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अपडेट- 259
उसके बाद मैने दीक्षा को एक बार और छोड़ा उसके कहने पर….तब तक वो भी तक गयी थी….तो मैने उसको गोद मे उठा कर बाथरूम ले गया और उसको नहलाया…नहलाते हुए वो एक बार फिर से गरम हो गयी तो एक बार और उसको चोदना पड़ गया….मैने उसको बेड पर लिटा दिया कपड़े पहना कर.
दीक्षा अब सोने लगी थी…तो मैं भी कपड़े पहन कर उसके रूम से बाहर निकला वैसे ही किसी से टकरा गया……
अब आगे…….
जैसे ही वो मुझसे टकराया तो टकराते ही धडाम से नीचे गिर गया….जबकि मैं तो ये सोच कर चौंक गया की कौन है ये और कहीं इसने मुझे दीक्षा के साथ कुछ करते हुए देख तो नही लिया…फिर भी मैने उसको उठाने के लिए जैसे ही अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया तो उसने
मुझे तेज़ी से धक्का देते हुए खड़ा हुआ और छत की तरफ भागने लगा.
ये देख कर मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कौन हो सकता है और मुझे धक्का देकर भाग क्यो रहा है, वो भी छत की तरफ….?
राज—अरे रूको..
उसको रुकते ना देख मैं भी उसके पीछे दौड़ पड़ा….उसने सीढ़ियो से भागते हुए जल्दी से उपर का दरवाजा खोल कर छत मे आ गया….उसके पीछे पीछे मैं भी पहुच गया.
राज—मैं कहता हूँ..रुक जाऊओ…
छत मे अंधेरा था…वो किनारे की ओर भागने लगा….मैं भी तेज़ी से दौड़ कर के जैसे ही उसके पास पहुचा वैसे ही उसने छत से सीधे जंप मार दिया नीचे.
मैं भी तुरंत नीचे कूद गया लेकिन ये देख कर मुझे फिर से झटका लगा कि वहाँ नीचे कोई नही था.. जब कि थर्ड मंज़िल की छत से नीचे कूदने पर तो उसके हाथ पैर ही टूट जाने चाहिए थे, किंतु वो नीचे गिरते ही गायब हो चुका था.
राज (मंन मे)—इतना जल्दी वो कैसे गायब हो गया….? कोई आम आदमी के बस का तो ये काम होना संभव नही है….फिर कौन हो
सकता है….और यहाँ क्यो आया था इस समय….?
मैने नीचे चारो तरफ घूम फिर कर देखा लेकिन जब कोई नही मिला तो वही से उपर जंप कर के छत मे आ गया….और नीचे जाने के
लिए जैसे ही सीधी की ओर रुख़ किया कि फिर किसी से टकरा गया….
“बेटू, तू इस समय यहाँ छत मे क्या कर रहा है….?” ये रूचि दीदी थी जिनसे मैं अभी अभी टकराया.
राज—कुछ नही दीदी….बस ऐसे ही टहल रहा था….लेकिन आप सोई नही क्या अभी तक….?
रूचि—मैं तो सो ही रही थी लेकिन तेरे चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मेरी नीद खुल गयी और मैं तुझे सब जगह ढूँढते हुए यहाँ आ गयी.
राज—ओह्ह्ह…सॉरी दीदी, मेरी वजह से आपकी नीद डिस्टर्ब हुई…
रूचि—मुझे सोने की कोई चिंता नही बेटू…..लेकिन तू चिल्लाया क्यो था…? कौन था यहाँ….?
राज—पता नही…शायद बिल्ली रही होगी....चलिए आप सो जाइए.
रूचि—आ जा, तू भी मेरे साथ ही सो जा.
मैं रूचि दीदी के साथ उनके रूम मे आ गया…वो मुझसे चिपक के लेट गयी…कुछ देर बाते करते करते वो मेरी बाहों मे ही सो गयी….मैने उनके गालो पर किस किया और आँखे बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा किंतु दिमाग़ अभी भी कुछ देर पहले की घटना पर ही
घूम रहा था…ऐसे ही कब नीद आ गयी मालूम नही हुआ.
अगली सुबह रूचि दीदी ने जब मुझे उठाया तब वो नहा कर आई थी….मैं उन्हे देखता ही रह गया…बहुत सुंदर लग रही थी.
रूचि—क्या देख रहा है बेटू…उठना नही है क्या….? पायल तीन बार चेक कर के चली गयी कि तुम उठे कि नही…
राज—जब ऐसा जानलेवा हुष्ण सामने हो तो कौन कम्बख़्त भला सोना चाहेगा.
रूचि—अच्छा जी, जनाब को शायरी सूझ रही है.
राज—दीदी आपके चेहरे पर ये क्या लगा है….?
रूचि (चेहरा पोछ्ते हुए)—कहाँ लगा है..कुछ भी तो नही है..
राज—इधर आओ मैं साफ करता हूँ
रूचि (चेहरा पास मे कर के)—हमम्म्मम
मैं धीरे धीरे जैसे ही उनके चेहरे के करीब पहुचा तो उनकी आँखे स्वतः ही बंद हो गयी और होठ अपने आप थर थराने लगे….मैने धीरे
से अपने होंठो को उनके अधरो से मिल जाने दिया…और फिर उनके अधरो मे शहद से भरे प्याले को पीने लगा.
रूचि दीदी मदहोश और मदहोश होती चली गयी और मुझसे कस के चिपक गयी….मैं उनके अधरो से शहद पीता रहा..पीता रहा….और तब तक पिया जब तक कि वो अकड़ नही गयी…क्यों कि मेरे दोनो हाथ उनकी छातियो का रस निचोड़ रहे थे…..इस दो तरफ़ा हमले से वो ज़्यादा देर तक खुद को ना रोक सकी और यौवन के उन्म्मद मे जल्दी ही अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच कर वो असीम आनंद की अनुभूत प्राप्त कर ली.
जब मैने अपने होंठो को उनकी गुलाब की पंखुड़ियो से अलग किया तो उनके चेहरे मे मुझे सारे जहाँ की शरम और हया की लाली नज़र आई…उन्होने अपना चेहरा झुका लिया….लेकिन उनकी साँसे धौंकनी की तरह तेज़ चल रही थी.
राज—क्या हुआ दीदी…आप इतना हाँफ क्यो रही हो…..?
रूचि (शर्मा कर)—कुछ नही
राज—तो आओ ना थोड़ी देर और सोते हैं..
रूचि (मुश्कुरा कर)—नही….मुझे फिर से नहाने जाना है.
राज—क्यो अभी तो नहा कर आई थी.... ?
रूचि (कान मे)—तुमने गंदी जो कर दिया है..
राज—ओह्ह्ह...सॉरी दीदी
रूचि—तू सॉरी मत बोल.....ये मेरी सबसे हसीन सुबह है...काश ऐसी सुबह हर रोज हो..
राज—होगी दीदी..ज़रूर होगी
रूचि—मैं इंतज़ार करूँगी फिर से ऐसी ही सुबह का बेटू
मैने उन्हे फिर से आगोश मे लेना चाहा तो वो मुश्कूराते हुए बाथरूम मे घुस गयी….और मैं भी मुश्कूराते हुए उनके रूम से निकल कर
अपने रूम मे आ गया..जहाँ पायल दीदी इधर उधर चहल कदमी कर रही थी और विधि बेड पर बैठी हुई थी.
पायल (ताना मारते हुए)—आ गये.. ! क्यो तुम्हे मेरे साथ सोने मे काँटे चुभते हैं...जो मुझे अकेली सोती छोड़ कर आधी रात मे ही भाग गये....अगर मुझे कुछ हो जाता तो..... ?
राज—बाप रे...इतना गुस्सा.. ! लेकिन किस बात का... ? मैं तो यही था रात भर….और मेरे रहते आप को कुछ नही होगा, मैं कुछ होने नही दूँगा.
पायल (गुस्से मे)—देखो राज…झूठ मत बोलो….मुझे छोड़ कर रात मे क्यो चले गये रूचि दीदी के पास…?
राज—वो…क्या है ना कि रूचि दीदी को नीद नही आ रही थी..इसलिए मैं उनके साथ बाते कर रहा था और कब नीद आ गयी पता ही नही चला.
पायल (व्यंग)—क्यो तुझे सपना आया था कि रूचि दीदी को नीद नही आ रही है….?
राज (मन मे)—अब तो इस बिल्ली को शांत करने का एक ही तरीका है.
मैने आगे बढ़ कर पायल दीदी को खीच के अपने सीने से लगा किया…पहले तो वो मुझसे छूटने के लिए छ्ट पटाइ लेकिन फिर शांत हो
कर उनकी बाहों का घेरा मेरी पीठ पर कसता चला गया.
राज—रूचि दीदी भी तो मेरी बहन हैं ना आपकी ही तरह.
पायल—तो मैं कहाँ मना कर रही हू की तू उनके पास मत जा…..लेकिन तू मुझे बता भी तो सकता था ना उनके पास जाने से पहले….कम से कम मैं परेशान तो नही होती….तुझे पता है कि जब रात मे मेरी नीद खुली तो तुझे अपने पास ना देख कर मुझे कितनी बेचैनी हो
रही थी….वैसे भी यहाँ कौन अपना है और कौन पराया समझना मुश्किल है…..मैं नही चाहती कि कोई फिर से तेरे खिलाफ कुछ साज़िश करे.
राज—सॉरी…अगली बार से ध्यान रखूँगा.
पायल—चल ठीक है….
विधि—अब आप जा कर नहा धो लीजिए.
पायल—जब तक मैं तेरे लिए कॉफी बनाती हूँ
विधि—अजीब प्यार है दोनो भाई बहन मे...अभी तो इतना गुस्सा थी और इतना जल्दी मान भी गयी
पायल—मैं जब गुस्सा होती हूँ तो ये ईडियट ऐसे ही करता है मेरे साथ….क्यों कि उसे पता है कि मैं चाहे जितनी भी गुस्सा क्यो ना रहूं…उसके सीने से लगते ही मेरे जिस्म का रोम रोम ठंडा पड़ने लगता है…ऐसे महसूस होता है कि जैसे मैने सब कुछ पा लिया हो…और
ये एहसास मन मे आते ही गुस्सा अपने आप गायब हो जाता है….फिर सब कुछ भूल कर मेरा मन बिल्कुल शांत हो जाता है….मेरी
यही कमज़ोरी का तो फ़ायदा उठाता रहता है ये
मैं दोनो को देख कर मुश्कूराते हुए बाथरूम मे घुस गया और जब फ्रेश हो कर बाहर आया तो दीदी ने कॉफी रेडी कर रखी थी.
कॉफी पीने और कपड़े पहनने के बाद मैं माँ और वीर से मिलने चला गया…उनसे मिलने के बाद अपनी धड़कन से मिला…जिसको देखे बिना मेरे दिल को करार आना संभव ही नही हो सकता कभी…वो भी जैसे बेताबी से मेरा ही इंतज़ार कर रही थी.
दिव्या पूजा कर के उठी ही थी कि मुझे देखते ही वो तड़प कर मेरी आगोश मे सिमट गयी…तो ऐसा लगा जैसे सारी कायनात ही सिमट
कर मेरी बाहों मे आ गयी हो…दिव्या के स्पर्श मे जो चरम सुख मुझे मिलता था वो सुख की कल्पना ही अकल्पनीय है.
दिव्या को देखते ही मेरी साँसे तरो ताज़ा हो जाया करती हैं….ये जनम हमारे प्यार की सबसे कठिन परीक्षा थी, हमारे प्यार की सच्चाई को यथार्थ के धरातल पर मापने के लिए तभी तो इस जनम मे हमे भाई बहन के रिश्ते मे बाँध दिया….ये देखने के लिए कि अब कैसे अपने
प्यार को इस दुनिया और जालिम समाज़ के सामने साबित कर सकोगे…?
राज—आज क्या माँगा भगवान जी से….?
दिव्या—साजन तुम्हे पा कर मैने सब पा लिया…
"सोचती हू अगर मैं दुआ मांगती
हाथ अपने उठा कर मैं क्या मांगती
जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगी
तब से जैसे इबादत मैं करने लगी."
राज—दिल करता है इस बात पर तुम्हारे होंठो का जाम पी लूँ
दिव्या—जब तक शादी नही होती तब तक फिलहाल सपनो से काम चलाओ
राज—अच्छा सुनो...आज रेडी रहना हम घूमने चलेंगे
दिव्या—सच…कहा…? और कौन कौन जाएगा….?
राज—शाम को देखते हैं
दिव्या--ओके
राज—चलो नाश्ता करते हैं...
मैं ब्रेक फास्ट करने के लिए सब के पास आ गया...लेकिन वहाँ दीक्षा मौजूद नही थी….मैने जब उसके बारे मे पूछा तो चाची ने बताया
कि उसको फीवर है और साथ मे बाथरूम मे गिरने की वजह से मोच भी लगी है जिससे वो चल नही पा रही है.
मैने ब्रेक फास्ट ले कर सबसे पहले विद्या और नानी को जा के खिलाया...फिर दीक्षा को जा कर खिलाया अपने हाथो से...वो मुझसे लिपट
गयी और चूमने लगी हर जगह...थोड़ी देर चूमा चाटी के बाद मैने उसे पेन किल्लर खिला के खुद भी नाश्ता करने लगा सबके साथ.
उसके बाद हम सब कॉलेज निकल गये....आज लड़कियो की गेम्स थी....जिसमे सभी ने अपने अपने मॅच जीत लिए...सेकेंड राउंड फाइटिंग का था..जिसमे मेडम मृणाल ने अपने प्रति द्वंद्वी का कचूमर बना दिया पटक पटक के बेचारी को.
वही दूसरी तरफ संध्या ने अपने प्रतियोगी को हरा कर फाइनल राउंड मे पहुच गयी...ये भी एक विडंबना ही थी कि फाइनल मे
जिनका मुक़ाबला आपस मे होना था वो मृणाल वनाम संध्या के बीच कल होना है...ये मेरे लिए बहुत बड़ी परेशानी की बात हो गयी थी.
आज के मॅच ख़तम होने के बाद हम घर वापिस आ गये....और फ्रेश होने के बाद लंच किया सबने मैने विद्या और नानी को भी खिलाया…नानी मेरे पैरो मे अपना सिर झुका देती थी जो मुझे अच्छा नही लगता था जबकि विद्या चुपचाप खा लेती थी…हां अंशु ज़रूर मुझे देखते ही दोनो की आँखो से बहने लगते थे.
उनको खाना खिलाने के बाद मैं अपने रूम मे आ गया….जहा परिधि, पायल, नेहा चाची, विधि और दिव्या बैठी गप्पे कर रही थी.
पायल—राज, अब तो तुम्हे वो मणि का दूसरा अंश भी मिल चुका है तो हम अब उस तिलिस्मि गुफा मे कब जाएँगे.... ?
राज—आज रात
विधि—मैं भी आपके चलूंगी
नेहा—मैं भी
राज—ठीक है....
मैने प्रियदर्शिनी और मृणाल को भी साथ चलने को बोल दिया....प्रियदर्शिनी बेहद खुश हुई मेरे साथ घूमने का सुन कर.
रात मे डिन्नर करने के बाद मैं कुछ वक़्त दीक्षा के पास बिताया....हालाँकि उसकी तबीयत मे अब सुधार था...सलोनी ने उसको पेन किल्लर का इंजेक्षन लगा दिया था....थोड़ा थोड़ा समय मैने सभी के साथ गुज़ारा शिखा और माला के साथ भी....दोनो यहाँ आने के बाद बहुत खुश थी...शिखा तो अब देख भी सकती थी.
सोनिया और नैना अपने भाई वीर का बराबर ध्यान रख रही थी...वीर की कंडीशन अब पहले से बहुत बेहतर थी..लेकिन मैं उसको अपने साथ ले जा कर अभी किसी ख़तरे मे नही डालना चाहता था.
रात मे सब के सोते ही सभी मेरे रूम मे ही आ गयी...मैने सब को आँखे बंद करने को कहा और फिर वहाँ से गायब हो गया.
पहुचने के बाद जैसे ही सबने आँखे खोली तो सामने देखते ही सब चौंक गयी.....
उसके बाद मैने दीक्षा को एक बार और छोड़ा उसके कहने पर….तब तक वो भी तक गयी थी….तो मैने उसको गोद मे उठा कर बाथरूम ले गया और उसको नहलाया…नहलाते हुए वो एक बार फिर से गरम हो गयी तो एक बार और उसको चोदना पड़ गया….मैने उसको बेड पर लिटा दिया कपड़े पहना कर.
दीक्षा अब सोने लगी थी…तो मैं भी कपड़े पहन कर उसके रूम से बाहर निकला वैसे ही किसी से टकरा गया……
अब आगे…….
जैसे ही वो मुझसे टकराया तो टकराते ही धडाम से नीचे गिर गया….जबकि मैं तो ये सोच कर चौंक गया की कौन है ये और कहीं इसने मुझे दीक्षा के साथ कुछ करते हुए देख तो नही लिया…फिर भी मैने उसको उठाने के लिए जैसे ही अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया तो उसने
मुझे तेज़ी से धक्का देते हुए खड़ा हुआ और छत की तरफ भागने लगा.
ये देख कर मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कौन हो सकता है और मुझे धक्का देकर भाग क्यो रहा है, वो भी छत की तरफ….?
राज—अरे रूको..
उसको रुकते ना देख मैं भी उसके पीछे दौड़ पड़ा….उसने सीढ़ियो से भागते हुए जल्दी से उपर का दरवाजा खोल कर छत मे आ गया….उसके पीछे पीछे मैं भी पहुच गया.
राज—मैं कहता हूँ..रुक जाऊओ…
छत मे अंधेरा था…वो किनारे की ओर भागने लगा….मैं भी तेज़ी से दौड़ कर के जैसे ही उसके पास पहुचा वैसे ही उसने छत से सीधे जंप मार दिया नीचे.
मैं भी तुरंत नीचे कूद गया लेकिन ये देख कर मुझे फिर से झटका लगा कि वहाँ नीचे कोई नही था.. जब कि थर्ड मंज़िल की छत से नीचे कूदने पर तो उसके हाथ पैर ही टूट जाने चाहिए थे, किंतु वो नीचे गिरते ही गायब हो चुका था.
राज (मंन मे)—इतना जल्दी वो कैसे गायब हो गया….? कोई आम आदमी के बस का तो ये काम होना संभव नही है….फिर कौन हो
सकता है….और यहाँ क्यो आया था इस समय….?
मैने नीचे चारो तरफ घूम फिर कर देखा लेकिन जब कोई नही मिला तो वही से उपर जंप कर के छत मे आ गया….और नीचे जाने के
लिए जैसे ही सीधी की ओर रुख़ किया कि फिर किसी से टकरा गया….
“बेटू, तू इस समय यहाँ छत मे क्या कर रहा है….?” ये रूचि दीदी थी जिनसे मैं अभी अभी टकराया.
राज—कुछ नही दीदी….बस ऐसे ही टहल रहा था….लेकिन आप सोई नही क्या अभी तक….?
रूचि—मैं तो सो ही रही थी लेकिन तेरे चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मेरी नीद खुल गयी और मैं तुझे सब जगह ढूँढते हुए यहाँ आ गयी.
राज—ओह्ह्ह…सॉरी दीदी, मेरी वजह से आपकी नीद डिस्टर्ब हुई…
रूचि—मुझे सोने की कोई चिंता नही बेटू…..लेकिन तू चिल्लाया क्यो था…? कौन था यहाँ….?
राज—पता नही…शायद बिल्ली रही होगी....चलिए आप सो जाइए.
रूचि—आ जा, तू भी मेरे साथ ही सो जा.
मैं रूचि दीदी के साथ उनके रूम मे आ गया…वो मुझसे चिपक के लेट गयी…कुछ देर बाते करते करते वो मेरी बाहों मे ही सो गयी….मैने उनके गालो पर किस किया और आँखे बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा किंतु दिमाग़ अभी भी कुछ देर पहले की घटना पर ही
घूम रहा था…ऐसे ही कब नीद आ गयी मालूम नही हुआ.
अगली सुबह रूचि दीदी ने जब मुझे उठाया तब वो नहा कर आई थी….मैं उन्हे देखता ही रह गया…बहुत सुंदर लग रही थी.
रूचि—क्या देख रहा है बेटू…उठना नही है क्या….? पायल तीन बार चेक कर के चली गयी कि तुम उठे कि नही…
राज—जब ऐसा जानलेवा हुष्ण सामने हो तो कौन कम्बख़्त भला सोना चाहेगा.
रूचि—अच्छा जी, जनाब को शायरी सूझ रही है.
राज—दीदी आपके चेहरे पर ये क्या लगा है….?
रूचि (चेहरा पोछ्ते हुए)—कहाँ लगा है..कुछ भी तो नही है..
राज—इधर आओ मैं साफ करता हूँ
रूचि (चेहरा पास मे कर के)—हमम्म्मम
मैं धीरे धीरे जैसे ही उनके चेहरे के करीब पहुचा तो उनकी आँखे स्वतः ही बंद हो गयी और होठ अपने आप थर थराने लगे….मैने धीरे
से अपने होंठो को उनके अधरो से मिल जाने दिया…और फिर उनके अधरो मे शहद से भरे प्याले को पीने लगा.
रूचि दीदी मदहोश और मदहोश होती चली गयी और मुझसे कस के चिपक गयी….मैं उनके अधरो से शहद पीता रहा..पीता रहा….और तब तक पिया जब तक कि वो अकड़ नही गयी…क्यों कि मेरे दोनो हाथ उनकी छातियो का रस निचोड़ रहे थे…..इस दो तरफ़ा हमले से वो ज़्यादा देर तक खुद को ना रोक सकी और यौवन के उन्म्मद मे जल्दी ही अपने चरमोत्कर्ष पर पहुच कर वो असीम आनंद की अनुभूत प्राप्त कर ली.
जब मैने अपने होंठो को उनकी गुलाब की पंखुड़ियो से अलग किया तो उनके चेहरे मे मुझे सारे जहाँ की शरम और हया की लाली नज़र आई…उन्होने अपना चेहरा झुका लिया….लेकिन उनकी साँसे धौंकनी की तरह तेज़ चल रही थी.
राज—क्या हुआ दीदी…आप इतना हाँफ क्यो रही हो…..?
रूचि (शर्मा कर)—कुछ नही
राज—तो आओ ना थोड़ी देर और सोते हैं..
रूचि (मुश्कुरा कर)—नही….मुझे फिर से नहाने जाना है.
राज—क्यो अभी तो नहा कर आई थी.... ?
रूचि (कान मे)—तुमने गंदी जो कर दिया है..
राज—ओह्ह्ह...सॉरी दीदी
रूचि—तू सॉरी मत बोल.....ये मेरी सबसे हसीन सुबह है...काश ऐसी सुबह हर रोज हो..
राज—होगी दीदी..ज़रूर होगी
रूचि—मैं इंतज़ार करूँगी फिर से ऐसी ही सुबह का बेटू
मैने उन्हे फिर से आगोश मे लेना चाहा तो वो मुश्कूराते हुए बाथरूम मे घुस गयी….और मैं भी मुश्कूराते हुए उनके रूम से निकल कर
अपने रूम मे आ गया..जहाँ पायल दीदी इधर उधर चहल कदमी कर रही थी और विधि बेड पर बैठी हुई थी.
पायल (ताना मारते हुए)—आ गये.. ! क्यो तुम्हे मेरे साथ सोने मे काँटे चुभते हैं...जो मुझे अकेली सोती छोड़ कर आधी रात मे ही भाग गये....अगर मुझे कुछ हो जाता तो..... ?
राज—बाप रे...इतना गुस्सा.. ! लेकिन किस बात का... ? मैं तो यही था रात भर….और मेरे रहते आप को कुछ नही होगा, मैं कुछ होने नही दूँगा.
पायल (गुस्से मे)—देखो राज…झूठ मत बोलो….मुझे छोड़ कर रात मे क्यो चले गये रूचि दीदी के पास…?
राज—वो…क्या है ना कि रूचि दीदी को नीद नही आ रही थी..इसलिए मैं उनके साथ बाते कर रहा था और कब नीद आ गयी पता ही नही चला.
पायल (व्यंग)—क्यो तुझे सपना आया था कि रूचि दीदी को नीद नही आ रही है….?
राज (मन मे)—अब तो इस बिल्ली को शांत करने का एक ही तरीका है.
मैने आगे बढ़ कर पायल दीदी को खीच के अपने सीने से लगा किया…पहले तो वो मुझसे छूटने के लिए छ्ट पटाइ लेकिन फिर शांत हो
कर उनकी बाहों का घेरा मेरी पीठ पर कसता चला गया.
राज—रूचि दीदी भी तो मेरी बहन हैं ना आपकी ही तरह.
पायल—तो मैं कहाँ मना कर रही हू की तू उनके पास मत जा…..लेकिन तू मुझे बता भी तो सकता था ना उनके पास जाने से पहले….कम से कम मैं परेशान तो नही होती….तुझे पता है कि जब रात मे मेरी नीद खुली तो तुझे अपने पास ना देख कर मुझे कितनी बेचैनी हो
रही थी….वैसे भी यहाँ कौन अपना है और कौन पराया समझना मुश्किल है…..मैं नही चाहती कि कोई फिर से तेरे खिलाफ कुछ साज़िश करे.
राज—सॉरी…अगली बार से ध्यान रखूँगा.
पायल—चल ठीक है….
विधि—अब आप जा कर नहा धो लीजिए.
पायल—जब तक मैं तेरे लिए कॉफी बनाती हूँ
विधि—अजीब प्यार है दोनो भाई बहन मे...अभी तो इतना गुस्सा थी और इतना जल्दी मान भी गयी
पायल—मैं जब गुस्सा होती हूँ तो ये ईडियट ऐसे ही करता है मेरे साथ….क्यों कि उसे पता है कि मैं चाहे जितनी भी गुस्सा क्यो ना रहूं…उसके सीने से लगते ही मेरे जिस्म का रोम रोम ठंडा पड़ने लगता है…ऐसे महसूस होता है कि जैसे मैने सब कुछ पा लिया हो…और
ये एहसास मन मे आते ही गुस्सा अपने आप गायब हो जाता है….फिर सब कुछ भूल कर मेरा मन बिल्कुल शांत हो जाता है….मेरी
यही कमज़ोरी का तो फ़ायदा उठाता रहता है ये
मैं दोनो को देख कर मुश्कूराते हुए बाथरूम मे घुस गया और जब फ्रेश हो कर बाहर आया तो दीदी ने कॉफी रेडी कर रखी थी.
कॉफी पीने और कपड़े पहनने के बाद मैं माँ और वीर से मिलने चला गया…उनसे मिलने के बाद अपनी धड़कन से मिला…जिसको देखे बिना मेरे दिल को करार आना संभव ही नही हो सकता कभी…वो भी जैसे बेताबी से मेरा ही इंतज़ार कर रही थी.
दिव्या पूजा कर के उठी ही थी कि मुझे देखते ही वो तड़प कर मेरी आगोश मे सिमट गयी…तो ऐसा लगा जैसे सारी कायनात ही सिमट
कर मेरी बाहों मे आ गयी हो…दिव्या के स्पर्श मे जो चरम सुख मुझे मिलता था वो सुख की कल्पना ही अकल्पनीय है.
दिव्या को देखते ही मेरी साँसे तरो ताज़ा हो जाया करती हैं….ये जनम हमारे प्यार की सबसे कठिन परीक्षा थी, हमारे प्यार की सच्चाई को यथार्थ के धरातल पर मापने के लिए तभी तो इस जनम मे हमे भाई बहन के रिश्ते मे बाँध दिया….ये देखने के लिए कि अब कैसे अपने
प्यार को इस दुनिया और जालिम समाज़ के सामने साबित कर सकोगे…?
राज—आज क्या माँगा भगवान जी से….?
दिव्या—साजन तुम्हे पा कर मैने सब पा लिया…
"सोचती हू अगर मैं दुआ मांगती
हाथ अपने उठा कर मैं क्या मांगती
जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगी
तब से जैसे इबादत मैं करने लगी."
राज—दिल करता है इस बात पर तुम्हारे होंठो का जाम पी लूँ
दिव्या—जब तक शादी नही होती तब तक फिलहाल सपनो से काम चलाओ
राज—अच्छा सुनो...आज रेडी रहना हम घूमने चलेंगे
दिव्या—सच…कहा…? और कौन कौन जाएगा….?
राज—शाम को देखते हैं
दिव्या--ओके
राज—चलो नाश्ता करते हैं...
मैं ब्रेक फास्ट करने के लिए सब के पास आ गया...लेकिन वहाँ दीक्षा मौजूद नही थी….मैने जब उसके बारे मे पूछा तो चाची ने बताया
कि उसको फीवर है और साथ मे बाथरूम मे गिरने की वजह से मोच भी लगी है जिससे वो चल नही पा रही है.
मैने ब्रेक फास्ट ले कर सबसे पहले विद्या और नानी को जा के खिलाया...फिर दीक्षा को जा कर खिलाया अपने हाथो से...वो मुझसे लिपट
गयी और चूमने लगी हर जगह...थोड़ी देर चूमा चाटी के बाद मैने उसे पेन किल्लर खिला के खुद भी नाश्ता करने लगा सबके साथ.
उसके बाद हम सब कॉलेज निकल गये....आज लड़कियो की गेम्स थी....जिसमे सभी ने अपने अपने मॅच जीत लिए...सेकेंड राउंड फाइटिंग का था..जिसमे मेडम मृणाल ने अपने प्रति द्वंद्वी का कचूमर बना दिया पटक पटक के बेचारी को.
वही दूसरी तरफ संध्या ने अपने प्रतियोगी को हरा कर फाइनल राउंड मे पहुच गयी...ये भी एक विडंबना ही थी कि फाइनल मे
जिनका मुक़ाबला आपस मे होना था वो मृणाल वनाम संध्या के बीच कल होना है...ये मेरे लिए बहुत बड़ी परेशानी की बात हो गयी थी.
आज के मॅच ख़तम होने के बाद हम घर वापिस आ गये....और फ्रेश होने के बाद लंच किया सबने मैने विद्या और नानी को भी खिलाया…नानी मेरे पैरो मे अपना सिर झुका देती थी जो मुझे अच्छा नही लगता था जबकि विद्या चुपचाप खा लेती थी…हां अंशु ज़रूर मुझे देखते ही दोनो की आँखो से बहने लगते थे.
उनको खाना खिलाने के बाद मैं अपने रूम मे आ गया….जहा परिधि, पायल, नेहा चाची, विधि और दिव्या बैठी गप्पे कर रही थी.
पायल—राज, अब तो तुम्हे वो मणि का दूसरा अंश भी मिल चुका है तो हम अब उस तिलिस्मि गुफा मे कब जाएँगे.... ?
राज—आज रात
विधि—मैं भी आपके चलूंगी
नेहा—मैं भी
राज—ठीक है....
मैने प्रियदर्शिनी और मृणाल को भी साथ चलने को बोल दिया....प्रियदर्शिनी बेहद खुश हुई मेरे साथ घूमने का सुन कर.
रात मे डिन्नर करने के बाद मैं कुछ वक़्त दीक्षा के पास बिताया....हालाँकि उसकी तबीयत मे अब सुधार था...सलोनी ने उसको पेन किल्लर का इंजेक्षन लगा दिया था....थोड़ा थोड़ा समय मैने सभी के साथ गुज़ारा शिखा और माला के साथ भी....दोनो यहाँ आने के बाद बहुत खुश थी...शिखा तो अब देख भी सकती थी.
सोनिया और नैना अपने भाई वीर का बराबर ध्यान रख रही थी...वीर की कंडीशन अब पहले से बहुत बेहतर थी..लेकिन मैं उसको अपने साथ ले जा कर अभी किसी ख़तरे मे नही डालना चाहता था.
रात मे सब के सोते ही सभी मेरे रूम मे ही आ गयी...मैने सब को आँखे बंद करने को कहा और फिर वहाँ से गायब हो गया.
पहुचने के बाद जैसे ही सबने आँखे खोली तो सामने देखते ही सब चौंक गयी.....