कहने के साथ ही चंद्रमणि ने एक बार सबकी तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ को करवट ले ली। गौरी शंकर समझ गया कि उसके पिता को जो कहना था वो कह चुका है। अपने पिता की तरफ देखते हुए उसने गहरी सांस ली और फिर उठ कर कमरे से बाहर आ गया। उसके पीछे बाकी लोग भी आ गए थे।
अब आगे....
खेती बाड़ी के काम में मैं ऐसा उलझा कि फिर मुझे किसी और चीज़ के लिए समय ही नहीं मिला। थका हारा हवेली आता और खा पी कर सो जाता। सुबह नाश्ता कर के फिर से खेतों की तरफ निकल जाता। मेरे अंदर एकदम से जैसे जुनून सा सवार हो गया था। सबसे ज़्यादा इस बात का जुनून कि मुझे अपनी भाभी की नज़रों में एक अच्छा इंसान बनना है और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरना है। इसी के चलते जब काम में खुद को समर्पित किया तो जैसे ज़िम्मेदारी अपने आप ही निभाने लग गया था मैं। इस बात का भी बोध था कि अब से सब कुछ मुझे ही सम्हालना है इस लिए अगर ये सब ईमानदारी से नहीं किया तो सब कुछ बर्बाद भी हो सकता है।
पिता जी मेरे इस समर्पित भाव से काफी खुश और प्रभावित थे। वो बीच बीच में मुझसे काम के बारे में पूछते रहते थे। दूसरे गांव के ठाकुर जो पिता जी के मित्र लोग थे वो उनसे मिलने आते रहते थे। दिन ऐसे ही गुज़रने लगे। इस बीच कोई भी ऐसी बात नहीं हुई जिससे हमें किसी तरह का नुकसान हो। इतने दिनों में एक और बात समझ में आई कि काफी दिनों से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था। ऐसा इस लिए कहा जा सकता है क्योंकि काफी समय से उसकी तरफ से न तो कोई प्रतिक्रिया हुई थी और ना ही हमें उसके कहीं होने का पता चला था। समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों था? अगर सफ़ेदपोश वाकई में मेरी जान का सबसे बड़ा दुश्मन था तो वो इस तरह से ख़ामोश अथवा लापता क्यों था? क्या वो किसी ऐसे मौके की तलाश में था जिसमें वो मुझे एक झटके में ही ख़त्म कर सके? या फिर वो कोई बड़ा खेल खेलने वाला था? ये दो सवाल ऐसे थे जो हमें सोचने पर मजबूर किए हुए थे और इसी के चलते पिता जी अक्सर मुझे सतर्क रहने की भी हिदायत देते रहते थे। मेरी हिफाज़त के लिए हमेशा मेरे चुनिंदा मुलाजिम मेरे आस पास ही रहते थे।
ऐसे ही बीस दिन गुज़र गए। इस बीच रूपा मुझे नज़र नहीं आई थी। जाने क्यों मुझे उसकी फ़िक्र सी होने लगी थी। उसके प्रति बेहद सहानुभूति थी मुझे। दूसरी तरफ अनुराधा से भी मेरी मुलाक़ात नहीं हुई थी क्योंकि मैं अपने नए वाले मकान में गया ही नहीं। मेरा सारा समय खेतों पर ही गुज़र जाता था। हालाकि भुवन से मुझे उसका और उसके घर वालों का हाल चाल पता चल जाता था।
खेतों में धान बो दी गई थी और साथ ही मूंग उड़द बाजरा आदि सब बो दिया गया था। पुराने जो किसान थे उन सबका कहना था कि इस बार ये सब काम करने में आनंद भी आया और समय भी कम लगा।
एक दिन मां ने कहा कि मैं मेनका चाची के मायके चला जाऊं और उन सबको लिवा लाऊं। दूसरे ही दिन मैं चाची के मायके कुंदनपुर निकल गया। मेरी हिफाज़त के लिए पिता जी ने मेरे साथ कुछ आदमियों को भी भेज दिया था।
मैं पहले भी कई बार कुंदनपुर आ चुका था इस लिए सभी मुझे पहचानते थे और साथ ही आस पास के बाकी लोग भी। इस बार मेरे आने पर मेरा कोई खास स्वागत नहीं हुआ। ज़ाहिर है इसकी मुख्य वजह मेरे चाचा की अकस्मात हुई मौत थी जिसके चलते अभी भी सब दुखी थे। बहरहाल सब बड़े ही आत्मीयता से मिले। मेरे साथ आए आदमियों को भी हवेली के दूसरी तरफ बने कमरों में ठहराया गया। हाल चाल के बाद भोजन पानी हुआ, उसके बाद मैं एक कमरे में आराम करने चला गया।
पहले जब मैं चाची के मायके आया करता था तो अलग ही जलवा रहता था मेरा। यहां भी मैंने झंडे गाड़े थे और इसका पता मेरे मामा मामी लोगों को भी था। वो मेरी फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ थे। वो ज़्यादा कुछ तो नहीं कहते थे बस यही हिदायत देते थे कि ऐसे काम मत किया करो क्योंकि इससे व्यक्ति के साथ साथ खानदान का भी नाम ख़राब होता है। मैं उनकी बातों को एक कान से सुन कर दूसरे वाले कान से निकाल देता था। अपने बारे में तो बस एक ही कहावत थी कि घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या?
मैंने दोपहर में ही सबको बता दिया था कि मैं चाची के साथ साथ उनके बच्चों को भी लेने आया हूं इस लिए सुबह जाने को तैयार रहें। छोटे मामा मेरी बदली हुई फितरत से थोड़ा हैरान थे और रात में मज़ाक करते हुए मुझसे पूछा भी कि मुझमें इतना बदलाव कैसे तो मैंने हंस कर उनकी बात को टाल दिया था।
सुबह हमारी रवानगी हुई। नाना नानी और मामा मामी सब दो चार दिन रुकने को बोल रहे थे लेकिन मैंने उन्हें बताया कि रुकना संभव नहीं है क्योंकि हवेली में भी सब अकेले ही हैं और वैसे भी मुझे खेतों पर जाना होता है। ख़ैर उन्हें भी सभी चीज़ों का एहसास था इस लिए सुबह हमारी रवानगी हो गई। चाची सबसे विदा ले रहीं थी। अपनी मां और भाभियों से लिपट कर रो रहीं थी वो। कुसुम का भी यही हाल था। उसके बाद हम सब वहां से चल पड़े। इस बार मेरी वाली जीप पर मेनका चाची और कुसुम थीं जबकि विभोर और अजीत दूसरी जीप में मेरे आदमियों के साथ थे।
एक घंटे बाद हम अपनी हवेली पहुंच गए। सभी के आ जाने से हवेली में एकदम से चहल पहल हो गई। पहले की अपेक्षा अब हवेली में थोड़ी रौनक सी आ गई थी वरना पूरी हवेली सुनसान सी लगती थी। मेनका चाची से मां हाल चाल पूछने लगीं। रागिनी भाभी भी उनके पास आ गईं थी। चाची ने अपना और अपने मायके वालों का हाल चाल बताया और फिर मां के कहने पर वो अपने कमरे में अपना झोला रखने तथा आराम करने चली गईं। रागिनी भाभी रसोई में दोपहर का खाना बनाने में लग गईं। कुछ देर में कुसुम आई तो वो भी रसोई में भाभी की मदद करने लगी।
मैं बैठक में पिता जी के पास बैठ गया था। पिता जी ने मुझसे चाची के मायके वालों का हाल चाल पूछा और ये भी कि सफ़र में कोई परेशानी तो नहीं हुई? उसके बाद उन्होंने बताया कि अगले दिन एक आदमी मेरे ननिहाल माधवगढ़ से आएगा। उस आदमी के साथ उसकी बीवी और उसके दो बच्चे भी होंगे। पिता जी ने बताया कि उन्होंने एक दिन मेरे ननिहाल में नाना जी को अपने एक मुलाजिम द्वारा संदेश भिजवाया था जिसमें उन्होंने नाना जी को लिखा था कि उन्हें अपने हिसाब किताब की देख रेख के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जो भरोसेमंद और सच्चा हो। पिता जी के संदेश पर नाना जी का संदेश आया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि कल तक एक आदमी हमारे पास पहुंच जाएगा जो पिता जी के इस काम को बेहतर तरीके से देखेगा।
"इसका मतलब वो आदमी अपने बीवी बच्चों के साथ यहीं हवेली में रहेगा?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"और साथ ही आपके बही खातों का सारा हिसाब किताब भी देखेगा?"
"वक्त की नज़ाकत को देखते हुए हमने यही फ़ैसला लिया है कि वो व्यक्ति हवेली में ही अपने बीवी बच्चों के साथ रहे।" पिता जी ने कहा____"अगर हम उसके रहने का इंतजाम इस गांव में ही कहीं करेंगे तो बहुत हद तक संभव है कि वो हमारे किसी दुश्मन का शिकार हो सकता है। इसी लिए हमने सोचा है कि जब तक सफ़ेदपोश जैसे रहस्यमय व्यक्ति का ख़तरा समाप्त नहीं हो जाता तब तक हम उस आदमी को हवेली में ही रखेंगे। इससे वो हमारी नज़रों के सामने भी रहेगा और हमें उसकी तथा उसके परिवार की फ़िक्र भी नहीं करनी पड़ेगी।"
"हां ये ठीक किया आपने।" मैंने सिर हिलाया____"वो हवेली में रहेगा तो चंद्रकांत जैसे व्यक्तियों का साया भी उस पर नहीं पड़ सकेगा।"
खाना बन गया तो मां हमें बुलाने बैठक में आईं। मैं और पिता जी उठ कर अंदर की तरफ चल पड़े। आज काफी दिनों बाद हम दोनों के अलावा विभोर और अजीत भी हमारे साथ खाना खाने बैठे थे। खाने के बाद मैं आराम करने के लिए अपने कमरे में चला गया।
✮✮✮✮
दो हफ़्ते ऐसे ही गुज़र गए। सब कुछ सामान्य चल रहा था। इस बीच विभोर और अजीत भी मेरे साथ खेतों की तरफ घूमने आ जाते थे। वो दोनों अब कुछ हद तक सामान्य नज़र आने लगे थे। मैं भी यही कोशिश करता था कि दोनों को ये महसूस न हो कि पिता का साया हट जाने के बाद वो दोनों अकेले अथवा अनाथ हो गए हैं।
एक दिन सुबह सुबह हम सब नाश्ता कर रहे थे कि तभी बाहर से एक दरबान अंदर आया और उसने पिता जी को जो कुछ बताया उसे सुन कर हम सबके जैसे होश ही उड़ गए। दरबान के अनुसार रात किसी ने चंद्रकांत के बेटे रघुवीर की हत्या कर दी जिसका इल्ज़ाम चंद्रकांत ने साहूकार हरि शंकर के बेटे रूपचंद्र पर लगाया है और ये भी कि इसमें दादा ठाकुर का भी हाथ है।
पूरे गांव में हड़कंप सा मच गया था। जल्दी ही ये ख़बर दूर दूर तक के गांवों में भी फैल गई। पिता जी और मैं दोनों साथ ही अपना अपना नाश्ता छोड़ कर सीधा मुंशी के घर की तरफ चल पड़े। हमारे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि किसी ने रघुवीर की हत्या कर दी और उसकी हत्या का इल्ज़ाम रूपचंद्र के साथ साथ हमारे ऊपर भी लगा रहा था चंद्रकांत।
कुछ ही समय में हम मुंशी के घर के बाहर पहुंच गए। मुंशी की बीवी, बहू और बेटी दहाड़ें मार मार कर रोए जा रहीं थी। साहूकारों का घर क्योंकि मुंशी के घर के पास ही था इस लिए उनके घर वाले भी वहीं जमा थे और साथ ही गांव के बहुत सारे लोग भी।
"आख़िर आपने मेरे बेटे को मरवा ही दिया दादा ठाकुर।" चंद्रकांत पिता जी को देखते ही आक्रोश में बोल पड़ा____"आपने अपना बदला ले ही लिया ना। मेरे घर के इकलौते चिराग़ की हत्या करवा के आपके कलेजे को ठंडक मिल गई ना?"
"होश में रह कर बात करो चंद्रकांत।" पिता जी ने सख़्त भाव से कहा____"दुनिया जानती है कि हम इस तरह की गिरी हुई हरकत ख़्वाब में भी नहीं कर सकते। तुम अपने बेटे की हत्या का इल्ज़ाम हम पर नहीं लगा सकते।"
"आप मुझे डराने की कोशिश मत कीजिए दादा ठाकुर।" चंद्रकांत ने चिल्लाते हुए कहा____"मैं आपसे डरने वाला नहीं हूं। मैं चीख चीख कर कहूंगा कि आपने ही साहूकार गौरी शंकर के साथ मिल कर मेरे बेटे की हत्या का षड्यंत्र रचा और फिर उसकी हत्या रूपचंद्र के हाथों करवाई है।"
"ये सब कोरी बकवास है।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारी अपनी मनगढ़ंत कहानी है ये। सच तो ये है कि हमने ना तो किसी के साथ इस तरह का कोई षडयंत्र रचा है और ना ही तुम्हारे बेटे की हत्या करवाई है।"
"तुम ये कैसे कह सकते हो कि पिता जी ने गौरी शंकर काका के साथ इस तरह का कोई षडयंत्र रचा है और फिर तुम्हारे बेटे की हत्या करवाई है?" इससे पहले कि चंद्रकांत कुछ बोलता मैंने उससे पूछा____"क्या तुम्हारे इस आरोप को गौरी शंकर काका स्वीकार करते हैं? इससे भी पहले तुम ये बताओ कि आख़िर किस आधार पर तुम मेरे पिता जी पर और गौरी शंकर काका के साथ रूपचंद्र पर इस तरह का आरोप लगा रहे हो? क्या तुमने अपनी आंखों से देखा है रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए?"
"मैंने देखा नहीं है लेकिन अच्छी तरह जानता हूं कि ये सब तुम्हारे पिता जी ने और गौरी शंकर जी ने साथ मिल कर किया है?" चंद्रकांत ने भीड़ की तरफ देखते हुए कहा____"और मेरी बहू ने खुद बताया है कि रूपचंद्र ने ही मेरे बेटे की हत्या की है।"
"क्या तुम्हारी बहू ने रूपचंद्र को रघुवीर की हत्या करते अपनी आंखों से देखा है?" पिता जी ने पूछा।
"देखा नहीं है लेकिन उसे यकीन है कि रूपचंद्र ने ही उसके पति की हत्या की है।" चंद्रकांत इस बार थोड़ा ठंडा सा पड़ते हुए बोला।
"इस यकीन की वजह?" पिता जी ने पूछा।
"मैं बताती हूं दादा ठाकुर।" रजनी एकदम से सामने आ कर बोल पड़ी। इस वक्त उसके सिर पर साड़ी का घूंघट नहीं था। शायद ऐसे वक्त में रोने धोने से उसे घूंघट करने का ख़याल ही नहीं रह गया था, बोली____"कल शाम को जब मैं दिशा मैदान कर के वापस लौट रही थी तब इस रूपचंद्र ने अंधेरे में मेरा रास्ता रोक लिया था।"
"क्या ये सच है?" गौरी शंकर बुरी तरह चौंकते हुए रूपचंद्र की तरफ देखा____"क्या सच में तुमने इसका रास्ता रोका था?"
बेचारा रूपचंद्र। उससे कुछ बोला ना गया। शर्म से सिर झुका लिया उसने। मैं तो जानता ही था कि उसके रजनी के साथ नाजायज़ संबंध थे। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो गौरी शंकर की आश्चर्य से आंखें फैल गईं।
"ये क्या बोलेगा।" रजनी किसी शेरनी की तरह गुर्राई____"सच तो ये है कि ये शुरू से ही मुझे मजबूर कर के मेरी इज्ज़त लूटता रहा है। कल भी ये मेरा रास्ता रोक कर मेरी इज्ज़त को लूटना चाहता था मगर मैंने इसे धमकी दी कि अगर इसने मुझे हाथ लगाया तो सारे गांव वालों को चीख चीख कर इसकी करतूत बता दूंगी। मेरी बात सुन कर ये उस वक्त गुस्से से चला गया था लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि इसी ने मेरी उस धमकी का बदला लेने के लिए रात के किसी समय मेरे पति की हत्या की है।"
रजनी की बातें सुन कर इतनी सारी भीड़ के बावजूद सन्नाटा छा गया। उधर गौरी शंकर और उसके घर की औरतें भौचक्की सी देखती रह गईं थी रजनी को। फिर जैसे सभी को होश आया तो सबके चेहरे गुस्से से आग बबूला होते नज़र आए।
"इसने जो कुछ तेरे बारे में बताया क्या वो सब सच है?" गौरी शंकर गुस्से से दहाड़ते हुए रूपचंद्र से पूछा।
"हां।" रूपचंद्र मरी हुई आवाज़ में बोला____"मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने रजनी को मजबूर कर के इसके साथ संबंध बनाए थे लेकिन मैं ये स्वीकार नहीं करता कि मैंने इसके पति की हत्या की है।"
रूपचंद्र की बात सुन कर गौरी शंकर गुस्से से चिल्ला ही पड़ा उस पर। उसने खूब खरी खोटी सुनाई अपने भतीजे को। रूपचंद्र सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा।
"मैं तो समझता था कि इस गांव में एक दादा ठाकुर का लड़का ही है जो दूसरों की बहू बेटियों की इज्ज़त के साथ खेलता है।" फिर वो हताश भाव से बोला____"किंतु मुझे क्या पता था कि इस तरह का एक हैवान मेरे घर में भी मौजूद है। आख़िर क्यों किया तूने ऐसा? बता वरना इसी वक्त तेरा गला दबा कर तेरी जान ले लूंगा।"
"मैं वैभव से नफ़रत करता था।" रूपचंद्र ने सिर उठा कर एक बार मेरी तरफ देखा और फिर खीझते हुए बोला____"इसने मेरी बहन की इज्ज़त ख़राब की थी तो मैं भी इससे बदला लेना चाहता था। इसके लिए मुझे जो सूझा वही किया मैंने।"
रूपचंद्र की बात सुन कर पिता जी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा तो इस बार सिर झुकाने की बारी मेरी थी। इतने सारे लोगों के सामने एक बार फिर से मेरी इज्ज़त का कचरा हो गया था लेकिन अपनी इज्ज़त का कचरा करवाने का काम तो मैंने खुद ही अपने हाथों किया था। अगर मैंने ऐसे काम ही नहीं किए होते तो भला आज ये सब क्यों होता?
"तुमने एक बार फिर से हमारे सिर को लोगों के सामने झुका दिया है।" पिता जी ने अपने गुस्से को किसी तरह जज़्ब करते हुए मुझसे कहा____"हमें आज तक समझ नहीं आया कि ऊपर वाले ने हमें तुम्हारी जैसी औलाद क्यों दी थी? हमने तो कभी किसी की बहू बेटी पर ग़लत दृष्टि नहीं डाली थी फिर क्यों हमारी औलाद ऐसी वाहियात पैदा हुई? आख़िर हमारी परवरिश में कहां कमी रह गई थी?"
"मैं मानता हूं पिता जी कि मेरा अतीत बहुत बुरा रहा है और मैंने बहुत ही ग़लत कर्म किए हैं।" मैंने गंभीरता से कहा____"लेकिन मेरा यकीन कीजिए कि अब मैं ऐसा नहीं हूं। रही बात रूपचंद्र की बहन की इज़्ज़त को ख़राब करने की तो मैंने उसके साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं की थी। उसकी सहमति से ही सब कुछ हुआ था। उसने अपनी सहमति से अपने प्रेम के चलते खुद को मुझे समर्पित किया था। अगर इसके बावजूद आपको लगता है कि मैंने उसकी इज्ज़त ख़राब की है तो मैं उसे अपनाने को तैयार हूं।"
"ये सब नाटक बंद कीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत सहसा चीखते हुए बोला____"यहां मेरे बेटे की हत्या की गई है और ये सब आप लोगों की ही वजह से हुआ है। मुझे इंसाफ़ चाहिए और जिसने मेरे बेटे की हत्या की है उसको मौत की सज़ा मिलनी चाहिए।"
"वैसे तो हमारा इस मामले में कोई हाथ नहीं है चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"फिर भी तुम्हारे इंसाफ़ के लिए तुम जहां कहोगे हम हाज़िर हो जाएंगे। अब क्योंकि हम मुखिया नहीं हैं इस लिए इस मामले के लिए तुम जिसे चाहे पंच बना सकते हो और पंचायत में इस मामले को रख सकते हो।"
"वो तो मैं करूंगा ही।" चंद्रकांत ने कहा____"ये मत समझिए कि आप बड़े लोग हैं और आपकी पहुंच बहुत ऊपर तक है तो आप अपने किए गए गुनाह से बच जाएंगे। एक घंटे के अंदर पंचायत लगेगी और यहीं पर फ़ैसला होगा।"
चंद्रकांत कहने के साथ ही अपने घर के अंदर गया और थोड़ी देर में बाहर आ कर वो लट्ठ लिए पैदल ही एक तरफ को बढ़ता चला गया। ज़ाहिर है वो पंच लोगों को बुलाने गया था। उसके जाने के बाद भीड़ में खुसुर फुसुर शुरू हो गई।
"ये बात मैं बहुत पहले से जानता था काका कि रूपचंद्र का रजनी के साथ नाजायज़ संबंध है।" मैंने गौरी शंकर की तरफ देखते हुए कहा____"फिर भी उस दिन पंचायत में मैंने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया था। जानते हैं क्यों? क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि आपके भतीजे की गांव समाज में बदनामी हो। मैं तो पहले से ही बदनाम था इस लिए मेरी वजह से रूपचंद्र क्यों बदनाम हो? मैं जानता था कि ये मुझसे बदला लेने के लिए ही ये सब कर रहा था तो मैं भी देखना चाहता था कि ये किस हद तक जाता है? आपको पता है ये किस हद तक गया? इसने दूसरे गांव के मुरारी काका की मासूम बेटी की भी इज्ज़त लूटने को कोशिश की थी। वो तो शुक्र था कि मैं सही वक्त पर वहां पहुंच गया था वरना ये मुझसे बदला लेने के लिए उस निर्दोष लड़की को बर्बाद ही कर देता। चलो मान लिया कि मैं इसका दोषी था और ये मुझसे बदला लेना चाहता था तो इससे पूछिए कि बदला लेने का भला ये कौन सा तरीका था इसका? अरे! इसे अगर मुझसे इतनी ही नफ़रत थी तो सीधे मुझसे बात करता या फिर मुझसे मुक़ाबला करता।"
रूपचंद्र सिर झुकाए खड़ा रहा। वहीं गौरी शंकर अहसाय भाव से देखता रहा मुझे। भीड़ में खड़े लोग अजीब भाव से हम सबको देख रहे थे।
क़रीब एक घंटे बाद हमने देखा कि कुछ जीपें हमारी तरफ चली आ रहीं हैं। जल्दी ही वो जीपें हमारे पास आ कर रुकीं और फिर उन जीपों से एक एक कर के लोग उतरे। ठाकुर महेंद्र सिंह के साथ कुछ और लोग भी थे जो ठाकुर ही थे। पिता जी को देखते ही सबने उनका अभिवादन किया। चंद्रकांत उनके साथ ही जीप में बैठ कर आया था। वो फ़ौरन ही अंदर जा कर कुछ कुर्सियां ले आया और सबको उनमें बैठाया।
✮✮✮✮
"वैसे तो हमें मामले के बारे में चंद्रकांत ने रास्ते में सब कुछ बता दिया है।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने कहा____"फिर भी आप सबके मुख से हम जानना चाहते हैं कि आख़िर ये मामला क्या है?"
"मामला चंद्रकांत के बेटे की हत्या का है ठाकुर साहब।" पिता जी ने कहा____"इनका आरोप है कि हमने गौरी शंकर के साथ मिल कर इनके बेटे की हत्या की साज़िश रची और फिर उसकी हत्या करवा दी। जबकि सच ये है कि हमारा रघुवीर की हत्या से दूर दूर तक कोई ताल्लुक़ ही नहीं है। हमें तो पता ही नहीं था इस बारे में । हम हवेली में अपने बच्चों के साथ सुबह नाश्ता कर रहे थे तभी हमारे दरबान ने आ कर हमें इस बारे में बताया। हमें तो यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी कुछ हो गया है। ख़ैर हमने अपना नाश्ता वहीं छोड़ा और भागते हुए यहां चले आए। यहां आए तो चंद्रकांत ने बिना किसी भूमिका के सीधा हम पर अपने बेटे की हत्या करने का आरोप लगा दिया। हमें इस बात पर अत्यंत आश्चर्य हो रहा है कि चंद्रकांत ने ये कैसे सोच लिया कि हम गौरी शंकर के साथ मिल कर कोई साज़िश कर सकते हैं?"
"दादा ठाकुर सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"सबसे पहला सवाल तो यही है कि हम भला इनके साथ कैसे मिल सकते हैं जबकि सबको पता है कि ये वही हैं जिन्होंने हमारे परिवार के इतने सारे सदस्यों की हत्या की थी। क्या आप में से कोई ये सोच सकता है कि हम किसी हत्यारे के साथ मिल जाने का सोच सकते हैं और फिर उसके साथ किसी की हत्या करने की साज़िश भी रच सकते हैं? नहीं ठाकुर साहब ये सब चंद्रकांत की अपनी एक मनगढ़ंत कहानी है। ना तो हमने दादा ठाकुर के साथ मिल कर कोई साज़िश रची है और ना ही हमने किसी की हत्या की है। इतना ही नहीं मुझे इस बात का भी यकीन है कि रघुवीर की हत्या में दादा ठाकुर का भी कोई हाथ नहीं हो सकता?"
गौरी शंकर की आख़िर वाली बात सुन कर पिता जी ने हैरानी से गौरी शंकर की तरफ देखा। मुझे भी उसकी इस बात से बड़ा आश्चर्य हुआ।
"देखा ठाकुर साहब।" चंद्रकांत एकदम से बोल पड़ा____"ये कहते हैं कि ये अपने लोगों के हत्यारे के साथ मिल जाने का कैसे सोच सकते हैं जबकि इस वक्त ये अपने लोगों के हत्यारे का ही पक्ष ले कर कह रहे हैं कि इन्होंने मेरे बेटे की हत्या नहीं को हो सकती। क्या आपको गौरी शंकर जी की बातों में दो तरह ही बातें नहीं समझ आ रहीं?"
"तुम बेवजह ही मुझे दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने की कोशिश कर रहे हो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"असल में तुम चाहते हो कि हमारा दादा ठाकुर से कभी सुलह ही न हो। तभी तो तुम कुछ दिन पहले मेरे पास आए थे और मुझे फिर से दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने की कोशिश कर रहे थे।"
"इस बात का क्या मतलब है?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पूछा____"क्या तुम्हारी इन बातों का संबंध इस मामले से है?"
"बेशक है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने पुरज़ोर लहजे में कहा____"असल में कुछ दिन पहले दादा ठाकुर मेरे घर आए थे। ये चाहते थे कि सब कुछ भुला कर हम फिर से अपने संबंधों को बेहतर बना लें। मुझे नहीं पता कि चंद्रकांत को इस बात का कैसे पता चला किंतु ये उसी दिन दोपहर को मेरे खेत में मेरे पास पहुंच गए थे। मुझे समझाने लगे कि मैं ऐसे व्यक्ति से अपने संबंध कैसे बना सकता हूं जिसने मेरे भाइयों और बच्चों की एक साथ हत्या की हो? ये चाहते थे कि मैं इस सबके बाद भी दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझूं। जब मैंने इंकार किया तो इन्होंने कहा कि मैं दादा ठाकुर से ख़ौफ खा गया हूं इस लिए उनके ख़िलाफ़ जाने का सोच भी नहीं सकता मगर ये ज़रूर जाएंगे क्योंकि इनकी नज़र में दादा ठाकुर इनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। जब तक ये वैभव को जान से नहीं मार डालेंगे तब तक ये चैन से नहीं बैठेंगे।"
"ये सब झूठ है।" चंद्रकांत बुरी तरह बौखला कर एकदम से ही चीख पड़ा____"पता नहीं ये क्या क्या मनगढ़ंत बातें बोले जा रहे हैं ठाकुर साहब। सच तो ये है कि ना तो मैं इनसे मिलने इनके खेत गया था और ना ही इनसे ऐसी बातें की थीं।"
"ऊपर वाले के ख़ौफ से डरो चंद्रकांत।" गौरी शंकर उसके सफ़ेद झूठ बोलने पर पहले तो बड़ा हैरान हुआ फिर बोला____"अपने बेटे की मौत के बाद भी तुम्हें एहसाह नहीं हुआ कि हमने और तुमने मिल कर कितना ग़लत किया था दादा ठाकुर के साथ। मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि अपने बदले की आग में अंधे हो कर तुमने खुद ही अपने बेटे की हत्या की है और उसका इल्ज़ाम मेरे भतीजे रूपचंद्र के साथ साथ दादा ठाकुर पर भी लगाया है। अगर वाकई में ये सच है तो तुम्हें अपनी इस नीचता के लिए चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए।"
"ऊपर वाले के ख़ौफ से डरो चंद्रकांत।" गौरी शंकर उसके सफ़ेद झूठ बोलने पर पहले तो बड़ा हैरान हुआ फिर बोला____"अपने बेटे की मौत के बाद भी तुम्हें एहसाह नहीं हुआ कि हमने और तुमने मिल कर कितना ग़लत किया था दादा ठाकुर के साथ। मुझे तो अब ऐसा लग रहा है कि अपने बदले की आग में अंधे हो कर तुमने खुद ही अपने बेटे की हत्या की है और उसका इल्ज़ाम मेरे भतीजे रूपचंद्र के साथ साथ दादा ठाकुर पर भी लगाया है। अगर वाकई में ये सच है तो तुम्हें अपनी इस नीचता के लिए चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए।"
अब आगे....
"चंद्रकांत, इस मामले के बारे में ईमानदारी से अपनी बात पंचायत के सामने रखो।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"अगर तुम झूठ के आधार पर किसी निर्दोष को फंसाने का सोच रहे हो तो समझ लो इसका बहुत ही बुरा ख़ामियाजा तुम्हें भुगतना पड़ सकता है।"
"मैं मानता हूं ठाकुर साहब कि मैं गौरी शंकर जी से मिलने इनके खेत पर गया था और इनसे वो सब कहा भी था।" चंद्रकांत ने महेंद्र सिंह की बात पर एकदम से घबरा कर कहा____"किंतु ये सच है कि मैं बेवजह अथवा झूठ के आधार पर किसी को फंसा नहीं रहा हूं। मैं बदले की भावना में इतना भी अंधा नहीं हुआ हूं कि अपने ही हाथों अपने इकलौते बेटे की हत्या करूंगा और फिर उसकी हत्या का इल्ज़ाम इन लोगों पर लगाऊंगा। चलिए मैं मान लेता हूं कि दादा ठाकुर ने मेरे बेटे की हत्या नहीं की होगी लेकिन मैं ये नहीं मान सकता कि रूपचंद्र ने भी मेरे बेटे की हत्या नहीं की होगी।"
"ऐसा तुम किस आधार पर कह रहे हो?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने पूछा____"क्या तुमने अपनी आंखों से रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए देखा है या फिर तुम्हारे पास कोई ऐसा गवाह है जिसने रूपचंद्र को तुम्हारे बेटे की हत्या करते हुए देखा हो?"
"नहीं ठाकुर साहब।" चंद्रकांत एकदम हताश हो कर बोला____"यही तो मेरा दुर्भाग्य है कि ना तो मैंने ऐसा देखा है और ना ही किसी और ने। किंतु मेरी बहू ने जो कुछ बताया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि रूपचंद्र ने ही मेरे बेटे रघुवीर की हत्या की है।"
"ऐसा क्या बताया है तुम्हारी बहू ने?" ठाकुर महेंद्र सिंह ने हैरानी से देखते हुए कहा____"अपनी बहू को बुलाओ, हम उसके मुख से ही सुनना चाहेंगे कि उसने तुम्हें ऐसा क्या बताया था जिसके आधार पर तुमने ये मान लिया कि रूपचंद्र ने ही तुम्हारे बेटे की हत्या की है?"
चंद्रकांत ने बेबस भाव से रजनी को इशारे से अपने पास बुलाया। रजनी सिर पर घूंघट डाले आ कर खड़ी हो गई। चेहरा घूंघट के चलते ढंका हुआ था इस लिए ये पता नहीं चल पाया कि इस वक्त उसके चहरे पर किस तरह के भाव थे? बहरहाल महेंद्र सिंह के पूछने पर रजनी ने झिझकते हुए पिछली रात की सारी बात बता दी जिसे सुन कर महेंद्र सिंह के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।
"इस बात से कहां साबित होता है कि रूपचंद्र ने ही रघुवीर की हत्या की है?" फिर उन्होंने चंद्रकांत से कहा____"क्या तुम्हारे पास कोई ऐसा गवाह है जिसने अपनी आंखों से रघुवीर की हत्या करते हुए देखा है? पंचायत में बिना किसी सबूत अथवा प्रमाण के तुम किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकते और ना ही किसी को हत्यारा कह सकते हो।"
"मैं मानता हूं ठाकुर साहब कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है।" चंद्रकांत ने सहसा दुखी भाव से कहा____"लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है ना कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या की ही नहीं है। इन लोगों के अलावा मेरी किसी से कोई दुश्मनी अथवा बैर नहीं है फिर कोई दूसरा क्यों मेरे बेटे की हत्या करेगा?"
"अगर तुम मानते हो कि किसी दूसरे ने तुम्हारे बेटे की हत्या नहीं की है बल्कि इन लोगों ने ही की है तो इसे साबित करने के लिए तुम पंचायत के सामने सबूत अथवा प्रमाण पेश करो।" ठाकुर महेंद्र सिंह ने स्पष्ट भाव से कहा____"बिना किसी प्रमाण के किसी को भी हत्यारा नहीं माना जाएगा। हमारा ख़याल है कि इस मामले में तहक़ीकात करने की ज़रूरत है। हम खुद देखना चाहेंगे कि तुम्हारे बेटे की हत्या किस जगह पर हुई और साथ ही उसे किस तरीके से मारा गया है? तब तक के लिए पंचायत बर्खास्त की जाती है।"
कहने के साथ ही महेंद्र सिंह जी कुर्सी से उठ गए। उनके साथ बाकी लोग भी उठ गए। भीड़ में मौजूद लोग दबी आवाज़ में तरह तरह की बातें करने लगे थे। इधर महेंद्र सिंह के पूछने पर चंद्रकांत ने बताया कि उसे अपने बेटे की लाश कहां और किस हालत में मिली थी?
महेंद्र सिंह के साथ पिता जी, मैं, गौरी शंकर, रूपचंद्र, और खुद चंद्रकांत चल पड़े। जल्दी ही हम उस जगह पर पहुंच गए जहां पर रघुवीर की लाश मिली थी।
चंद्रकांत का घर गांव में दाखिल होते ही सबसे पहले पड़ता था जबकि गांव से बाहर की तरफ जाने पर सबसे आख़िर में। उसके घर से कुछ ही दूरी पर साहूकारों के घर थे। बहरहाल हम सब चंद्रकांत के घर के पीछे पहुंचे। घर के चारो तरफ क़रीब चार फीट ऊंची चार दिवारी थी जो कि लकड़ी की मोटी मोटी बल्लियों द्वारा बनाई गई थी। सामने की तरफ बड़ा सा चौगान था जिसके एक तरफ गाय भैंस बंधी होती थीं। पीछे की तरफ एक कुआं था और साथ ही दूसरी तरफ छोटा सा सब्जी और फलों का बाग़ था।
रघुवीर की लाश जिस जगह मिली थी वो घर के बगल से जो खाली जगह थी वहां पर पड़ी हुई थी। उस जगह पर ढेर सारा खून फैला हुआ था। क़रीब से देखने पर एकदम से ही दुर्गंध का आभास हुआ। वो दुर्गंध पेशाब की थी। ज़ाहिर है उस जगह पर पेशाब किया जाता था। लाश को क्योंकि चंद्रकांत ने सुबह ही वहां से हटा लिया था इस लिए वहां पर सिर्फ खून ही फैला हुआ दिख रहा था जोकि ज़्यादातर सूख गया था और जो बचा था उसके ऊपर मक्खियां भिनभिना रहीं थी।
"हमारा ख़याल है कि हत्या रात में ही किसी पहर की गई थी।" पिता जी ने सहसा महेंद्र सिंह से कहा____"ज़्यादातर खून सूख चुका है जिससे यही ज़ाहिर होता है। हमें लगता है कि रघुवीर रात के किसी पहर पेशाब लगने के चलते घर से बाहर यहां आया होगा। हत्यारा पहले से ही उसकी ताक में यहां कहीं मौजूद रहा होगा और फिर जैसे ही रघुवीर यहां पेशाब करने के लिए आया होगा तो उसने उसकी हत्या कर दी होगी।"
"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"किंतु सबसे बड़ा सवाल ये है कि हत्यारे को ये कैसे पता रहा होगा कि रघुवीर रात के कौन से पहर पेशाब करने घर से बाहर आएगा?"
"हो सकता है कि ये इत्तेफ़ाक ही हुआ हो कि जिस समय हत्यारा यहां पर मौजूद था उसी समय रघुवीर पेशाब लगने के चलते बाहर आया।" पिता जी ने जैसे संभावना ज़ाहिर की____"या फिर हत्यारे ने रघुवीर के हर क्रिया कलाप को पहले से ही अच्छी तरह गौर फरमा लिया रहा होगा। हमारा मतलब है कि उसने पहले ये जांचा परखा होगा कि रघुवीर पेशाब करने के लिए रात के कौन से वक्त पर घर से बाहर निकलता है। कुछ लोगों की ये आदत होती है कि उनकी पेशाब लगने की वजह से अक्सर रात में नींद खुल जाती है और फिर वो बिस्तर से उठ कर पेशाब करने जाते हैं। संभव है कि रघुवीर के साथ भी ऐसा ही होता रहा हो। हत्यारे ने उसकी इसी आदत को गौर किया होगा और फिर उसने एक दिन अपने काम को अंजाम देने का सोच लिया।"
"क्या रघुवीर अक्सर रातों को उठ कर पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलता था?" महेंद्र सिंह ने पलट कर चंद्रकांत से पूछा।
"हां ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने स्वीकार किया____"उसकी तो शुरू से ही ऐसी आदत थी। मैं खुद भी रात में एक दो बार पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलता हूं। मेरा बेटा भी लगभग रोज ही रात में पेशाब करने के लिए उठता था और फिर घर से बाहर आता था।"
"यानि आपका सोचना एकदम सही था।" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"वाकई में रघुवीर पेशाब करने के चलते ही बाहर आया। हत्यारा जोकि रघुवीर की इस आदत से परिचित था वो यहां पर उसी की प्रतीक्षा कर रहा था। जैसे ही रघुवीर पेशाब करने के लिए बाहर आया तो उसने उसे एक झटके में मार डाला।"
"तुम्हें कब पता चला कि रघुवीर की हत्या हो गई है?" पिता जी ने चंद्रकांत से पूछा।
"सुबह ही पता चला था।" चंद्रकांत की आवाज़ भारी हो गई____"रात में तो मुझे किसी तरह का आभास ही नहीं हुआ। सुबह जब मैं पेशाब करने के लिए इस जगह पर आया तो अपने बेटे की खून से लथपथ पड़ी लाश को देख कर मेरी जान ही निकल गई थी।"
"यानि हत्यारे ने एक झटके में ही रघुवीर को मार डाला था।" महेंद्र सिंह ने कहा____"हमारा ख़याल है कि रघुवीर को ज़रा सा भी एहसास नहीं हुआ होगा कि कोई उसकी हत्या करने के लिए उसके पास ही मौजूद है। उधर हत्यारा भी अच्छी तरह समझता था कि अगर उसने ग़लती से भी रघुवीर को सम्हलने का मौका दिया तो वो शोर मचा देगा जिससे वो पकड़ा जाएगा। ख़ैर चलिए देखते हैं कि हत्यारे ने रघुवीर को किस तरीके से मारा होगा?"
हम सब जल्दी ही घर के सामने आ गए। घर के बाएं तरफ एक लकड़ी के तखत पर रघुवीर की लाश को रख दिया गया था। तखत में भी उसका बचा कुचा खून फैल गया था। बाहर काफी संख्या में भीड़ थी जो लाश को देखने के लिए आतुर हो रही थी किंतु हमारे आदमियों ने उन्हें रोका हुआ था।
रघुवीर के गले पर एक मोटा सा चीरा लगा हुआ था जो कि सामने की तरफ से था और पूरे गले में था। ज़ाहिर है रघुवीर बुरी तरह तड़पा होगा किंतु हत्यारे ने उसे शोर मचाने का कोई भी मौका नहीं दिया होगा। चंद्रकांत के बयान से तो यही ज़ाहिर होता था क्योंकि उसे भनक तक नहीं लगी थी। भनक तो तब लगती जब रघुवीर कोई आवाज़ कर पाता। यानि हत्यारे ने रघुवीर का गला तो काटा ही किंतु उसके मुख को तब तक दबाए रखा रहा होगा जब तक कि तड़पते हुए रघुवीर की जीवन लीला समाप्त नहीं हो गई होगी।
"काफी बेदर्दी से जान ली है हत्यारे ने।" महेंद्र सिंह ने रघुवीर के गले में दिख रहे मोटे से चीरे को देखते हुए कहा____"ऐसा तो कोई बेरहम व्यक्ति ही कर सकता है।"
"इन लोगों के अलावा इतनी बेरहमी कौन दिखा सकता है ठाकुर साहब?" चंद्रकांत दुखी भाव से बोल पड़ा____"इन लोगों ने ही मेरे बेटे की इस तरह से हत्या की है। इन्होंने अपने भाई और बेटे की हत्या का बदला मेरे बेटे की हत्या कर के लिया है। मुझे इंसाफ़ चाहिए ठाकुर साहब।"
"अगर हमें तुम्हारे बेटे की हत्या ही करनी होती तो यूं चोरी छुपे नहीं करते।" पिता जी ने इस बार सख़्त भाव से कहा____"बल्कि डंके की चोट पर करते, जिस तरह गौरी शंकर के अपनों की हत्या की थी। हालाकि अब हमें अपने किए गए कर्म पर बेहद अफसोस और दुख है लेकिन सच यही है कि हमने ये सब नहीं किया है। हमने अपने जीवन में पहले कभी किसी के साथ कुछ ग़लत नहीं किया था और ये बात तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता। तुम हमें हमारे बचपन से जानते हो। फिर ये कैसे सोच सकते हो कि हमने तुम्हारे बेटे की हत्या की है?"
"जब तक कोई प्रमाण नहीं मिलता तब तक तुम किसी पर भी अपने बेटे की हत्या का इल्ज़ाम नहीं लगा सकते।" महेंद्र सिंह ने कहा____"बेहतर यही है कि पहले प्रमाण खोजो और फिर पंचायत में इंसाफ़ की मांग करो।"
"मैं भला कहां से प्रमाण खोजूंगा ठाकुर साहब?" चंद्रकांत ने आहत भाव से कहा____"मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब कभी भी मेरे बेटे का हत्यारा नहीं मिलेगा और जब वो मिलेगा ही नहीं तो भला कैसे कोई इंसाफ़ होगा?"
"अगर तुम ठाकुर साहब पर भरोसा करते हो तो इनसे आग्रह करो कि ये तुम्हारे बेटे के हत्यारे का पता लगाएं।" महेंद्र सिंह ने जैसे सुझाव दिया।
"नहीं ठाकुर साहब।" पिता जी ने कहा____"हम ऐसे किसी भी मामले को अपने हाथ में नहीं लेना चाहते। हम ये भी जानते हैं कि चंद्रकांत को हम पर कभी भरोसा नहीं हो सकता। बेहतर यही है कि चंद्रकांत खुद अपने बेटे के हत्यारे का पता लगाए और फिर अपने बेटे की हत्या का इंसाफ़ मांगे।"
"अगर ऐसी बात है तो यही बेहतर होगा।" महेंद्र सिंह कहने के साथ ही चंद्रकांत से मुखातिब हुए____"ख़ैर हमें ये बताओ कि तुमने ये कैसे सोच लिया कि तुम्हारे बेटे की हत्या ठाकुर साहब ने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के की है?"
"सुबह जब मैंने अपने बेटे की खून से लथपथ लाश देखी तो मेरी चीख निकल गई थी।" चंद्रकांत ने दुखी भाव से कहा____"मेरी चीख सुन कर रघुवीर की मां, मेरी बहु और बेटी तीनों ही बाहर भागते हुए आईं थी। जब उन लोगों ने रघू की खून से लथपथ लाश देखी तो उनकी भी हालत ख़राब हो गई। उसके बाद हम सबका रोना धोना शुरू हो गया। इसी बीच मेरी बहू रजनी ने रोते हुए कहा कि ये सब रूपचंद्र ने किया है। उसकी बात सुन कर मैं उछल ही पड़ा था। मेरे पूछने पर उसने बताया कि कैसे पिछले दिन शाम को जब वो दिशा मैदान कर के वापस लौट रही थी तो रास्ते में रूपचंद्र ने उसे रोक लिया था। रूपचंद्र उसकी इज़्ज़त के साथ खेलना चाहता था जिसके लिए उसने उसे सबको बता देने की धमकी दी थी। मेरी बहू के अनुसार उसकी इस धमकी की वजह से रूपचंद्र बहुत गुस्सा हुआ था तो ज़ाहिर है कि इसी गुस्से में उसने मेरे बेटे की हत्या की होगी।"
"तो फिर तुम ये क्यों कह रहे थे कि ये सब दादा ठाकुर ने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के किया है?" महेंद्र सिंह ने कहा____"क्या तुम बेवजह ही इन्हें अपने बेटे की हत्या में जोड़ कर लोगों के बीच इन्हें बदनाम करना चाहते थे?"
"नहीं ठाकुर साहब।" चंद्रकांत हड़बड़ा कर जल्दी से बोला____"असल में कुछ दिन पहले मैंने सुना था कि ये गौरी शंकर जी के घर गए थे सुलह करने और फिर गौरी शंकर जी भी इनकी हवेली गए थे। मुझे लगा ये दोनों आपस में मिल गए हैं। दूसरी बात साहूकारों का विनाश कर के तो इन्होंने अपने भाई और बेटे की हत्या का बदला ले लिया था किंतु मुझसे और मेरे बेटे से नहीं ले सके थे। मुझे यकीन हो गया कि इन्होंने गौरी शंकर के साथ साज़िश कर के मेरे बेटे की हत्या की है। गौरी शंकर जी क्योंकि अब इनके खिलाफ़ जा ही नहीं सकते इस लिए वो इनके पक्ष में ही बोलेंगे। यही सब सोच कर मैंने इन दोनों पर अपने बेटे की हत्या का आरोप लगाया था।"
"ये सब तुम्हारी अपनी सोच है चंद्रकांत।" पिता जी ने कहा____"तुम्हें भले ही हम पर यकीन न हो लेकिन सच तो यही है कि तुम्हारे बेटे की हत्या से हमारा दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। तुम लोगों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या की थी उसके लिए हमने गुस्से में आ कर जो कुछ किया उसके लिए हमें अफ़सोस तो है लेकिन हम ये भी समझते हैं कि हमारी जगह कोई भी होता तो यही करता। शुकर मनाओ कि उस दिन हमें ये पता ही नहीं था कि साहूकारों के साथ तुमने भी हमारे भाई और बेटे की हत्या की थी वरना उस दिन तुम बाप बेटे भी हमारे गुस्से का शिकार हो गए होते। ख़ैर जो हुआ सो हुआ किंतु इस मामले में हमारा कोई हाथ नहीं है। बाकी तुम्हें जो ठीक लगे करो।"
चंद्रकांत कुछ न बोला। महेंद्र सिंह ने अपनी तरफ से इस मामले की तह तक जाने का फ़ैसला किया और चंद्रकांत को आश्वासन दिया कि वो उसके बेटे के हत्यारे को जल्द ही खोज लेंगे और उसके साथ इंसाफ़ करेंगे। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। चंद्रकांत दुखी हृदय से अपने बेटे की लाश के पास आ कर आंसू बहाने लगा।
✮✮✮✮
साहूकारों के घर के बाहर सड़क के किनारे जो बड़ा सा पेड़ था उसके नीचे बने चबूतरे के पास हम सब आ कर रुके। गौरी शंकर ने रूपचंद्र को भेज कर अपने घर से कुछ कुर्सियां मंगवा ली जिनमें पिता जी, गौरी शंकर, महेंद्र सिंह और उनके साथ आए लोग बैठ गए। जबकि मैं और रूपचंद्र ज़मीन में ही खड़े रहे।
"आपको क्या लगता है ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा____"चंद्रकांत के बेटे की हत्या किसने की होगी?"
"ये सवाल हमारे ज़हन में भी है मित्र।" पिता जी ने कहा____"हम खुद इस सवाल पर गहराई से विचार मंथन कर रहे हैं किंतु फिलहाल कुछ भी समझ में नहीं आ रहा।"
"इतना तो आप भी समझते हैं कि दुनिया में कुछ भी बेवजह नहीं होता।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस खींचते हुए कहा____"ज़ाहिर है चंद्रकांत के बेटे की हत्या भी बेवजह नहीं की होगी हत्यारे ने। अब सवाल ये है कि आख़िर वो कौन सी वजह रही होगी जिसके चलते हत्यारे ने रघुवीर को जान से मार डाला? अगर वजह का पता चल जाए तो कदाचित हमें हत्यारे तक पहुंचने में आसानी हो जाएगी।"
"एक बात और है बड़े भैया।" महेंद्र सिंह के छोटे भाई ने कुछ सोचते हुए कहा____"और वो ये कि क्या चंद्रकांत के बेटे की हत्या का मामला दादा ठाकुर अथवा गौरी शंकर जी से ही जुड़ा हुआ है या उसकी हत्या का मामला इनसे अलग है?"
"कहना क्या चाहते हो ज्ञानेंद्र?" महेंद्र सिंह ने उसकी तरफ देखा।
"मौजूदा समय में इस मामले के बारे में हर कोई यही सोचेगा कि रघुवीर की हत्या का मामला दादा ठाकुर अथवा गौरी शंकर जी से ही जुड़ा हुआ होगा।" ज्ञानेंद्र सिंह ने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"ज़ाहिर है इस सोच के चलते हम उसके हत्यारे को भी इन्हीं दोनों के बीच तलाश करने का सोचेंगे। हो सकता है कि उसकी हत्या किसी और ने ही की हो, ये सोच कर कि उसकी तरफ किसी का ध्यान जा ही नहीं सकेगा। आख़िर चंद्रकांत और उसके बेटे ने कुछ समय पहले दादा ठाकुर के भाई और बेटे की हत्या की थी तो ज़ाहिर है कि सब तो यही सोचेंगे कि इन्होंने ही रघुवीर की हत्या की होगी। उधर असल हत्यारा हमेशा के लिए एक तरह से महफूज़ ही रहेगा।"
"हम ज्ञानेंद्र की इन बातों से सहमत हैं मित्र।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए महेंद्र सिंह से कहा____"यकीनन काबीले-गौर बात की है इन्होंने। हमें भी यही लगता है कि रघुवीर का हत्यारा कोई और ही है जिसने मौजूदा समय में हमारी स्थिति का फ़ायदा उठा कर उसकी हत्या की और सबके ज़हन में ये बात बैठा दी कि ऐसा हमने ही किया है अथवा हमने गौरी शंकर के साथ मिल कर उसकी हत्या की साज़िश की है।"
"अब सोचने वाली बात ये है कि ऐसा वो कौन हो सकता है जिसने इस तरह से आपकी मौजूदा स्थिति का फ़ायदा उठा कर तथा रघुवीर की हत्या कर के अपना काम कर गया?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"मेरे हिसाब से अब हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि आपके अथवा गौरी शंकर जी के अलावा रघुवीर के और किस किस से ऐसे संबंध थे जिसके चलते कोई उसकी हत्या तक करने की हद तक चला गया?"
"हम्म्म्म सही कहा तुमने।" महेंद्र सिंह ने कहा____"कुछ समय पहले तक चंद्रकांत ठाकुर साहब का मुंशी था। उसका बेटा भी इनके लिए वफ़ादार था। हमें यकीन है कि चंद्रकांत ने मुंशीगीरी करने के अलावा भी ऐसे कई काम ठाकुर साहब की चोरी से किए होंगे जो उसके लिए फ़ायदेमंद रहे होंगे। ऐसे में उसके संबंध काफी लोगों से बने हो सकते हैं और उसके साथ साथ उसके बेटे के भी। हमें चंद्रकांत के ऐसे संबंधों के बारे में जांच पड़ताल करनी होगी। चंद्रकांत से भी उसके ऐसे संबंधों के बारे में पूछना होगा।"
"ठीक है आपको जो उचित लगे कीजिए।" पिता जी ने कहा____"अगर कहीं हमारी ज़रूरत महसूस हो तो बेझिझक हमें ख़बर कर दीजिएगा। हम भी चाहते हैं कि रघुवीर का हत्यारा जल्द से जल्द पकड़ा जाए और ये भी पता चल जाए कि उसने रघुवीर की हत्या क्यों की?"
इस संबंध में कुछ और बातें हुईं उसके बाद महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई और बाकी लोगों के साथ उठ कर चले गए। मैं और पिता जी भी जाने लगे तो सहसा गौरी शंकर ने पिता जी को रोक लिया।
"मैं आपसे अपने उन अपराधों की माफ़ी मांगना चाहता हूं दादा ठाकुर।" गौरी शंकर ने अपने हाथ जोड़ कर कहा____"जो मैंने अपने भाइयों और चंद्रकांत के साथ मिल कर आपके साथ किया है। बदले की भावना में हम सब इतने अंधे हो चुके थे कि आपकी नेक नीयती और उदारता को जानते हुए भी आपके साथ हमेशा बैर भाव रखा और फिर वो सब कर बैठे। बदले में आपने हमारे साथ जो किया उसके लिए वास्तव में हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं। ये आपके विशाल हृदय का ही सबूत है कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी आप हमसे रिश्ते सुधार लेने को कह रहे थे जबकि आपकी जगह कोई और होता तो यकीनन वो ख़्वाब में भी ऐसा नहीं सोचता। हमें हमारे अपराधों के लिए माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब। मैं अपने बच्चों की क़सम खा कर कहता हूं कि अब से मैं या मेरे घर का कोई भी सदस्य आपसे या आपके परिवार के किसी भी सदस्य से बैर भाव नहीं रखेगा। अब से हम आपकी छत्रछाया में ही रहेंगे।"
मैं गौरी शंकर की ये बातें सुन कर आश्चर्य चकित हो गया था। मुझे यकीन है कि पिता जी का भी यही हाल रहा होगा। वो उसकी बातें सुन कर काफी देर तक उसकी तरफ देखते रहे थे। दूसरी तरफ रूपचंद्र सामान्य भाव से खड़ा था।
"चलो देर आए दुरुस्त आए।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"हालाकि सोचने वाली बात है कि इसके लिए हम दोनों को ही भारी कीमत चुकानी पड़ी है। काश! इस तरह का हृदय परिवर्तन तुम सबका पहले ही हो गया होता तो आज वो लोग भी हमारे साथ होते जिन्हें हमने अपनी दुश्मनी अथवा नफ़रत के चलते भेंट चढ़ा दिया। कल्पना करो गौरी शंकर कि महज इतनी सी बात को तुम लोगों ने दिल से स्वीकार नहीं किया था और नफ़रत के चलते हमारे साथ साथ खुद अपने ही परिवार के लोगों को मिट्टी में मिला डाला। ऐसा क्यों होता है कि इंसान को वक्त रहते सही और ग़लत का एहसास नहीं होता? ख़ैर कोई बात नहीं, शायद हमारे एक होने के लिए हमें इतनी बड़ी कीमत को चुकाना ही लिखा था।"
"आप सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने संजीदगी से कहा____"हम इंसान वक्त से पहले प्रेम और नफ़रत के परिणामों का एहसास ही नहीं कर पाते। शायद यही हम इंसानों का दुर्भाग्य है।"
"इंसान अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हर इंसान के बस में होता है अच्छा और बुरा कर्म करना। हर इंसान अच्छी तरह जान रहा होता है कि वो कैसा कर्म कर रहा है। कभी प्रेम से, कभी नफ़रत से तो कभी स्वार्थ के चलते। ख़ैर छोड़ो, हम चाहते हैं कि हम सब एक नई शुरुआत करें। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते हैं कि हमारे गांव के साहूकारों का इतना सम्पन्न परिवार नफ़रत की वजह से अपने ही हाथों खुद को गर्त में डुबा ले।"
"आप बहुत महान हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"हम जैसे बुरी मानसिकता वाले लोगों के लिए भी इतना कुछ सोचते हैं तो ये आपकी महानता ही है। अब मुझे पूरा भरोसा है कि हम जितने भी लोग बचे हैं आपकी छत्रछाया में खुशी से फल फूल जाएंगे।"
"एक बात और।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारी भतीजी ने हमारे बेटे की जान बचा कर इसके ऊपर ही नहीं बल्कि हमारे ऊपर भी बहुत बड़ा उपकार किया है। पहले हमें कुछ पता नहीं था किंतु अब हमें सब कुछ मालूम हो चुका है इस लिए हम उस प्यारी सी बच्ची को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इस रिश्ते से अब तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी।"
"मुझे कोई समस्या नहीं है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर झट से बोल पड़ा____"बल्कि ये तो मेरे और मेरी भतीजी के लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि आप उसे अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।"
"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"अगले वर्ष हम बारात ले कर तुम्हारे घर आएंगे और तुम्हारी भतीजी को अपनी बहू बना कर ले जाएंगे।"
पिता जी की इस बता को सुन कर गौरी शंकर सहसा घुटनों के बल बैठ गया और फिर अपने सिर को पिता जी के चरणों में रख दिया। ये देख कर पिता जी पहले तो चौंके फिर झुके और उसे दोनों हाथों से पकड़ कर उठा लिया। उधर रूपचंद्र तो सामान्य ही दिख रहा था लेकिन इधर मेरी स्थिति थोड़ा अजीब हो गई थी। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो बात असंभव थी वो पलक झपकते ही संभव कैसे हो गई थी? एकाएक ही मेरा सिर अंतरिक्ष में परवाज़ करता महसूस होने लगा था।
"तुम्हारी जगह हमारे पैरों में नहीं।" सहसा पिता जी की आवाज़ से मैं धरातल पर आया____"बल्कि हमारे हृदय में बनने वाली है गौरी शंकर। अगले वर्ष हम दोनों समधी बन जाएंगे।"
"आप जैसा महान इस धरती में कोई नहीं हो सकता दादा ठाकुर।" गौरी शंकर की आंखें नम होती नज़र आईं____"अब जा कर मुझे एहसास हो रहा है कि इसके पहले हम सब कितने ग़लत थे। काश! पहले ही हम सबको सद्बुद्धि आ गई होती। काश! हमने अपने अंदर नफ़रत को इस तरह से पाला न होता।"
कहते कहते गौरी शंकर का गला भर आया और उससे आगे कुछ बोला ना गया। पिता जी ने किसी तरह उसे शांत किया और फिर समझा बुझा कर उसे घर भेज दिया। उसके बाद मैं और पिता जी बग्घी में बैठ कर अपनी हवेली की तरफ बढ़ चले। इधर मेरे दिलो दिमाग़ में एक अलग ही मंथन चलने लगा था।
"आप जैसा महान इस धरती में कोई नहीं हो सकता दादा ठाकुर।" गौरी शंकर की आंखें नम होती नज़र आईं____"अब जा कर मुझे एहसास हो रहा है कि इसके पहले हम सब कितने ग़लत थे। काश! पहले ही हम सबको सद्बुद्धि आ गई होती। काश! हमने अपने अंदर नफ़रत को इस तरह से पाला न होता।"
कहते कहते गौरी शंकर का गला भर आया और उससे आगे कुछ बोला ना गया। पिता जी ने किसी तरह उसे शांत किया और फिर समझा बुझा कर उसे घर भेज दिया। उसके बाद मैं और पिता जी बग्घी में बैठ कर अपनी हवेली की तरफ बढ़ चले। इधर मेरे दिलो दिमाग़ में एक अलग ही मंथन चलने लगा था।
अब आगे....
सरोज अपने घर के बरामदे में रखी खाट पर बैठी सोचो में गुम थी। उसकी बेटी अनुराधा घर के पीछे मौजूद कुएं में अपने भाई अनूप को ले कर नहाने गई हुई थी। पिछले कुछ दिनों से सरोज अपनी बेटी के लिए काफी चिंतित थी। अनुराधा का हर वक्त ख़ामोश तथा गुमसुम रहना ही उसकी चिंता का सबसे बड़ा कारण था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसकी बेटी को हुआ क्या है? आख़िर ऐसी कौन सी वजह है जिसके चलते उसकी बेटी एकाएक ही गूंगी बन कर गुमसुम रहने लगी है? सरोज ने कई बार उससे पूछा था मगर उसने सिर्फ इतना ही कहा था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं रहती है, दूसरे उसे उसके बापू की याद आती है। सरोज को अब समझ आ चुका था कि उसकी बेटी ज़रूर उससे कुछ छुपा रही है।
यूं तो अनुराधा पहले भी ज़्यादा किसी से बात नहीं करती थी लेकिन अब से पहले वो इस तरह ख़ामोश और गुमसुम भी नहीं रहती थी। मुरारी की याद तो सरोज को भी बहुत आती थी लेकिन इसके लिए वो अपनी बेटी की तरह गुमसुम नहीं रहने लगी थी। सरोज को अब पक्का यकीन हो चला था कि कोई तो बात ज़रूर है।
अभी वो खाट पर बैठी ये सब सोच ही रही थी कि तभी किसी ने बाहर वाला दरवाज़ा खटखटाया जिससे उसका ध्यान भंग हुआ। खाट से उतर कर वो दरवाज़े के पास पहुंची और फिर उसने दरवाज़ा खोला। बाहर भुवन को देख उसने राहत की तो सांस ली ही किंतु सहसा उसके ज़हन में ख़याल आया कि क्या भुवन को उसकी बेटी के ख़ामोश रहने की वजह पता हो सकती है?
"क्या बात है काकी?" सरोज ने उसे अंदर आने का रास्ता दिया तो भुवन ने अंदर दाखिल होते हुए उससे पूछा____"कुछ परेशान दिख रही हो मुझे। सब ठीक तो है ना?"
"तुम सही कह रहे हो भुवन।" सरोज ने दरवाज़ा बंद कर के उसके पीछे आते हुए कहा____"मैं सच में परेशान हूं और सिर्फ परेशान ही बस नहीं हूं बल्कि चिंतित भी हूं।"
"आख़िर बात क्या है काकी?" बरामदे में रखी खाट पर बैठते हुए भुवन ने पूछा____"किस बात से चिंतित हो तुम?"
"क्या बताऊं बेटा। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा मुझे।" सरोज बरामदे में ही ज़मीन पर बैठने के बाद बोली____"पिछले कुछ दिनों से अनू के बर्ताव को देख कर चिंतित हूं।"
"अ...अनू के??" भुवन एकदम से चौंका____"क्या हुआ उसको?"
"पता नहीं क्या हो गया है उसे?" सरोज ने हताश भाव से कहा____"हर वक्त चुप्पी साधे रहती है। किसी से कुछ बोलती ही नहीं है। बस सारा दिन गुमसुम सी ही रहती है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर उसे हुआ क्या है? पूछती हूं तो गोल मोल जवाब दे कर चुप हो जाती है।"
सरोज की बातें सुन कर भुवन फ़ौरन कुछ बोल न सका। उसे पता था कि अनुराधा की ऐसी दशा क्यों थी? अभी तक तो वो यही समझ रहा था कि शायद धीरे धीरे अनुराधा के दिलो दिमाग़ से छोटे कुंवर का ख़याल निकल जाएगा किंतु अब उसे भी एहसास हो चुका था कि अनुराधा अब उस मानसिकता पर पहुंच गई है जहां से उसे कोई भी आसानी से नहीं निकाल सकता था। एकाएक भुवन भी अनुराधा के लिए चिंतित हो उठा। उसने सच्चे हृदय से उसे अपनी छोटी बहन मान लिया था इस लिए उसे इस हालत में देख कर उसे भी तकलीफ़ होने लगी थी।
"क्या हुआ भुवन?" उसे ख़ामोशी से कुछ सोचते देख सरोज ने पूछा____"क्या सोचने लगे तुम?"
"चिंता मत करो काकी।" भुवन ने खुद को सम्हालते हुए कहा____"सब ठीक हो जाएगा।"
"कैसे ठीक हो जाएगा बेटा?" सरोज ने अधीरता से कहा____"मुझे तो अब उसकी दशा देख कर बहुत घबराहट होने लगी है। समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या करूं मैं जिससे कि वो पहले जैसी हो जाए? मुझे तो वो कुछ बताती ही नहीं है लेकिन तुम तो उसे अपनी बहन मानते हो। क्या तुम्हें भी उसकी इस हालत के बारे में कुछ नहीं पता?"
"मैं तुम्हें किसी अंधेरे में नहीं रखना चाहता काकी।" भुवन ने गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कहा____"मैं अच्छी तरह समझता हूं कि तुम्हें अपनी बेटी की बहुत चिंता हो रही है। इस लिए मैं तुम्हें बताता हूं कि अनुराधा की इस हालत का क्या कारण है?"
"क...क्या तुम जानते हो?" सरोज ने हैरानी से आंखें फाड़ कर उसे देखा____"क्या सच में तुम्हें पता है कि अनू को क्या हुआ है?"
"हां काकी।" भुवन ने कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि अनुराधा की ये हालत किस वजह से है।"
"क..किस वजह से है भुवन?" सरोज ने आतुरता से पूछा____"मुझे जल्दी बताओ बेटा कि आख़िर मेरी बेटी को क्या हुआ है?"
"प्रेम।" भुवन ने धड़कते दिल से कहा____"हां काकी उसे प्रेम हो गया है।"
"क...क्या???" सरोज की ज़ुबान लड़खड़ा गई, किसी तरह खुद को सम्हाल कर बोली____"ये तुम क्या कह रहे हो?"
"यही सच है काकी।" भुवन ने कहा____"मेरी मासूम बहन को प्रेम हो गया है, लेकिन उस पगली को शायद खुद ही नहीं पता है कि जिस हालत से वो गुज़र रही है उस हालत को असल में क्या कहते हैं?"
"पता नहीं तुम ये क्या बोले जा रहे हो?" सरोज का दिमाग़ जैसे चकरा ही गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
"इंसान जब किसी से प्रेम करने लगता है काकी तो उसकी ऐसी ही दशा हो जाती है।" भुवन ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"और ये दशा तब और भी ज़्यादा बद्तर हो जाती है जब प्रेम करने वाले को उसका प्रेमी नहीं मिलता।"
सरोज आश्चर्य से आंखें और मुंह फाड़े देखती रह गई भुवन को। इधर भुवन के ज़हन में सहसा ये विचार उभरा कि उसने ये बात सरोज को बता कर सही किया या ग़लत?
"क...कौन है वो?" उधर सरोज ने अजीब तरह से भुवन को देखते हुए पूछा____"बताओ भुवन, कौन है वो व्यक्ति जिससे मेरी बेटी प्रेम करती है? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरी भोली भाली बेटी ऐसे काम भी कर सकती है।"
"सच जान कर तुम्हें झटका लग सकता है काकी।" भुवन ने सरोज की तरफ देखते हुए गंभीरता से कहा____"लेकिन सच तो सच ही है। उसे सुनने के लिए तुम्हें हिम्मत से काम लेना होगा।"
"तुम्हारी ये बात सुन कर मेरा जी बहुत ज़्यादा घबराने लगा है।" सरोज ने कहा____"और तुम कह रहे हो कि मुझे हिम्मत से काम लेना होगा? ख़ैर तुम बताओ, मेरे जी से ज़्यादा मेरी बेटी मेरे लिए मायने रखती है।"
"अनुराधा जिस व्यक्ति से प्रेम करती है।" भुवन ने मानो सरोज के सिर पर बम फोड़ते हुए कहा____"वो व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि छोटे कुंवर हैं।"
"क...क्या????" सरोज की मानो चीख ही निकल गई। उसे ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही उसके पिछवाड़े की ज़मीन पाताल तक धंसती चली गई है।
"हां काकी।" भुवन ने कहा____"सच यही है कि अनुराधा छोटे कुंवर से प्रेम करने लगी है और शायद इस क़दर करने लगी है कि उसकी वजह से आज वो ऐसी दशा में पहुंच गई है।"
सरोज को एकदम से जैसे लकवा मार गया। किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में बैठी रह गई वो। भुवन को उसकी हालत का बखूबी एहसास था। वो जानता था कि एक दिन सरोज के सामने ये सच्चाई ज़रूर आएगी जिससे उसकी ये दशा हो जाएगी। तभी अचानक सरोज को जैसे होश आया।
"न...नहीं नहीं।" फिर वो अजीब सा बर्ताव करते हुए बोली____"ये...ये नहीं हो सकता। नहीं भुवन, ये सच नहीं हो सकता। तुम झूठ बोल रहे हो मुझसे? मेरी अनू ऐसा नहीं कर सकती। वो तो अभी नादान है, नासमझ है। उसे तो दुनियादारी का कोई ज्ञान ही नहीं है।"
"यही तो मैंने भी कहा है काकी।" भुवन के होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई____"कि उसे शायद खुद ही नहीं पता है कि वो जिस हालत में है उसे असल में क्या कहते हैं?"
"हाय राम! ये क्या ग़ज़ब हो गया?" सरोज ने जैसे माथा पीट लिया____"मेरी फूल सी बेटी के मन में ये कैसा बीज बो दिया तुमने? अब क्या होगा मेरी बेटी का?"
"चिंता मत करो काकी।" भुवन ने कहा____"छोटे कुंवर को सब पता है। मैंने इस बारे में उनसे पूछा था तो उन्होंने मुझसे बस यही कहा था कि इस बारे में मैं ज़्यादा मत सोचूं। क्योंकि सच ये है कि अगर अनुराधा को तकलीफ़ होगी तो उन्हें भी होगी।"
"क....क्या मतलब है इस बात का?" सरोज के चेहरे पर असमंजस के से भाव उभर आए।
"मतलब ये है कि शायद वो भी अनुराधा से प्रेम करते हैं।" भुवन ने कहा____"तभी तो अनुराधा की तकलीफ़ से उन्हें भी तकलीफ़ होती है।"
"नहीं....ये सब झूठ है।" सरोज की आवाज़ भारी हो गई____"सच तो ये है कि वैभव ने मेरी भोली भाली बेटी को अपने झूठे प्रेम के जाल में वैसे ही फांस लिया है जैसे वो बाकी लड़कियों को अब तक फांसता आया है। वो बाकी सबकी तरह मेरी बेटी को भी अपनी हवस का शिकार बना लेगा और क्या पता...उसने बना भी लिया हो। हे भगवान! ये क्या अनर्थ करवा दिया मेरी बेटी के साथ।"
कहने के साथ ही सरोज फूट फूट कर रोने लगी। इधर भुवन उसकी बातें सुन कर एकदम से ही चौंका और फिर गहरी सोच में डूबता नज़र आया। उसके अपने दिलो दिमाग़ में जैसे कई तरह के सवाल बड़ी तेज़ी से उछल कूद करने लगे थे।
"तुम ग़लत सोच रही हो मां।" सहसा आंगन में अनुराधा की आवाज़ गूंजी तो सरोज और भुवन दोनों ने ही चौंक कर आवाज़ की दिशा में देखा। अनुराधा अपने भाई के साथ गीले कपड़ों में दरवाज़े के अंदर खड़ी थी। उसके एक हाथ में पानी से भरी बाल्टी थी।
"तुम ये कैसे सोच सकती हो मां कि तुम्हारी बेटी अपने घर की इज्ज़त और मान मर्यादा को इस तरह धूल में मिला देगी?" अनुराधा ने गंभीर लहजे में कहा____"मैं कोई दूध पीती बच्ची नहीं हूं जिसे अच्छे बुरे का इतना भी ज्ञान न हो। तुम्हारी बेटी ने अपनी इज्ज़त पर दाग़ नहीं लगाया है मां और ना ही किसी ने लगाना चाहा है।"
"तू सच कह रही है ना अनू?" सरोज की जैसे जान में जान आई____"और....और तू वैभव से प्रेम भी नहीं करती है ना?"
"कपड़े बदल लूं मां।" बाल्टी को एक तरफ रख कर अनुराधा ने कहा____"उसके बाद तुम्हें सब कुछ सच सच बता दूंगी।"
कहने के साथ ही अनुराधा ने एक नज़र भुवन की तरफ देखा और फिर अपने कमरे की तरफ चली गई। इधर भुवन ये सोच कर हैरान था कि अनुराधा में इतनी हिम्मत कहां से आ गई थी जिसके चलते उसने इतना कुछ बेझिझक और निडरता से कह दिया था? बहरहाल कुछ ही देर में अनुराधा कपड़े बदल कर बाहर आ गई।
"माफ़ करना भैया।" फिर उसने संजीदगी से भुवन को देखते हुए कहा____"आपके सामने मैंने निर्लज्जता से ऐसी बातें बोल दी लेकिन सच कहूं तो आज आपकी ही वजह से मुझमें इतना बोलने की हिम्मत आई है वरना मैं तो शायद कभी भी इस बारे में मां को बता ही नहीं पाती।"
"ये सब छोड़।" सरोज ने तपाक से कहा____"और वो बता जो मैंने पूछा था। तू वैभव से प्रेम नहीं करती है ना?"
"मुझे तो पता ही नहीं था मां कि प्रेम क्या होता है?" अनुराधा ने जैसे सोच लिया था कि अब वो सब कुछ बेझिझक हो कर बोलेगी____"दरवाज़े के पास खड़ी आप दोनों की बातें सुन रही थी मैं। भुवन भैया की बातों से ही मुझे पता चला कि जिसे मैं अब तक समझ नहीं पा रही थी वो आख़िर था क्या? इतने दिनों से मैं यही तो जानना चाहती थी कि क्यों मुझे छोटे कुंवर की इतनी याद आती है? क्यों हर वक्त उनकी बातें मेरे कानों में गूंजती रहती हैं? क्यों हर समय उन्हें देखने का मन करता है? इन सब बातों का ज्ञान अब जा कर हुआ है मुझे।"
"ऐसी बातें करते हुए तुझे लाज नहीं आती बेशर्म?" सरोज ने एकाएक नाराज़गी से उसे देखा____"पता नहीं क्या क्या उल्टा सीधा बके जा रही है। चुप कर वरना मुंह तोड़ दूंगी तेरा।"
"इसे बोलने दो काकी।" भुवन ने कहा___"इसके मन में जो है उसे निकल जाने दो। तभी इसके मन को शान्ति मिलेगी वरना ये फिर से अंदर ही अंदर खुद को जलाती रहेगी।"
"उस वैभव ने तुझे अपने प्रेम के जाल में फांसा है ना?" सरोज ने उसे घूरते हुए कहा____"सच सच बता कब से चल रहा है ये सब?"
"तुम फिर से ग़लत सोच रही हो मां।" अनुराधा ने अधीरता से कहा____"मुझे किसी ने अपने जाल में नहीं फंसाया है। मुझे नहीं पता कि कब मेरे मन में छोटे कुंवर की छवि बस गई और कब मुझे उनसे प्रेम हो गया। बस इतना जानती हूं कि हर वक्त उनकी याद आती है। हर वक्त उन्हें देखने का मन करता है और जब वो नहीं दिखते तो बहुत दुख होता है। पता नहीं क्यों पर कुछ भी अच्छा नहीं लगता है मुझे। जब वो याद आते हैं तो आंखों से आंसू बहने लगते हैं।"
"हाय राम!" सरोज की आंखें आश्चर्य से फैल गईं____"क्या हो गया है इस लड़की को? पता नहीं क्या क्या बोले जा रही है।"
"मुझे पूछना तो नहीं चाहिए मेरी बहन लेकिन फिर भी पूछ रहा हूं।" भुवन ने कहा____"मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि आख़िर तुम्हारे और छोटे कुंवर के बीच ऐसा क्या हुआ है जिसके चलते तुम उनसे प्रेम करने लगी हो?"
"मुझे कुछ नहीं पता भैया।" अनुराधा ने बेबसी से कहा____"जब वो यहां आते थे तो उनको चोरी छुपे देखा करती थी। वो मुझे राज कुमार की तरह दिखते थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में दादी मुझे राजा रानी की कहानियां सुनाया करती थीं।"
उसके बाद अनुराधा ने झिझकते हुए संक्षेप में वो सारी बातें बताई जो उसके और वैभव के बीच शुरू से अब तक हुईं थी। जहां एक तरफ सरोज अपनी बेटी की प्रेम कहानी सुन चकित थी वहीं भुवन को उसके भोलेपन और नादानी भरी बातों पर बड़ी सहानुभूति हो रही थी।
भुवन को पहले भी यकीन था कि अनुराधा ऐसी वैसी लड़की नहीं है। हां वो थोड़ी नादान और नासमझ ज़रूर थी किंतु उसका मन बहुत भोला और साफ था। अब जब उसे उसकी प्रेम कहानी के सफ़र का पता चला तो उसके ज़हन में बस एक ही ख़याल उभरा____"ऐसी मासूम लड़की का कोई कसूर नहीं है। कसूर है तो उन हालातों का जिन हालातों में उसे वैभव जैसे अमीर और उच्च खानदान के लड़के को देखते हुए प्रेम हुआ।"
भुवन को एहसास था कि अनुराधा जो एक मामूली से ग़रीब घर की लड़की है उसका वैभव से दूर दूर तक कोई मेल नहीं है। फिर भी अगर वैभव को उसकी तकलीफ़ से तकलीफ़ होती है है तो शायद उसके जीवन की डगर अपनी उस मंज़िल तक पहुंच ही जाए जहां पहुंचना बेहद ही मुश्किल है।
✮✮✮✮
चंद्रकांत के बेटे के अंतिम संस्कार में मैं और पिता जी के साथ लगभग पूरा गांव ही शामिल था। गांव का साहूकार गौरी शंकर भी और दूसरे गांव के कुछ लोग भी। इस सब में दोपहर हो गई थी। हवेली में आ कर मैं और पिता जी एक बार फिर से नहाए और फिर कपड़े पहन कर खाना खाने बैठे। खाने के दौरान मां से पिता जी की थोड़ी बहुत बात चीत हुई उसके बाद मैं और पिता जी बैठक में आ गए।
"चंद्रकांत के बेटे की हत्या हो जाने से गांव में थोड़ा दहशत का माहौल हो गया है।" पिता जी ने थोड़े गंभीर भाव से कहा____"और इसके साथ ही अब हमारे लिए भी परेशानी और चिंता की बात हो गई है।"
"परेशानी किस बात की पिता जी?" मैंने सोचने वाले भाव से उनकी तरफ देखा।
"सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं लग रहा।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया है किंतु उसकी तरफ से किसी भी तरह की कोई हरकत नहीं की गई। वो तुम्हारी जान का दुश्मन बना हुआ था इस लिए अब सवाल ये है कि वो इस तरह अचानक से ख़ामोश क्यों हो गया है? क्या वो कुछ ऐसा करने का मंसूबा बनाए हुए है जो हमारी कल्पना से भी परे है?"
"कुछ तो बात ज़रूर है पिता जी।" मैंने गंभीरता से कहा____"उसकी ख़ामोशी उसके द्वारा किसी बड़े तूफ़ान के लाने का सबब हो सकती है। वो अब तक हमारी पकड़ में इस लिए नहीं आया है क्योंकि वो आश्चर्यजनक रूप से ख़ामोश है। अगर वो कोई हरकत करे तो हमें भी कुछ करने का मौका मिले।"
"तुम्हें बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत है।" पिता जी ने कहा____"और साथ ही अकेले कहीं भी जाने का मत सोचना। वैसे हमने तुम्हारी सुरक्षा के लिए गुप्त रूप से आदमियों को लगा रखा है, फिर भी तुम अपनी तरफ से कोई लापरवाही मत करना।"
"उसने अब तक अपने मोहरों के द्वारा ही मुझ पर जानलेवा हमला करवाया था।" मैंने कहा____"वो खुद कभी मेरे सामने नहीं आया। मैं तो चाहता हूं कि वो मर्द की तरह मेरे सामने आ कर मेरी जान लेने की कोशिश करे। मैं भी तो देखूं कि मेरी जान लेने की इच्छा रखने वाले के खून में कितनी तपिश है।"
"तुम्हें फिलहाल ऐसी कोई भी बेवकूफी भरी बात नहीं सोचनी है।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा____"वो एक छलावा जैसा है जो धोखे से ही तुम्हारी जान लेने की कोशिश करेगा इस लिए तुम्हें पूरी तरह सतर्क रहना है। उसकी ख़ामोशी देख कर हर गुज़रते पल के साथ हमारी बेचैनी और परेशानी बढ़ती ही जा रही है। हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द उसका पर्दाफाश हो और वो हमारी पकड़ में आ जाए।"
"मुझे लगता है कि हमें उसके बारे में जानने के लिए सुनील और चेतन को अब अपने काबू में लेना चाहिए।" मैंने कहा____"उन दोनों को कुछ तो पता होगा कि सफ़ेदपोश से उनकी किस तरह से मुलाक़ात होती थी? दूसरी अहम बात ये भी है कि उनसे हमें ये भी पता चल जाएगा कि उन लोगों ने आख़िर किस वजह से मेरे खिलाफ़ जा कर उस सफ़ेदपोश का मोहरा बनना स्वीकार किया था?"
"सही कहा।" पिता जी ने सिर हिलाया____"अभी तक हम यही सोचते थे कि हमारी वजह से किसी पर कोई ख़तरे जैसी बात न आए किंतु सच तो ये है कि हमारे ऐसा सोचते रहने से सिर्फ हमारा ही बुरा हुआ है। इस लिए अब से किसी पर भी इस तरह की कोई रियायत नहीं की जाएगी। हम आज ही शेरा को उन्हें पकड़ कर लाने के लिए बोलेंगे। इस किस्से को अब हम और ज़्यादा लंबा नहीं होने देंगे।"
"अगर यही सोच और सख़्ती आपने पहले अख़्तियार की होती।" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"तो आज हमारे साथ ऐसा नहीं होता। जगताप चाचा और बड़े भैया आज हमारे साथ होते। माफ़ कीजिए पिता जी लेकिन ये सच है कि आपकी नर्मदिली ने हमारे दुश्मनों के हौसलों को बुलंद किया जिसके चलते उन लोगों ने हमारे साथ इतना कुछ करने की हिम्मत दिखाई। आप इस गांव के ही नहीं बल्कि आस पास के गावों के भी मुखिया थे। मुखिया को इतना भी रहमदिल और कमज़ोर नहीं होना चाहिए कि लोगों के अंदर उसके लिए कोई ख़ौफ ही न रह जाए।"
"हमने जब से होश सम्हाला था तब से अपने पिता जी की हर कार्य शैली को देखा था।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"हमने देखा था कि वो किस तरह गांव के लोगों पर क़हर बन कर टूट पड़ते थे। लोग उनसे इतना डरते थे कि वो अपनी मर्ज़ी से सांस भी नहीं ले सकते थे। किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनके सामने सिर उठाने की, उनकी तरफ देखने की तो बहुत दूर की बात है। वो तो ख़ैर मामूली लोग थे किंतु यही हाल बड़े बड़े लोगों का भी था। शहर के विधायक मंत्री, पुलिस के अधिकारी सब उनसे डरते थे। इसी हवेली में उनका अपना एक हरमखाना हुआ करता था, जहां पर शाम ढलते ही उनकी महफ़िल सजती थी। उस महफ़िल में लड़कियां उनके सामने नाचती गाती थीं। पिता जी को खुश रखने के लिए बड़े बड़े लोग हमेशा दूर दूर से लड़कियों को लाते थे और उनके लिए खुद ही ये सब प्रबंध करते थे। ख़ैर उनकी मृत्यु के बाद जब हम दादा ठाकुर की गद्दी पर बैठे तो हमने ये सब कुछ बंद करवा दिया। उनके हरमखाने में हमेशा हमेशा के लिए ताला लगवा दिया। आज भी हवेली की ऊपरी मंजिल में बने उनके हरमखाने में वर्षों से ताला लगा हुआ है। वहां पर किसी को भी जाने की इजाज़त नहीं है। हमने ऐसा सिर्फ इसी लिए किया था क्योंकि हमने बचपन से देखा था कि पिता जी ने मासूम लोगों पर कितना अत्याचार किया था। जिसकी भी बहू बेटी उन्हें पसंद आ जाती थी उनके आदमी उसे उठा लाते और फिर पिता जी उसके मान सम्मान को तार तार कर डालते थे। उनके ख़ौफ की वजह से कोई उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की सोच तक नहीं सकता था। यही हाल हवेली के अंदर भी था। हवेली के अंदर भी कोई उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कुछ नहीं बोल सकता था। हमारी माता जी हमेशा उनके इन सभी कार्यों से दुखी रहतीं थी और हम दोनों भाइयों को यही सीख देती थीं कि हम बड़े हो कर अपने पिता जी के जैसे बनने का ख़याल भी अपने ज़हन में न लाएं। हमने बचपन से लोगों पर अत्याचार होते हुए देखा था। उनकी आत्माओं को तड़पते हुए देखा था इस लिए हमें उनकी पीड़ा का अच्छी तरह एहसास था। हम पहले भी उन दुखी लोगों के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन पिता जी के डर से कभी कुछ कर नहीं पाए थे। उसके बाद जब पिता जी की मृत्यु हुई तो हमने एक ही प्रण लिया कि अब से जीवन में कभी भी किसी को दुखी नहीं होने देंगे। पिता जी ने ऐसा माहौल बना रखा था कि हमें डरी सहमी हुई जनता को सामान्य बनाने में वर्षों लग गए। उन्हें इस बात का यकीन दिलाने में हमें वर्षों लग गए कि अब से वो अपनी मर्ज़ी से कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें हवेली में रहने वालों से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। अपने छोटे भाई जगताप को भी हमने हमेशा यही पाठ पढ़ाया कि वो भूल से भी किसी के साथ ग़लत न करे। वर्षों बाद आख़िर ऐसा समय आ ही गया जब वही डरे सहमे लोग सामान्य भाव से जीने लगे। हमने सबकी दिल खोल कर मदद की और उन्हें अपने तरीके से जीने के लिए प्रोत्साहित किया। ये उसी का परिणाम था कि यही डरे सहमे लोग हमें देवता की तरह पूजने लगे। लोगों को अपने तरीके से जीता देख और उन्हें खुश देख हमें भी आत्मिक खुशी मिली। हमें ऐसा लगा जैसे हमारी कोई तपस्या पूरी हो गई हो। ताक़त और ताक़तवर होने का मतलब ये नहीं होता कि हम अपनी ताक़त का स्तेमाल कर के लोगों का सुख चैन ही छीन लें। ईश्वर ने सबको समान रूप से बनाया है। इस धरती पर सबको खुशी से जीने का अधिकार है। किसी की खुशियां छीन कर और उन्हें दुख दे कर हम कोई अच्छा कार्य नहीं करते हैं बल्कि हद दर्जे का पाप करते हैं। हमने लोगों के अंदर से डर को दूर किया और सबको अपने तरीके से जीने की आज़ादी दी। बदले में हमने किसी से कुछ नहीं मांगा इसके बावजूद लोग हमें देवता मान बैठे और हमें पूजने लगे। लोगों के अंदर हमारे प्रति ऐसा भरोसा बैठ गया कि अगर उनके सामने कोई ग़लती से भी हमारी बुराई करता था तो वो लोग उस व्यक्ति की जान लेने पर उतारू हो जाते थे। वो अपने देवता की बुराई अथवा अपमान किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकते थे। किसी इंसान को इससे बढ़ कर और भला क्या चाहिए? जिस युग में लोगों की आस्था सचमुच के देवी देवताओं के प्रति कमज़ोर हो जाती है उस युग में अगर लोग किसी इंसान को देवता ही मान बैठे तो उसके लिए इससे बड़ा गौरव क्या हो सकता है? क्या इस खुशी और इस सम्मान से भी बड़ा कुछ हो सकता है?"
पिता जी ये सब कहने के बाद चुप हुए तो बैठक में सन्नाटा छा गया। मेरे अंदर उनकी ये बातें सुन कर अजीब तरह का एहसास होने लगा था।
"साहूकारों ने हमारे भाई और बेटे की हत्या की और फिर गुस्से में आ कर हमने भी उनके लोगों की हत्या कर दी।" पिता जी ने फिर से कहना शुरू किया____"हम जानते हैं कि इस सबमें हमारा इतना भी दोष नहीं है जितना कि वो लोग समझते हैं। इसके बावजूद हमने उनके आरोपों को क़बूल किया और उनसे अपने किए गए कृत्य की माफ़ी मांगी। खुद को उनके सामने झुका भी दिया। ऐसा सिर्फ इसी लिए कि हम अपने पिता जी की तरह नहीं बनना चाहते थे और ना ही उनके इतिहास को दोहराना चाहते थे। अपनी वर्षों की मेहनत को इस तरह से ख़ाक में मिलता नहीं देख सकते थे हम। लोग हमें देवता न मानें कोई बात नहीं लेकिन एक अच्छा इंसान समझें ये सबसे ज़रूरी है। अगर हम चाहते तो इतना कुछ कर देने के बाद भी साहूकार हमारा कुछ नहीं कर पाते और ना ही हवेली में उस दिन पंचायत होती। ये हमारा मामला था, अतः इसे हम अपने तरीके से जैसे चाहे निपटा लेते लेकिन हमने ऐसा नहीं किया बल्कि सबके बारे में सोचा। ख़ास कर इस बारे में कि जिन लोगों ने हमारे प्रति अपने अंदर आस्था जगा रखी है उन्हें हमारे बदल गए रूप से धक्का लग जाएगा। लोग ये सोच बैठेंगे कि हम भी अपने पिता की तरह बन गए और लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया है। ख़ैर छोड़ो इन बातों को, हम चाहते हैं कि तुम भी एक अच्छा इंसान बनो और लोगों के अंदर जो तुम्हारी छवि बनी हुई है उसे अपने अच्छे कर्मों से मिटा डालो।"
पिता जी की बात सुन कर मैंने सिर हिलाया और फिर उनसे इजाज़त ले कर मैं मोटर साईकिल से अपने खेतों की तरफ निकल गया। सारे रास्ते मेरे ज़हन में पिता जी की बातें ही गूंजती रहीं।
पिता जी की बात सुन कर मैंने सिर हिलाया और फिर उनसे इजाज़त ले कर मैं मोटर साईकिल से अपने खेतों की तरफ निकल गया। सारे रास्ते मेरे ज़हन में पिता जी की बातें ही गूंजती रहीं।
अब आगे....
गौरी शंकर ने अपने घर की सभी औरतों को बता दिया था कि आज दादा ठाकुर से उसकी क्या बातें हुई हैं। उसकी बातें सुन कर सभी के चेहरों पर अजीब से भाव उभर आए थे। अपने घर के सभी मर्दों और सभी बच्चों के हत्यारे की गौरी शंकर द्वारा सारी बातें सुन कर उन्हें अच्छा तो नहीं लगा था लेकिन अपने ससुर की बातों का ध्यान कर के सभी ने जैसे अब परिस्थितियों से समझौता कर लिया था। ये अलग बात है कि इस समझौते के चलते उन्हें अपने अंदर कोई खुशी महसूस नहीं हो रही थी। कदाचित मन को पूरी तरह बदलने में अभी समय लगना था।
वहीं दूसरी तरफ रूपा ने भी गौरी शंकर की सारी बातें सुन ली थी। उसे ये जान कर अत्यंत खुशी हुई थी कि जिस रिश्ते का होना लगभग असम्भव था वो अब किसी चमत्कार के जैसे पूरी तरह संभव की सूरत में बदल गया है। वैभव के साथ अपने ब्याह की पक्की ख़बर सुन कर उसे बेहद खुशी हुई थी लेकिन जल्दी ही उसके चेहरे पर मायूसी छा गई।
ऐसा इस लिए क्योंकि उसे एकदम से ही याद आ गया था कि जिसे वो बेइंतहां प्रेम करती है वो तो किसी अनुराधा नाम की मामूली सी लड़की से प्रेम करता है। ज़ाहिर है अगर वो उससे प्रेम करता है तो ये ख़्वाइश भी रखता ही होगा कि उसी के साथ उसका ब्याह हो। वैभव की फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ रूपा को पूरा यकीन था कि वैभव उसी से ब्याह करेगा जिससे वो प्रेम करता है। यानि भले ही उसके पिता दादा ठाकुर ने अपने बेटे से उसके ब्याह की बात को पक्की कर लिया हो लेकिन वैभव को ये रिश्ता दिल से क़बूल नहीं हो सकता था। रूपा यही सब सोच कर एकाएक मायूस और दुखी हो गई थी।
रूपा ये तो चाहती थी कि उसका ब्याह उसके प्रेमी वैभव से ही हो लेकिन वो वैभव को इसके लिए मजबूर अथवा बेबस नहीं करना चाहती थी और ना ही वो चाहती थी कि उसकी वजह से उसका प्रेमी बेबस और लाचार सा हो जाए। वो खुद उसके विरह में जीवन भर तड़पना स्वीकार कर सकती थी लेकिन वैभव को किसी बात से बेबस कर के उसे दुखी होते नहीं देख सकती थी। उसे अच्छी तरह एहसास हो चुका था कि वैभव की खुशी उस लड़की से ही है जिसका नाम अनुराधा है। उसे ऐसा लगा जैसे वो जीत कर भी हार गई है। वैभव भले ही अपने पिता के कहने पर मजबूरी में उससे ब्याह कर लेगा लेकिन ये भी सच है कि वो उसे वैसा प्रेम नहीं कर सकेगा जैसा वो अनुराधा से करता है। एकाएक ही रूपा को अपनी बेबसी और अपनी फूटी किस्मत पर रोना आ गया। अपने कमरे में वो पलंग पर औंधे मुंह गिर कर तथा तकिए में मुंह छुपा कर फूट फूट कर रो पड़ी। उसका जी चाहा कि धरती फटे और वो उसमें समा जाए।
✮✮✮✮
शाम तक मैं खेतों में रहा और किसी न किसी काम में लगा कर खुद को बहलाता रहा। मेरे दिलो दिमाग़ से वो सब बातें जा ही नहीं रहीं थी जो पिता जी ने गौरी शंकर से रूपा और मेरे ब्याह के संबंध में की थीं। अपने जीवन में इसके पहले मैं कभी भी इस क़दर बेबस और लाचार नहीं हुआ था। हमेशा से ही मैं अपनी मर्ज़ी का मालिक रहा था। जिस दादा ठाकुर को दूर दूर तक के लोग डरते थे अथवा सम्मान के चलते उनकी तरफ आंख उठा कर देखते तक नहीं थे उन्हीं दादा ठाकुर का मेरे अंदर रत्ती भर भी ख़ौफ नहीं हुआ करता था। मैं हमेशा वही करता था जो मेरा मन करता था और जिस चीज़ को करने से मुझे अपार खुशी मिलती थी। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि कभी ऐसा भी वक्त आएगा जब मैं इस तरह की परिस्थितियों में बुरी तरह घिर जाऊंगा।
हवेली में आ कर मैं नहाया धोया और दूसरे कपड़े पहन कर अपने कमरे में पलंग पर लेट गया। हवेली में आने के बाद मुझे मां, चाची, कुसुम और भाभी लोग मिली तो थीं लेकिन मैंने किसी से कोई बात नहीं की थी। असल में मेरा मूड थोड़ा बिगड़ा हुआ सा था जिसके बारे में मैं खुद नहीं समझ पा रहा था कि ऐसा क्यों है? पलंग पर लेटा मैं जाने कैसे कैसे ख़यालों में खोता जा रहा था कि तभी खुले दरवाज़े से कुसुम कमरे में दाखिल होती नज़र आई तो मैं उसे देख कर थोड़ा सम्हल गया। मैं अपनी लाडली बहन को अपना उखड़ा हुआ अथवा परेशान सा चेहरा नहीं दिखाना चाहता था क्योंकि इससे वो भी परेशान हो जाती।
"अपने सबसे अच्छे वाले भैया के लिए गरमा गरम चाय ले के आई हूं।" कुसुम मेरे क़रीब आते ही मेरी तरफ चाय का प्याला बढ़ाते हुए बोली____"चलिए उठिए और मेरे हाथ की बनी चाय पीजिए। चाय पीते ही आपका मन एकदम प्रसन्न हो जाएगा।"
"मेरा मन तो तुझे देख के ही प्रसन्न हो गया है मेरी गुड़िया।" मैंने उठ कर उसके हाथ से चाय ले कर तथा मुस्कुराते हुए कहा____"इतने दिनों से तू यहां नहीं थी तो मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था।"
"मुझे भी वहां अपने सबसे अच्छे वाले भैया की बहुत याद आती थी।" कुसुम पलंग में मेरे पास ही बैठते हुए मासूमियत से बोली____"मन करता था कि चिड़िया की तरह उड़ कर आपके पास पहुंच जाऊं।"
"अच्छा ये बता चाची कैसी हैं?" मैंने चाय का एक घूंट लेते हुए पूछा____"मामा जी के यहां पहुंचने पर वो अपनी मां से लिपट के खूब रोई होंगी न?"
"हां भैया।" कुसुम ने सिर हिलाया____"वहां तो मां नानी जी से लिपट के खूब रोती थीं। मुझे भी बहुत रोना आता था।"
"हां समझ सकता हूं।" मैंने गंभीरता से सिर हिलाया____"चाची और भाभी के ऊपर जिस तरह से दुखों का ये पहाड़ टूटा है उससे उनका दुखी होना स्वाभाविक ही है। हम सब भी बेहद दुखी हैं। बस किसी तरह खुद को बहलाते रहते हैं।"
"हां ये तो है भैया।" कुसुम ने कहा____"लेकिन मुझे सबसे ज्यादा भाभी के लिए दुख होता है। वो तो बेचारी कम उमर में ही अपने पति से हाथ धो बैठी हैं। काश! भगवान जी कोई चमत्कार कर दें जिससे बड़े भैया वापस आ जाएं।"
"तुझे एक काम करना होगा कुसुम।" मैंने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए कहा____"अब से तू अपने कमरे में नहीं बल्कि भाभी के कमरे में उनके साथ ही रात को सोया करेगी। मैं नहीं चाहता कि वो अकेले में भैया को याद कर के खुद को दुखी करती रहें।"
"आप चिंता मत कीजिए।" कुसुम ने कहा____"मैं अब से भाभी के साथ ही सोया करूंगी और उन्हें दुखी नहीं होने दूंगी।"
"मेरी प्यारी गुड़िया।" मैंने एक हाथ से उसके चेहरे को प्यार से सहलाया।
"अच्छा ये बताइए कि मेरी होने वाली भाभी के हाल चाल कैसे हैं?" कुसुम ने हल्के से मुस्कुरा कर मुझसे पूछा____"मुझे भी किसी दिन उनसे मिलवाइए।"
"ये तू क्या कह रही है?" मैं उसकी बात से चौंक पड़ा____"कौन भाभी? कैसी भाभी?"
"अब बातें मत बनाएं आप।" कुसुम ने घूरते हुए कहा____"हम सबको पता चल गया है हमारी होने वाली भाभी के बारे में। असल में ताऊ जी बड़ी मां को बता रहे थे तो हम सबने सुन लिया था।"
कुसुम की बात सुन कर मुझे समझ ही न आया कि इस संबंध में उससे क्या कहूं। बड़ा अजीब सा महसूस हो रहा था मुझे। इस बात का मुझे बखूबी एहसास था कि रूपा के प्रेम को ठुकरा देना उसके साथ अन्याय करना होगा। अगर बात सिर्फ प्रेम की ही बस होती तो शायद मैं उससे ब्याह करने से इंकार भी कर देता लेकिन यहां बात ये भी थी कि उसने अपने प्रेम के चलते मेरी जान बचा कर मुझे एक नया जीवन भी दिया था। ज़ाहिर है उसके दिए हुए इस जीवन में उसका हक़ तो बनता ही था। बस यही सोच कर मैंने भी ज़्यादा कुछ कहा नहीं था किंतु मेरी चिंता का कारण अब ये था कि अगर ऐसा हुआ तो अनुराधा का क्या होगा?
अनुराधा ऐसी लड़की हर्गिज़ नहीं थी जिसे एक पल में भुला दिया जाए बल्कि वो तो मेरी चाहत बन चुकी थी। मैं ये भी जानता था कि वो भी मुझसे बेहद प्रेम करने लगी है। अपने जीवन में प्रेम जैसी भावनाओं को मैंने कभी महत्व नहीं दिया था, और शायद यही वजह थी कि मुझे कभी किसी के दुख दर्द का एहसास नहीं होता था किंतु अब ऐसा नहीं था। जब मुझे खुद किसी से प्रेम हुआ तो मुझे एहसास हुआ कि प्रेम की तड़प और उसकी कसक क्या होती है। मुझे शिद्दत से एहसास हुआ कि मेरे प्रेम में अब तक रूपा किस क़दर तड़पती रही है।
"क्या हुआ भैया?" मुझे सोचो में गुम देख कुसुम ने जैसे मुझे पुकारते हुए कहा____"क्या सोचने लगे आप? आपको देख कर ऐसा क्यों लग रहा है मुझे जैसे आपको इस रिश्ते से कोई खुशी नहीं हो रही है?"
"ऐसी कोई बात नहीं है मेरी बहना।" मैंने बात को बदलने की गरज से कहा____"ख़ैर तू बता चाची क्या कर रही हैं?"
"वो तो बड़ी मां के पास बैठी थीं।" कुसुम ने बताया____"आपको उनसे कोई काम है क्या?"
"हां वो मुझे उनसे मिलना है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"इतना कुछ हो जाने के बाद मुझे उनके पास बैठ कर उनका हाल चाल पूछने का समय ही नहीं मिला। सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि अपनी प्यारी चाची का सामना कैसे करूं?"
"जब से पिता जी गुज़रे हैं।" कुसुम ने सहसा गंभीर हो कर कहा___"तब से उनके चेहरे की चमक और खुशी गायब ही हो गई है भैया। उन्हें जैसे सदमा सा लग गया है।"
"हां मैं समझ सकता हूं।" मैंने कहा____"अच्छा अब तू जा और चाची से कहना कि मैं उनके कमरे में उनसे मिलने आ रहा हूं।"
कुसुम के जाने के बाद मैं सोचने लगा कि चाची के पास जा कर उनसे क्या बात करूंगा? चाचा चाची दोनों ही मुझे बहुत चाहते थे। जगताप चाचा का मैं सबसे चहेता भतीजा था। वो मुझे शेर बेटा कहते थे। ख़ैर कुछ देर बाद मैं पलंग से उतरा और बाहर की तरफ बढ़ चला।
✮✮✮✮
कुसुम के बताने पर मेनका चाची अपने कमरे में मेरा इंतजार कर रहीं थी। मैं धड़कते दिल से उनके कमरे में दाख़िल हुआ। मैंने देखा वो अपने पलंग पर किनारे की तरफ बैठी हुई थीं। सफेद साड़ी में बड़ी अजीब सी दिख रहीं थी वो। मैं पलंग के पास ही रखी एक कुर्सी में जा कर बैठ गया।
"कुसुम ने बताया कि तुम मुझसे मिलना चाहते हो?" चाची ने मेरी तरफ देखते हुए भावहीन लहजे में कहा____"मुझसे कोई काम था क्या तुम्हें?"
"नहीं चाची, काम तो कुछ नहीं था।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"बस आपके पास कुछ देर बैठने का मन था इसी लिए कुसुम से बोला था कि वो आपको मेरा संदेशा दे दे।"
"अच्छी बात है।" चाची ने कहा____"और सुनाओ कैसा चल रहा है काम धाम? दीदी ने बताया कि आज कल तुम बहुत अच्छे से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हो। खेती बाड़ी के सारे काम कर रहे हो?"
"एक दिन तो अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होना ही था मुझे।" मैंने कहा____"लेकिन ऐसी परिस्थिति में होगा इसकी कल्पना नहीं की थी मैंने। काश! ये सब न हुआ होता तो कितना अच्छा होता। मुझे इतना प्यार करने वाले मेरे चाचा मेरे पास होते। मुझे उनसे बहुत कुछ सीखना था अभी।"
"क्या कह सकते हैं वैभव।" चाची ने गहरी सांस ली____"ऊपर वाले ने ऐसा झटका दिया है कि सब कुछ तहस नहस हो गया है। मैंने तो किसी तरह खुद को समझा लिया है लेकिन रागिनी बहू के बारे में जब भी सोचती हूं तो मुझे बहुत तकलीफ़ होती है। उस मासूम के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।"
"ऐसा तो किसी के भी साथ नहीं होना चाहिए था चाची।" मैंने गंभीरता से कहा____"लेकिन सब कुछ कहा हमारे चाहने से होता है?"
"ख़ैर, आज तो जेठ जी से कुछ और ही सुना है मैंने।" चाची ने मेरी तरफ देखा____"साहूकारों की बेटी से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है उन्होंने। हैरत की बात है कि जिन लोगों ने उनके भाई और बेटे की हत्या की उन्हीं की बेटी से तुम्हारा ब्याह कर के रिश्ता बनाना चाहते हैं वो। क्या वो इतना जल्दी सब कुछ भूल गए हैं?"
"ऐसी बातें जीवन में कभी नहीं भूलतीं चाची।" मैंने कहा____"मगर इंसान जब ये सोचता है कि हमें अब आगे बढ़ना चाहिए तो वो हर बात से समझौता कर लेता है। साहूकारों ने जो कुछ हमारे साथ किया है उसके चलते उनसे इस तरह का रिश्ता बना लेना आसानी से हजम तो नहीं होता लेकिन इसे हजम करने की दो वजह हैं। एक यही कि उन्होंने जो किया था उसका बदला हमने भी उनसे ले लिया है। बल्कि अगर ये कहें तो ग़लत न होगा कि हमने उन्हें पूरी तरह से नेस्तनाबूत ही कर दिया है इस लिए हमारा हिसाब बराबर हो गया है। दूसरी महत्वपूर्ण वजह ये है कि उनके घर की लड़की ने मेरी जान बचाई थी और साथ ही मुझसे प्रेम भी करती है। यही वजह है कि पिता जी ने खुद ही ये रिश्ता बनाने की पहल की।"
"क्या तुम्हें ये रिश्ता मंज़ूर है?" चाची ने मेरी तरफ गौर से देखा____"मेरा मतलब है कि क्या तुम भी चाहते हो कि उस लड़की से तुम्हारा ब्याह हो?"
"अगर उसने मेरी जान नहीं बचाई होती।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"तो कदाचित मैं इस रिश्ते को मंजूरी नहीं देता। वैसे भी, मैं अब पिता जी की मर्ज़ी के खिलाफ़ नहीं जाना चाहता। अपने जीवन में अब तक मैंने बहुत सी ग़लतियां की हैं जिसके चलते इस खानदान का नाम ख़राब हुआ है और इतना ही नहीं कदाचित मेरी ही ग़लतियों की वजह से इतना कुछ हो भी गया है।"
"जो होना था हो गया बेटा।" चाची ने कहा____"अब तो मैं बस यही चाहती हूं कि तुम अपने पिता जी का कहना मानो और ऐसे कर्म करो जिससे कि हर तरफ तुम्हारी वाह वाही हो। अपने छोटे भाइयों को भी अपने साथ रखो। उन्हें भी सिखाओ कि ज़िम्मेदारी कैसे निभानी है और कैसे एक अच्छा इंसान बनना है। जब से उनके सिर से पिता का साया हटा है तब से वो दोनों गुमसुम से रहते हैं।"
"समय बदल रहा है चाची।" मैंने कहा____"आने वाले समय में परिस्थितियां हमारी सोच से कहीं ज़्यादा बदल जाएंगी। अपने छोटे भाइयों के लिए मैंने कुछ अलग सोचा है। अगर आपकी इजाज़त हो तो कहूं?"
"तुम्हें कुछ कहने के लिए इजाज़त मांगने की ज़रूरत नहीं है बेटा।" चाची ने आत्मीयता से कहा____"तुम मेरे बेटे ही हो। मैंने कभी भी तुम्हें विभोर और अजीत से कम प्यार नहीं किया है।"
"मैं अपने दोनों छोटे भाइयों को विदेश भेजना चाहता हूं।" मैंने कहा____"वो दोनों विदेश में रह कर बेहतर तरीके से शिक्षा ग्रहण करेंगे। आने वाले समय में उच्च शिक्षा वाले लोगों की ही पहचान होगी और उन्हें सम्मान मिलेगा। इस लिए मैंने सोच लिया है कि वो दोनों विदेश जाएंगे और वहां बेहतर शिक्षा प्राप्त करेंगे। क्या आप मेरे इस निर्णय से सहमत हैं चाची?"
"वो तुम्हारे भाई हैं वैभव।" चाची ने कहा____"और मुझे पूरा यकीन है कि तुम उनके बारे में जो भी निर्णय लोगे वो उनके लिए बेहतर ही होगा लेकिन...।"
"लेकिन क्या चाची?" मेरे माथे पर शिकन उभरी।
"यही कि क्या तुमने इस बारे में जेठ जी से भी बात की है?" चाची ने पूछा____"क्या उन्हें इस बारे में पता है?"
"अभी मैंने उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की है चाची।" मैंने कहा____"अभी तो मैंने सिर्फ आपसे ही इस बारे में चर्चा की है। अगर आप मेरे इस निर्णय से सहमत हैं तो पिता जी से मैं इस बारे में बात कर लूंगा। मुझे यकीन है कि उन्हें भी इससे कोई एतराज़ नहीं होगा।"
"ठीक है।" चाची ने कहा____"जैसा तुम्हें ठीक लगे करो। मेरी तरफ से इजाज़त है तुम्हें।"
"मेरी सबसे अच्छी चाची।" मैंने हल्के से मुस्कुरा कर चाची से कहा____"अच्छा अब चलता हूं और हां मैं ये भी चाहता हूं कि मेरी प्यारी चाची कभी भी खुद को दुखी न रखें। जब तक उनका ये बेटा सलामत है उन्हें किसी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"
चाची मेरी ये बात सुन कर हल्के से मुस्कुराईं और मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा। उसके बाद मैं उनके कमरे से बाहर निकल आया। चाची से बात कर के अब मुझे थोड़ा बेहतर महसूस हो रहा था।
✮✮✮✮
"हम्म्म्म बहुत अच्छा सोचा है तुमने।" बैठक में मेरी बातें सुनते ही पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें अच्छा लगा कि तुमने उनके बारे में इतना कुछ सोचा है। यकीनन आने वाले समय में उच्च शिक्षा का बेहद महत्व होगा तथा उसी के द्वारा जीवन की दिशा और दशा आगे बढ़ेगी।"
"उन दोनों को यहां से बहुत दूर विदेश में भेजने के पीछे दो महत्वपूर्ण वजह हैं पिता जी।" मैंने कहा____"पहली तो यही कि उच्च शिक्षा के चलते उनका बेहतर भविष्य बनेगा और दूसरा ये कि वो दोनों विदेश में रहेंगे तो सुरक्षित भी रहेंगे। मैं नहीं चाहता कि उनके ऊपर किसी तरह की मुसीबत आए अथवा उनके साथ कुछ उल्टा सीधा हो जाए।"
"हम तुम्हारी इन बातों से प्रभावित हुए।" पिता जी ने कहा____"हम भी नहीं चाहते कि हमारे मरहूम भाई के बच्चों के साथ कुछ बुरा हो जाए। तुमने उनके सुनहरे भविष्य के बारे में सोच कर उन्हें विदेश भेजने का बेहद ही नायाब फ़ैसला किया है। हमारी तरफ से भी इस बात की इजाज़त है।"
"तो फिर उन दोनों को विदेश भेजने का इंतजाम हमें जल्द से जल्द करना होगा।" मैंने दृढ़ता से कहा____"और साथ ही विदेश में उनके रहने की विधिवत व्यवस्था भी करनी होगी।"
"फ़िक्र मत करो।" पिता जी ने कहा____"हमारी पहचान के ऐसे कई लोग हैं जो विदेश में रहते हैं। हम इस सिलसिले में उनसे चर्चा करेंगे।"
"नाना जी के यहां से वो लोग कब पहुंच रहे हैं यहां?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"उनके रहने के लिए हवेली में व्यवस्था भी करनी होगी।"
"वो कल दोपहर तक यहां आ जाएंगे।" पिता जी ने कहा____"तुम एक दो लोगों को ले जा कर हवेली के पूर्वी हिस्से वाले दो कमरों की साफ सफाई करवा देना। हमें भी एक ज़रूरी काम से कहीं जाना है।"
पिता जी के कहने पर मैंने सिर हिलाया और बैठक से बाहर आ गया। हवेली में काम करने वाले दो मुलाज़िमों को ले कर मैं हवेली के पूर्वी हिस्से की तरफ बढ़ चला। बंद पड़े कमरों को खोल कर दोनों मुलाज़िमों को उनकी बढ़िया से सफ़ाई करने के लिए बोल दिया। उसके बाद मैं नीचे आ गया। नीचे आ कर मैं मां से मिला। उन्हें बताया कि जब दोनों मुलाज़िम कमरों की सफ़ाई कर के आएं तो उन दोनों कमरों में पोंछा लगाने के लिए वो किसी नौकरानी को भेज दें।
"वो कल दोपहर तक यहां आ जाएंगे।" पिता जी ने कहा____"तुम एक दो लोगों को ले जा कर हवेली के पूर्वी हिस्से वाले दो कमरों की साफ सफाई करवा देना। हमें भी एक ज़रूरी काम से कहीं जाना है।"
पिता जी के कहने पर मैंने सिर हिलाया और बैठक से बाहर आ गया। हवेली में काम करने वाले दो मुलाज़िमों को ले कर मैं हवेली के पूर्वी हिस्से की तरफ बढ़ चला। बंद पड़े कमरों को खोल कर दोनों मुलाज़िमों को उनकी बढ़िया से सफ़ाई करने के लिए बोल दिया। उसके बाद मैं नीचे आ गया। नीचे आ कर मैं मां से मिला। उन्हें बताया कि जब दोनों मुलाज़िम कमरों की सफ़ाई कर के आएं तो उन दोनों कमरों में पोंछा लगाने के लिए वो किसी नौकरानी को भेज दें।
अब आगे....
अगले दिन सुबह नाश्ता पानी कर के मैं खेतों की तरफ चल पड़ा। गांव में क्योंकि चंद्रकांत के बेटे की किसी ने हत्या कर दी थी इस लिए हर तरफ उसी की चर्चा थी। मेरे ज़हन में भी ये सवाल चकरा रहा था कि आख़िर रघुवीर को किसने पेल दिया होगा? काफी दिमाग़ लगाने के बाद भी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा किसने किया होगा? ज़हन में ये ख़याल भी आता था कि कहीं सच में रूपचंद्र ने तो उसकी हत्या नहीं की होगी? संभव है कि रजनी की बातों से वो सच में गुस्से से इस क़दर पगला गया हो कि रजनी को सबक सिखाने के लिए उसने उसके पति की हत्या कर दी हो? किंतु अगले ही पल मुझे अपना ये ख़याल जमता हुआ प्रतीत नहीं होता था क्योंकि रूपचंद्र से मुझे ऐसे किसी कर्म की ज़रा भी आशा नहीं थी। वो बुरा इंसान ज़रूर था लेकिन रघुवीर की हत्या करेगा ऐसा बिल्कुल नहीं लगता था।
वो मेरी हत्या करने का ख़्वाइशमंद ज़रूर था किंतु अब तो वो भी संभव नहीं था क्योंकि उसकी बहन रूपा के साथ मेरे ब्याह की बात पक्की हो चुकी थी और अब वो ऐसा कुछ करने का सोच भी नहीं सकता था। वो मुझसे सिर्फ इस बात से नफ़रत करता था क्योंकि उसकी नज़र में मैंने उसकी बहन को बर्बाद किया था और अब जबकि उसकी बहन से मेरा ब्याह होना ही पक्का हो गया था तो उसकी नाराज़गी अथवा नफ़रत स्वतः ही दूर हो जानी थी।
साहूकारों के घर के सामने से निकला तो अनायास ही मेरी नज़र उनके दरवाज़े की तरफ चली गई किंतु बाहर किसी को ना देख मैं आगे बढ़ गया। ये अलग बात है कि जाने क्या सोच कर मेरी धड़कनें थोड़ा तेज़ हो गईं थी। थोड़ा आगे आया तो मुंशी चंद्रकांत का घर आ गया। उसके घर के बाहर और तो कोई न दिखा किंतु चंद्रकांत की बेटी कोमल दिख गई। वो घर के बाहर ही दरवाज़े के बगल से बनी चबूतरेनुमा पट्टी पर गुमसुम सी बैठी थी। मोटर साईकिल की आवाज़ सुनते ही जैसे वो ख़यालों से बाहर आई और फिर उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। आज काफी समय बाद उसे देख रहा था मैं। कितना बदल गई थी वो। ऐसा लग रहा था जैसे पहले से ज़्यादा जवान और सुंदर दिखने लगी थी वो।
मुझ पर नज़र पड़ते ही वो एकदम से सम्हल कर बैठ गई और साथ ही घबरा कर जल्दी से इधर उधर देखने लगी। एक वक्त था जब मेरे मन में उसे भोगने की इच्छा थी किंतु अब उसके बारे में ऐसा कुछ महसूस ही नहीं हुआ मुझे। मुझे खुद इस बात पर हैरानी हुई किंतु फिर जल्दी ही मुझे एहसास हुआ कि इसकी वजह शायद अनुराधा से मेरा प्रेम करना हो सकता है या फिर भाभी को दिया हुआ वचन हो सकता है, या फिर इसकी वजह वो हो सकती है जो पिछले कुछ समय से हमारे साथ हुआ था।
मैं उससे नज़र हटा कर सीधा निकल गया। जल्दी ही मैं अपने खेतों पर पहुंच गया। खेतों पर बने मकान के सामने जैसे ही मैं पहुंचा तो मकान के बाहर बरामदे में सरोज काकी को देख मैं चौंक गया। मेरे मन में सवाल उभरा कि काकी अपने गांव से हमारे गांव इतनी दूर मेरे खेत वाले मकान में किस लिए आ कर बैठी है? जाने क्यों मेरे मन में किसी अनहोनी की आशंका हुई और मैं एकदम से फिक्रमंद हो उठा। तभी मोटर साइकिल की आवाज़ सुन कर भुवन भी वहीं पर आ गया। भुवन ने मुझे सलाम किया, इधर मैं मोटर साईकिल खड़ी कर के बरामदे में आया। सरोज काकी ने मुझे पहले ही देख लिया था इस लिए वो उठ कर खड़ी हो गई थी।
"क्या बात है काकी?" मैंने फिक्रमंदी से उसके क़रीब पहुंचते हुए पूछा____"आप इतनी दूर यहां क्या कर रही हैं? सब ठीक तो है ना?"
मेरी बात सुन कर काकी ने कुछ बोलने से पहले भुवन की तरफ देखा। भुवन ने उसे देख कर हल्के से सिर हिलाया और फिर वापस चला गया। मुझे थोड़ा अजीब लगा किंतु मैंने इस बारे में कुछ नहीं कहा बल्कि अपने सवाल के जवाब की आशा में काकी के पास ही बैठ गया।
"बात क्या है काकी?" मैंने व्याकुलतावश फिर से पूछा____"तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही हो? सब ठीक तो है ना?"
"क्या बताऊं वैभव?" काकी ने गंभीरता से गहरी सांस ली____"कुछ समझ में ही नहीं आ रहा कि तुम्हें क्या बताऊं और कैसे बताऊं?"
"आख़िर बात क्या है?" मैं उसके इस तरह बोलने पर और भी फिक्रमंद हो उठा____"आज तुम्हारे चेहरे पर चिंता के भाव क्यों दिखाई दे रहे हैं? अगर कोई समस्या हो गई है तो तुम मुझे बेझिझक बताओ। तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए बिना सोचे समझे कुछ भी कर जाऊंगा।"
"यही तो ग़लत किया है तुमने।" काकी ने अजीब भाव से मुझे देखा____"तुम्हें बिना सोचे समझे कुछ भी नहीं करना चाहिए था। ख़ास कर हम जैसे ग़रीब लोगों के साथ।"
"यूं पहेलियों में बातें न करो काकी।" मैंने बेचैन भाव से कहा____"साफ साफ बताओ कि आख़िर हुआ क्या है? मैंने ऐसा क्या कर दिया है बिना सोचे समझे?"
"मेरी भोली भाली बेटी के हृदय में तुमने अपने प्रति कोमल भावनाएं जगा देने का काम किया है वैभव।" काकी ने सहसा हताश हो कर कहा____"उसके दिल में अपने प्रति तुमने प्रेम के ऐसे भाव उत्पन्न कर दिए हैं जिसके चलते मेरी बेटी का जीवन उजाड़ सा हो गया है। क्यों वैभव? आख़िर क्यों तुमने मेरी नासमझ और नादान बेटी के साथ इस तरह का खेल खेल लिया? क्या तुम्हें ज़रा भी इस बात का ख़याल नहीं आया कि इस सबके बाद मेरी बेटी का क्या होगा?"
सरोज काकी की बातें सुन कर मुझे एकदम से झटका लगा। मैं अंदर ही अंदर ये सोच कर भी हैरान हुआ कि काकी को इस बारे में कैसे पता चल गया? हालाकि उसको एक दिन तो इस बात का पता चलना ही था किंतु इतना जल्दी पता चल जाएगा ये उम्मीद नहीं थी मुझे। मैंने एक गहरी सांस ली।
"तुम ग़लत समझ रही हो काकी।" फिर मैंने गंभीरता से कहा____"मैंने तुम्हारी बेटी के साथ कोई खेल नहीं खेला। सच तो ये है कि जो कुछ हुआ है वो सब उस विधाता का ही मायाजाल था। उसने मुझ जैसे चरित्र हीन लड़के को बदलने के लिए तुम्हारी बेटी को चुना। हां काकी, तुम्हारी उस बेटी को जिसकी सादगी और मासूमियत में जाने ऐसी क्या बता थी कि मैं चाह कर भी उसे अपनी हवस का शिकार नहीं बना सका। शुरुआत में तो मैं खुद पर इसके लिए चकित होता था किंतु फिर जैसे आदत पड़ गई। उसके बाद तो फिर ऐसा हुआ कि तुम्हारी बेटी के प्रति मेरे दिल में खुद ही कोमल भावनाएं जागने लगीं। उससे बातें करना अच्छा लगने लगा। उसकी हर अदा दिलो दिमाग़ में घर करती चली गई। आज आलम ये है कि मेरे दिल में अनुराधा के लिए सिर्फ और सिर्फ प्रेम है। मेरा दिल हर पल उसकी खुशी की दुआएं मांगता है।"
"क्या तुम मुझे अपनी इन चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाना चाहते हो?" सरोज ने पूर्व की भांति ही आहत भाव से कहा____"मगर मैं बहलने वाली नहीं हूं। मैं तुमसे विनती करती हूं कि मेरी नादान और नासमझ बेटी को बर्बाद करने का मत सोचो और ना ही उसे ऐसे भ्रम में डालो जिसमें फंस कर वो एक दिन टूट कर बिखर जाए।"
"तुम अब भी मुझे ग़लत ही समझ रही हो काकी।" मैंने बेबस भाव से कहा____"शायद इस लिए क्योंकि तुम्हारी नज़र में मेरी छवि अच्छी नहीं है। मैं मानता हूं कि मेरे जैसे गंदे चरित्र वाले लड़के के साथ कोई भी मां अपनी बेटी का संबंध जुड़ा हुआ नहीं बर्दास्त करेगी लेकिन मेरा यकीन करो काकी। मैं अब पहले जैसा नहीं रहा। तुम्हारी बेटी ने किसी जादू की तरह मेरे बुरे चरित्र को मिटा कर मेरे अंदर एक अच्छा इंसान पैदा कर दिया है।"
मेरी बात सुन कर काकी मेरी तरफ अजीब भाव से देखने लगी। जैसे उसे मेरी बातों पर यकीन ही न हो रहा हो। मैं समझ सकता था कि उसको ही क्या बल्कि किसी को भी इतना जल्दी मेरे बदले हुए चरित्र की बात हजम नहीं हो सकती थी।
"तुम खुद सोचो काकी कि अगर मैं पहले जैसा ही होता तो क्या तुम्हारी बेटी मेरा शिकार होने से अब तक बची रहती?" मैंने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"क्या तुम्हें लगता है कि तुम में से कोई भी मुझे अपनी मनमानी करने से रोक लेता? हर्गिज़ नहीं, अगर मैं सच में तुम्हारी बेटी की इज्ज़त ख़राब कर के उसे बर्बाद करना चाहता तो वो पहले ही कर डालता और तुम में से कोई भी अनुराधा को मुझसे नहीं बचा सकता था मगर मैंने ऐसा नहीं किया। जानती हो क्यों? क्योंकि उस मासूम को देख कर मेरे अंदर ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं हुई। मुझे नहीं पता कि उस समय ऐसा क्यों होता था लेकिन सच यही है। मुझे ग़लत मत समझो काकी और ना ही अपनी बेटी को ग़लत समझना। वो बहुत मासूम है। उसका दामन बेदाग़ है। मैं खुद मिट जाना पसंद करूंगा लेकिन उस मासूम पर किसी तरह का दाग़ लगाने का सोच भी नहीं सकता।"
सरोज काकी के चेहरे पर बड़ी तेज़ी से भावों का आना जाना लग गया था। वो हैरत से मुझे देखे जा रही थी। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर थोड़ा असमान्य हो गई थीं कि जाने काकी अब क्या कहेगी?
"माना कि तुम मेरी बेटी को ख़राब नहीं करना चाहते।" फिर उसने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन उसके दिल में अपने प्रति प्रेम का अंकुर पैदा कर के उसे बर्बाद ही तो कर रहे हो तुम। वो तो नासमझ है इस लिए उसे अभी इस बात का एहसास ही नहीं है कि प्रेम के वशीभूत हो कर उसे ऐसे लड़के का ख़्वाब नहीं देखना चाहिए जो उसकी पहुंच से बहुत दूर है और जो उसको कभी हासिल ही नहीं हो सकता। किंतु तुम तो समझदार हो, तुम्हें तो सोचना चाहिए कि उसको ऐसे ख़्वाब नहीं दिखाना चाहिए।"
"फ़िक्र मत करो काकी।" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"तुमसे ज़्यादा मुझे अनुराधा की चिंता है और इस बात की भी कि इस प्रेम के चलते हम दोनों का क्या होगा? तुम जिस चीज़ के बारे में सोच कर इतना हलकान हो रही हो उसका मुझे भी शिद्दत से एहसास है। इस लिए यही कहूंगा कि तुम इस बारे में ज़्यादा मत सोचो। मैं सब कुछ ठीक कर दूंगा। तुम्हें मुझ पर भरोसा है ना?"
सरोज काकी अजीब भाव से देखने लगी मुझे। कदाचित उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहे? मैं समझ सकता था कि इस वक्त उसके अंदर किस तरह की आंधी चल रही थी। यकीनन उसे अपनी बेटी की चिंता थी। उसे पता था कि उसकी बेटी का और मेरा कोई मेल नहीं है लेकिन प्रेम कहां किसी की हैसियत देखता है? वैसे सच कहूं तो अब जा कर मुझे भी इस बात का एहसास हुआ था कि अनुराधा से प्रेम करना अलग बात है किंतु उसे अपनी जीवन संगनी बनाना ज़रा भी आसान नहीं हो सकता। क्योंकि हम दोनों की हैसियत में ज़मीन आसमान का फ़र्क है मगर मैंने भी अब ये सोच लिया था कि जिसने मेरा कायाकल्प कर के मुझे एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित किया है उसे अपने जीवन से यूं जाने नहीं दूंगा। फिर भले ही इसके लिए मुझे किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े।
"आख़िर कैसे भरोसा करूं वैभव?" सहसा सरोज काकी ने अधीरता से कहा____"ये बातें कोई मामूली बातें नहीं हैं जिसके बारे में कोई आंख बंद कर के भरोसा कर लेगा। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मेरी बेटी तुम्हारे प्रेम के चलते अपना जीवन बर्बाद कर लेगी। तुम भी एक दिन उसे बेसहारा छोड़ कर चले जाओगे।"
"नहीं काकी नहीं।" मैंने मजबूती से इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"ऐसा कभी नहीं होगा। ठाकुर वैभव सिंह तुम्हें वचन देता है कि वो ना तो तुम्हारी बेटी का जीवन बर्बाद करेगा और ना ही उसे कोई तकलीफ़ देगा। मेरे दिल में उसके लिए सच्चा प्रेम है। मैंने फ़ैसला कर लिया है कि अनुराधा को मैं अपनी जीवन संगनी बनाऊंगा। उससे ब्याह करूंगा। क्या तुम अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथों में दोगी?"
सरोज काकी मेरी बात सुन कर आश्चर्य से मुझे देखने लगी। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसके मुख से कोई बोल ना फूटा। ऐसा लगा जैसे उसकी आवाज़ हलक में ही कहीं फंस गई हो।
"जवाब दो काकी।" उसे मुंह फाड़े देख मैंने फिर से कहा____"क्या तुम अपनी बेटी का हाथ मेरे हाथ में दोगी?"
"आं...हां...म..मगर ये कैसे संभव है वैभव?" सरोज को जैसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था____"मेरा मतलब है कि क्या तुम्हारे पिता दादा ठाकुर अपने बेटे का ब्याह मुझ जैसी एक मामूली से किसान की बेटी से करेंगे?"
"वो सब तुम मुझ पर छोड़ दो काकी।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"तुम सिर्फ़ ये बताओ कि क्या तुम्हें ये रिश्ता मंज़ूर है और क्या तुम अपनी बेटी का ब्याह मेरे साथ करोगी?"
"भला कौन ऐसी मां होगी जो अपनी बेटी का ब्याह ऊंचे घर में करने के सपने न देखे?" काकी ने अधीरता से कहा____"लेकिन सपने में और हकीक़त में बहुत फ़र्क होता है बेटा। फिर भी अगर तुम इस सपने को हकीक़त बना देने का माद्दा रखते हो और मुझे वचन देते हो तो मुझे मंज़ूर है। अगर सच में ऐसा हो जाए तो ये मेरी बेटी का अहोभाग्य ही होगा।"
"ज़रूर होगा काकी।" मैंने इस बार मुस्कुराते हुए कहा____"हो सकता है कि ऐसा होने में थोड़ा वक्त लगे लेकिन यकीन मानो ऐसा होगा ज़रूर।"
मैंने देखा सरोज काकी के चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक दिखने लगी थी। खुशी से उसका चेहरा चमकने लगा था। हालाकि उसी चेहरे में कभी कभी दुविधा जैसे भाव भी गर्दिश करते नज़र आने लगते थे।
"अच्छा अब ये बताओ कि तुम्हें इस बारे में कैसे पता चला?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा।
"भुवन ने बताया।" काकी ने कहा____"असल में काफी दिनों से मैं देख रही थी कि अनू एकदम ख़ामोश और गुमसुम सी रहती है। मुझे उसकी दशा देख कर चिंता होने लगी थी। समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर उसकी ख़ामोशी की क्या वजह है। मेरे पूछने पर वो गोल मोल जवाब दे कर टाल जाती थी। फिर मैंने ये सोच कर भुवन से पूछा कि शायद उसे कुछ पता हो। आख़िर वो अनू को अपनी बहन मानता है। मेरे पूछने पर भुवन ने बताया कि अनू तुमसे प्रेम करती है और उसकी ऐसी हालत की वजह उसका प्रेम करना ही है। मुझे तो उसकी बात सुन कर यकीन ही नहीं हुआ था। फिर जब मैंने अनू से इस बारे में सख़्ती से पूछा तो उसने इस बात को क़बूल कर लिया। पहले तो मुझे यही लगा था कि तुमने मेरी भोली भाली बेटी को फंसा लिया है।"
"अच्छा हुआ कि उसे फंसाने की हिम्मत ही नहीं की मैंने।" मैंने कहा____"वरना शायद ऐसा होता कि आगे भी जीवन में मैं कभी अच्छा इंसान बनने का न सोच पाता और ना ही मुझे ये एहसास होता कि अपने अब तक के जीवन में मैंने कितने ग़लत कर्म किए थे। तुम्हारी बेटी कोई मामूली लड़की नहीं है काकी, वो तो एक ख़ास किस्म की लड़की है जिसने मेरे जैसे इंसान को बिना कुछ किए ही बदल कर रख दिया है। ऐसी लड़की से मुझे प्रेम न होता तो भला क्या होता?"
"मेरी तुमसे अब एक ही विनती है कि अपना वचन ज़रूर निभाना।" काकी ने मेरी तरफ देखते हुए नम आंखों से कहा____"मेरी बेटी के साथ कोई छल मत करना और ना ही कभी उसे कोई तकलीफ़ देना।"
"ठाकुर वैभव सिंह खुद मिट जाएगा लेकिन सपने में भी वो अनुराधा को कोई तकलीफ़ नहीं देगा।" मैंने कहा____"तुम बेफिक्र रहो काकी। अनुराधा अब मेरी अमानत है। उसका हर सुख दुख अब मेरा है।"
"ठीक है फिर।" काकी ने उठते हुए कहा____"अब मुझे उसकी कोई चिंता नहीं है। अच्छा अब चलती हूं।"
काकी के जाने के बाद भी मैं उसी के बारे में सोचता रहा। आज मैंने अनुराधा के विषय में एक अहम और अटूट फ़ैसला ले लिया था। हालाकि मुझे एहसास था कि इस बारे में मेरा फ़ैसला मेरे पिता जी को बेहद नागवार भी गुज़र सकता है क्योंकि वो पहले ही मेरा ब्याह साहूकार गौरी शंकर की भतीजी रूपा से तय कर चुके हैं। मतलब साफ़ है कि आने वाला समय मेरे लिए कुछ ज़्यादा ही चुनौतियों से भरा हुआ साबित होने वाला है। मैं ये सब सोच ही रहा था कि भुवन मेरे पास आया और सिर झुका कर खड़ा हो गया।
"तुम्हें क्या हुआ?" उसे सिर झुकाए खड़ा हो गया देख मैंने उससे पूछा____"इस तरह सिर झुकाए क्यों खड़े हो गए?"
"माफ़ करना छोटे कुंवर मैंने काकी को आपके और अनुराधा के बीच बने संबंध के बारे में बता दिया।" उसने दबी आवाज़ में कहा____"मैं उसे बताना नहीं चाहता था लेकिन जब मैंने उसे अपनी बेटी के लिए कुछ ज़्यादा ही चिंतित देखा तो मुझे उसको सब कुछ बताना पड़ा।"
"अच्छा किया भुवन जो तुमने काकी को सब कुछ बता दिया।" मैंने कहा____"वैसे भी एक दिन तो उसे पता चलना ही था। मैं भी इस बात को सोच कर थोड़ा परेशान सा हो जाता था कि काकी कहीं इस सबके बारे में ग़लत ना सोच बैठे। आख़िर पता तो उसे भी है कि मैं अब से पहले किस तरह का इंसान था?"
"वैसे बधाई हो छोटे कुंवर।" भुवन ने सिर उठा कर सहसा मुस्कुराते हुए कहा____"काकी ने आपके साथ अपनी बेटी का रिश्ता मंज़ूर कर लिया है। अनुराधा से जब आपका ब्याह हो जाएगा तो मेरे साथ भी आपका एक नया रिश्ता बन जाएगा।"
"मतलब?" मैंने उलझन पूर्ण भाव से उसे देखा।
"मतलब ये कि तब मैं आपका साला बन जाऊंगा।" भुवन ने उसी तरह मुस्कुराते हुए कहा____"आप शायद भूल रहे हैं कि अनुराधा को मैंने अपनी छोटी बहन माना है।"
"ओह! हां हां सही कहा तुमने हा हा हा।" मैं उसकी बात समझते ही ठहाका लगा कर हंस पड़ा। भुवन भी हंसने लगा था। कुछ देर बाद वो चला गया। मैं भी मन ही मन मुस्कुराते हुए अनुराधा के बारे में जाने कैसे कैसे हसीन ख़्वाब बुनने लगा।
✮✮✮✮
दोपहर को जब मैं खाना खाने हवेली पहुंचा तो बैठक में पिता जी के साथ किसी अंजान व्यक्ति को देख कर ठिठक गया। पिता जी की नज़र मुझ पर पड़ी तो उन्होंने मुझे बैठक में आने का इशारा किया।
"ये शायद छोटे कुंवर हैं।" मैं जैसे ही बैठक में दाखिल हुआ तो उस व्यक्ति ने मेरी तरफ इशारा करते हुए पिता जी से नम्र भाव से कहा____"कई साल पहले इन्हें देखा था जब ये अपनी ननिहाल माधवगढ़ आए थे।"
पिता जी ने उसकी बात सुन कर हां में सिर हिलाया। उस व्यक्ति ने मुझे अदब से सलाम किया तो मैं समझ गया कि ये वही व्यक्ति है जिसे पिता जी ने अपने हिसाब किताब के काम के लिए मेरे ननिहाल से बुलाया था। ख़ैर पिता जी के इशारा मिलते ही मैं बैठक से निकल कर हवेली के अंदर की तरफ बढ़ गया।
गुशलखाने में अच्छे से नहा धो कर मैंने अपने कमरे में जा कर दूसरे कपड़े पहने। उसके बाद खाना खाने के लिए नीचे आ गया। आज मुझे आने में देरी हो गई थी इस लिए भोजन करने वाला मैं अकेला ही बचा था। ख़ैर जल्दी ही कुसुम ने मेरे सामने भोजन की थाली ला कर रख दी तो मैं भूखा होने की वजह से टूट पड़ा खाने पर।
पेट भर खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में आ कर पलंग पर लेट गया। आंखें बंद किया तो सरोज काकी का चेहरा उजागर हो गया। उसकी बातें मेरे दिलो दिमाग़ में उभरने लगीं। सरोज अपनी बेटी का ब्याह मुझसे करने के लिए राज़ी हो गई थी इस बात से यकीनन मैं खुश था लेकिन मुझे इस बात का भी एहसास था कि अनुराधा से ब्याह करना मेरे लिए आसान काम नहीं हो सकता था। पिता जी को जब इस बारे में पता चलेगा तो जाने वो क्या कहेंगे मुझे?
रूपा से ब्याह होना तो पक्का ही हो गया था तो अब सवाल ये था कि क्या पिता जी मुझे किसी और से भी ब्याह करने की इजाज़त देंगे? हालाकि एक व्यक्ति का एक से ज़्यादा लड़कियों से ब्याह करना कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन पिता जी को ऐसा संबंध स्वीकार होगा कि नहीं ये सोचने वाली बात थी। अपने पिता जी के स्वभाव के बारे में मैं अच्छी तरह जानता था इस लिए एकाएक ही मुझे इस सबके बारे में सोचते हुए चिंता होने लगी।
मैं सरोज को वचन दे चुका था कि अब से अनुराधा मेरी अमानत है और उसके हर सुख दुख का मुझे ख़याल रखना है। अतः अब ये भी संभव नहीं था कि मैं अपने वचन को तोड़ दूं अथवा अनुराधा से ब्याह करने का इरादा ही बदल दूं। अनुराधा मेरी चाहत थी जिसके साथ ज़िंदगी गुज़ारना अब मेरी हसरत बन चुकी थी। मैंने महसूस किया कि अचानक ही मैं एक अलग ही तरह के चक्रव्यूह में फंस गया हूं। समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी इस समस्या को कैसे दूर करूं और वो सब कैसे हो जाए जो मैं चाहता हूं?
यही सब सोचते हुए जाने कब मेरी आंख लग गई। उसके बाद कुसुम के जगाने पर ही मेरी आंख खुली। वो एक ट्रे में पानी से भरा ग्लास और चाय का प्याला लिए खड़ी थी। मैं जल्दी से उठा और ग्लास उठा कर पानी पिया। कुसुम पलंग के किनारे ही मेरे पास बैठ गई। पानी पीने के बाद मैंने ट्रे से चाय का कप उठा लिया।
"शाम हो गई क्या?" मैंने खिड़की के बाहर हल्का अंधेरा छाया देखा तो कुसुम से पूछ बैठा।
"नहीं भैया।" कुसुम ने बताया____"शाम होने में तो अभी बहुत समय है। ये अंधेरा तो आसमान में छाए काले काले बादलों का है। ऐसा लगता है जैसे आज तेज़ बारिश होगी।"
"अच्छा ये बता भाभी कहां हैं?" मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा।
"वो तो नीचे बड़ी मां लोगों के पास बैठ के चाय पी रही हैं।" कुसुम ने कहा____"उन लोगों के साथ एक काकी भी है जो आज माधवगढ़ से आई हैं।"
"ओह! हां पिता जी ने बताया था मुझे।" मैंने चाय की चुस्की ले कर कहा।
"आपको पता है भैया।" कुसुम ने सहसा खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"काकी की एक बेटी भी है जो मेरी ही उमर की है। मेरी उससे दोस्ती भी हो गई है। बहुत अच्छी है वो।"
"अच्छा।" जाने क्यों मेरे कान खड़े हो गए उसकी बात सुन कर____"बड़ा जल्दी दोस्ती हो गई तेरी उससे।"
"हां भैया।" कुसुम ने उसी खुशी के साथ कहा____"बड़ी मां ने मुझसे कहा था कि मैं उसके साथ बातें करूं और उससे घुल मिल जाऊं जिससे उसको यहां पर अजनबीपन न महसूस हो।"
"हम्म्म्म।" मैंने चाय की चुस्की लेते हुए हुंकार भरी____"तो ऐसी क्या बातें की तुमने उससे जिससे वो तेरी इतनी जल्दी दोस्त बन गई?"
"बस ऐसे ही इधर उधर की बातें।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"वो अपने बारे में बताने लगी, फिर मैंने उसे सबके बारे में बताया। आपके बारे में भी बताया कि इस हवेली में आप मेरे सबसे अच्छे वाले भैया हैं और मुझे बहुत प्यार करते हैं।"
"अच्छा।" मैंने खाली कप को उसके ट्रे में रखते हुए कहा____"अगर उससे तेरी दोस्ती हो गई है तो ये बहुत अच्छी बात है फिर। उसके साथ तेरा भी अच्छे से समय कट जाया करेगा। अच्छा अब तू जा, मैं भी खेतों की तरफ जाऊंगा। विभोर और अजीत को जा कर बोल दे कि वो भी मेरे साथ चलने को तैयार हो जाएं।"
कुसुम ने हां में सिर हिलाया और फिर खुशी खुशी कमरे से चली गई। मैंने भी उठ कर अपने कपड़े पहने और नीचे गुशलखाने में हाथ मुंह धो कर मां लोगों के पास आ गया। मैंने देखा मां और चाची लोगों के पास एक औरत बैठी हुई थी। उसकी उमर यही कोई पैंतीस के आस पास रही होगी। चेहरा साफ था उसका, जिस्म भी काफी गदराया हुआ नज़र आ रहा था। मां ने मुझे देख कर उसे बताया कि मैं उनका छोटा बेटा हूं। मां की बात सुन कर उसने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए मुझे नमस्ते किया तो मैंने भी सिर को हल्का सा खम करके उसे नमस्ते किया। तभी मेरी नज़र रागिनी भाभी पर पड़ी। वो अपलक मुझे ही देखे जा रहीं थी। जैसे ही मेरी नज़र उनसे मिली तो वो हल्के से मुस्कुराईं। मुझे समझ न आया कि वो क्या सोच के मुस्कुराईं थी? हालाकि जवाब में मैंने भी मुस्कुरा दिया था उसके बाद मैं ये सोच कर उठ कर वहां से बाहर की तरफ चल पड़ा कि औरतों के बीच भला मेरा क्या काम?
थोड़ी ही देर में विभोर और अजीत बाहर आ गए तो मैं जीप में उन दोनों को बैठा कर खेतों की तरफ निकल गया। आसमान में काले बादलों ने अच्छा खासा अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। प्रतीत होता था कि आज वो जम के बरसेंगे।
थोड़ी ही देर में विभोर और अजीत बाहर आ गए तो मैं जीप में उन दोनों को बैठा कर खेतों की तरफ निकल गया। आसमान में काले बादलों ने अच्छा खासा अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। प्रतीत होता था कि आज वो जम के बरसेंगे।
अब आगे....
अनुराधा रसोई में दोपहर का खाना बना के अपनी मां सरोज के आने की प्रतीक्षा कर रही थी। उसका छोटा भाई अनूप खाना खाने के बाद बरामदे में ही अपने मिट्टी के खिलौनों के साथ खेल रहा था जबकि अनुराधा बरामदे में रखी चारपाई पर सोचो में गुम बैठी थी।
सरोज अनुराधा को बता कर गई थी कि वो वैभव से मिलने उसके गांव जा रही है। अपनी मां की ये बात सुन कर अनुराधा की धड़कनें एकाएक ही थम गईं थी। उसे ये सोच कर घबराहट सी होने लगी थी कि उसकी मां वैभव से जाने क्या क्या कहेगी? हालाकि अपने दिल के हाथों मजबूर हो कर अनुराधा ने अपनी मां से बस इतना ही कहा था कि वो वैभव को कुछ भी उल्टा सीधा न बोले। जवाब में सरोज ने उसे तीखी नज़रों से देखा था और फिर बिना कुछ कहे ही घर से बाहर निकल गई थी। उसके जाते ही अनुराधा की हालत ख़राब होने लगी थी।
अपनी मां के जाने के बाद वो बेमन से रसोई में जा कर दोपहर का खाना बनाने लगी थी। वो खाना ज़रूर बना रही थी लेकिन उसका पूरा ध्यान अपनी मां पर ही था और इस बात पर भी कि जाने अब क्या होगा? किसी तरह खाना बना तो उसने सबसे पहले अपने छोटे भाई को खिलाया और फिर बरामदे में रखी चारपाई पर बैठ कर वो अपनी मां के आने का इंतजार करने लगी थी।
जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था वैसे वैसे अनुराधा की हालत और भी ख़राब होती जा रही थी। उसने सैकड़ों बार मन ही मन ऊपर वाले को याद कर के उनसे सब कुछ अच्छा होने की प्रार्थना की थी। जब से उसका भेद उसकी मां के सामने खुला था तभी से वो इस बारे में चिंतित थी। हालाकि ये कहना भी ग़लत न होगा कि भुवन की वजह से वो अपनी मां को सब कुछ बता पाई थी और इसी के चलते उसके अंदर का बोझ और उसकी तड़प कुछ हद तक कम हो गई थी। उस वक्त तो उसे थोड़ा चैन भी मिल गया था जब उसने भुवन के द्वारा ये सुना था कि वैभव भी शायद उससे प्रेम करता है क्योंकि उसकी तकलीफ़ से वैभव को भी तकलीफ़ होती है। भुवन के अनुसार ऐसा तभी होता है जब कोई व्यक्ति किसी से प्रेम करता है। अनुराधा को ये जान कर अत्यंत खुशी हुई थी लेकिन अब जबकि सब कुछ जानने के बाद उसकी मां वैभव से मिलने गई थी तो उसके मन में तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे जिसके चलते उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी।
आख़िर बड़ी मुश्किल से वक्त गुज़रा और बाहर के दरवाज़े को खोल कर उसकी मां अंदर दाख़िल होती हुई नज़र आई। सरोज को देखते ही उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं और वो एकदम से ब्याकुल और बेचैन सी नज़र आने लगी। उधर सरोज ने अंदर आने के बाद पलट कर दरवाज़ा अंदर से बंद किया और फिर नर्दे के पास जा कर अपने हाथ पैर धोने लगी।
अनुराधा ने देखा कि उसकी मां ने उसे देखने के बाद भी कुछ नहीं बोला तो उसकी धड़कनें फिर से थमती हुई प्रतीत हुईं। वो अपनी मां से फ़ौरन ही सब कुछ जान लेना चाहती थी लेकिन उससे पूछने की वो चाह कर भी हिम्मत न जुटा सकी। जब उसे कुछ न समझ आया तो वो चारपाई से जल्दी से उठी और रसोई में जा कर अपनी मां के लिए खाने की थाली सजाने लगी। मन में तरह तरह के ख़याल बुनते हुए उसने जल्दी से थाली तैयार की और फिर उसे ले कर बरामदे में आ गई।
उधर सरोज अपने हाथ पैर धोने के बाद बरामदे में आई और एक बोरी को दीवार से सटा कर रखने के बाद उसमें बैठ गई। वो जैसे ही बैठी तो अनुराधा ने खाने की थाली को चुपचाप उसके सामने रख दिया। उसके बाद जल्दी ही उसने एक लोटे में पानी भी ला कर मां के सामने रख दिया।
"अनूप को खाना खिलाया कि नहीं तूने?" रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए सरोज ने अनुराधा से पूछा।
"ह...हां मां।" अनुराधा ने खुद को सम्हालते हुए झट से कहा____"उसे तो बहुत पहले ही खिला दिया था मैंने। बस तुम्हारे ही आने की प्रतीक्षा कर रही थी।"
"हम्म्म्म।" सरोज ने रोटी के निवाले को मुंह में डालने के बाद उसे चबाते हुए कहा____"और तूने खाया?"
"वो मैं तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रही थी।" अनुराधा ने धड़कते दिल से कहा____"मैंने सोचा जब तुम आ जाओगी तो साथ में ही खाऊंगी।"
"अरे! तुझे खा लेना चाहिए था।" सरोज ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखा____"मुझे वापस आने में समय तो लग ही जाना था। ख़ैर जा तू भी खा ले। मुझे अब कुछ नहीं चाहिए।"
अनुराधा पूछना तो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी इस लिए बेमन से वो पलटी और रसोई की तरफ बढ़ गई। कुछ ही देर में वो अपने लिए थाली में खाना ले कर आ गई और अपनी मां के पास ही चुपचाप बैठ गई। उसने एक नज़र सरोज पर डाली तो उसे आराम से खाना खाते हुए पाया। उसे समझ न आया कि उसकी मां इतना आराम से कैसे खाना खा रही थी? उसके अनुसार तो उसे गुस्से में नज़र आना चाहिए था।
अनुराधा का बहुत जी चाह रहा था कि वो अपनी मां से पूछे लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। दूसरे उसे झिझक के साथ साथ शर्म भी महसूस हो रही थी कि उसके पूछने पर उसकी मां उसके बारे में जाने क्या सोचेगी। वो बस मन ही मन दुआ कर रही थी कि मां खुद ही सब कुछ बता दे।
"वैसे मिल आई हूं वैभव से।" अनुराधा के कानों में उसकी मां की आवाज़ पड़ी तो वो एकदम से चौंकी और उसने अपनी मां की तरफ देखा। मन ही मन उसने ऊपर वाले को धन्यवाद दिया कि उसने उसकी दुआ सुन ली। उधर सरोज ने बिना उसकी तरफ देखे ही सपाट भाव से कहा____"मुझे तो पूरा यकीन था कि उसने तुझे भी बाकी लड़कियों की तरह अपने जाल में फांस रखा रहा होगा लेकिन उसकी बातें सुनने के बाद एहसास हुआ कि मैं ग़लत थी।"
अनुराधा की धड़कनें एकदम से मंद मंद चलने लगीं थी। सरोज के चुप होते ही उसने पूछना चाहा कि आख़िर वैभव ने उससे क्या बातें की लेकिन मारे झिझक और शर्म के पूछ न सकी। बस हलक में सांसें अटकाए और आस भरी नज़रों से देखती रही अपनी मां को। किंतु जब काफी देर गुज़र जाने पर भी सरोज ने आगे कुछ न कहा तो जैसे अनुराधा के सब्र का बांध टूट गया और उसकी सारी झिझक तथा शर्म छू मंतर सी हो गई।
"अ...आख़िर ऐसा क्या कहा तुमसे छोटे कुंवर ने मां?" अनुराधा ने दबी आवाज़ में पूछा।
अनुराधा के यूं पूछने पर सरोज ने मुंह में लिए निवाले को चबाना बंद कर उसकी तरफ अजीब भाव से देखा तो अनुराधा एकदम से सिमट गई और उसकी नज़रें झुक गईं। ये देख सरोज मन ही मन मुस्कुरा उठी किंतु अगले ही पल उसके अंदर एक टीस सी उभरी, ये सोच कर कि वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब उसने वैभव के साथ नाजायज़ संबंध बना लिया था। काश! उसे पता होता कि आगे चल कर उसी वैभव से उसकी बेटी प्रेम करने लगेगी और वैभव उससे ब्याह करने का उसको वचन भी देगा।
सरोज को इस बात के चलते बहुत बुरा महसूस हो रहा था मगर वो भी जानती थी कि होनी तो हो चुकी है इस लिए अब उसके बारे में सोच कर दुखी होने से या बुरा महसूस होने से भला क्या होगा? उसने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि अब से वो वैभव के बारे में कभी भूल से भी ग़लत ख़याल अपने ज़हन में नहीं आने देगी। आख़िर वो उसका होने वाला दामाद था और वो उसकी होने वाली सास जोकि मां समान ही होती है।
"बात ये थी कि मैं तेरे जीवन को बर्बाद होते नहीं देख सकती थी।" फिर सरोज ने अनुराधा से नज़र हटाने के बाद कहा____"इस लिए मैंने उससे साफ शब्दों में बातें की और ये निश्चित किया कि उसकी वजह से तेरा जीवन आबाद हो, ना कि बर्बाद।"
सरोज की बातें अनुराधा के कानों में ज़रूर पड़ीं लेकिन उसकी समझ में कुछ न आया। इस लिए उसने सिर उठा कर फिर से अपनी मां की तरफ देखा। इस बार उसे ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा।
"इतना तो उसने भी बताया कि वो भी तुझसे वैसे ही प्रेम करता है जैसे तू उससे करती है।" सरोज ने कहा____"लेकिन अपनी बेटी के सुखी जीवन की खातिर मेरे लिए इतना सुन लेना काफी नहीं था। सिर्फ प्रेम करने से तो तेरा जीवन नहीं संवर सकता था ना इस लिए मुझे उसके मुख से वो सुनना था जिसके चलते तेरा जीवन हमेशा के लिए सुखी भी हो जाए।"
अनुराधा को मानो अभी भी कुछ समझ नहीं आया। वो सोचने लगी कि आज उसकी मां ये कैसी अजीब अजीब बातें कर रही है?
"जब मैंने वैभव से इस संबंध में बातें की तो उसने आख़िर वो कह ही दिया जो मैं सुनना चाहती थी और जिसके चलते मैं चिंता से मुक्त हो सकती थी।" सरोज ने कहा____"उसने साफ शब्दों में मुझसे कहा है कि वो तुझसे ब्याह करेगा और इस बात का उसने मुझे वचन भी दिया है।"
सरोज की ये बात सुन कर अनुराधा के दिलो दिमाग़ में पलक झपकते ही मानो धमाका सा हुआ। आश्चर्य से उसकी आंखें फैल गईं। वो किसी बुत की तरह चकित अवस्था में अपनी मां को देखती रह गई। फिर अचानक ही जैसे उसे होश आया तो उसने महसूस किया कि उसकी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं हैं जिनकी धमक उसे अपने कानों में गूंजती महसूस हो रही हैं।
बिजली की तरह उसके मन में ये बात बैठ गई कि वैभव उसके साथ ब्याह करेगा। उसने मन ही मन चकित भाव से कहा_____'हाय राम! क्या सच में ऐसा हो सकता है? किंतु ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था।'
अनुराधा अपना खाना पीना भूल कर अगले कुछ ही पलों में जाने कौन सी दुनिया में गोता लगाने लगी। उसके दिलो दिमाग़ में उथल पुथल सी मच गई थी जिसे रोकना अथवा सम्हालना जैसे उसके बस में ही नहीं रह गया था। अचानक ही उसकी आंखों के सामने रंग बिरंगे कुछ ऐसे चित्र घूमने लगे जिन्हें देख कर उसका चेहरा खुशी से चमकता नज़र आया मगर फिर एकाएक ही उसके उस चमकते चेहरे पर लाज की सुर्खी भी छाती नज़र आई। उसकी नज़रें झुकती चली गईं। बार बार गुलाबी होठों पर एक गहरी मुस्कान थिरकने लगी जिसे वो जी तोड़ कोशिश कर के छुपाने की कोशिश करने लगी। उसका मन किया कि वो फ़ौरन ही खाना पीना छोड़ कर भागते हुए अपने कमरे में पहुंच जाए और फिर अकेले में वो खुशी के मारे उछलना कूदना शुरू कर दे। अपनी हालत को काबू करने का प्रयास करते हुए एकाएक वो उठने ही लगी थी कि तभी....
"अरे! कहां जा रही है?" सरोज ने उसे देखते हुए मानों टोका_____"पहले ठीक से खाना तो खा ले। उसके बाद अपने कमरे में जा कर खुशियां मना लेना।"
मां की ये बात सुन कर अनुराधा शर्म से मानो पानी पानी हो गई। उसके ज़हन में बिजली की तरह ख़याल उभरा कि उसकी मां को उसकी हालत के बारे में इतना अच्छे से कैसे पता चल गया? उसमें नज़र उठा कर मां की तरफ देखने की हिम्मत न हुई। खुद को समेटे वो किसी तरह वापस बैठ गई और फिर सिर झुकाए ही चुपचाप खाना खाने लगी। उधर सरोज उसकी ये हालत देख कर मन ही मन मुस्कुरा उठी। वो सोचने लगी कि सच में उसकी बेटी अब जवान हो गई है।
खुशी के मारे अनुराधा से कुछ खाया ही नहीं जा रहा था लेकिन खाना खाना उसकी मजबूरी थी इस लिए मजबूरन उसे किसी तरह खाना ही पड़ा। बड़ी मुश्किल से उसका खाना ख़त्म हुआ। सरोज खा चुकी थी और अब वो बरामदे में रखी चारपाई पर आराम करने के लिए लेट गई थी। इधर अनुराधा झट से उठी और अपनी तथा मां की थाली को उठा कर उसे नर्दे के पास रख दिया। उसके बाद वो लगभग दौड़ते हुए अपने कमरे की तरफ भागती चली गई।
कमरे में आ कर उसने सबसे पहले दरवाज़ा अंदर से बंद किया और फिर चारपाई पर पीठ के बल लेट कर अपनी आंखें बंद कर ली। होठों पर उभर आई मुस्कान के साथ उसने पहली बार चैन की लंबी सांस ली। अगले ही पल उसकी बंद पलकों में वैभव का मनमोहक चेहरा उभर आया और वो उसके साथ जाने कैसे कैसे ख़्वाब बुनने लगी। उसे पता ही न चला कि कब उसकी दोनों आंखों की कोरों से खुशी के आंसू निकल कर उसकी कनपटी को छूते हुए चारपाई में बिछी चादर पर फ़ना हो गए।
✮✮✮✮
जैसा कि आसमान में छाए बादलों को देख कर ही प्रतीत हुआ था कि बारिश होगी तो बिल्कुल वैसा ही हुआ। शाम होने में थोड़ा वक्त था जब बारिश शुरू हुई। सारे मजदूर भाग कर मकान में आ गए। मैं, विभोर और अजीत जीप से वापस हवेली जाने का सोच रहे थे किंतु भुवन ने मुझे रोक लिया, ये कह कर कि तेज़ बारिश में जाना ठीक नहीं है। एक तो कच्चा रास्ता दूसरे बारिश के चलते कीचड़ जिसकी वजह से तेज़ बारिश में जीप चलाना उचित नहीं था। भुवन की बात मान कर मैं तखत पर बैठ गया था।
सारे मजदूरों को देखते हुए अचानक मेरे मन में एक विचार आया जिसके बारे में सोचने से मुझे काफी अलग सा महसूस हुआ और साथ ही एक खुशी का आभास भी हुआ। मैंने निश्चय कर लिया कि अपने मन में उठे इस विचार पर ज़रूर अमल करूंगा।
ख़ैर आधा घंटा तेज़ बारिश हुई। एक बार फिर से खेतों में पानी नज़र आने लगा था। बारिश रुकी नहीं थी क्योंकि हल्की हल्की फुहारें अभी भी आसमान से ज़मीन पर गिर रहीं थी। कच्चा रास्ता पहले से और भी ज़्यादा ख़राब नज़र आने लगा था लेकिन जाना तो था ही इस लिए विभोर और अजीत को ले कर मैं जीप में बैठा और फिर उसे स्टार्ट कर हवेली की तरफ निकल गया।
जब मैं हवेली पहुंचा तो सूरज पूरी तरह डूब चुका था और शाम का धुंधलका छा गया था। हाथ पांव धो कर मैं अपने कमरे में आ गया। कपड़े उतार कर मैंने नीचे गमछा लपेट लिया, जबकि ऊपर बनियान थी। बारिश होने की वजह से बिजली गुल हो गई थी मगर लालटेन का पीला प्रकाश कमरे में फैला हुआ था। मेरी लाडली बहन को मेरा बहुत ख़्याल रहता था। बिजली के न रहने पर अक्सर शाम को वो मेरे कमरे की लालटेन जला कर चली जाती थी।
मैं पलंग पर आराम करने के लिए लेटने ही वाला था कि तभी खुले दरवाज़े से किसी के अंदर आने की आहट हुई। मुझे लगा कुसुम होगी इस लिए अपने अंदाज़ में दरवाज़े की तरफ चेहरा कर के मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि आने वाले व्यक्ति पर नज़र पड़ते ही मैं चुप रह गया।
एक अजनबी लड़की को अकेले मेरे कमरे में दाख़िल होता देख मैं एकदम से चौंक पड़ा। मेरी नज़रें उस पर ही जम गईं। उधर वो जैसे ही मेरे क़रीब आई तो लालटेन की रोशनी में मुझे उसकी शक्लो सूरत स्पष्ट नज़र आई और सच तो ये था कि मैं अपलक उसे देखता ही रह गया। इतना तो मैं समझ गया था कि ये वही लड़की है जिसके बारे में कुसुम ने मुझे बताया था किंतु वो इतनी आकर्षक होगी इसकी उम्मीद नहीं थी मुझे। हालाकि मेरी लाडली बहन के आगे वो कुछ भी नहीं थी किंतु अगर उसको अलग दृष्टि से देखा जाए तो वो बहुत कुछ थी।
कुसुम ने सही कहा था वो उसके ही उमर की थी। जिस्म एकदम नाज़ुक सा किंतु एकदम सांचे में ढला हुआ। घाघरा चोली पहने हुए थी वो जिसके चलते उसके पेट का हिस्सा साफ दिख रहा था। पेट में मौजूद उसकी नाभी को देख मेरे अंदर हलचल सी होने लगी थी। चोली में ढंकी उसकी छातियां एकदम तनी हुईं थी। सुराहीदार गले के ऊपर उसका ताज़े खिले गुलाब की मानिंद चेहरा एक अलग ही तरह से मुझे आकर्षित करने लगा था। उस पर उसकी बड़ी बड़ी किंतु गहरी आंखें जो काजल लगा होने की वजह से और भी क़ातिल लग रहीं थी।
"न...नमस्ते छोटे कुंवर।" उसकी खनकती आवाज़ से मैं एकदम से ही आसमान से ज़मीन पर आया और थोड़ा हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखा। फिर मैंने जल्दी ही खुद को सम्हालते हुए उसके नमस्ते का जवाब दिया।
मैंने देखा उसके हाथ में पीतल का ट्रे था जिसमें चाय का एक कप और ग्लास में पानी रखा हुआ था। वो थोड़ा और मेरे क़रीब आई और फिर मुस्कुराते हुए झुक कर मेरी तरफ ट्रे को बढ़ाया तो अनायास ही मेरी गुस्ताख़ नज़रें उसकी चोली के बड़े गले में से अचानक ही उजागर हो गए दो पर्वत शिखरों पर जा पड़ीं। मुझे पूरा यकीन था कि अगर वो थोड़ा और झुक जाती तो उसकी छातियां और भी ज़्यादा मेरी नज़रों के सामने उजागर हो जातीं। उसकी छातियों के बीच की गहरी दरार देख मेरा हलक सूख गया और साथ ही मेरे समूचे जिस्म में सिहरन सी दौड़ गई।
"हाय राम!" तभी मैं उसकी खनकती आवाज़ से चौंक पड़ा और साथ ही हड़बड़ा भी गया। मैंने झटके से उसकी तरफ देखा तो वो एकदम से सीधा खड़ी हो गई। उसके चहरे पर शर्म की हल्की लाली छा गई थी। मैं समझ गया कि उसे पता चल गया है कि मैं उसकी छातियां देख रहा था।
"आप तो बड़े ख़राब और बदमाश हैं छोटे कुंवर।" फिर उसने मुझे एक अलग ही अदा से घूरते हुए कहा____"भला कोई किसी लड़की को ऐसे देखता है क्या?"
"व...वो...वो माफ़ करना मुझे।" मुझसे कुछ कहते ना बना।
हालाकि मैं ये सोच कर एकदम से चौंक भी पड़ा कि मैं किसी लड़की के सामने इस तरह से कैसे हड़बड़ा गया और तो और उससे माफ़ी भी मांग बैठा। उधर मेरी बात सुन कर अचानक ही वो खिलखिला कर हंसने लगी। ऐसा लगा जैसे पूरे कमरे में घंटियां बज उठीं हों। मैं भौचक्का सा तथा मूर्खों की तरह उसे हंसते हुए देखने लगा। मेरे जीवन में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि मैं किसी लड़की के सामने इस तरह से असहज हो गया होऊं।
"अरे! लगता है आप डर गए हमसे।" फिर उसने अपनी हंसी को रोक कर किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"अगर ये सच है तो फिर हम यही कहेंगे कि कुसुम ने आपके बारे में हमें ग़लत बताया था। ख़ैर छोड़िए, लीजिए चाय पीजिए नहीं तो ये ठंडी हो जाएगी। वैसे आप ठंडी चीज़ के शौकीन तो नहीं होंगे न?"
मतलब हद ही हो गई। एक लड़की जो मेरे लिए अजनबी थी और मैं उसके लिए वो इतनी बेबाकी से मुझसे बातें कर रही थी? इतना ही नहीं मेरे जैसे सूरमा को अपनी बातों तथा हरकतों से एकदम अवाक सा कर चुकी थी। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर ये क्या बला है?
"बहुत खूब।" मैं जो अब तक उसके बारे में एक राय बना कर सम्हल चुका था बोला____"बहुत ही दिलचस्प। वैसे, क्या कुसुम ने तुम्हें बताया नहीं कि ठाकुर वैभव सिंह के कमरे में उस औरत जात का आना वर्जित है जो हवेली के बाहर की पैदाइश हो?"
"जी नहीं।" उसने पूरी बेबाकी के साथ कहा____"हमें तो कुसुम ने ऐसा कुछ भी नहीं बताया। वैसे आपके कमरे में किसी औरत जात का आना क्यों वर्जित है भला?"
"मेरा ख़याल है कि तुम्हें अपने इस सवाल का जवाब मुझसे नहीं।" मैंने उसकी कजरारी आंखों में देखते हुए कहा____"बल्कि हवेली में मौजूद किसी और व्यक्ति से मांगना चाहिए। तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि इसके लिए तुम्हें ज़्यादा तकलीफ़ उठाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी। तुम जिससे पूछोगी वही तुम्हें विस्तार से सब कुछ बता देगा। ख़ैर, लाओ चाय दो, मुझे सच में ठंडी चीज़ों का शौक नहीं है।"
मेरी बात सुन कर उसने मेरी तरफ ट्रे को बढ़ाया और इसके लिए उसे फिर से झुकना पड़ा किंतु इस बार मैंने उसकी चोली में से झांकती छातियों की तरफ नहीं देखा। ये देख उसके होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।
"एक बात पूछें आपसे?" उसने सीधा खड़े होते हुए कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए पलकें झपका कर इशारा कर दिया कि वो पूछ ले।
"आपको ठंडी चीज़ों का शौक नहीं है।" उसने पूरी निडरता से मेरी आंखों में देखते हुए कहा____"तो क्या गरम चीज़ों का भी शौक नहीं है?"
"क्या मतलब?" मैं उसकी बात सुन कर एकदम से चौंका।
"सोचिए।" उसने मुस्कुराते हुए बड़ी अदा से कहा____"अच्छा अब हम चलते हैं....छोटे कुंवर जी।"
कहने के साथ ही वो हवा के झोंके की तरह कमरे से बाहर निकल गई। मेरी तरफ से जैसे वो कुछ भी सुनना ज़रूरी नहीं समझी थी। उसकी बातों के साथ साथ उसके यूं चले जाने पर मेरे ज़हन में बस एक ही बात आई कि ज़रूर भेजा खिसका हुआ है इस लड़की का।
अगले दिन नाश्ता करने के बाद मैं खेतों की तरफ जाने के लिए निकला ही था कि बाहर बैठक में एक बार मैंने यूं ही नज़र डाली लेकिन अगले ही पल मुझे अपनी जगह पर जाम सा हो जाना पड़ा। कारण, बैठक में सुनील और चेतन को देख लिया था मैंने। उन दोनों से क़रीब दो क़दम की दूरी पर शेरा खड़ा था। मैं फ़ौरन ही बैठक कक्ष में दाखिल हो गया। बैठक में पिता जी के अलावा वो व्यक्ति भी था जिसे पिता जी ने मेरे ननिहाल से बुलाया था और जिसे पिता जी ने अपना नया मुंशी नियुक्त कर दिया था।
(यहां पर मैं इस नए मुंशी और उसके परिवार के बारे में संक्षिप्त में बता देना ज़रूरी समझता हूं।)
✮ किशोरी लाल सिंह (उम्र - 40 के क़रीब)
☞ निर्मला सिंह (किशोरी लाल की पत्नी/उम्र - 35 के क़रीब)
किशोरी लाल और निर्मला के दो बच्चे हैं, जिनमें से सबसे बड़ी बेटी है और फिर एक बेटा।
☞ कजरी सिंह (किशोरी और निर्मला की बेटी/ उम्र - 18)
☞ मोहित सिंह (किशोरी और निर्मला का बेटा/ उम्र **)
किशोरी लाल मेरे ननिहाल माधवगढ़ का रहने वाला है। उसका एक बड़ा भाई है जिसका नाम समय लाल है। समय लाल मेरे नाना जी का मुंशी है। इसके पहले इनके पिता मुंशी का काम करते थे। कहने का मतलब ये कि इन लोगों के बारे में मेरे नाना जी लोगों को अच्छी तरह पता है और क्योंकि ये उनकी नज़र में भरोसेमंद और योग्य थे इस लिए नाना जी ने उसे मेरे पिता जी के पास भेजा था। मेरा ख़याल है कि नए मुंशी का इतना परिचय काफी है इस कहानी के लिए। अतः अब कथानक की तरफ रुख करते हैं।
सुनील और चेतन पिता जी के सामने सिर झुकाए खड़े थे। मैंने दोनों को ध्यान से देखा और फिर आगे बढ़ते हुए एक कुर्सी पर बैठ गया।
"इन दोनों को हमारे सामने लाने में तुम्हें इतना समय क्यों लग गया?" पिता जी ने शेरा की तरफ देखते हुए उससे पूछा।
"माफ़ कीजिए मालिक।" शेरा ने खेदपूर्ण भाव से कहा____"दरअसल ये दोनों यहां थे ही नहीं। पता करने पर पता चला कि ये दोनों अपने ननिहाल गए हुए हैं। तब मैं अपने साथ कुछ आदमियों को ले कर इनके ननिहाल समयपुर गया। वहां जब इन दोनों ने मुझे देखा तो ये भाग खड़े हुए। बड़ी मुश्किल से हाथ लगे तो इन्हें ले कर यहां आया।"
शेरा की बात सुन कर पिता जी ने सख़्त नज़रों से सुनील और चेतन की तरफ देखा तो वो दोनों एकदम से सिमट गए। चेहरे पर मारे घबराहट के ढेर सारा पसीना उभर आया था।
"ठीक है अब तुम जाओ।" पिता जी ने शेरा से कहा तो वो चला गया। शेरा के जाने के बाद पिता जी ने उन दोनों की तरफ देखते हुए सख़्त भाव से कहा____"हम तुम दोनों से सिर्फ एक ही सवाल करेंगे और उम्मीद करते हैं कि तुम हमारे सवाल का जवाब सच के रूप में ही दोगे।"
"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" चेतन घबरा कर एकदम से पिता जी के पैर पकड़ कर बोल पड़ा____"हमसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है।"
"क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम दोनों ने जो अपराध किया है।" पिता जी ने कहा____"उसके लिए तुम दोनों को माफ़ी मिलनी चाहिए? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे जिस मित्र ने तुम्हें हमेशा अपना सच्चा मित्र मान कर अपने साथ किसी साए की तरह रखा उसके साथ इस तरह का विश्वास घात करने के बाद तुम्हें माफ़ कर देना चाहिए?"
"हम जानते हैं ताऊ जी कि हमारा अपराध माफ़ी के लायक नहीं है।" सुनील भी पिता जी के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ कर लगभग रोते हुए बोला____"लेकिन हम दोनों मजबूर थे। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हमारे परिवार को ख़त्म कर दिया जाता।"
"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने उसी सख़्ती के साथ कहा____"हम जानना चाहते हैं कि आख़िर किसने तुम्हें इस क़दर मजबूर कर दिया था कि तुम उसके कहने पर अपने मित्र के साथ विश्वास घात करने के साथ साथ उसकी जान के भी दुश्मन बन गए?"
"ये तब की बात है जब आपने वैभव को इस गांव से निष्कासित कर दिया था।" पिता जी के पैरों के पास से उठ कर सुनील ने दो क़दम पीछे हट कर कहा_____"उस दिन हमें बड़ा दुख लगा था जब हमारा दोस्त वैभव हमसे दूर चला गया। आख़िर उसकी वजह से ही तो हम दोनों का जीवन अच्छे से गुज़र रहा था और हमें किसी चीज़ का अभाव नहीं रहता था। उस दिन पंचायत में हमने भी आपका फ़ैसला सुना था जिसमें आपने कहा था कि गांव का कोई भी व्यक्ति वैभव से किसी भी तरह का ताल्लुक नहीं रखेगा और ना ही कोई उसकी मदद करेगा। अगर किसी ने ऐसा किया तो उसके साथ भी वही सुलूक किया जाएगा। आपकी इस बात से हम थोड़ा सहम तो गए थे लेकिन अपने दोस्त को इस तरह अकेले मुसीबत में पड़ गया देख भी नहीं सकते थे इस लिए हम दोनों ने फ़ैसला किया कि हम दोनों सबकी नज़र बचा कर अपने दोस्त वैभव से ज़रूर मिला करेंगे और हमसे जिस तरह से भी हो सकेगा हम वैभव की मदद करेंगे।"
"यही सोच कर एक दिन हम दोनों अपने अपने घर से निकल कर अपने ठिकाने पर मिले।" सुनील सांस लेने के लिए रुका तो जैसे चेतन ने कमान सम्हालते हुए कहा____"शाम पूरी तरह से हो गई थी और हर तरफ अंधेरा फैल गया था। आस पास का मुआयना करने के बाद हम दोनों जैसे ही अपने ठिकाने से निकले तो एकदम से अंधेरे में एक चमकता हुआ साया हमारे सामने आ कर खड़ा हो गया। इतना ही नहीं उसके साथ दो काले साए और भी आ कर हमारे अगल बगल खड़े हो गए। दोनों के हाथ में लट्ठ थे। अपने इतने क़रीब किसी जिन्न की तरह अचानक से उन लोगों को प्रगट हो गया देख डर के मारे हमारी चीख निकल गई थी। हमें समझ नहीं आया था कि आख़िर वो लोग कौन थे जो खुद को इस तरह से छुपाए हुए थे। पहले जो चमकीला साया आया था उसके पूरे शरीर पर सफेद लिबास था और जो दो लोग उसके बाद उसी समय आ कर हम दोनों के अगल बगल खड़े हो गए थे उनके शरीर पर काले रंग का लिबास था। यहां तक कि उन सबका चेहरा भी सफेद और काले रंग के नक़ाब में छुपा हुआ था। हम दोनों की तो उन्हें देख कर हालत ही ख़राब हो गई थी।"
"वो तीनों हमें इस तरह से घेर कर खड़े हो गए थे कि हम कहीं भाग ही नहीं सकते थे।" चेतन सांस लेने के लिए रुका तो सुनील ने आगे बताना शुरू किया____"पहले तो हमें लगा कि वो तीनों आपके ही कोई आदमी होंगे जो हम पर नज़र रखे हुए थे किंतु जल्दी ही हमारी ये ग़लतफहमी दूर हो गई। उन तीनों में से सफ़ेद लिबास पहने साए ने अपनी अजीब सी आवाज़ में हमसे कहा कि अब से हम दोनों को वही करना होगा जो वो कहेगा। अगर हमने उसके कहे अनुसार उसका कोई नहीं किया तो अंजाम के रूप में हमें अपने अपने परिवार के लोगों से हाथ धोना पड़ जाएगा।"
"यानि तुम दोनों उस सफ़ेदपोश के धमकाने पर अपने दोस्त के साथ विश्वास घात करने पर मजबूर हो गए?" सहसा पिता जी ने दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा____"ख़ैर, हम ये जानना चाहते हैं कि वो सफ़ेदपोश व्यक्ति तुम दोनों से क्या करवाता था या यूं कहें कि तुम दोनों उसके कहने कर क्या करते थे?"
"पहले तो उसने वैभव के बारे में हमसे सारी जानकारी ली।" सुनील ने कहा____"जैसे कि वैभव क्या क्या करता है और उसके किस किस से संबंध हैं? ये भी कि वैभव की पहुंच कहां तक है? हमसे ये सब जानने के बाद उसने हमें सिर्फ एक ही काम करने को कहा और वो काम था नज़र रखना। वैभव पर नज़र रखने के साथ साथ हमें ये भी देखते रहना था कि वैभव कहां कहां जाता है और खुद उसके पीछे कौंन कौंन है?"
"इस बात का क्या मतलब हुआ?" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंका था, उधर पिता जी ने पूछा____"वैभव के पीछे कौन कौन है इस बात को देखते रहने के लिए क्यों कहा था उसने तुम लोगों को?"
"हमें इस बारे में कुछ नहीं पता।" चेतन ने सिर झुका कर दबी आवाज़ में कहा____"हम खुद भी इस बारे में सोचते थे मगर कुछ समझ नहीं आया हमें। कई बार हमने आपको या वैभव को सब कुछ बताने का सोचा और एक दो बार आप दोनों के पास आने की कोशिश भी की मगर नाकाम रहे। पता नहीं कैसे उसे पता चल जाता था और उसके दोनों काले नक़ाबपोश आदमी हमारे सामने जिन्न की तरह आ कर खड़े हो जाते थे। आख़िरी बार उसने हमें धमकी दी थी कि अब अगर हमने फिर से आपको या वैभव को इस बारे में कुछ बताने का सोचा तो हमारे लिए अच्छा नहीं होगा।"
"सफ़ेदपोश से तुम लोगों की मुलाक़ात कैसे होती थी?" पिता जी ने पूछा____"और अभी आख़िरी बार कब मिले थे उससे?"
"हम दोनों अपनी मर्ज़ी से नहीं मिल सकते थे उससे।" चेतन ने कहा____"क्योंकि एक तो हमें उसके बारे में कुछ पता ही नहीं था और दूसरे उसने खुद ही हमें बोला हुआ था कि हम लोग भूल कर भी उससे मिलने की या उसके पीछे आने की कोशिश न करें। क्योंकि ऐसी सूरत में हमें बहुत बुरा अंजाम भुगतना पड़ सकता है। इस लिए हम अपनी मर्ज़ी से उससे मिल ही नहीं सकते थे। किंतु जब उसको हमसे मिलना होता था तो उसके दोनों काले नकाबपोश आदमी रात के अंधेरे में हमारे सामने प्रगट हो जाते थे और हमें उस सफ़ेदपोश व्यक्ति के पास ले जाते थे। सफ़ेदपोश के पूछने पर हम उसको सारी बातें बताते और फिर उसके अगले आदेश पर वापस चले जाते थे।"
"हम्म्म्म।" पिता जी ने लंबी हुंकार सी भरी, फिर बोले____"तो जैसा कि उस सफ़ेदपोश व्यक्ति के अनुसार तुम दोनों वैभव पर नज़र रखते थे और ये भी कि इसके पीछे कौन कौन है ये भी पता करते थे तो अब हमें बताओ कि तुम लोगों ने वैभव के पीछे किन किन लोगों को देखा था?"
"कई लोगों को देखा था हमने।" सुनील ने बताया____"लेकिन रात के अंधेरे में हम ये जान ही नहीं पाए थे कि वो लोग कौन थे जो वैभव के पीछे थे? किंतु हां, हरि शंकर के बेटे रूपचंद्र को वैभव पर नज़र रखते हुए हमने बहुतों बार देखा था।"
"कमाल है।" पिता जी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"तुम लोगों ने रूपचंद्र को तो कई बार देखा लेकिन बाकी लोगों को देखा तो ज़रूर मगर उन्हें पहचाना नहीं। ये कैसे हो सकता है भला? जब तुम दोनों का काम ही था ऐसे लोगों पर नज़र रखते हुए उनका पता लगाना तो फिर कैसे तुम लोगों को उनके बारे में पता नहीं चला?"
"ऐसा इस लिए क्योंकि वो लोग हमेशा रात के अंधेरे में ही कभी कभी वैभव के पीछे हमें नज़र आते थे।" चेतन ने कहा____"जबकि रूपचंद्र दिन में भी वैभव पर नज़र रखता था, इस वजह से हमें उसके बारे में अच्छे से पता चल गया था। दिन के उजाले में वैभव के पीछे हमने रूपचंद्र के अलावा कभी किसी को नहीं देखा।"
चेतन की ये बात सुन कर पिता जी फ़ौरन कुछ न बोले। उनके चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे। मैं खुद भी सोच में पड़ गया था किंतु सहसा मुझे एहसास हुआ कि वो दोनों इस बारे में झूठ नहीं बोल रहे थे। यकीनन रात के अंधेरे में ऐसे व्यक्तियों के बारे में जान पाना आसान नहीं रहा होगा दोनों के लिए।
"पिछली बार कब मिले थे तुम दोनों उस सफ़ेदपोश से?" सहसा मैंने दोनों की तरफ देखते हुए पूछा।
"बहुत दिन हो गए।" सुनील ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तब से अभी तक उससे हमारी मुलाक़ात नहीं हुई लेकिन....।"
"लेकिन??" मैंने घूरा उसे।
"पिछली बार अजीब बात हुई थी।" सुनील ने कहा____"हमेशा तो उसके काले नकाबपोश आदमी हमें लेने आते थे और वही हमें उस सफ़ेदपोश से मिलवाते थे लेकिन पिछली बार ऐसा नहीं हुआ।"
"क्यों?" पिता जी ने पूछा।
"पहले हमें भी पता नहीं चला था।" चेतन ने गहरी सांस ली____"फिर हमें कहीं से पता चला कि उसके दोनों नकाबपोश आदमी मर चुके हैं। तभी तो पिछली बार सफ़ेदपोश व्यक्ति खुद ही चल कर हमारे सामने आया था।"
"तुम दोनों के अलावा और किस किस को उस सफ़ेदपोश ने अपना मोहरा बना रखा है?" मैंने पूछा।
"एक दो बार मैंने पास वाले गांव के एक आदमी को देखा था।" सुनील ने बताया____"उसका नाम जगन था। उसके अलावा और किसी के बारे में हमें नहीं पता। हो सकता है कि हमारे अलावा भी उसके कई और मोहरे हों जिनसे वो अलग अलग समय पर मिलता हो।"
"पास के गांव में छुपे क्यों बैठे थे तुम दोनों?" मैंने पूछा____"क्या ऐसा करने के लिए तुम्हारे आका ने कहा था तुम लोगों से?"
"नहीं ऐसी कोई बता नहीं है।" चेतन ने झिझकते हुए कहा____"असल में काफी समय से हमारी उस सफ़ेदपोश व्यक्ति से मुलाक़ात नहीं हुई थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर इसकी क्या वजह हो सकती है? हालाकि इससे कहीं न कहीं हम ये सोच कर खुश भी थे कि उसके कहने पर हमें फिलहाल कहीं भटकना नहीं पड़ रहा है लेकिन फिर ये सोच कर डर भी जाते थे कि कहीं वो हमें आजमा न रहा हो। यानि अगर हम उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ कुछ करेंगे तो हमें लेने के देने ना पड़ जाएं। इधर जब काफी दिनों से सफ़ेदपोश हमसे मिलने नहीं आया तो हम और भी ज़्यादा असमंजस में पड़ गए। हमें ये भी डर सताता रहता था कि किसी दिन आप हमें पकड़ न लें। इतना तो हम समझ ही चुके थे कि अब तक आप लोगों को हम पर शक हो ही गया होगा, ख़ास कर वैभव को। इसी डर से हम इस गांव में ज़्यादा रहते ही नहीं थे। अपने घर वालों को भी समझा दिया था कि वो इस बारे में न तो हमारी फ़िक्र करें और ना ही किसी को बताएं। बस यही बात थी कि हम दोनों दूसरे गांव में छुप के रहते थे।"
"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" चेतन की बात पूरी होते ही सुनील अपने हाथ जोड़ कर बोल पड़ा____"हमने जो भी किया है वो सब मजबूरी में किया है।" कहने के साथ वो मेरी तरफ पलटा, फिर बोला____"तुम भी हमें माफ़ कर दो वैभव। तुम तो हम दोनों को बचपन से जानते हो कि हम कैसे हैं। ये ऊपर वाला ही जानता है कि तुमसे गद्दारी करने की वजह से हम कितना दुखी थे और कितना शर्मिंदा महसूस करते थे। मन करता था कि अपने आप को मिटा डालें मगर फिर ये सोच कर ऐसा क़दम नहीं उठाया कि ऐसा करने से हमारे घर वालों पर क्या गुज़रेगी?"
"ठीक है मैंने माफ़ किया तुम दोनों को।" मैंने एक नज़र पिता जी पर डालने के बाद कहा____"और उम्मीद करता हूं कि अब से वफ़ादारी दिखाओगे।"
"अभी इन लोगों से वफ़ादारी की उम्मीद करना उचित नहीं है।" पिता जी ने कहा____"क्योंकि इन दोनों को अभी भी उस सफ़ेदपोश से ख़तरा है। वो बहुत ही शातिर और ख़तरनाक व्यक्ति है। संभव है कि उसे ये पता चल गया हो कि ये दोनों हमारे पास पहुंच चुके हैं और हमारे पूछने पर इन लोगों ने हमें सब कुछ बता दिया हो। ऐसे में इन दोनों पर अब उसका ख़तरा बढ़ गया है। हमारा ख़याल ये है कि इन दोनों को फिलहाल वैसा ही करते रहना चाहिए जैसा अब तक ये करते आए थे। सफ़ेदपोश से अगर दुबारा इन लोगों की मुलाक़ात होती है तो ये किसी तरीके से हमें इशारा कर देंगे। इनका इशारा पाने के लिए हमारे कुछ लोग गुप्त रूप से इन दोनों के आस पास ही मौजूद रहेंगे।"
पिता जी की बात से मैं भी सहमत था इस लिए यही फ़ैसला हुआ कि वो दोनों फिलहाल पहले जैसा बर्ताव करते रहें। उन दोनों के जाने के बाद पिता जी कुछ देर तक जाने क्या सोचते रहे।
"क्या लगता है तुम्हें?" पिता जी ने सहसा मुझसे पूछा____"तुम्हारे वो दोनों दोस्त वाकई में सच बोल रहे थे या उन्होंने हमसे झूठ बोला था?"
"मुझे नहीं लगता पिता जी कि वो दोनों झूठ बोल रहे थे।" मैंने ठोस लहजे में कहा____"वैसे भी झूठ बोलने की कोई वजह नहीं थी उनके पास। मैं दोनों को बहुत अच्छे से जानता हूं। यकीनन वो दोनों सफ़ेदपोश के द्वारा इस क़दर मजबूर किए गए थे कि दोनों को ऐसा करना पड़ा।"
"ऐसा तुम इस लिए कह रहे हो क्योंकि तुम अभी भी उन दोनों को दोस्त मानते हो और उन्हें दोस्त के नज़रिए से ही देख रहे हो।" पिता जी ने मानो तर्क़ देते हुए कहा____"जबकि तुम्हें सबसे ज़्यादा इस बात पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि ये वही दोस्त हैं जो सफ़ेदपोश के द्वारा मजबूर कर दिए गए थे और फिर उन्होंने तुम्हारे साथ विश्वास घात किया। मान लेते हैं कि दोनों के दिल साफ हैं और वो तुमसे गद्दारी करने का नहीं सोच सकते लेकिन ये भी मत भूलो कि इंसान मजबूरी में कुछ भी कर गुज़रता है। हो सकता है कि उनका हमारे सामने वो सब कहना भी उनकी मजबूरी का ही हिस्सा रहा हो। आख़िर मजबूरी में वो तुमसे कहीं ज़्यादा अपने परिवार के बारे में ही सोचेंगे।"
"यानि आपको उन दोनों पर शक है?" मैंने कहा____"और आपके अनुसार उन्होंने जो कुछ भी हमसे कहा है वो सब सफ़ेदपोश के सिखाए अनुसार ही कहा है।"
"क्या ऐसा नहीं हो सकता?" पिता जी ने उल्टा सवाल कर दिया मुझसे।
"होने को तो कुछ भी हो सकता है पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मेरा दिल कहता है कि वो दोनों बेकसूर है"
"हमने ये कब कहा कि वो बेकसूर नहीं हैं?" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"हम तो सिर्फ ये कह रहे हैं कि संभव है कि उन्होंने अभी जो कुछ भी हमसे कहा है या बताया है वो सब उन्हें उस सफ़ेदपोश ने ही सिखाया रहा हो। शायद वो समझता था कि किसी न किसी दिन इन दोनों पर हम शक करेंगे ही और फिर इन्हें पकड़ने का भी सोचेंगे। सफ़ेदपोश ने इसी बात को समझते हुए इन्हें पहले ही सिखा पढ़ा दिया रहा होगा कि हमारे द्वारा पकड़े जाने पर इन्हें हमसे क्या कहना है।"
"बेशक ऐसा हो सकता है।" मैंने कुछ पल सोचने के बाद कहा____"किंतु सवाल है कि इससे सफ़ेदपोश का अपना क्या फ़ायदा होता? कहने का मतलब ये कि अगर दोनों ने वही सब कुछ हमें बताया है जो आपके अनुसार उन्हें सफ़ेदपोश ने सिखाया पढ़ाया रहा होगा तो इन सब बातों के द्वारा सफ़ेदपोश का क्या लाभ हो सकता है और क्या नुकसान हो सकता है? मुझे तो ऐसा लगता है पिता जी कि आप बेवजह ही इतना दूर का सोच रहे हैं। दोनों ने जो कुछ भी हमें बताया है वो सब स्वाभाविक बातें हैं जो उनकी परिस्थिति के अनुसार वाजिब ही लगती हैं।"
"मानते हैं।" पिता जी ने सिर हिलाया____"किंतु हमें सिर्फ एक पहलू के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि मौजूदा हालात के अनुसार दोनों पहलुओं पर सोचना चाहिए। हमारे लिए यही हितकर भी रहेगा।"
मैं पिता जी की इस बात से सहमत था इस लिए दुबारा कोई तर्क वितर्क नहीं किया। उधर पिता जी ने आगे कहा____"शेरा को बोलो कि वो अपने कुछ आदमियों को उन दोनों पर नज़र रखने को कहे।"
"क्या ऐसा करना ज़रूरी है?" मैंने बैठक से ही एक दरबान को आवाज़ देने के बाद पिता जी से कहा।
इससे पहले कि पिता जी मेरी बात का कोई जवाब देते एक दरबान फ़ौरन ही हाज़िर हो गया जिसको मैंने शेरा को बुलाने को कहा तो वो चला गया।
"बिल्कुल ज़रूरी है।" दरबान के जान के बाद पिता जी ने मेरी बात का जवाब देते हुए कहा____"ये मत भूलो कि सफ़ेदपोश के मोहरों में से फिलहाल हम तुम्हारे दोस्तों के बारे में ही जानते हैं। जगन तो मर चुका है इस लिए सुनील और चेतन के द्वारा ही हम सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं।"
"वो कैसे?" मेरे माथे पर सोचने वाले भाव उभर आए।
"काफी समय से सफ़ेदपोश ने कोई हरकत नहीं की है और ना ही उसके बारे में हमें कहीं से कोई ख़बर मिली है।" पिता जी ने कहा____"संभव है कि वो किसी बड़े काम को अंजाम देने की फ़िराक में हो। अब क्योंकि हमारे पास उसके पास पहुंचने का कोई रास्ता अथवा जरिया नहीं है तो सुनील और चेतन ही ऐसे हैं जिनके द्वारा हम सफ़ेदपोश तक पहुंच सकते हैं, बशर्ते कि सफ़ेदपोश इनसे मिलने की कोशिश करे। हमने इसी लिए दोनों पर नज़र रखने के लिए कहा है कि अगर सफ़ेदपोश उन दोनों से मिलने की कोशिश करे तो दोनों पर नज़र रख रहे हमारे आदमियों को भी सफ़ेदपोश दिख जाए और फिर वो फ़ौरन ही हमें इस बात की सूचना दे दें।"
मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि शेरा बैठक में दाखिल हुआ। पिता जी ने उसे समझा दिया कि उसे क्या करना है। सारी बात समझने के बाद शेरा चला गया।
"ये सब तो ठीक है लेकिन रघुवीर की हत्या का जो मामला सामने आया है उसके बारे में आपका क्या ख़याल है?" मैंने उत्सुकतावश ही पूछा पिता जी से____"क्या लगता है आपको? रघुवीर की हत्या किसने की होगी? क्या चंद्रकांत ने खुद ही अपने बेटे की हत्या कर के हमें फंसाने की साज़िश की हो सकती है?"
"नहीं, हर्गिज़ नहीं।" पिता जी ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा____"चंद्रकांत बदले की भावना में इतना भी अंधा नहीं हो सकता कि वो अपने ही हाथों अपने इकलौते बेटे की हत्या कर के अपने वंश का नाश कर बैठे। उसके बेटे की हत्या यकीनन किसी और ने ही की है।"
"किसने की होगी?" मैंने सवाल किया____"क्या उसकी हत्या हमारे मामले की वजह से हुई या फिर किसी और ने ही चंद्रकांत से उसके बेटे की हत्या कर के अपनी दुश्मनी निकाल ली है?"
"जहां तक हम दोनों बाप बेटे को जानते और समझते हैं उससे हम यही कहेंगे कि दोनों की किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उनमें से किसी की हत्या कर दे।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि इंसान किसी के बारे में पूर्ण रूप से सब कुछ नहीं जान रहा होता है। कहने का मतलब ये कि संभव है कि उसका ऐसा कोई दुश्मन बन ही गया रहा हो जिसके बारे में हमें फिलहाल पता नहीं था।"
"चंद्रकांत ने तो रूपचंद्र पर भी इल्ज़ाम लगाया था।" मैंने कहा____"उसकी बहू ने अपने और रूपचंद्र के विषय में जो बातें बताई थी तो क्या ऐसा हो सकता है कि रूपचंद्र ने गुस्से में आ कर रघुवीर की हत्या कर दी हो?"
"ये तो अपने ही हाथों अपने पैर में कुल्हाड़ी मार लेने वाली बात होती।" पिता जी ने कहा____"हमें नहीं लगता कि रूपचंद्र ने इस तरह की बेवकूफी की होगी। अगर उसे रजनी की बातों पर इतना ही गुस्सा आ गया था तो वो उसी समय रजनी पर ही अपना गुस्सा मिटा देता। अपने गुस्से को शांत करने के लिए वो रात होने का इंतज़ार नहीं करता और ना ही फिर वो रघुवीर की हत्या करता। इंसान जिस पर गुस्सा होता है ज़्यादातर वो उसी पर अपना गुस्सा निकालता है।"
"अगर ऐसा है।" मैंने कहा____"तो फिर यही ज़ाहिर होता है कि रघुवीर की हत्या करने वाला कोई और ही है। अब सवाल ये है कि रघुवीर ने आख़िर किसी के साथ ऐसा क्या बुरा किया था जिसके चलते उसे अपनी जान से हाथ धो लेना पड़ा?"
"महेंद्र सिंह इसकी तहक़ीकात कर रहे हैं।" पिता जी ने कहा____"हमें पूरा यकीन है कि जल्द से जल्द रघुवीर के हत्यारे का पता चल जाएगा। एक बात और, तुम्हें इस तरह के मामले से बिल्कुल ही दूर रहना है। हम चाहते हैं कि तुम ऐसे काम करो जिसके चलते लोगों के अंदर से तुम्हारी ख़राब छवि मिट जाए और लोग तुम्हें एक अच्छा इंसान मान कर तुम्हें सम्मान की दृष्टि से देखने लगें।"
"मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं पिता जी।" मेरे मन में अचानक ही एक बात आई तो मैंने कहा____"और इसके लिए मैंने एक अहम कार्य करने का भी सोचा है। अगर आप कहें तो अपने उस कार्य के बारे में आपको बताऊं?"
"हां क्यों नहीं।" पिता जी ने कहा____"हम भी जानना चाहते हैं कि तुम अच्छा बनने के लिए ऐसा कौन सा कार्य करना चाहते हो?"
"मैं चाहता हूं कि एक दिन गांव के सभी लोगों को हवेली के विशाल प्रांगण में बुलाया जाए।" मैंने कहा____"और फिर उन सभी लोगों को ये बताया जाए कि गांव के जिन लोगों ने हमसे कर्ज़ ले रखा है उन सबका कर्ज़ हम पूरी तरह से माफ़ करते हैं। मेरा ख़याल है कि कर्ज़ माफ़ी की बात सुन कर गांव वाले बेहद खुश हो जाएंगे और पिछले कुछ समय से जिस वजह से लोगों के अंदर हमारे प्रति ग़लत विचार पैदा हुए होंगे वो जड़ से समाप्त हो जाएंगे।"
"हम्म्म्म! काफ़ी अच्छा ख़याल है ये।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"गांव वालों के लिए ऐसा कार्य करना बड़ी बात है। यकीनन इससे गांव वाले काफी खुश और प्रभावित होंगे। हमें अच्छा लगा कि तुमने इतनी बड़ी बात सोची और ऐसा कार्य करने का निर्णय लिया है।"
"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"
"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"
थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।
"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"
"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"
थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।
अब आगे....
साहूकार गौरी शंकर बाहर बैठक में बैठा हुआ था। उसके साथ रूपचंद्र और फूलवती भी थी। शाम हो चुकी थी। गौरी शंकर और रूपचंद्र खेतों से आने के बाद तथा हाथ पैर धोने के बाद चाय पीने बैठे हुए थे। पिछले कुछ समय से जो थोड़ा बहुत तनाव परिवार में बना हुआ था वो अब काफी हद तक मिट गया था। हालाकि इस बात को सबके लिए भूल पाना अब भी आसान न था कि दादा ठाकुर ने एक झटके में उनके परिवार के मर्दों और बच्चों को जान से मार डाला था। किंतु परिवार के मुखिया और सबसे बुजुर्ग चंद्रमणि के समझाने से अब हर कोई इस बात को समझ चुका था कि पिछली चीज़ों को ले कर बैठे रहने से अथवा किसी तरह का विकार मन में रखने से परिवार की स्थिति अच्छी होने की बजाय ख़राब ही होनी थी।
"क्या फिर तुम्हारी दादा ठाकुर से दुबारा भेंट हुई?" फूलवती ने गौरी शंकर से पूछा____"और क्या तुमने उसे ये बताया कि वो अपने जिस बेटे के साथ हमारी बेटी रूपा का ब्याह तय कर चुका है उसका वो बेटा दूसरे गांव के एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है?"
"क्या फ़र्क पड़ता है इस बात से?" गौरी शंकर ने जैसे लापरवाही से कहा____"दादा ठाकुर ने वैभव के साथ रूपा के ब्याह को तय कर दिया है यही सबसे ज़्यादा अहम बात है। वैभव भले ही किसी किसान की लड़की से प्रेम करता हो लेकिन वो अपने पिता के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। वैसे भी उसने खुद भी तो कई बार कहा है कि वो रूपा से ब्याह करने को तैयार है। फिर आपको किस बात की फ़िक्र है?"
"हैरानी की बात है कि ऐसा तुम कह रहे हो?" फूलवती ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जबकि तुम्हें इस बारे में गहराई से सोचना चाहिए।"
"अब सोचने के लिए आख़िर बचा ही क्या है भौजी?" गौरी शंकर ने कहा____"जब दोनों बाप बेटे ब्याह करने को बोल चुके हैं तो फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
"मेरे ऐसा कहने की एक ठोस वजह हैं गौरी शंकर।" फूलवती ने ठोस लहजे से कहा____"और वो ये है कि वैभव के साथ हमारी बेटी रूपा का वैवाहिक जीवन तभी सफल और सुखमय हो सकता है जब उसके होने वाले पति के जीवन में किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान न हो। खास कर उसका तो बिल्कुल भी नहीं जिससे वैभव खुद प्रेम करता हो। ज़रा सोचो कि इसके चलते हमारी बेटी के वैवाहिक जीवन में कितना बड़ा असर पड़ेगा। कहने के लिए तो रूपा हवेली की बहू बन जाएगी लेकिन एक पत्नी के रूप में क्या वो वैभव के साथ खुश रहेगी? क्या वैभव उसे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर उसे वो सब कुछ देगा जो उसे अपनी पत्नी को देना चाहिए? अरे! जो पति किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता हो वो भला अपनी पत्नी को वैसा प्रेम कैसे देगा? नहीं गौरी, सच तो ये है कि ऐसी परिस्थिति में होगा ये कि हमारी बेटी उस हवेली में अपने पति से अपने प्रेम के लिए तरसती रहेगी। इसी लिए कह रही हूं कि तुम्हें इस बारे में दादा ठाकुर से बात कर लेनी चाहिए और उनसे इस बात का वचन लेना चाहिए कि वैभव के जीवन में रूपा के अलावा किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान नहीं होगा। इतना ही नहीं बल्कि वैभव सच्चे दिल से रूपा को अपनी पत्नी मानते हुए उसे हर सुख देगा।"
फूलवती की लंबी चौड़ी बातें सुन कर गौरी शंकर कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। यही हाल रूपचंद्र का भी था।
"बड़ी मां सही कह रही हैं काका।" रूपचंद्र बोल ही पड़ा____"आपको दादा ठाकुर से इस बारे में बात करना ही चाहिए। मैं भी ये बर्दास्त नहीं करूंगा कि ब्याह के बाद मेरी बहन को वैभव के किसी रवैए से दुख पहुंचे। वैसे मुझे तो अभी से ये प्रतीत हो रहा है कि ऐसा ही कुछ होगा क्योंकि जिस इंसान को मेरी बहन के समर्पण भाव और उसके प्रेम में किए गए त्याग का एहसास ही नहीं वो कैसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी बहन को खुशियां दे सकेगा?"
"प्रेम बहुत अच्छा भी होता है और बहुत ख़राब भी।" फूलवती ने कहा____"वो अच्छा तब होता है जब वो उचित व्यक्ति से किया जाए और ख़राब तब होता है जब वो अनुचित व्यक्ति से किया जाए। वैभव रूपा से नहीं बल्कि उस मामूली से किसान की लड़की से प्रेम करता है। ज़ाहिर है उसका मन हर वक्त उसी के बारे में सोचेगा और हमारी रूपा की तरफ वो कभी ध्यान ही नहीं देगा। ऐसे में हमारी बेटी उस हवेली में बहू बन जाने के बाद भी दुखी ही रहेगी।"
"शायद आप ठीक कह रही हैं भौजी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये प्रेम वाकई में बड़ा ख़राब भी होता है अगर अनुचित व्यक्ति से किया जाए तो। वैभव के बारे में हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। वो कमबख़्त वो बला है जो अपने बाप से क्या बल्कि ऊपर वाले से भी नहीं डरता। आज भले ही वो सुधर गया है लेकिन प्रेम के मामले में वो किसी की नहीं सुनेगा। यकीनन ऐसे में उसके साथ हमारी बेटी का वैवाहिक जीवन बेहतर नहीं हो सकेगा। आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मुझे दादा ठाकुर से इस बारे में बात करनी ही होगी।"
"तो फिर तुम्हें कल ही हवेली जा कर दादा ठाकुर से इस बारे में बात कर लेनी चाहिए।" फूलवती ने कहा____"प्रेम जैसे मामले में ज़्यादा देर करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की से वैभव का ये प्रेम प्रसंग अभी ताज़ा ताज़ा ही हो, इस लिए अगर दादा ठाकुर द्वारा इस प्रेम प्रसंग पर अभी से विराम लगा दिया जाएगा तो शायद इसमें कोई समस्या नहीं होगी। किन्तु अगर ज़्यादा देर हुई तो ये समस्या गंभीर हो जाएगी।"
"सही कहा आपने।" गौरी शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"इस मामले में देर करना ठीक नहीं होगा। इसके अलावा दादा ठाकुर से मैं अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा।"
"अपने कौन से मुद्दों पर चर्चा करोगे तुम?" फूलवती के माथे पर शिकन उभरी।
"हमने जहां पर आरती और रेखा का रिश्ता तय किया था वहां से कुछ दिन पहले एक ख़बर आई थी।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"उन लोगों ने रिश्ता करने से इंकार कर दिया है।"
"क्या????" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया।
"हां भौजी।" गौरी शंकर एकाएक चिंतित भाव से कह उठा____"असल में दादा ठाकुर के साथ हमारा जो मामला हुआ था उसकी ख़बर दूर दूर तक फैल चुकी थी। उसी के चलते उन्होंने हमारे तय किए गए रिश्ते को करने से इंकार कर दिया है।"
"हाय राम!" फूलवती ने अपने भाड़ की तरह खुल गए मुंह को हथेली से बंद करते हुए कहा____"ये तो सच में बहुत बुरा हुआ लेकिन तुमने ये बात हमें बताई क्यों नहीं थी?"
"मैंने जान बूझ कर ही नहीं बताया था आप लोगों से।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"असल में मैं आप सबको चिंता में नहीं डालना चाहता था।"
"तो अब क्या होगा फिर?" फूलवती ने चिंतित भाव से पूछा।
"मैंने पुरोहित जी को भी भेजा था वहां।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन पुरोहित जी के समझाने पर भी बात नहीं बनी। उन्होंने साफ कह दिया है कि हमें ऐसे घर में अपने बेटों का रिश्ता करना ही नहीं है जिस घर के लोगों की मानसिकता इतनी निम्न दर्जे की हो।"
"सच ही कहा था उस दिन पिता जी ने।" फूलवती ने अपने ससुर चंद्रमणि की बातों को याद करते हुए कहा____"कि कोई हमारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। हे प्रभु! अब क्या होगा? ये कैसी मुसीबत में डाल दिया है हमें?"
"फ़िक्र मत कीजिए भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"हमारी इस चिंता को अब दादा ठाकुर ही दूर कर सकते हैं। इसी लिए तो मैंने आपसे कहा है कि दादा ठाकुर से अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा। मुझे यकीन है कि दादा ठाकुर इस मामले में हमारी सहायता ज़रूर करेंगे।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" फूलवती ने जैसे बेबस भाव से कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो हमारी बदनामी तो होगी ही किंतु साथ में ये बात भी चारो तरफ फ़ैल जाएगी जिससे हमारी बेटियों से कोई ब्याह ही नहीं करेगा।"
"सच में हमारी स्थिति बहुत दयनीय हो गई है भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"और अपनी इस दयनीय स्थिति के ज़िम्मेदार हम खुद ही हैं। काश! इतना दूर तक हमने पहले ही सोच लिया होता तो आज ना तो हमें ये दिन देखना पड़ता और ना ही हम सबकी ये दशा होती।"
गौरी शंकर की इस बात का फूलवती के पास कोई जवाब नहीं था। रूपचंद्र भी गंभीर चेहरा लिए बैठा रह गया था। कदाचित उसे भी शिद्दत से एहसास हो रहा था कि आज के समय में उसकी और उसके परिवार की हालत सच में कितनी गंभीर है।
✮✮✮✮
"ये तो सच में बहुत ही बड़ी चिंता की बात हो गई है वैभव।" रागिनी भाभी ने मेरी सारी बातें सुनने के बाद गंभीर भाव से कहा।
मैं भाभी के कमरे में था और उन्हें वो सब बातें बता चुका था जो आज सरोज से उसकी बेटी के संबंध में हुईं थी। मैंने भाभी से कुछ भी नहीं छुपाया था। ये सब बातें भाभी को बताने का मेरा यही मकसद था कि ऐसी परिस्थिति में वो या तो मेरा मार्गदर्शन करें या फिर मेरी मदद करें। मैं जानता था कि मां और पिता जी भाभी को बहुत मानते थे और मौजूदा समय में वो जिस स्थिति में थीं उसकी वजह से वो लोग उनकी कोई भी बात टाल नहीं सकते थे। यही सब सोच कर मैंने भाभी को सब कुछ बता दिया था जिसे सुनने के बाद वो एकदम से गंभीर हो गईं थी।
"मुझे समझ नहीं आ रहा भाभी कि अपनी इस समस्या को कैसे दूर करूं?" मैंने चिंतित भाव से कहा____"मैं अब ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता जिससे आपको अथवा किसी को भी अच्छा न लगे। मैं चाहता हूं कि हवेली का हर सदस्य इस बात को समझे कि अनुराधा जैसी लड़की का मेरे जीवन में क्या महत्व है।"
"तुम अभी इस बारे में ये सब सोच कर खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने मेरे कंधे को हल्के से दबा कर जैसे मुझे धीरज देते हुए कहा____"अभी इस सबके लिए बहुत समय बाकी है। मुझे पूरा यकीन है कि जब पिता जी को इस बारे में सब कुछ पता चलेगा तो वो तुम्हारी बातों को ज़रूर समझेंगे और अनुराधा के साथ तुम्हारे ब्याह की मंजूरी भी देंगे।"
"क्या सच में आपको लगता है कि वो इस बात को समझेंगे?" मैंने जैसे बेयकीनी से कहा____"नहीं भाभी, ये इतना आसान नहीं है। उन्होंने रूपा के साथ मेरा रिश्ता तय कर दिया है और गौरी शंकर को वचन भी दे चुके हैं कि अगले साल वो बरात ले कर उसके घर जाएंगे। क्या इसके बाद भी वो मेरे और अनुराधा के रिश्ते को स्वीकृति देंगे? क्या वो इस बात के लिए राज़ी होंगे कि मेरे जीवन में रूपा के अलावा भी अनुराधा के रूप में मेरी कोई दूसरी पत्नी भी हो?"
"बिल्कुल राज़ी होंगे वैभव।" भाभी ने मजबूती से कहा____"और उन्हें राज़ी होना ही पड़ेगा। उन्हें समझना होगा कि तुम अगर सुधर गए हो तो इसमें सिर्फ और सिर्फ अनुराधा जैसी लड़की का ही हाथ है। मैं खुद तुम्हारी पैरवी करूंगी।"
"ओह! भाभी क्या सच कह रही हैं आप?" मैं एकदम से खुश हो कर बोल पड़ा____"क्या सच में आप इस मामले में मेरी मदद करेंगी?"
"बिल्कुल करूंगी।" भाभी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"अपने प्यारे से देवर के लिए मुझसे जो हो सकेगा करूंगी। ख़ास कर उस वैभव के लिए जो एक अच्छा इंसान बनने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। मैं ये बिल्कुल भी नहीं चाहूंगी कि सिर्फ इस वजह के चलते तुम अपना रास्ता भटक जाओ और फिर से पहले जैसे गंदे इंसान बन जाओ।"
"नहीं भाभी।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"अब मैं वापस पहले जैसा नहीं बनूंगा। अनुराधा के ना मिलने से सिर्फ इतना ही होगा कि उसके बिना खुश नहीं रह पाऊंगा, बाकी रास्ता नहीं भटकूंगा। क्योंकि मैंने आपको अच्छा इंसान बनने का वचन दिया है। आपने मुझसे जो उम्मीद लगा रखी है उसे टूटने नहीं दूंगा, फिर भले ही इसके लिए मुझे चाहे कितने ही अजाब सहने पड़ें।"
"अजाब सहें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने झट से मेरे दाएं गाल को सहलाते हुए स्नेह से कहा___"मैं अपने देवर को कोई अजाब नहीं सहने दूंगी। अगर वाकई में अनुराधा के मिलने से ही तुम्हें सच्ची खुशी मिलेगी तो वो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। अगर अच्छा इंसान बनने का तुमने मुझे वचन दे रखा है तो आज मैं भी तुम्हें ये वचन देती हूं कि अनुराधा के साथ तुम्हारा ब्याह ज़रूर करवाऊंगी मैं।"
"ओह! भाभी। आपने मेरे लिए मुझको इतना बड़ा वचन दे दिया?" मैंने गदगद भाव से उनकी तरफ देखा____"आपके चरण कमल कहां हैं। मैं उन चरणों में अपना सिर रख देना चाहता हूं।"
"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने जब देखा कि मैं सच में झुक कर उनके चरणों को छूने वाला हूं तो उन्होंने झट से पीछे हटते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम मेरा कितना अधिक सम्मान करते हो और सच कहूं तो इस बात से मुझे हमेशा गर्व महसूस होता है। ख़ैर अब ये तो बताओ कि अपनी होने वाली दोनों बीवियों से मुझे कब मिलवाओगे?"
"अनुराधा से तो मैं आपको किसी भी वक्त मिलवा सकता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन दूसरी वाली से मिलवाना शायद मेरे लिए मुश्किल है।"
"अरे! ऐसा क्यों भला?" भाभी ने कहा___"और ये तुम दूसरी वाली क्या बोल रहे हो? जैसे एक का नाम लिया है वैसे ही उसका भी नाम लो। माना कि अनुराधा से तुम प्रेम करते हो जिसके चलते तुम उसी में अपनी खुशी समझते हो लेकिन ये मत भूलो कि रूपा का भी तुम्हारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि अनुराधा का। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है और इतना ही नहीं अपने प्रेम को साबित करने के लिए उसने बहुत कुछ किया है तुम्हारे लिए। तुम उसके साथ कोई भेदभाव कैसे कर सकते हो?"
"ग़लती हो गई भाभी।" मैंने फ़ौरन ही अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा____"अब से कभी उसके साथ कोई भेदभाव नहीं करूंगा।"
"अच्छा इंसान बनने की राह पर हो तो सबके लिए अच्छा सोचना भी पड़ेगा।" भाभी ने जैसे उपदेश देते हुए कहा____"तभी समझा जाएगा कि तुम सच में अच्छे इंसान हो।"
"समझ गया भाभी, समझ गया।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा अब बताइए कब चल रही हैं मेरे साथ अपनी देवरानी से मिलने?"
"हांय...तुम तो एक ही पल में बेशर्म बन गए।" भाभी ने आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"अरे! कुछ तो शर्म करो। अपनी इस भाभी का कुछ तो लिहाज करो।"
"ठीक है ग़लती हो गई।" मैंने कहा____"अब से ऐसा कुछ नहीं कहूंगा आपके सामने और हां अब आप कहिएगा भी नहीं कि मैं उनमें से किसी से आपको मिलवाऊं।"
कहने के साथ ही मैंने इस तरह मुंह फेर लिया जैसे कोई छोटा बच्चा रूठ जाने पर फेर लेता है। ये देख भाभी खिलखिला कर हंस पड़ीं। उनकी हंसी मेरे कानों में मंदिर की घंटियां बजने जैसी प्रतीत हुईं तो मुझे ये सोच कर अच्छा लगा कि चलो किसी बहाने भाभी को हंसी तो आई। मैं तो चाहता ही यही था कि वो अपना दर्द भूल कर हंसती मुस्कुराती रहें।
"अगर तुम ये सोचते हो कि मैं तुम्हें मनाऊंगी तो भूल जाओ।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे भी मेरे मनाने से तुम्हें वो खुशी नहीं मिलेगी जो एक प्रेमिका के मनाने पर मिलती है। इस लिए अगर खुद को मनवाना ही है तो अपनी अनुराधा के पास ही जाओ।"
"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने फ़ौरन ही उनकी तरफ पलट कर कहा____"उन दोनों से पहले मेरे जीवन में आपकी प्राथमिकता ज़्यादा है। मैं आपका देवर हूं और आपसे रूठने मनाने का पूरा हक़ है मेरा।"
"अच्छा जी।" भाभी ने हल्के से हंस कर कहा____"अगर ऐसी बात है तो फिर उन दोनों बेचारियों का क्या होगा? वो दोनों तो तुम्हें मनाने की आस लिए ही बैठी रह जाएंगी। क्या तुम उनके साथ इस तरह का अत्याचार करोगे?"
"उनको मुझसे जो चाहिए होगा वो उन्हें मिल जाएगा।" मैंने लापरवाही से कहा____"फिर भला कैसे उनके साथ अत्याचार होगा?"
"तुम ना अब पिटोगे मुझसे।" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए मुझे थप्पड़ दिखाया____"चलो जाओ यहां से बेशर्म। मुझे आराम करना है अब।"
भाभी का अचानक से इस तरह का बर्ताव देख मैं चौंका। मुझे समझ न आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा मुझसे? मैंने सोचा कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कह दिया है उनसे? अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैंने उनसे ऐसी बात कह दी थी जिसमें एक अलग ही अर्थ छिपा हुआ था। मुझे अपने आप पर ये सोच कर गुस्सा आया कि मैं ऐसी बात कैसे बोल गया। मुझे बहुत शर्म आई। मैंने नज़र उठा कर भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपने पलंग पर बैठते पाया। उनसे कुछ कहने की हिम्मत न हुई मुझमें इस लिए चुपचाप उनके कमरे से बाहर निकल आया।
अपने कमरे में आ कर मैं पलंग पर लेट गया और भाभी से कही बात के बारे में सोचने लगा। क्या सोचा होगा भाभी ने मेरे बारे में कितना निर्लज्ज लड़का हूं मैं। मेरी नज़र में भाभी का मुकाम बहुत ऊंचा था और मैं उनका बेहद सम्मान करता था। इस तरह की द्विअर्थी बातें मैंने उनसे कभी नहीं की थीं। जाने क्यों मेरा मन एकाएक आत्मग्लानि से भर गया।
अगले दस पंद्रह दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच पिता जी शहर गए थे जहां पर उन्होंने अपने किसी जान पहचान वाले से मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि वो अपने भतीजों को यानि विभोर और अजीत को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं। पिता जी की इस बात से उस व्यक्ति ने पिता जी को बताया कि इसमें कोई समस्या की बात नहीं है, बस कुछ कागज़ी कार्यवाही करनी पड़ेगी।
उस व्यक्ति के दिशा निर्देश पर पिता जी सारी कागज़ी कार्यवाही संपन्न करने के काम पर लग गए। ऐसे कामों में वक्त लगना था किंतु पिता जी के लिए कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उनकी पहुंच काफी ऊपर तक थी इस लिए कम समय में ही सारा काम हो गया। हवेली में अब विभोर और अजीत की विदेश भेजने की तैयारी होने लगी। विभोर और अजीत का विदेश जाने का मन तो नहीं था लेकिन चाची के समझाने पर आख़िर वो दोनों मान ही गए। मैंने भी दोनों को आश्वस्त किया कि उन्हें यहां किसी की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। उनका काम सिर्फ इतना है कि वो दोनों हर चिंता से मुक्त हो कर विदेश में अच्छी तरह से अपनी शिक्षा ग्रहण करें।
आख़िर वो दिन आ ही गया जब विभोर और अजीत विदेश जाने लगे। दोनों अपने पिता को याद कर के बहुत रो रहे थे। उनके साथ चाची भी रो रहीं थी। हम सब भी अंदर से दुखी थे किंतु बात उनके उज्ज्वल भविष्य की थी इस लिए हम सभी को अपने आपको कठोर बनाना था। पिता जी जीप में दोनों को बैठा कर तथा अपने साथ कुछ हथियारबंद आदमियों को ले कर शहर के लिए रवाना हो गए। उस दिन हवेली में एकदम से सन्नाटा सा छा गया था। मां और भाभी मेनका चाची को सम्हालने में लगी हुईं थी। नए मुंशी किशोरी लाल की बीवी निर्मला भी वहीं थी, जबकि उसकी बेटी कजरी और कुसुम थोड़ी दूरी पर बैठी हुईं थी।
ऐसे ही दिन गुज़र गया और फिर शाम ढलते ढलते पिता जी शहर से वापस आ गए। उन्होंने सबको बताया कि दोनों बच्चे सकुशल हवाई जहाज में बैठ कर विदेश जा चुके हैं। विदेश में उनके रहने की तथा हर सुविधा संपन्न कराने की व्यवस्था पिता जी के उस परिचित को करनी थी। इसके लिए जितना भी खर्च लगने वाला था वो पिता जी ने दे दिया था उसे और साथ ही ये भी कह दिया था कि महीना पूरा होने से पहले ही वो आगे के खर्च के लिए पैसा भेजवा दिया करेंगे।
हमारे गांव से ही नहीं बल्कि आस पास गावों से भी कोई व्यक्ति अब तक उच्च शिक्षा के लिए विदेश नहीं गया था। ये हमारे लिए बड़े ही गर्व वाली बात थी। पिता जी को इस बात से बड़ा संतोष हुआ था कि उनके मरहूम छोटे भाई के दोनों बच्चों का भविष्य अब बेहतर बन जाएगा।
अगली सुबह नाश्ता करने के बाद पिता जी और मुंशी किशोरी लाल बैठक कक्ष में चले गए जबकि मैं खेतों की तरफ जाने की तैयारी करने लगा। इतने दिनों में मैंने महसूस किया था कि किशोरी लाल की बेटी कजरी कुछ अलग ही तरह से मुझसे बर्ताव करने लगी थी। मैं जब भी अपने कमरे में अकेले होता था तो वो किसी न किसी बहाने मेरे कमरे में आ धमकती थी। उसके बाद उसकी द्विअर्थी बातें शुरू हो जाती थीं जिसके चलते मैं असहज हो जाता था। अगर बात अच्छा इंसान बनने की न होती तो वो अब से पहले ही मेरे पलंग पर मेरे लंड की सवारी कर चुकी होती किंतु अब बात अलग थी। मैंने महसूस किया था कि पिछले कुछ दिनों से उसकी हिम्मत कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी और मुझे डर था कि उसे अपनी इस हिम्मत के लिए मेरे द्वारा कोई बुरा ख़ामियाजा न भुगतना पड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो हवेली में एक बड़ा हंगामा हो जाना तय था।
मैं तैयार हो कर अपने कमरे से निकला और भाभी के कमरे की तरफ बढ़ चला। पिछले दिन मैंने भाभी से कहा था कि वो मेरे साथ खेतों पर चलेंगी और उन्हें मेरे साथ चलना ही पड़ेगा। काफी समय से वो बहाने बना रहीं थी। असल में भाभी को अपने साथ ले जाने के पीछे एक खास वजह भी थी।
बहरहाल मैं जैसे ही भाभी के कमरे की तरफ मुड़ने वाले गलियारे के पास पहुंचा तो देखा भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर रहीं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो हल्के से मुस्कुराईं। सफ़ेद साड़ी में वो अलग ही नज़र आती थीं जिसके चलते मेरे अंदर एक टीस सी उभर जाया करती थी।
"आख़िर अपनी बात मनवा ही ली तुमने मुझसे।" भाभी ने दरवाज़ा बंद कर के मेरी तरफ आते हुए कहा____"अगर पिता जी ने नाराज़गी ज़ाहिर की तो तुम्हारे साथ साथ मेरी भी ख़ैर नहीं होगी।"
"अरे! कोई कुछ नहीं कहेगा।" मैंने कहा____"मां तो कब से आपको मेरे साथ खेत घूमने जाने के लिए बोल रहीं थी लेकिन आप ही नखरे दिखा रहीं थी।"
"अच्छा बच्चू।" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"मैं नखरे दिखा रही थी सबको?"
"और नहीं तो क्या?" मैंने हल्के से हाथ झटकते हुए कहा____"इतने नखरे तो रूपा या अनुराधा ने भी कभी मुझे नहीं दिखाए जितना आप दिखाती हैं।"
"उन्होंने इस लिए नहीं दिखाया क्योंकि वो बेचारी तुमसे डरती हैं।" भाभी ने कहा____"जबकि मैं रत्ती भर भी नहीं डरती तुमसे।"
"हां ये भी सही कहा आपने।" मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया____"और मैं चाहता भी नहीं हूं कि आप मुझसे डरें, बल्कि मैं तो ये चाहता हूं कि मेरी प्यारी भाभी हमेशा मेरी टांगें खींचें ताकि उन्हें खुशी मिले।"
"बहुत बातें बनाने लगे हो आज कल।" भाभी ने मुझे घूर कर देखा____"मां जी से शिकायत करनी पड़ेगी तुम्हारी।"
"अरे! मां को तकलीफ़ क्यों देंगी आप?" मैंने चौंक कर कहा____"अगर मुझसे कोई ग़लती हो जाए तो आप खुद मुझे डांट सकती हैं और हां पीट भी सकती हैं मुझे।"
"अच्छा सच में??" भाभी ने सीढ़ियों की तरफ बढ़ने से पहले मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मैंने कहा____"हां सच में। आप मेरी भाभी हैं, मुझसे बड़ी हैं। इस लिए आपको पूरा हक़ है मुझे डांटने और पीटने का।"
"फिर तो ठीक है।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब जब मेरी दोनों देवरानियां आ जाएंगी तो उनके सामने ही तुम्हें डांटा करूंगी और तुम्हारी पिटाई भी किया करूंगी। बहुत मज़ा आएगा तब।"
"अरे! ये क्या कह रही हैं आप?" मैं उनकी बात से बुरी तरह चौंका____"मतलब आप उनके सामने मेरी इज्ज़त का कचरा करेंगी? ये तो ग़लत बात है भाभी। अपने भोले भाले और मासूम से देवर के साथ इतना बड़ा अत्याचार करेंगी आप?"
"तुम भोले भाले और मासूम?" भाभी जो आधी सीढियां उतर चुकी थीं मेरी बात सुनते ही एकदम पलट कर बोलीं____"कुछ तो शर्म करो। ये तो वैसी ही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली।"
मैं भाभी की इस बात से अनायास ही मुस्कुरा उठा। इस वक्त भाभी से ऐसी बातें करने में जाने क्यों मुझे मज़ा आ रहा था। बहरहाल हम नीचे आ चुके थे इस लिए मैंने फिर कुछ नहीं कहा। आंगन से होते हुए हम दोनों जैसे ही दूसरी तरफ के बरामदे में पहुंचे तो मां और चाची ने हमें देखा।
"मां, मैं भाभी को खेतों पर घुमाने ले जा रहा हूं।" मैंने मां से कहा_____"आपको इनसे कोई काम तो नहीं है ना?"
"अरे! मुझे इससे कोई काम नहीं है।" मां ने झट से कहा____"तू ले जा इसे। मैं तो कब से कह रही हूं इसे कि वैभव के साथ घूम आया कर लेकिन ये मेरी सुने तब न।"
"आज इन्हें सुनना पड़ा मां।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैंने बहुत बड़ा काम किया हो____"आख़िर मेरी बात टालने का साहस कौन कर सकता है यहां?"
"ज़्यादा बोलेगा तो टांगें तोड़ दूंगी तेरी।" मां ने आंख दिखाते हुए मुझसे कहा____"और हां, मेरी बेटी को अच्छे से खेत घुमाना और सम्हाल कर ले जाना।" कहने के साथ ही मां भाभी से मुखातिब हुईं____"अगर ये तुझे परेशान करे तो आ कर मुझसे बताना। मैं अच्छे से इसकी ख़बर लूंगी।"
मां की बात सुन कर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। मेनका चाची, कुसुम, निर्मला काकी और उसकी बेटी कजरी भी मुस्कुरा पड़ी।
"आप तो ऐसे बोल रहीं हैं जैसे मैं अपनी भाभी का जन्मजात शत्रु हूं जो इन्हें किसी तरह की तकलीफ़ पहुंचा दूंगा।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"ये तो हद हो गई। मेरे जैसे मासूम लड़के के साथ इतना बड़ा अन्याय?"
मेरी बात सुनते ही कुसुम और कजरी खिलखिला कर हंसने लगीं। मेनका चाची और निर्मला काकी भी मुस्कुरा उठीं जबकि मां ने मुझे घूर कर देखा। इससे पहले कि मां मुझे कुछ कहतीं मैंने फ़ौरन ही भाभी को चलने का इशारा किया और खुद तेज़ी से आगे बढ़ गया।
बैठक के सामने से जैसे ही मैं गुज़रा तो मेरी नज़र बैठक कक्ष में बैठे गौरी शंकर पर पड़ गई। इतने दिनों बाद उसे यहां देख मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि ये यहां किस लिए आया होगा? ख़ैर मैंने इस बात पर ज़्यादा सोचना मुनासिब नहीं समझा और बाहर निकल गया।
मैं जीप ले कर जैसे ही मुख्य द्वार के सामने आया तो भाभी सीढ़ियों से उतरते हुए जीप के पास आ गईं और फिर मेरे बगल वाली सीट पर चढ़ कर बैठ गईं। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे। वो कुछ असहज सी प्रतीत हो रहीं थी। सफेद साड़ी से उन्होंने हल्का सा अपना चेहरा ढंक रखा था। ज़ाहिर है वो बैठक के सामने से गुज़र कर आईं थी जहां पर पिता जी और बाकी लोग बैठे हुए थे। उनके सामने वो अपना चेहरा उजागर नहीं कर सकतीं थी। ख़ैर उनके बैठते ही मैंने जीप को आगे बढ़ा दिया। महिंद्रा कमांडर वाली जीप जल्दी ही हाथी दरवाज़े को पार कर गई। कच्ची सड़क पर मैं आराम से ही जीप को दौड़ा रहा था ताकि भाभी को ज़्यादा तकलीफ़ ना हो। भाभी चुपचाप गांव का नज़ारा देखने लगीं थी।
✮✮✮✮
"अरे! ये हम किस तरफ जा रहे हैं?" गांव से दूर आने के बाद जैसे ही मैंने जीप को पगडंडी वाले रास्ते की तरफ मोड़ा तो भाभी ने सहसा चौंक कर मुझसे पूछा।
"हम सही रास्ते पर ही जा रहे हैं भाभी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा____"वैसे आपकी जानकारी के लिए सिर्फ इतना ही बता सकता हूं कि मैं आपको आपके काम से ही कहीं ले जा रहा हूं।"
"क...क्या मतलब??" भाभी ने मेरी बात सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखा____"तुम मुझे मेरे ही काम से कहीं ले जा रहे हो? मेरा भला कहीं पर कौन सा काम है?"
"ज़्यादा मत सोचिए।" मैंने मन ही मन हंसते हुए कहा____"जल्दी ही आपको पता चल जाएगा।"
भाभी मेरी बात सुन कर अपलक मेरी तरफ देखने लगीं और साथ ही सोचने भी लगीं कि भला उनके ऐसे कौन से काम से मैं उन्हें ले जा रहा हूं। मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा तो पाया कि वो कुछ सोच रही हैं।
"ओह! अच्छा अब समझी मैं।" अचानक ही भाभी बड़े उत्साहित भाव से बोल पड़ीं____"मैं समझ गई कि तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो लेकिन इसमें भला मेरा काम कहां हुआ? इसमें तो तुम्हारा अपना ही निजी काम है जिसे तुम्हारा स्वार्थ भी कहा जा सकता है।"
"अरे! ये आप क्या कह रही हैं?" मैंने हड़बड़ा कर उनकी तरफ देखा____"इसमें मेरा भला कौन सा निजी स्वार्थ है भाभी? आप ही ने तो कहा था कि मैं आपको उससे मिलवाऊँ।"
"अब बातें न बनाओ तुम।" भाभी ने सहसा घूरते हुए कहा____"इतनी भी बुद्धू नहीं हूं, सब समझती हूं मैं। मुझे तुमने माध्यम बनाया है जबकि सच ये है कि तुम खुद ही अपनी उस माशूका से मिलने के लिए मरे जा रहे थे।"
"नहीं भाभी ये सच नहीं है।" मैं एकदम से झेंपते हुए बोल पड़ा____"असल में आपको उससे मिलवाने का ख़याल अभी कुछ देर पहले ही मेरे ज़हन में आया था, वरना मैं तो आपको हमारे खेतों पर ही लिए जा रहा था।"
"अच्छा, क्या सच में?" भाभी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"पर तुम्हारे चेहरे के भाव तो यही बता रहे हैं कि तुम झूठ बोल रहे हो।"
"अब मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं?" मुझसे कुछ कहते ना बन पड़ा था। सच ही तो कह रहीं थी वो। मैं झूठ बोल कर अब बहाना ही तो बना रहा था। फिर भी खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हुए कहा____"मेरा यकीन कीजिए भाभी। मैं सच में.....!"
"रहने दो।" भाभी ने बीच में ही मेरी बात काट दी____"अपने झूठ को छुपाने के लिए तुम चाहे जितने भी बहाने बना लो पर मैं यकीन करने वाली नहीं हूं। वैसे अगर तुम सच कबूल कर लोगे तो भला कौन सा गुनाह हो जाएगा तुमसे?"
भाभी की इस बात से मैं कुछ ना बोल सका। मेरे मन में ख़याल उभरा कि बात तो बिल्कुल ठीक ही है। मैं अगर सच कबूल कर लूंगा तो भला क्या हो जाएगा?
"अच्छा ठीक है।" फिर मैंने जैसे हथियार डालते हुए कहा____"मैं कबूल करता हूं कि मैं जान बूझ कर आपको उससे मिलवाने लिए जा रहा हूं। अब ठीक है ना?"
"आय हाय देखो तो।" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा____"देखो तो इन आशिक़ को। अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए कैसे बहाने बना रहे हैं।"
"ये ग़लत बात है भाभी।" मैंने एकदम से झेंपते हुए कहा____"आप इस तरह से मेरी टांग नहीं खींच सकती।"
"क्यों नहीं खींच सकती भला?" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा_____"भूलो मत, तुमने ही कहा था कि मैं तुम्हारी टांग भी खींच सकती हूं और तुम्हारी पिटाई भी कर सकती हूं। अब क्या तुम अपनी ही कही बात से मुकर जाओगे?"
"नहीं भाभी।" मैंने कहा____"मैं बिल्कुल भी मुकरने वाला नहीं हूं। ठीक है, आपको मेरी टांग ही खींचनी है तो जितना मर्ज़ी खींच लीजिए। बस आप इसी तरह हमेशा खुशी से मुस्कुराती रहें।"
मेरी बात सुनते ही भाभी के चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। वो मेरी तरफ अपलक देखने लगीं। उनकी आंखों में मेरे लिए अथाह स्नेह दिखाई देने लगा था।
"अच्छा अब ये तो बताइए कि वहां उससे मिलने पर उसके साथ क्या बात करने वाली हैं आप?" मैंने झट से माहौल को पहले जैसा बनाने की गरज से पूछा____"क्या उसके सामने भी आप मेरी टांग खींचेंगी?"
"अब ये तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है वैभव।" भाभी ने इस बार सामान्य भाव से कहा____"मैं तो बस उस लड़की को देखना चाहती हूं जिसने तुम्हारे जैसे इंसान को बदल दिया है। मैं उसके सामने जा कर महसूस करना चाहती हूं कि उसमें ऐसी क्या ख़ास बात है?"
"क्या आपको लगता है कि एक मामूली से किसान की बेटी में कोई ख़ास बात होगी?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा।
"बिल्कुल होगी।" भाभी ने झट से कहा____"जिसने ठाकुर वैभव सिंह जैसे महान चरित्र वाले लड़के की फितरत बदल दी उसमें ज़रूर ख़ास बात होगी। वो लड़की मामूली हो ही नहीं सकती जिसे वैभव जैसा व्यक्ति प्रेम करने लगा हो।"
मुझे समझ न आया कि भाभी की इन बातों पर क्या प्रतिक्रिया दूं अथवा क्या कहूं। जीप कच्ची पगडंडी में बढ़ी चली जा रही थी। मुरारी काका का घर नज़र आने लगा था। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल एकाएक ही तेज़ी से धड़कने लगा था। ज़हन में सवाल उभरने लगे कि अनुराधा से मिलने के बाद भाभी क्या सोचेंगी अथवा वो उससे क्या बातें करेंगी? क्या अनुराधा मेरे साथ साथ भाभी को भी देख कर सहज महसूस करेगी?
कुछ ही देर में हम मुरारी काका के घर के सामने आ गए। मैंने जीप रोक कर उसका इंजिन बंद कर दिया। मैंने देखा घर का दरवाज़ा अंदर से बंद था। उधर भाभी अपनी तरफ के दरवाज़े से नीचे उतरीं तो उन्हें उतरता देख मैं भी धड़कते दिल से नीचे उतर आया।
"क्या यही उसका घर है?" जीप से उतरने के बाद भाभी ने बंद दरवाज़े की तरफ देखते हुए मुझसे पूछा तो मैंने हां में सिर हिला दिया। मेरे इशारा करने पर भाभी आगे बढ़ चलीं तो मैं भी उनके पीछे दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। भाभी नज़र घुमा घुमा कर चारो तरफ देख रहीं थी।
अभी हम दरवाज़े के थोड़ा ही क़रीब पहुंचे थे कि तभी घर का दरवाज़ा एक झटके से खुला और खुले दरवाज़े के बीचो बीच जो शख्सियत नज़र आई उसे देख कर जैसे मेरी धड़कनें ही थम गईं। भाभी की नज़र भी उस पर पड़ चुकी थी। उन्होंने फ़ौरन ही पलट कर मेरी तरफ देखा और आंखों के इशारे से ही मुझसे पूछा कि क्या यही है वो? भाभी के इस तरह पूछने पर मैंने अपने धाड़ धाड़ बजते दिल के साथ पलकें झपका कर हां में जवाब दे दिया। उधर दरवाजे पर खड़ी अनुराधा की नज़र जैसे ही मुझ पर और मेरे साथ साथ भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव उभर आए।
✮✮✮✮
"ये क्या कह रहे हो तुम?" बैठक में गौरी शंकर की बातें सुनते ही दादा ठाकुर ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि तुम जो कह रहे हो वो सच भी हो सकता है।"
"मैं तो इस बात से हैरान हूं ठाकुर साहब कि अपने बेटे के बारे में इतनी बड़ी बात आपको पता कैसे नहीं है?" गौरी शंकर ने कहा____"या फिर शायद आप अंजान बनने का दिखावा कर रहे हैं।"
"हमें इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो थी गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन हमें ये नहीं पता था कि हमारा बेटा मुरारी की बेटी से प्रेम भी करता है। हमारे लिए तो ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि हमारा बेटा किसी लड़की से प्रेम भी कर सकता है। यकीन नहीं होता।"
"अगर आपको इस बात का यकीन नहीं हो रहा तो आप खुद वैभव से पूछ लीजिएगा।" गौरी शंकर ने दृढ़ता से कहा____"वैसे इतना तो आप भी समझते हैं कि आपका बेटा वैभव अब पहले जैसा नहीं रहा है। उसमें आए परिवर्तन को देख कर शुरू शुरू में हम सबके साथ साथ आप खुद भी तो हैरान हुए होंगे? उसके बाद से अब तक वो जो कुछ भी करता आया है वो भी हैरान कर देने वाला ही तो रहा है। अगर अब तक के उसके सारे कार्य सच हैं तो उसका किसी मुरारी की लड़की प्रेम करना भी सच ही है।"
गौरी शंकर जाने क्या क्या बोलता चला जा रहा था जबकि इधर दादा ठाकुर एकाएक ही जाने किस सोच में पड़ गए थे?
"क्या सोचने लगे ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने जैसे उन्हें वर्तमान में लाते हुए कहा____"अगर वाकई में आपका बेटा किसी लड़की से प्रेम करता है तो आप भी इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं कि ऐसे में मेरी भतीजी के साथ उसका वैवाहिक जीवन कुछ ठीक नहीं होगा।"
"क्या मतलब है तुम्हारा?" दादा ठाकुर ने एकदम से चौंकते हुए कहा____"आख़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"
"यही कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं।" गौरी शंकर ने कहा____"अगर वैभव मुरारी की लड़की के साथ ही विवाह कर के खुश रह सकता है तो उसका विवाह उस लड़की से ही कर दीजिए। आपने मेरी भतीजी रूपा के बारे में इतना सोचा यही हमारे लिए बड़ी बात है किंतु ऐसे विवाह का क्या लाभ जिसमें मेरी भतीजी को खुशियां ही न मिल सकें।"
"नहीं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने स्पष्ट भाव से कहा____"हमने तुम्हें वचन दिया है कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली में बहू बन कर आएगी तो समझो वो आएगी। हमारे बेटे के साथ उसका विवाह ज़रूर होगा। रही बात उस लड़की से उसके प्रेम की तो इसके बारे में भी हम जल्द ही कोई फ़ैसला करेंगे।"
"छोटा मुंह बड़ी बात किंतु आपको मेरी सलाह है ठाकुर साहब कि ऐसा कोई भी फ़ैसला नहीं कीजिएगा जिससे आपके बेटे को धक्का लग जाए और वो अपने सही रास्ते पर चलते हुए अचानक पलट जाए।" गौरी शंकर ने कहा_____"ऊपर वाले की कृपा से उसमें इतना बढ़िया सुधार आया है तो उसे अपने हिसाब से चलने दीजिए। अगर आपने दो प्रेम करने वालों को जुदा करने का सोचा तो मुझे यकीन है कि इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।"
"हम ये सब समझते हैं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गभीरता से कहा____"किंतु ऐसा भी तो नहीं हो सकता कि तुम्हें दिया हुआ अपना वचन हम तोड़ दें। ख़ैर, तुम फ़िक्र मत करो। इस बात का यकीन करो कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली की बहू ज़रूर बनेगी और उसका वैवाहिक जीवन भी खुशी से गुज़रेगा।"
"पर ये भला कैसे संभव है ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने बेयकीनी से कहा____"माना कि आपके कहने पर अथवा मजबूर करने पर वैभव मेरी भतीजी से विवाह कर लेगा लेकिन प्रेम तो वो किसी और से ही करता है ना? ऐसे में वो मेरी भतीजी को वैसा प्रेम और वैसा हक़ कैसे देगा जो उसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी भतीजी को देना चाहिए?"
"हमने कहा न गौरी शंकर कि तुम इस बारे में ज़्यादा मत सोचो।" दादा ठाकुर ने ज़ोर देते हुए कहा_____"हम पर यकीन रखो। हम ऐसा हर्गिज़ नहीं होने देंगे जैसे कि तुम्हें फ़िक्र है।"
गौरी शंकर इस बारे में अभी कहना तो और भी बहुत कुछ चाहता था लेकिन फिर ये सोच कर उसने अपना इरादा बदल लिया कि ज़्यादा बहसबाजी करने से कहीं दादा ठाकुर उससे नाराज़ ना हो जाएं। वैसे भी अब वो दादा ठाकुर से किसी भी तरह का मन मुटाव नहीं होने देना चाहता था।
उसके बाद गौरी शंकर ने अपने उस मुद्दे की बात शुरू कर दी जो उसकी भतीजियों के शादी वाले रिश्ते से संबंधित थी। उसने दादा ठाकुर को अपनी सारी परेशानी बता दी और फिर उनसे आग्रह किया कि इस मामले में दादा ठाकुर उसकी सहायता करें।
"फ़िक्र मत करो गौरी शंकर।" सारी बातें सुनने के बाद दादा ठाकुर ने कहा____"हमने पहले भी तुमसे कहा था कि तुम्हारी बेटियों को हम अपनी बेटियां ही मानते हैं इस लिए उनकी ज़िम्मेदारी भी अब हमारी ही है। तुम अपनी दोनों भतीजियों के विवाह के बारे में किसी प्रकार की चिंता मत करो। जब उचित समय आएगा तो हम खुद तुम्हारे साथ चल कर इस रिश्ते की रजामंदी करवाएंगे।"
"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से अपने हाथ जोड़ते हुए कहा____"आपके ऐसा कहने से सच में अब मैं चिंता से मुक्त हो गया हूं।"
थोड़ी देर और इसी संबंध में गौरी शंकर की दादा ठाकुर से बातें हुईं उसके बाद वो दादा ठाकुर को प्रणाम कर के अपने घर चला गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर एक गहरी सोच में डूब गए। उनके ज़हन में जाने कैसे कैसे विचार उभरने लगे थे।
"कौन आया है अनू?" अनुराधा स्तब्ध सी खड़ी हमें देखे ही जा रही थी कि तभी अंदर से सरोज काकी की आवाज़ से वो चौंकी और हड़बड़ा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई।
इधर मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या कहूं अथवा क्या करूं? उधर भाभी ख़ामोशी से एकटक अनुराधा को ही देखे जा रहीं थी। दूसरी तरफ अनुराधा अजीब सी हालत में कभी मेरी तरफ देखती तो कभी भाभी की तरफ। उसके चेहरे पर अजीब सी कसमकस तारी हो गई थी और साथ ही लाज की सुर्खी भी दिखने लगी थी। बार बार वो लाज के चलते अपनी नज़रें नीचे कर लेती थी। तभी उसके पीछे सरोज काकी आती हुई दिखी। शायद अनुराधा से कोई जवाब न पा कर वो खुद ही ये देखने के लिए दरवाज़े के पास आ गई थी कि कौन आया है?
"अरे! वैभव बेटा तुम..??" काकी की आवाज़ से मेरी और भाभी की तंद्रा टूटी तो हम दोनों ही चौंक पड़े। उधर काकी की नज़र जब भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर एकदम से हैरत के भाव उभर आए। फिर एकदम से सम्हल कर तथा बड़े ही आदर सम्मान के साथ बोली____"अरे! बहू रानी आप यहां? मुझ गरीब की कुटिया के द्वार पर आप आईं ये तो मेरे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है। आइए आइए...अंदर आइए बहू रानी, आप इस तरह बाहर क्यों खड़ी हैं? अनू...ओ अनू....अरे कहां खोई है तू? द्वार पर बहू रानी आईं हैं और तूने इन्हें अंदर आने तक को नहीं कहा? हे भगवान! कितनी बेसहूर लड़की है ये...जाने कब अकल आएगी इसे।"
सरोज मारे हड़बड़ाहट के जाने क्या क्या बोले जा रही थी जबकि उसकी इस हड़बड़ाहट और बौखलाहट पर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। उधर अनुराधा ने अपनी मां की डांट को सुन कर लाज और घबराहट के चलते अपना सिर झुका लिया था। अपने दोनों हाथों को आपस में मसलने लगी थी वो। इधर मेरी भी हालत कुछ ठीक नहीं थी। मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बज रहीं थी और ज़हन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभर रहे थे।
"अरे! क्यों डांट रही हैं आप इस मासूम को?" सरोज की बातें सुन कर भाभी ने मुस्कुराते हुए किंतु बड़े प्रेम भाव से कहा____"इसमें इसकी कोई ग़लती नहीं है। हमें यहां देख कर शायद इसे कुछ समझ ही नहीं आया होगा कि क्या करे? मैं इसकी हालत को बखूबी समझती हूं।"
कहने के साथ ही भाभी ने दरवाजे के अंदर क़दम रखा तो उनके पीछे मैं भी धड़कते दिल से अंदर की तरफ चल पड़ा। सरोज को कदाचित स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी कि मेरे साथ हवेली की बहू उसके घर में यूं अचानक आ टपकेंगी। यही वजह थी कि उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो उनका किस तरह से स्वागत करे? मैंने देखा वो कुछ ज़्यादा ही हड़बड़ाई और बौखलाई हुई नज़र आ रही थी। बरामदे में रखी चारपाई को जल्दी ही उसने आंगन में बिछा दिया और फिर भागते हुए वो अंदर कमरे में गई और फ़ौरन ही एक गद्दा ले आई जिसे उसने बड़े सलीके से चारपाई पर बिछा दिया। अनुराधा बरामदे के अंदर एक कोने में जा कर चुपचाप खड़ी हो गई थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो जिसके बोझ तले दबी वो एक कोने में जा दुबकी थी।
"अरे! इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है मां जी।" भाभी ने सरोज को मां जी कहा तो वो एकदम से उछल पड़ी, इधर मैंने भी चौंक कर भाभी की तरफ देखा। जबकि भाभी ने सामान्य भाव से आगे कहा____"मैं कोई मेहमान नहीं हूं जिसके स्वागत के लिए आपको ये सब करना चाहिए। अरे! अनू की तरह मैं भी आपकी बेटी ही हूं तभी तो आपको मां जी कहा है। मेरे मां जी कहने पर आपको बुरा तो नहीं लगा न?"
"य...ये आप क्या कह रही हैं बहू रानी?" सरोज चकित भाव से बड़ी मुश्किल से बोल पाई____"मुझ जैसी एक मामूली औरत को आप मां कह रही हैं। हे भगवान! ये कैसी लीला है तेरी?"
"आप खुद को मामूली क्यों कह रही हैं मां जी?" भाभी ने आगे बढ़ कर सरोज के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े आदर भाव से कहा____"इस धरती पर कोई भी व्यक्ति मामूली नहीं होता। ईश्वर ने सबको समान रूप से बना कर इस धरती पर भेजा है।"
"पर हम तो मामूली ग़रीब लोग ही हैं न बहू रानी?" सरोज ने अपनी हालत को किसी तरह सम्हालते हुए कहा____"आपके सामने हमारी क्या औकात है भला?"
"जहां प्रेम होता है वहां औकात के कोई मायने नहीं होते मां जी।" भाभी ने कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि सबसे बड़ी औकात प्रेम की ही होती है। उसकी औकात के सामने बड़े से बड़े औकात वाले भी घुटने टेक देते हैं। ख़ैर मेरे देवर ने आप लोगों के बारे में मुझे सब कुछ बताया है और मैं इस बात से बेहद खुश हूं कि ऊपर वाले ने मेरे देवर को इस घर तक पहुंचाया। इस धरती में अगर ये घर न होता और इस घर में रहने वाले लोग न होते तो मेरे देवर का चरित्र कभी अच्छे चरित्र में न बदलता। ये सब प्रेम के चलते ही संभव हुआ है मां जी। जिस घर में प्रेम बसता हो मेरी नज़र में वही सबसे बड़ा औकात वाला है।"
सरोज को कुछ समझ न आया कि वो भाभी की बातों का क्या जवाब दे? उनकी बातों से उसे अब ये पता चल चुका था कि उन्हें मेरे और उसकी बेटी के संबंधों का पता चल चुका है। बरामदे में खड़ी अनुराधा भी भाभी की बातों को सुन रही थी। उसे देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी सांसें उसके हलक में आ कर अटकी हुई हैं। इधर मेरे अंदर भी अजीब सा झंझावात चालू था।
"चिंता मत कीजिए मां जी।" भाभी ने फिर से सरोज काकी के कंधे को हल्के से दबाते हुए कहा____"और मुझे यहां देख कर आपको घबराने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने आपको मां जी इसी लिए कहा है क्योंकि अब आप मेरी मां ही हैं। वैभव ने जब मुझे अपने और अनुराधा के प्रेम संबंध के बारे में बताया तो पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन फिर ये सोच कर अत्यंत खुशी हुई कि मेरे देवर का प्रेम के चलते हृदय परिवर्तन हो गया जोकि मेरी नज़र में असंभव था। मैं उस लड़की को अपनी आंखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठी थी जिसने वैभव के चरित्र को बदल कर उसके अंदर प्रेम जगा दिया और इतना ही नहीं उसे अच्छा इंसान बनने पर भी मजबूर कर दिया। आज यहां मैं उसी लड़की को देखने आई हूं।"
कहने के साथ ही भाभी ने गर्दन घुमा कर बरामदे में चुपचाप खड़ी अनुराधा की तरफ देखा जिससे वो एकदम से सिमट गई और सिर झुका लिया। मेरी धड़कनें एक बार फिर से तेज़ हो गईं थी। उधर सरोज काकी को जैसे अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो जो देख सुन रही थी वो सच है या नहीं?
"क्या मैं अपनी छोटी बहन से अकेले में मिल सकती हूं मां जी?" भाभी ने सरोज से मुखातिब हो कर पूछा।
"हां...हां क्यों नहीं बहू रानी।" सरोज ने हड़बड़ा कर जल्दी से कहा।
"मैंने आपको मां जी कहा है।" भाभी ने कहा____"तो अब मैं आपकी बेटी हो गई हूं और बेटी को आप नहीं कहा जाता। अनुराधा क्योंकि उमर में मुझसे छोटी है इस लिए अब से वो आपकी छोटी बेटी है और मैं आपकी बड़ी बेटी। ठीक है ना?"
भाभी ने इतने प्यार और स्नेह से कहा कि सरोज काकी की आंखों से आंसू छलक पड़े। कुछ कहने की उसने कोशिश तो की लेकिन अल्फाज़ उसके होठों से बाहर न निकल सके। भाभी ने जब ये देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े स्नेह के साथ अपने हाथों से उसके आंसू पोंछे।
"क्या बड़ी बेटी के मिलने की खुशी में आपकी आंखों से ये आंसू निकले हैं?" फिर उन्होंने सवालिया निगाहों से देखते हुए सरोज से पूछा तो सरोज ने अपने आंचल से अपने आंसू पोंछते हुए जल्दी से हां में सिर हिलाया। उसके होठ कांप रहे थे।
"फिर तो अच्छी बात है मां जी।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब मैं चाहती हूं कि आप अपनी इस बड़ी बेटी को एक बार अपने गले से भी लगा लें। बड़ी बेटी को भी तो अपनी मां से प्यार और स्नेह मिलना चाहिए, है ना?"
सरोज ने हां में सिर हिलाते हुए झट से भाभी को अपने गले से लगा लिया। एक बार फिर से उसकी आंखों से आंसू बह चले। इधर मैं ये सोच कर आश्चर्यचकित हो गया था कि भाभी ने कितनी आसानी से या फिर ये कहें की कितनी समझदारी से सरोज से अपना एक नया संबंध बना लिया था। मैं चकित तो था ही किंतु उनकी समझदारी और उनके प्रेम भाव को देख कर मंत्रमुग्ध भी हो गया था। मुझे एकदम से अपनी भाभी पर बड़ा ही गर्व महसूस हुआ। एकाएक उनकी किस्मत का ख़याल आते ही मेरे अंदर एक टीस सी उभरी जिसके चलते मुझे उनके लिए बड़ा ही दुख महसूस हुआ।
उधर भाभी कुछ देर तक सरोज के गले लगी रहीं फिर अलग हो कर उन्होंने एक बार फिर से सरोज के आंसू पोंछे और कहा____"अपनी इस बड़ी बेटी से वादा कीजिए कि अब से आप रोएंगी नहीं।"
"हां अब नहीं रोऊंगी मैं।" सरोज जबरन मुस्कुराते हुए बोली____"ऊपर वाले ने एक पल में जिसे इतना प्रेम करने वाली बेटी दे दी हो वो रोएगी क्यों? बल्कि वो तो ये सोच कर खुशी से फूली नहीं समाएगी कि उसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गई है।"
"मुझे भी तो एक मां मिल गई है।" भाभी ने उसी स्नेह के साथ कहा____"अच्छा अब आप वैभव के पास बैठ कर इससे बातें कीजिए। मैं भी अब अपनी छोटी बहन से अकेले में ढेर सारी बातें करने जा रही हूं।"
सरोज ने सिर हिला कर सहमति दी, जिसके बाद भाभी पलट कर अनुराधा की तरफ बढ़ चलीं। उधर अनुराधा ने जैसे ही भाभी को अपनी तरफ आते देखा तो वो और भी ज़्यादा लाज से सिमट गई और साथ ही असहज सी हो गई। ज़ाहिर है उसके अंदर अजीब सी घबराहट भर गई थी। उसकी ये हालत देख कर मुझे मन ही मन हंसी तो आई ही किंतु उस पर प्यार भी बहुत आया। आज काफी समय बाद उसे देख रहा था और सच कहूं तो अब मेरा बहुत जी कर रहा था कि उससे ढेर सारी बातें करूं। पहले की तरह उसे ठकुराईन कह कर छेड़ूं और उसे प्यार से अपने गले लगाऊं लेकिन शायद अभी इसके लिए मुझे इंतज़ार करना ही लिखा था।
भाभी अनुराधा के पास पहुंच चुकी थीं और उसे बड़े ध्यान से देखने लगीं थीं। उनके इस तरह देखने से अनुराधा और भी ज़्यादा छुईमुई नज़र आने लगी। ये देख भाभी बरबस ही मुस्कुरा उठीं। फिर उन्होंने अनुराधा से कुछ कहा जिससे अनुराधा ने सिर उठा कर उन्हें देखा और फिर वो सिर हिला कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे भाभी भी चल पड़ीं। इधर मेरी धड़कनें अब ये सोच कर तेज़ हो गईं कि अनुराधा के साथ अकेले में जाने भाभी क्या बातें करेंगी?
"हाय राम!" अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी काकी की आवाज़ से चौंका। उधर उसने मेरी तरफ देखते हुए लेकिन बौखलाए हुए लहजे से कहा____"अनू को अकल न होने की बात कह रही थी मैं और यहां तो मुझमें ही धेले भर की अकल नहीं है।"
"क्या हुआ काकी?" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"ये क्या कह रही हो तुम?"
"सच ही तो कह रही हूं वैभव।" काकी ने एकाएक परेशान हो कर कहा____"मेरे घर में बहू रानी पहली बार आईं हैं और मैंने अभी तक उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। हे भगवान! क्या सोच रही होंगी वो मेरे बारे में? हाय राम! कितनी नासमझ हूं मैं। उन्होंने मुझे अपनी मां तक बना लिया और मैंने उन्हें एक ग्लास पानी तक का नहीं पूछा।"
सरोज काकी की आंखें पलक झपकते ही छलक पड़ीं। ये देख मैं मुस्कुरा उठा। यकीनन इस वक्त वो इस बात के चलते खुद को दोषी मान रही थी और साथ ही उसे बहुत बुरा भी महसूस हो रहा था किंतु मैं समझ सकता था कि ऐसी परिस्थिति में उसे ऐसी औपचारिकता का ख़याल ही नहीं आया था।
"फ़िक्र मत करो काकी।" मैंने उसे आश्वस्त करने के इरादे से कहा____"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है। वैसे भी मेरी भाभी इतनी अच्छी हैं कि वो इतनी मामूली सी बात के बारे में सोचती ही नहीं हैं।"
"वो सोचें या ना सोचें लेकिन मुझे तो सोचना चाहिए था ना वैभव?" सरोज काकी जैसे अपराध बोझ से दब सी गई थी इस लिए बोली____"मुझे तो अपना धर्म निभाना चाहिए था ना। ऊपर वाला मुझे माफ़ नहीं करेगा अब।"
"अरे! तुम बेकार में ही खुद को इतना कोस रही हो काकी।" मैंने कहा____"मैंने कहा न कि इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।"
"ये सब तुम मेरा दिल रखने के लिए कह रहे हो वैभव।" काकी ने कहा____"जबकि मेरी अंतरात्मा तो चीख चीख कर मुझसे कह रही है कि मैंने ठीक नहीं किया है। उन्होंने मुझे मां कहा है और मैंने भी उन्हें अपनी बड़ी बेटी मान लिया है। हे भगवान! मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इतने बड़े खानदान की बहू ने मुझ जैसी मामूली सी औरत को मां कहा है। ये सब मेरी बेटी के भाग्य से ही हुआ है। ये सब उसी के पूर्व जन्मों के अच्छे कर्मों के फल से हुआ है। मैं तो पापिन हूं। मैंने तो....मैंने तो तुम्हारे साथ...।"
कहने के साथ ही सरोज काकी झट से अपने मुख में हथेली रख कर फूट फूट कर रोने लगी। उसकी आख़िरी बात सुन कर मुझे एकदम से झटका लगा। ज़हन में वो यादें उभर आईं जो मैंने उसके साथ ग़लत कर्म कर के बना ली थीं। एकाएक ही इस बात के चलते मुझे बेहद आत्मग्लानि सी होने लगी। मैं उस वक्त को कोसने लगा जब मैंने सरोज के साथ उस तरह का ग़लत संबंध बनाया था। हालाकि इसमें सिर्फ मेरा ही बस कसूर नहीं था बल्कि सरोज का भी बराबर का दोष था किंतु आज के वक्त में उसकी वजह से हम दोनों ही उस ग़लत कर्म की वजह से खुद को कोस रहे थे और आत्मग्लानि में डूबे जा रहे थे। सरोज की बेटी से मैंने ब्याह की बात पक्की कर दी थी, उस नाते अब वो मेरी होने वाली सास थी जोकि यकीनन मां के समान ही होती है। ये ऐसी बात थी जो अब मेरे ज़मीर को भाले के जैसे चुभने लगी थी।
सरोज काकी फूट फूट कर रोए जा रही थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उसे शांत कराऊं? सच कहूं तो उसके समीप जाने की हिम्मत ही न हुई मुझमें। एकदम से मुझे ये वक्त बड़ा ही अजीयत से भरा लगने लगा था जिसके पलक झपकते ही गुज़र जाने की मैं अब बस दुआ ही कर सकता था। ख़ैर कुछ ही देर में सरोज का रोना धीरे धीरे बंद हो गया जिससे मैंने राहत की सांस ली।
"हमारे बीच अतीत में जो कुछ हुआ है।" फिर उसने बिना मेरी तरफ देखे बेहद ही गंभीर भाव से कहा____"मैं चाहती हूं कि हम दोनों ही उसे एक बुरा सपना या बुरा हादसा समझ कर भूल जाएं।"
"तुम्हें ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं है काकी।" मैंने भी संजीदा हो कर कहा____"मैं उस मनहूस घड़ी को खुद भी अपने ज़हन से निकाल देना चाहता हूं। वैसे सच कहूं तो मैं निकाल भी चुका हूं। मैं ऊपर वाले का शुक्र गुज़ार हूं कि उसने मुझे अनुराधा से मिलाया और मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम पैदा किया जिसके चलते मैं ग़लत कर्मों को त्याग कर अब एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़ा हूं। अब तो बस एक ही ख़्वाईश है कि अनुराधा हमेशा के लिए मेरी पत्नी बन कर मेरे जीवन में आ जाए और मैं उसके साथ एक खुशहाल जीवन गुज़ारने लगूं।"
"अपने साथ आज यहां बहू रानी को ला कर तुमने मुझे पूरी तरह से यकीन दिला दिया है कि तुमने मुझे जो वचन दिया है उसमें कोई फ़रेब नहीं है।" काकी ने कहा____"यकीन मानो उस दिन तुम्हारे वचन देने पर भी मुझे पूरी तरह तुम पर भरोसा नहीं हुआ था, लेकिन अब हो चुका है। अब मुझे पूरी तरह से इस बात का भरोसा हो गया है कि तुम मेरी बेटी के साथ किसी भी तरह का छल नहीं करना चाहते हो बल्कि सच में उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते हो।"
"मैंने भाभी को अनुराधा के साथ अपने प्रेम संबंध के बारे सब कुछ बता दिया है।" मैंने सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"और उनसे ये भी कह दिया है कि जिस लड़की की वजह से मेरे अंदर बदलाव आया है और जिससे मैं प्रेम करने लगा हूं उसी से ब्याह भी करूंगा। मेरी ये बात सुन कर भाभी ने हमारे रिश्ते को मंजूरी दे दी है। वो अनुराधा से मिलने के लिए व्याकुल थीं इस लिए मैं आज उन्हें यहां लाया हूं।"
"ये बहुत अच्छा किया तुमने बेटा।" काकी ने अधीरता से कहा____"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे इस घर में इतने बड़े खानदान की बहू अपने क़दम रखने खुद आएगी। अनू के बापू के जाने के बाद आज मैं पहली बार इतना खुश हुई हूं। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव कि तुम बहू रानी को मेरे घर में ला कर मेरे साथ साथ मेरे इस घर को भी धन्य कर दिया है।"
"ये सब तो ठीक है काकी।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन एक ऐसी बात भी है जिसके बारे में मैं तुम्हें बता देना ज़रूरी समझता हूं।"
"क...कैसी बात बेटा?" काकी ने असमंजस जैसे भाव से मेरी तरफ देखा।
"वो बात बहुत ही गंभीर है काकी।" मैंने धड़कते दिल से सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"हो सकता है कि उस बात को सुन कर तुम परेशान हो जाओ लेकिन पहले मेरी बात ध्यान से सुन लो।"
सरोज काकी मेरी ये बात सुन कर अजीब भाव से मेरी तरफ देखती रह गई। चेहरे पर कई तरह के भाव नाचते नज़र आए उसके। मैंने जब उसके चेहरे पर बात को सुनने की उत्सुकता को देखा तो गहरी सांस ली।
"बात दरअसल ये है कि मेरे पिता जी ने गांव के साहूकार हरि शंकर की बेटी से मेरे ब्याह की बात पक्की कर दी है।" फिर मैंने बेहद ही संतुलित भाव से कहा____"असल में ऐसा इस लिए हुआ कि साहूकार की लड़की मुझसे बहुत पहले से ही प्रेम करती आ रही है और कुछ महीने पहले जो हमारे साथ हादसे हुए थे उसमें उसने अपने ही परिवार के खिलाफ़ जा कर मेरी जान बचाने का कार्य भी किया था। अब जबकि साहूकारों से हमारे रिश्ते फिर से सुधर गए हैं तो आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए उस लड़की के साथ पिता जी ने मेरा रिश्ता भी तय कर दिया। पिता जी को भी ये पता चल चुका है कि साहूकार की वो लड़की मुझसे प्रेम करती है और उसने प्रेम के चलते ही मेरी जान बचाने का काम किया था। ये सब जान कर पिता जी ने गौरी शंकर से उसकी भतीजी का हाथ अपनी बहू के रूप में मांग लिया है।"
"य....ये क्या कह रहे हो तुम?" सरोज काकी एकदम से चकित हो कर बोली____"हे भगवान! अब क्या होगा? तुम्हारे पिता जी ने खुद साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो अब तुम्हें उससे ब्याह करना ही पड़ेगा। ऐसे में फिर मेरी बेटी का क्या होगा....तुम्हारे वचन का क्या होगा?"
"मेरी पूरी बात तो सुनो काकी।" मैंने एकदम से ही चिंतित हो उठी काकी से कहा____"मैं जानता हूं कि इस बात के चलते मेरे सामने बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई है लेकिन यकीन करो, इसके बावजूद मैं अपना वचन निभाऊंगा और अनुराधा से ब्याह करूंगा।"
"म...मगर कैसे?" सरोज सहसा हताश भाव से बोल पड़ी____"भला अब ये कैसे संभव हो सकेगा वैभव? मैं तो पहले ही ये सोच कर चिंतित थी कि मुझ मामूली और ग़रीब औरत की बेटी से दादा ठाकुर अपने बेटे का ब्याह कभी करने का सोचेंगे तक नहीं। वो तो मैंने तुम पर और तुम्हारे वचन देने के चलते भरोसा कर लिया था। अब जबकि तुम्हारे पिता जी ने खुद ही साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो भला वो तुम्हारा ब्याह किसी और लड़की से कैसे करने का सोचेंगे? नहीं नहीं, अब ये मुमकिन नहीं है। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ जा कर तुम मेरी बेटी से ब्याह नहीं कर सकते। हे ईश्वर! अब क्या होगा मेरी बेटी का?"
कहने के साथ ही सरोज काकी एकदम से हताश और दुखी हो गई। उसकी आंखों से आंसू बह चले। मैं समझ सकता था कि अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य का सोच कर और साथ ही इतने बड़े खानदान की रानी ना बन पाने की बात सोच कर उसे अब बेहद दुख होने लगा था।
"अरे! तुम बेकार में ही हलकान हो रही हो काकी।" मैंने मजबूत लहजे से उसे समझाते हुए कहा____"तुम्हें ये सब सोच कर दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है। हां मैं समझता हूं कि परिस्थितियां बेहद ही गंभीर हैं लेकिन तुम्हें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं। मैं ये कैसे सहन कर लूंगा कि जिससे मैं प्रेम करता हूं वो मेरे जीवन से हमेशा के लिए दूर हो जाए? नहीं काकी, ऐसा कभी नहीं होगा।"
"मुझे झूठी तसल्ली मत दो वैभव।" काकी ने दुखी भाव से कहा____"दूर दूर तक के लोग जानते हैं कि दादा ठाकुर ने एक बार जो फ़ैसला कर लिया फिर कोई उनके फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। मैं ही मूर्ख थी जो उस दिन तुम्हारी बातों में आ गई और तुम्हारे साथ अपनी बेटी के रिश्ते की मंजूरी दे दी। मुझे ये नहीं भूलना चाहिए था कि मैं और मेरी बेटी क्या हैं और दादा ठाकुर के सामने हमारी औकात क्या है।"
"अपने आपको सम्हालो काकी और अपने दिमाग़ को थोड़ा शांत करो।" मैंने फिर से उसे समझाने के इरादे से कहा____"मैं भी ये मानता हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन तुम ये क्यों भूल रही हो कि इस वक्त तुम्हारे घर में कौन मौजूद है?"
"क...क्या मतलब??" काकी एकदम से मूर्खों की तरह मुझे देखने लगी।
"इस वक्त तुम्हारे घर में दादा ठाकुर की बहू मौजूद है काकी।" मैंने ठोस लहजे में कहा____"और दादा ठाकुर की उस बहू को मेरा और अनुराधा का रिश्ता मंज़ूर है।"
"हां लेकिन बहू रानी भी तो दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकतीं।" काकी ने अभी भी हताश भाव से कहा।
"ऐसा तुम सोचती हो काकी।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि तुम्हें अभी ये पता ही नहीं है कि हवेली में भाभी की अहमियत क्या है। हां काकी, हवेली में भाभी को हर कोई बड़ा स्नेह देते हैं और उनकी हर खुशी का ख़याल रखते हैं। जब दादा ठाकुर को ये पता चलेगा कि उनकी बहू को तुम्हारी बेटी के साथ मेरा रिश्ता मंज़ूर है और वो चाहती हैं कि मेरा ब्याह अनुराधा से हो तो यकीन मानो दादा ठाकुर को उनकी खुशी के आगे झुकना पड़ जाएगा।"
"क....क्या तुम सच कह रहे हो?" काकी के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ पहली बार राहत और खुशी के भाव उभरते नज़र आए।
"क्या तुम्हें लगता है कि ऐसी गंभीर परिस्थिति में मैं तुमसे झूठ बोलूंगा?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा____"मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूं वो सोलह आने सच है काकी। भाभी को ये रिश्ता मंज़ूर है और वो इस बात से बेहद खुश भी हैं कि तुम्हारी बेटी ने उनके देवर को बदल कर एक अच्छा इंसान बनने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने मुझसे खुद कहा है कि वो इस रिश्ते के लिए मेरे साथ हैं और इतना ही नहीं वो अनुराधा से मेरा ब्याह करवाने के लिए खुद दादा ठाकुर से बात करेंगी।"
"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है बेटा।" काकी ने राहत की गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन साहूकार की उस लड़की का क्या जिससे दादा ठाकुर ने तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है? क्या वो उस लड़की से फिर तुम्हारा ब्याह नहीं करेंगे?"
"ऐसा नहीं है काकी।" मैंने ठंडी सांस खींचते हुए कहा____"दादा ठाकुर क्योंकि गौरी शंकर को वचन दे चुके हैं और वो खुद भी चाहते हैं कि जिस लड़की ने अपने प्रेम के चलते उनके बेटे की जान बचाई है वो उनकी बहू बने। मतलब कि उस लड़की से मेरा ब्याह होना पक्का है लेकिन उसके साथ साथ अनुराधा से भी मेरा ब्याह होगा ये भी पक्की बात है।"
"तुम्हारा मतलब है कि दो दो लड़कियों से ब्याह करोगे तुम?" सरोज काकी ने एकाएक आश्चर्य से देखा मेरी तरफ।
"शायद यही नियति में लिखा है काकी।" मैंने गंभीरता से कहा____"वैसे अगर गहराई से सोचा जाए तो ऐसा होना भी चाहिए। जैसे मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं और चाहता हूं कि वो पत्नी बन कर हमेशा मेरे साथ रहे उसी तरह साहूकार की लड़की रूपा भी तो मुझसे प्रेम करती है। ज़ाहिर है उसके मन में भी यही हसरत होगी। तुम खुद सोचो काकी कि क्या ऐसी लड़की के प्रेम को मुझे ठुकरा देना चाहिए? क्या ऐसी लड़की को मुझे ठुकरा देना चाहिए जिसने अपने प्रेम के चलते अपना सब कुछ मुझे समर्पण कर दिया हो और इतना ही नहीं मेरी जान भी बचाई हो? अगर मैं ही न रहता इस दुनिया में तो क्या कोई कुछ कर लेता?"
"सही कह रहे हो तुम?" सरोज काकी ने गहरी सांस ली____"ऐसी लड़की को ठुकरा देना बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा। तुम्हारी बातें सुन कर तो मुझे भी अब ये लग रहा है कि तुम्हारे जीवन पर सबसे ज़्यादा हक़ उस लड़की का ही है। मैं तो अभी भी ये सोच के हैरत में पड़ जाती हूं कि मेरी बेटी ने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके चलते तुम उसे प्रेम करने लगे और उसे अपना बनाना चाहते हो।"
"ऐसा तुम्हें लगता है काकी।" मैं अनायास ही मुस्कुरा उठा____"जबकि सच तो ये है कि अनुराधा ने वो किया है जो अब से पहले कोई नहीं कर सका था। उसने मेरे जैसे इंसान का चरित्र बदल दिया है काकी। उसने मेरे जैसे इंसान को एक अच्छा इंसान बनने के लिए मजबूर कर दिया है। हालाकि मैं इसे मजबूर कर देना भी नहीं समझता क्योंकि मैं तो खुशी खुशी पूरी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगा हूं।"
मेरी बात सुन कर काकी अभी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी हमने देखा कि भाभी अनुराधा के कमरे से निकल कर हमारी तरफ ही आ रहीं थी। उनके पीछे अनुराधा भी थी जो सिर झुकाए और हल्की मुस्कान होठों पर सजाए चली आ रही थी। भाभी के चेहरे पर भी अलग ही तरह के खुशी के भाव नज़र आ रहे थे।
भाभी हमारे क़रीब आ कर काकी से जाने की इजाज़त मांगने लगीं तो काकी हड़बड़ाते हुए बोली कि ऐसे कैसे? अभी तो उसने उनका कोई स्वागत ही नहीं किया है। काकी के बहुत ज़ोर देने पर भाभी ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा कि वो किसी दिन फिर आएंगी और वैसे भी अब तो वो इस घर की बड़ी बेटी हैं इस लिए स्वागत करने की कोई ज़रूरत नहीं है। काकी जब इतने पर भी न मानी तो उन्होंने एक ग्लास पानी पिया और फिर मुझे इशारा कर दरवाज़े की तरफ बढ़ चलीं।
मैंने भाभी और काकी की नज़र बचा कर अनुराधा की तरफ देखा। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो वो एकदम से शर्मा गई और अपनी नज़रें झुका ली। मैं उसकी यूं छुईमुई हो गई दशा को देख कर मुस्कुरा उठा और फिर ये सोच कर भाभी के पीछे चल पड़ा कि किसी दिन अकेले में तसल्ली से अपनी अनुराधा से मुलाक़ात करूंगा। कुछ ही देर में मैं भाभी को जीप में बैठाए वापस अपने गांव की तरफ चल पड़ा था।