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अजनबी हसीना
रात बहुत ज़्यादा ठण्डी थी, आसमान में काले बादल मँडरा रहे थे। हवा तेज़ थी, कभी-कभी दिल दहला देने वाली गरज और चमक से बड़ी-बड़ी इमारतों में एक अजीब क़िस्म की झंकार-सी पैदा हो जाती थी। एक बज चुके थे, लेकिन फ़रीदी अभी तक अपने सोने वाले कमरे में टहल-टहल कर, सिगार-पर-सिगार फूँक रहा था। थोड़ी देर बाद बारिश होने लगी। फ़रीदी ने खिड़कियाँ बन्द कर दीं।
अभी वह लेटने के इरादे से पलँग पर बैठा ही था कि कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनायी दी और ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई बरामदे में गिर पड़ा हो। वह तेज़ी से बरामदे की तरफ़ लपका। पोर्टिको में उसके कुत्ते खड़े भौंक रहे थे। फ़रीदी ने उन्हें डाँटते हुए बरामदे का बल्ब जलाया।
‘‘अरे....!’’ वह चौंक कर एक क़दम पीछे हट गया।
बरामदे में एक औरत औंधी पड़ी हुई थी। उसकी क़ीमती साड़ी पिण्डलियों तक सरक आयी थी। उसने गरम और उम्दा लिबास और ऊपर से लबादा पहन रखा था, पहने कपड़े क़रीब-क़रीब बिलकुल भीग चुके थे।
फ़रीदी उसके क़रीब जा कर बैठ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। हिम्मत करके उसने उसे सीधा किया। औरत नौजवान थी। उसकी पलकें घनी थीं जिनकी गोद में झील की तरह दो आँखें सो रही थीं। लाल और गोरा चेहरा कुछ और ख़ूबसूरती पैदा कर रहा था। वह गहरी-गहरी साँस ले रही थी। उसके ख़ूबसूरत जिस्म में हाथ लगाते वक़्त फ़रीदी जैसा सूखा आदमी भी एक बार सिर से पैर तक काँप उठा था।
आख़िर वह हिम्मत करके इस बेहोश लड़की को हाथों पर उठा कर अपने कमरे में ले आया और पलँग पर लिटा दिया।
अब वह एक दूसरी उलझन में पड़ गया था। उसके भीगे हुए कपड़े किस तरह बदले। यह मसला कुछ पेचीदा था। आख़िर उसने उसे ज्यों-का-त्यों रहने दिया। सिर्फ़ इतना किया कि उसे कम्बलों से चारों तरफ़ से ढँक दिया और रूम हीटर से कमरा गरम करने का इन्तज़ाम करने लगा। उसने सोचा कि हमीद को भी जगा दे, लेकिन उसकी बदमज़ाक़ी का ख़याल आते ही ठहर गया। उसने लड़की के जूते उतार दिये थे और अब उसके नाज़ुक पैरों को देख रहा था।
थोड़ी देर बाद उसकी घनी पलकों के नीचे आँखें हिलीं। फ़रीदी उस पर झुक गया। वह धीरे-धीरे होश में आ रही थी। आँखें ज़रा-सी खुलीं और फिर बन्द हो गयीं। फिर उसने आँखें फाड़-फाड़ कर चारों तरफ़ देखना शुरू कर दिया। अचानक वह झटके के साथ उठ बैठी।
‘‘आप इत्मीनान रखिए। आप बिलकुल महफ़ूज़ हैं।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘लेकिन मैं कहाँ हूँ।’’ लड़की बोली।
‘‘घबराइए नहीं.... आप बुरे लोगों में नहीं।’’ फ़रीदी ने कहा।
लड़की सिर झुकाये सोचने लगी।
‘‘आप अभी लेटी ही रहिए तो बेहतर है।’’ फ़रीदी बोला।
लड़की उसे ख़ौफ़जदा हो कर देखने लगी।
‘‘आप बेकार में परेशान हो रही हैं। इत्मीनान रखिए, आप बिलकुल महफ़ूज़ हैं।’’
फ़रीदी ने उसे फिर दिलासा दिया। लड़की फिर लेट गयी।
‘‘आपके कपड़े भीगे हुए हैं।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘मुझे अफ़सोस है कि मैं आपके लिए ज़नाना कपड़ों का इन्तज़ाम न कर सकूँगा। अगर आप कुछ ख़याल न करें तो कुछ वक़्त के लिए मर्दाना कपड़े ही पहन लें। जब तक कि आपके कपड़े सूख न जायें।’’
लड़की ने कोई जवाब न दिया।
‘‘भीगे कपड़े आपको नुक़सान पहुँचा सकते हैं.... मेरे ख़याल से आपको इसमें कोई ऐतराज़ न होना चाहिए।’’
लड़की बदस्तूर ख़ामोश रही।
जब वह वापस आया तो उसके हाथों में उसके सोने वाले कपड़े थे।
‘‘लीजिए, कपड़े बदल डालिए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘मैं तब तक चाय का इन्तज़ाम करता हूँ।’’
‘‘नहीं.... आपको बहुत तकलीफ़ हो रही है।’’ लड़की जल्दी से बोली।
‘‘नहीं, तकलीफ़ की कोई बात नहीं, इस वक़्त चाय आपके लिए ज़रूरी है।’’ फ़रीदी ने कहा और कमरे में चला गया।
लड़की ने उठ कर अपने भीगे हुए कपड़े उतारे और फ़रीदी के कपड़े पहन लिये। उन ढीले-ढाले कपड़ों में वह सर्कस के जोकर जैसी मालूम होने लगी थी। कपड़े बदलने के बाद उसने रूम हीटर का प्लग निकाल दिया। फिर पलँग पर अच्छी तरह कम्बल ओढ़ कर बैठ गयी।
थोड़ी देर बाद फ़रीदी ट्रे में चाय ले कर आ गया। उसने इतनी रात को नौकरों को जगाना ठीक न समझा। इसलिए उसने चाय ख़ुद ही बना ली थी।
‘‘मुझे सख़्त शर्मिन्दगी है।’’ लड़की बोली।
‘‘शर्मिन्दगी किस बात की।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘बेकार ही में आपको तकलीफ़ हो रही है।’’ लड़की बोली।
‘‘भई, इसमें तकलीफ़ की क्या बात है।’’ फ़रीदी ने उसकी तरफ़ चाय की प्याली बढ़ाते हुए कहा।
‘‘शुक्रिया....!’’ लड़की ने कहा। चाय लेते वक़्त उसका हाथ काँप रहा था।
फ़रीदी आराम-कुर्सी पर अधलेटा हो कर सिगार सुलगाने लगा।
‘‘सिगार के धुएँ से आपको तकलीफ़ तो न होगी।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘जी नहीं.... बिलकुल नहीं।’’ लड़की मुस्कुरा कर बोली।
‘‘मेरे ख़याल से आप एक कप और पीजिए।’’
‘‘जी नहीं, बस.... शुक्रिया।’’
रात बहुत ज़्यादा ठण्डी थी, आसमान में काले बादल मँडरा रहे थे। हवा तेज़ थी, कभी-कभी दिल दहला देने वाली गरज और चमक से बड़ी-बड़ी इमारतों में एक अजीब क़िस्म की झंकार-सी पैदा हो जाती थी। एक बज चुके थे, लेकिन फ़रीदी अभी तक अपने सोने वाले कमरे में टहल-टहल कर, सिगार-पर-सिगार फूँक रहा था। थोड़ी देर बाद बारिश होने लगी। फ़रीदी ने खिड़कियाँ बन्द कर दीं।
अभी वह लेटने के इरादे से पलँग पर बैठा ही था कि कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनायी दी और ऐसा मालूम हुआ जैसे कोई बरामदे में गिर पड़ा हो। वह तेज़ी से बरामदे की तरफ़ लपका। पोर्टिको में उसके कुत्ते खड़े भौंक रहे थे। फ़रीदी ने उन्हें डाँटते हुए बरामदे का बल्ब जलाया।
‘‘अरे....!’’ वह चौंक कर एक क़दम पीछे हट गया।
बरामदे में एक औरत औंधी पड़ी हुई थी। उसकी क़ीमती साड़ी पिण्डलियों तक सरक आयी थी। उसने गरम और उम्दा लिबास और ऊपर से लबादा पहन रखा था, पहने कपड़े क़रीब-क़रीब बिलकुल भीग चुके थे।
फ़रीदी उसके क़रीब जा कर बैठ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। हिम्मत करके उसने उसे सीधा किया। औरत नौजवान थी। उसकी पलकें घनी थीं जिनकी गोद में झील की तरह दो आँखें सो रही थीं। लाल और गोरा चेहरा कुछ और ख़ूबसूरती पैदा कर रहा था। वह गहरी-गहरी साँस ले रही थी। उसके ख़ूबसूरत जिस्म में हाथ लगाते वक़्त फ़रीदी जैसा सूखा आदमी भी एक बार सिर से पैर तक काँप उठा था।
आख़िर वह हिम्मत करके इस बेहोश लड़की को हाथों पर उठा कर अपने कमरे में ले आया और पलँग पर लिटा दिया।
अब वह एक दूसरी उलझन में पड़ गया था। उसके भीगे हुए कपड़े किस तरह बदले। यह मसला कुछ पेचीदा था। आख़िर उसने उसे ज्यों-का-त्यों रहने दिया। सिर्फ़ इतना किया कि उसे कम्बलों से चारों तरफ़ से ढँक दिया और रूम हीटर से कमरा गरम करने का इन्तज़ाम करने लगा। उसने सोचा कि हमीद को भी जगा दे, लेकिन उसकी बदमज़ाक़ी का ख़याल आते ही ठहर गया। उसने लड़की के जूते उतार दिये थे और अब उसके नाज़ुक पैरों को देख रहा था।
थोड़ी देर बाद उसकी घनी पलकों के नीचे आँखें हिलीं। फ़रीदी उस पर झुक गया। वह धीरे-धीरे होश में आ रही थी। आँखें ज़रा-सी खुलीं और फिर बन्द हो गयीं। फिर उसने आँखें फाड़-फाड़ कर चारों तरफ़ देखना शुरू कर दिया। अचानक वह झटके के साथ उठ बैठी।
‘‘आप इत्मीनान रखिए। आप बिलकुल महफ़ूज़ हैं।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘लेकिन मैं कहाँ हूँ।’’ लड़की बोली।
‘‘घबराइए नहीं.... आप बुरे लोगों में नहीं।’’ फ़रीदी ने कहा।
लड़की सिर झुकाये सोचने लगी।
‘‘आप अभी लेटी ही रहिए तो बेहतर है।’’ फ़रीदी बोला।
लड़की उसे ख़ौफ़जदा हो कर देखने लगी।
‘‘आप बेकार में परेशान हो रही हैं। इत्मीनान रखिए, आप बिलकुल महफ़ूज़ हैं।’’
फ़रीदी ने उसे फिर दिलासा दिया। लड़की फिर लेट गयी।
‘‘आपके कपड़े भीगे हुए हैं।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘मुझे अफ़सोस है कि मैं आपके लिए ज़नाना कपड़ों का इन्तज़ाम न कर सकूँगा। अगर आप कुछ ख़याल न करें तो कुछ वक़्त के लिए मर्दाना कपड़े ही पहन लें। जब तक कि आपके कपड़े सूख न जायें।’’
लड़की ने कोई जवाब न दिया।
‘‘भीगे कपड़े आपको नुक़सान पहुँचा सकते हैं.... मेरे ख़याल से आपको इसमें कोई ऐतराज़ न होना चाहिए।’’
लड़की बदस्तूर ख़ामोश रही।
जब वह वापस आया तो उसके हाथों में उसके सोने वाले कपड़े थे।
‘‘लीजिए, कपड़े बदल डालिए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘मैं तब तक चाय का इन्तज़ाम करता हूँ।’’
‘‘नहीं.... आपको बहुत तकलीफ़ हो रही है।’’ लड़की जल्दी से बोली।
‘‘नहीं, तकलीफ़ की कोई बात नहीं, इस वक़्त चाय आपके लिए ज़रूरी है।’’ फ़रीदी ने कहा और कमरे में चला गया।
लड़की ने उठ कर अपने भीगे हुए कपड़े उतारे और फ़रीदी के कपड़े पहन लिये। उन ढीले-ढाले कपड़ों में वह सर्कस के जोकर जैसी मालूम होने लगी थी। कपड़े बदलने के बाद उसने रूम हीटर का प्लग निकाल दिया। फिर पलँग पर अच्छी तरह कम्बल ओढ़ कर बैठ गयी।
थोड़ी देर बाद फ़रीदी ट्रे में चाय ले कर आ गया। उसने इतनी रात को नौकरों को जगाना ठीक न समझा। इसलिए उसने चाय ख़ुद ही बना ली थी।
‘‘मुझे सख़्त शर्मिन्दगी है।’’ लड़की बोली।
‘‘शर्मिन्दगी किस बात की।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘बेकार ही में आपको तकलीफ़ हो रही है।’’ लड़की बोली।
‘‘भई, इसमें तकलीफ़ की क्या बात है।’’ फ़रीदी ने उसकी तरफ़ चाय की प्याली बढ़ाते हुए कहा।
‘‘शुक्रिया....!’’ लड़की ने कहा। चाय लेते वक़्त उसका हाथ काँप रहा था।
फ़रीदी आराम-कुर्सी पर अधलेटा हो कर सिगार सुलगाने लगा।
‘‘सिगार के धुएँ से आपको तकलीफ़ तो न होगी।’’ फ़रीदी ने कहा।
‘‘जी नहीं.... बिलकुल नहीं।’’ लड़की मुस्कुरा कर बोली।
‘‘मेरे ख़याल से आप एक कप और पीजिए।’’
‘‘जी नहीं, बस.... शुक्रिया।’’