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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
बीच का करीब पन्द्रह दिनों का वक्त राज को मिस्र जाने की तैयारियों में लग गया। वो घड़ी आ ही पहुंची, जब राज को अपने दोस्त सतीश और अपनी खतरनाक मगर हसीन भाभी से विदा लेकर लम्बे समय के लिए बिछुड़ जाना था।

रेलवे स्टेशन तक ज्योति और सतीश उसे छोड़ने पहुंचे थे। सतीश बहुत उदास था और ज्योति काफी दुखी नजर आ रही थी। उनकी पार्टी में सह आदमी थे, इसलिए फर्स्ट क्लास का एक पूरा कम्पार्टमेंट बम्बई तक के लिए बुक करवा लिया गया था, मुम्बई से समुद्री जहाज में यात्र करनी थी।

गाड़ी छूटने में अभी करीब आधा घंटा बाकी था, इसलिए राज, सतीश और ज्योति रिफ्रेशमेंट रूम मैं आ बैठे, ताकि चाय के साथ-साथ बातें भी हो सकें।

"वहां जाकर चिी-पत्र तो लिखी करोगे?" चाय आने के बाद ज्योति ने ट्रे अपनी तरफ सरकाते हुए कहा

"जरूर....नियमित रूप से।" राज ने जवाब दिया।

"लिखोगे?" सतीश ने झुंझला कर कहा, ''पर तुम कभी भी नियमित रूप से पत्र नहीं लिख सकते। मैं तुम्हारी आदतें अच्छी तरह जानता हूं।"

"नहीं राज जी, ऐसी हरकत हरगिज न करना, बर्ना कम से कम मुझे बहुत कष्ठ होगा।" ज्योति ने बड़े मासूम लहजे में कहा।

"नहीं भाभी। यह तो बस यों ही झल्लाहट निकाल रहा है। बर्ना मैं तो खतो-कितावत में बहुत चुस्त आदमी हूं। हर रोज पत्र लिखा करूंगा। एक-एक पत्र के दो-दो जवाब दिया करूंगा।" राज ने हंस कर कहा।

ज्योति भी हंस पड़ी। वो चाय तैयार कर चुकी थी, उसने कप उन दोनों की तरफ सरका दिया।

चाय के दौरान कोई बात नहीं हुई। तीनों खामोशी से चाय पीते रहे। राज ने यह जरूर महसूस किया कि ज्योति की । जादूभरी निगाहें उसके चेहरे का थोड़ी-थोड़ी देर बाद गौर से जायजा लेती रही हैं। जैसे वो राज को परख रही हो या फिर इस लम्बी जुदाई के ख्याल से उसे जी भर कर देख लेना चाहती हो।

उसकी बड़ी-बड़ी खूबसूरत आंखों में आज एक साथ-साथ कई भाव नाच रहे थे। एक तेज चमक, थोड़ी उदासी और थोड़ा सा दुख भी। जैसे वो अपनी आंखों से ही कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन किसी वजह से कह न पा रही हो । राज ने घड़ी देखी तो गाड़ी छूटने में सिर्फ दस मिनट रह गए थे।

"दस मिनट रह गए हैं, अब हमे चलना चाहिए।" राज बोला, साथ ही वो उठ खड़ा हुआ। ज्योति और सतीश भी खामोशी से उठ खड़े हुए। ज्योति ने बिल पे किया और तीनों बाहर आ गए।

बाहर निकलते हुए राज ने मूड जरा हल्का बनाने के लिए मजाकिया लहजे में कहा

"भाभी, सतीश मेरा बड़ा प्यारा दोस्त और बड़ी सीधा-सादा आदमी है और सच्चा निष्ठावान भी, बेवकूफी की हद सीधा! इसे मैं आपके भरोसे छोड़े जा रहा हूं, जरा इसका ख्याल रखियेगा।"

"ओह राज, सतीश की तुम चिंता ने करो। ये इतने सीधे सादे भी नहीं हैं जितने कि शक्ल से नजर आते हैं।" ज्योति ने कहा और उन दोनों के दरम्यान में आकर उसने अपने एक हाथ थाम लिया।

उसका नर्स और नाजुक हाथ अपने हाथ में आते ही राज के बदन में झुरझुरी सी आ गई। उसे ऐसा लगा जैसे सैंकड़ों च्यूटियां उसकी रगों में दौड़ने लगी हों।

राज के सारे बदन में ज्योति के गुदाज हाथ की गर्मी लहरें बनकर दौड़ गई थी। बहुत दिनों से राज ज्योति के उस खतरनाक नेकलेस को भूला हुआ था। लेकिन इस वक्त ज्योति का हाथ छूते ही भगवान जाने क्यों, उसकी निगाहें उसके नेकलेस की तरफ उठ गईं।

नेकलेस ज्योति की स्वच्छ, सुराहीदार गर्दन में पड़ा जगमगा रहा था।
 
चांदी के नेकलेस में जड़े हुए दोनों नीलम, जो आंखों की जगह लगे हुए थे, राज को अपनी तरफ घूरते हुए महसूस हुए थे, राज को अपनी तरफ घूरते हुए महसूस हुए और राज ने घबरा कर मुंह फेर लिया।

वो तीनों उसी तरह टहलते हुए बातें करते हुए राज वाले कम्पार्टमेंट के करीब पहुंच गए। राज का हाथ अभी तक ज्योति के हाथ में था। वो बड़ी गर्मजोशी से उसके सख्त और खुरदरे हाथ को अपनी नर्म और रेशमी हथेली के दबाव में लिए हुए थी।

अचानक गाड़ी के इंजन ने सीटी बजाई और राज नींद से जग उठा। उसने ज्योति के हाथ से अपना हाथ छुड़ाया और सतीश की तरफ बढ़ाते हुए कहा

"अच्छा दोस्त, एक लम्बे समय के हम बिछुड़ रहें हैं, लेकिन यकीन करो कि मेरा मन और मेरी आत्मा हर पल तुम्हारे पास ही रहेंगे।"

"विदा!" सतीश ने मरियल से लहजे में जवाब दिया और राज के हाथ पर अपना हाथ रख दिया। उसके बाद राज ने ज्योति से हाथ मिलाया।

"अच्छा राज, भगवान करे तुम जल्दी वापस आओ....। अपनी सेहत का ख्याल रखना। अभी सतीश के अलावा और लोगों को भी तुम्हारी जरूरत है।"

राज हंस पड़ा, वो चाहता था कि सतीश और ज्योति ज्यादा उदास न हों। खुद उसके अपने दिल में भी उन से पिछड़ने का दुख था, लेकिन मिस्र की रहस्यमय धरती की सैर की कल्पना ने उसे ज्यादा उदास नहीं होने दिया। गाड़ी ने दूसरी सीटी दी और हल्का सा झटका लेकर चलने लगी। राज ने सतीश और ज्योति से दोबारा हाथ मिलाया और दौड़कर कम्पार्टमेंट में सवार हो गया।

गाड़ी की रफ्तार तेज हो गई। सतीश और ज्योति हाथ हिला हिला कर उसे विदाई देते रहे । राज कम्पमेंट के दरवाजे में खड़ा सोचता रहा।

"अब सतीश का क्या होगा? अगर ज्योति, मेरे अनुमान के मुताबिक वाकई खतरनाक हसीना है तो यह सीधा सादा आदमी कैसे उसके खौफनाक चंगुल से बच पाएगा?" पहली बार उसे पछतावा हुआ कि उसने क्यों मिस्र जाने का फैसला कर लिया! पहले तो वह एक दो साल ज्योति के रंग-ढंग देखता। अगर वो कोई फरेब का जाल बिछाती भी तो सतीश को बचाने की कोशिश करता।

इस वक्त उसे अहसास हो रहा था कि सतीश को अकेला छोड़कर उसने वाकई भयंकर गलती की है। वो अपने सबसे प्यारे दोस्त के साथ बेवफाई कर रहा है। वाकई अब वक्त गुजर चुका था, इसलिए फिक्र से कुछ नहीं हो सकता था। गाड़ी दूर निकल आई थी और सतीश के साथ ज्योति राज की निगाहों से ओझल हो गए थे।

राज थके हुए दिमाग और सुस्त कदमों से चलता हुआ अपनी सीट पर आ बैठा। लेकिन अब उसका दिमाग यहां से बहुत दूर मिस्र की रहस्य जादू भरी धरती पर घूम रहा था। ट्रेन के किनारे उसके जेहन में घूमने लगे, पिरामिडों भरा रेगिस्तान खामोश हो गया और राज नींद की गोद में चला गया।

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मिस्र की रहस्यमय प्राचीन धरती पर कदम रखते ही राज हर चिंता, फिक्र और उलझन से छूट गया था। फराउनों के हजारों साल पुराने मकबरे....डरावने पिरामिड और तपते रेगिस्तानों में उड़ते रेत के करोड़ों कणों का संगीत-ये तमाम चीजें उसके आकर्षण का केन्द्र बन चुकी थीं।

अभियान दल के सभी सदस्य दिन पर सैर-सपाटे में व्यस्त रहते। मार्डन मिस्र की चहल-पहल से ज्यादा उन्हें रेगिस्तानों में पिरामिडों में घूमना अच्छा लगता था। बड़ी शांति मिलती थी

उन्हें उन हजारों साल पुराने पिरामिडों और महलों के खामोश खण्डरों में रहते हुए।

बिखरी हुई चांदनी में वो पूरी रात रेत में नील नदी के किनारे गुजार देते और उन्हें ऐसा लगता था जैसे वो किसी नई और अनोखी दुनिया में पहुंच गए हों। जहां की हर चीज में एक अजीब सा सादू बसता है। हर रहस्यभरी है, जहां के कण-कण पर प्राचीन कहानियां लिखी पड़ी हैं।

मिस्र में उस अभियान के दौरान अगर कभी राज को अपना वतन याद आता भी था वो उस समय जब उसे ज्योति का कोई पत्र मिलता था। सतीश के पत्र भी उसे आते रहते थे।

सतीश का पत्र पढ़ कर और यह जानकर कि सतीश चैन की जिन्दगी गुजार रहा है, राज के मन को सन्तोष प्राप्त होता था।

ज्योति का पत्र भी वो पढ़ता, लेकिन सतीश की तरफ से निश्चित हो जाने के बावजूद भी राज ने जाने क्यो उसका पत्र बड़े खौफ और आतंक की हालत में खोलता था। सावधानी से पढ़ता था और न चाहते हुए भी जवाब दे देता था।

जिस अभियान पर वो लोग आए थे, वो जरूरत से ज्यादा ही लम्बा हो गया और उन्हें मिस्त्र में एक साल के करीब लग गया था।

इस काल साल के अर्से में राज को मिस्र के अलावा अफ्रीका के कई दूसरे इलाकों में घूमने का भी काफी मौका मिल गया था, जहां सभ्यता के कदम अभी तक नहीं पड़े थे।

इसी महा रेगिस्तान में राज को एक अजीब शख्त से भी मिलने का मौका मिला। वो शख्स अहम इसलिए था क्योंकि वो बहुत से सांपों की किस्मों और ऐसी चीजों को जानता था जिनका जिक्र मात्र ही किसी के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी होता है।

वो शख्स मिस्री मूल का था और उसे नए-नए जहर खोजने का जनून की हद तक शौक था। उसे कांप, बिच्छुओं, छिपकलियों और कई तरह के प्रयोग भी कर चुका था। इसलिए उस शख्स से जल्दी ही उसकी दोस्ती हो गई थी।

लेकिन राज ने जल्दी ही मासूम कर लिया था कि उसका ज्ञान उस शख्स से सामने कुछ न होने के बराबर ही था। उसकी और राज की तुलना ऐसी ही थी जैसे किसी प्रोफेसर और पांचवीं क्लास के छात्र की हो। यह हकीकत थी कि संबंध बढ़ जाने पर राज ने उससे बहुत कुछ सीखा था।

उसने राज को अफ़्रीकी उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले बहुत से सांपों से परिचित कराया, उनकी भनायक क्षमताओं की दास्तानें सुनाई, उनके जहरों के तोड़ और मिश्रण बनाने सिखाए। करीब छ: महीने तक वो शख्स पार्टी के साथ-साथ रहा और राज उससे ज्ञान प्राप्त करता रहा। इन छ: महीनो में राज ने उस डॉक्टर से इतना कुछ सीख लिया जितना कि उसने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं सीखा था।
 
एक बार जब वो सांपों के जहरों पर कोई प्रयोग कर रहे थे तो उसने राज को बताया कि इस महारेगिस्तान के एक हिस्से में एक बड़ा हैरतअंगेज सांप पाया जाता है।

"कैसा सांप होता है वो?" राज ने उत्सुकता से पूछा।

उस डॉक्टर ने बताया

"होता तो वो बहुत छोटी किस्म का सांप है, और मजे की बात यह कि उसके दांत नहीं होते। लेकिन वो इतना ज्यादा खतरनाक होता है कि बड़े से बड़े जहरीला सांप भी उसके सामने कुछ नहीं होता है।"

"आखिर ऐसी क्या खास होती है उसमें कि वो बाकि सब जहरीले सांपों से ज्यादा मारक होता है?"

राज ने सवाल किया था।

"खास बात?" मुस्करा कर बोला था वह- "सबसे खास बात तो उस सांप में यह होती है कि अगर किसी भी तरीके से इन्सान के जिस्म में उसका जहर दाखिल कर दिया जाए तो इन्सान को दुनिया की कोई भी ताकत मरने से नहीं बचा सकती। और दुनिया का कोई भी डॉक्टर उसका पोस्टमार्टम करके यह नहीं कह सकता कि उसकी मौत किसी जहर से हुई है।"

"वाकई!" राज ने हैरत से कहा, "अगर उस कांप से इस तरह का जहर पाया जाता है तो वह यकीनन दुनिया का सबसे हैरत भरा और मारक सांप है।"

"वाकई!" राज ने हैरत से कहा, "अगर उस सांप में इस तरह का जहर पाया जाता है तो वह यकीनन दुनिया का सबसे हैरत भरा और मारक सांप है।"

और कीमती भी।" उस डॉक्टर ने अर्थपूर्ण ढंग से राज की तरफ देखते हुए कहा।

"जी हां, यकीकन उस सांप का जहर बहुत कीमती चीज है जिससे बड़े-बड़े काम लिए जा सकते हैं। राज ने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा।

"लेकिन उस नस्ल के सांप सिर्फ अफ्रीका के एक खास इलाके में ही पाए जाते हैं, वो भी बहुत कम संख्या में। वो एक नायाब नस्ल हैं। पुराने हकीम और वैद्य उस सांप और उसके जहर के बारे में पूरा ज्ञात रखते थे और उसके जरिये और बहुत से माली और पॉलिटिकल लाभ उठाते रहते थे। शाही खानदानों की खतरनाक साजिशों में हमेशा उसी सांप के जहर का इस्तेमाल किया जाता रहा है और जालिम बादशाहों को कोई बार उस जहर की मदद से पलक झपकते से भी पहले मौत की नींद सुला दिया गया था। मशहूर तो यह भी है कि मिस्र की हसीन परी मलिका क्लियोपेट्रा ने भी इस जहर का खूब अच्छी तरह से अपने दुश्मनों पर इस्तेमाल किया था।"

"आपके पास वो सांप है?" राज ने दिलचस्पी से पूछा था?

"नहीं।" उसने अफसोस से गर्दन हिलाकर जवाब दिया, "एक तो वह नस्ल सब से नायाब ही रही है, दूसरे मेरे पास जो एक सांप था, वो मैंने सात आठ साल पहले एक इण्डियन डॉक्टर के हाथ बेच दिया था।

"इण्डियन डॉक्टर के हाथ?" राज की हैरत सौ गुना बढ़ गई थी।

"हां, वो डॉक्टर भी तुम्हारी तरह जहरों पर एक्सपेरीमेंट करने का दीवाना था और इसी वजह से मेरी उससे दोस्ती हो गई थी। रूखसत होते वक्त उसने मुझसे वो सांप खरीदने की इच्छा प्रकट की थी, जिसे मैं ठुकरा नहीं सका था और सांप उसके हाथ बेच दिया था।"
 
राज को भी उस वक्त, उस सांप को न देख पाने का दुख हुआ, लेकिन वो इस मामले में कुछ भी तो नहीं कर सकता था। मजबूरी की बात थी।

बहुत देर तक दोनों उस सांप और उसके जहर के बारे में चर्चा करते रहे, फिर राज न पूछा।

"क्या उस सांप का जहर सांप के काटने के फौरन बाद असर कर देता है?"

"नहीं। मैंने अभी कहा था कि उस सांप के दांत नहीं होते, उसका जहर सिर्फ जुबान में होता है। आप सांप को हाथ में ले लें, वो आपके जिस्म पर रेंगता रहे, कुछ नहीं होगा, चाहे वो आपको अपनी जहर कभी चुबान से चाटता भी रहे, तब भी कोई नुकसान नहीं होगा। हां, जिस जगह उसकी जुबान लग जाती है, वो अंग जहरीला हो जाता है, और कई दिनों तक उसका असर बाकी रहता है। लेकिन उसकी जुबान अगर किसी के जिस्म के ऐसे हिस्से से छू जाए जिससे कि जहर खून में मिल जाए तो फिर जान जाना यकीनी हो साता है।"

"बड़ा अजीब और खतरनाक जहर है।" राज ने हैरत से कहा।

"हां। लेकिन मैंने उस सांप के जहर का तोड़ उसी के जहर से तैयार किया है। अगर जहर ने पूरी तरह बदन के अन्दरूनी अंगों पर असर न किया हो तो या जहर किसी कमजोर तरीके से खून में गया हो तो ऐसे शख्स को मारने से बचाया जा सकता है। लेकिन अगर जहर ख़तरनाक मात्र में जिस्म में समा चुका हो तो मुश्किल हो जाती है। मैं कोशिश कर रहा था कि ज्यादा ताकतवर तोड़ बना सकूँ जो ज्यादा कम वक्त में पहुंचाए, कि तभी वो सांप मुझे बेचना पड़ा और मेरा वह प्रयोग अधूरा ही रह गया।"

उसने रूककर गहरी सांस ली और आगे बोला

"अब अगर कभी किस्मत से मुझे उसी नस्ल का कोई दूसरा सांप मिल गया तो मैं अपना प्रयोग फिर से शुरू कर दूंगा।" उसके बाद उसने उस जहर का और उसके तोड़ का प्रयोग राज को करके दिखाया।

जब एक साल बाद राज भारत वापिस आ रहा था तो, वो सांप, उसका जहर और उसका तोड़ उसके जेहन में चक्कर काट रहा था।

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बम्बई बन्दरगाह पर जहाज से उतर कर राज ने सतीश को अपने आगमन की खबर और कुशल मंगल का बता दिया था, इसलिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सतीश और दोनों ही उसके स्वागत के लिए मौजूद थे।

प्लेटफार्म पर कदम रखते ही राज की नजर सबसे पहले ज्योति के हसीन मुखड़े पर पड़ी जो खुशी से चमक रहा था। राज ने महसूस किया था कि एक साल के अर्से में ज्योति का हुस्न कुछ और निखर आया था। उसकी निगाहें ज्योति के चेहरे से फिसलती हुई उसके गले में पड़े हुए सांप जैसे नेकलेस पर जाकर जम गई। फिर एक पल के लिये राज की खोपड़ी घूम कर रह गई। भगवान जाने उस सांप में ऐसी कौन सी शैतानी चीज छुपी हुई थी कि उसे देखकर राज के बदन में सनसनी की लहरें दौड़ने लगती थीं।

"हैलो राज!"

नजर मिलते ही वो मधुर मुस्कराहटों के फूल बरसाती हुई राज की तरफ बढ़ी। तो बिल्कुल उसी तरह हसीन और जवान थी जैसे पहले थी।

"हैलो भामी, कैसी...."

राज इतना ही कह पाया था कि किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया। राज बात अधूरी छोड़कर ही घूम गया। लेकिन घूमते ही खौफ और आतंक से राज की आंखें फैल गईं और वो

" सतीश...।" कह कर अपने दोस्त से लिपट गया।

"यह तुम्हें क्या हो गया है सतीश?" उसने सतीश के कंधे पर हाथ रखकर कहा। सतीश इस एक साल के अर्से में सिर्फ हायों का ढांचा भर रह गया था।

यही वही सतीश था जो एक साल पहले तक पत्थर से तराशी गई एक मूर्ति की तरह सख्त और सुडौल था। वही सतीश इस वक्त राज के सामने एक कंकाल की तरह खड़ा था, जिस पर पतली सी खाल मढ़ दी गई हो। जैसे वो कई सालों से बीमार चला आ रहा हो।

सतीश को इस स्थिति में देखकर खूबसूरत औरत कीमती लिबास में होने के बावजूद ज्योति एक भयानक डायन नजर आने लगी। पांच पतियों को हड़प जाने वाली डायन-जो अब छठे पति का खून चूस रही हो!

अनापेक्षित रूप से सतीश की हालत देखकर राज के होश उड़ गए और कुछ देर बो स्तब्ध सा खड़ा रह गया था। ऐसा लग रहा था कि उसका दिमाग सुन्न हो गया हो। उन दोनों से उसकी क्या-क्या बातें हुईं और वो स्टेशन से घर कैसे पहुंचा, राज को कुछ याद नहीं था।

जब उसके होशों-हवास काबू में आए तो वह सतीश की कोठी के एक भव्य सजे सजाए कमरे में बैठा हुआ था। वो ज्योति और सतीश के दाम्पत्य जीवन के बारे में सोचने लगा। लेकिन शायद व्यर्थ में और वक्त निकल जाने के बाद।

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कई दिन बीत गए, राज जितना भी उन दोनों के बारे में सोचता, उतना ही परेशान होता रहता। इसमें तो अब राज को शक की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती थी कि ज्योति ही अपने पूर्व पांचों पतियों की मौत की वजह थी। जिसका जीता जागता सबूत मौत के मुंह में लटका उसका पांचवां पति सतीश था। लेकिन सतीश के लिए सबसे बड़ी परेशानी यही थी कि ये सब बातें सही जान और सही मान लेने के बावजूद, उसके पास ऐसा कोई ठोस सबूत तो क्या कच्चा सबूत भी नहीं था, जो ज्योति को मुजरिम ठहरा सके।

राज को यह भी यकीन था कि ज्योति कोई जहर इस्तेमाल नहीं करती अपने पतियों को मारने के लिए-क्योंकि राज का विचार था कि ऐसा कोई जहर नहीं है जो आदमी को धीर-धीरे करके खत्म कर सके और किसी भी टेस्ट में वो जहर न पाया जाए, न मरने के बाद पोस्टमार्टम में जिसकी पता चल पाए।

वो सोच रहा था

अब दूसरी सूरत यही थी कि ज्योति वाकई कोई खतरनाक जादूगरनी थी....या उसके गले का सांप जैसा नेकलेस ही अपने अन्दर कोई शैतानी ताकत रखता है।

इस आखिरी चीज के अलावा राज की समझ कोई बात नहीं आ रही थी। लेकिन समस्या यह थी कि भूतप्रेत, शैतान या अदृश्य शक्ति वाली बातों को उसका दिमाग कबूल नहीं करता था, क्योंकि वो एक पढ़ा-लिखा डॉक्टर था, जो ऐसी बातों को टोटल अंधविश्वास कहते हैं।

सतीश का राज ने कई बार मैडिकल चैकअप भी किया था और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता से भी कई बार चैकअप करवाया था, उसके बाद वो घंटों सतीश की रहस्मयी बीमारी पर डिसकस करते रहे थे।

लेकिन सब बेकार रहा था, क्योंकि सतीश के जिस्म के भीतरी अंग बिल्कुल ठीक काम कर रहे थे। सतीश को न जाने ऐसी कौन सी बीमारी थी कि वो दिन-ब-दिन घुलता जा रहा था।

अब डॉक्टर गुप्ता भी राज से सहमत होता जा रहा था। जो सन्देह राज ने ज्योति के पांचवे पति बैरिस्टर खोसला के जीवन में जाहिर किए थे और बैरिस्टर खोसला की मौत के बाद उकसी लाश का पोस्टमार्टम करते हुए राज को भी इसलिए साथ रखा ताकि वो ज्योति को निर्दोष साबित कर सके कि ज्योति का पांचवा पति बैरिस्टर खोसला वाकई स्वाभिव मौत मरा और अब वही स्वाभाविक मौत पल-पल सतीश के करीब आती जा रही थी, जिसे देखकर डॉक्टर गुप्ता को राज की बातों पर यकीन करना पड़ा था। मगर दोनों डॉक्टरों को अफसोस था कि सब कुछ जान लेने और सब बातों पर यकीन कर लेने के बाद भी दोनों के दोनों बेबस थे, वो कुछ नहीं कर सकते थे।

देखने में सतीश और ज्योति की वैवाहिक जिन्दगी बड़े प्यार-मोहब्बत और सुख-शांति से गुजर रही थी। सतीश अब भी ज्योति का उसी तरह भक्त था और ज्योति अब भी दीवानों की तरह उसे चाहती नजर आती थी।

उन्हीं दिनों एक बात राज ने और नोट की कि ज्योति अब उस पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान होती जा रही थी। अपने प्रति ज्योति के इस अप्रत्याशित प्यार भरे व्यवहार से राज बहुत परेशान था। "क्या वो मुझे अपनी मोहब्बत के जाल में फांसकर सतीश की तरफ से मेरा ध्यान हटाना चाहती है? वो अक्सर सोचता था कि वो जल्द से जल्द सतीश का किस्सा खत्म कर देगा। या फिर वो अपनी खूबसूरत और खौफनाक मोहब्बत की झलक दिखा कर मेरा मजाक उड़ाना चाहती है?"

लेकिन यह समस्या भी रहस्य में ही रही। दरअसल इस विषय में राज ने ज्यादा विचार नहीं किया था। क्योंकि राज के सोचने के लिए इस वक्त सतीश की जान का सवाल सबसे पहला प्वाईंट था। इस वक्त राज की सारी दिमागी ताकतें सतीश की सम्भाविक मौत के बारे में सोचकर उसे बचाने की तरकीबें ढूंढने में लगी हुई थीं।

आखिर कई दिनों के सोच-विचार के बाद राज को यकीन हो गया कि इस सारे खौफनाक खेल का जिम्मेदार वही मनहूस सांप जैसा नेकलेस है, जो ज्योति की सुराहीदार गर्दन में पड़ा हुआ है।

जरूर वो कोई काले जादू का यंत्र है, जिसके जरिये वो अपने पतियों को मौत के घाट उतार देती है और सब उसका दोस्त सतीश भी उसी की वजह से मौत की घाटी में उतर रहा है।

अपने पर ज्योति की प्यारी मेहरबानियों का अर्थ भी जब कुछ-कुछ राज की समझ में आने लगा था। वो चाहती थी कि जब उसका छठा शिकार, यानि सतीश मौत के मुंह में समा जाए तो उसे सातवें नौजवान शिकार की तलाश में ज्यादा न सिर खपाना पड़े। बल्कि वो फौरन ही उसे अपने शिकंजे में कस ले।

इसीलिए वो एक चतुर मकड़ी की तरह पहले से ही राज के गिर्द प्यार-मोहब्बत का मजबूत जाल बुन देना चाहती थी। इसी असमंजस में राज ने कुछ दिन और गुजाए दिए। हालांकि ये दिन उसके कई बरसों की तरह गुजरे। क्योंकि गुजरने वाला हर पल उसके जिगरी दोस्त को मौत की तरफ धकेल रहा था।

और राज.... सतीश का जिगरी दोस्त हैरान था कि करे तो क्या करे? किस तरह उस बदकिस्मत को मौत के मुंह में जाने से रोके? किस तरह उस खूबसूरत नागिन से अपने दोस्त की जान छीने?

सोचते-सोचते राज का दिमाग थक गया, लेकिन उसकी समझ में यह राज नहीं आया कि आखिर ज्योति के पास ऐसी कौन की गुप्त शक्ति है जिसके जरिये वो अपने शिकार को इस तरह घुला-घुला कर मार देती है?

कई बार ज्योति की अनुपस्थिति में राज ने उसके कमरे की भी तलाशी ली। उसकी आलमारियों को, बक्सों को, बॉक्स बाले बैड को टटोल-टटोल कर देखा कि शायद कोई ऐसी चीज मिल जाए जिससे इस उलझी हुई हुई डोर का कोई सिरा हाथ आ जाए।

लेकिन उसे एक कण भी ऐसा न मिला जो उसे आगे बढ़ने को कोई रास्ता सुझा सके या उसके शक को पुख्ता कर सके। ज्योति के सामान में उसक कपड़े, मेकअप का सामान और कीमती जेवर ही थे, इसके सिवा कुछ नहीं था। बहुत कोशिश के बावजूद उसे कोई ऐसी डायरी कोई लेख, कोई चिी-पत्र नहीं मिली जो इस रहस्य पर से पर्दा हटा सके।

न ही राज को किसी ऐसे रसायन की छोटी-सी शीशी मिली जिसे वो जहर समझ लेता, ने ही कोई ऐसी चीज उसके हाथ लगी जिसे जादू-टोने से सम्बन्धित समझा जाए।

यानि एक चालाक मुजरिम की तरह उसने अपने पीछे कोई निशान नहीं छोड़ रखा था, जिसके जरिए किसी नतीजे पर पहुंचा जा सके।

इस दौरान एक मामूली सी घटना घटी, जिसने राज को और ज्यादा उलझा दिया।
 
ज्योति अचानक कुछ अस्वस्थ हो गई। सतीश ने राज से ज्योति के लिए कोई दवा लिख देने के लिए कहा। राज का जी तो नहीं चाह रहा था, लेकिन उसने सतीश की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ज्योति का इलाज शुरू कर दिया। दो-तीन दिन तक ज्योति राज की लिखी दवाएं इस्तेमाल करती रही।

लेकिन शायद आराम इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि डॉक्टर का ध्यान पूरी उसके इलाज पर नहीं था। वो सरसरी सी उसकी चैकअप करता और दवा लिख देता था। दवाइयां बाजार से आती थीं और सतीश बड़े प्यार के साथ अपने हाथों से ज्योति को लिखा-पिला देता था। बिल्कुल सही वक्त पर, सही मात्र में।

तीन दिन तक राज की लिखीं दवाईयां इस्तेमाल करने के बाद भी जब ज्योति को कोई आराम नहीं मिला तो सतीश ने झल्ला कर किसी और डॉक्टर को फोन कर दिया। एक ऐसे डॉक्टर को, जिसे सतीश नहीं जानता था। इसी शहर में जिन्दगी गुजर देने के बावजूद राज ने उस दिल उसे पहले बार देखा था।

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डॉक्टर आया, उसने ज्योति को अच्छी तरह चैक किया और लिख कर वो चला गया। डॉक्टर के जाने के बाद राज ने सतीश से पूछा

"ये कौन थे?"

"उन्हें डॉक्टर जय वर्मा कहते हैं।" सतीश ने बताया।

"इस शहर में शायद अभी-अभी पधारे हैं?"

"नहीं यार, वो तो बहुत दिनों से इसी शहर में हैं, लेकिन पहले शहर से दूर दिल्ली देहात के एक गांव में रहते थे, इसलिए तुम्हें उनसे मिलने का संयोग नहीं हुआ होगा।"

"तुम उन्हें पहले से जानते हो?" राज ने पूछा।

"नहीं, जानता तो मैं भी नहीं था उन्हें, बस शादी के बाद ही परिचय हुआ था उनसे ।” सतीश ने बताया-"वो ज्योति के दोस्त हैं कभी-कभी मिलने आते रहते हैं।"

"क्या वो गांव में रहकर प्रेक्टिस करते हैं?"

"पता नहीं लेकिन उन्हें भी तुम्हारी तरह जहरों के बारे में शोध करने का शौक जनून की हद तक है।" सतीश ने जवाब दिया।

"जहरों के बारे में शोध और प्रयोग?' राज के मुंह से हैरत भरे शब्द निकले।

सतीश का जवाब हथौड़ की तरह उसके दिमाग पर बरसा था। अचानक उसके जेहन में एक सवाल उठा-कहीं सतीश का इस डॉक्टर के जरिये ही तो कोई भयानक जहर नहीं दिया जा रहा? वहीं जहर जिसका शहर ज्योति के पहले पांच पति हो चुके हैं?

"क्या डॉक्टर जय सांप भी पालते हैं?" राज ने बेचैनी से पूछा।

"मुझे नहीं मालूम। कई बार मिलने के बावजूद मैं कभी भी उनकी कोठी पर नहीं गया। ज्योति अकसर वहां जाती रहती है। इसे मालूम होगा।"

"वो कभी मिस्र भी गए हैं?" राज ने पूछा।

"मैं नहीं जानता। लेकिन तुम उसके बारे में इतनी पूछताछ क्यों कर रहे हो?" सतीश ने राज के सवालों से घबरा कर पूछा।

"ऐसे ही पूछ लिया था यार, कोई खास बात नहीं है।' राज ने लापहवाही से जवाब दिया।

लेकिन उसका जेहन डॉक्टर जय में ही उलझा रहा। दरअसल उसे यह आशंका हो रही थी कि शायद यही वो डॉक्टर हो जिसने उस मिस्री डॉक्टर से वो अजीबोगरीब छोटा सांप खरीदा था। उस खतरनाक सांप का ख्याल आते ही राज को एक झुरझुरी सी आ गई।

"किस सोच में पड़ गए?" सतीश ने राज को खामोश देखकर पूछा।

"कुछ नहीं!” राज अपने ख्यालों से चौंक उठा।

फिर कुछ देर सोचने के बाद उसने सतीश से पूछा

"एक बात बताओ सतीश, क्या मेरी गैरहाजिरी के दौरान ज्योति के साथ तुम्हारी, मेरी रही।” सतीश ने जवाब दिया।

"आम सी चर्चा नहीं, मेरे शौक डॉक्टरी के बारे में?"

"हां, वो जानती है कि तुम डॉक्टर हो, लेकिन सिर्फ शौकिया डॉक्टर हो।"

"अरे यार ।” राज ने झल्ला कर कहा, "क्या मेरे जहरों पर शोध के बारे में उसे मालूम है?"

"नहीं। मेरे ख्याल से इस किस्म का जिक्र हम दोनों के दरम्यान कभी नहीं छिड़ा। न ही मैंने ज्योति को इस बारे में बताने की कभी जरूरत महसूस की?"

"अच्छा किया जो उसे नहीं बताया, और कृपा करके अब बताना भी नहीं।"

"क्यों भई?" सतीश ने हैरत से पूछा।

"कोई जरूरी नहीं है कि आदमी अपनी हॉबीज का ढिंढोरा पीटता रहे।"

"ठीक है।"

सतीश ने लापरवाही से कंधे हिलाए थे और कमरे से बाहर निकल गया था। शायद उसे अचानक कोई जरूरी काम याद आ गया था।

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दूसरे दिन डॉक्टर जय फिर आया। इस बार सोचे-समझे ढंग से सतीश ने बड़े तपाक से उससे मुलाकात की। जब डॉक्टर जय ज्योति का मुआयना करके वापस जाने लगा। तो राज उसे अपने कमरे में ले आया। वो डॉक्टर जय से थोड़ी देर बातें करके उससे सम्पर्क बढ़ाने का इच्छुक था।

करीब पैंतीस मिनट बातें करने के बाद राज ने डॉक्टर जय वर्मा को विदा कर दिया।

कुछ मुलाकतों के बाद राज डॉक्टर जय से खूब खुल गया था।

एक दिन डॉक्टर जय ने राज को अपनी कोठी पर आने की दावत दे डाली और राज ने भी फौरन आने का वादा कर लिया।

दरअसल, उससे दोस्ती करने में राज का मकसद था भी यही कि वो किसी तरह उसकी लेब्रॉटरी का मुआयना कर सके और सम्बंध बढ़ा कर उसके राज मालूम कर सके। मुमकिन है उसके माध्यम से कोई ऐसा सूत्र मिल जाए जिससे ज्योति की रहस्यमयी शख्सियत पर से पर्दा उठ सके।

वादे अनुसार राज तय वक्त पर जय की खूबसूरत कोठी पर पहुंच गया। कार के हॉर्न की आवाज सुनकर किसी नौकर के बजाय डॉक्टर जय वर्मा खुद दरवाजे पर आ पहुंचा था।

"हैलो राज साहब। मैं अपका ही इन्तजार कर रहा था।" डॉक्टर जय ने कहा।

'थैक्यू डॉक्टर। मैं अपने वादानुसार हाजिर हो गया हूं।" राज ने कार का दरवाजा खोल कर उतरते हुए कहा

डॉक्टर जय ने बड़े जोशीले अन्दाज में राज से हाथ मिलाया और एक अच्छे मेजबान की तरह उसे साथ ले जाकर कोठी के ड्राईंगरूम में बिठाया।

"मुझे हैरत है कि आप डॉक्टर होने के बावजूद प्रेक्टिस नहीं करते।" डॉक्टर जय ने राज को सिगरेट पेश करके लाईटर जला कर उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।

"इसे एक तरह की सनक कह लीजिये।" राज सिगरेट सुलगा कर हंसते हुए बोला, "दरअसल मैंने डॉक्टरी, पेशा बनाने के लिए पढ़ी ही नहीं थी। मेडिकल सांइस से लगाव होने की वजह से पढ़ी थी।"

"शौक के भी अजीब ढंग होते हैं।" डॉक्टर जय राज के करीब ही एक कुर्सी पर बैठ गया-"अगर एक विद्या मिली है तो उसे किसी काम में लाना चाहिए.... ।

"काम भी लेता हूं, कभी-कभी जब मैं या मेरे दोस्तों में से कोई छोटी-मोटी बीमारी का शिकार हो जाता है, तब यह विद्या काम आती है।"

"बढ़िया। आप वाकई दिलचस्प आदमी हैं।" डॉक्टर जय ने कहा, शायद इसीलिए ज्योति भी आपकी बहुत तारीफ करती रहती है।'

"यह तो बढ़प्पन है आपका भी और ज्योति भाभी का भी, वर्ना बन्दा क्या हैसियत रखता है!" राज ने शालीनता से कहा।

उसके बाद बातचीत के लिए कोई उचित विषय ने मिलने पर दो तीन मिनट दोनों खामोश ही रहे और सिर्फ सिगरेट के कश लगाते रहे। फिर अचानक राज ने उससे पूछा

"आपने कभी सतीश का भी चैकअप किया है डॉक्टर?"

"हां, कई बार ।" डॉक्टर ने गहरी निगाहों से राज की तरफ देखते हुए कहा।

"आपके ख्याल में क्या बीमारी हो गई है उसे?"

"जहां तक मेरा ख्याल है, उनका दिल कमजोर हो गया है और जरूरत के अनुसार पूरी मात्र में साफ खून नहीं बन पा रहा है....।"डॉक्टर जय ने जवाब दिया-"क्या आपने उनका मुआयना नहीं किया?"

"किया था, और मुझे खेद है कि मैं आपकी राय से सहमत नहीं हूं।" राज ने कहा।

"तो फिर, और क्या है?" उसने हैरत से पूछा।
 
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