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सुराग
शबाना कहने को कनाट प्लेस में स्थित सिल्वर मून नामक रेस्टोरेंट में कैब्रे डांसर थी लेकिन असलियत में वो एक हाई प्राईस्ड कालगर्ल थी । कितनी हाई प्राइस्ड थी, इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता था कि वो दिल्ली जैसे महंगे शहर में आठ एकड़ में बने उस फार्म हाउस में रहती थी ।
वो छतरपुर गांव से आगे भाटी माइन्स के रास्ते में मेन रोड से काफी हटकर बना शुक्ला फार्म्स के नाम से जाना जाने वाला एक फार्म हाउस था जिसके लोहे के बन्द फाटक के सामने मैं उस घड़ी मौजूद था ।
रात के बारह बजने को थे और चारों तरफ सन्नाटा था । शबाना कितनी हौसलामंद थी इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता था कि दिल्ली शहर के एक सिरे पर उस सुनसान इलाके में, जहां कि दिन में भी कोई इक्का-दुक्का बंदा ही नजर आता था वो -वो बंदी- अकेली रहती थी । दिन में अमूमन उसके साथ कोमलहोती थी लेकिन रात को वो भी वहां से रुख्सत कर दी जाती थी ।
तनहाई में खलल जो आता था उसकी मौजूदगी से !
कोमल एक गोवानी लड़की थी जो कि कहने को शबाना की मेड थी लेकिन असल में वो उसकी सहयोगी, केयरटेकर, बावर्चिन, वगैरह सब कुछ थी । वो कोई पच्चीस साल की सांवली रंगत वाली लड़की थी जिसकी रंगत वाली कमी उसके बनाने वाले ने उसे खूबसूरती और भरपूर जवानी देकर निकाल दी मालूम होती थी ।
उसकी मालकिन शबाना उम्र में उससे एकाध साल बड़ी परीचेहरा, शोलाबदन, युवती थी जिसको खुदा ने ताजमहल के से अन्दाज से बनाया मालूम होता था ।
ताजमहल कहीं किसी एक की मिल्कियत हो सकता है !
शबाना और कोमलको साथ देखकर हमेशा मुझे रसगुल्ले और गुलाब जामुन का ख्याल आता था ।
मैंने बंद फाटक के एक पहलू में बना एक लैटर बॉक्स सरीखा बक्सा खोला और भीतर लगा एक बटन दबाया ।
“कौन ?” - कुछ क्षण बाद बटन के ऊपर लगे माइक्रोफोन में से शबाना की आवाज आयी ।
“राज।” - मैं बोला ।
“कौन राज?”
“राज । दि ओनली वन ।”
“वैलकम ।”
मैंने बक्से का ढक्कन बंद कर दिया और वापस अपनी फियेट में आ बैठा ।
मेरे सामने लोहे का फाटक अपने आप खुला । मैंने कार आगे बढाई । कार फाटक पार कर गई तो वो वो पीछे अपने आप बंद हो गया । दोनों तरफ लगे पेड़ों के बीच से गुजरते एक लम्बे ड्राइव-वे में कार चलाता हुआ मैं फार्म के बीचोंबीच बने एक छोटे से बंगले के सामने पहुंचा । मैंने कार को पार्किंग में खड़ी एक मारुती 1000 के पीछे रोका और बाहर निकला ।
शबाना मुझे ड्राइंगरूम के दरवाजे पर मिली ।
उस घड़ी वो एक झीनी सी नाइटी पहने थी जिसमें से उसका पुष्ट गोरा बदन साफ झलक रहा था ।
“वैलकम ।” - वो बोली ।
मैं उससे बगलगीर होकर मिला । मेरे तजुर्बेकार हाथ ने एक ही क्षण में उसके जिस्म की कई गोलाईयां टटोल डालीं ।
“अकेली हो ?” - मैं बोला ।
“अब नहीं हूं ।” - वो चेहरे पर एक चित्ताकर्षक मुस्कराहट लाती हुई बोली ।
“नींद तो क्या आती होगी अकेले !”
“नहीं आती । अच्छा हुआ तुम आ गए ।”
“मैं किसी और मकसद से आया हूं ।”
“वो मकसद भी पूरा हो जायेगा ।”
“मैं उस मकसद से नहीं आया ।”
वो तनिक हकबकाई, क्षण भर को उसकी आंखें बर्फ की मानिन्द सर्द हुईं लेकिन फिर तत्काल ही वो अपने मोतियों जैसे दांत चमकाती मुस्कराने लगी । वो मुझे बांह पकड़कर भीतर ले चली और फिर मुझे एक सोफे पर धकेलती हुये बोली - “बैठो ।”
“थैंक्यू !” - मैं बोला ।
“कुछ पियोगे ?” - वो बोली ।
“जो पिलाओगी पी लूंगा ।” - मैं बोला ।
“अच्छा !” - वो इठलाकर बोली - “अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम उस मकसद से नहीं आये हो ।”
“म..मेरा मतलब था जो तुम पियोगी, वो मैं भी पी लूंगा ।”
“मैं अभी आयी ।”
बड़ी मदमाती चाल चलती वो वहां से रुख्सत हो गयी ।
कोई और वक्त होता तो मैं उसे वहीं दबोच लेता लेकिन वो घड़ी बिजनेस को प्लेजर से मिक्स करने की नहीं थी । बड़े नर्वस भाव से मैंने जेब से डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।
शबाना कहने को कनाट प्लेस में स्थित सिल्वर मून नामक रेस्टोरेंट में कैब्रे डांसर थी लेकिन असलियत में वो एक हाई प्राईस्ड कालगर्ल थी । कितनी हाई प्राइस्ड थी, इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता था कि वो दिल्ली जैसे महंगे शहर में आठ एकड़ में बने उस फार्म हाउस में रहती थी ।
वो छतरपुर गांव से आगे भाटी माइन्स के रास्ते में मेन रोड से काफी हटकर बना शुक्ला फार्म्स के नाम से जाना जाने वाला एक फार्म हाउस था जिसके लोहे के बन्द फाटक के सामने मैं उस घड़ी मौजूद था ।
रात के बारह बजने को थे और चारों तरफ सन्नाटा था । शबाना कितनी हौसलामंद थी इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता था कि दिल्ली शहर के एक सिरे पर उस सुनसान इलाके में, जहां कि दिन में भी कोई इक्का-दुक्का बंदा ही नजर आता था वो -वो बंदी- अकेली रहती थी । दिन में अमूमन उसके साथ कोमलहोती थी लेकिन रात को वो भी वहां से रुख्सत कर दी जाती थी ।
तनहाई में खलल जो आता था उसकी मौजूदगी से !
कोमल एक गोवानी लड़की थी जो कि कहने को शबाना की मेड थी लेकिन असल में वो उसकी सहयोगी, केयरटेकर, बावर्चिन, वगैरह सब कुछ थी । वो कोई पच्चीस साल की सांवली रंगत वाली लड़की थी जिसकी रंगत वाली कमी उसके बनाने वाले ने उसे खूबसूरती और भरपूर जवानी देकर निकाल दी मालूम होती थी ।
उसकी मालकिन शबाना उम्र में उससे एकाध साल बड़ी परीचेहरा, शोलाबदन, युवती थी जिसको खुदा ने ताजमहल के से अन्दाज से बनाया मालूम होता था ।
ताजमहल कहीं किसी एक की मिल्कियत हो सकता है !
शबाना और कोमलको साथ देखकर हमेशा मुझे रसगुल्ले और गुलाब जामुन का ख्याल आता था ।
मैंने बंद फाटक के एक पहलू में बना एक लैटर बॉक्स सरीखा बक्सा खोला और भीतर लगा एक बटन दबाया ।
“कौन ?” - कुछ क्षण बाद बटन के ऊपर लगे माइक्रोफोन में से शबाना की आवाज आयी ।
“राज।” - मैं बोला ।
“कौन राज?”
“राज । दि ओनली वन ।”
“वैलकम ।”
मैंने बक्से का ढक्कन बंद कर दिया और वापस अपनी फियेट में आ बैठा ।
मेरे सामने लोहे का फाटक अपने आप खुला । मैंने कार आगे बढाई । कार फाटक पार कर गई तो वो वो पीछे अपने आप बंद हो गया । दोनों तरफ लगे पेड़ों के बीच से गुजरते एक लम्बे ड्राइव-वे में कार चलाता हुआ मैं फार्म के बीचोंबीच बने एक छोटे से बंगले के सामने पहुंचा । मैंने कार को पार्किंग में खड़ी एक मारुती 1000 के पीछे रोका और बाहर निकला ।
शबाना मुझे ड्राइंगरूम के दरवाजे पर मिली ।
उस घड़ी वो एक झीनी सी नाइटी पहने थी जिसमें से उसका पुष्ट गोरा बदन साफ झलक रहा था ।
“वैलकम ।” - वो बोली ।
मैं उससे बगलगीर होकर मिला । मेरे तजुर्बेकार हाथ ने एक ही क्षण में उसके जिस्म की कई गोलाईयां टटोल डालीं ।
“अकेली हो ?” - मैं बोला ।
“अब नहीं हूं ।” - वो चेहरे पर एक चित्ताकर्षक मुस्कराहट लाती हुई बोली ।
“नींद तो क्या आती होगी अकेले !”
“नहीं आती । अच्छा हुआ तुम आ गए ।”
“मैं किसी और मकसद से आया हूं ।”
“वो मकसद भी पूरा हो जायेगा ।”
“मैं उस मकसद से नहीं आया ।”
वो तनिक हकबकाई, क्षण भर को उसकी आंखें बर्फ की मानिन्द सर्द हुईं लेकिन फिर तत्काल ही वो अपने मोतियों जैसे दांत चमकाती मुस्कराने लगी । वो मुझे बांह पकड़कर भीतर ले चली और फिर मुझे एक सोफे पर धकेलती हुये बोली - “बैठो ।”
“थैंक्यू !” - मैं बोला ।
“कुछ पियोगे ?” - वो बोली ।
“जो पिलाओगी पी लूंगा ।” - मैं बोला ।
“अच्छा !” - वो इठलाकर बोली - “अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम उस मकसद से नहीं आये हो ।”
“म..मेरा मतलब था जो तुम पियोगी, वो मैं भी पी लूंगा ।”
“मैं अभी आयी ।”
बड़ी मदमाती चाल चलती वो वहां से रुख्सत हो गयी ।
कोई और वक्त होता तो मैं उसे वहीं दबोच लेता लेकिन वो घड़ी बिजनेस को प्लेजर से मिक्स करने की नहीं थी । बड़े नर्वस भाव से मैंने जेब से डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।