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Guest
अपडेट-170
राज—ज़रा ध्यान से सोचिए…जिस राज़ को सदियो से आज तक कोई नही जान पाया…जिस राज़ से आज तक हर कोई अंजान है क्या वो इतनी सरलता से हासिल होगा……
पायल—ज़रूर कोई बहुत ही बड़ा रहस्य है ये.
राज—ऐसा ही कुछ समझ लो
इधर हम बाते करने मे मशगूल थे उधर नानी अकेले ही गुफा मे घूमने निकल गयी…ऐसे ही घूमते हुए एक जगह पहुचि ..तभी उन्हे लगा कि कोई उनके पीछे खड़ा है….ये महसूस होते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये
डरते डरते वो किसी तरह पलटी और फिर पलटते ही कुछ देख कर ज़ोर से चीख उठी...
‘’राज्ज्जज से तो तूमम्म्म बच गाइिईई मगर अब मुझसे तुम्हे कौन बचाएगाअ....हाहहहाहा’’
अब आगे.......
नानी की चीख सुन कर हम उनकी तरफ भागे, मैने देखा वहाँ पायल दीदी कुल्हाड़ी उपर किए हुई थी और नानी आँखे बंद कर के चिल्लाए जा रही थी.
राज—दीदी, स्टॉप इट
पायल—नही...मैं इस फ़साद की जड़ को काट कर रहूंगी, तभी मुझे चैन आएगा.
नानी (मेरी तरफ भागते हुए)—राज...मुझे बचा ले इस पायल से....ये मुझे अकेले पा कर कभी भी मार सकती है मैं कल ही अपने घर चली
जाउन्गी
राज—आपको कहीं जाने की ज़रूरत नही है....दीदी ऐसा कुछ नही करेंगी
पायल—मैं ऐसा ही करूँगी
राज—मैने आपको अपनी कसम दी थी ना कि आप नानी को कुछ नही करोगी....ठीक है जब मेरी कसम की कोई वॅल्यू ही नही है आप की
नज़रों मे तो फिर जो आपका मन आए वो करो, मैं कौन होता हूँ आपको कुछ कहने वाला.
पायल (तड़प कर)—राज...ऐसा मत बोल्ल्ल.....तेरी कसम तो मैं सपने मे भी नही तोड़ सकती….लेकिन तुझे कोई कुछ कहता है तो मुझसे बर्दास्त नही होता..मैं क्या करूँ….?…अब से तू जैसा रहने को कहेगा मैं रहूंगी, किसी को कुछ भी नही बोलूँगी....लेकिन प्लीज़ तू मुझ से मूह मत मोड़....अगर तू ही मुझसे रूठ जाएगा तो मैं जी कर क्या करूँगी...अपनी इस कुल्हाड़ी से मैं खुद का ही गला काट लूँगी.
इतना बोलते बोलते पायल दीदी का गला भर आया और आँखे छलक आई....मुझे कुछ एहसास होते ही उनकी तरफ मूड गया और उनकी
दर्द और तड़प से भरी आँखे देख कर मेरा हृदय भी उनके दर्द से जुड़ कर तड़प उठा.
नेहा—राज क्यो रुला रहा है मेरी बच्ची को..... ? हम सब जानते हैं कि तुझे वो कितना चाहती है....चल जा उसे शांत कर जल्दी से....वरना
उससे मारने के लिए किसी कुल्हाड़ी की ज़रूरत नही पड़ेगी वो वैसे ही यो ही रोते रोते ही मर जाएगी.
नेहा चाची की बात सुन कर मैं जल्दी से पायल दीदी के पास जा कर उन्हे खीच के अपने सीने से लगा लिया....मेरी छाती से लगते ही पायल
दीदी जोरो से बिफर उठी....मैने दोनो हाथो मे उनका चेहरा थाम कर उनके आँसुओं को पीने लगा.
राज—खबरदार जो अब एक भी बूँद पानी व्यर्थ मे बहाया तो....ये बहुत अनमोल मोती हैं…..इन्हे ऐसे ही बेकार मत बहने दिया करो.
पायल (सिसकते हुए)—तो फिर तू मुझसे रूठा क्यो था...... ? तू ही तो रुलाता है मुझे……मेरी हर खुशी, हर गम तुझ से ही तो जुड़ी हैं…..तू रूठ गया तो एक पल के लिए मुझे ऐसा लगने लगा जैसे कि मेरी साँसे ही थम जाएँगी… मेरे हृदय ने स्पंदन करना ही बंद कर दिया हो
जैसे……भले ही पूरी दुनिया मुझ से रूठ जाए तो मुझे कोई परवाह नही मगर तू मत नाराज़ हुआ कर राज मुझ से.
राज (खुद से चिपका कर)—भला मैं आपसे नाराज़ हो सकता हूँ कभी….? आप, परिधि दीदी और रूचि दीदी मेरे हृदय का टुकड़ा हो…..फिर कभी ऐसा कुछ मत सोचना.
पायल दीदी मेरे सीने से चिपक गयी और नानी और चाची के सामने ही उन्होने बेखायाली मे मुझे होठों पर किस करने लगी….परिधि दीदी एक तक मुझे देखे जा रही थी, मैने उन्हे देख कर अपनी बाहे खोल दी तो वो भी भाग कर तेज़ी से मेरी आगोश मे सिमट गयी और वो मुझे सब के सामने ही चूमने लगी.
दोनो को मुझे ऐसे चूमते हुए देख कर नेहा चाची और नानी की तो आँखे ही फॅट पड़ी किंतु उन्होने कोई भी टिका टिप्पणी नही की….कुछ देर ऐसे ही चुम्मा चाटी के बाद जब माहौल मे शांति आ गयी तो मैने दोनो को अलग किया.
राज—चलो अब समय मत बर्बाद करो…..हमे उस अबूझ पहेली को भी तो बूझना है अभी…..वैसे दीदी आप नानी के पीछे कब गयी थी…?
पायल—मुझे शक़ था कि कहीं इन्होने तुम्हे यहाँ का पता बता कर फसाने का कोई चाल ना खेली हो….इसलिए मेरी नज़र इन पर ही जमी हुई थी….जब ये तुम से अलग हो कर इधर उधर घूमने लगी तो मैं भी पीछा करते हुए वहाँ पहुच गयी कि अगर कुछ गड़बड़ किया तो वही काट दूँगी.
राज—ह्म्म्म्म तो ये बात है……खैर चलो पहेली को देखते हैं.
परिधि—हाँ चलो
नेहा (मन मे)—कहीं माँ जी बात सच तो नही….? पायल और परिधि दोनो कैसे बेशरम हो कर राज को चूम रही थी वो भी उसके होठ पर, ऐसा किस किसी बहन का तो नही हो सकता……लेकिन राज है भी तो कितना सुंदर, उसमे हर वो खूबी है जो एक लड़की अपने जीवन
साथी मे ढूड़ती है….हम सब तो परिधि को मृतपराय ही समझ चुके थे किंतु राज ने उसको नया जीवन दिया, मुझे मेरी बेटी से मिला दिया
और माँ जी ने , छी….मुझे राज पर ही भरोसा करना चाहिए था.
परिधि—कहाँ खो गयी मम्मी…..?
नेहा—हनन्न….कहीं नही बस यो ही.
नानी—कहाँ से यहाँ आ गयी मैं....अब तो बाहर भी नही निकल सकते.
परिधि—लेकिन इन शब्दो आ क्या अर्थ है….?
राज—पता नही…….लेकिन जो भी लिखा है उसका संबंध इस शेर के मुखौटे से अवश्य ही संबंधित होना चाहिए तभी उसके नीचे लिखा है.
मैं उस शेर को देखते हुए उस पर हाथ फिराने लगा चारो तरफ……कुछ समझ ही नही आ रहा था…ऐसे ही हाथ फेरते हुए अचानक जैसे ही मैने उसकी एक आँख पर उंगली घुमाई तो जैसे वहाँ भूकंप आ गया…..घड़ घड़ाहट की जोरो से आवाज़ होने लगी…..हम सभी हैरान रह गये की अचानक ये क्या होने लगा.
लेकिन अगले ही पल हमारे आश्चर्य की सीमा ही नही रही जब हमने देखा कि शेर की उस आँख से जिसके उपर मेरी उंगली दब गयी थी वहाँ से एक रोशनी निकल कर सामने की दीवार पर टकराने लगी.
जैसे जैसे रोशनी दीवार से टकराती जा रही थी वहाँ पर एक द्वार धीरे धीरे खुलता जा रहा था…हम सब हतप्रभ हो कर इस दृश्य को सिर्फ़
किसी मूक दर्शक की भाँति देखे जा रहे थे…..नेहा चाची और नानी के लिए तो ये घटना किसी अविश्वश्निय से लगने वाले ख्वाब से कम नही थी.
जैसे ही शेर की आँख से रोशनी निकलनी बंद हुई तो वो मुखौटा वहाँ से गायब हो गया…….सब एक बार फिर से चौंक गये….मैने सामने की दीवार पर नज़र दौड़ाई तो वहाँ पर अब एक छोटा सा द्वार बन चुका था, ज़्यादा चौड़ा तो नही किंतु इतना अवश्य था कि एक बार मे एक आदमी निकल सकता था उसमे से हो कर.
पायल—यी कैसे हो गया….? क्या किया था तुमने…?
राज—मैने कुछ नही किया वो सब तो अपने आप ही हो गया….देखो अब हमे आगे जाने का रास्ता भी मिल गया है.. तो अधिक विलंब करना उचित नही है.
नेहा—हाँ चलो…अब आगे चलते हैं
राज—सब एक एक कर के द्वार से अंदर प्रवेश करना.
सबसे पहले मैने उस छोटे द्वार से घुस कर अंदर गया….बाकी सब भी मेरा अनुसरण करते हुए क्रमशः एक के बाद एक द्वार से हो कर अंदर आ गये.
सब के अंदर आते ही वो द्वार पुनः बंद हो गया जैसे कि वहाँ कभी आने जाने का कोई रास्ता था ही नही…..आगे एकदम घना अंधेरा था….हाथ को हाथ नज़र नही आ रहा था.
नेहा—यहाँ तो रोशनी बिल्कुल नही है…..ऐसे अंधेरे मे हम आगे कैसे जा सकते हैं….?
राज—बात तो सही है आपकी….लेकिन हमे आगे बढ़ना तो पड़ेगा ही……सब एक दूसरे का हाथ पकड़ लो और मेरे साथ साथ बढ़ते रहो….कही ना कही किनारा भी मिल ही जाएगा.
सब मेरा हाथ पकड़ के साथ मे चलने लगे…..अभी हम कुछ ही दूर गये होंगे कि तभी हमारे पैरो को लोहे की मोटी मोटी ज़ंजीरो ने जकड लिया.
लोहे की सलाखे इतनी भारी थी कि एक कदम भी आगे बढ़ा पाना दूभर हो गया…..सब डर के मारे मुझसे जोरो से चिपक गयी….मैने काफ़ी
ज़ोर लगाया उन बेड़ियो से पीछा छुड़ाने का किंतु सभी प्रयास बेकार हो गये.
पायल—ये क्या नयी मुसीबत है, राज….?
राज—ज़रा ध्यान से सोचिए…जिस राज़ को सदियो से आज तक कोई नही जान पाया…जिस राज़ से आज तक हर कोई अंजान है क्या वो इतनी सरलता से हासिल होगा……
पायल—ज़रूर कोई बहुत ही बड़ा रहस्य है ये.
राज—ऐसा ही कुछ समझ लो
इधर हम बाते करने मे मशगूल थे उधर नानी अकेले ही गुफा मे घूमने निकल गयी…ऐसे ही घूमते हुए एक जगह पहुचि ..तभी उन्हे लगा कि कोई उनके पीछे खड़ा है….ये महसूस होते ही उनके रोंगटे खड़े हो गये
डरते डरते वो किसी तरह पलटी और फिर पलटते ही कुछ देख कर ज़ोर से चीख उठी...
‘’राज्ज्जज से तो तूमम्म्म बच गाइिईई मगर अब मुझसे तुम्हे कौन बचाएगाअ....हाहहहाहा’’
अब आगे.......
नानी की चीख सुन कर हम उनकी तरफ भागे, मैने देखा वहाँ पायल दीदी कुल्हाड़ी उपर किए हुई थी और नानी आँखे बंद कर के चिल्लाए जा रही थी.
राज—दीदी, स्टॉप इट
पायल—नही...मैं इस फ़साद की जड़ को काट कर रहूंगी, तभी मुझे चैन आएगा.
नानी (मेरी तरफ भागते हुए)—राज...मुझे बचा ले इस पायल से....ये मुझे अकेले पा कर कभी भी मार सकती है मैं कल ही अपने घर चली
जाउन्गी
राज—आपको कहीं जाने की ज़रूरत नही है....दीदी ऐसा कुछ नही करेंगी
पायल—मैं ऐसा ही करूँगी
राज—मैने आपको अपनी कसम दी थी ना कि आप नानी को कुछ नही करोगी....ठीक है जब मेरी कसम की कोई वॅल्यू ही नही है आप की
नज़रों मे तो फिर जो आपका मन आए वो करो, मैं कौन होता हूँ आपको कुछ कहने वाला.
पायल (तड़प कर)—राज...ऐसा मत बोल्ल्ल.....तेरी कसम तो मैं सपने मे भी नही तोड़ सकती….लेकिन तुझे कोई कुछ कहता है तो मुझसे बर्दास्त नही होता..मैं क्या करूँ….?…अब से तू जैसा रहने को कहेगा मैं रहूंगी, किसी को कुछ भी नही बोलूँगी....लेकिन प्लीज़ तू मुझ से मूह मत मोड़....अगर तू ही मुझसे रूठ जाएगा तो मैं जी कर क्या करूँगी...अपनी इस कुल्हाड़ी से मैं खुद का ही गला काट लूँगी.
इतना बोलते बोलते पायल दीदी का गला भर आया और आँखे छलक आई....मुझे कुछ एहसास होते ही उनकी तरफ मूड गया और उनकी
दर्द और तड़प से भरी आँखे देख कर मेरा हृदय भी उनके दर्द से जुड़ कर तड़प उठा.
नेहा—राज क्यो रुला रहा है मेरी बच्ची को..... ? हम सब जानते हैं कि तुझे वो कितना चाहती है....चल जा उसे शांत कर जल्दी से....वरना
उससे मारने के लिए किसी कुल्हाड़ी की ज़रूरत नही पड़ेगी वो वैसे ही यो ही रोते रोते ही मर जाएगी.
नेहा चाची की बात सुन कर मैं जल्दी से पायल दीदी के पास जा कर उन्हे खीच के अपने सीने से लगा लिया....मेरी छाती से लगते ही पायल
दीदी जोरो से बिफर उठी....मैने दोनो हाथो मे उनका चेहरा थाम कर उनके आँसुओं को पीने लगा.
राज—खबरदार जो अब एक भी बूँद पानी व्यर्थ मे बहाया तो....ये बहुत अनमोल मोती हैं…..इन्हे ऐसे ही बेकार मत बहने दिया करो.
पायल (सिसकते हुए)—तो फिर तू मुझसे रूठा क्यो था...... ? तू ही तो रुलाता है मुझे……मेरी हर खुशी, हर गम तुझ से ही तो जुड़ी हैं…..तू रूठ गया तो एक पल के लिए मुझे ऐसा लगने लगा जैसे कि मेरी साँसे ही थम जाएँगी… मेरे हृदय ने स्पंदन करना ही बंद कर दिया हो
जैसे……भले ही पूरी दुनिया मुझ से रूठ जाए तो मुझे कोई परवाह नही मगर तू मत नाराज़ हुआ कर राज मुझ से.
राज (खुद से चिपका कर)—भला मैं आपसे नाराज़ हो सकता हूँ कभी….? आप, परिधि दीदी और रूचि दीदी मेरे हृदय का टुकड़ा हो…..फिर कभी ऐसा कुछ मत सोचना.
पायल दीदी मेरे सीने से चिपक गयी और नानी और चाची के सामने ही उन्होने बेखायाली मे मुझे होठों पर किस करने लगी….परिधि दीदी एक तक मुझे देखे जा रही थी, मैने उन्हे देख कर अपनी बाहे खोल दी तो वो भी भाग कर तेज़ी से मेरी आगोश मे सिमट गयी और वो मुझे सब के सामने ही चूमने लगी.
दोनो को मुझे ऐसे चूमते हुए देख कर नेहा चाची और नानी की तो आँखे ही फॅट पड़ी किंतु उन्होने कोई भी टिका टिप्पणी नही की….कुछ देर ऐसे ही चुम्मा चाटी के बाद जब माहौल मे शांति आ गयी तो मैने दोनो को अलग किया.
राज—चलो अब समय मत बर्बाद करो…..हमे उस अबूझ पहेली को भी तो बूझना है अभी…..वैसे दीदी आप नानी के पीछे कब गयी थी…?
पायल—मुझे शक़ था कि कहीं इन्होने तुम्हे यहाँ का पता बता कर फसाने का कोई चाल ना खेली हो….इसलिए मेरी नज़र इन पर ही जमी हुई थी….जब ये तुम से अलग हो कर इधर उधर घूमने लगी तो मैं भी पीछा करते हुए वहाँ पहुच गयी कि अगर कुछ गड़बड़ किया तो वही काट दूँगी.
राज—ह्म्म्म्म तो ये बात है……खैर चलो पहेली को देखते हैं.
परिधि—हाँ चलो
नेहा (मन मे)—कहीं माँ जी बात सच तो नही….? पायल और परिधि दोनो कैसे बेशरम हो कर राज को चूम रही थी वो भी उसके होठ पर, ऐसा किस किसी बहन का तो नही हो सकता……लेकिन राज है भी तो कितना सुंदर, उसमे हर वो खूबी है जो एक लड़की अपने जीवन
साथी मे ढूड़ती है….हम सब तो परिधि को मृतपराय ही समझ चुके थे किंतु राज ने उसको नया जीवन दिया, मुझे मेरी बेटी से मिला दिया
और माँ जी ने , छी….मुझे राज पर ही भरोसा करना चाहिए था.
परिधि—कहाँ खो गयी मम्मी…..?
नेहा—हनन्न….कहीं नही बस यो ही.
नानी—कहाँ से यहाँ आ गयी मैं....अब तो बाहर भी नही निकल सकते.
परिधि—लेकिन इन शब्दो आ क्या अर्थ है….?
राज—पता नही…….लेकिन जो भी लिखा है उसका संबंध इस शेर के मुखौटे से अवश्य ही संबंधित होना चाहिए तभी उसके नीचे लिखा है.
मैं उस शेर को देखते हुए उस पर हाथ फिराने लगा चारो तरफ……कुछ समझ ही नही आ रहा था…ऐसे ही हाथ फेरते हुए अचानक जैसे ही मैने उसकी एक आँख पर उंगली घुमाई तो जैसे वहाँ भूकंप आ गया…..घड़ घड़ाहट की जोरो से आवाज़ होने लगी…..हम सभी हैरान रह गये की अचानक ये क्या होने लगा.
लेकिन अगले ही पल हमारे आश्चर्य की सीमा ही नही रही जब हमने देखा कि शेर की उस आँख से जिसके उपर मेरी उंगली दब गयी थी वहाँ से एक रोशनी निकल कर सामने की दीवार पर टकराने लगी.
जैसे जैसे रोशनी दीवार से टकराती जा रही थी वहाँ पर एक द्वार धीरे धीरे खुलता जा रहा था…हम सब हतप्रभ हो कर इस दृश्य को सिर्फ़
किसी मूक दर्शक की भाँति देखे जा रहे थे…..नेहा चाची और नानी के लिए तो ये घटना किसी अविश्वश्निय से लगने वाले ख्वाब से कम नही थी.
जैसे ही शेर की आँख से रोशनी निकलनी बंद हुई तो वो मुखौटा वहाँ से गायब हो गया…….सब एक बार फिर से चौंक गये….मैने सामने की दीवार पर नज़र दौड़ाई तो वहाँ पर अब एक छोटा सा द्वार बन चुका था, ज़्यादा चौड़ा तो नही किंतु इतना अवश्य था कि एक बार मे एक आदमी निकल सकता था उसमे से हो कर.
पायल—यी कैसे हो गया….? क्या किया था तुमने…?
राज—मैने कुछ नही किया वो सब तो अपने आप ही हो गया….देखो अब हमे आगे जाने का रास्ता भी मिल गया है.. तो अधिक विलंब करना उचित नही है.
नेहा—हाँ चलो…अब आगे चलते हैं
राज—सब एक एक कर के द्वार से अंदर प्रवेश करना.
सबसे पहले मैने उस छोटे द्वार से घुस कर अंदर गया….बाकी सब भी मेरा अनुसरण करते हुए क्रमशः एक के बाद एक द्वार से हो कर अंदर आ गये.
सब के अंदर आते ही वो द्वार पुनः बंद हो गया जैसे कि वहाँ कभी आने जाने का कोई रास्ता था ही नही…..आगे एकदम घना अंधेरा था….हाथ को हाथ नज़र नही आ रहा था.
नेहा—यहाँ तो रोशनी बिल्कुल नही है…..ऐसे अंधेरे मे हम आगे कैसे जा सकते हैं….?
राज—बात तो सही है आपकी….लेकिन हमे आगे बढ़ना तो पड़ेगा ही……सब एक दूसरे का हाथ पकड़ लो और मेरे साथ साथ बढ़ते रहो….कही ना कही किनारा भी मिल ही जाएगा.
सब मेरा हाथ पकड़ के साथ मे चलने लगे…..अभी हम कुछ ही दूर गये होंगे कि तभी हमारे पैरो को लोहे की मोटी मोटी ज़ंजीरो ने जकड लिया.
लोहे की सलाखे इतनी भारी थी कि एक कदम भी आगे बढ़ा पाना दूभर हो गया…..सब डर के मारे मुझसे जोरो से चिपक गयी….मैने काफ़ी
ज़ोर लगाया उन बेड़ियो से पीछा छुड़ाने का किंतु सभी प्रयास बेकार हो गये.
पायल—ये क्या नयी मुसीबत है, राज….?