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अपडेट-180
प्रियदर्शिनी—दिल देना थोड़ी ही पड़ता है, वो तो अपने आप ही चोरी हो जाता है.
मृणाल—रुक अभी बताती हूँ…..(वीर को देख कर) ए..बलात्कारी..रुक कहाँ जा रहा है.
वीर (मंन मे)—ये चुड़ैल फिर से मेरे पीछे पड़ गयी….कहाँ जाउ अब….चल भाग ले बेटा जल्दी से यहाँ से.
वीर जल्दी जल्दी बाहर की तरफ भागने लगा और मृणाल उसके पीछे पीछे.....तभी हमारी गाड़ी भी बंग्लॉ के कॉंपाउंड मे प्रवेश कर गयी.
अब आगे.........
गाड़ी की आवाज़ सुनते ही प्रियदर्शिनी और दिव्या बाहर की तरफ भागी....लेकिन दोनो के चेहरो पर निराशा और उदासी छा गयी जब उन्होने आने वालो मे राज को साथ मे नही देखा तो.
दिव्या—चाची आ गयी आप सब शॉपिंग कर के....लेकिन आपका लाड़ला तो नही दिख रहा है.... ?
नेहा—राज को कुछ काम था तो वो थोड़ा लेट आएगा.
काजल—क्या क्या खरीद लिया तुम लोगो ने….?
पायल—कुछ नही बुआ…आप सब के लिए भी हैं…चिंता मत करो.
ममता—राज कहाँ गया है….?
पायल—माँ उसको कुछ काम था....उसके कुछ दोस्त आने वाले हैं मुंबई से तो उनको लेकर आएगा वो....परिधि आ गयी क्या.... ?
मिताली (उदास)—नही अभी तक तो नही……उसका आना तो मुझे मुश्किल ही लगता है…..?
नेहा—राज ने मुझसे वादा किया है कि वो परिधि को बुला कर ही रहेगा आज.
ममता—क्या नेहा तू भी….(धीरे से)—तुझे तो सब कुछ पता ही है ना.
नेहा—ह्म, मैं सब जानती हूँ दीदी.
नानी—भगवान सब ठीक करेगा, तुम चिंता मत करो.
ऐसे ही बात करते हुए सब अंदर चले गये…..प्रियदर्शिनी भी निराश हो कर अंदर अपने कमरे मे चली गयी... सभी शॉपिंग मे क्या लिया ये देखने मे व्यस्त हो गयी.
यहाँ आने से थोड़ी देर पहले……..,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
राज—चाची आप तीनो घर जाओ...मैं और परिधि दीदी बाद मे आएँगे.
पायल—बाद मे क्यो.... ?
राज—दीदी..समझा करो..इट’स सर्प्राइज़......सब ने मुझसे सच छुपाया है तो सर्प्राइज़ देना तो बनता है ना.
नेहा—ठीक है बेटा…जैसी तेरी मर्ज़ी
पायल—ठीक है….लेकिन मैं भी तुम दोनो के साथ मे ही जाउन्गी….तुझे छोड़ कर मैं अकेले नही जाउन्गी.
राज—ऐसे मे सब को शक़ हो जाएगा.
नेहा—राज ठीक कह रहा है बेटी
पायल—क्या चाची आप भी….लेकिन तुझे जल्दी आना पड़ेगा….कहीं गायब मत हो जाना….समझ गया ना
राज—मैं प्रोग्राम स्टार्ट होने के पहले आ जाउन्गा.
पायल (मूह बनाते हुए)—ठीक है….अगर जल्दी नही आया तो सोच लेना फिर.
राज—अरे आ जाउन्गा मेरी माँ……और इस किताब को आप संभाल कर रखना और किसी को आज हमने क्या किया कुछ भी मालूम नही होना चाहिए….अब जाओ आप लोग.
नानी—हाँ..हाँ…चलो अब.
पायल—ए बुढ़िया चल पीछे बैठ…..तेरा क्या भरोसा, मेरा ध्यान गाड़ी चलाने रहे और तू कहीं मौके का फ़ायदा उठा कर मेरा ही गला दबा
दे….चाची आप आगे आ जाओ…..नही,,,नही….आप भी पीछे ही बैठ कर इसके उपर नज़र रखना जिससे ये कुछ गड़बड़ ना कर पाए.
नेहा—पायल तू भी ना.
सब वहाँ से राज की गाड़ी लेकर घर के लिए निकल गये और राज परिधि को लेकर निकल गया एक बहुत ही प्राकृतिक खूबसूरत जगह पर.
परिधि—वाउ.....व्हाट आ ब्यूटिफुल प्लेस दिस, राज
राज—ह्म…..आपको पसंद आया…..?
परिधि—बहुत ज़्यादा….आज मैं बहुत खुश हूँ राज
राज—आज आप जो चाहोगी वो मिलेगा आपको…..यहाँ पास मे ही एक मंदिर है…लोग कहते हैं कि अगर सच्चे मंन से वहाँ कोई कुछ माँगता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है.
परिधि—बस तुम्हे सही सलामत देखने की ख्वाहिश थी…तो देख लिया….अब अगर मेरी ये साँसे भी बंद हो जाए तो भी कोई शिकवा नही है.
राज—खबरदार जो फिर से ऐसी मनहूस बात ज़ुबान से निकाली तो….मैने कहा ना कि आपको कुछ नही होगा तो कुछ नही होगा…समझ गयी ना आप
परिधि—मंन को झूठी तसल्ली देने से क्या फ़ायदा राज….मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि अब मेरे पास समय नही है…मेरी ये साँसे किसी भी वक़्त बंद हो सकती हैं…..वैसे भी मौत से भी भला कोई बचा है आज तक.
राज (तड़प कर)—बेशक मौत से कोई नही बचा है आज तक किंतु रोग से तो बच सकता है ना…..मौत का इलाज़ ना सही पर रोग का इलाज़ तो संभव है.
परिधि—चलो मंदिर चलते हैं.
राज—ह्म्म्म्म..चलो
मैं परिधि दीदी को लेकर मंदिर आ गया....ये एक बहुत पुराना शिव मंदिर था...शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ परिधि दीदी घुटनो पर बैठ कर
दोनो हाथ जोड़ कर आँखे बंद कर के मंन ही मंन प्रार्थना करने लगी.
परिधि (मंन मे)—हे प्रभु....मुझे और कुछ नही चाहिए...बस मेरे राज को हमेशा खुश रखना....उसको लंबी उमर देना भगवान...उसको हर
मुसीबत से बचाना....मैं अपने राज की सुहागन बन कर मरना चाहती हूँ भगवान...अगर हो सके मेरी ये अंतिम इच्छा पूरी कर दो.
राज (मंन मे)—हे शिव शंकर...ये लड़की जो भी मांगती है उसकी ख्वाहिश पूरी कर दीजिए....उसने आज तक सिर्फ़ दिया ही है, पाया कुछ नही...उसकी प्रार्थना की लाज़ अब आपके हाथ मे है भगवान.
अभी हम दोनो आँखे बंद किए विनती ही कर रहे थे कि किसी के घंटा बजाने से हम दोनो ने अपनी अपनी आँखे खोल दी…ये मंदिर का शायद पुजारी था जिसने आते ही मंदिर मे लगा घंटा बजा दिया…किंतु उसके चेहरे पर अजीब तरह का तेज़ प्रकाशित हो रहा था.
राज—प्रणाम पुजारी बाबा.
परिधि—प्रणाम बाबा
पुजारी—तुम दोनो की जोड़ी सदा सलामत रहे…सदा सौभाग्य वती भव बेटी
राज—बाबा दर असल हम….
पुजारी (बीच मे ही)—ओह्ह्ह..समझा..अभी तुम दोनो की शादी नही हुई है….कोई बात नही…मैं करा देता हूँ तुम दोनो की शादी आज ही….बड़ा ही शुभ मुहूर्त है आज.
पुजारी जी की बात सुन कर मैं परिधि दीदी की ओर देखने लगा…परिधि दीदी ने एक बार मेरी ओर देख कर अपनी नज़रें झुका ली..उनका यही क्रम कुछ देर तक चलता रहा..वो मुझे देखती फिर आँखे नीचे कर लेती साथ मे दोनो पैर की एडियो को आपस मे रगड़ने
लगती….हालाँकि मैं उनके मंन की बात जानता था इसलिए ही उन्हे यहाँ लेकर आया था फिर भी मैं उनके मूह से सुनना और उनकी रज़ा मंदी चाहता था.
राज—दीदी..आपने क्या माँगा शिव जी से…?
परिधि (नीचे देखते हुए)—माँगी हुई मुराद बताई नही जाती राज.
पुजारी—आ जाओ बच्चो..यहाँ पर...मैने अग्नि कुंड तैय्यार कर दिया है.
मैने एक नज़र परिधि दीदी की तरफ देखा और फिर पुजारी जी के सामने जा कर बैठ गया...थोड़ी देर मे दीदी भी आ कर मेरे बगल मे बैठ गयी.
पुजारी—बेटी...पत्नी का स्थान उसके पति के वमंगी होता है...पत्नी को वाम भाग मे बैठना चाहिए.
परिधि दीदी तुरंत वहाँ से उठ कर मेरे दूसरे बगल मे आ कर बैठ गयी....मुझे मेरे सवाल का जवाब भी मिल गया था, उनके ऐसा करने से साथ ही उनकी रज़ा मंदी भी.
उसके बाद पुजारी जी ने हम दोनो का विधिवत विवाह करवाया...अग्नि के सात फेरो के बाद मैने परिधि दीदी की माँग मे सिंदूर भर
दिया...पुजारी जी ने खुद ही मंगल सुत्र दिया जिसको मैने दीदी के गले मे बाँध दिया.
पुजारी—आज से तुम दोनो के बीच सिर्फ़ एक ही रिश्ता है और वो है पति पत्नी का रिश्ता....इसके पहले जो भी रिश्ता था वो अग्नि के फेरे लेने के साथ ही अग्नि कुंड मे जल कर ख़तम हो गया...आज से अपने नये दांपत्य वैवाहिक जीवन की शुरुवत करो तुम दोनो...प्रभु श्री राम तुम दोनो का कल्याण करे.
राज—हमे आशीर्वाद दीजिए पुजारी बाबा
पुजारी—तुम दोनो का सदा कल्याण हो
मैने और दीदी ने उन्हे झुक कर प्रणाम किया लेकिन जैसे ही प्रणाम करने के बाद जैसे ही सिर उपर किया तो दोनो चौंक गये…क्यों कि वहाँ से पुजारी जी गायब थे…हमने पूरा मंदिर देख लिया लेकिन वो कही नही दिखे.
परिधि—ये पुजारी बाबा कहाँ गायब हो गये इतना जल्दी…..?
राज—आपने जो कुछ माँगा था भगवान से…तो शायद शिव जी ही पुजारी का रूप धार कर आपकी इच्छा पूरी करने आए थे और काम होते ही आशीर्वाद देकर चले गये.
परिधि (खुश होते हुए)—क्या..सच मे….?
राज—ह्म..आओ उन्हे प्रणाम कर के अपने जीवन की नयी शुरुआत करे
हम दोनो ने भगवान शिव शंभू को सिर झुका कर नमन किया उसके बाद परिधि दीदी ने मेरे पैर छुये मैने उनको खड़ा कर के अपने सीने से लगा लिया.
राज—आपकी जगह पैरो मे नही बल्कि मेरे हृदय मे है और हमेशा रहेगी.
परिधि—राज, क्या तुम भी मुझे प्यार करते हो…..?
राज—मेरी जिस्म के हर अंग मे, मेरी रूह मे सिर्फ़ और सिर्फ़ दिव्या है….उसके सिवा ना कोई कभी था और ना ही कभी होगा… वैसे भी ये मायने नही रखता की आप किससे प्यार करते हैं बल्कि मायने ये रखता है की आप से कौन प्यार करता है.
परिधि—क्या वो दिव्या हमारी गुड़िया महक ही है….?
राज—ह्म्म्म्म
परिधि—क्या वो मुझे स्वीकार करेगी तुम्हारी पत्नी के रूप मे……?
राज—उसको सब पता है….उसकी चिंता मत करो....अब चले घर...आपका जनम दिन मनाने के बाद सुहागरात की भी तो तैय्यारी करनी पड़ेगी ना.
परिधि (शर्मा कर)—ह्म…अगर पायल को पता चला तो वो मुझे कुल्हाड़ी से काट डालेगी.
राज—आप दोनो एक ही डाल पर बैठी हो….उनको भी पता है..टेन्षन मत लो.
परिधि—और किस किस को पता है.... ?
राज—सिर्फ़ दिव्या और पायल दीदी को.......और शायद नेहा चाची को भी शक़ है..मैं उन्हे संभाल लूँगा.....अब चलो यहाँ से
हम दोनो मंदिर से बाहर निकल आए और घर की तरफ चल दिए....तभी मेरे मोबाइल पर माला का कॉल आने लगा.. मैने उसका कॉल पिक किया जिसको कि मैने आज परिधि दीदी के जनम दिन पर उसकी दीदी के साथ आने को कहा था साथ ही मुंबई से प्लेन से दो टिकेट्स भी बुक करवा दी थी.
राज—हेलो...हां माला...पहुचि कि नही अभी तक.
माला—हां राज अभी मैं दीदी के साथ मुंबई एरपोर्ट पर हूँ....दो घंटे मे पहुच जाउन्गी...पर आना कहाँ है..तुमने अड्रेस तो मेसेज किया ही नही है... ?
राज—यहाँ पहुच के मुझे कॉल कर लेना, मैं लेने आ जाउन्गा या किसी को भेज दूँगा पिक करने के लिए....साथ ही यहाँ तुम्हारी शिखा दीदी की आँखो का इलाज़ भी करवा दूँगा.
माला—ओके राज
राज—ओके..सी यू बाइ स्वीटी
परिधि—ये क्या नया चक्कर है.... ?
राज—कुछ नही..बस फ्रेंड है
परिधि—फ्रेंड है या गर्ल फ्रेंड….?
राज—मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नही है…..ये फालतू के काम मैं नही करता.
परिधि—फिर तो ठीक है.
मैने परिधि दीदी को सलोनी के यहाँ छोड़ दिया…और उन्हे बता दिया कि आने के पहले मुझे कॉल कर ले….उसके बाद मैं घर के लिए निकल गया.
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वही प्लेन मे माला और शिखा राज से मिलने आ रही थी….दोनो बेहद खुश थी और कुछ कुछ उदास भी….अपने प्यार का इज़हार कर ना पाने के कारण, तभी किसी की आवाज़ से दोनो की तंद्रा भंग हो गयी.
“अगर हम ग़लत नही हूँ तो आप दोनो ज़रूर मुंबई से आ रही हो.” उनके ठीक पीछे की सीट पर बैठे एक शख्स ने कहा.
माला—जी..हाँ
आदमी—ये तुम्हार बहन है का….?
माला—हां ये मेरी दीदी हैं…इनकी आँखो का इलाज़ करवाने हम भोपाल जा रहे हैं.
आदमी—वैसन बहुत ही खब्सुरत है तुम्हार दीदी....भगवान ने बहुत ही ग़लत किया इतनी खब्सुरत लड़की के साथ.. भोपाल मे कौन रहत है….?
माला—मेरा दोस्त राज रहता है…..बहुत बड़ी कंपनी का मालिक है वो…उसने ही बुलाया है…आज उनकी बहन का बर्तडे है तो.
आदमी (चौंक कर मंन मे)—यी ससूरी दोनो तो यू राज के इहा जा रही हैं….ई अंधी लड़की बहुत खब्सुरत है.. हम्का कछु ना कछु करना पड़ी….बहुत मस्त माल लागत है.
आदमी (कुछ सोच कर)—अरे ईए तो कमाल हुई गवा…..राज ने ही तो हम्का बुलाया है और कहा है कि दो लड़किया मुंबई से इहा आवत हैं
तो उनका अपने साथ लेत आउब….और देखा तुम दोनो हम्का यहा मिल गयी.
तभी वहाँ कोई गंदी हवा छोड़ देता है जिससे वो आदमी अपनी नाक बंद कर लेता है और दूसरे हाथ से हवा नाक के आस पास हवा करने लगता है.
शिखा (शॉक्ड)—लेकिन राज ने तो हमसे कुछ नही बताया इस बारे मे….?
आदमी—अरे अभी अभी फोन किया हम्का भी….और कहा कि एक लड़की को आँख लगानी है…..हमार आँख का अस्पताल है.. राज ने
हम्का फोन कर के कहा है कि पहले हम तुमका आँख लगा दूं फिर उसके घर लेकर जाउ.
माला—दीदी, मैं राज से फोन कर के पूछ लेती हूँ.
शिखा—ह्म
आदमी—वू बेचारा तो आज बहुत बिज़ी है….ऊका खाम खा परेशान ना करो….ये देखो हमरे पास मा राज का फोटो भी है..अब तो तुमका यकीन हुई गवा की नही….राज का इच्छा है कि तुम्हार दीदी जनमदिन का प्रोग्राम को अपनी अन्खन से देखे….हम बहुत परोपकारी और अहिंसा वादी आदमी हू.
“अहिंसा परमो धर्मः”
शिखा—क्या सच मे राज ने ऐसा कहा है….?
आदमी—बिल्कुल सच...अगर हम झूठ बोलू तो हमार मरी हुई माँ दुबारा मर जाए.
“सरकार, आप इस लड़की को आँख कहाँ से लगवाएँगे…उसके लिए आँख डोनेट करने वाला भी तो चाहिए.” उस आदमी के बगल मे बैठे हुए दूसरे आदमी ने उसके कान मे कहा.
प्रियदर्शिनी—दिल देना थोड़ी ही पड़ता है, वो तो अपने आप ही चोरी हो जाता है.
मृणाल—रुक अभी बताती हूँ…..(वीर को देख कर) ए..बलात्कारी..रुक कहाँ जा रहा है.
वीर (मंन मे)—ये चुड़ैल फिर से मेरे पीछे पड़ गयी….कहाँ जाउ अब….चल भाग ले बेटा जल्दी से यहाँ से.
वीर जल्दी जल्दी बाहर की तरफ भागने लगा और मृणाल उसके पीछे पीछे.....तभी हमारी गाड़ी भी बंग्लॉ के कॉंपाउंड मे प्रवेश कर गयी.
अब आगे.........
गाड़ी की आवाज़ सुनते ही प्रियदर्शिनी और दिव्या बाहर की तरफ भागी....लेकिन दोनो के चेहरो पर निराशा और उदासी छा गयी जब उन्होने आने वालो मे राज को साथ मे नही देखा तो.
दिव्या—चाची आ गयी आप सब शॉपिंग कर के....लेकिन आपका लाड़ला तो नही दिख रहा है.... ?
नेहा—राज को कुछ काम था तो वो थोड़ा लेट आएगा.
काजल—क्या क्या खरीद लिया तुम लोगो ने….?
पायल—कुछ नही बुआ…आप सब के लिए भी हैं…चिंता मत करो.
ममता—राज कहाँ गया है….?
पायल—माँ उसको कुछ काम था....उसके कुछ दोस्त आने वाले हैं मुंबई से तो उनको लेकर आएगा वो....परिधि आ गयी क्या.... ?
मिताली (उदास)—नही अभी तक तो नही……उसका आना तो मुझे मुश्किल ही लगता है…..?
नेहा—राज ने मुझसे वादा किया है कि वो परिधि को बुला कर ही रहेगा आज.
ममता—क्या नेहा तू भी….(धीरे से)—तुझे तो सब कुछ पता ही है ना.
नेहा—ह्म, मैं सब जानती हूँ दीदी.
नानी—भगवान सब ठीक करेगा, तुम चिंता मत करो.
ऐसे ही बात करते हुए सब अंदर चले गये…..प्रियदर्शिनी भी निराश हो कर अंदर अपने कमरे मे चली गयी... सभी शॉपिंग मे क्या लिया ये देखने मे व्यस्त हो गयी.
यहाँ आने से थोड़ी देर पहले……..,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
राज—चाची आप तीनो घर जाओ...मैं और परिधि दीदी बाद मे आएँगे.
पायल—बाद मे क्यो.... ?
राज—दीदी..समझा करो..इट’स सर्प्राइज़......सब ने मुझसे सच छुपाया है तो सर्प्राइज़ देना तो बनता है ना.
नेहा—ठीक है बेटा…जैसी तेरी मर्ज़ी
पायल—ठीक है….लेकिन मैं भी तुम दोनो के साथ मे ही जाउन्गी….तुझे छोड़ कर मैं अकेले नही जाउन्गी.
राज—ऐसे मे सब को शक़ हो जाएगा.
नेहा—राज ठीक कह रहा है बेटी
पायल—क्या चाची आप भी….लेकिन तुझे जल्दी आना पड़ेगा….कहीं गायब मत हो जाना….समझ गया ना
राज—मैं प्रोग्राम स्टार्ट होने के पहले आ जाउन्गा.
पायल (मूह बनाते हुए)—ठीक है….अगर जल्दी नही आया तो सोच लेना फिर.
राज—अरे आ जाउन्गा मेरी माँ……और इस किताब को आप संभाल कर रखना और किसी को आज हमने क्या किया कुछ भी मालूम नही होना चाहिए….अब जाओ आप लोग.
नानी—हाँ..हाँ…चलो अब.
पायल—ए बुढ़िया चल पीछे बैठ…..तेरा क्या भरोसा, मेरा ध्यान गाड़ी चलाने रहे और तू कहीं मौके का फ़ायदा उठा कर मेरा ही गला दबा
दे….चाची आप आगे आ जाओ…..नही,,,नही….आप भी पीछे ही बैठ कर इसके उपर नज़र रखना जिससे ये कुछ गड़बड़ ना कर पाए.
नेहा—पायल तू भी ना.
सब वहाँ से राज की गाड़ी लेकर घर के लिए निकल गये और राज परिधि को लेकर निकल गया एक बहुत ही प्राकृतिक खूबसूरत जगह पर.
परिधि—वाउ.....व्हाट आ ब्यूटिफुल प्लेस दिस, राज
राज—ह्म…..आपको पसंद आया…..?
परिधि—बहुत ज़्यादा….आज मैं बहुत खुश हूँ राज
राज—आज आप जो चाहोगी वो मिलेगा आपको…..यहाँ पास मे ही एक मंदिर है…लोग कहते हैं कि अगर सच्चे मंन से वहाँ कोई कुछ माँगता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है.
परिधि—बस तुम्हे सही सलामत देखने की ख्वाहिश थी…तो देख लिया….अब अगर मेरी ये साँसे भी बंद हो जाए तो भी कोई शिकवा नही है.
राज—खबरदार जो फिर से ऐसी मनहूस बात ज़ुबान से निकाली तो….मैने कहा ना कि आपको कुछ नही होगा तो कुछ नही होगा…समझ गयी ना आप
परिधि—मंन को झूठी तसल्ली देने से क्या फ़ायदा राज….मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि अब मेरे पास समय नही है…मेरी ये साँसे किसी भी वक़्त बंद हो सकती हैं…..वैसे भी मौत से भी भला कोई बचा है आज तक.
राज (तड़प कर)—बेशक मौत से कोई नही बचा है आज तक किंतु रोग से तो बच सकता है ना…..मौत का इलाज़ ना सही पर रोग का इलाज़ तो संभव है.
परिधि—चलो मंदिर चलते हैं.
राज—ह्म्म्म्म..चलो
मैं परिधि दीदी को लेकर मंदिर आ गया....ये एक बहुत पुराना शिव मंदिर था...शेरशाह सूरी का बनवाया हुआ परिधि दीदी घुटनो पर बैठ कर
दोनो हाथ जोड़ कर आँखे बंद कर के मंन ही मंन प्रार्थना करने लगी.
परिधि (मंन मे)—हे प्रभु....मुझे और कुछ नही चाहिए...बस मेरे राज को हमेशा खुश रखना....उसको लंबी उमर देना भगवान...उसको हर
मुसीबत से बचाना....मैं अपने राज की सुहागन बन कर मरना चाहती हूँ भगवान...अगर हो सके मेरी ये अंतिम इच्छा पूरी कर दो.
राज (मंन मे)—हे शिव शंकर...ये लड़की जो भी मांगती है उसकी ख्वाहिश पूरी कर दीजिए....उसने आज तक सिर्फ़ दिया ही है, पाया कुछ नही...उसकी प्रार्थना की लाज़ अब आपके हाथ मे है भगवान.
अभी हम दोनो आँखे बंद किए विनती ही कर रहे थे कि किसी के घंटा बजाने से हम दोनो ने अपनी अपनी आँखे खोल दी…ये मंदिर का शायद पुजारी था जिसने आते ही मंदिर मे लगा घंटा बजा दिया…किंतु उसके चेहरे पर अजीब तरह का तेज़ प्रकाशित हो रहा था.
राज—प्रणाम पुजारी बाबा.
परिधि—प्रणाम बाबा
पुजारी—तुम दोनो की जोड़ी सदा सलामत रहे…सदा सौभाग्य वती भव बेटी
राज—बाबा दर असल हम….
पुजारी (बीच मे ही)—ओह्ह्ह..समझा..अभी तुम दोनो की शादी नही हुई है….कोई बात नही…मैं करा देता हूँ तुम दोनो की शादी आज ही….बड़ा ही शुभ मुहूर्त है आज.
पुजारी जी की बात सुन कर मैं परिधि दीदी की ओर देखने लगा…परिधि दीदी ने एक बार मेरी ओर देख कर अपनी नज़रें झुका ली..उनका यही क्रम कुछ देर तक चलता रहा..वो मुझे देखती फिर आँखे नीचे कर लेती साथ मे दोनो पैर की एडियो को आपस मे रगड़ने
लगती….हालाँकि मैं उनके मंन की बात जानता था इसलिए ही उन्हे यहाँ लेकर आया था फिर भी मैं उनके मूह से सुनना और उनकी रज़ा मंदी चाहता था.
राज—दीदी..आपने क्या माँगा शिव जी से…?
परिधि (नीचे देखते हुए)—माँगी हुई मुराद बताई नही जाती राज.
पुजारी—आ जाओ बच्चो..यहाँ पर...मैने अग्नि कुंड तैय्यार कर दिया है.
मैने एक नज़र परिधि दीदी की तरफ देखा और फिर पुजारी जी के सामने जा कर बैठ गया...थोड़ी देर मे दीदी भी आ कर मेरे बगल मे बैठ गयी.
पुजारी—बेटी...पत्नी का स्थान उसके पति के वमंगी होता है...पत्नी को वाम भाग मे बैठना चाहिए.
परिधि दीदी तुरंत वहाँ से उठ कर मेरे दूसरे बगल मे आ कर बैठ गयी....मुझे मेरे सवाल का जवाब भी मिल गया था, उनके ऐसा करने से साथ ही उनकी रज़ा मंदी भी.
उसके बाद पुजारी जी ने हम दोनो का विधिवत विवाह करवाया...अग्नि के सात फेरो के बाद मैने परिधि दीदी की माँग मे सिंदूर भर
दिया...पुजारी जी ने खुद ही मंगल सुत्र दिया जिसको मैने दीदी के गले मे बाँध दिया.
पुजारी—आज से तुम दोनो के बीच सिर्फ़ एक ही रिश्ता है और वो है पति पत्नी का रिश्ता....इसके पहले जो भी रिश्ता था वो अग्नि के फेरे लेने के साथ ही अग्नि कुंड मे जल कर ख़तम हो गया...आज से अपने नये दांपत्य वैवाहिक जीवन की शुरुवत करो तुम दोनो...प्रभु श्री राम तुम दोनो का कल्याण करे.
राज—हमे आशीर्वाद दीजिए पुजारी बाबा
पुजारी—तुम दोनो का सदा कल्याण हो
मैने और दीदी ने उन्हे झुक कर प्रणाम किया लेकिन जैसे ही प्रणाम करने के बाद जैसे ही सिर उपर किया तो दोनो चौंक गये…क्यों कि वहाँ से पुजारी जी गायब थे…हमने पूरा मंदिर देख लिया लेकिन वो कही नही दिखे.
परिधि—ये पुजारी बाबा कहाँ गायब हो गये इतना जल्दी…..?
राज—आपने जो कुछ माँगा था भगवान से…तो शायद शिव जी ही पुजारी का रूप धार कर आपकी इच्छा पूरी करने आए थे और काम होते ही आशीर्वाद देकर चले गये.
परिधि (खुश होते हुए)—क्या..सच मे….?
राज—ह्म..आओ उन्हे प्रणाम कर के अपने जीवन की नयी शुरुआत करे
हम दोनो ने भगवान शिव शंभू को सिर झुका कर नमन किया उसके बाद परिधि दीदी ने मेरे पैर छुये मैने उनको खड़ा कर के अपने सीने से लगा लिया.
राज—आपकी जगह पैरो मे नही बल्कि मेरे हृदय मे है और हमेशा रहेगी.
परिधि—राज, क्या तुम भी मुझे प्यार करते हो…..?
राज—मेरी जिस्म के हर अंग मे, मेरी रूह मे सिर्फ़ और सिर्फ़ दिव्या है….उसके सिवा ना कोई कभी था और ना ही कभी होगा… वैसे भी ये मायने नही रखता की आप किससे प्यार करते हैं बल्कि मायने ये रखता है की आप से कौन प्यार करता है.
परिधि—क्या वो दिव्या हमारी गुड़िया महक ही है….?
राज—ह्म्म्म्म
परिधि—क्या वो मुझे स्वीकार करेगी तुम्हारी पत्नी के रूप मे……?
राज—उसको सब पता है….उसकी चिंता मत करो....अब चले घर...आपका जनम दिन मनाने के बाद सुहागरात की भी तो तैय्यारी करनी पड़ेगी ना.
परिधि (शर्मा कर)—ह्म…अगर पायल को पता चला तो वो मुझे कुल्हाड़ी से काट डालेगी.
राज—आप दोनो एक ही डाल पर बैठी हो….उनको भी पता है..टेन्षन मत लो.
परिधि—और किस किस को पता है.... ?
राज—सिर्फ़ दिव्या और पायल दीदी को.......और शायद नेहा चाची को भी शक़ है..मैं उन्हे संभाल लूँगा.....अब चलो यहाँ से
हम दोनो मंदिर से बाहर निकल आए और घर की तरफ चल दिए....तभी मेरे मोबाइल पर माला का कॉल आने लगा.. मैने उसका कॉल पिक किया जिसको कि मैने आज परिधि दीदी के जनम दिन पर उसकी दीदी के साथ आने को कहा था साथ ही मुंबई से प्लेन से दो टिकेट्स भी बुक करवा दी थी.
राज—हेलो...हां माला...पहुचि कि नही अभी तक.
माला—हां राज अभी मैं दीदी के साथ मुंबई एरपोर्ट पर हूँ....दो घंटे मे पहुच जाउन्गी...पर आना कहाँ है..तुमने अड्रेस तो मेसेज किया ही नही है... ?
राज—यहाँ पहुच के मुझे कॉल कर लेना, मैं लेने आ जाउन्गा या किसी को भेज दूँगा पिक करने के लिए....साथ ही यहाँ तुम्हारी शिखा दीदी की आँखो का इलाज़ भी करवा दूँगा.
माला—ओके राज
राज—ओके..सी यू बाइ स्वीटी
परिधि—ये क्या नया चक्कर है.... ?
राज—कुछ नही..बस फ्रेंड है
परिधि—फ्रेंड है या गर्ल फ्रेंड….?
राज—मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नही है…..ये फालतू के काम मैं नही करता.
परिधि—फिर तो ठीक है.
मैने परिधि दीदी को सलोनी के यहाँ छोड़ दिया…और उन्हे बता दिया कि आने के पहले मुझे कॉल कर ले….उसके बाद मैं घर के लिए निकल गया.
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
वही प्लेन मे माला और शिखा राज से मिलने आ रही थी….दोनो बेहद खुश थी और कुछ कुछ उदास भी….अपने प्यार का इज़हार कर ना पाने के कारण, तभी किसी की आवाज़ से दोनो की तंद्रा भंग हो गयी.
“अगर हम ग़लत नही हूँ तो आप दोनो ज़रूर मुंबई से आ रही हो.” उनके ठीक पीछे की सीट पर बैठे एक शख्स ने कहा.
माला—जी..हाँ
आदमी—ये तुम्हार बहन है का….?
माला—हां ये मेरी दीदी हैं…इनकी आँखो का इलाज़ करवाने हम भोपाल जा रहे हैं.
आदमी—वैसन बहुत ही खब्सुरत है तुम्हार दीदी....भगवान ने बहुत ही ग़लत किया इतनी खब्सुरत लड़की के साथ.. भोपाल मे कौन रहत है….?
माला—मेरा दोस्त राज रहता है…..बहुत बड़ी कंपनी का मालिक है वो…उसने ही बुलाया है…आज उनकी बहन का बर्तडे है तो.
आदमी (चौंक कर मंन मे)—यी ससूरी दोनो तो यू राज के इहा जा रही हैं….ई अंधी लड़की बहुत खब्सुरत है.. हम्का कछु ना कछु करना पड़ी….बहुत मस्त माल लागत है.
आदमी (कुछ सोच कर)—अरे ईए तो कमाल हुई गवा…..राज ने ही तो हम्का बुलाया है और कहा है कि दो लड़किया मुंबई से इहा आवत हैं
तो उनका अपने साथ लेत आउब….और देखा तुम दोनो हम्का यहा मिल गयी.
तभी वहाँ कोई गंदी हवा छोड़ देता है जिससे वो आदमी अपनी नाक बंद कर लेता है और दूसरे हाथ से हवा नाक के आस पास हवा करने लगता है.
शिखा (शॉक्ड)—लेकिन राज ने तो हमसे कुछ नही बताया इस बारे मे….?
आदमी—अरे अभी अभी फोन किया हम्का भी….और कहा कि एक लड़की को आँख लगानी है…..हमार आँख का अस्पताल है.. राज ने
हम्का फोन कर के कहा है कि पहले हम तुमका आँख लगा दूं फिर उसके घर लेकर जाउ.
माला—दीदी, मैं राज से फोन कर के पूछ लेती हूँ.
शिखा—ह्म
आदमी—वू बेचारा तो आज बहुत बिज़ी है….ऊका खाम खा परेशान ना करो….ये देखो हमरे पास मा राज का फोटो भी है..अब तो तुमका यकीन हुई गवा की नही….राज का इच्छा है कि तुम्हार दीदी जनमदिन का प्रोग्राम को अपनी अन्खन से देखे….हम बहुत परोपकारी और अहिंसा वादी आदमी हू.
“अहिंसा परमो धर्मः”
शिखा—क्या सच मे राज ने ऐसा कहा है….?
आदमी—बिल्कुल सच...अगर हम झूठ बोलू तो हमार मरी हुई माँ दुबारा मर जाए.
“सरकार, आप इस लड़की को आँख कहाँ से लगवाएँगे…उसके लिए आँख डोनेट करने वाला भी तो चाहिए.” उस आदमी के बगल मे बैठे हुए दूसरे आदमी ने उसके कान मे कहा.