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आधी से अधिक रात्री बीत चुकी थी. ओरात की साँसे उखाड़'ने लगी थी. तब कोका ने बहुत ही शान्ती के साथ उस'की योनि मैं अप'ना लिंग प्रवेश किया. वह ताबाद तोड़ चुदाई के मूड मैं कतई न था. वह लंड को घूमा फिराकार उस'की चूत के अंदर की हर जगह को छ्छू रहा था, उस'की चूत की हर दीवार का घर्सन कर रहा था. जब भी ओरात अप'नी चूत से लंड को कस के निचोड़ना चाह'ती. कोका लंड बाहर निकाल लेता और आसान बदल लेता. उस रात कोका ने 64 बार आसान बद'ले जो काम सुत्र मैं वर्णित हैं. उस'ने हर आसान से उस'की शान्ती पूर्वक चुदाई की. जेसे ही भोर होने को हुआ वह ओरात पूरी तरह से पस्त हो चुकी थी. अब उस मैं हिल'ने डुल'ने की भी ताक़त नहीं बची थी. बहुत ही धीमी आवाज़ मैं वह कह रही थी,
"हे पंडित मेरी जिंद'गी मैं तुम पह'ले आद'मी हो जिस'ने मुझे पूर्ण रूप से तृप्त किया है. किसी ने भी मेरे साथ इस तरह नहीं किया जेसा तुम'ने किया. और तुम्हारी चुदाई हा'य क्या कह'ना. इत'ने तरीकों से भी किसी ओरात को चोदा जा सक'ता है मैं अभी तक आश्चयचकित हूँ. तुम'ने सच कहा था ओरात को सन्तुश्ट कर'ने के लिए बड़े लंड की दर'कार नहीं बल्कि तरीका आना चाहिए. पंडित मैं तुम'से हार गई हूँ और आज से मैं तुम्हारी दासी हूँ. तुम मेरे मालिक हो और इस दासी पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार है."
यह सुन'कर कोका ने उसे नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर आने को कहा.
कुच्छ सम'य बाद कोका और वह कम'रे मैं फिर आम'ने साम'ने थे. कोका ने उसे आप'ने पास बैठाया. उसके पाओं मैं पाजेब पहनाई, हाथों मैं चूरियाँ पहनाई फिर सुंदर सी सारी और अंगिया दी. जब वह अच्छी तरह से वस्त्र पहन आई तब कोका ने अप'ने हाथों से उस'का शृंगार कर'ना प्रारंभ किया. हाथों मैं मेहंदी रचाई, पाँव मैं आल'ता, आँखों मैं काजल और फिर हर अंग के आभुश्ण. फिर कोका ने कहा,
"जो ओरात नंगी रहती है वह एक नंगे छोटे बच्चे के समान है, काम के सुख से सर्वथा अन्भिग्य. तुम नंगी होके सारी दुनिया मैं फिर'ती रही, और तुम्हारे अंदर की नारी समाप्त हो गई. तुम्हारे काम अंगों की सर'सराहट ख़त्म हो गई. अब जो भी तुम्हारी चुदाई कर'ता तुम सन्तुश्ट नहीं होती थी. ओरात वस्त्रा केवल अप'ने अंगों को ढक'ने के लिए नहीं पहन'ती बल्कि अच्छे वस्त्र पहन के बनाव शृंगार कर'के वह अप'नी काम क्षम'ता को बढाती है. इस'से पुरुश उस'की ओर आकर्शित होते हैं. यह बात नारी बहुत अच्छी तरह से समझ'ती है कि वह आकर्शण दे रही है. और इसी मनोस्थिति मैं नारी जब स्वयं आकर्शित होके किसी पुरुश को अप'ना देह सौंप'ती है तभी उसे सच्ची संतुष्टि मिल'ती है."
"आप'ने आज मेरी आँखें खोल दी. पह'ले तो लोग मुझे खिलौना समझ'ते थे. मेरी जेसी अकेली नारी को जिस'ने चाहा जेसे चाहा आप'ने नीचे सुलाया. बात यहाँ तक पाहूंछ गई क़ी मैं स्वयं अप'नी चूत मैं हरदम लंड चाह'ने लगी. जब मैं इस'के लिए आगे बढ़ी तो जो पह'ले जिस काम के लिए मुझे बहलाते फूस'लाते थे वही मुझे देख कर दूर भाग'ने लगे. इस'से मैं विद्रोह'नी हो गई और उस'का चर्म राज'सभा तक पहून्च कर हुआ."
फिर वे दोनों राजसभा मैं पहून्चे. राजा और दर'बारी उसे सजी धजी और लज्जा की प्रतिमूरती बनी देख द्न्ग रह गये. कल की नंगी घूम'ने वाली बेशर्म रन्डी आज एक सभ्रान्त महिला नज़र आ रही थी. तब कोका ने उसे बोल'ने के लिए इशारा किया,
"महाराज मैं अप'नी हार स्वीकार कर'ती हूँ. जिस ब्राह्मण का सब उप'हास उड़ा रहे थे उसी ने मुझे जीवन का सब'से आद'भूत काम सुख दिया है." उस'ने सर पर पल्लू ठीक कर'ते हुए कहा. इस पर राजा ने कोका पंडित को आदर मान देते हुए कहा,
"इस दर'बार की मान मर्यादा बचाने के लिए आप'का बहुत बहुत धन्यवाद. फिर भी मेरी उत्सुक'ता यह जान'ने के लिए बढ़ी जा रही है कि जिसे हट्टे कट्टे राजपूत नहीं कर सके वो आप किस तरह कर पाए."
"राजन यह कार्य मैने अप'ने काम शास्त्रा के ग्यान के आधार पर पूरा किया. पर राजन उन सब'का इस सभा मैं एसे वर्णन कर'ना शिश्टाचार के विरुद्ध होगा."
तब राजा ने एकांत की व्यवस्था कर दी और कोका पंडित ने विस्तार से कई दिनों मैं राजा के सम्मुख उस'का वर्णन किया. तब राजा ने आग्या दी की वह इस'को एक ग्रंथ का रूप दे. तब कोका पंडित अप'ने कार्य मैं जुट गये और परिणाम एक महान ग्रंथ "रतिरहस्य" या "कोक-शास्त्र" के रूप मैं दुनिया के समक्ष आया.
एंड
दोस्तों आप सब की जान-कारी के लिए मैं यहाँ कुछ लिख रहा हूँ
प्राचीन साहित्य में संस्कृत साहित्य में एक भारी श्रृंखला उपलब्ध है जिसमें अनेक गूढ़ विषयों पर गहरा विचार किया गया है। अनेक रसिक विद्वानों ने उनका विश्लेषण कर जीवन को सुखमय बना दिया है। इस समय प्रमुख रूप से ये ग्रंथ ही मिल पाए हैं:
1. नंदिकेश्वर द्वारा रचित कामशास्त्र- यह अत्यन्त प्राचीन अनुपलब्ध ग्रंथ है। इसकी रचना उपनिषद् काल में हुई मानी जाती है।
2. औदालिक-श्वेतकेतु द्वारा रचित ‘‘कामशास्त्र’’ यह ग्रंथ भी उपनिषद कालीन है और अनुपलब्ध है।
3. पांचाल देश के महर्षि वाम्रव्य द्वारा रचित कामशास्त्र।
4. श्रीधारायण द्वारा रचित कामशास्त्र।
5. श्री स्वर्णनाथ नामक विद्वान का कामशास्त्र।
6. श्री नामक विद्वान का कामशास्त्र।
7. श्री गोर्दीय द्वारा रचित कामशास्त्र।
8. श्री गोणिकापुत्र द्वारा रचित कामशास्त्र।
9. श्री दत्तक द्वारा रचित कामशास्त्र।
10. श्री कुचुमार द्वारा रचित कामशास्त्र।
11. वात्स्यायन द्वारा रचित कामशास्त्र की विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हो चुका है एवं यह प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
12. कंदर्प चूड़ामणि नामक ग्रंथ में वात्स्यायन के कामसूत्र को आया छंद में संस्कृत भाषा में लिखा गया है।
13. रति रहस्य।
14. नगर-सर्वस्व।
15. अनंग रंग-रतिशास्त्र।
16. श्रृंगार दीपिका- यह ग्रन्थ श्री हरिहर पंडित द्वारा लिखा गया है परन्तु यह ग्रन्थ अधूरा ही प्राप्त है।
17. रतिशास्त्र- यह ग्रन्थ भी श्री नागार्जुन द्वारा रचित है।
18. अनंग तिलक- इस ग्रंथ के रचनाकार का नाम ज्ञात नहीं हो सका है। यग ग्रंथ भी अपूर्ण है। लंदन, बर्लिन में इसकी प्रतियाँ सुरक्षित हैं।
19. अनंग दीपिका- इस ग्रंथ की स्थिति भी अनंग तिलक के समान ही है। इसके लेखक का भी पता नहीं चलता। यह ग्रंथ भी अधूरा है।
20. अज्ञात रचनाकार का ग्रंथ- अनंग शेखर’’ भी अपूर्ण मिला है।
इनके अलावा अन्य ग्रन्थ हैं-
21. कुचिमार मंत्र
22. कामकलावाद तंत्र
23. काम प्रकाश
24. काम प्रदीप
25. काम कला विधि
26. काम प्रबोध
27. कामरत्न
28. कामसार
29. काम कौतुक
30. काम मंजरी
31. मदन संजीवनी
32. मदनार्णव
33. मनोदय
34. रति मंजरी
35. रति सर्वस्व
36. रतिसार
37. वाजीकरण तंत्र
38. वैश्यांगना कल्प
39. वैश्यांगना वृत्ति,
40. ऋंगार भेद प्रदीप
41. श्रृंगार पद्धति
42. श्रृंगार सारिणी
43. समर काम दीपिका
44. स्त्री विलास
45. सुरतोत्सव
46. स्तरतत्व प्रकाश
47. स्तर दीपिका
48. रतिरत्न प्रदीपिका
49. कामशतकम्
50. पच्चशायक।
उक्त सभी ग्रंथ बड़े ही विचित्र एवं काम संबंधी ज्ञान से ओतप्रोत हैं। उदाहरण के तौर पर हम प्रारम्भ में कुचिमार तंत्र नामक ग्रंथ की चर्चा करेंगे। यह ग्रंथ ‘‘कुचोपनिषद्’’ और ‘‘सुरतिकार तंत्र’’ के नाम से भी प्रकाशित हो चुका था। प्राचीन ग्रंथकार ने इन्हें ग्यारह प्रकरणों में विभाजित किया है। इन प्रकरणों में औषधियों का विशद वर्णन किया गया है। पहला प्रकरण है ध्वज वृद्धि। इनमें पुरुष की इन्द्रियों की कमजोरी दूर करने के लिए अनेक प्रयोग दिये गये हैं जिनसे इन्द्रियजन्य दोष दूर होते हैं तथा लिंगल पुष्ट होकर विकासरत होता है।
दूसरा प्रकरण लेप महिमा का है इसमें स्त्री-पुरुष में परस्पर आकर्षण हेतु विभिन्न प्रकार के औषधीय लेप बताए गए हैं।
तीसरे प्रकरण में स्त्री के स्वरूप व स्वभाव के अनुरूप रति समय का निर्धारण किया गया है।
चौथे प्रकरण में आयुष्य प्रयोगों का वर्णन है जिसमें अधिक आयु के जराग्रस्त पुरुष पुन: यौवन प्राप्त करके अपनी क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं।
पंचम संस्करण में ‘स्त्री द्रावण व स्तम्भन’ के अचूक उपाय बताए गए हैं।
छठे प्रकरण में प्रौढ़ महिलाओं के शिथिल यौनांगों के पूर्व स्थिति में लाने के प्रयोग बताए गए हैं।
सातवें प्रकरण में संतति नियमन के उपाय बताए गए हैं। यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन युग के इस ग्रंथ में बर्थ कंट्रोल से सरल प्रयोग बताए गए हैं।
आठवाँ प्रकरण केश नाश से संबंधित है इसमें यौनागों के अवांछित केशो को स्थायी रूप से समाप्त करने के प्रयोग दिये गये हैं।
नवाँ प्रकरण गर्भाधान से संबंधित है। इसमें नि:संतान दम्पत्ति हेतु संतान प्राप्ति के सरल प्रयोग हैं।
दसमें प्रकरण में पुत्र प्राप्ति हेतु मंत्र व पूजा के प्रयोग दिये हैं जिनके प्रयोग से जो संतान हो वह पुत्र ही हो। जिन्हें बार-बार कन्याएँ उत्पन्न होती हों उनके लिये नाल परिवर्तन हेतु इस प्रकरण में अनेक प्रयोग दिये हैं।
अंतिम ग्यारहवें पूजन विधि नामक प्रकरण में स्त्री-पुरुष के गुप्त रोगों की चिकित्सा के उपाय बताए गये हैं।
इसी प्रकार हिन्दी में ‘‘कोकशास्त्र’’ नामक ग्रंथ भी प्रचलित है। इस ग्रंथ की रचना कामशास्त्र के एक विद्वान पंडित ‘कोका’ ने की थी।
प्राचीन काल में (समझा जाता है कि लगभग 7वीं सदी में) वैश्वदत्त नामक राजा के दरबार में पंडित तेजोक के पौत्र और गद्य विद्याधर पंडित पारभिद्र के सुपुत्र ‘कोक’ का बड़ा नाम था। कोक अपने पिता के समान ही सर्वशास्त्र निष्णात थे। ये कहाँ के निवासी थे इसके बारे में अनेक मत हैं। कुछ इन्हें उज्जयिनी का निवासी बताते हैं तो कुछ की मान्यता ये है कि पंडित ‘‘कोके’’ काश्मीर के थे किन्तु रति रहस्य नामक उसके ग्रंथ के तृतीय अध्याय के अंत में लिखे श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि वे पाटल के रहने वाले थे।
कोक के विषय में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से एक सर्वप्रमुख है। इस कथा का उल्लेख एक जर्मन प्रोफेसर रिमड ने भी अपनी पुस्तक में किया था। कथा इस प्रकार है-
‘पंडित ‘कोक’ राजा भैरव सेन के राज दरबार के रत्नों में से एक थे। भैरव सेन को अपने राज दरबार के रत्नों में शामिल किया था। एक दिन हस्तिनी जाति की कोई स्त्री उनके दरबार में नग्नावस्था में आ गई। इससे राजा बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने उस स्त्री को फटकारा कि उसे दरबार में नग्न होकर आने का साहस कैसे हुआ था ? इस पर उस स्त्री ने उत्तर दिया कि उसकी कामेच्छा को उस दिन तक कोई भी शांत नहीं कर पाया था। साथ ही उसने दरबार में उसकी कामपीड़ा को शांत करने हेतु किसी को भी आमंत्रित किया।
स्त्री की बात सुनकर राजा ने दरबारियों को उस स्त्री के दर्प को चूर करने और उसकी कामग्नि को शांत करने की आज्ञा दी। परन्तु कोई भी इसके लिए तैयार न हो सका। तब राजा ने सभा का अपमान होते देख उसे अपने घर ले गये और उन्होंने उसे इस प्रकार तृप्त किया कि वह उनकी दासी बनी गई। तब राजा के कहने से लोगों के उपकार के लिए अर्थात् लोक कल्याणार्थ कोका पंडित ने ‘रति रहस्य’ नामक एक ग्रंथ की रचना की।