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Best Hindi stories by author Dr. Pushpa Saxena

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Best Hindi stories by author Dr. Pushpa Saxena

लेखक की कलम से,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

प्रिय पाठक मित्रो,

मेरी ये कहानियां जीवन के विविध रंगों से आपको मंत्रमुग्ध कर देंगी, इसका विश्वास है। इनमे प्रेम के अभिनव रूप हैं, विदेश मे रहने वालों की विवशता, जीवन की कटु सच्चाई, दलित- चेतना जैसे विषयों के साथ बच्चों के लिए भी प्रेरक और रोचक कहानियां हैं। ये मनभावन कहानियां आपको प्रेम- रस मे रंग कर अपना बना लेंगी और आप सहज ही कहानी के एक पात्र बन जाएंगे।

कहानियों की रोचकता के विषय मे पाठकों का कहना है "यदि कहानी पढनी शुरू कर दी तो सारे काम छोड़कर कहानी पूरी पढ डालना ज़रूरी हो जाता है। एक-एक शब्द मीठे शरबत की तरह घूंट-घूंट पीते है। "

कहानियोंके विषय मे आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। आपके अनुभव और सुझाव मुझ्र प्रेरणा देंगे।

धन्यवाद,

पुष्पा सक्सेना।
 
एक लड़की शालिनी

“रैविशिंग वूमन संस्था” का वार्षिक सम्मान समारोह प्रति वर्ष आयोजित किया जाता था.उस दिन नारी-शक्ति की प्रतीक एक महिला को उसकी उपलब्धियों, उसके संघर्ष और विजय आदि के आधार पर सम्मानित किया जाता था. संस्था की अध्यक्षा डॉ नंदिता नाथ ने अपने वक्तव्य में कहा-

“मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी है कि इस वर्ष रैविशिंग वूमन के गौरवपूर्ण सम्मान के लिए हमारे सियाटेल नगर की शालिनी यादव को सम्मानित किए जाने का निर्णय लिया गया है, एक छोटे शहर मथुरा से आई सामान्य लड़की शालिनी ने अकेले अपने अदम्य साहस, धैर्य और आत्मविश्वास से अनेकों कल्पनातीत विषम परिस्थितियों पर अपने संघर्ष से विजय प्राप्त की है.

आज शालिनी ने अपने को न केवल अमरीका में स्थापित ही किया है बल्कि नारी-शक्ति को चरितार्थ किया है. हमें शालिनी यादव पर गर्व है. मै शालिनी जी को मंच पर आमंत्रित करती हूँ. स्थानीय मेयर महोदया से निवेदन है वह शालिनी जी को बुके देकर उनका स्वागत करने की कृपा करें

धीमे कदमों से मंच पर जाकर बुके लेती शालिनी के लिए तालिया गूँज उठीं, कैमरों से शालिनी का चित्र लेने की होड़ लग गई.जलपान के समय स्त्रियों ने शालिनी को घेर लिया. सब उसके संघर्ष की कहानी जानने को उत्सुक थीं,पर उतने कम समय में क्या शालिनी अपने वर्षों के जीवन- संघर्ष की कहानी सुना सकती थी?

घर वापिस आई शालिनी फ्लॉवर वाज़ में फूल सजाती वर्षों पुरानी यादों में खो गई. चित्र आँखों के सामने खुलते गए-

दुबई से राजीव के परिवार की पुराने शहर मथुरा में वापिसी से कॉलोनी की युवा पीढी का राजीव हीरो बन गया था. राजीव के आने की सबसे ज़्यादा खुशी शालिनी को हुई थी. बचपन से साथ खेलते दोनों ने एक साथ हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी. दोनों की मित्रता के उदाहरण दिए जाते थे. परिवार के साथ राजीव के दुबई जाने से शालिनी को अपने मित्र की कमी खलती थी. पड़ोसी होने के कारण शालिनी और राजीव के परिवारों में भी.में भी घनिष्ठता थी. वर्ष बीत गए थे अब राजीव एक मेधावी युवक बन कर वापिस आया था और शालिनी भी मितभाषी सौम्य युवती बन चुकी थी थी. सादगी और सच्चाई के कारण शालिनी सबको प्रिय थी. वापिस आने पर राजीव सबसे पाहिले शालिनी से मिलने गया, उसे देख शालिनी खिल उठी दोनों का आपसी स्नेह और मैत्री पूर्ववत थी.उनकी बातें खत्म ही नहीं होती थीं .

राजीव महत्वाकांक्षी युवक था, उसने अपने भविष्य के सपने पहले ही निर्धारित कर लिए थे, अब वह अमरीका से एम बी ए करने जाने वाला था.राजीव जब भी अमरीका के विषय में शालिनी को बताता, शालिनी सोचती काश कभी वह भी सपनों के देश अमरीका जा पाती. शालिनी भी आगरा यूनीवर्सिटी से होम इकोनोमिक्स में मास्टर्स करने के लिए प्रवेश ले चुकी थी. राजीव शालिनी से कहता-

“अगर तुम अमरीका जाना चाहती हो तो अमरीका जाने के पहले तुम्हें अपने को तैयार करना होगा.वहां की लाइफ बहुत फास्ट है. वहां की लडकियां हर क्षेत्र में लड़कों के समकक्ष ही नहीं कहीं कहीं –कहीं उनसे बहुत आगे हैं. अगर तुम अमरीका के विषय में पढो तो तुम्हें उनके मुकाबले अपने आप में और मथुरा शहर में बहुत कमियाँ ज़रूर नज़र आएंगी.”

“हमें डराओ नहीं, एक बात तुम नहीं जानते भारतीय लडकियां हर स्थिति और परिवेश में अपने को एडजस्ट कर लेती हैं. वैसे भी हम भला अमरीका कैसे जा सकते हैं.”मायूसी से शालिनी कहती.

“ऐसा क्यों सोचती हो, जहां चाह वहां राह, कोशिश करने से तुम्हारे सपने भी सच हो सकते हैं. मन में साहस और विश्वास हो तो क्या कुछ नहीं किया जा सकता.”

“थैंक्स राजीव, मास्टर्स पूरी करने के बाद हम ज़रूर कोशिश करेंगे तुम्हारे शब्दों से बहुत प्रेरणा मिली है, हमेशा याद रखूंगी. तुम्हारे लिए लिए हमारी शुभ कामनाएं.”अचानक राजीव की बातों ने शालिनी में एक नया उत्साह और आत्मविश्वास जगा दिया.

सबकी शुभ कामनाओं के साथ राजीव अमरीका चला गया.

पर कभी-कभी सपने भी सच हो जाते हैं.अचानक शालिनी के पापा के एक मित्र ने शालिनी के लिए एक रिश्ता बताया. अमरीका से अमर नाम का युवक भारतीय लड़की के साथ विवाह करने भारत आरहा था. आई आई टी से कम्प्यूटर इंजीनियरिंग करने के बाद अमर अमरीका में माइक्रोसॉट जैसी नामी कम्पनी में काम कर रहा है.उसका परिवार हरयाना के एक गाँव में ज़रूर रहता है,पर परिवार के सब बच्चे सुशिक्षित थे. शालिनी के परिवार वाले अमर के परिवार से मिलने उसके गाँव गए. शीघ्र ही अमर और उसके माता-पिता शालिनी से मिलने मथुरा आने वाले थे.

निश्चित दिन अमर अपने माता-पिताके साथ आगया था.धड़कते दिल के साथ शालिनी उसके सामने गई थी.अमर ने नरमी से पूछा -

“आप की भविष्य की क्या योजना है, आगे क्या करना चाहती हैं?”

शालिनी ने धीमे से अपनी आगे की योजना बताते हुए कहा था-

“अगर आप कोई हाई-फ़ाई लड़की चाहते हैं, तो मै बिलकुल वैसी नहीं हूँ, मेरी अंग्रेज़ी भी कमज़ोर है.”

“कोई बात नहीं, अमरीका में आप सब सीख जाएंगी, मुझे आपकी सच्चाई पसंद आई है.”

“एक बात और कहनी है, मै अपनी एम् एस सी की पढाई पूरी करना चाहती हूँ.”

“उसमें कोई बाधा नहीं आएगी. वैसे भी मुझे ग्रीन कार्ड मिलने में कुछ समय लगेगा.”

अमर अभी एच वन वीसा पर था.शादी के बाद पत्नी के साथ ग्रीन कार्ड लेने की सोच कर जल्दी शादी का निर्णय लिया गया था. पन्द्रह दिनों के भीतर शादी कर के वह अमरीका लौटने वाला था.-

अमर की हाँ से घर में खुशी का माहौल बन गया.सबने शालिनी के भाग्य को सराहा उसकी माँ ने कहा-“हमारी शालिनी बेटी है ही बहुत भाग्यवान, इसके जन्म पर इसके पापा का डी एस पी के रूप में सेलेक्शन हुआ था. ग्रेड अच्छे होने पर अब उन्होंने यूनीवर्सिटी में जॉब ले लिया है.”

विवाह की तैयारियों और रिश्तेदारों के आ जाने से शालिनी भी व्यस्त होगई, सहेलियां चिढातीं-

‘शादी के बाद शालिनी अमरीकन बन कर लौटेगी. हमारे मथुरा की भला याद रहेगी?”शालिनी सोचती भला वह कभी मथुरा को भूल सकेगी, जहां उसका मीठा बचपन बीता है.

अंतत: शादी का दिन आ पहुंचा. दिसंबर की ठंडी रात में भी शालिनी के मन में खुशी की ऊष्मा थी.विवाह हर्षौल्लास के साथ संपन्न होगया. विदा होती शालिनी को उसकी माँ ने प्यार से सीख दी थी-

“शालू बेटी, मै जानती हूँ, तू बहुत अच्छी लड़की है. कभी किसी की गलत बात पर भी विरोध ना कर के चुप रह जाती है. बस ऐसे ही अपने श्वसुर –गृह में भी अपने माता-पिता के सम्मान को बनाए रखना.”

ससुराल पहुंची शालिनी का स्वागत आशानुरूप उत्साह से नहीं किया गया. श्वसुर जी बेहद नाखुश थे. उनकी आशा के अनुरूप दहेज़ नहीं मिला था. अमर ने दहेज़ मांगने को मना कर दिया था.सास भी औरतों से कह रही थीं-

“हमारा हीरा जैसा बेटा मथुरा वाले कौड़ियों के मोल ले गए. हमें डर था कहीं अमर किसी गोरी मेंम के जाल में ना फंस जाए इसीलिए जल्दी में ये रिश्ता करना पडा, हम तो ठग गए.”

“अरे कुछ कमीने ऐसे ही होते हैं, कुछ ना मांगों तो खाली लौटाते शर्म नहीं आती.” श्वसुर जी बडबडाते.

माता-पिता के लिए अपशब्द सुनती शालिनी की आँखों में आंसू आ जाते उसके माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य से अधिक सामान दिया था. शालिनी उनकी सबसे बड़ी बेटी थी, उसकी शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. अगर उन्हें पैसे ही चाहिए थे तो साफ़ शब्दों में अपनी मांग बता देते. अमर इन बातों के विरोध में कुछ नहीं कहते, सोच कर शालिनी दुखी होती,पर अमर से कुछ नहीं कहा. एक सप्ताह बाद जल्दी आने का वादा कर अमर चला गया. शालिनी भी अपनी पढाई पूरी करने वापिस मथुरा चली गई.

डेढ़ वर्ष बाद ग्रीन कार्ड पाने के लिए अमर वापिस आया था. शालिनी भी एम एस सी कर चुकी थी.दोनों को ग्रीन कार्ड मिल गया. अब शालिनी के अमरीका जाने का समय आगया था. पहली बार प्लेन में बैठती शालिनी को कुछ घबराहट हुई, पर अपने को बादलों के ऊपर उड़ते देख शालिनी उत्साहित हो उठी.

सियाटेल का भव्य एयरपोर्ट देख शालिनी चमत्कृत थी. टैक्सी से बाहर देखती शालिनी को साफ़ चौड़ी सड़कों पर् दौडते अनगिनत तेज़ भागते वाहन विस्मित कर रहे थे. सियाटेल की हरीतिमा और सौन्दर्य ने उसे मुग्ध कर दिया. शायद स्वर्ग इसे ही कहते हैं. टैक्सी अमर के अपार्टमेंट के सामने रुकी थी. अपनी चाभी से दरवाज़ा खोल अम्रर ने शालिनी को अन्दर आने को कहा था. घर के भीतर गई शालिनी ने एक नज़र अपने घर पर डाली थी. एक बैचलर के मुकाबिले घर काफी सुव्यवस्थित था. अमर ने कहा-

“शायद फ्रिज में कुछ खाने का सामान बचा रखा होगा, अगर भूख लगी हो तो निकाल लो.”

“नहीं, अभी फ्लाइट में तो इतना खाया है, शाम के लिए कुछ ताज़ा बना लूंगी. इतने दिन का बासी खाना कैसे खाएंगे?’खुशी से शालिनी ने कहा.

“यहाँ बासी का कॉन्सेप्ट ही अलग है, महीनों पुराना खाना भी ताज़ा ही रहता है. तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना होगा, ये मथुरा नहीं है.”स्पष्ट आवाज़ में अमर ने कहा.

“घबराइए नहीं,बहुत जल्दी सब सीख लूंगी.”मुस्कुरा कर शालिनी बोली.

“सबसे पहले तो ज़रा अपने कपडे देखो. टीवी पर वेस्टर्न ड्रेसेज तो देखती होगी. कम से कम दिल्ली से कुछ वेस्टर्न ड्रेसेज ही ले आतीं, तुम नहीं जानतीं यहाँ कपडे कितने महंगे होते हैं,अमर ने रुखाई से कहा.

शालिनी का मन बुझ गया, उसे तो यही पता था, पति अपनी नवविवाहिता को गिफ्ट देने में खुशी का अनुभव करते हैं. पर शायद अमर ठीक कह रहा था, उसे इस बारे में पहले ही सोचना चाहिए था.

अमर सवेरे जाकर देर शाम को लौटता था. वह अधिक बातें नहीं करता था, शालिनी को अमर के व्यवहार से कोई शिकायत नहीं थी. इतना ज़रूर था जब भी उसके घर से फोंन आता, उसका मूड ख़राब हो जाता. हर फोन- काल के बाद अमर को शालिनी से किसी न किसी बात की शिकायत हो जाती.

“तुम्हारे मम्मी-पापा को यह भी नहीं पता लड़की की ससुराल में तीज-त्योहार पर कितना सामान भेजना चाहिए.मेरे पेरेंट्स के भी तो कुछ अरमान थे. अगर हरयाणवी रीति-रिवाज़ नहीं पता थे, तो मुझसे शादी करनी ही नहीं चाहिए थी. नाराजगी में घर से बाहर निकल जाता और घंटों बाद वापिस लौटता.

अमरीका में दिन बीतने शुरू होगए. शालिनी हर बात को ध्यान से देखती, समझने की कोशिश करती. पास के घरों में रहने वाली स्त्रियों से शालिनी ने मिलना शुरू किया था. उसे खुशी थी, उसके घर के पास उसकी तरह की कुछ लडकियां विवाह के बाद अमरीका आई थीं. नीता और सविता से शालिनी की अच्छी पटने लगी थी. हांलाकि अंग्रेज़ी उसकी कमजोरी थी,पर पास में रहने वाली अकेली वृद्धा मारिया उससे स्नेह से मिलती, उसने शालिनी को हिम्मत दी कि वह उनके साथ नि:संकोच अंग्रेज़ी में बात कर सकती है,. मारिया ने शालिनी को यह भी समझाया-

“इस देश में सब स्त्री-पुरुष काम करते हैं, तुमने जो डिग्री ली है, उसके आधार पर कोई काम कर सकती हो. मेरी एक फ्रेंड है, वह तुम्हें तुम्हारे योग्य काम के लिए तुम्हारी सहायता कर सकती है.”

मारिया की फ्रेंड की सहायता से शालिनी ने अपनी पसंद के विषय चाइल्ड- केयर का लाइसेंस ले लिया.. पर अभी काम शुरू करने की बात नहीं सोची. पहले उसे अमेरिकन जीवन-शैली को समझना ज़रूरी था.इसके लिए सविता और नीता से बहुत जानकारी मिलती थी.

सविता और नीता ने शालिनी को सलाह दी कि उसे ड्राइविंग सीख लेनी चाहिए वरना छोटी-छोटी —ज़रूरतों और काम पर जाने के लिए उसे अमर पर निर्भर होना पड़ेगा. ड्राइविंग सीखने की बात पर अम्रर बोला-

“वाह लगता है तुम्हारे पर निकल आए हैं, मेरे पास दूसरी कार खरीदने के लिए फ़ालतू पैसे नहीं हैं.वैसे भी तुम कौन सी नौकरी पर जाती हो,”

“विश्वास रखिए जल्दी ही कोई काम शुरू करूंगी,प्लीज मुझे ड्राइविंग सीखने की परमीशन चाहिए.”

शालिनी को राजीव की बात याद हो आई, उसने कहा था, अमरीका में लडकियां कार ही नहीं बड़ी-बड़ी-वड़ी बसें चलाती हैं. शालिनी के बार-बार के अनुरोध पर अंतत: अमर ने ड्राइविंग स्कूल में शालिनी का नाम रजिस्टर करा दिया.शालिनी पूरे मन से ड्राइविंग सीखने लगी. जिस दिन उसे ड्राइविंग लाइसेंस मिला उसकी खुशी का अंत नहीं था. उसने एक विजय पा ली थी. इस बीच उसने ग्राफिक्स डिज़ाइनिंग और इंग्लिश की क्लासेज़ भी पूरी कर लीं. अब शालिनी कोई काम तलाशने की बात सोच रही थी कि शालिनी को आभास हुआ कि वह माँ बनने वाली है.

शालिनी की खुशी का ठिकाना ना रहा. किताबें पढ़ कर शालिनी अपने आने वाले शिशु के लिए अपने को तैयार कर रही थी. प्रसव समय निकट आने पर शालिनी ने बड़ी नम्रता से अमर से कहा—

“आपसे एक अनुरोध है, डिलीवरी के समय माँ के आने से मुझे साहस और सहायता मिलेगी. अगर आप अनुमति दें तो इस समय अपनी माँ को यहाँ बुलाना चाहती हूँ.”

“ठीक है, पर यहाँ आने के लिए अपना टिकट उन्हें खुद खरीदना होगा.अभी मुझे कुछ फाइनेंशियल प्रॉब्लेम है वरना टिकट ज़रूर भेजता.अब देखो बेबी के जन्म के पहले ही ढेरों सामान खरीदना होग़ा. हमारे हिन्दुस्तान में ऐसे झंझट नहीं होते.”संजीदगी से अमर ने कहा.

‘आप उसके लिए परेशान ना हों, माँ अपना यहाँ आने का खर्च उठा सकती हैं.”शालिनी ने जब खुशी से यह बात आंटी मारिया को बताई तो उन्होंने आश्चर्य से कहा-

“क्या अमर को पैसों की प्रॉब्लेम है क्या तुम उसकी सैलरी जानती हो? मुझे नहीं लगता उसे इंडिया एक टिकट भेजना कठिन बात है. तुम्हारा ज्वाइंट अकाउंट तो होगा.”

“नहीं, आंटी, मुझे यहाँ के बैंक वगैरह के बारे में कुछ नहीं पता. मुझे जो भी चाहिए अमर से ले सकती हूँ. अमर को ज़रूर कोई मुश्किल होगी.” शालिनी को अमर पर पूरा विश्वास था.

माँ के आ जाने से शालिनी बेहद खुश थी. माँ ने आते ही शालिनी को सारे घर के कार्यों से मुक्त कर दिया, दामाद होने के कारण माँ अमर का बहुत ख्याल रखतीं,पर अमर उनके स्नेह के प्रति उदासीन रहता बल्कि एक दिन उसने शालिनी से कहा-

“अपनी माँ से कह दो, मै बच्चा नहीं हूँ. अपनी परवाह खुद कर सकता हूँ.””

दिसंबर में शालिनी ने एक नन्हीं बेटी नेहा को जन्म दिया. माँ और बेटी दोनों सकुशल हैं की सूचना जब अमर ने अपने परिवार वालों को दी तो बधाई की जगह उसे ढेरों उलाहने सुनाने को मिले.

“कौन सी खुशी की बात सुना रहे हो? कौन सा बेटा जन्मा है. तुझ पर एक और बोझ बढ़ा दिया. अमरीका में शालिनी की माँ मौज उड़ा रही है, उसके टिकट पर अपने पैसे लुटा डाले.”श्वसुर जी दहाड़े.

“तुझे अपनी माँ पर यकीन नहीं था जो अपनी सास को बुला कर हमें बेइज्जत किया है. हमें तो पक्का यकीन है,शालिनी और उसके घरवाले तुझे लूट लेंगे.मेरी बात मान,बहुत होगया अब तू शालिनी से तलाक ले ले. तुझे एक नहीं हज़ार अच्छी और अमीर घर की लडकियां मिल जाएंगी.”

इत्तेफाक से शालिनी ने फोन के दूसरे कनेक्शन पर ये बातें सुन लीं. उसे आश्चर्य था कि अमर ने एक भी बात का प्रतिवाद नहीं किया इससे शालिनी स्तब्ध रह गई. अमर यह भी क्यों नहीं कह सका माँ अपने पैसे खर्च कर के यहाँ आई थी, अपनी बेटी और नातिन की सेवा करने आई है, मौज उड़ाने नहीं. वह तो घर से बाहर भी नहीं निकली थी. उस रात अमर बेहद उखड़े मूड में बाहर से खाना खाकर लौटा. कुछ स्वस्थ होते ही माँ को और अपमानित ना होने देने के कारण शालिनी ने माँ को वापिस भेज दिया. अमर से कोई शिकायत न कर अमर के साथ सामान्य जीवन व्यतीत करती रही.

दो वर्ष बाद शालिनी फिर माँ बनने वाली थी. इस बार अमर ने अपने माँ-बाप को बुला लिया.डॉक्टर ने कहा इस बार केस बहुत कॉम्प्लिकेटेड था. शालिनी को कम्प्लीट बेड- रेस्ट बताया गया था.सास का मानना था शालिनी ने डॉक्टर को भरमा कर आराम करने का बहाना बनाया था. शालिनी बहाना करके सास से सेवा करवाना चाहती है.सास ने जोर देना शुरू किया-

“अल्ट्रासाउंड करा लो अगर कोख में बेटी है तो उसे खत्म करना ज़रूरी है.” शालिनी ने साफ़ मना कर दिया, जो भी हो वह किसी भी हालत में अल्ट्रासाउंड नहीं कराएगी.

शालिनीके मना करने से सास का पारा और चढ़ गया, पर शालिनी नहीं मानी. दूसरी बेटी कोमल के जन्म से तो घर में भयंकर महाभारत छिड़ गई.

“हाय राम हमारे बेटे की तो किस्मत ही फूट गई दो-दो कुलाक्षणियां छाती पर मूंग दलने आगईं, हमारा अमर तो इन्हें पार लगाते-लगाते कंगाल हो जाएगा.” सास ने पोतियों को कोसना शुरू कर दिया.नन्हीं कोमल इस दुनिया में आने पर अपने स्वागत को टुकुर-टुकुर ताक रही थी.

“बेटा हमारा इंडिया का टिकट कटा दो, हम यहाँ नहीं रह सकते.बच्चों के जन्म पर ननिहाल से कपडे -जेवर आते हैं यहाँ हमें लूटा जारहा है.बहाना बना करके तेरी पत्नी अपनी सास से सेवा करवा रही है.”श्वसुर जी ने सिर्फ नाराजगी ही नहीं दिखाई बल्कि वापिस चले भी गए.

उनके वापिस जाने से अमर बहुत दुखी था और इसके लिए वह शालिनी को उत्तरदायी मानता. माँ-बाप की रोज़ की बातों और शिकायतों के कारण शालिनी और अमर के संबंधों में दरार आने लगी थी.उनका संबंध अब पहले जैसा नहीं रह गया था.अमर को अपने माँ-बाप की बातें और शिकायतें उचित लगतीं. वह भी अक्सर कहता-

“जल्दबाजी के कारण मुझे भी धोखा हो गया. मेरे लिए एक से एक अच्छे प्रोपोज़ल्स थे, ग्रीन कार्ड पाने की वजह से जैसा-तैसा जो मिला स्वीकार करना पड़ा.”

शालिनी जवाब देना चाहती, उसने तो अमर से कुछ नहीं छिपाया था अब शिकायत क्यों, पर अपने शांत स्वभाव के कारण वह मौन रह जाती शालिनी विस्मित होती, आई आई टी का पढ़ा इन्जीनियर अमर अपने माँ-बाप की गलत बातों का विरोध ना करके, शालिनी पर अपनी नाराजगी उतारता.

उनके जाने के कुछ दिनों बाद मथुरा से शालिनी के पापा ने शुभ सूचना दी कि शालिनी के भाई की शादी की तिथि निश्चित हो गई है, दामाद जी को विशेष आदर से निमंत्रित किया गया था. शालिनी की खुशी का ठिकाना नहीं था.इतने दिनों बाद अपने पति और अपनी बेटियों के साथ अपने घर जारही थी. घर में परिवार जनों ने बहुत प्यार और उत्साह से शालिनी, अमर और उनकी बेटियों का स्वागत किया.

मथुरा जाने के पहले अमर ने शालिनी से कहा था –

“शादी के घर की भीड़भाड़ में पासपोर्ट और ग्रीन कार्ड सुरक्षित नहीं रहेंगे, इन्हें मेरे पापा के लॉकर में छोड़ जाओ.”अमर की बात ठीक थी शालिनी ने अपने महत्वपूर्ण डॉक्युमेंट्स श्वसुर जी के पास रखवा दिए.

हंसी-खुशी शादी संपूर्ण हो जाने पर अमर वापिस अमरीका चला गया. शालिनी एक-दो माह अपने परिवार के साथ बिताने को मथुरा में ही रुक गई.अचानक एक दिन अमर का उदास स्वर सनाई दिया –

“शालिनी, मेरा जॉब चला गया. तुम तो जानती ही हो माइक्रोसॉफ़्ट में ले-ऑफ़ होते रहते हैं.अब कुछ दिन तुम्हे और मथुरा में रहना होगा. जैसे ही कोई दूसरा जॉब मिलेगा तुम्हें बुला लूंगा.”

शालिनी दिन गिनने लगी, रोज़ प्रार्थना करती अमर को जल्दी कोई जॉब मिल जाए. दिन बीतते रहे, तीन महीने तक अमर से शालिनी को कोई जॉब मिलने का समाचार ना मिलने से शालिनी के पापा को संदेह हुआ. उनके कहने पर शालिनी ने अपनी सहेली नीता से अमर के समाचार पूछे, नीता ने जो बताया वो शालिनी को स्तब्ध करने को काफी था. अमर की नौकरी नहीं गई थी, वह माइक्रोसॉफ़्ट में पूर्ववत कार्यरत था. उसके माता-पिता उसके साथ रह रहे हैं. वे सब लोग मजे से हैं.

शालिनी ने अमर को फोन कर के कहा अब वह अमरीका वापिस आना चाहती है, उसे अपने पासपोर्ट और ग्रीनकार्ड चाहिए. अमर का उत्तर सर्वथा अप्रत्याशित था-

“क्या कह रही हो? पासपोर्ट और ग्रीन कार्ड तो तुम्हारे ही पास थे. ज़रूर तुमने ये महत्वपूर्ण डॉक्युमेंट्स खो दिए हैं, तुम भला मेरे पापा के पास ये ज़रूरी डॉक्युमेंट्स क्यों छोड़तीं.”

शालिनी के पाँव तले ज़मीन खिसक गईं.अमर का धोखा साफ़ सामने आगया. पहले भी कई बार उसकी माँ को कहते सुना था, तू तलाक ले ले, एक से एक अच्छी लड़की मिलेगी. इसमें है ही क्या, ना तो कोई दान-दहेज़ लाई ना ही अमरीका में काम कर के कमाई करने लायक है. हम तो जल्दबाजी में मारे गए.”

अब शालिनी के सामने बहुत बड़ी समस्या मुंह बाए खडी थी. पर उसने दृढ निश्चय कर लिया, वह किसी भी हालत में हार नहीं मानेगी. मथुरा से दिल्ली में स्थित अमरीकन एम्बैसी के चक्कर लगाती शालिनी अमर के धोखे का सामना करने को दृढ प्रतिज्ञ थी. एम्बैसी के अधिकारी उसका सत्य मानने को तैयार नहीं थे, उनका कहना था ऎसी घटनाए आए दिन घटती है, शादी कर के बहुत से लोग पत्नी को यहाँ छोड़ कर अमरीका वापिस चले जाते हैं. तुम पर कैसे यकीन किया जाए कि तुम ग्रीन कार्ड होल्डर हो.

दोनों बेटियों का जन्म अमरीका में हुआ था वे अमेरिकन नागरिक थीं. अत:अमरीका से उनके जन्म के कागजात मिल जाने से उनके पासपोर्ट बन गए. सौभाग्यवश शालिनी के पास उसका ड्राइविंग लाइसेंस था उसमें उसका पूरा पता था. शालिनी द्वारा उसका सोशल सिक्यूरिटी नंबर बताने से अमरीका से जानकारी मंगाई गई. जानकारी मिलने पर शालिनी को अमरीकन एम्बैसी से एक बंद पैकेट दिया गया . पैकेट को ना खोलने के निर्देश के साथ वो पैकेट उसे अमरीका के इमीग्रेशन डिपार्टमेंट को देना था. शालिनी ने अमर और नीता को फोन से सूचित किया कि वह अमरीका पहुँच रही है.

भारतीय एयरपोर्ट पर दो नन्हीं बेटियों के साथ बोर्डिंग के लिए प्रतीक्षा कर रही शालिनी को पुलिस ने बोर्डिंग करने से रोक कर कहा कि अमरीका में रह रहे उसके श्वसुर ने रिपोर्ट की है कि शालिनी झूठे दस्तावेजों पर अमरीका जा रही है. शालिनी ने अपना बंद पैकेट दिखाया. अमरीकी एम्बैसी के पेपर्स देख कर उसे जाने की इजाज़त दी गई, यही कहानी लन्दन एयरपोर्ट पर दोहराई गई .इतनी समस्याओं का सामना करने के बाद जब शालिनी अपनी दो नन्हीं बेटियों के साथ सियाटेल पहुंची तो अमर उसे लेने नहीं आया था. नीता के पति ने उन्हें घर पहुंचाया. दरवाज़ा अमर ने खोला.शालिनी ने कोई बात नहीं की. कुछ देर बाद अमर ने नाराजगी से कहा-

“तुम बिना मेरी इजाजत कैसे आगईं? वापिस इंडिया जाओ, माफी मांगो, जब इजाज़त दूंगा तब आना.”

“मै यहाँ इसी घर में रहूंगी. इस घर पर मेरा भी आधा अधिकार है.”शालिनी ने दृढ़ता से कहा.

“”किस अधिकार की बात कर रही हो,तुम कर ही क्या सकती हो?मेरे बिना तुम कुछ नहीं हो. या तो मैकडोनाल्ड में काम करोगी या सड़क पर भीख मांगोगी.”अमर ने तेज़ी से कहा.

“क़ानून मुझे न्याय दिलाएगा. अपने और बेटियों के अधिकार के लिए लिए अन्याय नहीं सहूंगी.”

.शालिनी की बात अमर की समझ में आगई. अमरीका के क़ानून से वह परिचित था.मित्रो ने भी अमर को शालिनी के साथ समस्या सुलझाने और समझौता करने की सलाह दी.अमर ने समस्या सुलझाने के लिए तीन महीने का समय माँगा. बड़ी बेटी नेहा को स्कूल में एडमीशन दिला दिया गया. अमर उसे स्कूल पहुंचाने और वापिस लाने जाता था. शालिनी अब कुछ निश्चिंत हो चली थी ,शायद अमर सच में उसके साथ समझौता करना चाहता था.

एक दिन अमर ने शालिनी से घर के कागजातों पर यह कह कर साइन करा लिए कि वह घर को रिफाइनेंस कर रहा है. टैक्स के कागजों पर भी शालिनी के दस्तखत ले लिए. एक दिन शालिनी को किसी आवश्यक कार्यवश कहीं जाने के लिए कार चाहिए थी

“अमर, मुझे ज़रूरी काम के लिए कुछ देर के लिए कार चाहिए.”

“ऐसा कौन सा काम है,जिसके लिए कार चाहिए? नहीं, तुम जब जी चाहे कार नहीं ले जा सकतीं.”अमर ने क्रोध से कहा.

अमर को कार्य बताने के बावजूद उसने चाभी देने से साफ़ इनकार कर दिया. कोई उपाय न देख, शालिनी ने सामने रखी चाभी उठा ली.क्रोधावेश में अमर ने शालिनी को पीटना शुरू कर दिया. अपनी दोनों बेटियों को ले कर बदहवास शालिनी मारिया आंटी के पास पहुंची, उनके घर से शालिनी ने फोन से नाइन वन वन को कॉल कर दिया. मिनटों में पुलिस पहुंच गई, पुलिस घरेलू हिंसा के अपराध में अमर को जेल ले जाना चाहती थी, पर अमर ने रो-रो कर माफी मांग कर कहा,

“क्रोध में मुझसे गलती होगई, अब ऐसा नहीं होगा.”इसके बावजूद अमर रोज़ रात देर में वापिस आता, उसका व्यवहार भी बदला हुआ था. एक रात उसने फोन करके शालिनी से कहा-

“अब मै उस घर में कभी वापिस नहीं आऊँगा, शालिनी जो चाहे करने को स्वतंत्र है. अब शालिनी के साथ उसका कोई संबंध नहीं है.”

पता करने पर शालिनी को ज्ञात हुआ पिछले तीन महीनों से अमर की बहिन और उसके पेरेंट्स अमरीका में रह रहे थे. अमर ने उनके लिए एक अपार्टमेन्ट ले रखा था.मित्र की बीमारी का बहाना कर, वह रोज़ देर रात तक उन्हीं के साथ रहता था. इस बारे में अमर ने शालिनी को कुछ नहीं बताया था.

अमर द्वारा शालिनी से संबंध तोड़ने की बात सुन कर शालिनी के मित्रो और मारिया आंटी ने शालिनी को समझाया –

“अमर द्वारा तलाक का नोटिस भेजने के पहले शालिनी को तलाक का नोटिस भेज देना चाहिए , इससे उसका केस मज़बूत होगा.केस करने के अलावा अब कोई और चारा नहीं है.”

सबकी सलाह से शालिनी ने एक महिला वकील द्वारा अमर को तलाक का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस ने अमर को बौखला दिया. उसने कभी नहीं सोचा था मथुरा जैसे छोटे शहर की लड़की अमरीका जैसे विशाल महाद्वीप की धरती पर संघर्ष करने का साहस कर सकती थी. उसने कोर्ट में जज और वकीलों के समक्ष खड़े होने की कभी कल्पना भी नहीं की होगी.

पूरी सच्चाई जान कर महिला वकील समझ गई, शालिनी के साथ अन्याय हुआ है,उसने कहा-

“तुम डरो नहीं, तुम्हें चाइल्ड- सपोर्ट और अदालत से पैसे दिलवाऊंगी. केस समाप्त होने तक तुम्हें उसी घर में रहने का अधिकार होगा.कोर्ट का फैसला होने तक अमर को अपनी पत्नी शालिनी को खर्चे के पूरे पैसे देने होंगे.”

.शालिनी की दिन-रात की नींद उड़ गई. कोर्ट और कचहरी के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी, उस पर अमरीका का कोर्ट. शालिनी की माँ अपना सब कुछ त्याग कर शालिनी के साथ रहने को आगईं अन्यथा दो बच्चियों के साथ शायद वह अन्याय के सामने हार मानने को विवश कर दी जाती.

मुकदमा शुरू होने पर जांच के आधार पर अमर का धोखा सामने आ गया, शालिनी की जानकारी के बिना उसने लाखों के स्टॉक्स बेच दिए थे. बैंक से पूरा पैसा निकाल कर अपने माता-पिता के नाम अकाउंट खुलवा कर पैसे स्विट्ज़रलैंड के बैंक में ट्रांसफर करवा दिए थे.पूछे जाने पर अमर ने शालिनी पर इलज़ाम लगाया कि वह उन पैसों से बिजनेस करना चाहती थी,पर जांच करने पर सच्चाई सामने आगई.उसका इलज़ाम बिलकुल गलत था.

जज ने शालिनी क श्वसुर से कहा या तो वह पैसे वापिस करें अन्यथा उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा. उन्होंने अपनी सफाई में कहा, उन पैसों से इंडिया में ज़मीने खरीदी हैं. उसके लिए उन्होंने फर्जी कागज़ात भी बनवा लिए. श्वसुर ने शालिनी पागल करार करने की कोशिश की, कहा उसके लिए वह उसका प्रमाणपत्र भी दे सकते हैं. शालिनी के पक्ष में उसके पड़ोसियों, मित्रो और भारत से आए एक वकील ने गवाही दे कर शालिनी के पक्ष की सत्यता स्पष्ट कर दी.श्वसुर के सारे इलज़ाम झूठे सिद्ध होगए.

दोनों पक्षों की बातों के आधार पर जज ने शालिनी के पक्ष में अपना निर्णय सुना दिया. यह सिद्ध हो गया था कि अमर ने अपनी पत्नी शालिनी को धोखा दिया है. शालिनी केस जीत गई.अमर को निर्देश दिए गए कि अमर अपनी रिटायरमेंट के पैसों से शालिनी को पैसे देगा, शालिनी के वकील की फीस का भुगतान करेगा,चाइल्ड- सपोर्ट और पांच वर्षों की अलमनी देगा. आने लाभ के लिए अमर ने बेटियों की पूरी कस्टडी मांगी, पर उसे नियमानुसार ज्वाइंट कस्टडी ही दी गई.

शालिनी के सामने अब एक बड़ा सवाल था, उसे क्या करना है? अपनी दो बेटियों का उज्ज्वल भविष्य कैसे बनाना है. उन्हें किसी के सामने अपने को हीन नहीं समझने देगी. नहीं, वह हार नहीं मानेगी, स्वयं स्वाभिमान का जीवन जीते हुए, उसे अमर के शब्दों को झुठलाना है. उसने कटु शब्दों में कहा था-

“तलाक का नोटिस तो भेज दिया है, पर क्या अकेले रह कर मेरे साथ वाली हाई स्टैण्डर्ड जीवन- शैली बनाए रख सकती हो, उसी शानदार लोकैलिटी में वैसे ही घर में रह पाओगी? अपनी बेटियों को कैसे बड़ा कर पाओगी, उस स्कूल में पढ़ा पाना तो सपना भर बन कर रह जाएगा.”

शालिनी को जो पैसे मिले उनसे उसने उसी लोकैलिटी में एक अच्छा सा घर खरीद लिया. सहेलियों ने भी शालिनी को चाइल्ड –केयर के आधार पर काम शुरू करने की सलाह दी_

“शालिनी, तुम्हारे पास चाइल्ड केयर का लाइसेंस है, जो पेरेंट्स काम पर जाते हैं उनके बच्चों की देख-रेख का कार्य अपने घर में शुरू करो.इस तरह तुम्हें आर्थिक सहायता और संतोष मिलेगा.”

चाइल्ड केयर का कार्य शुरू करने करने से शालिनी को सच्चा सुख मिलने लगा.पेरेंट्स द्वारा उसके कार्य की प्रशंसा से बच्चों की संख्या बढ़ती गई. शालिनी अब पूर्णत: आत्मनिर्भर स्वाभिमानी स्त्री थी. उसके घर के सामने की बगिया उसके पुराने शौक की परिचायक थी. उसके गुलाबों की सुन्दरता देखने लोग आते थे. अपनी कार से बेटियों को स्कूल छोड़ने जाती शालिनी अपनी सहेलियों के प्रति आभारी थी, जिन्होंने उसे अमरीकी जीवन की आवश्यकताओं से परिचित कराया था.

दिन महीने वर्ष बन कर बीतते गए. नन्हीं नेहा कॉलेज पहुँच गई. अब वह अमरीका की प्रसिद्ध यूनीवर्सिटी में कम्प्यूटर सांइंस के तृतीय वर्ष में थी, छोटी बेटी कोमल ने भी इस वर्ष नामी यूनीवर्सिटी में प्रवेश लिया था. शालिनी जब अपने अतीत की समस्याओं के विषय में सोचती है तो स्वयं विस्मित होती है . कैसे वह उन समस्याओं के आगे अपराजित खडी रही.

पिछले कुछ दिनों से उसकी माँ और फ्रेंड्स उसे राय देने लगे हैं, अब शालिनी को अपने विषय में कुछ सोचना चाहिए.कुछ समय बाद उसकी बेटियों का अपना जीवन होगा, वह कहाँ तक शालिनी का साथ दे सकेंगी.अमरीका में माँ-बाप को अलग होते और दूसरा विवाह करते देखते हुए ही बच्चे बड़े होते हैं. कुछ नहीं तो उसे कोई सच्चा और ईमानदार पुरुष-मित्र ही बना लेना चाहिए.

आज अमरीका की संस्था द्वारा शालिनी को रैविशिंग वूमन के सम्मान से सम्मानित किया गया है. हाथ में फूलों का बुके थामे शालिनी सोच रही थी उस सीधी-सादी भीरु सी लड़की में कहाँ से इतना साहस और आत्म विश्वास आगया था. किस प्रेरणा से वह अपराजित खडी रह सकी.कौन था इसके पीछे?

फ़ोन की घंटी से शालिनी की तंद्रा भंगकर दी .दूसरी तरफ से एक परिचित आवाज़ थी –

“कांग्रेच्युलेशन्स रैविशिंग वूमन.राजीव हियर.”

“”राजीव तुम कहाँ हो? शालिनी की आवाज़ में उत्साह छलका पड़ रहा था.

“मै कहाँ गया था, हमेशा तुम्हारे साथ ही तो था.सच कहो, क्या मेरे शब्द तुम्हें मुश्किलों में प्रेरणा नहीं देते रहे. अपने मन से पूछो क्या वो मेरे दिखाए डर पर विजय पाने के लिए संघर्ष नहीं करता रहा?’

“मानती हूँ, पर तुमने तो अमरीका आकर अपनी मित्र की खबर ही नहीं ली.मैने क्या कुछ नहीं झेला, राजीव.”शालिनी का स्वर भीग गया था.

“सच्चे मित्र कभी दूर नहीं होते.मैने तुम्हारे हर साहसी कदम पर गर्व किया है.हमेशा तुम्हारे बारे में जानकारी लेता रहा. बहुत चाह कर भी तुमसे मिलने नहीं आया, जानता था, मुझे अपने साथ पाकर तुम कमज़ोर पड़ जातीं, मेरी सहायता पर क्या निर्भर नहीं हो जातीं? आज तुम्हारी जीत मेरी भी जीत है.

“अगर हार जाती तब क्या तुंम सहारा देने आते,राजीव?”

“शालू. मै तो अपनी हार मानता हूँ. मै गलत था, तुमने ठीक कहा था भारतीय लड़कियों में हर स्थिति से एडजस्ट करने और उस पर विजय पाने की शक्ति होती है.तुमने ये बात सिद्ध की है.”

तुमने कभी अपने बारे में भी नही बताया, राजीव. कहाँ हो कैसे हो?

“जो कष्ट तुमने झेला, मैने भी सहा है. हम दोनों एक ही राह के राही हैं. कुछ दुर्भाग्यपूर्ण कारणोंवश मेरा भी मेरी पत्नी के साथ डाइवोर्स होगया.तुम्हारी तरह दो बेटों को बड़ा किया है.”राजीव ने उदासी से कहा.

“तुम्हारे लिए बहुत दुःख है,काश तुमसे मिल कर हम दोनों एक-दूसरे के दुःख बाँट लेते.”

“दरवाज़ा खोलो, शायद तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जाए.“

दरवाज़ा खोलते सामने खड़े राजीव को देख शालिनी बिना कुछ सोचे उसकी फैली बाहों में समा गई.बीस वर्षों का अवसाद क्षण भर में तिरोहित हो गया.

“क्या

उक

अब राजीव की नज़रों में शालिनी का दूसरा ही रूप था.राकेश ने ठीक कहा था,सुन्दरता मन की होती है

दोनों ने यूनीवर्सिटी में एडमीशन ले लिया था.अक्सर मथुरा से आगरा दोनों एक साथ ही जाया करते.अब दोनों के संबंध सहज हो चुके थे. तरह-तरह के विषयों पर दोनों बात करते.एक-दूसरे का साथ अच्छा लगता. अक्सर शालिनी को लगता राजीव की मुग्ध दृष्टि उस पर निबद्ध रहती है,पर उसे उसने अपना भ्रम ही माना .राजीव की मेधा की तुलना में वह अपने को कम पाती थी.

अचानक शालिनी के पापा के एक मित्र ने अमरीका से भारतीय लड़की के साथ विवाह करने के लिए आरहे लड़के अनिल के विषय में सूचना दी थी. अनिल मद्रास आईआईटी से कम्प्यूटर इंजीनियरिंग करके अमरीका की कम्पनी में काम कर रहा था. वैसे तो उसका परिवार हरयाना के गांव का रहने वाला है, पर उनके परिवार के लड़के और लडकियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.शालिनी के विवाह के लिए उसके पापा लड़के और उसके परिवार से बात कर सकते हैं. वर रूप में अनिल हर प्रकार से योग्य था.घर में खुशी का माहौल छा गया.शीघ्र ही शालिनी के माता-पिता अनिल के माँ-बाप से मिलने उनके गाँव भाड़ावास पहुंचे. सब बातें होने के बाद अनिल और उसका परिवार शालिनी से मिलने आ पहुंचा.

अनिल के विषय में सुन कर राजीव के चेहरे पर छाई उदासी शालिनी नहीं देख सकी.उसकी आँखों में अमरीका के सपने जगमगा रहे थे.

“तू अमरीका के सपने देख रही है, पर तुझ जैसी सीधी-सादी भोली लड़की क्या अमरीकी ज़िंदगी से एडजस्ट कर पाएगी?वहां की फैशनेबल गोरी लड़कियों की रहने की स्टाइल की तो छोड़, तुझे तो ढंग के कपड़ों की भी समझ नहीं है. ये कस के बांधी एक चोटी, सादे सलवार सूट वहां नहीं चलेंगे.”

“क्या हम इतने खराब दीखते हैं, राजीव?”भोलेपन से शालिनी ने पूछा.

“मेरी नजरों में तो तू दुनिया की सबसे अच्छी,सबसे सुन्दर लड़की है,पर डरता हूँ, कहीं अनिल ने वहां किसी और के साथ रिश्ता ना बना लिया हो.ऎसी बहुत सी कहानियां सुनी हैं.”राजीव ने अपनी बात कही.
 
बलम सुगना

“कच्ची कली कचनारी, बलम सुगना बन के आ जाना “

ढोलक की थाप के साथ कुंती मौसी की सुरीली आवाज़ गूँज रही थी. चन्दा की हथेली पर मीरा दीदी मेंहंदी के फूल रचा रही थीं.

“हाय राम, चन्दा तेरी भांवरें सुगना के साथ पड़ेंगी री. चोंच सी लाल नाक वाला सुगना- - “गौरी ने चुटकी ली.

वहां जमा लड़कियों के साथ चन्दा भी जोर से हंस पड़ी. कमरे में किसी काम से आई बड़ी बुआ ने मीठी झिडकी दी –“

“अरी चन्नी आज तो चुप्पी साध. भांवरों के समय भी ये लडकियां ऐसे ही खी-खी करती रहेंगी. तुझे ही अपने को रोकना है.”

“बाज आए इन लड़कियों से, हाथों में मेंहंदी रचाए लड़की यूं मुंह फाड़े हंसती क्या अच्छी लगे है? मायका छोड़ जाने का ज़रा सा भी गम नहीं है.”दूर रिश्ते की ताई क्षुब्ध हो उठीं थीं.

“अरे ताई, आज ज़माना बदल गया है, आज तो लड्कियां मम्मी-पापा को बाय-बाय, टाटा कह के जाए हैं. हमारा-आपका ज़माना थोड़ी रहा जो चार दिन पहले से रोना शुरू कर देते थे.”मुंहबोली भाभी ने ताई को चिढाया.

ताई के कमरे से बाहर जाते ही लडकियां खुल कर हंस पडीं.

“हाय चन्दा, तेरे सुगने ने तुझे कहाँ देखा था री?”शोभा ने परिहास किया.

“कचनार के पेड़ पर- -- - “ रीता की टिप्पणी पर फिर लड़कियों पर हँसी का दौरा पड़ गया.

“अजी उनहोंने कहाँ देखा हमारी चन्दा को, उनके कानों में तो इसके रूप की चर्चा पहुंची और संदेसा आ गया.ठीक कहा ना चन्नी?”नैना ने चन्नी पर अपनी प्याभरी दृष्टि जमा दी थी.

नैना की इस बात पर चन्दा गंभीर हो गई थी. क्या कहे चन्दा, स्वयं उसे कितना अजीब लग रहा था, आज के युग में भी कोई ऐसा हो सकता है जिसके मन में अपनी भावी जीवन साथी को देखने की ज़रा सी भी ललक ना हो?

चन्दा ने अपनी चाची से पूछना चाहा था—बिना उसे देखे भाले जो उससे ब्याह करने आ रहा है, क्या उसकी अपनी कोई इच्छा -अनिच्छा भी है? पर चाची के साथ वह कब इतना खुल सकी थी. तीन-चार वर्ष की रही होगी तभी से पापा उसे चाचा-चाची के पास छोड़, अपने दायित्व से मुक्त हो गए थे. जमींदारी और बिजनेस का भार चाचा के जिम्मे छोड़ अपनी नई पत्नी के साथ अमरीका जा बसे थे. नई माँ या पापा ने उसे अपने साथ ले जाना ही नहीं चाहा था. पापा द्वारा चाचा के नाम भेजे गए बैंक ड्राफ्ट काफी भारी हुआ करते थे, शायद इसीलिए चन्दा को पराश्रित होने की दुखद स्थितियां नहीं सहनी पड़ी थीं.

‘लगता है बन्नो को पिछले साल की घटना याद आ रही है, ठीक कह रही हूँ ना चन्नी?”चन्दा को चुप देख नैना ने कहा.

“अरे वही ना रमा दीदी की शादी वाली बात”रीता हंस पड़ी. चन्दा मौन थी.

“सच चन्दा, हमें तो उस दिन लगा था, तेरा ब्याह उसी से होगा, पर फिर क्या हुआ?”शोभा ने सवाल किया.

“होना क्या, रमा की सास ने कह दिया, एक ही घर की दो लडकियां उन्हें स्वीकार नहीं.”नैना ने जानकारी दी थी.

“शायद चाची की भी यही इच्छा थी ना, चन्दा?”विनीता ने पूछा था.

“कुछ भी कह, लड़का था बड़ा डैशिंग और स्मार्ट, किस तरह हमारी चन्दा को बनाया था., याद है चन्दा?”रीता हंस रही थी.

याद क्यों नहीं होगा,वो भी क्या भूलने वाली बात थी?चन्दा सोच में पड़ गई.

चचेरी बहिन रमा दीदी की शादी में चंदा ने हलके जामुनी रंग पर रूपहले गोटे वाला सलवार सूट पहिन रखा था. बारात जनवासे में आ चुकी थी. संध्या सात बजे बारात दरवाज़े पर पहुँचने वाली थी. रमा दीदी का श्रृंगार लगभग पूरा हो चुका था तभी लड़कियों से भरे उस कमरे में किसी ने जोर की दस्तक दी थी. चन्दा ने ही आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोला था. सामने एक अजनबी युवक को खडा पा अचानक चन्दा के मुख से मज़ाक में वाक्य फिसल गया-

“कहिए प्रिंस चार्मिंग किसकी तलाश है? यहाँ आपकी राजकुमारी नहीं है, समझे.”

चन्दा के अप्रत्याशित वाक्य पर अजनबी के मुख पर शरारती मुस्कान आ गई थी.

“निश्चय ही आपकी तलाश में नहीं आया हूँ, मिस. माँ का सन्देश रमा भाभी को देना है,ज़रा रास्ता छोड़ कर हट जाएं तो भाभी तक ये चूड़ियाँ पहुंचा दूं.”

“माँ जी को शायद आपसे अच्छा संदेशवाहक नहीं मिला, महाशय, भला ये काम क्या आपको शोभा देता है?हाँ, यहाँ सीधे आ पहुँचने का रास्ता किसने बताया, मिस्टर?”अपनी टिप्पणी के साथ चन्दा ने सवाल किया था.

“हमेशा सीधा रास्ता ही चुनता आया हूँ, हाँ कभी-कभी शॉर्ट कट्स मार देता हूँ. अब ज़रा रमा भाभी तक पहुँचने की इजाज़त देंगी, देवी जी? बहुत देर आपको झेल चुका, मिस.”

अपमान से तमतमाए मुख के साथ चन्दा पीछे हट गई. राहुल सीधा रमा जीजी के पास जा पहुंचा था. सारी लडकियां उसके व्यक्तित्व से अभिभूत उसी के चेहरे पर दृष्टि निबद्ध किए मुग्ध थीं,.

“वाह भाभी, जितना सोचा आप उससे भी ज़्यादा सुन्दर हैं. मै आपका एकमात्र देवर राहुल हूँ. माँ के आदेश पर ये धानी चूड़ियां देने आया हूँ. माँ ने कहा है, विवाह के समय आप यही चूड़ियाँ पहिनें.”

“रमा जीजी के इकलौते देवर राहुल जी, इसके लिए रमा जीजी की माता श्री से बात कीजिए. यहाँ शॉर्ट कट नहीं चलेगा.’चन्दा ने व्यंग्य से कहा.

“क्यों क्या माता श्री मना कर देंगी?’ राहुल का सीधा तीखा उत्तर आया.

“ऎसी बातों में तो बड़े –बूढ़े लोग ही इजाज़त देते हैं.”

“आई डोंट केयर,इतना सा निर्णय तो रमा भाभी खुद ही ले सकती हैं,ठीक कहा ना भाभी?”

“जी - - - ई- - “रमा जीजी हडबडा सी गईं.

‘एक बात बताइए, पुरुषों के लिए सर्वथा निषिद्ध इस कमरे में आने का आपको साहस कैसे हुआ?” रमा जीजी की अभिन्न सहेली रूपा ने राहुल को छेड़ा.

“”अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए हज़ार ताले तोड़ने की हिम्मत रखता हूँ. वैसे भी आपके पहरेदार बिलकुल निष्क्रिय हैं. एक पुरुष तक को रोके रखने की शक्ति नहीं है उनमें.’ सस्मित अर्थपूर्ण दृष्टि राहुल ने चन्दा पर डाली थी. चन्दा का मुख लाल हो उठा था.

“किसी को रोकने के लिए इच्छा भी तो होनी चाहिए, जनाब इतनी ज़रा सी बात भी नहीं जानते.”

“ओह, लगता है आजकल भारत ने काफी तरक्की कर ली है. अब लडकियां भी अपनी चाहत के लिए इच्छा -अनिच्छा जताने लगी हैं., वैसे खुशी हुई इस जानकारी से. ओ के भाभी जल्दी ही मिलेंगे.”

जिस तेज़ी से राहुल आया था, उसी तेज़ी से वापिस लौट गया. राहुल के बाहर जाते ही लड़कियों में बातचीत शुरू हो गई.

“हाय रमा, तेरा देवर तो बड़ा स्मार्ट है. हमारी सिफारिश कर देना.”जूही ने खुशामद की.

“भाई इतना धाकड़ है तो जीजाजी कैसे होंगे, यही सोच रही है ना ,चन्दा.?नैना ने चन्दा को कुरेदा.

“नहीं, भगवान् से मना रही हूँ, जीजाजी में इसके अभिमान का अंश भी ना हो. ना जाने क्या समझता है अपने आप को. लगता है जैसे लन्दन से सीधा यहीं लैड किया है.”चन्दा का आक्रोश फूट पडा.

“सच ही तो है, बड़े भाई की शादी अटेंड करने सीधे लन्दन से ही तो आए हैं, तू क्या ये बात नही जानती, चन्दा दीदी. यूं के से एम् बी ए कर के वहीं एक बड़ी कम्पनी में नौकरी ज्वाइन की है. रमा की छोटी बहिन निक्की ने जानकारी दी.”

“वाह: तब तो ऐसा लड़का चिराग ले ढूंढें नहीं मिलेगा. चन्दा यार, तू जोर लगा, रमा जीजी के बाद तेरा ही तो नम्बर है.”रीता ने चन्दा की खिंचाई की.

“तुम्हे ही मुबारक हो, नहीं चाहिए ऐसा अभिमानी. बहुत सुपात्र पड़े हैं भारत में. अपनी सोच, मेरे लिए चिंता करने की ज़रुरत नहीं है समझी.”चन्दा चिढ गई थी.

“अरे सच तो यह है, वह हमारी सांवली-सलोनी चन्दा से बेहद इम्प्रेस्ड था. वह जो कह रहा था, इसे खिजाने के लिए था वरना इस जामुनी सूट में तो हमारी चन्दा कहर ढा रही थी. नैना ने चुटकी ली.

“अब मुझे तो बख्शो.” चन्दा ने नाराजगी जताई.

बारात आ गई, सुनते ही लड्कियां बाहर दौड़ पडीं. कार से उतरते अविनाश को सबने सराहा.छोटा भाई अगर पहले दृष्टि में ना आ गया होता तो लोग अविनाश को अद्वितीय ठहराते. दोनों भाई चाँद-सूरज की जोडी थे. बारात में आए युवक छोटी बहिन होने के नाते चन्दा को छेड़ रहे थे, पर उस अभिमानी राहुल की व्यंग्यपूर्ण तीक्ष्ण दृष्टि के कारण चन्दा अपने आप में सिमटी जा रही थी. ऐसा लग रहा था मानो उसके अंतर तक की बात वह अभिमानी पढ़ पा रहा था.

“राहुल यार, अच्छा मौक़ा है, तू भी इसी मंडप में चन्दा जी के साथ फेरे ले ले. कमाल की जोडी बनेगी.” एक मित्र ने राहुल से कहा था.

“तू तो मेरी पसंद जानता है, मुझे तो जरूरत से ज़्यादा स्मार्ट गीता जैसी नहीं सीधी- सादी सीता चाहिए.”चन्दा को देख कर राहुल ने कहा.

नैना के रोकने पर चन्दा चुप रह गई वरना मुहतोड़ जवाब थे उसके पास भी.

रमा दीदी विदा हो कर ससुराल चली गई थी. जाते समय चन्दा के कान में कहा था

“घबरा मत, जल्दी ही तुझे भी बुला लूंगी. दोनों बहिनें साथ रहेंगी, खूब मज़ा आएगा, तुझे राहुल तो ज़रूर पसंद आया है ना?”

“धत - - “ चन्दा से और कुछ कहा नहीं गया, पर मन में आकांक्षा का एक नन्हा सा अंकुर ऊमग आया था. काश रमा दीदी के मन की बात उसके देवर के मन की बात भी हो जाए. दीदी ससुराल से वापिस आ गई थीं. राहुल वापिस यूं के चला गया था. दीदी से ही पता लगा राहुल ने वहीं अपने लिए अपनी पसंद की लड़की चुन ली थी. और आज उसे बिना देखे अवनीश उसे ब्याहने आ रहा था. लड़कियों का शोर सुनाई पड़ रहा था.

“हाय, चन्दा का सुगना तो एकदम चिट्टा अंग्रेज है.” मीरा ने कहा.

“चन्दा बड़ी भाग्यवान है, इत्ता अच्छा वर मिला है.”रूपा के स्वर में ज़रा सा ईर्षा का पुट था.

“अजी हमारी चन्दा क्या किसी से कम है. उसके सांवले सलोने रूप में जो नमकीनियत है उस पर तो अच्छे-अच्छे फ़िदा हो जाएं.”नैना ने चन्दा का पक्ष लिया.

धड़कते दिल से चन्दा वो सब बातें सुनती रही.अनजानी पुलक से शरीर सिहर-सिहर उठता था. विवाह की रीति-रस्मे मानो स्वप्नवत पूरी की थीं. पापा के साथ विवाह में नई माँ भी आई थीं. शायद जब चन्दा सात साल की थी तब पापा उसे एक बार देखने आए थे. नई माँ के साथ पापा भी चन्दा के लिए नितांत अजनबी से थे. पापा के भेजे पैसों से चाचा के घर की सुख-समृद्धि बढ़ती गई. चन्दा मानो चाचा के घर के लिए विशिष्ट अतिथि जैसी थी, पर चाची के साथ एकात्मकता संभव नहीं हो सकी थी. कई मौकों पर चाची रमा और निक्की को डांटती, अधिकार से आदेश देतीं, पर चन्दा के लिए उनकी उदासीनता चन्दा के ह्रदय में शूल सी गड़ती. कितनी बार उसका जी चाहता, उसे भी चाची अधिकार से डांटती, आदेश देती पर वह तो उस घर की समृद्धि का ज़रिया भर थी.

विदा के समय उन्हीं चाची के सीने पर सिर रख चन्दा रो पड़ी. पापा के आशीर्वाद दिए जाने पर वह संकुचित हो उठी. नई माँ ने भी सिर पर हाथ धर कर आशीर्वाद दिया ज़रूर, पर उस आशीष में झिझक स्पष्ट थी. ढेर सारे बहुमूल्य विदेशी उपहारों से पापा ने उसका दहेज़ जगमगा दिया था.

ससुराल में सास ने आगे आ कर आरती उतारी थी. उसका मुख देखते ही शैतान ननद का वाक्य सीने पर हथौड़े सा पडा था.

“हाय अम्मा, भाभी तो काली है, भैया को तो गोरी पत्नी चाहिए थी ना?”

“चलो. ताई जी के लाडले को ज़िंदगी भर के लिए नज़र का टीका ही मिल गया. तेरी भाभी के साथ तेरे भैया को कोई नज़र नहीं लगा सकेगा, सुनयना.”चचेरी भाभी का व्यंग्य कानों में गर्म शीशे सा उतर आया था.अवनीश का चेहरा लाल् हो आया था. अम्मा ने झिडकी दी-

“छि:, जो मुंह में आया बोल देती ही.देखती नहीं इसकी सांवली रंगत में कितना आकर्षण है. वैसे भी लड़की का रंग ही नहीं, नाक-नक्शा और गुण देखे जाते हैं. हजारों में एक है मेरी बहू.”

“देखना है कि गुणों की खान पर रीझते हैं, अवनीश या - -“भाभी का वाक्य पूरा होते ना होते अवनीश धडधडा कर घर के भीतर चले गए थे. नई-नवेली का दामन उनके साथ बंधा था, इसका भी ध्यान नहीं रहा. रीति-रिवाजों के क्रम में जब अम्मा जी ने भाभी से दोनों को कंगना खिलाने की बात कही तो अवनीश का रुष्ट स्वर सुनाई दिया था.

“बहुत हो गया अम्मा, ये सब चोंचले मुझे नहीं भाते .अब और परेशान नहीं करना, मै शान्ति से आराम करना चाहता हूँ.”अवनीश के शब्दों से घर में चुप्पी छा गई थी. कुछ दबी-दबी फुसफुसाहटें चन्दा ने पकड़ने की कोशिश की थी, पर कहाँ पकड़ सकी?

मुंह दिखाई की रस्म चल रही थी. सबसे पाहिले अम्मा जी ने हार पहिना कर अपना परिचय दिया.

“मै तुम्हारी सास हूँ, बहू. इस घर का मान-सम्मान अब तुम्हें ही रखना है. बाद में मुंह देखती स्त्रियों का परिचय अम्मा जी कराती गई थीं.

“ये तुम्हारी चचेरी जिठानी हैं, बनारस में अवनीश इन्हीं के घर में रहते हैं. हम तो यहाँ दूर पड़े हैं, तुम्हें ही बड़े जेठ-जिठानी को सास-ससुर का मान देते हुए उनके साथ रहना है.”अनायास ही चंदा के झुके नयां उठे थे. चचेरी जिठानी के मुख पर तिरस्कार स्पष्ट था.

“ताई जी, भारी दहेज़ से मात खा गईं. सोने जैसी उजली मेरी बहिन को छोड़ कोयले पर रीझ गईं.

“बहू, इस तरह की बेकार की बातें करना शोभा नहीं देता. याद रखो, जो बिंध गए सो मोती.”

“सच बात सभी को बुरी लगे है, ताई जी. अपने बेटे का मन तो जानती थीं फिर भी- - . झमक कर जिठानी उठ कर चली गईं.

वातावरण में सन्नाटा खिंच गया. अम्मा जी ने प्यार से कहा-

“काफी कुछ तो समझ गई होगी, बहू, इन्हीं जिठानी से तुम्हें टक्कर लेनी होगी.अपनी बहिन से मुन्ना का ब्याह कराना चाहती थी, उसी की खुंदक निकाल रही है.”

चन्दा का सवाल ओंठों तक आ गया था “तो किया क्यों नहीं अम्मा जी?भरसक अपने को रोक चन्दा ने अपने ओंठ दांतों से काट लिए थे. माता-पिता के अभाव में भी चाचा के घर किसी को उसकी अवहेलना का साहस नहीं हुआ था. उसके सांवले रंग पर कोई व्यंग्य नहीं कसा गया था बल्कि सबका मानना था, उसके सांवले रंग में अनोखा आकर्षण था. अक्सर कॉलेज में साथ के लड़के उसे नमकीन कहते थे. इस क्षण उसे अपने विशिष्ट सम्मान का कारण स्पष्ट हो गया था. क्या उसके नाम आए पापा के बैंक ड्राफ्ट उसके सांवले रंग पर सोने का मुलम्मा चढा देते थे. काश, यह सत्य उस पर पहले उजागर हो गया होता.

प्रथम रात्रि के स्वप्न मानो पहले ही आहत हो गए थे. गुलाबी गोटा लगी साड़ी रमा जीजी ने विशेष रूप से इसी रात के लिए बनवाई थी. शिफौन की साड़ी में मुकेश वर्क के सितारे झिलमिला रहे थे.

“तुझ पर हल्का गुलाबी रंग बहुत अच्छा लगता है, चन्दा. अवनीश अपनी गुलाबी चांदनी को देखते ही रह जाएंगे.”

चाची ने भले ही चन्दा को अपने दिल से न लगाया हो, पर उनकी दोनों बेटियाँ रमा और निक्की, चन्दा पर जान देती थीं. आज उसी गुलाबी साड़ी को पहिनते चन्दा का मन उदास हो उठा. उसकी सांवली रंगत पर कभी किसी ने छींटाकशी नहीं की और आज जब वह प्रशंसा के अनगिनत उपमान पाने को आतुर थी, तो कटु सत्य यूं उघाड़ कर रख दिया गया था.

बहुत रात गए बंद द्वार खुला था.अवनीश कमरे में आ ठिठक गए थे. शायद जबरन ही उन्हें उस कैद में भेजा गया था .चन्दा अपने में और सिमट गई. दोनों के बीच चुप्पी ज़ोरों से बोलने लगी थी.काफी देर बाद अवनीश ने कहा-

“यह विवाह मेरी इच्छा से नहीं हुआ है. आप पढी-लिखी ही नहीं हमेशा टॉपर रही हैं, ये बात तो समझ ही गई होंगी.”चन्दा के मौन पर आगे कहा था-

“माँ की जिद थी इस घर की बहू आप ही बनेंगी. आपके पापा ने इस घर को हर संभावित चीज़ से भर जो दिया है.”स्वर का व्यंग्य चन्दा के कानों में बजने लगा.

“आप मना भी तो कर सकते थे” किसी तरह संयत रह कहा था चन्दा ने.

“कैसे मना करता, दो-दो बहिनों के विवाह के लिए समर्थ जो नहीं था. समझ लीजिए भगिनी-प्रेम पर बलि कर दिया गया. वैसे आपसे मुझे कोई शिकायत नहीं है, दोष हमारा ही है.”

“फिर ये सब बताना क्या ज़रूरी था?” अनायास ही चन्दा वार कर बैठी

.”मै ईमानदारी में विश्वास रखता हूँ. आपको किसी तरह की शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगा. पति-धर्म का सच्चाई से निर्वाह करूंगा, पर मानसिक रूप में जुड़ने की बाध्यता नहीं होगी. हमारे बच्चे हम दोनों के होंगे,”

”:छि:: घृणा और आक्रोश से चन्दा का रोम-रोम सुलग उठा. चेहरे पर वही भाव स्पष्ट थे.

“आप परेशान हो उठीं लगती हैं. भारत के अधिकाँश परिवारों में पति-पत्नी की यही स्थिति होती है. बाहर समाज में सब मुखौटे ओढ़े हंसते-मुस्कुराते हैं, पर उनके अन्दर की बात कितने लोग जानते हैं?”

“रहने दीजिए, हमने न ऎसी बातें देखी हैं न सुनी हैं, ये सब सुन कर ही शर्म आती है,”

“आपकी इस बात पर यकीन करने का बहुत जी चाहता है, चन्दा जी.”

“क्या मतलब, क्या हम झूठ बोल रहे हैं?’ आवाज़ में तल्खी थी

“नहीं, पर अकारण ही तो आपकी माँ का परित्याग कर आपके पापा ने दूसरी शादी नहीं की थी.”

“आप ये क्या कह रहे हैं, मेरी माँ के जीवित रहते मेरे पापा ने दूसरी शादी की थी इम्पौसिबिल. ये झूठ है. इस तरह अपमानित करने का आपको अधिकार नहीं है, अवनीश जी.”चन्दा नाराज़ थी.

“सच कहिए आप इस बारे में कुछ भी नहीं जानतीं?अवनीश विस्मित था.

“नहीं- बिलकुल नहीं”

“तो इस बार अपने चाचा या पापा से पूछ देखिएगा. हाँ एक बात याद आई. शायद आपकी कजिन रमा जी का कोई देवर था उसने आपको पसंद किया था. आपके साथ विवाह करना चाहता था, पर उसके घर वाले आपके माता-पिता की कहानी जानते थे इस लिए आपके साथ बेटे की शादी के लिए तैयार नहीं हुए. हमारे घर में तो सब जानते हुए भी स्वार्थवश मक्खी निगली गई है.” आवाज़ में कडवाहट साफ़ थी.

अवनीश का मुख ताकती चंदा स्तब्ध रह गई, तो वह जबरन स्वार्थवश स्वीकार की गई थी.

“मुझे दुःख है,मैने आपके दिल को ठेस पहुंचाई. वैसे आप प्रतीक्षा कर रही होंगी , चलिए इस रात का अर्थ सार्थक करें. यह भी तो पति -धर्म का कर्तव्य है.”

अवनीश के उस अभद्र वाक्य पर चन्दा चीख सी पड़ी.

“नहीं, अगर मेरा स्पर्श भी किया तो जान दे दूंगी. मेरी ओर से आप बंधन-मुक्त हैं. आपका मन जिससे जुड़ा है, आप उसके पास जाने को स्वतंत्र है,. हम यहाँ नहीं रहेंगे, यहाँ मेरा दम घुटता है. “उत्तेजित चन्दा के बाहर जाने के उपक्रम पर अवनीश ने शांत स्वर में कहा-

“इस समय बाहर जा कर जग हंसाई ना कराएं. वादा करता हूँ, अच्छे मित्र की तरह आपको पूरा सम्मान दूंगा. आई एम् सॉरी. मै नहीं जानता था, अपनी माँ के जीवन की त्रासदी से आप सर्वथा अनभिज्ञ हैं. मुझे माफ़ कर दो चन्दा.”

“आप क्या बता सकते हैं, मेरी माँ अगर जीवित हैं तो वह कहाँ हैं? क्या उन तक मुझे पहुंचा सकते हैं?दो व्याकुल उत्सुक नयन अवनीश के मुख पर निबद्ध थे,

“सुना है हरिद्वार के किसी आश्रम में वह रहती हैं. आपके पापा ने उन्हें पागल घोषित कर दिया था. पता नहीं ये बात सच है या झूठा आरोप.”

माँ पागल करार दी गईं, हरिद्वार में जीवित हैं, ये बात एक अजनबी तक जानता है और वह माँ की जायी, उसे मृत मान जीती रही. दुःख से चंदा का ह्रदय हाहाकार कर रहा था. उसकी आँखों से बहते आंसुओं को देख अवनीश पसीज गया.

“यह क्या मै अनजाने ही आपको रुलाने का अपराध कर बैठा. बिलीव मी, मैने ऐसा कभी नहीं चाहा था. प्लीज रोइए नहीं. अब आप आराम करें मै उधर सोफे पर ही सोने का आदी हूँ. गुड नाइट.”

अवनीश के सो जाने के बाद भी क्या चन्दा सो पाई थी? पागल माँ की बेटी राहुल के लिए ही नहीं, अवनीश के लिए भी अवांछित थी. काश ये सच उस पर उजागर ना होता.पूरी रात जागने के बाद, हौले से अवनीश को जगा, पलंग पर सोने को कह कर बाथरूम में नहाने चली गई. दिल पर भारी बोझ महसूस हो रहा था. प्रथम रात्रि में क्या किसी ने वैसा उपहार पाया होगा?

दूसरे दिन ससुराल के नियमानुसार पग फेरे के लिए बहू को कुछ देर के लिए मायके जाना होता है. अवनीश कार से उसे उसके घर छोड़ तुरंत वापिस चला गया. चाची द्वारा उसे रोकने के आग्रह पर कोई अच्छा सा बहाना भी बनाया था. रमा जीजी ने ही आगे बढ़ चन्दा को दुलार से अंक में ले लिया था.

“क्या बात है, चन्दा, चेहरा सूखा- सूखा सा लग रहा है. अविनाश ने रात भर जगाए रखा है, देखो न आँखें कैसी लाल हो रही हैं.चल, अपने कमरे में चल कर आराम से बातें करते हैं.”जाते-जाते निक्की को कमरे में शरबत लाने के लिए आवाज़ भी दी थी.

“दीदी, क्या तुम जानती हो मेरी माँ जीवित है?”चन्दा के सपाट प्रश्न पर रमा विस्मित हो गई.

“तुझे ये सब किसने बताया ?” किसी तरह रमा पूछ सकी.

“अवनीश ने, बताओ दीदी, सच क्या है? जब तक सच नहीं बताओगी हम ने पानी तक न पीने की कसम खाई है.”

“मैने तो बस इतना ही जाना, ताऊ जी और ताई जी में बनती नहीं थी. दोनों अलग हो गए थे.”

“जीवित माँ को मृत घोषित करना क्या ठीक था, दीदी” ना जाने मेरी माँ कैसी होगी.”चन्दा के रुके आंसू फिर बह निकले.

“मैने बचपन में ये बातें सुनी थीं, ठीक से पूरी बात मै भी नहीं जानती.”रमा चुप हो गई.

पापा बैठक में चाचा के साथ बैठे चन्दा की दूसरी विदाई के बाद विदेश वापिस जाने के कार्यक्रम के बारे में बात कर रहे थे. बैठक में आई चन्दा को देख पापा चौंक गए.

“अरे चन्नी, कैसी है, बेटी, ससुराल कैसा लगा? अवनीश रुक नहीं सका, उसके साथ बात नहीं हो पाई.”

“आपसे कुछ पूछना है, पापा.” उनकी बातों का जवाब न दे चंदा ने कहा.

“हाँ –हाँ बता न क्या पूछ्ना चाहती है?’ न जाने क्यों चन्दा को वह कुछ अस्थिर से लगे.

“”क्या मेरी माँ जीवित हैं?

पापा निरुत्तर थे.

-“माँ कहाँ हैं, मुझे उनके पास जाना है, पापा.” ’पापा के मौन पर चन्दा ने आगे कहा

“किस पगली के पास जाना चाहती है, बेटी? वह क्या तझे पहिचान सकेगी? चार माह की थी तब तुझे और मुझे छोड़ कर चली गई, उसके मन में तेरे लिए प्यार ही कहाँ था?’उनके चेहरे पर उद्विग्नता स्पाष्ट थी.

“मुझे माँ से ज़रूर मिलना है.”चन्दा ने दृढ़ता से कहा.

पापा ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया. पापा की चुप्पी पर चन्दा ने फिर कहा-

“मुझे माँ का पता भर दे दीजिए, मै अकेली जा सकती हूँ.”

“कल तेरी शादी हुई है,चन्नी ,ससुराल वाले क्या कहेंगे? चार दिन बाद चली जाना.”पापा धीमे से बोले.

“ससुराल से तेरा बुलावा आता ही होगा, ऐसे वक्त -- - “चाचा ने समझाना चाहा.

“नहीं जाना है मुझे ससुराल”.

“क्या कह रही है, चन्दा?”पापा का स्वर डरा हुआ था.

“ठीक कह रही हूँ पापा, उस घर में मेरे लिए जगह नहीं है. वहां किसी और का अधिकार है. मेरी नियति मेरी माँ से अलग हो भी कैसे सकती है? ठीक कहा न पापा?”व्यंग्यपूर्ण दृष्टि से देखा था उसने अपने पापा की ओर .

“तू कुछ नहीं जानती बेटी - - वह - - -“वाक्य पूरा नहीं हो सका.

“सच कहा, पापा, मै कुछ नहीं जानती. अगर जानती तो आज इस तरह से आपके साथ साक्षात्कार न होता. मुझे कुछ न बता, आपने मेरे साथ कितना बड़ा अन्याय किया है, आप समझ नहीं सकते, पापा” चन्दा का गला रुंध गया.

रमा जीजी, चाची सब सब चन्दा को समझा कर थक गईं, पर वह अविचलित रही.ससुराल से आया बुलावा चन्दा की अस्वस्थता केबहाने टाल दिया गया. सब जान कर भी रमा चन्दा को समझाने की कोशिश करती रही, पर चन्दा का एक ही उत्तर था—माँ के पास जाना है. अंतत: पापा ने पत्नी का पता दे ही दिया.

आभूषण विहीन, सादी सूती साड़ी में एक सुबह अचानक हरिद्वार के उस आश्रम में चन्दा पहुँच गई थी, जहां पिछले बीस वर्षों से उसकी माँ एकाकी जीवन जी रही थी. सरस्वती माँ को खोजने में चन्दा को देर नहीं लगी थी. एकाकी कुटी में उस समय वह ध्यानस्थ बैठी थीं. आसन के नीचे बैठ चन्दा ने माँ के मुख को अश्रुपूरित नयनों से निहारा था. सौम्य-शांत मुख पर मलिनता की एक लकीर तक चन्दा नहीं पढ़ पाई थी. धीमे से आँखें खोल सरस्वती देवी ने मधुर स्वर में पूछा –

“कौन हो बेटी, कहाँ से आई हो?”

चन्दा के अंतर में वर्षों का दबा रुदन मानो एक साथ उमड़ने लगा था. कंठ से एक शब्द भी नहीं फूटा, पर नयनों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी.अपने आसन से उठ चन्दा का घेहरा अपने हाथों में ले एक पल निहार सरस्वती देवी ने प्यार से पूछा था-

“तू मेरी चन्नी बेटी है न?”आवाज़ में बेचैनी थी.

“माँ—माँ - - “कहती चन्दा सरस्वती माँ के सीने से जा लगी थी.

चन्दा के सिर पर प्यार से हाथ फेरती सरस्वती की आँखें भी अश्रुपूर्ण हो उठीं.कुछ देर रो चुकने के बाद चन्दा ने मुख उठा पूछा था-

“मुझे छोड़ कर क्यों चली आई, माँ? मेरा क्या अपराध था जो इतना बड़ा दंड दिया. कभी अपनी मासूम बेटी को एक पल को भी याद किया था, माँ?”

“यहाँ की हर लड़की में अपनी बेटी को ही तो खोजती रही हूँ, चन्नी. प्रतीक्षा करती रही, कब मेरी चन्नी बड़ी होगी, कब अपनी माँ को याद करेगी, कब यहाँ पहुंचेगी. तूने आने में बहुत देर कर दी, चन्नी. पूरे बीस वर्ष, पांच माह , दस दिन बाद आई है.”

“मुझे कहाँ पता था, तू यहाँ जीती है, माँ वरना क्या इत्ती देर लगती तेरी चन्नी को यहाँ आने में?”

“”क्या तुझे यह भी नहीं बताया गया, तेरी माँ जीवित है.” सरस्वती देवी के मुख पर काले बादलों की छाया घिर आई थी.

नहीं ... माँ, मुझे तो इस सच्चाई का पता ससुराल में लगा, जानते ही तुरंत आई हूँ, माँ.”

“तेरा ब्याह हो गया चन्नी? मेरा जमाई कहाँ है, फिर तू अकेली क्यों आई है,चन्नी? शादी के बाद ये कैसे वेश में आई है, ना रंगीन कपडे, न शरीर पर कोई आभूषण . क्या बात है चन्नी?” सरस्वती की व्यग्रता बोल उठी.

“वो सब बाद में बताऊंगी, माँ. बहुत थक गई हूँ. पहले माँ तुझे सुनानी होगी अपनी कहानी.” लाड से माँ की गोदी में सिर रख चन्नी बच्ची बन गई.

“सच बिटिया मै कैसी पागल हूँ,इतना लंबा सफ़र कर के आई है और मै ने पानी तक को नहीं पूछा. हरीदासी.....” सरस्वती व्यग्र हो उठीं

हरीदासी के आते ही उन्होंने आदेश दिया-

“मेरी बेटी के रहने की व्यवस्था मेरी ही कुटी में कर दीजिए और अभी कुछ फल-फूल का प्रसाद ला दीजिए.”

“नहीं माँ, अब और कुछ नहीं चाहिए, तुम्हें पाकर सब पा लिया.”

“प्रसाद के लिए इच्छा -अनिच्छा का प्रश्न नहीं उठता बेटी. प्रसाद तो मन की शान्ति के लिए ग्रहण किया जाता है, चन्नी.”थोड़ी ही देर में हरीदासी एक दूध के गिलास के साथ एक दोने में केले, अमरुद और सेव ले आई थी.

“तेरी चाय की आदत तो नहीं है, चन्नी? यहाँ चाय नहीं चलती, पर आश्रम के बाहर एक चाय की दूकान है, तू कहे तो....”

“मेरे कारण अपनी तपस्या भंग मत करो माँ , मुझे ऎसी कोई आदत भी नहीं है. इतना प्रसाद ही ज़रूरत से ज़्यादा है.”

चन्नी माँ की अनजानी ममता से अभिभूत थी, काश ये ममता उसे बचपन से मिली होती.

अपनी कुटी में पहुँच, बेटी को बड़े दुलार के साथ कुश- शैया पर बैठा सरस्वती उसके पास ही बैठ गई.

“पहले प्रसाद खा ले तब तक तेरे भोजन की व्यवस्था करती हूँ. कुछ दिन रुकेगी न चन्नी या जमाई बाबू जल्दी लेने आ जाएंगे?, बहुत प्यार करते होंगे तुझे.”आँखों में उत्सुक सवाल था.

“अब हमेशा के लिए यहीं तेरे पास रहने ही तो आई हूँ . माँ की उत्सुकता अनदेखी कर चन्दा ने कहा.

“क्या कह रही है, चन्नी? अभी कुछ देर पहले ही तो तूने बताया तेरा विवाह हुआ है और अब ये क्या कह रही है? माँ की आँखों में चिता थी.

“तू भी तो पति और दुधमुही बेटी को छोड़ कर यहाँ आई थी न माँ?”सरस्वती को गहरी दृष्टि से देख चंदा ने कहा.

“क्या उसके लिए मुझे अराधी बना, दंड देने आई है, चन्नी?”

“नहीं तुम्हारे दंड की भागी बनना चाहती हूँ माँ. आखिर क्यों वैभव का जीवन त्याग कर तू यहाँ तपस्विनी का जीवन बिता रही है, माँ.”

“पागल हूँ न?”उदास स्वर में सरस्वती ने कहा था.

“विक्षिप्तों वाली एक भी बात तो तुम में नहीं देख सकी, माँ, शायद वैसा होता तो दिल को इतनी चोट तो ना पहुंचती माँ.”चन्दा का स्वर भीग आया था.

“जिस बात को तेरे पापा, उनके सारे घरवालों ने स्वीकारा, तू उसका विरोध कर रही है, चन्नी .”

“पापा की समृद्धि दूसरों के लिए उनकी सम्मति का कारण बन सकती है, चन्नी के लिए नहीं.”

“चन्नी..मेरी बेटी..”चन्नी को सीने से लगा सरस्वती का वर्षों से रुका आंसुओं का बाँध टूट गया.

माँ को बच्चों की तरह हलके-हलके थपकी देती चदा मानो सरस्वती की माँ बन गई थी. काफी देर रो चुकने के बाद आँचल से आंसू पोंछती सरस्वती के मुख पर उजली मुस्कान आ गई थी.

“कैसा अनुभव कर रही हो, माँ “?चंदा ने एक अध्यापिका बन माँ से. पूछा.

“वर्षों से दिल पर जो बोझ ढो रही थी, एक पल में ढह गया. बहुत हलकी हो गई हूँ, चन्नी”

“तू कभी हलकी नहीं हो सकती माँ, सब पर भारी बनी रहे, यही मेरी प्रार्थना है..”

“बिना कुछ जाने प्रमाणपत्र दे रही है, चन्नी.”

“तुझे देखते ही सब जान गई, माँ.”

“पर चन्नी तू जिस तरह अकेली यहाँ आई है, देख कर मेरा जी घबरा रहा है. कहीं मेरा दुर्बाग्य तो तेरी राह में नहीं आ गया?’ सरस्वती व्याकुल हो उठी थी.’’

“पहले अपनी बात बताओ तभी मेरी कहानी जान सकोगी, माँ.”चन्दा जबरन हंस दी.

“वो सच तुझे बता पाना संभव नहीं हो सकेगा, चन्नी. तू अपने मन की सुन, मै नहीं चाहती मेरी कहानी सुन तू किसी को प्यार की जगह घृणा करने लग जाए.”

“जिसने जीते जी मेरी माँ को मृत घोषित कर दिया, अब वह मेरे लिए आदर या प्यार का पात्र कभी हो सकेगा, इस बात की कल्पना भी असंभव है, माँ.”

“पर तेरे तो वह पूज्य हैं, तेरे प्रति तो उन्होंने अपना कर्तव्य निबाहा है न? मेरी बात छोड दे.”

“हाँ माँ उन्होंने पैसे भेज अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी और तूने मुझे दूसरों की दया पर आश्रित छोड़ अपना कर्तव्य पूरा कर लिया था, माँ.” चन्दा कुछ कटु हो उठी.

“तू कैसे जानेगी चन्नी, किन परिस्थितियों में तुझे छोड़ना पड़ा था. क्या किसी माँ को ऐसा दंड मिला होगा, चन्नी.”

“जब तक तू सच बताएगी नहीं, क्या मै शान्ति से सांस ले सकूंगी, माँ?”

“कैसे उस अपमानजनक घटना को दोहराऊँ, बेटी?”

“मै तेरी बेटी, तेरे रक्त से सिंचित तेरा अविभाज्य अंग हूँ, माँ. मुझसे कैसा परदा?”

“सिर्फ तीन माह बीस दिन पूरे किए थे तूने, चन्नी.तुझे पा कर मेरा मातृत्व धन्य था. तेरा मुंह निहारते मै थकती नहीं थी, रात को तेरे रोने से तेरे पापा को तकलीफ होती थी, चन्नी. इस लिए तेरे साथ दूर के कमरे में अपने सोने की व्यवस्था कर ली थी. उस रात... .. “कहती सरस्वती चुप पड़ गई.

“क्या हुआ उस रात, माँ कहती क्यों नहीं.”

“उस रात तू बुखार में तप रही थी, तेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टी बदलते अचानक लगा, तेरी सांस उखड़ सी रही थी. घबरा कर तुझे वहीं पलंग पर छोड़ तेरे पापा को बुलाने उनके कमरे में भागी थी. देख कर जड़ हो गई, पलंग पर तेरे पापा के साथ . . . . बस उसके आगे की बात मत पूछ चन्नी. नहीं बता सकूंगी.”सरस्वती काँप रही थी.

“क्या पापा तेरे रहते किसी और के साथ ..... ओह माँ तेरा दुःख समझ सकती हूँ., पर जिस घर में तेरा ऐसा अपमान हुआ उस घर में मुझे जीने को क्यों छोड़ा, माँ?”

छोड़ना कहाँ चाहा था, चन्नी? जैसे ही तुझे गोद में लिए बाहर निकलना चाहा, तेरे पापा ने तुझे मेरी गोद से छीन लिया. लोगों को बताया गया मै पागल थी. पागलपन में तुझे ले कर घर से भाग रही थी. एक –दो बार कमजोरी की वजह से बेहोश हो गई थी, वही बात पागल सिद्ध करने को काफी थी.”

“क्या तेरी सच्चाई पर किसी को विश्वास नहीं हुआ, माँ?”

“जिन्होंने किया, उन्होंने भी पापा की जमींदारी की शान और दौलत के कारण मुंह सी ळिए. तेरे पापा का दबदबा ही ऐसा था.”

“नाना के घर जाने की क्यों नहीं सोची?”

“नाना के घर से डोली उठते ही नाना ने कह दिया था, अब वह घर मेरा नहीं, मामा- मामी का था. मेरी माँ की मृत्यु के बाद नाना मेरे मामा के अधीन हो गए थे और मामी को मेरा उस घर में जाना पसंद नहीं था, मेरा वहां जाना सवथा वर्जित था, बेटी.”

“पापा ने तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं की, माँ?’

“कहा था, जमींदारों के लिए वैसी बातें कोई नई बात नही थी, नई बात तो मैने विरोध कर के की थी, चन्नी. गलत नुझे ही ठहराया गया था.”

“तुम्हारे घर छोड़ने के बाद पापा ने तुम्हारी कोई खोज-खबर नहीं ली, माँ?”

“उनके मन पर अधिकार कहाँ पा सकी थी? पुरुष को रिझाने के गुण कहाँ जानती थी, देवता मान पूजा करती थी, पर पुरुष का मन कुछ और भी चाहता है, नहीं जानती थी.”सरस्वती ने गंभीरता से कहा.

“फिर तुमने क्या किया, माँ?’

“ रिश्ते की विधवा बुआ इसी आश्रम में रहती थी, सीधी उनके पास आ गई थी कभी न वापिस लौटने की कसम ले के. शायद अपने अंतिम दिनों में बुआ ने तेरे पापा के पास पत्र भेजा था. वह सोचती थी , मेरा पता तेरे पापा के पास होना चाहिए क्योंकि मेरा अंतिम संस्कार मेरे पति द्वारा ही किया जाना चाहिए., आखिर मै सधवा नारी जो ठहरी.”

“ बुआ का पत्र मिलने पर आकर घर वापिस ले जाने की बात भी कही थी. पर तब तक भै बदल चुकी थी. वैराग्य के बाद् जूठे सुहाग का सुख क्या भोग सकती थी?’

“फिर”

“फिर क्या, उलटे पाँव लौटते हुए धमकी दे गए थे, उनके लिए मै मर चुकी और उनहोंने यह कर भी दिखाया ,चन्नी.तुझे तक नहीं बताया तेरी माँ जीवित है. सरस्वती का मुख उदास हो उठा था.

“जानती हो, पापा ने दूसरा विवाह कर लिया है माँ. पत्नी के साथ अमरीका जा बसे हैं.”

“जानती हूँ, शायद उम्र के इस मोड़ पर वह एक स्त्री के साथ बंध सके वरना उन दिनों क्या ऎसी बात सोची जा सकती थी?”

“तुझे पापा की वो सच्चाई मेरे जन्म के बाद ही पता लगनी थी, माँ?”

“शायद तेरी वही नियति थी, बेटी, पर आज तुझे देख कर अपने से बार-बार पूछने की इच्छा हो रही है, क्या तब का लिया मेरा निर्णय ठीक था?”

“मेरे लिए अपने को दोषी ठहरा क्यों दुःख पाती है, माँ? अवनीश और पापा में भी तो थोड़ा ही अंतर है. पिता बनने के बाद पापा ने तुम्हारा विश्वास तोड़ा और अवनीश ने विवाह के तुरंत बाद मेरा भ्रम तोड़ा है.”

“एक सच तो मानेगी, चन्नी, उसने तेरे साथ ईमानदारी तो बरती है. चाहता तो तेरे पापा की तरह् तुझे कुछ भी न बताता और उसी दूसरी लड्कीसे संबंध बनाए रखता,”

“अगर विवाह के पहले वो सच बता दिया होता तो शायद तुम्हारी बात से सहमत हो सकती, माँ.”

“भविष्य के लिए क्या सोचा है, चन्नी? अकेली इतनी बड़ी दुनिया में कहाँ रहेगी तू?

“अब तो तुम मिल गई हो. माँ. आज तक अकेली थी, अपना दुःख-सुख अकेली झेलती रही, पर अब तो तू मेरे साथ है.माँ.

“न चन्नी न... मेरा साथ कब तक रहेगा? न जाने कब ऊपर से बुलावा आ जाए.”

“फिर क्या अवनीश के साथ रह कर अवांछित का अपमान सहती रहूँ? जो तू नहीं सह सकी, वही मुझे सहने की बात कह रही है, माँ.”चन्दा रुष्ट लगी.

“इसलिए कि इतने वर्षों के अनुभव से यही जाना है, अधिकाँश पुरुषों का मन एक सुगना है, चन्नी, जो नई कलियों के प्रति स्वभावता; आकृष्ट होता है. यह पत्नी का कर्तव्य है, वह् पति का मन बांधे रखने की कोशिश करे. यह पत्नी की अपनी लड़ाई है. या तो वह अपने प्यार से सुगने को पालतू बना सकती है या उसे स्वतंत्र उड़ने को छोड़ सकती है.”

“ये जानते हुए भी तुमने ऐ सा क्यों नहीं किया, माँ?”

“आज तेरे सामने स्वीकार करती हूँ, मैने गलती की थी,चन्नी. मेरे पास भी शस्त्र थे, उनका प्रयोग किए बिना अपनी पराजय स्वीकार कर ली. तब उतना समझ पाने की उम्र नहीं थी. घर छोड़ते समय सोचा था, मैनै अपने स्वाभिमान को अक्ष्क्षुण रखा है, पर तेरे प्रति अन्याय तो कर ही गई न चन्नी. तू घर लौट जा, चन्नी.”

“किस घर में लौटूं, माँ? वहां अवनीश के मन पर मुझसे पहले ही कोई और अधिकार किए हुए है. “

“तेरी बातों से जान गई हूँ, अवनीश अच्छा लड़का है. अपने प्यार, धैर्य, और त्याग से तू उसे ज़रूर पा लेगी. मै तुझे अवनीश के साथ ही सच्चे मन से आशीर्वाद देना चाहती हूँ, चन्नी. लाएगी न उसे?”

“अगर अपना सच्चा अधिकार पा सकी तो ज़रूर आऊंगी, माँ वरना वापिस नहीं आऊंगी.”एक पल माँ का आशान्वित मुख ताकती चन्नी ने कहा.

”तू वापिस ज़रूर आएगी, चन्नी , मै तेरी प्रतीक्षा करूंगी.”

“पापा से मिलने का कभी दिल नहीं चाहा, माँ?

निरुत्तर माँ को निहार चन्दा ने फिर पूछा था-

“अगर अब पापा आएं?”

“”अब वह मेरे लिए उन हज़ारों व्यक्तियों में से ही एक होंगे जो रोज़ यहाँ आते रहते हैं, बेटी.”

“माँ, पापा से अलग रह कर तूने नहीं, उन्होंने जो खोया, वह कभी नहीं समझ सकेंगे. उसकी क्षति –पूर्ति कभी नहीं हो सकेगी.” चन्दा का कंठ रुंध आया था.

“कल सवेरे तुझे वापिस जाना है, चन्नी, अब सो जा.”

बड़े दुलार से बेटी के माथे पर झूल आई लट हटाती सरस्वती ने उसका माथा चूम, भीगी पलकों से मौन आशीर्वाद दिया था.
 
अभिमानी-निराभिमानी

शेखर भैया के सुझाव पर आज सुमन लाइब्रेरी के लिए अकेली ही निकल पड़ी थी. अब वह एम् .ए प्रीवियस में एडमीशन ले चुकी है, इतनी हिम्मत तो उसमे होनी ही चाहिए. रास्ता तो भैया ने समझा ही दिया था. अचानक राह में बने एक बंगले की गार्डेन देख सुमन ठिठक गई. ऐसा लगता था गार्डेन में दुनिया भर के फूलों का मेला सजा हुआ था. हवा में झूमते फूल खुशी से इतराते से लग रहे थे. बचपन से ही सुमन को फूलों से बहुत प्यार था. अपने छोटे से घर के गमलों में कुछ फूलों के पौधे लगा कर ही वह खुश रहती. फूलों पर दृष्टि गडाए सुमन की नज़र घर से बाहर आरहे एक युवक पर पड़ी थी.

“यह घर तुम्हारा है?”अचानक ही सुमन उस कीमती वस्त्रों में आए युवक से पूछ बैठी.

“मेरे कपडे देख कर भी तुम्हें ये सवाल पूछने की ज़रुरत है?”अभिमान से उसने कहा.

“अक्सर कपड़ों से इंसान की पहिचान नहीं होती. हमने सीधा सवाल किया था, क्या तुम सीधा जवाब नहीं दे सकते?”सुमन ने निर्भय सवाल किया. परिस्थितियों ने सुमन को साहसी बना दिया था.

“हाँ ये मेरा बंगला है. पूरे शहर में ऐसा दूसरा बंगला नहीं है. आजकल मॉम और डैड तीन महीनों के लिए लन्दन गए हैं. अब इस घर का मै अकेला ही मास्टर हूँ. वैसे तुम यहाँ क्यों खडी हो?”

“तुम लकी हो तुम्हारी गार्डेन में इतने सुन्दर फूल खिले हैं. लगता है तुम्हे भी फूलों से बहुत प्यार है. इन फूलों को देख कर हम रुक गए.थे.” भोलेपन से सुमन ने सच बयान कर दिया.

“ओह नो, मेरे पास फूल जैसी चीजों को ऐप्रिसिएट करने के लिए टाइम नहीं है. इंजीनियरिंग के फाइनल इयर में हूँ. इंजीनियर बन कर हाई क्लास आकाश छूती बिल्डिंग्स बनाना मेरा मकसद है.”हिकारत से युवक ने कहा.

“क्या तुमने कभी अपनी गार्डेन के फूलों से प्यार ही नहीं किया? फूलों पर उड़ती रंग-बिरंगी तितलियों को नहीं देखा, भंवरों के गुनगुन गीत नहीं सुने, कली की एक-एक पांखुरी को खिलते नहीं देखा? फिर क्यों इतनी सुन्दर फूलों की गार्डेन बनाई है?”सुमन के सुन्दर चहरे पर ढेर सारा विस्मय था.

“क्या तुम कविता लिखती हो? तुम्हारी बातें समझ में नहीं आतीं. ये गार्डेन हमारा स्टेटस-सिम्बल है. इसे देखने के लिए माली हैं. यहाँ से अगर कुछ फूल मुफ्त में ले कर अपने पैसे बचाना चाहती हो तो, ले सकती हो, पर रोज़- रोज़ फूल ले कर बाज़ार में बेचने की कोशिश मत करना.”अमन के चहरे पर व्यंग्य स्पष्ट था.

“इतने सुन्दर फूलों के बीच रहने वाले तुम इतनी छोटी बात सोच भी कैसे सकते हो?आक्रोश से सुमन का गोरा चेहरा लाल हो उठा.

“सॉरी, अक्सर लोग यहाँ के फूलों से बुके बना कर फ़ायदा उठाते हैं. वैसे तुम्हारा नाम क्या है?”

“सुमन, हमारा नाम जान कर क्या करोगे?’

“सु- मन- इसका मतलब जिसके पास अच्छा मन हो” अपने हिन्दी ज्ञान के आधार पर युवक ने कहा.

“वाह तुम तो बहुत अच्छी हिन्दी जानते हो, सुमन का अर्थ फूल होता है, समझे. इस तरह से तो तुम्हारा नाम अमन होना चाहिए, यानी जिसके पास मन ना हो.” सुमन के ओंठों पर मुस्कान आ गई.

“क्या, तुमने कैसे जाना मेरा नाम रियेलिटी में अमन ही है.” अब उसके विस्मित होने की बारी थी.

“जिसके पास फूलों के सौन्दर्य को सराहने वाला मन नहीं है, उसका तो यही नाम होना चाहिए.”सुमन के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी.

“मैने अपनी पूरी पढाई इंगळिश मीडियम से की है, फिर भी जानता हूँ, अमन का अर्थ शान्ति और चैन होता है और मेरे पास भी मन है.”अमन ने शान से जानकारी दी.

“तुम्हारे साथ बातें करते बहुत टाइम वेस्ट हो गया. अब चलती हूँ.”

“तुम क्या कहीं कोई काम करती हो? अगर चाहो तो किसी हॉरटीकल्चर डिपार्टमेंट में तुम्हे जॉब दिला सकता हूँ हमारे बहुत रिसोर्सेस हैं.” अमन के चहरे पर स्टेटस का अभिमान स्पष्ट था.

“थैंक्स अमन, अपनी योग्यता पर मुझे इतना यकीन है कि जो चाहूंगी पा लूंगी. किसी की सिफारिश की उन्हें ज़रुरत होती है जिन्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं होता.”गर्व से सुमन ने कहा.

“अभी कहाँ जा रही हो, तुम्हें कार से ड्रॉप कर दूंगा. आखिर मेरी वजह से तुम्हारा टाइम जो वेस्ट हुआ.”

“भगवान् ने ये जो दो पाँव दिए हैं, इनका इस्तेमाल ना करूं तो इनमे जंग लग जाएगी ऑफर के लिए .धन्यवाद” सुमन के चहरे पर आत्म विश्वास था.

“तुम मिडिल क्लास वालों की यही कमजोरी होती है, अवसर का फ़ायदा उठाने में अपनी तौहीनी मानते हैं, इसीलिए आगे नहीं बढ़ पाते.”अमन ने अपनी राय दी.

“इन मिडिल क्लास वालों ने ही प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ही नहीं देश के प्रधान मंत्री को भी दिया है. धूल-मिट्टी में खेलने वालों में से भी हीरे और मोती निकलते हैं.”गर्व से सुमन का सुन्दर चेहरा चमक उठा.

अपनी बात समाप्त करती सुमन तेज़ी से मुड कर वापस घर के लिए चल दी. अमन के साथ बातें कर के उसका मूड ही खराब हो गया था. लाइब्रेरी जाने का उत्साह ही नही रहा. सुमन सोचती रही ये अमीर अपने को क्या समझते हैं. अमन की बातों में कितना अभिमान था. क्या पैसे ही किसी इन्सान् की पहिचान होती है. अपनी इंजीनियरिंग की बात कितनी शान से बता रहा था. ज़रूर डोनेशन दे कर इसका एडमीशन किसी ऐसे वैसे कॉलेज में कराया गया होगा वरना वो अभिमानी आई आई टी का नाम ज़रूर लेता. एक शेखर भैया हैं अपनी मेधा के बल पर देश के सबसे अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे हैं, पर कभी इस बात के लिए लिए घमंड नहीं किया.

पिता की मृत्यु के बाद जब रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया तब अपनी माँ के साथ दस वर्ष की सुमन इस मोहल्ले में आई थी. इस मोहल्ले में आए हुए सुमन को नौ वर्ष बीत चुके थे. पास पड़ोस के परिवारों से उसे और उसकी माँ को बहुत अपनापन मिला था. माँ ने एक स्कूल में नौकरी कर ली थी पड़ोसियों की उन दोनों के प्रति बहुत सहानुभूति रहती. सच तो यह है, ये पड़ोसी उसके रिश्तेदारों से कहीं ज्यादा अपने सिद्ध हुए जो उनकी हर मुश्किल में साथ खड़े रहे. राखी के दिन उदास खडी सुमन पास के घरों में उत्साह् से मनाते त्यौहार को देख रही थी तभी साथ वाले घर से शेखर ने उसे देखा था.

“सुमन, अपने भाई को राखी नहीं बांधेगी?तुझसे राखी बंधवाने के लिए राखी भी साथ में लाया हूँ” अपनी जेब से राखी निकाल, शेखर ने अपनी कलाई आगे कर दी थी.

“सच, क्या हम तुम्हारे राखी बाँध सकते हैं?“खुशी से सुमन का सुन्दर चेहरा और भी कमनीय हो उठा.

“अरे पगली, मेरी भी तो कोई बहिन नही है. तू मेरे राखी बाँध देगी तो हम दोनों भाई-बहिन बन जाएंगे, पर तुझे मिठाई खिलानी पड़ेगी.”हंसते हुए शेखर ने कहा.

“आज माँ ने हलवा बनाया है, चलो माँ के सामने राखी बांधेंगे.”

उस दिन के बाद से शेखर ने सुमन को अपनी सगी बहिन जैसा ही स्नेह दिया था. शेखर के पिता एक ऑफिस में बड़े बाबू थे, पर बेटे के लिए उन्होंने ऊंचे सपने देखे थे. मेधावी शेखर ने उनके सपनों को पंख लगा दिए. जब शेखर कानपुर के आई आई टी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन मिला तो सुमन ने खुशी में सबको मिठाई खिलाई थी. दोनों परिवार भी अब बहुत निकट आ गए थे. बी ए के एक्जाम में सुमन को सभी विषयों में डिस्टींक्शन मिला था, शेखर की खुशी का ठिकाना न था.

“आखिर सुमन किसकी बहिन है? सुम्मी तू भी इंजीनियरिंग करती तो दोनों भाई-बहिन एक ही कॉलेज में पढते.”शेखर प्यार से सुमन को सुम्मी ही पुकारता था.

“नहीं भैया, हमें साहित्य में रूचि है. हम हिन्दी में पीएच डी करेंगे.”सुमन ने अपना निर्णय सुना दिया.

“”उसके लिए आज से ही खूब सारी हिन्दी की अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ना ज़रूरी है. पास में लाइब्रेरी है वहां जाकर किताबें पढ़, छुट्टियों में घर पर बोर ही तो होती है. छुट्टियों में आए शेखर ने सलाह दी थी.’

“क्या हुआ, सुम्मी क्या लाइब्रेरी तक नहीं पहुँच सकी. रास्ता तो सीधा था” घर वापिस आई सुमन से शेखर ने पूछा.

“नहीं भैया, सीधे रास्ते में कंटीले झाड़ मिल गए. जाने का मूड नहीं बना.”

“क्या, रास्ता तो बिलकुल साफ़ है, वहां झाड़ कैसे हो सकते हैं. तेरी बात समझ में नही आई.”

“पूरी बात फिर बताऊंगी, अभी धूप की वजह से सिर दुःख रहा है.”अमन के साथ हुई बात बताने के लिए उसे वक्त चाहिए था.

दूसरे दिन सुमन की पुरानी टीचर मीरा दीदी का फोन आया था अनाथ बच्चों और असहाय स्त्रियों की सहायता के लिए गांधी पार्क में एक मेले का आयोजन किया जा रहा था. सुमन ऐसे कामों में सबसे आगे रहती थी इसी लिए उसकी टीचर चाहती थीं कि सुमन भी मेले में एक स्टॉळ लगा कर मदद करे. सुमन सोच में पड़ गई, मेले में खाने और मनोरंजन के तो बहुत से स्टॉळ होंगे क्यों न सुमन हिन्दी के महान लेखकों की पुस्तकें और पत्रिकाओं का स्टॉळ लगाए. पड़ोस में रहने वाले किशोर अंकल की किताबों की दूकान से अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएँ इस काम के लिए नि:शुल्क मिल जाएंगी, किताबें बिकने पर अंकल को भी कुछ फ़ायदा होगा. स्टॉळ पर “भारतीय साहित्य भण्डार” का बैनर लगाने से अंकल की दूकान का भी प्रचार होगा. इस काम में उसकी सहायता के लिए उसकी सहेली नीरा खुशी से तैयार हो गई. सुमन ने जैसा सोचा था, वही हुआ. किशोर अंकल ने खुशी-खुशी अच्छी-अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएँ सहर्ष दे दीं. सुमन उत्साहित हो गई. इस उत्साह में अमन के साथ हुई बातों की कडवाहट भी भूल गई.

उस शहर के लिए ऐसा मेला सबके आकर्षण का केंद्र हुआ करता था. कुछ देर की मौज-मस्ती के साथ अनाथ बच्चों और दुखी स्त्रियों के लिए सहायता भी हो जाती थी. सुमन और नीरा अपने स्टॉळ को सजाने में जुट गईं. बड़े-बड़े पोस्टरों पर आकर्षक रंगों से हिन्दी साहित्यकारों के चित्र और स्लोगन लगाने से उनका स्टॉळ बहुत प्रभावी बन गया था. एक शंका ज़रूर थी, क्या ऐसे मेले में लोग पुस्तकें या पत्रिकाएँ खरीदेंगे? किशोर अंकल ने मूल्य में पच्चीस प्रतिशत की छूट भी देने को कह दिया था.

आखिर मेले का दिन आ पहुंचा. चारों ओर हर्ष और उल्लास का माहौल था. लाउडस्पीकर पर घोषणाएं की जा रही थी. स्टॉळ वाले ग्राहकों को लुभाने के लिए नए-नए तरीके आजमा रहे थे. बच्चों के लिए मनोरंजन वाले स्टॉळ बुला रहे थे. तरह -तरह के खाने के स्टॉलों पर भी खूब भीड़ थी

“हम भी चाट का स्टॉळ लगा लेते तो अच्छा था. यहाँ हमारी किताबों का मोल जानने वाला कोई नहीं दिखता.”नीरा ने अपनी शंका व्यक्त की.

“कोई बात नहीं, कम से कम हम लोगों का ध्यान तो आकृष्ट कर सकते हैं कि हमारा हिंदी -साहित्य कितना समृद्ध है.”सुमन ने शान्ति से कहा.

तभी दो प्रौढ़ महिलाएं उनके पास आ गईं. उनमे से एक ने कहा-

“अरे मीना बहिन देखो, इस स्टॉळ पर कितने महान साहित्यकारों की पुस्तकें हैं. यह स्टॉळ तो सबसे अलग और अनूठा है.”

“हाँ रेवा, ये तो पहली बार देखा इस मेले में इसके पहले कभी किसी ने ऐसा नहीं सोचा. क्यों बेटी ये किसकी सूझ है?” रेवा जी ने मुस्करा कर पूछा.

“ऎसी सोच तो बस हमारी इस सहेली सुमन की ही हो सकती है.”नीरा ने सुमन की ओर इशारा किया.

“आंटी आप क्या कुछ पुस्तकें खरीदेंगी? खरीद पर पच्चीस प्रतिशत की छूट है.”सुमन ने उत्साह से कहा.

“ज़रूर, हमे कुछ अच्छी पुस्तकें अपनी लाइब्रेरी के लिए लेनी हैं.” मीना जी ने कहा.

कुछ ही देर में दोनों महिलाओं ने दस पुस्तकें खरीद लीं. सुमन ने खुशी-खुशी पैकेट देकर धन्यवाद दिया.

“चलो हमारी पहली बोहनी तो हो गई, अब आगे देखें क्या होता है.”नीरा भी खुश थी.

दूर से आ रहे अमन और उसके साथी समीर की नज़र सुमन के स्टॉळ पर खडी लड़कियों पर पड़ी. अमन ने हलके से सीटी बजा कर कहा

“अरे ये तो उस दिन वाली लड़की सुमन है. साथ में कोई दूसरी लड़की भी है.”

“देख अमन, सुमन के साथ दूसरी लड़की मेरी कजिन नीरा है. उनके साथ कोई शैतानी नही चलेगी वरना घर में शिकायत हो जाएगी.”समीर ने चेतावनी दी.

“तू उस लड़की सुमन को जानता है?”अमन विस्मित था.

“उसे सिर्फ मै ही नहीं, बहुत लोग जानते हैं. ब्यूटी और ब्रेन दोनों का संगम है. पूरी यूनीवर्सिटी में सेकण्ड पोजीशन पाई थी. शहर की डिबेट में सबकी बोलती बंद कर डाली थी.”समीर ने तारीफ़ की.

“शायद इसी घमंड में मुझे पूरा लेक्चर दे डाला था. चल देखें क्या नायाब चीजें बेच रही है.”

दो लडकियां हिन्दी की पत्रिकाएँ देख रही थीं. नीरा उन्हें मैगजीन दिखा रही थी तभी अमन और समीर भी आ पहुंचे.

“हेलो, सुमन, मुझे पहिचानाती तो ज़रूर होगी.”पूरे यकीन के साथ अमन ने कहा.

“किसी अजनबी को याद रख पाना संभव नहीं होता. कहिए, आपको कैसी किताबों में इंटरेस्ट है?”गंभीरता से सुमन ने कहा.

“इंगलिश की क्लासिक स्टोरीज़ मिलेंगी? सॉरी, भूल गया, तुम तो हिन्दी पढने वाली हो, तुम्हे अंग्रेज़ी बुक्स के बारे में क्या पता होगा.”व्यंग्य से अमन ने कहा.

“फ़ॉर योर इन्फारमेशन बी. ए में मेरा एक विषय इंगलिश लिटरेचर रहा है और मुझे अंग्रेज़ी में डिस्टींक्शन मार्क्स मिले हैं. अगर आप नहीं जानते तो बता सकती हूँ, शहर में इंगलिश क्लासिक्स कहाँ मिलती हैं.”सुमन के चहरे पर हलकी मुस्कान थी.

“अरे समीर भैया, आप लोग हमारे स्टॉळ पर आए हैं, अब तो आप दोनों को किताबें खरीदनी ही होंगी.”समीर को देख नीरा ने खुशी से कहा.

“मेरे घर में इन किताबों के लिए जगह नहीं है, वैसे आप दोनों ने इतनी मेहनत की है, शायद लोगों से मांग कर किताबें सजाई है, इस लिए अगर डोनेशन चाहिए तो दे सकते हैं. कहिए कितने का चेक दे दूं.”सुमन को तिरछी नज़र से देखते अमन ने पूछा.

“ओह, थैंक्स. हमें आपकी दया नहीं चाहिए. अगर डोनेशन देना ही है तो शुरू में ही डोनेशन बॉक्स रक्खा गया है वहां अपने डैड के कमाए पैसे डाल दीजिए. वैसे भी आपको तो बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स बनानी हैं, उस वक्त आपके पैसे काम आएँगे.”उत्तेजना से सुमन का चेहरा लाल हो आया था.

“शांत हो जा सुमन, ये तो हमारी मदद ही करना चाह रहे हैं.” नीरा ने बात सम्हालनी चाही.

“मदद नहीं ,हमारी इन्सल्ट कर रहे हैं,सुना नहीं हमने मांग-मांग कर किताबें सजाई हैं. वैसे भी हमारे जैसे मिडिल क्लास वालों के बारे में ये बड़े ऊंचे विचार रखते हैं.”सुमन को अमन की बातें याद थीं.

‘सॉरी सुमन, अमन तो मज़ाक कर रहा था, वैसे मुझे कुछ अच्छी किताबें और पत्रिकाएँ चाहिए. घर में बहिने और भाभी ऎसी किताबों को बड़े शौक से पढती हैं. तुम अपनी पसंद की सात-आठ किताबें दे दो.”

“ज़रूर समीर भैया, अभी चुन कर देती हूँ.”सुमन ने जल्दी ही सात किताबें चुन लीं.

‘अमन यार, अब तू पेमेंट कर दे. डोनेशन देने वाला था, अब पैसे निकाल.”समीर ने मज़ाक किया.

“नो.प्रॉब्लेम, कितने का चेक काटना है. अगर कहें तो असल दाम से कुछ ज़्यादा का चेक दे सकता हूँ.”’

“थैंक्स, अपने पैसे खर्च करने के लिए आपके पास बहुत साधन हैं, हमें बस दो हज़ार का चेक चाहिए.”

‘ऐज़ यूं विश, वैसे अगर फ़ायदा नही उठाना था तो ये दूकान लगाने की क्यों सोची.”

“ये बात तुम नहीं समझोगे, अमन.”शान्ति से सुमन ने कहा.

“नीरा और सुमन तुम दोनों सवेरे से बिज़ी हो, जाओ अमन के साथ जा कर कुछ खा-पी लो. कुछ देर के लिए यहाँ मै सम्हाल लूंगा. अमन होप यूं डोंट माइंड.”समीर ने प्यार से कहा.

“नहीं, हमें नहीं जाना है, नीरा तू चली जा.”सुमन ने साफ़ मना कर दिया.

“अगर तू नहीं चलेगी तो हमें भी नहीं जाना है.”नीरा ने साफ़ इनकार कर दिया.

विवश सुमन को भी अमन का साथ झेलना पडा. तीनो चाट के स्टॉळ पर पहुंचे. वहां काफी भीड़ थी, पर अमन पर निगाह पड़ते ही एक लड़की ने चहक कर कहा-

“अरे अमन जी, आप , कहिए क्या लेंगे?”लड़की के चहरे पर खुशी की चमक थी.

“मुझे बस एक कोल्ड ड्रिंक दे दो, इन दोनों को जो चाहिए दे दो. हाँ पेमेंट मै करूंगा.”

“शुक्रिया, अमन हमें तुम्हारी दरियादिली की ज़रूरत नहीं है, हम अपना पेमेंट खुद कर सकते हैं.”

“एक पुरुष के साथ आई लडकियां अपना बिल खुद चुकाएं, क्या यही भारतीय संस्कृति है, सुमन?’

“याद नहीं., पहले दिन ही तुमने कहा था मिडिल क्लास वाले मौके का फ़ायदा उठाना नहीं जानते, बस वही समझ लो. हम तुम्हारे साथ आए हैं, उसके लिए धन्यवाद, इससे ज़्यादा और फ़ायदा नहीं उठाना है” बात खत्म करती सुमन ने पैसे काउंटर पर खड़ी लड़की को दे दिए.

अमन का चेहरा आक्रोश से लाल हो उठा. बिना बात किए वे लौट आए. उन्हें देख समीर ने पूछा-

“कहो मेरे दोस्त की कितनी जेब खाली कर डाली?”चहरे पर हँसी थी.

“चल समीर, आई एम् फेड- अप. ये अपने को न जाने क्या समझती है, मूड ही खराब कर दिया. चल क्लब चलते हैं, मूड ठीक करना है.”कड़ी नज़र सुमन पर ङाळ अमन चुप हो गया.

”किसकी बात कर रहा है, किसने मूड खराब कर दिया?”समीर विस्मित था.

“कुछ नहीं, अब यहाँ रुकना बेकार है.”अमन के साथ जाने को समीर विवश था.

“तू बेकार में ही अमन से उलझ पड़ी. उसने कुछ गलत तो नहीं कहा था.”नीरा ने कहा.

“तू उस घमंडी को नहीं जानती. अमीर बाप का बेटा है, दूसरों पर अपनी अमीरी का रोब झाड़ता है. उसकी बात छोड़, हमें तो यही खुशी है, हमने काफी पैसे जुटा लिए हैं.”

“हाँ मीरा दीदी तो हमारे काम से खुश हो जाएंगी.” नीरा ने सहमति जताई.

दो दिनों बाद नीरा सुमन के पास आई. उसके चहरे पर खुशी साफ़ झलक रही थी.

“सुम्मी, चल आज हम क्रिकेट मैच देखने चलेंगे. समीर भैया ने पास दिए हैं.”

“तुझे कब से क्रिकेट देखने का शौक हो गया? हमें नही जाना है.”

“जानती है इस मैच में समीर भैया भी खेलेंगे. इतने मंहगे टिकट हमें मुफ्त में मिले हैं. प्लीज़ मेरे लिए चली चल.”नीरा ने अनुरोध किया.

नीरा के साथ सुमन को मैच देखने के लिए जाना ही पडा. ग्राउंड में भारी भीड़ थी. नीरा के पास वी आई पी पास होने की वजह से अच्छी सीटें मिल गईं.

“इस मैच को अमन ने स्पौंसर किया है, इसीलिए हमें वी आई पी पास मिले हैं.”नीरा ने खुशी से बताया.

“अगर तूने पहले ही ये बात बता दी होती तो हम किसी हालत में मैच देखने नहीं आते. कभी उसने कबड्डी खेली है, नहीं ना? क्योंकि वहां तो उसका स्टेटस आड़े आ जाएगा.”स्वर में कडवाहट स्पष्ट थी.

“तू बेकार ही अमन से चिढती है, अच्छा-भला लड़का है. अमीर है इस बात को झुठलाया तो नहीं जा सकता. अब खेल शुरू हो रहा है, खेल का मज़ा ले.”

हर्ष प्वनि के साथ मैच शुरू हो गया. अमन बैटिंग कर रहा था. पहली ही बॉळ पर छक्का मार कर अमन ने ढेर सारी तालियाँ पा लीं. हर बॉळ पर रन बनाता अमन हीरो बन गया. पूरे दिन खेल चलता रहा.

अंतत: अमन की टीम विजयी रही. जीत का कप लेते अमन के साथियों ने उसे कंधे पर उठा लिया. अमन का हेहरा खुशी से खिला दिख रहा था. सुमन जल्दी वापिस लौटना चाहती थी, पर नीरा समीर को बधाई देना चाहती थी. थोड़ी देर बाद भीड़ छंटने पर समीर के साथ अमन भी बाहर आ रहा था. नीरा ने आगे बढ़ कर उन्हे बधाई दी. थैंक्स देते अमन की निगाह नीरा के साथ खडी सुमन पर पड़ी थी.

“ये तो कमाल हो गया, यूनीवर्सिटी की ब्रिलिएंट स्टूडेन्ट सुमन भी हमारा मैच देखने आई थीं, अच्छा हुआ मै ने इन्हें नहीं देखा वरना दहशत के मारे ज़ीरो पर आउट हो जाता.”व्यंग्य से अमन ने कहा.

“अपनी जीत पर नाज़ करना बेकार है, अमन. स्पॉंसरशिप के बदले जीत तो मिलनी ही थी” सुमन ने साफ़-साफ़ जीत का पूरा श्रेय अमन की स्पॉंसरशिप को दे डाला.

“मान जा, अमन इनकी दुआओं ने ही हमें जिता दिया.”समीर ने परिहास किया.

“यार समीर, तू इन्हें नहीं जानता, डरता हूँ कहीं अपना लेक्चर शुरू ना कर दें, अपनी गार्डेन देखने के लिए वक्त नहीं है और खेल में टाइम वेस्ट कर रहे हो. खैर आज की जीत की खुशी में माफ़ करता हूँ.”

सुमन का गोरा चेहरा तमतमा आया. ये होता कौन है जो उसे माफ़ करे. घमंडी कहीं का. अच्छा होता वह नीरा की बात न मान कर यहाँ ना आती.तभी पांच-सात लडकियां अमन के ऑटोग्राफ लेने आ गईं. उनके चेहरों पर अमन के लिए प्रशंसा थी. उनके साथ नीरा ने भी ऑटोग्राफ लिया था. अमन ने सबको ऑटोग्राफ देकर सुमन से कहा-

“तुम मेरा ऑटोग्राफ नहीं लोगी, सुमन. एक मशहूर बिल्डर की तरह से जब अखबारों में मेरा नाम निकला करेगा तब तुम मेरे ऑटोग्राफ की इम्पौरटेंन्स समझोगी.”शान से अमन ने कहा.

“एक बिल्डर की मेरी दृष्टि में कोई विशेष इज्ज़त क्यों होगी? अपने सपनों को सपने ही रहने दो, अमन. अमीरों से भारी रकम ले कर ऊंची-ऊंची इमारतें बनाने वाले हज़ारों बिल्डर्स होते हैं. काश कोई ग़रीबों के लिए घर बनवाता उसके लिए मेरे दिल में सच्ची इज्ज़त होती, नीरा अभी मुझे घर जाना है, तू रुक सकती है..”अपनी बात कहती सुमन तेज़ी से चल दी. उसके पीछे नीरा भी थी.

“ये लड़की अपने को न जाने क्या समझती है, इसे क्या पता एक दिन अपनी बनाई ऊंची-ऊंची इमारतों के साथ मै आकाश की ऊंचाइयां छू लूंगा.”अमन के चहरे पर अभिमान था.

घर पहुंची सुमन का आक्रोश थम नही रहा था. माँ हमेशा कहती हैं घमंडी का सिर नीचा होता है. एक दिन इस अमन का भी अभिमान ज़रूर टूटेगा. सिर्फ पैसे से ही तो कोई इंसान बड़ा नहीं बन जाता. आज शेखर भैया होते तो उनसे बात कर के कुछ शान्ति मिलती, पर वह तो छुट्टियों में किसी कम्पनी में इंटर्नशिप करने के लिए बाहर गए हुए हैं. नीरा तो अमन को बस इतना ही जानती है कि वह उसके समीर भैया का अच्छा दोस्त है. पता नही अमन को सुमन से क्या दुश्मनी है, उसे हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता है.

दो दिन बाद शाम को अपने लगाए फूलों के पौधों को पानी देती सुमन गुनगुना रही थी. गुलाब की टहनी पर मुस्कुराते सुर्ख लाल गुलाब को देख कर उसका अवसाद तिरोहित हो गया. तभी घबराई हुई नीरा आ पहुंची. उसके चहरे पर किसी अनिष्ट की आशंका स्पष्ट थी.

“क्या हुआ, नीरा, तू अचानक यहाँ?”उसे देख सुमन विस्मित थी.

“एक बुरी खबर है, कल शाम अमन ने एक लड़की को कुछ गुंडों से बचाया था. अमन रोज़ सवेरे जॉगिंग के लिए जाता है. वे गुंडे अमन से बदला लेने की ताक में थे. अमन को अकेला पा कर उन गुंडों ने अमन को बुरी तरह से पीटा और उसे बेहोश छोड़ कर भाग गए. सवेरे जब लोगों ने देखा तो उसे हॉस्पिटळ पहुंचाया गया. समीर भैया अमन के पास हैं. उसके मम्मी पापा तो लन्दन में हैं.”

“अगर अपनी गर्ल फ्रेंड को बचाने की वजह से उसे पिटना पडा तो उसके लिए तू क्यों हमदर्दी दिखा रही है? उस घमंडी को ऎसी ही सज़ा मिलनी चाहिए.”नीरा की खबर से अप्रभावित सुमन ने कहा.

“तू अमन के बारे में हमेशा उळ्टा ही क्यों सोचती है, सुम्मी. उसकी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है, उसे तो लड़कियों से चिढ है. शायद इसीलिए तेरे साथ उसकी नहीं बनती.”नीरा नाराज़ थी.

“अच्छा अब बता तू हमसे क्या चाहती है, यहाँ दौड़ी-दौड़ी क्यों आई है?”

“तुझे मेरे साथ अमन को देखने हॉस्पिटल चलना होगा.”

“सॉरी, हम उसे देखने नहीं जा सकते.”सुमन ने साफ़ कह दिया.

“तेरे हर काम में हम तेरा साथ देते हैं, आज तुझे चलना ही होगा. मेले में किताबों के पैसे और क्रिकेट मैच के पास अमन ने ही दिए थे, हमें तो उसका अहसान मानना चाहिए. अगर आज तूने साथ नहीं दिया तो आगे से हमसे कोई उम्मीद मत रखना.”नीरा ने चेतावनी दे डाली.

अन्तत: सुमन को नीरा के साथ जाना ही पडा. हॉस्पिटळ की बेड पर पैरों और हाथों पर प्लास्टर के साथ ळेटा अमन बेहद उदास नन्हे शिशु सा मासूम दिख रहा था. नीरा और सुमन को देख उसके चहरे पर शायद विस्मय था. समीर उसके पास से उठ कर खडा हो गया.

“कैसे हो, अमन? बहुत दर्द हो रहा होगा.”नीरा ने सहानुभूति से पूछा.

“पैरों के मल्टिपल फ़ैक्चर उतनी तकलीफ नही दे रहे हैं, जितना अपनी आगे आने वाली ज़िंदगी के बारे में सोच कर तकलीफ हो रही है.”अमन के चहरे पर दर्द था.

“ऐसा क्यों सोचते हो, तुम जल्दी ही ठीक हो जाओगे.”नीरा ने तसल्ली देनी चाही.

“सुमन तुम यहाँ?” सुमन को देखते अमन ने कहा,चेहरे पर ढेर सारा विस्मय था.

सुमन के उत्तर के पहले ही एक पुलिस इन्स्पेक्टर आ गया. अमन की बेड के पास आ कर कहा-

“हेलो अमन, अब कैसा फील कर रहे हो?”

“मेरी छोड़िए, क्या उन गुंडों का पता लगा?” अमन की आवाज़ में बेचैनी स्पष्ट थी.

“तलाश जारी है, अब आप पूरी घटना मुझे बताइए.”

“कितनी बार वही बात दोहरानी होगी? बताया तो था, मै शाम को ईवनिंग- वाक के लिए निकला था, रास्ता सूनसान था. तभी एक लड़की भागती हुई आई और मदद के लिए चिल्लाई. उसके पीछे दो गुंडे थे. मैने उन्हें रोकने की कोशिश की, पर उन्होंने मुझे छूरे से मारने की धमकी दी. लकीली मेरे पास मेरा रिवॉल्वर था, जैसे ही अपनी रिवॉल्वर पॉकेट से निकाली दोनों डर के भाग खड़े हुए.”

“बाई दि वे आपके पास रिवॉल्वर का लाइसेंस तो होगा, वैसे आप उसे ले कर क्यों घूमने निकले थे?”

“पुलिस को लाइसेंस दिखाया भी जा चुका है. आपसे बताया था कि रास्ता सूनसान रहता है. वहां कुछ वारदातें हो चुकी हैं. अपनी हिफाज़त के लिए उसे साथ रखना अपराध तो नही है, इन्स्पेक्टर.”

“ठीक है, मै समझता हूँ. आप उन गुंडों का कुछ हुलिया बता सकते हैं?”

“असल में शाम का अन्धेरा सा था, हाँ वे दोनों जींस और शर्ट पहिने हुए थे. एक के चेहरे पर बांई तरफ एक लंबा निशान था जैसे चाकू से कटा हो. सवेरे जब पीछे से हमला हुआ तो मुझे कुछ होश नही रहा.”बताते हुए अमन थक सा गया.

“थैंक्स, अमन. हम पूरी कोशिश करेंगे उन दोनों को जल्द ही पकड़ लिया जाए.” इन्स्पेक्टर चला गया.

“तुमने ठीक कहा था, सुमन, अपने सपनों को सपने ही रहने दो. अब इस ज़िंदगी में मेरे सपने कभी पूरे नही हो सकते. आकाश छूने की जिद थी अब तो ज़मीन पर भी सीधा खडा हो सकूंगा, इसमें भी शक है.’ पास खडी सुमन से अमन ने मायूसी से कहा.

“हमें माफ़ करो, अमन, हमारा ये मतलब कभी नही था. जिस साहस से तुमने एक लड़की के सम्मान की रक्षा की है, अब उसी साहस के साथ अपनी दुर्बलता पर विजय पानी है. अपने शरीर की चोट को अपने दिमाग पर हावी मत होने दो. ऐसा क्यों सोचते हो कि तुम सीधे खड़े नही हो सकोगे?”सुमन अमन के साहस की बातें सुन कर अभिभूत थी.

“थैंक्स, सुमन, तुम्हारी बातों से मुझे बहुत हिम्मत मिली है. मै ने तुम्हे हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की, पर आज तुमने मेरे सोच की दिशा बदल दी है. तुम फिर आओगी ना?”आशा से अमन ने पूछा.

“ज़रूर आऊंगी, पर एक शर्त है, दूसरी बार तुम उदास नहीं मुस्कुराते हुए मिलोगे.”

“ऐसा ही होगा, सुमन. मेरे बारे में सुन कर मम्मी को हार्ट अटैक आ गया है. वह हॉस्पिटैळाइज़्ड हैं, डैडी भी उन्हें छोड़ कर नही आ सकते. रिश्तेदार तो मतलब साधते हैं. आकर मुझे देख कर अपना फ़र्ज़ निभा गए. डैडी की तरक्की से उन्हें जलन होती है. समीर का ही सहारा है.”

“अरे तुझे किसी के सहारे की क्या ज़रुरत है, जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होगा.”समीर ने कहा.

“अपने को अकेला मत समझो, अमन, हम सब तुम्हारे साथ हैं.”नीरा ने भी स्नेह से कहा.

“शुक्रिया नीरा. तुम दोनों के आने से अच्छा लगा.” अमन की आवाज़ भीग सी गई.

घर वापिस पहुंची सुमन बहुत अपसेट थी क्या यह सच हो सकता है कि उसकी बात की वजह से आज अमन इस हाल में है? उसने ही तो कहा था एक दिन अमन का अभिमान ज़रूर टूटेगा, घमंडी का सर नीचा होता है. एक और बात भी तो कही थी अमन के सपने-सपने ही रहेंगे. उसके सपने सच नहीं होंगे, अमन को उसकी वो बात याद भी है. आज अमन के साहस की बातें सुन कर वह सोचने को विवश थी, जो इंसान एक अनजान लड़की की मदद के लिए अपनी जान पर खेल सकता है, वह क्या वही अमन है, जिससे वह चिढती रही है. आज उसके सामने अमन का एक दूसरा ही रूप था. अपनी गलती का उसे प्रायश्चित करना ही होगा,पर कैसे? अपने को दोषी ठहराती सुमन देर रात तक जागती रही. सुबह तक सुमन निर्णय ले चुकी थी. अगर अमन को लगता है कि उसके कहने से ही अमन की ये हालत है तो सुमन को ही उसका ये भ्रम हा दूर करना होगा. वह पूरी तरह से निराश हो चुका है, सुमन उसमे आशा का संचार करेगी. उसकी निराशा को दूर करेगी. अभी उसके क्लासेस शुरू होने में देर हैं, इन दिनों वह अमन के पास हॉस्पिटल जा कर उसके साथ समय बिता कर उसे खुशी देने का प्रयास करेगी.

सवेरे माँ को सारी बात बता कर उसका मन हल्का हो गया. माँ ने भी कहा अगर संभव हो, वह नीरा के साथ ज़रूर जाए. अमन अभी अकेला है उनके जाने से उसे खुशी मिलेगी. माँ ने भी स्वयं कभी उसे देख आने की बात कह कर सुमन का भय दूर कर दिया. वह जानती थी माँ को उस पर कितना ज़्यादा विश्वास है. सवेरे जल्दी उठ कर सुमन ने नीरा को फोन किया तो उसने दुखी स्वर में बताया

“नानी का निधन हो गया है. हम सब आज ही बनारस जा रहे हैं, समीर को ही सब रस्मे पूरी करनी हैं, उसे तीन चार सप्ताह बनारस में ही रहना होगा. उसे अमन की चिता है. अगर तू उसे कभी-कभी देख आया करे तो समीर आभारी रहेगा. अमन बहुत अकेला है, सुमन, प्लीज़ उसकी मदद करना.”

“तू चिता मत कर, समीर से कहना उसकी जगह तो नही ले सकती, पर अमन की परवाह रखूंगी.”

“सुप्रभात, अमन. अब कैसा महसूस कर रहे हो?’”अपने सामने मुस्कुराती सुमन को देख अमन चौंक गया.

“सुमन, तुम यहाँ आकर क्या मुझ पर दया कर रही हो?”

“तुम क्या कभी दया के पात्र हो सकते हो, अमन? तुम्हारे जैसा साहसी बिरला ही होगा.”

“मेरे पास आने से तुम्हारा टाइम तो वेस्ट होगा, सुमन.’

“यूनीवर्सिटी अभी बंद है, कोई दोस्त भी यहाँ नहीं है, सोचा तुम्हारे साथ ही बातें कर के समय बिता लूं. वैसे भी तुमने ही तो कहा था सुमन का अर्थ अच्छा मन होता है. शायद इसी लिए किसी को तकलीफ में नही देख सकती.”सुमन हंस रही थी.

“सचमुच तुम्हारा मन बहुत अच्छा है, सुमन वरना मेरी तकलीफ से तो तुम्हे कोई लेना-देना नही होता.”

तीन-चार दिनों में ही सुमन के साथ अमन सहजता से बातें करने लगा. बातों –बातों में सुमन ने बताया उसके पापा के न रहने पर भी उसकी माँ ने साहस नहीं खोया, माँ ने उसे अपने पापा की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. आज दोनों माँ बेटी कम, दोस्त ज़्यादा हैं. बातें सुनते अमन के चेहरे पर उदासी के भाव आ गए. अमन ने मायूसी के साथ बताया उसके मॉम और डैड के होते हुए भी वह अकेला महसूस करता रहा है. उन दोनो के पास बेटे के लिए वक्त कम रहा, डैड की बिजनेस और मॉम की सोशल सर्विस के बीच बेटा अकेला छूट जाता था. इसी लिए अमन एक लड़की के धोखे के प्यार का शिकार बन गया था. अमन पूरी बात न कह कर चुप हो गया.

“ये क्या कह रहे हो, अमन, तुम किसी से धोखा कैसे खा सकते हो?”सुमन विस्मित थी.

“लंबी कहानी है, सुमन. मेरे पैसों के लालच में वो लड़की मेरे साथ प्यार का नाटक खेलती रही. अपने अकेलेपन से ऊबा हुआ मै उसके जाल में फंसता गया. एक दिन मुझसे ज़्यादा अमीर लड़के के साथ कहीं चली गई. मुझे लड़की नाम से नफरत हो गई, शायद इसी लिए तुम्हारे साथ बहुत कटु था.”

“पुरानी दुखद बातें भुला देने में ही समझदारी होती है. मेरे ख्याल से इस वक्त तुम्हारे पास काफी फ्री टाइम है, तुम अपनी जिन बिल्डिंग्स को बनाने के सपने देख रहे थे उनके बारे में कुछ स्टडी क्यों नहीं कर लेते.”सुमन ने गंभीरता से कहा.

“अब समझा, तुम मेरा मज़ाक बना रही हो..”अमन ने नाराज़गी से कहा.

“तुम हमें समझ ही नही सके, अमन, हम सच्चे दिल से चाहते हैं तुमने जो सपने देखे हैं वो ज़रूर पूरे हों. तुम बुक्स पढ़ कर काफी आइडियाज़ ले सकते हो. हम तुम्हारे लिए लाइब्रेरी से किताबें ला सकते हैं.”

“थैंक्स, सुमन, सच कहती हो, मुझे इस वक्त को बेकार नहीं करना चाहिए. मेरे घर में बिल्डिंग डिज़ाइमिंग पर बहुत सी अमेरिका की किताबें हैं, पर तुम कैसे ला पाओगी?”

“तुम एक कागज़ पर लिख कर दे दो, हम माली काका के साथ जाकर बुक्स ले आएँगे,’

“हाँ माली तुम्हे पहचानता है, पर तुमने उसे अपना काका कब बना लिया?”

‘पहले दिन ही जब तुमने हमें फूलों को बाज़ार में बेच कर फ़ायदा उठाने का का अभियोगी बना दिया था.” सुमन ने शरारत से कहा.

“सॉरी, सुमन, मेरी गलती माफ़ करो. तुम्हे कितना गलत समझा था. तुम्हारे अच्छे मन से माफी तो ज़रूर मिलेगी.”मुस्कुराते हुए अमन ने एक स्लिप पर संदेश लिख कर सुमन को दे दिया.

“बाबा रे, इतनी भारी किताबें तुम कैसे पढ़ पाते हो, अमन, हम तो इन्हें उठाने से ही थक गए.” दूसरे दिन अपने साथ लाई किताबें पास की मेज़ पर रखती सुमन बोली.

“थैंक्स, सुमन. तुमने मुझे नई शक्ति दी है.”अमन ने प्यार से कहा.

दूसरे दिन से सुमन भी अपने साथ कुछ किताबें ला कर पढती रहती. बीच-बीच में दोनों बातें करते, पुराने मजेदार किस्से एक-दूसरे को सुना कर हंसते. सुमन अपने साथ जो भी खाने को लाती उसमे अमन का हिस्सा ज़रुर होता. अमन कहता सुमन की माँ के हाथ का बना खाना इतना टेस्टी क्यों होता है? इसमें माँ का प्यार जो है ,सुमन कहती. सुमन की माँ भी आ कर उसे आशीर्वाद दे गई थीं, अब अमन अपने विश्वास को फिर जीने लगा था. सुमन जैसे अमन की ज़रुरत बन गई थी.

“एक बात सच-सच बताना, मेरे अभिमान की वजह से तुम मुझसे नफरत तो ज़रूर करती रही होगी.” एक दिन अचानक अमन सुमन से पूछ बैठा.

“सच कहूं तो तुम पर बहुत गुस्सा आता था, ये लड़का अपने को क्या समझता है, पर अब सोचती हूँ तुम्हारे अभिमान के साथ मेरे स्वाभिमान और संस्कारों की टकराहट थी, दोनों के बीच तनाव था इस लिए हिसाब बराबर हो गया.” सुमन के हंसते सुन्दर चहरे को अमन मुग्ध ताकता रह गया.

दूसरे दिन जल्दी आने को कह सुमन लौट गई थी.

“ऐ लड़की, रुक. तू सुमन है?”कड़ी आवाज़ में पूछे गए प्रश्न पर अमन के पास जा रही सुमन चौंक गई.

जी ई—आप कौन हैं, हमें कैसे जानती हैं?’उस फैशनेबल स्त्री को विस्मय से देखती सुमन ने पूछा.

“मै कौन हूँ, तो सुन और समझ ले, मै अमन की मॉम हूँ. तेरे बारे में सब सुन चुकी हूँ. तुझ जैसी लड़कियों को अच्छी तरह से जानती हूँ. अमीर लड़कों को फंसा कर पैसे लूटना और फिर धोखा दे कर किसी और को शिकार बनाना. यही तेरी पहिचान है. एक बार मेरा बेटा धोखा खा चुका है, अब दूसरी बार उसे धोखा नहीं खाने दूंगी.”क्रोध से अमन की मॉम का का चेहरा तमतमा रहा था.

“आप हमारा अपमान कर रही हैं. हम ऎसी लड़की नहीं हैं ना ही हमारा ऐसा कोई इंटेंशन है. आप जैसे अमीरों से हम कहीं ज़्यादा अमीर हैं, आपके पैसे आपको मुबारक उन्हें तो हम छूना भी पसंद नही करेंगे.”अपमान से सुमन का चेहरा लाल हो गया.

“बकवास बंद करो, बहुत हो गया. जिस लालच से तुमने मेरे बेटे की देखरेख की है, उसके लिए कितने पैसे चाहिए. अभी चेक लिख देती हूँ, इसके बाद इधर कभी मत झांकना.”

“हर बात पैसे से नहीं तौली जाती मैडम, पर ये बात आप कभी नहीं समझ सकेंगी, धन्यवाद.”बात समाप्त करती सुमन तेज़ी से मुड़ कर चल दी.

क्रोध और अपमान से सुमन का अंतर जल रहा था. गलती उसी की थी आखिर उसे क्या पड़ी थी जो अमन के पास जा कर अपना समय नष्ट किया. अमन भी तो उसी माँ का बेटा है जिस स्त्री ने उस पर कितने अपमानजनक लांछन लगाए. शायद आज की दुनिया में अच्छाई करना ही गलत है. बस बहुत हो गया सुमन, अब उस अमन से उसे कोई नाता नही रखना है. न जाने क्यों सुमन का मन खूब रोने का कर रहा था. माँ से ये बात बतानी ठीक नही है, वह दुखी हो जाएगी. शेखर भैया या नीरा के आने पर उनसे बात कर के शायद उसका दिल हल्का को सकेगा. इतने अपमान के बावजूद भी वह अमन की चिंता से मुक्त नही हो पा रही थी. सुमन के साथ बातें करता अमन अपनी तकलीफ भूल जाता था. सुमन भी मजेदार किस्से सुना कर उसे अपने दर्द का एहसास नहीं होने देती थी. दोनों का साथ पूर्णता देता था. ना चाहते हुए भी सुमन की सोच का केंद्र- बिंदु अमन था. उसका अकेलापन उसे छू गया था.

हॉस्पिटळ में अमन बेचैनी से सुमन का इंतज़ार कर रहा था. आज सुमन को मॉम से मिलाना है और आज ही वह लेट हो रही है. सुमन से मिल कर मॉम कितनी खुश होंगी. मॉम के न होने की सुमन ने कमी ही महसूस नहीं होने दी थी. बार-बार अपनी कलाई घड़ी देखते अमन से उसकी मॉम ने पूछा –

‘”किसका इंतज़ार कर रहा है, अमन. अब तो तेरी मॉम आ गई है.”

“मै ने सुमन के बारे में बताया था, पता नही आज अभी तक क्यों नहीं आई.”

“अरे वो लड़की आई थी, पर मै ने उसे उसकी औकात बता दी. ब्लैंक चेक दे रही थी, पर वो शायद उससे भी कही ज़्यादा की उम्मीद लगाए हुए थी. वापिस चली गई.”रूखी आवाज़ में मॉम ने कहा.

“ओह नो, मॉम ये तुमने क्या किया? वह एक बहुत स्वाभिमानी लड़की है. आज उसकी वजह से ही मुझे जीने की हिम्मत मिली है. उसका अपमान कर के तुमने बहुत बड़ी गलती की है.”अमन व्याकुल हो उठा.’

“एक लड़की से इतना बड़ा धोखा खा कर भी तुझे अक्ल नही आई? ऎसी लडकियां अमीर लड़कों पर डोरे डाल कर धोखा देती हैं. इनकी मीठी-मीठी बातों के जाल में तू फंस कर धोखा खा चुका है.”

“बस,मॉम. अब सुमन के खिलाफ एक शब्द भी नही सह सकता. काश तुम उसे पहचान सकतीं. अब तो उससे माफी माँगने का भी साहस नहीं रहा. ये तुमने क्या कर दिया, मॉम.”अमन की आवाज़ भीग गई.

“तू बेकार परेशान हो रहा है, उसके घर का पता बता दे, एक-दो लाख का चेक मिलते ही तेरे पास थैंक्स देने भागी आएगी. पैसों में बड़ी ताकत होती है.”आवाज़ गर्वीली थी.

“एक दिन मुझे भी अपने पैसों पर अभिमान था, पर सुमन के साथ जाना, सच्ची खुशी पैसों से नहीं, नि:स्वार्थ प्यार और मन की शान्ति से मिलती है. हमारे पास पैसों की कमी नही है, मॉम, पर मुझे तुमसे या डैडी से कभी प्यार नही मिल सका. तुम दोनों के होते हुए भी मै कितना अकेला छूट गया, मॉम, अपने अकेलेपन को भुलाने के लिए अमीरी का खोखला चोंगा पहिन अपने को धोखा देता रहा.”

“ये तू कैसी बहकी-बहकी बात कर रहा है, अमन? हमने तुझे क्या नहीं दिया?”

“प्यार नहीं दे सके मॉम. आज भी डैडी लन्दन में मुझसे ज़्यादा अपने बिजनेस में बिजी हैं. मेरे अकेले मन को सुमन ने अपने निश्छल प्यार से सराबोर किया है.”अमन की आवाज़ रुंध गई.

अमन की बात से उसकी माँ स्तब्ध हो गई, ये कैसा कडवा सच अमन कह गया. बचपन से आया और नौकरों के सहारे उसे छोड़, वह पति और अपने कामों में व्यस्त रहीं. पांच-छह साल का नन्हा अमन माँ को बाहर जाता देख माँ का आँचल पकड़ उन्हे रोकने की कोशिश करता था, पर वह कब रुकीं? बेटे के हाथ में चॉकलेट का डिब्बा थमा, चली जाती थीं. अमन के आंसू माँ को कब रोक सके. बाद में उसने अकेलेपन को अपनी नियति स्वीकार कर लिया था. अगर सुमन के साथ ने अमन के खाली मन को पूर्ण किया है तो वह सुमन से उसे अलग नहीं कर सकतीं. इतना तो समझ में आ ही गया है कि जिस लड़की ने अमन को इतना बदल दिया है वो साधारण लड़की नही है. उन्हें सुमन से माफी मांगनी ही होगी.

दरवाज़े की दस्तक पर सुमन चौंक गई. माँ स्कूल जा चुकी थीं. दरवाज़े पर अमन की माँ को देख सुमन विस्मित थी.

“आप यहाँ? शायद और अपमान करना बाक़ी रह गया था.”तिक्त स्वर में सुमन ने कहा.

“घर के भीतर नहीं आने दोगी?”शांत स्वर में अमन की मॉ ने कहा.

‘हमारे इस छोटे से घर में आपके लायक फर्नीचर नहीं है. आपकी आदत मखमली सोफों पर बैठने की है.’”अनायास ही सुमन के स्वर में व्यंग्य आ गया, अपना वह अपमान भूली नही थी.

“मुझे माफ़ नहीं करोगी बेटी? मानती हूँ तुम्हे समझने में गलती हो गई. उसके लिए बहुत शर्मिंदा हूँ.”

“आप मुझसे बड़ी हैं, माफी मांग कर और अपमानित मत कीजिए. हम उस माँ की बेटी हैं जिसने अपना पति खोकर भी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया. मुश्किलों से डरे बिना, साहस के साथ स्वाभिमान का जीवन जिया और हमें भी यही सिखाया है, अन्याय के आगे कभी सर मत झुकाना. आपको अमन के साथ होना चाहिए.”दृढ आवाज़ में सुमन बोली.

“जानती हो सुमन आज अमन ने मेरी आँखें खोल दीं, मै माँ का कर्तव्य नहीं निभा सकी. उसके मन का खाली कोना तुमने भरा है, अब उसे फिर अकेला मत होने दो, सुमन.” माँ का स्वर दयनीय हो आया.

“शायद अमन ने आपको यहाँ भेजा है. आप उसकी माँ हैं आपका प्यार उसे पूर्ण कर देगा.”

“नहीं अमन ये जानता भी नहीं कि मै यहाँ आई हूँ. तुम नही जानतीं, अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए एक बार वह रीता नाम की एक धोखेबाज़ लड़की के जाल में फँस कर पूरी तरह से टूट चुका है, अब दोबारा फिर उसे उसी हाल में नही देख सकती. मेरी मदद करो, सुमन.”

“अमन एक समझदार लड़का है, वह अपनी कमजोरियों को जान गया है. उसे वक्त देना चाहिए.हमें पूरा विश्वास है वह ठीक रहेगा.”सुमन ने यकीन के साथ कहा.

“तुम्हारे यकीन पर विश्वास है, सुमन, पर अगर तुम उसके पास नही गईं तो वह मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा. प्लीज़, सुमन मै अपने बेटे को नहीं खो सकती. अब मै जाग गई हूँ.”उनकी आँखों में आंसू थे.

“ठीक है, आपके लिए आज चल रहे हैं, पर आगे के लिए आपको ही राह ढूढनी होगी.”

माँ के साथ सुमन को आया देख अमन का उदास चेहरा खिल उठा. डॉक्टर से बात करने के बहाने मॉम दोनों को अकेला छोड़ कर चली गई थीं.

“सुमन ,प्लीज़ माँम ने जो कुछ कहा, उसके लिए माफी मांगता हूँ. मुझसे नाराज़ मत होना, वरना मेरा जीना कठिन हो जाएगा.”अमन ने सच्चाई से कहा.

अरे वाह, हम तो वी आई पी हो गए. अरे जनाब, इस धोखे में मत रहिएगा कि इस सुमन के पास इतना फालतू समय है कि आपकी नर्स बनी रहे. अब आपकी मॉम आ गई हैं, हमारी ड्यूटी खत्म.

“अच्छा तो मैडम सुमन हमारी नर्स थीं. जो भी हो, इस नर्स ने इतनी अच्छी देखभाल की है कि उसे पूरी ज़िंदगी भर के लिए अप्वाइंट किया जाता है. बोलो मंजूर है, वैसे नो सुनने की तो मेरी आदत नही है.” अमन की मुग्ध दृष्टि ने सुमन को संकुचित कर दिया.

“कल क्या होगा कोई नहीं जानता और तुम पूरी ज़िंदगी की बात कर रहे हो.”अमन का परिहास में कहा गया संकेत समझ कर भी सुमन अनजान बन रही थी.

“मै कल में नहीं आज में जीता हूँ, सुमन और जानता हूँ मेरा आज बहुत सुखद है.”

“कल और आज की क्या बातें हो रही हैं, मै भी तो सुनूं.”अमन की माँ आ गई थीं.

“कुछ नहीं आंटी, अमन फिलौसफी झाड रहा है. वैसे आपको बताना था, कल हम माँ के साथ गया जा रहे हैं, पापा के लिए माँ हर साल पूजा करवाती हैं, एक वीक के बाद आएँगे.

“ठीक है, बेटी. एक सप्ताह अमन और मै तुम्हे मिस करेंगे, पर तुम्हारा काम ज़्यादा ज़रूरी है.”

“ओ के, अमन लौट कर मिलेंगे.”प्यार भरी नज़र अमन पर डाल, सुमन चल दी.

घर लौटी सुमन सोच में पड़ गई, अमन की बातों का अर्थ स्पष्ट था, क्या वह उसे चाहने लगा है? स्वयं सुमन भी तो उसकी ओर खिचती जा रही है. अमन की माँ ने कहा सुमन की वजह से अमन बदल गया है. सुमन ने भी तो साफ़ महसूस किया है कि अमन उसके साथ कितना खुश रहता है. अपनी निजी बातें भी उसने सुमन के साथ शेयर की हैं, क्यों? क्या दो सप्ताह में यह संभव हो सकता है? नहीं उसे अपने को रोकना होगा, समीर एक-दो सप्ताह बाद आ जाएगा, उसके बाद सुमन को अमन के पास जाने की ज़रुरत नहीं रह जाएगी, पर क्या अपने को अमन से दूर रख पाना उसे संभव हो पाएगा?

एक सप्ताह गया में बिता कर सुमन लौटी थी. इस दौरान भी वह अमन को कितना याद करती रही. अपने से डरती, कहीं उसे अमन से प्यार तो नहीं हो गया था वरना हर पल अमन को क्यों याद करती. पता नहीं अमन भी उसे इतना ही मिस कर रहा होगा. उसे अमन के पास जाने की उतावली थी.

“माँ, हम अमन को देखने जा रहे हैं.”.”

“ऎसी भी क्या उतावली है, इतना थक कर आई है, कल चली जाना,”

“माँ हम बिलकुल नहीं थके हैं, शायद अमन की माँ को हमारी ज़रुरत हो.”

सुमन को देखते ही अमन का चेहरा खिल गया.. हाथ में पकड़ी कॉपी और पेन्सिल रख कर कहा-

“बहुत दिन लगा दिए, बहुत अकेला महसूस कर रहा था.”

“वाह सात दिन बहुत हो गए, अगर ऐसा हो कि फिर कभी ना आ सकूं तो क्या करोगे?”

“तब शायद ज़िंदा नहीं रह पाऊंगा. तुम्हारे साथ समय पंख लगा कर उड़ जाता है, पर तुम्हारे बिना एक-अक पल भारी लगता है, सुमन. तुम मेरी ज़िंदगी बन गई हो.”अमन गंभीर था.

“कोई किसी की ज़िंदगी नहीं बन सकता, अमन, इस सच्चाई को स्वीकार करने में ही भलाई है. हाँ ये कागज़ पर क्या बना रहे थे?”अमन ने जो कागज़ रखे थे, उन पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खिंची थीं.

“झोपड़पट्टी में रहने वालों के लिए सस्ते और आराम दायक घर बनाने के लिए डिजाइन बना रहा हूँ.”

“क्या- - क्या कह रहे हो, अमन? तुम तो आकाश छूती बिल्डिंग्स बनाने का सपना देखते थे. उनकी जगह ये सस्ते घर, क्यों अमन?”सुमन विस्मित थी.

“अब वह अभिमानी अमन सच की दुनिया में जीता है. सच्चाई ये है कि अमीरों के लिए आकाश छूती बिल्डिंग्स बनाने वाले हज़ारों बिल्डर्स भारी रकम ले कर महल खड़े कर देंगे, पर इन ग़रीबों की सुध कौन लेगा? मॉम से बात कर ली है अपनी दौलत से इन ग़रीबों के लिए एक कॉलोनी बनाऊंगा. कॉलोनी का नाम भी तय कर लिया है.”अमन के चेहरे पर मुस्कान थी.

“विश्वास नहीं होता, तुम में इतना बदलाव कैसे आ गया?”विस्मय सुमन के चेहरे पर स्पष्ट था.

“एक लड़की है, जिसने एक अभिमानी अमन को निराभिमानी बना दिया और असली खुशी का मतलब समझा दिया. अब सिर्फ मै ही नहीं मॉम और डैड भी खुशी का सच्चा अर्थ समझ रहे हैं. तुम्हारी वजह से मुझे उनका प्यार मिल सका है, सुमन. अब तो समझ गईं वो लड़की कौन है. याद है, तुमने कहा था, ग़रीबों के लिए घर बनाए वाले को तुम इज्ज़त दोगी, उसी प्यार के इंतज़ार में हूँ.”अमन के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी.

“तुम बेकार में मुझे आकाश पर चढ़ा रहे हो, मुझमे ऐसा कुछ नहीं है. तुम हमेशा से अच्छे इंसान थे वरना एक अनजान लड़की की लिए अपनी जान खतरे में ना डालते..”

“कुछ भी कहो, सुमन मेरे ऊपर झूठे अभिमान का जो रंग चढ़ा हुआ था, वो तुमने धो कर मुझे सच की राह दिखाई है. अब वादा करो, तुम मुझे छोड़ कर कभी नहीं जाओगी. मेरा अब जो सपना है उसे पूरा करने में हमेशा –हमेशा के लिए तुम मेरे साथ रहोगी.”

“अमन बेटे, अब सुमन हमेशा तुम्हारा साथ देगी, तुम्हारे हर काम में और तुम्हारे जीवन में यह तुम्हारी प्रेरणा और जीवन संगिनी बनेगी. सुमन की माँ ने इस बात की स्वीकृति मुझे दे दी है. क्यों सुमन, तुम्हे तो कोई ऐतराज़ नहीं है ना?”अचानक अमन की मॉम ने मुस्कुराते हुए आ कर कहां.

“मुझे लगता है, अभी अमन को अपने पैरों पर खड़ा होना है, मुझे भी अपनी पढाई पूरी करनी है. अगर तब तक अमन का मन नहीं बदला तो हम अपने जीवन का निर्णय ले सकेंगे.” गंभीरता से सुमन बोली.

“मुझे तुम्हारी ये शर्त मंजूर है, सुमन. अपने मन को जानता हूँ, ये अब कभी नहीं बदलेगा. इसे बस तुम्हारी हाँ की प्रतीक्षा रहेगी. तुम मेरा इंतज़ार करोगी ना सुमन?”

“तुमने ना कहने की गुंजाइश छोडी ही कहाँ है, अमन ?’हलकी मुस्कान वाले सुमन के झुके मुख को अमन मुग्ध निहारता रह गया.
 
नहीं, वो खेल नहीं था

फाइनल एक्जाम्स खत्म होने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज के विद्यार्थी पार्टी के लिए हॉल में जमा थे .पूरा हॉल विद्युत् लड़ियों से सजाया गया था. म्यूजिक के साथ ड्रिंक्स और तरह-तरह के व्यंजन माहौल को खुशनुमा बना रहे थे. अब इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद सबके अलग-अलग इरादे थे, कुछ आगे मास्टर्स करने की सोच रहे थे तो कुछ कहीं नौकरी खोजने वाले थे.

रंगीन कपड़ों में सज्जित लडकियां लड़कों के आकर्षण का ख़ास कारण थीं. उन सबमें नेहा सबसे अलग चमक रही थी. सुन्दरता के साथ उसकी अदाएं भी बेहद मोहक होतीं. उसकी हर बात पर लड़के मुग्ध रह जाते. सच तो यह है जिस दिन उसने मुम्बई से आकर उनके साथ चतुर्थ वर्ष में प्रवेश लिया था तो लड़कों की जैसे दुनिया ही सुनहरी हो उठी थी. उसे ले कर सब सपने देखते. एक बस राम ही था जो उनकी बातों से निर्लिप्त अपने में सिमटा रहता. उसका ना कोई दोस्त था ना कोई दुश्मन, हाँ हर परीक्षा में प्रथम स्थान उसके नाम ही होता.

अब पार्टी जोरों पर आ गई थी. गीतों की धुन पर डांस होना स्वाभाविक ही था. नीरज ने आकर नेहा से अपने साथ डांस का प्रस्ताव रख, उसके साथ डांस शुरू किया तो शैलेश जल गया-

“ये नीरज बड़ा घाघ है, मौक़ा मिलते ही नेहा पर चांस मारता है.”

“तू क्यों पीछे रह गया, तू भी तो कम नहीं है. अब अपनी पार्टनर चुन ले वरना अकेला रह जाएगा. वैसे तेरी कविता शायद तेरा ही इंतज़ार कर रही है ” शरद ने रिमार्क दिया.

“अरे अपने राम मास्टर कहाँ रह गए, कम से कम आज के दिन तो एंज्वाय कर लेता.’ यशपाल ने राम को पार्टी में न देख कर अपने मित्र महीप से पूछा.

‘अरे उस जीनियस को पढाई के अलावा और कुछ सूझता ही कहाँ है. आज कह रहा था, जनाब आई एस की तैयारी शुरू करने वाले हैं.”महीप ने मुस्कुरा कर कहा.

“वैसे वो जीनियस तो है, सेलेक्ट तो ज़रूर हो जाएगा,पर बेचारा इंटरव्यू में मार खा जाएगा. उसे तो कपडे भी ढंग से पहिनने नहीं आते. महाशय एक दिन नंबर लगी शर्ट पहिन कर आगए थे “नरेश हंस रहा था.

“कुछ भी कह, मेरे मन में तो राम के लिए बहुत आदर है. हमेशा सब की मदद करता है, बदले में किसी से कुछ एक्स्पेक्ट नहीं करता.”महीप ने सच्चाई से कहा.

“एक बात समझ में नहीं आती, ये नेहा उसके साथ काफी घुलमिल के बातें क्यों करती है. दोनों के बीच ज़मीन आसमान का फर्क है. एक ओर बड़े बाप की इकलौती सुन्दर बेटी नेहा, जो किसी के साथ सीधे मुंह बात नहीं करती और दूसरी तरफ मायूसी को साकार करता राम, ”नरेश ने अपनी शंका व्यक्त की.

‘अरे उस सीधे-साधे जीनियस राम को उल्लू बना कर अपना काम निकलवाती होगी वरना कहाँ नेहा और कहाँ वो राम? मैने इस नेहा जैसी बहुत सी लडकियां देखी हैं, अपना मतलब सीधा करने को गधे को भी बाप बना लें.” मोहनीश ने कडवाहट से कहा.

“माइंड योर लैंग्वेज यार, ये बात तू इस लिए कह रहा है क्योंकि नेहा ने तुझे लिफ्ट नही दी. वैसे मुझे भी पता है, पिछले महीने सेमिनार में उसने राम से अपना पेपर लिखवा कर सबकी तारीफ़ पाई थी. अब नेहा-राम पुराण यहीं छोड़ कर मै तो चला, वरना कविता को कोई और अपना पार्टनर बना लेगा.”.अपनी बात कहता शैलेश सामने खडी कविता के साथ डांस करने के लिए चला गया.

“वैसे मोहनीश तेरी बात में कुछ सच्चाई तो ज़रूर है. मुझे याद है, जब ये नेहा अपनी पुरानी सहेली शशि के साथ पहले दिन कॉलेज आई थी तो जैसे कॉलेज में हलचल मच गई थी. सब उससे बात करने-मिलने को दीवाने थे, पर राम ने उस पर नज़र भी नहीं डाली थी, पर अब नेहा अपनी प्रोजेक्ट वगैरह में उसी राम की खूब मदद लेती है.”नरेश भी मोहनीश से सहमत था.

“असल में नेहा के पापा ब्यूरोक्रेट हैं, उनकी ऊंची पहुँच के कारण ही नेहा को इंजीनियरिंग के फोर्थ इयर में एडमीशन मिला था. इसी बात का उसे घमंड है. अपने काम निकलवाने के लिए वह राम के साथ दोस्ती का व्यवहार करती होगी. वैसे हमारा राम है ही ऐसा, बिना किसी अपेक्षा के सबकी मदद करता है. अब चल यार, हम भी आज की रात का आनंद लें.”मोहनीश ने बातों का रुख मोड़ दिया.

जोड़े बन गए थे, लड़के और लडकियां संगीत पर नृत्य कर रहे थे. बीच-बीच में हँसी मज़ाक और खाना-पीना चल रहा था. आज सब पूरी रात जश्न मनाने के मूड में थे, इसके बाद कब कौन कहाँ जाएगा या इसी शहर में रहेगा. माहौल रंगीन हो उठा था. सब जैसे सपनों को जी रहे थे. ये शाम दोबारा कब आने वाली थी.

.”स्टॉप -.स्टॉप, बंद करो---“ अचानक अमरेन्द्र बाहर से बदहवास चिल्लाता हुआ हॉळ में घुसा था. उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. उसकी आवाज़ पर सब चौंक गए.

उस आवाज़ पर सन्नाटा छा गया. कुछेक पलों के बाद नीरज ने आगे बढ़ कर पूछा था-

“क्या हुआ, अमरेन्द्र, सब ठीक तो है?”

“वो राम - - राम ने फोर्थ फ्लोर से कूद कर सुसाइड कर लिया.”अमरेन्द्र की आवाज़ कांप रही थी.

“पागल हो गई है, अपने पर कंट्रोल कर, हम हॉस्टेल जा रहे हैं.”शशि ने कडाई से नेहा का हाथ पकड़ पीछे खींच लिया.

“वैसे एक नए साथी पर नज़र डाले बिना उसे पहिचानेंगे कैसे?”नेहा हार नहीं मानने वाली थी.

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“क्या आ - ये नहीं हो सकता.”सब के मन में यही बात थी.

“क्यों—कैसे.-- कब?’जैसे सवालों ने सबको स्तब्ध कर दिया. नेहा को लडखडाते देख उसकी रूम- मेट और सहेली शशि ने उसे कंधे से पकड़ कर सहारा दिया था.

म्यूजिक बंद हो चुका था, सारे लड़के और लडकियां उस दुखद घटना-स्थल की ओर चल दिए. कुछ देर पहले की जगमगाती रात अब बेहद अंधेरी और भयानक लग रही थी. कॉलेज की बिल्डिंग के नीचे राम का रक्त-रंजित शरीर निर्जीव पडा था. जीवन का कोई भी अंश शेष नहीं दिख रहा था प्रिंसिपल के साथ आए कॉलेज के डॉक्टर ने निराशा जनक संकेत दे कर स्थिति स्पष्ट कर दी थी. प्रोफ़ेसर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे.

“’हमारे डिपार्टमेंट ने एक हीरा खो दिया. मुझे राम से बहुत उम्मीदें थीं” कम्प्यूटर विभाग के विभागाध्यक्ष ने रूमाल से अपनी आँखें पोंछते हुए कहा.

‘इतने ब्रिलिएंट लड़के के ऎसे दुखद अंत का क्या कारण हो सकता है. अपनी माँ का यही एकमात्र सहारा था. अपनी योग्यता के बल पर स्कॉलरशिप पर पढाई करता रहा.”प्रोफ़ेसर वर्मा ने दुखी स्वर में कहा.

“ठीक कहते हैं, उसका भविष्य तो बहुत उज्ज्वळ था, काश उसने ऐसा कदम ना उठाया होता. अब उसकी माँ को हमें सम्हालना है. मैने प्रोफ़ेसर माधवी से राम की माँ को अपने साथ हॉस्पिटळ लाने को कहा है.”प्रिंसिपल गुप्ता ने सबको सूचित किया.

पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही थी. अब सबको एम्बुलेंस की प्रतीक्षा थी. कॉलेज शहर से दूर होने की वजह से अस्पताल भी दूरी पर था. आवश्यक कार्रवाई के लिए राम के नश्वर शरीर को हॉस्पिटळ ले जाया जाना अनिवार्य था.

“सर, इस उमर में अक्सर प्यार के चक्कर में लड़के-लडकियां आत्महत्या कर लेते हैं, कहीं राम का भी तो किसी के साथ - - -“इन्स्पेक्टर ने प्रिंसिपल से जानना चाहा.

“नहीं सर, हम सब जानते हैं, राम बहुत ही गंभीर किस्म का लड़का था. पढाई के अलावा उसका किसी और बात में इंटरेस्ट नहीं था. कल ही हमारी उसके साथ बात हुई थी, बिलकुल सामान्य और खुश दिख रहा था..” इन्स्पेक्टर के अधूरे सवाल के जवाब में महीप ने आगे बढ़ कर जवाब दिया.

“ये स्लिप राम की शर्ट की जेब में थी. इस पर लिखा है ‘सपने जगाने और निर्ममता से तोड़ने के निमित्त—-“ इन्स्पेक्टर ने उस स्लिप पर लिखी इबारत को जोर से पढ़ कर कहा-

“अब तो मुझे साफ़-साफ़ यह प्यार में दिल टूटने का केस लग रहा है. स्लिप पर लिखी इबारत का कोई तो मतलब ज़रूर है. हमारी खोज में राम के साथी ही मदद कर सकते हैं.”इन्स्पेक्टर ने अपना फैसला सुना दिया.

महीप सोच में पड़ गया, क्या इंस्पेक्टर की बात सच हो सकती है. क्या राम किसी लड़की से प्यार करता था, कौन है वह? नेहा उसके साथ बातें ज़रूर करती थी, पर हम सब जानते थे, वह राम से मदद ले कर अपना फ़ायदा उठाती थी. उसे याद आया, कुछ घंटों पूर्व एक्जामिनेशन हॉळ से बाहर निकलते राम से कुछेक साथियों के साथ महीप ने परिहास किया था-

“राम, तुझे तो अपना रिजल्ट पहले ही पता है. सबसे ऊपर तेरा ही नाम होगा. डर तो हमें है, ना जाने किस नंबर पर आएँगे.” महीप ने हंस कर कहा था.

“वैसे इंजीनियरिंग के बाद मास्टर्स तो करेगा ही या नौकरी की सोच रहा है?”यशपाल ने जानना चाहा.

“सोचता हूँ, आई ए एस यानी प्रशासनिक सेवा की तैयारी करूं.”कुछ संकोच से राम ने कहा था.

“कमाल है यार, तू तो कम्प्यूटर का जीनियस है, तुझे तो उसी में मास्टर्स करना चाहिए.” महीप ने कहा.

“शुक्रिया, पर मुझे किसी ने प्रशासनिक सेवा के लाभ बताए हैं.”हलकी मुस्कान के साथ राम बोला.

“चल तेरा सपना पूरा हो, अब कल शाम की पार्टी में मिलते हैं.”सबने हंसते हुए राम से विदा ली.

कॉलेज के सिक्यूरिटी गार्ड ने बताया

“राम भैया जब ऊपर जाने लगे तो मै ने पूछा था-

“भैया जी, पार्टी तो सामने हॉळ में हो रही है, आप ऊपर क्यों जा रहे हैं?’

“एक किताब छूट गई है, लेने जा रहा हूँ”

“ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ सुनी तो तुरंत मदद के लिए भागा, पर वह तो जा चुके थे. बहुत अच्छे थे राम भैया. ना जाने कौन सा दुःख ऐसे ले गया. अपनी बूढ़ी माँ का भी ध्यान नहीं रहा.” गार्ड का कंठ भर आया था.

“उसे मार दिया.” नेहा जैसे अपने आपसे बोल रही थी.

“क्या कह रही है, नेहा, किसने उसे मारा?”पास खडी आशा ने पूछा.

“कुछ नहीं, नेहा नर्वस हो रही है, अपने को सम्हाल नेहा. उसे किसी ने नहीं मारा, उसने खुद सुसाइड किया है.”शशि ने नेहा का हाथ दबा कर चुप रहने का संकेत दिया.

मृत राम को हॉस्पिटळ ले जाने के लिए एम्बुलेंस आ गई थी, उसके साथियों द्वारा यही उसकी अंतिम विदाई थी. सबकी आँखें नम थीं. राम के साथ जाने के लिए महीप और यशपाल के साथ कुछ और साथी एम्बुलेंस में चढ़ने लगे. प्रिंसिपल और प्रोफ़ेसर्स कॉलेज-वैन में जारहे थे.

“मै भी राम के साथ जाऊंगी.” नेहा ने एम्बुलेंस की तरफ कदम बढाए.

“मुझे जाने दे, शशि..”नेहा जैसे अपने से बात कर रही थी.

“अब यहाँ कुछ शेष नहीं है, हमें चलना चाहिए.”नेहा का हाथ पकड़ शशि उसे जबरन खींचती ले गई.

अपने कमरे में पहुंची नेहा जैसे विक्षिप्त सी बोलती गई.

“आज उससे ना जाने क्या कुछ नहीं कह डाला. वह निर्वाक- विस्मित ताकता रह गया. राख- पुते चहरे के साथ उसे खडा छोड़ आई थी. मै अपराधिन हूँ.”बात कहती नेहा की आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ आया.

“अभी तू होश में नहीं है, तूने ऐसा कुछ नहीं किया, नेहा. भला अपने साथी की कही गई कोई बात किसी को सुसाइड करने को विवश कर सकती है? साथियों के बीच नोक-झोंक तो चलती ही रहती है. राम के साथ कुछ और बात रही होगी, जिसकी वजह से वह सुसाइड करने को विवश था. कुछ देर सो ले, हम बाद में बातें करेंगे. चल मै तेरा माथा सहलाती हूँ, नींद आ जाएगी.”शशि ने नेहा को समझाना चाहा था.

“आज जो हमेशा के लिए सो गया, उसके बाद क्या मै सो सकूंगी. जानती है शशि, अभी वह जिस ब्लू जींस और सफ़ेद टी शर्ट में गया है, वो उसे मै ने उसकी बर्थ डै पर गिफ्ट की थी. उसने कहा था वह उसे किसी स्पेशल अवसर पर पहिनेगा. आज वो स्पेशल दिन था.”आंसू लगातार बह रहे थे.

“क्या राम के साथ तेरा कोई अफेयर चल रहा था? मुझे पूरी बात बता तेरा मन हल्का हो जाएगा. अब एक बात सच-सच बता, तूने ऐसा क्यों कहा था कि तूने उसे मार डाला? अगर उस समय कुछ और कह डालती या तुझे एम्बुलेंस में जाने से मैने रोका ना होता तो अभी तू थाने में पुलिस वालों के सवालों का जवाब दे रही होती, अंजाम तो समझ ही सकती है.”शशि ने गंभीरता से कहा.

“मेरे लिए वही दंड ठीक होता. उसे हराने की जिद थी, पर आज वो जीत कर चला गया मै हार गई. मुझे मरना है, मै मर जाऊंगी.” पागल सी नेहा बोले जा रही थी.

“तेरी बातें समझ में नहीं आरही हैं, जानती हूँ, तेरे पीछे लड़के दीवाने रहते हैं,पर उन्हें मूर्ख बनाने में ही तू मजा लेती रही है, आज राम के सुसाइड करने पर तू क्यों ऎसी बहकी-बहकी बातें कर रही है. ये क्या स्लीपिंग पिल्स क्यों लेना चाह रही है, कुछ देर आँखें मूँद कर लेटी रह, नीद आ जाएगी.

नेहा के हाथ में स्लीपिंग पिल्स की बोतल देख, शशि ने बोतल नेहा के हाथ से छीन ली.

“नहीं मुझे नींद नहीं आएगी, प्लीज मुझे लेने दे.”

“पागल हो गई है, ले एक गोली खा ले तेरी नींद के लिए इतनी डोज़ ही काफी है. अभी तू राम की आत्मह्त्या के कारण परेशान है, कल सवेरे बात करेंगे.”पानी के साथ शशि ने नेहा को पिल खिला कर कडाई से कहा.

नेहा को जबरन बेड पर लिटा कर शशि भी लेट गई, पर उस शाम के हादसे को भुला पाना उसे भी आसान नहीं था. सबकी मदद करने वाला राम, सबके स्नेह का पात्र था, उसे भुलाना शशि को ही नहीं किसी को भी आसान नहीं होगा. राम की शर्ट की जेब से निकली उस इबारत का क्या अर्थ था, क्या राम किसी लड़की को चाहता था? नेहा जो कह रही है, क्या उसमें कुछ सच्चाई हो सकती है, क्या नेहा वो लड़की हो सकती है? नहीं, नेहा जैसी अभिमानी लड़की के सपने तो आकाश छूते हैं. वैसे भी उसकी शादी की बात तो लन्दन में पोस्टेड आई एफ़ एस संजय के साथ हो रही है. राम उसके सपनों में कैसे आ सकता है. इसी उधेड़बुन में उलझी शशि न जाने कब सो गई.

तकिए में मुंह गडाए नेहा की आँखों से बह रहे आंसुओं से तकिया भीग रहा था. कॉलेज के पहले दिन से लेकर आज तक की बातें एक-एक कर के चलचित्र की तरह से मानस में उभरती आ रही थीं. क्यों ऐसा पागलपन सवार था उस पर, कैसे उन बातों को भुला पाएगी. चुन्नी मुंह में दबाए नेहा अपनी सिसकियों को इस डर से दबा रही थी, कहीं शशि ना जाग जाए. काश वह भी आज हमेशा के लिए सो सकती. उसे राम से प्यार हो गया था, पर हमेशा अपने को झुठलाती रही, नहीं ऐसा नहीं हो सकता. नेहा की बातों से अब तो राम को भी अपने प्रति उसके प्यार का विश्वास हो गया था. काश हंसी-हंसी में आज राम से मज़ाक न कर उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता, उससे अपने मन की सच बात कह दी होती, राम को अपने और उसके बीच प्यार पर पूरा यकीन था इसीलिए तो उसने उसे रोज़ गार्डेन में बुलाया था. नेहा समझ गई थी,थी आज वह अपने मौन प्यार को शब्द देने वाला था, पर नेहा तू ये कैसी भूल कर बैठी.

वो कॉलेज का पहला दिन था. इस कॉलेज में आते ही शशि को यहाँ देख कर वह खुश हो गई थी. वो दोनो इंटरमीडिट के बाद अलग होगई थीं. शशि भले ही अभिन्न सहेली नहीं रही थी, पर नए कॉलेज में पुरानी परिचिता मिल जाना अच्छा लगा था. बड़े स्नेह के साथ शशि नेहा को डिपार्टमेंट के साथियों से मिलाने ले गई थी. शशि, के साथ नेहा को आते देख कर सारे लड़के उसका परिचय जानने को नेहा के चारों ओर घिर आए थे, पर सफ़ेद कमीज़-पैन्ट वाला वह लड़का सारे शोरगुल से उदासीन कम्प्यूटर में आँखें गडाए बैठा था.शुरू से नेहा ने अपनी सुन्दरता पर लड़कों को आहें भरते देखा था. कोई नेहा की उपस्थिति को यूं नकार दे, उसके लिए यह नया अनुभव था. उसकी उदासीनता नेहा को अपना अपमान लगा था.”नेहा की सिसकी से शशि ने करवट बदल कर पूछा-

“क्या अभी तक सोई नहीं, नेहा? तेरा सिर सहला दूं, नींद आ जाएगी.”

“नहीं, मै ठीक हूँ, तू सो जा.” अपने की भरसक संयत कर नेहा ने धीमे से कहा..

कुछ ही देर में शशि सो गई और नेहा की विचार- श्रंखळा फिर आगे की तस्वीरें देखने लगी. उस युवक के पास जा कर पूछा था- “ क्या आपको मेरा परिचय नहीं चाहिए?”

“जितना सुना, काफी है.”लैप टॉप से नज़र उठाए बिना उसका जवाब मिला था.

“आपके यहाँ अगर कोई नया मेहमान आए तो क्या उसका ऐसे ही स्वागत करते हैं?”

“यह तो मेहमान पर निर्भर करता है. क्लास में नए-पुराने सब साथी होते हैं, मेहमान नहीं.”

“अपरिचय से मेरी मित्रता है. परिचय बढ़ाने की चाह नहीं, प्लीज़ नुझे डिस्टर्ब मत कीजिए, मुझे कुछ ज़रूरी काम पूरा करना है” कुछेक पलों को नेहा पर नज़र डाल फिर उसने कम्प्यूटर में सिर गड़ा लिया.

“कमाल है, आपकी नई साथिन हूँ, क्या मेरे लिए एक मिनट का समय भी नहीं दे सकते?” उसके रूखे व्यवहार से चिढ कर नेहा जिद पर उतर आई थी. अपमान से पागल हो गई थी.

“आपसे कहा ना, एक ज़रूरी काम कर रहा हूं, इस काम को पूरा करना, आपसे परिचय करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण बात है. वैसे भी बाहर बहुत से साथी आपका इंतज़ार कर रहे हैं, प्लीज़ अब आप मुझे अपना काम करने दीजिए, यहाँ खडी हो कर मुझे डिस्टर्ब मत कीजिए और यहाँ से चली जाइए.”राम ने कड़ी आवाज़ में कहा था.”

अपने उस अपमान –अवज्ञा ने नेहा को तिलमिला दिया. मुख्य मंत्री के चीफ सेक्रेटरी की इकलौती सुन्दर बेटी से उसके माँ-पापा तक ने कभी ऊंची आवाज़ में बात नही की है, क्या समझता है ये अपने को, एक दिन इसका गर्व चूर-चूर ना किया तो मेरा नाम नेहा नहीं. मन ही मन में प्रतिज्ञा कर डाली थी. उसके जिद्दी स्वभाव को घर-बाहर सब जानते थे, हमेशा जो निश्चय किया पूरा कर के ही चैन लिया. राम को घमंडी कहने पर शशि ने समझाया भी था-

“नेहा, राम घमंडी नहीं बल्कि उसकी परिस्थितियों ने उसे गंभीर बना दिया है. वह ज़रूर हेड का कोई कोई महत्वपूर्ण काम कर रहा होगा, सारे प्रोफ़ेसर और सब साथी उसे प्यार करते हैं, वह सबका साथी है, पर किसी का भी घनिष्ठ मित्र नहीं. कभी किसी लड़की को लड़की की तरह देखा ही नहीं, उसके उदार और विशाल ह्रदय में हम सब उसके साथी हैं, वह ना किसी का दोस्त है ना ही किसी का दुश्मन”

“अरे तू इन लड़कों को नहीं जानती. अपने को सबसे अलग दिखा कर हीरो बनना चाहते हैं. मैने न जाने कितने राम जैसे लड़कों को अपने पैरों पर झुकाया है, एक दिन इसे अपने पीछे पागल ना बनाया तो मेरा नाम नेहा नहीं.”क्रोध में नेहा ने प्रतिज्ञा कर डाली.

“तू हार जाएगी, नेहा. मेरी बात मान, राम एक सच्चा, मेधावी, सरल ह्रदय वाला स्नेही युवक है. सबकी सहायता करने में वह प्रसन्नता का अनुभव करता है, बदले में कोई चाह नहीं रखता. वह दूसरों से बहुत अलग है, इसीलिए सब उसे प्यार करते हैं. तू खुद देख लेगी, हेड उस पर कितना विश्वास रखते हैं,. प्लीज राम को हराने की जिद मत कर वरना पछताएगी.”

काश शशि की बात समझ पाती, पर नेहा पर तो अपने अपमान का बदला लेने का जुनून सवार था. कोई उसका ऐसे अपमान कर सकता था, इस बारे में तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी. दो-तीन दिन बाद फिर राम के पास गई थी, क्लास में वह हमेशा अकेला ही बैठता था,. उसके पास खाली जगह देख कर पूछा था,

“आपके पास बैठ सकती हूँ?”

“अगर कहीं और जगह नहीं है तो बैठ जाइए.” इतना कह कर, अपना लैप टॉप उठा कर वह दूसरी बेंच पर चला गया.

“अरे वाह, मेनका का जादू भी हमारे विश्वामित्र पर नहीं चला.”मोहनीश के रिमार्क पर पूरा क्लास हंस पडा .अपमान से नेहा का गोरा रंग लाल हो गया.

लड़कों की धीमी हँसी से तिलमिला उठी थी, ऐसा अपमान कैसे सह सकूंगी. नहीं उसे इस अपमान का बदला चुकाना ही होगा. उसे नीचा दिखाने की उसी दिन दूसरी बार फिर प्रतिज्ञा कर डाली. इस विश्वामित्र को अपने पैरों पर ना झुकाया तो मेरा नाम नेहा नहीं. क्या उसके लिए मेरी वो नफरत थी या प्यार की पहल? उसके पहले किसी ने उसकी ऐसी अवहेलना नहीं की थी. तुमने ऐसा क्यों किया, राम? नेहा की सिसकियाँ फिर तेज़ हो गईं.

“अगर तुझे एक और स्लीपिंग पिल लेनी है तो देती हूँ, पर इतना रोने की वजह ज़रूर बतानी होगी.’

शशि उठ कर बैठ गई.

“माफ़ कर दे, शशि. कुछ देर को बाहर खुली हवा में जा रही हूँ, यहाँ घबराहट हो रही है.”

“आर यूं श्योर, अकेली बाहर जा सकेगी ? तू कहे तो मै भी तेरे साथ चलती हूँ”शशि ने कहा.

“डोंट वरी, मै ठीक हूँ. तू सो जा, सॉरी, तेरी नींद खराब कर दी.”धीमे से कह कर वह बाहर चली गई.

कमरे से बाहर आई नेहा जैसे खुली आँखों से सारी तस्वीरें देखने लगी. वह अपने पूर्व अनुभव से जानती थी, राम को अपने पैरों पर झुकाने के लिए उसके अहं को बढ़ावा देकर, उसके अन्दर के सोए पुरुष को जगाना आवश्यक था. उसे याद हैं, राम को आकृष्ट करने के उपाय उसने किस तरह से शुरू किए थे. पहले भोलेपन से उससे क्षमा मागी थी-

“माफ़ कीजिएगा, आपको अनजाने ही डिस्टर्ब करती रही. असल में मै आपकी तरह कम्प्यूटर की प्रोजेक्ट और प्रेजेंटेशन में अच्छी नहीं हूँ सोचा आपकी हेल्प से काम जल्दी कर सकूंगी, आप जीनियस जो ठहरे,”

“मै कोई जीनियस नहीं आपका साथी हूँ, आपको जब भी मेरी हेल्प चाहिए ज़रूर करूंगा, साथी होने की वजह से ये तो मेरा फ़र्ज़ है.” गंभीरता से राम ने कहा था.

नेहा की बातों पर विश्वास कर, उदार राम नेहा को हिम्मत रखने और मेहनत करने को उत्साहित करता. नेहा जानती थी, उसकी कमजोरी से राम को सहानुभूति होती, उसका पुरुषोचित अहं नेहा की मदद कर के संतुष्ट होता था. नेहा जानती थी, किसी लड़की द्वारा की गई प्रशंसा पुरुष के अहं को तुष्ट करती है. इसीलिए उसकी हर बात को मुग्ध भाव से सराहती.

“जानते हो, राम, मुझे सफ़ेद रंग पसंद नहीं था, पर अब मुझे सफ़ेद रंग से प्यार हो गया है. तुम्हारे व्यक्तित्व से इन सफ़ेद कपड़ों का मूल्य बढ़ जाता है.”

ये तो बाद में शशि से पता चला था, पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसकी माँ ने बड़ी कठिनाइयों से उसे पाला है. उसके पास बस दो या तीन जोडी सफ़ेद कपडे ही थे, जिनसे उसके कपड़ों की गिनती नहीं हो सकती है. एक पल को नेहा के सामने सफ़ेद परिधान में तेजस्वी राम जैसे साकार हो आया.

“मुझे माफ़ कर दो, राम.” नेहा रो रही थी.

नेहा को याद आया, सेमेस्टर के बाद कॉलेज पिकनिक पर वह नहीं गई थी. उसे पता था, राम ऐसे कार्यक्रमों में नहीं जाता था. उस दिन उसके अंकल उससे मिलने आने वाले थे, पर लाइब्रेरी में बैठे राम से यही कहा था,

“सब साथी पिकनिक के लिए गए हैं, पर मुझे पिकनिक में जाने वालों के साथ जाना पसंद नहीं था, अगर तुम जाते तो ज़रूर जाती “उस दिन पहली बार राम ने गंभीरता से कहा था-

“मै तुम्हारी मित्रता के योग्य नहीं हूँ, तुम्हारे साथ मित्रता के लिए दूसरे बहुत से योग्य लड़के उत्सुक हैं.”

ये बात क्या नेहा से छिपी थी, पर राम से यही कहा था,

“जिन लड़कों से मेरी मित्रता की बात तुम कर रहे हो, उनके लिए लड़की से मित्रता और उससे लाभ उठाना बस खेल होता है. कोई भी समझदार लड़की एक ऐसा जीवन साथी चाहती है, जो सच्चा और गंभीर हो, अपनी मेधा के बल पर आकाशीय ऊंचाइयां छू सके. जिसके पास धन ना हो, पर प्यार की अगाध संपत्ति हो.” हाय, इतना बड़ा झूठ कैसे आसानी से बोल गई थी.सिसकियाँ तेज़ हो गई थीं.

“ऎसी बातें सिर्फ किताबों में या फिल्मों में होती हैं, वास्तविक जीवन में लडकियां ऊंचे पद वाला धनी जीवन साथी ही चाहती हैं.”राम ने अपने अनुभव से कहा.

“शायद तुम्हारा किसी ऎसी लड़की के साथ इस तरह का अनुभव रहा हो, पर मेरी सोच दूसरी है. एक बात कहना चाह रही हूँ, जब से तुमसे मिली हूँ मुझे ऐसा लगता है, तुम जैसा ही कोई मेरा स्वप्न-पुरुष हो सकता है. तुम सबसे कितने अलग हो.”

काश उससे ऐसा कहते समझ पाती कि उसका वो झूठ एक दिन सच बन जाएगा. उस दिन के बाद से राम की नज़रें कुछ बोलने लगी थीं, राम नेहा के साथ सहज हो चला था. नेहा भी राम के सानिध्य में अपने को बहुत सुरक्षित महसूस करती थी. अभी तक उसे अपने आसपास मंडराने वाले युवकों का ही अनुभव था जो उसके सौन्दर्य के दीवाने होते. उसे खुश करने के तरीके अपनाते, पर राम उन सबसे कितना अलग था. नेहा की मदद करते समय उसकी मेधा नेहा को मुग्ध कर जाती, कितनी आसानी से वह बड़ी से बड़ी समस्या का कुछ क्षणों में समाधान कर जाता.सच्चे दिल से वह नेहा की सहायता करता.नेहा को एक सफल विद्यार्थी के रूप में आगे बढ़ने को उत्साहित करता.

नेहा राम के साथ बैठने लगी थी. साथियों के व्यंग्य उन्हें परेशान नहीं करते. कोई भी समस्या आने पर राम की मदद से नेहा आसानी से समस्या का समाधान कर लेती. राम नेहा की सहायता करके साथी होने का फ़र्ज़ सच्चे दिल से निभाता था. राम के साथ समय व्यतीत करना नेहा को अच्छा लगने लगा था. भविष्य के सपने देखने की जगह यथार्थ की कठोर भूमि पर जीते हुए, आत्मविश्वास से चमकता उसका चेहरा नेहा को मुग्ध कर जाता उसकी मेधा नेहा को विस्मित करती.वह भूल गई इसी राम ने कभी उसकी अवज्ञा की थी, और नेहा ने उस अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी.

राम का साथ नेहा को प्रिय लगता. वह जानती थी साथ के बहुत से युवक उसके साथ मित्रता करने के कई तरह के तरीके आजमाते,पर अब नेहा को जैसे किसी की ज़रुरत ही नहीं रह गई थी. राम के निश्छल स्वभाव के पारस ने जैसे नेहा को बदल दिया था. नेहा स्वयं अपने इस परिवर्तन को लक्ष्य कहाँ कर सकी थी? खाली समय में दोनों अपने अनुभव शेयर करते. कभी- कभी अपने बचपन की शैतानियाँ सुनाता राम जैसे बच्चा बन जाता. उसकी बातें नेहा को हंसा जातीं. राम का दुखद अतीत सुनती नेहा की आँखें भर आतीं. राम की वृद्धा माँ गाँव में अपने भाई के साथ रहती थी. अपनी माँ को सुखी बनाना राम का संकल्प था. नेहा सोचती, उतने कष्टों में राम कैसे इतना मेधावी बन सका.

“राम अगर तुम्हारी जगह मै होती तो परिस्थितियों के आगे हार मान जाती और कुछ नहीं कर पाती.”

“नहीं ऐसा कभी नहीं होता वरना हम दोनों कैसे मिल पाते?”राम ने पहली बार मज़ाक किया.

“अच्छा तो जनाब मज़ाक भी कर सकते हैं.”नेहा हंस रही थी.

अब दोनों जैसे एक- दूसरे के पूरक जैसे बन गए थे. कॉलेज खत्म होने के बाद अक्सर पास के पार्क में कुछ देर के लिए रुक जाते. नेहा के आग्रह के बावजूद राम ने कभी रेस्तरा में जाने की उसकी कोई बात स्वीकार नहीं की. अपनी वास्तविकता से वह परिचित था. ट्यूशन और स्कॉलरशिप के पैसे वह ऐसे शौक पर खर्च नहीं कर सकता था.

एक दिन अचानक पार्क से बाहर आते हुए नेहा का पैर एक पत्थर पर पड़ गया. नेहा का पैर मुड़ गया दर्द से नेहा की आँखों से आंसू बह निकले. राम व्याकुल हो उठा. नेहा को खडा कर पाना कठिन था बिना कुछ सोचे राम नेहा को गोद में उठा पास की डिस्पेंसरी में भागता सा ले गया..

नेहा के पैर को एक्जामिन कर डॉक्टर ने एक पेन किलर टैबलेट और मरहम दे कर क्रेप बैंडेज पैर पर लपेट कर कहा-

“घबराने की कोई बात नहीं है, मामूली मोच है, दो दिन में ठीक हो जाएगी. आप अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते हैं इसीलिए डर गए. आप लकी हैं, मैडम.”

“ओह ,नहीं डॉक्टर आप गलत समझ रहे हैं –“राम ने सच्चाई बताने की कोशिश की.

“इट्स ओ. के.मै समझता हूँ. हैव अ नाइस टाइम.” डॉक्टर चले गए’

दूसरे दिन कॉलेज में नेहा की अनुपस्थिति का समय काट पाना राम को कठिन लग रहा था वह समझ नहीं पारहा था उसे क्यों ऎसी बेचैनी हो रही थी. बहुत सोचने के बाद जो समझ सका वह असंभव ही था.

वापिस आई नेहा को देख राम खिल उठा, अपनी सोच का जवाब उसे नेहा से ही लेना होगा.

“कैसी हो नेहा, अब दर्द तो नहीं है?”राम की आवाज़ में कंसर्न था.

“थैंक्स राम, तुम्हारी कृपा से लंगडी होने से बच गई वरना मेरी शादी भी नहीं हो पाती,”

“ऐसा क्यों कहती हो, अगर तुम्हें कोई सच्चा प्यार करने वाला इंसान मिले जिस के पास सिर्फ मेधा और योग्यता जिसे तुम्हारे अलावा हो और कुछ नहीं चाहिए तो?”राम ने सवाल किया.

”तो उसे ही अपना जीवन साथी बनाना चाहूंगी. “उसकी बात अधूरी काट कर जवाब दिया था.

“ठीक है, तुम्हारी इच्छा पूरी होने में कोई बाधा कहाँ है, जो चाहोगी मिलेगा.”राम मुस्कुराया था..

राम कम्प्यूटर विभाग से एम् एस कर के प्रोफ़ेसर बनना चाहता था. हेड उसे कम्प्यूटर का जीनियस कहते थे, पर नेहा ने उसे प्रशासनिक सेवा में जाने की सलाह दी थी. उससे कहा था,

“असल में राम तुम जैसे इंटेलिजेंट और ईमानदार इंसान प्रशासनिक सेवा में जा कर समाज में सुधार ला सकते हैं,”अपने मन की बात नेहा ने कही थी.

“तुम मेरे बारे में ऐसा सोचती हो, नेहा? सच कहूं तो अब भी यकीन नहीं होता तुम जैसी लड़की मुझ जैसे साधारण इंसान को इतना महान बना सकती है. डरता हूँ कहीं ये सपना टूट ना जाए. अपनी ज़िन्दगी की सच्चाई जानता हू.”राम गंभीर था.

“तुम्हें नहीं पता तुम क्या हो, तुम किसी भी लड़की का सपना हो सकते हो.” अपनी कही इस बात को याद करती नेहा की आँखों से बहते आंसुओं की बाढ़ ने पूरी चुन्नी भिगो दी

“मुझ पर इतना भरोसा है, नेहा. सच अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं होता. तुम्हारा सपना पूरा करना ही अब मेरे जीवन का लक्ष्य है.कभी मेरा साथ तो नहीं छोडोगी, नेहा?”प्यार भारी नज़र से राम ने पूछा.

“कभी नहीं, तुम्हारे साथ अपने को पहिचान सकी हूँ, राम.” नेहा ने दृढ़ता से कहा.

एक्जामिनेशन हॉल से बाहर आ कर राम ने कहा था-

“कल ग्रैंड पार्टी की शाम है, वैसे तो मै ऎसी पार्टीज़ में नहीं जाता, पर कल स्पेशल दिन है, पार्टी में ज़रूर आऊँगा. पार्टी के पहले क्या कल शाम चार बजे हम रोज़ गार्डेन में मिल सकते हैं, नेहा?”

“क्यों क्या कोई ख़ास बात है, पार्टी में तो मिलेंगे ही.”नेहा ने बन कर कहा.

“हाँ एक सरप्राइज़ देना है, आओगी ना?”विश्वास से राम ने पूछा.

“तब तो आना ही पडेगा, तुम्हारा सरप्राइज़ जो लेना है.”मुस्कुरा कर उससे विदा ली थी.

.पिछले कुछ दिनों से राम उससे कुछ कहना चाहता था. वैसे दोनों ही संकेतों में आजीवन साथ निभाने की बातें करते थे. नेहा समझ गई आज राम उसे प्रोपोज करने वाला था. यही उसका सरप्राइज होगा.नेहा को याद नहीं जिस राम को अपमानित करने का उसने निश्चय किया था, कब अनजाने ही उस राम की तीव्र मेधा, सादगी और सच्चाई के मोहपाश में बंध चुकी थी. अब वह जान चुकी थी कि उसे राम से प्यार होगया था. राम जैसा मेधावी और सच्चा प्यार करने वाला जीवन साथी मिलना सौभाग्य ही था.

अचानक मुस्कुराती नेहा के दिमाग में एक मजाकिया ख्याल आगया. जनाब ने कॉलेज के शुरू के दिनों में नेहा को बहुत सताया है, आज उसे परेशान करने का मौक़ा है. उससे कहूंगी मै उसे प्यार नहीं करती. उसे धोखा हुआ है. शाम की पार्टी में उसे सच्चाई बताऊंगी कि गार्डेन में उससे जो बातें कहीं वो सब झूठी बातें थीं. वो तो मेरा मज़ाक था. सच्चाई तो कुछ और है, तुम मेरा प्यार हो, राम. मेरी सच्चाई जान कर राम का चेहरा खिल उठेगा. अपने मज़ाक की कल्पना से नेहा के चेहरे पर शरारती मुस्कान आगई.

काश वह राम के बुलाने पर ना गई होती. उसे बता सकती उसका वो मज़ाक एक झूठ था.राम कितनी उत्सुकता से उसका इंतज़ार कर रहा था.”नेहा सुबक रही थी.

गार्डेन में राम नेहा का इंतज़ार कर रहा था. नेहा की गिफ्ट की गई जींस और टी शर्ट में उसका व्यक्तित्व सचमुच निखर आया था. हाथ में सुर्ख लाल गुलाब के साथ उसके चेहरे पर खुशी की चमक थी.

“तुम्हारे इंतज़ार में एक-एक पल भारी लग रहा था, नेहा. ये गुलाब इसका साक्षी है.”राम ने कहा था.

“अब बताओ, मेरे लिए क्या सरप्राइज़ है, कहीं तुम्हारा ये नया परिधान ही तो मेरे लिए सरप्राइज़ नहीं है?” नेहा ने परिहास किया.

“आज तक मेरे दिल में जो बात कैद थी, तुमसे कहना चाह रहा हूँ, आज का यही सरप्राइज़ है” राम की आवाज़ में खुशी थी.

“ऎसी कौन सी बात है, जिसे इतने दिनों तक बोझ की तरह ढोते रहे?”

“बोझ नहीं अपनी अनमोल निधि की तरह छिपाए रखा है. एक वादा करना होगा, मै जो मांगूं उसका जवाब हाँ में दोगी.”वह मुस्कुरा रहा था.

“बिना बात जाने वादा करना मेरी आदत नहीं है. तुम बात बताओ, उसके बाद जवाब दूंगी.” कैसा जवाब दिया था नेहा ने, जो उसे मौत की तरफ ले गया.

“अपने हाथ का गुलाब नेहा को पकड़ा कर मुस्कुराते राम ने कहा था-

”नेहा, हम दोनों एक-दूसरे के इतने करीब आ चुके हैं कि अब हमें विवाह का फैसला कर लेना चाहिए. मेरा वादा है, जब तक प्रशासनिक सेवा में सफल नहीं हो जाता हमारा विवाह स्थगित रहेगा. इस बार एक्जाम दे रहा हूँ, मुझे विश्वास है मै सफल रहूँगा. तुम मुझे इसी रूप में तो देखना चाहती थीं ना?.”

बहुत प्यार और विश्वास से राम ने कहा था.

“क्या, कह रहे हो, मेरे साथ विवाह के बारे में तुम सोच भी कैसे सकते हो. तुमसे दो मीठे शब्द क्या बोल दिए तुम तो सचमुच आकाश का चाँद पाने की सोच बैठे.”नेहा ने अभिमान से कहा.

“ये क्या कह रही हो, नेहा? क्या तुमने मुझे अपने स्वप्न-पुरुष और जीवन साथी के रूप में नहीं देखा. हमेशा कहा तुम्हे मुझ जैसा मेधावी, प्यार करने वाला जीवन साथी चाहिए. तुम्हें पद या धन की चाह नहीं है. क्या वो बातें झूठ थीं या तुम्हारा धोखा था?”राम का स्वर बेहद आहत था.

“कैसा धोखा? धोखे में तो तुम हो. तुम जैसा स्वप्न-पुरुष या जीवन साथी कहने भर का मतलब तुमने अपने लिए कैसे समझ लिया? क्या कभी भूल कर भी तुमसे कहा कि तुम ही मेरे स्वप्न पुरुष हो, तुम्हे अपना जीवन साथी मानती हूँ?तुम इतने बड़े धोखे के शिकार कैसे हो गए” राम के उतरे चहरे का मज़ा लेती नेहा ने कहा था. ‘

“नेहा, मुझे तुम्हारी हर बात में अपने लिए प्यार दीखता था.क्या तुमने ये नहीं कहा मै किसी भी लड़की का सपना हो सकता हूँ. तुम्हें धन या पद की चाह नहीं- - -“राम ने दुखी स्वर में सच्चाई दोहराई.

“अक्सर सुनती आई हूँ लड़के किसी अमीर लड़की को अपने प्यार के जाल में फंसा रातों रात अमीर बनना चाहते हैं, कहीं तुमने भी तो यही नहीं सोचा था?”

“ये क्या कह रही हो, तुमने क्या मुझे इतना ही जाना है? क्या धन के लोभ से तुम्हें चाहा है. धन तो मेरे लिए कोई महत्व् ही नहीं रखता, नेहा. मैने तुम्हें अपने से ज़्यादा प्यार किया है ,क्या इस सत्य को तुम नहीं पहिचान सकीं?”राम की आवाज़ जैसे किसी गहरे कुंए से आ रही थी.

“बस अब बहुत हो गया. एक बात और तुम्हें अपना दोस्त माना था, ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. अब इस दोस्ती के नाम पर मेरे बारे में कोई स्कैडल मत फैलाना. वर्ना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा, आज की पार्टी में मेरे आस-पास भी मत दिखाई देना.” हाथ में पकड़ा गुलाब ज़मीन पर फ़ेंक नेहा गर्व से मुस्कुराती वापिस चल दी.

राम के विस्मित स्तब्ध चेहरे को नेहा जान गई राम उसे कितना प्यार करता है. उसकी झूठी बातों को सच मान वह किस कदर दुखी हो गया था. राम को अपने मज़ाक से उतना दुखी होता देख खुशी से वापिस आई थी.अपनी बातों का मज़ा लेती नेहा सोच रही थी शायद वह कुछ ज़्यादा ही बोल गई. वैसे उसे यकीन है पार्टी नें वह राम को सच्चाई बता कर मना लेगी.वह राम को प्यार करती है ये बात सुन कर राम कितना खुश हो जाएगा.रोती नेहा की हिचकियाँ सुन शशि बाहर आगई.

“क्या बात है, नेहा इतनी देर से तेरा रोना सुन रही हूँ. सच-सच बता आखिर बात क्या है. कहीं उसके साथ सच में तेरा अफेयर तो नहीं था? सबको ये देख कर ताज्जुब ज़रूर होता था कि राम जो किसी लड़की से बात भी नहीं करता था तेरे साथ काफी सहज होगया था.”

“मै अपराधिन हूँ. मैने उसे मार दिया.”नेहा फिर रो पड़ी

“ये क्या कह रही है, तू उसे कैसे मार सकती है. देख नेहा, मै तेरी सहेली हूँ, कोई गलती करने पर रोने से कोई लाभ नहीं होता. मुझे सच बात बता, तेरा मन हल्का हो जाएगा” प्यार से शशि ने नेहा से कहा’

“पार्टी वाले दिन राम ने पार्टी के पहले मुझे रोज़ गार्डेन में बुलाया था.क्यों गई वहां?अगर ना जाती तो वह इंतज़ार ही करता, दुनिया से तो ना जाता.”नेहा रो पड़ी.

“क्या कह रही है, क्या हुआ था गार्डेन में?”शशि जानने को व्याकुल हो उठी.

आंसू पोंछ टूटे फूटे शब्दों में रुक-रुक कर नेहा कहती गई. बीच-बीच में आंसुओं का सैलाब .उमड़ आता.

“इसका साफ़ मतलब है तू अपनी आदत के अनुसार उसे धोखा दे रही थी. जानती हूँ, इस तरह के खेल तो तू काफी पहले से खेलती आई है. याद आया, तूने राम को अपने पैरों पर झुकाने उसे हराने की प्रतिज्ञा की थी. आज तेरी प्रतिज्ञा पूरी हो गई. अब अपनी जीत की खुशी मना.तुझे समझाया था पर भला तू कब किसी की सुनने वाली है.”शशि ने कडाई से कहा.

“नहीं. मैने उसे धोखा नही दिया. मैने राम को सच्चा प्यार किया था, जान गई थी, राम के बिना जीवन संभव नहीं था. राम ने मुझसे सच्चा प्यार किया था और मैने मज़ाक-मज़ाक में उसके सपने तोड़ दिए. कभी उसे हराने की जिद थी ,पर में खुद हार बैठी.”नेहा ने आंसुओं से भीगी चुन्नी से बहते आंसूं पोंछे.

“तेरी बनावटी और झूठी बातों के बहकावे में मै नहीं आने वाली हूँ. तुझ जैसी अभिमानी लड़कों को उँगलियों पर नचाने वाली लड़की, उस सीधे सादे राम से प्यार कर ही नहीं सकती, तूने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के निमित्त उसकी जान ले ली. तू अपराधिन नहीं,पापिन है.”शशि के शब्दों में घृणा थी.

“ये सच नहीं है, मुझे नहीं पता था, वह मेरी मज़ाक में कही बातें सच मान लेगा. क्या उसे मेरे प्यार पर इतना ही विश्वास था, कितनी बड़ी गलती कर बैठी, आज समझ रही हूँ, मैने अपना प्यार अपनी ज़िंदगी खो दी .“नेहा की आँखों से आंसू बाँध तोड़ बह रहे थे.

“बस अब तेरा एक शब्द भी सहन नहीं कर सकती. तू लड़की के नाम पर कलंक है. तेरे बारे में पहले से जानी- सुनी बातें जानती हूँ, तूने न जाने कितनी बार ऐसे खेल खेले हैं. कितनों का दिल तोड़ा है. लड़कों को मूर्ख बनाना तेरी हॉबी रही है. राम कितने कोमल दिल का सीधा- सच्चा इंसान था, तेरी बातों ने उसे पूरी तरह से तोड़ दिया. तू हत्यारिन है.” नफरत भरे शब्दों में शशि चीख सी पड़ी,

“नहीं, राम के साथ मैने कोई खेल नहीं खेला, मेरा विश्वास कर शशि, राम को सच्चे मन से चाहा था,”

“मै तेरी झूठी बातों में नहीं आने वाली हूँ. तूने एक सच्चे इंसान राम की ही नहीं, सच्चे प्यार की भी ह्त्या की है. भगवान् करे तू पूरी ज़िंदगी प्यार के लिए तरसे, तुझे किसी का प्यार ना मिले. समझ नहीं पा रही हूँ, तेरा क्या हश्र कर डालूं, पुलिस के हवाले करने से तेरे पापा तुझे छुडा ले जाएंगे. अपने अक्षम्य पाप पर तू ज़िंदगी भर तिळ-तिळ कर जलती रहे, मरती रहे, यही तेरी सज़ा होगी.” शशि चिल्ला रही थी आँखों से चिंगारियां निकल रही थीं.

“मुझे माफ़ कर दे शशि, राम मेरा प्यार था, अपने पागलपन में उसे खो बैठी “ हाथ जोड़ नेहा बोली थी.

“नहीं, राम ने भले ही तुझे माफ़ कर दिया हो, क्योंकि वह ऐसा ही था. जाते-जाते भी उसने तुझ पर और अपने सच्चे प्यार पर आंच भी नहीं आने दी, पर अब स्लिप पर लिखी इबारत का अर्थ साफ़-साफ़ समझ में आ रहा है, तूने उसे झूठे सपने दिखाए और निर्ममता से तोड़ दिए. तू उसकी आत्महत्या की निमित्त बनी है, नेहा. आज अपने से नफ़रत हो रही है, इतने दिनों तक तेरे साथ क्यों रही? भगवान् करे आज के बाद कभी तेरा चेहरा भी ना देखना पड़े.” फटाक से खुले कमरे का दरवाज़ा बंद कर, नेहा को बाहर ही छोड़, शशि कमरे में चली गई.

“नहीं-नहीं ये सच नहीं है, ये खेल नहीं था.”

अपनी दोनों हथेलियों में चेहरा ढापें सिसकियाँ लेती नेहा खाली ज़मीन पर ढेर हो गई.
 
प्रेम दीवानी

“मैडम, आपको कॉन्फ्रेंस में ले जाने के लिए कैब आ गई है.”

“ठीक है, मै आ रही हूँ.”मेज़ से अपना पर्स उठा नीता जी लिफ्ट से नीचे आ गई.

अमरीका के शिकागो नगर में आयोजित होने वाली अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित होने के लिए उसकी कम्पनी ने उन्हें भेजा था. फाइनेंस डाइरेक्टर नीता अपनी मेधा और दक्षता के कारण कम्पनी के चेयरमैन की फेवरिट थी. उसके सुझाव बहुत महत्वपूर्ण माने जाते थे.

ड्राइविंग सीट से उतरी एक सुन्दर युवती ने तत्परता से नीता के लिए कैब की पीछे वाली डोर खोल कर मीठी आवाज़ में ‘नमस्ते” कह कर नीता को चौंका दिया. डोर बंद कर ड्राइविंग सीट पर बैठ कर युवती ने टैक्सी स्टार्ट की थी. सड़क पर दौड़ती टैक्सी में कुछ देर के मौन के बाद नीता का विस्मय पूछ बैठा-

“आपसे नमस्ते सुन कर बहुत अच्छा लगा. क्या आप हिन्दी के कुछ और शब्द जानती हैं.?”

“कुछ शब्द नहीं, अच्छी हिन्दी जानती हूँ. दो साल तक उसने हिन्दी लिखना, पढ़ना और बोलना सब सिखाया था. उसके फादर जिन्हें वह अक्का कहता था, हिन्दी और संस्कृत के विद्वान हैं. उनसे मिलाने के पहले मुझे हिन्दी आना ज़रूरी समझता था.”आवाज़ में कुछ गर्व और उदासी का मिश्रण था.

“आप किसकी बात कर रही हैं, क्या आपका कोई इन्डियन मित्र था?’

“विनायक मेरा पति, मेरा मित्र, मेरा सब कुछ था. मै उसे विनी पुकारती थी.

“मेरा डेस्टिनेशन बीस मील दूर है, समय बिताने के लिए अगर ठीक समझो तो जानना चाहती हूँ, आपका उसके साथ परिचय कैसे हुआ, प्रेम की पहल किसने की थी?”नीता जी की उत्सुकता जाग उठी.

नीता जी ने सोचा, विदेश जाने वाले भारतीय युवकों की गोरी चमड़ी कमजोरी होती है, शायद इसीलिए इस युवती का किसी के साथ प्यार और विवाह हुआ होगा. क्या अब भी दोनों साथ हैं, पर उसके लिए वह “था” कह रही है शायद अब दोनों अलग हो गए हैं, वैसे इस देश के लिए ये तो सामान्य बात है.

“आप भारतीय हैं, आपके साथ अपनी कहानी शेयर करने में खुशी होगी. अभी पहुँचने में समय लगेगा, इस लिए अपनी कहानी बताती हूँ. “कुछ देर मौन के बाद उसने कहना शुरू किया-

“उन दिनों मै बॉब की फ़्ळॉरिस्ट शॉप में काम करती थी. रंग-बिरंगे फूलों का साथ वक्त बिताना अच्छा लगता था. मेरे साथ एक हंसमुख पाकिस्तानी लड़का अहमद भी काम करता था. वृद्ध बॉब हम दोनों पर पूरी ज़िम्मेदारी छोड़ कर निश्चिन्त रहते. अचानक उस दिन एक सफ़ेद कार से उतरा एक हैंडसम हिन्दुस्तानी युवक शॉप में आया था.”

“गुड मॉर्निंग सर, आपको क्या चाहिए?”हलकी मुस्कान के साथ उससे पूछा था.

“अपने फ्रेंड की शादी में एक अच्छा बुके ले जाना चाहता हूँ.”मुझ पर गहरी नज़र डाल कर कहा था.

“आप सेलेक्ट कर लीजिए, हमारे पास आपके फ्रेंड के लिए बहुत खूबसूरत बुके हैं.”

“वो तो देख रहा हूँ. वैसे आपकी ड्रेस पर जो पिंक और परपल फूल बने हैं , मुझे इन्हीं दोनों रंगों के फूलों का बुके बना दीजिए, क्या ये पॉसिबिळ होगा?”चेहरे पर शरारती मुस्कान थी.

“मारिया ये तुझ पर लाइन मार रहा है.”अहमद ने धीमे से कहा.

“अगर आपका हमारे लिए ये चैलेन्ज है तो बस पांच मिनट का टाइम दीजिए.’

मारिया ने तत्परता से अधखिली गुलाबी गुलाब की कलियों के साथ जामुनी आर्किड्स मिला कर उन्हें हरी पत्तियों से सजा कर एक सुन्दर बुके तैयार कर दिया. बीच में रजनीगन्धा की दो-तीन अधखिली कलियों ने बुके का सौदर्य बढ़ा दिया.

“लीजिए, पांच मिनट में आपका बुके तैयार है., उम्मीद है ये आपके फ्रेंड को पसंद आएगा.”युवक को बुके देती मारिया ने हंस कर कहा.

“थैंक्स, आप सचमुच कलाकार हैं. अब तो आपको ऐसे ही चैलेन्ज देने में मज़ा आएगा.”

“मारिया को चैलेन्ज में हराना आसान नहीं है, बशर्ते आप किसी ऐसे फूल का बुके चाहें जो हमारे पास ना हो. वैसे तो मारिया सिर्फ पत्तियों तक का बुके बना सकती है.” अहमद ने मारिया की तारीफ़ में कहा.

“अगर ये बात सच है तो दो दिन बाद मुझे सिर्फ पत्तियों से बना ऐसा बुके चाहिए जो खूबसूरती में फूलों वाले गुलदस्ते से कम ना हो. चैलेन्ज जीतने पर आपकी शॉप के सबसे महंगे बुके के पैसे दूंगा.”

“आपका नाम जान सकता हूँ, जनाब?”अहमद ने हिन्दी में पूछा.

“विनायक, ये नाम मेरे अक्का यानी मेरे पापा ने दिया है. तुम लोग भी मुझे सर या मिस्टर ना कह कर सिर्फ विनी पुकारो तो अच्छा लगेगा.”उसके चेहरे पर खुशी और हलके से अभिमान की झलक थी.

“दो दिन बाद आपका इंतज़ार रहेगा, विनी, चैलेन्ज भूल मत जाइएगा.”अहमद ने याद दिलाया.

“मुझे भी दो दिन याद रहेंगे. ओके बाय.”मुस्कुराता विनी बुके ले कर चला गया.

“अहमद,ये क्या पागलपन है, तारीफ़ में सच्चाई होनी चाहिए, भला पत्तियों से बुके बनाया जा सकता है?”

मारिया ने नाराज़गी जताई.

“मुझे पूरा यकीन है, हमारी मारिया चैलेन्ज जीतेगी. आजकल फ़ाल का सीज़न है, ज़रा चारों तरफ नज़र डालो, पेड़ों की पत्तियां इस मौसम में कितने रंग बदल रही हैं, पीली, लाल, नारंगी, कत्त्थई पत्तियाँ क्या खूबसूरती में फूलों से कम हैं?ये नज़ारा कितना ब्यूटीफुल है, मारिया.”अहमद ने सच कहा था. फ़ाल-सीजन में पेड़ों की पत्तियों के बदलते खूबसूरत रंग देखना एक दर्शनीय नज़ारा होता है.

“ये बात तो सच है, अब तुमने चैलेन्ज ले ही लिया है तो कोशिश ज़रूर करूंगी. सवेरे जल्दी उठ कर रंग-बिरंगी पत्तियां इकट्ठी करनी होंगी. तुम्हें भी हेल्प करनी होगी, अहमद.”

“श्योर, मारिया. आखिर पत्तियों के बुके का आइडिया मेरा ही था, जीतने पर आधे पैसे मै लूंगा.”अहमद ने मज़ाक किया.

दो दिन बाद एक टोकरी में ढेर सारी रंग-बिरंगी पत्तियों के साथ आई मारिया को देख कर अहमद खुश हो गया.

“मारिया, आज कस्टमर्स को मै देख लूंगा, तुम पीछे बैठ कर ये अनोखा गुलदस्ता बनाओ. वैसे ब्यूटीफुल मारिया को शॉप में ना देख काफी लोग मायूस होंगे.”अहमद ने हंस कर कहा.

“शटअप, ये फ़ुलिश चैलेन्ज तुमने ही लिया है. मुझे हार एक्सेप्ट करने को तैयार रहना चाहिए.”

शॉप के पीछे फूल रखने के लिए खाली जगह में मारिया पत्तियां बिखरा कर बैठ गई. मारिया ने एक से रंगों वाली और एक साइज़ वाली पत्तियां अलग कर लीं. कुछ देर सोचने के बाद उसके दिमाग में जैसे तस्वीर बन गई, कैंची से पत्तियों को अलग-अलग शेप में काट कर मारिया ने जैसे फूलों से गुलदस्ते बनाती थी वैसे ही पत्तियों के रंगों, आकार और शेप से एक नायाब गुलदस्ता बना डाला. लाल,पीली, नारंगी. सुनहरी और बीच-बीच हरी पत्तियों से सज्जित बुके दर्शनीय बन पडा था. इस नायाब गुल्दास्ते को देख कर अहमद चहक उठा.

“विनी ने ठीक कहा था, तुम सचमुच एक कलाकार हो. अब हमारी जीत पक्की है.”काफी देर इंतज़ार के बाद भी विनी को ना आते देख कर वे निराश हो गए.

“लगता है, विनी ने सिर्फ मज़ाक किया था. तुमने बेकार इतनी मेहनत की.”अहमद कंसर्न था.

अचानक विनी को शॉप में आता देख दोनों के चेहरों पर खुशी आ गई.

“गुड मॉर्निंग विनी, आज आपको आने में देर हो गई.”अहमद ने खुशी से स्वागत किया.

“सॉरी, कुछ काम आ गया था. मेरा चैलेन्ज तो रेडी है.”मारिया पर नज़र डाळते विनी ने कहा.

“ये रहा मारिया का कमाल, एक कस्टमर इसे लेना चाहता था, मुश्किल से मना किया.”

“अहमद, क्यों बेकार की बातें बना रहे हो, इसे तो किसी ने देखा ही नहीं है.”मारिया ने सच बताया.

“वाह: मारिया यकीन नहीं होता तुमने ये बुके फूलों से नहीं पत्तियों से बनाया है. इतने सुन्दर गुलदस्ते को तो मै अपने सब फ्रेंड्स को दिखाऊंगा. ये तो प्राइज़ विनिंग आइटम है. मै अपनी हार मानता हूँ. अहमद, बताओं तुम्हारा सबसे मंहंगा बुके कौन सा है, मुझे इसकी कीमत देनी है,”

“थैंक्स विनी, पर मुझे इसकी कीमत नहीं चाहिए. जिन पत्तियों को उनके जीवन साथी पेड़ों ने अपने से अलग कर दिया, जो ज़मीन पर उपेक्षित पड़ी थीं, आपकी वजह से मै ने उन्हें एक नया रूप दिया है. मेरा तो सबसे बड़ा यही पुरस्कार है.”गंभीरता से मारिया ने कहा.

“तुम सिर्फ कलाकार ही नही, एक दार्शनिक और कवयित्री भी हो, मारिया. तुमने तो मेरा सोच ही बदल दिया. ज़मीन पर पड़ी, पैरों से कुचली जाने वाली पत्तियों के दर्द को बस तुम ही सोच सकती हो. एक बात ज़रूर समझ गया हूँ, मारिया तुम कोई साधारण लड़की नहीं हो.”.विनी ने सच्चाई से कहा.

“ये बात तो सच है, बीस साल की हो जाने पर भी इसका कोई ब्वॉय फ्रेंड नहीं है. वैसे मारिया को कीमत तो नहीं चाहिए, पर आप अपनी हार कैसे मनाएंगे?”अहमद ने मज़ाक किया.

“मै तुम दोनों को ट्रीट तो दे सकता हूँ. आज शाम को जब तुम दोनों काम से फ्री हो जाओगे तो हम बाहर डिनर लेगे. मै तुम्हें पिकप कर लूंगा.”मारिया पर दृष्टि डालते विनी ने खुशी से कहा.

“वाह: ये तो सचमुच हमारा इनाम होगा. हम आपका वेट करेंगे.

“ठीक है, तैयार रहना.” बाय कह कर विनी चला गया.

“अहमद,, क्या विनी के साथ जाना ठीक होगा? तुम ऐसे ही बोल देते हो.”मारिया परेशान दिखी,

‘अब तो बोल चुका, वैसे भी कीमत ना ले कर तुमने मेरा नुक्सान ही किया है.”अहमद हंस रहा था.

शाम को विनी के आने पर अचानक अहमद के घर से फोन आ गया, उसे फ़ौरन घर पहुंचना था. विनी परेशान था, उसने रेस्टोरेंट में तीन जगह रिज़र्व करा रखी थीं. विनी के साथ अकेले रेस्टोरेंट जाने में मारिया संकुचित थी, पर अहमद ने समझाया-

“विनी के साथ जाने में कैसा डर? यह तो मेरी बदकिस्मती है, अपना चांस खो रहा हूँ, पर विनी आपसे बाद में डिनर ज़रूर लूंगा.”अहमद ने मायूसी से कहा.

“ओह, श्योर, हम तुम्हें मिस करेंगे. चलें, मारिया.”

विनी के साथ आगे की सीट पर बैठती मारिया बेहद कांशस थी. शायद घबराहट या संकोच से उसका सुन्दर चेहरा लाल हो रहा था. सामने लगे मिरर में मारिया के गुलाबी चेहरे को देख विनी मुस्कुरा उठा, निश्चय ही मारिया सुन्दर और टैलेंटेड युवती थी.

खाने में मारिया की पसंद की डिशेज पूछने पर मारिया मौन रह गई. उस आलीशान रेस्टोरेंट को वह विस्मित देख रही थी. उसके मौन ने विनी को उसकी मनोदशा स्पष्ट कर दी,

“चाइनीज़ पसंद है या इन्डियन फ़ूड पसंद करोगी?”

“आपको जो पसंद हो, मंगा लीजिए.”धीमे स्वर में मारिया बोली.

खाने का ऑर्डर दे कर विनी ने पूछा-

“तुम कहाँ रहती हो, तुम्हारी फैमिली में कौन –कौन हैं?”

“चर्च के एक छोटे से कमरे में अकेली रहती हूँ. अब वही मेरा घर है. पापा की डेथ के बाद मम्मी ने दूसरी शादी कर ली और अपने हसबैंड के साथ लन्दन चली गई.”मारिया के सुन्दर मुख पर अवसाद की घनी छाया थी.

“तुम्हारी मम्मी तुम्हें अपने साथ क्यों नहीं ले गईं?”विनी ने पूछा.

“तब मेरी उम्र बस नौ साल की थी, पर मम्मी ने अपने नए पति की आँखों में ना जाने क्या देखा, बस मुझसे कहा, तुझे ले जाने में खतरा है, मेरा नया पति तेरा पापा नहीं बन सकता. मम्मी के साथ जाने के लिए बहुत रोई, पर वह मुझे चर्च के फादर के पास छोड़ कर चली गई. कितनी रातें मम्मी की याद में रो-रो कर काटीं, फादर ने मुझे सहारा ज़रूर दिया, पर आज भी मम्मी की जगह खाली ही रही.’मारिया की पलकें भीग गई थीं

“मुझे तुम्हारे लिए दुःख है, पर तुम एक ब्रेव लड़की हो. देखो अब तुम अपने पैरों पर खडी हो.”

“इसके लिए चर्च के फादर की शुक्रगुज़ार हूँ. चर्च के काम करते हुए पढाई भी करती रही. हाई स्कूल के बाद मुझे महसूस हुआ अब मुझे फुल टाइम काम करना चाहिए.”

“तुम इस फ़्ळॉरिस्ट शॉप में कैसे आई?’विनी की उत्सुकता बढ़ रही थी.

“चर्च में प्रेयर और दूसरे फंक्शन्स में सजाने के लिए मै फूलों के तरह-तरह के गुलदस्ते बनाया करती थी..बचपन से ही फूलों से मुझे बहुत प्यार था. हमारी फ़्ळॉरिस्ट शॉप का वृद्ध मालिक बॉब मेरे बनाए बुके बहुत पसंद करता था.उसने जब मुझे अपनी शॉप में जॉब का ऑफ़र दिया तो स्वीकार करने में देर नहीं की. अब तो बॉब ने मेरी ज़िम्मेदारी पर शॉप का काम देखना छोड़ ही दिया है. मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करता है.’मारिया का चेहरा गर्व मिश्रित खुशी से जगमगा रहा था.

“अगर तुम्हें मारिया ना कह कर मीरा कहूं तो? जैसे तुम भी मुझे विनायक की जगह सिर्फ विनी कहती हो.’’अचानक विनी बोल बैठा.

“मीरा की क्या मीनिंग होती है, मीरा कौन थी?.” मीठी आवाज़ में मारिया ने जानना चाहा.

“मीरा हमारे कृष्ण भगवान् के लिए प्यार और भक्ति का नाम है. कृष्ण के प्रेम में मीरा ने सारे सुख, अपना महल. राजा पति सब छोड़ दिया. मन्दिर में कृष्ण के लिए गाती और नाचती थी. आजकल यहाँ “मीरा” फिल्म लगी है, तुम्हें फिल्म दिखाने ले चलूँगा. फिल्म में अंग्रेजी के सब टाइटिळ्स हैं तुम समझ सकोगी, मीरा की कहानी देख कर कर उसका सच्चा प्रेम समझ सकोगी.”

“क्या आप भी मीरा से प्यार करते हैं?”मारिया की दृष्टि विनी के चेहरे पर थी.

“जिस मीरा की बात कर रहा हूं, वो तो कृष्ण की दीवानी थी, पर हाँ मै ने भी मीरा नाम की एक लड़की से बहुत प्यार किया था उसके जाने के बाद जैसे मेरी ज़िंदगी ही खत्म हो गई थी.”विनी चुप हो गया.

“आपकी मीरा कहाँ चली गई, अब कहाँ है?”

“उसका नाम मीरा ज़रूर था, पर उसमें मीरा जैसी कोई बात नहीं थी. उसे मुझसे नहीं, पैसों से प्यार था, मुझे अकेला छोड़ कर मेरे एक अमीर दोस्त के साथ चली गई. मै पूरी तरह से टूट गया था, पर तुमसे जब से मिला हूँ, मुझे लगता है तुम में मीरा की सादगी है. शायद इसीलिए आज अचानक मेरे दिल ने तुम्हें मीरा पुकारा है, पर डरता हूँ कहीं ये नाम तुम्हें दूर ना ले जाए .”

उदास स्वर में विनी ने अपने दिल का दुःख सुनाया.

मारिया को उसके छोटे से कमरे में छोड़ कर जाने के बाद मारिया विनी के बारे में सोचती रही. विनी ने किसी को प्यार किया, पर उसे प्यार के बदले में धोखा मिला. कैसे उसने अपने को सम्हाला होगा.? कौन थी वो लड़की जिसने विनी जैसे अच्छे इंसान को धोखा दिया. विनी के मन को मुझ में मीरा दिखाई दी, क्या मै मीरा बन सकती हूँ? मेरे लिए वह कितना सोचता है, काश उसकी मदद कर पाती. अपने सोच को झटक मारिया सोने की कोशिश करती रही, पर विनी का उदास चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ जाता. नहीं वह विनी को कभी धोखा नहीं दे सकती.

अहमद के साथ विनीत मारिया को फिल्म दिखाने ले गया. मारिया तो कुछ दृश्यों में आंसू पोंछ रही थी. फिल्म से निकल कर अहमद ने मारिया की हँसी उडाई थी-

“मारिया अभी भी छोटी बच्ची है, फिल्म में भला कोई रोता है?”

“कृष्ण से मिले बिना भी मीरा कैसे उसे इतना प्यार कर सकी?”मारिया ने विनी से पूछा था.

“यही तो सच्चा प्यार होता है, इसी प्यार की वजह से मीरा सब प्यार करने वालों के दिल में बसती है. मेरे पास अंग्रेज़ी में मीरा की कहानी की किताब है. तुम उसे पढना, तब उसका प्रेम समझ सकोगी,” विनी ने गंभीरता से समझाया था.

उस दिन के बाद से मारिया के मन पर जैसे मीरा ने अधिकार कर लिया था. उसके मन-मानस पर मीरा छा गई थी. उसका प्यार, त्याग ही नहीं उसके भजन भी दोहराती. किताब पढ़ती सोचती, क्या वह भी किसी को मीरा की तरह से प्यार कर सकती है, जिसके लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दे? विनी के मुंह से अपने लिए मीरा पुकारना उसे बहुत अच्छा लगता.

अब विनी अक्सर मारिया से गुलदस्ते लेने पहुँच जाता था. अहमद उसे छेड़ता-

“गुलदस्ते ले जाने के लिए बार-बार आना तो मारिया से मिलने आने का बहाना है. अब विनी के दिल पर मारिया का साम्राज्य है. वैसे शायद मारिया तुम्हें भी विनी अच्छा लगता है.”

“बेकार की बातें मत बना, जैसे तुम नूरी से मिलने जाने के बहाने खोजते हो. विनी ऐसा नहीं है.” मारिया का मुख लाल हो जाता.

एक दिन जब विनी बुके लेने आया तो अहमद पूछ बैठा-

“एक बात बताओ, तुम रोज़ बुके किसके लिए ले जाते हो, विनी?”

“हॉस्पिटल में मेरा एक फ्रेंड एडमिट है, उसके कमरे में रोज़ ताज़े फूल रखने से उसे अच्छा लगता है, मुरझाए फूल खुशी की जगह अवसाद दे सकते हैं, यही सोच कर उसके लिए बुके ले जाता हूँ.”

“ये तो बहुत अच्छी बात है, अब आगे से तुमसे गुलदस्तों के पैसे नहीं लेंगे.”मारिया ने कहा.

मारिया भी अब विनी के साथ सहज हो गई थी. कभी एक दिन विनी ने मारिया को अपने घर और माँ-बाप के विषय में भी बताया था. केरल में नारियल और केले की हरियाली से घिरा हुआ उसका घर है. विनी उनका एकलौता बेटा है, उसकी अम्मा सामान्य गृहिणी है, पर उसके् पापा हिन्दी और संस्कृत के ज्ञाता हैं विनी ने भी हिन्दी उन्हीं की प्रेरणा से सीखी है.

“तुम मुझे भी हिन्दी सिखाओगे, विनी?” अचानक मारिया पूछ बैठी.

“अगर तुम्हें सचमुच हिन्दी सीखनी है तो तुम्हारी मदद कर के मुझे बहुत खुशी होगी मीरा. मै चाहता हूँ, जब तुम मेरे पेरेंट्स से मिलो तो तुम उनके साथ आसानी से बात कर सको. मेरी अम्मा अंग्रेज़ी नहीं समझती, पर हिन्दी समझती है.”

“मै तुम्हारे पेरेंट्स से कैसे मिल सकूंगी, क्या वो अमरीका आ रहे हैं?”मारिया उत्सुक हो उठी.

“हो सकता है तुम उनसे मिलने मेरे साथ इंडिया चलो.”विनी के चेहरे पर शरारत थी.

“कैसे, क्या तुम मुझे इंडिया ले चलोगे?”मारिया विस्मित थी.

‘इंतज़ार करॉ, धैर्य का फल मीठा होता है.”विनी ने गंभीरता से कहा.

मारिया मनोयोग पूर्वक विनी से हिन्दी लिखना-पढ़ना सीख रही थी. उसकी मेहनत विनी को विस्मित करती. कुछ ही दिनों में वह काफी हिन्दी लिखने और विनी की बातें समझने लगी थी.

कुछ दिनों बाद विनी ने अचानक मारिया से कहा था-

“कुछ दिनों के लिए अपने घर केरल जा रहा हूँ, अम्मा बहुत याद करती है. मुझे मिस करोगी,मीरा?”

“कब जा रहे हो, कितने दिनों में लौटोगे?तुम्हें बहुत मिस करूंगी, विनी.”मारिया जैसे व्याकुल हो उठी.

“कुछ ज़रूरी काम है, हिन्दी पढती रहना, लौट कर टेस्ट लूंगा,किताबें छोड़े जा रहा हूँ.”

विनी के इंडिया चले जाने से जैसे मारिया की ज़िंदगी ही सूनी हो गई थी. हर रोज़ उसका इंतज़ार करती मारिया कहीं खो सी जाती. गुलदस्ते बनाती उँगलियों में असावधानी के कारण कांटे चुभ जाते.

“तुझे विनी से प्यार हो गया है, मारिया. अल्लाह से दुआ करूंगा, तुझे तेरा प्यार मिल जाए.”अहमद उसके लिए कंसर्न होता.

अचानक अहमद के अब्बा को हार्ट अटैक हो जाने की वजह से अहमद को अपने वतन जाना पडा. उसकी जगह एक लडकी ऐनी आ गई थी. विनी और अहमद के ना होने से मारिया को वक्त काटना मुश्किल लगता. आखिर बीस दिनों के लंबे इंतज़ार के बाद विनी को आते देख, मारिया का मुरझाया चेहरा खिल उठा.

“कैसी हो, मीरा? मुझे मिस किया या अपने काम में मुझे भुला दिया?”विनी मुस्कुरा रहा था.

“इतने दिन क्यों लगा दिए, बहुत याद करती थी.’भोलेपन से मारिया ने सच्चाई बयान कर दी.

“अम्मा-अक्का को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा था, पर वो अपना घर छोड़ कर आने को तैयार नहीं हुए. जानती हो इंजीनियरिंग के बाद जब मै ने अपनी कम्पनी की तरफ से अमरीका में पोस्टिंग लेने की बात कही तो अम्मा मुझे आने ही नहीं देना चाहती थीं, पर मेरी इच्छा और मेरे भविष्य के बारे में सोच कर अक्का ने किसी तरह से अम्मा को मनाया था.”विनी के चेहरे पर यादों की छाया थी.

“तुम लकी हो, विनी, तुम्हारी अम्मा तुम्हें बहुत प्यार करती हैं.”आवाज़ उदास थी.

“आज शाम तुमसे मिलने तुम्हारे घर आऊँगा, इंतज़ार करना.”एक भी बुके लिए बिना विनी लौट गया.

मारिया को शाम का बेसब्री से इंतज़ार था. उसके कमरे में विनी आने वाला है, सोच कर मारिया समझ नहीं पा रही थी, वह क्या करे, कैसे विनी का स्वागत करेगी. वह घर क्यों आ रहा था? वजह पूछने का उसने मौक़ा ही कहाँ दिया था.

दरवाज़े की दस्तक सुनती मारिया के दिल की धड़कन तेज़ हो गई. आज पहली बार उसके छोटे से कमरे में कोई आ रहा था. दरवाज़े पर मुस्कुराता विनी खडा था. मारिया को हाथ में पकड़ा सुर्ख लाल गुलाब दे कर “हैप्पी बर्थ डे मीरा कह कर मारिया को चौंका दिया था.

“तुम्हें कैसे पता आज मेरा बर्थ- डे है?”मारिया विस्मित थी.

“जिसे प्यार किया जाए, उसके बारे में इतना तो पता होना ही चाहिए.”

“ये क्या कह रहे हो, विनी, तुम मुझसे--- नहीं ये सच नहीं है.”मारिया यकीन नहीं कर पा रही थी.

“यही सच है मीरा, तुमसे दूर जा कर इस सच्चाई को जान सका हूँ, क्या तुम मुझसे शादी करोगी, मीरा?

तुम्हारे साथ शादी के लिए अपने पेरेंट्स को राजी कर के आया हूँ. मुझे स्वीकार कर लो, मीरा.’

“समझ नहीं पारही हूँ, क्या ये सच हो सकता है?”मारिया सोच में पड़ गई.

“यही सच है, मै जानता हूँ तुम मुझे पसंद करती हो, एक दिन प्यार भी करोगी, इसका विश्वास है.”

चाह कर भी मारिया अपना दिल खोल कर नहीं कह सकी कि उसने सिर्फ और सिर्फ विनी को ही चाहा है, उसके इंतज़ार में उसने कैसे एक-एक दिन काटा है.

“अगर तुम मुझे स्वीकार करो तो ये साड़ी इंडिया से लाया हूँ. विवाह के समय यही ट्रेडीशनल साड़ी पहिनी जाती है.. तुम सोच कर फैसला करना. साड़ी तुम्हारे पास छोड़े जा रहा हूँ.”दरवाज़ा खोल कर विनी चला गया.

अवाक मारिया कुछ भी ना कह सकी, ना उसे रोक सकी. विनी के लिए लाया केक वैसे ही रखा रह गया था. जो कुछ सोचा था, मन में ही रह गया. पूरी रात सोचने के बाद मारिया निर्णय कर चुकी थी.

प्यार से साड़ी को सीने से लगा, मारिया ने उसे सम्हाल कर अलमारी में रख दिया. हाँ वह विनी से प्यार करने लगी थी. हमेशा लड़कों से दूर रहने वाली मारिया विनी की मीरा बन गई थी.

दूसरे दिन मीरा की हाँ सुनते ही विनी चहक उठा.

“बस तुम्हारी हाँ का इंतज़ार था, हम अभी आज ही विवाह कर लेंगे. मुझसे इंतज़ार नहीं होगा.”

विवाह के लिए विनी के माता-पिता की अनुपस्थिति मीरा को खल रही थी. उसकी माँ तो नहीं थी, पर काश विनी के पेरेंट्स उन्हें आशीर्वाद देने आ जाते. मीरा की इच्छा थी उसका विवाह चर्च में हो जाता, पर विनी को ये मंजूर नहीं था. काश आज अहमद ही उनके साथ होता.

“विवाह दो लोगों के बीच होता है, इसके लिए पंडित या प्रीस्ट की ज़रुरत मै नहीं मानता. हमने सच्चे दिल से एक-दूसरे को स्वीकार कर के विवाह किया है. माला बदलना काफी होता है. एक बात और याद रखना अब तुम सिर्फ मेरी मीरा हो, मारिया नाम हमेशा के लिए भुलाना होगा.” विनी ने कहा.

विनी और मारिया एक-दूसरे के गले में माला पहिना कर विवाह-बंधन में बंध गए, मारिया को विनी की कही हर बात मान्य थी. बॉब ने मारिया को सुन्दर नेकलेस दे कर प्यार से सीने से चिपटा लिया. मारिया अब पूरी तरह से विनी की मीरा बन गई थी, उसे अब अपना पुराना नाम भी याद नही था.

विवाह ने दोनों के जीवन में खुशियों के रंग भर दिए. एक-दूसरे को पा कर दोनों पूर्ण हो गए थे. विनी के प्यार में मीरा जैसे जागते हुए सपने जी रही थी. विनी उसके जीवन का केंद्र-बिंदु बन गया था. विनी भी मीरा- मय बन गया था.

“हम तुम्हारे पेरेंट्स से मिलने इंडिया कब जाएंगे, विनी?”मीरा उसके पेरेंट्स से मिलने को उत्सुक थी.

“जब तुम्हें साड़ी पहिनना आ जाएगा. वहां तुम्हारी अमरीकी ड्रेस नहीं चलेगी.’विनी ने मज़ाक किया.

“ठीक है, अब तो जल्दी ही अपनी इन्डियन फ्रेंड के पास जाना होगा.”मारिया गंभीर थी.

समय पंख लगा कर उड़ रहा था. मीरा ने सिर्फ साड़ी पहिनना ही नहीं सीखा इन्डियन डिशेज़ भी बनानी सीख ली थीं. अपने विनी की खुशी के लिए वह हर संभव प्रयास करती. विनी के ऑफिस से आने के पहले वह सब काम समाप्त कर के विनी की प्रतीक्षा करती. विनी आते ही उसे अपनी सबल बांहों में भर लेता. मीरा का रोम-रोम खुशी से नाच उठता.अब मीरा को ज़िंदगी से बेहद प्यार हो गया था..उसकी मीठी आवाज़ गीत गुनगुनाने लगी थी. घरके बाहर रंग-बिरंगे फूल मुस्कुराते. एक साल बीतने आ रहा था, पर विनी से बार-बार कहने पर भी वह इंडिया जाने को उत्सुक नहीं था. हमेशा काम का बोझ उस पर रहता.

जिस दिन मीरा को पता लगा वह माँ बनाने वाली है, उसकी खुशी की सीमा नहीं थी.

“”विनी, जानते हो हमारे घर एक नया मेहमान आने वाला है. हम दोनों मम्मी- पापा बनने वाले हैं.”

खुशी से पगी आवाज़ में सूचना देती मीरा के गालों पर गुलाब खिल आए थे.

“क्या ये कैसे हो गया? हम अभी बेबी को नहीं ला सकते. अम्मा को कैसे बताएंगे.”विनी परेशान था.

“क्यों क्या तुमने अभी तक मम्मी को हमारी शादी के बारे में नहीं बताया है.”मीरा विस्मित थी.

“मै ने अम्मा-अक्का को तुम्हारे बारे में बताया है, वे चाहते हैं हम दोनों इंडिया के मन्दिर में शादी करें. उन्हें ये नहीं बताया है कि हमने यहाँ शादी कर ली है. सोचा था, एक-दो महीने बाद हम दोनों इंडिया जाएंगे, पर अब तो उन्हें सच्चाई बताने मुझे पहले अकेले ही जाना होगा.”विनी ने गंभीरता से कहा.

“तुमने ऐसा क्यों किया, विनी. माँ पापा से इतनी बड़ी बात क्यों छिपाई?”मीरा ने दुःख से कहा.

“परेशान मत हो. मै अगले हफ्ते इंडिया जा कर उन्हें सब समझा दूंगा, फिर हम दोनों साथ में इंडिया चलेंगे.”प्यार से मीरा को सीने से लगा कर विनी ने कहा.

मीरा को आश्वस्त कर विनी इंडिया चला गया, जाते समय चितित मीरा उसका फोन नम्बर भी लेना भूल गई. जाते-जाते विनी ने वादा किया वह उसे इंडिया पहुँच कर फोन करता रहेगा. उसका घर केरल के एक विलेज में है, वहां इंटरनेट की सुविधा नहीं है, इस लिए शायद फोन भी देरी से कर पाएगा. वैसे जल्दी ही विमी उसे अपने घर ले जाएगा. केरल की सुन्दरता देख कर मीरा अमरीका भूल जाएगी. मीरा के माथे पर चुम्बन अंकित कर विनी चला गया था.

दिन बीतने लगे, पर विनी का कोई फोन नहीं आया. मीरा बेचैन थी, पर विनी ने कहा था, शायद वहां से फोन लगाना कठिन होता होगा. अपने पेरेंट्स को समझाने में भी भी समय लगेगा.

अहमद वापिस आ गया था, मीरा की शादी की बात सुन कर नाराज़गी जताते हुए कहा-

“आने दो विनी को, ऎसी भी क्या जल्दी थी, मेरा भी इंतज़ार नहीं किया. उसके लौटने पर डबल पार्टी लूंगा.”अहमद को ऎसी जल्दी में विवाह का औचित्य समझ में नहीं आया, सोचा शायद प्यार में ऎसी ही दीवानगी होती होगी.

अचानक एक दिन किसी अपरिचित के फोन ने मीरा को संज्ञाशून्य सा कर दिया.

“क्या आप मारिया विन्सेंट बोल रही हैं?”

“जी हाँ ,पर अब शादी के बाद से मीरा नाम से जानी जाती हूँ.”मीरा खुशी और उत्सुकता से बोली.

“आपको एक दुखद सूचना देनी है, एक एक्सीडेंट में विनायक की मौत हो गई है. अपने को सम्हालिएगा.” “क्या, कब कैसे?” मीरा कुछ पूछ पाती कि फोन कट चुका था.

खबर मिलते ही अहमद आ गया. जिस नंबर से फोन आया था, अहमद द्वारा उस नंबर पर फोन लगाने से पता लगा वो किसी पी सी ओ का नंबर था. मीरा बेहाल थी. विनी के साथ रहने पर भी उसने कभी ना तो विनी की अमरीकी कम्पनी का नाम पूछा ना उसके केरल के घर का पता उसके पास था. उसके लिए बस विनी का साथ ही उसका संसार था. यहाँ तक कि उसने विनायक का सरनेम भी कभी नहीं जानना चाहा. एक बार पूछने पर विनी ने हंस कर कहा था-

“क्यों सिर्फ विनी ही काफी नहीं है?”

विनी ने ठीक ही तो कहा था, उसके लिए तो विनी में ही मीरा की पूरी दुनिया सिमटी हुई थी.

अहमद परेशान हो गया, मीरा से कहा-

“तू भोली है, ये बात तो जानता था, पर यह नहीं जानता था कि तुझमे इतनी भी अक्ल नही होगी कि जिसके साथ पूरी ज़िंदगी के बिताने के लिए शादी कर रही थी, उसका पूरा नाम, उसका इंडिया और उसकी कम्पनी का पता भी नही जानना चाहा. इतने बड़े देश में सिर्फ नाम से किसी को जानना आसान नही है.”

“उस स्थिति में मीरा ने फिर चर्च की शरण ली. निश्चित समय पर मीरा ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया. अहमद ने उसको “नायक” नाम दिया . विनायक का बेटा नायक कहलाएगा. वृद्धा सिस्टर मार्था ने माँ और बच्चे दोनों को सम्हाला था.

“बॉब के बहुत कहने पर भी फिर उस फ्लौरिस्ट शौप में काम के लिए जाना मंजूर नहीं किया जहां विनी से उसकी भेंट हुई थी. जीविका के लिए एक टैक्सी कम्पनी में काम करना शुरू किया था तब से यही काम कर रही हूँ.” मीरा की आवाज़ में आवाज़ में उदासी थी.

“मीरा तुम अभी यंग हो, सुन्दर हो, तुमने ज़िंदगी में आगे बढ़ने की नहीं सोची? तुमसे शादी करने के लिए बहुत से अच्छे लड़के मिल जाएंगे.”नीता जी पूछ बैठी.

“आपने तो मीरा के बारे में सुना होगा, मै विनी की मीरा हूँ, अब उसके अलावा किसी दूसरे के बारे में सोच भी नहीं सकती. वह हमेशा मेरी यादों में मेरे साथ रहेगा.”इतना कह कर वह चुप हो गई.

नीता जी अवाक थीं, एक अमरीकी लड़की ने मीरा को किस तरह से आत्मसात कर लिया था. कुछ देर के मौन के बाद मीरा ने भीगे स्वर में नीता जी से अनुरोध किया –

“मैडम, क्या आप मेरे विनी का पता लगा सकती हैं? वो शायद दिल्ली की किसी कम्प्यूटर कम्पनी में काम करता था. मै उसके पेरेंट्स से मिलना चाहती हूँ, उन्हें अपना गैंड सन देख कर कितनी खुशी होगी. अपनी ज़िंदगी में ये काम पूरा कर के उन्हें खुशी देना चाहती हूँ.”

“मुझे तुम्हारी हेल्प कर के बहुत खुशी होती, पर सिर्फ नाम से किसी को खोज पाना सागर से मोती निकालने जैसा कठिन काम है अगर विनायक का सरनेम जानतीं तो उसे लोकेट कर पाना आसान होता. तुम्हारे पास विनायक की कोई फोटो तो होगी, उसकी मदद से उसका पता लगाया जा सकता है.”

“ नहीं, विनी हमेशा हम दोनों का वीडियो लिया करता था, कहता था, जब हम दोनों चौबीस घंटे साथ रहते हैं तो फोटो रखने की क्या ज़रूरत है. तुम्हारी तस्वीर तो मेरे दिल में है. हाँ, याद आया, एक बार उसने कहा था टेम्पल में जो आइडल यानी मूरत होती हैं वैसा ही कुछ उसका सरनेम है “ कुछ सोच कर मीरा ने कहा.

अचानक जैसे बिजली सी कौंध गई, नीता जी को याद आया अभी अमरीका आने के दो दिन पहले कम्प्यूटर सेक्शन से विनायक मूर्ती अपनी शादी की खुशी में उन्हें मिठाई देने आया था. नीता जी के साथी ने उससे परिहास किया था-

“जानते हो विनायक, नीता मैडम शिकागो जा रही हैं, तुम भी तो वहां दो साल की पोस्टिंग पर गए थे. अगर वहां कोई गर्ल फ्रेंड बना ली हो तो उसे मेसेज भिजवा दो.”

“वैसे शायद तुम समय से पहले इंडिया लौट आए वरना अमरीका से कोई जल्दी नहीं लौटना चाहता क्या जल्दी लौटने की कोई खास वजह थी?’कमलेश कुमार ने भी कहा.

“ओह नो, ऐसा कुछ नहीं था, मुझे वहां की क्लाइमेट सूट नहीं कर रही थी, इसलिए इंडिया वापिसी की रिक्वेस्ट की थी.’ अचानक उसका चेहरा जैसे काला सा पड़ गया था.

ये कैसा संयोग था, आज नीता जी जिस टैक्सी में बैठी हैं उसकी ड्राइवर विनायक मूर्ती के धोखे की शिकार है. उस धोखेबाज़ के झूठे प्यार को सच्चा प्यार मान कर अपने दिल में उसे बसाए बैठी है. यहाँ तक कि उसके पेरेंट्स से उनके पोते को मिलाने के लिए बेचैन है. नहीं, विनायक तुम्हें इस धोखे की भरपाई करनी ही होगी. मीरा को उसका अधिकार दिलाना ही होगा, पर कैसे? कितनी चालाकी से उसने शादी का कोई गवाह या सबूत नहीं छोड़ा है. नीता जी ने पक्का निश्चय कर लिया. विनायक को सज़ा दिलाए बिना नहीं छोडेंगी. कुछ सोच कर शांत स्वर में उन्होंने कहा-

“मीरा उम्र और अनुभव दोनों में मै तुमसे बड़ी हूँ, अगर कोई सलाह दूं तो मानोगी?”

“ज़रूर, आप जो कहेंगी मेरी भलाई ले लिए होगी.”मीरा ने जवाब दिया,

“मुझे कहना है, जो तुम्हारी ज़िंदगी से चला गया, उसे भुला देने में ही समझदारी है. अब तुम्हें अपने बेटे के भविष्य की चिंता करनी चाहिए. उसे खूब पढ़ा-लिखा कर एक योग्य इंसान बनाना तुम्हारा फ़र्ज़ है. तुम्हारे सामने अभी बहुत लंबी ज़िंदगी है,अगर राह में कोई अच्छा जीवन साथी मिल जाए तो उसे स्वीकार कर लेना क्योंकि हो सकता है बड़ा होने पर तुम्हारे बेटे को पापा की कमी महसूस हो.”

“आप ठीक कहती हैं, पर विनी ने मुझे मीरा कहा है, अगर मै ने शादी कर ली तो क्या विनी को धोखा देना नहीं होगा?’ मीरा ने सवाल किया.

“नहीं, बिलकुल नहीं, तुम्हारी स्थिति अलग है. मीरा ने विवाह नहीं किया था, उस पर उसकी संतान की ज़िम्मेदारी नहीं थी, एक बड़ी बहिन की तरह तुम्हें सलाह दी है. तुम मेरी बात पर गंभीरता से सोचना. कोशिश करूंगी अगर विनायक का पता मिल सका तो उसके बेटे के लिए जो सहायता करा सकी ज़रूर करूंगी.”दृढ निश्चय के साथ नीता जी ने मन में निर्णय ले लिया था.

“धन्यवाद, मैडम. आपकी बातों से मुझे बहुत हिम्मत मिली है.”शायद उसका स्वर भीग आया था.

“अगर समय मिला तो तुम्हारे बेटे से मिलने ज़रूर आऊंगी.”प्यार से नीता जी ने कहा.

कॉन्फ्रेंस - हॉळ आ गया था. कैब रोक, मीरा ने तत्परता से नीता जी के लिए कार की डोर खोली थी.

कार से उतरती नीता जी ने अपने मोबाइल में मीरा का चित्र ले कर प्यार से उसे गले लगा लिया. नीता जी के गले लगी मीरा विस्मित थी. शायद दोनों की पलकों पर अनजाने ही जल- कण छलक आए थे.
 
तुम्हारी अंकिता

अर्पित को स्कूल जाता देखते ही घरों से औरतें बाहर निकल आई थीं. अर्पित के स्कूल का रास्ता उसके पुराने बंगले के सामने से हो कर जाता था.

“कहो, बेटा, तुम्हारी मम्मी वापिस आई या नहीं?’

“हाय-हाय कैसी निर्दयी माँ थी, इतने छोटे बेटे का भी मोह नही रहा. ”

“देखो तो ज़रा सा चेहरा निकल आया है, बच्चे का.”

“अरे ऎसी कलंकिनी औरत का तो नाम लेना भी पाप है, सुना है अपने रिश्ते के देवर के साथ भाग गई”

“अरे भगोड़ी पत्नी का गम इसके पापा को को भी ले गया.”

“क्यों बेटा सुनते हैं, तुम्हारे पापा ने ज़हर खाया था, उनकी तो इज्ज़त ही चली गई.”

सबकी बातें सुनता अनुत्तरित अर्पित रोता हुआ घर वापिस आ गया.

“क्या हुआ मुन्ना, स्कूल काहे नहीं गए?“प्यार से अर्पित के आंसू पोंछता रामू द्रवित था.

“हम स्कूल नहीं जाएंगे, काका, सब हमसे मम्मी और पापा के बारे में पूछ रहे थे.”आंसू फिर बह निकले.

“अरे मुन्ना तुम लोगों की बातें काहे सुनते हो, ठहरो हम तुम्हारे साथ चलते हैं, देखें किसकी हिम्मत कुछ कहने की पड़ती है?”रामू ने आश्वस्त किया.

“नहीं हमें स्कूल नहीं जाना है.” हथेली से बहते आंसू पोंछता दस वर्ष का अर्पित रो रहा था.

“चलो हम फादर के पास चलते हैं, वो तुम्हें बहादुर बच्चा कहते हैं ना?”

अपने पुराने बंगले से थोड़ी दूर पर एक मिशनरी स्कूल में अर्पित पढता था. स्कूल के प्रिंसिपल फादर जेम्स अर्पित के हार्ट स्पेशलिस्ट पापा डॉ अमित चंद्रा का बहुत सम्मान करते थे. प्राय: स्कूल की प्रगति के लिए वह डॉ चंद्रा की राय लिया करते थे. डॉ चंद्रा स्कूल के विकास के लिए अनुदांन के अलावा मेधावी और निर्धन बच्चों को छात्रवृत्ति भी देते थे. अर्पित फादर जेम्स का प्रिय छात्र था. अर्पित की मम्मी मोनिका स्कूल के कार्यक्रमों में तो रूचि नही लेती थी, पर पुरस्कार देने अवश्य जाती थी. अखबारों में अपनी फोटो देख कर उसे अपने रूप पर अभिमान होता था. क्लब और किटी पार्टीज़ ही उसकी दुनिया थी. पति डॉ चंद्रा को अपने मरीजों को नव- जीवन देने की व्यस्तता के कारण मोनिका को साथ देना संभव नहीं था, पर पत्नी की गतिविधियों से उन्हें कोई शिकायत नही होती.

रामू सोच में पड़ गया, दस दिनों में उस नन्हे अर्पित की तो दुनिया ही उजड़ गई. एक ही दिन में माँ और पापा दोनों उसे अकेला छोड़ गए. भला हो फादर जेम्स का जिनके हाथों अपने दुलारे बेटे को सौंप कर अर्पित के पापा ने आँखें मूंदी थी. पत्नी के अचानक हमेशा के लिए उन्हें और घर को छोड़ कर चले जाना वह सह नहीं सके थे, मृत्यु के पहले वकील को बुला कर अपनी वसीयत कर के फादर जेम्स को सारी संपत्ति और धनराशि का ट्रस्टी बना दिया था.

फादर और डॉ चंद्रा के डॉक्टर मित्र बोस बाबू की धीमी बातों से ज़हर खाने जैसी बात बाहर खड़े रामू ने सुनी थी. अंतिम संस्कार भी तुरंत कर दिया गया था, मोनिका का भी इंतज़ार नहीं किया गया. अर्पित का रोना सुनते रामू का कलेजा फटा जा रहा था. उतने बड़े बंगले में अकेला अर्पित कैसे रह पाएगा. फादर जेम्स ने अर्पित को अपने घर में रखने का ही निर्णय लिया था.

‘आज से तुम मेरे ब्रेव बेटे हो, अर्पित. मेरे साथ तुम्हे अपनी नई ज़िंदगी शुरू करनी है. अपने पापा की तरह नामी डॉक्टर बन कर उनके सपने पूरे करने हैं.”

“नहीं हम नहीं कर सकते, हमें पापा के साथ रहना है.”आंसुओं का सैलाब बह निकला.

“तुम्हारे पापा को गॉड ने अपने पास बुला लिया है, वहां उनकी ज़रुरत थी. अब तुम्हें बहादुर लड़के की तरह से ज़िंदगी जीनी है. अगर तुम रोओगे तो तुम्हारे पापा को दुःख होगा. तुम्हारे साथ तुम्हारे रामू काका और मै रहूँगा.”प्यार से अर्पित के सिर पर हाथ फेरते फादर ने समझाया.

“फादर, पापा ने ज़हर क्यों खाया, मुझे क्यों नहीं बताया”.अर्पित ने भी बोस अंकल और फादर की बातें सुन ली थीं.

“अभी तुम बहुत छोटे हो. इस बारे में हम बाद में बात करेंगे. अब सब कुछ भूल कर तुम्हें पढाई में मन लगाना है, इसी से तुम्हारे पापा को खुशी मिलेगी. पढाई को अपना सच्चा दोस्त बना लो, अर्पित.”

फादर के घर का एक हिस्सा रामू और अर्पित के लिए काफी था. अपने कमरे का सामान समेटते अर्पित की आँखों के सामने से दस वर्षों का इतिहास छूट रहा था. रामू और फादर जेम्स ही अब उसका परिवार था. पापा तो अनाथालय में पळे थे और मम्मी के किसी भी रिश्तेदार के बारे में कभी नही सुना, वह अपनी सौतेली माँ से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ कर पापा के साथ आ गई थी. अर्पित माँ-पापा की अपनी छोटी सी दुनिया में कितना खुश था.

अर्पित को अपने पापा बहुत अच्छे लगते थे. अपनी व्यस्तता के बावजूद अर्पित के लिए वह समय निकाल ही लेते थे. उसके साथ उसके स्कूल और उसके दोस्तों के बारे में जानकारी लेते हुए वह खूब मज़ा लेते. सच तो यह है, उस समय वह एक गंभीर डॉक्टर नहीं उसके साथ बच्चा बन जाते थे.. अर्पित के लिए अच्छी किताबें और दिमागी खिलौने वही लाते थे. मम्मी की अति व्यस्त दुनिया में अर्पित को अपने लिए ज़्यादा जगह नहीं मिलती थी. घर के पुराने विश्वस्त सेवक रामू पर अर्पित का दायित्व होता और वह सच्चे मन से अर्पित को प्यार करता.

लन्दन से डॉ चंद्रा के मित्र हरीश के आने से घर में खूब रौनक हो गई. घर में आते ही उसने परिवार वालों के मन जीत लिए. मेडिकल कॉलेज में पढ़ते हुए हरीश और डॉ चंद्रा की अच्छी मित्रता हो गई थी. हरीश स्वभाव से चंचल था और डॉ चंद्रा गंभीर स्वभाव के थे. पढाई के मुकाबले हरीश का ध्यान लड़कियों से दोस्ती करने में ज़्यादा लगता था. स्नेही और उदार डॉ चंद्रा उसे छोटे भाई की तरह प्यार करते .सच्चाई तो यह थी, उन्ही के कारण हरीश एक्जाम्स में पास होता गया और पहला चांस मिलते ही लन्दन चला गया. डॉ चंद्रा ने अपने देश में रह कर ज़रूरतमंद लोगों की सेवा का निर्णय लिया था.

“वाऊ भाभी, तुम्हे तो मै भाभी कह ही नहीं सकता, यूं लुक सो यंग एंड ब्यूटीफुल. तुम्हे तो मोना डार्लिंग कहना ठीक रहेगा. क्यों अमित भाई आपको तो कोई ऐतराज़ नहीं है?”शरारती मुस्कान के साथ मोनिका को देखते हुए हरीश बोला..

“बिलकुल नहीं, पर तेरी शरारतें अभी गई नहीं. अब शादी कर डाल. सुना है अभी भी लड़कियों से फ्लर्ट करता है.” डॉ अमित ने प्यार से कहा.

“ये बात तो आपने ठीक सुनी है, पर अभी तक मोना डार्लिंग जैसी खूबसूरत कोई लड़की ही नहीं मिली है.”मोनिका पर नज़र जमाए चेहरे पर फिर शरारत थी.

“अब रहने दे, मोनिका का दिमाग मत खराब कर. लन्दन में क्या सुन्दर लड़कियों की कमी है?”

“जाने दो हरीश, तुम्हारे भाई साहब के पास सुन्दरता देखने-परखने का वक्त ही कहाँ है? इन्हें तो बस दूसरों के दिल चीरने में मज़ा आता है.”मोनिका ने व्यंग्य किया.

‘वैसे इसी काम के लिए हमारे डॉ अमित चंद्रा जी लन्दन तक में मशहूर हैं.”हरीश मुस्कुराया.

“आप तो अपने भाई की तारीफ़ करेंगे ही, मुझसे पूछिए, मेरी कितनी बोरिंग लाइफ है, हरीश.”

“ओह नो हरीश, मुझे सब हैरी कहते हैं, अब तो हरीश किसी दूसरे का नाम लगता है. वैसे जब तक यहाँ हूँ आपको एक मिनट के लिए भी बोर नहीं होने दूंगा, ये मेरा वादा है.”

“मुझे तो आज ही पता लगा तुम्हारी लाइफ बोरिंग है. तुम्हे तो हमेशा अपनी ज़िंदगी एंज्वाय ही करते देखा है.” डॉ अमित के चेहरे पर विस्मय था.

“अब ये बेकार की बातें छोडो मोना डार्लिंग, लंच मिलेगा या होटल जाना पडेगा?’

तभी स्कूल से वापिस आए अर्पित को देख हरीश ने खुशी से कहा-

”अरे ये हमारा अर्पित हीरो है, इतना बड़ा हो गया. पिछली बार तो फोन पर ठीक से बात भी नहीं कर पाता था. तो हीरो, अपने हैरी अंकल को अपना शहर घुमाओगे?”

“जी, अंकल” छोटा सा जवाब दे कर अर्पित अपने कमरे की तरफ चल दिया.

“अरे अभी तो हमारी ठीक से बात भी नहीं हुई और जनाब चल दिए.”हरीश ने कहा.

“अपने पापा पर गया है. उनकी ही तरह सीरियस रहता है, बस किताबें ही इसकी दोस्त हैं.”रूखे स्वर में मोना बोली.

जब से हैरी घर आया था, घर में जैसे खुशी का त्यौहार साथ लाया था. अब मोनिका को क्लब अकेले नहीं जाना पड़ता, मोनिका के डांस- पार्टनर के रूप में हैरी अपने अलावा किसी और को चांस ही नहीं देता. देर रात तक दोनों क्लबों की शान बढाते, मोना की प्रतीक्षा करते डॉ अमित ने अगर कुछ ठीक नही भी महसूस किया तो उसे बस अपने मन तक ही सीमित रखा.

अर्पित सोचता उसकी मम्मी हैरी अंकल के साथ कितनी खुश रहती हैं, अंकल की हर बात पर कितना हंसती हैं, पर पापा के साथ थोड़ी ही देर में किसी छोटी सी बात पर नाराज़ हो जातीं हैं. पापा मम्मी की नाराज़गी को कितनी आसानी से सह जाते हैं. कभी-कभी उसे मम्मी पर बहुत गुस्सा आता, पर पापा का प्यार सब भुला देता.

दिन बीत रहे थे . एक रात उसने पापा को मम्मी से कहते सुना

“तुम्हे अपने पर कंट्रोल रखना चाहिए, मोना. कल रात तुम इतना ज़्यादा ड्रिंक करके आई थीं कि अगर मै ना सम्हालता तो तुम हरीश के साथ उसके बिस्तर पर ही सो जातीं. वह क्या सोचता.”

“ओह, आई डोंट केयर, तुम इतने पुराने ख्यालों वाले इंसान हो, तुम क्या जानो ड्रिंक मुझे किस दुनिया में ले जाता है. हवा में उडती हूँ, पर तुम्हे मेरी खुशी सहन नहीं होती.”ळड़खड़ाती आवाज़ में मोनिका बोली.

“तुम नहीं जानतीं, शराब तुम्हारी सेहत के लिए अच्छी चीज़ नही है. अपने बेटे का तो ख्याल रखो, उसके लिए तुम्हारे पास वक्त ही नहीं रहता, कितना अकेला हो गया है. फादर जेम्स उसके लिए बहुत कंसर्न हैं. उन्हें लगता है, आजकल वह कुछ परेशान सा रहता है. ”

“अर्पित सिर्फ मेरा ही बेटा नहीं है, तुम्हारी भी ज़िम्मेदारी है. वैसे उसके लिए क्या कमी है, कमरे में टीवी, वीडिओ- गेम्स हैं. अगर फादर को इतनी ही परवाह है तो अर्पित को अपने साथ क्यों नहीं रख लेते. उनके पास तो बड़ा घर है और अकेले ही रहते हैं. अब सोने दो.”मोनिका ने बात खत्म कर दी.

अर्पित जैसे डर सा गया, यह सच था, फादर उसे बहुत प्यार करते हैं, पर अपने घर से अलग होने की बात उसे अच्छी नहीं लगी, पर अगर कभी ऐसा हो गया तो? नहीं, वह अपने पापा को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा. बचपन से उसकी देखरेख रामू काका करते आ रहे हैं, वह उनके साथ अपने मन की बातें आसानी से कर लेता है. उस रात अर्पित को डरावने सपने जगाते रहे.

दिन पंख लगा कर उड़ रहे थे. मम्मी घर में कम चाचा के साथ बाहर ज़्यादा रहतीं. अचानक एक दिन स्कूल से वापिस आया अर्पित घर में पसरे सन्नाटे से चौंक गया. रामू काका भी बरामदे में चुपचाप बैठे थे. पापा का कमरा बंद था. इस वक्त तो पापा हॉस्पिटल में होते हैं.

“क्या बात है, रामू काका, मम्मी कहाँ हैं, क्या पापा आज हॉस्पिटल नही गए?”

“क्या बताएं बेटा, बहुत गड़बड़ हो गई, तुम्हारी मम्मी भाग गई, मेरा मतलब चली गई. तुम चलो खाना खा लो. अपने पापा को भी बुला लो, उन्होंने भी खाना नहीं खाया है.”रामू की आवाज़ में दुःख था.

अर्पित को जैसे किसी अनहोनी का आभास हो गया था. भागता हुआ पापा के कमरे के बंद दरवाज़े पर दस्तक दी थी. कई बार पुकारने पर पापा ने दरवाज़ा खोला था. उनके चेहरे को देख अर्पित डर गया.

“क्या हुआ, पापा, आप हॉस्पिटल क्यों नहीं गए, खाना भी नहीं खाया?

“कुछ नहीं बेटा,आज भूख नहीं है, तुम खालो. मुझे कुछ ज़रूरी काम करने हैं.”

“पापा रामू काका कह रहे हैं मम्मी हैरी अंकल के साथ चली गईं, मम्मी क्यों चली गईं, क्या मम्मी के साथ आपकी लड़ाई हुई थी, वो वापिस कब आएंगी?”अर्पित रुआंसा था.

“पता नहीं— “ कह कर डॉ चंद्रा चुप हो गए.

“हम मम्मी के बिना कैसे रहेंगे?”

“तू तो मेरा बहादुर बेटा है, ये लेटर फादर जेम्स को दे देना वह सब सम्हाल लेंगे. हमेशा उनका कहना मानना. वो तुझे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं.”डॉ अमित ने एक लिफाफा अर्पित को थमा दिया.

‘क्या आप कहीं जा रहे हैं? हम आपके बिना नहीं रह सकते, मम्मी भी नहीं हैं.”अर्पित जोर से रो पडा,.

“बहादुर बच्चे ऐसे नहीं रोते. हमेशा हिम्मत से काम करना. अच्छा अब तुम जाओ, मुझे वकील अंकल से बात करनी है.”अर्पित के सिर पर प्यार से हाथ फेर उसके पापा ने उसे भेज दिया.

परेशान अर्पित पापा की अजीब बातें नहीं समझ पाया. वह उसे फादर जेम्स की बात मानने को क्यों कह रहे थे. मम्मी के बिना घर कितना सूना लग रहा था. हांलाकि वह उसे ज़्यादा वक्त नहीं देती थीं, पर उनका घर में होना उसे साहस देता था. रोते हुए ना जाने कब आँख लग गई. रामू काका ने झकझोर कर जगाया था.

“उठो भैया, गज़ब हो गया. मालिक चले गए.”वह रो रहा था,

“क्या हुआ, काका, पापा कहां चले गए?”आंखे मलता अर्पित उठ गया.

“पता नहीं, डॉक्टर साहिब कह रहे हैं, दिल का दौरा पडा था, वह बचा नहीं सके.”

अर्पित बिस्तर छोड़ पापा के कमरे की तरफ भागा था. डॉक्टर बोस अंकल और फादर जेम्स धीमे-धीमे बातें कर रहे थे. उनकी बातों से अर्पित को पापा के ज़हर खाने जैसी कोई बात सुनाई दी थी, पर बोस अंकल ने कहा पापा को दिल का दौरा पडा था. सच क्या था, अर्पित की समझ के बाहर था.

अर्पित स्तब्ध रह गया, सदमे की वजह से आंसू गले में ही फंस गए. क्या मम्मी के घर से चले जाने की वजह ने पापा को ज़हर खाने को विवश कर दिया. शहर में पापा का कितना नाम है, मम्मी उन्हें छोड़ कर अंकल के साथ चली गईं, ये बदनामी उसके स्वाभिमानी पापा कैसे सह सकते थे? .दुःख और आक्रोश ने अर्पित को पागल सा कर दिया.

पापा को मुखाग्नि देता अर्पित बिलख पडा था. लन्दन के पते पर मोनिका और हैरी नहीं मिल सके थे, उनकी खोज करने का कोई ज़रिया भी नहीं मिल रहा था. आंसू पोंछ कर दृढ आवाज़ में अर्पित ने सबके असमंजस को दूर कर दिया था-

“किसी का भी इंतज़ार करना बेकार है. अब देर करने की ज़रुरत नहीं है.”

जब फादर जेम्स ने आ कर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा तो उनसे लिपट कर अर्पित जोर से रो पडा. अचानक उसे याद आया पापा ने उसे उन्हें लेटर देने को कहा था. लेटर पढ़ते फादर जेम्स गंभीर हो गए.

“डोंट वरी, माई चाइल्ड. आज से तू मेरा बेटा है. हम दोनों साथ रहेंगे.

“फादर,अब हम इस घर में नहीं रहेंगे.”अर्पित रो रहा था.

“ठीक है, अर्पित. मेरा घर बहुत बड़ा है, उसमे एक अलग हिस्सा तुम्हारा होगा. वैसे. तुम्हारे पापा ने अपनी विल में लिखा है, जब तुम अट्ठारह साल के हो जाओगे तब तुम उनकी सारी संपत्ति और कैश के हकदार होगे. मुझे उन्होंने तुम्हारा अभिभावक और ट्रस्टी बनाया है. अभी ये बातें तुम नहीं समझ सकोगे, मुझ पर यकीन रखना बेटे, वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा.”उनकी आवाज़ में प्यार और करुणा थी. इतनी छोटी उम्र में उस बच्चे को कितना सहना पड़ रहा था. सच्चाई उनसे छिपी नही थी रामू से बात कर के उन्हें मोनिका के हमेशा के लिए पति को छोड़ कर जाने की बात पता लग गई थी.

अपने घर से विदा होते अर्पित की आँखों के सामने ना जाने कितने चित्र उभर रहे थे, यादें आंसुओं में बह निकलीं. अपना कमरा छोड़ता अर्पित एक-एक चीज़ को भीगी आँखों से समेट रहा था. फादर जेम्स उसकी मानसिक स्थिति को समझ रहे थे. दस वर्षों का इतिहास मिट रहा था. पुरानी यादों में रामू काका ही उसके साथ जा रहे थे. फादर जेम्स जानते थे अर्पित उनके साथ कितना जुड़ा हुआ था. रामू काका ने अर्पित को बताया, मम्मी पापा को बिना कोई वजह बताए चुपचाप एक चिट छोड़ कर चाचा के साथ चली गई थी. अर्पित समझ नहीं पा रहा था, मम्मी ने ऐसा क्यों किया. अभी कुछ दिन पहले रोज़ी की मम्मी, रोज़ी के पापा को तलाक दे कर चली गई, पर ये बात रोज़ी के पापा और दूसरों ने स्वाभाविक रूप से ली थी. मम्मी ऐसे क्यों चुपचाप भाग गई, हां, रामू काका ने यही तो कहा था.

दिन बीतने लगे, फादर जेम्स का स्नेह अर्पित के दुखों पर मरहम का काम कर रहा था. वैसे भी दुःख भुलाने के लिए समय ही सबका सहायक बनता है. पढाई में तो अर्पित पहले ही बहुत अच्छा था, अब फादर की गाइडेंस और अपना दुःख भुलाने के लिए पढाई ही उसकी साथी थी. लेकिन सहानुभूति जताने के बहाने लोगों की बातें उसे तिलमिला देतीं. उनकी बातें दिमाग में गूंजती रहतीं. मन अशांत और बेचैन हो जाता. माँ के लिए मन में गहरा आक्रोश उभरता, पर उसे कहाँ किस के सामने निकाल पाता. कभी सोचता पापा ने आत्महत्या क्यों की, कम से कम वह तो उसके साथ रहते. अर्पित को क्यों भूल गए, उसे अकेला छोड़ गए. अर्पित अब अंतर्मुखी हो गया था.

एक दिन फादर ने कहा-

“अर्पित माई चाइल्ड, तुम्हारी मम्मी तुमसे मिलने आई है, वह तुम्हे अपने साथ लन्दन ले जाना चाहती हैं. वोटिंग- रूम में तुम्हारे अंकल के साथ तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं.”

“नहीं, कभी नहीं, वह मेरी माँ नहीं हैं. मै उनसे नहीं मिलूंगा, ना उनके साथ लन्दन जाऊंगा.”अर्पित की आँखें जल रही थीं, हाथ की मुट्ठियाँ भिंच गई थीं.

“ठीक है, पर एक बार अपनी मम्मी से मिल तो लो. तुम्हे जबरदस्ती उनके साथ नहीं जाना होगा.”

“फादर, मुझे उनकी शक्ल भी नहीं देखनी है, आप जा कर कह दीजिए.”कड़ी आवाज़ में अर्पित बोला.

तभी मोनिका उसकी आवाज़ सुन कर कमरे में आ गई. अर्पित से कहना चाहा-

“अर्पित बेटे, तुम यहाँ अकेले कैसे रहोगे? मेरे साथ चलो, मै तुम्हारी माँ हूँ”

“नहीं, तुम मेरी माँ नही हो, तुमने पापा को मारा है, यहाँ से चली जाओ. मुझे फादर के साथ रहना है.” रोता हुआ अर्पित, मोनिका को स्तब्ध छोड़ कर वहां से चला गया.

बहुत समझाने पर भी अर्पित मोनिका से बात तक करने को राजी नहीं हुआ. हार कर मोनिका वापिस चली गई.

मोनिका के जाने के बाद अर्पित ने फादर जेम्स से गंभीरता से कहा-

“फादर, आपको एक प्रॉमिस करना होगा, मेरे बारे में कोई भी इन्फौर्मेशन उन दोनों को नहीं देंगे.”

“ठीक है, मै तुम्हारे मन की बात समझता हूँ, ऐसा ही होगा, पर अगर कभी तुम्हारा मन बदले तो मुझे बता देना. मेरे पास तुम्हारी माँ अपना पता छोड़ गई है. उसे आशा है एक दिन तुम उसे ज़रूर माफ़ करोगे.’फादर ने प्रॉमिस किया.

दिन महीने और साल बीतते गए. अर्पित ने अकेलेपन को अपना लिया था. मित्रों में बस उसकी पुस्तकें, फादर जेम्स और रामू ही उसके साथी थे. उसकी गंभीरता किसी को भी उसके पास आने से रोकती रही. अर्पित को बारहवीं कक्षा में सर्व प्रथम स्थान मिला. उसकी पीठ ठोंकते फादर ने पूछा-

“अर्पित, अब तुम्हे डिसाइड करना है, आगे तुम क्या करना चाहते हो?’

“फादर, मुझे पापा का सपना पूरा करना है, वह मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे. मै भी उनकी तरह हार्ट-स्पेशलिस्ट बनना चाहता हूँ.”दृढ आवाज़ में अर्पित ने अपना लक्ष्य बता दिया.

“मुझे खुशी है, तुम अपने पापा का सपना पूरा करना चाहते हो. मुझे पूरा यकीन है तुम्हे सफलता मिलेगी.” फादर ने विश्वास के साथ उसका हौसला बढाया.

मेडिकल कॉलेज में एडमीशन की कोई समस्या ही नहीं थी. एंट्रेंस एक्जाम में भी उसे प्रथम स्थान मिला था. कॉलेज के प्रोफेसरों में से कुछ उसके पापा से परिचित थे. वैसे बात छिपाई जाने के बावजूद लोगों तक उसके पापा की मृत्यु का रहस्य पहुँच चुका था. अफवाहों पर अंतिम समय में उनकी पत्नी की अनुपस्थिति ने संदेह को सत्य में बदल दिया था. अठारह वर्ष पूरे होने पर फादर ने अर्पित से उसके पापा की वसीयत के बारे में बताकर पूछा-

“तुम्हारे पापा तुम्हारे नाम काफी धन और संपत्ति छोड़ गए हैं, अब तुम जिस तरह चाहो इसका उपयोग कर सकते हो.”

“मुझे कुछ नहीं चाहिए. इस धन से आप गरीब बच्चों की सहायता कीजिए. मेरे घर को अनाथ बच्चों का घर बना दीजिए. मुझे यकीन है आपके ऐसा करने से पापा की आत्मा को खुशी मिलेगी.”

‘तुम अपने पापा के सच्चे बेटे हो, ऐसा ही होगा.”प्यार से फादर ने अर्पित के सिर पर हाथ रख कर कहा.

कॉलेज के प्रोफेसर अर्पित जैसे होनहार विद्यार्थी की क्लास में काफी तारीफ़ करते. उसके साथी भी उसकी योग्यता से प्रभावित थे. दिन-महीने साल बीतने लगे. अर्पित अब मेडिकल के फाइनल इयर में पहुँच गया था. तभी एक दिन एक नई लड़की ने क्लास में प्रवेश लिया था. प्रोफ़ेसर अभी नहीं आए थे, लड़की ने क्लास के सामने खड़े हो कर अपना परिचय बिंदास स्टाइल में दिया-

“हाय गाइज़, मै अंकिता, नवाबों के शहर लखनऊ से आई हूँ. हीरोइन बनने का सपना था, पर पेरेंट्स की जिद की वजह से मेडिसिन कर रही हूँ. पापा की पाकिस्तान के उच्चायोग में पोस्टिंग की वजह से आपके शहर में आई हूँ, इस शहर में मेरे एक अंकल रहते हैं, बस इसी लिए इस कॉलेज में एडमीशन लिया है. कॉलेज में देर से आई हूँ, आपकी हेल्प चाहिए.” चेहरे पर मीठी मुस्कान थी.

‘आपके लिए तो जान भी हाज़िर है, अंकिता जी, बस हुकम करती जाइए.” शरारती नरेन ने कहा.

क्लास में ठहाके गूँज उठे, तभी प्रोफ़ेसर वर्मा के आने से सब चुप हो गए. अंकिता ने अपने बैठने के लिए निगाह दौडाई, अर्पित के साथ खाली जगह देख कर अंकिता नि:संकोच अर्पित के पास जा कर बैठ गई. अर्पित हलके संकोच के साथ थोड़ा और सिमट गया. पीछे से रजत ने रिमार्क दिया-

“वाह, क्या जगह चुनी है, टॉपर से हेल्प लेना आसान होगा.”

क्लास खत्म होने के बाद अंकिता ने अर्पित से कहा-

“कुछ देर पहले आपकी तारीफ़ सुनी आप टॉपर हैं, मेरी हेल्प तो करेंगे.?

“तारीफ़ लायक तो कुछ नहीं है, बस अर्पित हूँ. हाँ किसी की भी हेल्प करना, मेरा फ़र्ज़ है.”

“अर्पित, आप ही हर बैच के टॉपर हैं, तब तो तारीफ़ लायक हुए ना? फ़र्ज़ निभाने के लिए तहे दिल शुक्रिया, वैसे हम लखनऊ के हैं, हमारी बातों में लखनवी अंदाज़ तो होना ही चाहिए.”फिर मुस्कराहट.

घर वापिस आया अर्पित अंकिता की बेबाक बातों को सोच कर मुस्कुरा दिया. ये भी क्या बताने की बात थी कि वह हीरोइन बनना चाहती थी, वैसे शायद वह एक अच्छी हीरोंइन बन सकती थी. सिर्फ अच्छी शक्ल ही नहीं उसमे अभिनय की भी क्षमता है. कितनी आसानी से अपनी बात कह गई. अचानक अपनी सोच पर अंकित चौंक गया. वह क्यों किसी लड़की की फ़िज़ूल की बातों के बारे में सोच रहा था.

दूसरे दिन अर्पित को देखते ही अंकिता के चेहरे पर खुशी खिल आई. पहले दिन की तरह ही आज भी वह नि:संकोच अर्पित के पास बैठ गई

अचानक अर्पित की फ़ाइल पर उसकी लिखाई देख कर कह बैठी-.

“आपकी लिखाई बहुत अच्छी है, हांलाकि डॉक्टर्स अपनी खराब लिखाई के लिए मशहूर होते हैं.”

“ऎसी कोई बात नहीं है, मेरे पापा की लिखाई भी बहुत अच्छी थी.”

“क्या आपके पापा डॉक्टर हैं, इसीलिए आपको उनकी इतनी अच्छी गाइडेंस मिली है.”

“मेरे पापा मुझे गाइड करने के पहले ही चले गए.”अर्पित का चेहरा अवसादपूर्ण था.

“ओह, सॉरी. आपकी माँ आपके साथ रहती हैं?”

“मेरी कोई माँ नहीं है. फादर जेम्स ही मेरे सब कुछ हैं.”अचानक जैसे उसके चहरे पर आक्रोश आ गया.

“माफ़ कीजिएगा, आप शायद किसी वजह से परेशान हैं. क्या हम दोनों दोस्त बन सकते हैं?”

“मेरी किसी के साथ ना दोस्ती है ना दुश्मनी, हम क्लास के साथी हैं, क्या इतना ही काफी नहीं है?’

अर्पित ने रूखी आवाज़ में कहा.

“ये बात आप जैसे जीनियस के लिए भले ही काफी हो, पर हमें तो दोस्त के बिना ज़िंदगी ही बेगानी लगती है. कोई तो ऐसा होना ही चाहिए जिसके साथ दिल खोल कर बात की जा सके. बाई दी वे क्या हम रोज़ आपके साथ इस बेंच पर बैठ सकते हैं?”चेहरे पर वही मीठी मुस्कान खिली थी.

“ये बेंच मेरी प्रॉपरटी नहीं है, जहां जी चाहे बैठ सकती हैं.”आवाज़ में रूखापन साफ़ था.

“कमाल है, इतनी लंबी बात कहने की जगह आप छोटी सी बात कह सकते थे- जैसे श्योर या माई प्लेज़र”

“मेरा यही तरीका है, आप लड़कियों से दोस्ती क्यों नहीं कर लेतीं?“कह कर चुप हो गया.

“हमें लगता है कि लडकियां शायद हमें पसंद नहीं करतीं, उन्हें लगता है, हम पढाई के लिए सीरियस नहीं हैं, बस यहाँ ऐसे ही आ गए हैं.”मासूमियत से अंकिता ने कहा.

“ऐसा तो मुझे भी लगा, जब आपने दिल खोल कर अपनी बात कही थी.”

“इसका मतलब आपने हमारी बाते सच मान ली. फॉर योर इन्फौर्मेशन हम टॉपर भले ही नहीं हैं, पर हमेशा फर्स्ट डिवीजनर रहे हैं.”उसके सुन्दर मुख पर हल्का सा गर्व छलक आया.

प्रोफ़ेसर कुमार के आते ही क्लास में शान्ति छा गई.

बीच में ब्रेक होने पर अक्सर स्टूडेंट्स कैफेटेरिया में कॉफी के लिए जाते थे. नरेन के साथ कुछ लड़कों ने अंकिता को भी कॉफी के लिए इनवाइट किया.

“अंकिता जी ये समय हमारे कॉफी पीने का है, आप भी चलिए.”

“ओह श्योर, अर्पित आप नहीं चलेंगे?”

“मै कॉफी या चाय नहीं पीता, थैंक्स.”

“कमाल है, मुझे तो कॉफी के बिना नींद आने लगती है.”

कैफेटेरिया में जूनियर तथा सीनियर स्टूडेंट्स ही नहीं काफी इंटर्न्स भी थे, सब एक कोने की टेबिल पर बैठ गए.

“आज अंकिता जी के साथ सबको मेरी तरफ से कॉफी और स्नैक्स.” नरेन ने खुशी से कहा-

“क्यों क्या आज आपका जन्म दिन है?’अंकिता ने पूछा.

“अरे आप आज पहली बार हमारे साथ आई है, क्या ये कम खुशी की बात है?”

“थैंक्स, पर मुझे यह मंजूर नहीं है, मै अपनी कॉफी अपने आप ला सकती हूँ.” अपनी बात कहती अंकिता उठ कर कॉफी लाने चली गई.

”यार कमाल की लड़की है, नरेन को भी सबक सिखा दिया,” आकाश ने हंस कर कहा.

अगले दिन अंकिता बड़े आराम से अर्पित के पास बैठ गई. धीमी आवाज़ में बोली-

“अब जबकि ये बेंच जगह आपकी प्रॉपरटी नहीं है, तो इस जगह पर अपना अधिकार जमा सकती हूँ. कोई ऑब्जेक्शन तो नहीं है?”शरारती मुस्कान चहरे को और कमनीय बना गई थी.

“अच्छा हो आप लड़कियों के साथ बैठा कीजिए, मुझे परेशान करने की ज़रुरत नहीं है.”

“आपको बताया तो था लडकियां हमसे जेलस हैं, हमने टॉपर के साथ दोस्ती जो कर ली है.”

“आप मेरी दोस्त किसी हालत में नहीं हो सकतीं, अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिए.”

“दोस्ती ना सही, दुश्मनी भी तो नहीं है. इतना ही काफी है. कल प्रोफ़ेसर कुमार के लेक्चर के कुछ नोट्स छूट गए थे आज अपने नोट्स देने होंगे.”अधिकार से अंकिता ने कहा.

“अगर क्लास में ध्यान से नोट्स नहीं ले सकतीं, तो अच्छा हो फिल्म लाइन में चली जाओ. शायद वही जगह तुम्हारे लिए ठीक होगी.”अचानक अर्पित ने अंकिता को तुम कह कर संबोधित कर गया.

“सच कहो, तुम ऐसा ही सोचते हो या नोट्स ना देने का बहाना है. हाँ हम साथी हैं फिर एक-दूसरे को तुम ही कहना ठीक है, साथियों को आप कहना बड़ा फार्मल सा लगता है.”

“मेरे पास बेकार की बातों के लिए वक्त नही है. एक सच और जान लो, मुझे अकेले रहने की आदत है, किसी का साथ नहीं चाहिए.”कड़ी आवाज़ में अर्पित ने कहा.

“ये तो साफ़ दीखता है. क्लास के इतने साथियों के होते हुए भी तुम बिलकुल अकेले क्यों हो, अर्पित?”

“यही मेरी ज़िंदगी का सच है, इसमें झांकने की कभी कोशिश मत करना.”सपाट आवाज़ में उसने कहा.

अंकिता जैसे उसके कठोर चेहरे से डर गई, क्या है अर्पित की ज़िंदगी का सच? कुछ ही दिनों में अंकिता अर्पित के रूखे बर्ताव के होते हुए भी उसमे रुचि लेने लगी थी. उसकी गंभीरता और तेजस्विता ने उसे आकृष्ट किया था. जो भी हो वह अर्पित की ज़िंदगी का सच जानने की कोशिश ज़रूर करेगी. शायद फादर जेम्स के पास उसके जीवन का सच सुरक्षित है.

एक दिन क्लास के बाद बारिश होने लगी थी, अंकिता बारिश से बेपरवाह हलकी बूंदों का आनंद लेती हॉस्टल के लिए पैदल ही चल दी. साइकिल पर जा रहे दो लड़कों को यह नज़ारा देख मस्ती करने की सूझी. साइकिल से उतर कर अंकिता के दांए बांए चलते हुए कुछ उलटे-सीधे रिमार्क्स देने की हिमाकत कर बैठे. अंकिता ने रुक कर एक की कमीज़ का कालर पकड़ उसके चेहरे पर जोर का तमाचा लगा कर शान्ति से कहा कहा-

“चल तेरी साइकिल पर तेरे घर चलती हूँ, घर में माँ बहिन तो होंगी, इस मौसम में उनके हाथ की चाय और पकौड़ी तो मिलेगी? उन्हें भी तो पता लगना चाहिए तू कितना बड़ा हीरो है.”

सकपका कर दोनों अपनी साइकिलें ले कर भाग लिए. पीछे से आरहे लोगों का इस दृश्य ने अच्छा मनोरंजन किया.कुछेक ने अंकिता को बधाई दे कर कहा लड़कियों को ऎसी ही हिम्मती होना चाहिए.

दूसरे दिन यह घटना कॉलेज तक पहुंच गई. लड़कियों ने भी अंकिता की तारीफ़ करके कहा-

“तुम्हारी हिम्मत से हमें भी साहस मिला है, हमें भी ऐसे ही इन जैसों को तुम्हारी ही तरह ठीक करना चाहिए, ऐसे गुंडों की वजह से हमारा अकेले आना- जाना मुश्किल हो गया है .”

समय बीतने लगा. फाइनल एक्जाम्स के लिए कुछ ही समय रह गया था. थियोरी क्लासेज के साथ प्रैक्टिकल चल रहे थे. सीनियर रेसिडेंट्स और प्रोफेसरों के साथ वार्ड के मरीजों की केस हिस्ट्री और रिपोर्ट देखना और समझना होता था. अक्सर वार्ड के राउंड के समय अंकिता भी अर्पित के साथ होती. अर्पित की जानकारी और उसके उत्तर प्रोफेसरों को प्रभावित करते. उसकी बनाई पेशेंट्स की केस- हिस्ट्री देख कर प्रोफ़ेसर कान्त दूसरे स्टूडेंट्स के सामने अर्पित की तारीफ़ करते हुए कहते-

“मुझे पूरा यकीन है, अर्पित एक दिन एक बहुत सफल कारडियोळॉजिस्ट बनेगा.”

एक दिन एक बच्चे को बेड पर अकेले रोता देख अंकिता बच्चे के पास जा कर प्यार से बोली-

“क्या हुआ, क्यों रो रहे हो? अच्छे बच्चे ऐसे नहीं रोते. क्या मम्मी की याद आ रही है?’

“हो सकता है, इसे माँ की याद नही, बल्कि उससे जुड़ी कोई दुःखद बात याद आ रही हो”अजीब स्वर में अर्पित ने कहा.

“कमाल करते हो, भला माँ से जुड़ी कोई बात तकलीफ कैसे दे सकती है?”अंकिता विस्मित थी.

“कभी-कभी कोई ऎसी बात बच्चे की ज़िंदगी ही ख़त्म कर देती है, तुम नहीं समझोगी.”

अंकिता सोच में पड़ गई, क्या रहस्य है जिसने अर्पित को इतना कटु बना दिया है. फादर जेम्स के पास से वो रहस्य पता करना होगा.एक दिन अचानक अंकिता को अपने सामने आया देख कर फादर चौंक गए.

“यस माई डियर, तुम्हे क्या कहना है, क्या कोई परेशानी है?’प्यार से फादर ने पूछा.

अपना परिचय देकर अंकिता ने सीधे शब्दों में कहा था-‘

“फादर, आपका बेटा अर्पित एक जीनियस है, पर वह सामान्य लड़कों जैसा नहीं है. ऐसा लगता है जैसे उसके मन में कोई गहरा दुःख छिपा हुआ है. हमें उसके साथ हमदर्दी है, क्या आप बताएंगे वह ऐसा क्यों है?”आशापूर्ण दृष्टि फादर के चेहरे पर निबद्ध थी.

“तुम अर्पित को कब से जानती हो?’

“अभी कुछ महीने ही हुए हैं, पर ऐसा लगता है मानो बहुत पहले से जानती हूँ.”

“कुछ और समय बीतने दो, शायद उसे जान सको. इतनी जल्दी किसी को जान पाना संभव नहीं होता.’

“हमारा मानना है, किसी के साथ वर्षों का परिचय हो तब भी उसे नहीं जाना जा सकता, पर किसी के साथ कुछ समय का परिचय भी वर्षों पुराना सा लगता है.”अंकिता की आवाज़ में विश्वास था.

“शायद तुम ठीक कहती हो, मुझे खुशी है, तुम अर्पित को जानना चाहती हो, इसके लिए इंतज़ार करो, अगर कभी उसके दिल के पास जा सकीं तो वह खुद तुम्हे सब बता सकेगा. अगर तुम उसकी सच्ची दोस्त बन सकीं तो मुझे भी खुशी होगी, अब मेरी प्रेयर का समय होरहा है, गॉड ब्लेस यू. फादर चले गए.

बाहर निकल रही अंकिता का सामना रामू से हो गया.

“तुम कौन हो बेटी, किससे मिलने आई थीं?” स्नेह से रामू ने पूछा.

“क्या आप इसी घर में रहते हैं?हम फादर के पास आए थे.”अंकिता ने आदर से जवाब दिया.

“ हाँ हम और मुन्ना मतलब अर्पित बेटा इसी घर में रहते हैं.”

“अप अर्पित के साथ कब से रहते हैं? हम अर्पित की दोस्त हैं, उनके साथ पढ़ते हैं..”

“अरे हमने ही तो पांच बरस के मुन्ना को पाल- पोस कर इतना बड़ा किया है. तुम मुन्ना की दोस्त हो .अब तुम्हें ऐसे वापिस नहीं जाने देंगे आओ, कुछ खा पी कर जाना.”

ठीक है, काका .”घर भीतर से सुव्यवस्थित था.एक कुर्सी पर बैठ अंकिता ने रामू से वही सवाल दोहराया जिसका उत्तर वह फादर से जानना चाहती थी.

“हमें बहुत खुशी है, तुम हमारे मुन्ना की दोस्त हो और उसकी उदासी दूर करना चाहती हो. मुन्ना एक हंसते –खेलते परिवार का एकलौता बेटा था. बुरा हो उस हरीश का जिसने इस घर को आग लगा दी और हमारे मुन्ना को अनाथ बना दिया.”दुखी स्वर में रामू ने कहा.

“ऐसा क्या हुआ, काका? आप हम पर भरोसा रखिए, हम आपकी बेटी जैसे हैं. हम मुन्ना का दुःख दूर करना चाहते हैं, उसे ज़िंदगी मे खुशियाँ देना चाहते हैं, इसीलिए हम फादर से बात करने आए थे. आपसे हमारे मिलने और बात करने के बारे में अर्पित को कुछ मत बताइएगा.”

“अगर तुम सच कह रही हो तो हम तुम्हें पूरी बात बताते हैं. बेटी.” रामू ने अर्पित की माँ के घर छोड़ कर जाने और पिता की मृत्यु की कहानी सुनाते हुए कई बार पनियाई आँखें अपनी धोती के खूंट से पोंछी. अंकिता चाय का सिप लेते हुए रामू की बातें सुन रही थी. दस वर्ष के बालक के असहनीय दुःख की कल्पना से उसके नयन भी भर आए.

“जानती हो बेटी दस बरस का मुन्ना एक ओर माँ-बाप के बिछोह का दुःख सह रहा था, दूसरी तरफ लोगों के तानों ने उसका दिल छलनी कर दिया. वह उस दिन के बाद से हमेशा के लिए हंसना भूल गया.”

“अब आप परेशान ना हों, अर्पित को फिर हंसाने और खुश करने की अब मेरी ज़िम्मेदारी है.”लौटते हुए रामू के पाँव छू कर उन्हें विस्मित कर दिया.

“खुश रहो, बेटी. अब आती रहना. तुमने इस बूढ़े को नई ज़िंदगी दी है.”

उस दिन के बाद से अंकिता अर्पित के साथ और भी अपनापन महसूस करने लगी. अपना ज्यादा से ज़्यादा समय अर्पित के साथ बिताना उसे अच्छा लगता. कठिन से कठिन काम और सवाल अर्पित अपनी तीव्र मेधा से जिस आसानी से पूरा कर लेता वो अंकिता को चमत्कृत करता. अंकिता की कोशिश रहती वह अर्पित के साथ सीरियस बातों की जगह खुशगवार बातें करती रहे, जो अर्पित का मूड बदल सकें.. उसके परिहास अक्सर अर्पित को मुस्कुराने को विवश कर देते. ताज्जुब की बात यह थी कि अब अर्पित भी अंकिता के साथ सहज होने लगा था. उसकी शरारती बातों पर उसके ओंठों पर हलकी मुस्कान आ जाती. अब अंकिता का साथ उसे बोझिल नहीं लगता, पर पता नहीं वह अपने इस परिवर्तन को लक्ष्य कर सका था या नहीं.

प्रसिद्ध नाटक कम्पनी के निर्देशक और प्रोड्यूसर सागर वर्मा नरेन के मित्र थे. इस बार सागर की कम्पनी के नए नाटक “अनारकली” के शहर में आने की घोषणा जोर-शोर से की गई थी. सागर ने नरेन को नाटक के टिकट बेचने की ज़िम्मेदारी दी थी. टिकट देने आए सागर से नरेन ने अंकिता का परिचय कराते हुए कहा-

“इनसे मिल वैसे तो अंकिता जी डॉक्टर हैं, पर इनका पहला शौक फिल्म लाइन में जाने का था.”

“मै दावे के साथ कह सकता हूं, अगर अंकिता जी फिल्म लाइन में जातीं तो टॉप की हीरोइन होतीं अंकिता जी, आपको टिकट बेचने में हमारी हेल्प करनी होगी. हम ये नाटक कैंसर-रोगियों के इलाज के लिए धन एकत्रित करने के लिए कर रहे हैं. मेरी बहिन को इसी कैंसर ने हमसे छीन लिया.”सागर ने उदासी से कहा.

“आपके इस नेक काम में हमारी पूरी मदद होगी.” अंकिता ने संजीदगी से कहा.”

“ये ले अब अंकिता जी ने मदद को कहा है तो समझ ले तेरे टिकट मिनटों में बिक जाएंगे.”नरेन ने विश्वास से कहा.

“थैंक्स, अंकिता जी.”टिकटों का बंच दे कर सागर चला गया.

“शुरुआत अर्पित तुम से करते हैं, ये रहा पहला लकी टिकट.”अंकिता ने अर्पित को टिकट देना चाहा.

“मै ऐसे नाटकों को देखने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता, पर जिस उद्देश्य के लिए नाटक किया जा रहा है, उसकी हेल्प के लिए मुझे दस टिकट दे दो. ये मेरी तरफ दे सहयोग होगा.”

“शुक्रिया, जनाब, पर उन्हें दान नहीं चाहिए, नाटक देखने तो तुम्हें जाना ही होगा.”

दो दिन बाद अचानाक परेशान सागर अपने कुछ साथियों के साथ अंकिता के पास आया.

“अंकिता जी, हमें आपकी बहुत बड़ी मदद चाहिए, हम बहुत मुश्किल में पड़ गए हैं.”

“क्यों क्या हुआ, आपके टिकट नहीं बिके?”

“जी नहीं, टिकट आशा से अधिक बिक गए हॉळ भी मिल गया है. पर सबसे बड़ी कठिनाई ये है कि हमारी हीरोइन के पाँव में फ्रैक्चर हो गया है. अब वह अनारकली का रोल नहीं कर सकती है.”

“ओह, यह तो गंभीर समस्या है. अब आप क्या करेंगे?” अंकिता कंसर्न दिखी.

“इसी लिए हम आपकी मदद माँगने आए हैं. प्लीज आप अनारकली का रोल कर लीजिए.”

“ये कैसे संभव है, नाटक के लिए बस एक सप्ताह बचा है. इतने कम समय में डायळॉग कैसे याद हो सकते हैं?” अंकिता ने समस्या बताई.

“माफ़ कीजिएगा हम कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे इस लिए आपको खबर देनी पड़ी. कुछ देर में आप सब उससे मिल लीजिएगा. डॉक्टर अंकिता आपको देख कर खुश होगी.” डॉक्टर सिन्हा ने कहा.

.”वाह मम्मी-पापा ये आप क्या कह रहे हैं, अर्पित ने तो पूरी ज़िंदगी अतीत की काली कमली ओढ़े रखने की ठान रखी है. अगर उसे उतार दिया तो ज़िंदगी क्या बेमानी नहीं हो जाएगी, क्यों अर्पित ठीक कहा ना?”अंकिता ने सीधा व्यंग्य किया.

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“अब आप ही हमें इस कठिनाई से उबार सकती हैं, हमें पूरा यकीन है. आप लखनऊ की रहने वाली हैं, आनारकली के डायळॉग बहुत आसानी दोहरा सकेंगी. प्लीज हमारी विनती मान लीजिए.”

“प्लीज अंकिता सागर की बात मान लो. वैसे भी तुम अनारकली के रोल में बहुत अच्छी लगोगी. “रजत और नरेन ने भी रिक्वेस्ट की.

“ठीक है, पहले मुझे स्क्रिप्ट देखनी है. अगर पॉसिबिल हुआ तभी रोल करूंगी.” अंकिता ने शर्त रखी.

“ये लीजिए हम स्क्रिप्ट आपके लिए ही लाए हैं.” सागर ने स्क्रिप्ट देते हुए कहा.

अंकिता ने स्क्रिप्ट पर नज़र डाली. पढ़ते हुए उसके चेहरे पर भावों के उतार-चढ़ाव स्पष्ट दिख रहे थे.

“ठीक है हम कोशिश करेंगे, पर अगर एक्टिंग में कमी रह जाए तो माफ़ करना होगा. समय बहुत कम बचा है वरना इस भूमिका को तो हम अछ्ही तरह से निभाते. अनारकली हमारी फेवरिट पात्र है.”

“थैंक्स, अंकिता जी. आप नहीं जानतीं आपने हमें डूबने से बचा लिया है.”सागर गदगद था.

उनके जाने के बाद अंकिता उस स्क्रिप्ट में खो सी गई.

“सुनो, अर्पित, कल सन्डे की छुट्टी है, हम तुम्हारे साथ कॉलेज के स्टेज पर रिहर्सल करेंगे.”

“नहीं ये असंभव है, तुम्हें जो करना है, करो. मुझे इन झंझटों में खींचने की कोशिश मत करना.”

“वाह, कैसे दोस्त हो, हमारी हेल्प तो करनी ही होगी. समझ लो एक अच्छे काम के लिए मदद करोगे. अगर उन्हें प्रोग्राम कैंसल करना पडा तो क्या अन्याय नहीं होगा?”अंकिता ने पूछा.

“पहली बात तो मै तम्हारा दोस्त नहीं हूँ, हाँ कैंसर पीड़ितों की मदद करने की वजह से आ जाऊंगा.”

सन्डे के दिन कॉलेज का स्टेज खाली था. नियत समय पर अंकिता पहुँच गई, कुछ देर बाद अर्पित भी आ गया. अंकिता ने अर्पित की पोजीशन बता कर खडा रहने को कहा. स्टेज की एक साइड से बाहर आती अंकिता ने झुक कर बड़ी अदा से अपना डायळॉग शुरू किया-

“ओह मेरे शहजादे, आपके दीदार की आरज़ू में इस कनीज़ की जान अटकी हुई है, वरना - - -

इतना बोल कर अंकिता रुक गई. अर्पित की तरफ स्क्रिप्ट बढ़ा कर कहा-

“अर्पित तुम्हें शाहजादे सलीम का रोल यहाँ से पढ़ कर कहना है--.”ऐसा न कहो, मेरी जान - -‘”

“ये क्या बकवास है? तुमने आने को कहा था, इसका मतलब ये नहीं कि मै नाटक करूंगा.”

अर्पित आक्रोश में आ गया था.

“नाराज़ क्यों होते हो मेरे शहजादे?ये नाचीज़ तो आप पर कुर्बान है.”अंकिता हंस रही थी.

“मै जा रहा हूँ. याद रखो, मुझे ऐसे मज़ाक पसंद नहीं हैं.”अर्पित ने नाराज़गी से कहा.

“किसने कहा ये मज़ाक है, तुम तो मेरे सलीम बन चुके हो, अर्पित. सच पता नहीं कब और कैसे हम तुम्हें चाहने लगे हैं. तुम्हारी गंभीरता, तेजस्विता, मेधा ने आकृष्ट किया और तुम हमारी चाहत बन गए.”अंकिता ने गंभीरता से कहा.

‘ये कैसी बातें कर रही हो, मुझे नाटकों की भाषा बिलकुल पसंद नहीं. अगर मेरा अतीत जान पातीं तो मुझसे नफरत करतीं.”बात कहते हुए अर्पित जैसे कहीं खो सा गया.

“हम अतीत में नहीं वर्तमान में जीते हैं. जानते हो अतीत को भूतकाल कहा जाता है, यानी उसे भूलने में ही जीवन है. तुम्हारा अतीत कुछ भी रहा हो, अब तुम मेरे वर्तमान और भविष्य हो. हम दोनों मिल कर इसे खुशियों से भर देंगे. नफरत तो हमारे बीच सांस ले ही नहीं सकती.”अंकिता ने विश्वास से कहा.

“तुम एक लड़की हो, ऎसी बातें किसी अच्छी लड़की को शोभा नहीं देतीं.”अर्पित ने नाराजगी से कहा,

“हम आज की लड़की हैं, साफ़ दिल के हैं और सच्ची बात कहने में ज़रा भी नहीं हिचकते. हम तुम्हें प्यार करने लगे हैं, ये सच्चाई है. वैसे हमारे स्वभाव के बारे में इतना तो तुम जान ही चुके हो.”

‘मेरी प्यार शब्द पर आस्था नहीं है, उस पर विश्वास करना मूर्खता है.अगर प्यार में शक्ति होती तो मेरी माँ मेरे इतना प्यार करने वाले पापा को छोड़ कर किसी और के साथ क्यों जातीं”अर्पित अचानक अपने जीवन का कडवा सच कह गया.

“सिर्फ इसीलिए तुम्हारा प्यार से विश्वास उठ गया है.कि तुम्हारी माँ ने अपनी मनपसंद जीने की राह चुन ली? एक बात बताओ एक विवाहित पुरुष किसी पराई स्त्री के साथ विवाहेत्तर संबंध बनाए रख सकता है, जब पत्नी से मन भर जाए उसे छोड़ कर दूसरा विवाह कर सकता है तो एक स्त्री अपना मनपसंद साथी क्यों नहीं चुन सकती?”अंकिता ने अर्पित से सवाल किया.

“ तुम नहीं जानतीं, पापा उन्हें कितना प्यार करते थे , पापा ने मम्मी की किसी बात की कभी शिकायत नही की फिर भी मम्मी उन्हें आत्महत्या करने को छोड़ गईं.

“एक कड़वा सच यह है कि तुम्हारे पापा स्वार्थी और कायर थे. उनका अहं सबसे ऊपर था वरना अपने दस साल के बेटे के बारे में कुछ नहीं सोचा, समाज में अपने अपमान की बात तो सोची, बेटे को भुला कर स्वयं आत्महत्या कर के मुक्त हो गए अगर संभव हो मेरी बातों को शान्ति से सोचना,.”कुछ तेज़ी से अंकिता ने अपनी बात कही.

“तुम्हें ये बातें किसने बताईं? जो कह रही हो, ये सच नहीं है, मेरे पापा कायर और स्वार्थी नहीं थे.”अर्पित बेचैन हो उठा.

“तुम जो सोचते हो सोचो, मेरी सोच अलग है. खैर तुम्हारे मन से तुम्हारे पापा की छवि धूमिल नहीं करना चाहती, पर अपनी माँ के साथ अन्याय कर रहे हो, सच कहो, क्या तुम्हे कभी अपनी माँ याद नहीं आतीं?. एक बात कहूं, नाराज़ मत होना, तुम्हारे साथ शादी के बाद तुम्हारी माँ से आशीर्वाद लेने तुम्हें खींच कर उनके पास ले जाऊंगी.”अंकिता ने मुस्कुरा कर कहा.

“एक सच मुझ से भी जान लो. ना कभी हमारी शादी होगी ना ही तुम्हारे सपने सच होंगे. तुमने तो मेरी सोच पर बहुत चोट पहुंचाई है, अंकिता. अपनी सोच को बदल पाना आसान नहीं है, इसीलिए कहता हूँ, मुझे छोड़ दो, हमारा मिलन असंभव है,”

“सॉरी, हमारी डिक्शनरी में असंभव शब्द है ही नहीं , तुम्हें भी हमारी बात माननी ही होगी. अब तो ये अंकिता तुम्हारी बन चुकी है, अर्पित. ”

“मेरी इच्छा के विरुद्ध मुझसे कोई काम नहीं करा सकता.”यकीन से अर्पित ने कहा.

“ये बात तो समय आने पर ही पता लगेगी, हमें तो पूरा यकीन है हम तुम्हारी अंकिता ज़रूर बनेंगे. .”मुस्कुराती अंकिता ने कहा.

“तुम मेरे साथ विवाह के सपने मत देखो, मेरा अतीत तुम्हारे पेरेंट्स को कभी स्वीकार नहीं होगा.”

“हम अपने को भी जानते हैं और अपने पेरेंट्स को भी जानते हैं. शादी का फैसला हम दोनों का होगा, उसमें उन्हें कोई ऐतराज़ कैसे हो सकता है? हम दोनों बालिग हैं, अपना भला-बुरा समझते हैं. वैसे भी हमारी पापा- मम्मी को अपनी बेटी के निर्णय पर पूरा यकीन रहता है.उनका तो बस आशीर्वाद होगा.”

“तुम सपनों की दुनिया में जीती हो, अंकिता, मे भविष्य में नहीं अपने अतीत के साथ जीता हूँ.”

“अपने अतीत का काला कम्बल कब तक ढोते रहोगे अर्पित, अब इसे उतरवा के रहूंगी, ये मेरा वादा है . अब नाटक की तैयारी के लिए जा रही हूँ.“

अंकिता नाटक में अभिनय की तैयारी पूरे मन से कर रही थी. अंकिता ने अर्पित को नाटक देखने जाने को तैयार कर लिया था. नाटक देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ जमा थी. मेडिकल कॉलेज के साथी अंकिता को अनारकली के रूप में देखने को उत्सुक थे.

पहले ही दृश्य में अंकिता छा गई. अपने अभिनय, सौन्दर्य और परिधान से उसने अनारकली को साकार कर दिया था. उस दिन पहली बार अर्पित को अंकिता के विषय में पता चला कि अपनी दूसरी क्वालिटीज़ के साथ वह एक बहुत अच्छी नृत्यांगना भी है. नाटक की समाप्ति पर हॉळ तालियों से गूँज उठा.

सफलता से उत्साहित सागर ने सभी कलाकारों और मित्रो को दूसरे दिन डिनर के लिए आमंत्रित करना चाहा, पर अर्पित ने अपना प्रस्ताव रख सबको विस्मित कर दिया.

“कल आप सब मेरे घर डिनर लें तो समझूंगा इस पुनीत कार्य में मेरा भी थोड़ा सा सहयोग है.”

“वाह मेरे सलीम तुम तो सचमुच शहजादे बन गए, थैंक्स. वैसे तुम्हें मेरा एक्टिंग कैसा लगा,अर्पित?” अंकिता ने धीमे से पूछा.

“ये तो जानता था, तुम अच्छी अभिनेत्री हो, कोई और लड़की तुमसे ज़्यादा अच्छा एक्टिंग शायद ही कर पाती.”अर्पित ने सच्चाई से कहा.

“वाह, आज तो मेरा जीवन सफल हो गया., अनारकली ने सलीम को इम्प्रेस कर ही लिया.

दूसरी संध्या सब अर्पित के घर पहुंचे थे. अंकिता पहले ही पहुंच गई थी. किचेन में जाकर रामू से बोली-

“काका अब आपकी मदद करने हम आ गए हैं. बताइए क्या करना है?”

“अरे नहीं बिटिया, हमने सब तैयार कर लिया है. तुम आराम से बैठो. तुम्हें देख कर बहुत अच्छा लग रहा है. उस दिन के बाद आई ही नहीं.”खुशी से रामू ने कहा.

“अंकिता, क्या तुम रामू काका से मिल चुकी हो? काका तुम्हें कैसे जानते हैं?”आवाज़ सुन कर अर्पित किचेन में आ गया था.

“ये हमारा और काका का सीक्रेट है, हम उनकी बिटिया हैं. ठीक कहा ना काका?”अर्पिता हंस रही थी.

“अच्छा तो हमारे बारे में काका ने ही तुम्हें बताया है.”अर्पित समझ गया, अंकिता अपना होम वर्क कर चुकी थी.

सबके साथ अंकिता की वो संध्या बहुत अच्छी बीती. हमेशा गंभीर रहने वाला अर्पित भी हंस रहा था.’

सबने अंकिता के अभिनय की जी खोल कर तारीफ़ की सागर ने अंकिता को मोती का सेट देते हुए कहा-

“इन मोतियों की किस्मत है जो तुम इन्हें पहिनोगी. तुम्हारे संपर्क में ये और अधिक चमक उठेगे,”डिनर के बाद सब हँसी-खुशी विदा हुए.

उस रात अर्पित ना चाहते हुए भी अंकिता के विषय में सोचता रह गया. उसकी बातें भुला पाना संभव नहीं था. यह सच था, अंकिता अगर फिल्मों में जाती तो टॉप की हीरोइन होती. वह बिना किसी हिचक के अपने मन की बात साफ़-साफ़ कह जाती है. क्या वह सचमुच अर्पित को चाहने लगी है? पापा और मम्मी के बारे में बिना डरे अपनी राय दे दी. अचानक अर्पित को अपनी माँ याद आने लगीं. जब वह अच्छे मूड में होती थीं तो अर्पित को कितना प्यार करती थीं. पापा की मृत्यु के बाद भी वह उसे अपने साथ ले जाने आई थीं. और पापा क्या वह कायर थे? शायद मम्मी को डर था, तलाक माँगने पर वह मम्मी को तलाक नहीं देते इसीलिए मम्मी ने यह राह चुनी होगी.. बहुत देर बाद वह सो सका था .फोन की घंटी से उसकी नींद टूटी. फोन पर रजत था

“अर्पित बहुत बुरी खबर है. अंकिता का सीरियस एक्सीडेंट हो गया है, वह आई सी यू में है.”

“क्या कैसे?जवाब बिना सुने किसी तरह बदहवास अर्पित हॉस्पिटल पहुंचा था. आई सी यूं में अंकिता बेहोश थी. माथे पर पट्टी बंधी हुई थी. अर्पित व्याकुल हो उठा. वहां खड़े लड़कों ने बताया कॉलेज आते समय अंकिता की रिक्शा से तेज़ गति से आ रहा ऑटो रिक्शा टकरा गया. गनीमत है, अंकिता उछल कर दूर जा गिरी वरना ऑटो रिक्शा उस पर चढ़ जाता. उस दृश्य की कल्पना से अर्पित काँप उठा.

“डॉक्टर अंकिता कैसी है, वह सीरियस तो नहीं है?”एक सांस में अर्पित डॉक्टर सिन्हा से पूछ बैठा.

“हैव पेशेंस, तुम तो खुद एक डॉक्टर हो, अर्पित. जब तक पेशेंट को होश नहीं आ जाता कुछ नहीं कहा जा सकता. गॉड ब्लेस हर, उसके पेरेंट्स को इन्फौर्म कर दिया है.” डॉक्टर चले गए.

अर्पित निढाल सा बैठ गया. अंकिता की एक-एक बात याद आ रही थी. क्या वह खुद भी उसे नहीं चाहने लगा था. उसका साथ कितना जीवंत हुआ करता है. अनजाने ही अंकिता उसके जीवन में स्थायी जगह बना चुकी है, स्पष्ट समझ में आ रहा था. अंकिता के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव है. पूरे दिन बिना खाए-पिए अर्पित निश्चल बैठा था. रजत, नरेन सागर के कहने पर मुश्किल से एक कप चाय गले से नीचे उतारी थी. सबकी समझ में आ गया था, अर्पित का अंकिता के साथ दोस्ती से ज़्यादा कुछ और ही रिश्ता बन चुका है. सब अंकिता के लिए मौन प्रार्थना कर रहे थे.

शाम की फ्लाइट से अंकिता के पेरेंट्स आ गए. और ये संयोग ही था कि उनके आते ही अंकिता ने आँखें खोली थीं. नर्स ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया था. अर्पित हाल जानने को आगे बढ़ आया.

“डॉक्टर अर्पित, खतरे की कोई बात नहीं है. चोट गहरी नहीं थी, सदमे से बेहोश हो गई थी. शी इज फाइन.”सीनियर डॉक्टर सिन्हा ने आश्वस्त किया.

“सर, अंकिता के परेंट्स आए हैं.”अर्पित ने परिचय कराया.

अर्पित और और अंकिता के पेरेंट्स के चेहरों पर आशा और खुशी की चमक आ गई. आदर से अंकिता के पेरेंट्स को अपना परिचय देते ही, अंकिता की माँ ने प्यार से कहा-

“तुम्हें अपना परिचय देने की ज़रुरत नहीं है, अर्पित. अंकिता ने तुम्हारे बारे में सब कुछ बताया है. हम तो तुमसे मिलने आने ही वाले थे, पर आज अचानक आना हो गया.”

अर्पित के साथ अपने मम्मी-पापा को देखती अंकिता खुश हो गई.

“सॉरी मम्मी-पापा, मेरी वजह से आपको आना पड़ गया. अर्पित तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?”

“तुमने तो मेरी जान ही ले ली थी, पता नहीं क्या-क्या सोच बैठा था.”

“अपनी इस हालत का मतलब जनाब समझ पाए या नहीं? मम्मी कहने को ये जीनियस डॉक्टर है, हार्ट स्पेशलिस्ट बनने चला है, पर अपने दिल की बात ही नहीं समझता.”अंकिता ने मज़ाक किया.

“ऐसा ही होता है, बेटी. उम्मीद है, तेरे एक्सीडेंट ने इसे इसके दिल का राज़ खोल दिया. सुना है सवेरे से भूखा-प्यासा तेरी सलामती की प्रार्थना कर रहा है.”अंकिता के पापा ने हंस कर कहा.

“अर्पित तुम मम्मी-पापा को अपने कॉलेज की कैंटीन में ले जाओ, हमें पता है मम्मी-पापा ने भी कुछ नहीं खाया होगा. मम्मी, अर्पित को भी कुछ खिला देना, मम्मी इन जनाब का चेहरा सूख गया है वरना शहजादे सलीम दीखते हैं.” हंसती अंकिता ने अर्पित को चिढाया.

“चुप रह, इस वक्त भी शरारत से बाज़ नहीं आ रही है, अर्पित ये मेरी बेटी बड़ी साफ़ दिल की लड़की है, इसकी बातों पर नाराज़ तो नहीं होते?”

“जी नहीं, अंकिता को समझता हूँ.”धीमे से अर्पित ने कहा.

रात में अंकिता को डिस्चार्ज कर दिया गया. अंकिता और उसके मम्मी-पापा के साथ पांच सितारा होटल में अर्पित को भी जाना पडा. अंकिता के पापा की पोजीशन की वजह से उन्हें विशेष सम्मान दिया जा रहा था. डिनर के बाद कमरे में पहुँच अंकिता की मम्मी ने अर्पित से पूछा-

“अर्पित बेटे, एक महीने बाद तुम दोनों फाइनल इयर पूरा कर लोगे, उसके बाद तो बस एक वर्ष की इंटर्नशिप ही करनी है. हमारी बेटी तुम्हें बहुत चाहती है, क्या तुम उसे अपनी जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार करोगे?”

“अभी मै इस विषय में कुछ नहीं सोच सका हूँ, मै एम् एस करना चाहता हूँ. वैसे शायद आप मेरा अतीत नहीं जानतीं वरना आप ये प्रस्ताव नहीं रखतीं.”संकोच से अर्पित ने कहा.

“एम् एस तो अंकिता भी करेगी, पर उसके लिए तुम दोनों की शादी बंधन नहीं बनेगी, बल्कि दोनों साथ –साथ पढाई पूरी कर लोगे. अंकिता हमें तुम्हारे और तुम्हारे अतीत के बारे में सब कुछ बता चुकी है, तुम्हें अपने मन में अतीत से कोई शिकायत नहीं रखनी चाहिए.”अंकिता के पापा ने गंभीरता से अपनी बात कही

“हाँ बेटे, तुम्हारे साथ जो हुआ दुखद था, पर उसे भुलाने में ही समझदारी है.”माँ ने भी हामी भरी.

“एक बात जान लो, मेरी बेटी अंकिता जो ठान लेती है, उसे पूरा कर के ही छोडती है, मुझे पूरा यकीन है, अगर तुम अपने अतीत से छुटकारा पाना चाहते हो तो अंकिता ही उसकी दवा है.”पापा ने कहा.

“आप लोग बेकार परेशान हैं, अर्पित मेरे लिए भूखा-प्यासा पूरे दिन बैठा रहा क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि जनाब अर्पित भी मुझे बेहद चाहते हैं. ये अपने मन की बात नहीं मानने की जिद करता है, पर असल में तो हम इसके मन को जानते हैं.. क्यों अर्पित इस सच को तो स्वीकार करोगे या कह दो ये झूठ है.”अंकिता ने सीधी दृष्टि अर्पित पर डाल गंभीरता से कहा.

“मानता हूँ, अपने मन को नहीं समझा पाया, ये तुमसे हार गया, अंकिता. हाँ तुम्हारी जीत पर मुझे खुशी है. तुमने जो सपने देखे, अपने अतीत के कारण मुझे उन पर विश्वास नही था, पर तुमने जो कहा सच कर दिया. तुम्हारा आभारी हूँ, अंकिता.”अर्पित के चेहरे पर खुशी की आभा थी.

“अंकिता तेरे एक्सीडेंट की वजह से हमें आना पडा, पर तूने जिसे अपने जीवन साथी के रूप में चुना, उसे स्वीकार करते बहुत खुशी है. हमारा आशीर्वाद हमेशा तुम दोनों के लिए रहेगा.” पापा ने खुशी से कहा.

“ये हमारा सौभाग्य है अर्पित कि हमें तुम्हारा जैसा योग्य बेटा मिला है. हमें अंकिता के चुनाव पर हमेशा यकीन रहा है, तुम्हारे साथ हमारा परिवार पूर्ण हो गया. हमारी अंकिता अब तुम्हारी हुई.” मम्मी के सजल नयनों में प्यार था.

“अर्पित अब पापा-मम्मी का आशीवाद तो चरण-स्पर्श कर के ले लो या ये भी बताना होगा?”हंसते हुए अंकिता ने कहा.

मम्मी-पापा के चरण छूने को झुके अर्पित को पापा ने प्यार से अपने सीने से लगा लिया. “पापा’ कहते अर्पित के नयन भर आए. वर्षों का अवसाद पल भर में तिरोहित हो गया.
 
शंखनाद नव युग का

रात के डेढ़ बजे फोन की घंटी ने कंचन को गहरी नींद से जगा दिया. इस वक्त फोन कौन कर सकता है? दूसरी ओर से आशीष की उत्साहित आवाज़ सुनाई दी.

“कांची, अभी सोई तो नहीं थी?”

“नहीं, इतनी जल्दी कैसे सो सकती हूँ. अभी वक्त ही कितना हुआ है, बस रात के डेढ़ ही तो बजे हैं.”

“वही तो, मै जानता था, तू अभी जाग कर कोई कविता लिख रही होगी. एक अच्छी खबर है, तुझे सुनाए बिना सो नही सकता था.”कंचन यानी कांची के स्वर का व्यंग्य आशीष को छू भी नहीं गया.

‘देख आशू, हम गहरी नींद में सो रहे थे, अब बता इस वक्त फोन क्यों किया?”

“अच्छी खबर है, अमरीका से मेरे दोस्त ने इन्फार्म किया है, फिज़िक्स में रिसर्च करने के लिए मेरी एप्लीकेशन एक्सेप्ट हो गई है. अब बस अगला सेशन शुरू होते ही मै अमरीका के लिए उड़ जाऊंगा.”

“कांग्रेट्स, बस इसी खबर के लिए मुझे जगा दिया. मुश्किल से सो पाई थी, सोचती रही, कल रोहन को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवानी है. अगर रजिस्ट्रार नही माने तो वाइस चांसलर से ऐक्शन लेने के लिए मिलने जाना पडेगा.”कांची ने नाराजगी से कहा.

“देख कांची, तू अपनी नेतागिरी छोड़ जल्दी से अपना एम ए कम्प्लीट कर डाळ, मेरे साथ अमरीका जाने के लिए तेरी नेतागिरी नही एम ए की फर्स्ट डिवीज़न चाहिए. देर की तो पछताएगी.”

“थैंक्स फ़ॉर योर एडवाइस, अपना अच्छा-बुरा समझती हूँ. जनाब अभी अमरीका गए नहीं और उड़ान भरने लगे.” कांची ने फोन काट दिया.

कंचन और आशीष के घर पास-पास थे. दोनों परिवारों में इतनी घनिष्ठता थी कि परिवारों के बच्चे अपना-पराया जान ही न सके. आशीष उम्र में कंचन से तीन वर्ष बड़ा था, पर कंचन हमेशा उस पर हावी रहती. कांची की हर छोटी-बड़ी बात मान लेने में ही आशीष की खैर थी.

“आशू, कल प्लाज़ा में रणबीर कपूर की फिल्म लग रही है. हमें पहले शो के चार टिकट चाहिए.”

“कमाल करती है, जानती है फर्स्ट डे, फर्स्ट शो में कितनी भीड़ होती है मुझे धक्के नहीं खाने है.”

“मेरी फ्रेंड्स ने मुझे चैलेंज दिया है, अब टिकट ना मिलने पर मेरी कितनी इन्सल्ट होगी, क्या मेरी इन्सल्ट तुम्हे अच्छी लगेगी? ठीक है मुझे ही धक्के खाने जाना होगा.” भोलेपन से कांची कहती.

“इस बार टिकट ला दूंगा, पर आगे से ऐसा चैलेन्ज अपने भरोसे लेना, मेरे भरोसे रहेगी तो चैलेंज पूरा नहीं कर सकेगी. इसके बावजूद कांची की हर जिद उसे पूरी करनी ही पड़ती..

“थैंक्स, आशू तुम कितने अच्छे हो.”कांची की मुस्कान पर आशू न्योछावर हो जाता.

कंचन कवितायेँ लिखती और सबसे पहले हर कविता आशीष को सुननी पड़ती. उसकी कविता आशीष को ना सिर्फ सुननी पडतीं बल्कि उसकी खूब तारीफ़ भी करनी होती. दोनों उम्र के उस पड़ाव पर थे जहां प्यार हो जाना स्वाभाविक बात होती, पर दोनों ही इस बदलाव से अनजान थे. इतना ज़रूर था दोनों को एक-दूसरे का साथ अच्छा लगता. अपनी खुशी और परेशानी दोनों शेयर करते.

एम् एस सी में फर्स्ट डिवीज़न के बाद अमरीका में रिसर्च करके वहीं काम करने का आशीष का सपना था. वैसे तो उसने पार्ट टाइम जॉब ले लिया था, पर अपनी रिसर्च के लिए अमरीका की यूनीवार्सिटीज़ में ऐप्ळाई कर रहा था. आज जैसे ही उसे अमरीका में अपने ऐडमीशन की खबर मिली, उस खुशखबरी को कांची को सुनाने से नहीं रोक सका.

दूसरी ओर अपनी मेधा के कारण कंचन एम् ए फाइनल की शान थी. अपनी वाक् पटुता और निर्भीक स्वभाव की वजह से वह यूनीवर्सिटी यूनियन की सेक्रेटरी चुनी गई थी. आशीष कांची के कवयित्री रूप का बड़ा प्रशंसक था, पर यूनीवर्सिटी की राजनीति में कांची का हर छोटी-बड़ी लड़ाई में आगे रहना आशू को अच्छा नहीं लगता था.

कल ही कांची ने बताया था रजिस्ट्रार के बेटे रोहन ने बी ए पार्ट वन की लड़की रेशमा की चुन्नी सबके सामने उसके कंधे से खींच हवा में उड़ा दी थी. घुटनों में मुंह छिपाए रोती रेशमा के चारों ओर मोटर बाइक घुमाते हुए अपने साथियों के साथ गाता रहा-

“हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का हो जी-- -“ कुछ शरीफ लड़कों की मदद से रेशमा का दुपट्टा मिल सका था, पर रेशमा की आँखों से बहते आंसुओं का रोहन पर कोई असर नहीं पडा.

कांची तक जब यह बात पहुंची, उसका खून उबल पड़ा. सीधे रजिस्ट्रार के ऑफ़िस में जाकर रोहन के खिलाफ लिखित शिकायत करके कड़ी से कड़ी कार्रवाई का अनुरोध किया था.

रजिस्ट्रार ने बात रफा-दफा करने के लिए कहा था-

“देखिए मिस कंचन, रैगिंग में थोड़ा बहुत हंसी-मज़ाक चलता ही है. मै रोहन को समझाऊंगा. वह रेशमा से माफी मांग लेगा. आगे से वह ऎसी कोई गलती नहीं करेगा.”

“माफ़ कीजिए सर, पर रोहन अपनी गुंडागर्दी के लिए मशहूर है. उसकी इस हरकत की वजह से रेशमा के माता-पिता उसकी पढाई बंद करवाना सोच रहे हैं. उन्हें डर है बेटी की बदनामी के बाद उसकी शादी नही हो पाएगी. उनकी इज्ज़त पर बन आएगी,”

“”आप तो राई का पहाड़ बना रही हैं. अगर रेशमा के पेरेंट्स इतने दकियानूसी ख्यालातों के हैं तो उन्हें बेटी को किसी लड़कियों के कॉळेज में भेजना चाहिए था.”

“ठीक है, सर. अगर आप कोई कड़ा ऐक्शन नही ले सकते तो मुझे यूनियन में यह बात उठानी होगी.”

“आप बेकार की जिद पर अड़ी हुई हैं, क्या सज़ा चाहती हैं आप, उसे देश-निकाला दे दूं या फांसी की सज़ा मिलनी चाहिए?”रजिस्ट्रार के स्वर में इकलौते बेटे की शिकायत पर आक्रोश स्पष्ट था.

“देश-निकाला तो आपके हाथ में नहीं है, पर उसे सस्पेंड तो किया जा सकता है, शायद आप नहीं जानते रोहन के नाम से स्टूडेंट्स के बीच कितना खौफ है. उसे ऎसी सज़ा मिलनी चाहिए ताकि वह समझ सके कि वह भी एक आम विद्यार्थी है.”

“ठीक है, देखता हूँ क्या कर सकता हूँ. मेरा बहुत समय बर्बाद हो गया, अब मुझे एक ज़रूरी मीटिंग में जाना है.” रजिस्ट्रार उठ खड़े हुए थे.

कंचन की पूरी बात सुन कर आशीष ने समझाना चाहा था—

“देख कांची, रोहन जैसे गुंडे से पंगा लेना ठीक नहीं है. अपनी ऎसी ही हरकतों की वजह से वह बदनाम है. उसकी दादागिरी से सब डरते हैं. पढाई से उसे कोई मतलब नहीं है, अभी तक बी ए भी पास नहीं कर सका है. रजिस्ट्रार कह रहे हैं की वह रेशमा से माफी मांग लेगा तो बात खत्म कर दे.”

“तुम्हारा मतलब है उसके डर से किसी के साथ अन्याय होता देख कर भी चुप रहूँ ? सेक्रेटरी होने के नाते अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना मेरा कर्तव्य है, आशू.”

“मुझे जो कहना था कह दिया, आगे तेरी मर्जी, चल कुछ ठंडा पी कर आते हैं, तेरा दिमाग शांत हो जाएगा.”आशू फिर कंचन से हार मान गया.

दूसरे दिन पता लगा रजिस्ट्रार एक सप्ताह की छुट्टी पर चले गए है. कंचन ने यूनियन के प्रेसीडेंट गौतम से बात की और यूनियन की ओर से कड़ी कार्रवाई करने का प्रस्ताव रखा. गौतम बात आगे बढाने के पक्ष में नहीं था. उसका कहना था रोहन रेशमा से माफी मांग ले और बात खत्म की जाए, पर उत्तेजित कंचन इसके लिए तैयार नहीं थी.

“देखो, गौतम अगर हम ऎसी घटनाओं को सीरियसली नहीं लेंगे तो गुंडागर्दी और बढ़ जाएगी. आज उसने एक लड़की की चुन्नी खींच कर उसे सबके सामने अपमानित किया है, कल वह इसके भी आगे बढ़ सकता है.”

“शायद वह ऐसा कर भी चुका है, उसने एक लड़की को जबरन अपनी कार में ले जाने की कोशिश की थी. सौभाग्य से उस लड़की के चिल्लाने पर कुछ लोगों ने उसे बचा लिया.”

“इसके लिए क्या उसकी पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई थी, गौतम?”कंचन विस्मित थी.

“नहीं, लड़की की बदनामी के डर से माँ-बाप चुप रह गए. वैसे भी रोहन के चाचा पुलिस के बड़े अधिकारी हैं, वह जानता है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा.”

“ठीक है. रोहन को यूनियन हॉळ में सबके सामने रेशमा से माफी मांगनी होगी और वादा करना होगा भविष्य में वह इस तरह की कोई हरकत नहीं करेगा.”

यूनियन हॉळ में भारी संख्या में विद्यार्थी जमा थे सब देखने को उत्सुक थे रोहन जैसा दबंग इंसान सबके सामने कैसे माफी मांगेगा. रेशमा तो आने को तैयार ही नहीं थी, पर कंचन के बहुत समझाने और हिम्मत दिलाने पर वह आई थी. नियत समय पर अपने साथियों के साथ पान चबाता हुआ रोहन दाखिल हुआ. एक नज़र चारों और डाळ, पान की पीक पिच्च से थूक कर बोला-

“अरे वाह ,यहाँ तो हमारे स्वागत की ज़ोरदार तैयारी की गई है. कहिए मैडम कंचन जी, हमारा डायळॉग कहाँ है? आखिर हम हीरो हैं, हमारा राइटर कौन है?”जोर से हंस कर रोहन बोला.

“बकवास बंद करो, सीधे-सीधे रेशमा से माफी मांगो और वादा करो आगे से कभी किसी के साथ ऐसा अभद्र व्यवहार नहीं करोगे.”कड़ी आवाज़ में कंचन ने चेतावनी दी.

“आपकी आज्ञा शिरोधार्य, पर ये तो फिल्मी ड्रामा है तो पूरी तरह से ड्रामा होना चाहिए. पहले हीरोइन को सामने लाइए. हम उसे छेड़ेंगे, वह रोएगी फिर हम माफी मागेंगे. अरे एक गड़बड़ हो गई आज लाल की जगह हीरोइन नीली चुन्नी ओढ़ कर आई है. पहले हीरोइन से कहिए वह लाल चुन्नी ओढ़ कर आए, तब हमारा ड्रामा शुरू होगा. क्यों दोस्तों, ठीक कहा ना?”

रोहन की इस बात पर कुछ विद्यार्थी हंस पड़े. कंचन की आखें क्रोध से लाल हो गईं. तैश में उठी कंचन ने रोहन के गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया. रोहन चौंक गया. विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया. गौतम के माथे पर पसीना छळछळा आया. रोहन ने जलती आँखों से कंचन को देख कहा

”ये थप्पड़ बहुत भारी पडेगा, याद रखना” फिर बिना माफी मांगे रोहन अपने दोस्तों के साथ चला गया.

“यह तुमने क्या किया कंचन, बड़ी मुश्किल से तो वह माफी माँगने को तैयार हुआ था. अब बात हाथ से निकल गई. तुम घर जाओ, मै बात सम्हालने की कोशिश करता हूं.”

“कैसे बात सम्हालेंगे, क्या उस रोहन से माफी माँगने का इरादा है?’तीखे स्वर में कंचन ने कहा.

“ये बात नहीं है, पर तुम नहीं जानतीं तुमने अपने लिए कितनी बड़ी मुश्किल खडी कर ली है. मुझे अब तुम्हारी चिंता है, कंचन.”गौतम ने गंभीर आवाज़ में कहा.

‘मेरी चिंता छोड़ो, अब रोहन से माफी कैसे मंगवाई जाए?”

“वो मै देख लूंगा. गलती हमारी ओर से भी हो गई, भले ही इसके लिए वह खुद ज़िम्मेदार था, पर इतने विद्यार्थियों के सामने अपना अपमान वह शायद ही भूल सके.”

घर वापिस पहुंची कंचन परेशान थी, शायद गौतम ठीक कह रहा है, उसे अपना मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए था. रोहन से डीळ करने की ज़िम्मेदारी गौतम पर ही छोड़ देनी चाहिए थी. आशू अभी अपने काम से वापिस नहीं आया था. कंचन आशू का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. उससे बात करके ही उसका मन हल्का हो सकता था.` आशू के आते ही कंचन एक सांस में पूरी घटना बता गई. पूरी बात सुनते आशू का चेहरा गंभीर हो गया.

“ये तुम क्या कर बैठीं, कांची? मै ने पहले भी समझाया था, रोहन एक बदनाम लड़का है, अपने पिता और पुलिस आफिसर चाचा के बल पर उसे कभी सज़ा नही दी जा सकी, इसी का फ़ायदा उठाता है.”

“मानती हूँ मुझे उस पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था, पर उसकी बातें सहन करना कठिन था, आशू.”

“अब तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा, कांची. रोहन अपने अपमान का बदला ज़रूर लेगा.”

“वह मेरा क्या बिगाड़ सकता है, अगर उसने कभी कोई गलत हरकत की तो उसका परिणाम उसे भुगतना होगा. तुम जानते हो मै कायर लड़की नही हूँ. याद नहीं, मै ने जूडो-कराटे की ट्रेनिंग ली है.”

“सब याद है, मेरी झांसी की रानी, पर अगर कोई गुंडा सीमा से आगे बढ़ कर कुछ करे तो तुम्हारे जूडो-कराटे धरे रह जाएंगे. मेरी बात समझ रही हो न? तुम्हारे आत्म विश्वास का मै प्रशंसक हूँ, पर अपने पर संयम रखना चाहिए. जोश में होश खो देना समझदारी नहीं है, कांची.”

“तुम मुझे डरा रहे हो आशू?”

“नहीं मेरी कांची, तुम्हे सावधान कर रहा हूँ. कल से मै तुम्हे अपने स्कूटर से पहुंचाया और लाया करूंगा.”गंभीर आवाज़ में आशू ने कहा.

“इस तरह से तो वो रोहन समझ जाएगा कि हम उससे डर गए हैं. वैसे भी दो महीने बाद तो तुम अमरीका जाने वाले हो. पता नहीं तुम्हारे बिना हम कैसे रहेंगे, आशू.”कांची उदास होगई.

“सच तो यह है, कांची पिछले कुछ दिनों से तुझे छोड़ कर जाने की बात सोच-सोच कर रातों में ठीक से सो नही पाता. हर समय तू मेरे ख्यालों में रहती है, चाह कर भी किसी और काम में दिल नही लगा पाता. ऐसा क्यों हो रहा है, कहीं ऐसा तो नहीं, मुझे तुझसे प्यार तो हो गया है?”आशीष ने गंभीरता से कहा.

“इस बारे में तो कभी सोचा ही नही, आशू, पर तेरे बिना हमें भी कुछ अच्छा नहीं लगता. तुम्हारे साथ अपनी सब चिताएं भूल जाती हूँ. कुछ भी होने पर बस तुम याद आते हो.”

“मुझे लगता है हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे हैं तभी तो एक दिन भी मिले बिना हमें चैन नहीं पड़ता. जब हम दोनों साथ होते हैं तो सब कुछ कितना अच्छा लगता है, कांची.”

“शायद तुम ठीक कहते हो, हमें ज़रूर प्यार हो गया है. हर खुशी और परेशानी में बस तू ही याद आता है, अब हम क्या करें, आशू?”कंचन ने भोलेपन से पूछा.

“वैसे तो प्यार का अंत शादी में होता है, पर जब तक मै सेटल नहीं हो जाता, शादी तो हम कर नही सकते. ये तो हम जानते हैं हमारे परिवार वालों को हमारा रिश्ता स्वीकार होगा इस लिए शादी में कोई अड़चन तो नही आने वाली है., ऐसा करते हैं, दूर रहते हुए हम एक-दूसरे को प्रेम-पत्र लिखा करेंगे. तुम कविताओं में प्रेम-पत्र भेजना और मै वैज्ञानिक शब्दावली में उत्तर दिया करूंगा.” दोनों खुल कर हंस पड़े.

आज पहली बार जब आशीष ने कंचन को अपनी बांहों में लिया तो संकोच से कंचन ने अपना चेहरा आशीष के सीने में छिपा लिया. उस पल से दोनों की दुनिया ही बदल गई. रात में नींद कोसों दूर भाग गई. कंचन विस्मित थी इतने दिनों तक प्यार उन दोनों के बीच कैसे रहस्य बना रहा. एक-एक बात याद करते हुए रात बीत गई. यही हाल आशीष का था. दोनों को रात काटनी मुश्किल लग रही थी, कैसे सुबह हो और दोनों मिल सकें. प्यार में पागलपन इसे ही तो कहते हैं.

दूसरी सुबह पिछले दिन का तनाव भूल, कंचन काफी देर तक शीशे में अपने को देखती रही. वह सुन्दर थी, यह बात सब जानते हैं, पर अब आशीष के सामने वह कुछ ज़्यादा ही सुन्दर दिखना चाहती थी. कुछ ही देर में आशीष का स्कूटर उसे लेने आ पहुंचा था. स्कूटर में आशीष के पीछे बैठी कंचन रोमांचित थी. इसके पहले इस रोमांच का उसने कभी अनुभव नहीं किया था. झटका लगने पर आशीष की पीठ से सटी बैठी कंचन और ज़्यादा रोमांचित हो जाती थी. उसे लग रहा था, मानो वह हवा में उड़ी जा रही थी. लड़कों के रिमार्क्स उसे सुनाई ही नही दे रहे थे. वापसी में कंचन को लेने आने का वादा करके जाते हुए आशीष को जब तक वह आँख से ओझल नहीं हो गया कंचन उसे देखती रही. कुछ समय को वह रोहन को भूल गई थी, पर गौतम ने आकर जैसे उसे मीठे सपने से जगा दिया.

“कंचन, अब परेशान होने की ज़रुरत नहीं है. कल शाम मै रोहन से मिला और उसे प्यार से समझाया. अपने अपमान के बाद उसने सबके सामने तो माफी माँगने से इनकार कर दिया, पर यह माफीनामा दिया है.”गौतम ने कंचन को रोहन का लिखा माफीनामा थमा दिया.

‘गौतम’ क्या तुम्हे लगता है, अब रोहन लड़कियों के साथ मिसबिहेव नही करेगा?”

“हमें उस पर विश्वास करने की कोशिश तो करनी ही चाहिए. अब बात को ज़्यादा तूल देना मुझे ठीक नहीं लगता है. वैसे भी तुमने तो उसे सज़ा दे ही दी है.”गौतम हलके से मुस्कराया.

दिन बीतने लगे. कंचन और आशीष को लगता समय पंख लगा कर उड़ रहा है. आशीष के अमरीका जाने के दिन पास आते जा रहे थे. उसके विरह की कल्पना कंचन को बेचैन कर जाती. दोनों के प्यार को परिवार वालों की मूक सम्मति तो थी ही बस कुछ समय प्रतीक्षा करनी थी. अब कंचन भी अपना एम ए पूरा करने के लिए सीरियस थी. उसने सोच लिया था अब अपनी सेक्रेटरीशिप से त्यागपत्र देकर मन लगा कर पढाई करेगी फर्स्ट डिवीज़न लाने पर ही तो अमरीका जाना संभव होगा.

एक शाम यूनियन की मीटिंग में किसी विषय पर सदस्यों के बीच ज़ोरदार बहस चल रही थी, बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, चाय और पकौड़े खाते वक्त का अंदाज़ ही नही हुआ कि अन्धेरा घिर आया था. आशीष दो दिनों के लिए अपनी नानी से मिलने कानपुर गया हुआ था. आज कंचन को लेने आशीष नहीं आने वाला था, इसलिए वह निश्चिन्त थी. उस बरसात में भीगते हुए जाने की जगह कंचन ने यूनियन हॉळ में ही रुक कर बारिश हलकी होने का इंतज़ार करना ठीक समझा. उसके साथ कुछ और सदस्य भी रुके थे. जिनके पास वाहन था वे चले गए थे. कुछ देर बाद जब बारिश हलकी हुई तो कंचन ने अपनी साइकिल निकाली. आशीष की याद में डूबी कंचन को हळ्की फुहार में भीगना अच्छा लग रहा था. अचानक एक मोड़ से मुड़ती कंचन की साइकिल के पहिए में किसी ने डंडा फंसा दिया. कंचन साइकिल समेत ज़मीन पर गिर गई. उसके उठने के उपक्रम की जगह कुछ सबल हाथों ने उसे उठा कर पास खडी वैन में डाल दिया. कंचन के मुंह पर कस कर पट्टी बाँध दी गई. काफी दूर जाकर वैन एक खंडहर के पास रुकी थी. कंचन को जबरन उतार कर ज़मीन पर लिटा दिया गया. कंचन का हाथ-पाँव मारना बेकार था. उन वहशियों के सामने वह अवश थी. तीनो युवकों ने खूब शराब पी रखी थी.

“अरे यार, ज़रा कंचन जी का मुंह तो खोल दे, इनकी गालियों के साथ जोर-जबरदस्ती करने में ही तो मज़ा आएगा.”रोहन बेशर्मी से हंसा था.

“मुझे छोड़ दो रोहन, वरना बहुत बुरा अंजाम होगा.”कंचन ने तेज़ आवाज़ में कहा.

“ये बात तो थप्पड़ मारने के पहले सोचनी चाहिए थी, अब पता लगेगा रोहन से पंगा लेने का क्या अंजाम होता है, सारी अकड़ धरी रह जाएगी.”

कंचन की जूडो-कराते की ट्रेनिंग उन तीन दरिंदों के सामने काम नही आई. अपनी हवस पूरी कर तीनो कंचन को उसी खंडहर में छोड़ कर वैन ले कर चले गए. कुछ देर तक कंचन अर्ध मूर्छित सी पड़ी रही, फिर अपने को सहेज हिम्मत करके उठी थी. फटे कपड़ों को चुन्नी से ढांप, कराहती कंचन ने अंदाज़ लगाया वह शहर से कुछ दूरी पर थी. अचानक उसकी निगाह थोड़ी दूर पड़े अपने पर्स पर पड़ी थी. शायद उसे वैन से उतारते हुए पर्स भी नीचे गिर गया था. पर्स में उसका मोबाइल सुरक्षित था. पुलिस का इमरजेंसी नंबर लगा कर कंचन ने अपनी जगह का अनुमान से पता बताया था. काफी देर प्रतीक्षा के बाद पुलिस की गाड़ी का सायरन सुन कंचन अपनी जगह पर खडी हो गई. चुन्नी हवा में लहरा कर अपनी उपस्थिति भी बताने की कोशिश की. पुलिस की गाड़ी कंचन के पास आकर रुकी थी

“आप ठीक तो हैं, कहिए क्या हुआ, आप यहाँ. कैसे पहुंची.”इन्स्पेक्टर ने सवालों की झड़ी लगा दी.

“मुझे पहले थाने ले चलिए, मुझे एफ़ आई आर लिखानी है.”मुश्किल से कंचन इतना ही कह सकी.

थाने पहुंची कंचन ने गौतम को फोन कर तुरंत थाने आने को कहा, साथ में अपनी परिचित डाक्टर कविता को भी लाने को कहा. इन्स्पेक्टर कुमार अब तक सारी बात समझ गया था. कंचन ने सधी आवाज़ में अपने साथ घटी घटना की रिपोर्ट में जैसे ही रोहन नाथ का नाम लिया इन्स्पेक्टर रुक गया.

“देखिए मैडम, सोच समझ कर रिपोर्ट लिखाइए, इससे आपकी बदनामी हो जाएगी. परिवार वालों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी.”

“अगर आपको मेरे परिवार और मेरी इज्ज़त का इतना ही ख्याल है तो पूरी रिपोर्ट ठीक-ठीक दर्ज कीजिए., मै यूनीवर्सिटी- यूनियन की सेक्रेटरी हूँ, एक बात और अभी वे गुंडे अपनी दरिंदगी का जश्न मना रहे होंगे, उन्हें अभी आसानी से पकड़ा जा सकता है..”कंचन ने तेज़ी से कहा.

विवश इन्स्पेक्टर को रिपोर्ट लिखनी पड़ी थी. रिपोर्ट पर साइन करने के पहले कंचन ने पूरी रिपोर्ट पढ़ कर साइन कर दिए. इस बीच घबराया गौतम कुछ लड़कों और डॉक्टर के साथ आ पहुंचा. कचन की हालत देख पूरी बात समझते देर नही लगी थी. डॉक्टर कविता ने अपना कोट उतार कंचन को पहना दिया. प्यार से सर पर हाथ फिराती डॉक्टर के सीने से चिपट कंचन फफक पड़ी. बड़ी देर तक साहस का जो बाँध बांधे हुए थी, वह टूट कर बह गया.

“घबराओ नहीं कंचन, हम अपराधियों को सज़ा ज़रूर दिलवाएंगे.”गौतम ने विश्वास से कहा.

“सबसे पहले कंचन का मेडिकल चेक-अप कराना ज़रूरी है. इस घटना से जुड़ा कहीं कोई तथ्य छूटना नही चाहिए. मेरे साथ एम्बुलेंस आई है. आओ कंचन.”प्यार से कंचन को कंधे से पकड़, डॉक्टर ने कंचन को उठाया था.

डगमगाते कदमों से कंचन सबके साथ एम्बुलेंस तक पहुंची थी. अस्पताल में डॉक्टर कविता के कारण कंचन को तुरंत एडमिट कर लिया गया. इस बीच गौतम ने कंचन के घर खबर कर दी थी. बदहवास माता-पिता बेटी को ऎसी हालत में देख संयम खो बैठे. कंचन की मां का रो-रो कर बुरा हाल था. जब उन्हें पता लगा कंचन ने इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में लिखाई है तो रोना भूल मां सहम गई.

“ये क्या अनर्थ कर बैठी, कंचन? हम तो किसी को मुंह दिखाने के भी लायक नहीं रहेंगे.”

“ऐसा क्यों कह रही हो मॉं, मेरी कोई गलती नही है. पापियों को सज़ा दिलवानी ही चाहिए.कंचन ने क्षीण स्वर में मॉं को समझाना चाहा.”

“तू इस दुनिया को नही जानती, बेटी. गलती कोई भी करे दोष लड़की को ही दिया जाता है. अब तेरा क्या होगा. हम तो लुट गए..”मां ने आँखों से आँचल लगा लिया.

“आप ये कैसी बात कर रही हैं? आपको तो अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए. आज के समय में ये ज़रूरी है कि इस तरह की घटना को छिपाया न जाए बल्कि उन भेड़ियों का पर्दाफाश करके उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दिलवाई जाए. अगर उन्हें छोड़ दिया गया तो वे फिर किसी ऐसे ही शिकार के लिए आज़ाद होंगे.”डॉक्टर कविता ने कंचन की मां को समझाना चाहा.

“ये सब कहने भर की बातें हैं, कौन मेरी बेटी का साथ देगा, कौन इससे शादी करेगा. इस पर तो दाग लग गया.”मां फिर फूट पडीं.

“ऎसी ही बातें तो लड़की का मनोबल तोड़ देती हैं. आज ज़माना बदल गया है, मांजी. आप कंचन को हिम्मत देने की जगह उसे डरा रही हैं. आप दामिनी को भूल गईं, पूरे देश ने उसका साथ दिया था.”

“आप ठीक कहती हैं डॉक्टर हम और हमारे सब साथी कंचन के साथ हैं. हम उन दरिंदों को सज़ा दिलवा कर रहेंगे. कंचन जी के साहस से दूसरी लड़कियों को प्रेरणा मिलेगी.”गौतम ने जोश से कहा.

“गौतम, कल मुझे डिस्चार्ज कर दिया जाएगा. तुम जल्द ही यूनियन हॉळ में जेनरल बौडी मीटिंग बुला लो. मुझे अपने साथियों से बात करना ज़रूरी है.“

“ये क्या कह रही हो, ऎसी हालत में - - -“गौतम अपनी बात पूरी नहीं कर सका.

“तुम परेशान मत हो, मै बिलकुल ठीक हूँ. मुझे मुंह छिपाने या डरने की कोई ज़रुरत नहीं है. छिपने की ज़रुरत उन दरिंदों को है.” उत्तेजना से कंचन का गोरा चेहरा लाल हो आया.

‘पागल हो गई है, पहले ही क्या कम बदनामी हुई जो अब अपनी बर्बादी की कहानी सरे आम सुना कर हमारे खानदान के मुंह पर कालिख पोतेगी,”माँ ने तीक्ष्ण स्वर में चेतावनी दे डाली.

“गलत कह रही हो, माँ, कालिख उनके मुंह पर लगेगी जिन्होंने पाप किया है. तुम परेशान मत हो.”

“तूने जब ठान ही ली तो कौन रोक सकता है. बाद में पछताने से कुछ नहीं होगा.”

“माँ जी आप परेशान ना हों, पूरी यूनीवर्सिटी के स्टूडेंट्स कंचन जी का साथ देंगे.”गौतम ने कहा.

चार दिन बाद यूनियन हॉल स्टूडेंट्स से खचाखच भरा हुआ था. जिन्हें घटना का कुछ आभास हो गया था वे धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे. कंचन के आते ही सन्नाटा छा गया. कंचन के चेहरे पर थकान होते हुए भी आँखें जैसे जल रही थीं. संयत आवाज़ में कंचन ने कहना शुरू किया=

“साथियो, अपने परिवार के कड़े विरोध के बावजूद आपके साथ अपनी आप बीती शेयर करने आई हूँ. मुझे पूरा विश्वास है आपका जो सहयोग मुझे मिलता रहा है आज भी मिलेगा. आप जानते हैं मै ने नि:स्वार्थ भाव से हमेशा न्याय और सच्चाई का साथ दिया है. अपने भाइयों से पूछना चाहती हूँ क्या आप अपनी बहिन का सम्मान लुटते हुए देख या सह सकते हैं? मै जानती हूँ आपका उत्तर नहीं होगा तो जान लीजिए आपकी इस बहिन कंचन का रोहन और उसके साथियों ने रेप किया है. मै ने एक लड़की के सम्मान की रक्षा में उनका विरोध किया था उसके बदले उन्होंने यह घृणित काम किया है. अगर शहर में रोहन जैसे भेड़िए खुले घूमते रहे तो वे अपने शिकार करते रहेंगे. मेरी माँ को और दूसरी माओं की तरह भय है कि अगर मेरे रेप की बात फैली तो परिवार और मेरी बदनामी होगी. क्या समाज के भय से हम इन पापी दरिंदों को और पाप करने की छूट दे सकते हैं. अगर मेरा रेप हुआ है तो क्या इसमें मेरी कोई गलती थी, नहीं, फिर मै क्यों उन दरिंदों का पाप छिपाऊँ? क्या रोहन और उसके साथी आज मेरी तरह सर उठा कर यहाँ खड़े हो सकते हैं? अब आपको न्याय करना है, सज़ा और समाज की घृणा किसे मिलनी चाहिए?”

“रोहन और उसके साथियों को फांसी दो. कंचन को न्याय दो” समवेत आवाजें गूँज उठीं.

दूसरे दिन अखबारों की सुर्ख़ियों में घटना छपी थी. यूनीवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने जुलूस निकाल कर थाने और रजिस्ट्रार के ऑफ़िस पर धरना दे दिया. रोहन और उसके साथियों को सज़ा दिलवाने के लिए पूरे शहर में शोर मच गया था. लडकियां और भी अधिक जोश में थीं. अब वे और अत्याचार सहने को तैयार नहीं थीं. घर पहुंची कंचन के पास लडकियां फूल लेकर पहुँच रही थीं, अब शहर की महिला संस्थाएं भी आन्दोलन में सम्मिलित हो गई थीं, पर जिसकी प्रतीक्षा कंचन को सबसे अधिक थी, आशू उसके पास नही आया था. अंतत: आशू भी सामान्य पुरुष ही निकला, उसके माता-पिता कुछ देर को आ कर उसे तसल्ली दे कर चले गए थे.

आखिर रोहन और उसके साथी पकडे गए. आन्दोलनकारियों ने उसे फांसी देने के लिए शोर मचाया. अचानक एक दिन रजिस्ट्रार कंचन के घर आ पहुंचे. भांसू भरी आँखों के साथ कंचन के सामने हाथ जोड़ कर रोहंन की गलती के लिए क्षमा मांगी थी.

“अपने बेटे की गलती के लिए बहुत शर्मिंदा हूँ, बेटी. तुम उसे जो सज़ा दोगी, मंज़ूर है, पर उसे माफ़ कर दो. अपनी रिपोर्ट वापिस ले लो. मै ज़िंदगी भर के लिए तुम्हारा कर्ज़दार रहूँगा ”

“अगर यही घटना आपकी बेटी के साथ होती तो क्या आप ऐसे पापी को माफ़ कर देते? रोहन के इस अपराध में आप भी शामिल हैं, रजिस्ट्रार महोदय. आपने अगर मेरी शिकायत पर कोई कडा ऐक्शन लिया होता तो आज रोहन इस हद तक नहीं बढ़ सकता था.”कडवे स्वर में कंचन ने अपना फैसला सुना दिया.’

“अपनी गलती मानता हूँ,बेटी, मेरी आँखों पर बेटे के प्यार का पर्दा पडा हुआ था. उसके अपराध के लिए मै तुमसे माफी माँगता हूँ. बस एक मौक़ा दे दो, कभी शिकायत का अवसर नही दूंगा.”

“आप मेरे पिता की उम्र के हैं , मुझसे माफी मांग कर शर्मिन्दा न करें. रोहन को उसके किए की सज़ा मिलनी ही चाहिए, शायद सज़ा पाने के बाद वह सुधर जाए. मुझसे माफी की आशा रखना व्यर्थ है.”

रोहन और उसके साथियों को जब अदालत ले जाया जा रहा था तो उत्तेजित भीड़ ने उस पर जूते और पत्थर फेक कर अपना आक्रोश प्रकट किया था. टीवी पर बराबर खबरे दी जा रही थीं, सारा शहर जैसे जाग गया था, गौतम और कुछ लड़के-लडकियां कंचन को दिन-प्रतिदिन के समाचार देने आते थे. उन्होंने लिखित रूप में अपनी मांगें अथॉरिटीज़ को सौंप दी थीं, उन दरिंदों को ज़मानत न दी जाए और जल्दी से जल्दी कड़ी सज़ा दी जाए, ये शर्तें पूरी होने पर ही आन्दोलन रुकेगा. उनकी शर्तें मान ली गईं थीं. अन्याय पर यह उनकी पहली विजय थी, पर अभी दरिंदों की सज़ा के लिए प्रतीक्षा करनी थी

पर आशू कहाँ था? सात दिन बीत चुके थे आशू का कहीं पता नही था. अपने कमरे में चुप बैठी कंचन जैसे दूसरी ही कंचन थी. उसकी तेजस्विता कहीं खो गई थी. टीवी पर आते समाचारों में उसकी रूचि ही नही रह गई थी. खिडकी से बाहर नज़र गडाए कंचन को किसी की प्रतीक्षा थी. इसी खिडकी पर खड़े हो कर वह और आशू दुनिया भर की बातें किया करते थे. आज इस समय जब उसे आशू की सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी वह कहीं नहीं था. दोनों ने जब अपने प्यार को पहचाना, भविष्य के मीठे सपने देखने शुरू किए तो एक झटके में सपने टूट कर बिखर गए. कहाँ है उसका आशू?

.“हेलो, मेरी झांसी की रानी, आराम फरमाया जा रहा है.”अपनी परिचित मोहक मुस्कान के साथ आशू कमरे में खडा था.

“आशू - - कहाँ थे?”कई दिनों के रुके आंसुओं का सैलाब बह निकला.

“ये क्या, मेरी शक्ल इतनी डरावनी तो नही कि मेरी कांची डर से रो पड़े.”आशू हंस रहा था.

‘तेरा कहना नहीं माना, आशू, माफ़ कर दे, हम से नफ़रत तो नही करेगा? तेरी नफरत हम सह नही सकेंगे.”कंचन की आवाज़ रुंध गई.

“अपने आशू को बस इतना ही जान पाई, कांची. ये सच है, इस खबर से स्तब्ध रह गया, बहुत चोट भी पहुंची, तेरे दर्द की कळ्पना से सो नही सका. बस तेरे बारे मे ही सोचता रहा.”

“फिर आया क्यों नही, आशू हर पल तेरी राह तकती रही, जानती हूं हमारे सपने टूट गए. तेरे अमरीका जाने का समय आ रहा है, अच्छा है तू वहां जाकर इस हादसे को और हमे भुला सकेगा.” भीगी आवाज़ मे कंचन ने कहा”

“वाह, समस्या का कितना सहज उपाय निकाला है. अमरीका जाकर तुझे भूल जाऊंगा. तू मुझे भुला सकेगी, स्वार्थी तो नहीं कहेगी?”

“नहीं आशू, हम जानते हैं इस हादसे के बाद मेरी ज़िन्दगी की दिशा बदल जाएगी., पर मै डर कर या शर्म से मुंह नहीं छिपाऊंगी. मै ने कोई अपराध नहीं किया, अपनी ज़िन्दगी सर उठा कर जीऊँगी.”दृढ़ता से कंचन ने कहा.

“ये हुई ना बात. अब मुझे यकीन हो गया, मै ने जिस कांची से प्यार किया, वह कायर नहीं है. कायर तो मै था जो तेरा सामना करने से कतराता रहा. बहुत सोचा और समझ गया, अगर तुझसे सच्चा प्यार किया है तो उस घटना को क्यों तूल दे रहा हूँ, जिसमें तेरा कोई दोष ही नहीं है बस बात समझ में आ गई और तेरा आशू तेरे सामने है. देर से आने के लिए माफ़ करेगी न?”.

“क्या तुम सच कह रहे हो, तुम पर इस घटना का कोई असर नही हुआ?”

“तेरी तकलीफ और अपमान पर बहुत आक्रोश था, अपने से बेहद नाराज़ था, फिर सोचा तूने उस स्थिति में भी अपना साहस नहीं खोया थाने में जाकर उन दरिंदों के खिलाफ स्वयं रिपोर्ट लिखवाई, साहस के साथ सारी सच्चाई सबके सामने रखी. उस के लिए तुझ पर गर्व हुआ और अपनी सोच पर शर्म आई. तेरे सामने अपने को बहुत छोटा महसूस करता हूँ, कांची, मुझे माफ़ कर सकेगी.’

“तू मेरी शक्ति है, आशू, माफी मांग कर मुझे शर्मिन्दा मत कर. तेरे साथ आपनी लड़ाई और जोश से लड़ सकूंगी”कंचन के चहरे पर खुशी की आभा बिखर गई.

“तुझ पर पूरा यकीन है, कांची. याद रख तेरी हर लड़ाई, हर विजय में तेरा आशू हमेशा तेरे साथ है.”

“तेरा यकीन कभी टूटने नहीं दूंगी, आशू. ये मेरा वादा है.”

“तो चलो बाहर तुम्हारे साथी तुम्हारा अभिनन्दन करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.” प्यार से कंचन का हाथ पकड आशू ने अपनी कांची को उठाया था. बाहर से आता हर्षोल्लास नए युग का सन्देश दे रहा था.
 
अपराजिता

शहर के नामी मेडिकल कॉलेज के वार्षिकोत्सव में प्रसिद्ध उद्योगपति वयोवृद्ध शशि कान्त जी मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे. पिछले तेइस वर्षों से शशि कान्त जी अपने दिवंगत पुत्र रवि कान्त की स्मृति में मेडिकल कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी को ‘सूर्य- सम्मान’ के नाम से स्वर्ण पदक तथा इक्यावन हज़ार रुपयों की धनराशि पुरस्कार के रूप में प्रदान करते आए हैं. परम्परा के अनुरूप कॉलेज की प्राचार्या ने मंच पर आकर घोषणा की-

“मुझे यह घोषित करते हुए बहुत प्रसन्नता है कि इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी का पुरस्कार दिव्या कान्त को दिए जाने का निर्णय लिया गया है. दिव्या ने पिछले पांच वर्षों का रिकार्ड तोड़ कर सर्वोच्च अंक प्राप्त किए हैं. दिव्या, कृपया मंच पर आ कर अपना पुरस्कार ग्रहण करें.”

सधे कदमों से दिव्या मंच पर पहुंची थी. सौम्य शांत चेहरे पर गंभीरता थी, तालियों की गूँज के मध्य शशि कान्त जी की दृष्टि दिव्या को दिए जाने वाले प्रमाणपत्र पर पड़ी थी. अचानक उनके चेहरे के भाव बदल गए. दिव्या को देख कर जैसे वह कहीं खो से गए थे.अचानक सजग हो वह दिव्या से पूछ बैठे-

“तुम्हारी इस सफलता के पीछे क्या तुम्हारे पापा की प्रेरणा है?”

“यह मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे जन्म के पहले ही मेरे पापा एक दुर्घटना में इस संसार से चले गए, पर उनकी तस्वीर मुझे हमेशा प्रेरणा देती रही.” दिव्या का सुन्दर चेहरा अवसादपूर्ण था.

कांपते हाथों से दिव्या को पुरस्कार देते शशि कान्त जी थके से कुर्सी पर बैठ गए.पास बैठी प्राचार्या ने धीमे शब्दों में उन्हें बताया-

“दिव्या की माँ ने समाज की तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए बेटी को जन्म दिया और अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से बेटी को इस मुकाम तक पहुंचाया है.”

“क्या इस समय दिव्या की माँ इस समारोह में उपस्थित हैं?”

“काश आज वह जीवित होतीं और बेटी का सम्मान देख पातीं. एक वर्ष पहले उनकी कैंसर से मृत्यु हो गई एक प्रसिद्ध अमरीकी कॉलेज में कैंसर पर रिसर्च करने के लिए दिव्या को स्कॉळरशिप मिली है. दो महीने बाद वह अमरीका जाने वाली है. हमें दिव्या पर गर्व है” प्राचार्या के चेहरे पर सच्ची खुशी थी.

घर लौट कर शशि कान्त जी अनमने से पलंग पर लेट गए. पलंग के ठीक सामने अपने बेटे रवि की तस्वीर पर उनकी दृष्टि निबद्ध थी. मेडिकल कॉलेज की सर्वश्रेष्ठ छात्रा होनहार डॉक्टर दिव्या, उनके अपने पुत्र रवि की बेटी है. दोनों के चेहरों में कितना साम्य है. रवि जैसा ही तेजस्वी चेहरा, वही दृढ़ता और गंभीरता. इतने वर्षों में उन्होंने कभी यह जानने की भी कोशिश नही की, उनके रवि का खून कहाँ और कैसे पल्र रहा है. आज दिव्या को देख कर उनके मन में ममता का ज्वार क्यों उमड़ रहा है. पिछले तेइस वर्षों की घटनाएं आँखों के सामने चलचित्र की तरह से क्यों साकार होती जा रही हैं. ऐसा लग रहा है जैसे वो कल की ही बातें हों. यह सच है उन्होंने कभी जानने की कोशिश नहीं की कि वे दोनों माँ बेटी कैसे जी रही हैं, पर लोग सुना जाते, रवि की बेटी अपने पिता की तरह मेधावी है, हर परीक्षा में प्रथम आती है, ये सब सुन कर भी कब उनका दिल उसे देखने को उमड़ा था?

रवि ने ही उन्हें बताया था कैसे उसकी और और पूजा की पहली भेंट कॉलेज की डिबेट में हुई थी.

हॉल में विद्यार्थियों की भीड़ थी. बोर्ड पर डिबेट का विषय “कॉलेज में लड़कियों के एडमीशन के लिए पन्द्रह प्रतिशत सीट आरक्षित होनी चाहिए” स्पष्ट लिखा हुआ था .विषय के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करने थे. विषय को ले कर विद्यार्थियों के बीच काफी उत्तेजना थी.लडकियां पक्ष में और लड़के विपक्ष में अपने-अपने तर्क दे रहे थे. पूजा के मंच पर आते ही एक लड़के ने रिमार्क कसा-

“ये लो लड़कियों की वकालत करने उनकी लीडर आ गई, लड़की होने का फ़ायदा इन्हें भी तो मिलेगा.”

सधी आवाज़ में पूजा ने अपनी बात कहनी शुरू की-

“आरक्षण की बैसाखी के सहारे कॉलेज में प्रवेश क्यों? जिस तरह से मखमल पर टाट का पैबंद खटकता है, वैसे ही आरक्षण के सहारे प्रवेश लेने वाली लड़की सबकी आँख की किरकिरी बन जाएगी. नहीं, मुझे दया की भीख कतई स्वीकार नहीं है. मै ज़ोरदार शब्दों में लड़कियों को किसी भी तरह का आरक्षण दिए जाने का विरोध करती हूँ” लड़कों में सन्नाटा छा गया. लड़कियों के चेहरे तमतमा आए.

“अरे बड़ी-बड़ी बातें बनाना बहुत आसान बात है, वक्त पड़ने पर देखेंगे.”आशा ने व्यंग्य से कहा.

एक लड़के ने सवाल कर डाला-

“इसका मतलब इस कॉलेज में क्या आपने बिना किसी सिफारिश या डोनेशन के एडमीशन लिया है? सब जानते हैं इस कॉलेज में या तो डोनेशन या सिफारिश से एड्मीशंन किए जाते हैं या नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक वालों को चांस मिलता है.”

“मुझे हर विषय में नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक मिले हैं, निश्चय ही मेरे एडमीशन का आधार मेरी योग्यता ही थी.”पूजा ने शान्ति से जवाब दिया.

सबने आश्चर्य से पूजा को देखा तो यही है वह लड़की जिसे पूरे राज्य में सेकण्ड पोजीशन मिली है.

हिस्ट्री विषय में शोध कर रहे रवि कान्त ने अपने स्थान पर खड़े हो कर पूजा का तालियों से अभिनन्दन किया. अब अन्य विद्यार्थियों ने भी रवि का साथ दिया. केवल कुछ लडकियां ही अप्रसन्न दिखीं. सर्व- सम्मति से पूजा को प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया.

दूसरे दिन कक्षा से बाहर आती पूजा को बधाई देने के लिए रवि उसकी प्रतीक्षा कर रहा था.

“आज एक बार फिर आपको बधाई दे रहा हूँ, आपके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ हूँ. काश हर लड़की की सोच आप जैसी ही होती.”मुस्कुराते हुए एक गुलाब का फूल पूजा को देते हुए रवि ने कहा.

’”धन्यवाद, पर आपने तो कल ही तालियाँ बजा कर मेरी जीत पर मोहर लगा दी थी.”फूल लेती पूजा ने सहास्य कहा.

“आप तो अपराजिता हैं, व्यक्तिगत लाभ का मोह कितने लोग ही छोड़ पाते हैं.”मुग्ध रवि ने कहा.

दूसरे दिन क्लास के हंसोड़ सहपाठी मनोज ने ब्लैक बोर्ड पर पूजा के चरणों पर सिर धरे रवि का चित्र बना रखा था. पूजा के हाथों में सरस्वती की तरह वीना थी. लड़कों के ठहाकों पर पूजा की सहेली मानसी ने चित्र पर आपत्ति जताई, पर पूजा ने शांत स्वर में कहा-

“देवी सरस्वती के चरणों में तो सभी विद्यार्थी नत मस्तक रहते हैं. ठीक कहती हूँ न, मनोज?””

पूजा की बात सुन कर मनोज ने स्वयं ही चित्र मिटा दिया

क्लास के बाहर रवि पूजा की प्रतीक्षा कर रहा था.एम् ए का टॉपर रवि कान्त हिस्ट्री विषय में पीएच डी कर रहा था. वह विभागाध्यक्ष का प्रिय विद्यार्थी था. अपनी योग्यता के कारण रवि पार्ट टाइम लेक्चरार के रूप में भी कार्य कर रहा था. शोध कार्य पूरा होने पर उसकी स्थायी नौकरी पक्की थी.’

“अरे आप, क्या अब रोज़ बधाई देने आ कर अपना समय व्यर्थ करेंगे?”

“आपसे मिलने से समय व्यर्थ नहीं होता बल्कि बन जाता है. आपसे प्रेरणा जो मिलती है.”

“”ये लो, हमारे मजनूँ मियाँ अपनी लैला से मिलने आ गए. एक दिन में ऎसी दीवानगी?”मनोज ने आवाज़ कसी.

“क्या बकवास है, अभी इसका दिमाग ठीक करता हूँ. सीनियर्स से ऐसे बात की जाती है.”रवि उत्तेजित था

“जाने दीजिए, उसकी मज़ाक करने की आदत है. वैसे कहिए क्या आज मुझसे कोई काम है?”शान्ति से पूजा ने पूछा.

“आपकी इतनी बड़ी विजय को सेलीब्रेट करना चाहता हूं.आपके साथ एक कप कॉफी की रिक्वेस्ट है.”

“माफ़ कीजिए रवि जी, आपको अपने बारे में स्पष्ट बात बताना चाहूंगी. मै एक निर्धन विधवा माँ की बेटी हूँ. मेरी माँ ने बहुत मेहनत कर के मुझे यहाँ तक पहुंचाया है. मै ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती जिससे मुझ पर या मेरी माँ पर कोई उंगली उठा सके. आपके प्रस्ताव के लिए आभारी हूँ, पर आपके साथ कॉफी के निमंत्रण के लिए नहीं जा सकती.”

“आपकी इस बात से मेरे मन में आपके लिए और भी आदर बढ़ गया. यकीन कीजिए कभी ऎसी कोई बात नहीं करूंगा जो आपके सम्मान को चोट पहुंचाए. आपके साथ नि:स्वार्थ मित्रता का अनुरोध तो कर सकता हूँ.”रवि की आशा भरी नज़र पूजा के चेहरे पर निबद्ध थी.

“मेरा कोई शत्रु नहीं है, यदि आपकी मित्रता सीमा में रहे तो मुझे मंजूर है.”मीठे स्वर में पूजा बोली.

“मंजूर है, आपका हिस्ट्री में आनर्स कोर्स का फाइनल है, अगर कभी कोई ज़रुरत हो तो आपकी मदद करने में खुशी होगी. मै भी इतिहास विषय में ही शोध कार्य कर रहा हूँ.”

“अरे ये तो बड़ी अच्छी बात है, अगर आपके पास पुराने नोट्स और कुछ किताबें हों जो मेरे काम आ सकें उन्हें क्या मुझे दे सकते हैं?”पूजा के चहरे पर खुशी थी.’

“कल ही आपके पास आपके काम की सारी किताबें और नोट्स यहाँ पहुंचा दूंगा.”’

“नहीं आप यहाँ आने की तकलीफ ना करें, कल लाइब्रेरी में आपसे ले लूंगी.”

“ठीक है, कल इसी वक्त लाइब्रेरी में आपका इंतज़ार करूंगा.”रवि विदा ले कर चला गया.

पूजा को खुशी थी लाइब्रेरी में अक्सर सब किताबें मिल पाना आसान नहीं होता था. खरीदने के लिए माँ पर बोझ डालना उचित नहीं था. उसे याद है किस तरह उसके पिता की एक खान- दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. कारखाने के मालिक ने पिता को दोषी ठहरा, मुआवजे की रकम भी नहीं दी थी. उस दुःख की घड़ी मे भी माँ ने हिम्मत से काम लिया. स्कूल में बच्चों की देख-रेख करते हुए पूजा को बड़ा किया था. अपनी स्थिति देख कर उन्होंने पूजा को खूब पढ़ा कर आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया था. पूजा ने भी माँ को कभी निराश नहीं किया, स्कालरशिप और बच्चों की ट्यूशन लेकर हर परीक्षा में ऊंचे अंकों के साथ पास होती रही. आज माँ के त्याग और तपस्या की वजह से पूजा बी ए फाइनल में है. उसने सोचा है बी ए की परीक्षा पास करके वह कहीं कोई नौकरी कर के माँ को आराम देगी. माँ को अपने जीवन में बस दुःख ही मिला है.

रवि शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति शशि कान्त जी का इकलौता बेटा था, बिरादरी में शशि कान्त जी का बहुत मान था.. शशि कान्त जी को अपने उच्च कुल-गोत्र का बड़ा अभिमान था. मन ही मन उन्होंने रवि का विवाह अपने धनी मित्र की बेटी कल्पना के साथ करने का निर्णय ले रखा था. शशि कान्त जी चाहते थे रवि उनके काम में हाथ बटाए, पर रवि को अध्यापन में रूचि थी, वह अपना शोध कार्य पूरा कर के लेक्चरार बनने का निश्चय कर चुका था.

अगले दिन क्लास खत्म होने पर पूजा लाइब्रेरी पहुंची थी, रवि पहले ही पहुँच चुका था. साथ में बैग में किताबें और नोट बुक्स थीं.. पूजा को देख वह हलके से मुस्कुरा कर खडा हो गया.

“ये क्या, आपसे छोटी हूँ, आप क्यों खड़े हो गए?”पूजा के स्वर में संकोच था.

“महिलाओं का सम्मान करना हर पुरुष का पुनीत कर्तव्य है.”रवि ने मुस्कुरा कर जवाब दिया.

किताबें और नोट्स देख कर पूजा की आँखों में चमक आ गई/

“आपने तो मुझे खजाना ला दिया. मुझे बताया गया है, आप अपने बैच के टॉपर थे, अब इन नोट्स की मदद से मुझे भी अच्छी पोजीशन मिल सकती है.” पूजा के कजरारे नैनों में खुशी थी.

“आपको इसके बदले में अपने घर में मुझे चाय पिलानी होगी.”रवि ने हंस कर कहा.

“मेरा घर आपके लायक नहीं है. हम किसी तरह से गुजर कर रहे हैं, उस पर माँ अक्सर बीमार रहती है.”पूजा के चेहरे पर उदासी के बादल घिर आए.

“जिस घर में आप जैसी तेजस्विनी रहती है, वह घर तो महान है. वैसे भी घर ऊंचे महलों से नही बनते बल्कि उसमे रहने वालों की भावनाओं और उनके आपसी प्यार से बनते हैं.”गंभीरता से रवि बोला.

“आपकी बातों से बहुत प्रेरणा मिलती है, धन्यवाद.”

“सिर्फ धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, यहाँ पास में नन्दू का टी- स्टॉल मशहूर है. आपको चलना होगा.”

“अगर लोगों ने कुछ कहा तो ?”पूजा हिचक रही .

“आप यूनीवर्सिटी में पढती हैं, क्रांतिकारी विचार रखती हैं, पर लोगों से डरती हैं. मेरे साथ चलिए कोई कुछ कहने का साहस भी नहीं करेगा.बाद में आपको घर कार से ड्रॉप कर दूंगा.” रवि ने कहा.

“नहीं-नहीं उसकी ज़रुरत नहीं है, वैसे भी मेरे घर तक आपकी कार नहीं जा सकती. मै चली जाऊंगी.

चाय के स्टॉळ पर कुछ लडके-लडकियां चाय पीते हुए बातें कर रहे थे. मनोज भी उनमे से एक था.

“पूजा जी, रवि जी के साथ खूब छन रही है, हमें भी मौक़ा दीजिए आपके लिए आकाश के तारे तोड़ कर ला सकता हूँ” दूसरे दिन मनोज ने रिमार्क दिया.

“आकाश के तारे किस काम आएँगे, मनोज? टॉपर के साथ होने से उनकी नॉलेज काम आएगी, अगर चाहो तो तुम भी उनका ज्ञान पा सकते हो.” शान्ति से पूजा ने मसलाह दी.

उस दिन के बाद से रवि और पूजा अक्सर लाइब्रेरी में मिल जाते. पूजा रवि की योग्यता से अभिभूत थी. कठिन से कठिन प्रश्न के उसके पास हल होते थे. अब रवि के साथ बातें करने में पूजा को संकोच नहीं होता था. रवि उसे अच्छी पोजीशन लाने को प्रोत्साहित करता. एक दिन मनोज पूजा के पास फ्रेंडशिप बैंड ले कर आया और शैतानी से बोला-

“इस बैंड को स्वीकार कर लीजिए और हम दोस्त बन जाएंगे. वैसे रवि जी में कोई सुरखाब के पर तो नहीं लगे हैं. हमें भी आज़मा कर देखिए.”

बिना कुछ कहे पूजा ने मनोज के हाथ से फ्रेंडशिप बैंड ले कर मनोज की कलाई पर बाँध कर कहा-

“दोस्ती से ज़्यादा मजबूत राखी का बंधन होता है. आज से तुम मेरे भाई हुए, मनोज.”

“माफ़ करना, पूजा, मेरी कोई बहिन नहीं है, तुमने आज उसकी कमी पूरी कर दी. हमेशा भाई का फ़र्ज़ निभाता रहूँगा.”मनोज की आँखे भर आईं.

उस दिन के बाद से मनोज पूजा और रवि के साथ मिलता, बातें करता. उसे भी रवि से पढाई पर ध्यान देने की प्रेरणा मिल रही थी. अब तीनो अच्छे मित्र थे.

अचानक एक दिन रवि को अपने घर आया देख पूजा विस्मित रह गई.

“रवि जी, आप यहाँ., कैसे?”

“कमाल है तुम तो ऐसे डर रही हो, जैसे घर में कोई चोर घुस आया हो. याद है, वादा किया था, एक दिन तुम्हारे घर आऊँगा. अब अन्दर भी आने दोगी या बाहर से ही वापिस जाना होगा.”

“माफ़ कीजिएगा, आइए.” रवि को कमरे में आने के लिए जगह बनाने के उपक्रम में पूजा पीछे हट गई.

एक छोटे से कमरे में खाट पर पूजा की माँ लेटी थीं. एक ओर एक छोटी मेज़ पर पूजा की किताबें करीने से रखी थीं. पास में एक कुर्सी थी. साथ में लगी हुई रसोई भी रवि ने देख ली. छोटी सी जगह भी सुव्यवस्थित थी, कुर्सी आगे खीच पूजा ने रवि को बैठने को कह कर माँ से कहा-

“माँ ये रवि जी हैं. इन्होने अपनी किताबें और नोट्स दे कर मदद की है.”

“खुश रहो बेटा, इस लड़की की मदद कर ने वाला कोई और नहीं है.”माँ का कंठ भर आया.

“आप परेशान ना हों, ये खुद इतनी ज़हीन हैं, इन्हें किसी की मदद की ज़रुरत नहीं है. आपकी तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आपको देखने चला आया.”शालीनता से रवि ने कहा.

“तुम्हारी बड़ी कृपा है, बेटा, वरना हमारी कौन परवाह करेगा. पूजा तुम्हारी बहुत तारीफ़ करती है.”

“अच्छा पूजा जी क्या हम सचमुच आपकी तारीफ के लायक हैं, आपको मुझमे क्या अच्छाई नज़र आती है?”रवि के चेहरे पर मुस्कान स्पष्ट थी.

“हम अभी आपके लिए चाय लाते हैं,” शर्म से लाल मुख के साथ पूजा रसोई में चली गई.

माँ से उनका दुःख-सुख सुनता रवि सोच में पड़ गया उतनी समस्याओं के बीच कैसे पूजा अपने विचारों में दृढ़ता और तेजस्विता सुरक्षित रख सकी है. उसके मन में पूजा के लिए एक अव्यक्त आकांक्षा जाग रही थी. उसका जी चाह रहा था उस भोली सी पूजा को अपनी सशक्त भुजाओं में ले कर कहे, तुम अकेली नहीं हो पूजा, मै तुम्हारे साथ हूँ. तुम मुझ पर अपने को सौंप कर निश्चिन्त रह सकती हो. पूजा के लिए मन में ढेर सारा प्यार और करुणा का ज्वार उमड़ रहा था. इतने अभावों के होते हुए भी

उसने कितने साहस के साथ लड़कियों के लिए आरक्षण का विरोध किया था. उस दिन के बाद से रवि पूजा से अक्सर मिलता, कोई क्या कहेगा, इसकी उसे कतई परवाह नहीं थी. अब तक वह अपने मन का सत्य जान गया था, उसे पूजा से प्यार हो गया था.

रवि का शोध कार्य पूरा हो गया था.पीएच डी की डिग्री के साथ ही उसे यूनीवर्सिटी में लेक्चरार के रूप में जॉब भी मिल गया. उसके शोध- कार्य को बहुत प्रशंसा मिली थी. विभागाध्यक्ष ने बधाई देते हुए कहा-

“रवि, अगर तुम चाहो अमरीका की किसी यूनीवर्सिटी में जॉब ले कर बेहतर ज़िंदगी पा सकते हो.”

“नहीं सर, अपने देश को छोड़ कर विदेश जाने की मुझे कोई चाह नहीं है. भारत में क्या कुछ नहीं है” “मुझे तुम्हारे विचार सुन कर बहुत खुशी है,डिपार्टमेंट में तुम जैसे प्रोफ़ेसर ही चाहिए.”विभागाध्यक्ष के चेहरे पर रवि के लिए गर्व था.

नौकरी मिलते ही रवि ने मन ही मन में एक निर्णय ले लिया. पिछले कुछ दिनों पूजा के साथ बातें करते हुए उसने अनुभव किया, पूजा ही उसकी जीवन संगिनी बनने ,के योग्य है. उसमे वो सारे गुण हैं जो एक पत्नी और साथी में आवश्यक हैं. उसे पता भी नहीं लगा वह पूजा से अनजाने ही प्यार करने लगा था. अब उसे पूजा की माँ और अपने माता-पिता को अपने निर्णय की सूचना देनी होगी, पर पहले पूजा का मन जानना ज़रूरी था.”

“पूजा मुझे तुमसे कुछ कहना है, नाराज़ तो नहीं होगी?”

“आपसे क्या कभी नाराज़ हो सकती हूँ?”पूजा के ओंठों पर मीठी मुस्कान थी.

“तुमसे जो पूछूंगा उसका जवाब हाँ में चाहिए वरना सवाल ही नहीं पूछूंगा. तुम्हारी ना सह नहीं सकूंगा.”

“आप तो पहेलियाँ बुझा रहे हैं, वैसे आप कोई ऎसी बात पूछ ही नहीं सकते जिसका उत्तर ना हो.”

“मुझसे शादी करोगी, बहुत चाहता हूँ तुम्हे. कहो मंजूर है?”

“ये आप क्या कह रहे हैं, कहाँ आप, कहाँ मै? आप इतने योग्य और अच्छे हैं, आपको हज़ारों अच्छी लडकियां मिल जाएंगी.”कुछ पल मौन के बाद पूजा बोली.

“मुझे हज़ारों लडकियां नहीं चाहिए, बस तुम हाँ कह दो, वरना ज़िंदगी भर बिन ब्याहा ही रह जाऊंगा, ये मेरा निश्चय है.” प्यार से पूजा के माथे पर झूल आई लट हटाते रवि ने कहा.

“मुझे माँ के प्रति दायित्व पूरे करने हैं, उसके पहले अपने बारे में कैसे सोच सकती हूँ.”

“तुम्हारी माँ क्या मेरी माँ नहीं हैं, हम दोनों मिल कर उन्हें ज़िंदगी की सारी खुशिया देंगे, मुझ पर विश्वास करती हो तो बस हां कह दो,”

“क्या आपके माता-पिता जी मुझे स्वीकार कर सकेंगे. भला राजा और रंक में मेल कैसे हो सकता है.

“अपने माँ-पापा का लाडला इकलौता बेटा हूँ, मेरी बात तो माननी ही होगी. जल्दी ही तुम्हे शुभ सूचना दूंगा. एक रहस्य बताऊँ, तुम्हारी माँ से स्वीकृति ले चुका हूँ.” रवि के मुख पर शरारत थी.

“सच, कब? माँ ने मुझे कुछ नहीं बताया.”पूजा का विस्मय स्वाभाविक था.

“वो हम माँ बेटे के बीच की बात थी. मै ने ही उन्हें तुमसे ये बात बताने को मना किया था.”

उत्साहित रवि ने अपने माँ-बाप से जब पूजा के साथ अपने विवाह की बात बताई तो मानो घर में भूचाल आ गया. माँ-बाप पर रवि का विश्वास गलत निकला .शशि कान्त दहाड़ उठे –

“खबरदार भूल कर भी ये बात फिर मत कहना. ये असंभव है.”

“पापा, मै पूजा से बहुत प्यार करता हूँ, उसके अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकता.”

“शर्म नहीं आती, अपने खानदान का नाम मिट्टी में मिलाना चाहते हो. पूरी बिरादरी में हमारा कितना सम्मान है. एक नीचे कुल की लड़की से शादी कर के अपने कुल का नाम डुबोना चाहते हो. हमारी मान-मर्यादा का भी ख्याल नहीं है. इसीलिए तुझे पढाया लिखाया था. मुझे ये कतई मंजूर नही है.”

“पापा मै निर्णय ले चुका हूँ, पूजा के अलावा किसी और लड़की से शादी की बात भी नहीं सोच सकता. पूजा बहुत ही अच्छी, बुद्धिमान और गुणवती लड़की है. आप बस एक बार उससे मिल लीजिए - -“

“बस अब इसके आगे एक शब्द भी मुंह से निकाला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. उस लड़की की शक्ल देखना भी मुझे मंजूर नहीं है. अगर तुझे अपनी मनमानी करनी है तो इस घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है. याद रख तेरे इस कदम से मै तुझे अपनी संपत्ति से बेदखल कर दूंगा.”

“मुझे आपकी संपत्ति नहीं चाहिए, बस आप और माँ का आशीर्वाद चाहिए.” शांति से रवि ने कहा.

“वो तुझे कभी नहीं मिल सकता. चला जा और फिर कभी अपना चेहरा हमें मत दिखाना, हम समझ लेगे हमारी कोई औलाद ही नहीं है.”क्रोध से शशि कांत जी की आँखे लाल हो गई थीं.

अपने घर से निष्कासित रवि का पूजा से विवाह करने का निश्चय और भी दृढ हो गया. अपने कुछ मित्रों और मनोज को अपना निर्णय सुनाने पर सबने रवि के फैसले की प्रशंसा की. मनोज तो बहुत उत्साहित हो उठा. उन सबने रवि को सादे ढंग से मन्दिर में विवाह करने की राय दी. रवि के माता-पिता की नाराजगी से पूजा विवाह के लिए राज़ी नही हो रही थी, पर उसकी माँ ने अपनी बीमारी का वास्ता देकर पूजा को विवाह के लिए राजी कर लिया.एक सादे समारोह में कुछ मित्रों की उपस्थिति में रवि और पूजा विवाह-बंधन में बंध गए. मनोज ने भाई के फ़र्ज़ निभाए थे.

पूजा के कहने पर रवि पूजा के साथ अपने घर माँ-बाप का आशीर्वाद लेने गया था.

दोनों को देखते ही शशि कांत जी का पारा चढ़ गया. नौकर को आवाज़ दे कर चिल्लाए-

“रामू जल्दी गंगाजल ला, हमारे घर को इन लोगों ने अपवित्र कर दिया.”दुखी और निराश पूजा और रवि अपने छोटे से घर में वापिस आ गए.

रवि को जानने वालों से शशि कान्त जी सुनते रवि और पूजा की गृहस्थी सुख-शान्ति से चल रही है. रवि ने अपने घर में माँ-बाप की तस्वीरें लगा रखी हैं, रोज़ उन्हें प्रणाम कर के यूनीवर्सिटी जाता है. रवि की प्रेरणा से पूजा ने बी ए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली है. रवि उसे एम् ए में प्रवेश लेने को कह रहा है, पर अब उनके घर एक नया फूल खिलने वाला है, पूजा माँ बनने वाली है.

शुभ चिन्तक शशि कान्त जी को समझाते-

“अब गुस्सा छोड़ दीजिए, आप बाबा-दादी बनने वाले हैं. पूजा भी एम् ए में प्रवेश लेने की तैयारी कर रही है, पूजा को किसी की मदद चाहिए.”

“नहीं, उनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं है. इस घर में उसका नाम लेना भी निषिद्ध है.”

उधर जहां रवि और पूजा घर में नए मेहमान के आने की सूचना से खुश थे वहीं रवि को माँ-बाप की अनुपस्थिति कष्ट देती. काश इस समय उनकी खुशियाँ बांटने और आशीर्वाद देने वे उनके साथ होते. पूजा की मदद के लिए उसकी माँ आ गई थी, पर पूजा रवि के जीवन के अभाव को महसूस करती, पर वह विवश थी. रवि अपने बच्चे को डॉक्टर बनाने का स्वप्न देखता और पूजा हंसती.

उसके बाद सब कुछ कितनी जल्दी घट गया था. पिता बनने की खुशी में रवि ने एक स्कूटर खरीद लिया था. इतवार के दिन पूजा के साथ पिकनिक पर जाने के लिए दोनों बाहर निकले थे. स्कूटर को बांई ओर मोड़ते ही सामने से आ रही तेज़ रफ़्तार की ट्रक रवि के स्कूटर से टकरा गई. पूजा स्कूटर से छिटक कर दूर गिर गई, पर रवि ट्रक के नीचे आ गया. बेहोशी टूटने पर पूजा ने अपने को हॉस्पिटल में पाया.

दुर्घटना की खबर पा कर रवि के माँ-बाप अपने को रोक नहीं सके. हॉस्पिटल के डॉक्टर शशि कांत जी से परिचित थे. संवेदना पूर्ण शब्दों में उनसे कहा-

“हमें दुःख है, हम आपके बेटे को नहीं बचा सके, पर आपकी बहू और उसकी कोख में पल रही बेटी सुरक्षित हैं. आप उन्हें दो-तीन दिनों बाद घर ले जा सकते हैं. कम से कम यही संतोष है कि रवि की निशानी और आपकी वारिस तो आपके साथ रहेगी.”

“नहीं बिलकुल नही, उस अभागिन को तो इस दुनिया में आने ही नहीं देना चाहिए. आने के पहले ही बाप को खा गई. डॉक्टर आपको जितना पैसा चाहिए दूंगा, पर आप उसे कोख में ही खत्म कर दीजिए. मुझे उससे नफरत है, उसे जन्म नहीं लेने दे सकता.” शशि कांत जी ने क्रोध से फुफकारते हुए कहा.

“ये आप क्या कह रहे हैं? यह पाप है और कानूनन भी अपराध है. आखिर वो बच्ची आपका ही खून है.”

“हमारा उन दोनों से कोई रिश्ता नहीं है, अगर उसकी कोख में बेटा होता तो एक बार उसे अपना वारिस मान कर झेल भी लेते, पर इस अभागिन का तो जन्म ही पाप है, चलो शान्ति” आंसू पोंछती पत्नी पति के साथ चली गई.

रवि उन्हें हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुका था. पूजा की माँ बिलख रही थी. खबर पा कर मनोज आ गया था, वह स्तब्ध था. अभी दो दिन पहले ही तो वह रवि और पूजा से मिल कर गया था. माँ से रवि के पिता की बातें सुन कर पूजा के आंसू सूख गए, नहीं वह रवि की निशानी अपनी बेटी को जन्म देगी.

उसके लिए उसे जीना ही होगा. वह रवि की स्वाभिमानी पत्नी है. आश्रय के लिए वह श्वसुर के पाँव नहीं पड़ेगी, हार नहीं मानेगी. दृढ निश्चय कर वह उठ गई.

“माँ मुझे घर ले चलो, मुझे अपनी बेटी को जन्म देना है.”

मनोज और माँ के साथ पूजा उसी घर में आ गई, जहां से रवि उसे सम्मान के साथ अपने साथ ले गया था. माँ को रोता देख पूजा ने शांति से कहा था-

“माँ रोने से अगर जाने वाला लौट आए तो खूब रो लो, पर जो चला गया वो तो अब कभी लौट कर नहीं आएगा. अब हमें आने वाले दिनों की चिंता करनी है.”

“तुम परेशान मत हो, पूजा. तुम्हारा ये भाई हर कदम पर तुम्हारे साथ है.”मनोज ने सच्चाई से कहा.

“जानती हूँ, भाई. अब अपने यहाँ वाले पुराने स्टूडेंट्स की ट्यूशन लेना शुरू करूंगी.”उदास पूजा बोली.

“तुम किसी स्कूल में भी तो जॉब ले सकती हो, साथ में प्राइवेट एम् ए भी कर लोगी.” मनोज ने राय दी.

“अभी तो जो आने वाली है, उसकी चिंता करनी है, रवि होते तो “अधूरी बात कहती पूजा रो पड़ी .

उदास लंबे दिन बीतने लगे, अंतत: वह दिन भी आ गया जब पूजा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया. मनोज नवजात बच्ची बी के लिए पालना ले आया.

“अगर आज रवि जी होते तो कितनी खुशी मनाते, पर आज हम कुछ नहीं कर पारहे हैं.”मनोज उदास था.

“ऐसा नहीं सोचते, तुम जैसा भाई पा कर मै धन्य हूँ.”बेटी को पालने में लिटाती पूजा बोली.

“अब दिव्या के भविष्य लिए तुम्हे कोई अच्छा जॉब लेना होगा, पूजा. पास के स्कूल में जगह खाली है, तुम एप्लाई कर दो. रवि जी तो तुम्हें एम् ए कराते फिर तुम कॉलेज में जॉब करतीं, पर अभी कुछ दिन घर के पास में काम करना ही ठीक होगा.”मनोज ने सलाह दी.

“तुम ठीक कहते हो, मनोज. हाँ तुमने मेरी बेटी का दिव्या नाम भी रख दिया.”पूजा मुस्कुरा उठी.

“हाँ देख लेना, तुम्हारी बेटी अपना दिव्या नाम सार्थक करेगी.”मनोज ने विश्वास से कहा.

आज वही दिव्या मेडिकल कॉलेज की सर्वश्रेष्ठ स्टूडेंट का पुरस्कार पा चुकी है, पर उसका वह सम्मान देख पाने को पूजा नहीं रही.

असमय पलंग पर लेटे शशि कांत को देख पत्नी विस्मित थी.

“क्या बात है, इस वक्त क्यों लेटे हैं’?”

“अपने पाप पर पछता रहा हूँ. जानती हो, जिस अजन्मी बच्ची को मै ने माँ की कोख में ही समाप्त करने को कहा था, आज वह पूरे मेडिकल कॉलेज का गौरव है. अमरीका के प्रसिद्ध मेडिकल कॉलेज ने उसे कैंसर में रिसर्च करने के लिए स्कॉलरशिप दी है. अब वह कैंसर विशेषज्ञ बन कर वापिस आएगी.”

“तो अब क्या सोच रहे हो? हमने तो अपनी सारी संपत्ति का वारिस गोपाल को बनाने का निश्चय किया है.”शान्ति ने जवाब दिया.

“नहीं गोपाल मेरे भाई का बेटा ज़रूर है, पर मेरी सच्ची वारिस मेरे रवि की बेटी दिव्या ही है. उसमे रवि का खून है, मेरे रवि के सारे गुण हैं. उसका अधिकार किसी और को नहीं दे सकता.”

“पर दिव्या तो लड़की है, वो हमारी वारिस कैसे बन सकती है? वंश तो बेटे से ही चलता है. यही सोच कर तो हमने गोपाल को गोद लेने का निश्चय किया है.” पत्नी ने तर्क दिया.

“मेरा सोच गलत था, शान्ति. कॉलेज की प्राचार्या ने दिव्या के बारे में जो कुछ बताया उसके सामने हज़ार लड़के भी कम हैं. ये हमारा सौभाग्य है, हमारे घर में उस जैसी तेजस्विनी ने जन्म लिया.”

“अब क्या करने की सोच रहे हो?’शान्ति ने पति के दृढ चेहरे को देख कर पूछा.

“कल ही अपनी गलती का प्रायश्चित करने दिव्या के पास जाऊंगा. अपनी पोती को अपने साथ ले कर आऊँगा.”शशि कान्त के चेहरे पर निश्चय की चमक थी.

दूसरे दिन बड़े सवेरे शशि कान्त दिव्या के घर पहुँचे. दिव्या कॉलेज के पीछे बने एक छोटे से घर में रहती थी. इस समय वह पूजा कर के अपने माता-पिता के चित्रों के सामने दीप जला रही थी. खुले दरवाज़े से प्रविष्ट हो कर शशि कान्त चुपचाप दिव्या के पीछे जा कर खड़े हो गए. बेटे का चित्र देख कर उनकी आँखें नम हो गईं. अचानक पीछे मुड़ी दिव्या शशि कान्त को देख कर चौंक गई.’

“आप यहाँ, क्या किसी काम से आए हैं?”दिव्या विस्मित थी.

‘”अपनी पोती को उसके घर वापिस ले जाने आया हूँ?”भीगे स्वर में शशि कान्त ने कहा.

“आपकी पोती, आप क्या कह रहे हैं?’ यहाँ तो बस मै ही रहती हूँ.’

“हाँ बेटी तुम्हीं मेरे रवि का अंश मेरी पोती, मेरी वारिस हो. मुझे अपनी गलती का बहुत दुःख है, मुझे माफ़ कर दो.”शशि कान्त की आँखों से आंसू बह निकले.

“आप क्या कह रहे हैं? मै किसी की पोती नहीं हूँ. ना मेरे कोई बाबा-दादी हैं.”दिव्या ने तेज़ी से कहा.

“”ऐसा मत कह तू मेरे रवि की बेटी है और मेरी पोती है.’शशि कान्त जी ने आशापूर्ण शब्दों में कहा.

‘आप कहना चाहते हैं, आप मेरे पापा के वही पिता हैं जिन्होंने मेरी माँ को दर-दर की ठोकरें खाने को अकेले छोड़ दिया. हाँ क्या कहा, मै आपके बेटे का अंश हूँ, वही अंश जिसे आपने माँ की कोख में ही समाप्त कर देना चाहा था. जिस इंसान ने इतने अन्याय किए, उसके साथ मेरा कोई संबंध नही हो सकता.”

“जानता हूँ, मेरे अपराध माफी लायक नहीं हैं, पर आज मेरी आँखें खुल गई हैं. कहते हैं सुबह का भूला अगर शाम को वापिस आ जाए तो भूला नहीं कह्लाता. मेरा सब कुछ तुम्हारा है, तुम्हें अमरीका जाने की ज़रुरत नहीं है. तुम्हारे लिए एक हॉस्पिटल खुलवा दूंगा, तुम उसकी हेड होगी.”वह विनती कर रहे थे.

“एक मिनट रुकिए, अभी आती हूँ.”दिव्या कमरे के भीतर से अपनी पुरस्कार राशि और स्वर्ण पदक ले कर वापिस आई.

“ये लीजिए आपके पुरस्कार में दिए गए पैसे और स्वर्ण पदक आपको वापिस कर रही हूँ. इन्हें रख कर अपनी माँ के संघर्ष और त्याग को अपमानित नहीं करूंगी. मेरी माँ अपराजिता थी, सारी दुनिया के व्यंग्य, उलाहने सुन कर भी उसने हार नहीं मानी साहस के साथ संघर्ष किया, किसी से ना सहायता मांगी, ना किसी के आगे सिर को झुकाया मुझे स्वाभिमानपूर्ण जीवन जीने की राह दिखाई. मैं बस अपनी माँ की बेटी हूँ. उसे किसी हालत में पराजित नहीं होने दे सकती.”

“ये क्या कर रही हो बेटी, इस पुरस्कार पर तो तुम्हारा अधिकार है. एक पल को इस बूढ़े को बाबा समझ कर ही माफ़ कर दो.” शशिकांत दयनीय हो आए.

“क्षमा कीजिए, मुझे बाबा शब्द से एक ऐसे क्रूर इंसान का आभास होता है, जिसने एक पल को भी नहीं सोचा ना कभी जानने की कोशिश की कि उनके बेटे की पत्नी, जिसकी कोख में उनके बेटे का अंश पल रहा था, वह कहाँ रही, कैसे जी सकी. मैने कभी अपने बाबा-दादी का नाम भी नहीं जानना चाहा. मेरे मन में बाबा-दादी शब्दों के लिए कोई आदर नहीं है.’

“मै तुम्हारे दुःख को समझता हूँ, अपनी गलती की भरपाई करना चाहता हूँ. तुम्हें ढेर सारा प्यार दे कर प्रायश्चित करना चाहता हूँ.”शशि कान्त ने आंसू भरी आँखों से कहा.

“क्या आप मेरी माँ के अपमान, व्यंग्य वांणों से छलनी हुए मन को जोड़ सकेंगे. कहाँ से लाएंगे मेरी माँ को? आप उम्र में बड़े हैं इसलिए आपका अपमान नहीं करना चाहती. आप चले जाइए, ये हमारी पहली और आखिरी भेंट थी, अब हम कभी नहीं मिलेंगे.”

हाथ जोड़ कर अपराजित दिव्या ने विदा दे दी. बहते आंसुओं के साथ पराजित शशि कांत दरवाज़े से बाहर चले गए.
 
अपने पंख पसारो आकांक्षा

संडे के दिन चाय के कप के साथ शरद ने अख़बार खोला था। पूरे सप्ताह ऑफ़िस की व्यस्तता के बाद एक इसी दिन उसे कुछ आराम का मौका मिलता था। कभी सोचता अच्छा होता, किसी बड़ी कम्पनी का उच्च अधिकारी होने की जगह किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर बन जाता। कॉलेज में छुट्टियां तो मिलतीं। अचानक उसकी निगाह एक विज्ञापन पर पड़ी। रोज़- गार्डेन में गुलाबों की प्रदर्शनी थी। शरद का मन खिल उठा। फूलों से उसे बहुत प्यार था विशेषकर गुलाब उसकी पहली पसंद थे। अपने घर में भी उसने अलग-अलग रंगों वाले गुलाबों की रंगीन क्यारियां बनवा रखी थीं। उसकी कोशिश रहती वह गुलाब के अनूठे रंगों से अपनी गार्डेन को सजा सके। उसके दोस्त हंसते-

‘यार शरद, तुझे अपने लिए बीवी ऐसी ही ढूंढनी होगी जो इन गुलाबों को तेरी तरह ही प्यार दे सके वर्ना प्यार के अभाव में ये सूख जाएंगे।‘

विज्ञापन देखते ही शरद गुलाबों की प्रदर्शनी में जाने को उतावला हो उठा। सवेरे जल्दी जाने से भीड़ कम होगी और फूलों का सही आनन्द लिया जा सकेगा। कैमरे को गले से लटका शरद ने कार स्टार्ट की थी। अभी कम ही लोग प्रदर्शनी में पहुंचे थे। चारों ओर हवा में झूमते गुलाबों पर मुग्ध दृष्टि डालते शरद की नज़र एक अनोखे गुलाब पर अटक गई। गुलाबी और ज़ामुनी पंखुड़ियों वाला अकेला गुलाब अपने समस्त सौंदर्य के साथ इठला रहा था। शरद ने जैसे ही कैमरा क्लिक किया गुलाब को प्यार भरी नज़रों से सहलाती एक लड़की भी तस्वीर में उतर आई। शायद उसी पल वह वहां आई थी। कैमरे से नज़र हटा शरद ने उस लड़की को देखा था। गुलाब के सौंदर्य से होड़ लेती उस लड़की ने गुलाबी सलवार सूट के साथ जामुनी चुन्नी ओढ रखी थी। विस्मित शरद कुछ कह पाता कि लड़की की मीठी आवाज़ सुनाई दी-

‘एक्स्क्यूज़ मी, मिस्टर। किसकी परमीशन से आपने मेरी तस्वीर खींची है?’आवाज़ में तेजी थी.

‘माफ़ कीजिएगा, आपकी फ़ोटो लेने का मेरा कोई इरादा नहीं था, कैमरा क्लिक करते ही आप उसी गुलाब के पास अचानक आ गईं, जिसे मैं अपने कैमरे में कैद करना चाह रहा था। आप भी मानेंगी, इतना सुंदर और अनूठा गुलाब बहुत रेयर होगा।‘ शालीनता से शरद ने सफ़ाई देनी चाही।

‘आपकी बातों में मैं नहीं आने वाली, हो सकता है आपने गुलाब की.नहीं मेरी ही फ़ोटो लेनी चाही हो।‘

‘ये बात तो तब संभव थी जब मैं जानता कि आप इस समय इस स्पॉट पर आने वाली हैं। आप अपना ऐड्रेस दे दीजिए इस नायाब गुलाब के चित्र के साथ आपकी फ़ोटो आप तक पहुंच जाएगी।‘

‘यानी कि आप मेरा पता लेकर मेरे घर आ पहुंचेंगे। बाई दि वे अगर आप कोई प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र हैं और इस नायाब फ़ोटो को किसी कॉम्पटीशन या मैगज़ीन में भेजने की योजना बना रहे हों तो आने वाली मुश्किल से सावधान रहें।‘स्वर में चेतावनी सी थी.

‘कमाल करती हैं, ये कैसे सोच लिया कि मैं कोई प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र हूं। एक बड़ी कम्पनी में अच्छी भली नौकरी करता हूं। फ़ोटोग्राफ़ी मेरी हॉबी है। फ़ॉर योर इन्फ़ॉरमेशन ये फ़ोटो बस मेरे ऐलबम में रहेगी।‘

‘अगर ऐसा है तो मेरे साथ वाली फ़ोटो कैमरे से इरेज़ कर दीजिए और इस गुलाब की जितनी चाहें फ़ोटो खींचते रहिए।‘ लड़की ने कड़ाई से कहा।

‘अगर आपको किसी सुंदर चीज़ को मिटाने का इतना ही शौक है तो लीजिए आप खुद इरेज़ कर दीजिए। वैसे ये फ़ोटो आपके ऐलबम की शोभा बढा सकती है।‘ शरद ने अपना कैमरा लड़की को देते हुए कहा।

कैमरे में लिए गए चित्र को देखती लड़की के चेहरे पर एक मुग्ध भाव आगया।

‘आप सच कह रहे हैं, इस फ़ोटो का मिस यूज़ नहीं किया जाएगा?’ लड़की ने अविश्वास से कहा।

‘लीजिए, ये मेरा कार्ड रख लीजिए, कोई भी ग़लती होने पर मेरे खिलाफ ऐक्शन ले सकती हैं।‘ शरद के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

‘ठीक है, विश्वास कर रही हूं। अगर मुश्किल न हो तो फ़ोटो की एक कॉपी ‘महिला- कल्याण केंद्र’ में भेज दीजिएगा। ऐड्रेस नोट कर लीजिए।‘

‘नो प्रॉबलेम, मैं इस केंद्र को जानता हूं। मेरे ऑफ़िस के रास्ते में पड़ता है।‘

‘थैंक्स, तकलीफ़ के लिए क्षमा चाहूंगी।‘कुछ नरमी से लड़की ने कहा.

‘माई प्लेज़र, पर आपका नाम क्या है। केंद्र में किसके नाम से फ़ोटो छोड़नी होगी?’ लड़की जैसे ही जाने को मुड़ी, शरद पूछ बैठा।

‘आकांक्षा- - बस इतना कहना ही काफ़ी होगा।‘

वाह: क्या सार्थक नाम है। आप तो किसी की भी आकांक्षा हो सकती हैं। शरद के मन ने सोचा।

घर लौटकर शरद ने सबसे पहले एक स्टूडियो में फ़ोटो की प्रतियां निकालने को दे दीं। ताज्जुब की बात ये थी कि शरद भी प्रतियों की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा था। नियत दिन फ़ोटो की प्रतियां लाने गए शरद से फ़ोटोग्रफ़र ने पूछा-

‘बहुत सुंदर तस्वीर आई है। साथ में जो खड़ी हैं, क्या वह आपकी पत्नी हैं या कोई मॉडेल हैं? आपने कमाल की फ़ोटो ली है। अगर आप इजाज़त दें तो इस फ़ोटो को इन्लार्ज करके अपने स्टूडियो में लगाना चाहूंगा।‘

‘भूल कर भी ऐसी ग़लती मत कीजिएगा वर्ना आपको लेने के देने पड़ जाएंगे।‘ शरद को अपना वादा याद था, फ़ोटो का दुरुपयोग किसी हालत में मान्य नहीं होगा।

‘ऎसी क्या बात है,सर? सच तो यह है ,इस फोटो से मेरे स्टूडियो में ग्राहकों की संख्या बढ़ जाएगी. इतना ही नहीं अगर आप इस तस्वीर को किसी मैगजीन में छपवा दें तो मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि आपको ही फर्स्ट प्राइज़ मिलेगी. गुलाब और इस चेहरे में से कौन ज्यादा सुन्दर है, कहना मुश्किल है,’ मुग्ध दृष्टि से तस्वीर देखते फोटोग्राफर ने कहा.

‘आपके सुझाव के लिए धन्यवाद, पर मुझे न किसी पुरस्कार की चाह है ना ही आपके स्टूडियो के ग्राहकों की संख्या से मतलब है, बस इतना याद रखिएगा ये तस्वीर सिर्फ मेरी है. अगर इसका कहीं भी इस्तेमाल हुआ तो आप मुश्किल में आ जाएंगे.’ शरद ने तीखा जवाब दिया.

‘आपकी बात समझ गया,सर. ये लीजिए आपके फोटोग्राफ्स.” प्रतियां लिफ़ाफ़े में डालते फोटोग्राफर ने एक बार फिर फोटो पर हसरत भारी निगाह डाल, लिफाफा शरद को थमा दिया.

‘थैंक्स. पेमेंट कर शरद बाहर आगया. महिला कल्याण केंद्र पर कार रोक शरद रिसेप्शन की और बढ़ गया. मन में क्षीण सी आशा थी शायद वहां आकांक्षा मिल जाए. रिसेप्शन पर एक युवती ने स्वागत करते हुए पूछा- -

‘नमस्ते,सर, बताइए आपकी क्या सेवा कर सकती हूँ?”

‘मुझे मिज़ आकांक्षा से मिलना है, क्या वह इस समय यहाँ हैं?

“क्षमा करें, आकांक्षा दीदी अभी नही. आई है., पर थोड़ी देर में वह ज़रूर आ जाएंगी. अभी वह अस्पताल में भर्ती औरतों को देखने गई हैं. आप चाहें तो प्रतीक्षा कर सकते हैं.”

“क्या आकांक्षा जी डाक्टर है?” विस्मित शरद ने जानना चाहा.

“जी नहीं, पर दीदी दुखी औरतों के जख्मो पर प्यार और हिम्मत का मरहम लगा कर सबका दू;ख-दर्द ज़रूर कम कर देती हैं. अस्पताल के अलावा, इस केंद्र की देखभाल और यूनीवर्सिटी में पढाई के साथ इतने सारे काम हमारी आकांक्षा दीदी ही कर सकती है.” रिसेप्शनिस्ट के चहरे पर आदर का भाव था.

“ओह, पर मैं ठीक से समझा नही.” शरद कुछ सोचने की कोशिश कर रहा था.

‘मतलब दीदी समाज-शास्त्र विषय में रिसर्च कर रही हैं और जो औरते तकलीफ में होती हैं, दीदी उन्हें सहारा देती हैं. अरे ये लीजिए, आकांक्षा दीदी आ पहुंची. आपको ज़्यादा प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ी.”

रिसेप्शनिस्ट की दृष्टि का अनुसरण करते शरद की निगाहें आकांक्षा पर ठहर सी गई. सफ़ेद सलवार- सूट पर धानी दुपट्टे में आकांक्षा का खिला चेहरा ऐसा लग रहा था मानो नई कोमल हरी पत्तियों के बीच सफ़ेद फूल खिल रहा था. चहरे पर हलकी मुस्कान के साथ आकांक्षा ने रिसेप्शनिस्ट को स्नेह भरी दृष्टि से देख, पास खड़े शरद को देखा.

“अरे आप यहाँ, याद आया शायद आप फोटो लाए है. आइए उधर कुर्सी पर बैठते हैं.’ शरद के हाथ में पकडे लिफ़ाफ़े पर आकांक्षा की नज़र पड़ गई.

“जी हाँ, आपकी अमानत पहुंचाना मेरा दायित्व जो था.’ हलकी मुस्कान के साथ शरद ने लिफाफा बढाया.

“धन्यवाद, आशा करती हूँ आपने अपना वादा निभाया होगा. इस फोटो की प्रतियां कहीं बाहर नहीं दी हैं.’

“जी हाँ, फोटो की तीन प्रतियों में से दो आपको दे रहा हूँ , एक मेरे पास है. अगर आप चाहें तो फोटोग्राफर से कन्फर्म कर सकती हैं. वैसे वह आपकी फोटो अपने स्टूडियो में लगाना चाहता था.’

‘ओह नो, आपने उसे मना तो कर दिया, फिर भी एक बार देख लीजिएगा उस पर विश्वास करना ठीक नहीं. अपने फायदे के लिए ऐसे लोग कुछ भी कर सकते हैं.”

“परेशान न हों मैंने उसे चेतावनी दे दी है, वह ऎसी गलती नहीं कर सकता, ऐसा लगता है आप किसी के विश्वासघात की शिकार हुई हैं. दुनिया में सब लोग धोखेबाज़ ही नहीं होते.’ शरद ने कहा.

‘आपको ज़्यादा प्रतीक्षा तो नहीं करनी पड़ी? आप फोटो हमारी रिसेप्शनिस्ट रूबी को दे सकते थे.” शरद की बात का उत्तर न दे उसने अपनी बात कही.

“आप इस केंद्र से कैसे जुडीं? रिसेप्शनिस्ट आपके कामों की बहुत तारीफ़ कर रही थी.

”“यह केंद्र मेरा घर है. यहाँ रहने वाली शोषित, परिवार से निर्वासित स्त्रियाँ ही मेरा परिवार है.”

“आपके विचार जान कर बहुत खुशी हुई.मुझे यकीन है, आप की प्रेरणा से इन स्त्रियों को नव जीवन मिल सकेगा. मै मानता हूँ हमारा समाज आज भी स्त्रियों को उनका प्राप्य नहीं दे सका है.”

“मुझे खुशी है, आप ऐसा सोचते हैं वरना पुरुषों की गलती के लिए भी औरत को ही दोषी ठहराया जाता है. पता नहीं कैसे समाज के सोच को बदला जा सकता है.”आकांक्षा चहरे पर आक्रोश था.

“मेरा सोचना है कि एक दिन स्त्रियों को उनका प्राप्य अवश्य मिल सकेगा. बस स्त्री को अपनी शक्ति पहचाननी है. मुझे विश्वास है आप जैसी नारी की प्रेरणा से स्त्रियों में जागरूकता लाई जा सकती है.”

“आपको बहुत देर हो गई, मेरा भी काम का समय हो गया.. फोटो पहुँचाने के लिए धन्यवाद.” अचानक हाथ जोड़ आकांक्षा ने विदा मांग ली.

आकांक्षा द्वारा उसे इस तरह अकस्मात् विदा देने की बात से शरद के चहरे पर विस्मय और खिसियाहट स्पष्ट थी. क्या कारण हो सकता है कि इतनी सुन्दर शिक्षित लड़की को समाज-सेवा के लिए ऎसी ही जगह काम करना था. रिसेप्शनिस्ट ने बताया था आकांक्षा समाज-शास्त्र विषय में शोध-कार्य कर रही हैं.. इसी उधेड़बुन में वह घर पहुँच गया. मालिक को आया देख रामू ने चाय की ट्रे सामने रख दी. अनमने भाव से शरद ने चाय का कप होंठो से लगाया, पर जैसे चाय में आकांक्षा का चेहरा उभर आया था.. अचानक उसे याद आया समाज-शास्त्र विभाग में उसका मित्र अविनाश भी लेक्चरार है. वह ज़रूर आकांक्षा के बारे में जानता होगा. अविनाश से मिलने की सोच करके शरद को काफी आश्वस्ति सी महसूस हुई. वैसे वह स्वयं भी सोच रहा था ज़रा सी देर के परिचय में उसे उस लड़की की बारे में जानने की इतनी उत्सुकता क्यों है. भविष्य में उससे शायद ही कभी मिलना हो.

“अरे शरद, कहो आज हमारी याद कैसे आगई? सुना है अब अपनी कम्पनी में बड़े ऊंचे पद पर पहुँच गए हो.” बहुत दिनों बाद शरद को अपने विभाग में देख अविनाश विस्मित और खुश था.

‘ऐसी बात नहीं है, भला कोई अपने दोस्तों को भुला सकता है, बस काम के प्रेशर की वजह से मिल नहीं पाया. तू सुना कैसा है. यूनीवर्सिटी की नौकरी में तो छुट्टियों का मज़ा रहता है.”शरद ने सफाई दी.

“तू चाहे तो तू भी नौकरी बदल ले, पर तेरी कम्पनी वाले ठाठ यहाँ नहीं मिलेंगे. अब बता तू किस काम से आया है, सिर्फ मुझसे मिलने ही तो आया नहीं है. क्यों ठीक कहा न?” अविनाश शरारत से मुस्कराया.

‘क्यों क्या बिना काम के तेरे पास आना गुनाह है.? हाँ मानता हूँ, इधर कुछ दिनों से नहीं आ पाया वरना क्या पुरानी मीठी यादें भुलाई जा सकती है.’

“अरे मे तो मजाक कर रहा था, चल कैफेटेरिया चलते हैं, बहुत दिनों से तेरे साथ कॉफी का मज़ा नहीं लिया है.”दोनों साथ उठ खड़े हुए.

कैफेटेरिया में विद्यार्थियों की भीड़ थी. दोनों एक कोने की खाली टेबल पर बैठ गए. अविनाश ने वेटर को कॉफी लाने के निर्देश देकर पूछा –

“कुछ खाने को मंगाऊं?”

“नही,यार. कभी तेरे घर आऊँगा तब शीला भाभी के हाथ का बना खाना खाऊंगा. कैसी हैं, भाभी जी?’

“अच्छी भली हैं. आजकल समाज-सेवा की धुन चढी है. हमारे विभागाध्यक्ष डाक्टर नारंग ने अपनी माँ की स्मृति में एक महिला- कल्याण केंद्र खोला है. शीला वहां की स्त्रियों को कढ़ाई-बुनाई सिखाने जाती है. वैसे वहाँ की सर्वेसर्वा एक मिस आकांक्षा हैं. कमाल की लड़की है आकांक्षा..”

“वाह इन सो कॉल्ड मिस आकांक्षा में ऎसी क्या बात है जिसने हमारे दोस्त को भी इम्प्रेस कर रखा है.” ””अगर तुम उससे मिलोगे तो तुम समझोगे, बुद्धि और सौन्दर्य का मिलन किसे कहते हैं? हर परीक्षा में टॉप किया है..उसे तो जो देखेगा उस पर न्योछावर हो जाएगा,”

‘लगता है मेरा दोस्त भी उस पर न्योछावर है, भाभी से कहना होगा.”शरद ने परिहास किया.

‘मेरी छोड़, आकांक्षा ने गाम्भीर्य का ऐसा कवच ओढ़ रखा है कि वो तो लड़कियों से भी बात नहीं करती..वैसे हेड उस पर बहुत भरोसा करते हैं. अगर तू चाहे तो तुझे मिलवा सकता हूँ. तू तो अभी तक शादी के बंधन में नही बंधा है”.अविनाश ने मज़ाक किया.

“रहने दे, मुझे किसी समाज-सेविका से शादी नहीं करनी है. पति- सेवा की जगह समाज-सेवा होगी.”

“पागल है, अरे आकांक्षा का तो रिसर्च का विषय ही ऎसी स्त्रियों से संबंधित है. उनकी आज की स्थिति और उनके निर्वासन के कारण आदि जानने के लिए ही उसने उस केंद्र में रहने का निश्चय किया है. प्रताड़ित स्त्रियों को वह नई राह और जीना सिखाती है. में तो कहता हूँ, बड़े जीवट वाली लड़की है. उसकी तो जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.”अविनाश के चहरे पर प्रशंसा थी.

“थैक्स यार, अब चलता हूँ. हाँ कॉफी बहुत अच्छी थी. किसी दिन तेरे घर आऊँगा. भाभी जी को मेरी याद दिला देना.”अचानक शरद उठ खडा हुआ. अविनाश से हाथ मिला कार में जा बैठा.

आज ऑफिस में अवकाश था. अनायास ही उसने कार केंद्र की और मोड़ दी. रिसेप्शनिस्ट ने उसे पहचान लिया.

“आइए सर, अभी दीदी को बुलाती हूँ. वह अन्दर ही कुछ काम कर रही हैं.” रिसेप्शनिस्ट भीतर चली गई.

शरद कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया. समझ में नहीं आरहा था वह आकांक्षा से मिलने को इतना उत्सुक क्यों था. कोई बहाना तो बनाना ही पड़ेगा. आश्रम से आती आकांक्षा को देख शरद खडा हो गया.

“अरे आप कैसे आए? आप तो फोटो उसी दिन दे गए थे.” आकांक्षा विस्मित थी.

‘आज फोटो देने नहीं आया हूँ. असल में आपके आश्रम और आपके कार्यों की बहुत तारीफ़ सुनी है. आप के इस पुनीत कार्य में मै भी अपना कुछ सहयोग देना चाहता हूँ. आपका आश्रम देखना चाहता हूँ”.

“धन्यवाद मिस्टर कुमार. आपको निराश करते हुए दुःख है, पर इस मन्दिर जैसे आश्रम में मैंने पुरुषों का प्रवेश सर्वथा निषिद्ध कर रखा है.” गंभीरता से आकांक्षा ने कहा.

”पुरुषों से इस नाराजगी की कोई ख़ास वजह? कहीं ऐसा तो नहीं आपको किसी ने धोखा दिया है या--?”

“मै ने अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी के बारे में किसी को भी बात करने का अधिकार नहीं दिया है. अब क्या आपको कुछ और कहना है?”

“क्या सिर्फ पुरुष होने के कारण मुझे आश्रम को आर्थिक सहायता देने का भी अधिकार नहीं है?”

“आश्रम की स्त्रियों को स्वावलम्बी और स्वाभिमानी बनाने की शिक्षा दी गई है. अपने हुनर से वे स्वावलंबी बन रही हैं. अनुदान की अपेक्षा आप किसी और तरीके से उनकी मदद करना चाहें तो ठीक होगा.’ उदासीन स्वर में आकांक्षा ने कहा.

“बताइए मैं और किस तरह से उनकी मदद कर सकता हूँ, मुझे कुछ सहायता कर के खुशी मिलेगी.’

‘कुछ ही दिनों बाद आश्रम की स्त्रियाँ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का मंचन करने वाली हैं. अनुदान की जगह अगर आप इस कार्यक्रम के टिकट बेचने में मदद कर सकें तो आभार मानूंगी. हम सिर्फ अनुदान में विश्वास नहीं रखते,”

‘”वाह ये तो बहुत अच्छी बात है. मैं पूरी कोशिश करूंगा ज़्यादा से ज्यादा टिकट बेच सकूं’.” शरद का चेहरा खिल उठा.

“एक बात याद रखिए, मुझे इम्प्रेस करने के चक्कर में कहीं खुद ही सारे टिकट मत खरीद लीजिएगा.” पहली बार आकांक्षा के चहरे पर मीठी मुस्कान थी. शरद मुग्ध देखता रह गया.”

“यानी कि आप जानती हैं मै आपको इम्प्रेस करना चाहता हूँ. वैसे क्या चाय के लिए नहीं पूछिएगा. आज तो ऑफिस में भी चाय नही पी है.” शरद ने मज़ाक किया.

“एक बात स्पष्ट करना चाहूंगी, मुझे इम्प्रेस करने के चक्कर में अपना समय बर्बाद करने की गलती भूल कर भी मत कीजिएगा. आपको बता दूं यहाँ चाय कौन बनाती हैं?”

“सब जानता हूँ आपके आश्रम में किस तरह की दुखी और असहाय स्त्रियाँ रहती हैं. आप उन्हें अपना परिवार मानती हैं. कहिए ठीक कहा न?” शरद के चहरे पर शरारत थी.

“लगता है आपकी स्मरण –शक्ति बहुत अच्छी है. अपनी इस क्वालिटी को ऑफिस के कामों में ही लगाएं तो बेहतर है. वैसे अभी पांच मिनट में आपकी चाय हाज़िर हो जाएगी.” रिसेप्शनिस्ट को चाय मंगाने का आर्डर दे कर आकांक्षा ने ऑफिस की डेस्क से टिकटों का एक पैकेट निकाल कर शरद की और बढाते हुए कहा- -.

“ये तीस टिकट हैं, अगर इतने ही बेच सकें तो काफी है.”

“ये तो एक हफ्ते में ही बेच लूंगा, और टिकट लेने के बहाने आपसे एक बार फिर मिलना हो जाएगा. वैसे अगर बुरा न माने तो एक सच कहना चाहता हूँ, आपसे जो एक बार मिल ले वह बार-बार मिलना चाहेगा.” साहस कर के शरद ने कहा.

“जानती हूँ, पर एक सच और भी जानते होंगे, सुन्दर गुलाब में भी कांटे होते हैं. अगर ये कांटे चुभ जाएं तो तिलमिला देते हैं.”आकांक्षा के चेहरे पर आक्रोश सा था.

“जानता हूँ, फिर भी क्या गुलाब से प्यार करना छोड़ना संभव है? जानती हैं, मेरी गार्डेन में बहुत किस्मों के गुलाब खिलते हैं. उनकी काट-छांट में न जाने कितनी बार कांटे चुभे हैं, पर गुलाबों के प्यार में कभी कमी नहीं आई है.” शरद की दृष्टि आकांक्षा के चहरे पर निबद्ध थी.

रिसेप्शनिस्ट के साथ साफ़ आसमानी धोती पहने एक स्त्री चाय के प्यालो वाली ट्रे के साथ आई थी. सावधानी से ट्रे सामने की मेज़ पर रख शालीनता से हाथ जोड़ शरद को नमस्ते की थी. चेहरे पर पड़ी लकीरें उसके सुन्दर चेहरे को उदास बना रही थीं.

“मिस्टर कुमार, यह चन्दा है. इसे संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान है. सांस्कृतिक कार्यक्रम की यह जान है. क्यों चन्दा ठीक कह रही हूँ न? हाँ यह मिस्टर कुमार हैं, यह हमारे शो के टिकट बेचने में मदद करेंगे.” चाय का प्याला शरद की और बढाती आकांक्षा ने कहा.

“धन्यवाद, मुझे खुशी होगी अगर आपके कुछ काम आ सकूं.” चाय का सिप लेते शरद ने कहा.

“पता नहीं चाय आपको पसंद आई या नहीं, पर चन्दा के हाथ की बनी अदरक तुलसी की चाय मुझे बहुत पसंद है.” आकांक्षा के मुख पर संतोष की खुशी थी.

“आपकी पसंद भला गलत कैसे हो सकती है. चाय सचमुच अच्छी थी. डरता हूँ कहीं इस चाय के लिए फिर ना आना पड़े.” शरद ने परिहास किया.

“चाय के लिए या मेरे लिए? सच कहते क्या डर लगता है. वैसे ऎसी भूल मत कीजिएगा, पछताएंगे”. बात ख़त्म करती आकांक्षा ने विदा के लिए हाथ जोड़ शरद को फिर विस्मित कर दिया.

वापस लौटते शरद के मन में आकांक्षा की कही बात समझ में नहीं आ रही थी उसने ऐसा क्यों कहा ऎसी गलती मत कीजिएगा, पछताएंगे. क्या उसने शरद के मन की बात पढ़ ली थी. अब जैसे आकांक्षा शरद के लिए पहेली बनती जा रही थी. इतना तो निश्चित था, कोई बात ज़रूर है जिसने उसकी ज़िंदगी में कडुवाहट भर दी है. क्या हो सकता है, कहीं वह बलात्कार की शिकार तो नहीं हुई है, जिसकी वजह से उसे पुरुषों से इतनी नफरत हो गई है. नहीं ऐसा नहीं हो सकता, पर- - -, नहीं अब वह उसके बारे में नहीं सोचेगा. गराज में कार पार्क करते शरद ने निश्चय कर डाला.

अपने निश्चय के बावजूद दूसरे दिन शरद ने अपने असिस्टेंट को बुला कर कहा_

“महिला कल्याण केद्र द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, इस कार्यक्रम से जो धन आएगा, उसे पीड़ित महिलाओं के कल्याण-कार्यों में लगाया जाएगा. ऑफिस में. जो लोग दुखी स्त्रियों की सहायता करना चाहें उन्हें ये टिकट दे दीजिएगा, उम्मीद इस पुनीत कार्य में सब मदद करेंगे.”

“क्यों नहीं सर, लोग पिक्चर देखने में भी तो इतने पैसे बर्बाद करते है. ये तो पुन्य का काम है.” असिस्टेंट ने चापलूसी भरे शब्दों में. कहा. वह अच्छी तरह से समझता था, साहब का काम पूरा करने के बहुत फायदे हैं.

चार दिनों में तीस टिकट बिक जाना कठिन काम नहीं था, भले ही पीठ-पीछे कुछेक ने कहा, ये हमारे कुमार साहब को समाज-सेवा का शौक कब से हो गया. शायद अपनी किसी गलती का प्रायश्चित कर रहे हैं. जो भी हो शरद के असिस्टेंट को अपने काम में तो कामयाबी मिल ही गई थी.

आकांक्षा को एकत्रित की गई राशि देने के बहाने शरद को फिर उससे मिलने का बहाना मिल ही गया.

“वाह, आपने तो कमाल कर दिया. धन्यवाद के साथ आपको ये वी आई पी कार्ड देना मेरा फ़र्ज़ बनता है.

आपके लिए प्रोग्राम में सबसे अगली सीट पर स्थान रहेगा, पर समय से आना पडेगा, ये इसलिए कह रही हूँ क्योंकि आप एक व्यस्त अधिकारी हैं.”

“आपके लिए तो समय से पहले आना मेरा सौभाग्य होगा. वैसे मैंने कोई इतना बड़ा काम नहीं किया है की मुझे वी आई पी बना दिया जाए. अगर मेरे पुरुष होने से आपको कोई परेशानी न हों तो आपके कार्यों में सहयोग देकर मुझे बहुत खुशी होगी,” मीठी सी मुस्कान शरद के अधरों पर आ ही गई

“कितने पुरुष वस्तुत: पुरुष होते हैं, मिस्टर कुमार? कभी यही पुरुष इंसान के वेश में जंगली भेड़ियो से भी बदतर होते हैं, पर एक पुरुष होने के नाते आप इस सत्य को स्वीकार नही कर सकते.”

“मुझे आप जानती ही कितना हैं, दुःख है कि आपने मुझे भी जानवरों की श्रेणी में रख दिया. जीवन में किसी पुरुष के धोखे का शिकार बनने के कारण सब पुरुषों को एक ही तराजू में तौलना क्या ठीक है, आकांक्षा जी?” शरद का स्वर आहत था.

“माफ़ कीजिए, आपको निशाना बनाना मेरा लक्ष्य नहीं था, आपने यह कैसे सोच लिया, मै किसी का शिकार बन सकती हूँ. नही. शायद गलत कह रही हूँ, इन्हीं पुरुष नामधारी जीवों के कारण मुझे समाज ने एक ऐसा खिताब दिया है जिसे पाकर मै पत्थर बन गई हूँ.’

“आप पत्थर बन गई हैं, ऐसा तो कहीं किसी ऐंगल से नहीं देख पा रहा हूँ. आप तो एक कोमल टहनी पर खिली गुलाब का फूल दिखती हैं.’ शरारती मुस्कान शरद के अधरों पर थी.

‘गुलाब के फूलों की ज़ात यानी किस्मों के नाम होते हैं, मेंरे पास गुलाबॉ जैसा कुछ नहीं है. आकांक्षा ने अजीब स्वर में कहा.कहा.

“आप की बातें समझ नहीं पाया, मेरे लिए आप पहेली बनती जा रही हैं.’

“मुझे पहेली ही बनी रहने दें, समाधान पाने के प्रयास में बहुत निराशा होगी. एक दिन बाद प्रोग्राम है, बहुत काम करने है. आप ठीक समय पर आ जाइएगा.”

“जो भी हो, आप अगर पहेली हैं तो मै समाधान खोज कर ही चैन से सो सकूंगा.” शरद दृढ था.

“परेशान न हों ,मिस्टर कुमार. समाधान खोजने में आपकी बहुत लोग सहायता करेंगे.” अब माफी चाहूंगी, अचानक आकांक्षा उठ कर चली गई विस्मित शरद उसे जाते देखता रह गया.

शरद परेशान था, आकांक्षा उसकी समझ से परे थी. उसने क्यों कहा उसके पास गुलाबों जैसा कुछ नहीं है, पर सिर्फ आकांक्षा ही क्या किसी गुलाब से कम है? शरद जितना ही आकांक्षा के बारे में ना सोचना चाहता ,वह उसके दिमाग पर हावी होती जा रही थी. यह तो निश्चित था उसके मन पर कोई आघात पहुंचा था, पर क्या? काश वह पहेली बूझ पाता. शरद को लगता शायद वह आकांक्षा को चाहने लगा है. यह तो सच था उसमें चुम्बकीय आकर्षण है, पर उसकी उदासीनता शायद किसी को भी अपने पास नहीं आने देती. यही तो अविनाश ने भी कहा था. इसी उधेड़बुन में शरद की आँख लगी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी. अलसाए शरद ने फोन उठाया. दूसरी और उसके चाचा थे.

“शरद बेटा कैसे हो? तुम्हे नींद से उठा दिया, कल मै तुम्हारे पास पहुँच रहा हूँ. रिसीव तो करोगे ही, पर पिछली बार की तरह लेट मत हो जाना..’ चाचा जी की हँसी ने शरद को चैतन्य कर दिया.

“डोंट वरी चाचू , समय से पहले पहुँच जाऊंगा.” फोन रख कर शरद के अधरों पर मुस्कान आ गई.

दूसरे दिन चाचा के आ जाने से शरद बहुत खुश था. चाचा उसे बेटे की तरह से प्यार करते थे. दोनों के बीच चाचा-भतीजे से ज़्यादा दोस्ती का रिश्ता था. शरद उनके साथ अपने दिल का हर राज़ आसानी से खोल सकता था. चाचा को शहर घुमाने के लिए उसने ऑफिस से छुट्टी ले ली.

‘आप बहुत अच्छे समय पर आए हैं, कल यहाँ. के महिला कल्याण केंद्र द्वारा एक कलचरल प्रोग्राम होने वाला है, मुझे वी आई पी कार्ड मिला है, आपको भी चलना होगा.’ शरद ने खुशी से कहा.

‘वाह, बेटा तुम कब से महिलाओं का कल्याण करने लगे?” चाचा ने मज़ाक किया.

दूसरे दिन शरद बेहद उत्साहित था. ठीक समय पर पहुँचने की बात उसे याद थी नियत समय पर चाचा के साथ शरद कार्यक्रम-स्थल पर पहुँच गया. द्वार पर गुलाब की कलियाँ देकर उनका स्वागत किया गया. हाल में शरद की आँखे आकांक्षा को खोज रही थीं. पर आकांक्षा कहीं नहीं दिखी. कार्यक्रम का संचालन मिस्टर नारंग कर रहे थे. उनके साथ शहर के एन जी ओ के दो सदस्य मंच पर थे. मिस्टर नारंग ने केंद्र के बारे में बताते हुए आकांक्षा की भूरि –भूरि प्रशंसा की. शरद का जैसे उत्साह ही ख़त्म हो गया था. अचानक गुलाबी रंग की साड़ी में आकांक्षा ने मीठी-सधी आवाज़ में माइक पर धन्यवाद देना शुरू किया था. उसकी वाणी और अनुपम सौन्दर्य से हाल में सन्नाटा सा खिच गया. शरद उसे अपलक निहारता रह गया तभी पास बैठे चाचा की आवाज़ ने उसे चौंका दिया.

“अरे, आकांक्षा यहाँ? इतने दिनों बाद आज आकांक्षा यहाँ मिलेगी, सोचा भी नहीं था.”

“आप आकांक्षा को जानते हैं चाचू?’ शरद विस्मित था.

“मै ही क्या, फूलपुर का हर इंसान आकांक्षा को जानता है. बड़ी लम्बी कहानी है.’

“ऎसी क्या बात है, चाचू?” शरद का रोम- रोम जैसे कान बन गया हो. अब तो उस पहेली को बूझने का समय आ पहुंचा था, जिसे जानने के लिए वह बेचैन था. कार्यक्रम से तो उसका मन उचाट हो गया था. अपनी क्षमता के अनुसार केंद्र की स्त्रियों का प्रदर्शन अच्छा ही था, निश्चय ही उनकी इस सफलता में आकांक्षा के कुशल निर्देशन और नेतृतव का कमाल था, पर शरद को तो घर जाने की जल्दी थी.

“घर चल कर बात करते हैं. कल आकांक्षा से भी मिलूंगा. आज तो वह व्यस्त है”. चाचा निश्चिन्त थे.

घर पहुंचते ही शरद ने सवालों की झड़ी लगा दी.

“चाचू, ऎसी क्या बात थी जो आपने कहा, आकांक्षा को सब जानते थे.”

“बात ही ऎसी थी. आकांक्षा की अपूर्व सुन्दरी माँ माया, फूलपुर में दरिंदों की दरिंदगी का शिकार हुई थी. उस सुन्दर अकेली औरत पर दरिन्दे आँख लगाए बैठे थे.

“क्या माया जी के साथ उनके परिवार वाले नहीं थे/”

“अपने माता-पिता को एक दुर्घटना में खोकर, उसे ताऊ के घर शरण लेनी पड़ी थी. ताऊ ने उसकी सम्पत्ति पर अपना अधिकार जमा, उसे बेघर कर दिया. उनके दुर्व्यवहार के कारण माया ने फूलपुर के एक स्कूल में नौकरी कर ली. इलाहाबाद से रोज़ फूलपुर आना –जाना कठिन था इसलिए फूलपुर में ही एक कमरा ले कर रहने लगी.’

‘आप ये सब बातें कैसे जानते हैं, चाचू?”

‘उस समय फूलपुर मेरी ही कस्टडी में आता था. तेज़ तूफानी रात में माया का दरवाज़ा तोड़ कर वे दरिन्दे घुसे थे. माया की चीखें किसी को नहीं सुनाई दी या जान कर न सुनी गईं. सुबह खुला दरवाज़ा देख कर थाने में खबर दी गई थी. उसे अस्पताल मे भरती करा दिया गया, पर माया अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी. सबसे बड़ी त्रासदी तो यह हुई जब दो माह बाद उसे गर्भवती पाया गया.” चाचा चुप होगए.

.“सच यह तो माया जी के प्रति बहुत बड़ा अन्याय हुआ, उन्हें. किसने सहारा दिया चाचू?’

“मिशन अस्पताल से आई डाक्टर माया के प्रति बहुत सहानुभूतिपूर्ण थीं, उस अवस्था में उसे मेंटल हॉस्पिटल भेजना उचित नही था, माया के ताऊ-ताई ने उसे पापिन कह घर में रखने से साफ़ इनकार कर दिया. नौ माह बाद बेटी को जन्म देते ही माया ने इस दुनिया से विदा ले ली. बच्ची का प्यारा चेहरा देख डाक्टर के मुंह से सहसा निकल गया ‘आकांक्षा’. बस तभी उसका नामकरण हो गया. अस्पताल की दाई रतनी को बच्ची की देखभाल का दायित्व दिया गया., अकेली जान रतनी को बच्ची के साथ

जैसे नया जीवन मिल गया.

“आकांक्षा के ताऊ-ताई के मुकाबले तो रतनी दाई अच्छी थी. क्या आकांक्षा रतनी के साथ रही, चाचू?’शरद की आवाज़ में आक्रोश था.

“रतनी ने उसे माँ जैसा प्यार दिया, पर मोहल्ले वाले उस बच्ची को पाप की औलाद और नाजायज़ कहते थे. यहाँ तक कि बच्चे भी उसे पापिन कह कर चिढाते. समय बीतता गया. आकांक्षा चौथी कक्षा में पहुँच

गई, पढाई में वह हमेशा अव्वल रही. स्कूल में एक फ़ार्म भरती आकांक्षा ने अपना नाम “आकांक्षा नाजायज़” लिखा तो टीचर स्तब्ध रह गई. वास्तविकता जानने पर टीचर ने रतनी को समझा कर आकांक्षा को अपनी मिशन में काम कर रही विधवा बहिन के पास पढ़ने के लिए भेज दिया.. मुझे खबर मिलती रही आकांक्षा अब बड़ी हो चुकी थी और नाजायज़ का अर्थ समझने लगी थी. दुःख इस बात का है

कि फूलपुर का कोई व्यक्ति अचानक मिलने पर आकांक्षा के घाव कुरेद देता एक अखबार में पुरस्कार लेती आकांक्षा को देखा था इसीलिए आज पहचान गया.”

“ओह इसीलिए वह किसी के सामने नहीं खुलती, अपने को सबसे अलग और दूर रखती है . मुझे वह हमेशा एक अनबूझ पहेली ही लगी.”

“तुम आकांक्षा को कितना और कैसे जानते हो?’ तभी उनकी नज़र टीवी पर रखे एक फोटो पर पड़ी, जिसमे आकांक्षा गुलाब के फूल से होड़ लेती खडी थी.

“हूँ, तो तुम्हारा आकांक्षा के साथ कोई अफेयर चल रहा है?’ चाचा गंभीर थे.

‘ऐसा बिळ्कुळ नहीं है चाचू, पर न जाने क्यों मै उसके प्रति गहरा खिचाव महसूस करता हूँ.” शरद नि:संकोच पूरी कहानी सुना गया.

“उसके साथ शादी का इरादा तो नहीं रखते, बरखुरदार?”

“अगर ऐसा हो तो उसे मै अपना सौभाग्य मानूंगा.”शरद ने सच्चाई से कहा.

“उसकी सच्चाई जानते हुए भी क्या अपनी माँ को इस शादी के लिए राजी कर सकोगे?”

“उस काम के लिए आप पर पूरा भरोसा है. पापा के न रहने पर माँ आप पर ही तो वि्श्वास रखती हैं.”

“ठीक है, पर पहले तुम तो आकांक्षा से ‘हाँ’ कहला लो.” चाचा जैसे सोच में पड़ गए थे.

“शुक्रिया चाचू जान, आपने तो मेरी प्रॉब्लेम ही हल कर दी, इसीलिए तो आप मेरे प्यारे चाचू हैं.’

शरद को रात काटनी मुश्किल लग रही थी, कैसे सवेरा हो और वह आकांक्षा के सामने अपने दिल का राज खोल दे. क्या कमी है आकांक्षा में, अगर उसकी माँ के साथ कुछ गलत हुआ तो उसमे आकाँक्षा का क्या दोष? आज वह समझ पा रहा था वह आकांक्षा की ओर न सिर्फ उसके अनुपम सौदर्य की वजह से आकृष्ट था बल्कि उसके पूरे वजूद ने शरद को अपने मोहपाश में जकड लिया था. शरद को आया देख आकांक्षा का चेहरा खिल उठा.

“माफ़ कीजिएगा, कल आपको इतने सुन्दर प्रोग्राम के लिए बधाई नहीं दे सका.” शरद ने कहा.

“धन्यवाद, आपके सहयोग के लिए हम सब भी आभारी हैं.” मीठे स्वर में आकांक्षा ने उत्तर दिया.

“ आकांक्षा जी, आज आपसे कुछ माँगने आया हूँ, देने का वादा करना होगा?”

“मै आपको क्या दे सकती हूँ, अगर संभव हुआ तो वादा पूरा कर के ज़रूर खुशी होगी.”

“क्या आप मुझे अपना जीवन साथी बना सकती हैं? मै आपको बहुत चाहता हूँ. जीवन भर आपका साथ देता रहूँगा.” बिना किसी भूमिका के अचानक शरद कह गया.

“क्या— - कह रहे हैं आप?’ आकांक्षा का चेहरा पीला पड़ गया.

“मै आपकी पूरी कहानी जानता हूँ, जो हुआ उसके लिए आप कतई जिम्मेदार नहीं हैं.”

“सब कुछ जानते हुए आप ऐसा प्रस्ताव रख कर मेरा उपहास क्यों करना चाहते हैं?”

“आपका उपहास नहीं अपना सत्य बता रहा हूँ. जिस दिन से आपको देखा है एक अजीब कशिश महसूस करता रहा और अब अपने दिल का सत्य जान चुका हूँ. प्लीज़ आकांक्षा, मुझे स्वीकार कर लो.”

‘जब से समझ आई, अपने लिए पापिन की बेटी, नाजायज़ शब्दों में भरा तिरस्कार ही झेला है. आपको उस अपमान का भागी कैसे बनने दे सकती हूँ. मुझे क्षमा करें.”

“अगर ऎसी बात है तो मै कहूंगा, आपकी ये समाज-सेवा एक झूठ है,” तेज़ आवाज़ में शरद ने कहा.

‘क्या कहा, मेरी समाज-सेवा झूठ है, किस आधार पर आप ऐसा कह सकते हैं?’ आवाज़ भीगी सी थी.

‘सच ही तो कह रहा हूँ, जो अपने मन की कुंठा से मुक्त नहीं हो सकी, वह दूसरों का मार्ग-दर्शन कैसे कर सकती है? आपको तो अपनी माँ या अपने लिए कहे गए अपशब्दों को चुनौती की तरह स्वीकार कर के सबका डट कर विरोध करना चाहिए था, पर आपने क्या किया? अपने को सबसे अलग काट कर अपने लिए अकेलेपन की सज़ा खुद तय कर ली.”

“आप समझ नहीं रहे हैं, पूरे समाज से लड़ पाना क्या इतना आसान होता है. ना जाने मेरी माँ मुझे जन्म देने तक कैसे जीवित रह पाई.” आकांक्षा का स्वर भीग आया.

“माँ का दुःख याद करने की जगह आपको तो अपने आक्रोश की आग से समाज में चेतना जगानी चाहिए थी. आप आज तक वही पुराना दुःख जी रही हैं., नाजायज़ और नपुंसक तो वह दरिन्दे थे जिन्होंने रात के अँधेरे में एक अबला का जीवन नष्ट किया.’ शरद की आवाज़ में उत्तेजना थी. चेहरा क्रोध से लाल हो उठा. उस चहरे को विस्मय- विमुग्ध आकांक्षा ताकती रह गई.

“आज तक किसी ने मुझसे इस तरह से चुनौती नही दी, मिस्टर कुमार. आप ठीक कहते हैं मुझे कुंठा-मुक्त होना चाहिए.’आकांक्षा के नयन छलछला आए.

“इसी बात पर मेरी अर्जी मंजूर कर लो आकांक्षा. तुम्हारे पास कुंठा को फटकने भी नहीं दूंगा. मेरा प्यार सब भुला देगा.’ शरद की उत्सुक दृष्टि आकांक्षा के चहरे पर निबद्ध थी.

‘आपको मेरी माँ की दुर्भाग्य पूर्ण कहानी किसने सुनाई, मिस्टर कुमार.?”

“.उस घटना के समय मेरे चाचा इलाहाबाद में सीनियर एस पी थे. उन्होंने ही उन दरिंदों को सज़ा दिलवाई थी. आज भी उन्हें दुःख है, उन वहशियों को फांसी नहीं दिलवा सके. मुझे विश्वास है समाज में चेतना आएगी, समाज बलकृत स्त्री से नहीं बलात्कारियों से घृणा करेगा, उन्हें फांसी की सज़ा दी जाएगी. चाचा जी तुम्हे जानते हैं, उन्होंने ही तुम्हारी हाँ सुनने के लिए मुझे यहाँ भेजा है.”

“आपने तो मेरा दृष्टिकोण ही बदल दिया, मिस्टर कुंमार. मै सोच भी नहीं सकती थी कोई पुरुष आप जैसे विचार भी रखता होगा. हमेशा डरती रही, यहाँ तक कि साथ की लड़कियों से भी मित्रता नहीं कर पाई. हमेशा यही डर रहा, कहीं वे मेरी कहानी जान कर मुझसे नफरत ना करें. आप नहीं जानते बचपन से कितनी नफरत और अपमान का ज़हर मैने पिया है.”आकांक्षा का गला भर आया.

.“दूसरों के विवाह होते देख क्या कभी आपके मन में भी विवाह की इच्छा नहीं हुई, आकांक्षा?’’

“नहीं, एक ही बात मुझ पर हावी रही, अगर कभी कोई समझदार सुपात्र व्यक्ति मिला भी होता और उससे शादी कर भी लेती तो हमेशा डर लगा रहता, जो अपमान का ज़हर मुझे पीना पडा, कहीं वही अपमान मेरे जीवन साथी और नाजायज़ माँ की संतान कहला कर, मेरी सन्तान को ना सहना पड़े ? सच तो यह है पुरुष मात्र से नफरत की वजह से मैने कभी शादी की बात भी नही सोची”.

“अब तो यह डर अपने मन से निकाल फेंको, आकांक्षा. किसकी मजाल जो मेरी पत्नी या मेरे बच्चों की और नज़र उठा कर भी देख सके. कुछ उलटा-सीधा कहना तो दूर की बात है. मुझे हिम्मती इंसान तो मानोगी, अब तो ‘हाँ’ कह दो आकांक्षा. एक रिक्वेस्ट है, मिस्टर कुमार नहीं, मै तुम्हारा शरद बनाना चाहता हूं, आकांक्षा.’ शरद की गहरी दृष्टि आकांक्षा के चहरे पर निबद्ध थी.

आकांक्षा को मोंन देख शरद व्यग्र हो उठा.

“मुझ पर यकीन नहीं कर पारही हो, आकांक्षा? कहो तो अपनी सच्चरित्रता के प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर दूं., गवाहों को पेश करूं, जो कहो करने को तैयार हूँ, बस तुम्हारी ना नहीं सुन सकता.”

‘मुझमे ऐसा क्या देखा मिस्टर कुमार जो इस हद तक दीवानगी है. वैसे आपके प्रमाणपत्र की ज़रुरत नहीं है. शीला भाभी से आपकी तारीफें सुन चुकी हूँ. सच तो यह है, आपको मुझसे ज़्यादा अच्छी हज़ारों लडकियां मिल जाएंगी. हम दोनों के बीच कोई प्रेम-संबंध भी तो नहीं है. मेरी जो परिस्थितियाँ है उनमे इतनी जल्दी कोई निर्णय ले पाना संभव नहीं है.”

“iइसका मतलब आप प्रेम में तो यकीन रखती हैं. एक सच बताइए क्या कभी कोई आपकी ओर या आप किसी की और आकृष्ट हुई हैं?’

‘मेरा तो सवाल ही नहीं उठता, हाँ अगर कोई आपकी तरह मेरा बाहरी रूप देख कर आकर्षित हुआ भी हो तो मेरी उदासीनता और दृढ़ता के कारण किसी को आगे बढ़ने का साहस ही नही हुआ. उस दृष्टि से आप सचमुच बहुत हिम्मती हैं, मिस्टर कुमार. आपकी बातों में न जाने क्या बात थी जो आपके साथ मै अपनी वो बातें शेयर कर सकी, जो वर्षों से मेरे सीने में कैद थीं.”

“मिस्टर कुमार नहीं, आपके मुंह से शरद अच्छा लगेगा. इसका मतलब मुझसे आप प्रेम भले ही न करें, , पर आपके मन में मेरे लिए नफरत तो कतई नही है, अब आप मेरी हिम्मत जान ही गई हैं तो अपना लक्ष्य पूर्ण किए बिना पीछे नहीं हटने वाला, आपको दो दिन का समय देता हूँ बशर्ते आपका उत्तर “हाँ” में होगा.’

“क्या ये बात धमकी तो नहीं है या जो आपने हमारे प्रोग्राम के जो तीस टिकट बेचे उसका मुआवजा चाहते हैं.?”आकांक्षा हलके से मुस्कुराई.

“अच्छा तो आप मज़ाक भी कर लेती हैं. शायद अभी आपके व्यक्तित्व के न जाने कितने पृष्ठ खुलने बाक़ी हैं.” शरद भी हंस पडा.

घर पहुँच चाचा को न देख शरद ने सोचा वह किसी से मिलने गए होंगे. उन्हें सारी बात बताने को उतावला था. आकांक्षा क्या हाँ कहेगी. मन बेचैन था. संध्या का अन्धकार घिरता आ रहा था, तभी उसके चाचू जान ने घर में प्रवेश किया.

“आप कहाँ गए थे, चाचू? कब से आपका इंतज़ार कर रहा था.” शरद ने नाराजगी दिखाई.

“लगता है, तुम्हारी बात बनी नहीं वरना चेहरा यूं लटका सा न होता.”

बिना रुके शरद आकांक्षा के साथ हुई अपनी सारी बातें बता गया,”

“मुझे तो उम्मीद कम लगती है, तुम्हारा प्यार एकतरफा है, शरद.”

“नहीं, चाचू, उसने खुद स्वीकार किया है, मै वह पहला इंसान हूँ, जिसके साथ उसने अपना दिल खोल कर बाते. की हैं. आपको ऐसा क्यों लगा?” शरद मायूसी से बोला.

“अरे बेटा, तेरा अधूरा काम मै कर आया हूँ. तू तो उससे हाँ नहीं करा सका, पर मै उसकी रजामंदी ले आया हूँ. काम आसान नहीं था, पर तेरी बातों से उसे नई दिशा मिली और बाक़ी कमी मेरी कोशिश से पूरी हो गई. आखिर तेरा चाचू जान जो ठहरा” चाचा मुस्करा रहे थे.

“ओह चाचू आप महान हैं. बहुत बहुत शुक्रिया.” खुशी से शरद चाचू से लिपट गया.

“कल वापिस चला जाऊंगा, भाभी को भी तो राजी करना है.”

“वो तो आपके बाँए हाथ का खेल हैं, चाचू.’” शरद का चेहरा खुशी से जगमगा उठा.

दूसरी सुबह का शरद को बेसब्री से इंतज़ार था. हाथ में अपनी गार्डेन के ताज़े गुलाबों के साथ शरद आकांक्षा से मिलने जा पहुंचा.

“स्वीकृति दे कर इस शरद को अनुगृहीत किया है, आकांक्षा. देखो इन गुलाबों में एक भी काँटा नहीं है, अब शरद कुमार के साथ तुम्हारा जीवन भी कंटक रहित होगा.”

“आप पर विश्वास है, अब इस आकांक्षा के जीवन में अगर कभी किसी कांटे ने गलती से भी आने की कोशिश की तो वह चुभ नहीं सकेगा क्योंकि उसमे प्यार का गुलाबी रंग होगा,.” हाथ में शरद के लाए गुलाब के फूल लेती आकांक्षा ने कहा.”

“कमाल है, मेरी चाहत ने आपको एक रात में कवयित्री बना दिया, आकांक्षा जी, आपने तो काँटों को भी गुलाब का ताज पहना कर गुलाबी रंग दे दिया.’ शरद हंस रहा था.

‘कवयित्री तो नहीं, पर सच ये है, आपसे बातें करने के बाद इतना हल्का महसूस कर रही थी जैसे आकाश में उड़ रही हूँ.”

“यही सच है, अपने पंख पसारो, आकांक्षा, तब देख पाओगी सारा आकाश तुम्हारा है.’ आकांक्षा के माथे पर झूल आई लट को बड़े प्यार से हटाते शरद ने कहा.

उभरते सूर्य की रश्मियों के साथ आकांक्षा के चेहरे पर खुशियों के गुलाब खिल रहे थे.
 
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