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Erotica साहस रोमांच और उत्तेजना के वो दिन complete

सुनीलजी ने अपनी बात चालु रखते हुए कहा, “एक कहावत है की एक बार हो तो हादसा, दूसरी बार हो तो संयोग पर अगर तीसरी बार भी होता है तो समझो की खतरे की घंटी बज रही है।”

ज्योति बुद्धू की तरह सुनीलजीको देखती ही रही। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था।

सुनीलजी ने ज्योति के उलझन भरे चेहरे की और देखा और ज्योति का नाक पकड़ कर हिलाते हुए बोले, “अरे मेरी बुद्धू रानी, पहली बार कोई मेरे घरमें से मेरा पुराना लैपटॉप और एक ही जूता चुराता है, यह तो मानलो हादसा हुआ। फिर कोई मेरा और तुम्हारे पतिदेव सुनीलजी का पीछा करता है। मानलो यह एक संयोग था…

फिर कोई संदिग्ध व्यक्ति टिकट चेकर का भेस पहन कर हमारे ही डिब्बे में सिर्फ हमारे ही पास आ कर हम से पूछताछ करता है की हम कहाँ जा रहे हैं। मानलो यह भी एक अद्भुत संयोग था। उसके बाद कोई व्यक्ति स्टेशन पर हमारा स्वागत करता है, हमें हार पहनाता है और हमारी फोटो खींचता है…

क्यों भाई? हम लोग कौनसे फिल्म स्टार या क्रिकेटर हैं जो हमारी फोटो खींची जाए? और आखिर में कोई बिना नंबर प्लेट की टैक्सी वाला हमें आधे से भी कम दाम में स्टेशन से लेकर आता है और रास्ते में बड़े सलीके से तुम से हमारे कार्यक्रम के बारे में इतनी पूछताछ करता है? क्या यह सब एक संयोग था?”

ज्योति के खूबसूरत चेहरे पर कुछ भी समझ में ना आने के भाव जब सुनीलजी ने देखे तो वह बोले, “कुछ तो गड़बड़ है। सोचना पड़ेगा।” कह कर सुनीलजी उठ खड़े हुए और कमरे की और चल दिए।

साथ साथ में ज्योति भी दौड़ कर पीछा करती हुई उनके पीछे पीछे चल दी। दोनों अपने अपने विचारो में खोये हुए अपने कमरे की और चल पड़े।

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कर्नल साहब (सुनीलजी) ने काफी समय पहले ही कैंप के मैनेजमेंट से दो कमरों का एक बड़ा फ्लैट टाइप सुईट बुक करा दिया था। उसमें उनके दोनों बैडरूम को जोड़ता हुआ परदे से ढका एक किवाड़ था। वह किवाड़ दोनों तरफ से बंद किया जा सकता था।

जब तक दोनों कमरों में रहने वाले ना चाहें तब तक वह किवाड़ अक्सर बंद ही रहता था। अगर वह किवाड़ खुला हो तो एक दूसरे के पलंग को दोनों ही जोड़ी देख सकती थी। दोनों ही बैडरूम में एक एक वाशरूम जुड़ा हुआ था।

बैडरूम का दुसरा दरवाजा एक साँझा बड़े ड्रॉइंग कम डाइनिंग रूम में खुलता था। सुईट के अंदर प्रवेश उसी ड्रॉइंगरूम से ही हो सकता था। ड्रॉइंगरूम में प्रवेश करने के बाद ही कोई अपने कमरे में जा सकता था।

जब कैंप में आगमन के तुरंत बाद सुबह में पहली बार दोनों कपल कमरों में दाखिल हुए थे (चेक इन किया था) तब सबसे पहले सुनीलजी ने सुईट की तारीफ़ करते हुए सुनीलजी से कहा था, “सुनीलजी, यह तो आपने कमाल का सुईट बुक कराया है भाई! कितना बड़ा और बढ़िया है! खिड़कियों से हिमालय के बर्फीले पहाड़ और खूबसूरत वादियाँ भी साफ़ साफ़ दिखती हैं। मेरी सबसे एक प्रार्थना है। मैं चाहता हूँ की जब तक हम यहां रहेंगे, दोनों कमरों को जोड़ते हुए इस किवाड़ को हम हमेशा खुला ही रखेंगे। मैं हम दोनों कपल के बिच कोई पर्दा नहीं चाहता। आप क्या कहते हैं?”

सुनीलजी ने दोनों पत्नियों की और देखा। ज्योतिजी फ़ौरन सुनीलजी से सहमति जताते हुए बोली थी, “मुझे कोई आपत्ति नहीं है। भाई मान लो कभी भी दिन में या आधी रात में सोते हुए अचानक ही कोई बातचित करने का मन करे तो क्यूँ हमें उठकर एक दूसरे का दरवाजा खटखटा ने की जेहमत करनी पड़े? इतना तो हमें एक दूसरे से अनौपचारिक होना ही चाहिए। फिर कई बार जब मेरा न करे की मैं मेरी प्यारी छोटी बहन ज्योति के साथ थोड़ी देर के लिए सो जाऊं तो सीधा ही चलकर चुचाप तुम्हारे पलंग पर आ सकती हूँ ना?”

उस वक्त ज्योतिजी ने साफ़ साफ़ यह नहीं कहा की अगर दोनों कपल चाहें तो बिना किसी की नजर में आये एक दूसरे के पलंग में सांझा एक साथ सो भी तो सकते हैं ना?

ज्योति सारी बातें सुन कर परेशान हो रही थी। वह फ़ौरन अपने पति सुनीलजी को अपने कमरे में खिंच कर ले गयी और बोली, “तुम पागल हो क्या? तुम एक रात भी मुझे प्यार किये बिना तो रह नहीं सकते। अगर यह किवाड़ खुला रखा तो फिर रात भर मुझे छेड़ना मत। यह समझ लो।”

अपनी पत्नी की जिद देख कर सुनीलजी ने अपनी बीबी ज्योति के कानों में फुसफुसाते हुए कहा था, “डार्लिंग, तुम्ही ने तो माना था की हम दोनों कपल एक दूसरे से पर्दा नहीं करेंगे। अब क्यों बिदक रही हो? और अगर हम प्यार करेंगे भी तो कौनसा सबके सामने नंगे खड़े हो कर करेंगे? बिस्तर में रजाई ओढ़कर भी तो हम चुदाई कर सकते है ना?”

यह सुन कर ज्योति का माथा ठनक गया। उसने तो अपने पति से कभी यह वादा नहीं किया था की वह सुनीलजी और ज्योतिजी से पर्दा नहीं करेगी। तब उसे याद आया की उसने ज्योतिजीसे यह वादा जरूर किया था। तो क्या ज्योतिजी ने उनदोनों के बिच की बातचीत सुनीलजी को बतादी थी क्या? खैर जो भी हो, उसने वादा तो किया ही था। सुनीलजी की बात सुन कर हार कर ज्योति चुपचाप अपने काम में लग गयी थी।

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दोपहर का खाना खाने के बाद चारों के जहन में अलग अलग विचारों की बौछार हो रही थी। ज्योतिजी पहली बार अच्छी तरह कुदरत के आँगन में खुले आकाश के निचे सुनीलजी से चुदाई होने के कारण बड़ी ही संतुष्ट महसूस कर रही थी और कुछ गाना मन ही मन गुनगुना रहीं थीं। उनके पति सुनीलजी अपनी ही उधेड़बुन में यह सोचने में लगे थे की जो राज़ था उसे कैसे सुलझाएं। उस राज़ को सुलझाने का मन ही मन वह प्रयास कर रहे थे।

ज्योति मन ही मन खुश भी थी और दुखी भी। खुश इसलिए थी की उसने तैराकी के कुछ प्राथमिक पाठ सुनीलजी से सीखे थे और इस लिए भी की उसे सुनीलजी के लण्ड को सहलाने के मौक़ा मिला था। वह दुखी इस लिए थी की सब के चाहते हुए भी वह सुनीलजी का मन की इच्छा पूरी नहीं कर सकती थी। सुनीलजी को दोनों हाथों में लड्डू नजर आ रहे थे। बिस्तर में वह अपनी बीबी को चोदेंगे और कहीं और मौक़ा मिला तो ज्योति को।

दोपहर का खाना खाने के बाद अलग अलग वजह से दोनों ही कपल थके हुए थे। डाइनिंग हॉल से वापस आते ही ज्योतिजी और सुनीलजी अपने पलंग पर और सुनीलजी और ज्योति अपने पलंग पर ढेर हो कर गिर पड़े और फ़ौरन गहरी नींद सो गए। बिच का किवाड़ खुला ही था।

शाम को छे बजे स्वागत और परिचय का कार्यक्रम था और साथ में सब मेहमानों को अगले सात दिन के प्रोग्राम से अवगत कराना था। उसके बाद खुले में कैंप फायर (एक आग की धुनि) के इर्दगिर्द कुछ ड्रिंक्स (शराब या जूस इत्यादि) और नाच गाना और फिर आखिर में खाना।

शाम के पांच बजने वाले थे। सबसे पहले सुनीलजी उठे। चुपचाप वह हलके पाँव वाशरूम में जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने अपने पत्नीकी और देखा। वह अपने गाउन में गहरी नींद सोई हुई बड़ी ही सुन्दर लग रही थी। ज्योति के घने बाल पुरे सिरहाने पर फैले हुए थे। उसका चेहरा एक संतुष्टि वाला, कभी हलकी सी मुस्कान भरा सुन्दर प्यारा दिख रहा था। सुनीलजी के मन में विचार आया की कहीं उस झरने के वाटर फॉल के पीछे सुनीलजी ने उनकी बीबी को चोदा तो नहीं होगा?

विचार आते ही वह मन ही मन मुस्काये। हो सकता है सुनीलजी और ज्योति ने उस दोपहर अच्छी खासी चुदाई की होगी। क्यूंकि ज्योतिजी और सुनीलजी काफी कुछ ज्यादा ही दोस्ताना से एक दूसरे घुलमिल रहे थे। सुनीलजी के मन में स्वाभाविक रूपसे कुछ जलन का भाव तो हुआ, पर उन्होंने एक ही झटके में उसको निकाल फेंका। वह ज्योति को बेतहाशा प्यार करते थे। ज्योति सिर्फ उनकी पत्नी ही नहीं थी। उनकी दोस्त भी थी। और प्यार में और दोस्ती में हम अपनों पर अपना अधिकार नहीं प्यार जताते हैं। हम अपनी ख़ुशी से ज्यादा अपने प्यारे की खुशी के बारे में ही सोचते हैं।

खुले हुए किवाड़ के दूसरी और जब सुनीलजी ने नजर की तो देखा की सुनीलजी अपनीं बीबी को अपनी बाँहों में घेरे हुए गहरी नींद में सो रहे थे। ज्योति अपने पति की बाँहों में पूरी तरह से उन्मत्त हो कर निद्रा का आनंद ले रही थी।

सुनीलजी फुर्ती से वाशरूम में गए और चंद मिनटों में ही तैयार हो कर बाहर आये। उन्होंने फिर अपनी पत्नी को जगाया। ज्योति आखिर एक फौजी की बीबी थी। सुनीलजी की एक हलकी आवाज से ही वह एकदम बैठ गयी। अपने पति को तैयार देख वह भी वाशरूम की और तैयार होने के लिए अपने कपडे लेकर भागी। सुनीलजी हलके से चलकर बिच वाले खुले किवाड़ से अपने कमरे से सुनील और ज्योति के कमरे में आये।

सुनीलजी ने सुनील और ज्योति के पलंग में बदहाल गहरी नींद में लेटी हुई ज्योति को देखा। ज्योति का गाउन ऊपर उसकी जाँघों तक आ गया था। अगर थोड़ा झुक कर टेढ़ा होकर दो जाँघों के बिच में देखा जाये तो शायद ज्योति की चूत भी दिख जाए। बस उसकी चूत के कुछ निचे तक गाउन चढ चुका था। ज्योति की दो जाँघों के बिच में गाउन के अंदर कुछ अँधेरे के कारण गाउन ज्योति की प्यारी चूत को मुश्किल से छुपा पा रहा था। यह जाहिर था की ज्योति ने गाउन के अंदर कुछ भी नहीं पहन रखा था।

सुनीलजी को बेहाल लेटी हुई ज्योति पर बहुत सा प्यार आ रहा था। पता नहीं उन्हें इससे पहले कभी किसी औरत पर ऐसा आत्मीयता वाला भाव नहीं हुआ था। वह ज्योति को भले ही चोद ना पाएं पर ज्योति से साथ सो कर सारी सारी रात प्यार करने की उनके मन में बड़ी इच्छा थी। उन्होंने जो कुछ भी थोड़ा सा वक्त ज्योति को अपनी बाँहों में लेकर गुजारा था वह वक्त उनके लिए अमूल्य था। ज्योति के बदन के स्पर्श की याद आते ही सुनीलजी के शरीर में एक कम्पन सी सिहरन दौड़ गयी।

सिरहाने की साइड में खड़े होकर देखा जाए तो गाउन के अंदर ज्योति के दो बड़े बूब्स के बिच की खाई और उसके दो मस्त पहाड़ की चोटी पर विराजमान निप्पलोँ तक का नजारा लण्ड खड़ा कर देने वाला था। वह इसलिए की गहरी नींद में लेटे हुए सुनीलजी के दोनों हाथ अपनी बीबी के उन्मत्त स्तनोँ को नींद में ही दबा रहे थे।
 
सुनीलजी को सुनीलजी के भाग्य की बड़ी ईर्ष्या हुई। सुनीलजी को ज्योति के साथ पूरी रात गुजारने से रोकने वाला कोई नहीं था। वह जब चाहे ज्योति के बूब्स दबा सकते थे, ज्योति की गाँड़ में अपना लण्ड घुसा सकते थे, ज्योति को जब चाहे चोद सकते थे। एक गहरी साँस ले कर सुनीलजी ने फिर यह सोच तसल्ली की की जिस सुनीलजी को वह अति भाग्यशाली मानते थे वही सुनीलजी उनकी पत्नी ज्योति के आशिक थे। यह विचार आते ही वह मन ही मन हंस पड़े। सच कहा है, घर की मुर्गी दाल बराबर।

सुनीलजी का बड़ा मन किया की सुनीलजी के हाथ हटा कर वह अपने हाथ ज्योति के गाउन में डालें और ज्योति के मस्त नरम और फिर भी सख्त बूब्स को दबाएं, सहलाएं और अच्छी तरह से मसल दें।

ज्योति करवट लेकर पलंग के एक छोर पर सो रहीथी और उसके पति सुनीलजी उसके पीछे ज्योति की गाँड़ में अपना लण्ड वाला हिस्सा पाजामे के अंदर से बिलकुल ज्योति की गाँड़ में जाम किये हुए सो रहे थे। दोनों मियाँ बीबी इतनी गहरी नींद सो रहे थे की उन्हें सुनीलजी के आने का एहसास नहीं हुआ.

सुनीलजी ने अपने आप पर बड़ा नियंत्रण रखते हुए ज्योति के बालों में उंगलियां डाल उन्हें बालों को उँगलियों से कँघी करते हुए हलके से कहा, “ज्योति, उठो।”

जब सुनीलजी की हलकी आवाज का कोई असर नहीं हुआ तब सुनीलजी सुनील के सिरहाने के पास गए और थोड़ी सख्ती और थोड़े मजाक के अंदाज में सुनीलजी से कहा, “दोपहर का आप दोनों के मिलन का कार्यक्रम पूरा हुआ नहीं क्या? उठो, अब आप एक सेना के कैंप में हैं। आप को कुछ नियम पालन करने होंगें। सुबह साढ़े चार बजे उठना पडेगा। उठकर नित्य नियम से निपट कर सबको कुछ योग और हलकी फुलकी कसरत करनी पड़ेगी। चलो जल्दी तैयार हो जाओ। ठीक छे बजे प्रोग्रम शुरू हो जाएगा। मैं जा रहा हूँ। आप तैयार हो कर मैदान में पहुंचिए।”

सुनीलजी का करारा फरमान सुनकर ज्योति चौंक कर उठ गयी। उसने सुनीलजी को पलंग के पास में ही पूरा आर्मी यूनिफार्म में पूरी तरह से सुसज्ज खड़ा पाया। सुनीलजी आर्मी यूनिफार्म में सटीक, शशक्त और बड़े ही प्यारे लग रहे थे। ज्योति ने मन ही मन उनकी बलाइयाँ लीं। ज्योति ने एक हाथ से सुनीलजी को सलूट करते हुए कहा, “आप चलिए। आपको कई काम करने होंगें। हम समय पर पहुँच जाएंगे।”

चंद मिनटों में ही सुनीलजी उठ खड़े हुए हुए और वाशरूम की और भागे। ज्योति ने देखा की ज्योतिजी नहा कर बाहर निकल रही थीं। तौलिये में लिपटी हुई वह सुंदरता की जीती जागती मूरत समान दिख रही थीं। ज्योति को वह दिन याद आया जब उसने ज्योतिजी की “मालिश” की थी। ज्योति उठ खड़ी हुई और किवाड़ पार कर वह ज्योतिजी के पास पहुंची। ज्योति को आते हुए देख ज्योतिजी ने अपनी बाँहें फैलायीं और ज्योति को अपनी बाँहों में घेर लिया और फिर प्यार भरे शब्दों में बोली, ‘ज्योति कैसी हो? मेरे पति ने तुम्हें ज्यादा छेड़ा तो नहीं ना?”

ज्योति ने शर्माते हुए कहा, “दीद झूठ नहीं बोलूंगी। जितना छेड़ना चाहिए था उतना छेड़ा। बस ज्यादा नहीं। पर मेरी छोडो अपनी बताओ। मेरे पति ने आपके साथ कुछ किया की नहीं?”

ज्योतिजी ने कहा, “बस मेरा भी कुछ वैसा ही जवाब है। थोड़ा सा ही फर्क है। तुम्हारे पति ने जितना कुछ करना था सब कर लिया, कुछ छोड़ा नहीं। अरी! तेरे शौहर तो बड़े ही रंगीले हैं यार! तेरी तो रोज मौज होती होगी। इतने गंभीर और परिपक्व दिखने वाले सुनीलजी इतने रोमांटिक हो सकते हैं, यह तो मैंने सोचा तक नहीं था।”

ज्योति अपने पति की किसी और खूबसूरत स्त्री से प्रशंशा सुनकर उसे मुश्किल से हजम कर पायी। पर अब तो आगे बढ़ना ही था। ज्योति ने ज्योतिजी से कहा, “दीदी, लाइए मैं आपके बालों को आज की पार्टी के लिए सजा देती हूँ। मैं चाहती हूँ की आज मेरी दीदी अपनी खूबसूरती, जवानी और कमसिनता से सारे ही जवानों और अफसरों पर गजब का कहर ढाये! मैं सबको दिखाना चाहती हूँ की मेरी दीदी पार्टी में सब औरतों और लड़कियों से ज्यादा सुन्दर लगे।”

सुनीलजी जब वाशरूम में से तैयार होकर निकले तो उन्होंने देखा की ज्योति ज्योतिजी को सजाने में लगी हुई थी। ज्योतिजी को आधे अधूरे कपड़ों में देख कर सुनीलजी ने अपने आप पर संयम रखते हुए दोनों महिलाओं को “बाई” कहा और खुद सुनीलजी को मिलने निकल पड़े।

शामके ठीक छह बजे जब सब ने अपनी जगह ली तब तक ज्योति और ज्योति जी पहुंचे नहीं थे। मंच पर सुनीलजी और कैंप के अधिकारी कुछ गुफ्तगू में मशगूल थे। सुनीलजी को भी मंच पर ख़ास स्थान दिया गया था। धीरे धीरे सारी कुर्सियां भर गयीं। प्रोग्राम शुरू होने वाला ही था की ज्योतिजी और ज्योति का प्रवेश हुआ। उस समय सब लोग एक दूसरे से बात करने में इतने मशरूफ थे की पूरा हॉल सब की आवाज से गूँज रहा था।

जैसे ही ज्योति और ज्योतिजी ने प्रवेश किया की सब तरफ सन्नाटा छा गया। सब की निगाहें ज्योति और ज्योतिजी पर गड़ी की गड़ी ही रह गयीं। ज्योतिजी ने स्कर्ट और उसके ऊपर एक फ्रिल्ल वाला सतह पर सतह हो ऐसा सूत का सफ़ेद चिकन की कढ़ाई किया हुआ टॉप पहना था। ज्योतिजी के बाल ज्योति ने इतनी खूबसूरती से सजाये थे की ज्योति नयी नवेली दुल्हन की तरह लग रहीं थीं। ज्योतिजी का टॉप पीछे से खुला हुआ ब्लाउज की तरह था।

ज्योति जी के सुदृढ़ बूब्स का उभार उनके टॉप से बाहर उछल कर निकल ने की कोशिश कर रहा था। ज्योतिजी के कूल्हे इतने सुगठित और सुआकार लग रहे थे की लोगों की नजर उस पर टिकी ही रह जाती थीं।

ज्योति ने साडी पहन रक्खी थी। ज्योतिजी के मुकाबले ज्योति ज्यादा शांत और मँजी हुई औरत लग रही थी। साडी में भी ज्योति के सारे अंगों के उतार चढ़ाव की कामुकता भरी झलक साफ़ साफ़ दिख रही थी। ज्योति की गाँड़ साडी में और भी उभर कर दिख रही थी।

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जब धीरे धीरे सब ने अपने होश सम्हाले तब कैंप के मुख्याधिकारी ने एक के बाद एक सब का परिचय कराया। सुनीलजी का स्थान सभा के मंच पर था। कैंप के प्रशिक्षकों में से वह एक थे। वह सुबह की कसरत के प्रशिक्षक थे और उनके ग्रुप के लीडर मनोनीत किये गए थे।

जब उनका परिचय किया गया तब ज्योतिजी को भी मंच पर बुलाया गया और सुनीलजी की “बेहतर अर्धांगिनी” (Better half) के रूप में उनका परिचय दिया गया। उस समय पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

कप्तान कुमार सुनीलजी की बगल में ही बैठे हुए थे। नीतू और उसके पति ब्रिगेडियर खन्ना आगे बैठे हुए थे। कप्तान कुमार के पाँव तले से जमीन खिसक गयी जब नीतू का परिचय श्रीमती खन्ना के रूप में कराया गया। दोपहर के आराम के बाद कप्तान कुमार अच्छे खासे स्वस्थ दिख रहे थे।

मेहमानों का स्वागत करते हुए कैंप के मुखिया ने बताया की हमारा पडोसी मुल्क हमारे मुल्क की एकता को आहत करने की फिराक में है। चूँकि वह हमसे सीधा पंगा लेने में असमर्थ है इसलिए वह छद्म रूप से हम को एक के बाद एक घाव देनेकी कोशिश कर रहा है। वह अपने आतंक वादियों को हमारे मुल्क में भेज कर हमारे जवानों और नागरिकों को मार कर भय का वातावरण फैलाना चाहता है। हालात गंभीर हैं और हमें सजग रहना है।

इन आतंकवादीयों को हमारे ही कुछ धोखेबाज नागरिक चंद रूपयों के लालच में आश्रय और प्रोत्साहन देते हैं। आतंकवादी अलग अलग शहरों में आतंक फैलाने का प्रोग्राम बना रहे हैं। इन हालात में सेना के अधिकारीयों ने यह सोचा की एक आतंकी विरुद्ध नागरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जाए जिसमें हमारे नागरिकों को आतंकीयों से कैसे निपटा जाए और शहर में आतंकी हमला होने पर कैसे हमें उनका सामना करना चाहिए इसके बारे में बताया जाए।

उन्होंने बताया की इसी हेतु से यह प्रोग्राम तैयार किया गया था।

सारे मेहमानों को चार ग्रुप में बाँटा गया था। कप्तान कुमार, नीतू , उसके पति ब्रिगेडियर साहब और उनके दो हम उम्र दोस्त, सुनीलजी, सुनीलजी, ज्योतिजी और ज्योति एक ग्रुप में थे। ऐसे तीन ग्रुप और थे। कुल मिला कर करीब छत्तीस मेहमान थे। हर एक ग्रुप में नौ लोग थे। सुबह पाँच बजे योग और हलकी कसरत और उसके बाद चाय नाश्ता। बाद में सुबह सात बजे पहाड़ों में ट्रैकिंग का प्रोग्राम था। दोपहर का खाना ट्रैकिंग के आखिरी पड़ाव पर था। ट्रैकिंग का रास्ता पहले से ही तय किया गया था और जगह जगह तीरों के निशान लगाए गए थे।

परिचय और प्रोग्राम की बात ख़त्म होते होते शाम के सात बज चुके थे। लाउड स्पीकर पर सब को आग की धुनि के सामने ड्रिंक्स और नाच गाने के प्रोग्राम में हिस्सा लेने का आमंत्रण दिया गया।

मजे की बात यह थी की नीतू उसके पति ब्रिगेडियर साहब और कुमार भी ज्योति, सुनीलजी, सुनीलजी और ज्योतिजी वाली धुनि के आसपास बैठे हुए थे। ब्रिगेडियर खन्ना, कप्तान कुमार के साथ बड़े चाव से बात कर रहे थे। कप्तान कुमार बार बार नीतु की और देख कर अपनी नाराजगी जाहिर करने की कोशिश कर रहे थे की क्यों नीतू ने उन्हें अपनी शादी के बारेमें नहीं कहा?

तुरंत उन्हें याद आया की नीतू ने उन्हें कहने की कोशिस तो की थी जब उसने कहा था की “जिंदगी में कुछ परिस्थितियां ऐसी आती हैं की उन्हें झेलना ही पड़ता है।” परन्तु उसके बाद बात ने कुछ और मोड़ ले लीया था और नीतू अपने बारे में बता नहीं सकी थी। अब जब नीतू शादीशुदा है तो कुमार को अपना सपना चकनाचूर होते हुए नजर आया।

ब्रिगेडियर साहब ने कुमार से अपनी जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने बताया की कैसे नीतू और उसके के पिता ने ब्रिगेडियर साहब और उनकी स्वर्गवासी पत्नी की सेवा की थी। बादमें नीतू के पिता की मौत के बाद नीतू को उन्होंने आश्रय दिया। उनके सम्बन्ध नीतू से कुछ ज्यादा ही निजी हो गए। तब उन्होंने नीतू को समाज में बदनामी से बचाने के लिए शादी कर ली।

ब्रिगेडियर साहब ने कुमार को यह भी बताया की वह उम्र में उनसे काफी छोटी होने के कारण नीतू को अपनी पत्नी नहीं बेटी जैसा मानते हैं। वह चाहते हैं की अगर कोई मर्द नीतू को अपनाना चाहता हो तो वह उसे तलाक देकर ख़ुशी से नितुकी शादी उस युवक से करा भी देंगे।

ब्रिगेडियर साहब ने नीतू को बुलाकर अपने पास बिठाया और बोले, “नीतू बेटा, मैं अपने मिलने जा रहा हूँ। मैं थोड़ा थक भी गया हूँ। तो आप कप्तान कुमार और बाकी कर्नल साहब और इन लोगों के साथ एन्जॉय करो। मैं फिर अपने हट में जाकर विश्राम करूंगा।” कह कर ब्रिगेडियर साहब चल दिए।

ब्रिगेडियर साहब के जाने के बाद ज्योति उठकर कप्तान कुमार के करीब जा बैठी। उसने कुमार को कहा, “कप्तान साहब, नीतू आपसे अपनी शादी के बारे में कहना चाहती थी पर वह उस वक्त उसमें कहने की हिम्मत न थी और जब वह आपसे कहने लगी थी तो बात टल गयी और वह कह नहीं पायी। वह आपका दिल नहीं तोड़ना चाहती थी। आप उसको समझें और उसे क्षमा करें और देखो यह समाँ और मौक़ा मिला है उसे जाया ना करें। आप दोनों घूमे फिरें और एन्जॉय करें।

बाकी आप खुद समझदार हो।” इतना कह कर ज्योति कप्तान कुमार को शरारत भरी हँसी देकर, आँख मार कर वापस अपने पति सुनीलजी, सुनीलजी और ज्योतिजी के पास वापस आ गयी। उसे ख़ुशी हुई की अगर यह दो जवान दिल आपस में मिल कर प्यार में कुछ समय एक साथ बिताते हैं तो वह भी उनके लिए और खास कर नीतू के लिए बहुत बड़ी बात होगी।

शाम धीरे धीरे जवाँ हो रही थी। सुनीलजी और सुनीलजी ने अपने जाम में व्हिस्की भर चुस्की पर चुस्की ले रहे थे। ज्योति और ज्योतिजी चाय के साथ कुछ स्नैक्स ले रहीं थीं। सुनीलजी की उलझन ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। ज्योति ने अपने पति सुनीलजी को कहा, “ऐसा लगता है की कोई गंभीर मामला है जिसके बारे में सुनीलजी कुछ जानते हैं पर हमसे शेयर करना नहीं चाहते। आप ज़रा जा कर पूछिए ना की क्या बात है?”

सुनीलजी सुनीलजी पहुंचे। सुनीलजी आर्मी के कुछ अफसरान से गुफ्तगू कर रहे थे। कुछ देर बाद जब सुनीलजी फारिग हुए तब सुनीलजी ने सुनीलजी से पूछा, भाई, हमें हमें बताइये ना की क्या बात है? आप इतने चिंतित क्यों हैं?”

सुनीलजी ने सुनीलजी की और देख कर पूरी गंभीरता से कहा, “सुनीलजी, आपसे क्या छिपा हुआ है? आप को भी तो मिनिस्ट्री से हिदायत मिली हुई है की कुछ जासुस हमारी सना के कुछ अफसरान के पीछे पड़े हुए हैं। वह हमारी सेना की गतिविधियोँ की गुप्त जानकारी पाना चाहते हैं। वह जानना चाहते हैं की हमारी सेना की क्या रणनीति होगी। मैं सोच रहा था की कहीं जो हमारे साथ कुछ हादसे हुए हैं उससे इस बात का तो कोई सम्बन्ध नहीं है?”

सुनीलजी की बात सुनकर सुनीलजी चौक गए और बोल पड़े, “क्या इसका मतलब यह हुआ की पडोसी देश के जासूस हमारे पीछे पड़े हुए हैं? वह हम से कुछ सच्चाई उगलवाना चाहते हैं?”

ज्योति ने अपने पति के मुंह से यह शब्द सुने तो उसके चेहरे पर जैसे हवाइयाँ उड़ने लगीं। उसके चेहरे पर साफ़ साफ़ भय और आतंक के निशान दिख रहे थे। ज्योति बोल उठी, “बापरे! वह टैक्सी वाला और वह टिकट चेकर क्या दुश्मनों के जासूस थे? अब मैं सोचती हूँ तो समझ में आता है की वह लोग वाकई कितने भयंकर लग रहे थे।” सुनीलजी की और मुड़कर ज्योति बोली, “सुनीलजी अब क्या होगा?”

सुनीलजी ने ज्योति का हाथ थामा और दिलासा देते हुए बोले, ” अपने नन्हे से दिमाग को कष्ट ना दो। हमें कुछ नहीं होगा। हम इतनी बड़ी हिंदुस्तानी फ़ौज के कैंप में हैं और उनकी निगरानी में हैं। मुझसे गलती हुई की मैंने तुम्हें यह सब बताया।”

तब ज्योति ने अपना खूबसूरत सीना तान कर कहा, “हम भी भारत की शक्ति हैं। मैं एक क्षत्राणी हूँ और एक बार ठान लूँ तो सबसे निपट सकती हूँ। मुझे कोई डर नहीं।”

ज्योतिजी ने ज्योति की दाढ़ी अपनी उँगलियों में पकड़ी और उसे हिलाते हुए कहा, “अगर क्षत्राणी है तो फिर यह जूस ही क्यों पी रही है? कुछ गरम पेय पी कर दिखा की तू भी वाकई में क्षत्राणी है”

ज्योति ने ज्योतिजी की और मुड़कर देखा और बोली, “इसमें कौनसी बड़ी बात है? चलो दीदी डालो ग्लास में व्हिस्की और हम भी हमारे मर्दों को दिखाते हैं की हम जनाना भी मर्दों से कोई कम नहीं।”

नीतू ज्योति का जोश और जस्बा ताज्जुब से देख रही थी। उसने ज्योति की हिम्मत ट्रैन में देखि थी। वाकई में तो सबकी जान ज्योति ने ही बचाई थी क्यूंकि अगर ज्योति ने कुमार की टाँगें कस के काफी देर तक पकड़ रक्खी नहीं होतीं तो कुमार फुल स्पीड में चल रही ट्रैन से गिर पड़ते और नीतू और कुमार दोनों की मौत पक्की थी।

ज्योतिजी ने ज्योति के गिलास में कुछ ज्यादा और अपने गिलास में कुछ कम व्हिस्की डाली और सोडा से मिलाकर ज्योति को दी। सुनीलजी और सुनीलजी अपनी बीबियों की करतूत देख कर मन ही मन खुश हो रहे थे। अगर पी कर यह मस्त हो गयीं तो समझो उनकी रात का मझा कुछ और होगा।

लाउड स्पीकर पर डांस संगीत शुरू हो गया था। नीतू और कुमार बाँहों में बाँहें डाले नाच रहे थे। उनको देख कर ज्योति ने ज्योतिजी से कहा, “लगता है यह दो जवान बदनों की हवस की आग इस यात्रा के दरम्यान जरूर रंग लाएगी।”

ज्योति पर व्हिस्की का रंग चढ़ रहा था। झूमती हुई ज्योति कुमार और नीतू डांस कर रहे थे वहाँ पहुंची और दोनों के पास जाकर नीतू का कंधा पकड़ कर बोली, “देखो बेटा। मैं तुम दोनों से बड़ी हूँ। मैं तुम्हें खुल्लम खुल्ला कहती हूँ की जब भी मौक़ा मिले मत गंवाओ। जिंदगी चार दिनकी है, और जवानी सिर्फ दो दिन की। मौज करो। नीतू तुम्हारे पति ब्रिगेडियर साहब ने खुद तुम्हें किसी भी तरह से रोका नहीं है। बल्कि वह तो तुम्हें कुमार से घुल मिल कर मौज करने के लिए कहते हैं। वह तुम्हें बेटी मानते हैं। वह जानते हैं की वह तुम्हें पति या प्रियतम का मरदाना प्यार नहीं दे सकते।

तो फिर सोचते क्या हो? जवानी के दो दिन का फायदा उठाओ। अगर आप के प्यार करने से किसी का घर या दिल नहीं टूटता है, तो फिर दिल खोल कर प्यार करो।

नीतू के कान के पास जा कर ज्योति नीतू के कान में बोली, “हम भी यहां मौज करने आये हैं।” फिर अपनी माँ ने दी हुई कसम को याद कर ज्योति के चेहरे पर गमगीनी छा गयी।

ज्योति थर्राती आवाज में बोली, “पर बेटा मेरी तो साली तक़दीर ही खराब है। जिनसे मैं चुदाई करवाना चाहती थी उनसे करवा नहीं सकती। कहते हैं ना की “नसीब ही साला गांडू तो क्या करेगा पांडु?”
 
नीतू और कुमार बिना बोले ज्योति की और आश्चर्य से एकटक देख रहे थे की ज्योतिजी जो इतनी परिपक्व लगती थीं शराब के नशेमें कैसे अपने मन की बात सबको बता रही थी।

सुनीलजी और ज्योतिजी हॉल की बाँहों में बाँहें डाले घूम घूम कर डांस कर रहे थे। साथ साथ में जब मौक़ा मिलता था तब वह एक दूसरे से एकदम चिपक भी जाते थे। ज्योति ने यह देखा। उसकी नजर सुनीलजी को ढूंढने लगी। सुनीलजी कहीं नजर नहीं आ रहे थे। जब ज्योति ने ध्यान से देखा तो पाया की सुनीलजी वहाँ से काफी दूर एक दूसरे कोने में अपनी बीबी के करतब से बेखबर बाहर आर्मी कैंप के कुछ अफसरान से बातें करने में मशरूफ थे।

ज्योति को व्हिस्की का सुरूर चढ़ रहा था। उसे सुनीलजी के लिए बड़ा अफ़सोस हो रहा था। ज्योति और सुनीलजी आपस में एक दूसरे से एक होना चाहते थे पर ज्योति की माँ के वचन के कारण एक नहीं हो सकते थे। यह जानते हुए भी की ज्योति उनसे चुदवाने का ज्यादा विरोध नहीं करेगी, अगर वह ज्योति पर थोड़ी सी जोर जबरदस्ती करें। पर सुनीलजी अपने सिद्धांत पर हिमाचल की तरह अडिग थे।

वह तब तक ज्योति को चुदाई के लिए नहीं कहेंगे जब तक ज्योति ने माँ को दिया हुआ वचन पूरा नहीं हो जाता और वह वचन इस जनम में तो पूरा होना संभव नहीं था।

मतलब रेल की दो पटरियों की तरह ज्योति और सुनीलजी के बदन इस जनम में तो एक नहीं हो सकते थे। हालांकि ज्योति ने स्पष्ट कर दिया था की चुदाई के सिवा वह सब कुछ कर सकते हैं, पर अब तो सुनीलजी ने यह भी तय कर दिया था की वह ज्योति को छेड़ेंगे भी नहीं। कारण सुनीलजी का लण्ड सुनीलजी के नियत्रण में नहीं रहता था।

जब जब भी ज्योति उनके करीब आती थी तो वह काबू के बाहर हो जाता था और तब सुनीलजी का दिमाग एकदम घूम जाता था। इस लिए वह ज्योति से दूर रहना ही पसंद करने लगे जो ज्योति को बड़ा चुभ रहा था।

ज्योतिजी ज्योति के पति के साथ चिपकी हुई थी। कुमार और नीतू कुछ देर डांस करने क बाद वहाँ से थोड़ी दूर कुछ गुफ्तगू कर रहे थे। ज्योति से बात करने वाला कोई वहाँ नहीं था।

ज्योति उठ खड़ी हो रही थी की एक साहब जो की आर्मी वाले ही लग रहे थे झूमते हुए ज्योति के पास आये और बोले, “मैं मेजर कपूर हूँ। लगता है आप अकेली हैं। क्या मैं आपके साथ डांस कर सकता हूँ?”

ज्योति उठ खड़ी हुई और मेजर साहब की खुली बाँहों में चली गयी और बोली, “क्यों नहीं? मेरे पति किसी और औरत की बाँहों में हैं। पर सच कहूं कपूर साहब? मुझे डांस करना नहीं आता।”

कपूर साहब ने कहा, “कोई बात नहीं। आप मेरे बदन से साथ हुमते हुए थिरकते रहिये। धीरे धीर लय के साथ झूमते हुए आप सिख जाएंगे।”

कपूर साहब करीब पैंतालीस साल के होंगे। आर्मी की नियमित कसरत बगैरह की आदत के कारण उनका बदन सुगठित था और उनके चपल चहल कदमी से लगता था की वह बड़े फुर्तीले थे। उनके सर पर कुछ सफ़ेद बाल दिख रहे थे जो उनके सुन्दर चेहरे पर जँचते थे। ज्योति ने पूछा, “क्या आप अकेले हैं?”

कपूर साहब ने फ़ौरन जवाब दिया, “नहीं, मेरी पत्नी भी आयी है।” फिर दूर कोने की और इशारा करते हुए उन्होंने कहा, “वह जो उस कोने में जीन्स और डार्क ब्लू टॉप पहने हुए सुन्दर सी महिला उस अधेड़ पुरुष के साथ डांस करती दिख रही है, वह मेरी पत्नी पूजा है।”

ज्योति ने देखा तो वह सुन्दर महिला एक आर्मी अफसर के साथ काफी करीबी से डांस कर रही थी।” ज्योति का मन किया की वह पूछे की वह मर्द कौन था? पर फिर उसने पूछने की जरूरत नहीं समझी। कपूर साहबी काफी रोमांटिक लग रहे थे। वह ज्योति को एक के बाद एक कैसे स्टेप लेने चाहिए और कब अलग हो जाना है और कब एक दूसरे से चिपक जाना है इत्यादि सिखाने लगे।

ज्योति तो वैसे ही बड़ी कुशाग्र बुद्धि की थी और जल्द ही वह संगीत के लय के साथ कपूर साहब का डांस में साथ देने लगी। कपूर साहब भी काफी रूमानी मिजाज के लग रहे थे। जब बदन चिपका ने मौक़ा आता था तब कपूर साहब मौक़ा छोड़ते नहीं थे।

वह ज्योति का बदन अपने बदन से चिपका लेते थे। ज्योति को महसूस हुआ की कपूर साहब का लण्ड खड़ा हो गया था और जब कपूर साहब उससे चिपकते थे तब ज्योति उसे अपनी जाँघों के बिच महसूस कर रही थी। पर उसे कुछ बुरा नहीं लगता था। वह भलीभाँति जानती थी ऐसे हालात में बेचारे मर्द का लण्ड करे तो क्या करे?

ऐसे हालात में अगर औरत को भी कोई अपनी मर्जी के पुरुष के करीब आने का मौक़ा मिले तो क्या उसकी चूत में और उसकी चूँचियों में हलचल मच नहीं जाती? तो भला पुरुष का ही क्या दोष? पुरुष जाती तो वैसे ही चुदाई के लिए तड़पती रहती है।

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मेजर कपूर ने ज्योति से पूछा, “ज्योतिजी क्या आप के पति यहाँ नहीं है?”

ज्योति ने सुनीलजी को दिखाते हुए कहा, “कपूर साहब! वह सबसे खूबसूरत महिला जिनके साथ डांस कर रही है वह मेरे पति हैं।”

कपूर साहब बोल पड़े, “अरे वह तो मिसिस जसवंत सिंह है।”

ज्योति ने कहा, “कमाल है साहब, आप अपने आप उन्हें मिसिस जसवंत सिंह क्यों कह रहे हैं?”हाँ वही ज्योतिजी हैं। देखा आपने वह कितना करीबी से मेरे पति के साथ डांस कर रहीं हैं?”

कपूर साहब ने कहा, “तो फिर आपको किसने रोका है? आप भी तो मेरे साथ एकदम करीबी से डांस कर सकती हैं।”

ज्योति ने अपनी आँख नचाते हुए पूछा, “अच्छा? क्या आप की पत्नी बुरा तो नहीं मानेगी?”

कपूर साहब ने कहा, “भाई अगर आपके पति बुरा नहीं मानेंगे तो मेरी पत्नी क्यों बुरा मानेंगी? वह तो खुद ही उन साहब की बाँहों में चिपक कर डांस कर रही है।”

ज्योति ने कहा, “ठीक है फिर तो।” बस इतना बोल कर ज्योति चुप हो गयी। कपूर साहब को तो जैसे खुला लाइसेंस ही मिल गया हो वैसे वह ज्योति को अपनी बाँहों में दबाकर बड़ी उत्कटता से अपनी जाँघों से ज्योति की जांघें रगड़ते हुए डांस करना शुरू किया।

संगीत में चंद मिनटों का ब्रेक हुआ। मेजर कपूर और ज्योति अलग हुए। मेजर कपूर फ़ौरन व्हिस्की के दो गिलास ले आये और ज्योति को एक थमाते हुए बोले, “देखिये मोहतरमा, मैं सरहद पर तैनात हूँ। कल ही सरहद से आया हूँ।

अगले हफ्ते फिर सरहद पर लौटना है। जिस तरह से सरहद पर लड़ाई छिड़ने का माहौल है, पता नहीं कल ही बुलावा आ जाये। और फिर पता नहीं मैं अपने पाँव से चलके आऊं या फिर दूसरों के कंधों पर। पता नहीं फिर हम मिल पाएं भी या नहीं। तो क्यों हम दोनों अकेले ही इस समाँ को एन्जॉय ना करें? कहते हैं ना की “कल हो ना हो”

ज्योति को याद आया की सुनीलजी ने अपनी पत्नी ज्योति को भी यह शब्द कहे थे। ज्योति सोच रही थी की इन शब्दों में कितनी सच्चाई थी। उसने खुद कई सगे और सम्बन्धियों की लाशें खुद देखीं थीं। उसे अपने पिता की याद आ गयी। ज्योति ने भगवान् का शुक्र किया की उसके पिता जख्मी तो हुए थे, पर उनको अपनी जान नहीं गँवानी पड़ी थी।

ज्योति ने एक ही झटके में व्हिस्की का गिलास खाली कर दिया। यहाँ ज्योति के व्यक्तित्व के बारे में एक बात कहनी जरुरी है। वैसे तो ज्योति एक साधारण सी भारतीय नारी ही थी। वह थोड़ी सी वाचाल, बुद्धि की कुशाग्र, शर्मीली, चंचल, चुलबुली और एक पतिव्रता नारी थी।

पर जब उसे शराब का नशा चढ़ जाता था तब ज्योति की हरकतें कुछ अजीबोगरीब हो जाती थीं। ज्योति को जानने वाला यह मान ही नहीं सकता था की वह ज्योति थी। उसके हावभाव, उसकी वाचा, उसके चलने एवं बोलने का ढंग एकदम ही बदल जाता था। यह कहना मुश्किल था की वह असल में ज्योति ही थी।

सुनीलजी को ऐसा अनुभव दो बार हुआ। एक बार ऐसा हुआ की पार्टी में दोस्तों के आग्रह से ज्योति ने कुछ ज्यादा ही पी ली। पिने के कुछ देर तक तो ज्योति बैठी सबकी बातें सुनती रही। फिर जब उसे नशे का शुरूर चढ़ने लगा तब ज्योति ने सुनीलजी के एक दोस्त का हाथ पकड़ कर उस आदमी को सुनील समझ कर उसे चिपक कर उसे सबके सुनते हुए जल्दी से घर चलने का आग्रह करने लगी।

वह जोर जोर से यही बोलती रही की “पार्टी में आने से पहले तो तुम मुझे बार बार कहते थे की आज रात को बिस्तर में सोने के बाद खूब मौज करेंगे? तो चलो ना, अब पार्टी में देर क्यों कर रहे हो? आज तो मेरा भी बड़ा मन कर रहा है। चलो जल्दी करो, कहीं तुम्हारा मूड (??!!) ढीला ना पड़ जाए!” वह सुनीलजी का दोस्त बेचारा समझ ही नहीं पाया की वह रोये या हँसे?

दूसरी बार ज्योति ने दो पेग व्हिस्की के लगाए तब अचानक ही वह योद्धांगिनी बन गयी और वहाँ खड़े हुए सब को चुनौती देने लगी की यदि उसके हाथ में ३०३ का राइफल होता तो वह युद्ध में जाकर दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देती। और फिर वह वहाँ खडे हुए लोगों को ऐसे आदेश देने लगी जैसे वह सब लोग फ़ौज की कोई टुकड़ी हो और ज्योति को सेना के जवानों की टुकड़ी का लीडर बनाया गया हो। ज्योति चाहती थी की उस का कमांड सुनकर वहाँ खडे लोग परेड शुरू करें। वह “लेफ्ट, राइट, आगे बढ़ो, पीछे मूड़” इत्यादि कमांड देने लगी थी।

जब वह लोग उलझन में खड़े देखते रहे तब ज्योति ने उन लोगों को ऐसा झाड़ना शुरू किया की, “शर्म नहीं आती, आप सब जवानों को? तनख्वाह फ़ौज से लेते हो और हुक्म का पालन नहीं करते?” इत्यादि।

बड़ी मुश्किल से सुनीलजी ने सबसे माफ़ी मांगीं और ज्योति को समझा बुझा कर घर ले आये। सुनीलजी ने ज्योति को एक बार एक विशेषज्ञ साइक्याट्रिस्ट को दिखाया तो उन्होंने कुछ टेस्ट करने के बाद कहा था, “चिंता की कोई बात नहीं है। ज्योति की नशा हजम करने की क्षमता दूसरे लोगों से काफी कम है। बस ज्योति को शराब से दूर रखा जाय तो कोई दिक्कत नहीं है।

जैसे ही वह ज्यादा नशीली शराब जैसे व्हिस्की, रम, वोदका आदि थोड़ी सी ज्यादा पी लेती हैं तो उनका मन चंचल हो उठता है। जब तक उनपर नशे का शुरुर छाया रहता है तब तक वह उस समय उनके मन में चल रही इच्छा को अपने सामने ही फलीभूत होते हुए देखती है। मतलब वह यातो अपने को कोई और समझ लेती है या फिर किसी और को अपने मन पसंद किरदार में देखने लगती है।

अगर उस समय ज्योति के मन में शाहरूख खानके बारे में विचार होते हैं तो वह किसी भी व्यक्ति को शाहरूख खान समझ लेती है और उससे उसी तरह पेश आती है। उस समय यदि उसका मन कोई फिल्म में एक्टिंग करने का होता है वह खुद को एक्टर समझ लेती है और एक्टिंग करने लग जाती है।

नशा उतरते ही वह फिर अपनी मूल भूमिका में आ जाती है। उसे पता तो चलता है की उसने कुछ गड़बड़ की थी। पर उसे याद नहीं रहता की उसने क्या किया था। तब फिर उसे अफ़सोस होने लगता है और वह अपने किये कराये के लिए माफ़ी मांगने लग जाती है और उस समय उसे सम्हालने वाले पर काफी एहसान मंद हो जाती है।“

साइक्याट्रिस्ट की राय जान कर सुनीलजी की जान में जान आयी। इसी लिए सुनीलजी ख़ास ध्यान रखते थे की ज्योति को कोई ज्यादा मद्य पेय (व्हिस्की, रम, वोदका आदि) ना दे। जब कोई ज्यादा आग्रह करता तो ज्योति को सुनीलजी थोड़ा सा बियर पिने देते, पर बस एकाद घूँट अंदर जाते ही सुनीलजी उसका ग्लास छीन लेते इस डर से की कहीं उसको चढ़ ना जाए और वह कोई नया ही बवंडर खड़ा ना करदे।

पर उस दिन शाम उस समय सुनीलजी कहीं आगे पीछे हो गए और नीतू, कुमार साहब बगैरह लोगों ने मिलकर ज्योति को व्हिस्की पिला ही दी।

नशे का सुरूर ज्योति पर छा रहा था। सेना के जवानों की शूरवीरता और बलिदान की वह कायल थी। वह खुद भी देश के लिए बलिदान करने के लिए पूरी तरह तैयार थी। शराब का नशा चढ़ते ही ज्योति के दिमाग में जैसे कोई बवंडर सा उठ खड़ा हुआ। उसको अपने सामने मेजर कपूर नहीं, कर्नल जसवंत सिंह (सुनीलजी) दिखाई देने लगे। वह सुनीलजी, जो देश के लिए अपनी जान देने के लिए सदैव तैयार रहते थे। वह सुनीलजी जिन्होंने ज्योति के लिए क्या कुछ नहीं किया?
 
जब कपूर साहब ने ज्योति से कहा की वह देश के लिए अपनी जान तक देने के लिए तैयार थे तो ज्योति सोचने लगी, “जब सुनीलजी देश के लिए अपनी जान तक देने के लिए तैयार थे तो भला ऐसे जाँबाज़ के लिए देशवासियों का भी कर्तव्य बनता है की वह उनके लिए अपना सबकुछ कुर्बान करदें। अगर उनकी इच्छा सेक्स करने की हो तो क्या ज्योति को उनकी इच्छा पूरी नहीं करनी चाहिए?”

ज्योति ने कपूर साहब से कहा, “सुनीलजी, आप मेरे पति की चिंता मत करिये। आप मेरे वचन की भी चिंता मत करिये। जब आप देश के लिए अपनी जान तक का बलिदान करने के लिए तैयार हैं तो मैं आपको आगे बढ़ने से रोकूंगी नहीं। चलिए मैं तैयार हूँ। पर यहां नहीं। यहां सब देखेंगे। बोलिये कहाँ चलें?”

कपूर साहब ज्योति को देखते ही रहे। इनकी समझ में नहीं आया की यह सुनीलजी कौन थे और ज्योति कौनसे वचन की बात कर रही थी? ज्योति उन्हें सुनीलजी कह कर क्यों बुला रही थी? पर फिर उन्होंने सोचा, “क्या फर्क पड़ता है? सुनीलजी बनके ही सही, अगर इतनी खूबसूरत मोहतरमा को चोदने का मौक़ा मिल जाता है तो क्यों छोड़ा जाये, जब वह खुद सामने चलकर आमंत्रण दे रही थी?”

कपूर सर ने कहा, “मुझे कोई चिंता नहीं। आइये हम फिर इस भीड़ से कहीं दूर जाएँ जहां सिर्फ हम दोनों ही हों। और फिर हम दोनों एक दूसरे में खो जाएँ।” यह कह मेजर साहब ने ज्योति का हाथ पकड़ा और उसे थोड़ी दूर ले चले।

ज्योति ने भी उतने जोश और प्यारसे जवाब दिया, “सुनीलजी, मैं आप को प्यार करने ले लिए ही तो हूँ और रहूंगी। आपको मुझे पूछने की जरुरत नहीं।” ज्योति नशे में झूमती हुई मेजर साहब के पीछे पीछे चलती बनी।

कपूर साहब के तो यह सुनकर वारे न्यारे हो गए। उन्होंने हाथ बढ़ाकर ज्योति के टॉप के बटन खोलने शुरू किये। ज्योति भी कपूर साहब की जाँघों के बिच में हाथ डालने वाली ही थी की अचानक नजदीक में ही कपूर साहब को “ज्योति ज्योति” की पुकार सुनाई दी।

वोह आवाज सुनीलजी की थी। उनकी आवाज सुनकर कपूर साहब जैसे ज़मीन में गाड़ दिए गए हों, ऐसे थम गए। ज्योति अँधेरे में इधर उधर देखने लगी की कौन उसे आवाज दे रहा था। कुछ ही देर में सुनीलजी ज्योति और कपूर साहब के सामने हाजिर हुए।

इतने घने अँधेरे में भी सितारोँ की हलकी रौशनी में अपने पति को देखते ही ज्योति झेंप सी गयी और भाग कर उनकी बाँहों में आ गयी और बोली, “सुनील देखिये ना! सुनीलजी मुझसे कुछ प्यारी सी बातें कर रहे थे। वह मुझसे प्यार करना चाहते हैं। क्या मैं उनसे प्यार कर सकती हूँ? तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है ना?”

सुनीलजी अपनी पत्नी ज्योति को हक्केबक्के देखते ही रह गए। जब उन्होंने कपूर साहब को देखा तो सुनीलजी कुछ ना बोल सके। वह समझ गए की कपूर साहब ज्योति को फुसला कर वहाँ ले आये थे और नशे में धुत्त ज्योति, कपूर साहब को सुनीलजी समझ कर कपूर साहब के साथ वहाँ आयी थी। सुनीलजी किसको क्या कहे?

सुनीलजी को वहाँ देखकर कपूर साहब शर्मिन्दा हो कर सिर्फ “आई ऍम सॉरी” कह कर वहाँ से चलते बने और कुछ ही देर में अँधेरे में ओझल हो गए। सुनीलजी ने प्यार से ज्योति को गले लगाया और कहा, “डार्लिंग, अभी वापस चलते हैं, फिर अपने कमरे में पहुँच कर बात करते हैं।”

सुनीलजी ने अपनी पत्नी ज्योति को प्यार से पकड़ कर अपने साथ ले लिया और कैंटीन की और चल पड़े। कैंटीन में पहुंचकर उन्होंने ज्योति और अपने लिए डिनर मंगवाया और ज्योति को अपने हाथों से खिलाकर ज्योति को प्यार से वैसे ही बच्चे की तरह पकड़ कर अपने स्युईट की और चल दिए।

रास्ते में ज्योति ने अपने पति का हाथ थाम कर उनसे नजरें मिलाकर पूछा, “सुनील, आप बताइये ना, क्या मैंने शराब के नशे में कुछ उलटिपुलटि हरकत तो नहीं की?”

सुनीलजी ने अपनी पत्नी की और प्यारसे देख कर ज्योति के बालों में अपने होँठ से चुम्बन करते हुए कहा, “नहीं डार्लिंग, कुछ नहीं हुआ। तुम थकी हुई हो। थोड़ा आराम करोगी तो सब ठीक हो जाएगा।”

ज्योति अपने पति की बात सुनकर चुपचाप एक शरारत करते हुए पकडे जाने वाले बच्चे की तरह उनके साथ अपने कमरे में जा पहुंची। वहाँ पहुँचते ही ज्योति भाग कर पलंग पर लेट ने लगी पर सुनीलजी ने ज्योति को प्यार से बिठाकर उसका स्कर्ट और टॉप निकाल फेंका।

सिर्फ ब्रा और पेंटी पहने लेटी हुई अपनी खूबसूरत बीबी को कुछ समय तक सुनीलजी देखते ही रहे फिर उसे उसका नाइट गाउन पहनाने लगे। ज्योति ने जब अपने पति को कपडे बदलते हुए पाया तो उसने उठकर अपने आप अपना नाइट गाउन पहन लिया और अपने बदन को इधर उधर करते हुए अपनी ब्रा और पेंटी निकाल फेंकी और लेट गयी।

कोने में जल रही सिगड़ी से दोनों कमरों में काफी आरामदायक तापमान था। सुनीलजी ने देखा की ज्योतिकुछ ही मिनटों में गहरी नींद सो गयी। सुनीलजी अपनी पत्नी को बिस्तर पर बेहोश सी लेटी हुई देख रहे थे। उसका गाउन पलंग पर फैला हुआ उसकी जाँघों के ऊपर तक आ गया था।

ज्योति की नंगी माँसल जाँघों को देख कर सुनील का लण्ड खड़ा हो गया था। वह बेहाल लेटी हुई अपनी बीबी को देख रहे थे की कुछ ही पलों में सुनीलजी को अपनी पत्नी ज्योति के खर्राटे सुनाई देने लगे।

सुनीलजी पलंग के पास से हट कर खिड़की के पास खड़े हो कर सोचते हुए अँधेरे में दूर दूर जंगल की और सितारों की रौशनी में देख रहे थे तब उन्हें भौंकते और रोते हुए भेड़ियों की आवाज सुनाई दी। उन्होंने कई बार शहर में भौंकते हुए कुत्तों की आवाज सुनी थी पर यह आवाज काफी डरावनी और अलग थी। सुनीलजी की समझ में यह नहीं आ रहा था की यह कैसी आवाज थी।

तब सुनीलजी ने सुनीलजी का हाथ अपने काँधों पर महसूस किया। सुनीलजी और ज्योति अपने कमरे में आ चुके थे। ज्योतिजी कपडे बदल ने के लिए वाशरूम में गयी थी।

सुनीलजी को खिड़की के पास खड़ा देख कर सुनीलजी वहाँ पहुँच गए और उन के पीछे खड़े होकर सुनीलजी ने कहा, “यह जो आवाज आप सुन रहे हो ना, वह क्या है जानते हो? यह कोई साधारण जंगली भेड़िये की आवाज नहीं। यह आवाज सेना के तैयार किये गए ख़ास भयानक नस्ल के कुत्तों की आवाज है।“

सुनीलजी ने थोड़ा थम कर फिर बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “सेना में इन कुत्तों को खास तालीम दी जाती है। इनका इस्तेमाल ख़ास कर दुश्मनों के बंदी सिपाही जब कैद से भाग जाते हैं तब उनको पकड़ ने के लिए किया जाता है। उनको अंग्रेजी में “हाऊण्ड” कहते हैं।

यह कुत्ते “हाऊण्ड”, जानलेवा होते हैं। इनसे बचना लगभग नामुमकिन होता है। कैद से भागे हुए कैदी सिपाही के कपडे या जूते इन्हें सुँघाये जाते हैं। अगर कैदी को मार देना है तो इन हाउण्ड को कैदियों के पीछे खुल्ला छोड़ दिया जाता है। हाउण्ड उन कैदियों को कुछ ही समय में जंगल में से ढूंढ निकालते हैं और उनको चीरफाड़ कर खा जाते हैं।

अगर क़ैदियों को ज़िंदा पकड़ना होता है तो सेना के जवान इन हाउण्ड को रस्सी में बाँध कर उनके पीछे दौड़ते रहते हैं। यह हाउण्ड कैदी की गंध सूंघते सूंघते उनको जल्द ही पकड़ लेते हैं।“

सुनीलजी ने बड़ी गंभीरता से कहा, “सुनीलजी मेरी समझ में यह नहीं आता की यह हाउण्ड किसके हैं। हमारी सेना ने तो इस एरिया में कोई हाउण्ड नहीं रखे। तो मुमकिन है की यह दुश्मनों के हाउण्ड हैं। अगर ऐसा है तो हमारी सीमा में दुश्मनों के यह हाउण्ड कैसे पहुंचे? मुझे डर है की जल्द ही कुछ भयानक घटना घटने वाली है।”

सुनीलजी की बात सुनकर सुनीलजी चौंक गए। सुनीलजी ने पूछा, “सुनीलजी कहीं ऐसा तो नहीं की हमारी सेना के कुछ जवानों को दुश्मन ने कैदी बना लिया हो?”

सुनीलजी ने अपने हाथ अपनी स्टाइल में झकझोरते हुए कहा, “ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यही तो सोचनेवाली बात है। कुछ ना कुछ तो खिचड़ी पक रही है, और वह क्या है हमें नहीं पता।”

सुनीलजी ने घूमकर सुनीलजी का हाथ थामकर कहा, “सुनीलजी, आप बहुत ज्यादा सोचते हो। भला दुश्मन के सिपाहियों की इतनी हिम्मत कहाँ की हमारी सीमा में घुस कर ऐसी हरकत करें? क्या यह नहीं हो सकता की हम अपना दिमाग बेकार ही खपा रहे हों और वास्तव में यह आवाज जंगली भेड़ियों की ही हो?”

सुनीलजी ने हार मानते हुए कहा, “पता नहीं। हो भी सकता है।”

सुनीलजी ने सुनीलजी की नजरों से नजर मिलाते हुए पलंग में लेटी हुई अपनी बीबी ज्योति की और इशारा करते हुए कहा, “फिलहाल तो मुझे ज्योति के खर्राटों की दहाड़ का मुकाबला करना है। पता नहीं आपने उस पर क्या वशीकरण मन्त्र किया है की वह आपकी ही बात करती रहती है।”

सुनीलजी की बात सुनकर सुनीलजी को जब सकते में आते हुए देखा तो सुनीलजी मुस्कुराये और फिर से सुनीलजी का हाथ थाम कर अपने पलंग के पास ले गए जहां ज्योति जैसे घोड़े बेचकर बेहाल सी गहरी नींद सो रही थी। अपनी आवाज में कुछ गंभीरता लाते हुए सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ। क्या आप बुरा तो नहीं मानेंगे?”

बड़ी मुश्किल से ज्योति की माँसल जाँघों पर से अपनी नजर हटाकर सुनीलजी ने आश्चर्य भरी निगाहों से सुनीलजी की और देखा। अपना सर हिलाते हुए सुनीलजी ने बिना कुछ बोले यह इशारा किया की वह बुरा नहीं मानेंगे। सुनीलजी बोले,”सुनीलजी, क्या आप अब मुझे और ज्योति को अपना अंतरंग साथी नहीं मानते?”

सुनीलजी ने जवाब दिया, “हाँ मैं और ज्योति आप दोनों को अपना घनिष्ठ अंतरंग साथी मानते हैं। इसमें पूछने वाली बात क्या है?”

सुनीलजी ने कहा, “तब फिर क्या हम दोनों पति पत्नी की जोड़ियों में कोई पर्दा होना चाहिए?”

सुनीलजी ने फ़ौरन कहा, “बिलकुल नहीं होना चाहिए। पर आप यह क्यों पूछ रहे हैं?”

सुनीलजी ने कहा, “मैं भी यही मानता हूँ। पर मैं यहां यह कहना चाहता हूँ की कुछ बातें इतनी नाजुक होती हैं, की उन्हें कहा नहीं जाना चाहिए। हम लोगों को उन्हें बिना कहे ही समझ जाना चाहिए। मैं हम दोनों पति पत्नियों के बिच के संबंधों की बात कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ की हम दोनों जोड़ियों के बिच किसी भी तरह का कोई भी परायापन ना रहे…

अगर हम सब एकदूसरे के घनिष्ठ अंतरंग हैं तो फिर खास कर अपने पति या अपनी पत्नी के प्रति एक दूसरे के पति या पत्नी से सम्बन्ध के बारे में किसी भी तरह का मालिकाना भाव ना रक्खें। मुझे यह कहने, सुनने या महसूस करने में कोई परेशानी या झिझक ना हो की ज्योति आपसे बेतहाशा प्यार करती है और आपको भी वैसे ही ज्योतिजी के बारे में हो।”
 
सुनीलजी ने सुनीलजी का हाथ थामते हुए कहा, “बिलकुल! मेरी और ज्योति की तो इस बारे में पहले से ही यह सहमति रही है।

फिर सुनील की और प्यार से देखते हुए सुनीलजी बोले, “सुनीलजी, आप चिंता ना करें। आप और ज्योति के बिच के भाव, इच्छा और सम्बन्ध को मैं अच्छी तरह जानता और समझता हूँ। मेरे मन में आप और ज्योति को लेकर किसी भी तरह की कोई दुर्भावना नहीं है। आप दोनों मेरे अपने हो और हमेशा रहोगे। आप दोनों के बिच के कोई भी और किसी भी तरह के सम्बन्ध से मुझको कोई भी आपत्ति नहीं है ना होगी।”

पलंग पर मदहोश लेटी हुई ज्योति की और देखते हुए अपनी आवाज में अफ़सोस ना आये यह कोशिश करते हुए सुनीलजी ने कहा, “जहां तक मेरा और ज्योति के सम्बन्ध का सवाल है, तो मैं यही कहूंगा की ज्योति की अपनी कुछ मजबूरियां हैं। मैं भी ज्योति से बेतहाशा प्यार करता हूँ। मैं ज्योति की बड़ी इज्जत करता हूँ और साथ साथ में उसकी मजबुरोयों की भी बड़ी इज्जत करता हूँ।”

यह कह कर सुनीलजी बिना कुछ और बोले अपने मायूस चेहरे को सुनीलजी की नज़रों से छुपाते हुए, बिच वाले खुले किवाड़ से अपने पलंग पर जा पहुंचे जहां ज्योति ने अपनी बाँहें फैलाकर उनको अपने आहोश में ले लिया। दोनों पति पत्नी एक दूसरे से लिपट गए।

सुनील जी हैरान से देख रहे थे की उनकी निगाहों की परवाह किये बगैर सुनीलजी ज्योति को पलंग पर लिटा कर उसके ऊपर चढ़ गए और ज्योति के गाउन के ऊपर से ही ज्योति के बड़े मम्मों को दबाने लगे।

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दोनों कमरे पूरी तरह प्रकाशित थे। सुनील ज्योति और सुनीलजी को अच्छी तरह प्यार करते हुए देख सकते थे। सुनीलजी ने ज्योति के कानों में कुछ कहा। यह सुनकर ज्योति कुछ मुस्कुरायी और उसने शरारत भरी नज़रों से सुनील की और अपना सर घुमा कर देखा।

फिर अपनी हथेली को किस कर ज्योति ने एक फूंक मार कर जैसे उस किस को सुनीलजी की दिशा में फेंकने का इशारा किया और अपने पति सुनीलजी के निचे लेटी हुई ज्योति अपने पति सुनीलजी के पयजामे में हाथ डाल कर उनका लण्ड एक हाथ में पकड़ उसे सहलाने लगी।

ज्योति के साथ दिन में हुए कई निजी सम्पर्कों की वजह से सुनीलजी काफी उत्तेजित थे। ज्योति का हाथ लगते ही सुनीलजी का लण्ड खड़ा होने लगा। ज्योति के थोड़े से हिलाने पर ही उसने अपना पूरा लंबा और मोटा आकार धारण कर लिया।

ज्योति ने फ़टाफ़ट सुनीलजी के पाजामे का नाडा खोला और अपने पति के लण्ड को आज़ाद कर उस को लण्ड प्यार से हिलाने और सहलाने लगी। सुनीलजी ने सुनीलजी की नज़रों के परवाह किए बगैर ज्योति के छाती के आगे वाली ज़िप खोल दी और ज्योति ने उन्मत्त स्तनोँ को दोनों हाथों की हथेलियाँ फैलाकर उनसे खेलने लगे।

सुनीलजी और उनकी बीबी ज्योति की उनके पलंग पर हो रही प्रेमक्रीड़ा देख कर सुनीलजी का लण्ड भी उनके पाजामे में फुंफकारने लगा। उन्हीने भी ज्योति की छाती वाली ज़िप खोल कर ज्योति के उन्मत्त स्तनोँ को अपने बंधन से आजाद किया और अपने हाथों की हथेलियों में लेकर वह भी उन से खेलने लगे।

अपने पति की हरकतें महसूस कर ज्योति नींद में से जाग गयी। जागते ही उसे समझ में आया की शराब पीने के बाद उसने कुछ गलत हरकत की थी। उसे धुंधला सा मेजर कपूर साहब का चेहरा याद आ रहा था पर आगे कुछ नहीं याद आ रहा था।

ज्योति अपने आप दोषी महसूस कर रही थी। उसे यह तो समझ में आ रहा था की कहीं ना कहीं उसने मेजर कपूर के साथ ऐसा कुछ किया था जिससे उसकी अपनी और उसके पति सुनीलजी की इज्जत को उसने ठेस पहुंचाई थी। अगर सुनीलजी वहाँ सही समय पर नहीं पहुँचते तो पता नहीं शायद मेजर कपूर ज्योति को चोद ही देते और शायद इसके लिए ज्योति ने खुद सहमति दिखाई होगी क्यूंकि वरना इतने लोगों के सामने उनकी क्या हिम्मत की वह ज्योति पर जबरदस्ती कर सके?

ज्योति अपने पति सुनीलजी की दोषी भी थी और साथ साथ में आभारी भी थी क्यूंकि उन्होंने ज्योति को उस बदनामी और अपराध से बचा लिया. और फिर ज्योति का वचन भी ना टूटा। ज्योति ने तय किया की उसको इसके लिए अपने पति को कुछ पारितोषिक (उपहार) तो देना ही चाहिए। भला एक खूबसूरत पत्नी अपने पति से अगर दिल खोल कर बढ़िया चुदाई करवाए तो उससे कोई भी पति के लिए और बढ़िया पारितोषिक क्या हो सकता है?

पर इस में एक और मुश्किल थी। सुनीलजी के और उनके कमरे के बिच वाला किवाड़ खुला जो था उपर से कमरे की बत्तियां भी जल रहीं थीं। ऐसे में अगर वह स्वच्छंद चुदाई करवाना चाहे तो ख़ास करके उन्हें चुदाई करते हुए नंगी देख सकते हैं। यह सच था की ज्योति सुनीलजी के सामने आधी से भी ज्यादा नंगी तो हुई ही थी, पर पूरी तरह से नंगी होना और चुदाई करवाते हुए किसी को दिखाना एक अलग बात थी।

हालांकि जब ज्योति यह सब सोच रही थी तब ज्योतिजी अपने पति सुनीलजी से काफी कुछ सेक्स की अठखेलियां कर रही थी। ज्योति ने एक बार उन दोनों को नंगी हरकतें करते हुए देखा भी। पर उसने फिर अपनी आँखें फिरा लीं और उनकी हरकतों को अनदेखा कर दिया। ज्योति ने अपने पति को अपने पास खींचा और बोली, “हाय राम! इन्हें तो देखो! कैसे खुल्लम खुल्ला बेशर्मी से एक दूसरे से मस्ती कर रहे हैं?”

फिर कुछ बेफिक्री की अदा दिखाते हुए ज्योति ने कहा, “वैसे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें जो करना है वह करे! आखिर वह पति पत्नी जो हैं? पर मैं ऐसा आपके साथ खुल्लमखुल्ला नहीं कर सकती और कम से कम सुनीलजी के सामने तो बिलकुल नहीं। ”

सुनीलजी ने ज्योति को अपनी बाँहों में खींचते हुए कहा, “अरे यार तुम ना? बेकार की इन चक्करों में पड़ी रहती हो। आ जाओ चलो खुल्लमखुल्ला ना सही, चद्दर के निचे तो करने दोगी लोगी ना? इनको देख कर तो मेरा लण्ड भी खड़ा हो रहा है। क्या तुम मेरा इलाज नहीं करोगी?”

ज्योति ने अपने पति सुनीलजी से कहा, “हे भगवान्! मैं क्यों नहीं करुँगी? मैं जानती हूँ की ट्रैन में मैं आपको अच्छी तरह से आनंद दे नहीं पायी। हमेशा कोई उठ जाएगा, कोई देख लेगा यह डर रहता था। पर आज मौक़ा है। मेरा भी मन आप से जबरदस्त करवाने का है। पर आपने तो यहां मेरे लिए इस किवाड़ को खुला रख कर एक मुसीबत ही खड़ी कर दी है। अब मैं आपसे कैसे खुल्लमखुल्ला करवा सकती हूँ? क्या हम यह किवाड़ बंद नहीं कर सकते?”

सुनीलजी ने अपनी बीबी की और देखा और उसे अपनी बाँहों में ले कर उसके गाउन में हाथ डालकर उसकी चूँचियों को मसलते हुए कहा, “जानेमन, हमने सब मिलकर यह तय किया था की हम दोनों कपल एक दूसरे के बिच पर्दा नहीं रखेंगे। तुमने यह वचन ज्योतिजी को भी दिया था।“

ज्योति अपने पतिकी बात सुनकर चुप हो गयी। फिर उसने अपने पति के कान में मुंह डाल कर धीरे से कहा, “ठीक है, पर लाइट तो बंद करो?”

सुनीलजी ने कहा, “देखो तुमने कहा तो मैं मान गया की चलो चद्दर के निचे चोदेंगे। अब तुम कह रही हो लाइट बंद करो! तुम्हारी शर्तें तो हर पल बढ़ती ही जाती हैं। लगता है तुम्हें चुदवाने का मूड़ नहीं है। अगर ऐसा है तो साफ़ साफ़ कहो। मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता। पर अगर लाइट बंद करने मैं गया तो वह जो तुम्हारा आर्मी वाला आशिक है ना? वह दहाड़ने लगेगा! अगर फिर भी तुम्हें लाइट बंद करनी ही हो तो तुम उठो, मैं तो नहीं जाऊंगा। तुम्ही खड़ी हो कर जाओ और जाकर खुद ही लाइट बंद करो। फिर अगर सुनीलजी गुस्सा होंगे तो मुझे मत कहना।”

ज्योति सोच में पड़ गयी। सुनीलजी को बात तो सही थी। एक बार पहले भी तो ज्योति सुनीलजी से झाड़ खा चुकी थी जब ज्योति स्विमिंग कॉस्च्यूम में सुनीलजी के सामने जाने में हिचकिचा रही थी।

कुछ सोच कर ज्योति ने कहा, “चलो ठीक है। आखिर वह मियाँ बीबी हैं तो हम भी तो मियाँ बीबी ही है ना? अगर हम एक दूसरे से सेक्स करते हैं तो कौनसी नयी बात है? हर मियाँ बीबी रात को सेक्स तो करते ही है ना?”

सुनीलजी ने ज्योति के मुंह पर हाथ रख कर कहा, “डार्लिंग! हम यहां घूमने आये हैं। अगर तुम घुमा फिरा कर ना बोलो औरअगर चुदाई की ही बात करती हो तो बोलो चुदाई करवानी है! अगर ऐसा बोलोगी तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ने वाला है? खुल्लम खुल्ला बोलो तो चोदने का और मजा आता है।”

ज्योति ने अपनी ही लाक्षणिक अदा में अपने पति को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करती मुद्रा में कहा, “अच्छा मेरे पतिदेव, मैं हारी और तुम जीते। ठीक है भाई। चलो अब मैं सेक्स नहीं चुदाई ही कहूँगी, बस? खुश? तो चलो, पर फिर मेरी चुदाई करने के लिए तैयार हो जाओ।”

सुनीलजी ने अपना खड़ा लण्ड अपनी बीबी के हाथों में देते हुए कहा, “मैं तो कब का तैयार हूँ यह देखो।”

ज्योति ने अपने पति का लण्ड सहलाते हुए कहा, “हाँ भाई, यह तो बिलकुल लोहे की छड़ की तरह खड़ा है! और अपना रस भी खूब निकाल रहा है!” फिर थोड़ी धीमी आवाज में ज्योति ने अपने पति के कानों में अपना मुंह डाल कर फुफुसाते हुए पूछा, “सच सच बताना, क्या ज्योति दीदी ने आज नहाते हुए अंगूठा दिखा क्या? उन्हें चोदने का मौक़ा नहीं मिला क्या?”

अपनी बीबी ज्योति की बात सुन कर सुनीलजी थोड़ा सा झेंप गए और बोले, “देखो डार्लिंग! सच कहूं? आज अगर मैं दस बार भी चोदुँगा ना? तो भी मेरा लण्ड ऐसा ही खड़ा रहेगा क्यूंकि चुदाई का मौसम है। मैं तो इस कैंप में आने के लिए इसी लिए तैयार हुआ था की यहां आते ही हम सब मिलकर खूब चुदाई करेंगे। शायद सुनीलजी के मन में यह बात नहीं हो तो कह नहीं सकता। पर उन दोनों को अभी चुदाई की तैयारी करते हुए देख कर ऐसा तो नहीं लगता। और तुम यह मत कहना की तुम्हें पता नहीं था।”
 
ज्योति समझ गयी की उसके पति ने भले ही सीधासाधा ना माना हो की उन्होंने ज्योतिजी को चोदा था। पर इधर उधर बात घुमाते हुए यह कबूल कर ही लिया की उन्होंने ज्योतिजी की चुदाई उस वाटर फॉल के निचे जरूर ही की थी। पर बीबी जो थी! पति ने अगर ज्योतिजी की चुदाई की तो वह जरूर उनसे कबूल करवाना चाहेगी।

ज्योति ने कहा, “तो फिर तुम भी खुल्लमखुल्ला यह क्यों कबूल नहीं कर लेते हो की तुमने उस वाटर फॉल के निचे दीदी को अच्छी तरह से चोदा था?”

सुनीलजी की बोलती बंद हो गयी। अब वह झूठ तो बोल नहीं सकते थे। उनकी उलझन देख कर ज्योति मुस्कराई और बोली, “चलो, छोडो भी, मुझे झूठ सुनना अच्छा नहीं लगेगा और सच बोलने की आपमें हिम्मत नहीं है। तो मैं कह देती हूँ की आज तुमने उस वाटर फॉल के निचे दीदी को खूब अच्छी तरह से चोदा था। अगर मेरी बात सही है तो तुम्हें कुछ बोलने की जरुरत नहीं है। और अगर मेरी बात गलत है तो तुम मना करो।”

सुनीलजी के चेहरे पर यह सुनकर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वह चुप रहे। तब ज्योति ने मुस्कराते हुए कहा, “आपका स्टैमिना मानना पडेगा मेरे पतिदेव! ज्योतिजी को आज ही चंद घंटों पहले इतना चोदने के बाद भी अगर तुम्हारा लण्ड ऐसा तैयार है तो भाई मेरे खसम का जवाब नहीं।” फिर अपने पति का लण्ड हिलाते हुए ज्योति ने अंग्रेजी झाड़ते हुए कहा, आई एम् प्राउड ऑफ़ यू डिअर हस्बैंड!”

सुनीलजी धीरे धीरे बीबी की बात सुनकर थोड़ा सम्हले और चद्दर से अपने आपको ढकने की परवाह ना करते हुए वह ज्योति के ऊपर चढ़ कर ज्योति को अपनी बाँहों में लेकर अपना मुंह ज्योति के मुंह से सटाकर अपनी बीबी को गहरा चुम्बन करने लगे।

दोनों हाथों से ज्योति की मदमस्त चूँचियों को कुछ देर तक मसलते रहे और फिर बोले, “देखो डार्लिंग! अब हम दोनों कपल मित्रता से कहीं आगे बढ़ चुके हैं। क्या यह सब हमने जानबूझ कर नहीं किया है? तुम क्या यह मानती हो की नहीं?

आज स्विमिंग करते हुए जो हुआ वह तो होना ही था। मैं तो कहता हूँ, तुम भी क्यों बेचारे सुनीलजी को तड़पा रही हो? क्या फरक पड़ता है? मैं जानता हूँ और तुम भी जानती हो की वह तुम्हें चोदने के लिए कितने बेताब हैं। हमें कौन देखेगा की हमने क्या किया?

अगर तुम यह सोच रही हो की कहीं आगे चलकर कभी हम दोनों के बिच कोई रंजिश हो जाए तो कहीं मैं तुमपर तुम्हें सुनीलजी से चुदवाने के बारे में ताना मारूंगा तो भरोसा रखो की ऐसा कभी भी नहीं होगा। इस बात का मुझ पर पूरा भरोसा रखो। मैं कभी भी यह ताना नहीं मारूंगा। बोलो क्या इसी लिए तुम अड़ी हुई हो?”

ज्योति ने अपना सर हिलाते हुए कहा, “डार्लिंग! तुमतो बात का बतंगड़ बना रहे हो। ना भाई ना, ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे मेरे लम्पट पति पर पूरा भरोसा है। मैं जानती हूँ की तुम ऐसा कुछ भी बोलोगे नहीं। तुम बोल कैसे सकते हो? जब तुम खुद ही मेरे सामने किसी और की बीबी को चोदते हो तब? और अगर तुमने कहीं गलती से भी ऐसा उल्टापुल्टा बोल दिया ना? तो मैं उसी वक्त तुम्हारा घर छोड़ कर चली जाउंगी। बात वह नहीं है।”

सुनीलजी ने पूछा, “तब बात क्या है डार्लिंग? बोलो ना? क्या तुम माँ के दिए हुए वचन से चिंतित हो? तो फिर माफ़ करना, पर तुम्हारी माँ कहाँ यहां आकर देखने वाली है की तुमने उसका वचन रखा या तोड़ा?”

अपने पति की बात सुनकर ज्योति अपने पति से एकदम अलग हो गयी। और कुछ रंजिश और कुछ गुस्से में बोली, “देखो डार्लिंग! मैं एक बात साफ़ कर देती हूँ। आपने और सुनीलजी ने अगर मिलकर बीबी बदल कर चोदने की बात को अगर एग्री किया है तो बोलो। तुमने मुझे पहले से ही कहा था की ऐसी बात नहीं है…

मैंने भी आपको पहले से ही कहा था की मैं कोई नैतिकता की देवी नहीं हूँ। शादी से पहले मैंने चुदवाया तो नहीं था पर जवानी के जोश में दो लड़कों का लंड जरूर हिलाया था और उनका माल निकाला भी था। मैं तुम्हें इसके बारे में बता चुकी हूँ। मैंने तुम्हें यह भी बताया था की सुनीलजीने उस सिनेमा हॉल में अपना लण्ड मुझसे छुवाया था और उन्होंने मेरी ब्रेअस्ट्स दबायी भी थीं…

आज झरने में स्विमिंग सीखते हुए जब मैं डूबने लगी थी तब अफरातफरी में आज फिर उनका लण्ड मेरे हाथों में आ गया था। उन्होंने जाने अनजाने में मेरी ब्रेअस्ट्स भी दबायी थीं। बल्कि कुछ पल के लिए तो मैं भी अपना होशो हवास खो बैठी थी पर उन्होंने मुझे सम्हाला और कहा की वह मेरी माँ का दिया हुआ वचन मुझे तोड़ने नहीं देंगे। वह एक सच्चे दिलके मालिक है और मैं भी एक राजपूतानी हूँ। मैंने तुम्हें साफ़ कर बता दिया है और अब हम इस के बारे में बात ना करें तो ही अच्छा है।”

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ज्योति ने अपने पति को झाड़ तो दिया पर उनकी बातें सुनकर वह बहुत गरम हो गयी थी। उसकी चूत में से रस चू ने लगा था। वह सुनीलजी से तो चुदवा नहीं सकती थी पर अपने पति से जरूर चुदवा सकती थी। पति की उकसाने वाली बातें सुनकर उसकी चुदवाने की इच्छा तेज हो गयी। सुनीलजी तो अपना लोहे की छड़ जैसा लण्ड लेकर तैयार ही थे।

तब अचानक ही ज्योति को ज्योतिजी के कराहने की आवाज सुनाई दी। ज्योति ने ना चाहते हुए भी सुनीलजी और ज्योति के कमरे की और मुड़कर देखा तो पाया की सुनीलजी दोनों घुटनों पर बैठ कर अपनी बीबी ज्योतिजी पर सवार हुए थे और अपना मोटा लंबा लौड़ा बेचारी ज्योतिजीकी छोटी सी चूत में पेले जा रहे थे।

ज्योति सुनीलजी और ज्योतिजी की चुदाई देखती ही रह गयी। चाहते हुए भी वह अपनी नजर वहाँ से हटा नहीं सकी। सुनीलजी का जोश और सुनीलजी के चिकने प्रकाश में चमकते हुए लण्ड को ज्योतिजी की रस से लथपथ चूत में से अंदर बहार होते हुए देख ज्योति पर जैसे कोई तांत्रिक सम्मोहिनी का वशीकरण किया गया हो वैसे ज्योति एकटक ज्योतिजी और सुनीलजी की खुल्लमखुल्ला चुदाई देखने लगी। वह भूल गयी की उसका पति का फुला हुआ चिकना लण्ड उसकी हथेली में फर्राटे मार रहा था।

वैसे तो सुनीलजी ने चुदाई के कुछ अश्लील वीडियोस ज्योति को दिखाए थे। पर यह पहली बार था की ज्योति कोई मर्द और औरत लाइव चुदाई देख रही थी। उन वीडियो को देख कर ज्योति को इतनी उत्तेजना महसूस नहीं हुई थी जितनी उस समय उसकी दीदी की ज्योति के अपने गुरु और प्रेमी सुनीलजी को चोदते हुए देख कर हो रही थी। ज्योति का रोम रोम रोमांच से इस ज़िंदा प्रत्यक्ष साकार चुदाई देख कर कम्पन महसूस कर रहा था।

ज्योति ने महसूस किया की ज्योतिजी की छोटीसी चूत में जब सुनीलजी अपना घड़े जैसा लण्ड घुसाते थे तो बेचारी छोटीसी जयोतिजी का पूरा बदन काँप उठता था।

ज्योति को सुनीलजी और ज्योतिजी की चुदाई को मन्त्र मुग्ध हो कर देखते हुए जब सुनीलजी ने देखा तो ज्योति को हिलाकर बोले, “तुम तो अपनी चुदाई उनको दिखाना नहीं चाहती थी, पर अब उनको चोदते हुए इतने ध्यान से देखने में तुम्हे कोई परहेज क्यों नहीं है? अरे भाई अगर तुम उनकी चुदाई देख सकती हो तो वह तुम्हारी चुदाई क्यों नहीं देख सकते? यह कहाँ का न्याय है?”

ज्योति ने जबरन अपनी नजरें सुनीलजी के लण्ड पर से हटायीं और अपने पति की और देख कर मुस्करायी और बोली, “तुम मर्द लोग बड़े ही बेशर्म हो। देखो तो; ना तो तुम्हें सुनीलजी और दीदी की चुदाई देखने में कोई लज्जा आ रही है और ना तो सुनीलजी को अपनी बीबी को हमारे सामने चोदने में कोई हिचकिचाहट महसूस हो रही है।”

सुनीलजी ने कहा, “डार्लिंग, एक बात बताओ। क्या हम सब नहीं जानते की हर मर्द लगभग हर रात को अपनी बीबी को चोदता है? क्या हर औरत अपने मर्द से रात को चुदवाती नहीं है? जब यह सब साफ़ साफ़ सब जानते हैं तो फिर अपनों के सामने ही अगर हम अपनी अपनी बीबी को चोदे तो यह बताओ की तुम्हें क्या हर्ज है? तुम्ही ने तो कबूल किया था की तुम तुम्हारी दीदी और सुनीलजी से कोई पर्दा नहीं करोगी। तुम ने ज्योतिजी से यह वादा भी किया था की तुम सुनीलजी अगर तुम्हारा बदन छुएंगे तो कोई विरोध नहीं करोगी। तब अगर यह मियाँ बीबी चुदाई करते हैं तो तुम्हें क्यों आपत्ति हो रही है?”

ज्योति की नजर फिर बरबस सुनीलजी और ज्योतिजी की चुदाई की और चली गयी। इस बार ज्योति ने देखा की सुनीलजी ने भी ज्योति की और देखा। ज्योति को समझ नहीं आ रहा था की वह गुस्साए या मुस्काये। सुनीलजी ने अपनी बीबी की चूत में लण्ड पेलते हुए ही ज्योति की और देखा और बड़ी ही सादगी से मुस्कराये।

ज्योति को शक हुआ की शायद उनकी मुस्कान में कुछ रंजिश की झलक भी दिख रही थी। ज्योति यह जानती थी की उस समय कहीं ना कहीं सुनीलजी के मन में यह भाव भी हो सकता है की काश वह उस समय उनकीअपनी बीबी ज्योति को नहीं बल्कि सुनीलजी की बीबी ज्योति को चोद रहे होते। यह सोचते ही ज्योति काँप उठी।

सुनीलजी के लण्ड को ज्योतिजी की छोटी सी चूत में घुसते समय हर एक बार ज्योति जी की जो कराहट उनके मुंह से निकल जाती थी उससे ज्योति को अच्छा खासा अंदाज हो रहा था की ज्योतिजी चुदाई के आनंद के साथ साथ काफी मीठा दर्द भी बर्दाश्त कर रही होंगी। वह दर्द कैसा होगा? यह तो जब ज्योति सुनीलजी से चुदवायेगी तब ही उसे पता लगेगा। ज्योति अब यह अच्छी तरह जान गयी थी की वह इस जनम में तो नहीं होगा।

ज्योतिजी भी अपने पति का घोड़े जैसा लण्ड लेकर काफी उत्तेजित लग रहीं थीं। अपने पति के साथ साथ ज्योति ज्योतिजी का स्टैमिना देख कर भी हैरान रह गयी। ज्योतिजी ने सुनीलजी से उस दोपहर चुदवाया था यह तो स्थापित हो चुका था। और ज्योति यह भी जानती थी की उसके पति कैसी जबरदस्त चुदाई करते हैं। जब वह चोदते हैं तो औरत की जान निकाल लेते हैं।

ज्योति को इसका पूरा अनुभव था। ज्योति यह भी जानती थी की ज्योतिजी की चूत का द्वार एकदम छोटा था। सुनीलजी से चुदवाने के बाद अगर वह सुनीलजी के इतने मोटे लण्ड से चुदवा रही थी तो मानना पडेगा की ज्योतिजी की दर्द सहन करने की क्षमता बहुत ज्यादा थी।

ज्योति ने अपने मन ही मन में गहराई से सोचने लगी। आखिर उसके पति सुनीलजी की बात तो सही थी। हर औरत अपने मर्द से चुदवाती तो है ही। हर मर्द भी लगभग हर रात को अपनी बीबी को चोदता ही है। यह तो पूरी दुनिया जानती है, चाहे वह इस बात को किसी से ना कहे। सुनीलजी भी जानते थे की सुनीलजी ज्योति को कैसे चोदते थे। बल्कि उस रात ट्रैन में तो जरूर सुनीलजी ने ज्योति और सुनील की चुदाई कम्बल के अंदर होती हुई देखि भले ना हो पर महसूस तो जरूर की होगी।

जब उस समय सुनीलजी और ज्योतिजी की चुदाई ज्योति बड़ी ही बेशर्मी से खुद देख रही थी तो उसे कोई अधिकार नहीं था की वह सुनीलजी और ज्योतिजी से अपनी चुदाई छुपाये। क्या उन दोनों को भी ज्योति की चुदाई देखने का अधिकार नहीं है? ज्योति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।

ज्योति ने आखिर में हार कर अपने पति के कानों में बोला, “सुनीलजी, आपसे ना? बहस करना बेकार है। देखिये मैं आपकी बीबी हूँ। मेरी लाज की रक्षा करना आपका कर्तव्य है। अगर आप ही मेरी इज्जत नीलाम करोगे तो फिर मैं कहाँ जाउंगी?”

सुनीलजी अपने मन में ही मुस्काये। उनको महसूस हुआ की उस रात पहेली बार उनकी बीबी ज्योति चुदाई के मामले में उनके साथ एक कदम और चलने के लिए मानसिक रूप से तैयार हुई थी।

सुनीलजी ने एक चद्दर ज्योति पर डाल दी और उसका गाउन निकाल दिया और बोले, “क्या तुम्हें कभी भी ऐसा लगा की सुनीलजी, मैं और ज्योतिजी हम तीनों में से कोई भी तुम्हारी इज्जत नहीं करता? क्या तुम्हें ऐसा शक है की अगर मैं तुम्हें चोदुँगा तो तुम्हारी इज्जत हम तीनों की नजर में कम हो जायेगी? अरे भाई, हम पति पत्नी हैं। अगर हम चुदाई करती हैं तो तुम्हारी इज्जत कैसे कम होगी?”

ज्योति ने अपने पति की बात का कोई जवाब नहीं दिय। ज्योति समझ गयी थी की उसके पति उसको तर्क में तो जितने नहीं देंगे। ज्योति खुद सुनीलजी और ज्योतिजी की चुदाई देख कर काफी उत्तेजित हो गयी थी। उनकी खुल्लम खुली चुदाई देखकर उसकी हिचकिचाहट कुछ तो कम हुई ही थी, पर फिर भी जब तक सुनीलजी ज्यादा आग्रह नहीं करंगे तो भला वह कैसे मान सकती है? आखिर वह एक मानिनी भी तो है? उसको दिखावा करना पडेगा की वह तो राजी नहीं थी, पर पति की जिद के आगे वह करे भी तो क्या करे?

ज्योति इस उलझन में थी की तब अचानक ही उन्हें सुनीलजी की हाँफती हुए आवाज सुनाई दी। वह बोले, “सुनीलजी और ज्योति, अब ज्यादा बातचीत किये बिना जो करना है जल्दी करो। कल जल्दी सुबह चार बजे ही उठ कर पांच बजे मैदान पर पहुँचना है।”

ज्योति ने सुनीलजी के पलंग की और देखा तो पाया की सुनीलजी पूरी तरह जोशो खरोश से ज्योतिजी को चोद रहे थे और शायद उनका मामला अब लास्ट स्टेज पर पहुंचा हुआ था। सुनीलजी कस कस के ज्योतिजी की चूत में अपना लण्ड पेले जा रहे थे। पुरे कमरे में उनकी चुदाई की “फच्च, फच्च” की आवाज गूंज रही थी।

जैसे ही सुनीलजी का लण्ड पूरा ज्योतिजी की चूत में घुस जाता था और उनका अंडकोष ज्योतिजी की गांड पर फटाक फटाक थपेड़ मार रहा था, तो उस थपेड़ की “फच्च फच्च” आवाज के साथ ज्योतिजी की एक कराहट और सुनीलजी का “उम्फ… उम्फ…” की आवाज भी उस आवाज में शामिल होजाती थी।

उनकी चुदाई की तीव्रता के कारण उनका पलंग इतना सॉलिड होते हुए भी हिल रहा था। ज्योति ने देखा की ज्योतिजी की खूबसूरत चूँचियाँ सुनीलजी के धक्के के कारण ऐसी हिल रहीं थीं जैसे तेज हवा में पत्ते हिल रहे हों।
 
सुनीलजी की चेतावनी सुनकर सुनीलजी ने अपनी बीबी ज्योति की टांगें फैलायीं और अपनी उँगलियों से ज्योति की चूत के दोनों होँठों को अलग कर अपना लण्ड ज्योति के प्रेम छिद्र पर टिकाया। ज्योति ने भी अपना हाथ अपनी टांगों के बिच हाथ डाल कर अपने पति का लण्ड अपनी उँगलियों के बिच टिकाया और अपना पेंडू ऊपर कर अपने पति को चोदने की शुरुआत करने के लिए धक्का मारने का इशारा किया।

जैसे सुनीलजी ने चुदाई की शुरुआत की तो हर एक धक्के के बाद धीरे धीरे सुनीलजी का लण्ड उनकी बीबी ज्योति की चूत में थोड़ा थोड़ा कर अंदर अपना रास्ता बनाने लगा। सुनीलजी को आज दो दो महोतरमाओं को चोदने का सुअवसर प्राप्त हो रहा था।

दोनों की चूत में भी काफी फर्क था। ज्योतिजी की चूत काफी टाइट थी। जबकि उनकी बीबी ज्योति की चूत रसीली और नरम थी जिससे उनके लण्ड अंदर घुसने में ज्यादा परेशानी नहीं होती थी। ज्योतिजी की चूत उनको लण्ड को इतना टाइट पकड़ती थी की उनका लंड कभी ज्यादा दब जाता तो कभी वह दबाव कम हो जाता था। इसके कारण ज्योति को चोदते हुए उनके जहन में काफी उत्तेजना और रोमांच फ़ैल जाता था।

ज्योति की चूत की तो बात ही कुछ और थी। रसीली और लचकदार होने के कारण उन्हें ज्योति को चोदने में खूब आनंद मिलता था। उनका लण्ड ज्योति के रस में सराबोर रहता था। पर फिर भी उनके लण्ड को ज्योति की चूत अपनी दीवारों में जकड कर रखती थी।

ज्योति को चोदने में सबसे ज्यादा मजा ज्योति के चेहरे के हावभाव देखने में सुनीलजी को मिलता था। ज्योति अपनी चुदाई करवाते समय उसमें इतनी मग्न हो जाती थी की उसे उस समय अपनी चूत में हो रहे उन्माद के अलावा कोई भी बाह्य चीज़ का ध्यान नहीं रहता था।

कोई भी मर्द को औरत को चोदते समय अगर औरत चुदाई का पूरा आनंद लेती है तो खूब मजा आता है। अगर औरत चुदाई करवाते समय खाली निष्क्रिय बन पड़ी रहती है तो मर्द का आनंद भी कम हो जाता है। ज्योति चुदाई करवाते समय यह शेरनी की तरह दहाड़ने लगती थी। उसके पुरे बदन में चुदाई की उत्तेजना फ़ैल जाती थी।

जब एक मर्द एक औरत चोदता है और उस चुदाई को औरत एन्जॉय करती है तो मर्द को बहुत ज्यादा आनंद होता है। अक्सर हर मर्द की यह तमन्ना होती है की औरत भी उस चुदाई का पूरा आनंद ले। चोदते समय अगर औरत चुदाई का आनंद लेती है लेती है और उस उत्तेजना का आनंद जब औरत के चेहरे पर दिखता है तो मर्द का चोदने का आनंद दुगुना हो जाता है। क्यूंकि मर्द को तब अपनी चुदाई सार्थक हुईं नजर आती है।

ज्योति में वह ख़ास खूबी थी। सुनीलजी जब जब भी ज्योति को चोदते थे तब ज्योति के चेहरे पर उन्माद और उत्तेजना का ऐसा जबरदस्त भाव छा जाता था की सुनीलजी का आनंद कई गुना बढ़ जाता था। उनका पुरुषत्व इस भाव से पूरा संतुष्ट होता था। उन्हें महसूस होता था की वह अपनी चुदाई करने की कला से अपने साथीदार को (ज्योति को) कितना अद्भुत आनंद दे पा रहे हैं। अक्सर कई औरतें अपने मन के भाव प्रकट नहीं करतीं और पुरुष बेचारा यह समझ नहीं पाता की वह अपनी औरत को वह आनंद दे पाता है या नहीं।

ज्योतिजी की कराहटों से कमरा गूंजने लगा। जिस तरह ज्योतिजी कराह रहीं थीं यह साफ़ था की वह अपनी चरम पर पहुँच रहीं थीं। फिर उसमें सुनीलजी की भी आवाज जुड़ गयी। सुनीलजी ज्योति के दोनों स्तनों को कस के पकड़ कर अपनी भौंहें सिकुड़ कर ज्योतिजी की चूत में अपना लण्ड पेलते हुए बोलने लगे, “ज्योति, आह्हः… क्या बढ़िया पकड़ के रखती हो…. आह्हः…. ओह्ह्ह….” करते हुए सुनीलजी के लण्ड से ज्योति जी की चूत की गुफा में जोरदार फ़व्वार्रा छूट पड़ा।

उसके साथ साथ ज्योति के मुंह से भी हलकी सी चीख निकल पड़ी। “सुनीलजी, कमाल है! क्या चोदते हो आप। ओह्ह्ह… आअह्ह्ह…. बापरे……”

कुछ ही देर में दोनों मियाँ बीबी पलंग पर निढाल होकर गिर पड़े। ज्योति ने देखा की सुनीलजी का वीर्य ज्योतिजी की चूत से बाहर निकल रहा था। सुनीलजी के वीर्य की तादाद इतनी ज्यादा थी की ज्योतिजी की चूत इतना ज्यादा वीर्य समा नहीं पायी। ज्योति की जान हथेली में आ गयी। अगर सुनीलजी को कभी ज्योति को चोदने का अवसर मिल गया तो जरूर इतने ज्यादा वीर्य से वह ज्योति को गर्भवती बना सकते हैं।

उधर सुनीलजी ज्योति की चूत में अपना लण्ड पेलने में लगे हुए थे। सुनीलजी ने ज्योति को चद्दर के अंदर ढक कर रखा हुआ था। खुद सारे कपडे निकाल कर ज्योति का गाउन भी निकाल कर दो नंगे बदन एक दूसरे को आनंद देने में लगे हुए थे। ज्योति अपने पति को ज्योतिजी से कुछ ज्यादा आनंद दे सके इस फिराक में थी। उसे पता था की उसी दोपहर को पति सुनीलजी ने कस के ज्योतिजी की चुदाई की थी।

सुनीलजी ने ज्योति को चोदने की रफ़्तार बढ़ाई। ज्योति के चेहरे पर बदलते हुए भाव देखते ही सुनीलजी का जोश बढ़ने लगा। सुनीलजी के जोर जोर से धक्के मारने के कारण ऊपर की चद्दर खिसक गयी और ज्योति और सुनील ज्योतिजी और सुनीलजी के सामने नंगे चुदाई करते हुए दिखाई दिए। ज्योति की आँखें बंद थीं उसे नहीं पता था की वह सुनीलजी को नंगी सुनीलजी से चुदवाती दिख रहीं थीं। ज्योति को पहली बार बिलकुल नंग धडंग देख कर सुनीलजी देखते ही रह गए।

ज्योति की चुन्चियाँ दबी हुई होने के कारण पूरी तरह साफ़ दिख नहीं रहीं थीं। ज्योति की कमर का घुमाव और उसके सपाट सतह के निचे सुनीलजी के बदन से ढकी हुई ज्योति की चूत देखने को सुनीलजी बेताब हो रहे थे।

ज्योति की सुडौल नंगीं जांघें इतनी खूबसूरत नजर आ रहीं थीं की बस! सुनीलजी ने गहरी साँस लेते हुए लाचारी में अपनी नजर ज्योति के नंगे बदन से हटाई।

सुनीलजी की तेज रफ़्तार से पेंडू उठाकर मुकाबला कर रही ज्योति को कहाँ पता था की उसे चुदवाने का नजारा सुनीलजी और ज्योतिजी बड़े प्यारसे ले रहे थे? सुनीलजी जब वीर्य छोड़ने के कगार पर पहुँचने वाले ही थे ज्योति की आँखें खुलीं और उसने देखा की उनको ढक रही चद्दर हट चुकी थी और वह और उसके पति के नंगे बदन और उनकी चुदाई सुनीलजी और ज्योतिजी प्यार से देख रहे थे।

ज्योति को उस समय कोई लज्जा या छोटापन का भाव नहीं महसूस हुआ। आखिर चुदाई करना औरत और मर्द का धर्म है। भगवान् ने खुद यह भाव हम सब में दिया है।

औरत के बगैर मर्द कैसे रह सकता है? दुनिया को चलाने के लिए औरत का होना अनिवार्य है। अपने पसंदीदा मर्द से चुदवाना औरत के लिए सौभाग्य की बात है।

ज्योति ने भी हिम्मत कर के ज्योतिजी और सुनीलजी की आँख से आँख मिलाई और मुस्कुरा दी। यह पहला मौका था जब ज्योति ने चुदाई को इतना सहज रूप में स्वीकार किया था। सुनीलजी ने आँख मार कर ज्योति को प्रोत्साहन दिया की चिंता की कोई बात नहीं थी।

इससे ज्योति को यह सन्देश भी मिला की सुनीलजी ज्योति की चुदाई करवाते हुए देख कर भी उतनी ही इज्जत करते थे जितनी की पहले करते थे। ज्योतिजी जो की अपनी खुद की चुदाई करवाके निढाल पड़ी हुई थीं, उन्होंने भी उड़ती हुई किस देकर ज्योति की खुल्लमखुल्ला चुदाई को सलाम किया।

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सुनीलजी से चुदवाते हुए भी ज्योति को जंगली कुत्तों की दहाड़ने की डरावनी आवाजें सुनाई देती थीं। ज्योति ने जब सुनीलजी से इसके बारे में पूछा तो सुनीलजी ने सुनीलजी से हुई बात के बारे में ज्योति को बताया।

सुनीलजी ने कहा, “सुनीलजी को शंका है की दुश्मन या आतंकवादियों के जंगली कुत्ते जिनको इंग्लिश में हाउण्ड कहते हैं उनको कुछ ख़ास काम के लिए तैनात किया हो, ऐसा हो सकता है। सुनीलजी को आशंका थी की हो सकता है की अगले दो या तीन दिनों में कुछ ना कुछ दुर्घटना हो सकती है…

पर मुझे लगता है की सुनीलजी इस बात को शायद थोड़ा ज्यादा ही तूल दे रहे हैं। मुझे नहीं लगता की दुश्मन में इतनी हिम्मत है की हमारी ही सरहद में घुसकर हमारे ही बन्दों को कैदी बनाने का सोच भी सके। यह आवाज जंगली भेड़ियों की भी हो सकती है।”

सुनीलजी की बात से सेहमी हुई ज्योति बिना कुछ बोले सुनीलजी के एक के बाद एक धक्के झेलती रही। सुनीलजी ने ज्योति की टांगें अपने कंधे पर रखी हुई थी। गाँड़ के निचे रखे तकिये के कारण ज्योति की प्यारी चूत थोड़ी सी ऊपर उठी हुई थी जिससे सुनीलजी का लंड बिलकुल उनकी बीबी ज्योति की चूत के द्वार के सामने रहे और पूरा का पूरा लण्ड ज्योति की चूत में घुसे।

सुनीलजी धीमी रफ़्तार से ज्योति की चूत में अपना लण्ड पेले जा रहे थे। रफ़्तार जरूर धीमी थी पर धक्का इतना तगड़ा होता था की उनका पूरा पलंग समेत ज्योति का पूरा बदन धक्के से हिल जाता था।

ज्योति के भरे हुए बूब्स सुनीलजी के लगाए हुए धक्के के कारण हवा में उछल जाते और फिर जब सुनीलजी का लण्ड चूत के सिरे तक चला जाता और एक पल के लिए रुक जाते तो वापस गिर् कर अपना आकार ले लेते। कामोत्तेजना के कारण ज्योति की निप्पलेँ पूरी तरह से फूली हुई थीं।

निप्पलेँ थोड़े ऊपर उठे हुए फुंसियों से भरी हुई हलकी सी चॉकलेटी रंग की गोल आकार वाली एरोलाओं पर ऐसी लग रहीं थीं जैसे एक छोटा सा डंडा मनी प्लाँट को टिकाने के लिए माली लोग रखते हैं।

सुनीलजी ने अपनी बीबी के उछलते हुए स्तनों को देखा तो उस पर टिकी हुई निप्पलोँ को अपनी उँगलियों में पिचकाते हुए उत्तेजित हो गए और ज्योति के दोनों स्तनोँ को जोर से दबा कर धक्के मार कर चुदाई का पूरा मजा लेने में जुट गए।

ज्योति और सुनीलजी सुनील और ज्योति की चुदाई का साक्षात दृश्य पहली बार देख रहे थे। हकीकत में ऐसा कम ही होता है की आपको किसी और कपल की चुदाई का दृश्य देखने को मिले।

हालांकि उनको सुनीलजी का लण्ड और ज्योति की चूत इतनी दूर से ठीक से दिख नहीं रही थी पर जो कुछ भी अच्छी तरह से दिख रहा था वह वाकई में देखने लायक था। सुनीलजी ने भी देखा की खास तौर से ज्योतिजी ज्योति की चुदाई बड़े ध्यान से देख रही थी।

शायद वह यह देखना चाहती हो की सुनीलजी अपनी बीबी की चुदाई भी वैसे ही कर रहे थे जैसे की सुनीलजी ने कुछ ही घन्टों पहले ज्योति की की थी। यह तो स्त्री सुलभ इर्षा का विषय था। कहते हैं ना की “भला तुम्हारी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफ़ेद कैसे?”

जाहिर है ज्योति की चूत की पूरी नाली में चुदाई के कारण हो रहे कामुक घर्षण से ज्योति को अद्भुत सा उन्माद होना चाहिए था। पर सुनीलजी की बात सुनकर उसका मन कहीं और उड़ रहा था। वह जाँबाज़ सुनीलजी को मन ही मन याद कर रही थी।

हालांकि सुनीलजी का लण्ड सुनीलजी के लण्ड से उन्नीस बिस हो सकता है, पर काश उस समय वह लण्ड सुनीलजी का होता जिससे सुनीलजी चोद रहे थे ऐसी एक ललक भरी कल्पना ज्योति की चूत में आग लगा रही थी।

सुनीलजी के बदन की अकड़न से अपने पति का वीर्य छूटने वाला था यह ज्योति जान गयी। उसे भी तो अपना पानी छोड़ना था। वह अपने पति सुनीलजी के ऊपर चढ़ कर सुनीलजी को चोदना चाहती थी जिससे वह भी फ़ौरन अपने पति के साथ झड़ कर अपना पानी छोड़ सके। पर उसे डर था की उधर सुनीलजी उसे चुदाई करते हुए देख लेंगे।

एक होता है औरत को नंगी देखना। दुसरा होता है किसी नंगी औरत की चुदाई होते हुए देखना। दोनों में अंतर होता है। और यहां तो ज्योति सुनीलजी को चौदेगी। वह तो एक और भी अनूठी बात हो जाती है।

ज्योति का शर्माना जायज था। फिर भी ज्योति ने अपने पति से हिचकिचाते हुए धीरे से कहा, “ऐसा लगता है की तुम्हारा अब छूटने वाला है। थोड़ा रुको। मुझे भी तो मौका दो।”

सुनीलजी ने फ़ौरन कहा, “आ जाओ। मेरे पर चढ़ कर मुझे चोदो। दिखादो सबको की सिर्फ मर्द ही औरत को चोदता है ऐसा नहीं है, औरत भी मर्द को चोद सकती है।”

ज्योति जब हिचकिचाने लगी तब सुनीलजी ने कहा, “यही तो कमी है औरतों में। मर्दों के साफ़ साफ़ आग्रह करने पर भी औरतें अपनी सीमा से बाहर नहीं आतीं। फिर कहतीं हैं मर्द जात ने उन को दबा रखा है? यह कहाँ का न्याय है?”

ज्योति ने जब यह सूना तो उसे जोश आया। वह चद्दर फेंक कर बैठ खड़ी हुई और अपने दोनों घुटनें अपने पति की दोनों टाँगों के बाहर की तरफ रख अपने घुटनों पर अपना वजन लेते हुए सुनीलजी के ऊपर चढ़ बैठी।

सुनीलजी ने जब ज्योति को बिस्तर में अपने पति से चुदाई करवाती पोजीशन में से उठ कर अपने पति को चोदने के लिए पति के ऊपर चढ़ते हुए देखा तो वह ज्योति की हिम्मत देख कर दंग रह गए। पहली बार उन्होंने उस रात अपनी रातों नींद हराम करने वाली चेली को पूरा नंगी देखा।

ज्योति के अल्लड़ स्तन उठे हुए जैसे सुनीलजी को पुकार रहे थे की “आओ और मुझे मसल दो।”

ज्योति की पतली कमर और बैठा हुआ पेट का हिस्सा और उसके बिलकुल निचे ज्योति की चूत की झांटों की झांकी सुनीलजी देखते ही रह गए। अपनी प्रियतमा को उसके ही पति को चोदते देख उन्हें सीने में टीस सी उठी। पर क्या करे?

ज्योति ने अपने पति का लण्ड अपनी चूत में डाल कर ऊपर से बड़े प्यार से अपने पति को चोदना शुरू किया। उसका ध्यान सिर्फ अपनी चूत में घुसे हुए सुनीलजी के लण्ड का ही था।

हालांकि लण्ड उसके पति का ही था पर ज्योति की एक परिकल्पना थी की जैसे वह लण्ड सुनीलजी का था जिसे वह अपनी चूत में घुसा कर चोद रही थी। इस कल्पना मात्र से ही उसकी चूत में से उसका रस जोरशोर से रिस ने लगा और जल्द ही वह अपने चरम के कगार पर जा पहुंची।

कुछ ही मिनटों में सुनीलजी और ज्योति एक साथ झड़ गए। ज्योति के मुंह से सिसकारी निकली जो उसके चरम की उत्तेजना को दर्शाता था। सुनीलजी के मुंहसे “आहह…” निकल पड़ी।

दोनों मियाँ बीबी झड़ने के बाद ढेर हो गए। ज्योति जैसे अपने पति पर घुड़सवारी कर बैठी थी वैसी ही अपने पति का लण्ड अपनी चूत में रखे हुए उनपर लुढ़क पड़ी।

कुछ देर तक पति के ऊपर पड़ी रहने के बाद, चुदाई से थकी हुई ज्योति ऊपर से हट कर पति के बाजु में जाकर गहरी नींद सो गयी। उसके सपने में सारी रात जंगली कुत्तों के चीखने की आवाजें ही सुनाई दे रहीं थीं।

सुबह चार बजे ही सुनीलजी का पहाड़ी आवाज सारे हॉल में गूंज उठा। वह निढाल सो रहे सुनीलजी और ज्योति पर चिल्ला रहे थे। “अरे सुनीलजी उठिये! ४ बजने वाले हैं। देखिये अब हमें सेना के टाइम टेबल के हिसाब से चलना पडेगा। रात को आपको जो भी करना हो उसे जल्द निपटा कर सोना पडेगा। ऐसे देर तक लगे रहोगे तो जल्दी उठ नहीं पाओगे।”

सुनीलजी की दहाड़ सुनकर ज्योति और सुनीलजी चौंक कर जाग उठे। ज्योति अपने कपडे पहनना तक भूल गयी थी। जैसे ही उसने सुनीलजी की दहाड़ सुनी ज्योति ने बिस्तरे में ही कम्बल अपनी छाती के ऊपर तक खिंच लिया और बैठ गयी।

सुनीलजी हमेशा की तरह सुबह बड़ी जल्दी उठ कर तैयार हो कर अपने सुसज्जित सेना के यूनिफार्म में आकर्षित लग रहे थे। ज्योति खड़ी होने की स्थिति में नहीं थी। वह कम्बल के निचे नंगी थी। देर रात तक चुदाई कराने के बाद उसे कपडे पहनने का होश ही नहीं रहा था।

सुनीलजी ने पजामा पहन लिया था सो कूद कर खड़े हो गए और बाथरूम की और भागे। सुनीलजी ने ज्योति को देखा और कुछ बोलने लगे थे पर फिर चुप हो गए और घूम कर कैंप के दफ्तर की और चलते बने। जैसे ही सुनीलजी आँखों से ओझल हुए की ज्योति ने भाग कर बाहर का दरवाजा बंद किया और फ़टाफ़ट अपना गाउन पहन लिया।

ज्योतिजी वाशरूम में थीं। वह जानती थी की जब सुनीलजी के साथ आर्मी से सम्बंधित कोई प्रोग्राम होता है तो वह देर बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते।

ज्योति ने अपने कपडे तैयार किये और सुनीलजी के बाहर आने का इंतजार करने लगी। कुछ ही देर में तीनों: ज्योतिजी, सुनीलजी और ज्योति कैंप के मैदान में कसरत के लिए पहुंच गए।

सब लोग कतार में लग गए। सुनीलजी कहीं नजर नहीं आ रहे थे। प्राथमिक कसरतें करने के बाद सब को दरी पर बैठने को कहा गया। जो उम्र में बड़े थे उनके लिए कुछ कुर्सियां रखीं हुई थीं।

सब के बैठने के बाद कर्नल सुनीलजी भी वहाँ उपस्थित हुए। उन्होंने सब को आंतांकियों की गतिविधियों के बारेमें कहा और सबको सतर्क रहने की चेतावनी भी दी। यदि कोई सूरत में किसी का आतंकवादियों से या उनकी हरकतों से सामना होता है तो कैसे आतंकवादियों से मुकाबला किया जा सकता है उसके बारे में भी उन्होंने कुछ जरुरी हिदायतें दीं।

सबको कैंटीन में नाश्ते के लिए कहा गया। नाश्ते की समय सीमा 30 ममिनट दी गयी। सब ने फ़टाफ़ट नाश्ता किया। अगला कार्यक्रम था पहाड़ो में ट्रैकिंग करना।

याने पहाडोंमें उबड़ खाबड़ लंबा रास्ता लकड़ी के सहारे चल कर तय करना। करीब दस किलोमीटर दूर एक आर्मी का छोटा सा कैंप बना हुआ था जहां दुपहर के खाने की व्यवस्था थी। सबको वहाँ पहुँचना था।

ज्योति ने सिल्हटों वाली फ्रॉक पहनी थी। उस में ज्योति की करारी जाँघें कमाल की दिख रहीं थीं। फ्रॉक घुटनोँ से थोड़ी सी ऊपर तक थीं। देखने में वह बिलकुल अश्लील नहीं लग रही थी। ऊपर ज्योति ने सफ़ेद रंग का ब्लाउज पहना था और अंदर सफ़ेद रंग की ब्रा थी।

उसका परिवेश निहायत ही साधारण सा था पर उसमें भी ज्योति का यौवन और रूप निखार रहा था। ज्योति की गाँड़ का घुमाव और स्तनोँ का उभार लण्ड खड़ा कर देने वाला था।

ज्योतिजी ने कुछ लम्बी सी काप्री पहन राखी थी। घुटनों से काफी निचे पर यदि से काफी ऊपर वह काप्री में ज्योतिजी की घुमावदार गोल गाँड़ का घुमाव सुहावना लग रहा था।

ऊपर ज्योतिजी ने मर्दों वाला शर्ट कमीज पहन रखा था। उस शर्ट में भी उनके स्तनोँ का उभार जरासा भी छुप नहीं रहा था। दोनों कामिनियाँ ज्योतिजी और ज्योति गजब की कामिनी लग रहीं थीं। जब वह मैदान में पहुंचीं तो सबकी आँखें उन दोनों की चूँचियाँ और गाँड़ पर टिक गयीं थीं।

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कैंटीन में ज्योति और ज्योतिजी की मुलाक़ात नीतू से हुई। उसके पति ब्रिगेडियर खन्ना साहब कहीं नजर नहीं आ रहे थे। नीतू ने घुटनों तक पहुंचता हुआ स्कर्ट पहना था।

उसकी करारी जाँघें खूबसूरत और सेक्सी लग रहीं थीं। ऊपर उसने सिलवटों वाला छोटी बाँहों वाला टॉप पहना था। टॉप पीछे से खुला था जो एक पतली सी डोर से बंधा था।

पीछे से नीतू की ब्रा की पट्टी साफ़ दिख रही थी। नीतू के अल्लड़ स्तन उसके छोटे से टॉप में समा नहीं रहे थे और उसके टॉप में से उभर कर बाहर आने की भरसक कोशिश में लगे हुए दिख रहे थे।

लम्बी और गोरी नीतू अपने गदराते हुए बदन के कारण हर जवान मर्द के लण्ड को जैसे चुनौती दे रही थी। नीतू ने कपाल पर टिका लगा रखा था जो उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहा था।

“हेलो, हाई” होने के बाद ज्योति ने चुपके से जब नीतू के कान में कप्तान कुमार के बारे में कुछ पूछा तो नीतू थोड़ा शर्मायी और बोली की उसे कुमार के बारेमें कुछ भी पता नहीं था।

कुमार से उसकी मुलकात सिर्फ पिछली शामको हुई थी उसके बाद पता नहीं वह कहाँ चले गए थे। ज्योति ने नीतू की कान में कुछ और भी बताया जिसके कारण शर्म के मारे नीतू का मुंह लाल लाल हो गया। ज्योतिजी ने यह देखा पर कुछ ना बोली।

कुछ ही देर में वहाँ कुमार और ब्रिगेडियर साहब हाजिर हुए। शायद हॉल के बाहर ही वह दोनों मिल गए थे और ब्रिगेडियर साहब कप्तान कुमार की कमर में हाथ डाले उन्हें साथ लेकर अपनी बीबी नीतू के सामने आकर खड़े हुए।

नीतू के पास पहुँचते ही खन्ना साहब ने कुमार से कहा, “कुमार साहब, मैं ज्यादा चल नहीं पाउँगा इस लिए इस टेक्किंग में मैं आ नहीं पाउँगा। मैं चाहता हूँ की आप युवा लोग इस ट्रैकिंग में जाएं और खूब मौज करें। मेरी ख्वाहिश है की आप नीतू के साथ ही रहें और उसका ध्यान रखें। अगर आप ऐसा करेंगे तो मैं आपका आभारी रहूंगा।”

कप्तान कुमार ने झुक कर खन्ना साहब का अभिवादन किया और उनकी बात को स्वीकार कर नीतू की जिम्मेदारी लेने का वादा किया। सब ट्रैकिंग में जाने के लिए तैयार हो गए थे।

कर्नल जसवंत सिंह का इंतजार था, सो कुछ ही देर में वह भी आ पहुंचे और सुबह के ठीक छह बजे सब वहाँ से ट्रैकिंग में जाने के लिए निकल पड़े।

ज्योतिजी ने देखा की ज्योति ने नीतू को आँख मार कर कुछ इशारा किया जिसे देख कर नीतू शर्मा गयी और मुस्कुरा दी।

ज्योति जी ने ज्योति को कोहनी मार कर धीरे से पूछा, “क्या बात है ज्योति? तुम्हारे और नीतू के बिच में क्या खिचड़ी पक रही है?”

ज्योति ने शरारत भरी आँखों से ज्योतिजी की और देखते हुए, “दीदी हमारे बिच में कोई खिचड़ी नहीं पक रही। मैंने उसे कहा, ट्रैन में जो ना हो सका वह आज हो सकता है। क्या वह तैयार है?”

ज्योतिजी ने ज्योति की और आश्चर्य से देखा और पूछा, “फिर नीतू ने क्या कहा?”

ज्योति ने हाथ फैलाते हुए ज्योतिजी के प्रति अपनी निराशा जताते हुए कहा, “दीदी आप भी कमाल हो! भला कोई हिन्दुस्तांनी औरत ऐसी बात का कोई जवाब देगी क्या? क्या वह हाँ थोड़े ही कहेगी? वह मुस्कुरादी। बस यही उसका जवाब था।”

ज्योति ने आगे बढ़कर ज्योति के कान पकडे और बोली, “मैं समझती थी तू बड़ी सीधी सादी और भोली है। पर बाप रे बाप! तु तो मुझसे भी ज्यादा चंट निकली!”

ज्योति ने नकली अंदाज में जैसे कान में दर्द हो रहा हो ऐसे चीख कर धीरे से बोली, “दीदी मैं चेली तो आपकी ही हूँ ना?”

कर्नल जसवंत सिंह (सुनीलजी) ने सबसे मार्किंग की गयी पगदंडी (छोटा चलने लायक रास्ता) पर आगे बढ़ने के लिए कहा।

एक जवान को सबसे आगे रखा और कप्तान कुमार और नीतू को उनके पीछे चलने को कहा। सब को हिदायत दी गयी की सब की अपनी सुरक्षा के लिए के लिए वह निश्चित किये गए रास्ते (पगदंडी) पर ही चलें।

पहाड़ों की चढ़ाई पहले तो आसान लग रही थी पर धीरे धीरे थोड़ी कठिन होती जा रही थी। सबसे आगे एक जवान लेफ्टिनेंट थे। उनकी जिम्मेवारी थी की आगे से सबका ध्यान रखे। उसके फ़ौरन बाद नीतू और कुमार थे।

नीतू फुर्ती से दौड़ कर कुमार को चुनौती देती हुई आगे भागती और कुमार उसके पीछे भाग कर उसको पकड़ लेते। सुनीलजी और ज्योति, नीतू और कुमार की अठखेलियां देखते हुए एक दूसरे की और मुस्कराते हुए तेजी से उनके पीछे चल रहे थे।

आखिर में ज्योतिजी और सुनीलजी चल रहे थे। सुनीलजी को चलने की ख़ास आदत नहीं थी इस के कारण वह धीरे धोरे पत्थरों से बचते हुए चल रहे थे।

ज्योतिजी उनका साथ दे रही थी। नौ में से सिर्फ सात बचे थे। दो यात्री में से एक ब्रिगेडियर साहब और एक और उम्र दराज साहब ने टेक्किंग में नहीं जाने का फैसला लिया था वह बेस कैंप पर ही रुक गए थे।

रास्ते में जगह जगह दिशा सूचक चिह्न लगे हुए थे जिससे ऊपर के कैंप की दिशा की सुचना मिलती रहती थी। खूबसूरत वादियों और नज़ारे चारों और देखने को मिलते थे।

ज्योति इन नजारों को देखते हुए कई जगह इतनी खो जाती थी उन्हें देखने के लिए वह रुक जाती थी, जिसके कारण सुनीलजी को भी रुक जाना पड़ता था। सब से आगे चल रहा जवान काफी तेजी से चल रहा था और शायद काफिले से ज्यादा ही आगे निकल गया था।

रास्ते में एक खूबसूरत नजारा दिखा जिसे देख कर नीतू रुक गयी और कुमार से बोली, “कप्तान साहब, सॉरी, कुमार! देखो तो! कितना खूब सूरत नजारा है? वह दूर के बर्फीले पहाड़ से गिर रहा यह छोटी सी युवा कन्या सा यह झरना कैसे कील कील करता हुआ अल्लड़ मस्ती में बह रहा है? और पानीकी धुंद के कारण चारों तरफ कैसे बादल से छाये हुए हैं? लगता है जैसे आसमान अपनी प्रियतमा जमीन को चूम रहा हो।”

कुमार ने नीतू के हाथों में अपना हाथ देते हुए कहा, “नीतू ज़रा बताओ तो, आसमान अपनी प्रीतमा धरती को कैसे चूम रहा है?”

नीतू ने कुछ शर्माते हुए कहा, “मुझे क्या पता? तुम्हीं बताओ.”

कुमार ने नीतू के गालों पर हल्का सा चुम्बन लेते हुए कहा, “ऐसे?”

नीतू ने कहा, “भला कोई अपनी प्रियतमा को ऐसे थोड़े ही चुम्बन करता है?”

कुमार ने पूछा, “तो बताओ ना? फिर कैसे करता है?”

नीतू ने कहा, “मैं क्यों बताऊँ? क्या तुम नहीं बता सकते?”

कुमार ने हँस कर एक ही झटके में नीतू को अपनी बाँहों में भरकर उसके लाल लाल चमकते होँठों पर अपने होँठ रख दिए और एक हाथ नीचा कर नीतू की छाती पर हलके से रखते हुए शर्म के मारे लाल हो रही नीतू को जोर से चूमने और उसकी चूँचियों को टॉप के ऊपर से ही मसलने में लग गए।

अफ़रातफरीमें नीतू ने कुमार के हाथ अपनी छाती पर से हटा दिए और बोली, “शर्म करो! हमारे पीछे कर्नल साहब आ रहे हैं। अगर हम यही रास्ते पर चलते रहे तो वह जल्द ही यहां पहुँच जाएंगे।”

कुमार ने निराशा भरे अंदाज में कहा, “तो फिर क्या करें? कहाँ जाएं?”

नीतू ने बहते हुए झरने की और इशारा करते हुए कहा, “हम इस पहाड़ी वाले रास्ते से थोड़ा निचे उतर जाते हैं। वहाँ थोड़ी सी खाई जैसा दिख रहा है ना? वहाँ चलते हैं। वहाँ से नजारा भी अच्छा देखने को मिलगा और हमें कोई देखेगा भी नहीं और कोई दखल भी नहीं देगा।”

कुमार ने हिचकिचाते हुए कहा, “पर सेना के नियम के अनुसार हम इस रास्ते से अलग नहीं चल सकते।”

नीतू ने मुस्कराते हुए कहा, “अच्छा जनाब? क्या आप सब काम नियम के अनुसार ही करेंगे? क्या हम जो कर रहे हैं, नियम के अनुसार है?”

कुमार ने असहायता दिखाते हुए अपने हाथ खड़े कर कहा,”हे भगवान्! इन औरतों से बचाये! ठीक है भाई। चलो, वहीँ चलते हैं।”

नीतू ने शरारत भरी नज़रों से कुमार की और देखते हुए कहा, “अच्छा? लगता है जनाब का काफी औरतों से पाला पड़ा है?”

कुमार ने उसी अंदाज में कहा, “भाई एक ही औरत काफी है। ज्यादा को तो मैं सम्हाल ही नहीं पाउँगा।” ऐसा कह कर नीतू का हाथ कस के पकड़ कर कुमार भाग कर मुख्य रास्ते से निचे उतर गए और निचे की और एक गुफा जैसा बना हुआ था वहाँ एक बड़े पत्थर के पीछे जा पहुंचे।

वहाँ पहुँच कर कुमार ने कस कर नीतू को अपनी बाँहों में दबोच लिया और उसके होँठों पर दबा कर अपने होँठ रख दिए। दोनों एक शिला का टेक लेकर खड़े एक दूसरे का रस चूसने में लग गए।

नीतू के मुंहमें कुमार ने अपनी जीभ डाल दी। नीतू कुमार की जिह्वा को चूसकर उसकी लार निगलती गयी। कुमार नीतू के रसीले होँठों का सारा रस चूस कर जैसे अपनी प्यास तृप्त करना चाहता था।

पिछले दो तीन दिनों से कुमार इन होँठों को चूमने और चूसने के सपने दिन रात देखता रहता था। आज वही होँठ उसकी प्यास बुझाने के लिए उसके सामने अपने आप प्रस्तुत हो रहे थे।

कुमार का एक हाथ नीतू ने गर्व से उन्मत्त कड़क स्तनोँ को उसके टॉप के ऊपर से मसलने में लगा था। इन अल्लड़ मद मस्त स्तनोँ ने कुमार की रातों की नींद हराम कर रखी थी।

कुमार इन स्तनोँ को दबाने, मसलने और चूसने के लिए बेताब था। वह उन पर अपना सर मलना चाहता था वह उन स्तनों पर मंडित प्यारी निप्पलों को चूमना, चूसना और काटना चाहता था।

उधर नीतू कुमार से मिलकर उससे मिलन कर अपने जीवन की सबसे प्यारी पलों को भोगना चाहती थी। उसने उस से पहले कभी किसी युवा से सम्भोग नहीं किया था।
 
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