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कर्नल साहब की समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या करे। पर उस समय उन्होंने देखा की सुनीता गहरी नींद सो रही थी। उन्होंने सुनीता को एक करवट लेकर ऐसे लिटा दिया जिससे सुनीता का पिछवाड़ा कर्नल साहब की और हो। सुनीता की गाँड़ कर्नल साहब के लण्ड से टकरा रही थी। कर्नल साहब ने अपना हाथ सुनीता की बाँह और कंधे के ऊपर से सुनीता के स्तन पर रख दिया।
वह इतना तो समझ गए थे की सुनीता को अपना बदन जस्सूजी से छुआ ने में कोई भारी आपत्ति नहीं होगी। क्यूंकि जस्सूजी ने पहले भी तो सुनीता के स्तन छुए थे। उस समय सुनीता ने कोई विरोध नहीं किया था। सुनीता गहरी नींद में एक सरीखी साँसे लेती हुई मुर्दे की तरह लेटी हुई थी। उसे कुछ होश न था।
जस्सूजी ने धीरे से सुनीता के ब्लाउज के बटन खोल दिए। फिर उन्होंने दूसरे हाथ से पीछे से सुनीता की ब्रा के हुक खोल दिए। सुनीता के अल्लड़ करारे स्तन पूरी स्वच्छंदता से आज़ाद हो चुके थे। जस्सूजी बदन में रोमांचक सिहरनें उठ रही थी। जस्सूजी के रोंगटे खड़े हो गए थे। जस्सूजी ने दुसरा हाथ धीरे से सुनीता के बदन के निचे से घुसा कर सुनीता को अपनी बाँहों में ले लिया। जस्सूजी दोनों हाथोँ से सुनीता के स्तनोँ को दबाने मसलने और सुनीता के स्तनोँ की निप्पलोँ को पिचकाने में लग गए।
अपने हाथों की हाथेलियों में सुनीता के दोनों स्तनोँ को महसूस करते ही जस्सूजी का लण्ड फुंफकार मारने लगा था। कर्नल साहब ने सुनीता का निचला बदन अपनी दोनों टाँगों के बीचमें ले लिया। सुनीता उस समय जस्सूजी की दोनों बाँहों में और उनकी दोनों टांगों के बिच कैद थी। ऐसा लगता था जैसे उस समय सुनीता थी ही नहीं।
सुनीता और जस्सूजी दोनों जैसे एक ही लग रहे थे। जस्सूजी का लण्ड इतना फुंफकार रहा था की जस्सूजी उसे रोकना नामुमकिन सा महसूस कर रहे थे। जस्सूजी महीनों से सुनीता को अपने इतने करीब अपनी बाहों में लाने के सपने देख रहे थे। सुनीता के स्तन, उसकी गाँड़, उसका पूरा बदन और ख़ास कर उसकी चूत चूसने के लिए वह कितने व्याकुल थे?
उसी तरह उनकी मँशा थी की एक ना एक दिन सुनीता भी उनका लण्ड बड़े प्यार से चूसेगी और सुनीता एक दिन उनसे आग्रह करेगी वह सुनीता को चोदे। यह उनका सपना था। यह सब सोच कर भला ऊनका लण्ड कहाँ रुकता? जस्सूजी का लण्ड तो अपनी प्यारी सखी सुनीता की चूत में घुसने के लिए बेचैन था। उसे सुनीता की चूत में अपना नया घर जो बनाना था।
सुनीता उस समय साडी पहने हुए थी। कर्नल साहब ने देखा की सुनीता को ऊपर निचे खिसकाने के कारण सुनीता की साडी उसकी जाँघों से ऊपर तक उठ चुकी थी। सुनीता की करारी मांसल सुडौल नंगी जाँघें देख कर जस्सूजी का मन मचल रहा था। पर जैसे तैसे उन्होंने अपने आप पर नियत्रण रक्खा और सुनीता को खिंच कर कस कर अपनी बाँहों में और अपनी टाँगों के बिच दबोचा और सुनीता के बदन का आनंद लेने लगे।
जाहिर था की जस्सूजी का मोटा लंबा लण्ड पजामें में परेशान हो रहा था। एक शेर को कैद में बंद करने से वह जैसे दहाड़ता है वैसे ही जस्सूजी लण्ड पयजामे में फुंफकार मार रहा था। सुनीता की गाँड़ और उसकी ऊपर उठी हुई साडी के कारण जस्सूजी का लण्ड सुनीता की गाँड़ की बिच वाली दरार में घुसने के लिए बेताब हो रहा था। पर बिच में साडी का मोटा सा लोचा था।
जस्सूजी सुनीता की गाँड़ में साडी के कपडे के पीछे अपना लण्ड घुसा कर संतोष लेने की कोशिश कर रहे थे। सुनीता के नंगे स्तन उनकी हथेलियों में खेल रहे थे। उसे सहलाने में, उन्हें दबानेमें और मसलने में और उन स्तनोँ की निप्पलोँ को पिचकाने में जस्सूजी मशगूल ही थे की उन्हें लगा की सुनीता जाग रही थी।
अपनी नींद की गहरी तंद्रा में सुनीता ने ऐसे महसूस किया जैसे वह अपने प्यारे जस्सूजी की बाँहों में थी। उसे ऐसा लगा जैसे जस्सूजी उसकी चूँचियों को बड़े प्यार से तो कभी बड़ी बेरहमी से दबाते, मसलते तो कभी उसकी निप्पलों को अपनी उँगलियों में कुचलते थे। वह मन ही मन बड़ा आनंद महसूस कर रही थी। उसे यह सपना बड़ा प्यारा लग रहा था।
वह इतना तो समझ गए थे की सुनीता को अपना बदन जस्सूजी से छुआ ने में कोई भारी आपत्ति नहीं होगी। क्यूंकि जस्सूजी ने पहले भी तो सुनीता के स्तन छुए थे। उस समय सुनीता ने कोई विरोध नहीं किया था। सुनीता गहरी नींद में एक सरीखी साँसे लेती हुई मुर्दे की तरह लेटी हुई थी। उसे कुछ होश न था।
जस्सूजी ने धीरे से सुनीता के ब्लाउज के बटन खोल दिए। फिर उन्होंने दूसरे हाथ से पीछे से सुनीता की ब्रा के हुक खोल दिए। सुनीता के अल्लड़ करारे स्तन पूरी स्वच्छंदता से आज़ाद हो चुके थे। जस्सूजी बदन में रोमांचक सिहरनें उठ रही थी। जस्सूजी के रोंगटे खड़े हो गए थे। जस्सूजी ने दुसरा हाथ धीरे से सुनीता के बदन के निचे से घुसा कर सुनीता को अपनी बाँहों में ले लिया। जस्सूजी दोनों हाथोँ से सुनीता के स्तनोँ को दबाने मसलने और सुनीता के स्तनोँ की निप्पलोँ को पिचकाने में लग गए।
अपने हाथों की हाथेलियों में सुनीता के दोनों स्तनोँ को महसूस करते ही जस्सूजी का लण्ड फुंफकार मारने लगा था। कर्नल साहब ने सुनीता का निचला बदन अपनी दोनों टाँगों के बीचमें ले लिया। सुनीता उस समय जस्सूजी की दोनों बाँहों में और उनकी दोनों टांगों के बिच कैद थी। ऐसा लगता था जैसे उस समय सुनीता थी ही नहीं।
सुनीता और जस्सूजी दोनों जैसे एक ही लग रहे थे। जस्सूजी का लण्ड इतना फुंफकार रहा था की जस्सूजी उसे रोकना नामुमकिन सा महसूस कर रहे थे। जस्सूजी महीनों से सुनीता को अपने इतने करीब अपनी बाहों में लाने के सपने देख रहे थे। सुनीता के स्तन, उसकी गाँड़, उसका पूरा बदन और ख़ास कर उसकी चूत चूसने के लिए वह कितने व्याकुल थे?
उसी तरह उनकी मँशा थी की एक ना एक दिन सुनीता भी उनका लण्ड बड़े प्यार से चूसेगी और सुनीता एक दिन उनसे आग्रह करेगी वह सुनीता को चोदे। यह उनका सपना था। यह सब सोच कर भला ऊनका लण्ड कहाँ रुकता? जस्सूजी का लण्ड तो अपनी प्यारी सखी सुनीता की चूत में घुसने के लिए बेचैन था। उसे सुनीता की चूत में अपना नया घर जो बनाना था।
सुनीता उस समय साडी पहने हुए थी। कर्नल साहब ने देखा की सुनीता को ऊपर निचे खिसकाने के कारण सुनीता की साडी उसकी जाँघों से ऊपर तक उठ चुकी थी। सुनीता की करारी मांसल सुडौल नंगी जाँघें देख कर जस्सूजी का मन मचल रहा था। पर जैसे तैसे उन्होंने अपने आप पर नियत्रण रक्खा और सुनीता को खिंच कर कस कर अपनी बाँहों में और अपनी टाँगों के बिच दबोचा और सुनीता के बदन का आनंद लेने लगे।
जाहिर था की जस्सूजी का मोटा लंबा लण्ड पजामें में परेशान हो रहा था। एक शेर को कैद में बंद करने से वह जैसे दहाड़ता है वैसे ही जस्सूजी लण्ड पयजामे में फुंफकार मार रहा था। सुनीता की गाँड़ और उसकी ऊपर उठी हुई साडी के कारण जस्सूजी का लण्ड सुनीता की गाँड़ की बिच वाली दरार में घुसने के लिए बेताब हो रहा था। पर बिच में साडी का मोटा सा लोचा था।
जस्सूजी सुनीता की गाँड़ में साडी के कपडे के पीछे अपना लण्ड घुसा कर संतोष लेने की कोशिश कर रहे थे। सुनीता के नंगे स्तन उनकी हथेलियों में खेल रहे थे। उसे सहलाने में, उन्हें दबानेमें और मसलने में और उन स्तनोँ की निप्पलोँ को पिचकाने में जस्सूजी मशगूल ही थे की उन्हें लगा की सुनीता जाग रही थी।
अपनी नींद की गहरी तंद्रा में सुनीता ने ऐसे महसूस किया जैसे वह अपने प्यारे जस्सूजी की बाँहों में थी। उसे ऐसा लगा जैसे जस्सूजी उसकी चूँचियों को बड़े प्यार से तो कभी बड़ी बेरहमी से दबाते, मसलते तो कभी उसकी निप्पलों को अपनी उँगलियों में कुचलते थे। वह मन ही मन बड़ा आनंद महसूस कर रही थी। उसे यह सपना बड़ा प्यारा लग रहा था।