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Badla बदला compleet

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गतान्क से आगे...

"उम्म..छ्चोड़ो ना....प्लीज़!!!!...औउ मा...ऊव्व.....!",अंधेरे कमरे मे

रजनी की मस्त आवाज़े गूँज रही थी.वो अपने प्रेमी को बस सतही तौर पे मना

कर रही थी की वो उसके जिस्म से और ना खेले मगर उसका दिल तो चाहता था कि

अब बस पूरी उम्र बस वो ऐसे ही उसके मज़बूत जिस्म की पनाह मे पड़ी

रहे.इंदर & वो बिस्तर पे लेटे थे & इंदर उसकी चूत के दाने को दाए हाथ की

उंगली & अंगूठे से पकड़ के हल्के-2 मसल रहा था & उसकी ये हरकत रजनी को

जोश से पागल कर रही थी.

"तुम तो कहती थी कि तुम्हारे बॉस बीमार हैं मुझे तो बिल्कुल तन्दरुस्त

नज़र आए.",इंदर ने उसके होंठो पे अपनी ज़ुबान फिराई.

"उम्म...",जवाब मे उसने उसकी ज़ुबान को अपने मुँह के अंदर खींच लिया न&

कुछ पल उसे चूमती रही,"..नही इंदर,वो सचमुच बीमार है.यकीन मानो उन्हे दिल

की बीमारी है."

"अच्छा.."..तो फिर मेरी दवा अपना कमाल क्यू नही दिखा रही.कितनी मुश्किल

से उसने उस दवा का नाम & फिर उसकी जगह उस स्लो पॉइजान को ढुंडा था (ये

कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है )जो उसने उनकी

दवा की जगह रखा था...कही सहाय ने उसकी रखी डिबिया बदल के नयी डिबिया तो

नही ले ली..अब ये कैसे पता चलेगा?..यानी उसे कुच्छ और तरीका अपनाना

पड़ेगा...,"अहह...ह......ऊहह...ऊहह...!",उसकी उंगलियो की हरकत से झड़ती

रजनी ने उसके ख्यालो को तोड़ा.

वो उसके बाई तरफ लेटी साँसे लेती हुई अपने जिस्म को अभी-2 मिली खुशी का

पूरा लुत्फ़ उठा रही थी.इंदर ने उसे करवट ले अपनी ओर घुमाया फिर उसकी बाई

टाँग हवा मे उठा के खुद भी अपनी बाई करवट पे हुआ & अपना लंड उसकी उसके रस

से भीगी चूत मे पेल दिया,"..ऊव्वववव....!",रजनी अपनी टांग उसकी कमर पे

कसते हुए उसके सीने से लिपट गयी.अपना बाया हाथ इंदर ने रजनी की गर्दन के

नीचे लगाया & दाए से उसकी गंद मसल्ने लगा.

"और तुम्हारे भाईय्या?"

"प्रसून भाय्या...",आज रजनी को इंदर के घर पे बिताई उस दोपहर से भी

ज़्यादा मज़ा आ रहा था,"..उनके बारे मे 1 मज़ेदार बात बताऊं?"

"हूँ.",इंदर के कन खड़े हो गये मगर वो झुक के उसकी ठुड्डी ऐसे चूमने लगा

मानो उसे कोई खास मतलब ना हो इस बात से.

"उम्म्म्म....!",रजनी ने अपना बाया हाथ उसकी पीठ पे फिराते हुए उसकी गंद

को सहलाया,"..मॅ'म उनकी शादी करना चाहती हैं."

"क्या?!",चौंक के इंदर उसकी ठुड्डी छोड़ उसे देखने लगा.

"हां..",& फिर चुद्ते हुए रजनी ने झड़ने तक उसे बताया की कैसे शाम लाल जी

के आने पे उसके कान मे ये बात पड़ी थी & देविका & सुरेन सहाय अपने वकील

से भी इस बारे मे बात कर रहे थे.झड़ने के कुछ देर बाद इंदर ने लंड निकाला

तो रजनी ने थकान से चूर हो आँखे बंद कर ली.उसे सोता देखा इंदर उठा & कमरे

की खिड़की तक चला गया.अभी भी बारिश वैसे ही ताबड़तोड़ हो रही थी....आख़िर

उसे इस बात का पता कैसे नही चला?..ये शादी तो नही हो सकती किसी भी हालत

मे नही!..(ये कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है

)उसका पूरा प्लान चौपट हो जाएगा अगर उस पागल की शादी हो गयी तो.ये शादी

का ख़याल तो पक्का देविका के दिमाग़ की उपज होगा.सुरेन सहाय के बस का नही

था ऐसा सोचन.उसने जितना सोचा था देविका उस से भी कही ज़्यादा चालाक थी.आज

वो बहुत खुश था वो एस्टेट मे घुस जो गया था मगर इस नयी खबर ने उसकी खुशी

काफूर कर दी थी.

उसका दिल बेचैन हो उठा & उसे शराब की तलब लगी मगर यहा शराब थी कहा.वो

मुड़ा & रजनी की ओर देखा.वो बेख़बर सो रही थी.उसने अपने कपड़े पहने & सोई

हुई रजनी के बदन पे चादर डाली & वाहा से निकल उसके क्वॉर्टर के ठीक उपर

अपने क्वॉर्टर मे चला गया.

कामिनी ने आँखे खोल खिड़की के बाहर देखा तो पाया की सुबह हो चुकी थी &

बारिश भी रुक चुकी थी मगर बादल अभी भी छाए थे.रात काफ़ी देर तक वीरेन

सहाय पैंटिंग बनाता रहा था & कोई 1 बजे उसने उसे छ्चोड़ा था.वो उसी के

गेस्ट रूम मे अभी सोकर उठी थी.

बिस्तर से उतरी तो कामिनी ने देखा की उसके कपड़े आइरन करके पास पड़ी

कुर्सी पे रखे थे.घर मे कोई नौकर तो आया नही लगता था फिर इन कपड़ो को

प्रेस किसने किया?कामिनी की ब्रा & पॅंटी भी वाहा रखे थे....यानी की

वीरेन ने ही उसके कपड़े वाहा रखे थे..उसने उसके अंडरगार्मेंट्स भी

छुए..इस ख़याल से कामिनी के गाल शर्म से लाल हो गये.

रात को वो वीरेन की दी सारी पहन के ही सो गयी थी.सारी उतार अपने कपड़े

पहनते हुए उसे रात की बाते याद आ गयी.(ये कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग

कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है )पैंटिंग बनाते वक़्त दोनो ने 1 दूसरे से

नज़रो का जो खेल खेला था उसने उसके दिल मे अभी फिर से गुदगुदी पैदा कर दी

& उसके होंठो पे मुस्कान फैल गयी.

कपड़े पहन वो बाहर आई,"गुड मॉर्निंग,कामिनी जी!"

"गुड मॉर्निंग."

"आइए चाइ पीजिए.",दोनो बैठ के चाइ पीने लगे.चाइ पीते वक़्त भी कामिनी ने

गौर किया की वीरेन बीच-2 मे उसके चेहरे को देख रहा था.चाइ पीते हुए कोई

खास बातचीत नही हुई & उसके ख़त्म होते ही कामिनी ने चलने की बात की.

"चलिए मैं छ्चोड़ देता हू.",वीरेन उठा & थोड़ी ही देर बाद दोनो उसकी कार

मे कामिनी के घर के लिए रवाना हो गये.घर पहुँचते ही कामिनी ने वीरेन को

उसके घर मे आ साथ नाश्ता करने का न्योता दिया मगर वीरेन ने काम का बहाना

कर उसे शालीनता से मना कर दिया.

कार गियर मे डाल उसने कामिनी की ओर देखा,"तो आज शाम आप आ रही हैं ना?"

"हां.आने के पहले मे आपको फोन कर दूँगी."

"ओके.तो शाम को मिलते हैं.",वीरेन की नज़रे उसके चेहरे से फिसल उसके झीनी

सारी मे से झाँकते उसके क्लीवेज पे आई मगर फ़ौरन सँभाल गयी.उसने क्लच

छ्चोड़ा तो कार आगे बढ़ गयी & वाहा से निकल गयी.

वीरेन ने कहा था की पैंटिंग बनाने मे समय लगता है & अभी कामिनी को उसके

पास कुच्छ दीनो तक आना पड़ेगा.कामिनी इसके लिए तैय्यार हो गयी थी,उसने

कहा की शाम को काम के बाद जो 2-3 घंटे उसके पास बचते थे उसी समय मे वो

उसकी पैंटिंग के लिए आ जाया करेगी.

वीरेन की कार नज़रो से ओझल हुई तो कामिनी ने दरवाज़ा खोला & गुनगुनाते

हुए घर मे दाखिल हुई.वीरेन की दिलचस्पी ने उसके दिल मे भी उमंगे पैदा कर

दी थी.वो अपने कमरे मे गयी & काम के लिए तैय्यार होने लगी.अभी तो उसे

कोर्ट जाना था मगर उसका दिल चाह रहा था (ये कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग

कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है )क फ़ौरन शाम हो जाए & वो वीरेन के बंगल पे

पहुँच जाए ये देखने के लिए की आज दोनो का नज़रो का खेल कहा तक पहुँचता

है.

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"तो इंदर जी,समझ मे आ गया आपको सारा काम?",उसकी लाई फाइल पे सुरेन सहाय

ने दस्तख़त किए.

"यस सर.स्टाफ के लोग काफ़ी मदद कर रहे हैं इसलिए कोई परेशानी नही हो रही है."

"बहुत अच्छे लेकिन अगर कोई भी परेशानी हो तो मुझे ज़रूर बताएँ."

"थॅंक यू,सर.",इंदर फाइल ले वाहा से बाहर निकलने लगा.दरवाज़ा खोलते ही

उसने देखा की शिवा वाहा 1 फाइल लिए चला आ रहा था.दोनो ने मुस्कुरा के 1

दूसरे को ग्रीट किया & फिर शिवा अंदर घुस गया & इंदर बाहर चला गया.

"सर,ये उस सेक्यूरिटी सिस्टम्स वाली कंपनी ने अपना कोटेशन दिया है,1 बार

आप इसे चेक कर लीजिएगा."

"ओके.शिवा.1 बात बताओ भाई?"

"पुच्हिए,सर."

"क्या हमे सच मे इन चीज़ो की ज़रूरत है?"

"बिल्कुल है,सर.",शिवा ने उनपे बहुत ज़ोर डाला था की एस्टेट की हिफ़ाज़त

के लिए अब बाडो & तारो से उपर उठना पड़ेगा,"..सर,बाडेन & तार तो ठीक है

मगर इतने बड़े इलाक़े के चप्पे-2 पे हर वक़्त नज़र रखना तो मुश्किल है

चाहे आप कितने भी आदमी क्यू ना भरती कर ले.ये मशीन्स हमारे काम को आसान

करेंगी & हम अपना सेक्यूरिटी स्टाफ भी कोई 20% तक कम कर सकते हैं.."

"..जो पैसे यहा खर्च हो रहे हैं,आप ये सोचिए की वो पैसे सेकर्टी स्टाफ को

कम कर के बचा लिए जाएँगे."

"हूँ,तुम्हारी बात तो ठीक लगती है,फिर भी मैं 1 बार ये कोटेशन & इस मामले

मे तुमने जो मुझे रिपोर्ट मुझे दी थी उसे फिर से पढ़ लेता हू."

"ओके,सर.",शिवा वाहा से चला गया.

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"वाउ!",कामिनी वीरेन के साथ उसके स्टूडियो मे खड़ी उसकी बनाई खुद की

पैंटिंग देख रह थी,"..कितनी सुंदर पैंटीइंग बनाई है वीरेन आपने..मैं ऐसी

दिखती हू क्या?!...यकीन नही होता.ये आपके हाथो का कमाल है!",वीरेन की

पैंटिंग मे कामिनी की शख्सियत पूरी उभर के आई थी.पैंटिग देखने पे ये लगता

था मानो को रानी अपने दीवान पे बैठी हो,उसके चेहरे पे रौब झलक रहा था मगर

वो घमंडी नही लग रही थी बल्कि बड़ी ही अज़ीम लग रही थी.

"जी नही.ये आपकी शख्सियत का कमाल है.आप जैसी हैं वैसे ही मैने उसे इस

काग़ज़ पे उतार दिया है.",वीरेन मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था.उसकी

नज़रो मे अपनी तारीफ देख 1 पल को कामिनी जैसी विश्वास से भरी लड़की की

पॅल्को पे भी हया का बोझ आ पड़ा(ये कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग

कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है ).नज़रे झुका के वो फिर से अपनी तस्वीर

देखने लगी,वो जानती थी की वीरेन अभी भी उसे देखे जा रहा है.

"पैंटिंग तो बन गयी यानी मेरा काम ख़त्म?",उसने बात बदली.

"ख़त्म!अभी तो आपका काम शुरू हुआ है मोहतार्मा!"

"क्या मतलब?"

"मतलब ये की ये तो पहली तस्वीर है.अभी तो मैं तब तक आपकी तस्वीरे

बनाउन्गा जब तक की मुझे ये ना लगे कि अब आपकी शख्सियत का कोई भी पहलू

दिखाने को बाकी नही रहा है."

"आप भी ना!अब ऐसी भी कोई खास बात नही है मुझमे.",कामिनी ने बोल तो दिया

मगर वीरेन की बातो ने उसके दिल मे बहुत खुशी भर दी थी.

"..जिसका मतलब है की मैं आपकी पेंटिंग्स बनाता रहूँगा.",वीरेन ने जैसे

उसकी बात सुनी ही नही थी.

"प्लीज़!अब और तारीफ मत कीजिए वरना मुझमे गुरूर आ जाएगा."

"बिना गुरूर के तो हुस्न फीका ही लगेगा.",इस आख़िरी बात ने तो कामिनी के

गालो को शर्म से और भी सुर्ख कर दिया.

"अच्छा-2.तो आज कौन सी पेनिंट्ग बनाएँगे मेरी?"

"अभी बताता हू.",वीरेन ने पास का कपबोर्ड खोला.बरसो बाद वो किसी लड़की के

लिए अपने दिल मे ऐसे जज़्बात महसूस कर रहा था.ऐसा नही था कामिनी से मिलने

से पहले उसका किसी लड़की से कोई रिश्ता नही था.कयि लड़किया आई & गयी मगर

कोई भी उसके दिल मे ऐसी जगह नही बना पाई की वीरेन को लगे की वो उसके बगैर

जी नही सकता.बस 1 लड़की थी जिसने उसके दिल मे ये एहसास पैदा किया था मगर

वो..

उसने अपने माज़ी के बारे मे सोचना छ्चोड़ा.वो जो भी था,जैसा भी था,बीत

चुका था & ये खूबसूरत लड़की जो उसके स्टूडियो मे खड़ी थी ये हक़ीक़त थी &

उसे अब बस इसी बात से मतलब था.
 
"आज आप ये लिबास पहेनिए.",उसने उसे काले रंग का 1 लहंगा-चोली थमाया & 1

छ्होटा सा बॉक्स भी.कामिनी ने उसे खोला तो उसमे कुच्छ चाँदी के ज़वरात

थे.उसने सभी चीज़े ले वीरेन की ओर सवालिया नज़रो से देखा.

"कामिनी,मैं आपको हर इंसानी जज़्बात को महसूस करते हुए दिखाना चाहता

हू..इस तस्वीर मे आप 1 बहुत ही विश्वास से भरी औरत नज़र आ रही हैं जोकि

आप हक़ीक़त मे भी हैं.",उसने अपनी बनाई हुई पैंटिंग की ओर इशारा

किया,"..अब अगली पैंटिंग मे मैं आपको गम महसूस करते हुए दिखाना चाहता

हू-इंतेज़ार का गम.ये लिबास हमारे गाओं की लड़किया अभी भी पहनती हैं.(ये

कहानी आप राज शर्मा के ब्लॉग कामुक-कहानियाँ में पढ़ रहे है )ये ज़वरात

आपके जिस्म पे सजे ये दिखाएँगे की आपको धन-दौलत की कमी नही है मगर जो

चीज़ आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है,सबसे खास है आपके लिए वोही आपके

पास मौजूद नही & आप उसी के इंतेज़ार मे हैं."

वीरेन अपनी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित था & इस वक़्त कामिनी 1

कलाकार को ही सुन रही थी.वीरेन की बात पूरी होने पे वो मुस्कुराइ &

बाथरूम की ओर बढ़ गयी.कुच्छ लम्हो बाद जब वो बाहर आई तो उसे देख वीरेन का

मुँह हैरत से खुला रह गया.वो 1 पेंटर था & आम लोगो के मुक़ाबले उसकी

इमॅजिनेशन कुच्छ ज़्यादा सॉफ होती थी.ये लिबास चुनते वक़्त उसके दिमाग़

ने कामिनी की 1 तस्वीर बना ली थी कि वो कैसी दिखेगी मगर इस वक़्त जो

लड़की उसके सामने खड़ी थी वो उस तस्वीर वाली कामिनी से कही ज़्यादा हसीन

& दिलकश लग रही थी.

चोली थोड़ी तंग थी & इस वजह से कामिनी की छातिया आपस मे दब गयी थी & चोली

के गले से उसका क्लीवेज थोड़ा और उभर आया था.हाथो मे चूड़ियाँ खनक रही थी

& चलते हुए पैरो मे पायल.पतली कमर पे वो चाँदी का कमरबन्द झूल रहा था &

उसके उपर उसकी गहरी,गोल नाभि चमक रही थी.वीरेन ने उसके माथे पे चमक रही

बड़ी सी लाल बिंदी को देखा तो उसका दिल किया की इसी वक़्त उसे आगोश मे भर

उसके माथे को चूम ले & अपने जज़्बातो का इज़हार कर दे उस से.

वीरेन की निगाहे लगातार उसे देखे जा रही थी & कामिनी उन नज़रो की तपिश से

शर्मा रही थी & बेचैन भी हो रही थी,"क्या देख रहे हैं?",उसकी खनकती आवाज़

ने वीरेन को जगाया.

"हुन्न...हा-हन...क-कुच्छ नही..आइए यहा खड़े होइए..ऐसे.",वीरेन ने उसे

कमरे की बड़ी खिड़की के पास खड़ा कर के बाहर देखने को कहा.अब कामिनी की

पीठ उसकी तरफ थी.चोली की डोरिया पीठ के आर-पार हो रही थी मगर पीठ कमर तक

लगभग पूरी नुमाया ही थी.वीरेन ने उसकी पीठ से लेके कमर तक निहारा.पतली

कमर के बाहरी कोने फैलते हुए लहँगे मे गायब हो गये

थे....उफफफ्फ़....कितनी चौड़ी गंद थी & कितनी भरी हुई!उसका दिल किया की 1

बार उस दिलकश अंग पे अपने हाथ फिरा ले मगर उसने खुद पे काबू रखा & अपने

ईज़ल के पास खड़ा हो गया.

अब कामिनी अपने हाथ खिड़की के बदन शीशे पे रखे हुए बाहर देख रही थी,उसका

चेहरा थोड़ा सा दाई तरफ घुमा हुआ था & वीरेन भी उसके पीछे उसी तरफ खड़ा

अपनी कूची चला रहा था.कामिनी को ये तो पता चल गया था की उसके रूप ने

वीरेन के दिल को पूरी तरह से घायल कर दिया है & इस वक़्त वो कल की तरह

उसके चेहरे को देख नही पा रही थी इसलिए उसे ऐसा लग रहा था की पैंटिंग

करता वीरेन अपनी आँखो से उसके जवान हुस्न के घूँट पी रहा है.इस ख़याल ने

उसके दिल मे खलबली मचा दी थी.

इन्ही ख़यालो मे गुम वो खिड़की से बाहर बंगल के लॉन को देख रही थी

कि,"हाअ..!",अपनी कमर पे कुच्छ महसूस कर वो चौंक पड़ी.

"मैं हू.आप वैसे ही खड़े रहिए,प्लीज़.बिल्कुल भी मत हीलिएगा.",वीरेन ने

उसकी कमर की बाई ओर बँधी लहँगे की डोरी को ढीला कर दिया.कामिनी को इतनी

हैरानी हुई की पूछो मत..इसका इरादा क्या था?क्या वो उसको.."वीरेन..",उसने

उसे टोका.

"बस 1 मिनिट.",वीरेन के हाथो की लंबी उंगलिया उस डोरी को खोल लहँगे को

थोडा नीचे कर रही थी & फिर कस रही थी.उसके हाथो की कोमल छुअन ने कामिनी

के जिस्म की आग को भड़का दिया.वीरेन ने डोरी कस कर कमर को पकड़ के थोड़ा

सा हिला के सही पोज़िशन मे किया & वापस ईज़ल के पास चला गया.कामिनी की

चूत मे कसक सी उठी & उसका दिल किया की काश वीरेन उसके लहँगे को खोल अपनी

लंबी उंगलिया उसकी चूत मे घुसा देता.(दोस्तो ये कहानी आप राजशर्मास्टॉरीजडॉटकॉम पर पढ़ रहे है)

इस गुस्ताख ख़याल के आते ही उसकी आँखे बंद

हो गयी & गले से बहुत धीमी सी आह निकली.

"क्या हुआ कामिनी?",वीरेन ने चिंतित हो पुचछा.

"क-कुच्छ नही.",कामिनी ने खुद को संभाला & खिड़की से बाहर देख अपने

दिमाग़ से वीरेन का ख़याल हटाने लगी.

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क्रमशः........
 


BADLA paart--17

gataank se aage...

"umm..chhodo na....please!!!!...ouuiii maa...ooww.....!",andhere kamre

me Rajni ki mast avaze gunj rahi thi.vo apne premi ko bas satahi taur

pe mana kar rahi thi ki vo uske jism se aur na khele magar uska dil to

chahta tha ki ab bas puri umra bas vo aise hi uske mazboot jism ki

panah me padi rahe.inder & vo bistar pe lete the & inder uski chut ke

dane ko daye hath ki ungli & anguthe se pakad ke halke-2 masal raha

tha & uski ye harkar rajni ko josh se pagal kar rahi thi.

"tum to kehti thi ki tumhare boss bimar hain mujhe to bilkul tandarust

nazar aye.",inder ne uske hontho pe apni zuban firayi.

"umm...",jawab me usne uski zuban ko apne munh ke andar khinch liya n&

kuch pal use chumti rahi,"..nahi inder,vo sachmuch bimar hai.yakin

mano unhe dil ki bimari hai."

"achha.."..to fir meri dawa apna kamal kyu nahi dikha rahi.kitni

mushkil se usne us dawa ka nam & fir uski jagah us slow poison ko

dhoonda tha jo usne unki dawa ki jagah rakha tha...kahi sahay ne uski

rakhi dibiya badal ke nayi dibiya to nahi le li..ab ye kaise pata

chalega?..yani use kuchh aur tareeka apnana

padega...,"ahhhhh...ahhhh......oohhhhhh...oohh...!",uski ungliyo ki

harkat se jhadti rajni ne uske khaylo ko toda.

vo uske bayi taraf leti sanse leti hui apne jism ko abhi-2 mili khushi

ka pura lutf utha rahi thi.inder ne use karwat le apni or ghumaya fir

uski bayi tang hawa me utha ke khud bhi apni bayi karwat pe hua & apna

lund uski uske ras se bhigi chut me pel diya,"..oowwwww....!",rajni

apni tang uski kamar pe kaste hue uske seene se lipat gayi.apna baya

hath inder ne rajni ki gardan ke neeche lagaya & daye se uski gand

masalne laga.

"aur tumhare bhaiyya?"

"Prasun bhaiyya...",aaj rajni ko inder ke ghar pe bitayi us dopahar se

bhi zyada maza aa raha tha,"..unke bare me 1 mazedar bat bataoon?"

"hun.",inder ke kan khade ho gaye magar vo jhuk ke uski thuddi aise

chumne laga mano use koi khas matlab na ho is baat se.

"ummmm....!",rajni ne apna baya hath uski pith pe firate hue uski gand

ko sehlaya,"..ma'am unki shadi karna chahti hain."

"kya?!",chaunk ke inder uski thuddi chod use dekhne laga.

"haan..",& fir chudte hue rajni ne jhadne tak use bataya ki kaise Sham

Lal ji ke aane pe uske kaan me ye baat padi thi & devika & suren sahay

apne vakil se bhi is bare me bat kar rahe the.jhadne ke kuch der baad

inder ne lund nikala to rajni ne thakan se chur ho aankhe band kar

li.use sota dekha inder utha & kamre ki khidki tak chala gaya.abhi bhi

barish vaise hi tabdtod ho rahi thi....akhir use is bat ka pata kaise

nahi chala?..ye shadi to nahi ho sakti kisi bhi halat me nahi!..uska

pura plan chaupat ho jayega agar us pagal ki shadi ho gayi to.ye shadi

ka khayal to pakka devika ke dimagh ki upaj hoga.suren sahay ke bas ka

nahi tha aisa sochan.usne jitna socha tha devika us se bhi kahi zyada

chalak thi.aj vo bahut khush tha vo estate me ghus jo gay tha magar is

nayi khabar ne uski khushi kafur kar di thi.

uska dil bechain ho utha & use sharab ki talab lagi magar yaha sharab

thi kaha.vo muda & rajni ki or dekha.vo bekhabar so rahi thi.usne apne

kapde pehne & soyi hui rajni ke badan pe chadar dali & vaha se nikal

uske quarter ke thik upar apne quarter me chala gaya.

Kamini ne aankhe khol khidki ke bahar dekha to paya ki subah ho chuki

thi & barish bhi ruk chuki thi magar baadal abhi bhi chhaye the.raat

kafi der tak Viren Sahay painting banata raha tha & koi 1 baje usne

use chhoda tha.vo usi ke guest room me abhi sokar uthi thi.

bistar se utri to kamini ne dekha ki uske kapde iron karke paas padi

kursi pe rakhe the.ghar me koi naukar to aaya nahi lagta tha fir in

kapdo ko press kisne kiya?kamini ki bra & panty bhi vaha rakhe

the....yani ki viren ne hi uske kapde vaha rakhe the..usne uske

undergarments bhi chhue..is khayal se kamini ke gaal sharm se laal ho

gaye.

raat ko vo viren ki di sari pehan ke hi so gayi thi.sari utar apne

kapde pehante hue use raat ki baate yaad aa gayi.painting banate waqt

dono ne 1 dusre se nazro ka jo khel khela tha usne uske dil me abhi

fir se gudgudi paida kar di & uske hontho pe muskan fail gayi.

kapde pehan vo bahar aayi,"good morning,kamini ji!"

"good morning."

"aaiye chai pijiye.",dono baith ke chai peene lage.chai peete waqt bhi

kamini ne gaur kiya ki viren beech-2 me uske chere ko dekh raha

tha.chai peete hue koi khas baatchit nahi hui & uske khatm hote hi

kamini ne chalne ki baat ki.

"chaliye main chhod deta hu.",viren utha & thodi hi der baad dono uski

car me kamini ke ghar ke liye ravana ho gaye.ghar pahunchte hi kamini

ne viren ko uske ghar me aa sath nashta karne ka nyota diya mgar viren

ne kaam ka bahana kar use shalinta se mana kar diya.

car gear me daal usne kamini ki or dekha,"to aaj sham aap aa rahi hain na?"

"haan.aane ke pehle me aapko fone kar dungi."

"ok.to sham ko milte hain.",viren ki nazre uske chehre se fisal usk

jhini sari me se jhankte uske cleavage pe aayi magar fauran sambhal

gayi.usne clutch chhoda to car aage badh gayi & vaha se nikal gayi.

viren ne kaha tha ki painting banane me samay lagta hai & abhi kamini

ko uske paas kuchh dino tak aana padega.kamini iske liye taiyyar ho

gayi thi,usne kaha ki sham ko kaam ke baad jo 2-3 ghante uske paas

bachte the usi samay me vo uski painting ke liye aa jaya karegi.

viren ki car nazro se ojhal hui to kamini ne darwaza khola & gungunate

hue ghar me dakhil hui.viren ki dilchaspi ne uske dil me bhi umange

paida kar di thi.vo apne kamre me gayi & kaam ke liye taiyyar hone

lagi.abhi to use court jana tha magar uska dil chah raha tha k fauran

sham ho jaye & vo viren ke bungle pe pahunch jaye ye dekhne ke liye ki

aaj dono ka nazro ka khel kaha tak pahunchta hai.

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"to Inder ji,samajh me aa gay aapko sara kaam?",uski layi file pe

Suren Sahay ne dastkha kiye.

"yes sir.staff ke log kafi madad kar rahe hain isliye koi pareshani

nahi ho rahi hai."

"bahut achhe lekin agar koi bhi pareshani ho to mujhe zarur batayen."

"thank you,sir.",inder file le vaha se bahar nikalne laga.darwaza

kholte hi usne dekha ki Shiva vaha 1 file liye chala aa raha tha.dono

ne muskura ke 1 dusre ko greet kiya & fir shva andar ghus gaya & inder

bahar chala gaya.

"sir,ye us security systems vali company ne apna quotation diya hai,1

baar aap ise check kar lijiyega."

"ok.shiva.1 baat batao bhai?"

"puchhiye,sir."

"kya hume sach me in chizo ki zarurat hai?"

"bilkul hai,sir.",shiva ne unpe bahut zor dala tha ki estate ki

hifazat ke liye ab baado & taaro se upar uthna padega,"..sir,baaden &

taar to thik hai magar itne bade ilake ke chappe-2 pe har waqt nazar

rakhna to mushkil hai chahe aap kitne bhi aadm kyu na bharti kar le.ye

machines humare kaam ko asan karengi & hum apna security staff bhi koi

20% tak kam kar sakte hain.."

"..jo paise yaha kharch ho rahe hain,aap ye sochiye ki vo paise

securtiy staff ko kam kar ke bacha liye jayenge."

"hun,tumhari baat to thik lagti hai,fir bhi main 1 baar ye quotation &

is mamle me tumne jo mujhe report mujhe di thi use fir se padh leta

hu."

"ok,sir.",shiva vaha se chala gaya.

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"wow!",kamini viren ke sath uske studio me khadi usk banayi khud ki

painting dekh rah thi,"..kitni sundar paintiing banayi hai viren

aapne..main aisi dikhti hu kya?!...yakeen nahi hota.ye aapke hatho ka

kamal hai!",viren ki painting me kamin ki shakhsiyat pui ubhar ke aayi

thi.paintng dekhne pe ye lagta tha mano ko rani apne divan pe baithi

ho,uske chehre pe raub jhakal raha tha magar vo ghamandi nahi lag rahi

thi balki badi hi azeem lag rahi thi.

"ji nahi.ye aapki shakhsiyat ka kamal hai.aap jaisi hain vaise hi

maine use is kagaz pe utar diya hai.",viren muskurate hue use dekh

raha tha.uski nazro me apni tareef dekh 1 pal ko kamini jaisi vishvas

se bhari ladki ki palko pe bhi haya ka bojh aa pada.nazre jhuka ke vo

fir se apni tasveer dekhne lagi,vo janti thi ki viren abhi bhi use

dekhe ja raha hai.

"painting to ban gayi yani mera kaam khatm?",usne baat badli.

"khatm!abhi to aapka kaam shuru hua hai mohtarma!"

"kya matlab?"

"matlab ye ki ye to pehli tasveer hai.abhi to main tab tak aapki

tasveere banaunga juab tak ki mujhe ye na lage ki ab aapki shakhsiyat

ka koi bhi pehlu dikhane ko baki nahi raha hai."

"aap bhi na!ab aisi bhi koi khas baat nahi hai mujhme.",kamini ne bol

to diya magar viren ki baato ne uske dil me bahut khushi bhar di thi.

"..jiska matlab hai ki main taumra aapki paintings banata

rahunga.",viren ne jaise uski baat suni hi nahi thi.

"please!ab aur tareef mat kijiye varna mujhme gurur aa jayega."

"bina gurur ke to husn phika hi lagega.",is aakhiri baat ne to kamini

ke gaalo ko sharm se aur bhi surkh kar diya.

"achha-2.to aaj kaun si painintg banayenge meri?"

"abhi batata hu.",viren ne paas ka cupboard khola.barso baad vo kisi

ladki ke liye apne dil me aise jazbat mehsus kar raha tha.aisa nahi

tha kamini se milne se pehle uska kisi ladki se koi rishta nahi

tha.kayi ladkiya aayi & gayi magar koi bhi uske dil me aisi jagah nahi

bana payi ki viren ko lage ki vo uske bagair ji nahi sakta.bas 1 ladki

thi jisne uske dil me ye ehsas paida kiya tha magar vo..

usne apne maazi ke bare me sochna chhoda.vo jo bhi tha,jaisa bhi

tha,beet chuka tha & ye khubsurat ladki jo uske studio me khadi thi ye

haqeeqat thi & use ab bas isi baat se matlab tha.

"aaj aap ye libas peheniye.",usne use kale rang ka 1 lehanga-choli

thamaya & 1 chhota sa box bhi.kamini ne use khola to usme kuchh chandi

ke zevrat the.usne sabhi chize le viren ki or sawaliya nazro se dekha.

"kamini,main aapko har insani jazbaat ko mehsus karte hue dikhana

chahta hu..is tasveer me aap 1 bahut hi vishvas se bhari aurat nazar

aa rahi hain joki aap haqeeqat me bhi hain.",usne apni banayi hui

painting ki or ishara kiya,"..ab agli painting me main aapko gham

mehsus karte hue dikhana chahta hu-intezar ka gham.ye libas humare

gaon ki ladkiya abhi bhi pehanti hain.ye zevrat aapke jism pe saje ye

dikhayenge ki aapko dhan-daulat ki kami nahi hai magar jo chiz aapke

liye sabse zyada zaruri hai,sabse khas ahai aapke liye vohi aapke paas

maujood nahi & aap usi ke intezar me hain."

viren apni kala ke prati puri tarah se samarpit tha & is waqt kamini 1

kalakar ko hi sun rahi thi.viren ki baat puri hone pe vo muskurayi &

bathroom ki or badh gayi.kuchh lamho baad jab vo bahar aayi to use

dekh viren ka munh hairat se khula reh gaya.vo 1 painter tha & aam

logo ke mukable uski imagination kuchh zyada saaf hoti thi.ye libas

chunte waqt uske dimagh ne kamini ki 1 tasveer bana li thi ki vo kaisi

dikhegi magar is waqt jo ladki uske samne khadi thi vo us tassavur

vali kamini se kahi zyada haseen & dilkash lag rahi thi.

choli thodi tang thi & is wajah se kamini ki chhatiya aapas me dab

gayi thi & choli ke gale se uska cleavage thoda aur ubhar aaya

tha.hatho me churiya khanak rahi thi & chalte hue pairo me payal.patli

kamar pe vo chandi ka kamarband jhul raha tha & uske upar uski

gehri,gol nabhi chamak rahi thi.viren ne uske mathe pe chamak rahi

badi si laal bindi ko dekha to uska dil kiya ki isi waqt use agosh me

bhar uske mathe ko chum le & apne jazbato ka izhar kar de us se.

viren ki nigahe lagatar use dekhe ja rahi thi & kamini un nazro ki

tapish se sharma rahi thi & bechain bhi ho rahi thi,"kya dekh rahe

hain?",uski khanakti aavaz ne viren ko jagaya.

"hunn...ha-haan...k-kuchh nahi..aaiye yaha khade hoiye..aise.",viren

ne use kamre ki badi khidki ke paas khada kar ke bahar dekhne ko

kaha.ab kamini ki pith uski taraf thi.choli ki doriya pith ke aar-paar

ho rahi thi magar pith kamar tak lagbhag puri numaya hi thi.viren ne

uski pith se leke kamar tak nihara.patli kamar ke bahri kone failte

hue lehange me gayab ho gaye the....uffff....kitni chaudi gand thi &

kitni bhari hui!uska dil kiya ki 1 baar us dilkash ang pe apne hath

fira le magar usne khud pe kabu rakha & apne easel ke paas khada ho

gaya.

ab kamini apne hath khidki ke badn shishe pe rakhe hue bahar dekh rahi

thi,uska chehra thoda sa daayi taraf ghuma hua tha & viren bhi uske

peechhe usi taraf khada apni kuchi chala raha tha.kamini ko ye top

pata chal gaya tha ki uske roop ne viren ke dil ko puri tarah se

ghayal kar diya hai & is waqt vo kal ki tarah uske chehre ko dekh nahi

pa rahi thi isliye use aisa lag raha tha ki painting karta viren apni

aankho se uske jawan husn ke ghunt pi raha hai.is khayal ne uske dil

me khalbali macha di thi.

inhi khayalo me gum vo khidki se bahar bungle ke lawn ko dekh rahi thi

ki,"haaa..!",apni kamar pe kuchh mehsus kar vo chaumk padi.

"main hu.aap vaise hi khade rahiye,please.bilkul bhi mat

hiliyega.",viren ne uski kamar ki bayi or bandhi lehange ki dorei ko

dhila kar diya.kamini ko itni hairani hui ki puchho mat..iska irada

kya tha?kya vo usko.."viren..",usne use toka.

"bas 1 minute.",viren ke hatho ki lambi ungliya us dori ko khol

lehange ko thoda neeche kar rtahi thyi & fir kas rahi thi.uske hatho

ki komal chhuan ne kamini ke jism ki aag ko bhadka diya.viren ne dori

kas kar kamar ko pakad ke thoda sa hila ke sahi position me kiya &

vapas easel ke paas chala gaya.kamini ki chut me kasak si uthi & uska

dil kiya ki kash viren uske lehange ko khol apni lambi ungliya uski

chut me ghusa deta.is gustakh khayal ke aate hi uski aankhe band ho

gayi & gale se bahut dhimi si aah nikli.

"kya hua kamini?",viren ne chintit ho puchha.

"k-kuchh nahi.",kamini ne khud ko sambhala & khidki se bahar dekh apne

dimagh se viren ka khayal hatane lagi.

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kramashah........
 
गतान्क से आगे...

"मुझे कल ही पता चला है...क्या?..अच्छा....मगर ये कोई ऐसी-वैसी बात

नही.मैं यहा इन्हे बर्बाद करने आया हू.प्रसून तो पागल है मगर अगर सहाय की

मौत के बाद उसकी बीवी आ गयी तो फिर देविका के साथ-2 उसकी बहू से भी हमे

निबटना होगा....हां..जल्दी कुच्छ सोचो..हां-2 मैं ठीक हू.नही,मैं नही

बौख्लाउन्गा..बस इसका रास्ता मिल जाए..ओके!",इंदर ने मोबाइल बंद किया &

अपने फ़्लास्क से शराब के 2 घूँट भरे....सही कहा था उसने ..बदले की आग

उसकी दिमाग़ को जला के रख देगी 1 दिन.सहाय की बर्बादी के साथ ही काम

थोड़े ही ख़त्म था!..और ऐसी मुश्किले तो आती रहेंगी मगर इसका मतलब ये तो

नही की वो बौखलाने लगे.उसने 2 घूँट और भर के फ़्लास्क को अपनी अलमारी मे

बंद किया & अपने क्वॉर्टर से बाहर निकल गया.

वो नीचे के क्वॉर्टर मे जा रहा था जहा उसके इशारो पे नाचने वाली कठपुतली

उसका इंतेज़ार कर रही थी.

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देविका की आँखो से नींद गायब थी.उसने अपने पति से उसकी तबीयत के बारे मे

चिंता जताई थी तो उन्होने कहा था की ऐसी कोई बात नही है लेकिन उसके इसरार

पे वो 3 दिन बाद उसके साथ अपने डॉक्टर के पास जाने को तैय्यार हो गये

थे.देविका का दिल आज थोडा घबरा रहा था.बार-2 वो बस यही सोचे जा रही थी की

अगर अभी सुरेन ने उसका साथ छ्चोड़ दिया तो वो ये सब अकेले कैसे

संभालेगी.दुनिया की नज़रो मे वो 1 बहुत ही हिम्मती & आत्म विश्वास से भरी

औरत थी मगर थी तो आख़िर वो हाड़-माँस की इंसान ही ना!..सुरेन के बाद तो

वो बिल्कुल अकेली रह जाएगी.प्रसून को तो खुद सहारे की ज़रूरत थी वो उसे

भला क्या सहारा देगा!..शिवा....क्या उसपे भरोसा किया जा सकता था?उसकी

आँखो मे उसे सच्ची मोहब्बत दिखती थी ....हाँ बस 1 वही था जिसके सहारे वो

इस सब को संभाल सकती थी.

..& वीरेन?उसके दिमाग़ ने उस से सवाल किया तो उसे खुद पे बड़ा गुस्सा आया

& उस से भी कही ज़्यादा अपने देवर पे.उसने 1 तरह से सब कुच्छ सुरेन के

हवाले ही कर दिया था मगर फिर भी उसे आने की क्या ज़रूरत थी?!रहता वही

विदेश मे..!इधर उसने सुरेन जी को प्यार के लिए परेशान करना भी छ्चोड़

दिया था,वो चाहती थी की 1 बार डॉक्टर से बात कर ली जाए उसके बाद वो

निश्चिंत हो उनकी बाहो मे झूलेगी.2 दीनो से शिवा भी सवेरे उसकी प्यास नही

बुझा पाया था.

उसके ख़यालो से परेशान हो उसके दिल ने उसे अपने पति की बाहो मे पनाह लेने

को कहा मगर उसके दिमाग ने ऐसा करने से मना किया.अभी शिवा के पास जाना भी

बहुत ख़तरनाक हो सकता था.मन मार कर उसने अपनी नाइटी को उपर किया & अपना

नाज़ुक सा हाथ अपनी चूत से लगा दिया.वो जानती थी की 1 बार झड़ने के बाद

नींद उसे अपने आगोश मे ले लेगी & ये परेशान करने वाले ख़याल उसका पीछा

छ्चोड़ देंगे.

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आज मौसम बहुत ख़ुसनूमा था.ठंडी हवा के झोंके कामिनी के घने,काले,लंबे

बालो को बार-2 उसके चेहरे पे ला रहे थे & वो उन्हे बार-2 हटा के सामने

रखी वीरेन की बनाई दूसरी पैंटिंग देखे जा रही थी.वीरेन सचमुच कमाल का

कलाकार था.तस्वीर मे वो 1 गाओं की लड़की के रूप मे अपनी हवेली की खिड़की

पे खड़ी अपने प्रेमी का इंतेज़ार करती नज़र आ रही थी.उसके चेहरे के भाव

वीरेन ने किस खूबसूरती से दिखाए थे.

उसने नज़रे उठा के उसकी ओर देखा तो वीरेन ने अपनी दिलकश मुस्कान बिखेर

दी.जवाब मे कामिनी भी मुस्कुराए बिना ना रह सकी,"कैसी लगी?"

"मैं क्या बोलू..",कामिनी अपना सर हिला रही थी,"..आप-आप कैसे कर लेते हैं

ये....दिल के भाव चेहरे पो ले आना केवल रंगो के जादू से."

"आपके जैसी खूबसूरत & दिलचस्प चेहरे वाली लड़की मॉडेल हो तो ये काम बड़ी

आसानी से हो जाता है.",वीरेन हंसा.

"दिलचस्प?",कामिनी के होंठो पे मुस्कान थी & माथे पे शिकन.

"हां..",वीरेन ने उसकी आँखो मे आँखे डाल दी,"..ये चेहरा है ही ऐसा.इस्पे

सारे भाव सॉफ-2 आते हैं क्यूकी चेहरे की मालकिन के दिल मे ईमानदारी भरी

हुई है.हम सब जैसे-2 बड़े होते हैं कामिनी & अपने बचपन से दूर जाते हैं

वैसे-2 दुनियादारी की परते हमारे चेहरे पे चढ़ती जाती हैं & हमारा असली

चेहरा कही खो सा जाता है.ये पारट सिर्फ़ हम अपने बेहद करीबी लोगो के लिए

हटते हैं & काई बार तो उनके लिए भी नही..",वीरेन की मुस्कान गायब हो गयी

थी & वो खिड़की से बाहर देख रहा था.

कामिनी को लगा की उसका जिस्म यही था मगर वो कही दूर चला गया

था,"..उपरवाले की रहमत से आप इस से दूर हैं & यही बात आपकी खूबसूरती मे 4

चाँद लगाती है."

कामिनी की ज़िंदगी मे अब तक जितने भी मर्द आए थे सब उसकी तारीफ करते थे

मगर किसी का भी अंदाज़ ऐसा अनोखा नही था.वीरेन की तारीफ से ना जाने क्यू

कामिनी के चेहरे पे शर्म की लाली आ जाती.उसने फिर से बात बदलने के लिए कल

वाला ही सवाल दोहराया,"अब आज मुझे कैसे खड़ा होना है?",उसने थोड़ा शरारत

से पुचछा.

"बिल्कुल नंगी."

कामिनी के चेहरे की मुस्कुराहट गायब हो गयी & चेहरा सख़्त हो गया,"मुझे

ऐसा मज़ाक पसंद नही!",वीरेन से ऐसी बात की उम्मीद नही थी उसे.

"मैं मज़ाक नही कर रहा.",कामिनी का पारा अब बिल्कुल चढ़ गया.उसने अपन

हॅंडबॅग उठाया & वहा से जाने लगी.उसे भी वीरेन पसंद आने लगा था & मुमकिन

था की वो उसका आशिक़ भी बन जाता मगर ऐसी बेहूदा बात!

"रुकिये कामिनी.",वीरेन ने उसका हाथ पकड़ लिया,"..मुझे शायद आपसे इस

तरहसे नही कहना चाहिए था."

"जो कहना था आप कह चुके.अब मेरा हाथ छ्चोड़िए.",कामिनी की आवाज़ बड़ी तल्ख़ थी.

"प्लीज़..".वीरेन उसके सामने खड़ा हो गया,"..पहले मेरी बात सुन लीजिए,फिर

भी आप जाना चाहेंगी तो मैं नही रोकुंगा.",उसने कामिनी का हाथ छ्चोड़

दिया.कामिनी ने कुच्छ कहा तो नही मगर वही खड़ी रही.वीरेन समझ गया की वो

उसकी बात सुनने को तैय्यार है.

"कामिनी,मैं सारे इंसानी जज़्बात आपकी पूर्कशिष शख्सियत के ज़रिए कॅन्वस

पे उतारना चाहता हू.इस बार मैं आपको बेताब दिखाना चाहता हू & बेताबी की

शिद्दत तो सबसे ज़्यादा प्यार मे ही होती है.मैं चाहता हू की यही

बेताबी,ये बेसब्री जो 1 इंसान उसके जिसे की वो दिलोजान से चाहता है ना

होने पे महसूस करता है वो अपने बिल्कुल खालिस अंदाज़ मे आपके चेहरे पे

नज़र आए.."

"..इंसान जब किसी को हद से ज़्यादा चाहता है तो वो उसके जिस्म के साथ

अपने जिस्म को जोड़ उस से जुड़ने की कोशिश करता हुआ अपने प्यार का इज़हार

करता है..",कामिनी का गुस्सा काफूर हो चुका था.उसे ऐसा लग रहा था मानो

कोई प्रोफेसर,जोकि अपने विषय का उस्ताद है,उस से बात कर रहा हो..सही कह

रहा था वो..जिस्म की बेताबी से बड़ी कोई बेताबी नही & ये बेताबी बिना

नंगे हुए कैसे दिखाई जा सकती थी,"..& जब वो जुड़ने का एहसास उसे बार-2

नही मिलता तो वो बेचैन हो जाता है..यही बेचैनी मुझे दिखानी है.",उसकी

आँखो मे अपनी कला के लिए समर्पण झलक रहा था नकी किसी हवस से पैदा हुआ

पागलपन की वहशियात.

"..और आप नंगी ज़रूर होंगी मगर मेरी निगाहे फिर भी आपको नही देख पाएँगी."

"कैसे?",कामिनी के मुँह से बेसखता निकल गया.उसके सवाल ने वीरेन को भी ये

सॉफ कर दिया की उसका गुस्सा गायब हो चुका है.

मैं कमरे की इस दीवार से..",उसने अपने बाए हाथ से बाई दीवार की ओर इशारा

किया,"..उस दीवार तक..",अब हाथ दाई दीवार को दिखा रहा था,"..1 कपड़ा

बन्धूंगा.इस कपड़े की चौड़ाई इतनी होगी की आपके सीने से लेके जाँघो के

उपरी हिस्से तक ये आपको ढँक लेगा.आप इस कपड़े से अपना जिस्म इस तरह से

सटा के खड़ी होंगी की आपके जिस्म का आकर मुझे उस कपड़े से दिखाई पड़े."

कामिनी कुच्छ बोलती इस से पहले ही वीरेन ने आगे कहा,"कामिनी,ये परदा उन

मुश्किलो,उन दीवारो को दर्शाता है जोकि 2 प्रेमी हमेशा अपने रास्ते मे

महसूस करते हैं.आपको उस से सात के ऐसे खड़ा होना है मानो आप उस दीवार को

तोड़ देना चाहती हो."

"अगर अभी भी आपको ऐतराज़ है तो मैं ये पैंटिंग नही बनाउन्गा."

"कहा है वो परदा?",कामिनी का सवाल सुनते ही वीरेन हल्के से मुस्कुराया &

उसके करीब आया,"शुक्रिया..",उसने उसके दोनो हाथ अपने हाथो मे ले उसकी

आँखो मे झाँका,"..शुक्रिया,कामिनी.",उस वक़्त कामिनी को उसकी आँखो मे

केवल शुक्रगुज़ारी नही खुद के लिए चाहत भी नज़र आई.

बाथरूम स्टूडियो की दूसरी तरफ था & वाहा अपने कपड़े उतार कर कामिनी ने

बातरोब पहना & वापस आई.वीरेन ने 1 सॅटिन के मरून कपड़े को कमरे के

बीचोबीच बाँध दिया था.कामिनी उस कपड़े को उठा उसके दूसरे तरफ गयी & फिर

वीरेन की ओर मुँह कर खड़ी हो गयी.कपड़े के इस तरफ खड़ा वीरेन अपना ईज़ल

ठीक कर रहा था,"ठीक है.आप तैय्यार हैं,कामिनी?"

"हां.",कामिनी को जब वीरेन ने अपनी सोच के बारे मे बताया था तो उसने उसकी

बात को पूरी तरह से समझ लिया था.बदन की तन्हाई & उसकी बेताबी को उस से

बेहतर शायद ही कोई और समझता भी हो!..& इसलिए वो वीरेन के लिए नंगी पोज़

करने को तैय्यार हो गयी थी.वीरेन के पर्दे वाली बात ने उसे चौंका दिया

था.बहुत आसान होता की 1 औरत को नंगे तड़प्ते दिखाना.अब ये परदा उसके

जिस्म के सबसे हसीन अंगो को च्छूपा लेगा & देखने वाला बस उसके बदन की

कल्पना कर सकेगा & उसके चेहरे पे च्छाई बेताबी की शिद्दत उसे भी महसूस

होगी.

कामिनी अपना रोब उतार पर्दे की तरफ बढ़ी & उस से सॅट गयी,"हा..अब अपने

हाथ उपर उठा के पाने सर के बालो से खेलिए..थोड़ा और आगे आइए..थोड़ा

और..हां..बस ठीक है..",सामने खड़ी कामिनी को देख वीरेन का दिल ज़ोरो से

धड़कने लगा.कामिनी पर्दे से बिल्कुल सॅट गयी थी & उसकी छातियो का आकर सॉफ

दिख रहा था.परदा उसकी चूत के थोड़ा नीचे तक आया था & उपर,जहा से उसकी

छातियो का उभार शुरू होता था,वाहा तक था.इस तरह से उसकी भारी,गोरी जंघे &

सुडोल टाँगे जिन्हे कामिनी ने बिल्कुल सटा के ऐसे रखा था मानो उसकी चूत

को दबा के उसकी जंघे शांत कर रही हो.अपने हाथ उपर ले जा उसने लंबे बालो

मे फिरा के थोड़ा फैलाया तो उसके सीने के उभारो का हल्का सा कटाव वीरेन

को दिखा.

मगर जिस बात ने वीरेन के हलक को सूखा दिया था वो था कामिनी के चेहरे का

भाव.उसकी आँखे बंद थी लेकिन चेहरे पे प्रेमी के साथ की चाहत & उसके बदन

की तड़प से पैदा हुआ एहसास जोकि औरत के चेहरे को और नशीला बना देता है

फैला हुआ था.वीरेन का दिल उसके काबू से बाहर जा रहा था.उसका दिल कर रहा

था की अभी इस हसीना को अपनी बाहो मे भर उसकी सारी बेचैनी दूर कर दे &

अपनी भी प्यास बुझा ले मगर फिर उसका ध्यान ईज़ल पे लगे कोरे काग़ज़ पे

गया & उसके हाथ उसपे चलने लगे.

ठीक उसी तेज़ हवा के साथ वक़्त बारिश शुरू हो गयी.कामिनी पर्दे के जिस

तरफ खड़ी थी कमरे की बड़ी खिड़की भी उसी तरफ थी & इस वक़्त उसके शीशे

खुले हुए थे.वाहा से आती हवा कामिनी की ज़ुल्फो से खेलने लगी.कामिनी

उन्हे सावरते हुए खड़ी थी & उसका हुस्न अब और भी पूर्कशिष लग रहा

था.वीरेन उसके चेहरे को देखे जा रहा था & उसी मे कब उसने अपनी टी-शर्ट पे

रंग गिरा लिया उसे पता भी ना चला.

कामिनी के चेहरे के भाव अभी बिल्कुल सही थे & उन्हे वो जल्द से जल्द नकल

कर अपने कॅन्वस पे उतरना चाहता था.1 पल के लिए उसने ब्रश किनारे किया &

अपनी शर्ट निकाल दी.कामिनी ने भी ठीक उसी वक़्त आँखे खोली तो सामने वीरेन

के नंगे बालो भरे सीने को पाया.उसे षत्रुजीत सिंग की दिखाई तस्वीर याद आ

गयी.वीरेन का बदन अभी भी गतिला था & उसकी बाहे कितनी मज़बूत थी..कैसा हो

अगर वो इन मज़बूत बाजुओ मे उसके बदन को कस ले?..ख़याल ने उसकी चूत मे आग

लगा दी.
 
नीचे वीरेन ने 1 ट्रॅक पॅंट पहनी थी जोकि इस वक़्त थोड़ा और नीचे सरक गयी

थी.उसके सीने के बॉल नाभि से होते हुए पॅंट के अंदर गायब हो रहे

थे.कामिनी का दिल उस च्छूपे हुए मर्दाने अंग की कल्पना करने लगा.इस तरह

से 1 मर्द के साथ 1 ही कमरे मे नंगे खड़े होना मगर उसके साथ ये

दूरी..उफफफ्फ़...!उसका दिल अब उसके काबू मे नही था.वीरेन उसे और भी

ज़्यादा हॅंडसम लगने लगा & उसके जज़्बात मचलने लगे.

वीरेन का हाल भी कुच्छ ऐसा ही था.कामिनी के चेहरे के मस्ताने रंग उस से

छुपे नही थे & उसका जिस्म भी अब गरम हो रहा था.खिड़की से आती ठंडी हवा ने

उसके नंगे जिस्म को च्छुआ तो वो सिहर उठी & उसकी चूत की कसक & भी तेज़ हो

गयी.उसे शांत करने के लिए उसने अपनी जाँघो को थोड़ा रगड़ा & ये हरकत

वीरेन ने देख ली.1 बेइंतहा खूबसूरत लड़की की ऐसी मस्तानी हरकत ने उसे भी

बेचैन कर दिया & उसका लंड उसके पॅंट को फाड़ बाहर आने को पागल हो उठा.

उसी वक़्त उसने देखा की उसका रंग ख़त्म हो चुका है,वो उसने खुद ही गिराया

था अभी..अब फिर से मिक्स करना पड़ेगा..धात तेरे की!

"कामिनी.."

"हूँ..",वो जैसे नींद से जागी.

"आप थोड़ी देर आराम कर लीजिए.रंग ख़त्म हो गया है,मुझे मिक्स करने मे

10-15 मिनिट लगेंगे."

"ओके.",वीरेन घुमके रंगो की अलमारी की ओर चला गया तो कामिनी ने भी सोचा

की बैठ लिया जाए मगर कमरे के उसके हिस्से मे तो कोई कुर्सी ही नही

थी.उसने वीरेन को आवाज़ देने की सोची मगर फिर उसे खिड़की की चौड़ी सिल

नज़र आई.मौसम भी बड़ा सुहाना था..क्यू ना इसी पे बैठा जाए?

सिल कोई 2 फिट चौड़ी & 6 फिट लंबी थी.कामिनी उसपे चढ़ उसकी दीवार से टेक

लगा के उसपे टाँगे फैला के बैठ गयी & लॉन को देखने लगी.बारिश की बूंदे

घास पे चमक रही थी & सब कुच्छ धुला-2 लग व्रहा था.हवा के झोंके पानी की

बूंदे उसके नंगे जिस्म पे भी ले आते तो वो खुशी से मुस्कुरा उठती.उसने

अपना बाया हाथ बाहर निकल छज्जे से टपक रहे पानी को हथेली की अंजूरी मे

भरा & फिर बाहर फेंक दिया.

लॉन मे जलते लॅंप की रोशनी उसे ऐसी लगी मानो वीरेन की जलती निगाहे उसके

बदन को देख रही हैं.ये ख़याल आते ही उसकी चूत 1 बार फिर कसमसा उठी.उसने

अपनी बाई टांग मोड़ ली & उसके तलवे को सिल से लगा दिया & बाया हाथ पीछे

ले जा अपने सर के उपर सिल से लगा लिया & दाए से अपने सीने को सहलाने

लगी....कितना खूबसूरत & गतिला बदन था वीरेन का?....क्या वो उसपे कभी इतना

मेहेरबान होगा की उसे अपने सीने के बालो मे उंगलिया फिराने

दे..उम्म...कामिनी ने आँखे बंद कर हौले से अपनी दाई चूची दबाई.आँखे बंद

थी नगर फिर भी उसे ऐसा लगा की कोई उसे देख रहा है.

उसने आँखे खोल सर को हल्का सा दाए घुमाया तो देख की वीरेन पर्दे के पीछे

खड़ा उस देख रहा है,उसकी आँखो मे अब उसकी जिस्म की चाहत के लाल डोरे तेर

रहे थे.कामिनी की आँखे भी नशे से भरी हुई थी.दोनो 1 दूसरे की नज़रो मे

डूबे जा रहे थे.रंग मिक्स कर वीरेन उसे वापस बुलाने आया तो उसे अपने

ख्यालो मे गुम अपने जिस्म से खेलता पाया.उसकी मस्त चूचिया,गोरा पेट &

चिकनी चूत से उसकी नज़रे ऐसी चिपकी की वो बूटा बना वही कहदा रह गया & जब

दोनो की आँखे चार हुई तो वो अपने चेहरे के भाव च्छूपा नही पाया या यू

कहें की उसने उन्हे च्छुपाने की कोई कोशिश की ही नही.

कामिनी के दिल की धड़कने बहुत तेज़ हो गयी थी & वो बस वीरेन को देखे जा

रहे थी.तभी हवा का 1 तेज़ झोंका कमरे मे दाखिल हुआ & उसने उस पर्दे को

इतनी ज़ोर से छेड़ा की उसकी 1 गाँठ खुल गयी & वो गिर पड़ा.परदा खुला तो

मानो दोनो के बीच की ये दीवार भी गिरा गयी.दाए हाथ मे ब्रश पकड़ा वीरेन

उसकी नज़रो से नज़र मिलाए हुए उसके करीब आ खड़ा हुआ.कामिनी वैसे ही अपना

बाया हाथ उपर किए सिल पे बैठी उसे देख रही थी.दोनो ने 1 दूसरे से 1 लफ्ज़

भी नही बोला था मगर 1 दूसरे का दिल का हाल बखूबी मालूम था उन्हे-उनकी

नज़रे जो बात कर रही थी.

वीरेन ने 1 बार उसकी खूबसूरती को सर से पाँव तक निहारा..कुद्रत का सबसे

हसीन करिश्मा था ये जिस्म..इतनी खूबसूरती..इतनी मदहोशी..इतनी कशिश ..सब 1

ही जिस्म मे!उसने ब्रश को उसके बाए हाथ की बीच की उंगली के नाख़ून पे रखा

& वाहा से उसे नीचे लाने लगा,बहुत धीरे-2.कामिनी का बदन सिहरने लगा.ब्रश

उसके हाथ से उसकी अन्द्रुनि बाँह से होता हुआ उसकी चिकनी बगल तक पहुँच

गया.

उसके बालो की गुदगुदी कामिनी की मदहोशी बढ़ा रही थी.उसने सोचा की वीरेन

अब ब्रुश को उसकी बाई छाती पे फिराएगा मगर उसने ऐसा कुच्छ नही किया.उसने

ब्रश को बगल से उसके सीने के उपर का रास्ता दिखाया & वाहा से उसकी लंबी

गर्दन से होता हुआ उसके बाए कान तक पहुँच गया.

"उम्म...",कामिनी को बहुत मज़ा आ रहा था.वीरेन ने ब्रश को उसके माथे पे

रखा & फिर वाहा से उसे नीचे लाने लगा.कामिनी जानती थी कि ब्रश इस बार

उसके नाज़ुक अंगो से खेलने को बढ़ रहा है.उसकी धड़कने और भी बढ़

गयी.वीरेन ब्रश को नीचे लाया,उसकी नाक से नीचे उसके गुलाबी होंठो पे &

होंठो की पूरी लंबाई पे उन्हे हल्के से फिरा दिया,"..आहह...",कामिनी कांप

उठी & उसका दिल किया की अभी इसी वक़्त वीरेन उसके होंठो को चूम ले.

वीरेन ने ब्रश को नीचे उसकी ठुड्डी पे किया & फिर ब्रश उसकी गर्दन से

होता हुआ उसके सीने पे सजे दोनो उभारो के बीचोबीच बनी घाटी मे पहुँच

गया.कामिनी का बदन कांप रहा था,सिहर रहा था मगर वो अभी भी उसी पोज़िशन मे

बैठी थी मानो अभी भी वीरेन पैंटिंग कर रहा हो & वो उसके लिए पोज़ कर रही

हो.

वीरेन का ब्रश उसकी बाई चूची की गोलाई पे फिरने लगा तो उसके गले से निकल

रही आहे तेज़ होने लगी.वो चूची के पूरे दायरे पे ब्रश फिरा रहा था & जब

ब्रश गोलाई का 1 चक्कर पूरा करता तो दायरा छ्होटा हो जाता.इस तरह वो उसके

निपल तक पहुँच रहा था.वीरेन ने ऐसे गुलाबी निपल अपनी ज़िंदगी मे नही देखे

थे.उसने काई विदेशी लड़कियो को चोदा था मगर ऐसे फूलो के रंग के निपल्स

उनके भी नही थे.

"ऊहह..",कामिनी के नाख़ून खिड़की के सिल & दीवार के पैंट को खरोंच रहे थे

& वीरेन का ब्रश उसके निपल को.जब तक वीरेन ने ब्रश से उसकी दाई छाती पे

भी वही हरकत की तब तक कामिनी की चूत से पानी रिसने लगा था.ब्रश अब उसके

सीने से नीचे उसके पेट पे फिर रहा था & कामिनी की साँसे मानो अटक रही थी.

"उम्म..",ब्रश उसकी नाभि की गहराई मे रंग भर रहा था.वो अब बहुत धीरे-2

अपनी कमर हिला रही थी.उसे इंतेज़ार था अब ब्रश के खुरदुरे बालो का अपनी

चूत & उसके दाने पे.ब्रश नाभि से निकला & और नीचे आया.कामिनी की आँखे बंद

हो गयी & चेहरे पे हल्की सी मुस्कान खिल गयी बस थोड़ी ही देर मे वीरेन

उसकी परेशान चूत को सुकून पहुचाएगा.

मगर ऐसा कुच्छ भी नही हुआ.ब्रश उसकी चूत के बगल से होता हुआ उसकी बाई उठी

हुई टांग की जाँघ पे चढ़ गया & वाहा से नीचे जाने लगा.कामिनी ने आँखे खोल

वीरेन की ओर ऐसे देखा मानो उस से थोड़ी खफा हो लेकिन वीरेन बस उसके जिस्म

पे ब्रश फिराए जा रहा था.उसकी अन्द्रुनि जाँघ पे चलते ब्रश ने उसकी

बेताबी को और बढ़ा दिया था लेकिन जब ब्रश उसकी बाई टांग के उठे हुए घुटने

से होता हुआ नीचे उसके पाँव तक पहुँचा & उसकी उंगलियो के बीच घुस-2 कर

मानो रंग भरने लगा तब तो कामिनी पागल ही हो उठी.

वीरेन को अभी भी उसपे तरस नही आया था.ब्रश बाई से दाई टांग पे चला गया था

& वाहा भी उसके पाँव की उंगलियो के साथ उसने वैसा ही बर्ताव किया & फिर

उपर आने लगा.इस बार ब्रश उसकी भारी जाँघ से फिरता हुआ कही और नही गया

बल्कि सीधा उसकी चूत के दाने पे आ बैठा.वीरेन उसकी आँखो मे झाँक रहा था &

उसका हाथ ब्रश को उसके दाने पे फिराए जा रहा था.कामिनी आहे भरती हुई सिल

पे ऐसे मचल रही थी जैसे जल बिन मछली.

उसके हाथ अब अपनी चूचियो को मसल रहे थे.वीरेन उस मस्तानी लड़की की हरकते

देख गरम हो रहा था.उसके ब्रश ने कामिनी के दाने को छेड़-2 कर उसे झाड़वा

ही दिया था.उसके झाड़ते ही वीरेन ने ब्रश फेंका.ठीक उसी वक़्त कामिनी को

पूर्वाभास सा हुआ की वो उसे चूमेगा & उसने भी अपनी बाहे उसके गले मे डाल

उसे नीचे खींचा & दोनो प्रेमियो ने पहली बार 1 दूसरे को चूमा.दोनो 1

दूसरे के होंठो का लुत्फ़ उठाते हुए अपनी-2 ज़ुबान बारी-2 से 1 दूसरे के

मुँह मे डाल घुमा रहे थे.अभी तक वीरेन के हाथो ने कामिनी को च्छुआ भी नही

था & उसका बदन जैसे दुख रहा था.

वो चाह रही थी की वीरेन अपनी बाहो मे उसे कस उसका सारा दर्द मिटा दे मगर

वीरेन उस हुसनपरी को ऐसे प्यार करना चाहता था की उसे भी थोड़ा याद रहे.वो

होंठो को छ्चोड़ गर्दन चूमते हुए नीचे झुका & उसकी चूचियो को अपने मुँह

मे भरने लगा.कामिनी बेचैनी & जोश से उसके सर & बदन पे हाथ फेर रही थी मगर

उसके हाथ अभी भी पीछे ही थे.

क्रमशः........

 


BADLA paart--18

gataank se aage...

"mujhe kal hi pata chala hai...kya?..achha....magar ye koi aisi-vaisi

baat nahi.main yaha inhe barbad karne aaya hu.Prasun to pagal hai

magar agar sahay ki maut ke baad uski biwi aa gayi to fir Devika ke

sath-2 uski bahu se bhi hume nibatna hoga....haan..jaldi kuchh

socho..haan-2 main thik hu.nahi,main nahi baukhlaunga..bas iska rasta

mil jaye..ok!",inder ne mobile band kiya & apne flask se sharab ke 2

ghunt bhare....sahi kaha tha usne ..badle ki aag uski dimagh ko jala

ke rakh degi 1 din.sahay ki barbadi ke sath hi kaam thode hi khatm

tha!..aur aisi mushkile to aati rahengi magar iska matlab ye to nahi

ki vo baukhlane lage.usne 2 ghunt aur bhar ke flask ko apni almari me

band kiya & apne quarter se bahar nikal gaya.

vo neeche ke quarter me ja raha tha jaha uske isharo pe nachne vali

kathputli uska intezar kar rahi thi.

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devika ki aankho se neend gayab thi.usne apne pati se uski tabiyat ke

bare me chinta jatayi thi to unhone kaha tha ki aisi koi baat nahi hai

lekin uske israr pe vo 3 din baad uske sath apne doctor ke paas jane

ko taiyyar ho gaye the.devika ka dil aaj thoda ghabra raha tha.baar-2

vo bas yehi soche ja rahi thi ki agar abhi suren ne uska sath chhod

diya to vo ye sab akele kaise sambhalegi.duniya ki nazro me vo 1 bahut

hi himmati & aatm vishvas se bhari aurat thi magar thi to aakhir vo

haad-mans ki insan hi na!..suren ke baad to vo bilkul akeli reh

jayegi.prasun ko to khud sahare ki zarurat thi vo use bhala kya sahara

dega!..shiva....kya uspe bharosa kiya ja sakta tha?uski aankho me use

sachchi mohabbat dikhti thi ....haan bas 1 vahi tha jiske sahare vo is

sab ko sambhal sakti thi.

..& viren?uske dimagh ne us se sawal kiya to use khud pe bada gussa

aaya & us se bhi kahi zyada apne devar pe.usne 1 tarah se sab kuchh

suren ke hawale hi kar diya tha magar fir bhi use aane ki kya zarurat

thi?!rehta vahi videsh me..!idhar usne suren ji ko pyar ke liye

pareshan karna bhi chhod diya tha,vo chahti thi ki 1 baar doctor se

baat kar li jaye uske baad vo nishchint ho unki baaho me jhulegi.2

dino se shiva bhi savere uski pyas nahi bujha paya tha.

uske khayalo se pareshan ho uske dil ne use apne pati ki baaho me

panah lene ko kaha magar uske dimagh ne aisa karne se mana kiya.abhi

shiva ke paas jana bhi bahut khatarnak ho sakta tha.man maar kar usne

apni nighty ko upar kiya & apna nazuk sa hath apni chut se laga

diya.vo janti thi ki 1 baar jhadne ke baad nind use apne agosh me le

legi & ye pareshan karne vale khayal uska peechha chhod denge.

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aaj mausam bahut khusnuma tha.thandi hawa ke jhonke kamini ke

ghane,kale,lambe baalo ko baar-2 uske chehre pe la rahe the & vo unhe

baar-2 hata ke samne rakhi viren ki banayi dusri painting dekhe ja

rahi thi.viren sachmuch kamal ka kalakar tha.tasveer me vo 1 gaon ki

ladki ke roop me apni haweli ki khidki pe khadi apne premi ka intezar

krti nazar aa rahi thi.uske chehre ke bhav viren ne kis khubsurati se

dikhaye the.

usne nazre utha ke uski or dekha to viren ne apni dilkash muskan

bikher di.jawab me kamini bhi muskuarye bina na reh saki,"kaisi lagi?"

"main kya bolu..",kamini apna sar hila rahi thi,"..aap-aap kaise kar

lete hain ye....dil ke bhav chehre poe le aana kewal rango ke jadu

se."

"aapke jaisi khubsurat & dilchasp chehre vali ladki model ho to ye

kaam badi asani se ho jata hai.",viren hansa.

"dilchasp?",kamini ke hotho pe muskan thi & mathe pe shikan.

"haan..",viren ne uski aankho me aankhe daal di,"..ye chehra hai hi

aisa.ispe sare bhav saaf-2 aate hain kyuki chehre ki malkin ke dil me

imandari bhari hui hai.hum sab jaise-2 bade hote hain kamini & apne

bachpan se dur jate hain vaise-2 duniyadari ki parte humare chehre pe

chadhti jati hain & humara asli chehra kahi kho sa jata hai.ye parte

sirf hum apne behad karibi logo ke liye hatate hain & kayi baar to

unke liye bhi nahi..",viren ki muskan gayab ho gayi thi & vo khidki se

bahar dekh raha tha.

kamini ko laga ki uska jism yahi tha magar vo kahi dur chala gaya

tha,"..uparwale ki rehmat se aap is se dur hain & yehi baat aapki

khubsurati me 4 chand lagati hai."

kamini ki zindagi me ab tak jitne bhi mard aaye the sab uski tareef

karte the magar kisi ka bhi andaz aisa anokha nahi tha.viren ki tareef

se na jane kyu kamini ke chehre pe sharm ki lali aa jati.usne fir se

baat badalne ke liye kal wala hi sawal dohraya,"ab aaj mujhe kaise

khada hona hai?",usne thoda shararat se puchha.

"bilkul nangi."

kamini ke chehre ki muskurahat gayab ho gayi & chehra sakht ho

gaya,"mujhe aisa mazak pasand nahi!",viren se aisi baat ki ummeed nahi

thi use.

"main mazak nahi kar raha.",kamini ka para ab bilkul chadh gaya.usne

apan handbag uthaya & vahase jane lagi.use bhi viren pasand aane laga

tha & mumkin tha ki vo uska aashiq bhi ban jata magar aisi behuda

baat!

"rukiye kamini.",viren ne uska hath pakad liya,"..mujhe shayad aapse

is tarahse nahi kehna chahiye tha."

"jo kehna tha aap keh chuke.ab mera hath chhodiye.",kamini ki aavaz

badi talkh thi.

"please..".viren uske samne khada ho gaya,"..pehle merio baat sun

lijiye,fir bhi aap jana chahengi to main nahi rokunga.",usne kamini ka

hath chhod diya.kamini ne kuchh kaha to nahi magar vahi khadi

rahi.viren samajh gaya ki vo uski baat sunane ko taiyyar hai.

"kamini,main sare insani jazbat aapki purkashish shakhsiyat ke zariye

canvas pe utarna chahta hu.is baar main aapko betab dikhana chahta hu

& betabi ki shiddat to sabse zyada pyar me hi hoti hai.main chahta hu

ki yehi betabi,ye besabri jo 1 insan uske jise ki vo dilojaan se

chahta hai na hone pe mehsus karta hai vo apne bilkul khaalis andaz me

aapke chehre pe nazar aaye.."

"..insan jab kisi ko had se zyada chahta hai to vo uske jism ke sath

apne jism ko jod us se judne ki koshish karta hua apne pyar ka izhar

karta hai..",kamini ka gussa kafur ho chuka tha.use aisa lag raha tha

mano koi professor,joki apne vishay ka ustad hai,us se baat kar raha

ho..sahi keh raha tha vo..jism ki betabi se badi koi betabi nahi & ye

betabi bina nange hue kaise dikhayi ja sakti thi,"..& jab vo judne ka

ehsas use baar-2 nahi milta to vo bechain ho jata hai..yehi bechaini

mujhe dikhani hai.",uski aankho me apni kala ke liye samarpan jhalak

raha tha naki kisi hawas se paida hua pagalpan ki vahshiyat.

"..aur aap nangi zarur hongi magar meri nigahe fir bhi aapko nahi dekh payengi."

"kaise?",kamini ke munh se besakhta nikal gaya.uske sawal ne viren ko

bhi ye saaf kar diya ki uska gussa gayab ho chuka hai.

main kamre ki is deewar se..",usne apne baaye hath se baayi deewar ki

or ishara kiya,"..us deewar tak..",ab hath dayi deewar ko dikha raha

tha,"..1 kapda bandhunga.is kapde ki chaudai itni hogi ki aapke seene

se leke jangho ke upari hisse tak ye aapko dhank lega.aap is kapde se

apna jism is tarah se sata ke khadi hongi ki aapke jism ka aakar mujhe

us kapde se dikhayi pade."

kamini kuchh bolti is se pehle hi viren ne aage kaha,"kamini,ye parda

un mushkilo,un deewaro ko darshata hai joki 2 premi humesha apne raste

me mehsus karte hain.aapko us se sat ke aise khada hona hai mano aap

us deewar ko tod dena chahti ho."

"agar abhi bhi aapko aitraz hai to main ye painting nahi banaunga."

"kaha hai vo parda?",kamini ka sawal sunte hi viren halke se muskuraya

& uske kareeb aaya,"shukriya..",usne uske dono hath apne hatho me le

uski aankho me jhanka,"..shukriya,kamini.",us waqt kamini ko uski

aankho me kewal shukraguzari nahi khud ke liye chahat bhi nazar aayi.

bathroom studio ki dusri taraf tha & vaha apne kapde utar kar kamini

ne bathrobe pehna & vapas aayi.viren ne 1 satin ke maroon kapde ko

kamre ke beechobeech bandh diya tha.kamini us kapde ko utha uske dusre

taraf gayi & fir viren ki or munh kar khadi ho gayi.kapde ke is taraf

khada viren apna easel thik kar raha tha,"thik hai.aap taiyyar

hain,kamini?"

"haan.",kamini ko jab viren ne apni soch ke bare me bataya tha to usne

uski baat ko puri tarah se samajh liya tha.badan ki tanhai & uski

betabi ko us se behtar shayad hi koi aur samajhta bhi ho!..& isliye vo

viren ke liye nangi pose karne ko taiyyar ho gayi thi.viren ke parde

vali baat ne use chaunka diya tha.bahut aasan hota ki 1 aurat ko nange

tadapte dikhana.ab ye parda uske jism ke sabse haseen ango ko chhupa

lega & dekhne vala bas uske badan ki kalpna kar sakega & uske chehre

pe chhayi betabi ki shiddat use bhi mehsus hogi.
 
kamini apna robe utar parde ki taraf badhi & us se sat gayi,"haa..ab

apne hath upar utha ke pane sar ke baalo se kheliye..thoda aur aage

aaiye..thoda aur..haan..bas thik hai..",samne khadi kamini ko dekh

viren ka dil zoro se dhadakne laga.kamini parde se bilkul sat gayi thi

& uski chhatiyo ka aakar saaf dikh raha tha.parda uski chut ke thoda

neeche tak aaya tha & upar,jaha se uski chhatioy ka ubhar shuru hota

tha,vaha tak tha.is tarah se uski bhari,gori janghe & sudol tange jine

kamini ne bilkul sata ke aise rakha tha mano uski chut ko daba ke uski

janghe shant kar rahi ho.apne hath upar le ja usne lambe balo me fira

ke thoda failaya to uske seene ke ubharo ka halka sa katav viren ko

dikha.

magar jis baat ne viren ke halak ko sukha diya tha vo tha kamini ke

chehre ka bhav.uski aankhe band thi lekin chehre pe premi ke sath ki

chahat & uske badan ki tadap se paida hua ehsas joki aurat ke chehre

ko aur nashila band deta hai faila hua tha.viren ka dil uske kabu se

bahar ja raha tha.uska dil kar raha tha ki abhi is haseena ko apni

baaho me bhar uski sari bechaini dur kar de & apni bhi pyas bujha le

magar fir uska dhyan easel pe lage kore kagaz pe gaya & uske hath uspe

chalne lage.

thik usi tez hawa ke sath waqt barish shuru ho gayi.kamini parde ke

jis taraf khadi thi kamre ki badi khidki bhi usi taraf thi & is waqt

uske sheeshe khule hue the.vaha se aati hawa kamini ki zulfo se khelne

lagi.kamini unhe sawarte hue khadi thi & uska husn ab aur bhi

purkashish lag raha tha.viren uske chehre ko dekhe ja raha tha & usi

me kab usne apni t-shirt pe rang gira liya use pata bhi na chala.

kamini ke chehre ke bhav abhi bilkul sahi the & unhe vo jald se jald

nakal kar apne canvas pe utarna chahta tha.1 pal ke liye usne brush

kinare kiya & apni shirt nikal di.kamini ne bhi thik usi waqt aankhe

kholi to samne viren ke nange baalo bhare seene ko paya.use Shatrujeet

Singh ki dikhayi tasvir yaad aa gayi.viren ka badan abhi bhi gathila

tha & uski baahe kitni mazbut thi..kaisa ho agar vo in mazboot bazuo

me uske badan ko kas le?..khayal ne uski chut me aag laga di.

neeche viren ne 1 track pant pehni thi joki is waqt thoda aur neeche

sarak gayi thi.uske seene ke baal nabhi se hote hue pant ke andar

gayab ho rahe the.kamini ka dil us chhupe hue mardane ang ki kalpana

karne laga.is tarah se 1 mard ke sath 1 hi kamre me nange khade hona

magar uske sath ye duri..uffff...!uska dil ab uske kabu me nahi

tha.viren use aur bhi zyada handsome lagne laga & uske jazbat machalne

lage.

viren ka haal bhi kuchh aisa hi tha.kamini ke chehre ke mastane rang

us se chhupe nahi the & uska jism bhi ab garam ho raha tha.khidki se

aati thandi hawa ne uske nange jism ko chhua to vo sihar uthi & uski

chut ki kasak & bhi tez ho gayi.use shant karne ke liye usni apni

jangho ko thoda ragada & ye harkar viren ne dekh li.1 beintaha

khubsurat ladki ki aisi mastani harkat ne sue bhi bechain kar diya &

uska lund uske pant ko faad bahar aane ko pagal ho utha.

usi waqt usne dekha ki uska rang khatm ho chuka hai,vo usne khud hi

giraya tha abhi..ab fir se mix karna padega..dhat tere ki!

"kamini.."

"hun..",vo jaise nind se jagi.

"aap thodi der aaram kar lijiye.rang khatm ho gaya hai,mujhe mix karne

me 10-15 minute lagenge."

"ok.",viren ghumke rango ki almari ki or chala gaya to kamini ne bhi

socha ki baith liya jaye magar kamre ke uske hisse me to koi kursi hi

nahi thi.usne viren ko aavaz dene ki sochi magar fir use khidki ki

chaudi sill nazar aayi.mausam bhi bada suhana tha..kyu na isi pe

baitha jaye?

sill koi 2 ft chaudi & 6 ft lambi thi.kamini uspe chadh uski deewar se

tek laga ke uspe tange faila ke baith gayei & lawn ko dekhne

lagi.barsih ki boonde ghas pe chamak rahi thi & sab kuchh dhula-2 lag

vraha tha.hawa ke jhonke pani ki boonde uske nange jism pe bhi le aate

to vo khushi se muskura uthati.usne apna baaya hath bahar nikal

chhajje se tapak rahe pani ko hatheli ki anjuri me bhara & fir bahar

fenk diya.

lawn me jalte lamp ki roshni use aisi lagi mano viren ki jalti nigahe

uske badan ko dekh rahi hain.ye khayal aate hi uski chut 1 bar fir

kasmasa uthi.usne apni baayi tang mod li & uske talve ko sill se laga

diya & baya hath peechhe le ja apne sar ke upar sill se laga liya &

daaye se apne seene ko sehlane lagi....kitna khubsurat & gathila badan

tha viren ka?....kya vo uspe kabhi itna meherbaan hoga ki use apne

seene ke balo me ungliya firane de..umm...kamini ne aankhe band kar

haule se apni daayi choochi dabayi.aankhe band thi nagar fir bhi use

aisa laga ki koi use dekh raha hai.

usne aankhe khol sar ko halka sa daaye ghumaya to dekh ki viren parde

ke peechhe khada us dekh arah hai,uski aankho me ab uski jism ki

chahat ke lal dore tair rahe the.kamini ki aankhe bhi nashe se bhari

hui thi.dono 1 dusre ki nazro me dube ja rahe the.rang mix kar viren

use vapas bulane aaya to use apne khaylo me gum apne jism se khelta

paya.uski mast choochiya,gora pet & chikni chut se uski nazre aisi

chipki ki vo buta bana vahi kahda reh gaya & jab dono ki aankhe char

hui to vo apne chehre ke bhav chhupa nahi paya ya yu kahen ki usne

unhe chhupane ki koi koshish ki hi nahi.

kamini ke dil ki dhadkane bahut tez ho gayi thi & vo bas viren ko

dekhe ja rahe thi.tabhi hawa ka 1 tez jhonka kamre me dakhil hua &

usne us parde ko itni zor se chheda ki uski 1 ganth khul gayi & vo gir

pada.parda khula to mano dono ke beech ki ye deewar bhi gira gayi.daye

hath me brush pakda viren uski nazro se nazar milaye hue uske kareeb

aa khada hua.kamini vaise hi apna baaya hath upar kiye sill pe baithi

use dekh rahi thi.dono ne 1 dusre se 1 lafz bhi nahi bola tha magar 1

dusre ka dil ka haal bakhubi malun tha unhe-unki nazre jo baat kar

rahi thi.

Viren ne 1 baar uski khubsurati ko sar se panv tak nihara..kudrat ka

sabse haseen karishma tha ye jism..itni khubsurati..itni

madhoshi..itni kashish ..sab 1 hi jism me!usne brush ko uske baaye

hath ki beech ki ungli ke nakhun pe rakha & vaha se use neeche lane

laga,bahut dhire-2.kamini ka badan siharne laga.brush uske hath se

uski andruni banh se hota hua uski chikni bagal tak pahunch gaya.

uske baalo ki gudgudi kamini ki madhoshi badah rahi thi.usne socha ki

viren ab brush ko uski baayi chhati pe firayega magar usne aisa kuchh

nahi kiya.usne brush ko bagal se uske seene ke upar ka rasta dikhaya &

vaha se uski lambi gardan se hota hua uske baaye kaan tak pahunch

gaya.

"umm...",kamini ko bahut maa aa raha tha.viren ne brush ko uske mathe

pe rakha & fir vaha se use neeche lane laga.kamini janti thi ki brush

is baar uske nazuk ango se khelne ko badh raha hai.uski dhadkane aur

bhi badh gayi.viren brush ko neeche laya,uski naak se neeche uske

guilabi hontho pe & hontho ki puri lambai pe unhe halke se fira

diya,"..aahhhh...",kamini kanp uthi & uska dil kiya ki abhi isi waqt

viren uske hontho ko chum le.

viren ne brush ko neeche uski thuddi pe kiya & fir brsuh uski gardan

se hota hua uske seebne pe saje dono ubharo ke beechobech bani ghati

me pahunch gaya.kamini ka badan kanp raha tha,sihar raha tha magar vo

abhi bhi usi position me baithi thi mano abhi bhi viren painting kar

raha ho & vo uske liye pose kar rahi ho.

viren ka brush uski baayi choochi ki golai pe firne laga to uske gale

se nikal rahi aahe tez hone lagi.vo choochi ke pure dayre pe brush

fira raha tha & jab brush golai ka 1 chakkar pura karta to dayra

chhota ho jata.is tarah vo uske nipple tak pahunch raha tha.viren ne

aise gulabi nipple apni zindagi me nahi dekhe the.usne kayi videshi

ladkiyo ko choda tha magar aise phoolo ke rang ke nipples unke bhi

nahi the.

"oohh..",kamini ke nakhun khidki ke sill & deewar ke paint ko kharonch

rahe the & viren ka brush uske nipple ko.jab tak viren ne brush se

uski dayi chhati pe bhi vahi harkat ki tab tak kamini ki chut se pani

risne laga tha.brush ab uske seene se neeche uske pet pe fir raha tha

& kamini ki sanse mano atak rahi thi.

"umm..",brush uski nabhi ki gehrayi me rang bhar raha tha.vo ab bahut

dhire-2 apni kamar hila rahi thi.use intezar tha ab brush ke khurdure

balo ka apni chut & uske dane pe.brush nabhi se nikla & aur neeche

aaya.kamini ki aankhe band ho gayi & chehre pe halki si muskan khil

gayi bas thodi hi der me viren uski pareshan chut ko sukun

pahuchayega.

magar aisa kuchh bhi nahi hua.brush uski chut ke bagal se hota hua

uski bayi uthi hui tang ki jangh pe chadh gaya & vaha se neeche jane

laga.kamini ne aankhe khol viren ki or aise dekha mano us se thodi

khafa ho lekin viren bas uske jism pe rush firaye ja raha tha.uski

andruni jangh pe chalte brush ne uski betabi ko aur badha diya tha

lekin jab brush uski bayi tang ke uthe hue ghutne se hota hua neeche

uske panv tak pahuncha & uski ungliyo ke beech ghus-2 kar mano rang

bharne laga tab to kamini pagal hi ho uthi.

viren ko abhi bhi uspe taras nahi aaya tha.brush bayi se dayi tang pe

chala gaya tha & vaha bhi uske panv ki ungliyo ke sath usne vaisa hi

bartav kiya & fir upar aane laga.is baar brush uski bhari jangh se

firta hua kahi aur nahi gaya balki seedha uski chut ke dane pe aa

baitha.viren uski aankho me jhank raha tha & uska hath brush ko uske

dane pe firaye ja raha tha.kamini aahe bharti hui sill pe aise machal

rahi thi jaise jal bin machhli.

uske hath ab apni choochiyo ko masal rahe the.viren us mastani ladki

ki harkate dekh garam ho raha tha.uske brush ne kamini ke dane ko

chhede-2 kar use jhadwa hi diya tha.uske jhadte hi viren ne brush

fenka.thik usi waqt kamini ko purvabhas sa hua ki vo use chumega &

usne bhi apni baahe uske gale me daal use neeche khincha & dono

premiyo ne pehli bar 1 dusre ko chuma.dono 1 dusre ke hotho ka lutf

uthate hue apni-2 zuban bari-2 se 1 dusre ke munh me daal ghuma rahe

the.abhi tak viren ke hatho ne kamini ko chhua bhi nahi tha & uska

badan jaise dukh raha tha.

vo chah rahi thi ki viren apni baaho me use kas uska sara dard mita de

magar viren us husnpari ko aise pyar karna chahta tha ki use bhi

taumra yaad rahe.vo hotho ko chhod gardan chumte hue neeche jhuka &

uski choochiyo ko apne munh me bharne laga.kamini bechaini & josh se

uske sar & badan pe hath fer rahi thi magar uske hath abhi bhi peechhe

hi the.

kramashah........

 
गतान्क से आगे...

काफ़ी देर तक वो उसकी छातियो को पीता रहा,फिर वो तेज़ी से जीभ चलाते हुए

नीचे जाने लगा & उसके पेट से होता फ़ौरन उसकी गीली चूत पे पहुँच गया.उसकी

लपलपाति जीभ ने कामिनी की चूत के अंदर ऐसी-2 हरकते की कामिनी का अब सिल

पे बैठना मुहाल हो गया.

"आहह...हहाईयाीइ.....आआहह.....ऊहह..!",झाड़ते ही उसने वीरेन के बाल पकड़

उसे उपर उठा लिया & उसकी नज़रो मे देखते हुए उसके होंठो पे अपने होठ रख

दिए.उसे बहुत प्यार आ रहा था अपने इस नये आशिक़ पे & अब वो बस उसके साथ

इस खेल को इसके अंजाम तक ले जाना चाहती थी.उसने वीरेन के होंठ छ्चोड़े &

उसकी ट्रॅक पॅंट को नीचे किया.वीरेन ने उसे अपनी टाँगो से निकाल फेंका.

सामने उसका 9 इंच का बेहद मोटा लंड सर उठाए खड़ा था....इतना मोटा!..इतना

तो ठुकराल का भी नही था..कामिनी ने हैरत से उसपे अपने हाथ कसे तो वो उसके

1 हाथ की मुट्ठी मे बड़ी मुश्किल से समाया,".आहहह...",वीरेन ने खुशी से

आह भरी मगर अब वो और इंतेज़ार नही कर सकता था.

उसने कामिनी को सीधा बिठाया & उसके सामने सिल पे बैठ गया.कामिनी उसका

इशारा समझ गयी.वीरेन 1 टांग कमरे के अंदर & 1 बाहर लटकाए बैठा था.& उसके

सामने वैसे ही कामिनी.कामिनी आगे बढ़ी & अपनी जंघे उसकी जाँघो पे चढ़ाते

हुए उसके लंड पे बैठने लगी,"ओईई....माआआआआ....!",लंड की चौड़ाई उसकी चूत

को बहुत फैला रही थी & उसके चेहरे पे दर्द की लकीरे खींच गयी थी.

वीरेन ने उसकी गंद के नीचे हाथ लगाया & उसे थाम नीचे से 2-3 धक्के

दिए,"..ऊओवव्व..!",लंड अब पूरा घुस चुका था.उसने धक्के रोके & बस लूँ

घुसाए बैठ गया.कामिनी की चूत थोड़ी ही देर मे लंड की आदि हो गयी & उसने

उच्छल-2 कर चुदाई शुरू कर दी.वीरेन के हाथ उसकी गंद से उपर उसकी पीठ &

फिर बालो मे फिर रहे थे & दोनो 1 दूसरे को चूम रहे थे.वीरेन कामिनी की

चूत की कसावट से हैरान था..ऐसी कसी चूत उसने आज तक नही मारी थी.

"तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की मैने ज़िंदगी मे नही देखी थी..आअहह...& तुम

मेरे साथ..चुदाई कर रही हो..मुझे यकीन नही होता,कामिनी!",वीरेन ने सर

झुका के उसकी चूचिया मसली & उन्हे चूस लिया.

"ऊहह...वीरेन...तुम्हारे जैसे मर्द से मैं...आईययईए...भी ना..ही

मी..ली..आज .तक....आआअनंह...उऊन्ह.......ऊनह..!",उसने उसे अपनी बाँहो मे

भींच लिया क्यू की उसके लंड की रगड़ ने उसे फिर से झाड़वा दिया था.वीरेन

ने उसकी गंद की फांको के नीचे फिर से हाथ लगाया & उसे गोद मे उठा खड़ा हो

गया फिर उसने अपनी बाई टांग उठाई & अपनी प्रेमिका को लिए-दिए कमरे से

बाहर हो गया.वीरेन ने उसे कमरे की बाहरी दीवार से लगाया & उसकी गंद थामे

धक्के लगाने लगा.

कामिनी फिर से मस्ती मे खोने लगी.वीरेन झुक के कभी उसकी गर्दन चूमता तो

कभी सीने के उभार.कामिनी भी मस्ती मे पागल हो उसे उठा उसके होंठ चूम

लेती.वो फिर से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी की तभी वीरेन ने उसे दीवार

से हटाया & लेके खुले लॉन मे आ गया.तेज़ बारिश ने उन्हे पूरा भींगा दिया.

वीरेन उसे ले नर्म,मखमली घास पे लेट गया.कामिनी को पीठ पे ठंडी घास से

सिहरन हुई मगर उसके इस अंदाज़ ने उसे बहुत रोमांचित कर दिया था.लेटते ही

उसने अपनी टाँगे उसकी कमर पे & बाहे उसकी पीठ पे कस दी थी & अपनी कमर

नीचे से हिलने लगी थी.जवाब मे वीरेन ने भी अपने गहरे धक्के शुरू कर

दिए.तेज़ बारिश के शोर मे भी लॉन मे कामिनी की आहे गूँज रही थी.वो वीरेन

की पीठ को अपने नखुनो से खरोंच रही थी.उसकी चूत मे अब बहुत तनाव बन गया

था & वीरेन भी अब अपने लंड पे महसूस कर रहा था की उसकी चूत और कस गयी है.

"आअहह...कामिनी..आ..ह...कितनी कसी है तुम्हारी..चूत..आअहह....अब मैं नही

रुक सकता.."

"बस ...ऐसे ही छो..ते रा..हो..वी..रें...मैं

भी..बा.....आआआनंह..आआईईई...ऊऊऊहह....!",बात पूरी करने से पहले ही कामिनी

झाड़ चुकी थी.झाड़ते वक़्त उसकी चूत ने फिर वही सिकुड़ने-फैलने की

मस्तानी हरकत की जोकि वीरेन के लिए बिल्कुल नया एहसास था.

"आआहह...आहह...आहहह....!",उसकी भी आह निकल गयी & उसका गर्मागर्म गाढ़ा

वीर्या लंड से छूट कामिनी की चूत मे भरने लगा.बारिश से बेपरवाह दोनो घास

पे पड़े लिपटे हुए 1 दूसरे को चूमते जा रहे थे मानो 1 साथ झड़ने के इस

लम्हे को वो क़यामत तक बरकरार रखना चाहते हो.

सुरेन सहाय अपने बाथरूम से नहा कर तौलिया कमर पे बँधे बाहर आए तो सामने

का नज़ारा देख के उनका दिल जोश से भर गया.उनकी खूबसूरत बीवी केवल ब्रा &

पॅंटी पहने कपबोर्ड से कपड़े निकाल रही थी.उसकी गोरी पीठ उनकी तरफ थी

जिसपे ब्रा के काले स्ट्रॅप्स कसे हुए थे.

देविका कपबोर्ड के उपर के शेल्फ से कुच्छ निकालने के लिए अपने पंजो पे

उचकी तो उसकी चौड़ी गंद उभर गयी & उसकी गुदाज़ बाहे उपर होने से ब्रा

स्ट्रॅप्स भी खींचने लगे.सुरेन जी ने पिच्छले 2 दीनो से खुद पे काबू रखा

था,उन्होने सोचा था की 1 बार डॉक्टर से बात कर लें फिर अपनी बीवी को भी

चोदेन्गे & शहर जा किसी मस्त कल्लगिर्ल के बदन का भी भरपूर लुत्फ़

उठाएँगे.

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी & मौसम भी काफ़ी मस्ताना हो गया था.ऐसे मे

सामने देविका इस क़ातिल अंदाज़ मे खड़ी थी,वो सब कुच्छ भूल गये & बस यही

याद रहा की ये खूबसूरत बदन जोकि उनकी मिल्कियत है उसकी गहराइयो मे उतरके

उन्हे बस वो अनोखी खुशी हासिल करनी थी.वो आगे बढ़े & पहले नारंगी डिबिया

से निकाल 1 गोली खाई & फिर उस बेख़बर हसीना को पीछे से अपनी बाहो मे

जाकड़ लिया,"हाअ.....",देविका चौंक पड़ी.

"क्या करते हैं..छ्चोड़िए ना!....उउम्म्म्म....!",सुरेन जी ने उसके कंधो

से स्ट्रॅप्स को उतार ब्रा को फर्श पे गिरा दिया था & उनकी बाई बाँह उसके

सीने के पार पड़ी उसकी दोनो छातियो को अपने नीचे दबाए थी & बाया हाथ उसकी

दाई छाती को मसल रहा था.उनका दाया हाथ उसके चिकने पेट को सहलाता हुआ उसकी

नाभि को कुरेद रहा था & उनके तपते लब उसकी लंबी गर्दन को अपनी तपिश से

जला रहे थे.
 
"उउम्म्म्मम....",देविका को भी बहुत अच्छा लग रहा था & उसने अपनी गुदाज़

बाहे पीछे लेजा उनके सर को थाम अपने जिस्म पे और झुका दिया,"..दवा ली

आपने?...उउफफफ्फ़..!"

"हां.",सुरेन जी ने उसे घुमा के कुच्छ पल उसके गुलाबी होंठ चूमे & फिर

उसे हल्के से धकेला तो देविका पलंग पे गिर पड़ी,उसकी टाँगे नीचे लटकी हुई

थी & वो बिस्तर पे लेटी अपने हाथो से अपनी छातियो को दबाते नशीली आँखो से

अपने पति को देख रही थी.बीवी की मस्तानी अदा देख सुरेन जी ने फ़ौरन अपना

तौलिया उतार फेंका.उनका दिल बहुत ज़ोरो से धड़क रहा था मगर उन्हे अभी

देविका के जिस्म के अलावा कुच्छ नही सूझ रहा था.

1 झटके मे उन्होने देविका की पलंग से लटकी टांगो को उठा उसकी पॅंटी उतरी

& 1 ही झटके मे अपना पूरा लंड उसमे उतार दिया & खड़े-2 ही उसे चोदने लगे.

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"उउम्म्म्म....वीरेन....आहानन्न....अब सोने दो ना....ऊओवव्व....शरीर

कहिनके!",कामिनी वीरेन के स्टूडियो मे उसके पलंग पे पड़ी हुई थी & वो

उसकी छातियो के गुलाबी निपल्स को बारी-2 से दाँत से काट रहा था.

"इतना तो सो ली.अब और कितना सोयॉगी?4 बज रहे हैं,भोर हो गयी है.",वीरेन

ने दाँत को निपल से हटाया & उसकी दाई चूची को पूरा का पूरा मुँह मे भरने

की कोशिश करने लगा,"..आआआआआअहह.....!",शुरू मे तो कामिनी की आह निकली मगर

बाद मे बस मुँह खुला रह गया & आवाज़ बंद हो गयी.मस्ती मे 1 बार फिर उसकी

आँखे बंद हो गयी थी & वो फिर से हवा मे उड़ने लगी थी.रात को लॉन मे चोदने

के बाद वो उसे गोद मे उठा अंदर ले आया था.

अपने हाथो से उसने उसके मखमली जिस्म पे लगी मिट्टी & घास के टुकड़ो को

बाथरूम मे सॉफ किया था & उसके बाद से लेके अभी तक वो उसे 2 बार और चोद

चुका था.हर बार वीरेन उसे इतना मस्त कर देता था की वो उसके लंड के लिए

पागल हो जाती थी मगर वो उसे फिर भी तड़पता रहता था & कितना मज़ा था उस

तड़प मे..उउफ़फ्फ़!..& जब लंड घुसता तो ना जाने कितनी देर तक उसके अंदर

खलबली मचाता रहता.जब तक वो मन भर के नही झाड़ जाती तब तक वो भी नही

झाड़ता था.

अभी भी उसने उसे बिल्कुल पागल कर दिया था.कामिनी ने अपनी दाई तरफ करवट से

लेटे उसके जिस्म से खेलते वीरेन के उपर अपनी बाई टांग चढ़ा दी & उसके लंड

को पकड़ लिया....रात भर चुदने के बाद भी उसकी मोटाई ने उसे हैरान करना

नही छ्चोड़ा था.उसने अपने अंगूठे & उंगली का दायरा बनाके लंड को घेरना

चाहा मगर नाकामयाब रही.लंड को पकड़ उसने अपनी चूत पे रगड़ना चाहा तो

वीरेन ने लंड पीछे खींच लिया.

रात भर के तजुर्बे से कामिनी समझ गयी थी की वो तडपा-2 के उसके नशे को और

बढ़ाना चाहता था मगर उसे अभी बिल्कुल सब्र नही था,"..उउंम नाटक मत

करो...जल्दी से डालो ना!",वो टाँगे फैलाए लेट गयी & वीरेन को खींच अपने

उपर लिया & उसके लंड को पकड़ के फिर से अपनी चूत पे रख दिया.वीरेन

मुस्कुराते हुए फिर से रुक गया,"..उउन्न्ह..उऊन्ह...वीरेन..मत तड़पाव

ना....प्लीज़!...जल्दी से चोदो मुझे!",उसने अपनी कमर हिला के अपनी बेचैनी

जताई.इस बार वीरेन ने उसकी इल्तिजा सुन ली & 1 ही झटके मे आधे लंड को

अपनी नयी-नवेली प्रेमिका की चूत मे दाखिल करा दिया,"..ऊव्व...!",कामिनी

को अभी भी थोड़ा दर्द हुआ मगर उस से भी ज़्यादा उसे मज़ा आया.

"तिन्न्ग्ग्ग्ग....!",दोनो के मज़े मे वीरेन के मोबाइल ने खलल डाला.वीरेन

ने गर्दन घुमा के देखा तो नंबर देख उसने फ़ौरन मोबाइल उठा लिया.कामिनी को

बहुत बुरा लगा मगर वो चुपचाप उसे देखती रही.वीरेन ने धक्के लगाने बंद किए

& अपना सीना नीचे कर कामिनी की चूचियो को दबा अपना वजन उसके बदन पे टीका

फोन कान से लगाया,"हेलो..क्या?!!!!"

कामिनी ने महसूस किया की वीरेन का लंड जो अभी तक लोहे जैसा सख्त था अब

बिल्कुल ही कोमल हो सिकुड़ने लगा.वीरेन के माथे पे पसीने की बूंदे चूचुहा

आई & वो बस कान से फोन लगाए सुन रहा था.उसके चेहरे का रंग बिल्कुल उड़

चुका था.कामिनी को चिंता होने लगी.उसने उसके चेहरे पे प्यार से हाथ

फिराया & आँखो से इशारे मे पुचछा मगर वीरेन वैसे ही कान से फोन लगाए मानो

बुत बन गया था.

कामिनी को लगा की जिसने भी फोन किया था उसने अब फोन रख दिया था मगर वीरेन

वैसे ही बुत बना हुआ था,"वीरेन..वीरेन..!",कामिनी ने उसे झकझोरा मगर

उसपेकॉई असर नही हुआ.कामिनी ने उसके हाथ से फोन लिया & कान से लगाया मगर

फोन काट चुका था,"क्या हुआ वीरेन?!!!!कुच्छ तो बोलो!",उसने उसे दोबारा

झकझोरा.

"भाय्या....",& उसकी आँखो से आँसू बहने लगे.

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क्रमशः.................

 
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