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Erotica नज़मा का कामुक सफर

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दूसरी तरफ घर में नज़मा भी सुबह की घटनाओ के बारे में सोच रही थी| उसके दिमाग में अपनी माँ के कहे हुए सारे शब्द गूँज रहे थे| उसको साफ़ पता चल चूका था की उसकी माँ ने क्या कहा और कहे गए एक-२ शब्द का क्या मतलब है| नज़मा बेचारी एक बहुत ही मासूम बच्ची थी, वो अपनी माँ के कहे शब्दों का मतलब भी तो अपने बच्चों वाले दिमाग से ही निकालेगी| नज़मा के दिमाग में एक प्लान जनम ले चूका था| रात को भी नज़मा अपने प्लान के बारे में सोचती रही और ठीक से सो भी नहीं पायी| वो बार अपने प्लान को अपने दिमाग में सोच रही थी, उसकी छोटी-२ चीज़ों के बारे में वो पूरी तरह से आश्वस्त हो जाना चाहती थी| पता नहीं कब सोचते-२ नज़मा की आंख लग गयी|

अगली सुबह, नज़मा ने उठ कर अपनी योजना के अनुसार काम शुरू कर दिया| जैसे ही उसके पापा पिछवाड़े से नहा से आये, नज़मा रोज़ की तरह शौच करने के बाद, नहाने बैठ गयी| आज नज़मा ने अपना पेटीकोट भी उतार के एक साइड में रख दिया और केवल पेंटी में अपने भाई का इंतज़ार करने लगी| नज़मा के निप्पल उत्तेजना के मारे सख्त हो गए थे| उसका बदन उत्तेजना के मारे हल्का-२ कांप रहा था| उसके सारे रोयें खड़े हो रखे थे|

अब किसी भी समय उसका भाई पिछवाड़े में आ सकता था| थोड़ी देर में ही एक आवाज़ सुनाई दी| नज़मा के हाथ अपने आप ही नारी लज्जा के कारण बोबे छिपाने के लिए उठे लेकिन नज़मा ने हिम्मत करके बिलकुल नार्मल रही|

इरफ़ान पिछवाड़े में आ चूका था| एक पल को तो इरफ़ान की ऐसा लगा की उसकी बहन बिलकुल नंगी बैठी है लेकिन फिर उसने देखा की उसकी बहन ने सिर्फ एक छोटी सी कच्छी पहनी हुई है| उसे अपनी आँखों पे विश्वास नहीं हो रहा था| उसे उम्मीद थी की रोज की तरह आज भी उसकी बहन पारदर्शी पेटीकोट में होगी लेकिन ये नज़ारा तो पूरी तरह से चौंका देने वाला था।

नज़मा को इरफ़ान की घूरती नज़रें अपने बदन पे महसूस हो रही थी| नज़मा बैठी हुई थी और उसकी छाती उसके पैरों से दबी हुई थी| उसके बोबे दबकर थोड़ा साइड में फ़ैल गए थे| इरफ़ान को नज़मा के साइड से बोबे नंगे दिखाई दे रहे थे|

इरफ़ान (हकलाते हुए): दीदी ... तुम .... तुम .... नंगी क्यों नहा रही हो? पेटीकोट क्यों नहीं पहना?

नज़मा ( मासूमियत से अपनी आँखों को नीचे करते हुए): पता नहीं भाई, माँ ने मुझे नहाते हुए पेटीकोट पहनने से मना किया है|

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इरफान: लेकिन दीदी, माँ ऐसा क्यों कहेगी?

नज़मा: इरफ़ान मुझे नहीं पता, माँ ने ये मुझे डांटते हुए कहा था| मैंने उनसे पुछा भी लेकिन माँ ने कहा की उनकी बात मानने में ही मेरी भलाई है| अगर मैंने उनकी बात नहीं मानी तो वो मेरी टाँगे तोड़ देंगी|

नज़मा: भाई, मुझे ऐसे नहाने में बहुत शर्म आती है| वो तो खुदा का शुक्र है की तुम ही आये हो, सोचो पापा आ जाते तो?

इरफ़ान: यार समझ नहीं आ रहा की माँ ऐसा क्यों कहेंगी? अगर आप बोले तो मैं माँ से बात करूँ?

नज़मा: पागल हो गए हो क्या भाई? अगर तू बात करेगा तो भी माँ को लगेगा की मैंने ही कहा होगा| माँ को लगेगा की मैं तुझसे उनकी शिकायत करती हूँ| तू तो लड़का है तुझे तो कुछ नहीं कहेंगी लेकिन मुझे मार डालेंगी| माँ मुझे कितना डांटती है| मुझे कोई प्यार नहीं करता|

इरफ़ान: अरे .... क्या दीदी .... मैं करता हूँ ना आपसे सबसे ज़्यादा प्यार ... आप दुखी मत हो .... अगर आप नहीं चाहती तो मैं माँ से बात नहीं करूँगा|

नज़मा: भाई .. तू ही तो जिससे में दिल की बात कह सकती हूँ .... तू अपना सगा लगता है मुझे ... माँ तो ऐसे बात करती है जैसे मैं उनकी सौतेली बेटी हूँ ...

नज़मा: भाई ... तेरे सामने मुझे ज़्यादा शर्म भी नहीं आती ... अगर पापा आ जाते तो मेरी क्या हालत होती ...

इरफ़ान: नहीं आये ना पापा अभी ... क्यों जबरदस्ती जो नहीं हुआ उसे सोच के परेशान हो रही है ...

नज़मा: कितना प्यारा भाई है मेरा ... कितनी समझदारी की बातें करता है ...

नज़मा अभी तक नंगी ही बैठी हुई अपने भाई से बातें कर रही थी| नज़मा अचानक से खड़े होने लगी और अपने दोनों हाथों से अपने बोबे छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगी| नज़मा के खड़े होते ही इरफ़ान से लंड को फिर से एक झटका लगा| नज़मा ऊपर से पूरी तरह से टॉपलेस, नीचे सिर्फ एक छोटी सी चड्डी में उसके सामने खड़ी थी| नज़मा अपने बोबों को अपने हाथों से छुपाने का प्रयास कर रही थी लेकिन वो मुद्रा उसे और भी सेक्सी बना रही थी| इरफ़ान को नज़मा के बोबे आधे से ज़्यादा दिखाई दे रहे थे| इस समय इरफान को अपनी बहन कामदेवी की प्रतिमा नज़र आ रही थी| नज़मा सिमटी सी खड़ी अपने जोबन को बचाने की कोशिश कर रही थी|

इरफ़ान अपनी बहन की जवानी में खो गया| इरफ़ान की आँखें लाल हो गयी और पलक झपकना भी भूल गया| इरफ़ान आँखों ही आँखों में जैसे नज़मा की जवानी की प्रशंसा कर रहा था| नज़मा अपने भाई के सामने शर्माने का नाटक कर रही थी लेकिन वास्तव में नज़मा इसके हर सेकंड का आनंद ले रही थी। नज़मा की चूत बुरी तरह से रिस रही थी तो दूसरी तरफ इरफ़ान का लंड इतना सख्त हो गया था जैसे फट ही जायेगा| नज़मा ने सोचा भी नहीं था की वो कभी इस हालत में अपने भाई के सामने हो सकती है।

नज़मा: भाई ..... भाई ... कहाँ खो गए .... वो तौलिया पकड़ा दो प्लीज ....

इरफ़ान (मदहोशी से बाहर आते हुए): हाँ ... हाँ देता हूँ ...

इरफ़ान ने पास टंगा हुआ तौलिया उठा के नज़मा की और बढ़ा दिया| नज़मा ने बड़ी चालाकी से अपना एक हाथ बोबे से हटा के तौलिया पकड़ लिया| जैसे ही नज़मा ने अपना एक हाथ हटाया उसका एक बोबा खुली हवा में नंगा हो गया| नज़मा का खड़ा सख्त गुलाबी निप्पल देख के इरफ़ान के हाथ कांपने लगे| नज़मा के निप्पल कम से कम 2 इंच को तो होंगे ही, इरफ़ान ने सोचा| नज़मा जब तौलिया लेने लगी तो दोनों की उँगलियाँ एक पल के लिए छु गयी| इरफ़ान के मुंह से एक आह निकली जो नज़मा ने सुन के अनसुनी कर दी| लेकिन चेहरे पे आती मुस्कराहट को नज़मा नहीं छुपा पायी|

नज़मा (मन में): इरफ़ान सही रास्ते पे आ गया है| जल्दी ही मंज़िल मिल जाएगी|

इरफ़ान (मन में): दीदी का बदन तो एक दम माल हो गया है, क्या बोबे हैं, क्या निप्पल हैं| लेकिन बेचारी बहुत मासूम है| दीदी को तो पता भी नहीं चल रहा की कैसे में उसकी जवानी को चक्षुचोदन कर रहा हूँ| लंड खड़ा कर दिया दीदी ने आज तो, मज़ा आ गया|

फिर नज़मा ने तौलिया लपेट लिया और इरफ़ान अंदर चला गया|

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अगली सुबह नज़मा ने कुछ नया सोच रखा था| आज भी नज़मा सिर्फ कच्छी में बैठी इरफ़ान के आने का इंतज़ार कर रही थी| इरफ़ान जब पिछवाड़े में आया और उसने नज़मा को कच्छी में बैठे देखा तो सोचने लगा, माँ ने नज़मा के साथ गलत किया या सही, लेकिन मेरे मज़े करवा दिए|

इरफ़ान: कैसी हो दीदी?

नज़मा: मैं ठीक हूँ भाई| लेकिन मुझे अभी भी ये सोच-२ के बहुत शर्म आ रही है की मुझे माँ के कारण यहाँ ऐसे लगभग नंगे नहाना पड़ रहा है|

इरफ़ान: अरे दीदी, इतना क्यों परेशान होते हो| यहाँ कौन है मेरे सिवा| मैं कोई ग़ैर थोड़े ना हूँ| आप मेरे सामने बिलकुल ना शरमाया करें| आपका छोटा भाई ही तो हूँ|

नज़मा: मुझे माँ हर समय डांटती रहती है| कुछ भी मांगो, साफ़ मना कर देती है| अब ये देख|

कहते हुए नज़मा अपने भाई से दूसरी तरह मुंह करके खड़ी हो गयी| आज नज़मा ने एक छोटी सी गुलाबी रंग की चड्डी पहनी हुई थी जो की उसके चूतड़ों को 25 % से ज़्यादा डक नहीं पा रही थी| सबसे बड़ी बात उस कच्छी में गांड के सुराख़ के बिलकुल ऊपर एक बड़ा सा छेद था| उस छेद में झांकती नज़मा के चूतड़ों के बीच की लकीर साफ़ दिख रही थी| इरफ़ान को सुबह की ग़ुलाबी ठण्ड में भी नज़मा की गांड की लकीर देख के पसीना आने लगा|

नज़मा: देख भाई, फ़टी कच्छी पहन रही हूँ, पिछले 2 महीनो से| माँ को जब बोलो तो कहती है की मैं खर्चा बहुत करती हूँ| अब तू ही बता भाई, शर्म नहीं आएगी क्या|

इरफ़ान (थूक निगलते हुए): वो .. वो .. दीदी ... मैं लेके आऊंगा आपके लिए ...

नज़मा: भाई .. मैं भी नहीं चाहती की खर्चा ज़्यादा हो .. मुझे भी सब पता है घर की हालत ... ये देख ....

नज़मा ने अपनी कच्छी के दोनों हिस्से पकड़ के अपनी गांड के दरार में घुसा दिए| अब नज़मा की चड्डी बिलकुल थोंग में तब्दील हो गयी थी|

नज़मा: अगर भाई ... मैं ऐसे कर लूँ फ़टी चड्डी के छेद छुपाने के लिए ... तो सारे चूतड़ नंगे हो जाते हैं ...

इरफ़ान अपनी बहन के मुंह से "चूतड़" सुन के पागल हो गया| उसका लंड पाजामे में से बाहर आने के लिए फड़फड़ाने लगा|

इरफ़ान: मैं ला दूंगा दीदी .... आप ... आप

नज़मा: क्या ... आप-२?

इरफ़ान: साइज बता दो मुझे ...

नज़मा (मुस्कुराते हुए): मैं कैसे बताऊँ ... मुझे शर्म आती है ...

इरफ़ान: क्या दीदी ... आप तो फिर वही .. मुझ से कैसी शर्म

नज़मा: नहीं भाई ... मैं नहीं बता सकती .. तूने सब देख तो लिया है ... तुझे नहीं पता लगा साइज ..

इरफ़ान: दीदी .. कहाँ देखा है ठीक से .... और देख के तो केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है ...

नज़मा (मन में): क्या बात है| ये फट्टू तो बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है| खुदा ने चाहा तो जल्दी ही भाई से अपनी गांड मरवाउंगी|

नज़मा: तो ठीक है ... अंदाजे से ही ले आना|

इरफ़ान: दीदी, अगर गलत साइज आ गए तो सारे पैसे बरबाद हो जाएंगे ..... अगर आप नहीं बताना चाहती तो मैं नाप ले लूँ ....

इरफ़ान ने सोचा क्या पता दीदी बचपने में उसे ये भी चांस दे दें| लेकिन उसे क्या पता नज़मा बच्ची नहीं सबकी माँ थी| नज़मा को चुदना भी था और वो भी अपनी शर्तों पे| नज़मा को सब अपने कण्ट्रोल में चाहिए था| शायद जब भी कुछ उसके कण्ट्रोल से बाहर गया, वो वहां से पीछे हट गयी थी, जैसे की चमन चाचा|

नज़मा: kkkkkkkkkkkkkkkya .... बताती हूँ ... अपनी तरह मुझे भी बेशरम बना के मानोगे .... वो ... वो ... 34B ... और वो नीचे मीडियम ....

इरफ़ान के लंड ने नज़मा का साइज सुन के झटका मारा|

इरफ़ान: क्या-२ ... दोबारा बताना

नज़मा: सुन तो लिया है ... बहन का साइज सुन के मज़ा आ रहा है क्या .... बेशरम

इरफ़ान: दीदी बोला ना, हम भाई-बहन में कोई शर्म नहीं| आप भी कब तक ऐसे घुट-२ के जियोगी| कब तक माँ की डाँट सुन-२ के दुखी होती रहोगी| मैं हूँ ना आपका ख्याल रखने के लिए| लेकिन आप अगर मुझ से खुल के बात नहीं करोगी, इतना शरमाओगी तो कैसा चलेगा ....

नज़मा ने भावुक होने का नाटक करते हुए, मुड कर इरफ़ान के दोनों हाथ थाम लिए| नज़मा के बोबे खुल कर इरफ़ान के सामने आ गए| नज़मा के गोरे-२ चिकने बोबे देख के इरफ़ान पगला गया| नज़मा के बोबे इतने गोरे थे की उनमें से लाल-नीली नसें साफ़ दिखाई दे रही थी|

नज़मा: ओह मेरा प्यारा भाई .... जितना तू मुझ से प्यार करता है ना, उससे कहीं ज्यादा मैं तुझे प्यार करती हूँ|

इरफ़ान: अच्छा जी इतना प्यार करती हो .... तो फिर झूट क्यों बोला मुझ से

नज़मा: मैंने ... मैंने क्या झूट बोला?

इरफ़ान: अपने साइज के बारे में .... 34B में इतने बड़े बोबे कैसे आ सकते हैं?

नज़मा: या खुदा ... शर्म नहीं आती अपनी बहन से ऐसे बात करते हुए?

ये कहते हुए नज़मा ने अपने हाथ छुड़ाते हुए मुंह फेर लिया|

इरफ़ान: दीदी ... अगर बुरा ना मानो तो एक बात और कहूं?

नज़मा: अब और कितनी बेशर्मी करोगे? बोलो, क्या बोलना है?

इरफ़ान: मीडियम साइज ही चड्डी में ये तुम्हारे बड़े-२ चूतड़ भी नहीं आने वाले|

नज़मा: कमीने ... तुम्हे मैं मोटी दिखती हूँ?

इरफ़ान: मोटी कहाँ दीदी ... तुम तो माल दिखती हो|

नज़मा: बेशर्मी की हद है .... तुम्हारा बस चले तो तुम तो अपनी बहन को ही चो.....

इरफ़ान: चो, चो ... क्या चो?

नज़मा को लगा की एक दिन में इतना काफी है|

नज़मा: दफा हो बेशरम ... ये तौलिया दे मुझे और भाग यहाँ से|

इरफ़ान ने नज़मा को तौलिया दिया और अंदर चला गया|

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उस दिन शाम को सब एक साथ खाना खा रहे थे। इरफ़ान ज़रुरत से ज़्यादा खुश दिखाई दे रहा था और बार-बार अपनी बहन की तरह देख के मुस्करा रहा था। नज़मा भी अपने भाई के इस रवैये से खुश थी लेकिन उसे डर था की कहीं उसकी माँ को कोई शक न हो जाये। उसने एक-दो बार इरफ़ान को नार्मल रहने का इशारा भी किया लेकिन शायद इरफ़ान समझ नहीं पाया।

नज़मा अपने भाई को अपने बोबों और आधी नंगी गांड के दर्शन करवा चुकी थी। अगले दिन नज़मा ने गेम को आगे बढ़ाने का सोचा। नज़मा ने प्लान किया की क्यों न आज इरफ़ान को अपनी कुंवारी चूत के दर्शन करवाए जाएँ। लेकिन वो अपनी चूत ऐसे दिखानी चाहती की जैसे ये एक गलती जैसा लगे। आज इरफ़ान थोड़ा लेट उठा था, ये नज़मा के प्लान के लिए बहुत बढ़िया था।

नज़मा पिछवाड़े में जाके नहा ली और एक सूखा पेटीकोट पहन के इरफ़ान का इंतज़ार करने लगी। नज़मा ने आज अपना सूखा पेटीकोट बाकी दिनों के अपेक्षा थोड़ा ज़्यादा ऊपर पहना था। पेटीकोट उसकी उतनी की जांघें ढक पा रहा था जितना एक माइक्रो स्कर्ट ढक पाती है। अगर वो सीधी खड़ी रहती तो पीछे से हल्का सा चूतड़ों का उभार दिखाई देता लेकिन अगर वो सामने की तरफ झुक जाती तो अच्छे अच्छों का पानी निकल जाता। झुकते ही उसकी पेंटी में छिपी चिकनी चूत उभर कर सामने आ जाती।

नज़मा आज अपने भाई पे कहर बरपाने वाली थी। नज़मा ने प्लान किया की जैसे ही उसका भाई पिछवाड़े में आएगा, वो झुक के अपनी गीली पैंटी उतारने लगेगी और ऐसे नाटक करेगी जैसे उसे भाई के आने का पता ही ना चला हो। जब वो झुक के अपनी पानी और कामरस से भीगी पेंटी उतारेगी तो उसके भाई को उसकी चमकती चिकनी कुंवारी चूत के दर्शन हो जायेंगे।

नज़मा कुछ देर अपने भाई का इंतजार करती रही लेकिन कोई नहीं आया। नज़मा ने सोचा की अब कल ही इस प्लान को किया जायेगा लेकिन तभी उसे किसी के आने की आवाज़ सुनाई दी। नज़मा तुरंत अपनी पोजीशन में आ गयी और अपने चूतड़ ड्राइंग रूम की तरफ करके झुक के अपनी पेंटी निकलने लगी। जैसे ही पेंटी नीचे हुई उसकी चिकनी चूत के होंठ और उसकी पूरी गांड सुबह की सुनहरी धुप में चमकने लगे। उसकी चूत ने भी रिसना शुरू कर दिया।

तभी नज़मा को अपनी माँ की आह सुनाई दी "या अल्लाह"।

ये क्या हुआ, परवीन???? नज़मा तो अपने भाई का इंतज़ार कर रही थी, ये उसकी माँ कहाँ से आ गयी? हूँ यूँ था की परवीन को कल रात ही कुछ अंदेशा हो गया था। आज सुबह जब इरफ़ान अपने कमरे से निकल के पिछवाड़े में जाने लगा तो अपनी माँ को ड्राइंग रूम में देख के थोड़ा ठिठका और वापिस अपने कमरे में चला गया जिससे परवीन का शक और गहरा हो गया। परवीन ने तब पिछवाड़े में जाने का फैसला लिया। जैसे ही परवीन पिछवाड़े में पहुंची तो वो उसे झुकी हुई नज़मा दिखाई दी। नज़मा की चूत और गांड नंगे चमक रहे थे। परवीन के मुंह से आह निकल गयी।

नज़मा ने अपनी माँ की आवाज़ सुन ली लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। नज़मा को बड़े ठन्डे दिमाग से काम लेना था। नज़मा ने बिना हड़बड़ाए थोड़ा-थोड़ा करके पैंटी को नीचे लाना जारी रखा और आखिर में उसे टखनों तक गिरा दिया। इरफान भी अब ड्राइंग रूम में आ गया था और वहीँ से छुप के माँ बेटी को देख रहा था।

परवीन (चिल्ला के): नज़मा, ये क्या कर रही है तू?

नज़मा ने जैसे ही माँ की आवाज़ सुनी तो उसने चौंकने का नाटक किया और तुरंत घूम गयी लेकिन उसकी एड़ियों में पैंटी फसी हुई थी जिसके कारण वो गिर गयी।

गिरते ही नज़मा चिलायी: ओह, माँ मर गयी।

परवीन सब भूल के तुरंत भाग के अपनी बेटी को मदद देने के लिए आई।

परवीन: क्या हुआ बेटी, ज़्यादा चोट तो नहीं लगी?

नज़मा: हाय माँ, मेरा पिछवाड़ा। आपने डरा दिया पीछे से आवाज़ दे के।

परवीन अपनी बेटी को चूत की सरेआम नुमाइश के लिए डांटना चाहती थी लेकिन अब उसकी गलती से उसकी बेटी को चोट लग गयी थी। और कुछ दिन पहले भी वो नज़मा को बुरी तरह डांट चुकी थी इसलिए परवीन ने आराम से नज़मा को समझाने का मन बनाया।

परवीन: नज़मा तुम अपनी पैंटी क्यों उतार रही थी? तू पेंटी अपने कमरे में नहीं उतार सकती क्या?

नज़मा: माँ क्या है आपको? जब देखो तब मुझे डांटते रहते हो? मैं अब बड़ी हो गयी हूँ, मुझे पता है कैसे नहाना है। पहले पेटीकोट और अब ये पेंटी, आपको मेरे नहाने के तरीके में इतनी दिलचस्पी क्यों है?

परवीन: बेटी मैं तेरी भलाई के लिए ही पूछ रही हूँ, तू पेंटी अपने कमरे में नहीं उतार सकती क्या?

नज़मा: मैं गीली पेंटी पहन के कमरे तक जाउंगी क्या?

परवीन (मन में): बहुत मुर्ख है ये। अब इसे क्या बताऊँ की ये पेटीकोट के नीचे से पेंटी उतारते हुए छुपाती कम है, दिखती ज़्यादा है। ज़्यादा क्या दिखती है , पूरी नंगी ही तो हो गयी थी मुंदबुद्धि कहीं की।

परवीन: तू ऐसा कर ना। तू अपने कमरे में ही पेंटी उतार के आ और नहाने बाद रूम में जाके पेंटी पहन ले।

नज़मा: माँ, क्या कह रहे हो आप। मुझे बहुत शर्म आएगी।

परवीन: मुझे पता है की मैं क्या कह रही हूँ। तेरी दुश्मन नहीं हूँ, माँ हूँ तेरी। ज़्यादा सवाल जवाब ना कर मुझ से। आज से तू अपने कमरे में ही अपनी पैंटी निकाल के आएगी। बिना पैंटी के भी नहा सकती है, कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा। अभी तू पेंटी पहन के नहाती है, इसलिए तुझे अजीब लग रहा है, धीरे-२ आदत हो जाएगी बिना पेंटी नहाने की।

नज़मा: लेकिन मम्मी

परवीन: चुप, अब कोई बहस नहीं। जैसा मैं कहूँ वैसा कर। फिर से पानी डाल ले अपने पे, गन्दी हो गयी है नीचे गिर के।

परवीन वापिस अंदर चली गयी। माँ को अंदर आता देख इरफ़ान भाग के अपने रूम में चला गया।

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बात तो परवीन ने बिलकुल ठीक कही थी लेकिन नज़मा के शैतानी दिमाग ने क्या समझा ये तो नज़मा की जाने । इरफ़ान भी छुप के सारी बातचीत सुन चूका था, उसे भी अपने कानो पे यकीं नहीं हो रहा था । कैसे उसकी माँ नज़मा को पहले बिना पेटीकोट और तो बिलकुल नंगी, बिना कच्छी के? इरफ़ान को कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन उसे समझ के करना भी क्या था, जो भी हो रहा था उसमें इरफ़ान का तो फायदा ही होने वाला था ।

दूसरी और नज़मा अपनी माँ के दिए नए निर्देशों से बहुत उत्साहित थी। उसकी माँ गलती से नज़मा को ऐसा निर्देश देती थी की नज़मा उसे आराम से अपने मतलब के लिए थोड़-मरोड़ सकती थी । परवीन ने नज़मा को दोबारा नहाने के लिए कहा था इसलिए नज़मा दोबारा नहाने लगी लेकिन इस बार बिना पेंटी, बिलकुल मादरजात नंगी ।

पांच मिनट बाद जब इरफ़ान अपने कमरे से बाहर आया तो उसकी माँ तब तक दूकान के लिए निकल चुकी थी । नज़मा अभी तक पिछवाड़े में ही थी इसलिए इरफ़ान भी पिछवाड़े में पहुँच गया।

नज़मा को इरफ़ान के आने की उम्मीद नहीं थी इसलिए नज़मा अभी अभी नहा के उठी ही थी और तौलिये से अपने नंगे बदन को पूँछ रही थी । अचानक से इरफ़ान के आने की आवाज़ सुन के नज़मा ने तौलिये से अपने बदन को स्वाभाविक नारी लज़्ज़ा के कारण छुपा लिया । इरफ़ान को साइड से नज़मा के उभरे हुए चूतड़ दिखाई दे रहे थे ।

इरफ़ान (मन में): तो दीदी ने मान ली माँ की बात, इतनी जल्दी, बढ़िया है, बढ़िया है

इरफ़ान नज़मा के पास आया और दोनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे ।

इरफ़ान: कैसी हो दीदी?

नज़मा (रोने वाला मुंह बनाते हुए): मैं ठीक नहीं हूँ भाई

इरफ़ान: अब क्या हुआ मेरी प्यारी दीदी को? माँ ने फिर कुछ कहा क्या?

नज़मा: हाँ, फिर से । माँ नहीं दुश्मन है मेरी । पहले पेटीकोट अब तो ....

इरफ़ान: अब तो क्या?

नज़मा: माँ ने अब नहाते हुए कच्छी पहनने से भी मना किया है ...

इरफ़ान: क्या ...... क्यों ...... तो क्या तुम अभी ....

नज़मा: हाँ भाई .... बिलकुल नंगी नहा रही हूँ .... ये देख ...

नज़मा ने थोड़ा सा घूमके अपने भाई को अपने नंगे चूतड़ दिखा दिए |

इरफ़ान: आह .... हाँ दीदी ... आप तो सही में ... बिलकुल नंगी हो ...

इरफ़ान से रहा नहीं गया और उसने नज़मा के सामने की पजामे में तम्बू बनाते अपने लंड को मसल दिया | नज़मा तो आज इरफ़ान को वैसे भी अपनी कुंवारी चूत के दर्शन करवाना चाहती थी लेकिन अब ऐसे, एक दूसरे को देखते हुए, वो ये कैसे कर सकती थी | नज़मा अगर अब अपनी चूत दिखाती तो इरफ़ान को पता चल जाता की नज़मा ये सब जानबूज के कर रही है | लेकिन नज़मा अपनी चूत इरफ़ान को दिखाने के लिए तड़प रही थी|

आखिरकार नज़मा ने हिम्मत करके तौलिया अपने हाथों से गिरा दिया | आखिरकार नज़मा ने हिम्मत करके तौलिया अपने हाथों से गिरा दिया | लेकिन जैसे ही नज़मा के तौलिया गिराया वो भी बैठ गयी, नज़मा के ऐसा दिखाया जैसे गलती से उसके हाथ से तौलिया गिर गया हो और उसके बाद वो अपने बदन को छुपाने के लिए बैठ गयी | इरफ़ान को नज़मा की चूत तो दिखाई दी लेकिन सिर्फ एक पल के लिए | इससे पहले की इरफ़ान अपनी जवान बहन की चूत को अच्छे से देख पता वो नज़ारा तो गायब हो चूका था |

इरफ़ान को अपनी बहन के नंगे चूतड़, जांघें और पीठ सब दिखाई दे रहा था | इरफ़ान वासना से पागल हो रहा था | इरफ़ान ने साड़ी शर्म छोड़ दी और अपनी बहन के सामने की अपने लंड को मसलने लगा |

नज़मा: आआआह ...... मेरे साथ ही क्यों सब बुरा होता है ..... क्या यार ... भाई तूने मुझे बातों में लगा दिया ... देख तौलिया भी गिर गया मुझ से ...

इरफ़ान: तो क्या हो गया ऐसा? क्यों इतना टेंशन ले रही हो | मैं ही तो हूँ यहाँ | आप नहाओ ना आराम से ...

नज़मा: तू है इसी चीज़ की तो टेंशन है | मुझे सब पता है तेरा | कहाँ रहती हैं तेरी नज़रें आज कल |

इरफ़ान: क्या दीदी, आप भी न |

नज़मा: भाई, प्लीज मेरा एक काम कर दे | तू अंदर से एक सूखा तौलिया ला दे | तब तक मैं अपने बाल शैम्पू कर लेती हूँ | सुन आने से पहले दरवाज़ा खटखटा देना ताकि मुझे तेरे आने का पता चल जाये | ना जाने मैं कैसे नहा रही होंगी ...

इरफ़ान: आप भी ना दीदी, शर्म छोड़ोगी नहीं | अब हम दोनों के बीच कोई शर्म की जगह नहीं है |

नज़मा: हाँ हाँ ठीक है, तू तौलिया ला दे ... और सुन ... खटखटाना मत भूलना |

इरफ़ान: दीदी, मुझे थोड़ा काम भी है अपने कमरे में, आप आराम से शैम्पू करो, मैं दस मिनट में आपका तौलिया लेके आता हूँ | कोई और हुकम ?

नज़मा: और कुछ नहीं, ड्रामेबाज़ ...

इरफान अपनी बहन को देखते उलटे पाँव अंदर तौलिया लेने के लिए चला गया | इरफान ने तुरंत तौलिया उठाया और पिछवाड़े की तरफ चल दिया, वो अपनी जवान बहन के नंगे जिस्म के दीदार को एक सेकंड के लिए भी गवाना नहीं चाहता था | इरफ़ान को पता था की उसकी बहन सेक्सी है, लेकिन इतनी सेक्सी, ये तो सनी लियॉन से बड़ी वाली निकली | इरफ़ान पिछवाड़े में पहुँच और पानी की टंकी की ओट में खड़ा हो कर अपनी बहन की नंगेपन को निहारने लगा |

नज़मा खड़ी हुई अपने बालों को शैम्पू कर रही थी | नज़मा का मुंह दूसरी और था | इरफ़ान को अपनी बहन की नंगी गांड, पीठ, जांघें साफ़ नज़र आ रहे थे | इरफ़ान अपने लंड को अपने पजामे के ऊपर से लगातार रगड़े जा रहा था |

आवाज़ से नज़मा को अपने भाई के आने का पता लग गया था | लेकिन नज़मा ऐसे बर्ताव कर रही थी जैसे उसे कुछ पता न चला हो | नज़मा के हाथ शैम्पू करने के लिए उठे हुए थे इसलिए इरफ़ान को साइड से नज़मा के बोबे भी दिखाई दे रहे थे | नज़मा के हाथों के साथ उसके बोबे भी हिल रहे थे |

गांड तो नज़मा पहले भी दिखा चुकी थी अब वो इरफ़ान को अपनी चूत दिखाना चाहती थी | शैम्पू करते करते नज़मा अपने भाई की तरफ मुड़ गयी | शैम्पू करने के बहाने से नज़मा ने अपनी आँखें बंद कर रखी थी | कुछ देर के लिए नज़मा रुक गयी और बिलकुल कामदेवी की मूरत बन गयी | नज़मा चाहती थी की उसका भाई उसके बदन को अच्छे से निहार सके | नज़मा की चूत से पानी रिस रहा था और उसके निप्पल और बोबे कड़क हो गए थे |

इरफ़ान के लिए यह सब स्लो-मोशन में चल रहा था| अपनी जवान बहन को बिलकुल नंगी देख कर इरफ़ान को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था | गुलाबी धुप में चमकते नज़मा के ने इरफ़ान के दीमाग के फ्यूज उड़ा कर रख दिए थे | नज़मा अब धीरे-२ अपने बालों में हाथ चला रही थी |

अचानक से नज़मा ने झाग से भरा हाथ अपनी चूत पे रख दिया और अपनी चूत मसलने लगी | ये दृशय देखते ही इरफ़ान की हालत ख़राब हो गयी, उनके लंड की नसें फटने को हो आईं थी |

ओह, ये क्या | बहनचोद | नज़मा ने अपनी चूत में एक ऊँगली डाल दी और धीमे-२ उसे हिलाने लगी |

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नज़मा को ऊँगली करते देख इरफ़ान भी बर्दाश्त नहीं कर पाया| इरफ़ान ने भी तुरंत अपने पाजामे का नाडा खोला और अपने लंड को मज़बूती से पकड़ के मुठ मारने लगा|

पानी की टंकी के एक पार नज़मा अपनी चूत को बेदर्दी से मसल रही थी और टंकी के दूसरी पार इरफ़ान अपने लंड को मुठिया रहा था| इरफ़ान चाहता था की समय यहीं रूक जाये और वो कयामत तक अपनी जवान बहन को नंगी निहारता हुआ और मुठ मारता रहे| इरफ़ान इस मस्ती को ज्यादा से ज्यादा समय जीना चाहता था लेकिन इरफ़ान के ना चाहते हुए भी इरफ़ान के हाथ की तेज़ी बढ़ती जा रही थी| नज़मा अपनी दो उँगलियों से अपने चूत के दाने को पकड़ के कभी खींच रही थी और कभी दबा रही थी| बीच-२ नज़मा अपनी चूत में उँगलियाँ सरका भी देती थी| अपनी बहन का ये कामुक रूप देख के इरफ़ान हैरान रह गया| इरफ़ान को समझ आ रहा था की उसकी बहन उतनी भी शरीफ नहीं ही जितना वो समझता आया था|

इतने में तो हद ही हो गयी| नज़मा ने मस्ती में अपनी मुनिया को हलके-2 दो तीन थप्पड़ जड़ दिए| इरफ़ान ये देख के पागल हो गया| ये बहन नहीं बहन की लोड़ी है| ये नज़मा तो मिया खलीफा से भी सेक्सी तरीके से ऊँगली कर रही थी| इरफ़ान के बदन ने झटका खाया और ना चाहते हुए भी उसके मुंह एक दबी हुई सिसकारी निकल गयी| इसी के साथ ही इरफ़ान के लंड ने ढेर सारा माल उढेल दिया| ये सारा वाकया सिर्फ २-३ मिनट में ही हो गया था| शायद आज पहली बार इरफ़ान का माल इतनी जल्दी छूटा था| सिसकारी की आवाज़ से नज़मा को पता चल गया की उसके भाई का काम हो गया है|

नज़मा (मन में): जल्दी ही झड़ गया भाई, हा हा, बेचारा बर्दाश्त नहीं कर पाया अपनी बहन के जिस्म की गर्मी .... हा हा

जैसे ही नज़मा ने इरफ़ान के फारिग होने की सिसकारी सुनी, नज़मा वापिस से अपनी पानी की बाल्टी की तरह मुड़ गयी और अपने बदन पर पानी डाल के शैम्पू हटाने लगी|

इरफ़ान इतनी बुरी तरह से झड़ा था की वो वहीँ जमीन पर बैठ गया| 2 मिनट में इरफ़ान ने अपने आप संभाला और खड़ा होकर अपनी बहन की तरफ चल दिया| जैसे ही इरफ़ान बहन के बिलकुल नजदीक पहुंचा तो

इरफ़ान (तेज आवाज़ में): धप्पा

नज़मा (मन में): मैं यहाँ जवानी के खेल खेलना चाह रही हूँ, इस चूतिये का बचपना नहीं जा रहा|

नज़मा तेजी से मुड़ी और अपने सीने पे हाथ रखते हुए बोली: क्या भाई, तूने तो मुझे डरा ही दिया था ...

नज़मा ने अपने अपना हाथ अपने एक बोबे पर रखा हुआ था लेकिन उसका दूसरा बोबा और चूत उसके भाई के सामने थे|

इरफ़ान: देखा, डरा दिया ना दीदी

नज़मा: डराना तो ठीक है, लेकिन तू बिना खटखटाये यहाँ आया कैसे? तुझे बोला था ना मैंने ..

इरफ़ान: दीदी, अब आप भी ना| क्यों शर्माती हो मुझ से इतना?

नज़मा: हाँ-२ ठीक बात है, अपने भाई से क्या शर्माना| तू तो ये ही चाहता है ना की मैं तेरे सामने बिलकुल नंगी घूमती रहूं?

इरफ़ान (धीमी आवाज़ में): चाहने से क्या होता है?

नज़मा: क्या बोला? सब सुन रहा है मुझे| बहुत बेशर्म हो गया है तू | कैसे बेशर्मी से घूर रहा है अपनी बहन को?

इरफ़ान की आँखें अपनी बहन की चूत पे जमी हुई थी| दूर से वो अपनी बहन की चूत को अच्छे से नहीं देख पाया था| उसकी बहन के चूत के होंठ आपस में बिलकुल चिपके हुए थे, जैसे किसी कुंवारी लड़की के होने चाहिए|



नज़मा: कमीने कम से कम बात करते हुए तो आंखों में देख ले| कहाँ कहाँ घूर रहा है, खा जायेगा क्या अपनी बहन को?

इरफ़ान (धीरे से): खाऊंगा नहीं सिर्फ चाटूँगा

नज़मा: या अल्लाह, कितना बेशर्म है ये लड़का| अब घूरना बंद कर और ये तौलिया दे

इरफ़ान ने हाथ बढ़ा के तौलिया नज़मा को दे दिया और नज़मा वापिस से उसकी तरफ अपनी गांड करके अपने बदन को पूंछने लगी | अपने सामने अपनी बहन की गोल मटोल गांड देख के इरफ़ान से रुका नहीं गया और उसका हाथ अपने आप ही जवान बहन की गांड के तरफ बढ़ गया| इरफ़ान ने हलके से अपनी बहन की गांड को दबाया| अपने भाई को हाथ अपनी गांड पे महसूस करते ही नज़मा की सिसकी छूट गयी|

नज़मा: आहhhhhhhhhhhh, भाईiiiiiiiiiiiii, क्या कर रहा है?

इरफ़ान: क्या हुआ दीदी?

नज़मा: भाई, बहुत दर्द कर रहा है यहाँ|

इरफ़ान (अपनी बहन की गांड सहलाते हुए): क्या हुआ दीदी?

नज़मा: आज मैं माँ की वजह से गिर गयी थी, बहुत चोट लगी यहाँ पर

इरफ़ान का लंड अब फिर से सर उठाने लगा था| इरफ़ान अभी भी अपनी बहन की गांड को मसल रहा था|

इरफ़ान: ओह, ये माँ भी ना| कहाँ लगी दीदी?

नज़मा: बताया तो, जहाँ तुम्हारा हाथ है?

इरफ़ान: कहाँ हाथ है मेरा

नज़मा: ओहफ़ो, मेरी यहाँ दर्द से जान निकली जा रही है और तुम हो की तुम्हारी मस्ती पूरी नहीं होती| चूतड़ों पे .... चूतड़ों पे| बस, हो गयी तसल्ली अब

इरफ़ान: क्या दीदी? आप तो छोटी सी बात से बुरा मान जाती हो| अच्छा सुनो अगर दर्द हो रहा है तो मैं मालिश कर दूँ?

नज़मा: तो अभी क्या कर रहे हो?

इरफ़ान: अरे ऐसे नहीं दीदी, अच्छे से, गरम तेल से

नज़मा: नहीं ... नहीं ... रहने दे ... तू टेंशन मत ले ... अपने-आप ठीक हो जायेगा एक-दो दिन में

इरफ़ान: आप भी ना दीदी, फिर कहते हो की कोई प्यार नहीं करता| मुझे कुछ नहीं सुनना, आप अपने कमरे में पहुंचो, मैं तेल गरम करके लाता हूँ|

नज़मा: भाई ये ठीक रहेगा? तू अपनी बहन की मालिश .... तू समझ रहा है ना, मैं क्या कहना चाह रही हूँ?

इरफ़ान: दीदी, सब सही है| अगर ज़रुरत में भाई ही बहन के काम नहीं आएगा तो कौन आएगा?

नज़मा: फिर भी भाई, सोच ले

इरफ़ान: इतना क्या सोचना है? मालिश ही तो करनी है ... या आपको कुछ और भी करवाना है?

नज़मा: हट बदमाश, कुछ भी बोलता है ...

इरफ़ान: चलो फिर आप कमरे में पहुंचो, मैं दो मिनट में आता हूँ

ये कह के इरफ़ान पिछवाड़े से अंदर की तरफ चल दिया| अचानक से इरफ़ान मुड़ा और बोला

इरफ़ान: दीदी, सुनो ... वो अभी कपडे मत पहनना ... मालिश अच्छे से नहीं हो पाएगी

नज़मा के उत्तर का इंतज़ार किये बिना इरफ़ान तेज़ी से अंदर चला गया|

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इरफ़ान जब गरम तेल की कटोरी लेकर नज़मा के रूम में पहुंचा तो नज़मा शीशे के सामने खड़ी अपने बालों में कंघी कर रही थी| नज़मा ने एक पेटीकोट पहना हुआ था जैसे वो नहाते हुए पहनती थी| नज़मा को पेटीकोट पहने देख इरफ़ान का मूड थोड़ा ऑफ हो गया|

इरफ़ान: दीदी, ये क्या यार? आपने पेटीकोट क्यों पहन लिया? अब मैं अच्छे से मालिश कैसे करूँगा?

नज़मा: भाई, मैं तेरी तरह बेशरम नहीं हूँ| करनी है तो कर वरना रहने दे|

इरफ़ान ये मौका अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था|

इरफ़ान: दीदी, जैसी आपकी मर्ज़ी| अब चलो, बेड पर लेट जाओ, मैं मालिश कर देता हूँ| गरम तेल है, आपको आराम मिलेगा| जल्दी आओ, नहीं तो तेल ठंडा हो जायेगा|

नज़मा (मन में): बड़ी जल्दी है ठन्डे होने की भाई को ...

नज़मा ये सोचते हुए अपने बेड पे उलटी लेट गयी और इरफ़ान अपनी बहन की कमर के पास बेड पर बैठ गया| नज़मा ने सिर्फ पेटीकोट पहना हुआ था|

नज़मा: भाई, मेरे पैरों में भी दर्द हो रहा है

इरफ़ान अपनी बहन के पैरो के पास बैठ गया और अपने हाथों में तेल लेकर हलके हाथो से नज़मा के पैरो को दबाने लगा| इरफ़ान नज़मा के पैरों के पंजों को दबा रहा था| इरफ़ान को डर था की कहीं नज़मा बिदक ना जाए इसलिए वो धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहता था|

नज़मा: भाई मालिश कर ही रहा है तो अच्छे से कर ना| तू तो लड़कियों से भी नाज़ुक है| मुझे दर्द वहां नहीं है ऊपर है|

इरफ़ान ने थोड़ा ऊपर बढ़ते हुए नज़मा की पिंडलियों की मालिश शुरू कर दी| इरफ़ान का हाथ अपनी नंगी पिंडलियों पर महसूस करते ही नज़मा की सिसकी निकल गयी|

नज़मा: आह भाई, ये हुई न कुछ बात| ऐसे ही करता रह, बहुत अच्छी मालिश कर रहा है|

इरफ़ान: दीदी, मैं बहुत अच्छी मालिश करता हूँ, चाचा जी भी यही कहते हैं|

नज़मा (मन में): चूतिया है एक नंबर का, चाचा जी गांड में घुस जा

नज़मा: चल हट यहाँ से, जाकर चाचा जी की ही मालिश कर

इरफ़ान: अरे दीदी, नाराज़ क्यों हो रही हो, चाचा जी को छोड़ो| मैं आपकी मालिश इतनी मस्त करूँगा की आप हमेशा मुझसे मालिश करवाने के लिए मेरे पीछे भागती फिरोगी|

नज़मा: अच्छा-२, ठीक है, थोड़ा और ऊपर ..

इरफ़ान (मन में): बहुत चालू है दीदी| मैं तो दीदी को कितनी शरीफ समझता था| कितनी जल्दी है चुदने ही| खुदा ने चाहा तो आज मेरी पहली चुदाई हो ही जाएगी| पहली चुदाई? क्या दीदी वर्जिन है या फिर .... नहीं-२ इतनी भी हरामन नहीं लगती ... पूछूं क्या? बूरा मान गयी तो?

इरफ़ान ने अब अपने हाथ नज़मा के घुटनो पर रख दिए और घुटनो से लेकर जाँघों के निचले हिस्से तक हाथ चलाने लगा| नज़मा अपनी आँख बंद करके मुस्कुरा रही थी| नज़मा के पैर एकदम गोरे थे जैसे दूध में हल्का सा केसर मिला हो| इरफ़ान का लंड बुरी तरह से खड़ा हो चूका था| लंड के जोर से इरफ़ान की हिम्मत भी ज़ोर मारने लगी| अब अपने हाथ ऊपर ले जाते हुए इरफ़ान अपनी बहन की जाँघो के अंदर के हिस्से को भी दबाने लगा था| हर बार ऊपर जाते हुए इरफ़ान आगे बढ़ता जा रहा था| धीरे-२ इरफ़ान के हाथ अपनी बहन के पेटीकोट के नीचे तक पहुँच गए|

इरफ़ान: दीदी, ये पेटीकोट .....

नज़मा: हुंह ....

इरफ़ान: दीदी, पेटीकोट हटा दूँ, तेल से ख़राब हो जायेगा ...

नज़मा: हुंह ....

इरफ़ान ने अपनी बहन की सिसकी को अपनी बहन की रज़ामंदी माना और नज़मा का पेटीकोट उसके चूतड़ों से हटा दिया|

अपनी बहन के गोरे-२ गोल मटोल चूतड़ देखते ही इरफ़ान की आँखों में चमक आ गयी| उसने तुरंत अपने हाथों पर तेल लगाया और अपने दोनों हाथ अपनी बहन के चूतड़ों पर रख दिए| इरफ़ान पहले तो धीरे धीरे अपनी बहन के चूतड़ों को सहला रहा था लेकिन जब नज़मा ने कुछ भी रिएक्शन नहीं दिया तो इरफ़ान ने चूतड़ों को तेज़ी से दबाना शुरू कर दिया| इरफ़ान अब अपनी बहन के चूतड़ों को दबा नहीं बल्कि गूँथ रहा था जैसे आटे को गुंथते हैं|

दोनों बहन भाई पूरा आनंद उठा रहे थे| कोई कुछ बोल नहीं रहा था| बीच बीच में नज़मा की सिसकारी सुनाई पड़ती थी| इरफ़ान भी बुरी तरह से गरम हो चूका था| नज़मा की आँखें बंद थी| जब इरफ़ान से बर्दास्त नहीं हुआ तो इरफ़ान एक हाथ से अपनी बहन के चूतड़ों को रडता रहा और दूसरे हाथ से अपने लंड को मसलने लगा|

पजामे में इरफ़ान का लंड बुरी तरह मचल रहा था और बाहर आने के लिए बेताब हो रहा था| कुछ देर बाद इरफ़ान ने चुपके से अपना पजामा अंडरवियर के साथ नीचे सरका दिया और अपने नंगे लंड को मसलने लगा| इरफ़ान को बहुत मज़ा आ रहा था| अपनी बहन की तरफ से कोई विरोध ना देख के उसकी हिम्मत बढ़ती जा रही थी| इरफ़ान ने तेल की कटोरी उठायी और सीधे नज़मा के चूतड़ों की दरार में धार बना के तेल डालने लगा| तेल की धार सीधे नज़मा की गांड के छेद में पहुँच रही थी|

नज़मा: aaaaaaaaaahhhh, भाई .... बस ..... चद्दर ख़राब हो जाएगी .... और तेल ... हुंह

इरफ़ान अपनी बहन की बात समझ गया और उसने तेल की कटोरी साइड में रख दी|

इरफ़ान: ऐसे कैसे चद्दर ख़राब हो जाएगी| हम हाँ ना

ये कहते हुए इरफ़ान ने अपनी पूरी हथेली नज़मा की चूत पर रख दी| इरफ़ान ने तेल हथेली से रोक लिया ताकि तेल चद्दर पे ना गिरे| नज़मा की चूत बुरी तरफ से भबक रही थी और उसमे से कामरस चू रहा था| इरफ़ान ने धीरे से नज़मा की तपती चूत को दबाया और फिर अपने हाथ को ऊपर की और लाने लगा| इरफ़ान का हाथ नज़मा की गांड के छेद पर आ कर ही रुका| इरफ़ान अपनी बहन के चूतड़ों की दरार की मालिश कर रहा था| उसका हाथ अपनी बहन के चूतड़ों की दरार के शुरू होने से उसकी चूत तक चल रहे थे| बीच-२ में उसके हाथ अपनी बहन की गुदा पर रुक जाते थे|

इरफ़ान धीरे-२ अपनी उँगलियों से अपनी बहन के गांड के छेद को कुरदने लगा| नज़मा की हालत पतली होती जा रही थी| उसकी सिसकियाँ अब तेज हो गयी थी| इरफ़ान ने अपनी ऊँगली का दबाव थोड़ा सा बढ़ाया तो उसकी ऊँगली का एक पोर नज़मा की गांड में घुस गया| नज़मा एक दम से तेज़ सिसकी|
 
नज़मा के उलटे लेट हुए के कारण नज़मा के चूतड़ों के दोनों हिस्से आपस में दबे हुए थे| इरफ़ान ने थोड़ा और दबाव बनाया लेकिन उसकी ऊँगली ज़्यादा अंदर घुस नहीं पा रही थी|

इरफ़ान (धीरे से): दीदी, थोड़ा उठाओ ना ...

नज़मा: हुंह ... क्या ....

इरफ़ान: दीदी, अपनी गांड थोड़ी उठाओ ना ...

नज़मा: ......

इरफ़ान: दीदी, प्लीज ....

नज़मा: क्या है, कितना मज़ा आ रहा था| क्या करूँ, बोल?

इरफ़ान: दीदी आप अपने नीचे तकिया लगा लो ना, थोड़ा अंदर तक मालिश कर दूंगा ...

नज़मा की ऑंखें अभी तक बंद थी और वो उलटी लेती हुई मालिश का लुत्फ़ ले रही थी| नज़मा थोड़ा सा मुस्कुरायी और बोली|

नज़मा: अंदर तक ... हाँ ... ऐसे ही अंदर तक मालिश करता होगा चाचा जी की

इरफ़ान: हाहा, नहीं दीदी, ये स्पेशल मालिश तो सिर्फ आपके लिए है ...

नज़मा: स्पेशल मालिश, सही है, सुन तकिया रहने देते हैं, गन्दा हो जायेगा| मैं अपना हाथ अपने पेट के नीचे दबा लेती हूँ ....ठीक है

इरफ़ान: हाँ ये भी सही है दीदी

इरफ़ान (मन में): तकिया डाल या हाथ, तड़पा मत, अपनी गांड के छेद के दर्शन करा दे

नज़मा ने अपना एक हाथ अपने नीचे दबा लिया| ऐसे करने से नज़मा की गांड थोड़ा ऊपर उठ गयी| नज़मा के चूतड़ों की दरार खुल गयी और इरफ़ान को नज़मा की गांड का गुलाबी छेद दिखाई देने लगा| इरफ़ान का मन किया की उस छेद को चाट ले, चुम ले, खा जाये| लेकिन इरफ़ान ने अपने आप पर कण्ट्रोल करते हुए अपने हाथ आगे बढ़ाये और अपनी एक ऊँगली नज़मा की गांड में घुसा दी|

नज़मा: आह भाई .....

इरफ़ान: कितना सुन्दर है ये दीदी, दिल करता है इसे देखता रहूं ...

नज़मा (धीरे से): देखते रहना, करना कुछ मत ...

इरफ़ान ने अपनी ऊँगली नज़मा की गांड में अंदर बाहर करनी शुरू कर दी और अपने हाथ को थोड़ा घुमाया ताकि अपना अंगूठा नज़मा की चूत में डाल सके| जैसे ही इरफ़ान ने अपना अंगूठा नज़मा की चूत में डालने की कोशिश की तो उसे झटका लगा| नज़मा की तीन उँगलियाँ पहले से ही नज़मा की चूत की सेवा में लगी हुई थी|

इरफ़ान (मन में): बहुत चुदकड़ है, तकिया नहीं हाथ चाहिए, सही बात है, तकिये की उँगलियाँ थोड़ी होती हैं| जब इसे शर्म नहीं तो मैं क्यों चूतिया बन रहा हूँ|

इरफ़ान: दीदी, मैं थक गया ऐसे मालिश करते-२

इरफ़ान की ये बात सुनते ही नज़मा को गुस्सा आ गया| वो तुरंत पलटी और बोली|

नज़मा: चूतिया है क्या? अब यहाँ लाकर बोल रहा है की थक गया

इरफ़ान: कहाँ लाकर? क्या हुआ आपको, इतना गुस्सा क्यों कर रही हो मुझ पर?

नज़मा ने तभी अपने भाई के लंड की तरह देखा| हवा में लहराता सात इंच का मोटा लंड, लेस से चमकता हुआ, सूपड़ा ऐसा जैसे आलूबुखारा, अपने भाई के लंड को देख कर नज़मा का गला सुख गया|

नज़मा (मन में): ये तो अपना लंड निकाले बैठा है| मन तो इसका भी कर रहा है आगे बढ़ने का, फिर ये भाव क्यों खा रहा है? क्या प्लान है इसका?

नज़मा ने अपनी नज़रें बड़ी मुश्किल से इरफ़ान के लंड से हटा की इरफ़ान के चेहरे की तरफ देखा और थूक गटकते हुए बोली|

नज़मा: भाई-२, तू सुन तो, बुरा क्यों मान रहा है| मैं कह रही हूँ की मेरा दर्द ठीक होने वाला है, बस थोड़ी देर और मालिश कर दे ना| प्लीज-२

इरफ़ान: हाँ ... करता हुआ, लेकिन ऐसे नहीं, मैं अपने दोनों पैर आपके दोनों तरफ रख के आपके ऊपर आ जाता हूँ, ठीक है

नज़मा: प्यारा भाई मेरा, जैसे तू कहे लेकिन कुछ देर और, है ना .... आजा ... आजा ...

इरफ़ान (मन में): लंड देख लिया लेकिन ऐसे पेश आ रही है, जैसे कोई फरक नहीं पड़ता हो| पहले से चुदने को तैयार बैठी है| चढ़वा ले, चढ़वा ले अपने भाई को अपने ऊपर

नज़मा अपना पेटीकोट थोड़ा और ऊपर किया| नज़मा का पेटीकोट अब एक माला बन के नज़मा के गले में लिपटा हुआ था| नज़मा के गले में पेटीकोट की माला ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने नज़मा को अपने भाई के सामने नंगे रहने के लिए सम्मान दिया हो| नज़मा फिर से उलटी लेट गयी| इरफ़ान अपनी बहन की जाँघों पे बैठ गया और दोनों हाथों से अपनी बहन से चूतड़ों को मसलने लगा| सब फिर से सेटल| नज़मा ने भी अपनी उँगलियाँ अपनी चूत में घुसा दी और अपनी चूत घिसने लगी|

इरफ़ान ने एक दो मिनट इंतज़ार किया फिर वो थोड़ा ऊपर खिसक गया| अब इरफ़ान का लंड नज़मा की गांड के छेद को छू रहा था| इरफ़ान थोड़ा सा झुका और अपनी बहन के नीचे हाथ डाल के उसके दोनों बोबे पकड़ लिए| इरफ़ान अपनी उँगलियों और अंगूठे के बीच नज़मा के निप्पल उमेठ रहा था| साथ-२ इरफ़ान धीरे-२ ऊपर नीचे भी हो रहा था| हर धक्के के साथ इरफ़ान का लंड नज़मा की गांड को थोड़ा सा खोल देता था| बोल दोनों ही नहीं रहे थे लेकिन नज़मा की सिसकियों की आवाज़ कमरे में तेज होती जा रही थी|

इरफ़ान के लंड का लिसलिसा पानी नज़मा की गांड के छेद पर लग रहा था| अपने भाई के प्रीकम से और तेल से, नज़मा की गांड का छेद बिलकुल चिकना हो चूका था| इस बार जैसे ही इरफ़ान ने धक्का लगाया, उसका सूपाड़ा बहन की गांड में घुस गया|

नज़मा: ओह .... आह ..... भाई ...

नज़मा ने अब अपनी उँगलियों की तेजी बढ़ा दी| वो अपने ओर्गास्म पर पहुँचने वाली थी| अब हर धक्के से साथ इरफ़ान का सूपाड़ा नज़मा के गांड के छेद में घुस जाता था| इरफ़ान की हालत भी ख़राब होती जा रही थी| अचानक से नज़मा के शरीर से एक झटका खाया और नज़मा ने अपनी गांड हवा में कुछ ज़्यादा ही ऊपर उठा दी| इस बार इरफ़ान ने जैसे ही धक्का लगाया उसका आधा लंड नज़मा की गांड में घुस गया| नज़मा की गांड इतनी टाइट और गरम थी की ना चाहते हुए भी इरफ़ान अपने बदन को पीछे की बजाय आगे ही दबाता चला गया और अपनी बहन पर और झुकता चला गया|

इरफ़ान अपने लंड को पूरी ताकत से अपनी बहन की गांड पर दबा रहा था| उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ हो गया था| वो बहुत थक गया था लेकिन फिर भी उसने ज़ोर लगाना नहीं छोड़ा| धीरे-२ उसका पूरा लंड नज़मा की गांड में चला गया| इरफ़ान तब तक नहीं रुका जब तक उसका पूरा लंड नज़मा की गांड की गहराईयों में उतर नहीं गया|

अपने भाई के लंड को नज़मा अपनी गांड में घुसता हुआ महसूस कर रही थी| नज़मा को ऐसे लग रहा था की जैसे उसकी गांड फट जाएगी| उसकी गांड में बहुत तेज जलन हो रही थी, लेकिन जैसे-२ उसके भाई का लंड उसकी गांड में उतर रहा था, नज़मा को लग रहा था की जैसे आज वो पूरी हो गयी है| उसके ज़िन्दगी की खाली जगह को कोई भर रहा था|

इरफ़ान ने अपना लंड नज़मा की चूत में पूरा उतार दिया था और नज़मा पर लेट गया| उसका पूरा भार नज़मा पर था| इरफ़ान का सीना, नज़मा की पीठ से चिपक गया था| इसी के साथ नज़मा का शरीर कांपने लगा और उसकी चूत ने रस की बारिश चालू कर दी|

नज़मा: ooooooooooohhhhhhhhhhhhhhhhhhh ................... भाई ...................... aaaaaaaaaaaahhhhhhhhhh

नज़मा की चूत और गांड पानी छोड़ते हुए बुरी तरह से फूल रही थी और सिकुड़ रही थी| गांड का इस तरफ से सिकुड़ना और फूलना जैसे इरफ़ान के लंड को चूस रहा था, जैसे कोई ब्रैस्ट पंप बोबों से दूध चूसता है| ये सब इरफ़ान के बर्दास्त से बाहर था, इरफ़ान के लंड ने भी वीर्य फेकना शुरू कर दिया|

दोनों बहन भाई झड़ते हुए उलटे लेते हुए थे| इरफ़ान ने अपनी बहन को बुरी तरफ से जकड़ा हुआ था और नज़मा ने पलंग को| वो दोनों एक जिस्म, एक जान हो गए थे| दोनों बहुत थक चुके थे, लेकिन बहुत संतुष्ट भी थे| जाने कितनी देर तक वो ऐसे ही पड़े रहे| फिर इरफ़ान उठा और अपना पजामा और अंडरवियर उठा के वहां से अपने कमरे में चला गया| नज़मा उसी पोजीशन में नंगी ही नींद के आगोश में चली गयी|

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एक तरफ जहां नजमा की जिंदगी मस्ती के सागर में हिलोरे खा रही थी वहीं दूसरी तरफ परवीन आर्थिक तंगी और अपने पति के व्यवहार के कारण दिन-ब-दिन चिड़चिड़ी होती जा रही थी | परवीन और उसके पति, शहज़ाद, को चुदाई किये हुए एक साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका था| कई बार तो परवीन को ऐसा लगता था कि शायद उसी में कोई कमी है जिसकी वजह से शहज़ाद उसकी ओर देखता भी नहीं है|

आज भी देखने में परवीन बहुत ही सेक्सी लगती थी| उम्र के साथ-साथ उसके शरीर पर सही जगह पर सही मात्रा में मोटापा आ गया था| उसके बोबे और गांड पहले से बहुत ज़्यादा फूल गए थे| उसे बोबे 36 C साइज के थे और उसकी गांड बहुत ही जानमारू तरीके से बाहर निकली हुई थी| ऐसे मादक शरीर की औरत को तो दिन रात चुदाई की जरूरत होती है लेकिन प्रवीण जिंदगी में तो जुदाई थी ही नहीं| इस उम्र में उसे उंगली करना भी बड़ा अटपटा लगता था| इस वजह से परवीन बहुत परेशान और चिड़चिड़ी रहने लगी थी|

उस दिन नजमा बहुत देर तक सोती रही जब शाम को उठकर वह ड्राइंग रूम में आई तो उसने देखा कि उसकी मां सोफे पर बैठी कुछ पैकिंग कर रही थी| नजमा को देखकर परवीन बोली|

परवीन: उठ गई महारानी| कोई दिन में भी इतनी देर तक सोता है क्या?

नज़मा: क्या है मां? आपको तो बस बहाना चाहिए मुझे डांटने का|

नज़मा (मन में): जब देखो डांटना डांटना डांटना| खुद की जिंदगी तो झंड है ही, मेरी जिंदगी भी झंड करने में लगी रहती है|

परवीन: तुझे डांटू नहीं तो क्या करूं? पूजा करूं तेरी? काम की ना काज की, दुश्मन अनाज की|

नजमा: मां, आप तो मेरे पीछे ही पड़ी रहती हो| अब यह पैकिंग क्यों कर रही हो?

परवीन: अरे मेरी जिंदगी में वैसे ही दुख कम है क्या? अब देख, तेरे मामा को हार्ट अटैक आया है| उनकी दुकान संभालने के लिए वहां कोई नहीं है| इसलिए मैं इमरान को कुछ दिनों के लिए गांव, मामा की दुकान संभालने के लिए भेज रही हूं|

यह सुनते ही नजमा के सारे सपने जैसे चूर चूर हो गए| नज़मा का मुंह उतर गया|

नजमा: यह तो बहुत बुरा हुआ| मां, क्या इमरान का गाना जरूरी है?

परवीन: हां जाना तो जरुरी है| जरूरत के समय में अगर तेरे मामा के हम नहीं काम आएंगे तो कौन काम आएगा? वैसे भी तेरे मामा का लड़का, सैफ, अभी बहुत छोटा है| वह अभी दुकान नहीं संभाल पाएगा|

नजमा: लेकिन माँ, इरफान की पढ़ाई का क्या होगा? भैया की पढ़ाई भी तो जरूरी है|

परवीन: पता है मुझे| ज्यादा ज्ञान मत दे मुझे| कौन सा पूरी जिंदगी के लिए भेज रही हूं| आ जाएगा दो-चार दिनों में|

नजमा: मां, मैं आपकी कोई मदद करूं?

परवीन: हां ऐसा कर अपने भाई के लिए दो तीन पराठे बना दे| रास्ते में अगर भूख लगी तो खा लेगा|

शाम को इरफान गांव के लिए निकल गया| रात को नजमा अपने बिस्तर पर लेती हुई थी| उसका मन बहुत भारी हो रहा था| कहां तो नजमा ने सोचा था कि वह इरफान के साथ अब खुलकर मस्ती करेगी और कहां दूसरी तरफ उसे फिर से अपनी उंगली से काम चलाना पड़ रहा था| इरफान के बारे में सोचते सोचते नजमा को नींद आ गयी| अगले दिन नजमा देर से उठी| उसका पिछवाड़े में जाने का मन नहीं हो रहा था, जाती भी किसलिए, नहाती भी किस लिए, आज तो कोई देखने वाला भी तो नहीं था| फिर भी नजमा भारी कदमों से उठी और पिछवाड़े में जाकर नंगी ही नहाने लगी| नजमा नहा रही थी की अचानक से उसे लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है| उसने मुड़कर देखा तो उसके पापा उसे नहाते हुए घूर रहे थे| नजमा पहले तो अपने पापा को खड़ा देखकर घबरा गई लेकिन अगले ही पल उसे अपने पापा की नज़रें समझ आ गयी| अब वो वासना से भरी इन निगाहों को अच्छे से पहचानती थी|

नजमा: पापा, आप कब आए?

शहजाद: बेटी, मैं तो अभी आया हूँ लेकिन पहले से बता की तू पूरी तरह से नंगी होकर क्यों नहा रही है?

नज़मा: पापा .... वो .... वो मम्मी ने कहा है, ऐसे नहाने के लिए ... और कहा है की अगर मैं उनकी बात नहीं मानूगी तो वो मुझे बहुत मारेंगी

शहजाद: पागल हो गई है यह औरत| अजीब बातें करती है| मैं बात करूँगा उससे|

नज़मा: रहने दो पापा| अगर आप मां से बात करोगे तो मां बाद में मुझे भी डाँटेंगी| वैसे भी इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? यहां आप ही तो हैं| आप तो पापा है मेरे| आप से क्या शर्माना?

नजमा की यह बात सुनकर शहजाद हैरान रह गया|

शहजाद(मन में): तो क्या नजमा को मेरे सामने ऐसे नंगे रहने में कोई दिक्कत नहीं है? चल क्या रहा है ये माँ बेटी के बीच? कहीं नज़मा की जवानी तो फूट फूट के बाहर आने को मचल तो नहीं रही? क्या बात है, अल्लाह सुन ले तूने मेरी| क्या बुराई है अगर मैं अपनी बेटी की थोड़ी मदद कर दूँ| वैसे भी कहते ही हैं की जो पेड़ लगता है, पहला हक़ भी उसी का| लेकिन हो सकता है की मेरा अंदाज़ा गलत हो| लेकिन ये मौका छोड़ भी तो नहीं सकते| बड़े ध्यान से कदम बढ़ाना पड़ेगा|

शहजाद: ठीक है, बेटी जैसे तुम कहो, नहीं करूँगा तुम्हारी माँ से बात| वैसे भी तुम ठीक कह रही हो, यहाँ कोनसा कोई बाहर वाला है| अब तुम नहाओ, मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है|
 

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