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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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शाम को शिंगूरा और उसका भाई जमाल पाशा कार में सवार होकर शहर के लिए निकले थे तो बंता सिंह ने उनका पीछा किया था। पहले वो दोनों फोर्ट इलाके की कालोनी की एक बड़ी दुकान पर गए थे। फिर एक केमिस्टर से उन्होंने कुछ

दवाईयों खरीदी थी। वहां से वो सीधा क्लब गए थे और करीब दो घंटे उन्होंने क्लब में बिताए थे और बंता सिंह उस नाईट क्लब के बाहर उनका इन्तजार करता रहा था।

नौ बजे के करीब वो क्लब से निकले थे और सीधा अपनी कोठी पहुच गए थे। बंता सिंह उनके पीछे कोठी तक गया था

और वहां से वापसी पर सीधा डॉक्टर सावंत के घर आया था।

डॉक्टर सावंत और राज ने उसकी चतुराई की तारीफ की

और उसे ज्यादा से ज्यादा सतर्क रहने का निर्देश देकर वापिस भेज दिया।

ऊपरी तौर पर उन्हें आज की रिपोर्ट से कोई खास बात नहीं मालूम हुई थी। लेकिन चूंकि उसकी गतिविधियों पर ही नजर रखनी थी, इसलिए इससे ज्यादा किया भी क्या जा सकता था।

डॉक्टर सावंत की राय थी कि क्योंकि शिंगूरा बहुत चालाक है इसलिए वो इस बड़ी वारदात के बाद अभी कोई नया काण्ड नहीं करेगी, ताकि लगातार वारदातें उसे पुलिस और पब्लिक की नजरों में संदिग्ध न बना दें।

बंता सिंह को इस ड्यूटी के बारे में राज ने सतीश को भी विस्तार से बात दिया था। सतीश ने तो जिउ भी की थी कि वो बंता सिंह के साथ-साथ खुद भी शिंगूर की निगरानी करेगा।

लेकिन डॉक्टर सावंत और राज ने उस पर सोचकर उसकी जिद नहीं मानी कि सतीश एक लापरवाह सा आदमी है और

सीधा-सादा भी, अगर शिंगूरा को जरा भी उस पर शक हो गया तो उसे बेझिझक ठिकाने लगा देगी। जाहिर है, वो राज या सतीश पर रहम नहीं कर सकती थी।

एक बात और राज को कई दिन से परेशान कर रही थी कि शिंगूरा उनकी तरफ से खामोश क्यों बैठ गई है? आखिर वो किस सोच में है? न ही उस दिन के बाद वो भयानक सूरत

आदमी ही उन्हें नजर आया था, जिसने खंजर से उन पर हमला किया था।

नीलकण्ड की यकीन था कि शिंगूरा उनके बारे में कोई निहायत

की खतरनाक चाल साचे रही होगी। शायद बीच में सलीम अनवर का मामला फस जाने की वजह से उसने इनका मामला टाल दिया था।

इसी तरह दिन गुजरते रहे, हर काम सुख-शांति से होता रहा। बंता सिंह हर रोज शाम को उन्हें उस दिन की रिपोर्ट दे दिया करता। लेकिन अभी तक इन्हें ऐसी कोई बात नहीं पता चली थी जो सन्देह पैदा करती । इस तरह नौ-दस दिन गुजर चुके

वो लोग हालात की एकरसता से उपकता चुके थे कि अचानक एक दिन एक नई घटना घट गई। उस दिन पिछले दिनों की रूटीन के खिलाफ बंता सिंह डॉक्टर सावंत के यहां नहीं पहुंचा।

रात को उन्होंने यह समझा कि शायद वो देर से शहर लौटा होगा, इसलिए इधर आने के बजाय सीधा घर चला गया होगा। लेकिन जब सुबह को भी वो नहीं आया तो राज ने दस जे के बाद बंता सिंह के घर जाकर पूछा तो उसे पता चला कि वो रात को घर भी नहीं लौटा था।

यह सचूना पाकर राज को सख्त चिंता हुई थी और वो भागा-भागा डॉक्टर सावंत के यहां पहुंचा था और उसने डॉक्टर सावंत को बंता सिंह के लापता होने के बारे में बताया।

यह खबर पाकर डॉक्टर सावंत भी परेशान हो गया। बहुत देर

तक वो दोनों मशविरे करते रहे। स्थिति की समीक्षा करते रहे।

आखिर काफी देर बाद उन्होंने यह फैसला किया कि राज टैक्सी पकड़ कर ब्रिक फैक्ट्री की उन खंदकों की तरह जाए जहां से फैक्ट्री के जमाने में ईंट बनाने के लिए मी निकाली जाती थी

और जिनका जिक्र बंता सिंह ने किया था कि वो टैक्सी उनमें से किसी एक में खड़ी किया करेगा।

पैंतीस मिनट बाद राज उन खंदकों के किनारे पहुंचा गया

टैक्सी वाले को साथ लेकर राज उन खंदकों में उतरा। बड़ी भयानक और रहसयमय जगह थी। जमीन काफी गहरी खुदी हुई

थी और इसी तरह की पतली-पतली गलियां थीं कि दिन के वक्त भी वहां खौफ सा महसूस होता था।

राज ने सोचा

"इस जगह अगर कोई किसी को कत्ल करके डाल दे तो किसी को महीनों पता न चले....।"

उसे आशंका हुई कि कहीं बंता सिंह के साथ भी ऐसा ही तो कुछ नहीं घट गया? हो सकता है शिंगरा या उसके साथी को शक हो गया हो और उन्होंने बंता सिंह का काम तमाम कर दिया हो? यह सोचते ही मारे खौफ को राज के रोंगटे खड़े हो गए।

टैक्सी ड्राईवर को उसने बता दिया कि ड्राईवर बंता सिंह कल यहां किसी काम से अपनी टैक्सी लेकर आया था, उसके बाद

वापिस नहीं गया, उसे तलाश करना है।
 
ड्राईवर हैरान था कि बंता सिंह आखिर इन खंदकों में किस काम से आया था? अगर आया था तो फिर कहां गायब हो गया? वो राज से इस बारे में में कई सवाल करना चाहता था, लेकिन नहलकण्ठ को अपने ख्यालों में खोया देखकर उसकी हिम्त नहीं हो रही थी कि उससे कुछ पूछे।

आखिर एक चौड़ी खदक में उन्होंने बंता सिंह की टैक्सी खड़ी हुई ढूंढ ली। टैक्सी बिलकुल सही सलामत थी। लेकिन बंता सिंह का कहीं पता नहीं था। टैक्सी देखकर ड्राईवर से रहा ने गया और उसने पूछ लिया

"क्या बंता सिंह अपनी गाड़ी लेकर यहां आया था?"

"हां।” राज ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।

"लेकिन इन खातों में गाड़ी लाने की उसे जरूरत ही क्या थी?"

"यही सोच कर तो मैं हैरान हूं!" राज ने झूठ बोला और टॉपिक चेंज करते हुए बोला-"अच्छा, इस टैक्सी को स्टार्ट करके मैं बाहर निकालता हूं, तुम अपनी गाड़ी में वापिस चलना।"

"ठीक है सर।" ड्राईवर ने जवाब दिया। लेकिन उसके चेहरे से जाहिर था कि वो बहुत परेशान है। और राज की तरफ से सन्देह में पड़ गया है।

राज ने टैक्सी का इंजन स्टार्ट किया और कई चक्करदार रास्तों से होकर वो उन खंदकों से बाहर निकला। दूसरे ड्राईवर ने भी अपनी टैक्सी स्टार्ट की और दोनों आगे-पीछे शहर की तरफ चल पड़े।

शृिंगरा की कोठी सड़क से कुछ हट कर बनी हुई थी। सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े पेड़ थे। कोठी से कुछ फासले पर एक साथ बड़े-बड़े ऊंचे-ऊंचे पांच-छ: पेड़ खड़े थे। कोठी के सामने से गुजरते हुए राज ने जानबूझकर गाड़ी की रफ्तार कम कर दी थी। जिस वक्त वो पेड़ों के उस झुण्ठ के करीब से गुजरा तो उसे दो खौफनाक आंखें अपनी तरफ घूरती हुई नजर आई।

ये दोनों खौफनाक आंखें उसी भयानक शक्ल आदमी की थीं जिसने उस रात उन पर खंजर से हमला किया था। उसे पेड़ों में छुपा अपनी तरफ घूरता देखकर देखकर राज को यकीन हो गया कि बंता सिंह जरूर किसी मुसीबत में फंस गया है।

वो पेड़ों के इसी झुण्ड में घुसकर कोठी की निगरानी कर रहा होगा कि उस भयानक सूरत गुण्डे ने उस पर हमला कर दिया होगा और उसे जख्मी या बेहोश करके काबू करने के बाद कोठी में ले गया होगा। उसके बाद भगवान जाने वो खून के प्यासे लोग उसके साथ कैसे पेश आए होंगे, उस गरीब को मार दिया होगा या कैद करके रखा होगा कहीं, ये सब बातें रहस्य के पर्दे में छुपी हुई थीं।

राज सोच रहा था, अगर उसे कैद किया गया होगा तो यकीनन उससे पूछताछ भी की गई होगी कि वो इस कोठी की निगरानी क्यों कर रहा था। किसके लिए काम कर रहा था, हो सकात है बंता सिंह ने दबाव में आकर सब कुछ बता भी दिया हो।

इसका मतलब था कि दोनों तरफ से बकायदा जंग शुरू हो गई थी और दोनों एक-दूसरे से ज्यादा सावधान हो गए थे।

अगर बंता सिंह ने मुंह नहीं खोला तो उस पर सख्ती की जा रही होगी। ऐसी स्थिति में राज ने अपना फर्ज समझा कि बंता सिंह की मदद करे और अगर वो अभी तक जिन्दा है तो उसे छुड़ाने की भरपूर कोशिश करे।

लेकिन सवाल यह था कि वो करे तो क्या करे? इसी सोच-विचार में रास्ता कट गया। डॉक्टर सावंत बड़ी बेचैनी से उसका इन्तजार कर रहा था। नीलकण्ठा को एक दूसरे ड्राईवर के साथ और कुछ फिक्रमंद देखकर सो समझ गया कि बंता सिह नहीं मिला।

सबसे पहले तो उन्होंने नए ड्राईवर को किराये के अलावा पांच सौ रूपये और देकर उससे वादा किया कि वह इस बात का जिक्र किसी से नहीं करेगा। उस राज ने बता दिया कि बंता सिंह किसी काम में उनकी मदद कर रहा था और उनके कुछ दुश्मनों ने शायद उसे कैद कर लिया है और अब वो उसे छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह हालात सुनकर वो संतुष्ट हो गया और खामोश रहने का वादा करके चला गया।

उसके बाद राज ने डॉक्टर सावंत को सारा किस्सा सुना दिया।

"फिर यही कहा जा सकता है कि उन्होंने या तो उसे मार डाला है, या फिर कैद कर लिया है....।” सारी बात सुनकर डॉक्टर सांवत ने कहा।

"जी हां, यही मेरी भी ख्याल है।" राज बोला-"लेकिन अब फिर वही सवाल सामने है कि क्या किया जाए?"

"अगर बंता सिंह उनकी कैद में है तो किसी तरह उस गरीब को छुड़ाना चाहिए। उनकी कोठी में दाखिल होने की कोई तरकीब सोची जाए।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"वो तरकीब ही तो समझ में नहीं आ रही।" राज ने लम्बी सांस ली।

कई घंटे तक वो सोचते रहे, लेकिन कोई तरकीब उनकी समझ में नहीं आई। शाम हो चुकी थी इसलिए दोनों सिरखपाई से उकता कर क्ल्ब की तरफ चल पड़े।

न जाने क्या बात थी कि सतीश से लड़कियां बड़ी जल्दी घुल-मिल जाती थीं। वो खूबसूरत जवान तो था ही, पैसे की भी उसके पास कोई कमी नहीं थी, ऊपर से बातचीत में भी पटु था। इसलिए भी लड़कियां उसका साथ पसन्द करती थीं, खासतौर से बालरूम में तो हर लड़की चाहती थी कि वो सतीश के साथ डांस करे।

सतीश का पालन-पोषण क्योंकि शुरू से ही पश्चिमी तर्ज के माहोल में हुआ था और उसने पूरी जिन्दगी तफरीह और लड़कियों के साथ फ्लर्ट करने के अलावा कोई खास काम नहीं किया था, इसलिए वो हर किस्म के डांस में पारंगम हो चुका

था। डांस की माहिर विदेशी लड़कियां भी उकसी तारीफों के पुल बांध चुकी थीं।
 
बम्बई आने के बाद करीब हर रोज ही वो क्लब जाते थे, लेकिन इस बार कोई लड़की उसकी नजर में नहीं अटकी थी, जो स्थाई रूप से उसकी डांस पार्टनर बनी रहती । वो हर रोज नई लड़की के साथ डांस करता था।

लेकिन उस दिन जब डॉक्टर सांवत और राज क्लब में दाखिल हुए तो उन्होंने सतीश को एक कोने की मेज पर एक बहुत ज्यादा हसीना लड़की के पास बैठे हुए देखा। वो दोनों अपने आस-पास से बेखबर बड़े प्यार से आपस में बातें करने में व्यस्त थे।

उस लड़की को राज ने पहली बार देखा था। वो हर रोज कल्ब जाते थे लेकिन यह लड़की उन्हें कभी नजर नहीं आई थी। राज ने डॉक्टर सावंत का हाथ दबाकर सतीश की तरफ इशारा किया और पूछा

"क्या आपने पहले कभी इस लड़की को क्लब में देखा है?"

"नहीं।” डॉक्टर ने इन्कार में सिर हिलाया, "यह नई लड़की है...और आजकल में ही क्लब की मेम्बर बनी होगी।"

"लड़की तो एकमदल एटमबम है।'' राज ने लड़की की तारीफ की।

"वाकई।" डॉक्टर सावंत ने कहा, "आपका दोस्त भाग्यशाली

वो जानबूझ कर उन दोनों के करीब से गुजरे तो सतीश ने उन्हें देख लिया और मुस्कराते हुए उसने उन दोनों से लड़की का परिचय करवाते हुए कहा

"यह जूही है, और जूली, यह मेरे दोस्त राज और यह डॉक्टर सावंत हैं।"

उन दोनों ने ही जूही से हाथ मिलाया।

जूही का रेशमी मुलायम हाथ अपन हाथ में पाकर राज ने अपने आपको जन्नत की फिजाओं उड़ता हुआ महसूस किया। वो बेहद हसीन थी और उसका हुस्न तारीफों से बहुत ऊंचा था। लम्बी-लम्बी रेशमी काली जुल्फों के नीचे उसी खूबसूरत, मुस्कराती हुई आंखें यों मालूम होती थीं जैसे घने बादलों के बीच बिजलियां कौंध रही हों। गालों में जवानी का खून झलक रहा था। हरे रंग की साड़ी में लिपटा उसका गोरा बदन निगाहों में समाया जा रहा था।

"बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर।" राज ने बड़ी मुश्किल से उसके सम्मोहन से निकलते हुए कहा।

"मुझे भी।" उसने शोखी से हंसते हुए कहा।

रस्मी बातचीत के बाद राज और डॉक्टर उन्हें अकेला छोड़

कर एक दूसरों मेज पर जा बैठे। वो दोनों खामखां कबाब में ही नहीं बनना चाहते थे।

बहुत देर तक दोनों बैठे स्कॉच से दिल बहलाते रहे । एक-दो बार राज ने भी अच्छी पार्टना मिल जाने पर डांस भी किया। एक बार डॉक्टर सावंत भी अपनी एक पुरानी दोस्त के साथ डांस करने फ्लोर पर गया।

दो-तीन घंटे उनके बड़े मजे से गुजर गए। कुछ देर के लिए बंता सिंह का ख्याल भी राज के जेहन से उतर गया। लेकिन नौ बजे के करीब शिंगूरा अपने भाई के साथ हॉल में दाखिल हुई तो एक बार फिर बंता सिंह का ख्याल राज के दिमाग पर बुरी तरह छा गया। उसका नशा हिरण हो गया।

दूर से ही हल्का सा सिर हिलाकर शिंगूरा ने राज और डॉक्टर सावंत का स्वागत किया और जमाल से बातें करती हुई उनमें दूर एक मेज पर जा बैठी। राज की तरफ शिंगूरा की पीठ थी जबकि जमाल पाशा का चेहरा उसकी निगाहों के सामने

था।

डॉक्टर सावंत ने राज के चेहरे पर पेरशानी के लक्षण देख कर आधी बोतल स्कॉच और मंगवा ली। दो पैग और पीकर राज हर किस्म की फिक्र से आजाद हो गया।

सतीश उनसे थोड़े फासले पर जूही के साथ बैठा हुआ था, कुछ इस तरह कि जमाल और शिंगूरा की तरफ उसकी पीठ थी, अलबत्ता जमाल और जूही आमने-सामने थे।

उस वक्त, जबकि राज और डॉक्टर सावंत पूरी तरह नशे में थे, न चाहते हुए भी राज की नजरें एक बार सतीश की तरफ उठ गई थीं।

उसने देखा कि सतीश सिगरेट मुंह में दबाए मेज पर झुका हुआ था और जूही माचिस की तीली जलाकर उसकी सिगरेट सुलगा रही थी।

उसके हाथ तो सिगरेट सुलगाने में व्यस्त थे लेकिन उसकी नजरें सतीश के झुके हुए सिर के ऊपर से होती हुई जमाल पाशा की तरफ उठी हुई थीं। नशे में होने की वजह से था या हकीकत थी कि एक बार राज ने महसूस किया कि जूही ने आंख दबा

और भौंहें उचकाकर ऐसे भाव जाहिर किए थे जैसे किसी को कोई खास इशारा कर रही हो। राज ने जल्दी से उकी नजरों की सीधी में देखा तो जमाल पाशा उन दोनों की तरफ बड़े गौर से देख रहा था और उसके होंठों पर पैशाचिक मुस्कराहट नाच रही थी।

यह सारा कुछ इतनी ही देर में हो गया था, जितनी देर में कि माचिस की तीली जलाकर सिगरेट सुलगाई जा सकती है। उसके बाद सतीश और जूही फिर बातें करने लगे थे।

राज इस पहेली को न समझ सका। फिर यह सोचकर कि

वो नशे में है और ऐसी हालत में कुछ गलतफहमी भी हो सकती है, यह सोचकर उसने वो ख्याल दिमाग से निकाल दिया।

थोड़ी देर में ही जूही सतीश से विदा लेकर चली गई और सतीश उठ कर नीलकण्ड और डॉक्टर सावंत वाली मेज पर आ बैठा। वो बहुत ज्यादा खुश था, जिससे राज ने अन्दाजा लगाया कि लड़की पूरी तरह उसके काबू में आ चूकी है। सतीश ने भी खुशी में बेतहाशा पीनी शुरू कर दी। उसके राज को कुछ पता नहीं चला कि शिंगूरा और जमाल पाशा कब गए और क्लब में कौन-कौन आया गया।

आखिर बारह बजे जब वो क्लब से निकले तो तीनों ही नशे में चूर थे। सतीश को उन दोनों से कुछ कम नशा था, इसलिए कार ड्राईव करने ही जिम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली थी और वो उम्मीद के खिलाफ बगैर किसी घटना के सुरक्षित घर पहुंच गए।

सुबह को जब सतीश राज के साथ नाश्ते की मेज पर बैठा हुआ था तो नीलकण्ड ने सतीश से कहा

" सतीश, यह लड़की जूही है तो बहुत हसीन, मगर इतनी हसीन लड़की से बच कर ही रहना। आजकल हम बड़ी पेचीडा स्थितियों से गुजर रहे हैं।"

"ओह डियर राज, तुम उसकी फिक्र न करो।” सतीश ने शोख लहजे में कहा-"मैं बहुत सावधान हूं।"

"वो है कौन?"

"एक लड़की है, क्लब की मेम्बर है।"

"कहां रहती है?" नीलकण्ड ने पूछा।

"मालूम नहीं। मैंने पूछा नहीं था।"

"अजीब बेवकूफ बन्दे हो यार!" नीलकण्ड ने झुंझलाकर कहा-'"इश्क लड़ाना शुरू कर दिया, और उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते हो?"

"अरे, इश्क कौन कर रहा है यार, वो तो बस जरा सी दिल्लगी है।" सतीश मुस्करा कर बोला।

"चलो दिल ही लगा हो, उसके बारे में कुछ जानकारी तो होनी ही चाहिए थी न।”

"ठीक है साहब ।” सतीश ने शोखी से कहा-"आज ही इसकी वंशावली और जन्म स्थान के बारे में मालूम कर लूंगा। और कुछ? अब उसका पीछा छोड़ा, नाश्ता कर लेते हैं।"

कह कर उसने केतली खींच कर चाय बनानी शुरू कर दी और बोला

"तुम बताओ, तुम्हारे जासूस बंता सिंह जी कोई खबर लाए हैं?"

"वो तो कल रात से लापता हो गया है....।"

"लापता हो गया है?" सतीश ने हैरत से पूछा, "क्या मतलब?'

"यही कि परसों रात से फिर वो वापिस नहीं लौआ।" राज बोला, "आज सुबह मैं शिंगूरा की कोठी की तरफ गया था, सिर्फ उसकी गाड़ी खड़ी थी, वो मैं वापिस लाट लाया।"

"कहां जा सकता है वो?" सतीश ने कुछ फिक्रमंदी से कहा।

"जाना कहां है!" राज बोला, "या तो उसे कत्ल कर दिया गया है, या फिर वो शिंगूर की कोठी में कैद है।"

"फिर क्यों ने पुलिस की मदद से उसकी कोठी की तलाशी ले ली जाए?"

"राय तो अच्छी है।" राज बोला, "लेकिन फर्ज करो, उन्होंने बंता सिंह को उस कोठी में नहीं, किसी और जगह कैद कर रखा हो या उसे मार कर कहीं दबा दिया हो-ऐसी सूरत में हम उन पर क्या आरोप लगा सकेंगे? ओछा हाथ डालकर मुफ्त

की शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।"

"यह भी ठीक है।" सतीश ने कहा, "लेकिन कुछ तो करना ही होगा।"

"हां, करना तो जरूर चाहिए। लेकिन क्या किया जाए? किस तरह किया जाए? यही सोचने की बता है।"

"कुछ सोचा भी है?"
 
"कल कई घंटे तक मैं डॉक्टर सोच-विचार करते रहे थे लेकिन हमारी समझ में कुछ नहीं आया था।" राज ने जवाब दिया, "अब सोच रहा हूं कि नाश्ते के बाद मैं टैक्सी लेकर जाऊं या कार में शिंगूरा की कोठी के चारों तरफ आधा मील के दायरे में घूम-फिर कर देखू, शायद कोई सुराग मिल जाए। और मैं वहां जाकर यह भी देखना चाहता हूं कि क्या किसी तरह चोरी-छुपे कोठी में घुसने की कोई तरकीब हो सकती है? अगर ऐसा कोई सुरक्षित रास्ता मिल गया तो रात के वक्त मैं कोठी में जाकर बंता सिंह को तलाश करने की कोशिश करूंगा।"

"काम बहुत खतरनाक है।' सतीश ने कहा।

"मालूम है मुझे।" राज बोला, "लेकिन उस गरीब को राम भरोसे भी तो नहीं छोड़ा जा सकता। वो हमारी वजह से इस संकट में फंसा है।"

"ठीक है।' सतीश बोला, " अब तुम यह बताओ कि इसमें मैं किस तरह तुम्हारे काम आ सकता हूं?" ।

"फिलहाल तो तुम अपनी हिफाजत ढंग से करते रहो। बाद में तुम्हारी जरूरत पड़ी तो देखा जाएगा।"

"लेकिन राज, कोई भी काम करो, अपना ख्याल रखना।" सतीश ने फिक्रमंदी से कहा, "मुझे तो वो लोग बहुत खतरनाक महसूस हो रहे हैं।"

"मेरी फिक्र न करो, मैं अपनी रक्षा करना खूब जानता हूं।" राज ने मुस्करा कर जवाब दिया।

"क्या अभी जाओगे?" सतीश ने पूछा।

"हां । बस नाश्ता करके जा रहा हूं।" राज ने जवाब दिया।

उसके बाद वो दोनों खामोशी से नाश्ता करने लगे और कोई आधे घंटे बाद ही राज अभियान पर निकल गया।

अपनी कार में आया था राज, और कार को उने खंदकों में खड़ी करके और पैदल ही कोठी के इर्द-गिर्द घूमता रहा और शाम तक जंगलों की खाक छानता रहा।

लेकिन उसे बंता सिंह का कुछ पता नहीं चल सका । कोठी को भी उसने चारों तरफ से देख लिया था, जाहिरी तौर पर उसमें घूसने का कोई रास्ता नजर नहीं आता था।

कोठी में जानबूझ कर बाहर की तरफ खिड़कियां बनवाई ही नहीं गई थीं। लेकिन छत पर कई जगह बुर्जियां सी बनी हुई थीं जिनके नीचे शायद रोशनदान टाईप की कोई चीज हो या शीशे के उठाए जा सकने वाले रोशनदान हो सकते हैं। नीलकण्ड ने उन्हें देखा तो उसने सोचा अगर किसी तरह कोठी की छत पर पहुंचा जा सके तो कोठी के अन्दर की स्थिति मालूम की जा सकती है।

कोठ की इस बनावट से ही उसने यह अन्दाजा भी लगाया कि इस कोठी में जरूर कोई गड़बड़ है जिसे वहां रहने वालों में छुपाए रखने के लिए सब पर्देदारी बरती जा रही है। वर्ना खिड़कियां ने बनवाने की वजह कोई न होती।

बहुत देत तक इधर-उधर घूम कर राज यह ढूंढने की कोशिश करता रहा कि छत पर किसी रास्ते से चढ़ा जा सकता था। लेकिन डेढ़ घंटे की नाकाम कोशिश के बाद उसकी समझ में आ गया कि बगैर किसी बाहरी मदद के वो कोठी की छत पर भी नहीं पहुंच सकता।

आखिरी मायूस होकर वो फ्लैट पर लौट आया। बंता सिंह का ख्याल उसके दिमाग पर इस तरह सवार था कि उसे चैन नहीं

आ रहा था। वो सोच रहा था कि अगर बंता सिंह को कुछ हो गया तो उसकी सारी जिम्मेदारी उन्हीं लोगों पर होगी। क्योंकि वो इनके हितों के लिए काम कर रहा था।

बंता सिंह कोई पेशेवर जासूस नहीं था बल्कि एक गरीब टैक्सी ड्राईवर था और उसे ऐसे खतरनाक काम पर लगाकर उन्होंने एक गलती ही की थी। दुश्मन बहुत ज्यादा चालाक और खतरनाक थे और उनसे टक्कर लेने के बहुत ज्यादा चालाक और ताकतवर शख्स की जरूरत थी।

शाम तक राज इन्हीं ख्यालों में उलझा रहा, डॉक्टर सावंत के यहां भी नहीं गया, बल्कि फोन पर अपनी नाकामी की दास्तान संक्षेप में सुना दी थी।

शाम को सतीश ने बहुत ज्यादा अनुरोध किया तो राज को उसके साथ क्लब आना पड़ा। लेकिन क्लब में जाते ही सतीश

को जूही मिल गई और राज अकेला रह गया था।

थोड़ी देर राज अकेला बैठा दिल बहलाने की कोशिश करता रहा, एक-दो पैग स्कॉच पीकर फिक्र दूर करने की कोशिश की

और एक बार एक लड़की के साथ डांस करने फ्लोर पर भी गया। लेकिन एक दो राउण्ड डांस करने के बाद ही उसका दिल उकता गया और तबीयत खरा का बहाना करके, लड़की से माफी मांगकर टेबल पर वापिस आ गया।

आखिर तंग आकर उसने सतीश की बातचीत में दखल देते हुए

कहा

" सतीश, मैं घर जा रहा हूं और कार ले जा रहा हूं। तुम टैक्सी में आ जाना।” राज कार में बैठ कर सीधा घर आ गया।

एकांत में बैठकर राज बहुत देर तक सोचता रहा कि आखिर बंता सिंह को किस तरह तलाश किया जाए।

बैठे-बैठे सोचते हुए राज को न जाने कितना वक्त गुजर गया। ऐशे-ट्रे में सिगरेटों के टाटों से उसने अन्दाजा लगाया कि उसे क्लब से आए कम से कम दो घंटे गुजर चुके हैं।

उसी वक्त अचानक उसके दिमाग में एक ख्याल आया कि इसी वक्त शिंगूरा की कोठी पर चलना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है किसी तरह इस वक्त अन्दर जाने की कोई तरकीब सूझ जाए या कम से कम छत पर पहुंचने का कोई

रास्ता ही मिल जाए।

दिल और दिमाग की इस आवाज को उसने फौरन सुना और उस पर अमल करने का फैसला कर लिया। पिस्तौल जेब में डाल कर वो चल पड़ा।

रास्ते में उसने एक मजबूत प्लास्टिक की रस्सी भी खरीदी ताकि छत पर चढ़ने के काम आ सके। इस वक्त चारों तरफ अन्धेरा छाया हुआ था, क्योंकि चांद की शुरूआती तारीखें थीं इसलिए रात को किसी के देखे जाने का खतरा भी नहीं था।

शहर से बाहर कोठियां बिल्कुल सुनसान पड़ी थीं। राज ने घड़ी देती तो साढ़े ग्यारह बजे रहे थे। दस-बारह मील का सफर नीलकण्ड को बड़ा सुहाना लग रहा था। कार की हैड लाईट में तारकोल की सड़क चमक रही थी। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था, जिसे कभी-कभी किसी कार के इंजन की आवाज भंग कर देती थी। उसके बाद फिर वही गम्भीर सन्नाटा छा जाता था।

शिंगूरा की कोठी के करीब पहुंचकर राज ने कार की सभी लाईटें बुझा दी और सड़क से हटकर कोठी के पीछे जहां एक बागीचा सा बना हुआ था, वहीं कार राक दी।

उस वक्त राज प्रकृति की सुन्दरता के दृश्यों में इतना मगन था कि थोड़ी सी असावधानी कर बैठा। जिसका खामियाजा उसे बाद में भुगतना पड़ा। जब कार उसने कोठी के करीब जाकर रोक दी, तब उसे इस मूर्खता का अहसास हुआ कि कोठी के पीछे एक कार के अक्षरों के निशान देख कर उन्हें जरूर शक हो जाता और उन्हें मालूम हो जाता कि रात को किसी ने कोठी के बारे में छानबीन करने की कोशिश की है। लेकिन यह अहसास राज को वक्त के बाद हुआ था। अब कुछ नहीं हो सकता

था उस बारे में।

कार छोड़कर राज ने एक बार कोठी की परिक्रमा की, लेकिन एक दरवाजे के सिवा उसे कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं

आया। पानी को टंकी क्योंकि छत पर था इसलिए लोहे का एक मजबूत पाईप ऊपर से नीचे जरूर आ रहा था। दीवार से लगा-लगा।

अगर कोई फुर्तीला वोर या कोई पशेवर डिटेक्टिव होता तो उस पाईप को देखते ही बगैर सोचे-समझे लपककर उसके जरिये छत पर चढ़ जाता।

लेकिन राज ने चूंकि इसके पहले कभी इस तरह का कोई काम नहीं किया था, इसलिए छत पर पहुंचने को एक रास्ता मिल जाने के बावजूद उसे सोचना पड़ रहा था।

इसमें भी कोई शक नहीं कि ज्योति और शिंगूरा के चक्करों में उलझ पर राज भी आधा-अधूरा जासूस बन गया। और उसे पूरी उम्मीद थी कि हालात की रफ्तार अगर ऐसी ही रही तो बहुत जल्दी वो एक माहिर जासूस बन जाएगा। वहां खड़े-खड़े तो राज यहां तक सोच गया कि थोड़ा अनुभव और हो जाए तो बाकायदा लाइसें लेकर प्राइवेट डिटेक्टिव बन जाएगा

और एक एजेन्सी खोल लेगा।

कुछ देर वो पाईप के पास खड़ा छप पर जाने के लिए हिम्मत बटोरता रहा। कोठी के अन्दर के हालात जानने का एकमत्र जरिया छत पर बने वो वेंटीलेटर थे और छत पर जाने का इकलौता जरिया या पानी का पाईप ही था।
 
आखिर राम नाम लेकर उसने सूली पर चढ़ने का फैसला कर ही लिया और सबसे पहले उसने जूते उतार कर कार में डाल दिए। उसके बाद पाईप हाथों के थाम कर और दीवार पर पैर जमाकर राज ने धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकना शुरू कर दिया। पाईप चूंकि दीवार से पूरी तरह सटा हुआ नहीं था, इसलिए राज की अंगुलियां पाईप को चारों तरफ से पकड़ में ले सकती थीं। इसलिए उसे ऊपर चढ़ने में बहुत आसानी हो गई थी। काम बेहद कठिन था और राज को अपना संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा था, वो बार-बार फिसल रहा था और थोड़ा नीचे आ जाता था, फिर ऊपर सरकने लगता था।

एक बार तो छत का सिरा सिर्फ एक मीटर दूर रह गया था कि वो फिसल कर दो मीटर और नीचे आ पहुंचा, पाईप को दीवार के साथ लगाए रखने के लिए थोड़े-थोड़े फासले पर लोहे के मजबूत हुक ठोंके गए थे, उन्होंने छत पर चढ़ने में राज की बहुत मदद की।

उनका अपना ख्याल था कि अगर वो लोहे के हुक दीवार पर न लगे होते तो वह छत पर कभी नहीं नहीं चढ़ सकता था वो थक जाता था तो नीचे वाले हुक में पैर फंसाकर और ऊपर वाले हुक को थामकर थोड़ा सुस्ता लेता था एक दो मिनट के लिए।

आखिरकार पौन घंटे के लगातार संघर्ष के बाद राज छत पर पहुंचने में कामयाब हो ही गया। बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बैठे-बैठे वो सरकते हुए सबसे करीबी वेटीलेटर के करीब पहुचा। खड़े होकर चलने की हिम्मत इसलिए न कर सकता था कि कहीं कदमों की आवाज से नीचे रहने वाले चौंक न उठे।

ऊपर वाला झरोखा कहिए या रोशनदान या कुछ और, काफी चौड़ा था और उस पर शीशे लगे हुए थे। उस पर एक छप्पर सा बनरा हुआ था जिसके नीचे लोहे की जाली थी यानि इन्हें बनाने में खास ख्याल रखा गया था कि हवा और रोशनी नीचे कमरों तक जा सके।

इस वक्त रात का एब बज रहा था और शायद कोठी के तमाम वासी अपने-अपने कमरों में सो चुके थे, क्योंकि पूरी दत पर अन्धेरा था, किसी भी छप्पर के नीचे से रोशनी नहीं नजर आ रही थी, सिर्फ एक छप्पर के नीचे से हल्की-हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

राज सरकता हुआ उस छप्पर के करीब पहुंचा और उसने बड़ी सावधानी से नीचे झांककर देखा। नीचे एक बहुत बड़ा हॉल कमरा था जो बड़े करीने से सजा हुआ था, वो स्टडी रूम लगता था, चारों तरफ आलमारियों मे किताबें लगी हुई थीं और बीच में एक मेज थी जिस पर लिखने-पढ़ने का सामान नजर आ रहा था, ऊपर वाला रोशनदान इतना चौड़ा था कि उसकी एक साईड में आधार कमरा नजर आता था। दूसरी साईड से बाकी का

आधा कमरा भी देखा जा सकता था।

इस वक्त कमरा बिल्कुल खाली था। कमरे की दीवारों पर भी काफी तस्वीरें टंगी हुई थी और मेज पर भी एक तस्वीर का फ्रेम नजर आ रहा था।

मेज पर कागज-कलम इस तरह पड़े हुए थे जैसे कोई लिखते-लिखते किसी काम से उठकर चला गया हो। करीब दस मिनट बाद राज को नीचे कहीं कदमों की आवाज सुनाई दी। एक पल बाद ही लायब्रेरी का दरवाजा बेआवाजा खुला और जमाल पाशा नाईट गाउन पहने हुए लायब्रेरी में दाखिल हुआ और आहिस्ता-आहिस्ता चलता हुआ मेज के करीब कुर्सी पर आकर बैठ गया।

थोड़ी देर तक वो दोनों कोहनियां मेज पर टिकाए सामने रखी फ्रेम की तस्वीर की घूरता रहा। फिर उसने फ्रेम उठाकर तस्वीर को चूमा और फिर बड़ी सावधानी से फ्रेम वापिस मेज पर रख दिया, लेकिन तस्वीर शायद मेज पर अपने बैक स्टेण्ड के सहारे टिकी नहीं थी। क्योंकि उसके हाथ हटाते ही तस्वीर सीधी होकर मेज पर गिर पड़ी। जमाल पाशा ने फौरत ही तस्वीर को उठाकर फिर सीधा कर दिया।

लेकिन इतनी देर में राज की निगाह उस तस्वीर पर पड़ चुकी थी। और अगर फासला ज्यादा होने की वजह से उसकी निगाहों ने धोखा नहीं खाया था तो वह तस्वीर जूही की ही थी।

शायद राज इस बक्त अपनी नजर की कमजोरी मान लेता, अगर एक दिन पहले ही उसने सतीश के पास बैठी जूही को जमाल पाशा की तरफ एक खास इशारा करते हुए न देखा होता उस वक्त जमाल पाशा भी जूही की तरफ देखकर मुस्कराया था।

इससे राज की समझ में दो बातें आईं। पहली यह कि यह

तो जमाल पाशा जूही से मोहब्बत करता था और जूही चूंकि रंगीन मिजाज, उड़ती तितली थी, इसलिए किसी एक मर्द से उसकी तसल्ली नहीं हो सकती थी। हो सकता है कुछ दिन उसने जमाल पाशा के साथ भी इश्क के पेंच लड़ाए हों, लेकिन बाद में किसी और मर्द की तरफ आकर्षित हो गई हो ओर अब सतीश में दिचस्पी ले रही हो।

हो सकता है उस दिन की उनकी इशारेबाजी सिर्फ संयोग से मिल जाने की वजह से हो या फिर दूसरी सूरत यह हो सकती थी कि जूही सिर्फ जमाल पाशा से ही मोहब्बत करती हो ओर उसकी तमाम साजिशों में भी शामिल हो। इस वक्त वो किसी प्लान के तहत की जमाल और शिंगूरा के कहने पर ही वो सतीश को फांस रही हो।

अगर जूही और सतीश के सम्बंधों की वजह यह दूसरी बात थी तो स्थिति वाकई गम्भीर थी। राज ने सोचा, इसका मतलब है कि उन्होंने हमोर लिए कोई नई और अनोखी तरकीब सोचाी

क्योंकि राज जानता था कि उन तीनों में से सतीश ही ऐसा मोहरा था कि कभ भी आसानी से फरेब दिया जा सकता था। इसलिए राज को उसी की तरफ से ज्यादा चिंता थी। राज को यकीन था कि उसे अगर उस खेल में मात होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सीधे-सादे सतीश पर ही होगी।

जूही के बारे में सारे ख्यालों में से यह आखिरी ख्याल ही राज को सही लगा था। जरूर वो जमाल पाशा की किसी साजिश के तहत ही सतीश की फांस रही थी।

वो अभी इसी सोच-विचार में गुम था कि अचान किसी कार के इंजन की आवाज से चौंक उठा। उसने जरा सा सिर उठा कर सड़क क तरफ देखा तो ऐ कार इसी कोठी की तरफ आते देखी।
 
कार को देख कर राज का दिल धड़कने लगा, जोर-जोर से, खतरा उसके सिर पर आ पहुंचा था। अपनी कार को कोठी के पीछे खड़ी कर देने की जो मूर्खता उसने की थी, उस मूर्खता के नतीजे का वक्त आ चुका था। उसे खौफ हुआ कि अगर उनमें से किसी की भी नजर उसकी कार पर पड़ गई, या वो अपनी कार भी उसी तरफ ले आए तो सारा भाण्डा फूट जाएगां वो लोग सब समझ जाएंगे कि कोई शख्स कहीं छुपा बैठा है। थोड़ी सी मेहनत के बाद वो उसे ढूंढ भी लेते और जूते कार में देखकर वो यह भी समझ जाते कि कोई पानी के पाईप के जरिये छत पर चढ़ गया है।

लेकिन वो नई कार कोठी के दरवाजे पर पहुंच कर रूक गई। कार की आवाज सुनकर ही शायद जमाल पाशा भी बड़बड़ाता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

उसके बाद करीब पन्द्रह मिनट कोठी के अन्दरूनी हिस्सों से चलने फिरने और दरवाजों के खुलने और बन्द होने की आवाजें

आती रहीं।

फिर लायब्रेरी का दरवाजा खुला और जमाल पाशा अन्दर दाखिल हुआ। उसके तुरंत बाद ही राज के जूही वाले सन्देह भी पुष्ट हो गए। जमाल के पीछे-पीछे जूही भी कमरे में दाखिल हुई थी। आखिी में आने वाला वही भयानक सूरत बदमाश था जिसे नील कण्ठ कई बार देख चुका था।

जूही ने एक कुर्सी खींची और उस पर इस तरह गिर गई जैसे

बहुत मेहनत करके आई हो। फिर वो अहसान जताने वाले लहजे में बोल

"लीजिए सर । मेरा काम तो खत्म हो गया।"

"जी हां।" जमाल पाशा ने प्यार भरी नजरों से जूही की तरफ देखते हुए कहा, "जूही, तुमने वाकई बड़ी फुर्ती से काम कर दिखाया है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम इतनी जल्दी कामयाब हो जाओगी।"

"मैं तो हर काम इतनी ही फुर्ती और खूबसूरती से करती हूं।" जूही ने हलके से झटके से बालों की लट पीछे हटाते हुए बड़ी अदा से कहा।

जमाल ने उस बदमाश की तरफ घूम कर रहा

"जग्गा, कोई ज्यादा परेशानी तो नहीं उठानी पड़ी?"

उस भयानक सूरत बदमाश ने पहले एक वीभत्स कहकहा लगाया। फिर भौंडे लहजे में बोला

"परेशानी क्या होनी थी सर?” मैं तो इस किस्म के काम करने का माहिर हो गया हूं।"

फिर एक-दो पल ठहरकर उसने पूछा, "क्या डॉक्टर साहब सो गए?"

"हां।" जमाल ने जवाब दिया-"वो और शिंगूरा सोने जा चुके

"अच्छा...भई।" जूही बोली-''मैं सोने चली....।" उसने एक कयामत-तोड़ अंगड़ाई ली।

"इस वक्त कहां जाओगी?" जमाल ने ललचाई नजरों से उसे देखते हुए पूछा

"कार बाहर खड़ी है, पन्द्रह-बीस मिनट में घर पहुंच जाऊंगी।" जूही से कहा।

राज को ऐसा लगा जैसे जमाल जूही को रात वहीं रूकने के लिए कहना चाहता हो लेकिन उसके हुस्न के रौब से या उस भयानक सूरत जग्गू की वजह से नहीं वह कह पा रहा हो।

एक-दो दोनों एक दूसरे को देखते रहे। फिर जूहों ने खामोशी तोड़ते हुए कहा

"अच्छा तो डियर, गुड नाइट...."

"गुड नाइट।" जमाल पाशा बोला, "चलिए....आपको कार तक तो छोड़ ही आऊ....।"

"थैक्स।" जूही ने कहा और इठलाती हुई बाहर निकल गई। उसके साथ ही जमाल भी चला गया।

दो मिनट बाद कार स्टार्ट होने की आवाज ने राज को बता दिया कि जूही चली गई है।

कुछ देर बात ही जमाल पाशा मुंह लटकाए फिर लायब्रेरी में आ पहुंचा। जमाल के वापस आने के बाद जग्गा बोला

"जूही जी हैं काम की लड़की। उनकी वजह से सब काम बड़ी आसानी से हो गया।"

"हां, काम की भी है, बहुत ज्यादा हसीन और उससे ज्यादा पत्थरदिल भी है।" जमाल ने दीवार पर निगाहें जमा कर कहा।

जग्ग मुस्कराया और बोला

"तीन महीने हो गए....और आप अभी तक उसे रास्ते पर नहीं पर सके?"

"रास्ते पर तो आ गई!" जमाल ने कहा, "वो भी मुझसे मोहब्बत करती है, शादी के लिए भी तैयार है। रूकावट सिर्फ यह है कि वो चाहती है कि कुछ दिन हम साथ रहकर एक-दूसरे के मिजाज से वाफिक हो जाएं। वो असूलों की बड़ी पक्की है। मुझसे इतना खुलने के बावजूद वो मुझे एक हद से आगे नहीं बढ़ने देती। रात को कभी यहां नहीं रूकती।"

"लेकिन आपने इतनी बड़ी जिम्मेदारी उस पर सौंप दी थी, उसके बारे में पहले सोच लिया था?" जग्गा ने पूछा।

"उस बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करने से ही मुझे दो बातों के सबूत मिल गए हैं।" जमाल पाशा ने कहा, "पहला यह कि वो मुझसे इतनी मोहब्बत करती है कि मेरी खातिर कोई भी खतरनाक काम कर सकती है। दूसर यह कि इस कात को खूबसूरती से निबटा कर उसने साबित कर दिया है कि यह भरोसेमंद भी है।"

"यह सो सच है।" जग्गा बोला।

उसके बाद थोड़ी देर तक कमरे में खामोशी छाई रही । फिर जमाल ने जम्हाई लेते हुए कहा

"अच्छा भई, चलो, अब सोने चलते हैं।"

"चलिए। अब मुझे भी नींद आ रही है।"

जग्गा ने जवाब दिया और उठा खड़ा हुआ। जमाल ने स्विच दबार लाईट ऑफ कर दी और दोनों कमरे में निकल गए।

उनके जाने के बाद यह खतरा तो राज के सिर से टल गया तक वो उसकी कार न ढूंढ ले। अलबत्ता वो इस फिक्र में जरूर पड़ गया था कि आखिर जूही जमाल के लिए कौन सा काम करके आई थी?
 
बहुत देर तक राज छत पर बैठा इसी समस्या पर सोचता रहा, लेकिन उसी समझ में कुछ नहीं आया। उसके बाद जब उसे

अन्दाजा हो गया कि वो दोनों अपने-अपने बिस्तरों पर जाकर सा चुके होंगे तो वह खिसकता हुआ छत के किनारे पहुंचा और पानी के पाईप से होता हुआ नीचे उतर गया। उतरना, चढ़ने के बजाय आसान था। इसलिए राज को उतरने में कोइ कठिनाई नहीं हुई।

उसे दस मिनट बाद ही राज की कार सड़ पर फरटि भरती हुई शहर की तरफ उड़ी जा रही थी। आज की उसकी जानकारी में बढ़ोत्तरी का सार यह था कि नम्बर एक तो यह कि जूही वाकई जमाल की प्रेमिका है और वो वाकई जमाल के कहने पर ही सतीश को फांस रही है। नम्बर दो, यह कि इस कोठी में जमाल पाशा, शिंगूरा और भयानक सूरत जग्गा के अलावा एक

और शख्स, कोई डॉक्टर भी रहता है जो इन सबका बॉस या बड़ा है और यकीनन वही उन सांपों ओर जहरों का स्पेशलिस्ट होगा। या यों कि इन सब हंगामों के पीछे उसी डॉक्टर का हाथ होगा।

और यह कि शिंगूरा उा डॉक्टर की प्रेमिका या बीवी भी हो सकती है और उसके जुर्मों की भागीदार भी।

राज बहुत खुश था कि उसने आज एक बड़ा काम कर लिया है। काफी अहम जानकारियां हासिल कर ली हैं। लेकिन बंता सिंह का मामला अभी अनसुलझा ही था। यह भी मुमकिन था कि वो इसी कोठी के किसी कमरे में या किसी तहखाने में कैद हो और यह भी हो सकता था कि उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाए।

इसके अलावा राज को यह भी देखना था कि उन्होंने इनके खिलाफ कौन सी नई स्कीम बनाई है। जमाल पाशा का जूही के जरिये सतीश को फांसने का क्या मकसद है? क्या वो जूही के जरिये सतीश पर कोई जहर इस्तेमाल करना चाहता है? और यह भी खुद राज को वो क्यों नजरअन्दाज किए हैं ?

अगर वो सतीश को जूही के जरिये फांस रहे हैं तो खुद राज के लिए वो क्या कदम उठाने वाले हैं? लेकिन बहुत कुछ सोचने के बाद भी उसे इन सवालों के जवाब नहीं मिल सके, यहां तक कि वो फ्लैट पर पहुंच गया।

कार राज ने गैराज में खड़ी की, और अपने कमरे में जाकर लेट गया। पूरे फ्लैट में अन्धेरा छाया हुआ था, रात के तीन बज चुके थे, राज ने सोचा कि सतीश और नौकर सो ही चुके होंगे।

उसका ख्याल था कि बिस्तर पर लेटते ही वो सो जाएगा, लेकिन यह न हो सका, क्योंकि बहुत देर तक सैंकड़ों सवाल उसके जेहन में चकराते रहे। वो करवटें बदलता रहा और सोचता रहा।

चार बजे के बाद धीरे-धीरे उसकी आंखें बन्द होनी शुरू हुई

और राज को नींद आनी शुरू हो गई। रात को देर से सोने की वजह से सुबह ग्यारह के बाद ही उसकी आंख खुल

सकी।

हाथ-मुंह धोकर और तैयार होकर राज नाश्ते की मेज पर

आया तो नाश्ता लगाते हुए नौकर ने पूछा

"बहुत देर से सोकर उठे हैं साहब, क्या रात को देर से आए थे?"

"हां।” राज ने सिर हिलाकर जवाब दिया, " क्या सतीश ने नाश्ता कर लिया?"

"नहीं साहब ।' नौकर ने कहा, "वो भी अभी तक सो रहे होंगे। कमरे का दरवाजा बन्द हैं मैंने उन्हें जगाना मुनासिब नहीं

समझा।

"क्या वो भी रात को देर से आया था?"

"मुझे नहीं मालूम साहब।” नौकर ने कहा, "एक बजे तक तो मैं जागता रहा था, तब तक तो वह आए नहीं थे। क्या आप रात को उसके साथ नहीं थे?"

"नहीं ।" राज ने जवाब दिया, "मैं एक दूसरे काम से कहीं और गया था। वो क्लब गए थे, तुम उन्हें जगा दो। यह कहो कि मैं नाश्ते पर उनका इन्तजार कर रहा हूं।"

"ठीक है साहब ।” नौकर सिर हिलाकर सतीश को बुलाने चला गया।

लेकिन दो मिनट बाद ही उसने वापस आकर जवाब दिया

"साहब, वो तो कमरे में नहीं हैं।"

"जी नहीं, कमरा खाली पड़ा है।" नौकर ने बताया, "बल्कि बिस्तर की हालत से पता चलता है कि वो रात को अपने बिस्तर पर लेटे तक नहीं।"

राज यह बात सुनकर चौंका और उसने जल्दी से सतीश के कमरे में जाकर देखा तो वाकई बिस्तर पर किसी के सोने के लक्षण नहीं मौजूद थे।

उसके बाद नीकण्ठ ने नौकर के साथ मिलकर फ्लैट का कोना-कोना देख लिया। लेकिन सतीश आखिर को ई सुई तो था नहीं जो फर्श पर गिरकर खो जाता?

इसका मतलब था कि वो रात को घर लौटा ही नहीं। राज फिर सोच में पड़ गया। सतीश चला गया, उसने झपट कर रिसीवर उठाया और डॉक्टर सावंत को नमबर मिलाया।

"क्या सतीश आपके साथ था?" डाक्टर सावंत के लाईन पर आते ही राज ने सवाल दिया।

"हां था, क्यों क्या हुआ।"

"फिर वो कहां गया?"

"अरे, आखिर हुआ क्या है?' उसने राज के सवाल को नजरअन्दाज करके फिर पूछा-"क्या वो घर पर नहीं है?"

"नहीं, वो घर पर नहीं है।" राज ने कहा, "वो रात को घर लौटा ही नहीं।"

"क्या ?" डॉक्टर के खौफ भरे लहजे की सरसराहट राज को रिसीवर में सुनाई दी, "एक बजे के बाद वो और मैं क्लब से चले थे। उसके साथ वही लड़की जूही थी। सतीश ने बाहर आकर टैक्सी मंगवाना चाही तो मैंने उससे कहा था कि वो मेरे साथ चले, में उसे घर छोड़ दूंगा। मगर तभी वो लड़की जूही जल्दी से बोल उठी कि वो सतीश को घर छोड़ती हुई निकल जाएगी। उसके बाद हम अलग हो गए थे।"

"जूही के साथ गया था वो?" राज ने हैरत और खौफ के मिले-जुले लहजे में पूछा।

अब उसकी समझ में पूरी बात आने लगी थी। जिसकी उसे आशंका थी, आखिर वही हो गया था। यानि जूही के जरिये वो लोज सतीश को कब्जे में कर लेने में कामयाब हो गए थे।

"क्या बात है?" डॉक्टर सावंत ने लाईन खामोश पाकर पूछा, "परेशानी की क्या बात है? हो सकता है वो जूही के यहां रात को रूक गया हो या किसी होटल में ठहर गया हो।"

"जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ।" राज जल्दी से बोला, "आपको पूरे हालात की जानकारी नहीं है। मैंने रात को बहुत सी बातें मालूम की हैं, जिनको ध्यान में रखते हुए सतीश का लापता होना भी समझ में आ जाता है। मैं अभी आपके पास पहुंच कर सब कुछ बताता हूं।"

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राज ने रिसीवर रखा और जल्दी-जल्दी थोड़ा सा नाश्ता

करके फौरन डॉक्टर सावंत की तरफ रवाना हो गया। उसे सख्त चिंता और परेशानी लग गई थी।

अब उसे जमाल पाशा के वा शब्द याद आए कि जूही ने यह काम करके साबित कर दिया है कि वो भरोसेमंद भी है। इसका मतलब यह कि उसने ही सतीश को गायब किया और जमाल पाशा का भरोसा जीता था। लेकिन क्या उसे कत्ल कर दिया

गया है?

यह सोचकर वो कांप उठा।

"यह हो सकता है कि उसे बेहोश करके कोठी पर ले गए हों।" वो सेच रहा था, "ओर जब जमाल पाशा कार के इंजन की आवाज सुन कर कमरे से निकल कर बाहर गया था और काफी देर बाद वापिस लौटा था तो हो सकता है बेहोश सतीश को सम्भाल कर किसी कमरे में पहुंचने में वो देर लगी हो....।"

राज के ख्याल में बस यही दो सूरतें मुमकिन थीं कि या तो इस वक्त सतीश कोठी के किसी कमरे में कैद होगा, या फिर उस भयानक बदमाश जग्गा ने उसे मारकर कहीं डाल दिया होगा।

इन्हीं सोचों में गुम वो डॉक्टर सावंत के यहां पहुंच गया।

डॉक्टर सावंत उसका इन्तजार कर रहा था ओर कुर्सी में बेचैनी से पहलू बदल रहा था। राज को देखते ही बोला

"हैरत की बात है कि सतीश आखिर गया कहां? मेरा ख्याल है कि क्लब से जूही का पता लेकर उसके यहां चलना चाहिए, शायद वहीं.....।"

"बेकार है।" राज ने उसकी बात काटी।

"क्यों?" डॉक्टर सावंत ने हैरत से पूछा।

"ठहरिये, मैं आपको रात की पूरी कथा सुनाता हूं।''

राज ने कुर्सी खींच ली और डॉक्टर सावंत के करीब बैठ कर उसे रात वाली सारी घटनाए सुना दी।

सारी बातें सुनकर डॉक्टर सावंत ने गहन गम्भीरता से सोचते हुए कहा

"इसका मतलब यह है कि सतीश उसके चुंगल में फंस गया

"जी हां। इसी बात की मुझे आशंका थी।" राज ने फिकमंदी से कहा।

"भगवान जाने अब वो उसके साथ क्या व्यवहार करें?"

"सवाल तो यह है कि आखिर वो सतीश को बेहोश करके इस तरह कोठी में किसलिए ले गए हैं।" राज ने गम्भीरता से सिर हिलाकर कहा।

"अब तो यह सोचो कि हमें क्या करना है.....हमें सतीश की गुमशुदगी की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए या नहीं?"

"उचित तो यही रहेगा कि अब हम पुलिस को सूचना दे ही दें।" राज बोला, "लेकिन मेरे ख्याल में आज का दिन और

ठहर जाएं तो बेहतर है।"

"क्यों?" डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"मेरा इरादा आज रात को फिर उनकी कोठी में जाने का है। अगर सतीश वहां होगा तो यकीनन मुझे पता चल जाएगा। पहले तो मैं कोशिश करूंगा कि बगैर हंगामें के किसी तरह उसे छुड़ा लाऊं। अगर मेरी कोई तरकीब काम न आई तो हम पुलिस को रिपोर्ट कर देंगे.....और मेरी राय में पुलिस को भी उस वक्त सूचना देना अच्छा होगा।, जब मैं यह यकीन कर लूं कि सतीश उसी कोठी में हैं। फर्ज करो, उन्होंने सतीश को कोठी की बजाय कहीं और पहुंचाया हो या भगवान न करे उसे मार दिया हो, ऐसी स्थिति में अगर पुलिस उनकी कोठी पर छापा मारेगी भी, तो क्या हासिल होगा? सिवा पछतावे के!"

"बहरहाल, जैसा काहो.....।" डॉक्टर सावंत ने कहा, "लेकिन मुझे तो अब तुम्हारी भी फिक्र हो गई है। तुम हर कदम फूंक-फूक कर उठाना। अगर उन्होंने तुम्हें भी घेर लिया तो मेरे लिए एक ही रास्ता बचेगा कि मैं पुलिस लेकर उनकी कोठी पर चढ़ दौडूं।"

"यही बहुत है।" राज ने कहा, "मैं रात को बारह बजे वहां जाऊंगा उम्मीद है कि तीन तीन बजे तक लौट आऊंगा। आप सुबह उठते ही हमारे फ्लैट पर फोन करके पता कर लें। अगर तब तक मै घर न लौटा हुआ तो आप तुरंत सारी बातें इंस्पेक्टर बसंत पाटेकर को बता दीजिएगा और जुलिस दल साथ लेकर कोठी पर फौरन पहुंच जाइएगा।"

"ठीक है।" डॉक्टर सावंत ने जवाब दिया-"मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन क्यों न हम क्लब से पता मालूम करके जरा जूही के यहां मालूम कर लें?"

"चलिए।" राज ने उठते हुए कहा।

फौरन वो क्लब पहुंचे और क्लब के ऑफिस से जूही का पता हासिल किया। यह जानकर उन्हें हैरत हुई कि जूही मैरीना होटल में रहती है।

वो दोनों फौरन कार में बैठ कर मैरीना होटल पहुंचे और मैनेजर से कहा कि उन्हें जूही से मिलना है।

"मिस जूही तो हाटल छोड़कर जा चुकी हैं सर।" मैंनेजर ने शालीन लहजे में कहा।

"कब?" दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

"दो दिन पहले।" मैनेजर ने रजिस्टर देख कर बताया।

उन दोनों ने अर्थपूर्ण निगाहों से एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर डॉक्टर सावंत ने पूछा

"कुछ बता सकते हैं कि वो कहां गई होंगी?"

"जी नहीं। उन्होंने जाते हुए इस बारे में हमें कुछ नहीं बताया था।" मैनेजर ने जवाब दिया।

"उसकी डाक तो होटल के पते पर ही आएगी?" राज ने पूछा, "उसके लिए वो क्या पता दे गई हैं?"

"जी हां।" मैनेजर ने रजिस्टर में एक पर अंगुलि रख दी, "वो हमें यह पता लिखवा गई हैं।"

नीलण्ठ ने वो पता पढ़ा तो वह शिंगूरा की उसी कोठी का था।

उन्होंने फिर एक-दूसरे की तरफ देखा और मैनेजर का शुक्रिया अदा करके होटल से बाहर निकल आए।

"अब?" बाहर आकर डॉक्टर सावंत ने पूछा।

"अब जाहिर है कि जूही उनकी कोठी में नहीं है। वो जरूर किसी दूसरे होटल में शिफ्ट हो गई होगी।" राज ने कहा,

"चूंकि वो पूरे हालात जानती थी और समझती थी कि सतीश के गायब होने के बाद उसे जरूर तलाश किया जाएगा। इसलिए वो दो दिन पहले ही होटल छोड़ कर निकल गई।"

"लेकिन अब हम क्या करे?" डॉक्टर ने अपना सवाल दोहराया।

"मेरा सुझाव तो यह है कि शहर के तमाम बडे-बड़े होटलों में जूही की तलाश करनी चाहिए। अगर वो मिल गई तो कई भेद खुल जाएंगे और हमें यह भी मालूम हो जाएगा कि सतीश कहां है।"

"चलो....फिर चलें।"
 
दिन भर वो बम्बई के होटलों की खाक छानते फिरे । बहुत से होटलों में खुद गए, बहुत से होटलों में फोन करके मालूम किया, लेकिन परिणाम शूनय ही रहा। जूही का कहीं से पता न चला।

आखिर जब बुरी तरह थक गए तो डॉक्टर सामत ने कहा

"राज, मेरा ख्याल है कि जूही अब किसी होटल में नहीं ठहरी होगी।"

"क्यों?" राज ने पूछा।

"इसलिए कि वो समझती होगी कि सतीश के गायब हो जाने के बाद यह केस पुलिस के पास चला जाएगा और मैरीना होटल से गायब हो जाने के बाद अगर वो किसी दूसरे होटल में गई तो पुलिस उसे आसानी से तलाश कर लगी। इसलिए उसने यही मुनासिब समझा होगा कि कहीं कोई कमरा या फ्लैट लेकर रहे

और अगर स्थिति उसके विरूद्ध हो जाए तो छुपी रहे रहे या वहीं से कहीं फरार हो जाए। अगर हालात उसे फेवर में रहे तो वो फिर खुले में निकल आए।"

"इसका मतलब यह है कि हमें जूही की तलाश खत्म कर देनी चाहिए।" यकीनन खत्म कर देनी चाहिए और किसी दूसरी दिशा में बढ़ना चाहिए।" डाक्टर सावंत ने कहा।

वो दोनों घर वापस आ गए। शाम तक राज डॉक्टर सावंत के यहां ही रहा, फिर अपने घर आ गया, ताकि रात को शिंगूरा की कोठी पर जाने के लिए तैयारी कर सके।

राज घर पहुंचा तो कलकत्ता से सुधीर का लम्बा चौड़ा पत्र आया पड़ा था। उसने राज के निर्देश के मुताबिक सलीम अनवर के बारे में पूरी जानकारी देते हुए लिखा था कि उसने कई बार करके पैंतीस-चालीस लाखा रूपया बैंकों से निकाला है। उसके मैनेजर का कहना था कि उन रूपयों का कोई माल फर्म को वसूल नहीं हुआ था। सलीम अनवर का एक छोटा भाई वसीम अनवर हो , जो कारोबारी कामों से योरोप के टूर पर गया हुआ है।

मैनेजर का कहना था कि जब वसीम भारत में था, उसी वक्त से सलीम अनवर ने बैंकों से पैसा निकालना शुरू कर दिया था। क्योंकि वो भाई की इज्जत करता था, इसलिए फर्म में बराबर का हिस्सेदार होने के बावजूद, उसने बड़े भाई से, इस मोटी रकम के बारे में कोई पूछताछ नहीं की थी।

इसी तरह की कुछ जानकारियां और भी थीं जो राज के काम की नहीं थीं।

'शायद आगे चल कर ये जानकारियां कुछ काम आएं.....।"

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राज बड़बड़ाया और दूसरे कामों में व्यस्त हो गया।

रात को ठीक बारह बजे राज शिंगूरा की कोठी पर पहुंच गया। लेकिन आज उसने कार कोठी के पीछे नहीं खड़ी की, बल्कि उन्हीं खंदकों में छुपा दी थी।

वो पैदल ही कोठी तक पहुंचा था और प्लास्टिक की रस्सी तथा पिस्तौल आज भी वो साथ ही लाया था। आज राज ने स्पोर्ट्स शू पहने थे ताकि चलने में आवाज न पैदा हो सके। अपनी तरफ से वो पूरी तैयारी करके आया था, ताकि कल की तरह आज कोई परेशानी न हो।

कोठी के बाहर का माहौल बिल्कुल सुनसान था, नीकण्ठ ने जूते उतार कर कोट की जेबों में डाल लिए और पानी के पाईप के जरिये छत पर चढ़ गया। वो रोशनदान की तरफ बढ़ गया जिसमें से रोशनी आ रही थी। आज भी छत पर अन्धेरा छाया हुआ था।

यह वही कमरा था जिसमें बीती रात जमाल पाशा और जूही मौजूद थे, भयानक सूरत जग्गा के साथ। इस वक्त वो कमरा

खाली पड़ा हुआ था। आज इधर-इधर के कई छप्परों के नीचे भी रोशनी चमक रही थी।

राज ने पहले छप्पर के बराबर वाले छप्पर के नीचे कमरे में झांक कर देखा, नीचे कमरे में जमाल पाश और जूही बैठे ताश खेल रहे थे।

थोड़ी देर तक राज यह सोच कर वही कान लगाए बैठा रहा कि शायद वो दोनों काम की बात छेड़े। लेकिन इस वक्त वो शायद पूर्णतया खेल में मगन थे। इसलिए वो उठ कर तीसरे छप्पर की ओर बढ़ गया।

तीसरा कमरा वाकई दिलचस्प था। यह कमरा उस रहस्यमय डॉक्टर की लेब्रॉटरी था। बहुत बड़ा हॉल थो, जिसमें प्रयोग करने की बहुत सी चीजें, शीशे के जार-शीशियां, नलकियां, और कई तरह की छोटी-बड़ी मशीनें करीने से लगी हुई थीं। प्रेक्टिकल मेज पर कई मर्तबानों में सांप रखे हुए थे। कमरे की दाईं तरफ वाले दरवाजे पर एक बोर्ड लगा हुआ था, जिस पर लिखा गया था

"सावधान! इस कमरे में जिन्दा और जहरीले सांप हैं।"

यन्त्रे और शीशियों का भण्डार देख कर ही राज ने अन्दाज लगा लिया कि जिस डॉक्टर की लेब्रॉटरी है, वो यकीनन

सांपों और उनके जहरों का एक्सपर्ट होगा।
 
कमरा इस वक्त बिल्कुल खाली था, लेकिन बिजली के एक कम वोल्टेज वाले हीटर पर शीशे का एक जार रखा हुआ था, जिसमें बादामी रंग का कोई तरल रसायन खौल रहा था। उस जार में से दो-तीन कांच की नलकियां बाहर निकली हुई थीं।

उन नलकियों में से एक तो एक बड़ी सी बोतल में फिट थी, दूसरी किसी ठण्डी रास्ते से होती हुई पानी से भरे एक बर्तन में पहुंच रही थी। बोतल वाली नलकी से बोतल में हल्के बादामी रंग का तरल पदार्थ बूंद-बंद करके टपक रहा था। इसका मतलब यह था कि वो डॉक्टर थोड़ी देर के लिए ही कमरे से बाहर गया है।

राज ने सोचा , जब तक यह डॉक्टर वापिस आए, तब तक वो दूसरे कमरे को ही देख ले, यह तीसरा कमरा वाकई काम का निकला, क्योंकि उसमें वो चीज मौजूद थी जिसकी राज को तलाश थी यानि सतीश।

कमरा बिल्कुल सादा था। फर्श पर एक दरी बिछी हुई थी और चार कुर्सियां इधर-उधर रखी हुई थीं। बाईं दीवार के पास एक लम्बी सी मेज पड़ी हुई थी, जिस पर सतीश बेहोश पड़ा हुआ था ओर एक आदमी हाथ में सिरिंज लिए उसके करीब खड़ा हुआ था, जो दूसरे हाथ से सतीश की नब्ज देख रहा था।

वो शख्स क्योंकि सतीश पर झुका हुआ था, इसलिए राज को उसकी पीठ ही दिखाई दे रही थी। राज ने अन्दाज लगाया कि यही शख्स वो रहस्यमय डॉक्टर होना चाहिए, जिसकी कल रात जमाल पाशा और जग्गा की बातों में जिक्र आया था।

कमरे की उत्तरी दीवार में एक दरवाजा, जिस पर लाईट ब्राउन कलर का भारी पर्दा पड़ा हुआ था। सतीश को बेहोश और एक रहस्मय डॉक्टर के कब्जे में देख कर राज के दिल की धड़कने तेज हो गईं। उसे खौफ होने लगा कि वो न जाने क्या करना चाहता है। न जाने इस इंजेक्शन के जरिये वो डॉक्टर न जाने कौन सी खतरनाक दवा सतीश के जिस्म में दाखिल करना चाहता है।

"कहीं यह किसी सांप का जहर तो नहीं है?" यह सोच कर राज के रोंगेटे खड़े हो गए।

उसने फुर्ती से जेब में से पिस्तौल निकाल लिया और फैसला कर लिया कि अगर डॉक्टर ने सतीश को इंजेक्शन लगाने की

कोशिश की तो वह फौरन फायर कर देगा और सतीश के जिस्म में जहर दाखिल होने से पहले ही इस खूनी डॉक्टर का खात्मा कर देगा। अपने निशाने पर राज को गर्व था, इसलिए वो पिस्तौल हाथ में मजबूती से थामे डॉक्टर के अगले कदम का इन्तजार करने लगा।

लेकिन उसके बाद जो हुआ, वो इतना भयंकर और रहस्यमय था कि राज के पूरे होश उड़ गए। अगले ही पल उसकी सारी योजना पानी की तरह बह गई। ऐन उस वक्त , जब वो पिस्तौल हाथ में लिये गोली चलाने को तैयार खड़ा था, कमरे का दरवाजा खुला और एक ऐसी हस्ती ने कमरे में कदम रखा, जिसे देखने की नीकण्ठ ने कल्पना भी नहीं की थी यहां।

और वो रहस्यमयी हस्ती थी ज्योति । सचमुच की ज्योति ।

वहीं ज्योति जो डेढ़ साल पहले एक निहायत ही जहरीले सांप के काटने से मर गई थी।

वो निश्चित रूप से ज्योति ही थी। राज की आंखें ज्योति के मामले में धोखा नहीं खा सकती थीं। वही खौफनाक लेकिन जादुई आंखें , वही गुलाबी गाल, वही मनमोहक नाक-नक्शा। वो स्तब्ध खड़ा सोच रहा था।

"लेकिन वो तो मर गई थी? फिर यह क्या मायाजाल है? क्या रहास्य है यह?"

खाशी भरे खौफ के मारे राज के अंग-अंग में सनसनी की लहरें दौड़ रही थीं, उसकी निगाहें एकटक ज्योति के चेहरे पर टिकी हुई थी और दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

राज ने अपनी आंखें मली कि कहीं वो कोई ख्वाब तो नहीं देख रहा? अपने हाथ पर चिकोटी काटकर देखी, उसने पाया कि यह हकीकत है और वह जाग रहा है, वह ख्बाव नहीं है और जागते में, पूरे होशो-हवास में अपने सामने एक ऐसी औरत को देख रहा था डेढ़ साल पहले उसकी आंखों के सामने मर चुकी थी और एक डॉक्टर के रूप में उसने खुद उसकी लाश का मुआयना करके उसे मृत घोषित किया था।

तो क्या यह ज्योति का प्रेत है? मुमकिन है उसकी जुड़वां बहन हो या हमशक्त?

राज इन सम्भावनाओं पर ही सोच रहा था कि अचानक उसे एक जोरदार झटका लगा। पहले से भी ज्यादा हैरत भरा।

ज्योति धीरे-धीरे मस्त हाथियों की चाल चलते हुए सतीश वाली मेज के करीब पहुंची तो कदमों की आहट सुनकर उस डॉक्टर ने पलट कर उसकी तरफ देखा।

जब राज की नजर उस डॉक्टर के चेहरे पर पड़ी तो खौफ और दहशत के मारे उसके मुंह से चीख निकलते-निकलते रह गई। वो डॉक्टर जय था। जय वर्मा, जो ज्योति की मौत कुछ घंटे ही जहर पीकर मर गया था।

वहीं डॉक्टर जय वर्मा, ज्योति के जुर्मों का भागीदार और उसका गुप्त प्रेमी था और खुद राज का कथित दोस्त । इन रहस्यमय हालात में राज का सिर चकराने लगा, उसे अपने आप पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था।

उसने कांपते हाथ से पिस्तौल जेब में रखी और छप्पर का सहारा लेकर बैठ गया ताकि गिरने से बच सके। इस वक्त खौफ दहशत और हैरत से उसका दिल इस तरह धड़क रहा था जैसे वो कई मील दौड़कर आया हो।

लेकिन ठीक उसी वक्त एक तीसरी दुर्घटना घट गई। राज डेढ़ साल पहले मर चुके ज्योति और डॉक्टर जय को अपपनी आंखों के सामने जिन्दा देखकर बिल्कुल निढाल हो गया था। और अभी अपनी सांसों पर भी काबू नहीं कर सका था कि उसे अपनी गर्दन पर दो सख्त हाथों की मजबूत पकड़ महसूस हुई।

राज ने चौंक कर खुद को छुड़ाने के लिए हल्का सा संघर्ष किया जो बेकार था, कयोंकि हालात ने उसे बिल्कुल निढाल और

बेबस कर दिया था।

उसने फिर तड़पने की कोशिश की, लेकिन इस प्रयास में उसकी गर्दन पर केसे हाथों की पकड़ और तंग हो गई। राज को अपनी सांसें सीने में घुटती महसूस हुईं और उसकी आंखों के सामने अन्धेरा फैलता गया।

उसे आखिरी बात यही याद थी कि एक चेहरा उसकी निगाहों के सामने आया था, और यह चेहरा भयानक सूरत जग्गा का चेहरा था। उसके बाद राज को होश नहीं रहा।

दोबारा जब नीकण्ठ की आंख खुली तो उसने खुद को उसी कमरे में पाया जहां सतीश मेज पर बेहोश पड़ा हुआ था। वो

एक कुर्सी पर बंधा बैठा था और उसके हाथ पीठ पीछे बंधे हुए थे।

नीचे फर्श पर उसकी पिस्तौल, प्लास्टिक की रस्सी, उसके जूते

और जेबों का तमाम सामान पड़ा हुआ था। सामने सतीश उसी मेज पर अभी तक बेहोश पड़ा हुआ था।
 
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