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Hindi Sex Stories By raj sharma

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आधी से अधिक रात्री बीत चुकी थी. ओरात की साँसे उखाड़'ने लगी थी. तब कोका ने बहुत ही शान्ती के साथ उस'की योनि मैं अप'ना लिंग प्रवेश किया. वह ताबाद तोड़ चुदाई के मूड मैं कतई न था. वह लंड को घूमा फिराकार उस'की चूत के अंदर की हर जगह को छ्छू रहा था, उस'की चूत की हर दीवार का घर्सन कर रहा था. जब भी ओरात अप'नी चूत से लंड को कस के निचोड़ना चाह'ती. कोका लंड बाहर निकाल लेता और आसान बदल लेता. उस रात कोका ने 64 बार आसान बद'ले जो काम सुत्र मैं वर्णित हैं. उस'ने हर आसान से उस'की शान्ती पूर्वक चुदाई की. जेसे ही भोर होने को हुआ वह ओरात पूरी तरह से पस्त हो चुकी थी. अब उस मैं हिल'ने डुल'ने की भी ताक़त नहीं बची थी. बहुत ही धीमी आवाज़ मैं वह कह रही थी,

"हे पंडित मेरी जिंद'गी मैं तुम पह'ले आद'मी हो जिस'ने मुझे पूर्ण रूप से तृप्त किया है. किसी ने भी मेरे साथ इस तरह नहीं किया जेसा तुम'ने किया. और तुम्हारी चुदाई हा'य क्या कह'ना. इत'ने तरीकों से भी किसी ओरात को चोदा जा सक'ता है मैं अभी तक आश्चयचकित हूँ. तुम'ने सच कहा था ओरात को सन्तुश्ट कर'ने के लिए बड़े लंड की दर'कार नहीं बल्कि तरीका आना चाहिए. पंडित मैं तुम'से हार गई हूँ और आज से मैं तुम्हारी दासी हूँ. तुम मेरे मालिक हो और इस दासी पर तुम्हारा पूर्ण अधिकार है."

यह सुन'कर कोका ने उसे नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर आने को कहा.

कुच्छ सम'य बाद कोका और वह कम'रे मैं फिर आम'ने साम'ने थे. कोका ने उसे आप'ने पास बैठाया. उसके पाओं मैं पाजेब पहनाई, हाथों मैं चूरियाँ पहनाई फिर सुंदर सी सारी और अंगिया दी. जब वह अच्छी तरह से वस्त्र पहन आई तब कोका ने अप'ने हाथों से उस'का शृंगार कर'ना प्रारंभ किया. हाथों मैं मेहंदी रचाई, पाँव मैं आल'ता, आँखों मैं काजल और फिर हर अंग के आभुश्ण. फिर कोका ने कहा,

"जो ओरात नंगी रहती है वह एक नंगे छोटे बच्चे के समान है, काम के सुख से सर्वथा अन्भिग्य. तुम नंगी होके सारी दुनिया मैं फिर'ती रही, और तुम्हारे अंदर की नारी समाप्त हो गई. तुम्हारे काम अंगों की सर'सराहट ख़त्म हो गई. अब जो भी तुम्हारी चुदाई कर'ता तुम सन्तुश्ट नहीं होती थी. ओरात वस्त्रा केवल अप'ने अंगों को ढक'ने के लिए नहीं पहन'ती बल्कि अच्छे वस्त्र पहन के बनाव शृंगार कर'के वह अप'नी काम क्षम'ता को बढाती है. इस'से पुरुश उस'की ओर आकर्शित होते हैं. यह बात नारी बहुत अच्छी तरह से समझ'ती है कि वह आकर्शण दे रही है. और इसी मनोस्थिति मैं नारी जब स्वयं आकर्शित होके किसी पुरुश को अप'ना देह सौंप'ती है तभी उसे सच्ची संतुष्टि मिल'ती है."

"आप'ने आज मेरी आँखें खोल दी. पह'ले तो लोग मुझे खिलौना समझ'ते थे. मेरी जेसी अकेली नारी को जिस'ने चाहा जेसे चाहा आप'ने नीचे सुलाया. बात यहाँ तक पाहूंछ गई क़ी मैं स्वयं अप'नी चूत मैं हरदम लंड चाह'ने लगी. जब मैं इस'के लिए आगे बढ़ी तो जो पह'ले जिस काम के लिए मुझे बहलाते फूस'लाते थे वही मुझे देख कर दूर भाग'ने लगे. इस'से मैं विद्रोह'नी हो गई और उस'का चर्म राज'सभा तक पहून्च कर हुआ."

फिर वे दोनों राजसभा मैं पहून्चे. राजा और दर'बारी उसे सजी धजी और लज्जा की प्रतिमूरती बनी देख द्न्ग रह गये. कल की नंगी घूम'ने वाली बेशर्म रन्डी आज एक सभ्रान्त महिला नज़र आ रही थी. तब कोका ने उसे बोल'ने के लिए इशारा किया,

"महाराज मैं अप'नी हार स्वीकार कर'ती हूँ. जिस ब्राह्मण का सब उप'हास उड़ा रहे थे उसी ने मुझे जीवन का सब'से आद'भूत काम सुख दिया है." उस'ने सर पर पल्लू ठीक कर'ते हुए कहा. इस पर राजा ने कोका पंडित को आदर मान देते हुए कहा,

"इस दर'बार की मान मर्यादा बचाने के लिए आप'का बहुत बहुत धन्यवाद. फिर भी मेरी उत्सुक'ता यह जान'ने के लिए बढ़ी जा रही है कि जिसे हट्टे कट्टे राजपूत नहीं कर सके वो आप किस तरह कर पाए."

"राजन यह कार्य मैने अप'ने काम शास्त्रा के ग्यान के आधार पर पूरा किया. पर राजन उन सब'का इस सभा मैं एसे वर्णन कर'ना शिश्टाचार के विरुद्ध होगा."

तब राजा ने एकांत की व्यवस्था कर दी और कोका पंडित ने विस्तार से कई दिनों मैं राजा के सम्मुख उस'का वर्णन किया. तब राजा ने आग्या दी की वह इस'को एक ग्रंथ का रूप दे. तब कोका पंडित अप'ने कार्य मैं जुट गये और परिणाम एक महान ग्रंथ "रतिरहस्य" या "कोक-शास्त्र" के रूप मैं दुनिया के समक्ष आया.

एंड

दोस्तों आप सब की जान-कारी के लिए मैं यहाँ कुछ लिख रहा हूँ

प्राचीन साहित्य में संस्कृत साहित्य में एक भारी श्रृंखला उपलब्ध है जिसमें अनेक गूढ़ विषयों पर गहरा विचार किया गया है। अनेक रसिक विद्वानों ने उनका विश्लेषण कर जीवन को सुखमय बना दिया है। इस समय प्रमुख रूप से ये ग्रंथ ही मिल पाए हैं:

1. नंदिकेश्वर द्वारा रचित कामशास्त्र- यह अत्यन्त प्राचीन अनुपलब्ध ग्रंथ है। इसकी रचना उपनिषद् काल में हुई मानी जाती है।

2. औदालिक-श्वेतकेतु द्वारा रचित ‘‘कामशास्त्र’’ यह ग्रंथ भी उपनिषद कालीन है और अनुपलब्ध है।

3. पांचाल देश के महर्षि वाम्रव्य द्वारा रचित कामशास्त्र।

4. श्रीधारायण द्वारा रचित कामशास्त्र।

5. श्री स्वर्णनाथ नामक विद्वान का कामशास्त्र।

6. श्री नामक विद्वान का कामशास्त्र।

7. श्री गोर्दीय द्वारा रचित कामशास्त्र।

8. श्री गोणिकापुत्र द्वारा रचित कामशास्त्र।

9. श्री दत्तक द्वारा रचित कामशास्त्र।

10. श्री कुचुमार द्वारा रचित कामशास्त्र।

11. वात्स्यायन द्वारा रचित कामशास्त्र की विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हो चुका है एवं यह प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

12. कंदर्प चूड़ामणि नामक ग्रंथ में वात्स्यायन के कामसूत्र को आया छंद में संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

13. रति रहस्य।

14. नगर-सर्वस्व।

15. अनंग रंग-रतिशास्त्र।

16. श्रृंगार दीपिका- यह ग्रन्थ श्री हरिहर पंडित द्वारा लिखा गया है परन्तु यह ग्रन्थ अधूरा ही प्राप्त है।

17. रतिशास्त्र- यह ग्रन्थ भी श्री नागार्जुन द्वारा रचित है।

18. अनंग तिलक- इस ग्रंथ के रचनाकार का नाम ज्ञात नहीं हो सका है। यग ग्रंथ भी अपूर्ण है। लंदन, बर्लिन में इसकी प्रतियाँ सुरक्षित हैं।

19. अनंग दीपिका- इस ग्रंथ की स्थिति भी अनंग तिलक के समान ही है। इसके लेखक का भी पता नहीं चलता। यह ग्रंथ भी अधूरा है।

20. अज्ञात रचनाकार का ग्रंथ- अनंग शेखर’’ भी अपूर्ण मिला है।

इनके अलावा अन्य ग्रन्थ हैं-

21. कुचिमार मंत्र

22. कामकलावाद तंत्र

23. काम प्रकाश

24. काम प्रदीप

25. काम कला विधि

26. काम प्रबोध

27. कामरत्न

28. कामसार

29. काम कौतुक

30. काम मंजरी

31. मदन संजीवनी

32. मदनार्णव

33. मनोदय

34. रति मंजरी

35. रति सर्वस्व

36. रतिसार

37. वाजीकरण तंत्र

38. वैश्यांगना कल्प

39. वैश्यांगना वृत्ति,

40. ऋंगार भेद प्रदीप

41. श्रृंगार पद्धति

42. श्रृंगार सारिणी

43. समर काम दीपिका

44. स्त्री विलास

45. सुरतोत्सव

46. स्तरतत्व प्रकाश

47. स्तर दीपिका

48. रतिरत्न प्रदीपिका

49. कामशतकम्

50. पच्चशायक।

उक्त सभी ग्रंथ बड़े ही विचित्र एवं काम संबंधी ज्ञान से ओतप्रोत हैं। उदाहरण के तौर पर हम प्रारम्भ में कुचिमार तंत्र नामक ग्रंथ की चर्चा करेंगे। यह ग्रंथ ‘‘कुचोपनिषद्’’ और ‘‘सुरतिकार तंत्र’’ के नाम से भी प्रकाशित हो चुका था। प्राचीन ग्रंथकार ने इन्हें ग्यारह प्रकरणों में विभाजित किया है। इन प्रकरणों में औषधियों का विशद वर्णन किया गया है। पहला प्रकरण है ध्वज वृद्धि। इनमें पुरुष की इन्द्रियों की कमजोरी दूर करने के लिए अनेक प्रयोग दिये गये हैं जिनसे इन्द्रियजन्य दोष दूर होते हैं तथा लिंगल पुष्ट होकर विकासरत होता है।

दूसरा प्रकरण लेप महिमा का है इसमें स्त्री-पुरुष में परस्पर आकर्षण हेतु विभिन्न प्रकार के औषधीय लेप बताए गए हैं।

तीसरे प्रकरण में स्त्री के स्वरूप व स्वभाव के अनुरूप रति समय का निर्धारण किया गया है।

चौथे प्रकरण में आयुष्य प्रयोगों का वर्णन है जिसमें अधिक आयु के जराग्रस्त पुरुष पुन: यौवन प्राप्त करके अपनी क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं।

पंचम संस्करण में ‘स्त्री द्रावण व स्तम्भन’ के अचूक उपाय बताए गए हैं।

छठे प्रकरण में प्रौढ़ महिलाओं के शिथिल यौनांगों के पूर्व स्थिति में लाने के प्रयोग बताए गए हैं।

सातवें प्रकरण में संतति नियमन के उपाय बताए गए हैं। यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन युग के इस ग्रंथ में बर्थ कंट्रोल से सरल प्रयोग बताए गए हैं।

आठवाँ प्रकरण केश नाश से संबंधित है इसमें यौनागों के अवांछित केशो को स्थायी रूप से समाप्त करने के प्रयोग दिये गये हैं।

नवाँ प्रकरण गर्भाधान से संबंधित है। इसमें नि:संतान दम्पत्ति हेतु संतान प्राप्ति के सरल प्रयोग हैं।

दसमें प्रकरण में पुत्र प्राप्ति हेतु मंत्र व पूजा के प्रयोग दिये हैं जिनके प्रयोग से जो संतान हो वह पुत्र ही हो। जिन्हें बार-बार कन्याएँ उत्पन्न होती हों उनके लिये नाल परिवर्तन हेतु इस प्रकरण में अनेक प्रयोग दिये हैं।

अंतिम ग्यारहवें पूजन विधि नामक प्रकरण में स्त्री-पुरुष के गुप्त रोगों की चिकित्सा के उपाय बताए गये हैं।

इसी प्रकार हिन्दी में ‘‘कोकशास्त्र’’ नामक ग्रंथ भी प्रचलित है। इस ग्रंथ की रचना कामशास्त्र के एक विद्वान पंडित ‘कोका’ ने की थी।

प्राचीन काल में (समझा जाता है कि लगभग 7वीं सदी में) वैश्वदत्त नामक राजा के दरबार में पंडित तेजोक के पौत्र और गद्य विद्याधर पंडित पारभिद्र के सुपुत्र ‘कोक’ का बड़ा नाम था। कोक अपने पिता के समान ही सर्वशास्त्र निष्णात थे। ये कहाँ के निवासी थे इसके बारे में अनेक मत हैं। कुछ इन्हें उज्जयिनी का निवासी बताते हैं तो कुछ की मान्यता ये है कि पंडित ‘‘कोके’’ काश्मीर के थे किन्तु रति रहस्य नामक उसके ग्रंथ के तृतीय अध्याय के अंत में लिखे श्लोक से यह स्पष्ट होता है कि वे पाटल के रहने वाले थे।

कोक के विषय में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से एक सर्वप्रमुख है। इस कथा का उल्लेख एक जर्मन प्रोफेसर रिमड ने भी अपनी पुस्तक में किया था। कथा इस प्रकार है-

‘पंडित ‘कोक’ राजा भैरव सेन के राज दरबार के रत्नों में से एक थे। भैरव सेन को अपने राज दरबार के रत्नों में शामिल किया था। एक दिन हस्तिनी जाति की कोई स्त्री उनके दरबार में नग्नावस्था में आ गई। इससे राजा बड़े क्रोधित हुए। उन्होंने उस स्त्री को फटकारा कि उसे दरबार में नग्न होकर आने का साहस कैसे हुआ था ? इस पर उस स्त्री ने उत्तर दिया कि उसकी कामेच्छा को उस दिन तक कोई भी शांत नहीं कर पाया था। साथ ही उसने दरबार में उसकी कामपीड़ा को शांत करने हेतु किसी को भी आमंत्रित किया।

स्त्री की बात सुनकर राजा ने दरबारियों को उस स्त्री के दर्प को चूर करने और उसकी कामग्नि को शांत करने की आज्ञा दी। परन्तु कोई भी इसके लिए तैयार न हो सका। तब राजा ने सभा का अपमान होते देख उसे अपने घर ले गये और उन्होंने उसे इस प्रकार तृप्त किया कि वह उनकी दासी बनी गई। तब राजा के कहने से लोगों के उपकार के लिए अर्थात् लोक कल्याणार्थ कोका पंडित ने ‘रति रहस्य’ नामक एक ग्रंथ की रचना की।

 
ज़ोर का झटका धीरे से

मैं जब कॉलेज मे पढ़ती थी, तो हमारा सात लड़कियों का ग्रूप था. लेकिन उन सब मे पल्लवी मेरी खास सहेली थी. वो एक छ्होटे गाओं से आई थी. इस शहर मे पेयिंग गेस्ट बन के रहती थी. ऊम्र के हिसाब से हमको भी रोमॅन्स और सेक्स की बातें अच्च्ची लगती थी. हम लड़कों को देखते थे थे और उनके बारे मे बात किया करते थे. दिन मस्ती से गुज़र रहे थे. लेकिन हमेशा समय एक सा नही रहता.

जब हमारा कॉलेज का पहला साल पूरा हो रहा था, तो पल्लवी के पिताजी का अचानक देहांत हो गया. वैसे भी वो लोग ग़रीब थे. अब तो कॉलेज की पढ़ाई करना तो दूर रहा, घर चलना मुश्किल हो गया. उसके छ्होटे भाई बहन भी थे. मैं भी सहेली होने के नाते चिंतित थी, पर उसे पैसों की मदद करनेकी स्थिति हमारी ही नही थी. मुझे लगा, हमारा साथ च्छुत जाएगा. वो पढ़ नही पाएगी. लेकिन भाग्या को कुछ और मंज़ूर था. उसकी परिस्थिति से वाकिफ़ किसी दलाल ने उसे संपर्क किया और वो कॉल गर्ल बन गयी. उसकी मा को पता था. पर वो भी क्या करती ?

वो दिन मे कॉलेज अटेंड करती और रात को अपना काम करती. फिर तो वो अपने तरह तरह के अनुभव हमे सुनती थी. शुरू मे उसके दिल मे ग़लत काम का डंख रहता था, पर बाद मे वो सब निकल गया. उल्टा उसे मज़ा आने लगा. वो इतने रोचक ढंग से अपने अनुभव मुझे सुनती की मुझे भी उसकी तरह कॉल गर्ल बनने का जी कर जाता था. पर मैं ऐसा ना कर पाई. मुझे लगता था मैं जीवन की उन खुशियों को मिस कर रही हूँ, जिसे पल्लवी पा रही है. इसी तरह हमने पढ़ाई पूरी कर दी. सब बिखर गये. पल्लवी मुंबई चली गयी. वहाँ ज़्यादा स्कोप था उसके लिए.

मेरी मँगनी हो गयी. वो दूसरे गाओं से थे. तो मँगनी के बाद मुलाकात कम हुई. हां, हम लव लेटर और मैल से संपर्क मे थे.

शादी तय हो जाती है तो लड़कियों को सहेलियाँ ज़्यादा याद आती है. मुझे भी पल्लवी याद आई. अब कॉलेज को ही एक अरसा हो गया था. मैने मुंबई आने का फ़ैसला किया और पिताजी से रज़ा ले कर निकल पड़ी.

लंबे समय के बाद मैं आज उसे मिल रही थी. दोनो ने बहोट बाते की. दिनभर हम बात करते थे. रात होते वो अपने धंधे पर चली जाती थी. उसके चार एजेंट थे, जो उसके लिए बुकिंग किया करते थे. अब तो वो अलग अपना फ्लॅट ले कर रहती थी.

एक शाम हम बातें कर रहे थे की एक फोन आया. फोन पर बात कर के वो चिंतित हो गयी.

मैने पुचछा ; “क्या हुआ ? कोई समस्या ?”

उसके चेहरे पर उलज़ान नज़र आई. फिर उसने कहा ; “हां, समस्या तो है. लेकिन तू कुछ नही कर सकती.”

मैने कहा ; “फिर भी, बता तो सही.”

वो बोली ; “मेरा आज रात का होटेल गौरव का बुकिंग था. उसका 5000 नक्की हुआ है. लेकिन अभी जो फोन आया, वो दूसरे एजेंट का था. वो फुल नाइट, तीन आदमी का ऑफर लाया है.”

मैने कहा ; “तू अगर तीन आदमी पूरी रात नही सह सकती तो ना कर दे उसे. इस मे क्या उलज़ान है ?”

वो मुझ पर बिगड़ी ; “अर्रे तू कुछ समज़ाती नही है. पैसे मिलते हो तो मैं तीन क्या पाँच को भी ज़ेल लूँ. और यहाँ तो 25000 मिल रहे है.”

अब मुझे उलझन हुई, मैने कहा ; “तो स्वीकार कर ले.”

वो मूह नाचते मेरी नकल करते बोली ; “वा वा, स्वीकार कर ले, अच्च्ची सलाह दी. फिर वहाँ गौरव मे कौन जाएगी ? तू ?”

अब मैं बात समझी. इनके धंधे मे हां करनेके बाद ना नही कर सकते. नही तो वो एजेंट साथ छ्चोड़ देगा. पल्लवी को यह 25000 चाहिए थे, लेकिन 5000 वाला काम ले कर फाँसी थी.

पर उसके आखरी सवाल - “फिर वहाँ गौरव मे कौन जाएगी ? तू ?” – से मैं चौंकी ? उसने तो गुस्से मे ही कह दिया था. मगर मुझे कॉलेज के वो दिन याद आ गये जब उसके रोचक अनुभव सुन के मेरा भी कॉल गर्ल बनाने का जी करता था. आज मौका पाते ही वो पुरानी इच्च्छा प्रबल हो उठी, और मैने कह दिया ; “ हां, मैं जौंगी वहाँ, बस?”

वो आश्चर्या से मेरी और देखती ही रह गयी. उसकी नज़र मे सवाल था. बिना कुछ कहे वो मेरी और प्रश्ना भारी निगाह से देखती रही. मैं क्या जवाब दूं ? खुद मैं भी हैरान थी. वो पुरानी इच्च्छा का बीज इस तरह बड़ा हो के मेरे सामने आएगा, मैने कभी सोचा भी ना था. लेकिन वो भी मेरी अंतरंग सहेली थी. मेरी राग राग से वाकिफ़ थी. मेरे चेहरे पर बदलते रंगो को देख कर बोली ; “ ठीक है, पर बाद मे पचहताएगी तो नही ?” मैने नकार मे सिर हिलाया.

फिर तो उसने मुझे सारी सलाह दी. समय होते उसने एजेंट से कन्फर्मेशन भिजवा दिया की हू समय से पहुँच रही है. मुझे पल्लवी बनकर ही जाना था. ग्राहक नया था, तो वो उसे पहचानता नही था. पल्लवी मुझे होटेल पर छ्चोड़ गयी.

मैं लिफ्ट से रूम पर पहुँची. गाभहारते हुए लॉबी पसार की. रूम खोजा और डोर बेल बजाने जा रही थी की देखा की दरवाज़ा खुला है. मैं हल्के से अंदर दाखिल हुई और दरवाज़ा बाँध कर लिया. अंदर गयी, तो कोई नज़र नही आया… फिर ख़याल आया, बातरूम से आवाज़ आ रहा है, कोई नहा रहा है. मैं सोफा पर बैठी, इंतेज़ार करने के लिए. समय पसार करने के लिए कोई मॅगज़ीन धहोँढने के लिए नज़र दौड़ाई तो सेंटर टेबल पर पड़ी चित्ति पर ध्यान गया, लिखा था , “पल्लवी, ई गॉट कन्फर्मेशन फ्रॉम एजेंट तट योउ अरे रीचिंग इन टाइम. अनड्रेस युवरसेल्फ आंड जाय्न मे इन बात. “ मैं स्तब्ध हो गयी. मैं पल्लवी की जगह आ तो गयी, लेकिन वास्तविकता अब मेरे सामने थी. ये जनाब तो अंदर मेरा इंतेज़ार कर रहे है. मैने हिम्मत बटोरी, और अपने सारे कपड़े निकल दिए. पूरी नंगी हो कर धीरे से मैं ने बाथरूम का दरवाज़ा खोला.

वो नहा रहा था. शवर बाँध था, पर वो उसके नीचे खड़ा था. उसकी पीठ मेरी और थी. पूरे बदन पर साबुन लगा चक्का था. मूह पर भी साबुन था. वो मुझे देख नही पा रहा था. मैने राहत की साँस ली. मैं नज़दीक गयी और उसको पिच्चे से ही लिपट गयी. मेरे बूब्स उसकी पीठ पर टच हुए. दोनो को मानो करेंट लगा. मैने अपने हाथ उसकी च्चती पर फिराए, और उसकी पीठ पर अपने गाल घिसने लगी. (किस करने जैसी तो बिना साबुन की कोई जगह ही नही बची थी) उसने भी अपने हाथ पिच्चे फैलाए और मेरी जाँघो पर फिरने लगा. कोई कुछ बोल नही रहा था. मान-वुमन मॅजिक अपना कम कर रहा था. च्चती पार्स मैने हाथ नीचे सरकए. इन सारे वक्त मेरे बूब्स तो उसकी पीठ पर ही चिपके हुए थे. मेरे हाथ नीचे सरकते उसके कॉक तक पहुँच गये. मैं पहली बार, किसी मर्द के इस भाग को छ्छू रही थी. कॉक कड़क होने लगा. मैं उसे सहलाती रही, दबाती रही. वो “श, श” करने लगा. मैं अब तक जो पीठ पर बूब्स चिपका के गाल घिस रही थी, धीरे से नीचे की और सर्की. मैं बूब्स उसकी पीठ पर घिसते हुए नीचे जा रही थी. उसके हिप्स को अपने बूब्स से दबाती हुई मैं और नीचे उतार गयी. उसके हिप्स पर गाल घिसे. फिर मैं वहाँ से आयेज की और आई और उसका लंड मूह मे लिया. उसके हाथ मेरे सिर पर आ गये थे. मैं ने उसे पानी से साफ करके चूसना और चारों औरसे किस करना शुरू किया. साथ मे मैं उसके बॉल्स से भी खेल रही थी. दोनो के बादन मे आग लग चुकी थी. जब जी भरा तो मैं उपर उठी. अपने बूब्स उसके आयेज के बदन पर घिसती हुई मैं उपर उठी. मैने उसके होठ पर किस करना चाहा. पर वहाँ भी साबुन था. तो मैने शवर चालू किया. फुल फोर्स मे पानी बहना शुरू हुआ. मूह साफ हो गया, उसने आँखे खोली और हम दोनो चौंके……….दोनो के मूह से एक साथ एक ही शब्द निकला, “ तुम ???????? ” वो मेरा मंगेतर था !!!!!!!!!!!!!

दोनो के चेहरे पर एक साथ तरह तरह के भाव ज़लाक रहे थे ; शॉक, डिसबिलीफ, अंगेर, रिपेंटेन्स…..आंड वॉट नोट ?

 
छोटे लंड से गुज़ारा

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा आपके लिए एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो ये कहानी कुछ इस तरह है

यह कहानी उस समय की है जब मेरी नयी नयी शादी हुई थी. गाओं में पति पत्नी को मिलने के लिए मौका ढूँढना पड़ता है. रात में या तो पति चोरी से पत्नी की चारपाई पर आ जाता हे वारना कोई और जगह डूंड कर मिलन होता है. औरतों के लिए अलग वा मर्दों के लिए अलग सोने की जगह होती हे. इसी चोरी च्छूपे मिलने के कारण ही यह घटना घटी जो मेने अपनी आँखों से देखी कि कैसे छ्होटे भाई ने अपनी बड़ी बेहन को चोदा.मेरी बड़ी ननंद की शादी को चार साल हो चुके थे लेकिन उसका कोई बचा नहीं हुया था. हमारे गाओं के निकट एक मंदिर की बड़ी मान्यता थी के वॅन्हा जो भी मन्नत माँगता है पूरी होती है. मेरी ननंद भी इसीलिए हमारे यहाँ आई थी के वो भी मन्नत माँगे और मा बन सके. उस दिन मंदिर से हो कर लोटने के बाद वो और मैं एक कमरे मे बातें करते हुए सो गये थे लेकिन जिस चारपाई पर में सोती थी उस पर मेरी ननंद सो गयी और मैं उस के साथ वाली चारपाई पर सो गयी.रात को मेरा पति मेरे पास आया तो वो उस चारपाई पर जिस पर उसकी बेहन सोई थी चला गया, यह समझ कर के मैं उस पर सोई हूँ. मैं तो उस समय जाग रही थी लेकिन मेरी ननंद ( मेरे पति की बड़ी बेहन) सो चुकी थी. मैं चाहते हुए भी कुच्छ बोल ना पाई कि कही शोर मच जाए गा और यह बात खुल जाएगी के हम दोनो एक दिन भी मिले बिना नहीं रह सकते. मेरी चुप्पी से जो हो गया उस का मुझे अब भी पछतावा है लेकिन मेने यह बात अब तक ना तो अपने पति से कही है ना ही उस की बेहन से बताई है. भगवान की मर्ज़ी समझ कर चुप कर गयी और चुप ही हूँ और रहने की कोशिश कर रही हूँ.मैं चुप चाप देखती रही बड़ी बेहन को अपने छ्होटे भाई से चुदते हुए और कुच्छ ना कर सकी. मेरे पति ने भी मुझे समझ कर अपनी बड़ी बेहन को चोदा और उस की बड़ी बेहन ने अपना पति समझ कर अपने भाई से चूत मरवाई. जिस तरह हम पति पत्नी मज़ा लेते थे उसी तरह वो भाई बेहन चुदाई का मज़ा लेते रहे और में चुप चाप देखती रही.सुबह मेरी ननंद ने मुझे कहा' जानती है रात को सपने में तेरे नंदोई मेरे पास आए थे और आज रात को जितना मज़ा आया उतना पहले कभी नन्ही आया. आज तो उनका लंड भी काफ़ी लंबा और मोटा लग रहा था. लगता है यह सब बाबा ( मंदिर वाले) की कृपा है. मुझे लगता है के अब मेरे बच्चा ज़रूर हो जाएगा.'मेने कहा 'सब उपर वाले की कृपा है, मुझे भी लगता है के अब तेरे बच्चा जलदी ही हो जाए गा'वो बोली ' जलदी नही 9 महीने बाद'मैने कहा ' हाँ जल्दी से मेरा मतलब भी 9 महीने से ही है. यह तो में इसलिए कह रही हूँ के अब पक्का है के तू मा बन जाएगी'' मेरे बच्चा होने के बाद मैं मंदिर में प्रसाद चढ़ाने आउन्गि 'मैं सोच रही थी के प्रसाद तो तू चढ़ाने आए गी मंदिर में लेकिन बच्चा किस की कृपा से हुया है यह तो तू जानती ही नही और जब तक में बताउन्गि नहीं ना तुझे पता लगे गा ना तेरे पति को ना तेरे भाई को.अगले दिन वो अपने ससुराल चली गयी. रात को मेरा पति मेरे पास आया और मेरे से प्यार करने लगा लेकिन मेरा बार बार ध्यान उस की बेहन की ओर चला जाता था जो अंजाने में अपने छ्होटे भाई से चुद कर भी बहुत खुश थी.मेरे पति ने कहा 'क्या बात है आज तू कहाँ खोई है प्यार में मज़ा नही आ रहा क्या.'मेने जवाब दिया ' मज़ा तो बहुत आ रहा है लेकिन में सोच रहीं हूँ के यह चोरी चोरी प्यार कब तक करते रहेंगे . कोई ऐसा रास्ता निकालो के हमे चोरी चोरी ना मिलना पड़े.'' क्या बात है आज तुझे चोरी चोरी मिलने में मज़ा नहीं आ रहा जब के पिच्छाले 6 महीने से हम ऐसे ही मिल रहें हैं.'मैं चुप हो गयी और उसका लंड पकड़ कर देखने लगी के रात यह दूसरी चूत में गया था कुछ फरक पड़ा है या वैसा ही है. मेरे पति ने मुझे लंड को मुँह में लेने के लिए कहा तो मैं सोचने लगी के दूसरी चूत मे गया हुया लंड अपने मुँह में लूँ या नही. मेरा पति बोला क्या बात है आज तू कही और खोई हुई है कोई बात नही अगर तेरा दिल मुँह में लेने को नही करता तो कोई बात नही आज तेरी चूत में डाल कर ही इस की तसल्ली कर देता हूँ और उसने अपना लंड मेरी चूत में डाल दिया और चुदाई का काम कर के अपने कमरे में चला गया और मैं बार बार सोचती जा रही थी के रात को जो हुया है इस में दोनो भाई बेहन जिन्हे पता भी नही उनका इस में क्या कसूर है. मुझे याद आने लगी अपनी एक सहेली की कहानी कैसे वो अपने छ्होटे भाई से चुदाई करवाती थी. लेकिन उसने तो जान कर अपने छ्होटे भाई का लंड लिया था के वो अभी बच्चा है और उस का पानी नहीं निकलता इसलिए बच्चा होने का डर नहीं था. यान्हा तो अंजाने में बड़ी बेहन अपने छ्होटे भाई से चुदति रही और यह सोचती रही के उसका पति उसे चोद रहा है.पूरे 9 महीने बाद मेरी ननंद को एक सुंदर सा लड़का हो गया. मैं अपने पति के साथ उसे मिलने गयी. बच्चा बिल्कुल मेरे पति की शकल का था. वो कहने लगी' देखा अपने मामा पर गया है. मैं सोचती थी के अपने बाप पर ना जाए'.मेने कहा' क्यो अपने बाप पर क्यो नहीं' वो बोली ' इस का बाप तो तुझे पता है इतना सुन्दर नही और हर मा अपने बच्चे को सुंदर देखना चाहती है. इसके अलावा तुझे एक राज़ की बात बताउ यह तो मंदिर वाले बाबा का आशीर्वाद है वारना मेरा पति तो शायद ज़िंदगी भर बच्चा पैदा नन्ही कर सकता'मेने पूछा ' क्यो'वो बोली ' उसका लंड बहुत छ्होटा है और उसका पानी भी बहुत जलदी छ्छूट जाता है. मुझे तो उस रात सपने में पहली बार मज़ा आया था, जिस के कारण मेरा बच्चा हुया है'मैं उसकी बात सुन कर सोचने लगी कही इसे इस बात का पता तो नही है के यह बच्चा उसके भाई का है और जानबूझकर कर मुझे बार बार यह कह रही है के भगवान का प्रसाद है.उसका लड़का 5 साल का हो गया था और मेरे भी दो बच्चे हो गये थे. उसका क्यो के दूसरा बचा नही हुया था इसलिए वो फिर बाबा का आशीर्वाद माँगने आई. मेने उसे कहा' बेहन भगवान ने तुझे एक बार आशीर्वाद दे दिया है उसी में तसल्ली कर. ज़यादा लालच करने से भगवान नाराज़ हो जातें हैं.'वो बोली ' भाबी भगवान से तो हम ज़िंदगी भर माँगते हैं भगवान कभी किसी से नाराज़ नहीं होता.'दूसरे दिन हम मंदिर गये और वापस आ कर फिर वो मेरे कमरे में ही सो गयी और कहने लगी ' भाबी तुझे पता है इसी कमरे में मुझे सपने में मेरे पति के चोदने से बच्चा हुया था इसलिए मैं इसी चारपाई पर सोउंगी.'मुझे अब शक और भी ज़यादा होने लगा के यह जानभूज कर मेरे से छुपा रही है लेकिन इसे सब पता है के इस का पति इसे बच्चा नही दे सकता और यह बच्चा इस के भाई का ही है. लेकिन क्यो के अब हमारी शादी को 5 साल हो गये थे और हमारे दो बच्चे भी हो गये थे इसलिए रात को मेरे पति का मेरे पास आना कम हो गया था उस पर मेने अपने पति को कह दिया के आज तुम रात को मत आना. कही तुम्हारी बेहन जाग गयी तो बड़े शरम की बात होगी. मेरे पति ने कहा ' इस में शरम की क्या बात है हम पति पत्नी हैं' फिर भी वो मेरा कहना मान कर रात को नही आया. सुबह मेने अपनी ननंद से पूछा ' रात को कैसा सपना आया तो'वो कहने लगी' लगता है तेरी बात सच है भगवान मुझे दूसरा बच्चा नहीं देना चाहते,. रात को सपना तो नही आया और आता भी कैसे मुझे रात भर नींद ही नही आई.मैने सोचा अच्छा हुया मेने अपने पति को आने से रोक दिया वारना भेद खुल जाता.
 
वो अगले दिन अपनी ससुराल नही गयी तो मुझे फिर शक होने लगा के यह चाहती है के इस का भाई इसे चोदे और यह मा बने, लेकिन में उन्हें मौका नही देना चाहती थी. रात को वो बातें करते करते सो गयी लेकिन मुझे नींद नही आ रही थी. रात को देखा के मेरा पति चुप चाप आया और उसी चारपाई पर लेट गया जिस पर उसके बेहन लेटी थी. मैं जान बूझ कर चुप रह कर तमाशा देखना चाहती थी के वो जाग कर चुदाई करवाए गी या सोते हुए उसका भाई अंजाने में उस की चुदाई करता है. मैने देखा के मेरे पति ने उस का ब्लाउस खोला और उसके मम्मे पहले हाथ में लेकर दबाने लगा फिर मुँह में लेकर चूसने लगा. वो चुप चाप लेटी हुई थी अभी पता नही लग रहा था के वो सोई हुई है या उसे पता ही नही. थोड़ी देर बाद उसके भाई ने उस का लहंगा उपर किया और उसकी चूत पर हाथ फेरने लगा तो उसने अंगड़ाई ली. मुझे लगा के वो मज़ा ले रही है और जानबूझ कर चुप है. फिर भी आज मुझे सच्चाई को जानना था इसलिए बड़े ध्यान से देख रही थी के कैसे छ्होटे भाई से बड़ी बेहन चुदाई करवा रही है. जब उसने चूत हिलानी शुरू की तो मेरे पति उसके भाई ने अपना लंड उसकी चूत पर रख दिया. वो अपनी चूत को उपर उच्छालने लगी और उसके भाई ने अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया और फिर ज़ोर ज़ोर से झटके मार कर चुदाई करने लगा. अब यह भगवान जाने या वो दोनो के वो अंजाने में एक दूसरे से चुदाई करवा रहे थे या जानते हुए मज़े ले रहे थे. चुदाई के मज़े लेते हुए उन्होने मुँह से मुँह मिला कर एक दूसरी के होंठों का रस पीना शुरू किया तो मैं सोचने लगी के क्या इतना कुच्छ हो जाए और औरत को पता भी ना लगे ऐसा संभव है. लेकिन मुझे चाहे अपने पति का लंड दूसरी चूत में जाते अच्छा नहीं लग रहा था वो भी उसकी अपनी बेहन की चूत में लेकिन मेने सोच लिया था के मैं आज सच्चाई जान कर ही रहूंगी.अच्चानक मेने सुना के वो कह रही है ' भाई तेरी बेहन बहुत दिनो की प्यासी थी और तुझे कुच्छ कह भी नही सकती थी, लेकिन पिच्छली बार तुमने अपनी बीवी समझ कर जब मेरी चुदाई की तो मुझे पहली बार चुदाई का मज़ा आया था और उसके बाद बच्चा होने से तो मैं तेरे लंड की दीवानी हो गयी थी. तुझे आज बताउ के तेरे जीजा का लंड बिल्कुल छ्होटा है और मेरी क्या किसी भी औरत की तसल्ली नही कर सकता. कल तू नही आया तो मुझे नींद ही नही आई और मुझे एक दिन सिर्फ़ तेरा लंड लेने के लिए रुकना पड़ा.'' बोल मत मेरी पत्नी ने सुन लिया तो गड़बड़ हो जाएगी. यह तो ठीक है के पिच्छली बार मैं अपनी पत्नी के पास ही आया था और मुझे नहीं पता था के उसकी चारपाई पर तू सोई हुई है. लेकिन जब हो ही गया तो भगवान की मर्ज़ी समझ कर चुप करने में ही भलाई समझी'.'यह तो ठीक है होता है वोही जो मंज़ुरे खुदा होता है, लेकिन ऐसे कब तक चोरी चोरी मिलते रहेंगे और कब तक यह भेद बना रहेगा. पहले की बात दूसरी थी, जब तक तेरे लंड का स्वाद नही लिया था में तेरे जीजा के छ्होटे से लंड से ही गुज़ारा चला रही थी लेकिन अब तेरे लंड का स्वाद चखने के बाद इसके बिना रहा नहीं सकती.'' ऐसा कर कुच्छ दिन के लिए तू यही रह जा, फिर आगे की सोचेंगे.'सुबह मैने अपनी ननंद से पूछा ' रात को कोई सपना आया या नही'' रात बड़ा हसीन सपना आया, मज़ा आ गया, तेरी चारपाई में तो कोई जादू है. मेरे पति का लंड जो घर में छ्होटा लगता है यहाँ पर पता नही कैसे इतना बड़ा हो जाता है.'मैं सोचने लगी के इसे अभी यह बताउ के नहीं के मेने इनकी रात की बातें सुन ली है. फिर मैं यह सोच कर के अगर इन्हे यह कह दिया के मेने इनकी बातें सुन ली हैं तो इनका आगे का नाटक देखने का मज़ा नही मिलेगा. सच यह था के अब मुझे इनके झूठ की कहानी सुनने में मज़ा आने लगा था. अभी तो मेने अपने पति से इस बारे में ज़यादा बात ही नही की थी और मैं उस से बात करने की बजाए उसे रंगे हाथों पकड़ना चाहती थी. रात को मेरे बहुत कहने के बावज़ूद मेरी ननंद उसी चारपाई पर सोई और मैं रात भर भाई बेहन की चुदाई के मज़े लेती रही. एक बार दिल में आया के उठ कर उन्हें उस समय पकड़ लूँ जब भाई का लंड बेहन की चूत में होगा, लेकिन ना जाने क्यो मेने उनके मज़े में खलल डालना पसंद नही किया और चुप चाप भाई बेहन की चुदाई देखती रही. वो इस बार काफ़ी दिन रुकी और दोनो हर रात मेरे सामने ही खूब मज़े लेते रहे. अब कई साल हो गये हैं उसका एक और बच्चा भी हो गया है और वो ज़्यादा अब यहीं रहती है. मैने भी उन दोनो का राज ना तो कभी खोला खोलने की कोशिश की

तो दोस्तो कैसी लगी ये कहानी आपको ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

 
गंगा स्नान

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मैं गंगा स्नान के लिए त्रिवेणी घाट ऋषिकेश गई थी. बहुत भीड़ थी. समझ

नही आरहा था कि अपना बॅग कहाँ रखूं और कैसे नहाऊ? सीढ़ियों पर एक

अधेड़ उमर का जोड़ा (हज़्बेंड वाइफ बैठे थे उनके साथ उनकी एक बेटी जिसकी एज

10-11 के लगभग होगी. मुझे वो लोग सारीफ़ से लगे और मैने उस औरत से रिक्वेस्ट

की कि प्लीज़ आप मेरे बॅग का ध्यान रखेंगे और उनके हां कहने के बाद मैने

सब लोगों की तरह अपनी साडी उतरी और पेटिकोट का नाडा खोलकर अपने चुचो के

उपर तक खींच कर फिर से गाँठ मार दी, फिर मैने सीधी पर बैठ कर

पेटिकोट के अंदर अपने हाथ घुसेड कर अपना ब्लाउस और ब्रा खोलने के बाद पॅंटी

भी उतारी और बॅग मे डाल दी. अब मेरे बदन पर मेरे चुचो के उपर से लेकर

घुटनों तक केवल मेरा पेटिकोट था.

उस औरत ने सलवार कमीज़ पहनी थी, उसने भी झट से पहले अपनी कमीज़ और फिर

ब्रा उतारकर मॅक्सी पहनी और फिर सलवार भी उतार दी. उसके हज़्बेंड ने शर्ट पॅंट

और बनियान उतारकर कछे मे नहाने के लिए तैयार हो गया.

सबसे पहले वो आदमी पानी मे घुसा उसके साथ साथ उसकी वाइफ भी उसके पास

गयी और सॅफ्टी चैन पकड़ कर पानी मे गर्दन तक डुबकी मारने लगी. मैं भी

उनसे 4-5 फीट उपर की साइड सॅफ्टी चैन पकड़ कर डुबकी मारने लगी, जैसे ही मैं

डुबकी मारती मेरा पेटिकोट उपर उठकर पानी के उपर तैरने लगता और मेरे हिप्स

नंगे हो जाते. एक दो बार मैने एक हाथ से ही अपने पेटिकोट को खींचकर अपनी

दोनो थैएस को चिपकाकर उनके बीच मे फासकार डुबकी मारती मगर पानी के तेज

बहाओ मे फिर से पेटिकोट छिटक जाता और पानी के उपर आ जाता. पता नही वहाँ

पर हज़ारो मर्दो के बीच मे कितने मर्दों ने मेरा अग्वाडा और पिच्छवाड़ा देखा

होगा.

एक बार पानी से बाहर सीढ़ी पर आकर मैं अपने हाथों और पैरों को रगड़

रही थी कि मेरी निगाह उसी आदमी पर पड़ी जिनके पास मैने अपने बॅग रखा था,

वो चोरी चोरी मेरे बदन को निहार रहा था, उसका ध्यान अपनी वाइफ की तरफ कम

और मेरी तरफ ज़्यादा था.

मैं फिर से पानी घुसी और एक हाथ से सॅफ्टी चैन पकड़ कर डुबकी मारने लगी.

अबकी बार मैने एक हाथ से अपनी नाक बंदकर जैसे ही पूरा सर पानी मे डुबोया,

अचानक मेरे मूह मे खूब सारा पानी घुसने के कारण मेरी साँस अटक गयी और

हड़बड़ाहट मे मेरा सॅफ्टी चैन वाला हाथ छूट गया और मैं बहते हुए ज़ोर से

बचाआआआओ चिल्ला पड़ी और बेहोसी जैसी हालत मे पानी के अंदर डूब कर बहने

लगी. अचानक मैने पानी के अंदर ही महसूस किया कि कुच्छ हाथों ने मेरी

गर्दन को पकड़ कर पानी से बाहर खींचा अभी मेरा सर पानी से बाहर आया ही

था कि किसी ने गच्छ एक उंगली मेरी चूत मे घुसेड कर मुझे पानी से बाहर

निकालने की कोसिस करने लगा और मैं अपनी जान बचाने की लिए अपने हाथ से उसकी

टाँगो को पकड़ने की कोसिस करने लगी कि पहले तो उसके कछे के बाहर से ही

उसका लॅंड मेरे हाथ मे आया पर मैने झट से हाथ हटाया और अबकी बार उसके

कछे का लस्टिक मेरे हाथ मे आया. मेरा कमर से उपर की हिस्सा पानी के बाहर

आ चुका था आँख खुलने पर मैने पाया कि मेरा पेटिकोट नीचे के बजाई पूरा

का पूरा उपर की तरफ उठ गया था और सर पेटिकोट से ढक था.

ये सब कुच्छ इतनी जल्दी घट गया कि पता ही नही चला. किसी की उंगली अभी भी

मेरी चूत के अंदर थी और जैसे ही मुझे बाहर निकालने की कोसिस करते-करते

झटके से और अंदर घुसेड देता. किसी तरह उनलोगों ने मुझे खींच कर सीढ़ी

पर बिठाया और पता नही किस ने मेरा पेटिकोट मेरे सर से नीचे किया तो मैने

देखा मेरे चारों तरफ भीड़ खड़ी थी, जिनमे ज़्यादातर मर्द थे. मेरा शरम

के मारे बुरा हाल था, गर्दन उपर नही उठा पा रही थी, कई आवाज़े आ

रही थी, कोई पूच्छ रहा था "मेडम ठीक हो" कोई कहता "बहन जी घबराओ मत

भगवान ने बचा लिया" और ना जाने क्या क्या. वो औरत मेरा बॅग लेकर मेरे पास

ही लेकर आई और बोली "दीदी भगवान का सूकर है कि आप बच गयी हैं", अब

कपड़े पहनलो और मंदिर मे सवा 5 रुपये का परसाद चढ़ा कर घर जाना. मैने

बदहवासी मे टॉवल से सर पोंच्छा और दूसरा पेटिकोट सर के उपर से डालकर चुचो

के उपर अटककार गीले पेटिकोट का नाडा खोलकर नीचे सरकया और फिर साडी का एक

कोना कंधों पर ओढकर बिना ब्रा के ब्लाउस पहना. मुझे वहाँ से जाने की जल्दी

थी इसलिए फटाफट कपड़े पहन कर त्रिवेणी घाट से निकलकर मार्केट मे पहुँच

कर साँस ली.

अब मेरे दिमाग़ मे उथलपुथल होने लगी कि उन 10-11 मर्दों, जो मुझे घेरे हुए

थे, मे से किस मर्द ने मेरी चूत मे उंगली घुसेदी होगी, अंजाने मे घुसी होगी या

उसने जान बुझ कर घुसेदी होगी. चूँकि मेरा पेटिकोट नीचे के बजाई मेरे सर

के उपर पलटा हुवा था तो क्या इतने सारे लोगों ने मेरी 2 महीने से बिना सेव

की हुई चूत को देखा होगा?. अजीब हालत हो रही थी एक तरफ घबराहट के मारे

बदन काँप रहा था और दूसरी तरफ दिमाग़ मे उंगली का ख़याल आते ही चूत के

अंदर गीलापन महसूस होने लगा.

आअप लोग क्या बोलते हैं कि उस आदमी ने मेरी चूत मे उंगली अंजाने मे घुसेदी

होगी या अंजाने मे.

 
हिंदी सेक्सी कहानियाँ

मासूम--1

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी मासूम लेकर हाजिर हूँ

वो सर पर अपना पल्लू डाले घर से निकली. बाहर गर्मी बहुत ज़्यादा थी और

धूप काफ़ी तेज़ जबकि ये सिर्फ़ एप्रिल का महीना था. उसने टी.वी पर भी

सुना था के ये साल पिच्छले 50 सालों में सबसे गरम होगा.

दोपहर के वक़्त गाओं की सड़कें अक्सर सुनसान ही रहती थी. 1 बजने तक लोग

अपने अपने घर में घुस जाते

थे और शाम 4 या 5 बजे से पहले नही निकलते थे.

खाली सड़कों पर तेज़ कदम बढ़ाती वो गाओं से थोड़ा बाहर बने चर्च की तरफ बढ़ी.

पीछे से एक कार के आने की आवाज़ सुनकर वो सड़क के किनारे हो गयी. वो

जानती थी के कार किसकी है. रोज़ाना ये कार इसी वक़्त यहाँ से गुज़रती थी.

पर आज पीछे से आती कार तेज़ी के साथ गुज़री नही बल्कि उसके पास पहुँच कर

धीमी हो गयी.

"कैसी हो सिरिशा?" मेरसेडीज का शीशा नीचे हुआ

उसने रुक कर कार की तरफ देखा और दिल की धड़कन जैसे अपने आप तेज़ होने लगी.

विट्ठल पर गाओं की हर लड़की फिदा थी, उसकी अपनी दोनो बड़ी बहने भी. वो

देखने में था ही ऐसा. लंबा, चौड़ा ...... वो क्या कहते हैं अँग्रेज़ी में

.... हां, टॉल डार्क आंड हॅंडसम. वो हमेशा महेंगे कपड़े पेहेन्ता था,

महेंगी गाड़ियाँ चलाता था. उसने तो ये भी सुना था के विट्ठल के पापा का

इंडिया के हर

बड़े शहर में एक घर था.

"आपको मेरा नाम कैसे पता विट्ठल साहिब" वो खिड़की के थोड़ा करीब होते हुए बोली

"तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?" विट्ठल ने मुस्कुराते हुए सवाल के बदले सवाल किया

"कैसी बात करते हैं. आपको तो हर कोई जानता है" वो थोड़ा शरमाते हुए बोली

"ह्म्‍म्म्मम" विट्ठल मुस्कुराया "कहाँ जा रही हो?"

"चर्च तक"

"चर्च? सिरिशा पर तुम तो एक ब्रामिन हो........"

"मुझे वहाँ जाके अकेले बैठना अच्छा लगता है, इसलिए इस वक़्त जाती हूँ.

कोई नही होता चर्च में,

एकदम शांति, आराम से बैठ के भगवान को याद किया जा सकता है" सिरिशा एक

साँस में बोल गयी

"आअराम से, शांति से मंदिर में भी बैठा जा सकता है. या मंदिर के पुजारी

तुम्हें पसंद नही आते उस

गोरे फादर के सामने?"

फादर पीटर का नाम इस तरह सुनकर सिरिशा और भी शर्मा उठी. वो बाहर किसी देश

के थे, कौन सा पता नही पर यहाँ इंडिया में वो क्रिस्चियन धरम फेलाने के

लिए आए थे. वो अपने आपको एक मिशनरी कहते थे. जब वो चर्च में खड़े होकर

बोलते थे तो सिरिशा के दिल को एक अजीब सा सुकून मिलता था. कितना ठहराव था

उनकी बातों में, उनकी आवाज़ में.

जो भी बात कभी सिरिशा को परेशान करती, वो अक्सर कन्फेशन बॉक्स में बैठ कर

फादर पीटर से कह देती थी. यूँ चर्च में उनके सामने सब कुच्छ कन्फेस कर

लेना उसे बहुत पसंद था.

"तुम्हें पता है ये लोग यहाँ ग़रीब लोगों को पैसा देकर क्रिस्चियन बनाते

हैं?" वो अभी अपनी सोच में ही गुम थी के विट्ठल बोला

उसकी बात सुनकर एक अजीब तरह का गुस्सा सिरिशा के दिल में भर गया. उसने

विट्ठल की बात का जवाब देना ज़रूरी नही समझा और कार से हटकर आगे की तरफ

चल पड़ी.

"अर्रे इतनी गर्मी में कहाँ जा रही हो? आओ मैं छ्चोड़ देता हूँ" पीछे से

विट्ठल चिल्लाया उसकी बात सुनकर सिरिशा एक पल के लिए सोचने पर मजबूर हो

गयी.

चर्च अभी थोड़ा दूर था और आज

गर्मी कुच्छ ज़्यादा ही थी. वो चर्च तक पहुँचते पहुँचते पसीना पसीना हो

जाएगी और इस हालत में

चर्च जाना उसे अच्छा नही लगता था.

"गाड़ी में ए.सी. चल रहा है. मैं छ्चोड़ दूँगा तुम्हें" कहते हुए विट्ठल

ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला.

सिरिशा ने पल्लू अपने सर से हटाया और गाड़ी में पिछे की सीट पर जाकर बैठ

गयी. पर उस वक़्त चर्च जाने का उस वक़्त विट्ठल का शायद कोई इरादा नही

था.

"कहाँ जा रहे हैं हम?" गाड़ी जब एक चर्च जाने के बजाय एक दूसरे ही रास्ते

पर मूडी तो सिरिशा ने पुछा

"कहीं नही. चिंता मत करो तुम्हें चर्च छ्चोड़ दूँगा मैं" विट्ठल पिछे देख

कर मुस्कुराया.

उसके बाद जो हुआ वो सिरिशा के लिए एक सपने जैसा ही था, एक ऐसा बुरा सपना

जिसे सोचकर ही उसके दिल घबरा जाता था और गुस्सा से वो लाल हो जाती थी.

विट्ठल ने गाड़ी रोकी और उसके साथ बॅक्सीट पर आ गया था.

"छ्चोड़ दो मुझे, जाने दो" वो ज़बरदस्ती करने लगा तो सिरिशा रोते हुए बोली.

"बस एक बार .... कुच्छ नही होगा .... मज़ा आएगा तुझे भी" विट्ठल ने उसकी

सारी कमर तक उठा दी थी

"ये पाप है, तुम ऐसा नही कर सकते मेरे साथ"

"अर्रे कोई पाप वाप नही है" उसने अपनी पेंट की ज़िप खोली और नीचे को खिसकाई.

उसके बाद सिरिशा जैसे एक ज़िंदा लाश बन गयी थी. वो कार की पिच्छली सीट पर

पड़ी बाहर चिड़ियों के चहचाहने की आवाज़ें सुनती रही. उसको मालूम था के

जहाँ वो लोग रुके हुए हैं, वहाँ इस वक़्त दूर दूर तक कोई नही होता इसलिए

रोने चिल्लाने का कोई फ़ायदा नही था.

"जितनी मस्त तू उपेर से दिखती है, उससे कहीं ज़्यादा मस्त तू अंदर से है"

विट्ठल ने एक पल के लिए अपना सर उपेर उठाकर बोला और फिर से झुक कर उसकी

चूचियाँ चूसने लगा.

सिरिशा का ब्लाउस खुला था और ब्रा को विट्ठल ने खींच कर उपेर कर दिया था

ताकि उसकी दोनो चूचियो के साथ खेल सके. नीचे से उसने सारी को सिरिशा की

कमर तक चढ़ा दिया था और अपनी नंगी टाँगो के बीच विट्ठल को महसूस कर रही

थी.

"ये टाँग थोड़ी उपेर कर ना प्ल्स" विट्ठल अंदर दाखिल होने की कोशिश कर

रहा था पर अंदर जा नही पा रहा था.

सिरिशा ने बिना कुच्छ कहे उसकी बात मानती हुए अपनी एक टाँग को थोड़ा सा

हवा में उठा दिया. विट्ठल ने एक बार फिर उसके शरीर में दाखिल होने की

कोशिश की. सिरिशा पूरी तरह से बंद थी और ज़रा भी गीली नही हुई थी इसलिए

अंदर जाने की ये कोशिश विट्ठल के लिए काफ़ी तकलीफ़ से भरी महसूस हुई.

"एक काम कर ... थोड़ी देर मुँह में लेके चूस दे ना ... गीला हो जाएगा"

विट्ठल ने कहा तो सिरिशा ने गुस्से में उसकी तरफ देखा और बिना कुच्छ कहे

अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया.

"अर्रे नाराज़ क्यूँ होती है, मैं तो बस पुच्छ ही रहा था" विट्ठल ने नीचे

को झुक कर उसका गाल चूमा और फिर अपने हाथ पर थोड़ा सा थूक लिया और लगा कर

फिर से कोशिश की.

थोड़ी तकलीफ़ हुई पर इस बार लंड बिना रुके सिरिशा के अंदर तक दाखिल हो गया.

"आआअहह .... कितनी टाइट है तू .... आज तक चुदी नही क्या कभी?"

इस बार भी सिरिशा ने जवाब देना ज़रूरी नही समझा. दर्द के मारे उसकी चीख

निकलते निकलते रह गयी थी और आँखों में आँसू भर आए.

"मज़ा आ गया .... ओह्ह मेरी जान .... बहुत गरम है तू ... बहुत टाइट"

और भी जाने क्या क्या बकता हुआ विट्ठल अकेला ही मंज़िल की तरफ बढ़ चला.

सिरिशा की दोनो चूचियाँ उसके हाथों में थी और उसके गले को चूमता हुआ वो

धक्के पर धक्के लगा रहा था. उसके नीचे दबी सिरिशा बड़ी मुश्किल से अपने

आपको कार की सीट पर रोक पा रही थी. एक तो इतनी छ्होटी सी जगह और उसपर

विट्ठल के धीरे धीरे तेज़ होते धक्के, हर पल उसको लगता था के वो खिसक कर

नीचे गिर जाएगी.

"आआआहह" अचानक विट्ठल ने उसकी एक चूची पर अपने दाँत गढ़ाए तो उसकी चीख निकल गयी.

"सॉरी" वो दाँत दिखाता हुआ बोला "कंट्रोल नही, तेरी हैं ही ऐसी, इतनी

बड़ी और इतनी सॉफ्ट"

सिरिशा का दिल किया के मुक्का मार कर उसके दोनो दाँत तोड़ दे.

"जल्दी करो" वो पहली बार बोली

"जल्दी क्या है ... अच्छी तरह से मज़ा तो लेने दो" विट्ठल फिर धक्के लगाने लगा

"तुझे मज़ा नही आ रहा?"

सिरिशा कुच्छ नही बोली

"अर्रे बोल ना ... मज़ा नही आ रहा. कैसा लग रहा है मेरा तेरे अंदर?"

वो फिर भी कुच्छ नही बोली

"पूरी गीली हो चुकी है तू और कहती है के मज़ा नही आ रहा?"

विट्ठल ने कहा तो सिरिशा का ध्यान पहली बार इस तरफ गया. उसकी टाँगो के

बीच की जगह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और अब विट्ठल बड़ी आसानी के साथ

उसके अंदर बाहर हो रहा था.

"मेरी कार की सीट तक गीली कर दी है तूने"

वो सही कह रहा था. खुद अपनी कमर और कूल्हो के नीचे सिरिशा को कार की गीली

सीट महसूस हो रही थी. खुद उसका अपना शरीर उसे छ्चोड़ कर विट्ठल के साथ हो

चला था और उसे पता भी नही चला था.

वो पूरी तरह से खुल चुकी थी और उसका शरीर जैसे विट्ठल के हर धक्के का

स्वागत कर रहा था.

"निकलने वाला है मेरा" विट्ठल ने कहा और किसी पागल कुत्ते की तरह हांफता

हुआ धक्के लगाने लगा.

थोड़ी देर बाद उसको चर्च के सामने छ्चोड़ कर विट्ठल चलता बना. सिरिशा ने

एक पल के लिए सामने चर्च के दरवाज़े पर नज़र डाली और फिर अंदर जाने के

बजाय पलट कर वापिस घर की तरफ चल पड़ी.

वो इस हालत में चर्च कैसे जा सकती थी?

क्रमशः.........................
 
Masoom--1

Dosto main yaani aapka dost raj sharma ek our nai kahaani masoom lekar hajir hun

Vo sar par apna pallu daale ghar se nikli. Bahar garmi bahut zyada thi

aur dhhop kaafi tez jabki ye sirf April ka mahina tha. Usne T.V par

bhi suna tha ke ye saal pichhle 50 saalon mein sabse garam hoga.

Dopahar ke waqt gaon ki sadken aksar sunsan hi rehti thi. 1 bajne tak

log apne apne ghar mein ghus jaate

the aur shaam 4 ya 5 baje se pehle nahi nikalte the.

Khaali sadakon par tez kadam badhati vo gaon se thoda bahar bane

church ki taraf badhi.

Pichhe se ek car ke aane ki aawaz sunkar vo sadak ke kinare ho gayi.

Vo jaanti thi ke car kiski hai. Rozana ye car isi waqt yahan se

guzarti thi. Par aaj pichhe se aati car tezi ke saath guzri nahi balki

uske paas pahunch kar dheemi ho gayi.

"Kaisi ho Sirisha?" Mercedez ka sheesha neeche hua

Usne ruk kar car ki taraf dekha aur dil ki dhadkan jaise apne aap tez hone lagi.

Vitthal par gaon ki har ladki fida thi, Uski apni dono badi behne bhi.

Vo dekhne mein tha hi aisa. Lamba, chauda ...... vo kya kehte hain

angrezi mein .... haan, tall dark and handsome. Vo hamesha mehenge

kapde pehenta tha, mehengi gaadiyan chalata tha. Usne toh ye bhi suna

tha ke Vitthal ke papa ka India ke har

bade shehar mein ek ghar tha.

"Aapko mera naam kaise pata Vitthal sahib" Vo khidki ke thoda kareeb

hote hue boli

"Tumhein mera naam kaise pata?" Vitthal ne muskurate hue sawal ke

badle sawal kiya

"Kaisi baat karte hain. Aapko toh har koi janta hai" Vo thoda sharmate hue boli

"Hmmmmm" Vitthal muskuraya "Kahan ja rahi ho?"

"Church tak"

"church? Sirisha par tum toh ek Brahmin ho........"

"Mujhe vahan jaake akele bethna achha lagta hai, isliye is waqt jaati

hoon. Koi nahi hota church mein,

ekdam shanti, aaram se bethke bhagwan ko yaad kiya ja sakta hai"

Sirisha ek saans mein bol gayi

"Aaaram se, shanti se mandir mein bhi betha ja sakta hai. Ya mandir ke

pujrai tumhein pasand nahi aate us

gore father ke saamne?"

Father Peter ka naam is tarah sunkar Sirisha aur bhi sharma uthi. Vo

bahar kisi desh ke the, kaun sa pata nahi par yahan India mein vo

Christian dharam phelane ke liye aaye the. Vo apne aapko ek missionary

kehte the. Jab vo church mein khade hokar bolte the toh Sirisha ke dil

ko ek ajeeb sa sukoon milta tha. Kitna thehrav tha unki baaton mein,

unki aawaz mein.

Jo bhi baat kabhi Sirisha ko pareshan karti, vo aksar confession box

mein beth kar Father Peter se keh deti thi. Yun church mein unke

saamne sab kuchh confess kar lena use bahut pasand tha.

"Tumhein pata hai ye log yahan gareeb logon ko paisa dekar Christian

banate hain?" Vo abhi apni soch mein hi gum thi ke Vitthal bola

Uski baat sunkar ek ajeeb tarah ka gussa Sirisha ke dil mein bhar

gaya. Usne Vitthal ki baat ka jawab dena zaroori nahi samjha aur car

se hatkar aage ki taraf chal padi.

"Arrey itni garmi mein kahan ja rahi ho? Aao main chhod deta hoon"

Pichhe se Vitthal chillayaUski baat sunkar Sirisha ek pal ke liye

sochne par majboor ho gayi.

Church abhi thoda door tha aur aaj

garmi kuchh zyada hi thi. Vo church tak pahunchte pahunchte paseena

paseena ho jaayegi aur is halat mein

church jana use achha nahi lagta tha.

"Gaadi mein A.C. chal raha hai. Main chhod doonga tumhein" Kehte hue

Vitthal ne gaadi ka darwaza khola.

Sirisha ne pallu apne sar se hataya aur gaadi mein pichhe ki seat par

jakar beth gayi. Par us waqt church jaane ka us waqt Vitthal ka shayad

koi irada nahi tha.

"Kahan ja rahe hain ham?" Gaadi jab ek church jaane ke bajay ek doosre

hi raaste par mudi toh Sirisha ne puchha

"Kahin nahi. Chinta mat karo tumhein church chhod doonga main" Vithhal

pichhe dekh kar muskuraya.

uske baad jo hua vo Sirisha ke liye ek sapne jaisa hi tha, ek aisa

bura sapna jise sochkar hi uske dil ghabra jata tha aur gussa se vo

laal ho jaati thi. Vitthal ne gaadi roki aur uske saath backseat par

aa gaya tha.

"Chhod do mujhe, jaane do" Wo zabardasti karne laga toh Sirisha rote hue boli.

"Bas ek baar .... kuchh nahi hoga .... maza aayega tujhe bhi" Vitthal

ne uski saree kamar tak utha di thi

"Ye paap hai, tum aisa nahi kar sakte mere saath"

"Arrey koi paap vaap nahi hai" Usne apni pent ki zip kholi aur niche

ko khiskayi.

Uske baad Sirisha jaise ek zinda laash ban gayi thi. Vo car ki pichhli

seat par padi bahar chidiyon ke chehchahane ki aawazen sunti rahi.

Usko maalum tha ke jahan vo log ruke hue hain, vahan is waqt door door

tak koi nahi hota isliye rone chillane ka koi fayda nahi tha.

"Jitni mast tu uper se dikhti hai, usse kahin zyada mast tu andar se

hai" Vitthal ne ek pal ke liye apna sar uper uthakar bola aur phir se

jhuk kar uski chhatiyan choosne laga.

Sirisha ka blouse khula tha aur bra ko Vitthal ne khinch kar uper kar

diya tha taaki uski dono chhatiyon ke saath khel sake. Niche se usne

saree ko Sirisha ki kamar tak chadha diya tha aur apni nangi taango ke

beech Vitthal ko mehsoos kar rahi thi.

"Ye taang thodi uper kar na pls" Vitthal andar daakhil hone ki koshish

kar raha tha par andar ja nahi pa raha tha.

Sirisha ne bina kuchh kahe uski baat maanti hue apni ek taang ko thoda

sa hawa mein utha diya. Vitthal ne ek baar phir uske shareer mein

daakhil hone ki koshish ki. Sirisha poori tarah se band thi aur zara

bhi geeli nahi hui thi isliye andar jaane ki ye koshish Vitthal ke

liye kaafi takleef se bhari mehsoos hui.

"Ek kaam kar ... thodi der munh mein leke choos de na ... geela ho

jaayega" Vitthal ne kaha toh Sirisha ne gusse mein uski taraf dekha

aur bina kuchh kahe apna munh doosri taraf ghuma liya.

"Arrey naraz kyun hoti hai, main toh bas puchh hi raha tha" Vitthal ne

neeche ko jhuk kar uska gaal chuma aur phir apne haath par thoda sa

thook liya aur laga kar phir se koshish ki.

Thodi takleef hui par is baar lund bina ruke Sirisha ke andar tak

daakhil ho gaya.

"Aaaaahhhhhhhhhh .... kitni tight hai tu .... aaj tak chudi nahi kya kabhi?"

Is baar bhi Sirisha ne jawab dena zaroori nahi samjha. Dard ke maare

uski cheekh nikalte nikalte reh gayi thi aur aankhon mein aansoo bhar

aaye.

"Maza aa gaya .... ohh meri jaan .... bahut garam hai tu ... bahut tight"

Aur bhi jaane kya kya bakta hua Vitthal akela hi manzil ki taraf badh

chala. Sirisha ki dono chhatiyan uske haathon mein thi aur uske gale

ko choomta hua vo dhakke par dhakke laga raha tha. Uske niche dabhi

Sirisha badi mushkil se apne aapko car ki seat par rok pa rahi thi. Ek

toh itni chhoti si jagah aur uspar Vitthal ke dheere dheere tez hote

dhakke, har pal usko lagta tha ke vo khisak kar niche gir jaayegi.

"Aaaaaahhhhhh" Achanak Vitthal ne uski ek chhati par apne daant gadaye

toh uski cheekh nikal gayi.

"Sorry" Vo daant dikhata hua bola "Control nahi, teri hain hi aisi,

itni badi aur itni soft"

Sirisha ka dil kiya ke mukka maar kar uske dono daant tod de.

"Jaldi karo" Vo pehli baar boli

"Jaldi kya hai ... achhhi tarah se maza toh lene do" Vitthal phir

dhakke lagane laga

"Tujhe maza nahi aa raha?"

Sirisha kuchh nahi boli

"Arrey bol na ... maza nahi aa raha. Kaisa lag raha hai mera tere andar?"

Vo phir bhi kuchh nahi boli

"Poori geeli ho chuki hai tu aur kehti hai ke maza nahi aa raha?"

Vitthal ne kaha toh Sirisha ka dhyaan pehli baar is taraf gaya. Uski

taango ke beech ki jagah poori tarah se geeli ho chuki thi aur ab

Vitthal badi aasani ke saath uske andar bahar ho raha tha.

"Meri car ki seat tak geeli kar di hai tune"

Vo sahi keh raha tha. Khud apni kamar aur koolho ke niche Sirisha ko

car ki geeli seat mehsoos ho rahi thi. Khud uska apna shareer use

chhod kar Vitthal ke saath ho chala tha aur use pata bhi nahi chala

tha.

Vo poori tarah se khul chuki thi aur uska shareer jaise Vitthal ke har

dhakke ka swagat kar raha tha.

"Nikalne wala hai mera" Vitthal ne kaha aur kisi pagal kutte ki tarah

haanfta hua dhakke lagane laga.

Thodi der baad usko church ke saamne chhod kar Vitthal chalta bana.

Sirisha ne ek pal ke liye saamne church ke darwaze par nazar daali aur

phir andar jaane ke bajay palat kar vaapis ghar ki taraf chal padi.

Vo is halat mein church kaise ja sakti thi?

kramashah.........................
 
हिंदी सेक्सी कहानियाँ

मासूम--2

गतान्क से आगे...................

विट्ठल ने जो भी उसके शरीर के अंदर छोड़ा था, अब वो बाहर निकल कर उसकी

टाँगो पर बहता महसूस हो

रहा था.

उस दिन जो हुआ था, उसका ज़िक्र सिरिशा ने कभी किसी से नही किया. फादर

पीटर से भी नही.

2 हफ्ते बाद ही उसे वो खबर सुनने को मिल गयी थी. गाओं में हर कोई इसी

बारे में बात कर रहा था.

विट्ठल की शादी राजलक्ष्मी से होने जा रही थी. विट्ठल की तरह ही

राजलक्ष्मी का परिवार भी आस पास के इलाक़े मे काफ़ी जाना माना था. पर

जहाँ विट्ठल के घरवाले सिर्फ़ व्यापारी थे और सिर्फ़ कपड़ो और जूतो का

धंधा करना जानते थे, वहीं राजलक्ष्मी के घरवाले पैसे के कारोबार में थे.

कर्ज़े पर पैसा देना और ब्याज़ कमाना, यही उनका काम था और पॉलिटीशियन और

बड़े बड़े लोगों के साथ उनका बहुत उठना बैठना था. ये कहना ग़लत नही होगा

के वो ताक़त और प्रतिष्ठा में विट्ठल के परिवार से 100 गुना ज़्यादा थे.

दो रईस और बड़े परिवार के बीच हो रहा ये रिश्ता जैसे उस वक़्त हर किसी की

ज़ुबान पर था.

जब सिरिशा को विट्ठल की शादी के बारे में पता चला तो वो खुद जैसे नफ़रत

के एक अंधे कुएँ में गिर गयी. धीरे धीरे नफ़रत बदला लेने की एक भारी

इच्छा में तब्दील होने लगी. उसे ऐसा लगने लगा जैसे वो विट्ठल से बदला

लेने के लिए, उसे तड़प्ता देखने के लिए कुच्छ भी करने को तैय्यार थी.

पर ऐसा कुच्छ ना तो वो कर पाई और ना ही उसे करने को मौका मिला. ज़िंदगी

यूँ ही धीरे धीरे आगे बढ़ती रही और वो अपने आप में कुढती रही, जलती रही.

कई बार दिल में ख्याल आया के सबको बता दे के विट्ठल ने उसके साथ क्या

किया था पर वो बखुबी जानती थी के ऐसा करना सिर्फ़ खुद उसे ही बदनाम करता.

उसकी ज़िंदगी अपनी स्कूल की किताबो और चर्च के बीच सिमट कर रह गयी थी.

"तू इतनी बड़ी भक्त कैसे बन गयी? अपनी उमर की लड़कियों को देखा है? सजने

सवरने से फ़ुर्सत नही मिलती उन्हें और तू है के बस पुजारन बनी बैठी है"

उसकी माँ ने एक दिन उसे कहा था.

"मुझे अच्छा लगता है चर्च जाना. वहाँ भगवान के सामने बैठती हूँ तो ऐसा

लगता है जैसे मेरा कुच्छ नही च्छूपा उनसे, सब देख रहे हैं वो" जवाब में

सिरिशा बस इतना ही कह पाई थी.

2 महीने गुज़र गये और उसने फिर कभी विट्ठल को नही देखा. फादर पीटर भी अब

अपने देश वापिस जा चुके थे. अब कन्फेशन बॉक्स में बैठकर उसने दिल का हाल

सुनने वाला और उसे समझने वाला कोई नही था.

और फिर बरसात का मौसम भी आ गया. पूरे अगस्त के महीने भी बारिश ने रुकने

का नाम नही लिया. बादल हर वक़्त आसमान में छाए रहते और कभी भी अचानक

बरसने लगते. गाओं की सड़कों पर हर तरफ कीचड़ जमा हो गया था और छत पर हर

वक़्त पड़ती बारिश की बूँदों की आवाज़ जैसे कभी कभी पागल

ही कर देती थी. और अगर बारिश रुकती भी थी तो हवा में इतनी नमी होती के

इंसान बैठे बैठे ही पसीने से नहा जाए और फिर बारिश की दुआ करने लगे.

और एक दिन, जबके उसका पूरा परिवार उसके छ्होटे भाई का बर्तडे मनाने के

लिए इकट्ठा हुआ था, कुच्छ ऐसा हुआ जिसका डर सिरिशा को हफ़्तो से सता रहा

था. वो अपने छ्होटे कज़िन के साथ बैठी बाल्कनी में खेल रही थी के अचानक

वो अंजान बच्चा सबके सामने बोल पड़ा.

"दीदी आप कितनी मोटी हो गयी हो. देखो आपका पेट कैसे बाहर को निकल आया है"

पूरे घर में हर किसी की नज़र सिरिशा के पेट की तरफ हो गयी थी. जैसे

सिरिशा के पेट का वो उठान देखा तो सबने था पर इंतेज़ार कर रहे थे के पहले

कौन बोलेगा.

उस दिन सिरिशा को ना स्कूल जाने दिया गया और ना चर्च.

"हमें यूँ शर्मिंदा करके तुझे क्या मिला?" उसकी माँ ने रोते हुए उससे

पुछा था "क्या कमी रह गयी थी हमारी तरफ से जो तूने हमें ये दिन दिखाया?

कौन करेगा अब तुझसे शादी? इस उमर में अपने बाप का नाम इस तरह उच्छालके

तुझे क्या हासिल हुआ? वो तो अच्छा हुआ के वो ये दिन देखने से पहले ही चल

बसे?

आज अगर वो ज़िंदा होते तो खड़े खड़े ही मर जाते"

सुबह शाम इस तरह की बातों का जैसे एक सिलसिला ही चल निकला. कभी उसकी माँ

तो कभी रिश्तेदार. हर कोई उसे यही बातें सुनाता रहता और हर किसी की

ज़ुबान पर एक ही सवाल था,

"बच्चे का बाप कौन है?"

और जब सिरिशा से और बर्दाश्त ना हुआ तो उसने हार कर उस दोपहर के बारे में

सबको बता दिया जब उसे राह चलते विट्ठल मिल गया था.

"अगर बदनाम होना ही था तो मेरी मासूम बच्ची अकेली बदनाम नही होगी. अपने

हिस्से की बदनामी विट्ठल भी उठाएगा" बात ख़तम होने पर उसकी माँ ने कहा था

और हर कोई हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा था.

"इसको दाई के पास ले चलें? वो जानती हैं के बच्चा कैसे गिराते हैं" उसकी

बड़ी बहेन इंद्रा बोली

"तेरा दिमाग़ खराब हुआ है? उस औरत को बच्चा जानना तो आता नही, गिराएगी

क्या खाक" सिरिशा की माँ ने कहा

अगले दिन ही सिरषा अपनी माँ के साथ शहर के एक हॉस्पिटल में गयी थी.

टेस्ट्स से साबित हो गया था के वो प्रेग्नेंट थी.

"कुच्छ किया जा सकता है?" उसकी माँ ने डॉक्टर से पुछा

"जितनी जल्दी हो सके, इसकी शादी करा दीजिए" डॉक्टर ने जवाब दिया. वो उसके

पिता के एक पुराने दोस्त थे और अक्सर उनके घर आते जाते थे

"अब आप ही बताइए के इस मनहूस से शादी कौन करेगा? इस बच्चे का कुच्छ नही

हो सकता क्या?"

बाहर अब भी बारिश का मौसम था. आसमान में बदल इस कदर फेले हुए थे के दिन

में भी रात का एहसास होता था. कमरे में जल रहे बल्ब के चारो तरह अजीब

अजीब तरह के कीट पतंगे उड़ रहे थे.

"बच्चे का इंटेज़ाम मैं कर तो सकता हूँ" डॉक्टर बहुत धीमी आवाज़ में बोला

"पर पैदा होने के बाद. बच्चा इस वक़्त गिराया नही जा सकता. आपकी बेटी

वैसे ही बहुत दुबली पतली है और उपेर से 3 महीने की प्रेग्नेंट है. अगर जो

डेट्स ये हमें बता रही है वो सही हैं तो और 3 महीने में ये फुल टर्म हो

जाएगी. इस वक़्त कुच्छ भी किया तो मामला बिगड़ सकता है. बच्चे के साथ साथ

इसकी जान को भी ख़तरा हो सकता है"

"और अगर बच्चा पैदा किया" उसकी माँ ने मुँह बनाते हुए कहा "अगर पैदा किया

तो उसके बाद क्या?"

"मैं बच्चा रखना चाहती हूँ माँ" सिरिशा अचानक बोल पड़ी

"बेवकूफ़ मत बन"

"ये बच्चा मेरा है. मैं इसे पैदा करना चाहती हूँ. अपने पास रखना चाहती हूँ"

"और खर्चे कौन उठाएगा? कौन देखभाल करेगा तुम दोनो की?"

"मेरा होने वाला पति" सिरिशा ने अपनी माँ की आँख से पहली बार आँख मिलाई

"और कौन करेगा तुझसे शादी?"

"विट्ठल. मुझसे शादी वही करेगा जो मेरी इस हालत के लिए ज़िम्मेदार है"

"आपकी बेटी इतनी बेवकूफ़ है नही" डॉक्टर जो अब तक माँ बेटी की बातें सुन

रहा था बीच में बोल पड़ा.

"वैसे भी आपको इसकी शादी तो करनी है ही तो विट्ठल से ही एक बार बात चला

के देखिए. कोशिश करने में क्या हर्ज है?"

और फिर जैसा के सिरिशा चाहती थी, उसकी माँ उसे लेकर विट्ठल के घर जा

पहुँची. हैरानी सबको तब हुई जब विट्ठल ने बिना कोई ना नुकुर किए इस बात

की हामी भरी के उसने सिरिशा के साथ ज़बरदस्ती की थी. और उससे भी बड़ी

हैरानी तब हुई जब वो सिरिशा से शादी करने के लिए भी फ़ौरन तैय्यार हो

गया.

"शायद इतना बुरा ये है नही जितना मैं सोच रही थी" पहली बार सिरिशा के दिल

में विट्ठल के लिए एक नाज़ुक जगह बनी थी.

बात उड़ चुकी थी और साथ में उड़ चुका था विट्ठल के परिवार का नाम. हर तरफ

हो रही बदनामी से बचने का उनके पास अब एक ही रास्ता था और वो ये के जिस

ग़रीब लड़की का उनके बेटे ने फ़ायदा उठाया, वो उसे अपने घर की बहू बनाए.

और इसके लिए सबसे पहला कदम था राजलक्ष्मी के साथ तय हो चुकी विट्ठल की

शादी को तोड़ना.

किसी ने कहा के विट्ठल एक कायर था इसलिए शादी के लिए मान गया था.

किसी ने कहा के उसके घरवाले पोलीस के मामले में पड़ना नही चाहते थे इसलिए

शादी का ज़ोर डाला गया था.

किसी ने कहा था के सिरिशा ने विट्ठल पर रेप केस कर दिया था इसलिए शादी की

बात चला दी गयी थी.

किसी ने कहा, और जो कि खुद सिरिशा ने भी सोचा था, के विट्ठल उस बदसूरत

राजलक्ष्मी से शादी नही करना चाहता था इसलिए उसे फ़ौरन सिरिशा का हाथ थाम

लिया था. राजलक्ष्मी रईस और एक बड़े घराने से ज़रूर थी पर हर कोई जानता

था के वो देखने में सुंदर तो क्या, एक आम लड़की से भी गयी गुज़री थी,

और उपेर से कितनी मोटी भी तो थी वो. उसके मुक़ाबले मासूम सी दिखने वाली

सिरिशा तो जैसे आसमान से उतरी एक परी थी. विट्ठल ने ज़बरदस्ती राजलक्ष्मी

से हो रही अपनी शादी से बचने के लिए सिरिशा का सहारा लिया था.

मासूम--3

गतान्क से आगे...................

वजह जो भी थी, विट्ठल शादी के लिए मान गया था और उसने काफ़ी समझदार से

काम लिया था. और उससे कहीं ज़्यादा समझदारी दिखाई थी राजलक्ष्मी के

घरवालो ने. अंदर से भले ही उन्हें ही इस तरह रिश्ता तोड़ दिए जाने पर

बे-इज़्ज़ती महसूस हुई हो पर उपेर से उन्होने कुच्छ भी ज़ाहिर नही होने

दिया. और तो और, उन्होने तो विट्ठल के परिवार के साथ अपनी बोल-चाल भी

जारी रखी थी.

राजलक्ष्मी के तीनो भाइयों ने विट्ठल को अपने नये फार्म-हाउस पर आने का

नियोता तक भेज दिया ताकि दोनो परिवार के बीच जो कुच्छ भी हुआ था, वो

ख़ाता किया जा सके और वो लोग बिना दिल में कुच्छ रखे आगे बढ़ सकें.

विट्ठल भी यही चाहता था के इस सारे कांड में किसी को कोई नुकसान ना

पहुँचे इसलिए उसने फ़ौरन हां कर दी.

उसी दिन फार्म-हाउस की तरफ जाते हुए विट्ठल की कार का आक्सिडेंट हो गया

और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया था. ना तो उस ट्रक का पता चला जिससे

विट्ठल की कार की टक्कर हुई थी और ना ही उस ट्रक ड्राइवर का.

3 दिन बाद विट्ठल का क्रिया करम कर दिया गया. एक बार फिर बातों का बाज़ार

गरम हो चला था. कुच्छ को भरोसा था के विट्ठल के साथ जो कुच्छ हुआ उसमें

भगवान का हाथ था. एक मासूम लड़की के साथ किए गये उसके सलूक की सज़ा भगवान

ने उसे दी थी. भगवान नाराज़ थे और यही वजह थी के इस साल इस क़दर

बरसात हुई थी.

कुच्छ लोगों का मानना था के विट्ठल मरा नही बल्कि उसे मारा गया है.

राजलक्ष्मी के परिवार वाले इज़्ज़त और रोबदार लोग थे. अपनी बेटी की यूँ

शादी तोड़ दिए जाने से सरे-आम हुई बदनामी को वो कैसे बर्दाश्त कर सकते

थे. 3 भाइयों की वो अकेली बहेन थी. अपनी बहेन का बदला लिया था भाइयों ने.

"कुच्छ भी हो भाय्या" क्रिया करम में शामिल होने आए लोगों में से किसी ने

कहा था "हम कौन हैं बोलने वाले? पोलीस ने तो लड़के का शरीर ठंडा पड़ने से

पहले ही आक्सिडेंट बोलकर फाइल बंद कर दी थी. आक्सिडेंट कैसे हुआ, क्यूँ

हुआ ये जाने की कोशिश तक नही की गयी थी.

हैरत की बात थी के इतने दिन से लगातार हो रही बरसात उस दिन रुकी थी जिस

दिन विट्ठल की चिता को आग दी गयी.

सबको लगा था के विट्ठल की मौत का सिरिशा को बहुत सदमा होगा. आख़िर वो

उसके बच्चे का बाप था और उसका होने वाला पति. और शायद ऐसा हुआ भी. सिरिशा

पूरी तरह मातम में शामिल थी. लोगों की बात माने तो ये सदमा था या

कुच्छ और पर ड्यू डेट आई और निकल गयी पर सिरिशा को बच्चा नही हुआ.

और जब हुआ तब तक ड्यू डेट को एक पूरा महीना निकल चुका था. यानी तब सिरिशा

पूरे 10 महीने की प्रेग्नेंट थी.

हॉस्पिटल का पूरा खर्चा विट्ठल के परिवार ने उठाया. शहर के एक महेंगे

हॉस्पिटल में बच्चे को जनम दिया गया और पैदा होने से पहले ही विट्ठल के

पिता इस बात के एलान कर चुके थे के बच्चे को विट्ठल का नाम दिया जाएगा और

उसे पाल पोसने का पूरा खर्चा वो खुद उठाएँगे.

वो खुद अपने पैरवार के साथ बच्चा हो जाने के बाद सिरिशा से मिलने भी आए

थे और बच्चे का नाम-करण कर गये थे.

पूरा दिन सिरिशा को अकेले रहने का बिल्कुल मौका नही मिला. लोगों का आना

जाना लगा रहा. कोई ना कोई उससे मिलने आता रहता. तरह तरह के गिफ्ट्स कोई

नयी माँ के लिए लाता तो बच्चे के लिए.

कोई उसके घर का था तो कोई विट्ठल के घर का जिन्होने शायद तकदीर के आगे

हार मान ली थी और अपने बेटे की निशानी, उसके बच्चे को अपना लिया था.

आने वालो में कोई शकल सूरत से बच्चे को सिरिशा जैसा बताता तो कोई विट्ठल जैसा.

अगले दिन जब उसकी माँ घर से कुच्छ समान लाने के लिए गयी तो सिरिशा को

पहली बार बच्चे के साथ अकेले होने का मौका मिला. उसने प्यार से अपने

बच्चे को गोद में लिया और उसकी तरफ तूकटुकी लगाकर देखने लगी.

एक नज़र में ही उसे एहसास हो गया था के बच्चा ना तो उसके जैसा दिखता था

और ना ही विट्ठल के जैसा.

बच्चे की आँखें भूरे रंग की थी और ब्राउन आइज़ ना तो सिरिशा की थी और ना विट्ठल की.

उन दोनो की क्या, पूरे गाओं में भूरी आँखें किसी की नही थी. तो

क्या................सोचो दोस्तो सिरिशा क्या वास्तव मे मासूम थी क्या

बच्चा वास्तव विट्ठल का था या फिर....

दोस्तो कैसी लगी ये कहानी ज़रूर बताना आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त........

 


Masoom--2

gataank se aage...................

Vitthal ne jo bhi uske shareer ke andar chhod tha, ab vo bahar nikal

kar uski taango par behta mehsoos ho

raha tha.

Us din jo hua tha, uska zikr Sirisha ne kabhi kisi se nahi kiya.

Father Peter se bhi nahi.

2 hafte baad hi use vo khabar sunne ko mil gayi thi. Gaon mein har koi

isi baare mein baat kar raha tha.

Vitthal ki shaadi Rajalakshmi se hone ja rahi thi. Vitthal ki tarah hi

Rajalakshmi ka pariwaar bhi aas paas ke ilaake bhi kaafi jana mana

tha. Par jahan Vitthal ke gharwale sirf vyapari thi aur sirf kapdo aur

jooto ka dhandha karna jaante the, vahin Rajalakshmi ke gharwale paise

ke kaarobar mein the. Karze par paisa dena aur byaaz kamana, yahi unka

kaam tha aur politician aur bade bade logon ke saath unka bahut uthna

bethna tha. Ye kehna galat nahi hoga ke vo taaqat aur pratishtha mein

Vitthal ke pariwar se 100 guna zyada the.

Do raees aur abde pariwar ke beech ho raha ye rishta jaise us waqt har

kisi ki zubaan par tha.

Jab Sirisha ko Vitthal ki shaadi ke baare mein pata chala toh vo khud

jaise nafrat ke ek andhe kuen mein gir gayi. Dheere dheere nafrat

badla lene ki ek bhaari ichha mein tabdeel hone lagi. Use aisa lagne

laga jaise vo Vitthal se badla lene ke liye, usse tadapta dekhne ke

liye kuchh bhi karne ko taiyyar thi.

Par aisa kuchh na toh vo kar paayi aur na hi use karne ko mauka mila.

Zindagi yun hi dheere dheere aage badhti rahi aur vo apne aap mein

kudhti rahi, jalti rahi. Kai baar dil mein khyaal aaya ke sabko bata

de ke Vitthal ne uske saath kya kiya tha par vo bakhubhi jaanti thi ke

aisa karna sirf khud use hi badnaam karta.

Uski zindagi apni school ki kitabo aur church ke beech simat kar reh gayi thi.

"Tu itni badi bhakt kaise ban gayi? Apni umar ki ladkiyon ko dekha

hai? Sajne sawarne se fursat nahi milti unhen aur tu hai ke bas

pujarin ban bethi hai" Uski maan ne ek din use kaha tha.

"ujhe achha lagta hai Church jana. Vahan bhagwan ke saamne bethti hoon

toh aisa lagta hai jaise mera kuchh nahi chhupa unse, sab dekh rahe

hain vo" Jawab mein Sirisha bas itna hi keh paayi thi.

2 mahine guzar gaye aur usne phir kabhi Vitthal ko nahi dekha. Father

Peter bhi ab apne desh vaapis ja chuke the. Ab confession box mein

bethkar usne dil ka haal sunne wala aur use samajhne wala koi nahi

tha.

Aur phir barsaat ka mausam bhi aa gaya. Poore August ke mahine bhi

baarish ne rukne ka naam nahi liya. Badal har waqt aasman mein chhaye

rehte aur kabhi bhi achanak barasne lagte. Gaon ki sadkon par har

taraf kichad jama ho gaya tha aur chhat par har waqt padti baarish ki

boondon ki aawaz jaise kabhi kabhi pagal

hi kar deti thi. Aur agar baarish rukti bhi thi toh hawa mein itni

nami hoti ke insaan bethe bethe hi pasine se naha jaaye aur phir

barish ki dua karne lage.

Aur ek din, jabke uska poora pariwaar uske chhote bhai ka birthday

manane ke liye ikattha hua tha, kuchh aisa hua jiska darr Sirisha ko

hafto se sata raha tha. Vo apne chhote cousin ke saath bethi balcony

mein khel rahi thi ke achanak vo anjaan bachcha sabke saamne bol pada.

"Didi aap kitni moti ho gayi ho. Dekho aapka pet kaise bahar ko nikal aaya hai"

Poore ghar mein har kisi ki nazar Sirisha ke pet ki taraf ho gayi thi.

Jaise Sirisha ke pet ka vo uthaan dekha toh sabne tha par intezaar kar

rahe the ke pehle kaun bolega.

Us din Sirisha ko na school jaane diya gaya aur na church.

"Hamein yun sharminda karke tujhe kya mila?" Uski maan ne rote hue

usse puchha tha "Kya kami reh gayi thi hamari taraf se jo tune hamein

ye din dikhaya? Kaun karega ab tujhse shaadi? Is umar mein apne baap

ka naam is tarah uchhalke tujhe kya haasil hua? Vo toh achha hua ke vo

ye din dekhne se pehle hi chal base?

Aaj agar vo zinda hote toh khade khade hi mar jaate"

Subah shaam is tarah ki baaton ka jaise ek silsila hi chal nikla.

Kabhi uski maan toh kabhi rishtedaar. Har koi use yahi baatein sunata

rehta aur har kisi ki zubaan par ek hi sawal tha,

"Bachche ka baap kaun hai?"

Aur jab Sirisha se aur bardasht na hua toh usne haar kar us dopahar ke

baare mein sabko bata diya jab use raah chalte Vitthal mil gaya tha.

"Agar badnaam hona hi tha toh meri masoom bachchi akeli badnaam nahi

hogi. Apne hisse ki badnami Vitthal bhi uthayega" Baat khatam hone par

uski maan ne kaha tha aur har koi hairani se unki taraf dekhne laga

tha.

"Isko daai ke paas le chalen? Vo jaanti hain ke bachcha kaise girate

hain" Uski badi behen Indra boli

"Tera dimaag kharab hua hai? Us aurat ko bachcha janna toh aata nahi,

girayegi kya khaak" Sirisha ki maan ne kaha

agale din hi Sirsha apni maan ke saath shehar ke ek hospital mein gayi

thi. Tests se saabit ho gaya tha ke vo pregnant thi.

"Kuchh kiya ja sakta hai?" Uski maan ne doctor se puchha

"Jitni jaldi ho sake, iski shaadi kara dijiye" Doctor ne jawab diya.

Vo uske pita ke ek purane dost the aur aksar unke ghar aate jaate the

"Ab aap hi bataiye ke is manhoos se shaadi kaun karega? Is bachche ka

kuchh nahi ho sakta kya?"

Bahar ab bhi baarish ka mausam tha. Aasman mein badal is kadar phele

hue the ke din mein bhi raat ka ehsaas hota tha. Kamre mein jal rahe

bulb ke chaaro tarah ajeeb ajeeb tarah ke keet patange ud rahe the.

"Bachche ka intezaam main kar toh sakta hoon" Doctor bahut dheemi

aawaz mein bola "Par paida hone ke baad. Bachcha is waqt giraya nahi

ja sakta. Aapki beti vaise hi bahut dubli patli hai aur uper se 3

mahine ki pregnant hai. Agar jo dates ye hamein bata rahi hai vo sahi

hain toh aur 3 mahine mein ye full term ho jaayegi. Is waqt kuchh bhi

kiya toh mamla bigad sakta hai. Bachche ke saath saath iski jaan ko

bhi khatra ho sakta hai"

"Aur agar bachcha paida kiya" Uski maan ne munh banate hue kaha "Agar

paida kiya toh uske baad kya?"

"Main bachcha rakhna chahti hoon maan" Sirisha achanak bol padi

"Bevakoof mat ban"

"Ye bachcha mera hai. Main ise paida karna chahti hoon. Apne paas

rakhna chahti hoon"

"Aur kharche kaun uthayega? Kaun dekhbhaal karega tum dono ki?"

"Mera hone wala pati" Sirisha ne apni maan ki aankh se pehli baar aankh milayi

"Aur kaun karega tujhse shaadi?"

"Vitthal. Mujhse shaadi vahi karega jo meri is halat ke liye zimmedar hai"

"Aapki beti itni bevakoof hai nahi" Doctor jo ab tak maan beti ki

baatein sun raha tha beech mein bol pada.

"Vaise bhi aapko iski shaadi toh karni hai hi toh Vitthal se hi ek

baar baat chalake dekhiye. Koshish karne mein kya harj hai?"

Aur phir jaisa ke Sirisha chahti thi, uski maan use lekar Vitthal ke

ghar ja pahunchi. Hairani sabko tab hui jab Vitthal ne bina koi na

nukur kiye is baat ki haami bhari ke usne Sirisha ke saath zabardasti

ki thi. Aur usse bhi badi hairani tab hui jab vo Sirisha se shaadi

karne ke liye bhi fauran taiyyar ho gaya.

"Shayad itna bura ye hai nahi jitna main soch rahi thi" Pehli baar

Sirisha ke dil mein Vitthal ke liye ek naazuk jagah bani thi.

Baat ud chuki thi aur saath mein ud chuka tha Vitthal ke pariwar ka

naam. Har taraf ho rahi badnami se bachne ka unke paas ab ek hi rasta

tha aur vo ye ke jis gareeb ladki ka unke bete ne fayda uthaya, vo use

apne ghar ki bahu banaye. Aur iske liye sabse pehla kadam tha

Rajalakshmi ke saath tai ho chuki Vitthal ki shaadi ko todna.

Kisi ne kaha ke Vitthal ek kaayar tha isliye shaadi ke liye maan gaya tha.

Kisi ne kaha ke uske gharwale police ke maamle mein padna nahi chahte

the isliye shaadi ka zor dala gaya tha.

Kisi ne kaha tha ke Sirisha ne Vitthal par rape case kar diya tha

isliye shaadi ki baat chala di gayi thi.

Kisi ne kaha, aur jo ki khud Sirisha ne bhi socha tha, ke Vitthal us

badsurat Rajalakshmi se shaadi nahi karna chahta tha isliye use fauran

Sirisha ka haath thaam liya tha. Rajalakshmi raees aur ek bade gharane

se zaroor thi par har koi jaanta tha ke vo dekhne mein sundar toh kya,

ek aam ladki se bhi gayi guzri thi,

Aur uper se kitni moti bhi toh thi vo. Uske mukaable Masoom si dikhne

wali Sirisha toh jaise aasman se utri ek pari thi. Vitthal ne

zabardasti Rajalakshmi se ho rahi apni shaadi se bachne ke liye

Sirisha ka sahara liya tha.

Vajah jo bhi thi, Vitthal shaadi ke liye maan gaya tha aur usne kaafi

samajhdar se kaam liya tha. Aur usse kahin zyada samajhdari dikhayi

thi Rajalakshmi ke gharwalo ne. Andar se bhale hi unhein hi is tarah

rishta tod diye jaane par be-izzati mehsoos hui ho par uper se unhone

kuchh bhi zaahir nahi hone diya. Aur to aur, unhone toh Vitthal ke

pariwar ke saath apni bol-chaal bhi jaari rakhi thi.

Rajalakshmi ke teeno bhaaiyon ne Vitthal ko apne naye farm-house par

aane ka niyota tak bhej diya taaki dono pariwar ke beech jo kuchh bhi

hua tha, vo khata kiya ja sake aur vo log bina dil mein kuchh rakhe

aage badh saken. Vitthal bhi yahi chahta tha ke is saare kaand mein

kisi ko koi nuksaan na pahunche isliye usne fauran haan kar di.

Usi din Farm-house ki taraf jaate hue Vitthal ki car ka accident ho

gaya aur usne mauke par hi dam tod diya tha. Na toh us truck ka pata

chala jisse Vitthal ki car ki takkar hui thi aur na hi us truck driver

ka.

3 din baad Vitthal ka kriya karam kar diya gaya. Ek baar phir baaton

ka bazar garam ho chala tha. Kuchh ko bharosa tha ke Vitthal ke saath

jo kuchh hua usmein bhagwan ka haath tha. Ek masoom ladki ke sath kiye

gaye uske salook ki saza bhagwan ne use di thi. Bhagwan naraz the aur

yahi vajah thi ke is saal is qadar

barsaat hui thi.

Kuchh logon ka maanna tha ke Vitthal mara nahi balki use mara gaya

hai. Rajalakshmi ka pariwar wale izzat aur robdaar log the. Apni beti

ki yun shaadi tod diye jaane se sare-aam hui badnami ko vo kaise

bardasht kar sakte the. 3 Bhaiyon ki vo akeli behen thi. Apni behen ka

badla liya tha bhaiyon ne.

"Kuchh bhi ho bhaiyya" Kriya karam mein shaamil hone aaye logon mein

se kisi ne kaha tha "Ham kaun hain bolne wale? Police ne toh ladke ka

shareer thanda padne se pehle hi accident bolkar file band kar di thi.

Accident kaise hua, kyun hua ye jaane ki koshish tak nahi ki gayi thi.

Hairat ki baat thi ke itne din se lagatar ho rahi barsaat us din ruki

thi jis din Vitthal ki chita ko aag di gayi.

Sabko laga tha ke Vitthal ki maut ka Sirisha ko bahut sadma hoga.

Aakhir vo uske bachche ka baap tha aur uska hone wala pati. Aur shayad

aisa hua bhi. Sirisha poori tarah matam mein shaamil thi. Logon ke

baat maane toh ye sadma tha ya

kuchh aur par Due date aayi aur nikal gayi par Sirisha ko bachcha nahi hua.

Aur jab hua tab tak Due date ko ek poora mahina nikal chuka tha. Yaani

tab Sirisha poore 10 mahine ki pregnant thi.

Hospital ka poora kharcha Vitthal ke pariwar ne uthaya. Shehar ke ek

mehenge hospital mein bachche ko janam diya gaya aur paida hone se

pehle hi Vitthal ke pita is baat ke elaan kar chuke the ke bachche ko

Vitthal ka naam diya jaayega aur use paal posne ka poora kharcha vo

khud uthayenge.

Vo khud apne pairwar ke saath bachcha ho jaane ke baad Sirisha se

milne bhi aaye the aur bachche ka naam-karan kar gaye the.

Poora din Sirisha ko akele rehne ka bilkul mauka nahi mila. Logon ka

aana jana laga raha. Koi na koi usse milne aata rehta. Tarah tarah ke

gifts koi nayi maan ke liye lata toh bachche ke liye.

Koi uske ghar ka tha toh koi Vitthal ke ghar ka jinhone shayad takdeer

ke aage haar maan li thi aur apne bete ki nishani, uske bachche ko

apna liya tha.

Aane walo mein koi shakal soorat se bachche ko Sirisha jaisa batata

toh koi Vitthal jaisa.

Agle din jab uski maan ghar se kuchh saman laane ke liye gayi toh

Sirisha ko pehli baar bachche ke saath akele hone ka mauka mila. Usne

pyaar se apne bachche ko god mein liya aur uski taraf tuktuki lagakar

dekhne lagi.

Ek nazar mein hi use ehsaas ho gaya tha ke bachcha na toh uske jaisa

dikhta tha aur na hi Vitthal ke jaisa.

Bachche ki aankhen bhoore rang ki thi aur brown eyes na toh Sirisha ki

thi aur na Vitthal ki.

Un dono ki kya, poore gaon mein bhoori aankhen kisi ki nahi thi.

samaapt........
 
हिंदी सेक्सी कहानियाँ

दा मैड

"क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?" रचना ने दरवाज़ा खोला तो मैं फूल आगे बढ़ता हुआ बोला

"बाहर मत खड़े रहो अंदर आओ, कोई देख लेगा" उसने मेरी शर्ट पकड़ कर मुझे

अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद कर लिया.

"अर्रे देखने दो, यहाँ तुम लोगों को जानता ही कौन है" मैं अंदर आता हुआ बोला

"जानते फिलहाल नही हैं तो इसका मतलब ये नही के कभी नही जानेंगे. बाद में

मोम डॅड से लोग बातें करेंगे तो बताएँगे नही के आपके पिछे आपकी लड़की रात

को घर पर लड़के बुलाती है"

रचना अपने माँ बाप की एकलौती लड़की थी और पिच्छले हफ्ते ही उन्होने इस

नये घर में शिफ्ट किया था.

मैं पिच्छले 5 साल से उसे जानता था, उससे प्यार करता था और सही मौके की

तलाश में था के बात को घरवालो की मर्ज़ी से आगे बढ़ाया जाए. उस रात उसके

मोम डॅड किसी रिलेटिव के यहाँ रुके हुए थे तो उसने मुझे फोन करके बुला

लिया.

मैं अपना कोट उतारता हुआ ड्रॉयिंग रूम में दाखिल हुआ. रात के करीब 11.30

बज रहे थे. बाहर मौसम ठंडा था पर घर के अंदर हीटर ऑन होने की वजह से कमरे

का टेंपॅरेचर गरम था. ड्रॉयिंग रूम में ही उनके घर में काम करने वाली

लड़की ज़मीन पर बैठी टीवी देख रही थी.

"आइ थॉट यू सेड यू वर अलोन?" मैने रचना की तरफ देखते हुए कहा तो उसने

मुझे आँख मारी और पलट कर फ्रिड्ज से कुच्छ खाने को निकालने लगी.

मैं सोफे पर आकर बैठ गया और टीवी देखने लगा. उस लड़की ने एक बार मेरी तरफ

देखा. मैं जवाब में मुस्कुराया पर वो अजीब नज़रों से मुझे देखती वहाँ से

उठी और एक कमरे के अंदर चली गयी.

"यू वाना ईट हियर ओर यू वाना गो टू दा बेडरूम?" रचना ने मुझसे पुछा तो

मैने इशारे से कहा के बेडरूम में चलते हैं हाथ में खाने की प्लेट्स उठाए

हम उसके बेडरूम तक पहुँचे.

"घर तो बहुत मस्त है" मैने खाने की प्लेट्स टेबल पर रखते हुए कहा

"और काफ़ी सस्ते में मिला है डॅड कह रहे थे. ही सेड इट वाज़ आ प्रेटी गुड

डील" रचना झुकी हुई खाना टेबल पर लगा रही थी.

उसने उस वक़्त एक स्कर्ट और टॉप पहेन रखा था. स्कर्ट घुटनो तक था और आगे

को झुकी होने के कारण टॉप खींच कर उपेर हो गया था.

"आइ थिंक प्रेटी गुड डील तो ये है जो मुझे मिली है" मैने आगे बढ़कर उसकी

कमर को पकड़ते हुए अपना खड़ा लंड उसकी गांद पर टीका दिया.

"औचह" वो फ़ौरन ऐसे खड़ी हुई जैसे बिच्छू ने डॅंक मार दिया हो "क्या करते हो?"

"तुम्हें प्यार" मैने फ़ौरन उसको अपनी तरफ घुमाया और होंठ उसके होंठों पर रख दिए.

"खाना तो खा लो" वो किस के बीच में बोली

"पूरी रात पड़ी है"

"ठंडा हो जाएगा"

"गरम कर लेंगे. खाने के साथ साथ ज़रा हम दोनो भी ठंडे हो लें"

वो अच्छी तरह जानती थी के फिलहाल मुझसे बहस करने का कोई फायडा नही था

इसलिए बिना आगे कुच्छ बोले मेरा साथ देने लगी.

हम दोनो उसके बेड के पास खड़े हुए थे. वो अपने पंजो पर खड़ी मेरे होंठों

को चूस रही थी और मेरे हाथ उसके टॉप के अंदर उसकी नंगी कमर को सहला रहे

थे.

"क्या इरादा है?" अपने पेट पर कपड़ो के उपेर से ही मेरे खड़े लंड को

महसूस करते हुए वो बोली

"तुम्हें चोदने का" मैं आँख मारते हुए कहा और आगे को झुक कर उसके गले को

चूमने लगा. मेरे हाथ अब उसकी कमर से नीचे सरक कर उसकी गांद तक पहुँचे.

"ओह लव" उसने मुझसे लिपट-ते हुए एक ठंडी आह भरी. मैने धीरे धीरे उसके

स्कर्ट को उपेर की ओर उठाना शुरू कर दिया.

"वेट. उतार ही दो" वो बोली

हम दोनो एक पल के लिए अलग हुए और वो मुस्कुराती हुई बेड पर चढ़ कर खड़ी हो गयी.

"लेट्स स्ट्रीप टुगेदर"

उसने कहा तो हम दोनो ने एक दूसरे के देखते हुए एक साथ कपड़े उतारने शुरू

कर दिए. उसने टी-शर्ट और स्कर्ट के नीचे कुच्छ भी नही पहना हुआ था. अगले

ही पल वो नंगी हो चुकी थी.

"नो अंडरगार्मेंट्स?" मैने मुस्कुराते हुए पुच्छा और पूरी तरह नंगा होकर

बिस्तर पर चढ़ गया

"पता था के तुम आओगे तो वैसे ही उतारने पड़ेंगे तो सोचा के पेहेन्के फायडा ही क्या"

वो बिस्तर पर अपनी पीठ पर लेट गयी और दोनो टांगे खोल दी. मैं इशारा समझ

गया. पेट पर उल्टा लेट कर मैने उसकी टाँगो को अपने कंधो पर रखा. उसकी चूत

किसी फूल की तरह खुल चुकी थी और रस टपका रही थी.

"यू आर सोकिंग वेट" मैने कहा और आगे बढ़कर अपने होंठ उसकी जीभ पर टीका दिए.

"लिक्क मी" उसने ऊँची आवाज़ में सरगोशी की और टाँग उपेर हवा में उठा दी.

जैसे जैसे मेरी जीभ उसकी चूत की गहराइयों में उतरती रही, वैसे वैसे उसकी

मेरे बालों पर पकड़ और मज़बूत होती रही. नीचे से वो कभी बिस्तर पर अपनी

गांद को कभी रगड़ने लगती तो कभी एडीयन नीचे रख कर अपनी चूत मेरे मुँह पर

दबाने लगती.

"सक मी ... लिक्क इट .... जीभ घुसाओ अंदर .... अंगुली डालो"

जब वो इस तरह से बोलने लगती तो मैं समझ जाता था के वो गरम हो गयी थी.

"लंड चाहिए?" मैने चूत से मुँह हटा कर पुच्छा

"हां"

"चूत में या पहले मुँह में लोगि?"

"फक मी फर्स्ट .... आइ विल सक यू लेटर. पूरी रात पड़ी है" वो बेसब्री

होते हुए बोली और मुझे अपने उपेर खींचने लगी.

"कम ऑन ... हरी अप ... फक मी फास्ट"

मैं पूरा उसके उपेर आ गया तो उसने खुद ही हाथ हम दोनो के बीच ले जाकर

मेरा लंड पकड़ा और अपनी चूत के मुँह पर लगा दिया.

"घुसाओ अंदर"

मैने हल्का सा धक्का मारा और लंड उसकी गीली चूत में ऐसे गया जैसे मक्खन

में गरम च्छुरी.

"ओह गॉश ..... " मैने धक्के मारने शुरू किए तो उसने फिर सरगोशी की "यू

अरे फक्किंग मी सो वेल ... सो डीप .... पूरा घुसाओ ना अंदर जान ...."

"मज़ा आ रहा है?" मैने उसकी आँखों में देखते हुए पुच्छा

"बहुत ..... यू आर फक्किंग माइ चूत सो वेल बेबी ...."

उसकी दोनो टांगे मेरी कमर पर लिपटी हुई थी और मेरे हर धक्के के साथ उसकी

बड़ी बड़ी चूचियाँ ऐसे हिल रही थी जैसे अंदर पानी भरा हो. मैने आगे झुक

कर उसका एक निपल अपने मुँह में लिया.

"सक देम माइ लव ... सक देम"

मैं बारी बारी उसकी दोनो चूचियाँ चूस्ता हुआ उसकी चूत पर धक्के मारता

रहा. कमरा वासना के एक तूफान से भर गया था और रचना की चीखने चिल्लाने की

आवाज़ से गूँज रहा था. वो ऐसी थी थी, जब एग्ज़ाइटेड होती तो ज़ोर ज़ोर से

चिल्लाने लगती थी.
 
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