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Faridi aur Leonard ibne safi

थोड़ी देर के बाद दोनों शहर के एक घटिया-से शराबखाने में पहुँचे। यह शराबख़ाना भी था और होटल भी। बाहर से आये हुए कम हैसियत वाले मुसाफ़िरों के लिए यहाँ सस्ते कमरे भी मिल जाते थे।

फ़रीदी और हमीद को देखते ही होटल का मैनेजर लपक कर उनके क़रीब आ गया।

‘‘कहिए हुज़ूर, ख़ैरियत तो है?’’ उसने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘मेरे कमरे की कुंजी....!’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और हाँ, फ़ज़लू को भेज देना।

मैनेजर ने फ़रीदी को एक कुंजी ला कर दे दी। फ़रीदी और हमीद सीढ़ियाँ चढ़ कर एक बन्द कमरे के सामने आ कर रुक गये। फ़रीदी ने ताला खोला और दोनों अन्दर दाख़िल हो गये।

फ़रीदी ने माचिस जला कर ताक़ पर रखी हुई मोमबत्ती जलायी।

‘‘यह आपका कमरा है?’’ हमीद ने हैरत से पूछा।

‘‘हाँ, ऐसे बहुतेरे कमरे मैंने शहर के अलग-अलग हिस्सों में ले रखे हैं।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘और मुझे इनके बारे में नहीं मालूम।’’ हमीद ने पलकें झपकाते हुए कहा।

‘‘हाँ.... यूँ ही मौक़ा पड़ने पर तुम्हें भी धीरे-धीरे इनके बारे में मालूम हो जायेगा।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘जानते हो होटल का मैनेजर कौन है?’’

‘‘नहीं....!’’

‘‘एक बदमाश.... और दस नम्बर का आदमी। मगर है बड़े काम का।’’ फ़रीदी ने कहा।

सीढ़ी पर आहट सुनायी दी और कुछ ही देर बाद एक बूढ़ा आदमी कमरे में आया और सलाम करके एक तरफ़ खड़ा हो गया।

‘‘फ़ज़लू, तुम न्यू स्टार प्रेस में ही काम करते हो न?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘जी हुज़ूर....!’’

‘‘अच्छा देखो, तुम्हें कुछ दिन तक इसी कमरे में रहना होगा.... और तुम्हारे भेस में ये तुम्हारा काम करेंगे।’’

‘‘अरे हुज़ूर, कोई ख़ास काम हो तो मुझे ही बताइए।’’ बूढ़ा बोला।

‘‘नहीं, तुम न कर सकोगे।’’

‘‘जैसी हुज़ूर की म़र्जी।’’ बूढ़े ने कहा। ‘‘एक घण्टे बाद मुझे काम पर जाना होगा। आजकल नाइट ड्यूटी में हूँ।’’
 
‘‘अच्छा हमीद, तुम तैयार हो जाओ.... मैं अभी तुम्हें फ़ज़लू बनाये देता हूँ।’’ फ़रीदी ने कहा और कमरे में रखे हुए एक बड़े सन्दूक़ को खोल कर उसमें भेस बदलने का सामान निकालने लगा।

थोड़ी देर के बाद उस कमरे में एक ही शक़्ल के दो बूढ़े खड़े हुए थे। उनमें एक बूढ़ा बाहर चला गया और दूसरा वहीं खड़ा रहा।

‘‘हाँ तो फ़ज़लू जब तक तुम्हें मेरी तरफ़ से कोई ख़बर न मिले, तुम यहीं, इसी कमरे में रहना। मैंने इन्तज़ाम कर दिया है। तुम्हारी ज़रूरत की सारी चीज़ें यहीं पहुँचती रहेंगी।’’

अब फ़रीदी ने भी भेस बदलना शुरू किया। लगभग आधे घण्टे के बाद उसकी जगह पर एक अधेड़ उम्र का मिलिट्री अफ़सर खड़ा सिगार पी रहा था।

फ़ज़लू उसे हैरत से देख रहा था।

‘‘फ़ज़लू, मुझे ख़बर मिली है कि तुमने फिर कोकीन का कारोबार शुरू कर दिया है।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘अब सरकार से क्या पर्दा।’’ फ़ज़लू ने सिर खुजाते हुए कहा। ‘‘प्रेस की नौकरी में इतना नहीं मिलता जिससे पेट पल सके। महीने में हज़ार रुपये तो सिर्फ़ बाल-बच्चों के लिए गाँव भेज देना पड़ता है।’’

‘‘ख़ैर, लेकिन.... इस बात का ख़याल रखना कि मामला मेरे हाथ तक न पहुँचने पाये, वरना मैं मजबूर हो जाऊँगा।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘अरे नहीं सरकार.... ज़्यादा नहीं, बस धेले-दमड़ी का रोज़गार हो जाता है।’’ फ़ज़लू ने सिर हिला कर कहा।

‘‘ख़ैर, तुम लोगों का धेला-दमड़ी मैं अच्छी तरह समझता हूँ।’’ फ़रीदी ने सिर हिला कर कहा।

फ़ज़लू दाँत निकाल कर हँसने लगा।

‘‘अच्छा, अब मैं चला.... देखो, जो कुछ समझा दिया है, उसके ख़िलाफ़ न होने पाये।’’

‘‘मजाल है सरकार.... इसके ख़िलाफ़ हो जाये। आपके लिए जान भी जाये तो हाज़िर है।’’ फ़ज़लू ने कहा।

फ़रीदी मिलिट्री अफ़सर के भेस में हाथ में एक सूटकेस लटकाये, बाहर आया और टैक्सी करके रेलवे स्टेशन की तरफ़ रवाना हो गया।

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चिड़चिड़ा नवाब

दो घण्टे का सफ़र तय करके फ़रीदी दाराब नगर स्टेशन पर उतरा। रात के लगभग दस बज चुके थे। स्टेशन पर उसे एक फटीचर-सी टैक्सी दिखायी दी। वह उसमें बैठा और नवाब रशीदुज़्ज़माँ के महल की तरफ़ रवाना हो गया।

नवाब साहब बहुत बड़े जागीरदार थे और नम्बरी कंजूस। उनकी बेशुमार दौलत की कहानियाँ दूर-दूर तक मशहूर थीं। बहुत-से लोगों का तो यहाँ तक ख़याल था कि नवाब साहब ने इतनी दौलत जौ की रोटी खा-खा कर जमा की है। उनके और वारिस तो शाहाना ज़िन्दगी गुज़ारते थे, मगर वे ख़ुद बहुत ही सादा ज़िन्दगी बसर करने के आदी थे। आज वे अभी तक नहीं सोये थे, और दोपहर ही से वह किसी ख़ास चीज़ में उलझे हुए थे। बात-बात पर लोगों से उलझ जाते थे। उस वक़्त वे बेचैनी के साथ दीवानख़ाने में टहल रहे थे।

अचानक एक नौकर प्लेट में किसी का विज़िटिंग कार्ड लाया और मेज़ पर रख कर ख़ामोशी से खड़ा हो गया।

‘‘हूँ....!’’ नवाब साहब ने कार्ड उठाते हुए कहा। ‘‘कर्नल ई.एम. ख़ान, लाहौल विला कूवत.... यह भी कोई मिलने का वक़्त है। जाओ, भेज दो।’’

कुछ देर बाद फ़रीदी कर्नल ख़ान के भेस में दीवानख़ाने में आया।

नवाब साहब ने ज़बर्दस्ती चेहरे पर मुस्कुराहट पैदा करने की कोशिश की।

‘‘फ़रमाइए, कैसे आना हुआ?’’ नवाब साहब ने पूछा।

‘‘मैं एक बहुत ही ख़ास काम के सिलसिले में हाज़िर हुआ हूँ।’’

‘‘फ़रमाइए।’’ नवाब साहब ने चौंक कर कहा।

‘‘मैं बहुत दूर से आया हूँ.... ज़रा दम ले लूँ तो कुछ कहूँ।’’ फ़रीदी ने आराम-कुर्सी पर तक़रीबन लेटते हुए कहा।

नवाब साहब की भवें तन गयीं, लेकिन उन्होंने फिर फ़ौरन ही अपने चेहरे पर नर्मी के आसार पैदा कर लिये। उन्होंने घण्टी बजायी। एक नौकर आया।

‘‘कुछ पीजिएगा?’’ नवाब साहब ने फ़रीदी से पूछा।

‘‘सिर्फ़ पानी....!’’ फ़रीदी ने जवाब दिया और नौकर चला गया।

पानी पीने के बाद फ़रीदी ने सिगार जलाया।

‘‘हाँ, अब फ़रमाइए।’’ नवाब साहब बेताबी से बोले।

‘‘इन्हें पहचानते हैं आप....!’’ फ़रीदी ने जेब से एक तस्वीर निकाल कर नवाब साहब की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।

नवाब साहब ने जैसे ही तस्वीर हाथ में ली, उनका चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया। वे फ़रीदी को घूरने लगे।

‘‘आप ठहरिए.... मैं अभी आ कर इसका जवाब देता हूँ।’’ नवाब साहब ने कहा और दीवानख़ाने से चले गये।

फ़रीदी सिगार का कश लेता हुआ दीवानख़ाने की दीवारों पर लगी हुई तस्वीरों का जायज़ा लेने लगा।

थोड़ी देर बाद नवाब साहब वापस आये, उनके हाथ में एक पिस्तौल था। फ़रीदी चौंक पड़ा।

‘‘हाँ, मैं इसे पहचानता हूँ।’’ नवाब साहब गरज कर बोले। ‘‘और तुम जैसे बदमाशों को भी अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारी मौत तुम्हें यहाँ लायी है।’’

फ़रीदी हँसने लगा।

‘‘तुम हँस रहे हो.... लेकिन याद रखो, इसके लिए तुम्हारे घर वालों को रोना पड़ेगा।’’ नवाब साहब ने उसी अन्दाज़ में कहा।

‘‘मालूम नहीं आप क्या समझ रहे हैं।’’ फ़रीदी ने आराम से कहा।

‘‘मैं सब कुछ समझ रहा हूँ।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘तुम इस तरह मुझसे रुपया नहीं ऐंठ सकते।’’

‘‘ओह समझा....!’’ फ़रीदी ने संजीदगी से कहा। ‘‘तो मामला यहाँ तक पहुँच चुका है। बहुत अच्छा हुआ कि मैं बिलकुल ठीक वक़्त पर पहुँच गया।’’

‘‘अच्छा, अब कोई दूसरी चाल चलने वाले हो।’’ नवाब साहब चीख़ कर बोले। ‘‘देखो, यहाँ बड़े-बड़े बदमाशों की लाशें दफ़्न हैं।’’

‘‘चलिए, यह दूसरी बात मालूम हुई।’’ फ़रीदी हँस कर बोला।

‘‘अब की तुम हँसे और मैंने गोली चलायी।’’ नवाब साहब ने झल्ला कर कहा।

‘‘और फिर कल इस इमारत का चप्पा-चप्पा पुलिस से भरा होगा।’’ फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘यह गीदड़ भभकी किसी और को देना, मुझे रशीदुज़्ज़माँ कहते हैं।’’

‘‘और मैं आपसे सच कहता हूँ कि मुझे कर्नल ख़ान नहीं कहते।’’ फ़रीदी ने इत्मीनान से कहा।

‘‘वह तो मैं पहले ही से जानता हूँ।’’ नवाब साहब ने ऐंठते हुए कहा।

‘‘लेकिन आप कुछ नहीं जानते।’’ फ़रीदी ने अपनी जेब से दूसरा कार्ड निकाल कर नवाब साहब को देते हुए कहा।

‘‘यह क्या....?’’

‘‘मेरा दूसरा विज़िटिंग कार्ड....!’’

‘‘बस-बस, रखे रहो।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘तुम उस वक़्त तक मेरी क़ैद में रहोगे जब तक मेरी लड़की मुझे वापस न मिल जाये।’’

‘‘तो क्या आपको इत्तला मिल गयी।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘बको मत....!’’ नवाब साहब चीख़े।

फ़रीदी सोच में पड़ गया था इस सिरफिरे को किस तरह सीधे रास्ते पर लाये। नवाब साहब का ग़ुस्सा देख कर उसे उलझन हो रही थी कि कहीं सचमुच गोली न चला दें। अचानक वह लेटे-लेटे उछला और दूसरे पल में नवाब साहब का रिवॉल्वर उसके हाथ में था और ख़ुद नवाब साहब ज़मीन पर।

‘‘अगर ज़रा भी आवाज़ निकाली तो आप अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे।’’ फ़रीदी ने दबी आवाज़ में कहा। ‘‘मैं ख़ुफ़िया पुलिस का इन्स्पेक्टर फ़रीदी हूँ।’’

‘‘यह झूठ है.... सरासर झूठ।’’ नवाब साहब ने कहा।

‘‘देखिए, मैं आपसे फिर कहता हूँ कि धीरे बोलिए।’’ फ़रीदी ने कहा।

नवाब साहब ख़ामोश हो गये। ज़मीन पर पड़े वे अभी तक फ़रीदी के हाथ में दबे हुए रिवॉल्वर की तरफ़ देख रहे थे।

‘‘उठ कर बैठ जाइए।’’ फ़रीदी ने सोफ़े की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

नवाब साहब ख़ामोशी से उठ कर बैठ गये।

‘‘मालूम होता है कि अब बदमाशों ने आपको धमकी दी है।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘ग़ज़ाला बेचारी पहले मेरे ही पास मदद के लिए गयी थी। बदमाशों को मालूम हो गया और उन्होंने उसे ग़ायब कर दिया।’’
 
‘‘मैं कैसे यक़ीन कर लूँ कि तुम फ़रीदी हो।’’ नवाब साहब ने कहा।

‘‘आप यक़ीन करें या न करें, मुझे तो अपना काम करना ही है।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और यह भी आपको बता दूँ कि ख़ुफ़िया पुलिस को आपकी लड़की पर शक हो गया है कि वह मुझे धोखा देने आयी थी।’’

‘‘भला वह क्यों तुम्हें धोखा देने लगी।’’ नवाब साहब ने कहा।

फ़रीदी ने उन्हें सारा क़िस्सा सुना दिया।

‘‘अच्छा है, वह कमबख़्त उन्हीं की क़ैद में मर जाये। उसने ख़ानदान की इज़्ज़त पर बट्टा लगा दिया।’’ नवाब साहब बोले।

‘‘अव्वल तो वह बेक़सूर है।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और अगर इस मामले की तह में वाक़ई कोई बात है तो उसके सौ फ़ीसदी ज़िम्मेदार आप हैं। आपने उसे क्यों इतनी आज़ादी दी थी कि वह एक नौजवान प्राइवेट सेक्रेटरी के साथ स्विट्ज़रलैंड गयी?’’

‘‘हाँ, मेरा ही क़सूर है।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘लेकिन तुम यह किस तरह कह रहे हो कि वह बेक़सूर है।’’

‘‘वह तस्वीर सिर्फ़ रुपया ऐंठने के लिए खींची गयी थी। ग़ज़ाला एक तफ़रीहगाह में किसी वजह से बेहोश हो गयी थी। प्राइवेट सेक्रेटरी उसे उठा कर गाड़ी की तरफ़ ला रहा था कि किसी ने उसी हालत में दोनों की तस्वीर ले ली।’’

‘‘ख़ुदा करे तुम ठीक कह रहे हो।’’ नवाब साहब एकदम से बोले।

‘‘आपने यूरोप के मशहूर ब्लैक-मेलर लियोनार्ड का नाम सुना है।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘हाँ! मैंने अख़बारों में पढ़ा है उसके बारे में।’’

‘‘तो यह हरकत उसी की है। आजकल वह हिन्दुस्तान आया हुआ है और हम लोग उसे गिरफ़्तार कर लेने की फ़िक्र में हैं।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘लेकिन मुझे अब भी यक़ीन नहीं आता कि तुम फ़रीदी हो।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘क्योंकि मैं नवाब वजाहत मिर्ज़ा की ज़बानी सुन चुका हूँ कि फ़रीदी जवान आदमी है और शायद मैंने उसकी तस्वीर भी डॉक्टर शौकत के ऐलबम में देखी थी।’’

‘‘यह बात है तो मुझे बहुत ही ख़ुफ़िया जगह पर ले चलिए.... मैं आपको अपनी शकल भी दिखा दूँ।’’ फ़रीदी ने हँस कर कहा और रिवॉल्वर नवाब साहब को वापस कर दिया।

नवाब साहब उसे हैरत से देखने लगे।

‘‘अच्छा, आओ मेरे साथ।’’ नवाब साहब ने उठते हुए कहा।

फ़रीदी उनके पीछे चल पड़ा।

एक छोटे-से ख़ूबसूरत कमरे में पहुँच कर नवाब साहब ने दरवाज़ा बन्द कर लिया।

‘‘ज़रा थोड़ा-सा पानी मँगवाइए।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘पीने के लिए।’’ नवाब साहब ने पूछा।

‘‘जी हाँ।’’

नवाब साहब ख़ुद बाहर चले गये, इतनी देर में फ़रीदी ने अपना मेक-अप बिगाड़ दिया।

वापसी पर नवाब साहब दरवाज़े ही पर ठिठक कर खड़े हो गये।

‘‘अरे....!’’ उनकी ज़बान से निकला और फ़रीदी ने बढ़ कर पानी का गिलास उनके हाथ से ले लिया।

‘‘वही.... बिलकुल वही।’’ नवाब साहब बड़बड़ाये। ‘‘मैंने तुम्हारी तस्वीर ग़ौर से देखी थी। वाक़ई तुम फ़रीदी हो.... बैठो....बैठो....।’’

फ़रीदी मुस्कुराता हुआ बैठ गया।

‘‘भई, माफ़ करना, मैंने तुम्हें बिना जाने हुए काफ़ी बुरा-भला कहा है।’’ नवाब साहब ने माफ़ी माँगी।

‘‘और मैंने भी तो सिर्फ़ जान जाने के डर से आपकी शान में गुस्ताख़ी की है जिसकी माफ़ी चाहता हूँ।’’

‘‘कोई बात नहीं.... कोई बात नहीं। अब मैं बिलकुल मुतमईन हूँ।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘जिस वक़्त मुझे बदमाशों का ख़त और ग़ज़ाला की तस्वीर मिली थी, मेरे दिल में सबसे पहले तुम्हारा ही ख़याल आया था कि क्यों न तुमसे मदद लूँ।’’

‘‘बहरहाल, मैं हाज़िर हूँ।’’ फ़रीदी हँस कर बोला।

‘‘मगर वाक़ई तुम बहुत बहादुर हो.... जैसा सुना था, वैसा ही पाया।’’

‘‘सब आप बुज़ुर्गों की दुआएँ हैं।’’

‘‘मुझे वजाहत मिर्ज़ा की ज़बानी मालूम हुआ है कि तुम नवाब आबिद अली ख़ाँ मरहूम के लड़के हो।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘मरहूम मेरे क्लास-फ़ेलो थे और मेरे दूर के रिश्तेदार भी होते थे। अरे भई, तुम तो अपने ही बच्चे हो।’’

‘‘इस रिश्ते पर मुझे और ख़ुशी हुई।’’ फ़रीदी ने ख़ुश हो कर कहा।

‘‘मुझे यह भी मालूम हुआ है कि तुम सिर्फ़ शौक़िया इस डिपार्टमेंट में काम कर रहे हो। तुम्हारे वालिद मरहूम को भी इन्वेस्टिगेशन का बड़ा शौक़ था.... आख़िर क्यों न हो, उन्हीं के तो लड़के हो।’’

फ़रीदी को डर मालूम हुआ कि कहीं अब नवाब साहब वालिद मरहूम की जासूसी का कोई वाक़या न सुनाने लगें, इसलिए वह जल्दी से बोला, ‘‘हाँ, तो ज़रा वह ख़त मुझे भी दिखाइए।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘मैं अभी लाया।’’ कह कर नवाब साहब कमरे से चले गये।

कुछ मिनट बाद वे वापस आये और उन्होंने एक लिफ़ाफ़ा फ़रीदी की तरफ़ बढ़ा दिया। उसमें एक टाइप किया हुआ ख़त था और एक तस्वीर वैसी ही थी जैसी ग़ज़ाला ने फ़रीदी को दिखायी थी।

फ़रीदी ख़त पढ़ने लगा।

‘‘नवाब साहब!

अपनी बेटी की करतूत देखिए। बेशुमार तस्वीरों में से यह एक तस्वीर आपको रवाना कर रहा हूँ। तस्वीर में जो आदमी दिख रहा है, आप शायद उसे भी पहचानते होंगे। यह तस्वीर स्विट्ज़रलैंड में ली गयी थीं। मैंने इन तस्वीरों की क़ीमत बीस करोड़ रुपये रखी थी। आपकी साहबज़ादी बजाय इसके कि आपसे सलाह लेती, ख़ुफ़िया पुलिस के पास जा पहुँची। मजबूरन हमें उसे गिरफ़्तार कर लेना पड़ा। अगर आप अपनी बेटी की वापसी इन तस्वीरों समेत चाहते हैं तो कल रात के नौ बजे माँगी हुई रक़म के साथ शहर आइए और विक्टोरिया पार्क में विक्टोरिया के बुत के पीछे मिलिए। आपको तस्वीरों के साथ निगेटिव वापस मिल जायेंगे और आपकी साहबज़ादी भी रिहा कर दी जायेंगी। अगर आपने भी कोई चाल चलने की कोशिश की तो फिर नतीजे के आप ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे। इस सिलसिले में आपकी जान भी जा सकती है और आपकी साहबज़ादी की इज़्ज़त भी। रुपया कल हमें मिल जाना चाहिए, वरना देर होने की सूरत में फिर आपको मौजूदा रक़म का डेढ़ गुना अदा करना पड़ेगा। जब आप माँगी गयी रक़म ले कर आयें तो आपको अकेला होना चाहिए। एक बार फिर हिदायत दी जाती है कि काफ़ी एहतियात से काम लिया जाये।’’
 
फ़रीदी ख़त पढ़ कर कुछ देर तक ख़यालों से उलझता रहा फिर अचानक बोला।

‘‘सबसे पहले तो मैं आपको आपकी साहबज़ादी की बेगुनाही पर मुबारकबाद देता हूँ।’’

‘‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझा।’’ नवाब साहब ने कहा।

‘‘बदमाशों के पास इस तस्वीर के अलावा और कोई दूसरी तस्वीर नहीं।’’

‘‘मैं अब भी नहीं समझा।’’

‘‘यही तस्वीर मुझे ग़ज़ाला ख़ानम ने भी दिखायी थी और यही तस्वीर उन्हें स्विट्ज़रलैंड में भी मिली थी। इसका मतलब यह कि बदमाशों के पास इसके अलावा और कोई तस्वीर नहीं और इसका सौ फ़ीसदी मतलब यही है कि इस तस्वीर के बारे में ग़ज़ाला ख़ानम का बयान सही है।’’

‘‘वह तो ठीक है।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘मुझे भी यक़ीन नहीं आया था। ग़ज़ाला लाख आज़ाद ख़याल सही, मगर वह इतना नहीं गिर सकती। अब सवाल यह पैदा होता है कि आख़िर ख़ुलासा किस तरह हो। बीस करोड़ रुपये कम-से-कम मेरे बस की बात नहीं।’’

‘‘कोशिश तो यही की जायेगी कि यूँ ही काम चल जाये।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘लेकिन मैंने भी यह ख़त देख कर जो स्कीम बनायी है, उसके तहत आपको काफ़ी होशियार रहना पड़ेगा।’’

‘‘वह किस तरह।’’ वह बेचैनी से बोले।

‘‘मैं आपका भेस बदल कर जाऊँगा.... और आपको यहाँ उस वक़्त तक बन्द रहना पड़ेगा जब तक कि मेरी तरफ़ से आपको ख़बर न मिले। आपको यहाँ इस तरह छिपे रहना पड़ेगा कि महल के किसी भी शख़्स को आपकी मौजूदगी का पता न चल सके। शायद आप समझ गये होंगे।’’

‘‘अच्छी तरह समझ गया.... लेकिन अगर बदमाशों को पता चल गया तो क्या होगा। वे लोग काफ़ी चालाक मालूम होते हैं।’’

‘‘पहली बात तो उन्हें मालूम ही नहीं हो पायेगा, क्योंकि मैं इसके लिए शहर में अच्छा-ख़ासा जाल बिछा कर आया हूँ।’’ फ़रीदी ने कुछ सोचते हुए कहा। ‘‘और अगर मालूम भी हो गया तो कोई और रास्ता निकाला जायेगा।’’

‘‘बहरहाल भई, अब तुम जानो.... मुझे तो इत्मीनान हो गया है।’’

‘‘अच्छा, यह बताइए कि आप जब शहर जाते हैं तो किस होटल में ठहरते हैं।’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘ग्रीन में।’’ नवाब साहब ने जवाब दिया।

फ़रीदी ख़ामोश हो कर कुछ सोचने लगा।

‘‘तो ग़ज़ाला कब तक यहाँ पहुँच जायेगी।’’ नवाब साहब बोले।

‘‘उसके बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता, लेकिन जब आपको मुबारकबाद का कोई तार मिले तो समझ लीजिएगा कि ग़ज़ाला महफ़ूज़ है और मैं ख़ुद उसकी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ। उस दौरान आपको बिलकुल ख़ामोश रहना पड़ेगा। आप शहर आ कर मुझसे मिलने की भी कोशिश न कीजिएगा।’’

‘‘बहुत अच्छा.... जैसा तुम कह रहे हो, वैसा ही करूँगा।’’ नवाब साहब ने कहा। ‘‘तो क्या तुम सुबह ही जाओगे?’’ उन्होंने फ़रीदी से पूछा।

‘‘जी हाँ....!’’ फ़रीदी बोला। ‘‘और उस वक़्त तक मैं सारी तैयारियाँ पूरी कर लूँगा। फ़िलहाल आप मुझे अपने कपड़ों के कुछ ऐसे जोड़े दे दें, जिन्हें आप आम तौर पर पहना करते हैं और दो बड़े सूटकेस भी। एक में कपड़े रखवा दीजिए और दूसरा ख़ाली रहने दीजिए।’’

‘‘बहुत अच्छा.... मैं अभी जा कर इन्तज़ाम करता हूँ।’’ नवाब साहब जाने के लिए मुड़े।

‘‘ठहरिए.... इस इन्तज़ाम की भनक भी किसी के कान में न पड़ने पाये।’’

‘‘हरगिज़ नहीं.... तुम इत्मीनान रखो।’’

नवाब साहब चले गये और फ़रीदी ने सोफ़े पर गिर कर आँखें बन्द कर लीं। उसका दिमाग़ बहुत तेज़ी से चल रहा था।

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शिकार

दूसरे दिन सुबह फ़रीदी नवाब रशीदुज़्ज़माँ के भेस में महल से निकला और कार में बैठ कर स्टेशन की तरफ़ रवाना हो गया।

शहर पहुँच कर उसने टैक्सी की और ग्रीन होटल पहुँच गया। होटल मैनेजर शायद नवाब रशीदुज़्ज़माँ से अच्छी तरह वाक़िफ़ था, इसलिए उसने ख़ूब ख़ैरमक़दम किया और इस बार इस तरह अकेले आने पर ताज्जुब करते हुए इधर-उधर की बातें शुरू कर दीं।

दिन भर फ़रीदी इधर-उधर, मारा-मारा फिरता रहा। शाम होते ही वह फिर होटल वापस आ गया। इस दौरान उसने कई बार महसूस किया कि एक आदमी उसके पीछे लगा हुआ है और यह शख़्स प्रिंस अदनान था। फ़रीदी दिल-ही-दिल में मुस्कुराता रहा। इस चीज़ से उसने यह अन्दाज़ा भी लगा लिया कि लियोनार्ड के पास इस ख़ास काम के लिए शायद यही एक आदमी है। उसने इस मामले में ज़्यादा राज़दार नहीं बनाये। इस ख़याल के आते ही उसे अपनी कामयाबी और ज़्यादा पक्की मालूम होने लगी।

लगभग आठ बजे वह एक सूटकेस हाथ में लटकाये हुए होटल के बाहर आया और टैक्सी करके विक्टोरिया पार्क की तरफ़ रवाना हो गया।

पार्क में बिलकुल सन्नाटा था। ठण्डी इतनी पड़ रही थी कि पार्क में उस वक़्त रुकने की हिम्मत करना आसान काम न था। फ़रीदी एक कुंज में घिरे हुए विक्टोरिया के बुत के पीछे जा कर बैठ गया और एक सिगरेट सुलगा कर लम्बे-लम्बे कश लेने लगा। लगभग नौ बजे उसे किसी के क़दमों की आहट सुनायी दी और वह सीधा हो कर बैठ गया। आने वाले ने अपने कोट के कॉलर से अपना चेहरा छिपा रखा था। लेकिन फ़रीदी ने उसके अन्दाज़ से पता लगा लिया कि वह प्रिंस अदनान है। फ़रीदी यूँ ही लापरवाही से सिगरेट पीता रहा।

प्रिंस अदनान उसके क़रीब आ कर खड़ा हो गया। वह धीरे-धीरे बड़बड़ा रहा था।

‘‘लोगों ने इस पार्क को भी अय्याशी का अड्डा बना लिया है। भला कोई तुक है इतनी रात गये यहाँ।’’

उसने यह सब इस अन्दाज़ में कहा जैसे वह कोई पुलिस अफ़सर है।

‘‘कहिए जनाब, आप कौन हैं.... और इस वक़्त यहाँ बैठे क्या कर रहे हैं?’’ उसने फ़रीदी से पूछा।

‘‘आप कौन होते हैं पूछने वाले?’’ फ़रीदी ने कड़े तेवर में जवाब दिया।

‘‘मैं अभी बताता हूँ कि मैं कौन हूँ?’’ अदनान ने कहा। ‘‘यह उसी वक़्त तुम्हारी समझ में आ जायेगा जब तुम्हारे हाथों में हथकड़ियाँ होंगी। अभी कल ही यहाँ पर एक नौजवान लड़की बेहोश पायी गयी है.... कमबख़्तों ने अय्याशी का अड्डा बना लिया है इस पार्क को।’’

‘‘मम.... मैं....!’’ फ़रीदी हकलाने लगा। ‘‘मैं.... मम.... मुसाफ़िर हूँ।’’

‘‘मुसाफ़िर हो तो किसी होटल वग़ैरह में जाओ.... यहाँ बैठे क्यों झक मार रहे हो।’’ प्रिंस अदनान ने कहा।

‘‘क्या बताऊँ साहब.... स्टेशन पर जेब कट गयी।’’ फ़रीदी ने रो देने वाले अन्दाज़ में कहा। ‘‘समझ में नहीं आता कि अब इस वक़्त कहाँ जाऊँ।’’

प्रिंस अदनान हँसने लगा।

‘‘बहुत अच्छे नवाब रशीदु़ज़्जुमाँ साहब।’’ वह हँसता हुआ बोला। ‘‘आप अपनी लड़की से ज़्यादा समझदार हैं। कहिए, रक़म लाये हैं?’’

‘‘मेरी बेटी कहाँ है?’’ फ़रीदी बोला।

‘‘घबराइए नहीं.... वह आप तक पहुँच जायेगी। तस्वीरें निगेटिव समेत मैं अपने साथ ही लेता आया हूँ.... लड़की आपको उस वक़्त मिलेगी जब हम लोग रुपया गिन लेंगे।’’

‘‘अगर मेरी लड़की को ज़र्रा बराबर भी नुक़सान पहुँचा तो याद रखना कि बीस करोड़ के बजाय तुम लोगों से चालीस करोड़ वसूल कर लूँगा। अभी तुम लोग मुझे जानते नहीं।’’

फ़रीदी ने कहा और सूटकेस उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। प्रिंस अदनान ने सूटकेस हाथ में ले कर तौला और फिर ज़मीन पर रख दिया।

‘‘इसमें हज़ार-हज़ार के नोट हैं।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘ख़ैर, देखा जायेगा.... ये लीजिए तस्वीरें....!’’ प्रिंस अदनान ने फ़रीदी के हाथ में एक लिफ़ाफ़ा दे दिया। फ़रीदी ने तस्वीरें निकाल कर देखीं। उनमें निगेटिव भी मौजूद था। उसने लिफ़ाफ़ा जेब में रख लिया।

‘‘मैं किस तरह यक़ीन करूँ कि तुमने सारी तस्वीरें दे दी हैं?’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘आप यक़ीन कीजिए कि हम लोग मामले के पक्के हैं।’’ प्रिंस अदनान ने सूटकेस उठाते हुए कहा। ‘‘लेकिन हम लोग किस तरह यक़ीन कर लें कि इस सूटकेस में पूरी रकम है?’’

‘‘इसका तो तुम्हें यक़ीन होना चाहिए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘ऐसी सूरत में जबकि मेरी लड़की तुम लोगों की क़ैद में है, मैं तुम्हें किस तरह धोखा दे सकता हूँ।’’

‘‘हाँ, यह बात क़ायदे की है।’’ प्रिंस अदनान ने कहा। ‘‘अच्छा, कल शाम तक आपकी लड़की आप तक पहुँच जायेगी।

प्रिंस अदनान जाने के लिए मुड़ा, लेकिन दूसरे ही पल फ़रीदी ने उछल कर उसे दबोच लिया। प्रिंस अदनान ने उसकी पकड़ से निकल जाने की कोशिश की, लेकिन फ़रीदी ने दो-तीन बार उसका सिर संगमरमर के उस चबूतरे से टकरा दिया जिस पर विक्टोरिया का बुत लगा हुआ था।

प्रिंस अदनान बेहोश हो गया।

दो घण्टे के बाद फ़रीदी उसी शराबख़ाने के एक तहख़ाने में आया। जहाँ से वह दाराब नगर के लिए रवाना हुआ था। वह शराबख़ाने के मैनेजर की मदद से बेहोश प्रिंस अदनान को एक खम्भे में बाँध रहा था।

‘‘इन्स्पेक्टर साहब.... वाक़ई आप भी बला के आदमी हैं।’’ शराबख़ाने का मैनेजर बोला।

‘‘अगर मैं बला का आदमी न होता तो शायद तुम्हारे हाथों मुझे क़ब्र में सोना पड़ता।’’ फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा।

‘‘इसमें शक नहीं।’’ मैनेजर ने कहा। ‘‘अगर आपकी बजाय कोई और होता तो उसका यही अंजाम होता, मगर आपको तो उस्ताद कह ही चुका हूँ।’’

‘‘अच्छा, मेरे शागिर्द.... लेकिन तुमने अब बहुत बेदर्दी से नाजायज़ शराब बेचनी शुरू कर दी है। ज़रा एहतियात से।’’

‘‘मेरा दावा है कि सिवा आपके और कोई ऐसा नहीं कह सकता।’’ मैनेजर ने सीने पर हाथ मारते हुए कहा।

‘‘यही मतलब था।’’ फ़रीदी ने कहा और प्रिंस अदनान को होश में लाने की कोशिश करने लगा।

‘‘आख़िर मामला क्या है?’’ मैनेजर ने कहा।

‘‘मामला बहुत उलझा हुआ है। सुलझ जाने के बाद बताऊँगा.... लेकिन तुम इसकी अच्छी तरह हिफ़ाज़त करना, यह निकल कर जाने न पाये, वरना निकल गया तो तुम ज़िम्मेदार होगे।’’

‘‘अरे, भला ऐसी क्या बात है.... यहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता।’’ मैनेजर ने कहा।

प्रिंस अदनान होश में आ गया था। वह घबरायी हुई ऩजरों से चारों तरफ़ देखने लगा।

फ़रीदी उसकी तरफ़ मुस्कुरा कर देख रहा था।

‘‘नवाब रशीद़ुज़्जमाँ ने मुझे धोखा दिया।’’ प्रिंस अदनान अंग्रेज़ी में बड़बड़ाया।

‘‘तुम बिलकुल ठीक समझे।’’ फ़रीदी ने हिन्दी में कहा।

‘‘मैं तुम्हारी ज़बान नहीं समझता.... क्या तुम अंग्रेज़ी में बात नहीं कर सकते।’’ प्रिंस अदनान ने कहा।

‘‘मेरी ज़बान तो तुम ऐसी समझते हो जैसे कि समझना चाहिए।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘अगर तुम कहो तो तुम्हारी मादरी ज़बान गुजराती में बात करूँ।’’

प्रिंस अदनान चौंक पड़ा।

‘‘चौंको नहीं मिस्टर जमशेद.... तुम दूसरों की आँख में धूल झोंक सकते हो मेरी आँख में नहीं।’’

‘‘मैं कुछ नहीं समझ रहा कि तुम क्या कह रहे हो।’’ प्रिंस अदनान ग़ुस्से में बोला। ‘‘तुम इराक़ के एक शहज़ादे की तौहीन कर रहे हो। तुम्हारी हुकूमत को उसके लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।’’

‘‘ठीक कह रहे हो मिस्टर जमशेद।’’ फ़रीदी अंग्रेज़ी में बोला। ‘‘हमारी हुकूमत काफ़ी दिनों से तुम्हारी ताक में है।’’

‘‘क्या बकवास है.... कौन जमशेद.... कैसा जमशेद.... तुम्हें कुछ ग़लत-फ़हमी हुई है।’’

‘‘जनाब.... मुझे तो अक्सर ग़लत-फ़हमी हुआ करती है। तुम समझे थे कि शायद मैं तुम्हारी इस तस्वीर वाली धमकी से डर कर तुम्हारा पीछा छोड़ दूँगा।’’

‘‘क्या बेकार में बकवास लगा रखी है। मुझे फ़ौरन खोल दो, वरना अच्छा न होगा।’’ अदनान चीख़ कर बोला।

‘‘अगर मैं तुम्हें यहाँ से रिहा भी कर दूँ तो शक के तहत तुम्हें हवालात में रहना पड़ेगा। तुम क्या समझते हो.... मेरे पास तुम्हारे काले कारनामों का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है और तुम्हारी उँगलियों के निशान भी जो मैंने उस काग़ज़ से हासिल किये थे जो तुम छपने के लिए ‘न्यू स्टार’ के दफ़्तर में दे आये थे।’’

अदनान के चेहरे पर पसीना आ गया।

‘‘सब बकवास है।’’ वह फिर चीख़ा।

‘‘ख़ैर, बकवास ही सही।’’ फ़रीदी ने मुस्कुरा कर कहा। ‘‘यह बताओ लियोनार्ड कहाँ है?’’

लियोनार्ड के नाम पर प्रिंस अदनान बुरी तरह चौंक पड़ा और हैरत से फ़रीदी को घूरने लगा।

‘‘इस तरह घूरने से काम न चलेगा। यह तो तुम्हें बताना ही पड़ेगा।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘इस वक़्त तुम हुकूमत की हिरासत में नहीं, बल्कि सीधे मेरी हिरासत में हो। मैं इस राज़ को उगलवाने के सिलसिले में तुम्हें क़त्ल भी कर सकता हूँ।’’

फ़रीदी के चेहरे पर अजीब क़िस्म की सूरत बन गयी जिसे देख कर शराबख़ाने का मैनेजर काँप गया।

‘‘अँगीठी में कोयले दहकाओ।’’ फ़रीदी ने मैनेजर की तरफ़ देख कर कहा।

‘‘जी अच्छा।’’ कह कर मैनेजर चला गया।

‘‘मैं लोहा लाल करके तुम्हारे जिस्म पर इतनी बार रखूँगा कि काले हो कर रह जाओगे।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘लेकिन आख़िर क्यों.... मेरी हुकूमत....!’’

‘‘चुप रहो हुकूमत के बच्चे।’’ फ़रीदी गरज कर बोला। ‘‘जो मैं पूछता हूँ, उसका सही-सही जवाब दो, वरना अभी सारी हक़ीक़त मालूम हो जायेगी।’’

‘‘मैं नहीं जानता।’’ अदनान ने घुटी हुई आवाज़ में कहा।

इतनी देर में मैनेजर दहकती हुई अँगीठी ले कर आ गया।

‘‘इसमें लाल होने के लिए लोहे की एक सलाख़ डाल दो।’’ फ़रीदी ने मैनेजर से कहा।

अदनान सिर से पैर तक काँप उठा।

फ़रीदी लाल होती हुई सलाख़ को ग़ौर से देख रहा था। सलाख़ के लाल हो जाने पर फ़रीदी उसे अँगीठी से निकाल कर धीरे-धीरे अदनान की तरफ़ बढ़ने लगा।

‘‘मैं मुजरिम हूँ.... मगर तुम्हें इसका हक़ हासिल नहीं।’’ अदनान डरी हुई आवाज़ में चीख़ा।
 
‘‘यहाँ इस तहख़ाने में मुझे हर तरह का हक़ हासिल है।’’ फ़रीदी ने बेदर्दी से कहा और जलती हुई सलाख़ उसके हाथ पर रख दी। अदनान बिलबिला उठा और शराबख़ाने का मैनेजर मुँह फेर कर दूसरी तरफ़ हट गया।

‘‘मैं तुम्हें इसी तरह जला-जला कर रखूँगा।’’

‘‘लेकिन तुम्हारी यह हरकत क़ानून के ख़िलाफ़ है।’’ अदनान अपनी मादरी ज़बान गुजराती में चीख़ा।

‘‘शाबाश मेरे बेटे। आख़िर तुम अदनान से जमशेद हो ही गये। अब जल्दी से यह भी बता दो कि लियोनार्ड कहाँ है?’’ फ़रीदी ने सलाख़ को दोबारा अँगीठी में डालते हुए कहा।

‘‘मुझे नहीं मालूम....!’’

‘‘फिर वही....!’’

‘‘पवित्र आग की कसम, मैंने उसे आज तक नहीं देखा।’’

‘‘तुम झूठे हो।’’

‘‘अब मैं तुम्हें किसी तरह यक़ीन नहीं दिला सकता।’’अदनान ने जले हुए निशान की तरफ़ देखते हुए कहा।

‘‘अच्छा, उसके हुक्म तुम तक कैसे पहुँचते हैं?’’

‘‘ट्रांसमीटर द्वारा।’’

‘‘ठीक.... अच्छा यह बताओ कि जिस बिल्डिंग में तुम रहते हो, उसमें ट्रांसमीटर कहाँ लगा हुआ है?’’

‘‘मेरे सोने के कमरे में।’’

‘‘तुम्हारे नौकरों को तुम्हारी हरकतों की ख़बर है या नहीं?’’

‘‘सिर्फ़ एक को।’’

‘‘उसका नाम क्या है?’’ फ़रीदी ने पूछा।

‘‘राजू....!’’

‘‘तुम लोगों का उस मकान पर कब से क़ब्ज़ा है?’’

‘‘लगभग दस साल से।’’

‘‘लियोनार्ड के प्रोग्राम से तुम्हारे अलावा कोई और भी जानता है?’’

‘‘नहीं....!’’

‘‘ग़ज़ाला कहाँ क़ैद है?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम....!’’

‘‘तुम झूठ बकते हो।’’

‘‘मुझे नहीं मालूम कि लियोनार्ड ने उसे किस तरह ग़ायब किया है और कहाँ छुपा रखा है।’’

उसके बाद ख़ामोशी छा गयी। फ़रीदी ने महसूस किया कि अदनान बार-बार अपना हाथ सीने की तरफ़ ले जाने की कोशिश कर रहा है।

फ़रीदी ने झपट कर उसके चेस्टर के गरेबान में हाथ डाल दिया। उसके सीने पर कोई ठोस चीज़ बँधी हुई मालूम हुई। फ़रीदी ने उसे खींच कर बाहर निकाल लिया वह एक चपटा-सा ट्रांसमीटर था।

‘‘ओह, तो यह कहिए कि आप अपनी गिरफ़्तारी की ख़बर लियोनार्ड को देने जा रहे थे।’’

फ़रीदी ने ट्रांसमीटर को ग़ौर से देखते हुए कहा। ‘‘यह बिलकुल वैसा ही है जैसा जर्मनी के जासूस जंग के वक़्त इस्तेमाल किया करते थे।’’

अदनान के चेहरे से ऐसा मालूम हो रहा था जैसे अब उसे अपनी ज़िन्दगी की कोई उम्मीद न रह गयी हो।

‘‘अच्छा शागिर्द साहब।’’ फ़रीदी ने होटल के मैनेजर की तरफ़ देख कर कहा। ‘‘अब मैं चलता हूँ.... इस पर कड़ी ऩजर रखना।’’

फ़रीदी और मैनेजर अदनान को तहख़ाने में छोड़ कर ऊपर आ गये।

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रहस्यमय मकान

थोड़ी देर बाद फ़रीदी कमरे से निकला। उसने अपना चेहरा चेस्टर के कॉलर में छिपा रखा था। शराबख़ाने के बाहर आ कर उसने चेस्टर के कॉलर गिरा दिये। वह प्रिंस अदनान के भेस में था। उसने फ़ुटपाथ पर कुछ देर खड़े हो कर सोचा और फिर एक टैक्सी में बैठ कर प्रिंस अदनान के मकान की तरफ़ चला गया।

प्रिंस अदनान जिस मकान में रह रहा था, वह एक बहुत पुरानी बिल्डिंग थी। उसके बारे में आम तौर पर मशहूर था कि वहाँ भूत-प्रेत का साया है। इससे पहले यहाँ एक बहुत ही अमीर आदमी रहता था। वह बिलकुल अकेला था। उसके बारे में लोग कहते थे कि वह इस मकान में रहने वाले भूतों ही की मदद से अमीर हो गया है। यह इमारत दरअसल शाही दौर की थी और शहर के एक नवाब ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थी। किसी वजह से इस ख़ानदान वालों ने उसे बेच दिया था। वजह कुछ भी रही हो, लेकिन आम लोगों में यह बात मशहूर हो गयी थी कि उसका बेचना दरअसल भूतों वाला मामला ही था। जिस शख़्स ने उसे ख़रीदा था, उसने उसे किराये पर उठा दिया। किरायेदार, जो मकान में कुछ नौकरों के साथ अकेला रहता था, एक दिन सुबह अपने कमरे में मुर्दा पाया गया। इस वाक़ये से उस मकान के भुतहा होने की शोहरत में और इज़ाफ़ा हो गया।

फिर उस मकान को प्रिंस अदनान ने किराये पर लिया और वहीं रहने लगा। मकान यूँ ही कुछ सन्दिग्ध लगता था। फिर भूतों वाले मामले ने उसे और भी भयानक बना दिया। प्रिंस अदनान जब उसे किराये पर ले रहा था तो आस-पास के लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन उसने हँस कर टाल दिया था।

फ़रीदी इस इमारत के सामने पहुँच कर थोड़ी देर के लिए रुका। मेन गेट पर हाई पावर का बल्ब जल रहा था। एक तरफ़ चौकीदार बैठा ऊँघ रहा था। फ़रीदी खड़ा कुछ सोचता रहा, फिर आगे बढ़ा। उसके क़दम एक ऐसे शराबी की तरह लड़खड़ा रहे थे जैसे ज़्यादा पी गया हो। उसने चौकीदार के पास पहुँच कर उसे ठोकर मारी वह हड़बड़ा कर खड़ा हो गया।

‘‘सुअर का बच्चा, सोता है।’’ फ़रीदी बिगड़ी हुई आवाज़ में चीख़ा।

‘‘नहीं तो हुज़ूर....!’’ चौकीदार ने सहम कर जवाब दिया।

‘‘हुज़ूर का बच्चा.... उल्लू का पट्ठा।’’ फ़रीदी बड़बड़ाता हुआ अन्दर चला गया।

अब उसने भद्दी आवाज़ में एक अंग्रेज़ी का गाना शुरू कर दिया, उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे उसकी आवाज़ से सारी इमारत गूँज रही हो। शोर सुन कर दो पहलवान उसके क़रीब आ कर खड़े हो गये।

‘‘क्या बात है सरदार....!’’ एक आदमी ने गुजराती में पूछा।

‘‘तुम्हारा सिर....!’’ फ़रीदी ने भी गुजराती में झल्ला कर कहा। ‘‘आइए.... मैं आपको आपके सोने के कमरे में पहुँचा दूँ।’’ पहला आदमी बोला।

‘‘अबे ओ गधे, तेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या।’’ फ़रीदी झूमता हुआ बोला। ‘‘मैं मु़र्गी का बच्चा हूँ क्या समझा.... मुझे मेरे दड़बे में पहुँचा दे।’’

दोनों आदमियों ने मुस्कुरा कर सिर झुका लिया।

‘‘अच्छा, तुम दोनों मुस्कुराते हो।’’ फ़रीदी ने जेब से पिस्तौल निकाल कर कहा। ‘‘हैण्ड्स अप।’’

दोनों गिड़गिड़ाते हुए उसके क़दमों पर गिर पड़े। फ़रीदी ने एक जोरदार क़हक़हा लगाया और पिस्तौल जेब में रख लिया।

‘‘उठो....!’’ वह गरज कर बोला। ‘‘तुम दोनों मेरे बाप हो।’’

दोनों खड़े हो कर काँपने लगे।

‘‘जाओ.... राजू को भेज दो।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘राजू....!’’ दोनों ने एक साथ कहा और हैरत से एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे।

‘‘हाँ.... हाँ.... राजू....!’’ फ़रीदी झूमता हुआ बोला।

‘‘कौन राजू....!’’ एक ने कहा।

‘‘तुम राजू को नहीं जानते.... तब तुम काली बिल्ली की औलाद मालूम होते हो। जाओ, उसे फ़ौरन बुला लाओ.... वरना मैं तुम दोनों को ख़त्म कर दूँगा।’’

‘‘सरदार.... हम नहीं जानते, राजू कौन है।’’ एक बोला।

फ़रीदी सोच में पड़ गया कि सिर्फ़ प्रिंस अदनान ने राजू वाली बात झूठ कही थी। अगर वह शराबी का रोल न कर रहा होता तो इसी दौरान बुरा वक़्त आ जाता। वह सोचने लगा कि कहीं ट्रांसमीटर वाली बात भी ग़लत न हो।

‘‘तुम लोग बिलकुल गधे हो, जो राजू को नहीं जानते।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘राजू मेरी जान, मेरी महबूबा है। अभी वह होटल में मेरे साथ शराब पी रही थी।’’

‘‘यह बात है।’’ एक मुस्कुरा कर बोला। ‘‘आप हमें उसके घर का पता बताइए.... हम अभी उसे उठा लाते हैं।’’

‘‘वह जन्नत में रहती है।’’ फ़रीदी ने लड़खड़ा कर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन दूसरे ही पल में वह गिर पड़ा।

‘‘सरदार.... सरदार....!’’ दोनों उस पर झुकते हुए एक साथ चीख़े।

‘‘बेहोश हो गये।’’ एक ने कहा।

‘‘कभी इतनी नहीं पीते थे.... मालूम नहीं क्या बात है।’’ दूसरा बोला।

‘‘कोई औरत साथ थी न।’’ पहला मुस्कुरा कर बोला। ‘‘चलो, इन्हें उठा कर उनके सोने के कमरे में डाल आयें।’’

दोनों फ़रीदी को उठा कर सोने के कमरे में लाये और लिटा दिया। उनके चले जाने और थोड़ी देर यूँ ही लेटे रहने के बाद फ़रीदी उठा और कमरा अन्दर से बन्द कर लिया। यह एक बहुत ही ख़ूबसूरत सजा-सजाया कमरा था। सोने के पलँग के क़रीब एक छोटी-सी मेज़ पर रेडियो रखा हुआ था। फ़रीदी को ट्रांसमीटर की तलाश थी। उसने कमरे का कोना-कोना छान मारा मगर ट्रांसमीटर का कहीं पता न चला। वह सोचने लगा.... ख़ैर, कुछ परवाह नहीं। अब तो प्रिंस अदनान उसकी कैद ही में है। अगर वह आज सीधी तरह नहीं बता सका तो किया हुआ, कल उसकी खाल खींच ली जायेगी। अभी वह सोच ही रहा था कि अचानक मेज़ पर रखे हुए रेडियो में हल्की-हल्की-सी खरखराहट पैदा होने लगी। वह चौंक पड़ा। रेडियो अपने आप कैसे चलने लगा। वह झपट कर रेडियो के क़रीब पहुँचा। अब रेडियो में से किसी आदमी की आवाज़ भी सुनायी देने लगी। बोलने वाला अंग्रेज़ी में कह रहा था।

‘‘तुमने अभी तक ख़बर नहीं दी.... तीसरी बार तुमसे कह रहा हूँ.... जवाब दो.... कि क्या हुआ.... दोपहर को तुमने ख़बर दी थी कि वह आ गया है।’’

फ़रीदी ग़ौर से रेडियो का जायज़ा लेने लगा। अचानक उसका हाथ एक जगह पड़ा और एक खटके के साथ रेडियो में एक ख़ाना-सा ख़ुल गया। जहाँ फ़रीदी का हाथ लगा था, वहाँ एक छोटा-सा और सरसरी तौर पर देखने पर ऩजर न आने वाला एक स्विच लगा हुआ था। फ़रीदी ने स्विच दबाया और ख़ाना फिर बन्द हो गया। उसने ख़ाने को फिर खोला और मुँह लगा कर कहने लगा।
 
‘‘मैंने ज़बर्दस्त धोखा खाया.... कमबख़्त ने सादे काग़ज़ों के ऊपर कुछ नोट लगा रखे थे.... नोटों की गड्डियों में ऊपर-नीचे नोट और बीच में सादा काग़ज़ था।’’

‘‘तस्वीरों का क्या हुआ....?’’ रेडियो से आवाज़ आयी।

‘‘निगेटिव समेत ले गया।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘तुम बिलकुल बेवकूफ़ हो।’’ रेडियो से आवाज़ आयी।

‘‘क्या लड़की भी वापस कर दी?’’

‘‘नहीं....!’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘यह मेरी पहली ग़लती है उम्मीद है कि आप मुझे माफ़ कर देंगे।’’

‘‘ख़ैर, जाने दो....!’’ रेडियो से आवाज़ आयी। ‘‘लड़की को हिफ़ाज़त से रखना और अगर हो सके तो उस गधे को भी उठा लाओ.... और हाँ, फ़रीदी से होशियार रहना।’’

‘‘वह बुरी तरह मेरे पीछे पड़ गया है.... अगर हुक्म हो तो उसे क़त्ल कर दिया जाये।’’ फ़रीदी ने कहा।

‘‘तुम उसकी फ़िक्र मत करो.... मैं उसका क़ायदे से इन्तज़ाम कर रहा हूँ।’’ रेडियो से आवाज़ आयी।

फ़रीदी ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया और बोला.... ‘‘कल दिन में आपसे बात नहीं कर सकूँगा.... मेरा इरादा है कि उस नवाब के बच्चे को एक अच्छा सबक़ पढ़ाऊँ।’



‘‘उसे सबक़ देने का सबसे आसान तरीक़ा तुम्हें बताता हूँ।’’ रेडियो से आवाज़ आयी। ‘‘लड़की तुम्हारे क़ब्ज़े में है ही, किसी के साथ उसकी तस्वीर खींच कर उसे रिहा कर दो और तस्वीर की एक-एक कापी उसके हर रिश्तेदार के पास भिजवा दो।’’

फ़रीदी उलझन में पड़ गया। अदनान ने कहा था कि उसे लड़की के अपहरण के बारे में कुछ मालूम ही नहीं। लियोनार्ड ने सीधे उसे ग़ायब कर दिया था और उसी ने उसे कहीं रखा भी था।

‘‘आपका यह ख़याल बहुत अच्छा है। ऐसा ही किया जायेगा।’’ फ़रीदी ने कहा। ‘‘और कोई हुक्म।’’

‘‘नहीं, अब बस कल रात को फिर बात होगी।’’ रेडियो से आवाज़ आयी और कमरे में पूरे तौर से सन्नाटा छा गया। फ़रीदी ने ख़ाना बन्द कर दिया। वह सोच रहा था कि आख़िर ग़ज़ाला का पता कैसे लगाये। अगर वह उसी मकान में किसी जगह क़ैद है तब तो आसानी से पता चल जायेगा और अगर यहाँ न हुई तो उसके लिए उसे दोबारा अदनान के साथ सख़्ती करनी पड़ेगी। उसने अदनान के साथ जो रवैया अपनाया था, वह उसे बिलकुल पसन्द न था, लेकिन इसके अलावा कोई और सूरत भी तो न थी। वह अच्छी तरह जानता था कि इस क़िस्म के लोग मारने-पीटने से ही क़ाबू में आते हैं और कभी-कभी तो मार-पीट भी उन्हें सीधे रास्ते पर लाने के लिए बेकार साबित होती है।

फ़रीदी रात भर जागता रहा। जब मकान के सारे लोग सो गये तो वह उठा और मकान का कोना-कोना छान मारा। मगर ग़ज़ाला का कोई पता नहीं चला।

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फ़रीदी पागल हो गया

दूसरे दिन सुबह फ़रीदी अपने घर पहुँचा। उसने हमीद को पहले ही ख़बर भिजवा दी थी और अब उसके आने का इन्तज़ार कर रहा था। हमीद की ग़ैरमौजूदगी में घर उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। नाश्ते की मेज़ पर पहुँच कर भी उसने हमीद की कमी महसूस की।

‘‘क्यों भई.... ये बंगाली रसगुल्ले कहाँ से आये थे?’’ फ़रीदी ने मेज़ के क़रीब खड़े हुए नौकर से पूछा। उसे बंगाली रसगुल्ले बेहद पसन्द थे।

‘‘चीफ़ साहब ने आपके लिए भिजवाये हैं।’’ नौकर ने जवाब दिया।

फ़रीदी ने रसगुल्ला उठाया, लेकिन फिर फ़ौरन ही रख दिया। वह कुछ सोच रहा था। ट्रांसमीटर पर बोलने वाले के शब्द अब तक उसके कानों में गूँज रहे थे और फिर आज से पहले कभी चीफ़ इन्स्पेक्टर साहब ने इतनी मेहरबानी नहीं की थी। फ़रीदी ने एक रसगुल्ला उठा कर क़रीब बैठे हुए कुत्ते के आगे डाल दिया। कुत्ता उसे खा कर दोबारा फ़रीदी की तरफ़ देखने लगा। फ़रीदी ने एक और डाल दिया। धीरे-धीरे उसने सारे रसगुल्ले उसे खिला दिये। थोड़ी देर के बाद कुत्ता ऊँघने लगा। फ़रीदी चाय के घूँट ले ले कर ग़ौर से उसे देखता रहा। कुछ देर बाद अचानक कुत्ता चौंका और एक बड़े आईने में अपना चेहरा देख कर उस पर झपटा.... वह आईने के सामने इस तरह उछल-कूद रहा था जैसे किसी दूसरे कुत्ते से लड़ रहा हो। फ़रीदी के होंटों पर थोड़ी-सी मुस्कुराहट पैदा हुई। वह उठा और कमरे से निकल गया। दो नौकरों ने कुत्ते के शोर के बारे में उससे पूछा। लेकिन उसने उन्हें यह कह कर टाल दिया कि उसने एक चूहा पकड़ लिया है। उसने दूसरे कमरे में जा कर पिस्तौल निकाला और फिर कमरे में लौट आया। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे कुत्ता पागल हो गया हो। फ़रीदी ने पिस्तौल चला दिया। कुत्ते ने एक छलाँग लगायी और ज़मीन पर आ गिरा। गोली चलने की आवाज़ सुन कर कई नौकर कमरे की तरफ़ दौड़ आये। फ़रीदी का चेहरा लाल हो रहा था। लाल-लाल आँखें उबली पड़ रही थीं। उसने नौकरों की तरफ़ देख कर एक डरावना क़हक़हा लगाया और उन्हें भी गोली मार देने की धमकियाँ देने लगा।

सारे नौकर डर कर इधर-उधर चले गये। फ़रीदी तरह-तरह की आवाज़ें निकालता हुआ उछल-कूद कर रहा था।

इतने में हमीद आ गया, फ़रीदी को इस हालत में देख कर उसे हँसी आ गयी।

‘‘क्यों बे उल्लू के पट्ठे, तू हँस क्यों रहा है?’’ फ़रीदी ने चीख़ कर कहा।

हमीद फौरन संजीदा हो गया। फ़रीदी ने आज तक उससे इस तरह की बात न की थी।

‘‘अबे, बोलता क्यों नहीं?’’ फ़रीदी फिर चीख़ा।

इस बार हमीद सिर-से-पैर तक काँप गया। उसने फ़रीदीकी आँखों में एक बहुत ही भयानक क़िस्म की चमक देखी।

‘‘अबे, बोल....’’ फ़रीदी फिर गरजा।

‘‘क्या बोलूँ....?’’ हमीद ने डरते-डरते कहा।

‘‘अबे, वही बोल जो तुझे शैतान की मौसी ने सिखाया है।’’ फ़रीदी चीख़ा। ‘‘अबे बोल, बन्दर की औलाद, कौड़ियाले साँप के भांजे।’’

हमीद को फिर हँसी आ गयी और फ़रीदी ने जेब से पिस्तौल निकाल कर फ़ायर कर दिया। गोली हमीद के दाहिने कान के क़रीब से निकल गयी।

हमीद बदहवास हो कर भागा.... फ़रीदी उसके पीछे दौड़ रहा था। हमीद ने बाथरूम में घुस कर दरवाज़ा बन्द कर लिया। फ़रीदी दरवाज़ा पीटने लगा।

‘‘अबे, ओ टमाटर के मौसा.... दरवाज़ा खोलो.... वरना कच्चा खा जाऊँगा।’’ फ़रीदी चीख़ा।

घर के सारे नौकर उसकी यह हालत देख कर इधर-उधर छिपते फिर रहे थे।

‘‘अच्छा बेटा.... न खोलो.... दफ़्तर से लौट कर तुम्हारी मरम्मत करूँगा।’’ फ़रीदी ने कहा और वहाँ से हट गया।

उसने पायजामे और कमीज़ पर टाई बाँधी, एक पैर में काला जूता पहना और दूसरे में कत्थई और सिर पर गाँधी कैप रख कर दफ़्तर की तरफ़ पैदल ही चल दिया।

रास्ते भर लोग उसे देख-देख कर हँसते रहे.... और वह उन्हें मुँह चिढ़ाता रहा।

दफ़्तर में घुसते ही उसने हुल्लड़ मचाना शुरू कर दिया।

‘‘आई ऐम द बेस्ट-आई ऐम द बेस्ट।’’ वह चीख़-चीख़ कर गा रहा था।

दफ़्तर के सारे कर्मचारी उसके पास इकट्ठे हो गये थे। गाते-गाते उसने एक हाथ कमर पर रखा और दूसरा सिर पर और अंग्रेज़ी गाना गाता हुआ हिन्दुस्तानी अन्दाज़ में ठुमुक-ठुमुक कर नाचने लगा।

लोग खड़े हँस रहे थे। बहुतेरों के ज़ेहन में यह बात आयी कि शायद वह जासूसी के सिलसिले में कोई नयी चाल चल रहा है।

यह सिलसिला जारी था कि हमीद भी दफ़्तर पहुँच गया। लोग उससे पूछने लगे।

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.... यह बहरूपिया हरगिज़ नहीं हो सकता।’’ हमीद ने कहा। ‘‘अभी-अभी उन्होंने मुझ पर पिस्तौल से वार किया था.... अगर मैं एक तरफ़ न हो जाता तो खोपड़ी साफ़ हो गयी थी।’’

यह सुन कर बहुत-से लोग डर कर फ़रीदी के पास से हट गये।

‘‘तुम आ गये मेरे बेटे।’’ फ़रीदी हमीद की तरफ़ हाथ बढ़ाता हुआ बोला। ‘‘भाइयो! मेरे पहले शौहर की औलाद है।’’

फिर एक ज़ोरदार हँसी हुई और हमीद झेंप कर वहाँ से हट गया।

आख़िरकार यह हुल्लड़ इतना बढ़ा कि मिस्टर जैक्सन को अपने कमरे से बाहर निकल आना पड़ा।

लोग उसे देख कर इधर-उधर फैल गये।

‘‘वेल मिस्टर फ़रीदी, क्या बात है?’’ जैक्सन ने उसे इस तरह देख कर हैरत ज़ाहिर करते हुए कहा।

‘‘दिल का मेरी जान तुम्हारे इश़्क में यह हाल हो गया है।’’ फ़रीदी ने उसकी तरफ़ बढ़ कर उसे लिपटाने की कोशिश करते हुए कहा।

‘‘क्या बदतमीज़ी है।’’ जैक्सन उसे हटाते हुए गरज कर बोला।

‘‘मार डालो मेरी जान, बस इसी अदा पर जान जाती है।’’ फ़रीदी ने अपने सीने पर हाथ मार कर कहा।

‘‘अरे, इसे क्या हो गया?’’ जैक्सन ने बेबसी से कहा।

‘‘इश़्क हो गया है, इश़्क....‘‘ फ़रीदी इतने जोर से चीख़ा कि उसकी आवाज़ भर्रा गयी।

जैक्सन ने लोगों को पुकारा.... वहाँ फिर भीड़ लग गयी।

‘‘शायद इसने बहुत ज़्यादा पी ली है।’’ जैक्सन ने कहा।

‘‘नहीं साहब.... शायद इनका दिमाग़ ख़राब हो गया है।’’ एक आदमी बोला।

‘‘अचानक दिमाग़ कैसे ख़राब हो गया?’’ जैक्सन ने पूछा।

‘‘मुझे नौकरों की ज़बानी मालूम हुआ कि सुबह नाश्ते के वक़्त अचानक उन पर इस क़िस्म का दौरा पड़ गया।’’ हमीद ने कहा। ‘‘पहले इन्होंने एक कुत्ते को मार डाला और फिर मुझ पर भी गोली चलायी।’’

‘‘अरे....!’’ जैक्सन ने कहा और डरी ऩजरों से फ़रीदी की तरफ़ देखने लगा।

फ़रीदी अब भी खड़ा डरावने अन्दाज़ में हँस रहा था।
 
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