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Hindi Sex Kahani काला इश्क़!

update 10

मैं: क्या हुआ रो क्यों रही हो?

ऋतू: वो....वो....कैंटीन में.... रैगिंग .... उसने... मुझे .... डांस..... करने को.....|
मैं: (बीच में बोलते हुए) क्या नाम है उसका?
ऋतू: तोमर
बस ऋतू का इतना कहना था की मैं बाइक से उतरा और उसका हाथ पकड़ के तेजी से कैंटीन में घुसा और देखा वहाँ कुछ लड़कियां डांस कर रही हैं और सेकंड और थर्ड ईयर के बच्चे खड़े देख कर हँस रहे हैं| मैंने ऋतू का हाथ छोड़ा और भीड़ के बीचों-बीच होता हुआ सामने जा पहुँचा| 5 लड़कों का एक झुण्ड सब की रैगिंग कर रहा था और मुझे देखते ही उनमें से एक बोला; "ये लो एक और बच्चा आ गया|"
"तुम में से तोमर कौन है?" मैंने गरजते हुए कहा| ये सुन कर उनका हीरो लड़का सामने आया और बोला; "मैं हूँ बे!" उसकी आँखें पूरी लाल थी, जिसका मतलब था उसने अभी-अभी गांजा फूंका है| "इस कॉलेज में रैगिंग अलाउड नहीं है, जानता है ना तू?" मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल के कहा| "तू कौन है बे? प्रिंसिपल का चमचा!?" ये सुनते ही मैंने एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर रख दिया और वो मिटटी चाट गया| उसके सारे चमचे आ कर उसे उठाने लगे| जिन बच्चों की रैगिंग हो रही थी वो सब डरे-सहमे से एक तरफ खड़े हो गए और पूरी कैंटीन में शान्ति छ गई! "तेरी ये हिम्मत साले!" ये कहते हुए वो तोमर नाम का लड़का अपने होठों पर लगे खून को साफ़ करते हुए बोला और अपना मोबाइल निकाल कर अपने भाई को फ़ोन करने लगा| "भाई....भाई....एक लड़के ने... मुझे बहुत मारा...मेरा खून निकाल दिया... आप जल्दी आओ भाई!" ये कहके उसने फ़ोन काट दिया और मुझे बोला; "रुक साले ...तू यहीं रुक.... एक बाप की औलाद है तो यहीं रुक|"
"यहीं बैठा हूँ.... बुलाले जिसे बुलाना है|" ये कह कर मैंने पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसे उस लड़के की तरफ घुमा कर रख कर बैठ गया| तभी पीछे से ऋतू आ गई और इससे पहले वो कुछ कहे मैंने उसे इशारा कर के वापस भेज दिया|
तोमर: अच्छा ... ये तेरी बंदी है ना?! कौन से क्लास में है तू?
मैं: वो प्रिंसिपल रूम के बाहर जो दिवार है न उस पर सबसे ऊपर वाली तस्वीर मेरी है!
तोमर: वही तस्वीर तेरी कल अखबार में भी छपेगी!
मैं: आने दे तेरे भाई को फिर पता चलेगा किसकी तस्वीर छपेगी कल!
तोमर: हाँ-हाँ देख लेंगे.... और तुम लोग भी सुन लो सालों! जो कोई भी मेरे खिलाफ जाता है उसका क्या हाल होता है!
मैं: चुप-चाप बैठ जा अब! वरना दूसरे झापड़ में यहीं हग देगा!
तोमर: तेरी तो.....
इसके आगे वो कुछ कहता की उसका भाई पीछे से आ गया| मेरी पीठ अभी भी उस शक़्स की तरफ थी की तभी आवाज आई; "हाँ भई किसने पेल दिया तुझे?" ये सुन कर जैसे ही मैं पलटा तो देखा ये तो सोमू भैया हैं| उन्होंने भी देखते ही मुझे पहचान लिया और आगे बढ़ कर सीधे गले लगा लिया| "अरे मानु इतने साल बाद! कैसा है तू?" ये कहते हुए सोमू भइया मुस्कुरा कर मुझसे बात कर रहे थे और वो तोमर को भूल ही गए|
"ओ भैया? इसे क्या गले लगा रहे हो इसी ने तो मारा है मुझे!" तोमर बोला|
"अरे? तू तो पढ़ाकू लड़का था, तूने कैसे हाथ छोड़ दिया?!"
"भैया .... आपका भाई लड़कियों की रैगिंग कर रहा था, उन्हें यहाँ आइटम नंबर वाले गानों पर डांस करवा रहा था|" ये सुनते ही उनका चेहरा तमतमा गया और वो बड़ी तेजी से उसके पास गए और एक जोरदार तमाचा उसके बाएं गाल पर दे मारा| ठीक उसी समय उन्हें गांजे की महक आई तो उन्होंने उसे उठा के एक और तमाचा मारा और वो फिर नीचे जा गिरा| "हरामजादे!!! तेरी हिम्मत कैसे हुई लड़कियों की रैगिंग करने की? ये कॉलेज हमारी माँ के नाम पर है और तू उन्हीं के नाम को गन्दा कर रहा है! समझाया था ना तुझे की कॉलेज की लड़कियों का सम्मान करना, पर तू....कुत्ते! बहुत चर्बी चढ़ी है न तुझे, अभी उतारता हूँ तेरी चर्बी!" ये कहते हुए सोमू भैया ने अपनी बेल्ट निकाल ली और एक जोर दार चाप उसके कंधे पर पड़ी| मैंने भाग कर उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोका; "छोड़ दे मुझे मानु! इस कुत्ते ने हमारे खानदान की इज्जत पर कीचड़ उछाला है!"
"भैया...." मैंने बस इतना ही कहा था की उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और एक बेल्ट और चाप दी! अब मैंने जैसे तैसे उन्हें पीछे से पकड़ लिया और पीछे की तरफ खींचने लगा पर मुझे बहुत ताकत लगानी पढ़ रही थी| भैया थे ही इतने बलिष्ट! उधर तोमर जमीन पर पड़ा दर्द से करहा रहा था और उसके चमचे हाथ बांधे पीछे खड़े सब कुछ देख रहे थे|
सोमू भैया: तेरी तो मैं जान ले लूँगा कुत्ते!
मैं: भैया.. छोड़ दो ... तमाशा मत खड़ा करो... हम बैठ कर बात करते हैं!"
सोमू भैया: कोई बात-वात नहीं करनी मुझे! छोड़ तू मुझे!
मैं: भैया मैं आपके आगे हथजोड़ के विनती कर रहा हूँ! आप घर चलो ... वहाँ आप जो चाहे इसे सजा दे देना|
तब जा कर भैया का गुस्सा कुछ काबू में आया और उन्होंने बेल्ट छोड़ दी| "तुम सब लोग सुन लो! आज के बाद यहाँ किसी ने भी रैगिंग की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा| रैगिंग करनी है तो उस फाटक वाले कॉलेज में पढ़ो, इस कॉलेज में प्यार, मोहब्बत, आशिक़ी, नशे के लिए कोई जगह नहीं है| मानु जैसे स्टूडेंट्स ने इस कॉलेज की जो शान बनाई है वो बनी रहनी चाहिए और इस शान पर अगर किसी ने कलंक लगाने की कोशिश की तो वो जान से जायेगा!" सोमू भैया ने गरज के साथ अपना फरमान सुनाया| "....और मानु, इस कुत्ते की गलती के लिए मैं तुझसे हाथ जोड़ कर माफ़ी माँगता हूँ|" ये कहते हुए भैया ने हाथ जोड़े तो मैंने उनके हाथ पकड़ लिए; "ये क्या कर रहे हो भैया? लड़का भटक गया है, आप इस समझाओगे तो समझ जायेगा|"
"सुना तूने कुत्ते! चल माफ़ी माँग मानु से|" भैया ने गरजते हुए तोमर से कहा| वो बेचारा रोता हुआ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ के माफ़ी मांगने लगा तो मैंने भी उसे माफ़ कर दिया| "आज के बाद तूने किसी को भी परेशान किया ना तो देख फिर! और आप सभी को भी बता दूँ, इसका नाम राकेश है और आज के बाद आप में से किसी भी स्टूडेंट को इससे डरने की जर्रूरत नहीं है, कोई भी इसे तोमर नहीं कहेगा| साले कुत्ते! हमारी जात का नाम ले कर ऐसे डरा रखा है जैसे की कोई तोप हो! घर चल तू अब, जरा पिताजी को भी पता चले तेरे खौफ के बारे में|" ये कहते हुए भैया ने उसके पिछवाड़े पर लात मारी और वो बेचारा शर्म के मारे सर झुका कर निकल लिया| भैया से कुछ बातें हुई और फिर हम दोनों गेट पर पहुँचे, पीछे पीछे ऋतू भी आ रही थी तो भैया ने उससे पूछा: "हाँ भई तुम क्यों हमारे पीछे आ रही हो? कुछ काम है क्या मुझसे?"
"जी....वो....." इतना कहते हुए ऋतू ने मेरी तरफ इशारा कर दिया और ये सुनके भैया हँसते हुए बोले; "अच्छा जी... तो यही हैं जिनकी वजह से तुम ने राकेश को पेल दिया|"
"भैया वो...."
"अरे छोडो भाई! हम सब समझ गए!" ये कहते हुए वो मुझे छेड़ने लगे| "चलो बढ़िया है! खुश रहो!" इतना कह कर भैया अपनी गाडी में बैठ के निकल गए|
उनके जाते ही डरी-सहमी सी ऋतू मेरे सीने से लग गई और रोने लगी| उस ने आज पहली बार ऐसा कुछ देखा था जो उसके लिए पूरी तरह नया अनुभव था| मैंने उसे पुचकार के चुप कराया और उसके माथे को चूमा तो वो कुछ शांत हुई| फिर उसे बाइक पर बिठा कर हॉस्टल छोड़ा और कल की मुलाक़ात का समय भी तय हुआ और इसी तरह रोज़ कॉलेज के बाद एक घंटे के लिए मिलना, घूमना-फिरना, प्यार भरी बातें करना... ऐसे करते हुए दिन बीते.. बस मेरे लिए ऑफिस और पर्सनल लाइफ को बैलेंस करना मुश्किल हो रहा था जिसका पता मैंने ऋतू को कभी चलने नहीं दिया.... और फिर वो दिन आया जब ऋतू का जन्मदिन था|
मैंने आज पूरे दिन की छुट्टी ले रखी थी, ऋतू को भी मैंने बता दिया था की वो आज आधे दिन के बाद बंक मार के मेरे साथ चले| सबसे पहले तो मैं उसे एक अच्छी सी रोमांटिक मूवी दिखाने ले गया और फिर उसके बाद उसे आज पहली बार अपने घर पर लाया| कमरे में दाखिल होते ही वो कमरे की सजावट देख कर दंग रह गई| फ्रिज से केक निकाल के जब मैंने रखा तो उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसूं छलक आये| केक पर लगी मोमबत्ती बुझा कर सबसे पहला टुकड़ा उसने मुझे खिलाया और फिर वही आधे टुकड़ा मैंने ऋतू को खिला दिया| मैंने उसे कस के अपने सीने से लगा लिया पर अगले ही पल वो मुझसे थोड़ा दूर हुई और नीचे जमीन की तरफ देखने लगी| फिर मेरी आँखों में देखा और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होठों को चूम लिया| मैं उसके इस अचानक हुए हमले से थोड़ा हैरान था, जो उसने साफ़ पढ़ ली और शर्म से सर झुका लिया| पर आज मैं अपनी जान को कैसे नाराज करता सो मैं आगे बढ़ा और ऋतू के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसे गुलाबी होठों को चूमा| मेरे स्पर्श से ऋतू के जिस्म में हलचल शुरू हो चुकी थी और उसने अपने दोनों होठों को मेरे हाथों पर रख दिया| इधर मैंने अपने होठों को थोड़ा खोला और ऋतू के निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| ५ सेकंड के बाद मैंने ऐसा ही उसके ऊपर वाले होंठ के साथ भी किया| ऋतू ने कभी ऐसा चुम्बन महसूस नहीं किया था इसलिए वो मदहोश होने लगी थी, उसका जिस्म हल्का होने लगा था और उसके जिस्म का वजन मुझ पर आने लगा था| इधर मैं बारी-बारी उसके दोनों होठों को चूसने में लगा था की तभी मेरे लंड में तनाव आने लगा और दिमाग ने जैसे बहुत तेज करंट मुझे मारा और मैंने ऋतू को खुद से अलग किया| हम दोनों की सांसें भारी हो चली थी और मेरे तन और दिमाग में जंग छिड़ चुकी थी| तन सम्भोग चाहता था और दिमाग उसके परिणाम से डरता था| ऋतू को आ रहे आनंद में जैसे ही विघ्न पड़ा उसने अपनी आँखें खोली और फिर मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी की भला क्यों मैंने ये चुंबन तोडा?! पर उसके ऊपर जैसे कुछ फर्क पड़ा ही नहीं| इसलिए वो धीरे-धीरे कदमों से मेरे पास आई और मैं धीरे-धीरे पीछे हटने लगा और पलंग पर जा बैठा| वो मेरे पास आकर खड़ी हो गई और फिर घुटने मोड़ के नीचे बैठ गई और मेरे चेहरे को अपने हाथ में थामा और फिर से अपने गुलाबी होंठ मेरे होठों पर रखे और मेरे नीचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूस ने लगी| ऋतू मेरे कश्मक़श को समझ नहीं रही थी और बस मेरे होठों को बारी-बारी से चूस रही थी| इधर मेरा काबू भी खुद के ऊपर से छूटने लगा था और हाथ अपने आप ही उठ के उसके दोनों गालों पर आ चुके थे, मेरी जीभ भी अब कोतुहल करने को तैयार थी| जैसे ही ऋतू ने मेरे ऊपर के होंठ को छोड़ के नीचले होंठ को पकड़ने के लिए अपना मुँह खोला मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में सरका दी और मैं ये महसूस कर के हैरान था की उसने तुरंत ही मेरी जीभ को मुँह में भर के चूसना शुरू कर दिया| अब तो मेरी हालत ख़राब हो चुकी थी, लंड कस के खड़ा हो चूका था और पैंट में तम्बू बना चूका था| हाथ नीचे आ कर ऋतू के वक्ष को छूना चाहते थे पर अभी भी दिमाग में थोड़ी ताक़त थी इसलिए उसने हाथों को नीचे सरकने नहीं दिया|
इधर ऋतू को तो जैसे मेरी जीभ इतनी पसंद आ रही थी की वो उसे छोड़ ही नहीं रही थी और सांसें रोक कर उसे चूस-चूस के निचोड़ना चाहती थी| ऋतू के हाथ भी हरकत करने लगे थे और उस ने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए थे| बस तीन ही बटन खुले थे की मैंने उसके हाथों को रोक दिया, तभी ऋतू ने मेरी जीभ की चुसाई छोड़ी और अपनी जीभ मेरे मुँह में सरका दी तो मैंने उसकी जीभ को चूसना शुरू कर दिया| इधर ऋतू के हाथों ने फिर से मेरी कमीज के बटन खोलना शुरू कर दिया था और मेरे हाथों ने उसके चेहरे को थामा हुआ था| अब लंड की हालत यूँ थी की वो पैंट फाड़ के बाहर आने को मचल रहा था और दिमाग में फिर से घंटी बजने लगी थी की कहीं कुछ हो ना जाए! मैंने ऋतू की जीभ को चूसना बंद किया और इससे पहले की मैं कुछ कहूं उसने पुनः अपने होठों से मेरे निचले होंठ को अपने मुँह की गिरफ्त में ले लिया| जैसे-तैसे कर के मैंने इस चुंबन को तोडा और ऋतू के होठों पर ऊँगली रखते हुए कहा; "बस! बाकी...शादी के बाद!" ये सुन के वो ऐसे मुँह बनाने लगी जैसे किसी छोटे बच्चे के हाथ से लॉलीपॉप छीन ली हो! "awwww मेरा छोटा बच्चा|" ये कह के मैंने उसे गले लगा लिया और फिर खाने ले लिए कुछ आर्डर किया| मैं बाथरूम में घुसा ताकि अपने लंड मियां को शांत कर लूँ, कहीं ऋतू देख लेती तो पता नहीं क्या सोचती?!
दस मिनट में मैं उसे शांत कर के और मुँह धो कर बहार लौटा तो देखा ऋतू पलंग पर बैठी है| उसकी पीठ दिवार से लगी थी और दोनों पाँव पलंग पर सीधे थे| उसने अपनी दोनों बाहें खोल के मुझे पलंग पर बुलाया| मैं उसके गले लगने के बजाये उसकी गोद में सर रख कर लेट गया| ऋतू के उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी;
ऋतू: ये बर्थडे अब तक का Best बर्थडे था| थैंक यू जानू!
मैं: हम्म...
ऋतू: एक और थैंक यू आपको!
मैं: एक और? किस लिए?
ऋतू: Kiss करना सिखाने के लिए| (ये कह के ऋतू हँसने लगी|) वैसे आप तो काफी expert निकले? और कितनी बार कर चुके हो?
मैं: पागल फर्स्ट टाइम था!
ऋतू: अच्छा? इतना परफेक्ट कैसे?
मैं: वीडियो देख-देख के सीख गया|
ऋतू: अच्छा? मुझे भी दिखाओ!
मैं: नहीं... उसमें 'और' भी कुछ है! 'वो सब' अभी नहीं!
ऋतू: स्कूल और कॉलेज में बहुत सी लड़कियां हैं जिन्होंने 'वो सब' कर रखा है और वो सब मज़े ले कर सुनाती हैं| इसलिए theory तो मुझे अच्छे से पता है|
मैं: अच्छा? चलो प्रैक्टिकल शादी के बाद कर लेना?
ऋतू: इतना इंतजार करना पड़ेगा? आप भी ना?! आप की उम्र के लड़के तो लड़कियों के पीछे पड़े रहते हैं इन सब के लिए और एक आप हो की.....
मैं: अब कुछ तो फर्क होगा न मुझ में और बाकियों में, वरना तुम मुझिसे प्यार क्यों करती?
ऋतू: आपका मन नहीं करता?
मैं: करता है.... पर जिम्मेदारियां भी हैं! घर से भागना आसान काम नहीं है!
ऋतू: हम प्रोटेक्शन इस्तेमाल करते हैं|
मैं: तुम सच में चाहती हो की पहली बार में मैं कॉन्डम इस्तेमाल करूँ?
ऋतू: नहीं....(कुछ सोचते हुए) मैं गर्भनिरोधक गोली ले लूँगी|
मैं: ऐसा कुछ नहीं करना ... थोड़ा सब्र करो! (मैंने थोड़ा डाँटते हुए कहा|)
ऋतू: सॉरी! पर आप वीडियो तो दिखा दो ना प्लीज? देखने से तो कुछ नहीं होगा|
मैं: तुम बहुत जिद्दी हो! ये लो...
ये कहते हुए मैंने उसे अपने फ़ोन में राखी एक ब्लू-फिल्म लगा के दे दी और तभी दरवाजे पर दस्तक हुई| खाना आ चूका था तो मैंने खाना लिया और ऋतू के हाथ से फ़ोन छीन लिया और कहा; "पहले खाना ... बाद में देख ना|" ये कहते हुए मैंने उसे पहली बार पिज़्ज़ा दिखाया और बताया की ये है क्या| ऋतू को पिज़्ज़ा बहुत पसंद आया और हम दोनों ने खाना खाया और वापस पलंग पर बैठ गए पर इस बार ऋतू ने अपना सर मेरी गोद में रखा था और वो वही ब्लू-फिल्म देखने लगी| ब्लू-फिल्म से उसके जिस्म का तो पता नहीं पर मेरे लंड में हरकत होने लगी थी| वो तन के खड़ा होना चाहता था पर ऋतू का सर ठीक उसी के ऊपर था, मैंने थोड़ा हिलना चाहा की मैं उसका सर हटा दूँ पर वो ये सब समझ चुकी थी और उसने कुछ इस कदर करवट ले ली अब उसका बायां गाल ठीक मेरे लंड के ऊपर थे| वो मुझ से कुछ नहीं बोली बस बड़ी गौर से ब्लू-फिल्म देखती रही| इधर लंड मियां बगावत पर उत्तर आये और अपने आप ही पैंट के ऊपर से ऋतू के गाल पर थाप देने लगे जिसे ऋतू ने शायद महसूस भी किया| अब मैंने उठ के खड़े होने की कोशिश की तो ऋतू ने वीडियो रोक दी और हँसते हुए कहा; "अच्छा बाबा! अब तंग नहीं करुँगी!" मतलब वो मेरे लंड को साफ़ महसूस कर रही थी और जान बुझ कर मेरे साथ ऐसा कर रही थी| "तू बदमाश हो गई है|" ये कहते हुए मैंने उसके गाल पर हलकी सी थपकी लगाईं| मैं वापस दिवार से पीठ लगा कर बैठ गया और उसने भी अपना सर अब मेरे सीने से टिका लिया और वीडियो देखने लगी| चुदाई का सीन शुरू हुआ ही था की ऋतू का हाथ मेरे लंड पर आगया और ऐसा लगा जैसे वो नाप के देख रही हो के मेरा लंड उस आदमी के लंड के मुकाबले कितना बड़ा है| मैंने धीरे से उसका हाथ अपने लंड से हटा दिया और वापस उसका हाथ अपनी छाती पर रख दिया| 30 मिनट की वीडियो को उसने बिना काटे देखा और उसका जिस्म पूरा गर्म हो चूका था" उसने वीडियो पूरी होते ही फ़ोन रखा और खड़ी हो गई और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच के लेटने को कहा और फिर खुद मेरी बगल में लेट गई| अपने दाएं हाथ को मेरे गाल पर रखा और मुझे Kiss करने लगी| शुरू-शुरू में मैंने भी उसकी Kiss का जवाब बहुत अच्छे से दिया पर जब लंड फिर से खड़ा हो गया तो मैंने उसे रोक दिया; "बस जान!" और फिर घडी देखि तो सवा पांच बजे थे| "कुछ देर और रुक जाते हैं ना?" ऋतू ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे उठने से रोकते हुए कहा| "आने-जाने में 1 घंटा लगेगा, फिर हॉस्टल में क्या बोलोगी?" मैंने तुरंत अपने कपड़े ठीक किये पर ऋतू का तो जैसे जाने का मन ही नहीं था| "कल भी बंक मारूँ?" उसने खुश होते हुए कहा|
"दिमाग ख़राब है? यही सब करने के लिए यहाँ आई थी? फर्स्ट सेमेस्टर में फ़ैल हो गई तो घर वाले फिर घर पर बिठा देंगे| समझी? कॉलेज पढ़ने के लिए होता है समय बर्बाद करने के लिए नहीं और आज के बाद कभी मुझे बिना बताये बंक मारा ना तो सोच लेना!" मैंने ऋतू को थोड़ा झाड़ते हुए कहा| डाँट सुन के उसका सर झुक गया; "पढ़ाई के मामले में कोई मस्ती नहीं! समझी?" उसने हाँ में सर हिलाया और फिर मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊँची की और उसके होठों को चूमा| तब जा के वो फिर से खुश हो गई और अपने कपडे ठीक किये और मुँह हाथ धो के हम घर से निकले और मैंने ऋतू को हॉस्टल छोड़ा| ऋतू को मैं कभी भी कॉलेज के गेट से पिकअप नहीं करता था बल्कि चौक पर बत्ती के पास मेरी बाइक हमेशा खड़ी होती थी और हॉस्टल भी मैं उसे कुछ दूरी पर छोड़ता था ताकि कोई भी हमें एक साथ न देखे| खेर ऋतू बाइक से तो उत्तर गई पर उस का हॉस्टल जाने का मन कतई नहीं था इसलिए उसे खुश करने के लिए मैंने अपने बैकपैक से उसके लिए एक गिफ्ट निकाला और उसे दे दिया| गिफ्ट देख कर वो खुश हो गई, गिफ्ट में एक फ़ोन था और एक सिम-कार्ड भी| वो ख़ुशी से उछलने लगी और अचानक से मेरे गले लग गई और थैंक यू कहते हुए उसकी जुबान नहीं तक रही थी| "इसका पता किसी को भी नहीं चलना चाहिए? न कॉलेज में न हॉस्टल में?" मैंने उसे थोड़ा सख्त लहजे में कहा और जवाब में उसने हाँ में सार हिलाया पर उसके चेहरे की ख़ुशी अब भी कायम थी| जाने से पहले उसने अचानक से मेरे होठों को चूमा और फिर हॉस्टल की तरफ भगति हुई घुस गई, मैंने भी बाइक घुमाई और ऑफिस आ गया और काम करने लगा| ये मेरा रोज का काम था की शाम को जल्दी ऋतू को मिलने पहुँचो और ऋतू को हॉस्टल छोड़ के ऑफिस देर तक बैठो और फिर देर रात घर पहुँचो और बिना खाये-पीये सो जाओ! बॉस इसलिए कुछ नहीं कहता था की उसे काम कम्पलीट मिलता था पर मेरी कई बार रेल लग जाती थी!
 
update 11

जो बदलाव अब मैं ऋतू में देख रहा था वो ये था की वो अब उसका प्यार मेरे लिए अब कई गुना बढ़ चूका था| जब भी उसे टाइम मिलता तो वो कहीं छुप कर मुझे फ़ोन करती, व्हाट्स ऍप पर मैसेज करती रहती| रोज सुबह-सुबह उसका प्यार भरा मैसेज देख कर मैं उठता| तरह-तरह के हेयर स्टाइल बना कर उसका सेल्फी भेजना और मेरे पीछे पड़ जाना की मैं उसे सेल्फी भेजूँ! जब भी हम मिलते तो वो मेरा हाथ थाम लेती, और तरह-तरह की फोटो खींचती| कभी मुझे kiss करते हुए तो कभी पॉउट करते हुएऔर बहाने से मुझे Kiss करती| कभी इस पार्क में, कभी उस पार्क में, कभी किसी कैफ़े में और यहाँ तक की एक दिन उसने एक पुराने खंडर जाने की भी फरमाइश कर दी| ये खंडर प्रेमी जोड़ों के लिए जन्नत था क्योंकि यहाँ कोई आता-जाता नहीं था| जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ कोई जगह खाली नहीं थी पर ऋतू मेरा हाथ थामे मुझे खींच के अंदर और अंदर ले जा रही थी| उसे तो जैसे भूत-प्रेत का कोई डर ही नहीं था| अंदर पहुँच कर वो मेरी तरफ मुड़ी और अपनी बाहें मेरे इर्द-गिर्द लपेट ली| फिर वो अपने पंजो पर खड़ी हो गई और मेरे होठों पर Kiss कर दी| मेरे दोनों हाथ उसकी पीठ पर घूमने लगे थे और इधर ऋतू ने अपनी बाहें मेरे गले में डाल ली| हम अपने Kiss में इतना मग्न थे की आस-पास की कोई खबर ही नहीं थी| जब जेब में फ़ोन बजा तब जा के होश आया, फोन ऋतू के हॉस्टल से था जिसे देखते ही हम तुरंत बाहर आये और फटाफट हॉस्टल पहुँचे|

इस शनिवार हमें घर जाना था तो मैं सुबह-सुबह ऋतू को लेने हॉस्टल पहुँचा| रास्ते भर ऋतू मेरी पीठ से चिपकी रही और हमारा एक मात्र हॉल्ट वो ढाबा ही था जहाँ रुक कर हम चाय पीने लगे|

ऋतू: तो अब हम अपने रिश्ते को आगे कब ले कर जा रहे हैं?

मैं: आगे? मतलब?

ऋतू: 'वो'

मैं: वो सब शादी के बाद|

ऋतू: पर क्यों?

मैं: तुम प्रेग्नेंट हो गई तो?

ऋतू: ऐसा कुछ नहीं होगा|

मैं: ऋतू! मैं इस बारे में अब कोई बात नहीं करूँगा! नहीं मतलब नहीं! (मैंने गुस्से से कहा)

ऋतू: अच्छा ठीक है! पर आप आज रात को मेरे कमरे में तो आओगे आज? कितने दिनों बाद आज मौका मिला है|

मैं: पागल हो गई हो क्या? किसी ने देख लिया तो क्या होगा जानती हो ना?

ऋतू: कोई नहीं देखेगा| आप सब के सोने के बाद आ जाना|

मैं: नहीं!

ऋतू: मैं इंतजार करुँगी!

इतना कह कर वो टेबल से उठ गई और बाइक के पास जा कर खड़ी हो गई| मैं बिल भर के बाहर आया और बिना उससे कुछ बोले बाइक स्टार्ट की और हम फिर से हवा से बातें करते हुए घर की ओर चल दिए| रास्ते में ऋतू उसी तरह मुझसे चिपकी रही पर मैंने उससे और कोई बात नहीं की| हम घर पहुँचे और ऋतू ने सब के पैर छू के आशीर्वाद लिया और मैं सीधा अपने कमरे में घुस गया और बिस्तर पर पड़ गया| कुछ देर बाद ऋतू ऊपर आई और मेरे कमरे में झांकते हुए निकल गई| वो समझ गई थी की मैं उससे नाराज हूँ| उसी ने घर पर आज खाना बनाया और फिर सब के साथ बैठ के यहाँ-वहाँ की बातें चल ने लगी| हमेशा की तरह ऋतू भी कोने में बैठी बातें सुनती रही पर मेरा सर भन्ना रहा था सो मैं उठ के बाहर चला गया| कुछ ही दूर गया हूँगा की पीछे से संकेत की आवाज आई और फिर उस के साथ खेत पर बैठ कर माल फूँका| रात साढ़े आठ बजे घर घुसा तो घरवालों ने ताने मारने शुरू कर दिए की इतने दिन बाद आया है, ये नहीं की कुछ देर सब के साथ बैठ जाये| मैं बिना कुछ कहे ऊपर गया और तौलिया ले कर नीचे आ कर नहाया और ऊपर कमरे में टी-शर्ट डालने ही वाला था की मेरे नंगे जिस्म पर मुझे ऋतू ने पीछे से जकड लिया| उसकी उँगलियाँ मेरी छाती पर घूमने लगी थी, मैंने तुरंत ही उसे खुद से दूर किया; "दिमाग ख़राब है तेरा?" गुस्से से लाल मैंने टी-शर्ट पहनी और नीचे जा कर सब के साथ बैठ गया और बातों में ध्यान लगाने लगा|

रात के खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था और ऋतू में आये बदलावों के बारे में सोच रहा था| उसके जिस्म में भूख की ललक मुझे साफ़ नजर आ रही थी|तभी वहाँ ऋतू चुप-चाप आ कर खड़ी हो गई| नजरें झुकी हुई, हाथ बाँधे वो जैसे अपने जुर्म का इकरार कर रही हो| बचपन में जब भी उससे कोई गलती हो जाती थी तो वो इसी तरह खड़ी हो जाती थी और उस समय जब तक मैं उसे गले लगा कर माफ़ न कर दूँ उसके दिल को चैन नहीं आता था| 'ऋतू.... तू ये सब क्यों कर रही है? खुद पर काबू रखना सीख प्लीज! वरना सब कुछ खत्म हो जायेगा!" ये कहते हुए मैंने उसके सामने हाथ जोड़ दिए| जिसे देख उसकी आँख से आँसूं गिरने लगे| इस बात की परवाह किये बिना की हम घर पर हैं और कोई हमें देख लेगा मैंने ऋतू को कस कर अपने गले लगा लिया| मेरी बाहों में आते ही वो टूट के सुबकने लगी और बोली; "जानू.... मैं क्या करूँ? मुझसे ये दूरी बर्दाश्त नहीं होती| हम एक शहर में हो कर भी कभी दिल भर के मिल नहीं पाते| हमेशा हॉस्टल की घंटी या कोई साथ न देख ले वाला डर हमें एक दूसरे के करीब नहीं आने देता| आप जी तोड़ कोशिश करते हो की हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहे पर आपको अपनी नौकरी भी देखनी है| आप जब भी मिलते हो तो वो पल मैं आपके साथ जी भर के जीना चाहती हूँ इसलिए उन कुछ पलों में मैं सारी हदें तोड़ देती हूँ| जन्मदिन वाले दिन के बाद से तो आपके बिना एक पल को भी चैन नहीं आता! रात-रात भर तकिये को खुद से चिपकाए सोती हूँ, ये सोच कर की वो तकिया आपका जिस्म है जिसकी गर्मी से शायद मेरा जिस्म थोड़ा ठंडा पद जाए पर ऐसे कभी नहीं होता| पढ़ाई में भी मन नहीं लगता, किताब खोल कर बस आप ही के ख्यालों में गुम रहती हूँ| आपके जिस्म की गर्माहट को महसूस करने को हरपल बेताब रहती हूँ| प्लीज-प्लीज हम अभी क्यों नहीं भाग जाते? मैं आप के साथ एक पेड़ के नीचे रह लूँगी पर अब और आप से दूर नहीं रहा जाता|" उसकी बातें सुन कर उसके दिल का हाल मैं जान चूका था पर इस कोई इलाज नहीं था| अगर मेरा खुद के शरीर पर काबू है इसका मतलब ये तो नहीं तो की दूसरे का भी उसके शरीर पर काबू हो?

"जान! मैं समझ सकता हूँ तुम कैसा महसूस करती हो, और यक़ीन मनो मेरा भी वही हाल है पर हम दोनों को एक दूसरे पर काबू रखना होगा! हम अभी नहीं भाग सकते, बिना पैसों के हम बनारस तो क्या इस जिले के बहार नहीं जा सकते| हमें बहुत बड़ी लड़ाई लड़नी है और उसके लिए खुद पर काबू रखना होगा| मैं ये नहीं कहता की हम मिलना बंद कर दें, पर हमें जिस्मानी रिश्ते को रोकना होगा| ये Kissing, ये Hugging ..... इन सब पर काबू रखना होगा| जब मौका मिलेगा तब हम ये सब करेंगे और प्लीज Sex अभी नहीं! वो शादी के बाद!" इसके आगे मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋतू मुझसे अलग हो गई और सर झुकाये हुए बोली; "इससे तो अच्छा है की मैं जान ही दे दूँ!" ऋतू की आँखें से आँसूं थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे, मैंने आगे बढ़ कर उसके आँसू पोछने चाहे पर वो एकदम से मुड़ी और नीचे अपने कमरे में चली गई| मैं कुछ देर तक और छत पर टहलता रहा और सोचता रहा| घडी पर नजर डाली तो बारह बज रहे थे, मैं अपने कमरे की तरफ जाने लगा तो ऋतू के कमरे का दरवाजा खुला था| अंदर झाँका तो पाया ऋतू अब भी रो रही थी और अपने तकिये को अपनी छाती से चिपकाये हुए थी| पता नहीं क्यों पर बार-बार वो तकिये को चुम रही थी| शायद ये सोच रही होगी की वो तकिया मैं हूँ| तभी उसने करवट बदली पर इससे पहले वो मुझे देख पाती मैं दिवार की आड़ में छुप गया और वो करवट बदल के फिर से उसी तकिये को खुद से चिपकाये हुए प्यार करती रही| 15 मिनट तक मैं छुप कर उसे यूँ तकिये से लिपटे रोता देखता रहा पर मजबूर था क्योंकि अगर कोई घरवाला देख लेता तो?!!! मन मार के जैसे ही अपने कमरे में जाने को मुड़ा की नीचे से ताऊ जी की आवाज आई; "इतनी रात गए क्या कर रहा है?" ये सुनते ही मैं हड़बड़ा गया, शुक्र है की मैं ऋतू के कमरे में नहीं घुसा वरना आज सब कुछ खत्म हो जाता| "जी वो.... नींद नहीं आ रही थी इसलिए छत पर टहल रहा था|" मेरी आवाज सुनते ही ऋतू उठ के बहार आ गई और बिना कुछ बोले ही मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया| मैं भी उसके इस बर्ताव से चौंक गया और समझ गया की उसे बहुत बुरा लगा है| मैं अपना इतना सा मुँह ले कर अपने कमरे में आ गया और बिस्तर पर लेट गया पर नींद तनिक भी नहीं आई| घड़ियाँ गिन-गिन कर रात गुजारी और सुबह जब चलने का समय हुआ तो ऋतू अब भी खामोश थी| गाँव से कुछ दूर आने के बाद मैंने बाइक रोक दी और ऋतू को दोनों तरफ पैर कर के बैठने को कहा तो उसने मेरी ये बात भी अनसुनी कर दी| मजबूरन मुझे ऐसे ही बाइक चलानी पड़ी, ढाबे पर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी और ऋतू को चाय पीने चलने को कहा तो उसने फिर से मना कर दिया| अब मैंने जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ के खींचा और उसे ढाबे में ले गाय और जबरदस्ती चाय पिलाई| "जान! I'm Sorry!!! प्लीज मुझे माफ़ कर दो! मैं तुम्हें दुःख नहीं पहुँचाना चाहता था| तुम जो सजा दोगी वो मंजूर है पर प्लीज मुझसे बात करो!" मैंने ऋतू से की मिन्नतें की पर वो कुछ नहीं बोली| हमने चुप-चाप चाय पी और फिर हम वापस हाईवे पर आ गए, पर मैंने बाइक बजाये हॉस्टल की तरफ ले जाने के अपने घर की तरफ मोड़ दी| घर पहुँचने से पहले मैंने बाइक एक मेडिकल स्टोर के पास रोकी और कुछ दवाइयाँ ले कर वापस आया| "आपकी तबियत ख़राब है?" ऋतू ने चिंता जताते हुए पूछा| तो मैंने मुस्कुरा कर नहीं कहा और बाइक घर की तरफ घुमा दी| जैसे ही घर पहुँच कर मैंने बाइक रोकी तो ऋतू बड़ी हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी| मैंने उसे ऊपर कमरे की तरफ चलने को कहा और कमरे की चाभी भी उसे दे दी| मैंने बाइक नीचे पार्क की और घर फ़ोन कर दिया की हम घर पहुँच गए हैं, और साथ ही ऋतू के हॉस्टल में फ़ोन कर दिया की गाँव में कुछ काम है इसलिए मैं उसे कल हॉस्टल छोड़ दूँगा| फिर खाने के मैगी ली और सारा सामान ले कर मैं कमरे में आया| ऋतू खड़ी हो कर पीछे वाली खिड़की से बाहर कुछ देख रही थी| मुझे देखते ही वो बोली; "मुझे हॉस्टल कब छोड़ोगे?" मैंने ऋतू का हाथ पकड़ा और उसे खींच के पलंग के पास ले आया और बोला: "आज की रात और कल की दोपहर आप मेरे साथ गुजारोगे!" ये सुन के ऋतू बोली: "क्यों?"

"आपने कहा था ना आप का मन मेरे बिना नहीं लगता तो मैंने सोचा की क्यों न आपको इतना प्यार करूँ की आपको मेरी कमी कभी महसूस न हो|" ये सुन कर ऋतू ने मेरी तरफ पीठ कर दी और बोली; "मैं जानती हूँ ये आप सिर्फ मुझे खुश करने के लिए कर रहे हो| आपको ऐसा कुछ भी करने की जर्रूरत नहीं जिसके लिए आपका मन गवाही ना देता हो|" मैं ने ऋतू को पीछे से अपनी बाँहों में जकड़ा और उसके कान में फुसफुसाता हुआ बोला; "दिल से कह रहा हूँ|" इतना कह कर मैंने उसे गोद में उठा लिया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया और झुक कर ऋतू के होठों को चूम लिया| मेरे होंठ के स्पर्श से उसकी सारी कठोरता खत्म हो गई और उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द डाल दी और मेरे Kiss का जवाब देने लगी| मैंने अपने होंठ खोले के अपनी जीभ से उसके होठों को रगड़ा और फिर अपने दोनों होठों के भीतर उसके नीचे होंठ को भर के चूसने लगा| तभी ऋतू ने धीरे से मुझे खुद से दूर किया और बोली; "आप .... मुझे धोका तो नहीं दोगे ना?" मैंने ना में सर हिलाया| "पर एक शर्त है! वादा करो की पढ़ाई में ध्यान लगाओगे|"

"वादा करती हूँ जानू! पढ़ाई को ले कर आपके पास कोई शिकायत नहीं आएगी|" इतना कह के ऋतू ने अपनी बाहें फिर से मेरी गर्दन पर जकड़ दी और मुझे खींच के अपने ऊपर झुका लिया और अपनी जीभ से मेरी जीभ को छूने व चूसने लगी| उसके हाथ मेरी पीठ पर घूम रहे थे पर मेरे हाथ अभी भी मेरे वजन को संभाले हुए थे| मैं उठा और ऋतू की आँखों में देखते हुए अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा और वो भी उठ बैठी पर पलंग पर घुटनों के बल बैठ के मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों से थामा और फिर से मेरे होठों को बारी-बारी से चूसने लगी| मैंने अपनी कमीज उतारी पर ऋतू ने एक पल के लिए भी मेरे होठों को अपने मुँह से आजाद नहीं किया| मैंने ही अपने होठों को उससे छुड़ाया और कहा; "जान कपडे तो उतारो|" ये सुनते ही उसके गाल शर्म से लाल हो गए| मैं समझ गया की वो क्यों शर्मा रही है| मैंने खुद उसके सूट को उतारने के लिए हाथ आगे बढाए तो उसकी नजरें झुक गईं| मैंने धीरे से उसका सूट उतरा और ऋतू ने इसमें मेरा पूरा सहयोग दिया| अब वो मेरे सामने सिर्फ एक ब्रा में थी और शर्म से अब भी उसकी नजरें झुकी हुई थीं| मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ के ऊपर की और उसके गुलाबी होठों को चूमा और धीरे-धीरे उसे फिर से लिटा दिया और उसके ऊपर आ कर उसके होठों को चूसने लगा| उसका निचला होंठ बहुत फूला हुआ था, और हो भी क्यों ना पिछले कुछ महीनों से मैं जो उसका रसपान कर रहा था|लंड मियाँ पूरे जोश में आ कर बहार आने को बेताब थे पर ऋतू को तो जैसे Kiss करने से फुरसत ही नहीं थी| मैं भी कोई जल्दी नहीं दिखाना चाहता था इसलिए हम दोनों पिछले १५ मिनट से बस एक दूसरे को होठों को चूस और चाट ही रह थे| शायद ऋतू को भी मेरे लंड का एहसास होने लगा तो उसके हाथ अपने पा ही मेरे लंड महराज पर आ गए और वो धीर-धीरे से उसे सहलाने लगी| ऐसा लगा जैसे वो ये अनुमान लगा रही हो की मेरा लंड कितना बड़ा है| लंड को मिल रहे स्पर्श से उसमें तनाव बढ़ता ही जा रहा था और अब पैंट में कैद होने से दर्द हो रहा था| मैंने धीरे-धीरे अपने हाथ को सरका कर ऋतू की पिजामि के नाड़े पर रख दिया और अपनी उँगलियों से नाड़े का छोर ढूंढने लगा| ऋतू भी मेरी उँगलियों को अपनी नाभि के आस पास महसूस करने लगी थी और उसका जो हाथ अभी तक लंड को सहला रहा था वो अब मेरी बनियान के अंदर जा घुसा था और जैसे कुछ ढूंढ रहा था| आखिर मुझे नाड़े का छोर मिल ही गया और मैंने उसे धीरे-धीरे खींचना शुरू कर दिया| आखिर कर वो खुल गया और ऋतू की पजामी अब ढीली हो चुकी थी| मैंने अपना हाथ धीरे-धीरे अंदर सरकना शुरू कर दिया और इधर ऋतू के जिस्म में सिहरन शुरू हो गई थी| फिर मैं एक पल के लिए रुक गया और ऋतू के होठों को अपने होठों की पकड़ से आजाद करते हुए कहा; "जान! पहली बार बहुत दर्द होगा! मुझे कम पर तुम्हें बहुत ज्यादा होगा, खून भी निकलेगा!" ये सुन कर ऋतू थोड़ा डर गई|

"आपसे दूर रहने के दर्द से तो कम होगा ना?" ये कह कर उसने मुझे अपनी सहमति दी और मैंने मुस्कुरा कर उसके माथे को चूमा| मेरा हाथ उसकी पैंटी पर आ चूका था और मुझे उसके ऊपर से ही उस की बुर की गर्मी महसूस होने लगी थी| मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली को ऋतू की पैंटी के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया जिसके परिणाम स्वरुप ऋतू की सीत्कार निकल गई| आनंद से उसकी आँखें बंद हो चली थीं| मैंने अब अपना हाथ उसकी पैंटी से बहार निकाला और उसकी पजामी को पकड़ कर नीचे सरकाने लगा पर अब भी ऋतू ने अपनी आँख नहीं खोली थी| पजामी तो निकाल दी मैंने पर ऋतू की गुलाबी रंग की पैंटी ने मेरा मन मोह लिया| उसे देखते ही मन ही नहीं कर रहा था की उसे निकालूँ, ऊपर से ऋतू की माँसल जांघें मेरे लंड में कोहराम मचाने लगी थी| मैंने नीचे झुक कर ऋतू की नाभि के नीचे चूम लिया और अपने दोनों हाथों की उँगलियों को उसकी पैंटी में फँसा कर के उसे नीयकाल दिया और अब जो मेरे सामने थी उसे देख तो मेरा कलेजा धक कर के रह गया| एक दम गुलाबी और चिकनी बुर! उसके गुलाबी पट बंद थे और बुर की रक्षा कर रहे थे, उन्हें देखते ही मेरे मुँह में पानी आ गया! मैं उनपर झुक कर उन्हें चूमना चाहता था पर जैसे ही मेरी गर्म साँस ऋतू को अपने बुर पर महसूस हुई उसने ने अपने दोनों हाथों से मेरे चेहरे को थामा और अपने ऊपर आने को कहा| "जानू वो सब बाद में! पहले आप..." उसने बात अधूरी छोड़ दी पर मैं समझ गया की उसे सेक्स करना है ना की फोरप्ले! "जान. फोरप्ले अगर नहीं किया तो बहुत दर्द होगा| तुम बस रिलैक्स करो और इतने बरसों से जो मैं वीडियो देख कर जो ज्ञान अर्जित किया है उसे इस्तेमाल करने दो|" मेरी बात सुन कर हम दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई| तभी मैंने गौर किया की ऋतू की ब्रा तो मैंने निकाली ही नहीं| अब ये ऐसा काम था जो मैंने कभी किया नहीं था और ना ही इसके बारे में कोई ज्ञान मुझे वीडियो देखने से मिला था| मैंने ऋतू का हाथ पकड़ के उसे उठा के बिठाया और उसके होठों को चूसने लगा और अपने हाथ उसके पीछे ले जाकर ब्रा के हुक ढूंढने लगा| जब उँगलियों ने उन्हें ढूंढा तो ये दिक्का थी की उन्हें खोलने के लिए उसका सिरा कहाँ है? ऋतू मेरी ये नादानी समझ गई और उसने मेरे होठों से अपने होंठ छुड़ाए और अपने दोनों हाथ पीछे ले जा कर ब्रा के हुक खोल दिए| ब्रा ढीली हो गई बार अभी भी ऋतू के जिस्म से चिपकी हुई थी| मैंने धीरे से ऋतू की ब्रा को उसके सुनहरे जिस्म से अलग किया और पलंग से नीचे गिरा दिया| अपनी ब्रा को नीचे गिरते देख ऋतू कसमसाने लगी थी, मेरी नजर जब उसकी छाती पर पड़ी तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई| ऋतू के कोमल चुचुक मुझे उसे छूने को कह रहे थे, वो गुलाबी अरेओला ....सससस.....हाय! मैंने थोड़ा सा झुक कर ऋतू के बाएं चुचुक को अपने होठों से छुआ और अपनी जीभ से उसके छोटे से प्यार से निप्पल को छेड़ा तो ऋतू के मुँह सिसकारी निकल पड़ी| मैंने ऋतू के चेहरे पर देखा तो उसकी गर्दन पीछे की ओर झुकी हुई थी और आँखें बंद थी|

मैं उठ कर खड़ा हुआ और अपनी बेल्ट खोली और फिर पैंट के हुक खोलते ही वो नीचे जा गिरी, मेरे कच्छे पर बने उभार को ऋतू टकटकी बांधे देखती रही| मैं पलंग से उतरा और अपनी पैंट कुर्सी पर फेंकी और बैग से कुछ निकाल कर वापस ऋतू के पास आ गया| जब मैं लौटा तो ऋतू मुझे थोड़ी डरी सी दिखी; "क्या हुआ जान?!" मैंने उसके दाएं गाल को छूते हुए कहा| "आप उठ कर गए तो मुझे लगा आप मुझे छोड़के जा रहे हो!|" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो गई|

"जान मैं तो बस ये लेने गया था|" ये कहते हुए मैंने उसे कंडोम दिखाया| पहले तो ऋतू को समझ ही नहीं आया की मेरे हाथ में आखिर है क्या फिर जब उसने डिब्बे पे लिखा पढ़ा तो वो नाराज होते हुए बोली; "नहीं! आप इसे यूज़ नहीं करोगे! ये हमारा.... पहलीबार है.... और मुझे फील करना है....सब कुछ! मैं बाद में गर्भनिरोधक गोली ले लूँगी|" ये कहते हुए उसने मेरे हाथ से कंडोम का डिब्बा छीन लिया और दूर फेंक दिया| मैंने आगे उससे बहस करना ठीक नहीं समझा उल्टा मैं फिर से ऋतू के ऊपर आ गया और ऋतू की नाभि पर अपने होंठ रखे और ऋतू के मुँह से फिर से "सससस...'' आवाज निकली| अगला चुम्बन मैंने ऋतू की गुलाबी बुर की फाँकों पर किया तो उसके पूरे जिस्म में करंट दौड़ गया और उसके मुँह से फिर से सीत्कार फूट पड़ी| मैंने अपनी जीभ से ऋतू की बुर की फाँकों को कुरेदना शुरू कर दिया| ऐसा लगा मानो जीभ की नोक अपने लिए अंदर जाने का रास्ता बना रही हो| पर बुर के गुलाबी होंठ खुल ही नहीं रहे थे, तो मैंने जितना हो सके उतना मुँह खोला और ऋतू की बुर के ऊपर रख दिया| अपनी जीभ से मैंने फाँकों को जोर से कुरेदना शुरू कर दिया| आखिर फाँकों को मुझ पर तरस आ गया और अंगड़ाई लेते हुए मुझे बुर का छेद दिखाई दिया| बस फिर क्या था मैंने उस अध्खुली फाँक को अपने मुँह में भर के मैं यूज़ चूसने लगा| इधर ऋतू पर इसका बहुत मादक असर हुआ और उसके मुँह से बस सिसकारियाँ ही सिसकारियाँ फूटने लगी....."स्स्सस्स्स्स...स्स्सस्स्स्स.... ससससस आए ससससस हहहह स्स्सस्स्स्स!!!" ऋतू की सिसकारियाँ मेरे लिए प्रोत्साहन का काम कर रही थी और मैंने अपनी पूरी जीभ से बुर के द्वार को चाटना...चूसना...कुरेदना...शुरू कर दिया| ऋतू के दोनों हाथ मेरे सर के ऊपर थे और वो मेरे बालों में अपने हाथ फिराने लगी| अब मैंने अपने दोनों हाथ की उँगलियों से ऋतू के बुर के द्वार को खोला और अपनी जीभ जितनी हो सके उतनी अंदर डाल दी| जैसे ही जीभ अंदर घुसी ऋतू चिहुँक पड़ी; "सीईई ...!!!!" मैंने अपनी जीभ से ऋतू की बुर चुदाई शुरू कर दी और मेरे इस प्रहार से उसकी हालत ख़राब होने लगी थी| वो बार-बार मेरे सर का दबाव अपनी बुर पर बढ़ाती जा रही थी| "सससससस...ीसीसीसीसीसिस..... सीईई..... सीईई.... ईईई .... आआह्ह्हह्ह्ह्ह!!!" करते हुए वो झाड़ गई और हाँफते हुए निढाल हो कर रह गई| उसका सारा रस मैंने अपनी जीभ से चाट-चाट कर पी लिया था! आखिर मैं भी उसके ऊपर से उठ कर उसकी बगल में लेट गया| पिछले पाँच मिनट से मुँह खोल कर ऋतू की बुर चाटने से मुँह दर्द करने लगा था|

दो मिनट बाद जब ऋतू की सांसें नार्मल हुई तो वो करवट ले कर मेरी छाती पर अपना सर रख कर लेट गई| "जानू! आज मुझे पता चला की चरम सुख क्या होता है! थैंक यू!!!!" मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि उसे तो तृप्ति मिल गई थी पर मैं तो अभी भी प्यासा था| ऋतू शायद समझ गई तो उसका डायन हाथ मेरे लंड पर आ गया और वो उसे सहलाने लगी| अपने मुँह को खोल ऋतू ने मेरे दाएं निप्पल को मुँह में भर लिया जैसे शिकायत कर रही हो की क्यों मैंने अभी तक उसके स्तनों को प्यार नहीं किया? मैंने ऋतू के दाएं गाल को अपनी उँगलियों से सहलाया और उसके मुँह से अपने निप्पल को छुड़ाया और उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "जान......." मेरा बस इतना कहना था की वो मेरी बात समझ गई और मुझे उसके चेहरे पर डर की रेखा दिखने लगी| "डर लग रहा है?!" मैंने पूछा तो जवाब में ऋतू ने बस हाँ में सर हिला दिया| "मैं पूरी कोशिश करूँगा की मेरी जान को कम से कम दर्द हो|" सबसे पहले मैंने अपना कच्छा उतारा और ऋतू की टांगों को खोल कर उनके बीच घुटने मोड़ कर बैठ गया| मेरे फनफनाते हुए लंड को ऋतू एक टक बांधे घूर रही थी, जैसे की सोच रही हो की ये दानव मेरी छोटी सी बुर में कैसे घुसेगा?! मैंने बहुत सारा थूक अपने लंड पर चुपेड़ा और उसे धीरे से ऋतू की बुर के होठों पर छुआया| इतने भर से ही उसने अपनी आँखें कस के भीँचलि जैसे की उसे बहुत दर्द हुआ हो! इसलिए मैं बिना लंड अंदर डाले उसके ऊपर छा गया और उसके होठों को एक बार चूमा, तब जाके उसकी आँखें खुलीं| मैं समझ गया की लंड अंदर डालने से पहले मुझे ऋतू को थोड़ा उत्तेजित करना होगा| इसलिए मैं उसके जिस्म को चूमता हुआ उसके स्तनों पर आ गया और गप्प से उसके दाएं स्तन को अपने मुँह में भर लिया और अपनी जीभ से उसके निप्पल से छडने लगा| अपने दाएं हाथ से मैंने ऋतू के बाएं स्तन को धीरे दबाना शुरू कर दिया| अपनी उँगलियों से मैं ऋतू के बाएं निप्पल को दबाने लगा और उसके दाएं निप्पल को तो मैं ऐसे चूसने लगा था जैसे उस में से दूध निकल रहा हो| पाँच मिनट की चुसाई के बाद मैंने ऋतू के बाएं स्तन को भी ऐसे ही चूसा उसके छोटे से निप्पल को मैं दांतों से खींच रहा था और बीच-बीच में काट भी रहा था| ऋतू बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गई थी और अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरा लंड पकड़ के अपनी बुर की तरफ खींचने में लगी थी| मैंने जब उसके बाएं चुचुक को छोड़ा तो देखा उसके दोनों स्तन लाल हो चुके थे और उनपर मेरे दांतों के निशाँ साफ़ नजर आ रहे थे| मैंने और समय गँवाय बिना अपना लंड उसकी बुर के द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेला| मेरे लंड की चमड़ी चूँकि अभी भी बंद थी तो लंड अंदर नहीं गया पर इससे ऋतू को दर्द बहुत हुआ और उसने अपनी सर को बायीं तरफ झटक दिया| मैंने सोचा की बिना दम लगाए तो लंड अंदर जायेगा नहीं इसलिए मैंने अपनी कमर को पीछे किया और एक झटका मार के लंड अंदर डाला| मेरी इस हकात से मेरी और ऋतू दोनों की जान पर बन आई! मेरे लंड की चमड़ी एकदम से खुली और जलन से मेरी गांड फ़ट गई और उधर ऋतू के मुँह से जोरदार चींख निकली! "आआआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह.....मममममअअअअअ.....!!!" दर्द से दोनों का बुरा हाल था, मन तो कर रहा था की लंड बहार निकाल के लेट जाऊँ पर ये जानता था की ागलीबार और दर्द होगा| इसलिए मैंने ऋतू के होठों को अपने मुँह में भर लिया और उसकी पीड़ा उसके गले में ही रोक दी| ऋतू ने दर्द के मारे अपने नाखून मेरी नंगी पीठ में धंसा दिए और उनमें से खून भी निकल आया| नीचे लंड में दर्द और पीठ में जलन से मैं तड़प उठा| मैं इसी तरह से ऋतू के ऊपर अपना वजन दाल आकर लेटा रहा और उसके होठों को चुस्त रहा और उसके मुँह में अपनी जीभ घूमता रहा| करीब पाँच मिनट हुए और ऋतू ने अपने नाखून मेरी पीठ से निकाल दिए और अपने हाथ वापस पलंग पर रख दिए| उसी वक़्त मुझे मेरे लंड पर गर्म पानी का एहसास हुआ, मतलब की ऋतू झाड़ चुकी थी और वो निढाल होकर बिना कुछ बोले ही बिस्तर पर लाश की तरह पड़ी थी| मैंने ऋतू के होठों को छोड़ा और ऋतू के चेहरे की तरफ देखने लगा, ऋतू की आँखें बंद थी और उसके मस्तक पर पसीने की बूँदें थी| मैंने ऋतू के गाल को चूमा और उसे पुकारा; "जान!" तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म..." निकला|

"बहुत दर्द हो रहा है?" मैंने उसके माथे को चूमते हुए पूछा तो जवाब में बस उसके मुँह से "हम्म" निकला और दर्द की एक लकीर चेहरे पर आ गई| मेरा दिल भी उसके दर्द को महसूस कर रहा था इसलिए मैं ऋतू के ऊपर से हटने लगा, की तभी उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन में डाल के हटने नहीं दिया| "जान... आपको दर्द हो रहा है! रूक जाते हैं!" मैंने चिंता जताते हुए कहा| "नहीं...." वो बस इतना ही बोल पाई और मुझे अपने ऊपर से हटने नहीं दिया| मैंने ऋतू के माथे फिर से चूम लिया और उसने अपनी गर्दन ऊँची कर के अपने होंठ मेरे सामने कर दिए जैसे कह रही हो की आप गलत जगह को चूम रहे हो| मैंने ऋतू के होठों को चूसना शरू कर दिया, इसका असर अब ऋतू पर दिखने लगा था और जिस्म में अब हरकत होने लगी थी| उसका दर्द कुछ कम होने लगा था और उसकी उँगलियाँ अब मेरे सर के बालों में घूमने लगी थी| मैंने उसके होठों को छोड़ा और ऋतू के चेहरे पर देखा तो उसने अपनी आँख खोली और उसकी आँखें मुझे नम दिखाई दे रही थी| उसकी मूक सहमति से मैंने अपने लंड को धीरे से बाहर निकाला और फिर धीरे से अंदर किया तो ऋतू की कमर कांपने लगी और उसने कस के मुझे अपने आलिंगन में जकड लिया| उसकी दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपट चुकी थी और उनके दबाव से ये साफ़ था की ऋतू अब भी पूरी तरह तैयार नहीं है| पर मेरा सब्र अब जवाब देने लगा था, मेरे लंड में अब तनाव बहुत बढ़ चूका था ऊपर से चमड़ी खींचने की वजह से लंड में दर्द अभी था| मैंने फिर से ऋतू की तरफ देखा तो उसकी आँखें अब भी दर्द के मारे मीच राखी थी| "जान! प्लीज!!!!" मेरा इतना कहाँ था की उसने आँखें बंद किये हुए ही हाँ में गर्दन हिला दी| मैंने धीरे से अपनी कमर को पीछे खींचा और धीरे उसे अंदर-बहार करने लगा| ऋतू की बुर की गर्माहट बढ़ रही थी और उस गर्माहट से मेरे लंड को काफी आराम मिल रहा था| इसी तरह धीरे-धीरे करते हुए करीब दस मिनट हुए होंगे की मेरा ज्वालामुखी फूटने को तैयार था और मैं उसे बहार खींचने वाला था की ऋतू ने कस के अपने जिस्म को मेरे जिस्म से चिपका लिया और मुझे ऐसा करने नहीं दिया और हम दोनों ही साथ-साथ झड़े! झड़ते ही मैं पास्ट हो कर ऋतू के ऊपर गिरा और उसका भी हाल ख़राब ही था| करीब पाँच मिनट बाद मैं उसके ऊपर से उठ के उसकी बगल में लेट गया और अपने लंड और उसकी बुर की तरफ देखा| दोनों ही खून और हमारे कामरस से सने थे, खून तो काफी निकला था और दोनों ही की यौन अंग सूझ चुके थे| मेरे लंड के सुपडे के इर्द-गिर्द सूजन थी तो ऋतू की बुर मुझे सूजी हुई दिख रही थी| दस मिनट बाद में उठा और बाथरूम जा कर अपने लंड को पानी से हलके हाथ से धोया और वापस आकर जमीन पर नंगा ही बैठ गया| जमीन की ढंडक चप से चूतड़ों को ठंडा कर गई| मैं दिवार का सहारा ले कर दोनों टांगें खोल कर बैठ गया| ऋतू की तरफ देखा तो वो अब भी सो रही थी और इधर मेरे पेट में आवाजें आने लगी थीं| इसलिए में उठा और बैग से मैगी का पैकेट निकाला और बनाने लगा| मैगी की खुशबु से ऋतू की नींद खुल गई और उसने धीरे से आकर मुझे पीछे से अपनी बाँहों में जकड लिया| उसका नंगा जिस्म मेरी नंगी पीठ पर मह्सूस होते ही मैं पीछे मुड़ा और ऋतू के होंठों को चूम लिया| मैंने नोटिस किया की उसके होंठ भी थोड़े सूजे लग रहे थे|

ऋतू: जानू! आप क्यों बना रहे हो, मुझे बोल दिया होता तो मैं बना देती|

मैं: आज मैंने अपनी जान को बहुत दर्द दिया है, इसलिए सोचा आज मैं ही तुम्हें अपने हाथ से बना हुआ कुछ खिला दूँ|

ऋतू: दर्द तो आपको भी हुआ होगा ना? पर सच कहूँ तो आज अपने मुझे दुनिया भर की ख़ुशी एक साथ दे दी है! इसलिए आज तो मुझे आपकी सेवा करनी है, आखिर आज से आप मेरे पति जो हो गए हो!

मैं: चलो मुँह-हाथ धो कर आओ|

ऋतू हँसते हुए बाथरूम में चली गई और मैंने मग्गी एक ही प्लेट में परोस ली और प्लेट ले कर जैसे ही बिस्तर की तरफ घुमा की मुझे उस पर खून और हमारे कामरस का घोल पड़ा हुआ मिला| मैंने प्लेट टेबल पर राखी और चादर को बिस्तर से हटाया पर तब तक अभूत देर हो चुकी थी, मेरा गद्दा भी बीच में से लहू-लुहान हो चूका था! मैंने पंखा तेज चालु किया और जमीन पर ही प्लेट ले कर बैठ गया| ऋतू जब बाथरूम से आई तो मुझे नीचे बैठा देख हैरान हुई पर इससे पहले वो कुछ बोलती उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी और वहां खून देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई|

"हाय! इतना सारा खून! कुछ बचा भी मेरे जिस्म में या सब निकल गया?" ये सुन कर मुझे हँसी आ गई और मुझे हँसता देख ऋतू भी खिलखिलाकर हँस पड़ी| ऋतू भी मेरे सामने ही नंगी फर्श पर बैठ गई और ठन्डे फर्श की चपत जब उसके चूतड़ों पर लगी तो वो 'आह' कर के फिर हँसने लगी| हमने मैगी खाई और फिर ऋतू बर्तन उठा कर किचन में रखने चली गई और मैं उठ कर बाथरूम में हाथ-मुँह धोने चला गया| मैंने बाथरूम से ही ऋतू को आवाज दे कर दूसरी चादर बिछाने को कहा| ऋतू ने जैसे ही अलमारी से चादर निकाली उसे मेरी गांजे की पुड़िया दिखाई दे गई| उसे जरा भी देर नहीं लगी ये समझते हुए की ये गांजा है और जैसे ही मैं बाथरूम से निकला वो मुझे पुड़िया दिखाते हुए बोली; "ये क्या है?" उसके हाथ में पुड़िया देखते ही मेरी हवा खिसक गई| अब उससे झूठ तो बोल नहीं सकता था;

मैं: वो....गा...गांजा है! (मैंने सर झुकाये हुए कहा|)

ऋतू: आप गांजा पीते हो? (उसने हैरानी से पूछा|)

मैं: कभी-कभी...

ऋतू: क्यों पीते हो? (उसने गुस्सा करते हुए पूछा|)

मैं: वो... वो... कभी...टेंशन होती है तो.... थोड़ा....

ऋतू: टेंशन तो दुनियाभर में सब को है, तो क्या सब ये पीते हैं?

मैं: सॉरी!

ऋतू: कब से पी रहे हो आप?

मैं: कॉलेज...के ...

ऋतू: और इसके लिए पैसे कहाँ से आते थे?

मैं: वो... टूशन....देता... था...तो....

ऋतू: तो इस काम के लिए आप कॉलेज के दिनों में जॉब करते थे?

मैं:हाँ ...

ऋतू: मुझे कभी कुछ बताया क्यों नहीं? अगर आपको कोई बिमारी लग जाती तो?

मैं: सॉरी....मैं...मैं....

ऋतू: आज के बाद आप कभी भी इसे हाथ नहीं लगाओगे! समझे?

मैं: हाँ ...

ऋतू: खाओ मेरी कसम? (ऋतू मेरे पास आई और मेरा हाथ अपने सर पर रख कर मेरे जवाब का इंतजार करने लगी|)

मैं: मैं तुम्हारी कसम खता हूँ... आज के बाद कभी इसे हाथ नहीं लगाऊँगा!

ये सुन कर ऋतू ने वो पुड़िया कूड़े में फेंक दी और नाराज हो कर बिस्तर पर दूसरी चादर बिछाने लगी| मैं अपने हाथ बांधे सर झुकाये उसे देखता रहा| जब चादर बिछ गई तो ऋतू मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई और मेरी आँख में देखते हुए बोली; "और क्या-क्या शौक हैं आपके?"

"जी...कभी-कभी दारु भी पीता हूँ!" ये सुनते ही ऋतू की आँखें चौड़ी हो गईं और उसका गुस्सा फिर से लौट आया|

"मतलब अपनी जान देने की पूरी तैयारी कर रखी है आपने? आपको कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? ये कभी सोचा आपने?" ये कहते हुए उसकी आँखें नम हो आईं थी| "अरे जानू... मैं कोई रोज-रोज थोड़ी ही पीता हूँ? वो तो कभी कभार किसी पार्टी में या किसी के बर्थडे पर! चलो आई प्रॉमिस आज के बाद ये सब बंद! अब तो मुस्कुरा दो मेरी जान!" ये सुन कर ऋतू को तसल्ली हुई और उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई| घडी में 2:30 बजे थे, पेट भरा था और सेक्स से दिल भी भरा हुआ था तो अब बारी थी सोने की| मैंने हम दोनों के पहनने के लिए अलमारी से दो टी-शर्ट निकाली तो ऋतू कहने लगी; "क्या जर्रूरत है? हम दोनों ही तो हैं यहाँ!" तो मैंने टी-शर्ट वापस अंदर रख दी और हम दोनों एक दूसरे के आगोश में लेट गए|

मैं: जान! अब भी दर्द हो रहा है?

ऋतू: हम्म्म...थोड़ा-थोड़ा ... और आपको?

मैं: थोड़ा...

ऋतू का हाथ अपने आप ही मेरे लंड पर आ गया और वो अपनी उँगलियों से उसे सहलाने लगी| चुदाई की थकावट ऋतू पर असर दिखाने लगी थी आँखें बोझिल होने लगी और वो सो गई, पर मेरा मन अब भी प्यासा था| अब उसे उठाने का मन नहीं किया और इधर नींद में उसने अपने को और कस कर मेरे जिस्म से चिपका लिया और सो गई| मैं उसके दाएं गाल को सहलाता हुआ कब सो गया पता ही नहीं चला| जब आँख खुली तो साँझ हो चुकी थी और घडी सात बजा रही थी| मैं उठा तो ऋतू भी उठ गई और अपनी बाहें खोल कर उसने अंगड़ाई ली| ऋतू के स्तन अंगड़ाई लेने से आगे को निकल आये और मुझसे कण्ट्रोल नहीं हुआ तो मैंने उसके दाएं स्तन को चूम लिया| ऋतू की 'सीईई' निकल गई और उसने अपने दोनों हाथों से मेरे सर को अपने स्तन पर दबा दिया| मैंने अपनी जीभ से उसके पूरे स्तन को चाटा और उससे अलग हो कर खड़ा हो कर अंगड़ाई लेने लगा| मेरा मुँह ठीक ऋतू के सामने था और अभी ऋतू के स्तनपान के बाद लंड खड़ा हो गया था जो अंगड़ाई लेते समय ऋतू के सामने बिलकुल सीधा खड़ा था और उसे अपने पास बुला रहा था| मैंने जब ऋतू की तरफ देखा तो पाया वो मंत्रमुग्ध सी मेरे ही लंड को देख रही थी| मैंने एक चुटकी बजा कर उसकी तन्द्रा को भंग किया और जैसे वो किसी ख्यालों की दुनिया से बाहर आई हो वैसे मुझे देख कर मुस्कुरा दी| मैंने उसे अपना तौलिया दिया और नहाने को कहा तो उसने अदा के साथ वो तौलिया लिया और मेरा हाथ पकड़ के अंदर बाथरूम में खींच के ले जाने लगी| "जान! वहाँ इतनी जगह नहीं है की हम दोनों एक साथ नहा सकें|"

"जगह बन जाएगी, आप आओ तो सही|" उसने फिर से मेरा हाथ खींचा और मैं भी उसके साथ अंदर घुस गया| उसने इशारे से मुझे कमोड पर बैठने को कहा, खुद शावर का मुँह मेरी तरफ कर के चालु किया और आ कर मेरी गोद में बैठ गई| लंड मियां ऋतू के बुर के सम्पर्क में आते ही अकड़ के खड़े हो गए|पानी की बूंदें ऋतू के जिस्म पर ज्यादा और मेरे ऊपर कम पढ़ रही थी| ऋतू टकटकी बंधे मुझे देखे जा रही थी की तभी पानी की एक धार ऋतू के बालों से बहती हुई ठीक उसके निचले होंठ पर आ गई| ऋतू के गुलाबी होंठ उस पानी से पूरी तरह भीग पाते उससे पहले ही मैंने उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसा| ऋतू की उँगलियाँ मेरे बालों में चलने लगी थी और उसके भीतर भी आग दहकने लगी थी| मेरे लंड ने भी नीचे से धीरे-धीरे उसकी बुर पर थाप देना शुरू कर दिया था| ऋतू ने अपने होठों को मेरे होठों की गिरफ्त से छुड़ाया और सीढ़ी कड़ी होगी और फिर मेरे लंड को अपनी बुर के नीचे सेट किया और धीरे-धीरे अपनी बुर को मेरे लंड पर दबाने लगी पर जैसे ही थोड़ा सूपड़ा अंदर गया उसे दर्द होने लगा| दरसल उसकी बुर अभी अंदर से सूखी थी इसलिए वो फिर से कड़ी हो गई और अपने दाहिने हाथ में ढेर सारा थूक उसने चुपड़ा और मेरे लंड के सुपाड़ी पर अच्छे से लगा दिया और फिर धीरे-धीरे मेरे लंड पर अपनी बुर को रबाने लगी| इस बार लंड अंदर जाने लगा पर दर्द तो उसे अभी भी हो रहा था| वासना हम दोनों ही के अंदर भड़क चुकी थी और मुझसे उसका ये 'स्लो ट्रीटमेंट' बर्दाश्त नहीं हो रहा था| इसलिए मैंने भी नीचे से कमर को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाना शुरू कर दिया ताकि लंड जल्दी से अंदर चला जाए| लंड अभी आधा ही अंदर गया था की वो दर्द के मारे रूक गई और मेरी हालत तो ऐसे हो गई हो जैसे किसी ने गाला दबा कर साँस रोक दी हो| ऋतू की बुर ने कस के लंड को जकड लिया और जैसे वो उसे अंदर जाने से रोक रही हो और लंड मियाँ थे जो और अंदर जाना चाहते थे| "जान?!" मैंने ऋतू से मिन्नत करते हुए कहा तो उसने हाँ में गर्दन हिला कर मुझे खुद ही आगे बढ़ने की इज्जाजत दे दी| मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँ की ऋतू को ज्यादा दर्द न हो पर ये कमबख्त जिस्म वासना से जल रहा था इसलिए मैंने कुछ ज्यादा ही जोर से लंड अंदर पेल दिया और ऋतू की एक जोरदार चीख निकली; "आअह", उसने अपनी गर्दन दर्द के मारे पीछे की तरफ झटक दी| मैंने अपने दोनों हाथों को उसकी नंगी पीठ पर फिराया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया| दर्द के मारे उसकी आँख बंद हो चुकी थी और आंसुओं की लकीर बह निकली थी| पर लंड मियाँ इधर बुर की गर्मी में पिघलने लगे थे और मेरी कमर ने अपने आप ही ऋतू को ऊपर झटका देना शुरू कर दिया| ऋतू ने कस कर मेरे सर को अपनी छाती से दबा लिया और अपने हाथों को लॉक कर दिया जिससे मेरा सर हिल भी नहीं सकता था| दो-चार सेकंड बाद जब साँस लेने में दिक्कत होने लगी तो हाथों ने ऋतू की पीठ पर चलना शुरू किया और जैसे ही उँगलियों में उसके बाल आये तो मैंने उन्हें पीछे की तरफ खींचा| ऋतू की गर्दन पीछे की तरफ खींच गई और उसकी गिरफ्त मेरे सर के इर्द-गिर्द ढीली पड़ी| मैंने उसके बालों को अपनी ऊँगली से ढीला छोड़ा तब ऋतू ने अपनी आँखें खोली और मेरी आँखों में देख कर उसे जैसे होश आया हो| इधर मेरी कमर फिर से नीचे से धक्के देने लगी पर ऋतू ऊपर ज्यादा नहीं उठ रही थी| जब उसे इस बात का एहसास हुआ तो उसने खुद ही मेरे लंड पर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया| "ससससीई" कहते हुए उसने अपनी गति बढ़ा दी थी, माने अपने दोनों हाथों को उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस रखा था की कहीं वो गिर ना जाये| ऋतू पर अब चुदाई की खुमारी चढ़ने लगी थी और उसने अपने दोनों हाथों को अपने बालों में अदा के साथ फिराना शुरू कर दिया था| ऐसा करने से उसके स्तन उभर के बाहर आ गए थे और उन्हें देख मेरा सब्र जवाब देने लगा था|

पाँच मिनट और की ऋतू ने पानी बहाना शुरू कर दिया और वो तक कर मेरे सीने से लगने को आई| पर मैंने उसके दाहिने स्तन को पकड़ लिया और चूसने लगा| ऋतू ने मेरे सर को फिर से अपने स्तन पर दबाना शुरू कर दिया| उसकी उँगलियाँ फिर से मेरे सर पर रास्ता बनाने लगी और मैंने बारी-बारी से उसके दोनों स्तनों को चूसना और काटना शुरू कर दिया| पर मेरा लंड अब अकड़ कर चीखने लगा था और ऋतू तो जैसे थक कर अपना सारा वजन मुझ पर डाल कर पड़ी थी और अपने स्तनों को चुसवा कर मजे ले रही थी| मैंने अपने दोनों हाथों से ऋतू की कमर को कस कर पकड़ा और मैं उठ खड़ा हो गया और उसे दिवार से सटा कर अपने लंड को जोर से अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| ऋतू की दोनों टांगें मेरी कमर के इर्द-गिर्द टाइट हो चुकी थी और वो मेरे और दिवार के बीच दबी हुई थी| मेरी रफ़्तार बहुत तेज थी, इतनी तेज की ऋतू एक बार फिर झाड़ गई और उसने फिर से मुझे कस कर अपने से चिपका लिया पर मैंने अपने धक्के चालु रखे और अगले ही क्षण मैंने अपना सारा गाढ़ा रस उसकी बुर में बहा दिया और उसके ऊपर ही लुढ़क गया| शावर से आ रहे ठन्डे पानी मेरे सर पर पड़ रहा था जिसके कारण जिस्म ज्यादा थका नहीं था| मिनट भर बाद मैंने ऋतू की आँखों में देखा तो मुझे उसकी आँखों में संतुष्टि नजर आई, उसने धीरे से अपने पैरों को नीचे फर्श पर टिकाया और मैं उससे दूर हुआ| पर अगले ही पल उसने मेरा हाथ थामा और अपने पंजों पर खड़े हो कर मेरे होठों को चूम लिया और मुस्कुरा दी| फिर हम साथ नहाये, उसने मुझे और मैंने उसे साबुन लगाया और फिर शावर के नीचे नहा के हम दोनों बाहर आये| अब तो बड़ी जोर से भूख लगी थी इसलिए मैंने खाना आर्डर करना चाहा तो ऋतू ने मना कर दिया और खुद ही बिना कपडे पहने किचन में खाना बनाने लगी| मैंने ही एक टी-शर्ट निकाल कर उसे दी;

मैं: जान इसे पहन लो|

ऋतू: क्यों? मुझे बिना कपडे के देखना आपको पसंद नहीं?

मैं: तुम्हें ऐसे देख कर मेरा ईमान डोल रहा है|

ऋतू: हाय! सच्ची?

मैं: हाँजी!

ऋतू: डोलने दो! मैं तो आपकी ही हूँ| (ऋतू ने मुझे आँख मारते हुए कहा|)

ऋतू ने मेरी बात नहीं मानी खाना बनाने में लगी रही पर मेरा मन कहाँ मानने वाला था| मैं भी उसके पीछे सट के खड़ा हो गया और अपने दोनों हाथों को उसकी कमर से लेजाते हुए उसकी नाभि के ऊपर कस दिया| उसकी सुराही सी गर्दन मुझे चूमने के लिए बुला रही थी| मेरे दहकते होठों ने जैसे ही छुआ की ऋतू के मुँह से मादक सी सिसकारी निकल गई| "सससस...sssss .... आप जान ले कर रहोगे मेरी!" उसने मेरे हाथों को खोल कर आजाद होने की एक नाकाम कोशिश की पर मैं कहाँ मानने वाला था, मैं उसी तरह उसे अपनी बाँहों में कैसे हुए अपनी कमर को दाएँ-बाएँ हिलाने लगा और धीरे-धीरे नाचने लगा| ऋतू भी मेरा साथ देने लगी और उसने शेल्फ पर रखे अपने फ़ोन पर गाना चला दिया|

"तुझको मैं रख लूँ वहाँ

जहाँ पे कहीं है मेरा यकीं

मैं जो तेरा ना हुआ

किसी का नहीं

किसी का नहीं"

गाना सुनते-सुनते हम थिरकते रहे और ऋतू साथ-साथ खाना भी बनाती रही| रात नौ बजे तक मैं यूँ ही उसके जिस्म से अटखेलियाँ करता रहा और वो कसमसा कर रह जाती| आखिर खाना बना और ऋतू ने एक ही थाली में दोनों के लिए खाना परोसा और मुझे फर्श पर ही बैठने को कहा| मैं फर्श पर दिवार से सर लगा कर बैठा था, वो थाली पकडे मेरे सामने बैठ गई और मुझे अपने हाथ से कोर खिलाने लगी| मैंने भी उसे अपने हाथ से खिलाना शुरू कर दिया, खाना खा कर दोनों ही पलंग पर लेट गए| नींद तो आने वाली थी नहीं तो ऋतू ने कहा की उसे पोर्न मूवी देखनी है इसलिए मैंने उसे एक मूवी फ़ोन में चला कर दी| मैं दिवार का सहारा ले कर बैठा था और वो मेरे सीने पर सर रख कर बैठी थी| उस मूवी में लड़की के स्तन बहुत बड़े थे जिन्हें देख ऋतू को अपने स्तनों के अकार से निराशा हुई| उसके स्तनों का साइज 29 था और अब चूँकि मैं उसकी निराशा ताड़ गया था इसलिए मैंने मूवी रोक दी| "क्या हुआ जान?" तो उसने जवाब में अपना सर झुका लिया और अपने स्तनों को देखते हुए बोली; "आपको तो बड़े...... पसंद हैं.... और मेरे.... तो छोटे!" उसने अटक-अटक कर कहा| "मैंने तुमसे प्यार तुम्हारे इनके (उसके स्तनों को छूटते हुए) लिए नहीं किया|"

"सच?" उसकी आँखें चमक उठीं| "इन लड़कियों के बड़े इसलिए होते हैं क्योंकि इन्होने सर्जरी कराई है|" इतना कह के मैंने उसे थोड़ा ज्ञान बाँटा, पर सर्जरी का नाम सुन के जैसे वो हैरान हो गई| उसने फ़ोन साइड में रखा और और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं भी कराऊँ?" "बेबी! आपको ऐसा कुछ भी कराने की कोई जर्रूरत नहीं है! मैंने आपसे कहा ना की मैं आपसे प्यार करता हूँ| भगवन ने आपको जैसा भी बनाया है सुन्दर बनाया है और ये सर्जरी वगैरह करके इसकी सुंदरता ख़राब मत करो|" मेरा जवाब सुन कर वो संतुष्ट हो गई, उसे विश्वास होगया की मेरा प्यार सिर्फ उसके जिस्म तक सीमित नहीं है|
 
update 12

मैंने फिर से ऋतू को अपने आगोश में ले लिया और हम दोनों लेट गए| मैं पीठ के बल लेटा था और ऋतू मेरी तरफ करवट किये हुए थी, उसका बायाँ हाथ मेरी छाती पर था और वो मेरी शेव की हुई छाती पर अपनी उँगलियाँ चला रही थी| तभी उसने अपनी बायीं टांग उठा कर मेरे लंड पर रख दी और अचानक ही उसके मुँह से दर्द भरी 'आह' निकल गई| "क्या हुआ जान?!" मैंने चिंता जताते हुए उससे पूछा तो उसने मुस्कुरा कर ना में गर्दन हिला दी| मैं उठ बैठा और लाइट जला कर उसकी बुर की तरफ देखा तो पाया की वो बहार से सूज गई है| उसके कोमल पट सूजे हुए दिखे| जिस लड़की से मैं इतना प्यार करता हूँ, आज उसी को मैंने इतना दर्द दे दिया वो भी सिर्फ अपनी वासना में जल कर? ग्लानि से मेरा सर झुक गया तो ऋतू उठ बैठी और मेरे सर को अपने दोनों हाथों में थाम के ऊपर उठाया और बोली; "आपको क्या हुआ?"

"सॉरी! मेरी वजह से तुम्हें इतना दर्द हो रहा है|" इतना कह के मैंने शर्म से सर फिर झुका लिया| उसने फिर से मेरा सर ऊपर किया और मेरी आँखों में आँखें डाले बोलने लगी;"जानू! ये तो बस १-२ दिन में ठीक हो जायेगा, आप खामखा अपने को दोष ना दो|"
"ठीक है! अब तुम्हें दर्द दिया है तो दवा भी मैं ही करूँगा|" इतना कह कर मैं उठा और किचन में पानी गर्म करने लगा|
ऋतू: आप क्या कर रहे हो?
मैं: पानी गर्म कर रहा हूँ, उससे सेक देने से आराम मिलेगा|
ऋतू: रहने दो ना,आप मेरे पास लेटो|
मैं: आ रहा हूँ|
पानी थोड़ा गर्म हो चूका था, मैंने एक छोटा तौलिया लिया और रुई का एक टुकड़ा ले कर मैं वापस पलंग पर लौट आया| तौलिये को मैंने ऋतू की कमर के नीचे रख दिया ताकि पानी से बिस्तर गिला न हो जाये और फिर रुई को गर्म पानी में भिगो कर ऋतू के बुर की सिकाई करने लगा| इस सिकाई से उसे बहुत आराम मिला और उसने की बार मुझे रोका, ये कह के की उसे आराम मिल गया पर मैं फिर भी करीब दस मिनट तक उसकी बुर की सिकाई करता रहा| "बस बहुत हो गई सिकाई, अब मेरे पास आओ|" ये कहते हुए ऋतू ने अपनी बाहें खोल दीं और मैंने बर्तन नीचे रखा, उसे अपनी बाहों में भर कर लेट गया| हम इसी तरह सो गए पर रात के ग्यारह बजे होंगे की ऋतू चौंक कर उठ गई और हाँफने लगी| "क्या हुआ जान? कोई बुरा सपना देखा?" मैंने ऋतू से पूछा तो जवाब में वो कुछ नहीं बोली बल्कि अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक कर रोने लगी| मैंने उसके दोनों हाथों को उसके चेहरे से हटाया और उसके माथे पर चूमा और उसे अपने सीने से लगा लिया| करीब दो मिनट बाद उसका रोना बंद हुआ और उसने सुबकते हुए जो कहा उसे सुन मेरे होश उड़ गए; "आप.... मैंने ... बहुत बुरा....सपना...." ऋतू ने सुबकते हुए कहा| मैं तुरंत उससे अलग हुआ, कमरे की लाइट जलाई और उसके लिए पानी ले कर आया| पानी पीने के बाद उसने एक गहरी साँस ली और बोली;
ऋतू: मैंने सपना देखा की माँ मुझसे बदला लेने के लिए आपके साथ सेक्स कर रही है|
मैं: (चौंकते हुए) क्या? क्या बकवास कर रही है? तेरी माँ मतलब मेरी भाभी और भला हम दोनों ऐसा!? छी!
ऋतू: आपको नहीं पता पर एक रात मैं और माँ छत पर सो रहे थे| वो नींद में आपका नाम बड़बड़ा रही थी और तकिये को अपने से चिपकाए हुए कसमसा रही थी|
मैं: ये नहीं हो सकता?! पर .... पर ... हमारे बीच तो सीधे मुँह बात भी नहीं होती| तो सेक्स......
ऋतू: मुझे नहीं पता|
इतना कह कर ऋतू फिर से रोने लगी| "ऐसा कभी नहीं होगा! मैं तुझसे प्यार करता हूँ और भाभी मेरे साथ कभी भी वो सब करने में कामयाब नहीं होगी|" मैंने ऋतू को फिर से अपने गले लगा लिया और उसकी पीठ सहला कर उसे चुप कराने लगा|ऋतू का सुबकना कम हुआ तो हम दोनों लेट गए पर अगले ही पल वो मुझसे कस के चिपक गई, जैसे की उसे डर हो के सच में कोई मुझे उससे चुरा लेगा| इधर मेरे दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी की भाभी भला मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच सकती हैं? मैंने तो कभी भाभी को इस नजर से नहीं देखा? हम दोनों के बीच तो कभी सीधे मुँह बात भी नहीं हुई? तभी मुझे संकेत की बात याद आई जब उसने भाभी को 'माल' कहा था| क्या भाभी के गैर मर्दों के साथ रिश्ते हैं? ये सभी सोचते-सोचते दिमाग जोर से चलने लगा था, अब अगर ऋतू नहीं होती तो मैं गांजा पीता और इस टेंशन से बाहर निकल जाता| पर अब तो उसे वादा कर चूका था तो तोड़ता कैसे? इसलिए ऐसे ही चुप-चाप बिस्तर पर पड़ा रहा| न जाने कैसे शायद ऋतू ने मेरी चिंता भाँप ली और उसने अपनी गर्दन मेरे बाजू पर से उठाई और मेरे होठों को चूम लिया| उसके इस चुंबन से मेरा ध्यान भाभी से हटा, पर ये बहुत छोटा सा चुंबन था| शायद आज की दमदार सेक्स के बाद वो काफी तक चुकी थी| मेरे आगोश में आते ही उसकी आँख लग गई और वो चैन की नींद सो गई| इधर ऋतू के जिस्म की भीनी खुशबु और उसे आज सकूँ से प्यार करने के बाद मैं भी सो गया|
 
update 13

रात के एक बजे थे, खिड़की से आ रही चांदनी की रौशनी कमरे में फैली हुई थीकी तभी ऋतू बाथरूम से आई तो उसने पाया की मेरा लंड एक दम कड़क हो चूका है और छत की तरफ मुँह कर के सीधा खड़ा है और फुँफकार रहा है| दरअसल मैं उस समय कोई सेक्सी सपना देख रहा था जिस कारन लंड मियाँ अकड़ चुके थे| पता नहीं उसे क्या सूजी की वो मेरी टांगों के बीच आ गई और घुटने मोड़ के बैठ गई| मेरे लंड को निहारते हुए वो ऊपर झुकी और धीरे-धीरे अपना मुँह खोले हुए वो नीचे आने लगी| सबसे पहले उसने अपनी जीभ की नोक से मेरे लंड को छुआ और मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए मेरी तरफ देखने लगी| जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने अपने मुँह को थोड़ा खोला और आधा सुपाड़ा अपने मुँह में भर के चूसा| ''सससससस''' नींद में ही मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई| उसने धीरे-धीरे पूरा सुपाड़ा अपने मुँह के भीतर ले लिया और रुक गई| "ससस...अह्ह्ह..." अब ऋतू से और नीचे जाय नहीं रहा था तो उसने आधा सूपड़ा ही अपने मुँह के अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया| इधर मैं नींद में था और मेरे सपने में भी ठीक वही हो रहा तह जो असल में ऋतू मेरे साथ कर रही थी| पर ऋतू को अभी ठीक से लंड चूसना नहीं आया था, उसके मुँह में होते हुए भी मेरा लंड अभी तक सूखा था| जबकि उसे तो अभी तक अपने थूक और लार से मेरे लंड को गीला कर देना चाहिए था| पूरे दस मिनट तक वो बेचारी बीएस इसी तरह अपने होठों से मेरे लंड को अपने मुँह में दबाये हुए ऊपर-नीचे करती रही और अंत में जब मेरा गर्म पानी निकला तो मेरी आँख खुली और ऋतू को देख मैं हैरान रह गया| मेरा सारा रस उसके मुँह में भर गया था और वो भागती हुई बाथरूम में गई उसे थूकने| मैं अपनी पीठ सिरहाने से लगा कर बैठ गया और जैसे ही ऋतू बहार आई उसकी नजरें झुक गई| तो जान! ये क्या हो रहा था? आपके साथ तो मैं बिना कपडे के भी नहीं सो सकता?!" मैंने ऋतू को छेड़ते हुए कहा| वो एक दम से शर्मा गई और पलंग पर आ कर मेरे सीने पर सर रख कर बैठ गई| "वो न..... जब मैं उठी तो..... आपका वो...... मुझे देख रहा था!" ऋतू ने शर्माते हुए मेरे लंड की तरफ ऊँगली करते हुए कहा|

मैं: देख रहा था मतलब? इसकी आँख थोड़े ही है?

ऋतू: ही..ही...ही... पता नहीं पर उसे देखते ही मैं .... जैसे मैं अपने आप ही ..... (इसके आगे वो कुछ बोल नहीं पाई और शर्मा के मेरे सीने में छुप गई|)

मैं: चलो अब सो जाओ वरना अभी थोड़ी देर में फिर से आपको देखने लगा|

ये सुनते ही ऋतू के गाल लाल हो गए और हम दोनों फिर से एक दूसरे की बाहों में लेट गए और चैन से सो गए| सुबह मेरी नींद चाय की खुशबु सूंघ कर खुली और मैंने उठ के देखा तो ऋतू किचन में चाय छान रही थी| मैं पीछे से उसके जिस्म से सट कर खड़ा हो गया और अपनी बाँहों को उसके नंगे पेट पर लोच करते हुए उसकी गर्दन पर चूमा| "Good Morning जान!"

"सससस....आज तो वाकई मेरी Morning Good हो गई|" ऋतू ने सिसकते हुए कहा|

ऋतू: काश की रोज आप मुझे ऐसे ही Good Morning करते?

मैं: बस जान.... कुछ दिन और|

ऋतू: कुछ साल ...दिन नहीं|

मैं: ये साल भी इसी तरह प्यार करते हुए निकल जायेंगे|

ऋतू: तभी तो ज़िंदा हूँ|

इतना कह कर ऋतू मेरी तरफ मुड़ी और अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी और अपने पंजों पर खड़ी हो कर मेरे होंठों को चूम लिया| मैंने अपनी दोनों हाथों से उसकी कमर को जकड़ लिया और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया|

मैंने घडी देखि तो नौ बज गए थे और मुझे 11 बजे ऋतू को हॉस्टल छोड़ना था तो मैंने उससे नाश्ते के लिए पूछा| ऋतू उस समय बाथरूम में थी और उसने अंदर से ही कहा की वो बनाएगी| जब ऋतू बहार आई तो वो अब भी नंगी ही थी;

मैं: जान अब तो कपडे पहन लो?

ऋतू: क्यों? (हैरानी से)

मैं: हॉस्टल नहीं जाना?

ये सुनते ही ऋतू का चेहरा उतर गया और उसका सर झुक गया| मुझसे उसकी ये उदासी सही नहीं गई तो मैंने जा कर उसे अपने गले से लगा लिया और उसके सर को चूमा|

ऋतू: आज भर और रुक जाऊँ? (उसने रुनवासी होते हुए कहा|)

मैं: जान! समझा करो?! देखो आपको कॉलेज भी तो जाना है?

ऋतू: आप उसकी चिंता मत करो मैं साड़ी पढ़ाई कवर अप कर लूँगी|

मैं: और मेरे ऑफिस का क्या? आज की भी मुझे पूरे दिन की छुट्टी नहीं मिली|

ऋतू के आँख में फिर से आँसूँ आ गए थे| अब मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटाया और मैं भी उसकी बगल में लेट गया|

मैं: अच्छा तू बता मैं ऐसा क्या करूँ की तुम्हारे मुख पर ख़ुशी लौट आये?

ऋतू: आज का दिन हम साथ रहे|

मैं: जान वो पॉसिबल नहीं है, वरना मैं आपको मना क्यों करता?

ऋतू फिर से उदास होने लगी तो मैंने ही उसका मन हल्का करने की सोची;

मैं: अच्छा मैं अगर तुम्हें अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाऊँ तब तो खुश हो जाओगी ना?

ऋतू: (उत्सुकता दिखाते हुए) क्या?

मैं: भुर्जी खाओगी?

ऋतू: Hawwwwww ... आप अंडा खाते हो? घर में किसी को पता चल गया न तो आपको घर से निकाल देंगे!

मैं: मेरे हाथ की भुर्जी खा के तो देखो!

ऋतू: ना बाबा ना! मुझे नहीं करना अपना धर्म भ्रस्ट|

मैं: ठीक है फिर बनाओ जो बनाना है| इतना कह कर मैं बाथरूम में घुस गया और नहाने लगा| नाहा-धो के जब तक मैं ऑफिस के लिए तैयार हुआ तब तक ऋतू ने प्याज के परांठे बना के तैयार कर दिए| पर उसने अभी तक कपडे नहीं पहने थे, मुझे भी दिल्लगी सूझी और मैं ने उसे फिर से पीछे से पकड़ लिया और उसकी गर्दन को चूमने लगा|

ऋतू: इतना प्यार करते हो फिर भी एक दिन की छुट्टी नहीं ले सकते| शादी से पहले ये हाल है, शादी के बाद तो मुझे time ही नहीं दोगे|

मैं: शादी के बाद तो तुम्हें अपनी पलकों अपर बिठा कर रखूँगा| मजाल है की तुम से कोई काम कह दूँ!

ऋतू: सच?

मैं: मुच्!

हमने ख़ुशी-ख़ुशी नाश्ता खाया और वही नाश्ता ऋतू ने पैक भी कर दिया| फिर मैंने उसे पहले उसके कॉलेज छोड़ा और उसके हॉस्टल फ़ोन भी कर दिया की ऋतू कॉलेज में है| फ़टाफ़ट ऑफिस पहुँचा और काम में लग गया| शाम को फिर वही 4 बजे निकला, ऋतू के कॉलेज पहुँचा और मुझे वहाँ देख कर वो चौंक गई| वो भाग कर गेट से बाहर आई और बाइक पर पीछे बैठ गई, हमने चाय पी और फिर उसे हॉस्टल के गेट पर छोड़ा|

अगले दिन सुबह-सुबह ऑफिस पहुँचते ही बॉस ने मुझे बताया की हमें शाम की ट्रैन से मुंबई जाना है| ये सुनते ही मैं हैरान हो गया; "सर पर अमिस ट्रेडर्स की GST रिटर्न पेंडिंग है!"

"तू उसकी चिंता मत कर वो अंजू (बॉस की बीवी) देख लेगी|" बॉस ने अपनी बीवी की तरफ देखते हुए कहा| ये सुन कर मैडम का मुँह बन गया और इससे पहले मैं कुछ बोलता की तभी ऋतू का फ़ोन आ गया और मैं केबिन से बाहर आ गया|

मैं: अच्छा हुआ तुमने फ़ोन किया| मुझे तुम्हें एक बात बतानी थी, मुझे बॉस के साथ आज रात की गाडी से मुंबई जाना है|

ऋतू: (चौंकते हुए) क्या? पर इतनी अचानक क्यों? और.... और कब आ रहे हो आप?

मैं: वो पता नहीं... शायद शनिवार-रविवार....

ये सुन कर वो उदास हो गई और एक दम से खामोश हो गई|

मैं: जान! हम फ़ोन पर वीडियो कॉल करेंगे... ओके?

ऋतू: हम्म...प्लीज जल्दी आना|
 
update 14

ऋतू बहुत उदास हो गई थी और इधर मैं भी मजबूर था की उसे इतने दिन उससे नहीं मिल पाउँगा| मैं आ कर अपने डेस्क पर बैठ गया और मायूसी मेरे चेहरे से साफ़ झलक रही थी| थोड़ी देर बाद जब अनु मैडम मेरे पास फाइल लेने आईं तो मेरी मायूसी को ताड़ गईं| "क्या हुआ मानु?" अब मैं उठ के खड़ा हुआ और नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाके उनसे बोला; "वो मैडम ... दरअसल सर ने अचानक जाने का प्लान बना दिया| अब घर वाले ..." आगे मेरे कुछ बोलने से पहले ही मैडम बोल पड़ीं; "चलो इस बार चले जाओ, अगली बार से मैं इन्हें बोल दूँगी की तुम्हें एडवांस में बता दें| अच्छा आज तुम घर जल्दी चले जाना और अपने कपडे-लत्ते ले कर सीधा स्टेशन आ जाना|" तभी पीछे से सर बोल पड़े; "अरे पहले ही ये जल्दी निकल जाता है और कितना जल्दी भेजोगे?" सर ने ताना मारा| "सर क्या करें इतनी सैलरी में गुजरा नहीं होता| इसलिए पार्ट टाइम टूशन देता हूँ|" ये सुनते ही मैडम और सर का मुँह खुला का खुला रह गया| सर अपना इतना सा मुँह ले कर वापस चले गए और मैडम भी उनके पीछे-पीछे सर झुकाये चली गईं| खेर जैसे ही 3 बजे मैं सर के कमरे में घुसा और उनसे जाने की अनुमति माँगी| "इतना जल्दी क्यों? अभी तो तीन ही बजे हैं?" सर ने टोका पर मेरा जवाब पहले से ही तैयार था| "सर कपडे-लत्ते धोने हैं, गंदे छोड़ कर गया तो वापस आ कर क्या पहनूँगा?" ये सुनते ही मैडम मुस्कुराने लगी क्योंकि सर को मेरे इस जवाब की जरा भी उम्मीद नहीं थी| "ठीक है...तीन दिन के कपडे पैक कर लेना और गाडी 8 बजे की है, लेट मत होना|" मैंने हाँ में सर हिलाया और बाहर आ कर सीधा ऋतू को फ़ोन मिलाया पर उसने उठाया नहीं क्योंकि उसका लेक्चर चल रहा था| मैं सीधा उसके कॉलेज की तरफ चल दिया और रेड लाइट पर बाइक रोक कर उसे कॉल करने लगा| जैसे ही उसने उठाया मैंने उसे तुरंत बाहर मिलने बुलाया और वो दौड़ती हुई रेड लाइट तक आ गई|

बिना देर किये उसने रेड लाइट पर खड़ी सभी गाडी वालों के सामने मुझे गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगी| मैंने अब भी हेलमेट लगा रखा था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुप कराने लगा| "जान... मैं कुछ दिन के लिए जा रहा हूँ| सरहद पर थोड़े ही जा रहा हूँ की वापस नहीं आऊँगा?! मैं इस संडे आ रहा हूँ... फिर हम दोनों पिक्चर जायेंगे?" मेरे इस सवाल का जवाब उसने बीएस 'हम्म' कर के दिया| मैंने उसे पीछे बैठने को कहा और उसे अपने घर ले आया, वो थोड़ा हैरान थी की मैं उसे घर क्यों ले आया पर मैंने सोचा की कम से कम मेरे साथ अकेली रहेगी तो खुल कर बात करेगी| वो कमरे में उसी खिड़की के पास जा कर बैठ गई और मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया और उसकी गोद में सर रख दिया| ऋतू ने मेरे सर को सहलाना शुरू कर दिया और बोली;

ऋतू: संडे पक्का आओगे ना?

मैं: हाँ ... अब ये बताओ क्या लाऊँ अपनी जानेमन के लिए?

ऋतू: बस आप आ जाना, वही काफी है मेरे लिए|

उसने मुस्कुराते हुए कहा और फिर उठ के मेरे कपडे पैक करने लगी| मैंने पीछे से जा कर उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया| मेरे जिस्म का एहसास होते ही जैसे वो सिंहर उठी| मैंने ऋतू की नंगी गर्दन पर अपने होंठ रखे तो उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जा कर जकड़ लिया| हालाँकि उसका मुँह अब भी सामने की तरफ था और उसकी पीठ मेरे सीने से चुपकी हुई थी| आगे कुछ करने से पहले ही मेरे फ़ोन की घंटी बज उठी और मैं ऋतू से थोड़ा दूर हो गया| जैसे ही मैं फ़ोन ले कर पलटा और 'हेल्लो' बोला की तभी ऋतू ने मुझे पीछे से आ कर जकड़ लिया| उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ा की उसके जिस्म में जल रही आग मेरी पीठ सेंकने लगी| "सर मैं आपको अभी थोड़ी देर में फ़ोन करा हूँ, अभी मैं ड्राइव कर रहा हूँ|" इतना कह कर मैंने फ़ोन पलंग पर फेंक दिया और ऋतू की तरफ घूम गया| उसे बगलों से पकड़ कर मैंने उसे जैसे गोद में उठा लिया| ऋतू ने भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लिया और मेरे होठों को चूसने लगी| मैंने अपने दोनों हाथों को उसके कूल्हों के ऊपर रख दिया ताकि वो फिसल कर नीचे न गिर जाए| ऋतू मुझे बेतहाशा चुम रही थी और मैं भी उसके इस प्यार का जवाब प्यार से ही दे रहा था| मैं ऋतू को इसी तरह गोद में उठाये कमरे में घूम रहा था और वो मेरे होठों को चूसे जा रही थी| शायद वो ये उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अब पलंग पर लिताऊँगा, पर मेरा मन बस उसके साथ यही खेल खेलना चाहता था|

ऋतू: जानू...मैं आपसे कुछ माँगूँ तो मन तो नहीं करोगे ना? (ऋतू ने चूमना बंद किया और पलकें झुका कर मुझ से पूछा|)

मैं: जान! मेरी जान भी मांगोंगे तो भी मना नहीं करूँगा| हुक्म करो!

ऋतू: जाने से पहले आज एक बार... (इसके आगे वो बोल नहीं पाई और शर्म से उसने अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लिया|)

मैं: अच्छा जी??? तो आपको एक बार और मेरा प्यार चाहिए???
ये सुन कर ऋतू बुरी तरह झेंप गई और अपने चेहरे को मेरी छाती में छुपा लिया| अब अपनी जानेमन को कैसे मना करूँ?
 
update 15 (1)

मैंने ऋतू को गोद में उठाये हुए ही उसे एक खिड़की के साथ वाली दिवार के साथ लगा दिया| ऋतू ने अपने हाथ जो मेरी पीठ के इर्द-गिर्द लपेटे हुए थे वो खोल दिए और सामने ला कर अपने पाजामे का नाडा खोला| मैंने भी अपने पैंट की ज़िप खोली और फनफनाता हुआ लंड बाहर निकाला| ऋतू ने मौका पाते ही अपनी दो उँगलियाँ अपने मुँह में डाली और उन्हें अपने थूक से गीला कर अपनी बुर में डाल दिया| मैंने भी अपने लंड पर थूक लगा के धीरे-धीरे ऋतू की बुर में पेलने लगा| अभी केवल सुपाड़ा ही गया होगा की ऋतू ने खुद को मेरे जिस्म से कस कर दबा लिया, जैसे वो चाहती ही ना हो की मैं अंदर और लंड डालूँ| दर्द से उसके माथे पर शिकन पड़ गई थी, इसलिए मैं ने उसे थोड़ा समय देते हुए उसके होठों को चूसना शुरू कर दिया| जैसे ही मैंने अपनी जीभ ऋतू के मुँह में पिरोई की उसने अपने बदन का दबाव कम किया और मैं ने भी धीरे-धीरे लंड को अंदर पेलना शुरू किया| ऋतू ने मेरी जीभ की चुसाई शुरू कर दी थी और नीचे से मैंने धीरे-धीरे लंड अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया था| पाँच मिनट हुए और ऋतू का फव्वारा छूट गया और उसने मुझे फिर से कस कर खुद से चिपटा लिया| पाँच मिनट तक वो मेरे सीने से चिपकी रही और अपनी उखड़ी साँसों पर काबू करने लगी| मैंने उसके सर को चूमा तो उसने मेरी आँखों में देखा और मुझे मूक अनुमति दी| मैंने धीरे-धीरे लंड को अंदर बहार करना चालू किया और धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगा| ऋतू की बुर अंदर से बहुत गीली थी इसलिए लंड अब फिसलता हुआ अंदर जा रहा था| दस मिनट और फिर हम दोनों एक साथ झड़ गए| ऋतू ने फिर से मुझे कस कर जकड़ लिया और बुरी तरह हाँफने लगी| उसे देख कर एक पल को तो मैं डर गया की कहीं उसे कुछ हो ना जाये| मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और कुर्सी पर बिठाया और उसके लिए पानी ले आया| पानी का एक घूँट पीते ही उसे खाँसी आ गई तो मैंने उसकी पीठ थप-थापाके उस की खाँसी रुक वाई| "क्या हुआ जान? तुम इतना हाँफ क्यों रही हो? कहीं ये आई-पिल का कोई रिएक्शन तो नहीं?" मैंने चिंता जताते हुए पूछा|

"ओह्ह नो! वो तो मैं लेना ही भूल गई!" ऋतू ने अपना सर पीटते हुए कहा|

"पागल है क्या? वो गोली तुझे 72 घंटों में लेनी थी! कहाँ है वो दवाई?" मैंने उसे डाँटते हुए पूछा तो उसने अपने बैग की तरफ इशारा किया| मैंने उसका बैग उसे ला कर दिया और वो उसे खंगाल कर देखने लगी और आखिर उसे गोलियों का पत्ता मिल गया और मैंने उसे पानी दिया पीने को| पर मेरी हालत अब ख़राब थी क्योंकि उसे 72 घंटों से कुछ ज्यादा समय हो चूका था| अगर गर्भ ठहर गया तो??? मैं डर के मारे कमरे में एक कोने पर जमीन पर ही बैठ गया| ऋतू उठी अपने कपडे ठीक किये और मेरे पास आ गई और मेरी बगल में बैठ गई| "कुछ नहीं होगा जानू! आप घबराओ मत!" उसने अपने बाएं हाथ को मेरे कंधे से ले जाते हुए खुद को मुझसे चिपका लिया|
 
update 15 (2)

मेरी आँखें नम हो चलीं थीं, पर आंसुओं को मैंने बाहर छलकने नहीं दिया और खुद को संभालते हुए मैं उठ के खड़ा हुआ और बाथरूम में मुँह धोने घुसा| जब बाहर आया तो ऋतू मायूस थी; "जानू! आप मुझसे नाराज हो?" मैंने ना में सर हिलाया तो वो खुद आ कर मेरे गले लग गई| आगे हम कुछ बात करते उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया और वो मुझसे कुछ पूछने लगे| इधर ऋतू ने मेरे बैग में कपडे सेट कर के रख दिए थे और खाने के लिए सैंडविच बना रही थी| बॉस से बात कर के मैं वहीँ पलंग पर बैठ गया और मन ही मन ये उम्मीद करने लगा की ऋतू अभी गर्भवती ना हो जाये| मेरी चिंता मेरे चेहरे से झलक रही थी तो ऋतू मेरे सामने हाथ बांधे कड़ी हो गई और मेरी तरफ बिना कुछ बोले देखने लगी| मैं अपनी चिंता में ही गुम था और जब मैंने पाँच मिनट तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो वो मेरे नजदीक आई, अपने घुटने नीचे टिका कर बैठी और मेरी ठुड्डी ऊपर की| "क्यों चिंता करते हो आप? कुछ नहीं होगा! आप बस जल्दी आना, मैं यहाँ आपका बेसब्री से इंतजार करुँगी|" इतना कह कर उसने मेरे होठों को चूमा और मेरे निचले होंठ को चूसने लगी| मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला और ऋतू के होठों को चूसने लगा| दो मिनट बाद मैं उठ खड़ा हुआ, अपने कपडे बदले और फिर ऑटो कर के पहले ऋतू को हॉस्टल छोड़ा| फिर उसी ऑटो में मैं स्टेशन आ गया, पर ऋतू मेरी चिंता भाँप गई थी इसलिए उसने आधे घंटे बाद ही मुझे कॉल कर दिया| पर ये कॉल उसने अपने मोबाइल से नहीं बल्कि मोहिनी के नंबर से किया था;

मैं: हेल्लो?

ऋतू: आप पहुँच गए स्टेशन?

मैं: हाँ... बस अभी कुछ देर हुई|

ऋतू: अकेले हो? कुछ बात हो सकती है?

मैं: हाँ बोलो?

ऋतू: वो मुझे आपसे कुछ पूछना था, एकाउंट्स को ले कर|

और फिर इस तरह उसने मुझसे सवाल पूछना शुरू कर दिए| पार्टनरशिप एकाउंट्स में उसे JLP पर डाउट थे| हम दोनों बात ही कर रहे थे की वहाँ सर और मैडम आ गए| अब चूँकि वो मेरे पीछे से आये थे तो उन्होंने मेरी JLP को लेके कुछ बातें सुन ली थी और वो ये समझे की मैं अपने स्टूडेंट से बात कर रहा हूँ| जिस बेंच पर मैं बैठा था उसी पर जब उन्होंने सामान रखा तो मैं चौंक गया और ऋतू को ये बोलके फ़ोन काट दिया की मैं थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ|

अनु मैडम: अरे! तुम तो ऑन-कॉल भी पढ़ाते हो?

ये सुन कर मैं और मैडम दोनों हँसने लगे पर सर को ये हँसी फूटी आँख न भाई|

सर: अच्छा मानु सुनो, मैं नहीं जा पाउँगा तो ऐसा करो तुम और अनु चले जाओ| वहाँ से तुम्हें अँधेरी वेस्ट जाना है, वहाँ तुम्हें Palmer Infotech जाना है जहाँ पर एक टेंडर के लिए मीटिंग रखी गई है| PPTs मैं तुम दोनों को मेल कर दूँगा, ठीक है? राखी तुम दोनों को वहीँ मिलेगी|

मैंने जवाब में सिर्फ हाँ में गर्दन हिलाई और सर ने मुझे टिकट का प्रिंटआउट दे दिया| इतना कह कर सर चले गए और मैडम और मैं उसी बेंच पर बैठ गए| मैडम ने तो कोई नावेल निकाल ली और वो उसे पढ़ने लगी और इधर ऋतू ने फिर से फ़ोन खनखा दिया और मैं थोड़ी दूर जा कर उससे बात करने लगा| जब मैंने उसे बताया की मैडम और मैं एक साथ जा रहे हैं तो वो नाराज हो गई|

ऋतू: आपने तो कहा था सर जा रहे हैं तो ये मैडम कहाँ से आईं?

मैं: यार वो बॉस की वाइफ हैं, कुछ काम से वो नहीं जा रहे इसलिए उन्हें भेजा है|

ऋतू: What's her name?
मैं: अनु मैडम

ऋतू: Age?

मैं: I don't know. maybe 30, 35. I don't know! (मैंने झुंझलाते हुए कहा|)

ऋतू: How does she look like?

मैं: What?

ऋतू: I mean her figure, bust size etc!

मैं: Are you mad? She's my boss's wife.

ऋतू: वो सब मुझे नहीं पता, दूर रहने उससे|

मैं: ओह हेल्लो मैडम! मैं उनके साथ ऑफिस ट्रिप पर जा रह हूँ घूमने नहीं जा रहा|

ऋतू: जो तो उसी के साथ रहे हो ना?

मैं: पागल जैसे तुम सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं हैं| वो बस मेरी बॉस है!

ऋतू आगे कुछ बोलने वाली थी पर फिर चुप हो गई और फ़ोन रख दिया| साफ़ था वो जल भून कर राख हो गई थी| मैं वापस बेंच पर बैठने जा रहा था की उसने मुझे वीडियो कॉल कर दिया| मैंने क्योंकि हेडफोन्स पहने थे तो मैंने कॉल उठा लिया|

ऋतू: मुझे देखन है आपकी अनु मैडम को?!

मैं: तू पागल है क्या? किसी ने देख लिया तो?

ऋतू: आपको मेरी कसम!

मैंने हार मानते हुए चुपके से दूर से ऋतू को अनु मैडम का चेहरा दिखाया| ठीक उसी समय मैडम ने मेरी तरफ देखा और हड़बड़ी में मैंने कॉल काट दिया| पर मैडम को लगा की मैं सेल्फी ले रहा हूँ इसलिए उन्होंने बस मुस्कुरा दिया|ऋतू ने आग बबूला हो कर दुबारा कॉल किया और मुझ पर बरस पड़ी;

ऋतू: ये किस एंगल से मैडम लग रही हैं? ये तो मॉडल हैं मॉडल! मैं ना..... आह! (ऋतू गुस्से में चीखी|)

मैं: जान! एक टेंडर के लिए....

ऋतू: (मेरी बात काटते हुए) उससे दूर रहना बातये देती हूँ! वरना उसका मुँह नोच लुंगी!

इतना कह कर उसने फ़ोन काट दिया| मुझे उसकी इस नादानी पर प्यार आ रहा था और मैंने उसे दुबारा फ़ोन किया और उसके कुछ बोलने से पहले ही मैंने उसे फ़ोन ओर एक जोरदार "उउउउम्मम्मम्मम्माआआअह्ह्ह्हह" दिया| ये सुनते ही वो पिघल गई और मैंने उसे यक़ीन दिला दिया की उसे चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं है| मुझ पर सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार है!
 
update 16

ऋतू से बात करके मैं वापस बेंच पर बैठ गया और फ़ोन में गेम खेलने लगा, मेरे और मैडम के बीच अब भी कोई बातचीत नहीं हो रही थी| कुछ देर बाद ट्रैन आ गई और प्लेटफार्म पर लग गई, पर दिक्कत ये थी की मेरी टिकट कन्फर्म नहीं थी और मैडम वाली टिकट कन्फर्म तो हुई पर वो सर के नाम पर थी| कंजूस सर ने स्लीपर की टिकट बुक की थी, जबकि फर्स्ट ऐ.सी. में टिकट्स खाली थी| लखनऊ से मुंबई की 32 घंटे की यात्रा वो भी बिना कन्फर्म टिकट के, ये सोच कर ही थकावट होने लगी थी मुझे| जैसे-तैसे मैंने मैडम का बैग तो उनकी सीट पर रख दिया और मैं इधर-उधर जा कर कोई खाली सीट खोजने लगा| दूसरे कोच में मुझे एक सीट खाली मिली और मैं उधर ही अपना बैग ले कर बैठ गया| करीब पंद्रह मिनट बाद मुझे मैडम का कॉल आया;

अनु मैडम: मानु? कहाँ हो तुम?

मैं: जी...मैं S2 में हूँ, वहाँ कोई सीट खाली नहीं थी इसलिए|

अनु मैडम: अरे गाडी चलने वाली है, आप जल्दी आओ यहाँ!

मुझे बड़ा अजीब लगा पर मैंने उनसे कोई बहस नहीं की और उठ कर चल दिया| अब मैं जहाँ बैठा था वहाँ शायद मुझे बर्थ मिल भी जाती पर मैडम ने बुलाया तो मुझे अपनी विंडो सीट छोड़के मैडम के पास वापस जाना पड़ा| जब में S1 कोच में पहुँचा तो देखा वहाँ दो हट्टे-कट्टे आदमी मैडम की बर्थ पर बैठे हैं, तब मुझे समझ आया की वो क्या कह रहीं थी| मैं वहाँ पहुँचा तो मुझे देखते ही वो दोनों आदमी समझे की मैं मैडम का बॉयफ्रेंड हूँ और उनमें से एक उठ कर कहीं चला गया| में ठीक मैडम की बगल में बैठ गया पर मेरे और उनके जिस्म के बीच गैप था| "ये बैग आप सीट के नीचे रख दो|" मैडम ने कहा तो मैंने वैसा ही किया और चुप-चाप दूसरी खिड़की से बाहर देखने लगा| ट्रैन चल पड़ी और इधर मैडम मेरे बिलकुल नजदीक आ गईं और मेरे कान में खुसफुसाईं; "आपकी सीट कन्फर्म हुई?" मैं उनकी इस हरकत से चौंक गया और मैंने ना में सर हिलाया| "TTE से बात करें?" मैडम ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया| मैडम के इतना करीब आने से मुझे उनके परफ्यूम की महक आने लगी थी और वो बहुत जबरदस्त थी| मदहोश कर देने वाली, पर ये ऋतू का प्यार था जो मुझे बहकने नहीं दे रहा था| कुछ देर बाद TTE आया और उसे देखते ही वो आदमी जो मेरी बगल में बैठा था उठ के भाग खड़ा हुआ| मैडम ने चुपके से मेरे हाथ में 500 के चार नोट पकड़ा दिए थे और मुझे ये देख कर बहुत हैरानी हो रही थी| इधर TTE ने जब हम से टिकट माँगी तो मैंने उसे टिकट दिखाई तो वो बोला की; "मानु कौन है?" मैंने हाँ में सर हिला कर बताया| फिर उसने कहा; "आप मैडम किसी और की टिकट पर सफर कर रही हैं?" अब मुझे कैसे भी बात संभालनी थी, तो मैंने ही कहा; "सर वो दरसल एक गड़बड़ हो गई थी, मैंने मैडम की जगह सर का नाम लिख दिया था? आप चाहे तो देख लीजिये मैडम का PAN Card उसमें इनके हस्बैंड का नाम वही है जो टिकट में लिखा है|" वो तुरंत मेरी चालाकी भाँप गया और बोला; "बेटा, चलो तुमने नाम गलत भरा पर लिंग भी गलत भर दिया? महिला को पुरुष लिख दिया?" अब ये सुन कर तो सब हँस पड़े| उन्होंने हँसते हुए कहा; "कोई बात नहीं, पति की टिकट पर पत्नी ही तो सफर कर रही है|" अब वो जाने लगा तो मैडम ने ही उन्हें रोका; "सर दो मैं से एक ही टिकट कन्फर्म हुई है आप प्लीज देख लीजिये एक और टिकट कन्फर्म हो जाए?"

"सॉरी मैडम पर सिवाए फर्स्ट ऐ.सी. के सारे फुल हैं| कहो तो मैं फर्स्ट ऐ.सी. की दो टिकट बना दूँ?" अब ये सुन के तो मैं ने सोचा की भाई ये 32 घंटे बैठे-बैठे ही निकलेंगे| पर मैडम तपाक से बोलीं; "ठीक है TTE साहब आप दो टिकट बना दीजिये|" अब ये देख मैं हैरानी से मैडम को देखने लगा| उसने मैडम से 7800/- माँगे, तो मैडम ये सुन कर थोड़ा सोच में पड़ गईं| अब मैं उठ खड़ा हुआ और TTE साहब को थोड़ा मस्का लगाने लगा और उन्हें थोड़ा दूर ले जा कर कहा; "सर प्लीज थोड़ा रहम करो! देखो यही टिकट लेनी होती तो मैं बुक करा देता| कुछ तो कन्सेशन करो? मैं अयोध्या रहता हूँ, आपको कुछ भी काम हो तो आप कहना| प्लीज सर!" अब ये सुन कर वो थोड़ा तो नरम हो गया| "अरे तुम तो हमारे गाँव वाले निकले!" ये कहते हुए हमारी बातें शुरू हुई, फिर मैने उसकी बात अपनी पिताजी से करवाई और तब पता चला की ये मेरे दोस्त संकेत तिवारी के छोटे चाचा हैं| उन्होंने मुझसे मेरा मोबाइल नंबर लिया और अपना नंबर भी दिया और फिर दो टिकट भी बना दिए जब पैसे की बात आई तो उन्होंने कहा है जो मन करे वो दे दो| मैंने दो हजार मैडम वाले और हजार अपनी जेब से उन्हें दे दिए और वो आगे चले गए| वापस आ कर मैंने मैडम से कहा की हमें आगे जाना है, इधर मैडम भी होशियार निकली उन्होंने 500/- में अपनी टिकट एक आंटी को बेच दे दी| हम फर्स्ट ऐ.सी में अपने कम्पार्टमेंट में घुसे तो अंदर घुसते ही मैडम घबरा गईं| अंदर दो लौंडे बैठे थे और शक्ल से ही चरसी लग रहे थे| मैडम की घबराहट उनके चेहरे से ही झलक रही थी तो मुझे ही आगे आना पड़ा| मैंने मैडम को बहार रुकने का इशारा किया और सामान उठा कर सीट के नीचे डाला और फिर उन्हें अंदर आने को कहा| जैसे ही दोनों ने मैडम को देखा तो ठरक्पना उनके चेहरे पर आ गया और उनकी शक़्लें देख मैं गंभीर हो गया| "आप दोनों झाँसी जा रहे हैं?" उनमें से एक ने बात शुरू की तो मैंने जवाब देते हुए नहीं कहा और बात आगे बढे उसके पहले ही मैडम मुझसे सट कर बैठ गईं और खिड़की के बाहर देखने लगीं| फिर मेरी तरफ मुँह कर के धीमी आवाज में बोलीं की उन्हें भूक लगी है| उनका व्यवहार अचानक से गर्लफ्रेंड वाला हो गया था और मुझसे इससे बहुत अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा था| मैंने बैग से ऋतू के पैक किये हुए सैंडविच निकला और उन्हें दे दिया| वो बाहर मुँह कर के खाने लगीं, इधर उन दोनों कमीनों की नजर अभी भी उन पर टिकी हुई थी| मैं समझ सकता था की उन्हें कितना अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा है पर मैं इस समय कुछ नहीं कर सकता था, बस हर थोड़ी-थोड़ी देर में उन दोनों की हरकत पर नजर रखे हुए था| वो दोनों भी कभी फ़ोन में कुछ देखते, कभी एक दूसरे से बात करते और मेरी नजर बचा-बचा के अनु मैडम को देखते| मैडम उनकी सारी हरकतें कनखी नजरों से देख रही थी और गुस्सा उनके चेहरे पर झलक रहा था| उनमें से एक ने मैडम की तरफ देखते हुए अपने लंड पर हाथ रख दिया और उसे दबाने लगा| इससे पहले की मैं उसे कुछ कहता मैडम को अचानक से क्या सुझा की उन्होंने अपना सर मेरी जांघ पर रख दिया और उन दोनों की तरफ पीठ कर के लेट गईं| इससे पहले की वो मैडम को पीछे से देख पाते मैंने उनपर एक चादर डाल दी| पर मेरी हालत ख़राब हो गई थी, मैडम का सर मेरे लंड से कुछ सेंटीमीटर दूर था और उनकी सांसें मुझे उस पर साफ़ महसूस हो रही थी| लंड अब फुल ताव में अकड़ने लगा था और मुझे डर लग रहा था की अगर मैडम को ये महसूस हो गया तो वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी| मैं मन ही मन उन कमीनों को गाली दे रहा था, न वो हरामी यहाँ होते और ना ही मैं इस परिस्थिति में फँसता| मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अपने दोनों हाथों को कहाँ रखूँ? दायाँ हाथ तो मैंने अपने दायीं तरफ सीट पर रख लिया पर बायाँ हाथ कहाँ रखूँ? मैडम के सर पर रख नहीं सकता था और न ही उसे अपने बाएं घुटने पर रख सकता था| तो मैंने उसे मोड़ के अपने सर के पीछे रख लिया और पीछे तक लगा कर बैठ गया| मेरे मन में मैडम के लिए कोई गंदे विचार नहीं थे पर लंड का दिमाग तो होता नहीं, उसे गर्मी मिली नहीं की वो टनटनाते हुए अकड़ गया| इधर ये दोनों जल भून के राख हो चुके थे और मन ही मन मुझे गाली दे रहे होंगे की क्यों मैंने मैडम के जिस्म को ढक दिया| थोड़ी देर में ऋतू का फ़ोन आया और अब मैं अजब दुविधा में फँस गया था! अगर उठ के जाऊँ तो मैडम अकेली रह जाएँगी और ये भूखे भेड़िये कोई बदसलूकी न करें उनके साथ और यहाँ बैठा रहा तो फ़ोन पर बात कैसे करूँ| आखिर मैंने फ़ोन उठा लिया और हेडफोन्स कान में लगाए हुए ही उससे बात करने लगा, पर वो मेरी हालत समझ गई और पूछने लगी की मैं क्या कर रहूँ? मैंने बस 'कुछ नहीं' कहा, पर वो समझ गई और जोर देने लगी की मैं उसे बताऊँ तो मैंने उसे बस ये कह के टाल दिया की मैं "बाद में कॉल करता हूँ|" उसने फिर से मुझे कॉल कर दिया पर मैंने उठाया नहीं|

नौ बजे एक अटेंडें आया और उसने मुझसे खाने को पूछा तो मैंने उसे दो थाली बोल दी और सामने वाले एक लड़के ने भी दो थाली बोल दी| उनमें से एक बाहर गया हुआ था और जब वो आया तो उसकी आँखें सुर्ख लाल थी, मतलब साफ़ था की वो अभी माल फूँक कर आया है| मैंने अभी तक मैडम को छुआ नहीं था पर जब अटेंड खाना ले कर आया तो मुझे उन्हें उठाना था| अब मैं उनका नाम नहीं ले सकता था, भले ही वो उन दोनों को ये जता रहीं हों की हम दोनों पति-पत्नी हैं| उन्हें छू भी नहीं सकता था अब हार मानते हुए मैंने सोचा की उनकी दायीं बाजू को छू कर उन्हें उठाऊँ की तभी TTE वहाँ से गुजरे और उन्होंने हम दोनों को इस हालत में देख लिया| मेरी बुरी तरह फटी की अब मैं गया काम से पर उन्होंने कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा दिए और चले गए| मैंने मैडम के बाजू को थोड़ा हिलाया और उन्हें उठा दिया| वो उठीं और अपने होठों को पोछने लगी, मैंने अपनी पैंट पर देखा तो मेरे लंड के पास से गीली हो चुकी थी| सोते समय मैडम के मुँह से लार निकली थी जिसने मेरे लंड के पास गीला निशान बना दिया था| जब उनकी नजर वहाँ पड़ी तो वो बुरी तरह झेंप गईं और नजर चुरा कर बाथरूम चली गईं| इधर उन दोनों छिछोरों ने जब ये देखा तो वो भी गन्दी हंसी हँसने लगे| मैंने मैडम वाली चादर ही उठा ली और पैंट के ऊपर डाल ली| जब मैडम आ गईं तो मैं हाथ धोने जाने लगा तो मैडम मुझे देख कर फिर से शर्मा गईं और वापस सीट पर सर झुका कर बैठ गईं| मैं हाथ धो कर आया तो देखा वो दोनों हरामी खुसफुसा रहे थे; "देख रहा है?! मियाँ-बीवी का प्यार? इसीलिए कह रहा था की तू भी शादी कर ले!" मैं आगे कुछ बोलता उससे पहले ही मैडम ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने को कहा और हम दोनों खाना खाने लगे|
 
update 17

खाना खाने के बाद भी उन कमीने लड़कों की नजरें मैडम पर बानी हुई थी और मैडम बस खिड़की से बाहर देखे जा रही थी| मुझे अब उन पर तरस आने लगा था और मैं मन ही मन सोचने लगा की क्या करूँ? मैंने अपने बैग से लैपटॉप निकाला और उसमें हेडफोन्स कनेक्ट कर के उन्हें दिया| वो हैरानी से मुझे देखने लगी पर जब मैंने उन्हें मूवी देखने को कहा तो वो मुस्कुरा दीं और मूवी प्ले करके देखने लगी| मैंने ऊपर से दो तकिये उतार के अदम को दे दिए जिन्हें मैडम ने अपनी गोद में एक के ऊपर एक रख लिया और सबसे ऊपर उन्होंने लैपटॉप रख लिया| इतनी ऊंचाई होगई थी की मैडम आराम से मूवी देख सकें और उन लड़कों की आँखों से अपने जिस्म को बचा सकें| अब तो वो दोनों मुझे देखने लगे की क्यों मैंने उनके हुस्न के दीदार में बाधा डाल दी| मैडम भी मेरी चालाकी समझ चुकी थी और उन्होंने मुझे नजर बचा के दबी आवाज में थैंक यू और मैंने बस हाँ में गर्दन हिला दी| मैं भी पाँव ऊपर कर के बैठ गया और ऋतू को मैसेज करने लगा| मैंने उसे अभी जो भी कुछ हुआ उसके बारे में कुछ नहीं बताया था वर्ण वो फिर कोई काण्ड कर देती| मैंने उसे सॉरी कहा की दरसल मैं उस समय मैडम से बात कर रहा था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया पर वो मुझसे रूठ चुकी थी और थोड़ी ही देर में ऑफलाइन चली गई| मूवी देख कर मैडम हँस रही थी और उनकी हंसी मन्त्र-मुग्ध करने वाली थी पर मेरा दिल तो अब किसी और का हो चूका था| इतने साल से ऑफिस में काम कर रहा था पर मैडम को कभी इस तरह मैंने मुस्कुराते हुए नहीं देखा था| वो हमेशा ही ऑफिस में काम करती रहती थी और शायद ही कभी मुस्कुराईं हो! खेर अब चूँकि ऋतू मुझसे नाराज थी तो बात करने वाला कोई था नहीं मेरे पास, तो मैं बैठे-बैठे ऊबने लगा था| मैडम ने मेरी परेशानी भाँप ली और वो मेरे कंधे पर सर रख चिपक गईं और लैपटॉप को थोड़ा टेढ़ा कर लिया, हेडफोन्स का एक सिरा उन्होंने मुझे दे दिया| आज तक सिर्फ एक ऋतू थी जिसने कभी मेरे कंधे पर अपना सर रखा हो अब ऐसे में मैडम के सर रखने से मुझे बहुत ही अजीब महसूस हो रहा था| वो दोनों लड़के मैडम के इस तरह से बैठने से आहें भरने लगे और मैंने गौर किया तो पाया की मैडम की एक जाँघ उन्हें दिखने लगी थी| अब चूँकि मैडम ने चूड़ीदार पहना था और उनकी कुर्ती शॉर्ट थी तो उनके जिस्म का उभार उन्हें साफ़ दिख रहा था| मैंने मेरे बगल में पड़ी चादर को उठा के उन पर डाला और तब मैडम को एहसास हुआ की वो लौंडे क्या देख रहे थे और उन्हें बहुत मायूसी होने लगी| मैंने मूवी को फ़ास्ट-फॉरवर्ड कर के हँसी वाला सीन लगा दिया जिसे देख कर मैडम मुस्कुरा दी| वो समझ गईं थीं की मैंने ये सिर्फ उन्हें खुश करने के लिए किया था| रात के बारह बजे होंगे और अब मुझ पर नींद हावी होने लगी थी, अब मैडम तो सो चुकी थीं पर मुझे बड़ी जोर से नींद आ रही थी| मेरी उबासी सुन कर वो समझ गईं और उन्होंने मुझे अपनी गोद में सर रख कर लेटने को कहा तो मैं फिर से हैरान हो गया| मैंने ना में सर हिलाया और वैसे ही बैठा रहा, जेब से एक च्युइंग गम निकाली और चबाने लगा| रैपर मैंने जेब में डाल लिया, फिर मैडम ने भी एक गम माँगी तो मैंने उन्हें भी दे दी| उनका ध्यान मूवी में लगने से उनका अनकम्फर्टेबले लेवल कम हो चूका था|

रात एक बजे गाडी झाँसी पहुँची और ये दोनों लौंडे अपना सामान ले कर उत्तर गए और तब जा कर मैडम का सर मेरे कंधे से उठा| उनके जाते ही दो ऑन्टी केबिन में घुसीं और सामने वाली बर्थ पर बैठ गईं और अपना सामान सेट करने लगीं| मैंने भी मैडम से ऊपर जा के सोने की इजाजत माँगी तो उन्होंने हँसते हुए इजाजत दे दी| सामने वाली एक आंटी भी हँसने लगी| मैंने चादर बिछाई और लेट गया और घोड़े बेच के सो गया| पौने तीन बजे मैडम ने मुझे उठाया तो मैं चौंक कर उठ गया; "सॉरी मानु! वो मुझे ....जाना है|" मैं तुरंत समझ गया की उन्हें वाशरूम जाना है और इतनी रात को ट्रैन में उन्हें अकेले जाने से डर लग रहा है| मैं जूते पहनके उनके साथ बाथरूम तक गया और फिर वापस उन्ही के साथ आ गया| वापस आने के रास्ते में वो शर्मिंदा महसूस कर रहीं थीं पर मैंने ''its alright mam, I can understand." कह के बात खत्म कर दी| सुबह 8 बजे मैं उठा और अभी इटारसी स्टेशन आया था और अटेंड चाय ले कर आया था| मैडम ने उसे रात के खाने और चाय के पैसे दिए और मैं भी नीचे उतर आया|

फ्रेश हो कर मैं चाय पीने लगा;

अनु मैडम: वो टिकट कितने की थी?

मैं: 3,०००/- की| (मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा|)

अनु मैडम: वो तो 8,०००/- माँग रहा था?

मैं: वो दरसल उनसे बात की तो पता चला की वो मेरे ही गाँव के हैं और मेरे ही दोस्त के चाचा हैं|

अनु मैडम: आपका गाँव कहाँ है?

मैं: अयोध्या

अनु मैडम: अरे वाह! कभी बताया नहीं आपने?

मैं: जी कभी टॉपिक ही नहीं छिड़ा| पर मैडम सर को पता चला तो वो बहुत गुस्सा होंगे?

अनु मैडम: उन्हें बोलने की कोई जर्रूरत नहीं| उन्हें जरा भी समझ नहीं है, बस सारा टाइम हुक्म चलाते रहते हैं| अचनक से मुझे कहा की तुम चली जाओ, भला ये कोई बात हुई?

उन्हें सर पर बहुत गुस्सा आ रहा था और मैं उनकी किसी भी बात का जवाब हाँ या नहीं में दे रहा था बस चुप-चाप सुने जा रहा था| दस मिनट तक उनके मन की भड़ास निकलती रही और मैं सर झुकाये सुनता रहा की तभी वो दोनों आंटी आ गईं जो फ्रेश होने गईं थी| उनके आते ही मैडम चुप हो गईं और मेरा सर झुका होने से उन्हें लगा की मैडम मुझे हिओ डाँट रही हैं| "अरे बेटा क्या हुआ? काहे झगड़ रहे हो?" पहली आंटी बोलीं|

"अरे मियाँ-बीवी तो ये खट-पट चलती रहती है|" ये कह के दूसरी आंटी हँसने लगी, और ठीक उसी समय वही TTE आ गया और उसने ये मियाँ-बीवी वाली बात सुन ली| अब इससे पहले मैं कुछ बोलता मैडम ही बोल पड़ी; "आंटी मैं झगड़ नहीं रही थी, आपके आने से पहले यहाँ दो छिछोरे बैठे थे और वो बस मुझे घूरे ही जा रहे थे|" मैं बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ के बाहर आ गया और ऋतू को फ़ोन करने लगा|

मैं: Good Morning जान!

ऋतू: जा के अपनी अनु मैडम को बोलिये|

मैं: यार... प्लीज .... बात तो....

ऋतू: बात भी आप जाके अनु मैडम से करिये| मुझे कॉलेज जाना है|

इतना बोल कर उसने कॉल काट दिया, मैं जानता था की वो फ़ोन पर नहीं मानने वाली| TTE ने पीछे से मेरी बातें सुन ली थी और वो आ कर मुझसे चुटकी लेने लगे; "लगे रहो!" मेरा जवाब सुनने से पहले ही वो आगे चले गए| खेर रात दस बजे ट्रैन मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पहुँची और मैं दोनों का सामान ले कर उतर गया| टैक्सी वाले से अँधेरी वेस्ट के लिए पूछा तो कोई भी जाने को तैयार नहीं था, मैंने ओला पर ढूंढा तो एक मिल गया पर अब स्टे की दिक्कत थी| टैक्सी वाले ने अपने जान-पहचान के 6-7 होटल दिखाए पर कहीं भी रूम खाली नहीं था और जहाँ था भी वो सिर्फ सिंगल रूम था| बड़ी मुश्किल से एक होटल मिला और मैडम वहाँ पूछताछ करने गईं और मैं बाहर ही रुक गया टैक्सी वाले के पास| मैडम ने अंदर से मुझे आवाज दी; "मानु जी आ जाइये|" मैंने शुक्र मनाया की कम से कम कमरा मिल गया वर्ण रात के 1 बजे कहाँ मारे-मारे फिरते| टैक्सी वाले को पैसे दे कर मैं उनके पास आया तो उन्होंने मुझे रजिस्टर में साइन करने को कहा| जब मैंने डिटेल पढ़ी तो मैं हैरान रह गया| मैडम ने Mr. Manu Maurya and Mrs. Anu Maurya लिखा था| अब ये देख कर मैंने मैडम की तरफ देखा तो वो बड़ी नार्मल लगीं मुझे! मैंने साइन तो कर दिया पर दिल अंदर से धक-धक करने लगा था| कमरे के अंदर पहुँचा तो लाइट्स मध्यम थीं, बिलकुल रोमांटिक वाली| मैंने तुरंत ही कमरे की ट्यूब लाइट जला दी और जब मैडम की तरफ देखा तो उनकी सांसें बहुत तेज थीं| वो सीधा बाथरूम में घुस गईं और आधे घंटे तक वहीँ रहीं| अब ज्यादा सोचने की जर्रूरत नहीं थी की वो वहाँ क्या कर रहीं हैं, मैंने इस मौके का फायदा उठाया और तुरंत अपने कपडे चेंज कर लिए| फिर मैं सोफे पर अपना बिस्तर लगाने लगा| जब मैडम बाहर आईं तो वो मुझसे नजरें चुरा रहीं थीं और मेरी तरफ पीठ किये हुए ही बोलीं; "आप यहाँ बेड पर सो जाओ वहाँ सोफे पर कैसे सोओगे?"

"It's alright mam! I'll manage." मैंने भी उनकी तरफ देखे बिना ही कहा|

"um.. actually they had just one room and we've been searching for an hour. it was very late so. I." मैडम को आगे बोलने में बहुत हिचकिचाहट हो रही थी|
"I can understand mam!" इतना कह कर मैंने कमरे की लाइट बंद की और लेट गया| कुछ देर बाद मैडम उठीं और कपडे बदलने के लिए बाथरूम में घुस गईं, लाइट के स्विच की आवाज से मैं चौंक कर उठ गया और देखा तो मैडम अभी बाहर आईं थीं और वो सिल्क की शॉर्ट नाइटी जो उनके जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी की क्या कहूँ? उनके कंधे नंगे थे और उन पर बस एक पतली सी स्ट्रिंग थी| डीप कट जिससे उनकी छातियों की घाटी साफ़ दिख रही होगी| अब चूँकि मैं दूर था तो वो घाटियाँ नहीं देख सकता था| अब ये सब देखते ही मेरे लंड में तनाव आने लगा था और मैं मुँह दूसरी तरफ कर के खुद पर काबू करने लगा| मैंने ऋतू के बारे में सोचना शुरू कर दिया| उसका मासूम चेहरा याद करने लगा, पर उसे याद करते ही मुझे कल शाम का वाक्य याद आ गया| अब तो लंड अकड़ के पूरा खड़ा हो गया और मैंने जान बुझ कर दूसरी तरफ करवट ली और मैं लंड की अकड़न छुपाने लगा| दस मिनट बाद मुझे कमरे में शराब की महक आने लगी और ये ऐसी महक थी जिसने मेरे दिमाग में कोहराम मचा दिया| मन बेचैन होने लगा और मैं उस खुशबु का पीछा करते हुए उठ बैठा और देखा मैडम बिस्तर पर बैठीं और उनके हाथ में एक पेग है! अब ये देखते ही मुझे डर लगने लगा की कहीं कुछ गलत न हो जाए| मैडम ने जब मुझे बैठे हुए देखा तो वहीँ से मुझसे पूछा; "आप पियोगे?" मैंने ना में सर हिलाया पर कमरे में इतनी रौशनी नहीं थी की वो मेरी गर्दन हिलती हुई देख सकें| इसलिए उन्होंने दुबारा पूछा पर मेरे जवाब देने से पहले ही मेरे क़दमों में जैसे जान आ गई और वो अपने आप ही उनकी तरफ चल पड़े| पर दिमाग ने जैसे अंतर् आत्मा को झिंझोड़ा और अपना वादा याद दिलाया| मैंने "no thank you mam" कहा और बाथरूम में घुस गया, वाशबेसिन के सामने खड़े हो कर अपने आप को देखने लगा और अपने मन पर काबू करने लगा" बार-बात खुद को ऋतू को किया वादा याद दिलाने लगा, पर मन शर्म की खुशबु से बावरा हो गया था| मन कह रहा था की एक बार चीट करने में दिक्कत ही क्या है?! मैंने अपने मुँह पर पानी मारना शुरू कर दिया ताकि खुद को किसी तरह संभाल सकूँ| एक दृढ निश्चय कर मैं बाहर आया और वापस सोफे पर लेट गया और चादर ओढ़ ली पर मन साला काबू में नहीं आ रहा था| मैंने करवटें बदलनी शुरू कर दीं| मैडम ने इसका कुछ अलग ही मतलब निकाला, "Manu the couch's not comfortable come and sleep on the other side, its not like I need the whole bed to myself! We are grownups and know our limits. No need to be afraid of me!"

"No mam, its okay. it's a new place..umm.." मुझसे बोला नहीं जा रहा था| "Then come we'll talk." उन्होंने बात शुरू करने के लिए कहा|
अब मैं उठा और जा कर उनके सामने खड़ा हो गया तो उन्होंने अपने पास बैठने को कहा तो मैंने पास पड़ी कुर्सी उठा ली और उसे घुमा कर बैठ गया|

अनु मैडम: आप बहुत फॉर्मेलिटी दिखाते हो?

मैं: umm. you're my boss, I'm your employee. How can I sit or sleep next to you on a bed?

अनु मैडम: chivalry ???

मैं: yes mam!

अनु मैडम: That's the first time... For me! (उन्होंने एक सिप लिया|)
मैं अब उनसे नजरें चुरा के इधर-उधर देख रहा था|
अनु मैडम: So do you have a girlfriend?

मैं: No

अनु मैडम: Wow! How come you're single? You're such a gentleman?
मैं: umm. I don't get time!
अनु मैडम: I know. I know.. That asshole husband of mine is always yelling on you! I know... bloody bastard! Ruining everyone's life.. But I.(hic) . won't let. (hic)

शराब अब मैडम पर अपने जादू दिखाने लगी थी और उन्होंने हिचकी लेना शुरू कर दिया था|

मैं: ummm. mam. its getting late. we'll talk tomorrow!

पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और आखरी घूँट जैसे तैसे पिया और बाथरूम जाने को उठीं और लड़खड़ाने लगीं| मैंने कमरे की लाइट्स जला दी ताकि उन्हें ठीक से दिखाई दे और तब मैंने उन्हें ठीक से देखा और जो शराब का जादू मेरे मन पर हावी था वो खत्म हो गया और लंड अकड़ने लगा| मैडम अब बाथरूम में घुस गईं थीं, तो मैंने एक गहरी साँस ली और अपने जज्बातों पर काबू करने लगा और सोफे की तरफ घुमा और तभी मेरी नजर बोतल पर पड़ी| मैडम ने कम से कम तीन पेग मारे थे व्हिस्की के वो भी नीट! अब तो मुझे डर लगने लगा की आज रात जर्रूर कुछ होगा? ये सोचते हुए मैं एक कदम चला हूँगा की मुझे मैडम के बाथरूम से बाहर आने की आवाज आई और वो गिरने लगी| मैंने भाग कर उन्हें तुरंत थाम लिया पर अब तो गजब ही सीन था! मैंने मैडम को कमर से पकड़ रखा था और वो नीचे को झुकी हुई थीं| उनकी नाइटी बिलकुल उनके शरीर से चिपकी हुई थी, जिससे उनके सारे के सारे उभार दिखने लगे थे| उनके वो 38D के वक्ष! 30 इंची कमर मुझे उनकी तरफ खींचने लगी थी| लंड तो फूल चूका था और पूरी तैयारी में था की आज उसे कुछ नया मिलेगा चखने को मर मन मेरे काबू में था| मैंने उन्हें सहारा दे कर खड़ा किया, पर मैडम के मन में मेरे लिए कुछ गंदे विचार नहीं थे इसलिए उन्होंने किसी भी तरह की पहल नहीं की थी| मुझे लग रहा था की वो शायद इतने होश में तो हैं की सही और गलत पहचान सकें| खेर मैं उन्हें पलंग तक ले आया और उन्हें लिटा दिया और उनके ऊपर चादर डाल दी और वापस आ कर अपने पलंग पर लेट गया| मैं लेटे-लेटे सींचने लगा की ये आखिर हो क्या रहा था मेरे साथ? मेरे मन में उनके लिए कोई गंदे विचार नहीं हैं फिर भी किस्मत क्यों मेरे साथ ऐसा कर रही थी? ट्रैन में उनका मुझे पति बनाने का नाटक! मेरी गोद में सर रख लेट जाना वो भी बिना मुझसे पूछे? ठीक है की उन्हें उन लड़कों की गन्दी नजरों से बचना था पर एटलीस्ट मुझसे पूछा तो होता? फिर होटल के रजिस्टर में Mr. Manu Maurya nad Mrs. Anu Maurya लिखना? मुझे अपने साथ बिस्तर पर लेटने को कहना? फिर भले ही वो इसलिए कहा हो की मैं आराम से सो सकूँ! पर हूँ तो मैं पराया ही ना? ऑफिस में उन्होंने सिवाए काम के कभी मुझसे कोई बात नहीं की, प्लेटफार्म पर भी वो कुछ नहीं बोल रहीं थी, पर ट्रैन में बैठते ही वो इतना कैसे बदल गईं? हम दोनों में तो दोस्ती भी नहीं है की मैं इस साब को ये मान कर टाल दूँ की दोस्तों में ये सब चलता है| ये सोचते-सोचते मैं सो गया और सुबह 8 बजे उठा और देखा तो मैडम अब भी सो रही हैं| मैं नाहा-धो के तैयार हो गया| पर मैडम अब भी नहीं उठीं थी, मैंने एक ब्लैक कॉफ़ी आर्डर की और मैडम को उठाने के लिए उनके कन्धर पर दो उँगलियों से ना चाहते हुए छुआ| पर मैडम नहीं उठीं तो मजबूरन मुझे उन्हें थोड़ा हिलाना पड़ा और वो थोड़ा कुनमुनाने लगीं और अपनी आँखें खोलीं जो ठीक से खुल भी नहीं रही थीं; " Good Morning Mam!" मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देख कर उन्हें होश आया और उन्होंने साइड टेबल पर पड़ी अपनी घडी उठाई और टाइम देखा| मैं तुरंत घूम गया क्योंकि मुझे पता था उन्होंने बहुत तंग नाइटी पहनी है और उन्हें इस हालत में शर्म आना तय है| मेरे घूमते ही मैडम तुरंत बाथरूम में घुस गईं और मैं अपने बैग में लैपटॉप और कुछ फाइल रखने लगा| मेरी पीठ अब भी बाथरूम की तरफ थी, मैडम फटाफट बहार आईं और अपने कपडे ढूंढने लगीं| मैं बिना उनकी तरफ मुड़े ही दरवाजा खोल कर बाहर चला गया|

दस मिनट ही मैडम की ब्लैक कॉफ़ी आ गई जिसे मैंने चुप-चाप कमरे में रख दिया और बाहर लॉबी में बैग ले कर आगया| आधे घंटे बाद मैडम भी अपना बैग और लैपटॉप ले कर बाहर आ गईं और मुझसे नजरें चुराती हुई बाहर आ गईं और फ़ोन कर के राखी से पूछने लगीं की वो कहाँ है| मैडम ने इस समय बिज़नेस सूट पहन रखा था और वो बहुत सुन्दर लग रहीं थी, पर मुझे क्या? मेरे पास तो मेरा प्यार था; ऋतू! उसके आगे सब फीका था! मैंने ओला बुला ली थी और उसने हमें Palmer Infotech छोड़ा| वो एक बहुत बड़ी बिल्डिंग थी, जैसे की फिल्मों में दिखाया जाता है| दसवीं मंजिल पर पहुँचे तो वहां का नजारा बिलकुल कॉर्पोरेट वाला था| सभी लोग वहाँ बिज़नेस सूट पहने थे, एक मैं ही था जो वहाँ सिर्फ टाई पहने आया था| मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे की मैं वहाँ इंटरव्यू दे ने आया हूँ| मैं अभी उस कॉर्पोरेट कल्चर को महसूस करने में बिजी था की पीछे से राखी ने आ कर मेरी पीठ पर हाथ रखा और मैं एक दम से पलटा|

ये राखी वही लड़की थी जो पहले मेरे ऑफिस में काम करती थी और जिसे मैं ऋतू से प्यार होने से पहले पसंद करता था| "Hi Maanu! How're you?"

"I'm fine, how you doing? How's your new job?" मैंने पूछा|

"I already resigned, I'll be joining sir again!" उसने कहा पर आगे कुछ बात होने से पहले ही मैडम आ गईं और वो अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं| "मानु....अ...आप... यहीं वेट करो!" इतना कह कर मैडम और राखी दोनों अंदर चले गए| मैं सोचने लगा की ये सब हो क्या रहा है? मुझे अगर मीटिंग में शामिल ही नहीं करना था तो मुझे यहाँ लाये ही क्यों? पर फिर मुझे समझ आया की सबने बिज़नेस सूट पहना है और ऐसे में मैं ही सब से अलग दिख रहा था? मुझे ये सोच कर बड़ी निराशा हुई की मेरे पास कोई बिज़नेस सूट नहीं है| मैं वहीँ वेटिंग एरिया में चुप-चाप बैठ गया और ऋतू को फ़ोन किया पर उसने फ़ोन काट दिया! मुझे लगा की शायद क्लास में होगी, पर जब वो क्लास में होती तो कॉल काटते समय वो मैसेज कर देती थी| इसबार उसका कोई मैसेज नहीं आया था, मतलब साफ़ था की वो बहुत नाराज है| पर मैंने जब वहाँ लड़के-लड़कियों को आपस में खुल कर बातें करते देखा तो मैं सोचने लगा की जब वो जॉब करेगी तभी ये सब समझेगी| खेर मीटिंग 3 घंटे चली और मैं बुरी तरह बोर हो चूका था| जब मैडम और राखी बाहर आये तो वो काफी खुश दिखे पर मुझे मायूस देख राख ने पूछा; "क्या हुआ मानु?" मैडम फिर से नजरें चुरा कर दूसरी तरफ मुँह कर के जाने लगीं| "कुछ नहीं यार, आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है!" ये मैडम ने सुन लिया पर वो कुछ नहीं बोलीं और रिसेप्शन की तरफ चली गईं| राखी मेरे पास आ कर बैठ गई और डिटेल पूछने लगी पर मैंने उसकी बात टाल दी| उसने बताय की प्रेजेंटेशन सक्सेसफुल रही और शायद कॉन्ट्रैक्ट हमें ही मिलेगा| तभी मैडम आ गईं और उन्होंने हमें कैफेट्रेरिअ चलने को कहा| वहाँ जा कर उन्होंने खाना आर्डर किया पर मेरा मन अब भी बुझा हुआ|

मैडम और राखी मीटिंग के बारे में बात कर रहे थे और मैं बस खिड़की से बाहर देख रहा था, वैसे भी मैं क्या इनपुट देता जब मुझे ये ही नहीं पता था की वहाँ हुआ क्या है? मैं अपनी कॉफ़ी ले कर चुप-चाप उठा और एक काँच की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया| मेरा बयां हाथ मेरी पैंट की पॉकेट में था और मैं बस वो हरा-भरा नजारा देख रहा था| उम्मीद कर रहा था की शायद ऋतू कॉल कर दे, उसकी आवाज सुने हुए बहुत टाइम हो गया था| मैंने फ़ोन निकाला और दुबारा मिलाया पर एक घंटी बजते ही उसने फ़ोन काट दिया| आगे मैं कुछ सोचता उससे पहले ही राखी आ गई; "मानु! Come yaar! Let's celebrate?" मैडम ने लंच आर्डर कर दिया था, मैं वापस आ कर बैठ गया और फिर राखी ने अपनी बातों से मेरा ध्यान लगाए रखा| मैं बस हाँ-ना में मुस्कुरा कर जवाब दे रहा था| लंच के बाद राखी की ट्रैन थी तो वो निकल गई, पर मेरी और मैडम की ट्रैन रात 11 बजे की थी जो हमें लखनऊ अगले दिन रात 3 बजे छोड़ती| राखी के जाने के बाद हम दोनों अकेले उसी टेबल पर बैठे थे, मैडम अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं और मुझे रह-रह कर ऋतू की याद आ रही थी| अब वापस होटल भी नहीं जा सकते थे क्योंकि वहाँ एक कमरे में हम दोनों ही ऑक्वर्ड हो जाते| बात शुरू करते हुए मैंने मैडम से कहा; "congratulations mam . for the contract!" जवाब में उन्होंने बीएस मुस्कुरा दिया और "thank you" कहा| "so mam..should we just sit here.. Or go out?" मैडम ये सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं| "Go out? Where?" उन्होंने पूछा| "ummm. how about beach?" मैंने थोड़ा उत्साह दिखते हुए कहा| तो उन्होंने वही प्यारी सी मुस्कान दी और वो उठ कड़ी हुईं| उनकी awkwardness अब खत्म हो गई थी| मैंने ओला बुक की और और उसने हमें जुहू बीच छोड़ा|
 
update 18

वहाँ पहुँच कर मैं एक्सपेक्ट कर रहा था की बिलकुल खाली जगह होगी पर ये तो भीड़-भाड़ वाली जगह निकली| मैडम तो जा कर रेत में लगे पाँव बैठ गईं और मैं इधर-उधर टहलता रहा और फोटो क्लिक करता रहा, कुछ सेल्फी भी ली और सब फोटो ऋतू को भेज दी| उसने सब फोटो देख ली पर जवाब कुछ नहीं दिया| मैं वापस मैडम के पास आया तो वो ढलते हुए सूरज को देख रही थीं और मंद-मंद मुस्कुरा रही थी| मैंने दो नारियल लिए और मैडम की तरफ बढ़ाया, मैडम एक डीएम से चौंक गईं पर बोली कुछ नहीं| एक सिप नारियल पानी पीने के बाद मुझे इशारे से वहीँ रेट में बैठने को कहा| मैं भी उन्हीं के साथ बैठ गया पर थोड़ी दूर और ढलते हुए सूरज को देखने लगा| फिर बैठे-बैठे कुछ फोटो खींची और उन्हें एडिट करने लगा| मैडम ने ये देख लिया पर कुछ बोली नहीं, फिर वो कुछ सोचने लगी और अपना मुँह झुका लिया| "Manu. I..I'm sorry for whatever happened last night? I misbehaved." उन्होंने सर झुकाये हुए कहा, पर इससे पहले वो कुछ आगे कहती मैंने उनकी बात काट दी| "But nothing happened mam! I mean we had a lil chat and then you were kindaa drunked and said a lot of things about sir and then I said good night. That's it.. Well you did almost fell down." ये सुन कर मैडम के मन से गिलटी वाली फीलिंग खत्म हुई और वो गिरने वाली बात से तो वो थोड़ा हँस भी दी|

"Thank God! I've been living in guilt since morning. I thought I may have done something which was..." वो आगे कहते-कहते रुक गईं| उन्हें डर था की नशे की हालत में शायद हम दोनों ने सेक्स किया होगा|

"I've another confession to make, I kindaa took advantage of your chivalry in the past 48 hours! I mean that train incident, writing our names as Mr. and Mrs. Maurya. I'm really sorry! I was so scared in train. I've never travelled alone in my entire life and .." उन्होंने सर झुकाये हुए कहा|

"Its okay mam. I can understand. I know it wasn't intentional or anything."

"मेरा इरादा तुम्हें छूने का कतई नहीं था, उस समय तुम मेरे लिए सहारा थे और मुझे तुम पर भरोसा था की तुम मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाओगे| वैसे ही भरोसा जो एक दोस्त को दूसरे दोस्त पर होता है|" ये सुनने के बाद मुझे मेरे रात वाले सवालों का जवाब मिल गया था| मैडम मुझे अपना दोस्त समझती थीं पर ये सब शुरू कैसे हुआ ये जानने को मन बेचैन था| "umm. mam if you don't mind me asking, in office we barely spoke! I mean we only had conversation regarding work. So h..h.. how did we become friends?" मैंने थोड़ा झिझकते हुए पूछा|
"Well I don't think a conversation is required to start a friendship." मैडम का ये जवाब मुझे बहुत ही अटपटा लगा क्योंकि बिना बात किये कोई दोस्त कैसे बन सकता है? पर मैंने आगे उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की और चुप-चाप सूरज को ढलते हुए देखने लगा| अचानक ही मैडम कड़ी हुईं और मुझे अभी अपने साथ चलने को कहा| मुझे लगा की उनका मन भर गया होगा इसलिए वो अब जाना चाहती हैं पर फिर मेरी नजर उनके पैरों पर पड़ी| मैडम अब भी नंगे पाँव थीं मतलब वो चाहती थी की मैं उनके साथ वॉक करूँ| मैंने भी अपने जूते उतारे और नंगे पाँव हम दोनों रेत पर चलने लगे| "The general traits of a friendship include similar interests, mutual respect and an attachment to each other.." ये कहते हुए मैडम एकदम से रुक गईं, ऐसा लगा जैसे वो कुछ ऐसा बोल गईं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था| मैं अब कुछ-कुछ समझने लगा था की आखिर मैडम के मन में क्या चल रहा है पर कुछ भी कहने से डर रहा था| डर इसलिए रहा था की कहीं मैं गलत निकला तो मैडम के नजर में जो मेरी इज्जत है वो चली जाएगी और एक डर ये भी था की कहीं मेरे कुछ कहने से उनका दिल न टूट जाए| मैंने सोचा की मैं अपनी बात कुछ इस तरह से रखूँगा की उन्हें ये समझ आ जाये की मैं प्यार क्यों नहीं कर सकता|

"You're even giving me company in walking!" इतना कह कर वो हँसने लगीं| "So now we're friends right?" अब मैं इसका जवाब ना तो नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया और मैडम ने हाथ मिलाने के लिए अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया| मैंने अभी उनसे हाथ मिलाया और मुस्कुरा दिया, हम वॉक करते-करते करीबन एक किलोमीटर दूर आ गए तो मैडम ने चाय पीने के लिए कहा| टापरी वाली मस्त चाय पी कर मैडम में शॉपिंग के लिए बोला और हम जुहू मार्किट आ गए वहाँ मैडम ने कुछ बालियाँ खरीदी और खरीदते वक़्त वो बार-बार मुझसे पूछती की ये कैसी है| मैंने भी पूरा इंटरेस्ट लेते हुए उन्हें एक बालियाँ उठा के दीं जो उन पर बहुत जच रही थी| उन्हें पहन के तो मैडम खुश हो गईं और मेरी पसंद की तारीफ करने लगीं| मेरा मन किया की मैं ऋतू के लिए भी एक बाली खरीदूं पर मैडम से क्या कहूँगा ये सोच कर रह गया| कुछ दूर आ कर मैडम ने मॉल जाने के लिए कहा और हम एक मॉल में घुसे| वहाँ एक शोरूम में मैडम ने मुझे एक बिज़नेस सूट दिया और try करने को कहा| अब ये देख कर तो मेरी आँख फटी की फटी रह गई| "I'm sorry mam! I can't take this."

"क्यों?" मैडम ने सवाल पूछा| "Mam its way too costly! I .I can't afford it!" मैंने दबी हुई आवाज में कहा| "Oh come on! It's a gift. from a friend to another."
"No.No.No. Mam. I can't. please" मैंने उन्हें मना करते हुए कह| पर उन्होंने जबरदस्ती करते हुए कहा; "इसका मतलब की हम दोस्त नहीं हैं?" "जी मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा| दोस्ती में जर्रूरी तो नहीं की इतना महँगा गिफ्ट दिया जाए?" मैंने उन्हीं की बात उन पर डालते हुए कहा| "पर मैं अपनी ख़ुशी से दे रही हूँ!"

"जानता हूँ mam पर मैं इतना महँगा गिफ्ट अभी deserve नहीं करता!" मैंने बात खत्म करना चाहा पर मैडम तो जैसे अड़ ही चुकी थी की वो मुझे गिफ्ट दे कर रहेंगी| "क्या deserve नहीं करता?" उन्होंने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ के मुझे एक तरफ खड़ा किया और गुस्से में बोली; "एक लड़का जो पिछले दो दिन से मेरा इतना ख्याल रख रहा है, ट्रैन में मुझे उन लफंगों की गन्दी नजरों से बचाता है! होटल के एक कमरे में मैं नशे में थी फिर भी जिसने मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाया वो ये सूट deserve नहीं करता तो फिर इस दुनिया में chivalry की कोई कीमत ही नहीं है|"

"Mam तो आप मुझे ये सब करने की कीमत दे रहे हो? अभी तो आप ने कहा की हम दोस्त हैं और अभी आप कीमत की बात कर रहे हैं?"

"मेरा वो मतलब नहीं था..... उस टाइम आपने राखी से कहा था ना की आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है, मुझे बहुत बुरा लगा|"

"Mam वो...." आगे बोलने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे| मैं बहुत ही गैरतमंद इंसान हूँ और उनसे ऐसा कोई भी तोहफा नहीं लेना चाहता था| शायद वो ये समझ गईं थीं इसलिए वो बोलीं; "अच्छा एक शर्ट तो ले लो?" अब मुझे बुरा लग रहा था की मैं भला कब तक उन्हें ऐसे मना करूँ| "ठीक है पर पैसे मैं दूँगा|"

"अरे ये क्या बात हुई? ठीक है! पसंद मैं करुँगी|" उन्होंने हँसते हुए कहा और मैंने भी और मना नहीं किया| फिर मैडम ने एक नेवी ब्लू कलर की एक शर्ट पसंद की जिसे मैंने उन्हें try करके दिखाया और पैसे मैंने दिए|

शाम के 6 बजने लगे थे तो मैडम ने पावभाजी खाने के लिए कहा| मैं इधर सोच रहा था की ऋतू के लिए क्या खरीदूँ, आखिर मुझे याद आया की उसने एक बार मुझसे डायरी माँगी थी| तो पावभाजी खाने के बाद मैंने एक डायरी ली और मैडम ने मुझे वो डायरी लेते देखा तो खुद को पूछने से खुद को रोक पाईं; "आप शायरी करते हो क्या?" अब मुझे कुछ तो जवाब देना ही था सो मैंने हाँ में सर हिला दिया और ये सुन करते वो मुझसे और भी ज्यादा इम्प्रेस हो गईं| तो एक शेर हमें भी सुनाइए! मैडम की फरमाइश पर मुझे ऋतू की याद आ गई और फिर मुझे घुलम अली जी का एक शेर याद आ गया;

"फासले ऐसे भी होंगे,

ये कभी सोचा ना था.

सामने बैठा था मेरे,

और वो मेरा ना था|"

ये सुनते ही मैडम एक दम से चुप हो गईं और एक पल के लिए मेरे सामने ऋतू का चेहरा आ कर ठहर गया| "आप शायरी इस डायरी में जर्रूर लिखना|" इतना कह कर मैडम ने अपनी चुप्पी तोड़ दी और मैंने भी सोचा की इसे पढ़ कर ऋतू भी खुश हो जाएगी| शायद उसे उसकी बेरुखी भी याद आ जाये! खेर हम थोड़े दूर वहीँ घूमें, मैंने मैडम की कुछ तसवीरें लीं उन्हींके फ़ोन से और फिर खाना खा कर होटल 8 बजे पहुँचे| वहाँ से चेक-आउट किया और स्टेशन पहुँच गए और वहाँ एक बेंच पर बैठ गए| ट्रैन आई और हम अपनी-अपनी बर्थ पर लेट गए| इस बार हमारी टिकट्स कन्फर्म हो गई थीं, नाम वाली दिक्कत अब भी हुई तो फिर मैंने कैसे ना कैसे कर के बात संभाल ली|

आज रात मैं चैन से सोया इस ख़ुशी में की सैटरडे मुझे देख कर ऋतू खुश हो जाएगी| हालाँकि मैडम ने दो बार मुझे उठाया था क्योंकि उन्हें वाशरूम जाना था और मैंने इसका कोई माइंड नहीं किया| अगले दिन आठ बजे मैडम ने मुझे उठाया, फ्रेश हो कर हम ने चाय-नाश्ता किया| सर का फ़ोन आया और मुझे नहीं पता की उनकी क्या बात हुई क्योंकि मैं डायरी में वही शेर लिख रहा था| सर से बात कर के मैडम ने बात शुरू की; "Isn't it strange, a handsome guy filled with so much of chivalry is single?" उन्होंने chivalry शब्द पर बहुत जोर दे कर कहा| ये सुन कर मेरे मन में जो पहले विचार आया था की शायद मैडम मुझसे प्यार करती हैं, क्यों ना उस विचार का गाला घोट दूँ| मैंने बहुत गंभीर होते हुए कहा; "Mam my village is famous for honor killing! My cousin's wife was burned alive because of this!" ये सुनते ही मैडम के हालत देखने लायक थी, उनका मुँह खुला का खुला रह गया| उनका हँसता-खेलता हुआ चेहरा मायूस हो गया और तभी उनको याद आय की वो ट्रैन वाला हादसा और जो होटल में हुआ वो; "I..I'm really sorry! That TTE saw us.and.h.how..what are you going to tell them?" उनकी घबराहट उनके चेहरे से झलक रही थी और मैं भी अंदर ही अंदर जानता था की जब ये बात सामने आएगी तो काण्ड होना तय है| क्योंकि कोई भी मेरी बात पर ऐतबार नहीं करता की जो कुछ हुआ उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी| मैंने नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाते हुए कहा; "Haven't thought about it! But don't worry I won't drag you in that mess!" मैंने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा पर बिलकुल मायूस हो गईं और फिर से गिलटी महसूस करने लगी| अब उस समय मैं अगर ज्यादा कुछ बोलता तो शायद उसका कुछ गलत मतलब निकलता, उन्हें कहीं ये ना लगे की मेरे मन में भी उनके लिए कोई प्यार-व्यार है इसलिए मैं चुप-चाप फिर से लेट गया| पर मैडम बहुत उदास थीं!

अब एक हँसता-खेलता इंसान मेरे कारन गुम-शूम हो गया था और रह-रह कर मैं गिलटी महसूस करने लगा था| "Mam you don't have to worry, the least punishment I'll get is either marriage or kicked from home. And trust me I'm really happy for the later punishment!" मैंने थोड़ा हँसते हुए कहा ताकि उनका कुछ मन हल्का हो पर वो अब भी गुम-सुम थीं| "Mam आपके इस तरह गुम-सुम होने से इसका कोई हल तो निकलेगा नहीं| जब ये बात सामने आएगी तब मैं इसका कोई ना कोई हल निकाल लूँगा|" पर मैडम अब भी चुपचाप थीं, इससे ज्यादा मैं उन्हें कुछ कह नहीं सकता था| पूरा सफर वो इसी तरह गुम-सुम रहीं और मुझसे कोई भी बात नहीं की| रात दो बजे हम स्टेशन पहुँचे और अब वहाँ से घर जाना था| सर कार ले कर हम दोनों को लेने आये और मुझे घर छोड़ा| जब मैं जाने लगा तो मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कल की छुट्टी ले लेना, See you on Monday!" ये सुन कर मेरी लाटरी निकल गई और मैंने उन्हें 'Thank you mam' कहा और ऊपर चला गया| सर की उस टाइम जली जर्रूर होगी पर वो कुछ बोले नहीं| बिस्तर पर ऐसे ही पड़ गया और सो गया, अगली सुबह 7 बजे उठ कर तैयार हुआ और ऋतू के कॉलेज के लिए निकल गया| उसके कॉलेज के गेट पर बाइक रोक कर उसका इंतजार करने लगा, जैसे ही उस की नजर मुझ पर पड़ी वो भाग कर आई और मेरे गले लग गई और उसकी आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी| "ये तीन मैंने कैसे काटे मैं ही जानती हूँ!" उसने रोते-रोते कहा|

"तीन दिन से मेरे कॉल 'काट' ही तो रही थी|" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू फिर से गुस्सा हो गई पर उसे मानाने के लिए मैंने उसे उसका तौहफा दिया| डायरी देख कर तो वो खुश हो गई और उस पर छापे गेटवे ऑफ़ इंडिया की तस्वीर देख कर वो और भी खुश हो गई| अंदर खोल कर देखा तो दूसरे पैन पर मैंने वही शेर लिखा था जिसे पढ़ कर उसे मेरे दिल के दर्द के बारे में एहसास हुआ पर वो कान पकड़ के माफ़ी माँगने लगी| इतने में उसकी एक सहेली भी आ गई और मुझे देखते ही वो समझ गई की मैं उसका बॉयफ्रेंड हूँ| हालाँकि मैं ये नहीं चाहता था और उम्मीद कर रहा था की ऋतू बोलेगी की मैं उसका चाचा हूँ| पर ऋतू के कुछ कहने से पहले ही वो बोल पड़ी; "ओह! तो ये ही हैं वो जिनकी वजह से तू इतने दिन गुम-सुम थी?" ये सुन कर वो शर्मा गई और मेरी बाजू पर अपना सर रख दिया| "Hi" मैंने इतना कहा और उसने होना हाथ आगे करते हुए कहा; "Myself काम्य|| मैंने उसका हाथ मिलाया और "मानु" कहा| काम्य ने मेरा हाथ बहुत जोर से दबा रखा था और वो हाथ छोड़ ही नहीं रही थी इसे देख ऋतू जल गई और उसने दोनों का हाथ छुड़वा दिया| "हेल्लो मैडम आप जा कर अपने वाले से हाथ मिलाओ|" ये सुन कर हम दोनों हँस पड़े|

"तो चलें?" मैंने ऋतू से कहा तो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी| "क्या कोई जर्रूरी लेक्चर है?" वो खुश हो गई और ना में सर हिलाया और फ़ौरन बाइक पर पीछे बैठ गई| काम्य और जोर से हँसने लगी और फिर बाय बोल कर चली गई| ऋतू हमेशा की तरह मेरी पीठ से चिपक कर बैठ गई, जैसे की तीन दिन से उसका जिस्म बर्फ बन गया था और मेरे बदन की तपिश से वो सारी बर्फ पिघलना चाहती थी| "तो जान! बताओ की जाना कहाँ है?" मैंने उससे पूछा|

"घर और कहाँ?" ऋतू तपाक से बोली| मैं समझ गया था की उसे घर क्यों जाना था तो मैंने रास्ते से खाने के लिए कुछ पैक करवाया और फिर हम दोनों घर आ गए|
 
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