरी तरह से भूल ही चुकी थी पर मैंने कहा, ठीक है? मैं थोड़ी और देर के लिए उस उज्ज्वल प्रकाश में बिल्कुल नग्न खड़ी हुई काफी शर्म महसूस कर रही थी था इस बीच मीनाक्षी ने तेल की बोतल खोली और मैंने देखा कि वो तेल हरे रंगका कुछ जड़ी बूटियों का हर्बल अर्क था ।

मैं: मीनाक्षी, मैं तेल लगा लेती हूँ ?

मीनाक्षी: मैडम, जब मैं मौजूद हूँ तो आप परेशानी क्यों उठाएंगी ?

मीनाक्षी ने मेरे बड़े और चौड़े कंधों और लंबे हाथों पर तेल रगड़ना शुरू कर दिया। हालाँकि यह मालिश नहीं थी, लेकिन उस ठंडे पानी के स्नान के बाद यह सुखद अनुभव था और इससे निश्चित रूप से मेरे शरीर को आराम मिला ।

मैं: मुझे आशा है कि इस समय इतने ठंडे पानी से स्नान करने से मुझे ठण्ड नहीं पड़केगी और जुकाम नहीं होगा ।

मिनाक्षी थोड़ा सा मुस्कुराई और बोतल से थोड़ा तेल लिया और उसे अपनी दोनों हथेलियों में फैला लिया और मेरे पास आ गई। मीनाक्षी को शायद एहसास हुआ कि मैं नग्न खड़े होने के कारण शर्म महसूस कर रही थी, जबकि उसने पूरे कपडे पहने हुए थे ।

मीनाक्षी: मैडम, एक काम कीजिए, आप तेल लगाते समय अपनी आँखें बंद कर लीजिए। मुझे लगता है इससे आप बेहतर महसूस करेंगी।

मैं: हम्म। लेकिन कृपया जल्दी से लगा दीजिये ।

मीनाक्षी ने सहमति में सिर हिलाया और मैंने आँखें बंद कर लीं। मीनाक्षी ने मेरे कंधों से तेल लगाना शुरू किया और फिर मेरी लंबी बाँहों पर तेल लगाने के बाद आगे स्तनों की तरफ बढ़ गई। यह निश्चित रूप से मालिश नहीं थी, लेकिन फिर भी जड़ी बूटियों से युक्त बर्फीले पानी से मेरे स्नान के बाद उसके गर्म हाथो का गर्म स्पर्श मेरे लिए राहत भरा था ।

जब उसके तैलीय हाथों ने मेरे प्रत्येक उभरे हुए स्तन को अपने हाथो में भर कर और रगड़ कर उन्हें तेल से सराबोर कर दिया और फिर सहलाने लगी तो मेरा पूरा शरीर कांप गया और झटका देने लगा यद्यपि मेरी आँखें बंद थीं, मैं उसके हाथों को मेरे स्तनों को दबाते हुए महसूस कर रही थी और फिर उसने मेरे निपल्स को दो अंगुलियों से पकड़ लिया और धीरे-धीरे उन्हें मसल दिया और इस तरह से सहलाने और मसलने के कारण मेरे चूचक एक ही क्षण के भीतर खड़े हो गए। फिर उसकी साड़ी उंगलियों ने मेरी निपल्स को अपनी उँगलियों से दबाया और उस मुझे बिल्कुल ऐसा लगा जैसे मेरे पति की जीभ मेरे निप्पलों के साथ खेल रही हो!

मैं अपना ध्यान स्थानांतरित करने की कोशिश करते हुए बोली

मैं: मीनाक्षी, क्या यह तेल मेरी ब्रा नहीं ख़राब करेगा?

मीनाक्षी: मैडम, यह गुरु-जी द्वारा स्वयं तैयार किया गया पूर्णतया चिकनायी रहित जड़ी बूटियों का मिश्रण है इसलिए आप बिलकुल चिंता मत करो?

मैं: ठीक है।

फिर मीनाक्षी ने मेरे पेट पर तेल लगाया और मेरी टांगो पर तेल लगाने लगी । वह मेरी जाँघों और टांगों पर हाथ फेर रही थी इसलिए मुझे गुदगुदी का अहसास भी हो रहा था । जब उसने मेरी टांगो पर लगा लिया तो मैंने सोचा था कि वह अब मेरी पीठ के पीछे तेल लगाबे जायेगी , लेकिन?

मीनाक्षी: मैडम, कृपया पीछे मुड़ें।

मैं: आप इस तरफ क्यों नहीं आए?

मीनाक्षी: नहीं, नहीं मैडम। मेरे लिए ऐसा करना आसान होगा।

हालाँकि मैं उसके इस तरफ नहीं आने से थोड़ा हैरान थी , लेकिन मैंने उस पर ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया था । मुझे शुक हुआ कही यहाँ कोई गुप्त कैमरा तो इसी तरफ नहीं था और मैं तब तक मैं उस गुप्त कैमरे का सामना कर रही थी वो मेरे पूरी तरह से नग्न अगर भाग को रिकॉर्ड कर रहा था और अब जैसे मैंने अपनी गांड मीनाक्षी की तरफ घुमाई, तो मैं वास्तव में कैमरे को अपनी बड़ी नंगी गाँड दिखा रही थी !

कहानी जारी रहेगी
 
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