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सभी राजाओ ने मिलकर अयोध्या पर आक्रमण कर दिया लेकिन वो सब रतनेश के युद्ध कौशल के सामने नही टिक सके और उन्हे अपनी जान बचा कर भागना पड़ा.
केयी बार देव पल ने अयोध्या पर हमला करवाया किंतु हर बार पराजय का ही मूह देखना पड़ा…रतनेश की इस जीत मे उसके मस्तक मे
लगी सुर्य चिन्ह की शक्ति का बड़ा योगदान था.
देव पाल—फिर से हमारी हार हुई….समझ नही आता क्या करूँ…?
राघव—मेरी इतनी शक्तियाँ भी उसका कुछ बिगाड़ नही पा रही हैं…..ऐसा कैसे हो सकता है….?
देव पाल—ऐसा इसलिए है कि उसके मस्तक मे जनम जात सुर्य मणि है, जिसके कारण वो बेहद शक्ति शालि हो जाता है लड़ाई के समय.
राघव—खैर तुम चिंता मत करो…उसकी इन शक्तियो का तोड़ भी है मेरे पास…अब की बार हमला दिन मे नही बल्कि रात मे होगा, बाकी
सब मुझ पर छोड़ दो…फिर देखो मैं कैसी माया रचता हूँ.
उसने एक दूत भेज कर ये संदेशा भेजा कि अगर अपने राज्य को बचाना चाहते हो तो हमे पद्मिनी सौंप दो रतनेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया..उसने युद्ध की चुनौती स्वीकार कर ली.
अगली बार एक बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर के हमला किया गया…..रतनेश को ये नही पता था कि राघव ने क्या चाल चली है…वो हमले का
जवाब देते हुए युद्ध भूमि मे उतर गया.
इधर पद्मिनी ने हीरा मणि को युद्ध का समाचार लेने भेजा..वो आख़िर कार रतनेश तक पहुच ही गया.
हीरा मणि को देख कर रतनेश के चेहरे पर मुश्कन आ गयी लेकिन ये सिर्फ़ दर्द को छिपाने की कोशिश थी.. उसने एक पत्र लिख कर हीरा
मणि को दे दिया.
रतनेश—हीरा मणि, ये पत्र तुम कैसे भी कर के पद्मिनी तक पहुचा देना.
हीरा मणि रतनेश से वो पत्र लेकर चुपके से वहाँ से निकल गया…वापिस आते समय उसने राघव और देव पाल को एक साथ देख कर उसका माथा ठनका....
उसने अयोध्या पहुच कर पद्मिनी को रतनेश का दिया हुआ पत्र दे दिया, जिसे पढ़ते ही पद्मिनी की आँखो से आँसू बहने लगे…
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…..
धर्म भूमि यह कर्म क्षेत्र की, कल रणभूमि बनेगी
भाई भाई का रक्ता बहेगा, चांडी लहू पिएगी
चांडी लहू पिएगी,
जाने किसका जीवन दीपक, जला रहेगा कब तक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे……
किसका किसका लहू गिरेगा पहचानेगा कौन
लहू, लहू में मिल जाएगा, मौत रहेगी मौन
मौत रहेगी मौन
बन अनाथ जीवन भटकेगा, भाव लिए पर मरते तक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
पर हम सैनिक हैं, लड़ना आवश्यक है
पर धर्म की रक्षा के हित हमको मरना आवश्यक है
मारना आवश्यक है
मर कर ही जीना होता है, जीने से आवश्यक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
वही युद्ध भूमि मे रतनेश जितने भी सैनिक वो मारता उससे दुगुने पैदा हो जाते, साथ ही मरे हुए सैनिक भी फिर से खड़े होकर लड़ने लगते…रतनेश इस मायाजाल मे उलझ गया और इस मौके का फ़ायदा उठा कर राघव ने यक्षिणी की मदद से रतनेश को बंदी बना लिया. और उसको राजगढ़ ले जया गया….रतनेश अब तक ये नही समझ सका था कि ये जगह कौन सी है और इसका असली खिलाड़ी कौन है.
इधर युद्ध भूमि से कोई समाचार ना मिलता देख कर पद्मिनी को किसी अपशकुन की आशंका होने लगी….उसने हीरा मणि को रतनेश की खोज मे भेजा.
हीरा मणि खोजते खोजते राजगढ़ जा पहुचा जहाँ उसे सच्चाई पता चली कि रतनेश यहीं राघव की क़ैद मे है वो किसी तरह रतनेश तक पहुच
गया…जहाँ रतनेश के शरीर मे जगह जगह पर चोट के निशान थे और वो बुरी तरह से घायल अवस्था मे था.
हीरा मणि—आपकी ये हालत कैसे हुई…?
रतनेश—मुझे धोखे से फसाया गया है….मुझे पद्मिनी की चिंता हो रही है…उनका असली मकसद उसे हासिल करना है..तुम कोई उपाय
करो और उसे किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाओ....
लेकिन जैसे ही हीरा मणि ने उसके राजगढ़ मे क़ैद होने और घायल होने की जानकारी दी साथ मे बताया कि ये सब राघव और देव पाल ने किया है तो उसकी आँखे गुस्से से तमतमा गयी.
जिन आँखो मे अभी आँसू बह रहे थे, उनमे से आग की चिंगारी निकलने लगी…..उसने राजशी वस्त्र त्याग कर एक वीरांगना की तरह हाथो मे
तलवार लेकर घोड़े पर सवार हो के युद्ध भूमि की तरफ निकल पड़ी.
इधर देव पाल ने परी की मदद से पद्मिनी के पुत्र को अपने क़ब्ज़े मे ले लिया कि अगर पद्मिनी ना नुकुर करे तो इस बच्चे को जान से मारने की धमकी से वो खुद को हमारे हवाले कर दे…साथ ही उसने परी को ये झूठा आश्वासन दिया कि पद्मिनी को हासिल कर लेने के उपरांत वो रतनेश को क़ैद मुक्त कर देंगे.
पद्मिनी इस समय आँखो मे तूफान लिए राजगढ़ मे घुस गयी और वहाँ कहर मचाना शुरू कर दिया…जो भी उसके सामने आता वो गाजर
मूली की तरह कट जाता.
वो इस समय दुर्गा का नया अवतार लग रही थी….पूरी तरह से रन चांडी बन चुकी थी वो….उसका ऐसा उग्र रूप देख कर सब एक साथ उसके उपर आक्रमण करने लगे किंतु उन्हे मिल रही थी तो सिर्फ़ मौत.
जब राघव और देव पाल ने ये सुना तो उन्होने रतनेश को ख़तम करने का फ़ैसला किया…..कारागार मे पहुच कर अचेत पड़े रतनेश के उपर सबने प्रहार करने शुरू कर दिए.
उनके प्रहार से रतनेश की चेतना लौट आई..उसने बेड़ियो मे जकड़े होने के बावजूद भी राघव को उठा कर दीवार मे पटक दिया, लेकिन यक्षिणी के प्रभाव से वो बच गया.
इस समय क्यों कि दिन था जिससे रतनेश के मस्तक का सूर्य चक्र सक्रिय होकर चमकने लगा, जिसके कारण राघव के सभी तांत्रिक वार विफल होने लगे.
उधर पद्मिनी राजगढ़ और उसके साथी राजाओ को लाखो की सेना का सर काट काट कर राजगढ़ को श्मशान भूमि और लाषो का अखाड़ा
बना दिया था….उसके पैर तेज़ी से कारागार की तरफ बढ़ने लगे.
वही रतनेश ने राघव की गर्दन दबोच ली…इससे पहले कि वह राघव की गर्दन उसके धड़ से अलग करता किसी ने उसकी पीठ मे तलवार
आर पार कर दी….वो जैसे ही उस कायर को देखने के लिए पलटा तो उसे बहुत गहरा धक्का लगा.
रतनेश (शॉक्ड)—त्त्त्तुम्म्म्म…..तुमने ये…क्क्कयो किया….? मैं तो तुझे अपना भाई..अपना दोस्त समझता था….और तूने मेरे विश्वास का गला घोंट दिया…क्यो…?
देव पाल—पद्मिनी चाहिए मुझे…..पद्मिनी अब मेरी है….हाहहाहा…. अब वो मेरी होगी…हाहहहाहा
देव पाल जैसे ही तलवार का वार रतनेश की गर्दन पर करने को हुआ वैसे ही किसी ने ज़ोर से उसका नाम पुकारा ‘ देवववव पाालल्ल्ल्ल’ और
अगले ही पल उसकी गर्दन धड़ से अलग होकर दूर जा गिरी.
रतनेश—दिव्याआअ..तुउउम्म्म्मम
पद्मिनी ने जैसे ही रतनेश की हालत देखी उसकी रुलाई फूट पड़ी….वो तुरंत उसके सीने से लिपट कर रोने लगी…रतनेश उसे समझाते
समझाते थक गया.
रतनेश—पद्मिनी,,तुम चिंता मत करो…मैं फिर जनम लूँगा…और हर जनम मे मेरा ये दिल सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही धड़केगा…..मैं तुम्हे वचन देता हूँ…कि तुम्हारा साजन सिर्फ़ तुम्हारा ही रहेगा..जनम जन्मान्तर तक्क्क्क…आअ…तुम मेरी रूह मे समा चुकी हो दिव्या..तुम्हे मुझ से अब मौत भी अलग नही कर सकती…आआआआ….राजगढ़ को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगिइइइ….आआआआअ
और पद्मिनी की गोद मे ही उसने अपनी अंतिम साँस लेते हुए दम तोड़ दिया…..पद्मिनी उसके सर को अपनी गोद मे उठाए बिलख बिलख कर रोने लगी.
पद्मिनी (रोते हुए)—नहियीईईईई…..तुम मुझे छोड़ कर नही जा सकते..साजन…..मैं अब कैसे जिंदा रहूंगी…? मेरी तो साँसे ही तुमसे चलती हैं…जब तुम ही नही रहे तो मैं जीवित रह के क्या करूँगी….
उसने रतनेश के मृत शरीर को उठा कर राजगढ़ के बाहर लाकर रख दिया और लकड़िया इकट्ठी कर के उसका सर अपनी गोद मे ले के उनकेउपर बैठ गयी.
पद्मिनी (रोते हुए)—मैं तुम्हे वचन देती हूँ..साजन…हर जनम मे दिव्या केवल तुम्हारी ही रहेगी…..हे माँ जगदंबा..अगर मैने कभी भूल वश भी साजन के सिवा किसी पराए मर्द का ध्यान ना किया हो तो मुझे भी मृत्यु दे दो…हे अग्नि देव….अगर मैने तन से, मंन से और कर्म से हमेशा
अपने पति व्रत धर्म का पालन किया है तो इसी समय इस चिता को अग्नि दान दो.
पद्मिनी के इतना कहते ही जोरो की मेघ गर्जना होने लगी और अगले ही पल उस महा सती की चिता मे स्वतः ही अग्नि प्रज्ज्वलित हो गयी…..मेघो ने पानी बरसा कर उस महा सती का अभिवादन किया किंतु अग्नि जलती रही और पद्मिनी अपने साजन सहित उसमे जल कर सती हो गयी.
इस घटना ने दिव्या और साजन की रूह को एक कर दिया और साथ ही परी भी साजन से हमेशा हमेशा के लिए जुड़ गयी….और राजगढ़ के इतिहास मे एक कलंक का काला अध्याय जुड़ गया वही जब परी को ये सब मालूम हुआ तो वो पछताते हुए विलाप करने लगी…और रतनेश
की विरह पीड़ा ना झेल सकनेकी स्थिति मे उसने खुद ही दोनो की उस जलती चिता मे अपना सिर काट के भेंट कर दिया.
तब से जैसे राजगढ़ के बुरे दिन शुरू हो गये….लगभग 50 वर्षो के बाद राजगढ़ मे तीन बच्चो ने एक ही समय नक्षत्र मे जनम लिया….दिव्या,
शक्ति और परी ने.
केयी बार देव पल ने अयोध्या पर हमला करवाया किंतु हर बार पराजय का ही मूह देखना पड़ा…रतनेश की इस जीत मे उसके मस्तक मे
लगी सुर्य चिन्ह की शक्ति का बड़ा योगदान था.
देव पाल—फिर से हमारी हार हुई….समझ नही आता क्या करूँ…?
राघव—मेरी इतनी शक्तियाँ भी उसका कुछ बिगाड़ नही पा रही हैं…..ऐसा कैसे हो सकता है….?
देव पाल—ऐसा इसलिए है कि उसके मस्तक मे जनम जात सुर्य मणि है, जिसके कारण वो बेहद शक्ति शालि हो जाता है लड़ाई के समय.
राघव—खैर तुम चिंता मत करो…उसकी इन शक्तियो का तोड़ भी है मेरे पास…अब की बार हमला दिन मे नही बल्कि रात मे होगा, बाकी
सब मुझ पर छोड़ दो…फिर देखो मैं कैसी माया रचता हूँ.
उसने एक दूत भेज कर ये संदेशा भेजा कि अगर अपने राज्य को बचाना चाहते हो तो हमे पद्मिनी सौंप दो रतनेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया..उसने युद्ध की चुनौती स्वीकार कर ली.
अगली बार एक बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर के हमला किया गया…..रतनेश को ये नही पता था कि राघव ने क्या चाल चली है…वो हमले का
जवाब देते हुए युद्ध भूमि मे उतर गया.
इधर पद्मिनी ने हीरा मणि को युद्ध का समाचार लेने भेजा..वो आख़िर कार रतनेश तक पहुच ही गया.
हीरा मणि को देख कर रतनेश के चेहरे पर मुश्कन आ गयी लेकिन ये सिर्फ़ दर्द को छिपाने की कोशिश थी.. उसने एक पत्र लिख कर हीरा
मणि को दे दिया.
रतनेश—हीरा मणि, ये पत्र तुम कैसे भी कर के पद्मिनी तक पहुचा देना.
हीरा मणि रतनेश से वो पत्र लेकर चुपके से वहाँ से निकल गया…वापिस आते समय उसने राघव और देव पाल को एक साथ देख कर उसका माथा ठनका....
उसने अयोध्या पहुच कर पद्मिनी को रतनेश का दिया हुआ पत्र दे दिया, जिसे पढ़ते ही पद्मिनी की आँखो से आँसू बहने लगे…
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…..
धर्म भूमि यह कर्म क्षेत्र की, कल रणभूमि बनेगी
भाई भाई का रक्ता बहेगा, चांडी लहू पिएगी
चांडी लहू पिएगी,
जाने किसका जीवन दीपक, जला रहेगा कब तक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे……
किसका किसका लहू गिरेगा पहचानेगा कौन
लहू, लहू में मिल जाएगा, मौत रहेगी मौन
मौत रहेगी मौन
बन अनाथ जीवन भटकेगा, भाव लिए पर मरते तक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
पर हम सैनिक हैं, लड़ना आवश्यक है
पर धर्म की रक्षा के हित हमको मरना आवश्यक है
मारना आवश्यक है
मर कर ही जीना होता है, जीने से आवश्यक
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
हे प्रियतमे, पत्र ये मेरा तुम्हे मिलेगा जब तक,
पता नही, पता नही, पता नही मैं रहूं ना रहूं,
इस दुनिया में तब तक, हे प्रियतमे…….
वही युद्ध भूमि मे रतनेश जितने भी सैनिक वो मारता उससे दुगुने पैदा हो जाते, साथ ही मरे हुए सैनिक भी फिर से खड़े होकर लड़ने लगते…रतनेश इस मायाजाल मे उलझ गया और इस मौके का फ़ायदा उठा कर राघव ने यक्षिणी की मदद से रतनेश को बंदी बना लिया. और उसको राजगढ़ ले जया गया….रतनेश अब तक ये नही समझ सका था कि ये जगह कौन सी है और इसका असली खिलाड़ी कौन है.
इधर युद्ध भूमि से कोई समाचार ना मिलता देख कर पद्मिनी को किसी अपशकुन की आशंका होने लगी….उसने हीरा मणि को रतनेश की खोज मे भेजा.
हीरा मणि खोजते खोजते राजगढ़ जा पहुचा जहाँ उसे सच्चाई पता चली कि रतनेश यहीं राघव की क़ैद मे है वो किसी तरह रतनेश तक पहुच
गया…जहाँ रतनेश के शरीर मे जगह जगह पर चोट के निशान थे और वो बुरी तरह से घायल अवस्था मे था.
हीरा मणि—आपकी ये हालत कैसे हुई…?
रतनेश—मुझे धोखे से फसाया गया है….मुझे पद्मिनी की चिंता हो रही है…उनका असली मकसद उसे हासिल करना है..तुम कोई उपाय
करो और उसे किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाओ....
लेकिन जैसे ही हीरा मणि ने उसके राजगढ़ मे क़ैद होने और घायल होने की जानकारी दी साथ मे बताया कि ये सब राघव और देव पाल ने किया है तो उसकी आँखे गुस्से से तमतमा गयी.
जिन आँखो मे अभी आँसू बह रहे थे, उनमे से आग की चिंगारी निकलने लगी…..उसने राजशी वस्त्र त्याग कर एक वीरांगना की तरह हाथो मे
तलवार लेकर घोड़े पर सवार हो के युद्ध भूमि की तरफ निकल पड़ी.
इधर देव पाल ने परी की मदद से पद्मिनी के पुत्र को अपने क़ब्ज़े मे ले लिया कि अगर पद्मिनी ना नुकुर करे तो इस बच्चे को जान से मारने की धमकी से वो खुद को हमारे हवाले कर दे…साथ ही उसने परी को ये झूठा आश्वासन दिया कि पद्मिनी को हासिल कर लेने के उपरांत वो रतनेश को क़ैद मुक्त कर देंगे.
पद्मिनी इस समय आँखो मे तूफान लिए राजगढ़ मे घुस गयी और वहाँ कहर मचाना शुरू कर दिया…जो भी उसके सामने आता वो गाजर
मूली की तरह कट जाता.
वो इस समय दुर्गा का नया अवतार लग रही थी….पूरी तरह से रन चांडी बन चुकी थी वो….उसका ऐसा उग्र रूप देख कर सब एक साथ उसके उपर आक्रमण करने लगे किंतु उन्हे मिल रही थी तो सिर्फ़ मौत.
जब राघव और देव पाल ने ये सुना तो उन्होने रतनेश को ख़तम करने का फ़ैसला किया…..कारागार मे पहुच कर अचेत पड़े रतनेश के उपर सबने प्रहार करने शुरू कर दिए.
उनके प्रहार से रतनेश की चेतना लौट आई..उसने बेड़ियो मे जकड़े होने के बावजूद भी राघव को उठा कर दीवार मे पटक दिया, लेकिन यक्षिणी के प्रभाव से वो बच गया.
इस समय क्यों कि दिन था जिससे रतनेश के मस्तक का सूर्य चक्र सक्रिय होकर चमकने लगा, जिसके कारण राघव के सभी तांत्रिक वार विफल होने लगे.
उधर पद्मिनी राजगढ़ और उसके साथी राजाओ को लाखो की सेना का सर काट काट कर राजगढ़ को श्मशान भूमि और लाषो का अखाड़ा
बना दिया था….उसके पैर तेज़ी से कारागार की तरफ बढ़ने लगे.
वही रतनेश ने राघव की गर्दन दबोच ली…इससे पहले कि वह राघव की गर्दन उसके धड़ से अलग करता किसी ने उसकी पीठ मे तलवार
आर पार कर दी….वो जैसे ही उस कायर को देखने के लिए पलटा तो उसे बहुत गहरा धक्का लगा.
रतनेश (शॉक्ड)—त्त्त्तुम्म्म्म…..तुमने ये…क्क्कयो किया….? मैं तो तुझे अपना भाई..अपना दोस्त समझता था….और तूने मेरे विश्वास का गला घोंट दिया…क्यो…?
देव पाल—पद्मिनी चाहिए मुझे…..पद्मिनी अब मेरी है….हाहहाहा…. अब वो मेरी होगी…हाहहहाहा
देव पाल जैसे ही तलवार का वार रतनेश की गर्दन पर करने को हुआ वैसे ही किसी ने ज़ोर से उसका नाम पुकारा ‘ देवववव पाालल्ल्ल्ल’ और
अगले ही पल उसकी गर्दन धड़ से अलग होकर दूर जा गिरी.
रतनेश—दिव्याआअ..तुउउम्म्म्मम
पद्मिनी ने जैसे ही रतनेश की हालत देखी उसकी रुलाई फूट पड़ी….वो तुरंत उसके सीने से लिपट कर रोने लगी…रतनेश उसे समझाते
समझाते थक गया.
रतनेश—पद्मिनी,,तुम चिंता मत करो…मैं फिर जनम लूँगा…और हर जनम मे मेरा ये दिल सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही धड़केगा…..मैं तुम्हे वचन देता हूँ…कि तुम्हारा साजन सिर्फ़ तुम्हारा ही रहेगा..जनम जन्मान्तर तक्क्क्क…आअ…तुम मेरी रूह मे समा चुकी हो दिव्या..तुम्हे मुझ से अब मौत भी अलग नही कर सकती…आआआआ….राजगढ़ को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगिइइइ….आआआआअ
और पद्मिनी की गोद मे ही उसने अपनी अंतिम साँस लेते हुए दम तोड़ दिया…..पद्मिनी उसके सर को अपनी गोद मे उठाए बिलख बिलख कर रोने लगी.
पद्मिनी (रोते हुए)—नहियीईईईई…..तुम मुझे छोड़ कर नही जा सकते..साजन…..मैं अब कैसे जिंदा रहूंगी…? मेरी तो साँसे ही तुमसे चलती हैं…जब तुम ही नही रहे तो मैं जीवित रह के क्या करूँगी….
उसने रतनेश के मृत शरीर को उठा कर राजगढ़ के बाहर लाकर रख दिया और लकड़िया इकट्ठी कर के उसका सर अपनी गोद मे ले के उनकेउपर बैठ गयी.
पद्मिनी (रोते हुए)—मैं तुम्हे वचन देती हूँ..साजन…हर जनम मे दिव्या केवल तुम्हारी ही रहेगी…..हे माँ जगदंबा..अगर मैने कभी भूल वश भी साजन के सिवा किसी पराए मर्द का ध्यान ना किया हो तो मुझे भी मृत्यु दे दो…हे अग्नि देव….अगर मैने तन से, मंन से और कर्म से हमेशा
अपने पति व्रत धर्म का पालन किया है तो इसी समय इस चिता को अग्नि दान दो.
पद्मिनी के इतना कहते ही जोरो की मेघ गर्जना होने लगी और अगले ही पल उस महा सती की चिता मे स्वतः ही अग्नि प्रज्ज्वलित हो गयी…..मेघो ने पानी बरसा कर उस महा सती का अभिवादन किया किंतु अग्नि जलती रही और पद्मिनी अपने साजन सहित उसमे जल कर सती हो गयी.
इस घटना ने दिव्या और साजन की रूह को एक कर दिया और साथ ही परी भी साजन से हमेशा हमेशा के लिए जुड़ गयी….और राजगढ़ के इतिहास मे एक कलंक का काला अध्याय जुड़ गया वही जब परी को ये सब मालूम हुआ तो वो पछताते हुए विलाप करने लगी…और रतनेश
की विरह पीड़ा ना झेल सकनेकी स्थिति मे उसने खुद ही दोनो की उस जलती चिता मे अपना सिर काट के भेंट कर दिया.
तब से जैसे राजगढ़ के बुरे दिन शुरू हो गये….लगभग 50 वर्षो के बाद राजगढ़ मे तीन बच्चो ने एक ही समय नक्षत्र मे जनम लिया….दिव्या,
शक्ति और परी ने.