S
StoryPublisher
Guest
'विलिंगडन अस्पताल' के वार्ड नम्बर के कमरा नम्बर सत्रह में कृष्ण जगतार लोहे के पलंग के सिरहाने से पीठ लगाए बैठा था और संगतरे का रस पी रहा था। उसने राज को देखा तो एक पल के लिए उसका चेहरा खिल उठा, लेकिन फौरन हो उदासी घिर आई ।
"कहो दोस्त ! " राज ने मुस्कराकर प्यार से पूछा, "अभी सैर से तुम्हारा जी नहीं मरा ?"
कृष्ण जगतार ने इधर-उधर देखा और पूछा, "आपको यहाँ पुलिस तो नहीं लाई ?"
"मैं इन्स्पेक्टर तनेजा से यह मालूम करके ही आया हूँ कि तुम घायल हो और अस्पताल में हो।"
"बैठ जाइये, राज बाबू ! मेरे एक सवाल का जवाब दीजिये !
राज कुर्सी खींचकर कृष्ण के पलंग के पास बैठ गया । वह जानता था कि इन्स्पेक्टर तनेजा बन्द दरवाजे वाले दूसरे कमरे के पीछे से उनकी बातचीत सुन रहा था ।
"राज बाबू ! मैं जानता हूँ कि आप झूठ नहीं बोलेंगे । यह बताइये, मेरे पिता की क्या आपने हत्या की है ?"
"यह क्या कह रहे हो, दोस्त ?"
"राज बाबू ! मैं हाँ' या 'नहीं' में अपने सवाल का जवाब मांगता हूँ ।"
"मैंने तुम्हारे पिता की हत्या नहीं की ।"
“ओ भगवान् ! तेरा लाख लाख धन्यवाद !” कृष्ण आश्वस्त हो गया
‘’ तुम भाग क्यों निकले थे ? तुम मुझे शुरू से सारी कहानी सुनाओ !
"राज बाबू ! कल रात मैं यह जानकर बड़ा खुश हुआ था कि आप मनजीत के जन्म-दिन की पार्टी में शामिल हो रहे हैं। आपर्क मौजूदगी की खबर से मुझे हिम्मत बँधी । मैं अपने पिता से आमने सामने होकर बात करना चाहता था। मैं उनकी लायब्रेरी के गिर्द मंडराता रहा और अवसर की ताक में रहा। मैं उनसे यह कहना चाहता था कि अब उसकी सख्तियों को में सहन नहीं कर सकता। मैं घर से जाना चाहता था और कभी न लौटने का इरादा था—यह बात मैं पिताजी को स्पष्ट कह देना चाहता था ताकि मेरी खोज में वह फिर किसी को मेरे पीछे न भेजें।"
“क्या तुमने अपने पिता से ये बातें कही थीं ?"
'नहीं, राज बाबू ! बहुत-से मेहमान उनके कमरे में आ-जा रहे थे । मैं बीयर का एक ग्लास पीने के लिए डाइनिंग हॉल में चला गया । बीयर पीकर में लोटा । मैंने आपको तेजी के साथ पिताजी के कमरे से निकलकर कॉरीडोर में गायव होते हुए देखा।"
"मुझे देखा ?" राज हैरानी में बोला, "यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो उनके कमरे में दुबारा गया भी नहीं ! "
“क्यों ? क्या कल आपने धारीदार नीला कोट नहीं पहन रखा या ?"
“बारीदार नीला कोट ओह ! कोट तो मेरा ही था, मेरे दोस्त ! लेकिन वह मैंने नहीं, उस समय किसी और ने पहन रखा था।" यह कहकर राज ने उसे समझाया कि कैसे एक खूबसूरत लड़की ने उसके साथ नाचने का प्रस्ताव रखा, कैसे नाच के दौरान वह उसका रिवॉल्वर ले उड़ी, कैसे वह उसके पीछे दौड़ा तो उस पर हमला हुआ, कैसे जब उसे होश आया तो पता लगा कि उसके बदन पर कोट नहीं था ।
यह कहानी सुनकर कृष्ण जगतार हैरान रह गया ।
राज का भी ध्यान उस स्थिति में केंद्रित हो गया कि हत्यारे ने शंकर जगतार की हत्या के लिए उसकी दो चीजें इस्तेमाल कीं- कोट और रिवॉल्वर । एक बात स्पष्ट थी कि कोई मिस्टर शंकर को ठिकाने लगाने के लिए आया था। उसके पास अपना माइलेंसर-चढ़ा पिस्तौल भी था, मगर उसने राज का रिवाल्वर इस्तेमाल करना ज्यादा उचित समझा। उसने कृष्ण से पूछा, "तुमने दो गोलियां चलने की आवाज सुनी या नहीं ?"
"नहीं, किसी ने भी नहीं सुनी। मैं बीयर पीकर पिताजी के कमरे में गया तो देखा कि वह मेज पर सिर रखे सो रहे थे। वह अपने स्टडी रूम में अक्सर वैसे ही सो जाया करते थे, इसलिए मैंने स्वाम ध्यान न दिया । मेरी नजरें तो उनके कैश बॉक्स से निकले हुए करेंसी नोटों पर थीं। चार या साढ़े चार हजार रुपए होंगे। मेरे लिए वह अवसर बेहतरीन था— रुपया लेकर भाग निकलने का । फौरन रुपया मैंने अपनी जेबों में भर लिया।"
"फिर ?" राज ने उत्सुकता से पूछा ।
"फिर मैं गैराज की ओर लपका। मैंने मनजीत की कार का एंजिन स्टार्ट किया। तभी मैंने चीखों की आवाज सुनो। मेरा अन्दाजा था कि शोर का कारण मेरा भाग निकलना रहा होगा। मैंने मेरठ जाकर ही दम लिया। सवेरे अखबार में पिताजी के कत्ल का समाचार पढ़ा तो मेरा जैसे दम हो निकल गया। मेरा विश्वास पक्का हो गया कि उनकी हत्या आपने की है। वैसे मेरा मन इस बात पर विश्वास नहीं ला रहा था। मैं बड़ा परेशान था। मुझे कुछ पता न था कि मैं कहाँ उड़ा जा रहा हूँ। उस परेशानी ही मैं कार टकरा गई। मुझे अस्पताल लाया गया और मैं आपका नाम पुकारता रहा । मैं आपसे यह जानना चाहता था कि आपने ही तो मेरे पिता की हत्या नहीं की ! मैं ठीक हूँ कि पिता के देहान्त का जो झटका लगा था. आपके निर्दोष होने से वह हल्का हो गया है।"
"एक बात बनाओ, कृष्ण ! तुमने जिस आदमी को मेरा कोट पहने हुए देखा था, वह मर्द या या औरत ?" राज ने पूछा।"
"वह जो कोई भी था, मेरे देखते-ही-देखते नजरों से ओझल हो गया था। मैं यह नहीं बता सकता कि मदं था या औरत ।"
"तुमने अभी बताया कि नोट कैश बॉक्स से बाहर बिखरे हुए थे। इसका मतलब तो यह हुआ कि जो कोई भी तुम्हारे पिता की हत्या करने आया, उसे का कोई लालच नहीं था । आपके पिता कंदाक्स में करेंसी नोटों के सिवा क्या कोई और कीमती चीज भी रखते थे ?"
"यह मैं नहीं जानता। वैसे क्या आप यह कह रहे हैं कि हमलावर ने कैश बॉक्स खोलकर करेंसी नोट तो निकालकर फेंक दिये थे और वह कैश बॉक्स में कोई और चीज़ खोज रहा था ? नोट छोड़कर वह अपनी मनचाही चीज निकालकर ले गया ?"
"हाँ, कृष्ण ! मैं तो यही समझता हूँ ।" राज ने कहा और इस चालाक सुन्दरी का हुलिया बताकर पूछा, “क्या तुम उस युवती को जानते हो ?"
"नहीं।"
"देखो, कृष्ण ! सच्चाई यह है कि तुमने घर से भागकर अपने को पिता का हत्यारा सिद्ध कर दिया है। हालांकि, मुझे विश्वास है कि तुम मासूम और बेगुनाह हो । अब मुझे यह सिद्ध करना होगा कि तुमने अपने पिता की हत्या नहीं की ।"
"तो क्या पुलिस मुझे हिरासत में लेने पर उतारू है ?" कृष्ण जगतार ने घबराकर पूछा ।
"घबराओ नहीं, पुलिस तुम्हें हिरासत में नहीं लेगी। बस, तुम जल्दी से अच्छे हो जाओ !" कहकर राज ने कृष्ण जगतार के कन्धे पर प्यार से थपकी दी और उठ खड़ा हुआ। वह दरवाज़े की ओर बढ़ा और कृष्ण उसे श्रद्धा के साथ देखता रहा ।
…………………………….
"कहो दोस्त ! " राज ने मुस्कराकर प्यार से पूछा, "अभी सैर से तुम्हारा जी नहीं मरा ?"
कृष्ण जगतार ने इधर-उधर देखा और पूछा, "आपको यहाँ पुलिस तो नहीं लाई ?"
"मैं इन्स्पेक्टर तनेजा से यह मालूम करके ही आया हूँ कि तुम घायल हो और अस्पताल में हो।"
"बैठ जाइये, राज बाबू ! मेरे एक सवाल का जवाब दीजिये !
राज कुर्सी खींचकर कृष्ण के पलंग के पास बैठ गया । वह जानता था कि इन्स्पेक्टर तनेजा बन्द दरवाजे वाले दूसरे कमरे के पीछे से उनकी बातचीत सुन रहा था ।
"राज बाबू ! मैं जानता हूँ कि आप झूठ नहीं बोलेंगे । यह बताइये, मेरे पिता की क्या आपने हत्या की है ?"
"यह क्या कह रहे हो, दोस्त ?"
"राज बाबू ! मैं हाँ' या 'नहीं' में अपने सवाल का जवाब मांगता हूँ ।"
"मैंने तुम्हारे पिता की हत्या नहीं की ।"
“ओ भगवान् ! तेरा लाख लाख धन्यवाद !” कृष्ण आश्वस्त हो गया
‘’ तुम भाग क्यों निकले थे ? तुम मुझे शुरू से सारी कहानी सुनाओ !
"राज बाबू ! कल रात मैं यह जानकर बड़ा खुश हुआ था कि आप मनजीत के जन्म-दिन की पार्टी में शामिल हो रहे हैं। आपर्क मौजूदगी की खबर से मुझे हिम्मत बँधी । मैं अपने पिता से आमने सामने होकर बात करना चाहता था। मैं उनकी लायब्रेरी के गिर्द मंडराता रहा और अवसर की ताक में रहा। मैं उनसे यह कहना चाहता था कि अब उसकी सख्तियों को में सहन नहीं कर सकता। मैं घर से जाना चाहता था और कभी न लौटने का इरादा था—यह बात मैं पिताजी को स्पष्ट कह देना चाहता था ताकि मेरी खोज में वह फिर किसी को मेरे पीछे न भेजें।"
“क्या तुमने अपने पिता से ये बातें कही थीं ?"
'नहीं, राज बाबू ! बहुत-से मेहमान उनके कमरे में आ-जा रहे थे । मैं बीयर का एक ग्लास पीने के लिए डाइनिंग हॉल में चला गया । बीयर पीकर में लोटा । मैंने आपको तेजी के साथ पिताजी के कमरे से निकलकर कॉरीडोर में गायव होते हुए देखा।"
"मुझे देखा ?" राज हैरानी में बोला, "यह तुम क्या कह रहे हो ? मैं तो उनके कमरे में दुबारा गया भी नहीं ! "
“क्यों ? क्या कल आपने धारीदार नीला कोट नहीं पहन रखा या ?"
“बारीदार नीला कोट ओह ! कोट तो मेरा ही था, मेरे दोस्त ! लेकिन वह मैंने नहीं, उस समय किसी और ने पहन रखा था।" यह कहकर राज ने उसे समझाया कि कैसे एक खूबसूरत लड़की ने उसके साथ नाचने का प्रस्ताव रखा, कैसे नाच के दौरान वह उसका रिवॉल्वर ले उड़ी, कैसे वह उसके पीछे दौड़ा तो उस पर हमला हुआ, कैसे जब उसे होश आया तो पता लगा कि उसके बदन पर कोट नहीं था ।
यह कहानी सुनकर कृष्ण जगतार हैरान रह गया ।
राज का भी ध्यान उस स्थिति में केंद्रित हो गया कि हत्यारे ने शंकर जगतार की हत्या के लिए उसकी दो चीजें इस्तेमाल कीं- कोट और रिवॉल्वर । एक बात स्पष्ट थी कि कोई मिस्टर शंकर को ठिकाने लगाने के लिए आया था। उसके पास अपना माइलेंसर-चढ़ा पिस्तौल भी था, मगर उसने राज का रिवाल्वर इस्तेमाल करना ज्यादा उचित समझा। उसने कृष्ण से पूछा, "तुमने दो गोलियां चलने की आवाज सुनी या नहीं ?"
"नहीं, किसी ने भी नहीं सुनी। मैं बीयर पीकर पिताजी के कमरे में गया तो देखा कि वह मेज पर सिर रखे सो रहे थे। वह अपने स्टडी रूम में अक्सर वैसे ही सो जाया करते थे, इसलिए मैंने स्वाम ध्यान न दिया । मेरी नजरें तो उनके कैश बॉक्स से निकले हुए करेंसी नोटों पर थीं। चार या साढ़े चार हजार रुपए होंगे। मेरे लिए वह अवसर बेहतरीन था— रुपया लेकर भाग निकलने का । फौरन रुपया मैंने अपनी जेबों में भर लिया।"
"फिर ?" राज ने उत्सुकता से पूछा ।
"फिर मैं गैराज की ओर लपका। मैंने मनजीत की कार का एंजिन स्टार्ट किया। तभी मैंने चीखों की आवाज सुनो। मेरा अन्दाजा था कि शोर का कारण मेरा भाग निकलना रहा होगा। मैंने मेरठ जाकर ही दम लिया। सवेरे अखबार में पिताजी के कत्ल का समाचार पढ़ा तो मेरा जैसे दम हो निकल गया। मेरा विश्वास पक्का हो गया कि उनकी हत्या आपने की है। वैसे मेरा मन इस बात पर विश्वास नहीं ला रहा था। मैं बड़ा परेशान था। मुझे कुछ पता न था कि मैं कहाँ उड़ा जा रहा हूँ। उस परेशानी ही मैं कार टकरा गई। मुझे अस्पताल लाया गया और मैं आपका नाम पुकारता रहा । मैं आपसे यह जानना चाहता था कि आपने ही तो मेरे पिता की हत्या नहीं की ! मैं ठीक हूँ कि पिता के देहान्त का जो झटका लगा था. आपके निर्दोष होने से वह हल्का हो गया है।"
"एक बात बनाओ, कृष्ण ! तुमने जिस आदमी को मेरा कोट पहने हुए देखा था, वह मर्द या या औरत ?" राज ने पूछा।"
"वह जो कोई भी था, मेरे देखते-ही-देखते नजरों से ओझल हो गया था। मैं यह नहीं बता सकता कि मदं था या औरत ।"
"तुमने अभी बताया कि नोट कैश बॉक्स से बाहर बिखरे हुए थे। इसका मतलब तो यह हुआ कि जो कोई भी तुम्हारे पिता की हत्या करने आया, उसे का कोई लालच नहीं था । आपके पिता कंदाक्स में करेंसी नोटों के सिवा क्या कोई और कीमती चीज भी रखते थे ?"
"यह मैं नहीं जानता। वैसे क्या आप यह कह रहे हैं कि हमलावर ने कैश बॉक्स खोलकर करेंसी नोट तो निकालकर फेंक दिये थे और वह कैश बॉक्स में कोई और चीज़ खोज रहा था ? नोट छोड़कर वह अपनी मनचाही चीज निकालकर ले गया ?"
"हाँ, कृष्ण ! मैं तो यही समझता हूँ ।" राज ने कहा और इस चालाक सुन्दरी का हुलिया बताकर पूछा, “क्या तुम उस युवती को जानते हो ?"
"नहीं।"
"देखो, कृष्ण ! सच्चाई यह है कि तुमने घर से भागकर अपने को पिता का हत्यारा सिद्ध कर दिया है। हालांकि, मुझे विश्वास है कि तुम मासूम और बेगुनाह हो । अब मुझे यह सिद्ध करना होगा कि तुमने अपने पिता की हत्या नहीं की ।"
"तो क्या पुलिस मुझे हिरासत में लेने पर उतारू है ?" कृष्ण जगतार ने घबराकर पूछा ।
"घबराओ नहीं, पुलिस तुम्हें हिरासत में नहीं लेगी। बस, तुम जल्दी से अच्छे हो जाओ !" कहकर राज ने कृष्ण जगतार के कन्धे पर प्यार से थपकी दी और उठ खड़ा हुआ। वह दरवाज़े की ओर बढ़ा और कृष्ण उसे श्रद्धा के साथ देखता रहा ।
…………………………….