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Adultery प्यास बुझाई नौकर से

रूबी इस हालत में अपनी नाइटी में हाथ डालकर अपने मम्मे दबा रही थी। पर उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इसी बेचैनी के बीच उसने अपने एक हाथ से नाइटी के ऊपर से अपनी चूत को छुआ तो उसे थोड़ा सा गीलापन का एहसास हुआ। उसकी चूत ने पानी छोड़ा था और चुदवाने के लिए पूरी तरह तैयार थी। पर उसकी विडंबना ही ये थी की उसे चोदने वाला नहीं था।

कुछ देर रूबी ने अपनी चूत को नाइटी के ऊपर से ही रगड़ा, तो उसकी अंदर की आग और भड़क गई और प्रीति को अपनी नाइटी को अपनी कमर तक उठना ही पड़ा। रूबी ने अपनी पैंटी के ऊपर से ही अपनी चूत और महसूस किया की पैंटी पूरी तरह से गीली थी। रूबी को पता था इस हालत में उसको नींद आना मुश्किल ही है, जब तक चूत शांत नहीं होती। उसने धीरे से अपना हाथ पैंटी के अंदर डाला और चूत की पंखुड़ियों के साथ खेलने लगी। अपनी आँखें बंद किए हुए प्रीति और हरजीत की चुदाई को याद करने लगी। धीरे-धीरे उसने अपनी एक उंगली को चूत के अंदर डाल दिया और अंदर-बाहर करने लगी।

रूबी की सांसें तेज हो रही थी। अचानक उसके मुंह से निकला 'उफफ्फ' हरजीत और प्रीति की चुदाई को अपने आँखों के सामने लाते हये वो मदहोशी में खोने लगी। उसने अपनी उंगली की रफ्तार बढ़ा दी। उसका गला सूखने लगा। वो अपनी जीभ से होंठों को लाटने लगी। अब रूबी की दूसरी उंगली ने पहली वाली को जान कर लिया और दोनों साथ मिलकर रूबी का पानी निकालने की कोशिश करने लगी।

रूबी की सांसें तेज हो गई। आँखें बाद किए वो इमेजिन कर रही थी की हरजीत प्रीति की जगह उसे चोद रहा है। प्रीति की जगह वो हरजीत के नीचे लेटकर लण्ड का स्वाद ले रही थी। अब उंगलियों की रफ्तार तेज हो गई और रूबी अपने क्लाइमेक्स की तरफ बढ़ने लगी। रूबी की सिसकियां बढ़ने लगी। उफफ्फ... आहह... उम्म्म... की आवाजें रूबी के गुलाबी होंठों से निकल रही थी। इतनी ठंड में भी रूबी के बदन पे पशीना आ गया था। हरजीत के लण्ड की कल्पना करती रूबी पूरी स्पीड से उंगलियों को अपनी चूत के अंदर-बाहर कर रही थी। दोनों उंगलियां चूत के रस से सराबोर थीं।

तभी रूबी की साँस अटकी और चूत ने अपना पानी छोड़ दिया। रूबी तेज-तेज सांसें लेने लगी और बेड पे लेटी लेटी शांत हो गई। धीरे-धीरे रूबी की सांसें और धड़कन कंट्रोल में आने लगी। रूबी की चूत की आग ठंडी हो चुकी थी। पहले भी रूबी पता नहीं इस आग को अपनी उंगलियों के साथ कितनी बार ठंडी कर चुकी थी। पर यह आग बढ़ती ही जा रही थी। इस आग को ठंडा करने के लिए तगड़े मोटे लाड की जरूरत थी, जो की रूबी को साल भर बाद मिलता था। चूत की आग ठंडी होते ही रूबी की आँखें भारी होने लगी। नींद ने कब उसको अपने आगोश में ले लिया उसे पता भी ना चला।

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*****

 
अगले दिन रूबी सुबह उठी और ब्रश वगेरा करने के बाद सलवार सूट में आ गई, और फिर अपने कमरे से बाहर आ गई, तो देखा मम्मीजी किचेन में थे। रूबी ने उनके पैर छुए और उनका हाथ बंटाने लगी।

ससुर अभी टहलने गये थे। कुछ देर बाद वापिस आ गये और फिर तीनों ने बैठकर चाय पी और बातें करने लगे। सुबह का अखबार भी आ चुका था। तीनों ने अलग-अलग पेज लेकर पढ़ना शुरू कर दिया। बातें करते-करते 8:00 बज गये थे।

रामू ने बाहर खड़े होकर मालिक को आवाज लगाई। हरदयाल बाहर गया और दोनों के बीच कुछ बात होने लगी।

रामू- बाबूजी काफी टाइम हो गया है घर गये। कुछ दिन की छुट्टी डेडा घर वालों से मिल आएं।

हरदयाल- अरे राम तुम्हें पता है ना काम कितना है खेतों का? अगर तुम मिलने गये तो जल्दी वापिस नहीं वाले हो, और मैं अकेला कैसे सारा काम देखूगा। पहले भी तुम दो हफ्तो का कहकर जब भी जाते हो और महीने से ज्यादा लगाके आते हो।

राम- बाबूजी क्या करें? घर पे कोई ना कोई काम पड़ जाता है और टाइम ज्यादा लग जाता है।

हरदयाल- चल देखता हूँ कुछ दिनों तक। अगर कुछ हो सका तो चले जाना।

राम- "ठीक है बाबू जी। और बाबू जी अगर पगार थोड़ी सी बढ़ा देते तो घर का गुजारा थोड़ा सा अच्छे से चल जाता। पिछले साल से पगार नहीं बढ़ी है और खर्चे बढ़ गये हैं।

हरदयाल- हाँ हाँ, देखता हूँ इसके बारे में भी। तुम्हारी छुट्टी खतम होने के बाद जब तुम वापिस आओगे तो बढ़ा दूंगा पगार।

रामू- ठीक है बाबूजी।

हरदयाल- ठीक है। भैसों को नहला दो और बाद में खेतों में खाद डालने चलना है।

रामू- ठीक है बाबू जी।

हरदयाल वापिस आकर अखबार पढ़ने लगता है। रूबी और कमलजीत वापिस किचेन में आ गये थे, और खाने की तैयारी कर रहे थे।

कमलजीत- क्या कह रहा था रामू?

हरदयाल- कुछ नहीं वही छुट्टी का रोना और पगार बढ़ाने का बोल रहा था।

कमलजीत- इन लोगों का यही इश्यू होता है। छुट्टी दे दो घर जाना है। पगार बढ़ा दो।

हरदयाल- हाँ, वो तो है। पर इतना है की रामू काफी टाइम से काम कर रहा है और सबसे बड़ी बात ईमानदार भी

कमलजीत- हाँ जी यह तो है।

 
हरदयाल- कुछ नहीं वही छुट्टी का रोना और पगार बढ़ाने का बोल रहा था।

कमलजीत- इन लोगों का यही इश्यू होता है। छुट्टी दे दो घर जाना है। पगार बढ़ा दो।

हरदयाल- हाँ, वो तो है। पर इतना है की रामू काफी टाइम से काम कर रहा है और सबसे बड़ी बात ईमानदार भी

कमलजीत- हाँ जी यह तो है।

रूबी- डैडीजी, राम की कितनी सेलरी है?

हरदयाल- बहू ₹8000 है?

रूबी- यह अपना घर कैसे चलाता होगा इतनी कम सेलरी में?

हरदयाल- इनकी सेलरी इतनी ही होती है। यह कौन सा डीसी लगा है नौकर ही तो है।

सभी हल्के से हँस पड़ते हैं।

हरदयाल- पर छुट्टी से आने के बाद इसकी पगार बढ़ा दूंगा। काम भी तो अच्छा करता है। इसका एक ही इश्यू है की छुट्टी पे जाने के बाद जल्दी वापिस नहीं आता।

रूबी- रामू कब से काम कर रहा है हमारे जहां?

कमलजीत- “बह, इसको 5 साल हो गये हैं। इसका चाचा करता था पहले काम। वो चला गया और इसको छोड़ गया हमारे यहां पे। तुम्हारे डैडीजी से ही इसने सारा काम सीखा। ट्रेक्टर वगेरा चलाना भी इन्होंने ही सिखाआ था इसको। अकेला काम संभाल लेता है खेतों का..."

रूबी- हाँ, वो तो मैंने देखा है। जब डैडीजी घर पे नहीं भी होते तो अकेला ही ट्रैक्टर लेकर चला जाता है खेतों में। चुपचाप काम करता है और कभी मैंने इसको फालतू में बातें करते नहीं देखा।

कमलजीत- हाँ बहु। सबसे बड़ी बात है इस्पे विश्वाश है। वरना अकेले नौकरों पे विश्वाश नहीं हो पता। कई बार तो खाद वगेरा लानी हो मार्केट से तो तुम्हारे डैडी इसको ही पैसे दे देते हैं लाने के लिए और इसने कभी पैसों में घपला नहीं किया।

रूबी- फिर तो थोड़ी सी सेलरी बढ़ा देनी चाहिए और छुट्टी भी दे देनी चाहिए। इसका तो हक बनता है।

हरदयाल- हाँ बहू ये तो इसका हक है। पहले इसकी छुट्टी का देखता हूँ कब की बनती है।

तीनों बातें करते रहते हैं, और घर की सफाई करने वाली सीमा आ जाती है और हाथ में झाडू पकड़कर सफाई करने लग जाती है।

इधर रूबी हरदयाल का खाना लगा दे देती है, और हरदयाल खाना खाने लग जाता है। खाना खाने के बाद हरदयाल हाथ धोता है और राम को आवाज लगाकर खाने लेने के लिए बोलता है। राम किचेन के बाहर खड़ा हो जाता है हाथ में प्लेट लिए और रूबी एक ही बार में 5 चपाती और दाल पलेट में परोस देती है और राम घर के बाहर बने अपने कमरे में आकर खाना खाने लगता है।

इधर रूबी सीमा से घर की सफाई करवाने लग जाती है। सारे कमरों में सफाई करवाने के बाद रूबी और कमलजीत खाना खाने लगते हैं। हरदयाल और रामू खेतों में चले जाते हैं। इधर कामवाली भी सफाई करने के बाद चली जाती है। खाना खाने के बाद रूबी अखबार में बिजी हो जाती है, और धूप बढ़ने का इंतजार करती है। कुछ देर बाद अपना बाथरूम का गीजेर चालू कर देती है और फिर से अखबार पढ़ने लग जाती है।

इतनी ठंड में रूबी धूप बढ़ने पे ही नहाती थी, क्योंकी नहाने के बाद वो कमलजीत के साथ घर के पीछे बने पार्क में चारपाई और कुस ने धूप में बैठकर काम और बातें करती थी। पंद्रह मिनट अखबार पढ़ने के बाद रूबी अपने कमरे में बने बाथरूम में आ जाती है और पानी चेक करती है, जो की काफी गरम हो गया था।

 
इतनी ठंड में रूबी धूप बढ़ने पे ही नहाती थी, क्योंकी नहाने के बाद वो कमलजीत के साथ घर के पीछे बने पार्क में चारपाई और कुस ने धूप में बैठकर काम और बातें करती थी। पंद्रह मिनट अखबार पढ़ने के बाद रूबी अपने कमरे में बने बाथरूम में आ जाती है और पानी चेक करती है, जो की काफी गरम हो गया था।

रूबी तौलिया लेकर वापिस बाथरूम में आ जाती है और बाथरूम का दरवाजा बंद कर लरती है। बाथरूम में लगे बड़े से शीशे में अपने आपको निहारने लगती है। क्या खूबसूरत थी वो। स्वर्ग की अप्सराओं को भी मात दे सकती थी उसकी खूबसूरती। इतना सोचते ही वो खुद से ही शर्मा गई और मुश्कुरा दी। अब उसने धीरे से अपने बालों को खुला छोड़ दिया और कमीज को उतारने लगी। अभी वो ब्रा और सलवार में थी और शीशे में फिर से अपने उभारों को देखने लगी। ब्लैक ब्रा में गोरे सुडौल उभार कहर ढा रहे थे। ब्रा में कैद अपने उभारों को देखकर रूबी को अपने ऊपर गर्व महसूस होता है। धीरे-धीरे अपने हाथ पीठ के पीछे लेजाकर अपनी ब्रा के हक खोल देती है। अब ब्रा सिर्फ कंधों के सहारे ही टिकी थी। धीरे से अपने हाथ ऊपर को लेजाकर रूबी ने अपने उभारों को ब्रा की कैद से आजाद कर दिया। भरे-भरे गोरे उभार और ऊपर ब्राउन निपल किसी भी मर्द को दीवाना बना सकते थे।

लखविंदर भी तो इनका दीवाना था। लखविंदर ने तो इनको पूरा चूसा था। यह सोचते-सोचते रूबी के दोनों हाथ उभारों के ऊपर आ गये और उभारों का जायजा लेने लगे। अपने उभारों की गोलाईयों का जायजा लेते-लेते रूबी ने अपने आपको को शीशे में निहारा। खुले बाल, गोरा जिश्म, नंगे उभार, रूबी की खूबसूरती को चार चाँद लगा रहे थे। अपनी खूबसूरती पे उसे गर्व महसूस हुआ।

अब उसने अपनी सलवार भी ढीली कर दी और सलवार ने ब्रा को फर्श पे जाय्न कर लिया। अब रूबी सिर्फ ब्लैक कलर की पैंटी में थी। क्या गदराया शरीर था रूबी का। काले रंग की पैंटी मानो जैसे रूबी की खूबसूरती को। उसकी अपनी ही नजर से बचा रही थी। अब रूबी ने नल को खुला छोड़ा और गरम पानी से टब को भरने लगी। रूबी ने हाथ लगाकर देखा तो पानी काफी गरम था तो रूबी ने साथ वाले ठंडे पानी के नल को भी खुला छोड़ दिया। इधर पानी भरने लगा, उधर रूबी ने अपनी काले रंग की पैंटी भी उतार दी। पैंटी के अंदर जहां पे चूत का महाना टच होता है वहां पे सफेद रंग का दाग था। रूबी ने कल रात के सूखे अपने रस के दाग को देखा तो हल्का सा मुश्कुरा दी।

रूबी ने पैंटी को अपनी नाक के पास लेकर सूंघा तो पैंटी से रूबी की चूत की खुश्बू आ रही थी। रूबी ने आँखें बंद कर ली और कछ देर पैंटी को ऐसे ही पकड़कर सँघा। आँखें बंद किए-किए उसे प्रीति और हरजीत की चुदाई याद आ गई। प्रीति का सिसकियां लेना उसे अभी भी याद था। यह सब सोचते-सोचते उसके हाथ अपने उभारों को सहलाने लगे और वो सोचने लगी- "प्रीति कितनी किश्मत वाली है जो उसका पति उसके साथ है..."

सहलाने-सहलाते रूबी अपने उभारों को दबाने लगी थी। उसने अपनी दोनों हाथों की उंगलियों से अपने उभारों की ब्राउन निपलों को दबाया। ऐसा करने से अंदर करेंट सा लगा। धीरे-धीरे उसके हाथ तेज चलने लगे और उभारों पे दबाब भी बढ़ गया। नीचे उसकी चूत भी गीली हो गई थी। उसने एक हाथ से अपनी उंगली को चूत में डाल दिया और अंदर-बाहर करने लगी। रूबी मदहोश होती जा रही थी। अब वो नीचे फर्श पे लेट गई और उंगली की रफ़्तार बढ़ा दी और सिसकियां लेने लगी।

अंदर-बाहर होने से उसकी दोनों उंगलियां चूत के पानी से गीली हो गई थीं। उंगलियों की स्पीड अब और तेज हो गई थी और रूबी के शरीर में अकड़न आ गई थी। थोड़ी देर में उसका रस निकल गया और रूबी का शरीर ढीला पड़ गया।

कुछ देर बाद सांसें नार्मल होने के बाद रूबी खड़ी हो गई और फिर से अपने आपको शीशे में देखा और सोचने लगी- “क्या फायदा ऐसी खूबसूरती का, जिसे भोगने वाला ही उसके पास ना हो। इतना गदराया जिश्म सुडौल जांघे, कोई भी इन पे फिदा हो सकता था। पर इन सबका क्या फायदा? जब इस फूल का रस पीने वाला भँवरा ना हो। प्रीति कितनी लकी सै, उसे भोगने वाला उसके साथ है..." यह सब सोचते-सोचते उसे याद आया टब में पानी भर गया था और बाहर गिर रहा था।

 
कुछ देर बाद सांसें नार्मल होने के बाद रूबी खड़ी हो गई और फिर से अपने आपको शीशे में देखा और सोचने लगी- “क्या फायदा ऐसी खूबसूरती का, जिसे भोगने वाला ही उसके पास ना हो। इतना गदराया जिश्म सुडौल जांघे, कोई भी इन पे फिदा हो सकता था। पर इन सबका क्या फायदा? जब इस फूल का रस पीने वाला भँवरा ना हो। प्रीति कितनी लकी सै, उसे भोगने वाला उसके साथ है..." यह सब सोचते-सोचते उसे याद आया टब में पानी भर गया था और बाहर गिर रहा था।

उसने अपने आपको संभाला और नहाने लगी। कुछ देर नहाने के बाद अपनी पैंटी और ब्रा धोई और अपने आपको तौलिया से साफ करके कपड़े पहन लिए और बाथरूम से बाहर आ गई।

दोपहर के टाइम था रूबी अपनी सासू माँ के साथ घर के पिछवाड़े में बनाए पार्क में बैठकर धूप का आनंद ले रही थी और साथ-साथ सास बहू सब्जी वगेरा भी काट रही थी। रूबी का दिल अपने मायके जाने को कर रहा था। उसने पहले भी बात की थी और आज फिर से पूछ रही थी।

रूबी- मम्मीजी मेरा मायके जाने को दिल कर रहा है। काफी टाइम हो गया गये

कमलजीत- चले जाना बेटा, मैंने कब रोका है।

रूबी- पर मम्मीजी आप लास्ट टाइम बोल रहे थे के अभी रुक जा?

कमलजीत- अरे मैंने तो इसलिए बोला था की सीमा ने बोला था कीउसको छुट्टी चाहिए कुछ दिन। अगर वो चली गई तो घर में काम बढ़ जाएगा। मेरे से अकेले कहाँ होने वाला काम।

रूबी- मम्मीजी, वो कब जा रही है छुट्टी पे?

कमलजीत- पता नहीं। उसने बात नहीं रा। वैसे भी इस सनडे को पड़ोस के घर में फंक्सन है। प्रीति आने वाली है फंक्सन में उसके बाद देख लेना। तुम दोनों फंक्सन भी साथ-साथ देख लोगी।

रूबी- ओहह... प्रीति आ रही है क्या? उसने मुझे नहीं बताया।

कमलजीत- अरे उसकी सहेली की शादी है वो क्यों नहीं आएगी?

रूबी- ठीक है उसके बाद चली जाऊँगी। पहले तो मैं प्रीति को पूछती हूँ की मुझे क्यों नहीं बताया उसने इसके बारे में?

कमलजीत- हाँ।

कमलजीत कुछ काम के लिए घर के अंदर आ गई। और रूबी ने फोन प्रीति को लगा लिया और पार्क में टहलते टहलते बातें करनी लगी। बातें करते-करते उसकी नजर ट्यूबवेल की तरफ पड़ी। वहां पे रामू नहा रहा था। रामू सिर्फ अपनी अंडरवेर में था। रूबी उसकी तरफ देखती रह गई। रामू का जिश्म फिट था। सुडौल बाहें चौड़ी छाती। रूबी का ध्यान भटक गया। प्रीति अपनी बातें करती रही, पर रूबी का ध्यान राम के सुडौल जिश्म पे अटक गया था। कुछ देर बाद।

प्रीति- हेलो हेलो... भाभी क्या हुआ? आप वहां पे हो?

रूबी को अचानक प्रीति की आवाज अपने कान में सुनाई दी। रूबी बोली- “हाँ हाँ सुन रही हूँ.."

प्रीति- कहा सुन रही हो भाभी? मैं कब से बोले जा रही हूँ और आप कुछ बोल ही नहीं रहे।

रूबी- अरे मैं सुन रही थी, पर नेटवर्क में कुछ इश्यू आ गया था।

प्रीति- ओके।

रूबी- तो तेरा फाइनल है सनडे आने का?

प्रीति- हाँ पक्का।

रूबी ने अब प्रीति को बातों में उलझा लिया था की वो बातें करते-करते राम को देख सके, और किसी को कोई शक ना हो।

रूबी- ओके और सुनाओ क्या चल रहा है?

प्रीति- “कुछ खास नहीं भाभी, बस वही रूटीन..." और प्रीति जो के बातें ज्यादा करती थी अपनी बातें सुनाने लगी।

 
इधर रूबी की आँखें राम के शरीर को निहार रही थी। दोपहर के टाइम काला शरीर चमक रहा था। रूबी का ध्यान रामू की अंडरवेर की तरफ गया तो गीली अंडरवेर में उसके लण्ड की आउट-लाइन नजर आ रही थी। रूबी को धूप में बातें करते-करते पशीना आने लगा।

इधर कमलजीत वापिस आ गई और रूबी और प्रीति की बातें भी खतम हो गई। सास बह फिर से बातें करने लगे। पर रूबी का ध्यान वापिस राम की तरफ ही जा रहा था, और कमलजीत इससे बेखबर थी। आज पहली बार रूबी ने राम को नहाते और सिर्फ अपने अंडरवेर में देखा था। वो तो बस देखती ही रह गई थी। बातें वो कमलजीत के साथ कर रही थी पर उसका ध्यान राम की तरफ था।

राम के नहाने के बाद भी रूबी के माइंड में बार-बार राम के नहाने का दृश्य रूबी के दिमाग में आ रहा था। क्या सुडौल शरीर था राम का। लखविंदर का तो इतना सुडौल नहीं था, थोड़ा सा ढीला और पतला सा था। उस दिन पूरा दिन रूबी रामू के बारे में सोचती रही। उसके शरीर ने पता नहीं क्या जादू कर दिया था रूबी के दिमाग पे। यह सब रामू की तरफ आकर्षण था या फिर उसके पति की कमी के एहसास के कारण था, उसे नहीं पता था।

उस दिन के बाद रूबी राम की तरफ अलग सी नजर से देखने लगी और उसे नोट करने लगी। इससे पहले उसने कभी रामू की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था। शायद रूबी के जिश्म की भूख ही उसे अपनी मंजिल की तरफ लेकर जा रही थी। उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अब उसके लिए अकेले काली ठंडी रातें काटना मुश्किल हो रहा था। रामू के नंगे बदन ने पता नहीं रूबी पे क्या जादू किया था की वो अपनी अंदर की औरत को अपनी जिंदगी एंजाय करने के लिए सोचने पे मजबूर करने लगी थी। उसने एक-दो बार राम के बारे में सोचते हए अपनी चूत की आग भी ठंडी कर ली थी।

कुछ दिन बाद प्रीति अपने मायके आई और रूबी का ध्यान रामू की तरफ से थोड़ा सा भटक गया। रूबी और प्रीति ने उस दिन काफी एंजाय किया। दोनों ने फंक्सन का पूरा लुत्फ उठाया। पूरा दिन एंजाय करने के बाद दोनों काफी थक गई थी। रात को फंक्सन से आने के बाद दोनों ने चेंज किया और फिर कुछ देर बातें की। हरदयाल और कमलजीत भी उनसे बात कर रहे थे। कछ देर बातें करने के बाद रूबी उठी और चलने लगी।

तभी कमलजीत ने उससे बोला- "बहू कहा जा रही हो?"

रूबी- कुछ नहीं मम्मीजी बस थक गई हूँ। नींद आ रही है।

प्रीति- हाँ थक तो मैं भी गई हूँ।

 
कुछ दिन बाद प्रीति अपने मायके आई और रूबी का ध्यान रामू की तरफ से थोड़ा सा भटक गया। रूबी और प्रीति ने उस दिन काफी एंजाय किया। दोनों ने फंक्सन का पूरा लुत्फ उठाया। पूरा दिन एंजाय करने के बाद दोनों काफी थक गई थी। रात को फंक्सन से आने के बाद दोनों ने चेंज किया और फिर कुछ देर बातें की। हरदयाल और कमलजीत भी उनसे बात कर रहे थे। कछ देर बातें करने के बाद रूबी उठी और चलने लगी।

तभी कमलजीत ने उससे बोला- "बहू कहा जा रही हो?"

रूबी- कुछ नहीं मम्मीजी बस थक गई हूँ। नींद आ रही है।

प्रीति- हाँ थक तो मैं भी गई हैं।

रूबी- मैं तो सोने जा रही हैं।

प्रीति- ठीक है मैं भी आपके साथ ही सोऊंगी आज।

रूबी- “ठीक है आ जाना..." रूबी इतना कहर चली गई और अपने बेड पे लेट गई।

एक-दो मिनट बाद प्रीति आई और दरवाजा बंद करके रूबी के कम्बल में आ गई।

रूबी- अरे तुम्हारा कम्बल वो है, मेरा क्यों ले रही हो?

प्रीति- अरे भाभी आपने कम्बल गरम कर दिया है और मुझे करना पड़ेगा। थोड़ी देर में चेंज कर लूंगी।

रूबी- अच्छा जी।

प्रीति- अरे भाभी इतनी ठंड में अकेले काफी ठंड लगेगी।

रूबी- तो क्या हुआ, मैं भी तो अकेली ही सोती हूँ।

प्रीति- अरे भाभी आपकी तो मजबूरी है, भईया जो नहीं है यहां पे। अगर भईया यहां पे होते तो कहां आपको अकेला छोड़ते।

रूबी- “धत्...”

प्रीति- और नहीं तो क्या? भाभी आप इतनी खूबसूरत हो, आपको कैसे कोई अकेला छोड़ सकता है।

रूबी- तुम्हारे भईया ने छोड़ा तो है।

प्रीति- सही बात है। इतनी खूबसूरत भाभी है और भईया को पैसे कमाने की पड़ी है। अब मुझे देख लो हरजीत कभी भी मुझे अकेला नहीं छोड़ते।

रूबी- अच्छा ।

प्रीति- और नहीं तो क्या? जब भी मैं यहां पे आती हैं तो पीछे फोन करते रहते हैं की जल्दी आ जाओ, मेरा दिल नहीं लग रहा। इनका तो मेरे से कभी मन ही नहीं भरता।

रूबी- इतनी खूबसूरत बीवी के बिना हरजीत कैसे रह सकता है?

प्रीति- हाँ वो तो है। मेरे बिना नहीं रह पाते यह तो। और एक औरत को चाहिए भी क्या? जब उसका पति उसे पूरा टाइम देता हो और हर पल खुश रखता हो।

प्रीति की इस बात का रूबी के पास जवाब नहीं था और वो चुप हो गई। प्रीति ने रूबी की तरफ देखा और दोनों की नजरें टकराई और रूबी ने अपनी आँखें नीचे कर ली।

प्रीति- क्या हुआ भाभी?

रूबी- कुछ नहीं।

प्रीति ने अपने हाथ को रूबी की ठोड़ी पे रखकर उसके चेहरे को ऊपर किया। पर रूबी नजरें चुरा रही थी। प्रीति ने कहा- “क्या हुआ भाभी? भईया की याद आ रही है?"

रूबी- रूबी ने हल्का सा सिर हिलाया।

प्रीति- ओहह... मेरी स्वीट भाभी उदास मत हो। आप हमेशा मश्कराते अच्छे लगते हो। अगली बार जब भईया आएंगे तो मैं उनकी क्लास लूंगी।

दोनों हँस पड़ी और उसके बाद फिर से शांति हो गई रूम में। रूबी अपने दिल का र्दछपाने की कोशिश कर रही थी और सोच रही थी की प्रीति कितनी किश्मत वाली है, जो उसे पति का पूरा सुख मिल रहा है।

उधर प्रीति लगातार रूबी के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी और सोच रही थी- “भाभी बाला की खूबसूरत हैं, पर भईया के लिए कितना तड़प रही हैं। इतनी खूबसूरत औरत कैसे अपने आदमी की बिना रातें काटती होगी?" उसे रूबी पे तरस अगया और उसने रूबी को अपनी बाहों में प्यार से भर लिया।

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