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Hindi Xkahani - प्यार का सबूत

अध्याय - 40
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अब तक....

मेनका चाची और कुसुम कुछ देर बाद चली गईं। वो बच्ची लड्डू खाने में ब्यस्त थी और मैं ये सोचने में कि विभोर और अजीत के पास कुसुम की आख़िर ऐसी कौन सी कमज़ोरी है जिसके बल पर वो लोग कुसुम को मेरे खिलाफ़ मोहरा बनाए हुए हैं? आख़िर ऐसी क्या बात हो सकती है जिसके चलते कुसुम उनकी बात मानने के लिए इस हद तक मजबूर है कि वो अपने उस भाई को भी कुछ नहीं बता रही जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह देता है? मैंने फैसला किया कि सबसे पहला काम मुझे इसी सच का पता लगाना होगा।

अब आगे....

दिन ढलने लगा था।
भाभी मेरे कमरे में आईं और मुझे बताया कि गुड़िया को लेने के लिए उसकी दादी फूलवती अपने दूसरे बेटे सूर्यभान के साथ आई हैं। मैंने देखा भाभी का चेहरा अब थोड़ा सामान्य था। मैंने भाभी से उनके हाथ की बनी चाय पिलाने को कहा तो वो सिर हिला कर चली गईं। इधर उनके जाने के बाद मैं भी उस बच्ची को ले कर नीचे आ गया।

नीचे आया तो देखा मणि शंकर की बीवी फूलवती माँ और मेनका चाची से बातें कर रही थी। तीनों के चेहरों पर ख़ुशी के भाव थे। बच्ची को लिए जब मैं उनके पास पहुंचा तो फूलवती मुझे और अपनी पोती को देख कर मुस्कुरा उठी।

"ये अभी तक तुमसे ही चिपकी हुई है?" फूलवती ने मुस्कुराते हुए किन्तु हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"लगता है तुमसे कुछ ज़्यादा ही घुल मिल गई है ये।"

"आप क्या इसे लेने आई हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा____"पर अब तो ये मेरे पास ही हवेली में रहेगी। है न मेरी प्यारी गुड़िया?"
"हां ताता।" उस बच्ची ने मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से कहा____"मैं आपते पाथ ही लहूंगी।"

"हाय राम!" फूलवती उसकी बात सुन कर चकित भाव से कह उठी____"ये तो सच में तुमसे घुल मिल गई है बेटा। देखो तो एक ही दिन में अपनी उस दादी को भी भूल गई जिसके बिना ये रहती ही नहीं थी।"

मां और चाची उनकी बात सुन कर हंसने लगीं। जबकि फूलवती उस बच्ची से कहने लगी कि चल बेटा घर चल तेरी माँ तुझे बहुत याद कर रही है और तेरे बिना घर भी सूना सूना लगता है। फूलवती की ये बातें सुन कर भी वो बच्ची मेरी गोद से उतर कर उसके पास न गई। आख़िर मैंने जब उसे प्यार से समझाया और ये कहा कि मैं उसके लिए उसके घर लड्डू ले कर आऊंगा तो वो मान गई और फिर ख़ुशी ख़ुशी अपनी दादी के पास चली गई।

रागिनी भाभी सबके लिए चाय ले कर आईं। चाय पीने के बाद मैं बाहर बैठक में आ गया। बैठक में सूर्यभान जगताप चाचा के पास बैठा था और चाय पी रहा था। मैं भी उनके पास ही बैठ गया। कुछ देर हम तीनों के बीच इधर उधर की बातें होती रहीं उसके बाद फूलवती जब आई तो सूर्यभान उन्हें ले कर चला गया।

"तो कैसा चल रहा है हमारे भतीजे के मकान का निर्माण कार्य?" जगताप चाचा ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा____"ब्यस्तता के चलते उधर जा ही नहीं पाए हम।"

"आधे से ज़्यादा कार्य हो गया है चाचा जी।" मैंने कहा____"जल्द ही शेष कार्य भी पूरा हो जाएगा।"
"चलो अच्छी बात है फिर।" चाचा जी ने कहा____"अच्छा अब तुम बैठो, हमें एक ज़रूरी काम से जाना पड़ेगा।"

चाचा जी के जाने के बाद मैं भी उठा और पैदल ही हवेली से बाहर चल पड़ा। कुछ दूरी से ही सड़क के दोनों तरफ लोगों के कच्चे मकान शुरू हो जाते थे। दिन ढल रहा था इस लिए धुप में ज़्यादा तपिश नहीं रह गई थी। मैं सोचता जा रहा था कि मेरे सामने सबसे महत्वपूर्ण दो मामले थे और दोनों ही मामले गंभीर थे, ख़ास कर बड़े भैया वाला मामला। बड़े भैया का जब भी ख़याल आता था तब मेरे दिल में एक दर्द सा जाग उठता था। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि भैया का जीवन काल इतना जल्दी ख़त्म हो जाएगा। मेरे लिए सबसे बड़ी हैरानी की बात ये थी कि भैया का बर्ताव एकदम से कैसे बदल जाता था? कभी वो बहुत अच्छे से बात करते थे और कभी ऐसे हो जाते थे कि वो गुस्से में आ कर मुझ पर हाथ ही उठा देते थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ये क्या माजरा है? मैं ये सब सोचता चला ही जा रहा था कि सहसा मुझे ऐसा लगा जैसे कहीं से आवाज़ आई हो। मैं रुक कर इधर उधर देखने लगा और तभी मेरी नज़र दाएं तरफ जा रही एक संकरी गली पर पड़ी। गली के किनारे एक नीम का पेड़ था उसी पेड़ के पास एक आदमी खड़ा था। वो आदमी हमारे ही गांव का था। मैंने देखा वो मुझे अपनी तरफ बुला रहा था। मुझे उसका बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उत्सुकतावश मैं उसकी तरफ बढ़ ही गया।

"क्या बात है काका?" उस आदमी के पास पहुंचते ही मैंने उससे पूछा____"तुम मुझे इस तरह क्यों बुला रहे थे?"
"मेरी इस धृष्टता के लिए मुझे माफ़ कर देना छोटे ठाकुर।" उसने इधर उधर देखते हुए कहा_____"अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल ग‌ए। मैं कई दिनों से हवेली में आना चाहता था लेकिन बड़ी कोशिश के बाद भी आ नहीं पाया अथवा ये समझ लीजिए कि हवेली में आने की मैं हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।"

"आख़िर बात क्या है?" मैं उसकी बात सुन कर सोच में पड़ गया था, बोला_____"तुम किस लिए हवेली आना चाह रहे थे?"
"यहां नहीं छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने इधर उधर देखते हुए धीमें स्वर में कहा____"आप मेरे साथ मेरे घर चलिए। मुझे आपको बहुत ज़रूरी बात बतानी है।"

उस आदमी की बात सुन कर मैं चौंका। एकाएक मेरे ज़हन में कई तरह के ख़याल उभरने लगे। मैं फ़ौरन ही उस आदमी के साथ चल पड़ा। जिस गली में हम थे वो ज़्यादा चौड़ी नहीं थी। अगल बगल बने घरों के बगल की दीवार थी गली की तरफ। आगे जा कर वो गली बाएं तरफ मुड़ जाती थी जहां पर निम्न वर्ग के लोगों के घर बने हुए थे। कुछ ही देर में मैं उस आदमी के साथ एक घर में पहुंच गया। आदमी ने इधर उधर नज़र घुमाई और एक तरफ देख कर हाथ से एक इशारा किया। मैंने उस तरफ देखा तो एक और आदमी परली तरफ खड़ा था। मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन इतना ज़रूर सोचा कि कुछ तो बात ज़रूर है।

"वो मेरा छोटा भाई है छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने कहा____"मैंने उसे निगरानी में लगा रखा है। असल में कुछ दिनों से मुझे एक बड़े ख़तरे का आभास हो रहा है।"

"आख़िर बात क्या है काका?" मैं बेचैन भाव से बोल पड़ा____"तुम साफ़ साफ़ बताते क्यों नहीं मुझे?"
"अन्दर आ जाइए।" उसने कहा और घर के अंदर दाखिल हो गया। उसके पीछे मैं भी सोच में डूबा दाखिल हो गया। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे।

"अरे! ओ धनिया।" आदमी ने अंदर तरफ किसी को पुकारा____"जल्दी से जल पान ला, छोटे ठाकुर आए हैं।"
"काका इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है।" मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था, इस लिए उतावलेपन से बोल पड़ा_____"तुम मुझे बस वो बताओ जिसके लिए तुम हवेली आना चाहते थे या फिर मुझे यहाँ ले कर आए हो।"

"तीन दिन पहले की बात है छोटे ठाकुर।" मैं जब खटिया में बैठ गया तो वो मेरे पास ही ज़मीन पर बैठने के बाद गंभीर भाव से बोला_____"मेरी भैंस घर नहीं आई थी तो मैं उसे खोज रहा था। आख़िर बड़ी खोज के बाद वो शाम को मुझे नदी के पास मिली। मेरे साथ मेरा छोटा भाई कलुवा भी था। मैंने कलुवा को भैंस ले कर घर चले जाने को कहा और खुद दिशा मैदान के लिए वहीं रुक गया। आप तो जानते हैं कि नदी से कुछ दूरी पर ही गांव के साहूकारों का बगीचा शुरू होता है। मैं डर तो रहा था कि मुझे उस जगह पर दिशा मैदान करते हुए साहूकारों का कोई नौकर न देख ले लेकिन क्योंकि मेरा ज़ोरों से पेट चढ़ा हुआ था इस लिए मजबूरन मुझे वहीं बैठ जाना पड़ा। दिशा मैदान से फुर्सत होने के बाद मैं उनके बगीचे से ही घुस कर घर की तरफ चल दिया। मैंने सोचा था कि बगीचे से हो कर अगर जाऊंगा तो जल्दी ही गांव की मुख्य सड़क पर पहुंच जाऊंगा। अँधेरा घिर चुका था पर मैं अंदाज़न चलता ही जा रहा था। थोड़ी दूर ही आया था कि अँधेरे में मुझे थोड़ी देर के लिए हवा में आग जलती दिखी और फिर बूझ गई। मैं समझ गया कि किसी ने बीड़ी सुलगाया होगा लेकिन तभी ख़याल आया कि अँधेरे में उस वक़्त भला वहां पर कौन हो सकता है? जहां तक मुझे पता था दिन ढले ही बगीचा सुनसान हो जाता था। ख़ैर मैंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ चला। कुछ दूर ही आया था कि तभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुन कर मैं एकदम से उछल पड़ा। चिल्लाने की आवाज़ किसी लड़की या औरत की थी। मैंने सोचा अँधेरे में उस वक़्त कौन हो सकती थी जो इस तरह चिल्लाई थी? मन में एक उत्सुकता जाग उठी थी इस लिए दबे पाँव उस तरफ को मुड़ गया। डर तो बहुत लग रहा था छोटे ठाकुर क्योंकि साहूकारों का बगीचा था पर शायद नियति यही चाहती थी इस लिए मैं दबे पाँव उस तरफ बढ़ता ही चला गया।"

वो आदमी सांस लेने के लिए कुछ देर रुका। मैं गौर से उसकी बातें सुन रहा था। अभी वो फिर से बोलने ही वाला था कि अंदर से एक लड़की हाथ में एक थाली लिए आई। मैंने देखा लड़की जवान थी। सांवली रंगत वाले जिस्म पर घाघरा चोली था। चोली में कैद उसकी चूचियां साफ़ बता रहीं थी कि लड़की अब भरपूर जवान हो चुकी है। शायद इसी का नाम धनिया था और उस आदमी की बेटी थी। उसने झुक कर मेरी तरफ थाली बढ़ाई जिसमें एक गिलास पानी रखा हुआ था। वो झुकी हुई थी तो मेरी नज़र एकदम से उसके उभारों पर चली गई। चोली का गला झुकने से नीचे की तरफ फ़ैल सा गया था जिससे मुझे साफ़ साफ़ उसके उभार दिखने लगे थे। मेरे मन में एक हलचल सी हुई तो मैंने जल्दी से उसके उभारों से नज़र हटा कर ग्लास उठा लिया। मेरे ग्लास उठाते ही वो सीधा हुई और अंदर चली गई।

"आगे बताओ काका।" उसके जाते ही मैंने उस आदमी से कहा____"उसके बाद क्या हुआ?"
"बगीचे की ज़मीन पर सूखे पत्ते पड़े हुए थे इस लिए मेरे चलने से आवाज़ पैदा हो रही थी।" काका ने कहना शुरू किया____"और इस आवाज़ के चलते मैं ये सोच कर और भी डर रहा था कि कहीं मैं पकड़ा न जाऊं। उधर किसी लड़की या औरत के चिल्लाने की आवाज़ बीच बीच में आ रही थी। मैंने साफ़ सुना था कि वो खुद को छोड़ देने के लिए मिन्नतें कर रही थी, रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी। मैं किसी तरह उस तरफ पहुंचा। अचानक चिल्लाने की आवाज़ बंद हो गई। ऐसा लगा जैसे किसी ने जादू किया हो और शोर गुल शांत हो गया हो। मैं एक पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा हो गया था। मुझसे क़रीब दस या पंद्रह क़दम की दूरी पर अँधेरे में मुझे तीन लोग खड़े दिखाई दिए। अँधेरे की वजह से उनकी शकल नहीं दिख रही थी और ना ही उनके कपड़े ठीक से समझ में आ रहे थे। उनमें से एक आदमी थोड़ा झुका हुआ दिख रहा था। शायद वो उस लड़की या औरत को पकड़े हुए था जो कुछ देर पहले चिल्ला रही थी।"

"मैंने तो पहले ही कहा था कि इस रांड के बस का नहीं है हवेली से उन कागज़ातों को निकाल कर लाना।" सन्नाटे को चीरती उनमें से एक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी____"लेकिन आप ही नहीं माने और इसे हवेली की नौकरानी बना कर वहां रखवा दिया।"

"ग़लती तो हो ही गई मुझसे।" दूसरे की आवाज़ आई____"मुझे क्या पता था कि ये अपनी खूबसूरती और अपने मादक जिस्म का सही उपयोग ही नहीं कर पाएगी। इससे ज़्यादा समझदार तो वो शीला निकली जिसने अपने काम को अच्छे तरीके से अंजाम देना शुरू कर दिया है।"

"मुझे लगता है इसे थोड़ा और वक़्त देना चाहिए।" तीसरे की आवाज़ थी ये____"मत भूलिए कि इसी की वजह से हमारा एक महत्वपूर्ण काम सफलता से हुआ है। हवेली में आज कल जिस तरह के हालात हैं उसमें इसके लिए ये काम करना फिलहाल आसान नहीं हो सकता। उस कम्बख्त दादा ठाकुर को अब यकीन हो चला है कि कोई तो है जो उसके खानदान को बर्बाद करने के लिए शातिर खेल खेल रहा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो पूरी तरह सतर्क हो गया होगा।"

"ये सही कह रहा है।" पहले वाले की आवाज़____"मामला थोड़ा पेंचीदा है इस लिए इसे थोड़ा वक़्त देना चाहिए हमें।"
"मुझ पर यकीन कीजिए।" सहसा वो लड़की या औरत की आवाज़ आई जो पहले चिल्ला रही थी____"मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं लेकिन क्या करूं वहीं की दोनों ठकुराईनें हर वक़्त वहीं जमी रहती हैं। इस वजह से मुझे दादा ठाकुर के कमरे में जाने का मौका ही नहीं मिलता।"

"क्या एक बार भी उसके कमरे में जाने का तुझे मौका नहीं मिला?" दूसरे वाले की आवाज़ आई तो उस औरत ने कहा____"ऐसे तो कई बार मिला है और मैं गई भी हूं लेकिन ज़्यादा समय तक कमरे में रह ही नहीं पाई वरना उस कमरे में उन कागज़ातों को ज़रूर तलाश करती।"

"उसके कमरे को देख कर क्या समझ आया था तुझे?" दूसरे वाले ने उससे पूछा।
"समझ आया मतलब? मैं कुछ समझी नहीं?" उस औरत की उलझी हुई आवाज़।
"अरे! मतलब ये कि उस दादा ठाकुर के कमरे को देख कर।" दूसरे वाले की आवाज़ में इस बार थोड़ा गुस्सा था____"क्या तुझे ऐसा लगा कि उसी कमरे में वो कागज़ात रखे हो सकते हैं?"

"उनके कमरे में तो चारो तरफ बहुत कुछ है।" उस औरत की आवाज़____"लेकिन ठीक से देखने का मौका ही नहीं मिल पाया मुझे।"
"देख मैं इन दोनों के कहने पर तुझे आख़िरी मौका दे रहा हूं।" दूसरे वाले कठोरता से कहा____"अगर तूने वहां से कागज़ात निकाल कर हमें नहीं दिया तो सोच लेना कि तू और तेरा परिवार इस दुनिया में नहीं रहेगा।"

"वो तीनों लोग कौन थे काका?" वो आदमी जब सब कुछ बता कर चुप हुआ तो मैंने गहरी सांस लेते हुए उससे पूछा____"क्या उन तीनों की आवाज़ों से तुम उन्हें पहचान पाए?"

"यही तो नहीं हो पाया छोटे ठाकुर।" उस आदमी ने बेबस भाव से कहा____"अँधेरे की वजह से उनकी शकल तो वैसे भी नहीं दिख रही थी लेकिन बातें भी वो धीमें स्वर में ही कर रहे थे इस लिए साफ़ साफ़ उनकी आवाज़ मेरे कानों में नहीं पहुंच पा रही थी, अगर वो खुल कर बातें करते तो शायद उनकी आवाज़ से मैं कुछ अंदाज़ा लगा पाता।"

"और वो औरत कौन थी?" मैंने कहा___"क्या उसे भी नहीं पहचान पाए?"
"मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" वो आदमी बेबसी बोल पड़ा____"औरत को पहचानना तो वैसे भी मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मैंने इस गांव की ज़्यादातर औरतों की आवाज़ें सुनी ही नहीं हैं।"

"ख़ैर उसके बाद क्या हुआ?" मैंने काका की तरफ देखते हुए पूछा____"क्या वो लोग वहीं रहे या फिर उनके जाने के बाद तुमने उनका पीछा भी किया था?"

"पीछा करने की नौबत ही नहीं आई छोटे ठाकुर।" काका ने कहा____"उनको पता चल गया कि वहां पर उनके अलावा भी कोई है जो उनकी बातें सुन रहा है।"

"अरे! पर उन्हें पता कैसे चल गया?" मैंने काका की बात सुन कर हैरानी से पूछा।
"मेरे दुर्भाग्य की वजह से छोटे ठाकुर।" काका ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मैं पेड़ के पीछे खड़ा उनकी बातें सुन रहा था कि तभी मेरे पैर में से कोई चीज़ एकदम सर्र से निकल गई जिसके चलते मैं डर के मारे उछल ही पड़ा था और मेरे मुख से आवाज़ भी निकल गई थी। बस उसके बाद तो जैसे मुझ पर क़यामत ही टूट पड़ी थी। मैं भी अपनी जान बचा कर इस तरह वहां से भाग खड़ा हुआ था जैसे सैकड़ों भूत मेरे पीछे पड़ गए हों। पीछे मुड़ कर एक बार भी नहीं देखा था मैंने। सीधा घर पर ही आ कर रुका था।"

"तो इस बात को बताने के लिए तुम हवेली आना चाहते थे?" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा___"और अपने छोटे भाई को निगरानी में लगा रखे हो?"
"हां छोटे ठाकुर।" काका ने गंभीरता से कहा____"मैं यही सोच कर डर गया था कि क्या उन लोगों ने मुझे पहचान लिया होगा? आज तीसरा दिन है और अब यही लगने लगा है कि उस दिन उन लोगों ने मुझे पहचाना नहीं था। अगर पहचान गए होते तो संभव है कि आज मैं आपके सामने जीवित न बैठा होता। मैंने कई बार ये सब दादा ठाकुर से बताने के लिए हवेली जाने का मन बनाया लेकिन हिम्मत न हुई। क्योंकि मुझे कहीं न कहीं यही लगता है कि वो हवेली की तरफ जाने वाले हर ब्यक्ति को जांच परख रहे होंगे और जब मुझ जैसा नीच जाति का आदमी हवेली की तरफ जाता हुआ उन्हें दिखेगा तो वो फ़ौरन समझ जाएंगे कि उस रात उनकी बातें सुनने वाला शायद मैं ही था।"

"शायद तुम सही कह रहे हो काका।" मैंने काका की बुद्धि की मन ही मन सराहना की, फिर बोला____"तुम्हारी इस बुद्धिमानी ने ही तुम्हें अब तक सही सलामत रखा है और मेरा तुमसे यही कहना है कि तुम अब हवेली की तरफ देखना भी नहीं। अच्छा हुआ कि इत्तेफ़ाक से आज पैदल चलते हुए मैं इधर से गुज़र रहा था और तुमने मुझे देख लिया। सही कहते हैं बूढ़े बुजुर्ग लोग कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद काका ये सब बताने के लिए। आज तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। तुम्हारे इस खूबसूरत उपकार को मैं कभी नहीं भूलूंगा। तुमने हमारे प्रति जो वफ़ादारी दिखाई है उसका मोल एक दिन ज़रूर मिलेगा तुम्हें। ख़ैर, अब चलता हूं काका, अपना ख़याल रखना।"

"रूकिए छोटे ठाकुर।" मेरे उठते ही काका ने झट से कहा____"एक और बात उनके मुख से सुनी थी मैंने। मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि कोई ऐसा भी कर सकता है।"
"ऐसी कौन सी बात सुनी थी तुमने?" मैंने उत्सुकतावश पूछा।

और काका ने मुझे जो बात बताई उसे सुन कर मैं बुरी तरह अचम्भे में पड़ गया था किन्तु अगले ही पल मेरे चेहरे पर पत्थर जैसी शख़्ती उभर आई। गुस्से के मारे मेरी आँखें लाल सुर्ख पड़ने लगीं थी। काका ने मुझे किसी तरह समझा बुझा कर शांत किया।

सूरज डूब चुका था और अँधेरे की चादर चारो तरफ फैलने लगी थी। मैं गहरी सोच में डूबा हवेली की तरफ चला जा रहा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि कोई इतना बड़ा षड़यंत्र या इतना बड़ा खेल भी रच सकता है। दिलो दिमाग़ में जो तूफ़ान मचल रहा था उसे मैं बड़ी मुश्किल से दबाए हुए हवेली पहुंचा। आज बहुत कुछ पता चल गया था मुझे। मैं मन ही मन भगवान से उस काका के लिए दुआएं मांग रहा था जिसने मुझे इतने बड़े रहस्य के बारे में बताया था।

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रात का वक़्त था।
गांव से थोड़ा दूर जंगल के बीचों बीच चार इंसानी साए दो दो फिट के अंतराल में खड़े थे। यूं तो आसमान में आधे से थोड़ा कम ही चाँद मौजूद था जिसकी हल्की रौशनी हर तरफ फैली हुई थी लेकिन जंगल के बीच चाँद की वो हल्की रौशनी नहीं पहुंच पा रही थी। इस वजह से सब कुछ धुंधला सा दिख रहा था। रात के सन्नाटे में हवा के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराने की ही आवाज़ें गूंज रहीं थी।

"अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमारे सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा।" उन चारों में से एक साए की धीमी आवाज़ गूंजी_____"शुरु से ले कर अब तक हमने जो कुछ भी किया है उसका कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ। उस कम्बख्त दादा ठाकुर ने अपनी पहुंच का फ़ायदा उठा कर सारा मामला ही रफा दफा कर दिया है।"

"बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी?" एक दूसरे साए की कर्कश आवाज़ गूंजी____"एक दिन तो वो हमारे लपेटे में आएगा ही। फिलहाल एक अच्छी बात ये है कि एक चिड़िया पूरी तरह हमारे बस में है। जल्द ही हवेली में एक ऐसा मातम छाने वाला है जिसकी भरपाई हवेली का कोई भी सदस्य नहीं कर पाएगा।"

"मुझे तो डर है कि कहीं वक़्त से पहले दादा ठाकुर को ऐसे किसी काम का शक न हो जाए।" तीसरे साए की सोचपूर्ण आवाज़ गूंजी____"अगर ऐसा हुआ तो समझो ये खेल भी बिगड़ जाएगा।"

"चिंता मत करो।" दूसरे वाले ने कहा____"दादा ठाकुर ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता कि ऐसा कुछ हो सकता है। हमने शतरंज की बिसात ही ऐसी बिछाई है कि वो इस तरीके से सोच ही नहीं सकता। इस लिए इस बारे में फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि फ़िक्र तो अब इस बात की है कि उसका दूसरा बेटा कुछ ज़्यादा ही अच्छा बन गया है। आज कल वो बुद्धि से कुछ ज़्यादा ही काम लेने लगा है। समझ में नहीं आ रहा कि वो आश्चर्यजनक रूप से इतना कैसे बदल सकता है?"

"उसके इस तरह बदल जाने से ही तो हमारे लिए मुश्किलें पैदा हो गई हैं।" चौथे ने कहा____"मुझे तो रातों में ये सोच सोच कर नींद नहीं आ रही कि उसका गरम खून इतना जल्दी ठंडा कैसे पड़ गया? अपने बाप से भी भिड़ जाने वाला वो छोकरा आख़िर कैसे यूं अचानक अपने बाप की जी हुज़ूरी करने लगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके बाप ने उसे कोई सम्मोहन करने वाली दवा खिला दी है?"

"यकीनन ऐसा हो सकता है।" दूसरे साए ने कहा_____"क्योंकि इतने कम समय में किसी का इस तरह से कायाकल्प हो जाना लगभग असंभव बात है। जो छोकरा हमेशा अय्याशियां करने में ही मगन रहता था और अपने परिवार वालों की एक नहीं सुनता था उसका इस तरह पलक झपकते ही बदल जाना बिलकुल भी हजम नहीं होता। तुम सच कहते हो, ज़रूर दादा ठाकुर ने उसको कोई ऐसी ही दवा खिला दी है वरना किसी इंसान की फितरत इतना जल्दी बदल जाए ये असंभव है।"

"ये सब छोड़िए।" पहले वाले साए की आवाज़ गूंजी____"और ये सोचिए कि अब आगे हमें क्या करना चाहिए? एक बात और, मेरे एक ख़ास आदमी से मुझे पता चला है कि दादा ठाकुर ने दरोगा को गुप्त रूप से मुरारी के हत्यारे का पता लगाने का काम सौंपा है।"

"हां पता है मुझे।" दूसरे वाले साए ने कहा____"एक दिन तो उस साले दरोगा ने पकड़ ही लिया था मुझे। वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि वो किसी पत्थर से टकरा कर गिर गया और मुझे उसके होने का पता चल गया था। उसके बाद मैंने बड़ी सफाई से अपने उस आदमी का काम तमाम किया और फिर उड़न छू हो गया था।"

"ऐसा नहीं होना चाहिए था।" तीसरे वाले साए ने कहा____"क्योंकि अब उस दरोगा के अलावा दादा ठाकुर को भी यकीन हो गया है कि मुरारी की हत्या करने के पीछे किसी का यही मकसद था कि उस हत्या में दादा ठाकुर के उस छोकरे को फंसा दिया जाए।"

"सही कहा तुमने।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन अच्छी बात यही है कि ये पता लगने के बाद भी वो दरोगा और दादा ठाकुर ये नहीं जान सकते कि ऐसा किसने किया होगा? हाँ ये ज़रूर है कि अब हमें पूरी तरह से सावधान रहना होगा और अपने किसी भी काम को पूरी सतर्कता से ही करना होगा।"

"क्या ये पता चल सका कि वो नक़ाबपोश कौन था जो उस दिन बगीचे में उस छोकरे का बचाव कर रहा था?" चौथे साए की आवाज़____"मुझे पूरा यकीन है कि वो नक़ाबपोश दादा ठाकुर का ही कोई आदमी है लेकिन हमारे लिए ये पता करना ज़रूरी है कि वो आख़िर है कौन? वो हमारे लिए बहुत ही बड़ा ख़तरा है।"

"मेरे आदमी उसका पता लगाने में लगे हुए है।" दूसरे साए ने कहा____"अभी तक उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली है। ऐसा लगता है वो नक़ाबपोश बहुत ही शातिर है।"

"कितना भी शातिर क्यों न हो।" चौथे साए की आवाज़____"उसका पता करना ज़रूरी है हमारे लिए।"
"एक बात समझ में नहीं आ रही।" दूसरे वाले साए ने कहा____"वो छोकरा उस बंज़र ज़मीन पर मकान क्यों बनवा रहा है? क्या अपनी अय्याशियों के लिए या फिर उसके ज़हन में कुछ और चल रहा है?"

"सुना तो यही है कि वो उस जगह पर महज शान्ति और सुकून के लिए मकान बनवाना चाहता है।" पहले वाले साए ने कहा____"बाकि असल बात क्या है ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा।"

"जो भी हो।" दूसरे साए ने कहा____"लेकिन एक बात निश्चित है कि जिस तरह से वो बदल गया है और बुद्धि से काम लेने लगा है उससे हमारा बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इस लिए कुछ ऐसा करो कि उसका खेल ही ख़त्म हो जाए। मैं उसे अब और बरदास्त नहीं कर सकता। मुझे उस हवेली में ऐसा मातम छाया हुआ देखना है जो कभी खुशियों में तब्दील ही न हो सके।"

"ये इतना आसान नहीं है।" पहले वाले साए ने कहा____"पहले की बात और थी क्योंकि पहले वो पूरी तरह लापरवाह रहता था लेकिन अब वो सम्हल गया है या यूं कहें कि उसे सम्हल कर चलने के लिए प्रेरित किया गया है। दूसरी बात दादा ठाकुर भी ये समझ चुका है कि कोई तो ऐसा ज़रूर है जो उसके बेटे को मोहरा बनाए हुए है और उसके साथ साथ पूरे ठाकुर खानदान को भी। ऐसे में वो पूरी तरह सम्हल गया है और ये भी यकीन करो कि वो गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा रहा होगा। अब तुम लोग समझ सकते हो कि ऐसी परिस्थिति में हवेली के किसी भी ब्यक्ति का शिकार करना आसान नहीं होगा।"

"ये सब जान कर हम हार नहीं मान सकते।" दूसरे वाले साए ने शख़्त भाव से कहा____"और ना ही अपने प्रतिशोध को भूल सकते हैं।"
"मैं भी कहां अपने प्रतिशोध को भूला हूं?" पहले वाले ने कहा____"प्रतिशोध तो मैं ले कर ही रहूंगा फिर चाहे आख़िर में मुझे सब कुछ खुल कर ही क्यों न करना पड़े।"

"शांत हो जाओ।" तीसरे साए ने कहा_____"किसी को भी अपना संयम खोने की ज़रूरत नहीं है। हमारे लिए अभी यही ज़रूरी है कि परिस्थितियों को देख कर हमें पूरे होशो हवास में काम लेना है। हमारी थोड़ी सी चूक हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत का सबब बन सकती है। इस लिए माहौल को देख कर काम करो। फिलहाल यही सोच कर तसल्ली रखो कि एक तो बहुत जल्द विदा होने ही वाला है। उसके बाद मौका देख कर दूसरे को भी वैसे ही विदा करवा देंगे।"

"अगर उसको भी उसी तरह विदा करवाना होता तो ये काम पहले ही कर दिया गया होता।" दूसरे साए ने कठोर भाव से कहा____"मगर किया इसी लिए नहीं कि उसे मैं अपने हाथों से तड़पा तड़पा कर इस दुनिया से विदा करना चाहता हूं और ये हो कर ही रहेगा चाहे इसके लिए मुझे कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।"

"वैसे मेरा ख़याल है कि ऐसा खूबसूरत वक़्त जल्द ही आ सकता है।" चौथे साए ने कहा_____"अब तो दोनों परिवारों के बीच अच्छे सम्बन्ध बन चुके हैं और वो छोकरा भी अपने दुश्मनों को दोस्त बना कर उनसे ख़ुशी ख़ुशी घुल मिल रहा है। हमारे लिए ऐसी परिस्थिति में कोई ऐसा सुनहरा मौका ज़रूर मिल सकता है कि हम उस छोकरे को अपने लपेटे में बड़ी आसानी से ले सकें।"

"बेवक़ूफ़ी भरी बात मत करो तुम।" तीसरे साए ने कहा____"तुम्हें क्या लगता है ये सब दाल चावल खाने जैसा आसान है? इस बात को सबसे पहले याद रखो कि दादा ठाकुर को ऐसे ही किसी ख़तरे का आभास हो चुका है इस लिए ये भी यकीन ही करो कि वो इस सबके लिए पूरी तरह से सतर्क हो गया होगा और गुप्त रूप से इस सबका पता भी लगा ही रहा होगा। मुझे तो अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उस छोकरे की फितरत को बदलने के पीछे उसके बाप दादा ठाकुर का ही महत्वपूर्ण हाथ है और मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा है कि उसने किसी ख़ास योजना के तहत ही अपने छोकरे को मणि शंकर के यहाँ भेजा होगा।"

"तुम्हारी बातों में यकीनन भारी वजन है।" दूसरे वाले साए ने कहा____"मुझे भी यही आशंका है। ख़ैर तो इन सब बातों का निचोड़ यही है कि फिलहाल हमें कुछ नहीं करना है बल्कि अच्छे वक़्त का इंतज़ार करना है।"

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।
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अध्याय - 41
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अब तक....

"बिल्कुल।" तीसरे वाले साए ने कहा____"एक और बात, अपने उस दूसरे आदमी को भी कुछ समय के लिए छुपा दो। अगर वो दरोगा के हाथ लग गया तो समझ ही सकते हो कि उस सूरत में हम लोगों की गर्दनें पलक झपकते ही तलवार की धार पर धरी नज़र आएंगी।"

दूसरे साए ने हाँ में सिर हिलाया। उसके बाद चारो के चारो अलग अलग दिशा की तरफ पलट कर चल दिए। कुछ ही देर में वो चारों पेड़ों के बीच कहीं खो ग‌ए। जंगल में अब हवा की वजह से सिर्फ पत्तों के सरसराने की ही आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी।


अब आगे.....

रात में सबके साथ मैं भी खाना खाने बैठा हुआ था लेकिन मेरा ध्यान खाने की तरफ ज़रा भी नहीं था। रह रह कर ज़हन में उस काका की बातें गूँज उठतीं और मैं सोचने पर मजबूर हो जाता कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है? सहसा जगताप चाचा ने मुझे टोका तो मैं हल्के से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। उन्होंने इशारे से ही मुझे खाना खाने के लिए कहा तो मैं चुप चाप भोजन करने लगा। मैंने सिर उठा कर एक नज़र विभोर और अजीत पर डाली। मेरे वो दोनों कमीने भाई बेफ़िक्र हो कर खाने में मगन थे। उन्हें देख कर मेरे अंदर गुस्से का ज्वालामुखी सा उबल पड़ा जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से दबाया। खाने के बाद पिता जी ने एक बार फिर से मुझसे कहा कि सुबह जल्दी तैयार हो जाना क्योंकि मुझे उनके साथ पंचायत पर जाना है।

अपने कमरे में बेड पर लेटा मैं रात भर करवटें बदलता रहा और मन ही मन मौजूदा परिस्थितियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता रहा। मैंने फैसला कर लिया था कि अगले दिन पिता जी से इस बारे में बात करुंगा और फिर जल्द से जल्द इस बारे में कुछ करुंगा। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख लगी और मैं नींद की आगोश में चला गया।

बन्द पलकों तले सहसा कुछ अजीब से चित्र उभरने लगे। ठीक वैसे ही जैसे पहले भी दो बार मैं सपने में देख चुका था। मैं एक सुनसान जगह पर एक बड़ी सी शिला पर लेटा हुआ था। चारो तरह अँधेरे की चादर फैली हुई थी। मुझसे क़रीब बीस फिट की दूरी पर घने पेड़ पौधों से युक्त जंगल दिख रहा था जो कि मेरे चारो तरफ ही था। सहसा उन पेड़ पौधों से मुझे अपनी तरफ बढ़ता हुआ गाढ़ा धुआँ दिखा। मैं शिला पर चित्त लेटा हुआ था। मेरे हाथ पैर पूरी तरह आज़ाद थे लेकिन मैं उन्हें अपनी मर्ज़ी से हिला नहीं सकता था। पेड़ों के बीच से निकल कर आता हुआ वो गाढ़ा धुआँ निरंतर मेरी तरफ ही बढ़ता चला आ रहा था। मैं उस गाढ़े धुएं को देख एकदम से घबरा उठा और खुद को उस धुएं से बचाने के लिए उस शिला से उठ कर भागने का सोचा मगर उठना तो दूर की बात थी मैं हिल भी नहीं पा रहा था। उधर वो गाढ़ा धुआँ अब मेरे बेहद क़रीब आ चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे वो धुआँ नहीं बल्कि कोई भयानक यमदूत हो जो धुएं का रूप ले कर मुझे चारो तरफ से घेरते हुए आ रहा था।

उस धुएं को अपने बेहद क़रीब देख कर मैं बुरी तरह उससे बचने के लिए छटपटाने लगा मगर मेरा छटपटाना सिर्फ मेरे मन तक ही था। मैं पूरी ताक़त लगा कर उस शिला से उठ कर भाग जाना चाहता था मगर मेरी हर कोशिश बेकार थी। मेरे देखते ही देखते वो गाढ़ा धुआँ आया और मुझे अपनी चपेट में ले लिया। मैं उस गाढ़े धुएं में पूरी तरह डूब गया। डर और घबराहट से मैं बुरी तरह चीख पड़ा और तभी मेरी आँख खुल गई।

मैं बेड पर उठ कर बैठ गया था और बुरी तरह हांफते हुए इधर उधर देखने लगा था। मेरा चेहरा पसीने से तरबतर था। छत के कुंडे पर झूल रहे पंखे की हवा जैसे मुझ पर कोई असर ही नहीं डाल पा रही थी। मैंने बेड पर बिछे चादर से अपने चेहरे का पसीना पोंछा और फिर लेट कर उस सपने के बारे में सोचने लगा। ये तीसरी बार था जब मुझे इस तरह का सपना आया था। मेरे ज़हन में एक बार फिर से उस काका की बातें गूँज उठीं। पलक झपकते ही मेरे अंदर गुस्सा उभर आया। मेरा मन किया कि अभी यहाँ से जाऊं और उन लोगों का खून कर दूं जिन्होंने ऐसा कुचक्र चला रखा है।

जाने कितनी ही देर तक मैं उस सपने और मौजूदा परिस्थितियों के बारे में सोचता रहा। उसके बाद जाने कब मेरी आँख फिर से लग गई। सुबह मेनका चाची के जगाने पर ही मेरी आँख खुली। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जल्दी से गुशलखाने में जा कर नहा धो लूं क्योंकि मुझे दादा ठाकुर के साथ पंचायत पर जाना है। चाची की बात सुन कर मैं फ़ौरन ही बेड से उठा और नीचे गुशलखाने की तरफ चल पड़ा।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं बैठक में पहुंचा। पिता जी और जगताप चाचा कुछ बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही पिता जी ने मुझसे जीप निकालने के लिए कहा तो मैंने वहीं दीवार पर लगी कील से जीप की चाभी ली और बाहर निकल गया।

ये पहली बार था जब मैं पिता जी के साथ किसी पंचायत पर जा रहा था वरना इसके पहले तो ज़्यादातर जगताप चाचा ही जाते थे या फिर बड़े भ‌इया। पिता जी की जीप के पीछे दो जीपें और जाती थीं जिनमें वो लोग होते थे जो पिता जी की सुरक्षा के लिए होते थे और उनके हाथों में बन्दूखें होती थीं। ख़ैर पिता जी जीप में मेरे बगल से बैठे तो मैंने उनके आदेश पर जीप को आगे बढ़ा दिया। हमारे पीछे वो दोनों जीपें भी चल पड़ीं।

"हमने तुम्हारे लिए एक ख़ास चीज़ मंगवाई है।" रास्ते में पिता जी ने मुझसे कहा____"और तुमसे यही उम्मीद करते हैं कि उस ख़ास चीज़ का तुम ग़लत स्तेमाल नहीं करोगे।"
"ऐसी कौन सी ख़ास चीज़ है पिता जी?" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा।

"रिवाल्वर।" पिता जी ने ये कह कर मानो धमाका सा किया, और उनकी इस धमाकेदार बात को सुन कर मैं चकित भाव से उनकी तरफ देखने लगा जबकि उन्होंने मेरी तरफ एक नज़र डालने के बाद कहा____"जैसा कि तुम्हें भी पता है कि आज कल हालात कुछ ठीक नहीं हैं इस लिए हमने तुम्हारी सुरक्षा को देखते हुए यही सोचा कि तुम्हारे पास एक ऐसी चीज़ ज़रूर होनी चाहिए जिससे विकट हालात में तुम बेहतर तरीके से अपनी सुरक्षा कर सको।"

"क्या अभी भी आपको इस बात का पता नहीं चल पाया है कि हमारे खिलाफ़ जो लोग षड़यंत्र रचे हुए हैं वो कौन लोग हैं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"पहले हमें सिर्फ़ अंदेशा था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"लेकिन अब यकीन हो चुका है इस बात का। बहुत हद तक हमें ऐसे लोगों पर शक भी है लेकिन जैसा कि हम पहले भी तुमसे कह चुके हैं कि सिर्फ़ शक के आधार पर हम किसी पर भी हाथ नहीं डाल सकते, बल्कि किसी भी बात को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पुख़्ता सबूतों का होना बेहद ज़रूरी है।"

"यानि आपको ऐसे लोगों पर शक तो है लेकिन पुख़्ता सबूत न होने की वजह से आप खुद को लाचार बना के बैठे हुए हैं।" मैंने बेख़ौफ़ भाव से कहा____"आपका दरोग़ा भी आज तक मुरारी काका के हत्यारे का पता नहीं लगा पाया।"

"उसको ये तो पता चला है कि उस रात जिस नक़ाबपोश की हत्या हुई थी वो कौन था।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अभी वो ये पता नहीं लगा पाया है कि उस नक़ाबपोश को उस रात जान से मारने वाला वो सफ़ेदपोश कौन था।"

"मेरा ख़याल है कि उस सफ़ेदपोश का पता लगा पाना अब उस दरोगा के बस का है भी नहीं पिता जी।" मैंने बेझिझक कहा____"लेकिन इस मामले में मुझे कुछ ऐसा पता चला है जिसके बारे में आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं।"

"क्..क्या मतलब?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"ऐसा क्या पता चला है तुम्हें?"
"यही कि बड़े भैया के सम्बन्ध में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी झूठी है।" मैंने ये कह कर मानो धमाका सा कर दिया था।

"क्...क्या??" पिता जी बुरी तरह उछल पड़े, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोले____"ये क्या कह रहे हो तुम?"
"यही सच है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ एक नज़र डाल कर कहा____"कुल गुरु ने बड़े भैया के सम्बन्ध में जो भविष्यवाणी की है वो पूरी तरह तो नहीं लेकिन झूठी ज़रूर है। यानी अगर हम चाहें तो बड़े भैया को कुछ नहीं हो सकता।"

"ले...लेकिन।" पिता जी के मुख से बड़ी मुश्किल से अल्फ़ाज़ निकले____"ऐसा कैसे कह सकते हो तुम? आख़िर ऐसा कहने के पीछे आधार क्या है तुम्हारे पास? कुल गुरु भला हमसे झूठ क्यों कहेंगे कि तुम्हारे बड़े भाई का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"यही तो एक बड़ा षड़यंत्र है पिता जी।" मैंने पिता जी को इस तरह चकित कर देने पर मन ही मन थोड़ा विजयी महसूस किया, फिर बड़े गर्व से बोला____"आप भी जानते हैं कि कुल गुरु कोई भगवान नहीं हैं बल्कि हमारी ही तरह एक आम इंसान ही हैं और इंसान से डरा धमका कर कुछ भी कराया जा सकता है।"

"मतलब तुम ये कहना चाहते हो कि किसी ने कुल गुरु को बुरी तरह डराया धमकाया?" पिता जी ने पहले जैसे ही चकित भाव से कहा____"और उनसे हमारे बड़े बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी करवाई?"

"बिल्कुल।" मैंने ज़ोर दे कर कहा____"अब क्योंकि आप कुल गुरु की बातों पर आँख बंद कर के भरोसा कर लेंगे इस लिए इस बात को आप ख़्वाब में भी नहीं सोच सकेंगे कि कुल गुरु ने ऐसा किसी के डराने धमकाने से कहा होगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी तुरंत कुछ न बोल सके थे। मेरी तरफ ऐसे देखने लगे थे मानो मैं कोई अजूबा था। वैसे मौजूदा परिस्थितियों में मैं उनके लिए अजूबा ही तो बन गया था।

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा कुछ हो सकता है।" उन्होंने सोचने वाले भाव से किन्तु गंभीरता से कहा____"कुल गुरु ऐसे नहीं हैं कि वो किसी के डराने या धमकाने से हमारे बेटे के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल देंगे। तुम्हें जहां से भी ये सब बातें पता चली हैं वो निहायत ही फ़र्ज़ी और बकवास हैं।"

"आप ऐसा इस लिए कह रहे हैं क्योंकि आपको कुल गुरु पर खुद से ज़्यादा भरोसा है और आपकी नज़र में वो कभी भी किसी से झूठ नहीं बोल सकते।" मैंने कहा____"जबकि आपके इसी विश्वास का फ़ायदा हमारे दुश्मनों ने उठाया है। हालांकि कुल गुरु ने जो कुछ आपसे कहा था वो यकीनन हो जाने वाला है। यानी एक तरह से उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं होगी लेकिन ये सब ऐसा हर्गिज़ नहीं होगा जिसे प्राकृतिक कहा जा सके।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने झुंझलाते हुए कहा____"कभी कहते हो कि कुल गुरु ने झूठी भविष्यवाणी की थी और कभी कहते हो कि उनकी भविष्यवाणी ग़लत भी नहीं है। आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?"

"क्या आप ये सोच सकते हैं कि बड़े भैया पर किसी ने तंत्र मंत्र करवाया हो सकता है?" मैंने ये कह कर मानो एक और धमाका किया, जिस पर पिता जी ने एक बार फिर से मेरी तरफ आश्चर्य से देखा। जबकि मैंने आगे कहा____"जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने बहुत दूर का सोच कर ही ऐसा खेल रचा है। इसे सीधे तरीके से यूं समझिए कि किसी ने बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवा दिया और हमारे कुल गुरु द्वारा ये भविष्यवाणी आपको सुनवा दी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। कुल गुरु के कहे को आप विधाता का लेख समझ कर चुप चाप बैठ जाते। आप इस बात को स्वप्न में भी नहीं सोचते कि बड़े भैया के साथ किसी ने तंत्र मंत्र किया हो सकता है जिसके लिए आपको किसी ऐसे तांत्रिक से या किसी जादू मंतर करने वाले के पास जाना चाहिए जो भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का इलाज़ कर सके। ज़ाहिर है जब आप ऐसा कुछ करते ही नहीं तो उस तंत्र मंत्र के प्रभाव से बड़े भैया एक दिन ज़रूर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते और आप यही समझते रहते कि ये सब विधाता का ही लेख था। षड़यंत्र करता ने जिस मकसद से ये षड़यंत्र रचा था उसमें वो बड़ी आसानी से सफल हो जाता। वो अपनी दुश्मनी के चलते आपके बड़े बेटे को इतनी आसानी से ख़त्म कर देता और आप अपने बेटे की हुई इस अकस्मात मौत को विधी का लेख ही समझते रहते।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एक बार फिर से मुझे वैसे ही देखने लगे थे जैसे कि मैं कोई अजूबा होऊं। मेरा ख़याल था कि अब उनकी बुद्धि के द्वार खुल चुके थे और ऐसा मुझे उनके चेहरे को देख कर आभास भी होने लगा था।

"यकीनन।" पिता जी गहरी सांस लेते हुए गंभीरता से कह उठे____"हम यकीनन ऐसा कुछ नहीं सोच सकते थे। तुमने बिल्कुल सही कहा कि जिस किसी ने भी ये षड़यंत्र रचा है उसने काफी दूर का सोच कर ही रचा है और इसके लिए उसने हमारे कुल गुरु को भी माध्यम बना लिया। हैरत की बात है कि हमारे कुल गुरु ने उनके कहने पर ऐसा कैसे कह दिया हमसे?"

"बताया न पिता जी कि इंसान से डरा धमका कर कुछ भी करवाया जा सकता है।" मैंने जीप को दाएं तरफ मोड़ते हुए कहा____"कुल गुरु को उन लोगों ने डराया धमकाया होगा या फिर किसी चीज़ से उन्हें मजबूर कर दिया गया होगा।"

"लेकिन तुम्हें ये सब बातें कहां से पता चलीं?" पिता जी ने मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा____"किसने बताया तुम्हें और कब बताया?"

"मुझे ये बातें कल शाम को हमारे ही गांव के एक आदमी द्वारा पता चली हैं पिता जी।" मैंने कहा____"और तभी से मेरा खून ये सोच कर खौला जा रहा है कि जिस किसी ने भी मेरे भाई की मौत का ऐसा गन्दा षड्यंत्र रचा है उसको चीर फाड़ कर रख दूं।"

"नहीं, तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमें इस मामले में बहुत ही सावधानी से और बहुत ही बुद्धिमानी से काम लेना होगा। वैसे भी अभी हमें ये नहीं पता है कि ऐसा षड्यंत्रकारी कौन है? अगर हमने बिना सोचे समझे गुस्से में आ कर कोई भी कठोर क़दम उठाया तो हमारा दुश्मन सतर्क हो जाएगा।"

"आपने शायद ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि आप इस सबको विधि का लेख समझ बैठे थे।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मैं काफी समय से इस बात को देख कर हैरान था और सोच में पड़ा हुआ था कि बड़े भैया का बर्ताव अचानक से बदल कैसे जाता है। कभी तो वो मुझसे बड़ी ही ख़ुशी से बातें करते हैं और कभी उनके अंदर इतना गुस्सा और इतनी ज़्यादा नफ़रत भर जाती है कि वो मेरी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। आपको पता है अब तक वो कई बार मुझे अपने इस बदले हुए बर्ताव की वजह से थप्पड़ मार चुके हैं। मुझे समझ नहीं आता था कि आख़िर ऐसा क्या है कि वो अलग अलग समय में दो तरह का बर्ताव करते हुए नज़र आते हैं। कल जब गांव के उस काका द्वारा मुझे ये सब बातें पता चलीं तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसा वो जान बूझ कर नहीं बल्कि उस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से ही करते थे।"

पिता जी किसी गहरी सोच में डूबे हुए नज़र आने लगे थे। चेहरे पर कई तरह के भावों का आवा गवन चालू था। मैंने उन्हें इतना विचाराधीन कभी नहीं देखा था।

"हमें गुप्त रूप से कुल गुरु से मिलना होगा।" फिर उन्होंने गंभीर भाव से कहा____"उन्हीं से पता चलेगा कि उनसे हमारे बेटे के बारे में ऐसी भविष्यवाणी कराने वाला कौन था और उन्होंने किस मजबूरी के तहत ऐसी भविष्यवाणी की थी?"

"आपको जो सही लगे कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मैं भी अब अपने तरीके से कुछ करना चाहता हूं और आप इसके लिए मुझे बिल्कुल भी मना नहीं करेंगे।"

"क्या करना चाहते हो तुम?" पिता जी ने चौंकते हुए मेरी तरफ देखा____"देखो, तुम्हें फिलहाल ऐसा कुछ भी नहीं करना है जिसकी वजह से अब तक के सारे किए कराए पर पानी फिर जाए। इस मामले को हम अपने तरीके से सम्हाल लेंगे।"

"आप बेफ़िक्र रहिए पिता जी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"आप जिस आशंका के चलते मुझे कुछ भी करने से रोक रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा। हालांकि मैं तो सब कुछ डंके की चोट पर करना पसंद करता हूं लेकिन क्योंकि मुझे भी वक़्त और हालात का बखूबी एहसास है इस लिए मैं जो कुछ भी करुंगा वो ठंडे दिमाग़ से और होशो हवास में ही करुंगा।"

मेरी बात सुन कर पिता जी मेरी तरफ अपलक देखने लगे थे। जैसे समझने की कोशिश कर रहे हों कि मेरे अंदर आख़िर चल क्या रहा है? हम दोनों के बीच कुछ देर तक ख़ामोशी रही।

"और क्या बताया था गांव के उस आदमी ने तुम्हें?" पिता जी ने मुझसे पूछा जिसके जवाब में मैंने उन्हें सारी बातें बता दी जिसे सुन कर वो दंग रह गए थे। माथे पर सोचो की लकीरों का मानों जाल सा फ़ैल गया था।

"बड़ी अजीब बात है।" सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"किसी ने हवेली में दो ऐसी नौकरानियों को रखा हुआ है जो नमक तो हवेली का खा रही हैं लेकिन काम उनका कर रही हैं। ख़ैर, सोचने वाली बात है कि उस नौकरानी को ऐसे कौन से कागज़ात हमारे कमरे से निकाल कर लाने का काम सौंपा होगा उन लोगों ने? क्या हमारी ज़मीन जायदाद के कागज़ात या फिर हमारी वसीयत वाले कागज़ात?"

"अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात पूछूं आपसे?" मैंने धड़कते दिल से उनकी तरफ देखते हुए कहा तो उन्होंने सामान्य भाव से ही कहा____"क्या पूछना चाहते हो?"

"कागज़ातों के बारे में विचार कीजिए पिता जी।" मैंने कहा____"और सोचिए कि हमारे ऐसे कागज़ातों की सबसे ज़्यादा किसे ज़रूरत हो सकती है? अगर वो कागज़ात वसीयत वाले हैं तो आख़िर ऐसा कौन हो सकता है जो उस नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से उस वसीयत को चुरा लेना चाहता है? क्या ऐसा काम जगताप चाचा करवा सकते हैं? संभव है कि उनके मन में ये लालच अथवा ये भावना पनप रही हो कि हवेली का सारा कारोबार सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं की मुट्ठी में होना चाहिए।"

"इस सम्बन्ध में तुम्हारा जगताप पर इस तरह से शक करना जायज़ तो है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा____"लेकिन ये भी यकीन मानो कि ना तो उसके मन में इस तरह का कोई लालच है और ना ही वो ऐसा किसी से करवा सकता है।"

"आप इतने यकीन से जगताप चाचा के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ एक नज़र डाली____"जबकि दुनिया का एक सच यही है कि ज़र जोरु और ज़मीन के लिए आज तक कोई किसी का नहीं हुआ।"

"हमारे इस यकीन की वजह ये है कि कुछ समय पहले जब हमने वसीयत बदलवाई थी।" पिता जी ने कहा____"तब हम जगताप को भी अपने साथ ही ले गए थे और सब कुछ उससे पूछ कर ही करवाया था। एक बात और, हमने अपनी सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद के दो हिस्से भी किए थे। हालांकि जगताप इससे सहमत नहीं था पर हमने भविष्य का सोच कर ही ऐसा किया था। हमने उसे समझाया था कि समय के साथ साथ हर इंसान की सोच और मानसिकता बदल जाती है इस लिए कल को किसी भी तरह का ज़मीनी विवाद न हो इस लिए सारी संपत्ति और सारी ज़मीन जायदाद का बटवारा अभी से कर देना ज़्यादा उचित होगा। अब तुम खुद सोचो कि जिस जगताप को हिस्सा करना ही पसंद नहीं था और वो ये कहता था कि उसे ज़मीन जायदाद का मोह नहीं है बल्कि वो सिर्फ़ अपने बड़े भैया की सेवा ही करते रहना चाहता है वो किसी नौकरानी के द्वारा हमारे कमरे से ऐसे कोई कागज़ात क्यों चुराना चाहेगा?"

"जैसा कि आपने खुद कहा कि वक़्त के साथ साथ लोगों की सोच और मानसिकता भी बदल जाती है।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आज के वक़्त में जगताप चाचा की सोच और मानसिकता बदल गई हो? जिस समय आपने सम्पूर्ण संपत्ति और ज़मीन जायदाद के दो हिस्से किए थे उस समय उनकी मानसिकता भले ही वैसी रही हो लेकिन ज़रूरी नहीं कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी वो वैसी ही मानसिकता रखते हों? संभव तो ये भी है कि उस समय उन्होंने ये मोह और आपकी सेवा करने वाली बात इसी लिए कही होगी ताकि उनके द्वारा ऐसा कहने से आपके मन में वो अपने प्रति एक अटूट विश्वास बैठा सकें। उनकी योजना रही होगी कि अगर कभी भविष्य में ऐसा कुछ होता नज़र आए तो आप उन पर शक ही न कर सकें। सीधी सी बात है पिता जी कि एक पिता को अपने लिए भले ही किसी चीज़ का लालच न हो लेकिन अपनी औलाद के लिए वो बहुत कुछ कर गुज़रने की मानसिकता रख सकता है।"

"हम मानते हैं कि तुम्हारी ये बातें तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन सिर्फ तर्क़ संगत बातों से कुछ नहीं होता। अगर सच्चाई वाकई में यही है तो इस सच्चाई को साबित करने के लिए भी सबसे पहले हमारे पास किसी ठोस प्रमाण का होना ज़रूरी है। वैसे हमें यकीन है कि जगताप के मन में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमें आज तक ऐसा आभास नहीं हुआ कि उसके मन में ऐसा कुछ है।"

"मौजूदा परिस्थितियों में और कल उस गांव वाले काका के द्वारा ऐसी बातें जानने के बाद।" मैंने कहा____"मैंने इतना ज़रूर समझा है कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना हद दर्ज़े की बेवकूफ़ी होती है। बड़े भैया के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ आपको बताया उससे आप समझ ही गए होंगे कि ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप तंत्र मंत्र जैसी चीज़ों का तसव्वुर तक नहीं कर सकते थे। ये आपके भरोसे का ही नतीजा होता कि आप बड़े भैया की मौत को महज विधि का लेख समझ कर अपने बेटे की मौत पर सिर्फ़ और सिर्फ़ दुखी ही होते रहते। जहां तक मुझे याद है कुल गुरु ने अपनी भविष्यवाणी में यही कहा था कि बड़े भैया का जब अंत समय आएगा तब वो बीमार पड़ जाएंगे। अब सवाल ये है कि उनके बीमार पड़ जाने पर क्या आप या हवेली का कोई भी सदस्य सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ही बैठा रह जाता? क्या उनकी बिमारी के इलाज़ के लिए कुछ न किया जाता? क्या सब लोग सिर्फ ये सोच कर ही बैठे रहते कि कुल गुरु ने बड़े भैया के लिए ऐसी भविष्यवाणी कर दी है तो अब कुछ हो ही नहीं सकता?"

"आख़िर कहना क्या चाहते हो तुम?" पिता जी ने मेरी तरफ शख़्त भाव से देखा।
"यही कि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करना कभी कभी बहुत ही ज़्यादा ग़लत और नुक़सानदायक होता है।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैं अपने ही बाप को छोटा बच्चा समझ कर समझा रहा होऊं।

"हम मानते हैं कि हमने ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लिया था।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन हमने कुल गुरु की बातों पर भरोसा भी इसी लिए किया क्योंकि वो हमारे कुल गुरु हैं और उन पर या उनकी किसी भी बात पर शक करना हम पाप समझते थे। ख़ैर अब जब कि हमें सच का पता चल गया है तो हम यही सोच रहे हैं कि वास्तव में भीषण कलियुग आ गया है, जिसके चलते अब हमें अपने ही पूज्य गुरु पर शक करना होगा वरना भरोसा करने की स्थिति में बहुत बड़ा अनर्थ हो सकता है।"

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।

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अध्याय - 42
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अब तक....

जिस गांव में पिता जी पंचायत के लिए जा रहे थे वो गांव आ गया था इस लिए हमारे बीच इस विषय पर अब कोई बातचीत नहीं हो सकती थी। मैंने पिता जी से इतना ज़रूर कहा कि मुझे अपने तरीके से कुछ चीज़ें करने की इजाज़त दें। पिता जी मेरी बात सुन कर कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहे फिर सिर हिला कर मुझे इजाज़त दे दी लेकिन साथ ही ये भी कहा कि जो भी करना बहुत ही होशियारी से करना। मैं इजाज़त मिल जाने से अंदर ही अंदर खुश हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे अचानक ही मैं किसी पिंजरे से आज़ाद हो गया हूं और अब कुछ भी कर सकता हूं।

अब आगे....

वापस हवेली आते आते दोपहर हो गई थी। माँ ने खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने उन्हें ये कह कर इंकार कर दिया था कि मुझे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है। अपनी बुलेट ले कर मैं सीधा मुरारी के गांव निकल गया था। जैसा कि मैंने पहले भी बताया था कि इधर से जाने पर सबसे पहले गांव से बाहर मुरारी का ही घर पड़ता था। उसके घर के क़रीब पहुंचा तो घर के बाहर ही मुझे सरोज काकी मिल गई थी। मैंने उससे कहा कि थोड़ी देर में लौट कर आऊंगा और अनुराधा के हाथ का बना खाना खाऊंगा। सरोज काकी मेरी बात सुन कर मुस्कुराई और फिर हाँ में सिर हिला दिया था। उसके बाद मैं सीधा जगन के घर पहुंच गया था। जगन घर पर नहीं था। उसकी बीवी ने बताया कि गांव तरफ गए हैं। मेरे कहने पर उसने अपने बेटे को भेजा था जगन को बुला कर लाने के लिए। थोड़ी देर में जब जगन आया तो मुझे अपने घर में देखते ही पहले तो चौंका था फिर ख़ुशी से मुस्कुराने लगा था। उसने मेरे स्वागत के लिए खुद ही जल्दी से जल पान की ब्यवस्था कर दी थी।

जल पान करने के बाद मैंने जगन को बताया कि मैं उसके पास एक ख़ास काम से आया हूं। जगन मेरी बात सुन कर ख़ुशी ख़ुशी बोला कि ये उसकी खुशनसीबी है कि मैं उसके पास किसी काम से आया हूं। ख़ैर मैंने जगन को एक काम सौंपा और कहा कि जल्द से जल्द वो काम कर के मुझे बताए। जगन काम के बारे में सुन कर थोड़ा चौंका भी था और हैरान भी हुआ था लेकिन फिर बोला कि ठीक है वैभव बेटा मैं जल्दी ही ये काम कर के बताता हूं।

जगन के यहाँ कुछ देर मैं रुका और उसके घर का भी हाल चाल लिया उसके बाद मैं अपनी बुलेट ले कर मुरारी काका के घर की तरफ चल पड़ा। कल जब मैं यहाँ आया था तो अनुराधा से कह कर गया था कि दूसरे दिन मैं उसके हाथ का बना खाना खाने आऊंगा। सुबह क्योंकि मुझे पिता जी के साथ पंचायत पर जाना पड़ गया था इस लिए मुझे कुछ ज़्यादा ही देर हो गई थी। ख़ैर मुरारी काका के घर के बाहर मैंने बुलेट खड़ी की। दरवाज़ा खुला ही था तो मैं अंदर दाखिल हो गया। अंदर सरोज काकी अपने बेटे अनूप के पास बैठी थी।

"बड़ी देर लगा दी आने में बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"अनु ने बताया था कि आज तुम यहाँ पर खाना खाने आओगे तो मैं बड़ा खुश हुई थी।"
"माफ़ करना काकी।" काकी ने उठ कर बरामदे में रखी चारपाई को बिछाया तो मैं उसमें बैठते हुए बोला____"असल में सुबह पिता जी के साथ पंचायत पर चला गया था इस वजह से आने में देर हो गई वरना तुम तो जानती ही हो कि अनुराधा के हाथ का बना खाना खाने के लिए मैं भागता हुआ यहाँ आता।"

"मैंने उसे समझाया था कि खाना अच्छे से बनाना और सब कुछ तुम्हारी पसंद का ही बनाए।" काकी ने कहा____"इस चक्कर में ये सुबह जल्दी ही उठ गई थी और जल्दी नहा भी लिया था। उसके बाद खाना बनाने की तैयारी में जुट गई थी। जब तुम सुबह नहीं आए तो मैं समझ गई कि कहीं किसी काम में फंस गए होगे। तुम्हारे चक्कर में हम लोगों ने भी नहीं खाया। बस अनूप खाने के लिए रोने लगा था तो इसे खिलाया।"

"तुम भी हद करती हो काकी।" मैंने हैरानी से कहा____"मेरे चक्कर में तुम लोगों को भूखा रहने की भला क्या ज़रूरत थी? वैसे तुम्हें पता है हवेली में माँ ने मुझसे खाना खाने के लिए कहा लेकिन मैंने मना कर दिया उन्हें। अब तुम ही बताओ काकी कि यहाँ के खाने को भुला कर मैं कैसे हवेली का खाना खा लेता और वो भी तब जबकि मैंने अनुराधा से कहा हो कि मैं ज़रूर आऊंगा।"

"यानी हम लोगों की तरह तुम भी भूखे ही घूम रहे हो?" सरोज काकी हंसते हुए बोली____"ख़ैर, अब बातें छोड़ो और चलो जल्दी से हाथ मुँह धो लो। मैं तब तक बैठका लगाती हूं।"

सरोज काकी ने अनुराधा को आवाज़ दी तो वो रसोई से निकल कर बाहर आई। काकी ने उससे कहा कि वो मुझे पानी दे ताकि मैं हाथ पैर धो लूं। काकी की बात सुन कर अनुराधा कोने में रखी बाल्टी का पानी उठा कर नर्दे के पास रख दिया। मैं नर्दे के ही पास आ गया था। मैंने देखा अनुराधा के चेहरे पर अलग ही चमक थी। जैसे ही मुझसे नज़र मिलती तो वो झट से नज़रें हटा लेती और अपनी मुस्कान को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगती। मैंने उसे छेड़ने का सोचा।

"कहो ठकुराईन क्या हाल चाल हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में ये कहा तो अनुराधा बुरी तरह चौंकी और आँखें फाड़ कर मेरी तरफ देखने लगी। चेहरे पर घबराहट के भाव लिए वो धीमें से ही बोली____"मु..मुझे इस नाम से मत पुकारिए।

"ना, मैं तो अब इसी नाम से पुकारूँगा तुम्हें।" उसने लोटे में भर कर पानी दिया तो मैंने लेते हुए कहा।
"नहीं न।" अनुराधा ने बेबस भाव से कहा____"मां ने सुन लिया तो वो बहुत डाँटेगी मुझे।"

"अगर तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ठकुराईन न कहूं।" मैंने हाथ धोते हुए कहा____"तो तुम भी मुझे छोटे ठाकुर नहीं कहोगी और काकी के सामने मेरा नाम ले कर पुकारोगी।"

"पर बिना वजह कैसे पुकारूंगी मैं?" अनुराधा ने उलझनपूर्ण भाव से कहा____"वैसे मैंने कहा तो है आपसे कि अब से मैं आपका नाम ले कर ही आपको पुकारुंगी।"

"चलो अब यही तो देखना है।" मैंने खड़े होते हुए कहा____"कि तुम मुझे काकी के सामने मेरे नाम से पुकारती हो कि नहीं।"
"पर मैं बिना वजह कैसे आपको पुकारूंगी भला?" अनुराधा ने मासूमियत से कहा____"ऐसे में तो माँ गुस्सा हो जाएगी।"

"यार तुम काकी से इतना डरती क्यों हो?" मैंने उसे घूरते हुए कहा____"अच्छा मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। उपाय ये है कि जब मैं खाना खा रहा होऊंगा तो तुम रसोई से ही मेरा नाम लेकर मुझसे पूछना कि मुझे और कुछ चाहिए कि नहीं, ठीक है?"

"और अगर मेरे ऐसा कहने पर माँ ने डांटा तो?" अनुराधा ने मेरी तरफ नज़र उठा कर देखा।
"अरे! मैं हूं न।" मैंने उसे आस्वस्त किया____"काकी अगर तुम्हे डाँटेगी तो मैं काकी को अच्छे से समझा दूंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा ने हाँ में सिर हिलाया और चली गई। हाथ पैर धो कर मैं आया तो देखा काकी ने बरामदे की ज़मीन पर एक चादर बिछा दी थी और उसके सामने एक लकड़ी का पीढ़ा रख दिया था जिसके बगल से लोटा ग्लास में पानी रखा हुआ था। मैं आया और उसी चादर में बैठ गया। काकी मेरे पास ही कुछ दूरी पर बैठ गई। कुछ ही देर में अनुराधा थाली ले कर आई और उस लकड़ी के पीढ़े पर रख दिया। थाली में वो सब कुछ था जो मुझे इस घर में सबसे ज़्यादा खाना पसंद था।

खाना शुरू हुआ और खाने के दौरान काकी से इधर उधर की बातें भी शुरू हो ग‌ईं। ये अलग बात है कि मेरा ध्यान काकी से बातों में कम बल्कि इस बात पर ज़्यादा था कि अनुराधा कब रसोई से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारती है। इस बीच कई बार अनुराधा रसोई से निकल कर आई और थाली में कुछ न कुछ रख कर चली गई लेकिन एक बार भी उसने वो न किया जो कहने का हमारे बीच समझौता हुआ था। यहाँ तक कि मैं खाना भी खा चुका और हाथ धो कर चारपाई पर भी जा बैठा। इस बात से मुझे अनुराधा पर बेहद गुस्सा आया हुआ था। अभी मैं अपने अंदर उभरे इस गुस्से को काबू में कर ही रहा था कि तभी सरोज काकी का बेटा अनूप काकी से कहने लगा कि उसे दिशा मैदान जाना है। वो पेट पकड़े काकी के सामने आ कर खड़ा हो गया था।

"बेटा तुम यहीं बैठना।" काकी मेरी तरफ देखते हुए बोली____"मैं इसे दिशा मैदान करा के लाती हूं।"
"ठीक है काकी।" मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि काकी के चले जाने से मुझे अनुराधा के साथ अकेले रहने का मौका मिल गया है लेकिन प्रत्यक्ष में बोला____"लेकिन जल्दी ही आना क्योंकि मुझे हवेली जल्दी जाना है।"

काकी अनूप को ले कर दूसरे वाले दरवाज़े से घर के पीछे की तरफ चली गई। काकी के जाते ही मानो फ़िज़ा में सन्नाटा छा गया। मेरा दिल किया कि अभी उठूं और पलक झपकते ही रसोई में अनुराधा के पास पहुंच जाऊं। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अनुराधा रसोई से निकल कर बाहर आई।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए दीन हीन भाव से कहा____"मां के सामने आपका नाम ले कर आपको पुकारने की मुझमें हिम्मत ही न हुई थी। हर बार सोचती थी कि अब पुकारूंगी आपको लेकिन माँ के डर से पुकारा ही नहीं गया मुझसे। माफ़ कर दीजिए मुझे।"

"तुम्हें पता है इस वक़्त मुझे कैसा महसूस हो रहा है?" मैंने संजीदा भाव से कहा____"ऐसा लग रहा है जैसे सरे-बाज़ार लुट गया हूं मैं। भरी महफ़िल में जैसे किसी ने मेरी इज़्ज़त का जनाजा निकाल दिया हो।"

"भगवान के लिए ऐसा मत कहिए।" अनुराधा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"मुझे खुद भी बहुत बुरा लग रहा है कि मैंने आपका कहा नहीं माना लेकिन यकीन मानिए माँ के सामने मुझसे कुछ बोला ही नहीं गया।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने जब देखा कि अनुराधा की आँखें नम हो गई हैं तो मुझे एहसास हुआ कि ग़लती उसकी नहीं थी। यकीनन अपनी माँ के सामने उससे बोला नहीं गया होगा। उसकी हालात को समझते हुए मैंने आगे कहा____"मैं समझ सकता हूं कि तुम्हारे लिए ये इतना आसान नहीं था। तुमने कोशिश की यही बड़ी बात है।"

"क्या आप नाराज़ हैं?" उसने मासूमियत से मेरी तरफ देखते हुए पूछा।
"यही तो समस्या है कि मैं तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम वो लड़की हो जिसने मुझ जैसे इंसान को मुकम्मल तौर पर बदल दिया है। तुम सच में एक अच्छी लड़की हो अनुराधा। मैं अगर चाहूं भी तो तुमसे नाराज़ नहीं हो सकता। कभी कभी सोचता हूं कि क्या तुमने कोई जादू कर दिया है मुझ पर?"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" अनुराधा बुरी तरह चौंकी।
"वही जो मैं महसूस करता हूं।" मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा____"कुछ तो किया ही है तुमने। कभी खुद भी सोचना इस बारे में।"

"पता नहीं आप ये क्या बोले जा रहे हैं।" अनुराधा ने सिर झुका कर कहा____"मैं तो बस इतना जानती हूं कि मैं किसी के साथ कुछ भी करने का सोच भी नहीं सकती।"

"छोड़ो इस बात को।" मैंने कहा____"मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि आज कल वक़्त और हालात ठीक नहीं हैं इस लिए अपना और अपने परिवार का ख़याल रखना। एक बात और, अगर किसी भी तरह की ऐसी वैसी कोई बात समझ में आए तो सीधा उस जगह पर चली जाना जहां पर मेरा नया मकान बन रहा है। वहां पर तुम्हें भुवन नाम का एक आदमी मिलेगा, उसे तुम बता देना।"

"क्या कुछ होने वाला है वैभव जी?" अनुराधा ने मेरा नाम ले कर कहा____"क्या वो साहूकार का लड़का फिर से कुछ करने वाला है?"

"किसी का भरोसा नहीं है अनुराधा।" मैंने कहा____"कौन कब क्या करेगा इस बारे में ठीक से कुछ नहीं कह सकते। इसी लिए कह रहा हूं कि ख़याल रखना। रात में दरवाज़े अच्छे से बंद कर के रखना, और अगर कोई दरवाज़ा खुलवाए तो पहले ये जान लेना कि बाहर कौन है। कोई अजनबी कितना भी ज़ोर देकर कहे मगर दरवाज़ा मत खोलना।"

"आपकी ये बातें सुन कर तो मुझे अब घबराहट होने लगी है वैभव जी।" अनुराधा ने चिंतित भाव से कहा____"आज तक मेरे बाबू जी के हत्यारे का पता नहीं चला। हमारा ये घर वैसे भी गांव से बाहर अलग बना हुआ है जिससे अगर कोई ऐसी बात हुई भी तो जल्दी से कोई हमारी मदद के लिए नहीं आ सकता।"

"फ़िक्र मत करो।" मैंने कहा____"मेरे रहते ऐसी वैसी कोई बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों की सुरक्षा का कोई अच्छा सा इंतजाम कर दूंगा।"

अभी मैं उससे बात ही कर रहा था कि तभी अनुराधा का भाई अनूप दूसरे वाले दरवाज़े से आँगन में दाखिल हुआ। उसे देख अनुराधा जल्दी से मुझसे दूर चली गई। अनूप के पीछे सरोज काकी भी आ गई। थोड़ी देर मैं वहां रुका उसके बाद बुलेट ले कर शहर की तरफ निकल गया। समय आ गया था कुछ अलग करने का और कुछ ज़रूरी काम करने का।

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उस वक़्त शाम ढल चुकी थी।
हमारे गांव से क़रीब तीस किलो मीटर की दूरी पर एक गांव था जिसका नाम था नाहरपुर। नाहरपुर के पास ही एक जंगल था। उस जंगल के बीच में ही वो तांत्रिक अपने परिवार के साथ रहता था जिसके बारे में जगन काका ने पता कर के मुझे बताया था। मैं और जगताप चाचा अपने कुछ आदमियों के साथ जीप में वहां पहुंचे थे। जंगल के अंदर जीप नहीं जा सकती थी इस लिए जीप को बाहर ही खड़ी कर के हम सब जंगल के अंदर की तरफ गए थे। हम सबके हाथों में बड़ी बड़ी बन्दूखें थी जबकि मेरे पास पिता जी द्वारा दिया हुआ रिवाल्वर था। जंगल के बीचो बीच तांत्रिक की एक बड़ी सी कुटिया बनी हुई थी। उस कुटिया के अगल बगल और भी दो कुटिया बनी हुईं थी। हम सब के अंदर बेहद गुस्सा भरा हुआ था, ख़ास कर मेरे अंदर मगर जैसे ही हम सब तांत्रिक की कुटिया के पास पहुंचे तो वहां के वातावरण में गूंजते चीखो पुकार को सुन कर हम सब एकदम से रुक गए थे।

हम लोगों को समझ न आया था कि आख़िर ये चीखो पुकार किस बात का था? एक दो औरतें थी और दो तीन लड़के लड़कियां। सबके सब दहाड़ें मार मार कर रो रहे थे। मुझे किसी बात की आशंका हुई तो मैंने जगताप चाचा को फ़ौरन ही कुटिया के पास पहुंचने को कहा था। जब हम सब वहां पहुंचे तो रोने धोने की आवाज़ और भी तेज़ सुनाई देने लगी। जगताप चाचा ने हमारे एक आदमी को कुटिया के अंदर जा कर पता करने को कहा। आदमी गया और थोड़ी ही देर में उसने बताया कि अंदर एक औरत है जो किसी की लाश के पास बैठी बुरी तरह रो रही है और उसके साथ उसके छोटे बड़े बच्चे भी रोए जा रहे हैं।

हम सब तेज़ी से अंदर दाख़िर हुए। हम लोगों को देख कर उन सबका रोना धोना एकदम से बंद हो गया। जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि किसी ने उसके तांत्रिक पति की हत्या कर दी है। उसकी बात सुन कर जहां जगताप चाचा स्तब्ध रह गए थे वहीं मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों तले से ज़मीन ही गायब हो गई हो। दिलो दिमाग़ कुछ पलों के लिए मानो कुंद सा पड़ गया था। फिर जब ज़हन ने काम करना शुरू किया तो मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात आई कि षड्यंत्रकारियों को शायद पता चल गया होगा कि उनका भेद खुल चुका है इस लिए उन्होंने उस तांत्रिक की भी जान ले ली जिसके द्वारा हम उनके पास पहुंच सकते थे। पलक झपकते ही सारे किए कराए पर पानी फिर गया था। सारी मेहनत और सारी होशियारी बेकार साबित हो गई थी।

जगताप चाचा के पूछने पर उस औरत ने बताया कि सुबह के क़रीब ग्यारह बजे उसका तांत्रिक पति किसी काम के सिलसिले से कुटिया से गया था। जब वो दिन ढलने के बाद भी वापस न आया तो उसने अपने सोलह वर्षीय बेटे को उसका पता लगाने के लिए भेजा था। उसके बाद जब उसका बेटा वापस आया तो उसके साथ में उसका मरा हुआ पति भी था जिसके पेट में किसी तेज़ धार वाले हथियार के कई सारे गहरे घाव थे। उसका बेटा अपने पिता की लाश को बड़ी मुश्किल से बांस की बनाई गई अर्थी में लिटा कर लाया था।

तान्त्रिक की बीवी कोई पचास के आस पास वाली उम्र की औरत थी। उसके चार बच्चे थे। जिनमें से पहले एक पच्चीस वर्षीय शादी शुदा बेटी थी और फिर एक सोलह वर्षीय वही बेटा जो अपने पिता की लाश को ले कर आया था। उसके बाद दो और बच्चे थे जिनमें से एक लड़का और एक लड़की थी। तांत्रिक की बीवी ने बताया कि अभी डेढ़ घंटे पहले ही उसका बेटा अपने पिता की लाश ले कर आया था। बेटे के अनुसार तांत्रिक की लाश जंगल में ही एक जगह पड़ी मिली थी।

मैंने और जगताप चाचा ने उस औरत से ज़्यादातर यही जानने की कोशिश की थी कि तांत्रिक की हत्या किसने की होगी और पिछले कुछ समय से ऐसे कौन से लोग उससे मिलने आए थे। हमारे पूछने पर उस औरत का जवाब यही था कि उसके तांत्रिक पति के पास बहुत से लोग आते थे इस लिए वो ये नहीं बता सकती कि किसने उसके पति की हत्या की होगी। मैं समझ गया था कि अब यहाँ पर हमें ऐसी कोई भी जानकारी नहीं मिल सकती थी जिससे ये पता चल सके कि तांत्रिक को किसने मेरे बड़े भाई और मुझ पर तंत्र क्रिया करने के लिए कहा होगा?

किसी हारे हुए जुआंरी की तरह हम सब वहां से वापस चल पड़े थे। मुझे उम्मीद थी कि हवेली में पिता जी से इस बारे में ज़रूर कुछ ऐसा पता चलेगा क्योंकि वो कुछ आदमियों के साथ कुल गुरु से मिलने गए हुए थे। हम रात के क़रीब आठ बजे हवेली पहुंचे थे। हमें नहीं पता था कि हवेली में एक नया ही काण्ड हुआ देखने को मिलेगा।

पिता जी वापस आ चुके थे। ये देख कर मेरे मन में सब कुछ जानने की ब्याकुलता और उत्सुकता भर गई थी लेकिन जल्दी ही पता चला कि हवेली की एक नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली है। हवेली में इस बात के चलते बड़ा अजीब सा माहौल छाया हुआ था।

"ये सब कैसे हुआ बड़े भैया?" जगताप चाचा ने उस नौकरानी की लाश को देखते हुए पूछा____"ऐसी क्या बात हुई कि इसने ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर ली?"
"यही तो हमारी समझ में भी नहीं आ रहा जगताप।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"अभी कुछ देर पहले जब हम यहाँ आए तभी हमें पता चला कि ये नौकरानी हवेली के एक कमरे में मेनका को मरी हुई मिली थी।"

"बड़ी हैरत की बात है।" जगताप चाचा ने सोचपूर्ण भाव से कहा____"पर इसने ऐसा क्यों किया होगा? वैसे ये मेनका को कब मिली थी?"
"जब तुम लोग यहाँ से गए थे तब।" पिता जी ने कहा____"किसी काम के लिए जब इसको हवेली में खोजा गया तो ये किसी को नज़र ही नहीं आई थी। तुम्हें तो पता ही है कि कुछ नौकरानियाँ शाम का अपना काम करने के बाद अपने अपने घर चली जाती हैं। मेनका ने बाकी नौकरानियों को भी इसकी खोज में लगाया और खुद भी खोजती रही। काफी खोजबीन के बाद मेनका को ये ऊपर के उस कमरे में मिली जो हमेशा खाली ही रहता है।"

"इसके घर वालों को सूचित किया गया या नहीं?" सहसा मैंने पूछने की हिमाक़त की।
"हवेली में इस तरह इसकी लाश को देख कर सब घबरा गए थे।" पिता जी ने बताया____"इस लिए किसी ने इसके घर वालों तक ख़बर नहीं भेजवाई थी लेकिन अब भेजवाना ही पड़ेगा।"

"हवेली में इस तरह किसी नौकरानी का खुद ख़ुशी कर लेना बहुत सी संगीन बात है पिता जी।" मैंने कहा____"गांव वालों को पता चला तो लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे। गांव के साहूकार तो और भी इस मामले को उछालेंगे। हमें बहुत ही सोच समझ कर इस बारे में कोई काम करना होगा।"

"हमने दरोगा को इत्तिला भेजी है।" पिता जी ने कहा____"वो आएगा और इस मामले की जांच करेगा। जगताप तुम इसके घर वालों तक ख़बर भेजवा दो और उन्हें समझाओ कि ये जो कुछ भी हुआ है उसकी पूरी ईमानदारी से जांच करवाई जाएगी। हालांकि मामला खुद ख़ुशी का है लेकिन ये पता करने की ज़रूर कोशिश की जाएगी कि इसने खुद ख़ुशी क्यों की अथवा इसे खुद ख़ुशी करने पर किसने मजबूर किया था?"

"जो हुकुम बड़े भइया।" जगताप चाचा ने सिर नवा कर कहा और हवेली से बाहर चले गए।

मुझे इस सबकी ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। न तो उस तांत्रिक की इस तरह हत्या हो जाने की और ना ही इस नौकरानी के इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने की। सहसा मुझे उस नौकरानी का ख़याल आया जो उस रात विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी। मैंने आस पास नज़र घुमाई लेकिन वो नज़र न आई। मैंने सोचा इस नौकरानी की इस तरह खुद ख़ुशी कर लेने से कहीं वो भी न कुछ कर बैठे या फिर उसके साथ कोई कुछ कर न दे। मैं फ़ौरन ही अंदर की तरफ भागा और उसकी खोज करने लगा लेकिन वो मुझे नज़र न आई। उसके न मिलने से मेरे मन में तरह तरह की आशंकाए उभरने लगीं और साथ ही ये सोच कर मुझे घबराहट सी भी होने लगी कि अगर वो न मिली या उसके साथ कुछ हो गया तो मेरे हाथ से एक और मौका निकल जाएगा। मैं पागलों की तरह हवेली के ज़र्रे ज़र्रे पर उसे खोज रहा था लेकिन उसे तो मानो मिलना ही नहीं था। अचानक मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि कहीं वो हवेली से खिसक न गई हो। उसने देखा होगा कि एक नौकरानी ने खुद ख़ुशी कर ली है तो उसके मन में भी यही ख़याल आया होगा कि कहीं वो भी पकड़ी न जाए इस लिए मौका देख कर भाग निकली होगी।

मैं फ़ौरन ही हवेली से बाहर निकला। अपने साथ एक आदमी को लिया और तेज़ क़दमों से चलते हुए उस औरत के घर की तरफ चल पड़ा। मैं उसे इस तरह हाथ से नहीं निकल जाने देना चाहता था। अगर उसके साथ कुछ हो गया तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जानी थी। एक वही थी जो मुझे बता सकती थी कि वो कुसुम को किस बात पर मजबूर किए हुए थी या फिर ये कहूं कि विभोर और अजीत उसे कौन सी पट्टियां पढ़ा कर मेरे खिलाफ़ किए हुए हैं?

क़रीब दस मिनट लगे मुझे उस औरत के घर तक पहुंचने में। वो औरत हमारे गांव की ही थी। उसके घर वाले हमारे खेतों में काम करते थे। उसका पति बाहर ही चारपाई पर बैठा मिल गया। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो जल्दी से चारपाई से उठा और हाथ जोड़ कर सलाम किया। मैंने बिना किसी भूमिका के उससे पूछा कि उसकी बीवी कहां है? वो मेरे पूछने पर थोड़ा घबरा सा गया और बोला कि अभी अभी वो दिशा मैदान के लिए गई है। मैंने उस आदमी से दूसरा सवाल यही पूछा कि दिशा मैदान के लिए वो किस तरफ गई है। उस आदमी के बताने पर मैं अपने आदमी के साथ फ़ौरन ही उस तरफ बढ़ चला। औरत का पति बुरी तरह डर गया था और उलझन में पड़ गया था। इधर मैं यही सोच रहा था कि रात के साढ़े आठ बजे उस औरत का दिशा मैदान के लिए जाना क्या स्वभाविक हो सकता है या इसके पीछे कोई और वजह हो सकती है? आम तौर पर गांव की औरतें दिन ढले ही दिशा मैदान के लिए निकल जाती थीं।

इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।
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अध्याय - 43
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अब तक....

इसे किस्मत कहिए या इत्तेफ़ाक़ कि मैं अपने आदमी के साथ बिल्कुल सही दिशा में ही आया था क्योंकि वो औरत हल्की चांदनी रात में मुझे कुछ दूरी पर दिख गई थी। वो तेज़ी से बढ़ी चली जा रही थी। मैंने अपने आदमी को इशारा किया कि वो भाग कर जाए और उसे पकड़ ले। मेरा हुकुम मिलते ही शम्भू नाम का मेरा आदमी उस औरत की तरफ भाग चला। अपने क़रीब जैसे ही किसी के दौड़ते हुए आने का आभास हुआ तो उस औरत ने पलट कर देखा और बुरी तरह डर कर उसने भागना ही चाहा था कि लड़खड़ा कर वहीं ज़मीन पर गिर गई। जब तक वो सम्हल कर खड़ी होती तब तक शम्भू किसी जिन्न की तरह उसके सिर पर जा खड़ा हुआ था। उसके बाद शम्भू ने उस औरत की कलाई पकड़ी और ज़बरदस्ती खींचते हुए उसे मेरे पास ले आया। मुझ पर नज़र पड़ते ही मानो उस औरत की नानी मर गई।

अब आगे....

शीला नाम की वो नौकरानी मुझे देख कर बुरी तरह डर गई थी। इससे पहले कि वो शंभू की पकड़ से छूट कर भागने की कोशिश करती मैंने शंभू को उसे बेहोश करने को कहा। हट्टे कट्टे शंभू ने मेरे हुकुम का फौरन ही पालन किया। उसने बिजली की सी तेज़ी दिखाते हुए शीला की कनपटी पर एक कराट मारी। परिणामस्वरूप शीला अगले ही पल उसकी बाहों में झूलती नज़र आई। मैंने शंभू से कहा कि इसे फ़ौरन ही अपने कंधे पर लाद कर हमारे बगीचे वाले मकान में ले चले।

कुछ ही समय में हम अपने बगीचे वाले मकान में थे। मकान के एक कमरे में शंभू ने शीला को एक चारपाई पर लेटा दिया। मैं क्योंकि समझ चुका था कि शीला भी उस नौकरानी की ही तरह हमारे दुश्मन का काम कर रही थी इस लिए मैंने शंभू से कहा कि वो शीला की तलाशी ले। मुझे अंदेशा था कि कहीं इसके पास भी कोई ज़हर वगैरा न हो जिसकी वजह से होश में आते ही वो अपनी जान लेने की कोशिश करे। मेरे कहने पर शंभू ने शीला की तलाशी ली लेकिन उसके पास से कुछ भी नहीं मिला। उसके बाद मैंने शंभू से उसको होश में लाने के लिए कहा तो शंभू तेज़ी से बाहर गया और फौरन ही कुएं से बाल्टी में पानी ले आया और उस पानी को शीला के चेहरे पर छिड़कने लगा। जल्दी ही शीला को होश आ गया। मैंने शंभू से कहा कि अब वो बाहर जाए और बाहर से निगरानी रखे।

"मु...मुझे यहां क्यों लाए हैं छोटे ठाकुर?" होश में आते ही शीला बुरी तरह घबराई हुई आवाज़ में बोल पड़ी थी____"क्..क्या आप मेरे साथ कुछ ऐसा वैसा करने वाले हैं?"

"क्या लगता है तुझे?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सर्द लहजे में कहा____"क्या तू इतनी खूबसूरत है कि तुझे देख कर मेरा ईमान डोल जाएगा? क्या तेरा जिस्म ऐसा है कि विभोर और अजीत की तरह मैं भी तुझे चाटना शुरू कर दूंगा?"

"ये...ये आप क्या कह रहे हैं छोटे ठाकुर?" शीला एकदम से बौखला कर बोली____"देखिए, मैं ऐसी वैसी नहीं हूं। भगवान के लिए मुझे छोड़ दीजिए।"

"तू कैसी है ये मैं अपनी आंखों से देख चुका हूं साली रण्डी।" मैंने ज़ोर से उसके गाल पर थप्पड़ मार कर कहा। थप्पड़ लगते ही वो लड़खड़ा गई थी, और मारे डर के उसके माथे पर पसीना उभर आया था। जबकि मैंने शख़्त लहजे में कहा____"उस रात तू ही थी ना जो सीढ़ियों से नीचे भागते हुए गई थी और जब मैंने तेरा पीछा किया तो तू नीचे कहीं छिप गई थी? उसके बाद दूसरी बार मैंने कुसुम के कमरे से तुम लोगों की सारी बातें सुनी थी जब तू विभोर और अजीत के साथ मज़े कर रही थी।"

"मु...मुझे माफ़ कर दीजिए छोटे ठाकुर।" मेरी बातें सुनते ही शीला जल्दी से मेरे पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए बोल पड़ी____"मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई है, लेकिन इसमें भी मेरा कोई दोष नही है। वो तो आपके उन दोनों भाइयों ने मुझे अपने जाल में फांस लिया था और मैं भी थोड़े धन के लालच में आ गई थी। भगवान के लिए मुझे इस सबके लिए माफ़ कर दीजिए। मैं क़सम खाती हूं कि आज के बाद ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी।"

"मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि तू विभोर और अजीत दोनों के ही साथ गुलछर्रे उड़ा रही है।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"मुझे सिर्फ ये बता कि तू उन दोनों के कहने पर कुसुम को किस बात पर मजबूर कर रही थी? आख़िर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिसके चलते कुसुम चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर हर रोज़ मुझे देने आती है?"

"मु...मुझे कुछ नहीं पता छोटे ठाकुर।" शीला एकदम से हड़बड़ा गई, बोली____"भगवान के लिए मुझ पर यकीन कीजिए।"

"अगर तू सच नहीं बताएगी।" मैंने उसके सिर के बालों को पकड़ कर उठाते हुए कहा जिससे वो दर्द से बिलबिला उठी____"तो तू सोच भी नहीं सकती कि मैं तेरा क्या हाल कर सकता हूं। तुझे शायद पता नहीं है कि कुसुम मेरी बहन ही नहीं बल्कि मेरी जान भी है और कोई उसे किसी तरह से मजबूर कर के दुख दे तो ये मैं किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकता। मेरी मासूम बहन को दुख देने वाले को मैं एक पल भी ज़िंदा नहीं रहने दूंगा।"

मेरी बात सुन कर शीला का चेहरा डर और दहशत से पीला ज़र्द पड़ गया था। वो थरथर कांप रही थी। नज़र उठा कर मुझे देखने की भी हिम्मत नहीं थी उसमें। जब काफी देर तक भी वो कुछ न बोली तो मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

"मैं तुझसे आख़िरी बार पूंछ रहा हूं।" मैंने कठोरता से कहा____"मुझे बता कि मेरी बहन को किस बात पर इतना मजबूर करती है कि वो मुझे चाय में नामर्द बना देने वाली दवा मिला कर पिलाने पर मजबूर हो जाती है? बता वरना तुझे नंगा कर के पूरे गांव में दौड़ाऊंगा और अपनी जिस चूंत पर तू विभोर और अजीत का लंड लेती है न उसमें लोहे का गरमा गरम सरिया डाल दूंगा।"

"अ...अगर मैंने आपको इस बारे में कुछ बताया तो वो लोग मुझे जान से मार देंगे।" शीला ने रोते हुए कहा____"भगवान के लिए मुझ पर दया कीजिए। मैं क़सम खाती हूं कि अब से ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी। आप कहेंगे तो मैं ये गांव ही छोड़ कर चली जाऊंगी।"

"तेरे जैसी घटिया औरत को ज़िंदा रहने का कोई हक़ नहीं है।" मैंने गुस्से में दांत पीसते हुए कहा____"अब तक तूने जो पाप किए हैं उसका प्रायश्चित यही है कि तू मुझे सब कुछ सच सच बता दे। अगर नही बताएगी तो यहां से भी तू ज़िंदा नहीं जा पाएगी।"

मेरी बात सुन कर शीला ने बेबसी का घूंट पिया और अपने आंसू पोंछने लगी। उसके चेहरे के बदलते भावों से ऐसा ज़ाहिर हुआ मानों वो कोई फ़ैसला कर रही हो। जितना वो बताने में देरी कर रही थी उतना ही मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था जिसे मैं बड़ी मुश्किल से रोके हुए था।

"ठ..ठीक है छोटे ठाकुर।" फिर उसने लरज़ते स्वर में कहा____"मैं आपको सब कुछ बताऊंगी लेकिन क्या फिर आप मुझे यहां से जाने देंगे?"

"पहले तू मुझे सब कुछ सच सच बता।" मैंने गुस्से से कहा____"तेरी बातें सुनने के बाद ही मैं सोचूंगा कि मुझे तेरे साथ क्या करना है।"

"ये बात तब की है जब आपको दादा ठाकुर ने गांव और समाज से बहिष्कृत कर के निकाल दिया था।" शीला ने गहरी सांस लेते हुए कहा_____"आपको इस तरह निकाले जाने से हवेली में लगभग सभी दुखी थे, खास कर आपकी लाडली बहन कुसुम। दिन ऐसे ही गुज़र रहे थे और गुज़रते समय के साथ सब कुछ सामान्य होता जा रहा था। आपकी बहन से मिलने उनकी कुछ सहेलियां हवेली आती थीं और वो घंटों कुसुम जी के कमरे में रहती थीं। आपके दोनों चचेरे भाई कुसुम जी की उन सहेलियों को भोगना चाहते थे लेकिन डर की वजह से उनका मंसूबा पूरा नहीं हो पा रहा था। मैं जो कि पहले से ही उनकी दासी बनी हुई थी इस लिए मैं उनके मंसूबों से अंजान नहीं थी। मैंने सोचा कि अगर मैं उन दोनों का काम कर दूं तो शायद वो खुश हो कर मुझे और भी रुपया पैसा देंगे। ये सोच कर मैं कुसुम जी पर नज़र रखने लगी। जब भी उनकी सहेलियां उनसे मिलने आतीं तो मैं चुपके से उनके कमरे के पास पहुंच जाती और ये जानने समझने की कोशिश करती कि अंदर कमरे में वो क्या बातें करती हैं। यूं तो मुझे इस तरह से कोई फ़ायदा नही हो रहा था लेकिन अचानक से एक दिन मुझे कुछ ऐसा पता चला जो मेरे लिए चकित कर देने वाला था।"

"ऐसा क्या पता चला था तुझे?" मैं उससे पूंछे बगैर न रह सका था।
"दिन के समय आपके दोनों चचेरे भाई और आपके बड़े भाई साहब हवेली में नहीं रहते थे।" शीला ने बताना शुरू किया____"शायद यही वजह थी कि उन लोगों को ऐसा कुछ करने की हिम्मत हुई थी। उस दिन जब कुसुम जी की सहेलियां उनसे मिलने आईं तो मैं भी कुछ देर बाद सबकी नज़र बचा कर ऊपर उनके कमरे के पास पहुंच गई और दरवाज़े से कान लगा कर उनकी बातें सुनने की कोशिश करने लगी। असल में उनकी बातें सुनने का मेरा सिर्फ़ यही मतलब था कि मैं जान सकूं कि कुसुम जी की सहेलियां हवेली के सभी लड़कों के बारे में किस तरह की बातें करती हैं? अगर बातें करती हैं तो ये मेरे लिए अच्छी बात होती क्योंकि उस सूरत में में सीधे उनसे बात कर सकती थी या फिर उन्हें आपके दोनों चचेरे भाईयों के लिए तैयार कर सकती थी। ख़ैर, मैं दरवाज़े पर कान लगाए अंदर की बातें सुनने लगी थी। तभी मुझे अंदर से ऐसी आवाज़ें सुनाई दीं जिन्हें सुन कर पहले तो मुझे यकीन न हुआ लेकिन फिर जब आवाज़ें अनवरत आती ही रहीं तो मैं बुरी तरह आश्चर्य चकित रह गई। मैं कुसुम जी को बहुत ही सीधी सादी और शरीफ़ लड़की समझती थी जबकि कमरे के अंदर से जिस तरह की आवाज़ें आ रही थीं उससे मैं हैरान हो गई थी। आवाज़ों से साफ था कि अंदर कमरे में कुसुम जी अपनी दोनों सहेलियों के साथ एक अनोखे सुख का आनंद ले रहीं थी। जिसके चलते उनके मुख से आनन्द भरी आहें और सिसकियां निकल रही थीं। मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि कुसुम जैसी शरीफ़ लड़की अपनी सहेलियों के साथ ऐसा करने का सोच भी कैसे सकती है? पर क्योंकि मैं ये समझती थी कि ऐसा इस उमर में होता ही है। मैं ये भी समझ गई थी कि ऐसे आनंद का ज्ञान ज़रूर उनकी सहेलियों ने ही उन्हें दिया होगा। ख़ैर, बाहर खड़े हो कर सुनने से मेरे मन में अब ये देखने की उत्सुकता जाग गई कि कमरे के अंदर वो किस तरह से इस तरह का आनंद ले रही होंगी? उनके कमरे में कोई खिड़की तो थी नहीं जिससे मैं उन्हें देख पाती, लेकिन सहसा मैं उस वक्त चौंकी जब अंजाने में ही मेरा हाथ लग जाने से कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुल गया। मैं ये देख कर हैरान हुई कि उन्होंने कमरे का दरवाज़ा तक अंदर से बंद नहीं किया था। शायद उस स्वर्गिक आनंद को पाने की उनमें इतनी जल्दी रही होगी कि वो दरवाज़े को अंदर से बंद करना ही भूल गईं थी। अंजाने में ही मेरा हाथ दरवाज़े पर लग गया था और वो थोड़ा सा खुल गया था। कमरे के अंदर वो सब आनंद में डूबी हुईं थी इस लिए उन्हें दरवाज़ा खुलने का कोई आभास ही नहीं हो पाया था। ख़ैर, मैंने सतर्कता से उस थोड़े से खुले दरवाज़े से अंदर की तरफ देखने की कोशिश की लेकिन ठीक से कुछ दिखा नहीं तो मैंने सावधानी पूर्वक दरवाज़े को थोड़ा और ढकेल कर खोल दिया। दरवाज़ा लगभग आधा खुल चुका था इस लिए मुझे अंदर देखने में कोई परेशानी नहीं हुई। मैंने पूरी सतर्कता से जैसे ही अंदर देखा तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। कमरे के अंदर कुसुम जी पलंग पर पूरी तरह नंगी लेटी हुईं थी और उनकी दोनों सहेलियां उनके ऊपर झुकी हुईं थी। दोनों सहेलियों के संगमरमरी जिस्मों पर सिर्फ़ काली और लाल रंग की कच्छियाँ थी। एक सहेली कुसुम जी की छाती पर झुकी हुई थी और दूसरी सहेली उनकी टांगों के बीच में। पलंग पर लेटी कुसुम जी बुरी तरह मचल उठतीं थी और उनके मुख से आनन्द में डूबी सिसकियां निकल पड़ती थीं। कमरे के अंदर पलंग पर जो कुछ हो रहा था उसे देख कर मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन उस सच पर भला मैं कब तक यकीन न करती?"

"तो सिर्फ़ इस वजह से तुम कुसुम को मजबूर किए हुए थी?" मैं अपनी बहन के बारे में ये सब सुन कर अंदर ही अंदर बेहद चकित था, मगर क्योंकि वो मेरी लाडली बहन थी इस लिए उसके बारे में ऐसी बातें मैं और ज्यादा सुनना नहीं चाहता था इस लिए बीच में ही बोल पड़ा था____"और क्या तुमने ये सब बातें विभोर और अजीत को भी बताई थी?"

"पहले तो ये सब उनसे बताने की मुझमें हिम्मत ही नहीं हो रही थी क्योंकि मुझे डर था कि अपनी बहन के बारे में ऐसी बातें सुन कर कहीं वो मुझ पर गुस्सा ही न हो जाएं।" शीला ने एक लंबी सांस ले कर कहा_____"लेकिन फिर ये सोच कर बताने का सोचा कि इस तरह में कुसुम जी की दोनों सहेलियों को उन्हें भोगने का बेहतरीन अवसर भी तो मिल जायेगा। ख़ैर उससे पहले ये सुनिए कि उस दिन आगे क्या हुआ। वो तीनों अपनी मस्ती और अपने आनंद में मगन थीं, लेकिन मुझे इस बात का एहसास था कि मैं ज़्यादा देर तक वहां नहीं ठहर सकती थी क्योंकि आपकी भाभी जी कभी भी आ सकतीं थी। मैंने फ़ौरन ही उन तीनों के सिर पर गाज गिराने का सोचते हुए दोनों हाथों से ज़ोर ज़ोर से ताली बजाना शुरू कर दिया। ताली बजने की आवाज़ से उन तीनों पर सच मुच में ही गाज गिर पड़ी थी। तीनों की तीनों ही बुरी तरह उछल पड़ीं थी। पलक झपकते ही उन तीनों की हालत ऐसी हो गई थी मानों उन तीनों के जिस्म में प्राण ही न रह गए हों। चेहरे एकदम सफ़ेद पड़ गए थे। काफी देर तक तो उन्हें अपनी नग्नता का आभास तक न हुआ लेकिन मैंने जैसे ही ये कहा कि ये सब यहां क्या हो रहा है तो उन तीनों में जैसे पलक झपकते ही जान आ गई। उसके बाद वो जल्दी जल्दी अपने अपने कपड़े पहनने लगीं। कुसुम जी तो इतनी घबरा गईं थी कि उन्होंने पलंग पर बिछी चादर को ही अपने ऊपर डाल लिया था। चेहरे पर डर, घबराहट और शर्मिंदगी के भाव गर्दिश करते हुए नज़र आ रहे थे। उनकी दोनों सहेलियां तो फ़ौरन ही अपने अपने कपड़े पहन कर कमरे से निकल कर भाग गईं थी लेकिन कुसुम जी में इतनी हिम्मत ही ना बची थी कि वो अपनी जगह से हिल डुल भी सकें। मुझे उनकी उस हालत पर मन ही मन मज़ा तो बहुत आया लेकिन फिर तरस भी आया। उधर कुसुम जी मुझसे नज़रें नहीं मिला पा रहीं थी। कुछ ही पलों में उनके चेहरे पर ऐसे भाव उभर आए मानों अभी रो देंगी। मेरी आत्मा तो चीख चीख कर कह रही थी कि उस मासूम को उस हालत में छेड़ना ठीक नहीं है लेकिन क्योंकि मुझे धन का लालच था इस लिए मैंने ऐसे मौके को हाथ से गंवाना भी उचित नहीं समझा। मैं जैसे ही उनकी तरफ बढ़ने लगी तो वो और भी ज़्यादा उस चादर में सिमटने लगीं लेकिन मुझे उनकी कोई परवाह नहीं थी। उनके पास पहुंच कर मैंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा कि क्या हो अगर आपके इस खूबसूरत खेल के बारे में हवेली में किसी को पता चल जाए, खास कर उनके अपने दोनों भाईयों को? मैं जानती थी कि उनके दोनों भाई अक्सर उनको डांटते रहते थे। ख़ैर मेरी ये बात सुन कर कुसुम जी के चेहरे का रंग ही उड़ गया। बुरी तरह घबरा गईं वो। कुछ कहने के लिए उनके होंठ कांपे तो ज़रूर लेकिन होठों से कोई लफ्ज़ खारिज़ न हो सका। मुझे लगा कि ऐसी हालत में अगर मैंने उनको कुछ और भी कहा तो शायद कोई अनर्थ जैसी बात न हो जाए। इस लिए मैं मुस्कुराते हुए वापस पलटी और दरवाज़े की तरफ बढ़ चली। ये उनके अंदर समाया हुआ डर ही था कि वो हिम्मत जुटा कर जल्दी से ही बोल पड़ीं थी_____'र...रु...रुको।' उनके ऐसा कहने पर मैं अपनी जगह पर रुक गई थी लेकिन उनकी तरफ पलटी नहीं। मैं जानती थी कि अब वो इस सबके बारे में किसी से न कहने के लिए मुझसे मिन्नतें करेंगी और अगले ही पल ऐसा हुआ भी। जब उन्होंने डरे सहमे हुए भाव से इस बारे में किसी से कुछ न बताने के लिए मुझसे कहा तो इस बार मैंने पलट कर उनकी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए कहा____'ठीक है, मैं किसी को भी इस बारे में नहीं बताऊंगी लेकिन इसके लिए उनको भी एक कीमत चुकानी पड़ेगी। कीमत की बात सुन कर उनके चेहरे पर जल्दी ही राहत और खुशी के भाव उभर आए, कहा____'तुम्हें अपना मुंह बंद रखने के लिए जितना पैसा लेना हो ले लो लेकिन इस बारे में कभी किसी से कुछ मत कहना।' उनकी भोली और लुभावनी बात पर मैं ये सोच कर मुस्कुराई कि ये भी अपने दोनों भाईयों की तरह हर चीज़ की कीमत धन से ही चुकाने की बात करती हैं जबकि उनको तो ख़्वाब में भी ये उम्मीद नहीं हो सकती कि कीमत के रूप में मैं उनसे क्या मांगने वाली थी?"

शीला बोलते हुए एकदम से चुप हो गई और गहरी गहरी सांसें लेने लगी। मुझे उसकी बातें सुन कर उस पर ये सोच कर गुस्सा आ रहा था कि वो मेरी बहन के साथ कैसा गंदा खेल खेल रही थी। ख़ैर, मैंने अपने गुस्से को किसी तरह सम्हाला और उसके आगे बोलने का इंतज़ार करने लगा।

"मैंने कुसुम जी से कहा कि मुझे उनसे ना तो धन चाहिए और ना ही कोई रुपया पैसा।" शीला ने एक बार फिर से बताना शुरू किया____"अगर वो चाहती हैं कि मैं उनके ऐसे कृत्य के बारे में किसी को कुछ भी न बताऊं तो उन्हें इसके लिए अपनी उन दोनों सहेलियों से ये कहना होगा कि वो दोनों उनके दोनों भाईयों को संभोग का सुख दें। मेरी ये बात सुन कर कुसुम जी के चेहरे का रंग एक बार फिर से उड़ गया। काफी देर तक उनके मुख से कोई अल्फाज़ न निकला। इधर मैंने एक बार फिर से अपनी बात दोहरा दी, वो भी कुछ इस अंदाज़ और लहजे में कि कुसुम जी के पास अब मेरी बात को मान लेने के सिवा कोई चारा ही ना रह जाए। कुसुम जी बुरी तरह फंस चुकीं थी। उनके जैसी लड़की अपनी इज्ज़त को बचाने की ख़ातिर अब शायद कुछ भी कर सकती थी। मैंने भी उन्हें समझाया कि इसके लिए उन्हें कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि वो अपनी सहेलियों से कह सकती हैं कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगी तो ये उनके लिए भी अच्छा नहीं होगा। उस दिन मैं बेहद खुश थी कि चलो आपके दोनों चचेरे भाईयों के लिए दो कोरी लड़कियों का जुगाड़ कर दिया मैंने जिसके लिए यकीनन वो दोनों मुझे अच्छी खासी कीमत भी देंगे। मैंने कुसुम जी को समझा दिया था कि इसमें उनका कहीं नाम नहीं आएगा और ना ही उनके दोनों भाईयों को उनके ऐसे कृत्य का पता चलेगा। ख़ैर शाम को जब आपके दोनों चचेरे भाई आए तो मैं खुशी खुशी उनके कमरे में पहुंच गई और उनसे कहा कि मैंने आज उनके लिए दो कोरी लड़कियों का मस्त इंतजाम कर दिया है। औरत के जिस्म के भूखे आपके दोनों चचेरे भाई मेरी ये बात सुन कर बेहद खुश हुए और पूछने लगे कि ऐसी कोरी लड़कियां कब ला रही हूं मैं उनके हरम में? मैंने उनसे झूठ मूठ का कहा कि इसके लिए उन्हें थोड़ा धन ज़्यादा देना पड़ेगा क्योंकि वो दोनों लड़कियां धन के लालच में ही उनके नीचे लेटने के लिए और उनको खुश करने के लिए तैयार हुई हैं। उन्हें भला इससे क्या आपत्ति होनी थी इस लिए फ़ौरन ही रुपया पैसा देने को तैयार हो गए। मैं इस सबसे इतना खुश थी कि मैंने उन्हें बिना रुके सारी कहानी ही बता दी। होश तो मुझे तब आया जब एकदम से वो दोनों मुझ पर गुस्से से चिल्ला पड़े। मैं एकदम से सहम गई, और मुझे अपनी भारी ग़लती का एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे सपने में देखा गया ढेर सारा रुपया पैसा आंख खुलते ही पल भर में गायब हो गया हो। मैं सिर झुकाए खड़ी ही थी कि सहसा अगले ही पल चमत्कार हो गया। उन दोनों के द्वारा खी खी कर हंसने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी थी। मैं मूर्खों की तरह उन्हें देखने लगी थी, जबकि उन्होंने कहा कि पहली बार तुमने कोई अच्छा काम किया है। उसके बाद इसी खुशी में दोनों ने मेरे साथ जी भर के संभोग किया और फिर मुझे जाने को कह दिया। दो चार दिन वो दोनों जाने कहां व्यस्त रहे। एक दिन उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया और कहा कि मैंने उस दिन जिन दो कोरी लड़कियों के इंतजाम की बात कही थी उन्हें बगीचे वाले मकान में बुलाओ। उनकी ये बात सुन कर मैंने हां में सिर हिलाया और फिर कुसुम जी के पास पहुंच गई। कुसुम जी मुझे देखते ही घबरा गईं। मैंने उनसे कहा कि वो अपनी उन दोनों सहेलियों से कहें कि आज उन्हें बगीचे वाले मकान में जा कर उनके दोनों भाईयों को खुश करना है। कुसुम जी इस बात से भारी कसमकस में पड़ गईं लेकिन उनके पास ऐसा करने के सिवा कोई चारा नहीं था इस लिए उन्होंने बेबस भाव से हां में सिर हिलाया और अपनी सहेलियों के घर चली गईं। उसके बाद वही हुआ जैसा होना तय हो गया था। आपके दोनों चचेरे भाईयों ने कुसुम जी की दोनों सहेलियों के साथ बगीचे वाले मकान में संभोग का खूब आनंद लिया। उसके बाद तो ये क्रम ऐसा चला कि फिर रुका ही नहीं। जब भी उनका मन होता तब वो मुझसे कहते और मैं जा कर कुसुम जी से कहती। कुसुम जी अपनी इज्ज़त और मर्यादा को बचाए रखने के ख़ातिर वो सब करने को मजबूर थीं। मुझे क्योंकि इसके लिए खूब रुपए पैसे मिल रहे थे इस लिए मैंने भी कभी ये सोचने की कोशिश नहीं की थी कि इस सबसे कुसुम जी के दिलो दिमाग़ पर क्या असर पड़ रहा होगा। आपके दोनों चचेरे भाइयों ने भी इस बारे में कभी कुछ सोचना ज़रूरी नहीं समझा। वो ये जानते थे कि एक तरह से उनके लिए उन लड़कियों का इंतजाम उनकी अपनी ही बहन कर रही है लेकिन उन्हें जैसे इससे कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था। समय ऐसे ही गुज़रता रहा और फिर एक दिन आप भी वापस हवेली आ गए। आपके आ जाने से आपके वो दोनों भाई काफी ज़्यादा असहज हो गए और उनका ये पसंदीदा खेल मजबूरीवश रुक गया। सबकी तरह मैं भी जानती थी कि वो दोनों आपसे बहुत डरते हैं और आपको ज़रा भी पसंद नहीं करते हैं। आपको वापस हवेली आए एक हफ्ता भी न हुआ था कि एक दिन आपके उन दोनों भाईयों ने मुझे फिर बुलाया और कहा कि इस बार मैं कुसुम को एक खास काम के लिए मजबूर करूं। उनकी ये बात मुझे बिलकुल भी समझ नहीं आई थी। मेरे पूछने पर उन्होंने विस्तार से बताया कि मैं उनकी बहन कुसुम जी से ये कहूं कि जब वो आपके लिए चाय ले कर जाएं तो वो पहले उस चाय में एक दवा मिला लिया करें। जब मैंने कुसुम जी से इस बारे में बात की तो उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इंकार कर दिया। मैंने उन्हें कठोरता से समझाया कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो मैं उनकी करतूत के बारे में उनके उसी भाई को जा कर बता दूंगी जो भाई उन्हें अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करता है। मैंने उन्हें समझाया कि सोचो उस सूरत में क्या होगा? अपनी जिस बहन को वो दुनिया की सबसे अच्छी लड़की समझते हैं उसके बारे में ये सब जान कर उन्हें कैसा लगेगा और क्या खुद वो इस सबके बाद अपने उन भाई से नज़र मिला पाएंगी? मेरी बातों ने कुसुम जी के मानों प्राणों का हरण कर लिया था। अचानक ही उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। रोते हुए बोली कि आख़िर मेरे उस कृत्य के लिए मुझे और कितना जलील होना पड़ेगा और किस हद तक ऐसे गिरे हुए काम करने पड़ेंगे जिसकी वजह से उसकी आत्मा तक ज़ख्मी हो जाए? देर से ही सही लेकिन कुसुम जी एक बार फिर से वो सब करने के लिए मजबूर हो गईं। जब उन्हें पता चला कि चाय में मिलाने वाली दवा असल में उनके सबसे अच्छे वाले भाई को नामर्द बना देने वाली है तो वो मेरे पैरों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं कि ऐसा भयंकर पाप वो हर्गिज़ नहीं करेंगी, भले ही इसके बदले उन्हें अपनी इज्ज़त के हज़ारों टुकड़े कर के पूरे गांव में फेंक देने पड़ें। उनकी ये बातें सुन कर मुझे लगा कि अगर ऐसा हुआ तो सबसे ज़्यादा नुकसान मेरा ही हो जाएगा क्योंकि भारी रकम के रूप में मिलने वाला रुपया पैसा मुझे एकदम से मिलना बंद हो जाएगा। ये सब सोच कर मैंने उन्हें समझाया कि भावनाओं में बह कर ऐसी बातें कहने का कोई फ़ायदा नहीं है बल्कि ठंडे दिमाग़ से सोचने वाली बात है। उन्हें सोचना चाहिए कि जिनकी नज़र में वो पाक साफ़ हैं और जो उन्हें अपनी पलकों पर बिठा के रखते हैं वो उनकी ऐसी करतूत के बारे में जान कर क्या क्या सोचने लगेंगे। उस दिन कुसुम जी को इस बात के लिए राज़ी करना मेरे लिए काफी मुश्किल काम रहा लेकिन आख़िर वो ऐसा काम करने को राज़ी हो ही गईं जिस काम के करने से यकीनन उनकी आत्मा तक ज़ख्मी हो जाने वाली थी। बस, उसके बाद ऐसा ही होने लगा। उन्हें स्पष्ट रूप से हिदायत दी गई थी कि वो आपको इस बारे में कुछ न बताएं कि जो चाय आप पीते हैं उसमें नामर्द बनाने वाली दवा मिली हुई होती है। उन्हें ये भी समझा दिया गया था कि उन पर हर पल नज़र रखी जाएगी।"

मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा शीला नाम की ये नौकरानी हरामन निकली थी। सारा किस्सा बताने के बाद वो सिर झुका कर चुप हो गई थी। मेरा मन कर रहा था कि उसे इस सबके लिए ऐसी भयानक सज़ा दूं कि वो ऐसा करने के बारे में अगले कई जन्मों तक न सोच सके। वो मेरी मासूम बहन को इतने समय से मजबूर किए हुए थी और मेरी बहन मुझे नामर्द बना देने वाली दवा चाय में मिला कर पिलाने पर मजबूर थी। मैं अच्छी तरह महसूस कर सकता था कि इसके लिए उस पगली ने अपने दिल को कितनी मुश्किल से पत्थर का बनाया रहा होगा। मैं ये भी महसूस कर सकता था कि इसके लिए वो अकेले में कितना रोती रही होगी। उसके अपने भाइयों ने उससे क्या क्या करवा लिया था। अपनी सहेलियों के साथ इस तरह का कृत्य करना कोई गुनाह नहीं था, कोई पाप नही था। दुनिया का हर व्यक्ति इस उमर में ऐसा काम करता है, उसने अगर किया तो कौन सा ग़लत किया था? अब मुझे समझ आया कि क्यों वो मुझे इस सबके बारे में बता नहीं रही थी। वो किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहती थी कि उसकी ऐसी करतूत जान कर मैं उसके बारे में ग़लत सोचने लगूं। वो मेरी भोली भाली और मासूम बहन थी और मेरी नज़रों में वो वैसी ही बनी रहना चाहती थी।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि सहसा बाहर कुछ आवाज़ों को सुन कर मैं चौंका। ऐसा लगा जैसे कुछ बज रहा हो और साथ ही कुछ अजीब सी आवाज़ें भी थीं। मैं फ़ौरन ही दरवाज़ा खोल कर बाहर आया। हल्की चांदनी रात में बाहर मुझे जो कुछ दिखा उसे देख कर मैं बुरी तरह चौंका। बाहर दो काले नकाबपोश आपस में भिड़े हुए थे और उनके साथ भिड़ा हुआ था शंभू। यूं तो शंभू खुद भी हट्टा कट्टा आदमी था किंतु उन दो नकाबपोशों के मुकाबले वो कमज़ोर सा ही नज़र आया। मैंने महसूस किया कि जैसे ही शंभू उन दोनों के बीच हमले में कूदता था वैसे ही उन दो नकाबपोशों में से कोई न कोई उसको बड़ी दक्षता से किसी न किसी दांव के द्वारा दूर गिरा देता था। मैं समझ गया कि उन दो में से एक नकाबपोश मेरी सुरक्षा करने वाला पिता जी का कोई रहस्यमई आदमी था जबकि दूसरा नकाबपोश वही था जिसकी हमें तलाश थी। दोनों में से कोई भी कमज़ोर होता नहीं दिख रहा था। मेरे पास पिता जी का दिया हुआ रिवॉल्वर था लेकिन समस्या ये थी कि मैं उसका उपयोग नहीं कर सकता था। ऐसा इस लिए क्योंकि उनमें से मेरी सुरक्षा करने वाला नक़ाबपोश कौन था ये मुझे खुद नहीं पता था। दोनों के ही जिस्मों पर एक जैसा ही काला कपड़ा और नक़ाब था।

वो दोनों एक दूसरे पर लट्ठ का प्रहार कर रहे थे लेकिन लट्ठ किसी के जिस्म पर नहीं लग रहा था। दोनों किसी न किसी तरह एक दूसरे के प्रहार को अपने लट्ठ से रोक ही लेते थे। ये सब देख कर मैं असमंजस में पड़ गया था और सोचने लगा था कि मुझे इस हालत में क्या करना चाहिए? वैसे सवाल तो ये भी था कि दूसरा नकाबपोश यहाँ किस लिए आया था? क्या मुझे मारने के लिए या फिर शीला को.....। ओ तेरी, शीला का नाम ज़हन पर आते ही मेरे मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी। मुझे याद आया कि वो भी तो षड्यंत्रकारियों के हाथ की कठपुतली थी। मैं तेज़ी से पलटा और कमरे के खुले हुए दरवाज़े के अंदर की तरफ देखा मगर मैं ये देख कर बुरी तरह चौंका कि अंदर शीला नहीं थी। ज़हन में सवाल कौंधा कि ये अचानक से कहां गायब हो गई? मैंने शंभू को आवाज़ दी और शीला के भाग जाने की बात उसको बताई। शंभू जल्दी ही मेरे पास आया। मैंने देखा उसके माथे से खून बह रहा था। ज़ाहिर है उन दो नकाबपोशों में से किसी ने उसको चोट पहुंचाई थी। मैंने शंभू को हुकुम दिया कि वो शीला को खोजे। मेरा हुकुम मिलते ही शंभू तेज़ी से एक तरफ दौड़ गया। उसके जाते ही मैं भी दूसरी तरफ तेज़ी से भागा।

शीला से मुझे इस तरह भाग निकलने की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। मैं हैरान था कि वो कितनी होशियारी से भाग निकली थी। चारो तरफ बगीचे के पेड़ पौधे थे जिसके चलते चांद की रोशनी कम थी। अंधेरे का फ़ायदा उठा कर शीला जाने किस तरफ निकल गई थी? मैं पागलों की तरह उसको इधर उधर खोज रहा था लेकिन वो कहीं नज़र ही नहीं आ रही थी। नज़र आती भी कैसे, उसे तो मुझसे छिप कर ही भागना था। अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी वातावरण में एक हृदयविदारक चीख गूंजी। ऐसा लगा जैसे किसी का गला चीर दिया गया हो। मैं जिस तरफ था उसके बाएं तरफ से चीख की ये आवाज़ आई थी। मैं तेज़ी से उस तरफ भागा। ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर भागने से आवाज़ हो रही थी। जल्दी ही मैं उस तरफ पहुंचा जहां से चीखने की आवाज़ आई थी। हल्के अंधेरे में ऐसा लगा जैसे किसी ने किसी को धक्का दिया हो जिससे कोई इंसानी आकृति लहरा कर कच्ची ज़मीन पर भरभरा कर जा गिरी थी। धक्का देने वाला फ़ौरन ही भागा, क्योंकि उसके भागने की आवाज ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों से स्पष्ट आई थी। मैंने जोर से शंभू को पुकारा और तेज़ी से उस तरफ भागा।

क़रीब पहुंचा तो देखा शीला ज़मीन पर लुढ़की पड़ी थी। मैंने झुक कर देखा, उसके गले से भल्ल भल्ल कर के खून बहता हुआ वहीं ज़मीन पर फैलता जा रहा था। शीला के जिस्म में कोई हलचल नहीं हो रही थी। मैंने ये सोच कर ज़मीन पर गुस्से में आ कर ज़ोर से अपना हाथ पटका कि दुश्मन ने कितनी आसानी से मेरे हाथ से अपना शिकार छीन कर उसका शिकार कर लिया था और मैं कुछ न कर सका था। अभी तो मुझे शीला से और भी बहुत कुछ जानना था। कुछ ही पलों में शंभू और मेरी रक्षा करने वाला नकाबपोश आ गए। मैंने दोनों को गुस्से में ही हुकुम सुनाया कि इस औरत का हत्यारा उस तरफ को भागा है इस लिए उसे खोजो। हुकुम मिलते ही शंभू तो उस तरफ को तेज़ी से दौड़ गया मगर नकाबपोश अपनी जगह से हिला तक नहीं। मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखा और कहा____"तुमने सुना नहीं मैंने क्या कहा है?"

"मैंने अच्छी तरह सुना है छोटे ठाकुर।" उसने अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मेरा काम उसके पीछे जा कर उसको खोजना नहीं है बल्कि तुम्हारी सुरक्षा करना है। मैं तुम्हें यहां पर अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला।"

मैं जानता था कि उसे मेरे पिता जी से ऐसा ही करने का हुकुम मिला था इस लिए गुस्से का घूंट पी कर रह गया। क़रीब दस मिनट बाद शंभू आया। वो बुरी तरह हांफ रहा था। आते ही उसने मुझसे कहा कि पता नहीं वो नकाबपोश कहां गायब हो गया। मुझसे कुछ दूरी पर खड़े जब एक दूसरे नकाबपोश पर उसकी नज़र पड़ी तो वो चौंका। मैंने शंभू को शांत रहने को कहा और ये भी कि वो शीला के घर में जा कर उसके पति को बता दे कि उसकी बीवी का किसी ने क़त्ल कर दिया है।


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अध्याय - 44
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अब तक....

"मैंने अच्छी तरह सुना है छोटे ठाकुर।" उसने अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मेरा काम उसके पीछे जा कर उसको खोजना नहीं है बल्कि तुम्हारी सुरक्षा करना है। मैं तुम्हें यहां पर अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाला।"

मैं जानता था कि उसे मेरे पिता जी से ऐसा ही करने का हुकुम मिला था इस लिए गुस्से का घूंट पी कर रह गया। क़रीब दस मिनट बाद शंभू आया। वो बुरी तरह हांफ रहा था। आते ही उसने मुझसे कहा कि पता नहीं वो नकाबपोश कहां गायब हो गया। मुझसे कुछ दूरी पर खड़े जब एक दूसरे नकाबपोश पर उसकी नज़र पड़ी तो वो चौंका। मैंने शंभू को शांत रहने को कहा और ये भी कि वो शीला के घर में जा कर उसके पति को बता दे कि उसकी बीवी का किसी ने क़त्ल कर दिया है।


अब आगे....

मैं थका हुआ सा और कुछ हारा हुआ सा हवेली पहुंचा। शंभू तो मेरे साथ ही बगीचे से आया था लेकिन मेरी सुरक्षा करने वाला वो नकाबपोश जाने कब गायब हो गया था इसका मुझे पता ही नहीं चला था। शीला की इस तरह हत्या हो जाएगी इसकी मुझे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी। मेरी नज़र में एक वही थी जो षड्यंत्रकारियों तक मुझे पहुंचा सकती थी लेकिन उसकी हत्या हो जाने से मानों फिर से हमारे लिए मुश्किलें खड़ी हो गईं थी। ख़ैर अब भला क्या हो सकता था।

हवेली में पहुंचा तो देखा धनंजय नाम का दारोगा अपने दो तीन हवलदारों के साथ आया हुआ था। जिस नौकरानी ने ज़हर खा कर खुद खुशी की थी वो उसकी जांच कर चुका था और अब उसे पोस्टमार्टम के लिए भेजने वाला था। कुछ ही देर में उन हवलदारों ने रेखा नाम की उस नौकरानी की लाश को जीप में लादा और दारोगा के आदेश पर चले गए। उनके जाने के बाद दारोगा पिता जी के साथ उस कमरे की तरफ फिर से चल पड़ा था जिस कमरे में रेखा को मेनका चाची ने मृत अवस्था में देखा था। मैं उनके साथ ही था इस लिए देख रहा था कि कैसे वो दारोगा कमरे की बड़ी बारीकी से जांच कर रहा था। कुछ ही देर में उसे कमरे के एक कोने में एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा पड़ा हुआ मिला जिसे उसने एक चिमटी की मदद से बड़ी सावधानी से उठाया और अपनी जेब से एक छोटी सी पन्नी निकाल कर उस कागज़ को उसमें सावधानी से डाल दिया।

जब तक हम सब वापस बैठक में आए तब तक जगताप चाचा भी आ गए थे। उनके साथ में रेखा के घर वाले भी थे जो बेहद ही दुखी लग रहे थे। ज़ाहिर है, जगताप चाचा ने जब उन्हें बताया होगा कि रेखा ने खुद खुशी कर ली है तो वो भीषण सदमे में चले गए होंगे। पिता जी ने रेखा के घर वालों को आश्वासन दिया कि वो इस बात का पता ज़रूर लगाएंगे कि रेखा ने आख़िर किस वजह से खुद खुशी की है? कुछ देर तक पिता जी रेखा के घर वालों को समझाते बुझाते रहे उसके बाद उन्हें ये कह कर वापस अपने घर जाने को कह दिया कि रेखा का मृत शरीर पोस्टमार्टम के बाद जल्दी ही उन्हें मिल जाएगा।

गांव के लोग अच्छी तरह जानते थे कि हम कभी भी किसी के साथ कुछ भी बुरा नहीं करते थे बल्कि हमेशा गांव वालों की मदद ही करते थे। यही वजह थी कि गांव वाले पिता जी को देवता की तरह मानते थे लेकिन आज जो कुछ हुआ था उससे बहुत कुछ बदल जाने वाला था। हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की मौत हो चुकी थी और ये कोई साधारण बात नहीं थी। पूरे गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के गांवों में भी ये बात जंगल की आग की तरह फ़ैल जानी थी और इसका सबसे बड़ा प्रभाव ये होना था कि लोगों के मन में हमारे प्रति कई तरह की बातें उभरने लग जानी थी। स्थिति काफी बिगड़ गई थी लेकिन अब जो कुछ हो चुका था उसे न तो बदला जा सकता था और ना ही मिटाया जा सकता था।

ख़ैर पिता जी ने दारोगा को भी ये कह कर जाने को कहा कि वो बाद में उससे मुलाक़ात करेंगे। दरोगा के जाने के बाद बैठक में बस हम तीन लोग ही रह गए। अभी हम सब बैठक में ही बैठे थे कि तभी बड़े भैया के साथ विभोर और अजीत बाहर से अंदर दाखिल हुए। उन्हें रात के इस वक्त हवेली लौटने पर पिता जी तथा जगताप चाचा दोनों ही नाराज़ हुए और उन्हें डांटा भी। वो तीनों उनके डांटने पर सिर झुकाए ही खड़े रहे और जब पिता जी ने अंदर जाने को कहा तो वो चुप चाप चले गए। इधर मैं ये सोचने लगा था कि बड़े भैया ज़्यादातर विभोर और अजीत के साथ ही क्यों घूमते फिरते रहते हैं?

हवेली की दो नौकरानियों की आज मौत हो चुकी थी इस वजह से पूरी हवेली में एक अजीब सी ख़ामोशी छाई हुई थी। पिता जी ने जगताप चाचा से तांत्रिक के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उसका किसी ने क़त्ल कर दिया है। पिता जी ये सुन कर स्तब्ध रह गए थे। उसके बाद जगताप चाचा ने पिता जी से पूछा कि कुल गुरु के यहां जाने पर क्या पता चला तो पिता जी ने हमें जो कुछ बताया उससे हम और उलझ गए।

पिता जी के अनुसार ये सच है कि कुल गुरु को डराया धमकाया गया था लेकिन उन्हें डराने धमकाने का काम पत्र के माध्यम से किया गया था। किसी ने उनके पास पत्र में लिख कर अपनी धमकी भेजी थी कि पिता जी को बड़े भैया के बारे में वैसी भविष्यवाणी तो करनी ही है लेकिन विस्तार से ये नहीं बताना है कि उनके बेटे की मौत वास्तव में किस वजह से होगी। पत्र में साफ़ साफ़ धमकी लिखी हुई थी कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उनके पूरे परिवार को ख़त्म कर दिया जाएगा। पिता जी की ये बातें सुन कर मैं और जगताप चाचा गहरी सोच में पड़ गए थे। कहने का मतलब ये कि कुल गुरु के यहां जाने का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ था। कुल गुरु को खुद भी नहीं पता था कि उन्हें इस तरह की धमकी देने वाला कौन था? अब जब उन्हें ही नहीं पता था तो भला वो पिता जी को क्या बताते?

अभी हम इस बारे में बातें ही कर रहे थे कि हवेली के बाहर पहरे पर खड़ा एक आदमी अंदर आया और उसने बताया कि साहूकारों के घर से दो लोग आए हैं। पिता जी उसकी बात सुन कर बोले ठीक है उन्हें अंदर भेज दो। कुछ ही पलों में साहूकार मणि शंकर अपने बड़े बेटे चंद्रभान के साथ अंदर बैठक में आया। दुआ सलाम के बाद पिता जी ने उन दोनों को पास ही रखी कुर्सियों पर बैठने को कहा तो वो दोनों शुक्रिया कहते हुए बैठ गए।

"क्या बात है पिता और पुत्र दोनों एक साथ इस वक्त हमारे यहां कैसे?" पिता जी ने शालीनता से किंतु हल्की मुस्कान के साथ कहा।

"गांव के एक दो हिस्सों में रोने धोने की आवाज़ें सुनाई दी थीं ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने कहा____"पूछने पर पता चला कि आपकी हवेली में दो दो नौकरानियों की अकस्मात मौत हो गई है इस वजह से उन दोनों नौकरानियों के घरों में ये मातम का माहौल छा गया है। ये ख़बर ऐसी थी कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ, पर कई लोगों का यही कहना था इस लिए यहां आने से खुद को रोक नहीं सका। मुझे एकदम से चिंता हुई कि आख़िर ऐसा कैसे हो गया आपके यहां?"

"सब उस ऊपर वाले की माया है मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"कब किसके साथ क्या हो जाए ये कौन जानता है भला? हम सब तो किसी काम से बाहर गए हुए थे। शाम को जब वापस आए तो इस सबका पता चला। हमें ख़ुद समझ नहीं आ रहा कि आख़िर ऐसा कैसे हो गया? ख़ैर ये सब कैसे हुआ है इसका पता ज़रूर लगाएंगे हम। आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि हवेली में काम करने वाली किसी नौकरानी की इस तरह से मौत हुई हो।"

"आते समय गांव के कुछ लोगों से पता चला कि एक नौकरानी ने हवेली में ज़हर खा कर खुद खुशी कर ली थी।" मणि शंकर ने कहा____"और एक नौकरानी के बारे में उन लोगों ने बताया कि शाम को देवधर की बीवी शीला की किसी ने हत्या कर दी है। ये भी पता चला कि उसकी लाश आपके ही बगीचे में पड़ी मिली थी।"

"सही कहा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"शाम को वैभव उसकी खोज में उसके घर गया था। असल में वो समय से पहले ही हवेली से चली गई थी। हम जानना चाहते थे कि आख़िर ऐसी क्या बात हो गई थी जिसके चलते वो बिना किसी को कुछ बताए ही यहां से चली गई थी? वैभव ने उसके पति से उसके बारे में पूछा था, उसके बाद ये जब उसकी खोज में आगे गया तो हमारे ही बगीचे में इसे उसकी लाश मिली। हमारे लिए ये बड़ी ही हैरानी की बात है कि एक ही दिन में हमारी हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की इस तरह कैसे मौत हो सकती है? ख़ैर, इस सनसनीखेज़ माजरे का पता तो निश्चय ही करना पड़ेगा। हमें दुख इस बात का है कि दोनों के घर वालों पर अकस्मात ही इतनी भारी विपत्ति आ गई है।"

"मैं भी यही चाहता हूं ठाकुर साहब कि इसका जल्द से जल्द पता लगाया जाए।" मणि शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"क्योंकि ये जो कुछ भी हुआ है बिलकुल भी ठीक नहीं हुआ है। लोग हम पर भी उंगली उठाएंगे। वो यही सोचेंगे कि इस सबके जिम्मेदार हम ही होंगे क्योंकि हम हमेशा आपसे मन मुटाव रखते थे। ठाकुर साहब, हमारे बीच पहले कैसे संबंध थे इस बात को हम और आप दोनों ही भूल चुके हैं और इसी लिए हमने हमारे बीच एक अच्छे रिश्ते का आधार स्तंभ खड़ा किया है। मैं किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहता कि हमारे बीच किसी और की वजह से फिर से कोई मन मुटाव हो जाए।"

"इस बात से आप बेफ़िक्र रहें मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"हम भी समझते हैं कि इस हादसे के बाद लोगों के जहन में कैसे कैसे ख़्याल उभर सकते हैं। हमें लोगों के ख़्यालों से कोई मतलब नहीं है बल्कि उस सच्चाई से मतलब है जिसके तहत हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियों की मौत हो गई है। हम उन दोनों की मौत की असल वजह का पता ज़रूर लगाएंगे।"

"मैं यही सब सोच कर इस वक्त यहां आया था ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने कहा____"सच कहूं तो मेरे मन में ये ख़्याल भी उभर आया था कि कहीं आप भी ना इस हादसे के लिए हम पर शक करने लगें। अभी अभी तो हमारे बीच अच्छे संबंध बने हैं और अगर किसी ग़लतफहमी की वजह से हमारे संबंधों में फिर से दरार पड़ गई तो सबसे ज़्यादा तकलीफ़ मुझे ही होगी।"

"आप इस बात से निश्चिंत रहें मणि शंकर जी।" पिता जी ने कहा____"हम अच्छी तरह जानते हैं कि आप ऐसा कुछ करने का सोच भी नहीं सकते हैं। ख़ैर, छोड़िए इन बातों को और चलिए साथ में बैठ कर भोजन करते हैं। अभी हम में से भी किसी ने भोजन नहीं किया है।"

"शुक्रिया ठाकुर साहब।" मणि शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा____"पर हम तो भोजन कर चुके हैं। आप लोग भोजन कीजिए, और अब हमें जाने की इजाज़त भी दीजिए।"

पिता जी ने एक दो बार और मणि शंकर से भोजन के लिए कहा लेकिन उसने ये कह कर इंकार कर दिया कि फिर किसी दिन। उसके बाद मणि शंकर अपने बेटे चंद्रभान के साथ दुआ सलाम कर के चला गया। इस हादसे के बाद भोजन करने की इच्छा तो किसी की भी नहीं थी लेकिन थोड़ा बहुत खाया ही हमने। मेरे ज़हन में बस यही बातें गूंज रहीं थी कि मणि शंकर आख़िर किस इरादे से हमारे यहां आया था? उसने जो कुछ हमारे संबंधों के बारे में कहा था क्या वो सच्चे दिल से कहा था या फिर सच में ही उसका इस मामले में कोई हाथ हो सकता है? क्या उसकी मंशा ये थी कि यहां आ कर अपनी सफाई दे कर वो अपना पक्ष सच्चा कर ले ताकि हमारा शक उस पर न जाए?

मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कुछ कहना ही चाहा था कि उन्होंने इशारे से ही मुझे चुप रहने को कहा। मुझे ये थोड़ा अजीब तो लगा किन्तु जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो शायद जगताप चाचा की मौजूदगी में कोई बात नहीं करना चाहते थे। ख़ैर उसके बाद हमने खाना खाया और अपने अपने कमरों में सोने के लिए चल दिए।

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पता नहीं उस वक्त रात का कौन सा प्रहर था किंतु नींद में ही मुझे ऐसा आभास हुआ मानों कहीं से कोई आवाज़ आ रही हो। मेरी नींद में खलल पड़ चुका था। नींद टूटी तो मैंने आखें खोल कर चारो तरफ देखा। कमरे में बिजली का मध्यम प्रकाश था और छत के कुंडे पर लटक रहा पंखा मध्यम गति से चल रहा था। मैं समझने की कोशिश करने लगा कि आवाज़ किस चीज़ की थी? तभी फिर से हल्की आवाज़ हुई। रात के सन्नाटे में मेरे कानों ने फ़ौरन ही आवाज़ का पीछा किया। आवाज़ दरवाज़े की तरफ से आई थी। ज़हन में ख़्याल उभरा कि कमरे के बाहर ऐसा कौन हो सकता है जो इस तरह से दरवाज़ा थपथपा रहा है?

मैं सतर्कता से पलंग पर उठ कर बैठ गया। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था और मैं ये समझने की भरपूर कोशिश कर रहा था कि रात के इस वक्त कौन हो सकता है? मन में सवाल उभरा, क्या मेरा कोई दुश्मन हवेली में घुस आया है लेकिन अगर ऐसा होता तो वो मेरे कमरे का दरवाज़ा क्यों थपथपाता? मेरा दुश्मन तो पूरी ख़ामोशी अख़्तियार कर के ही मुझ तक पहुंचने की कोशिश करता। ज़ाहिर है ये जो कोई भी है वो मेरा दुश्मन नहीं हो सकता, बल्कि कोई ऐसा है जो इस वक्त किसी ख़ास वजह से मुझ तक पहुंचना चाहता है। ये सोच कर एक बार फिर से मैं सोचने लगा कि ऐसा कोई व्यक्ति कौन हो सकता है?

मैं ये सोच ही रहा था कि दरवाज़े को फिर से हल्की आवाज़ में थपथपाया गया। इस बार चुप रहना ठीक नहीं था, अतः मैं बड़ी ही सावधानी से पलंग से नीचे उतरा। दरवाज़े के क़रीब पहुंच कर मैंने बड़े आहिस्ता से और बड़ी ही सतर्कता से दरवाज़े को खोला। मेरे दिल की धड़कनें अनायास ही तीव्र गति से चलने लगीं थी। ख़ैर, जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर नीम अंधेरे में खड़े जिस शख़्स पर मेरी नज़र पड़ी उसे देख कर मैं बुरी तरह हैरान रह गया।

बाहर पिता जी खड़े थे। अपने पिता यानी दादा ठाकुर को रात के इस वक्त अपने कमरे के दरवाज़े के बाहर इस तरह से आया देख मेरा हैरान हो जाना लाज़मी था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि पिता जी मेरे कमरे में रात के वक्त इस तरह से आए हों। ख़ैर मैंने उन्हें अंदर आने का रास्ता दिया तो वो ख़ामोशी से ही अंदर आ गए। मैंने दरवाज़े को वापस बंद किया और पलट कर उनकी तरफ देखा। वो जा कर पलंग पर बैठ चुके थे। अपने पिता को अपने कमरे में आया देख मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं थी और साथ ही ज़हन में कई तरह के ख़्याल भी उभरने लगे थे।

"बैठो।" पिता जी ने धीमें स्वर में मुझे हुकुम सा दिया तो मैं ख़ामोशी से आगे बढ़ कर पलंग पर उनसे थोड़ा दूर बैठ गया। अब तक मैं ये समझ गया था कि कोई बेहद ज़रूरी और गंभीर बात ज़रूर है जिसके चलते पिता जी मेरे कमरे में रात के इस वक्त आए हैं।

"हम जानते हैं कि हमारे इस वक्त यहां आने से तुम्हारे मन में कई तरह के सवाल उभर आए होंगे।" पिता जी ने जैसे भूमिका बनाते हुए कहा_____"लेकिन क्योंकि हालात ही कुछ ऐसे हैं कि हमें रात के इस वक्त इस तरह से यहां पर आना पड़ा।"

"जी, मैं समझता हूं पिता जी।" मैंने उनकी तरह ही धीमें स्वर में कहा_____"अब तक तो मैं भी इतना समझ चुका हूं कि जो कोई भी हमारे साथ ये सब कर रहा है वो बहुत ही शातिर है। वो इतना शातिर है कि अब तक हर क़दम पर हम उसके द्वारा सिर्फ मात ही खाते आए हैं। हमें अगर कहीं से उससे ताल्लुक रखता कुछ भी पता चलता है तो वो उस जड़ को ही ख़त्म कर देता है जिसके द्वारा हमें उस तक पहुंचने की संभावना होती है। इससे एक बात तो साबित हो चुकी है कि उसे हमारे हर क्रिया कलाप की पहले से ही ख़बर हो जाती है और ऐसा तभी हो सकता है जब उस तक ख़बर पहुंचाने वाला कोई हमारे ही बीच में मौजूद हो।"

"तुमने बिल्कुल सही कहा।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"आज जो कुछ भी हुआ है उससे हमें भी ये बात समझ आ गई है। निश्चित तौर पर हमारे उस दुश्मन का कोई भेदिया हमारे ही बीच मौजूद है, ये अलग बात है कि हम उस भेदिए को फिलहाल पहचान नहीं पाए हैं। तुमने मुरारी के भाई जगन के द्वारा उस तांत्रिक का पता लगवाया लेकिन जब तुम लोग उस तांत्रिक के पास पहुंचे तो वो तांत्रिक स्वर्ग सिधार चुका था। ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि हम उसके पास पहुंचते हैं और वो उससे पहले ही किसी के द्वारा कत्ल किया हुआ पाया जाता है। ज़ाहिर है कि हमारे दुश्मन को पहले ही पता चल चुका था कि हमें उसकी करतूत पता चल गई है जिसके चलते हम उस तांत्रिक के पास पहुंच कर उसके बारे में मालूमात करेंगे, किंतु ऐसा न होने पाए इस लिए हमारे दुश्मन ने पहले ही उस तांत्रिक को मार दिया। अब सवाल ये है कि हमारे दुश्मन को ये कैसे पता चला कि हमें उसकी करतूत के बारे में पता चल चुका है, जिसके लिए उसे फ़ौरन ही उस तांत्रिक का काम तमाम कर देना चाहिए? क्या जगन उसका भेदिया हो सकता है? क्या उसी ने इस बारे में हमारे दुश्मन को बताया होगा? लेकिन हमें नहीं लगता कि जगन ने ऐसा किया होगा या फिर ये कहें कि वो भेदिया हो सकता है क्योंकि हमारे हर क्रिया कलाप की दुश्मन तक ख़बर पहुंचाना उसके बस का नहीं हो सकता। ऐसा काम तो वही कर सकता है जो हमारे क़रीब ही रहता हो, जबकि जगन कभी हवेली नहीं आया और ना ही उससे हमारा कभी मिलना जुलना रहा था।"

"तो क्या लगता है आपको?" मैंने गहरी सांस लेते हुए धीमें स्वर में कहा____"इस तरह का भेदिया कौन हो सकता है जो हमारी पल पल की ख़बर हमारे दुश्मन तक पहुंचा सकता है? वैसे आप जगन के बारे में इतना जल्दी इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच सकते हैं कि वो हमारे दुश्मन का भेदिया नहीं हो सकता? मेरा मतलब है कि ज़रूरी नहीं कि हमारे बीच की ख़बर प्राप्त करने के लिए उसे हमारे बीच ही मौजूद रहना पड़े। किसी और तरीके से भी तो वो हमारे क्रिया कलापों की ख़बर प्राप्त कर सकता है।"

"कहना क्या चाहते हो?" पिता जी के माथे पर सहसा बल पड़ गया था।
"यही कि जगन ऐसा भेदिया हो सकता है जिसे किसी अन्य भेदिए के द्वारा हमारी ख़बरें दी जाती होंगी।" मैंने बेहद संतुलित भाव से कहा____"यानि कि एक भेदिया वो होगा जो हमारे बीच मौजूद रहता है और यहां की ख़बरों को वो अपने दूसरे साथी भेदिए जगन के द्वारा हमारे दुश्मन तक बड़ी ही सावधानी से पहुंचा देता होगा।"

"हां, ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारे इस तर्क़ को हम इस लिए मान रहे हैं क्योंकि अब तक जिस तरह से हमारे शातिर दुश्मन ने कारनामें किए हैं उससे इस बात को स्वीकार करने में हमें कोई झिझक नहीं है। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि जगन जैसा व्यक्ति हमारे खिलाफ़ हो कर किसी और के लिए ऐसा काम क्यों करेगा?"

"ज़ाहिर है किसी मज़बूरी की वजह से।" मैंने सोचने वाले भाव से कहा_____"या फिर धन के लालच की वजह से। वैसे मेरा ख़्याल यही है कि वो इन दोनों ही वजहों से ऐसा काम कर सकता है। मज़बूरी ये हो सकती है कि वो किसी के कर्ज़े तले दबा होगा और धन का लालच इस लिए कि उसकी आर्थिक स्थिति ज़्यादा ठीक नहीं है।"

"यानि हम ये कह सकते हैं कि जगन हमारे दुश्मन का भेदिया हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"फिर भी अपने शक की पुष्टि के लिए ज़रूरी है कि उस पर नज़र रखी जाए, लेकिन कुछ इस तरीके से कि उसे अपनी नज़र रखे जाने का ज़रा भी शक न हो सके।"

मैं पिता जी की बातों से पूर्णतया सहमत था इस लिए ख़ामोशी से सिर हिला दिया। कहीं न कहीं मैं भी इस बात को समझ रहा था कि जगन ने ऐसा काम यकीनन किया जो सकता है। मुरारी की हत्या के बाद अब उसकी ज़मीन जायदाद को कब्जा लेने का भी अगर वो सोच ले तो ये कोई हैरत की बात नहीं हो सकती थी। इसके लिए अगर उसे किसी की सरपरस्ती मिली होगी तो यकीनन वो इससे पीछे हटने का नहीं सोचेगा। ख़ैर, मेरे जहन में इस संबंध में और भी बातें थी इस लिए इस वक्त मैं पिता जी से उस सबके बारे में भी विचार विमर्श कर लेना चाहता था।

"मुंशी चंद्रकांत के बारे में आपका क्या ख़्याल है?" कुछ सोचते हुए मैंने पिता जी से कहा____"बेशक उसके बाप दादा हवेली और हवेली में रहने वालों के प्रति पूरी तरह से वफ़ादार रहे हैं लेकिन क्या मुंशी चंद्रकांत भी अपने बाप दादाओं की तरह हमारे प्रति वफ़ादार हो सकता है?"

"बेशक, वो वफ़ादार है।" पिता जी ने कहा____"हमें कभी भी ऐसा आभास नहीं हुआ जिससे कि हम ये सोच सकें कि वो हमसे या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य से नाखुश हो। हम आज भी कभी कभी उसकी गैरजानकारी में उसकी वफ़ादारी की परीक्षा लेते हैं और परिणाम के रूप में हमने हमेशा यही पाया है कि वो अपनी जगह पर पूरी तरह सही है और हवेली के प्रति पूरी तरह वफ़ादार भी है।"

"संभव है कि वो इस हद तक चालाक हो कि उसे हमेशा आपकी परीक्षा लेने वाली मंशा का आभास हो जाता हो।" मैंने तर्क़ किया____"और वो उस समय पर पूरी तरह से ईमानदार हो जाता हो ताकि वो आपकी परीक्षा में खरा उतर सके।"

"चलो मान लेते हैं कि वो इतना चालाक होगा कि वो हमेशा परीक्षा लेने वाली हमारी मंशा को ताड़ जाता होगा।" पिता जी ने कहा____"लेकिन अब तुम ये बताओ कि वो हमारे खिलाफ़ ऐसा कुछ करेगा ही क्यों? आख़िर हमने उसका ऐसा क्या बुरा किया है जिसके चलते वो हमसे इतनी भारी दुश्मनी निभाने पर तुल जाएगा?"

"संभव है कि हमारे द्वारा उसके साथ कुछ तो ऐसा बुरा हो ही गया हो।" मैंने कहा____"जिसका कभी हमें एहसास ही ना हुआ हो जबकि वो हमें अपना दुश्मन समझने लगा हो?"

"ये सिर्फ ऐसी संभावनाएं हैं।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"जिनमें कोई वास्तविकता है कि नहीं इस पर पूरी तरह संदेह है।"
"बेशक है।" मैंने कहा____"पर संभावनाओं के द्वारा ही तो हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे। वैसे अगर मैं ये कहूं कि मुंशी चंद्रकांत का संबंध गांव के साहूकारों से भी हो सकता है तो इस बारे में आप क्या कहेंगे?"

"ऐसा संभव नहीं है।" पिता जी ने कहा____"क्योंकि गांव के साहूकारों से हमेशा ही उसके ख़राब संबंध रहे हैं। जिन साहूकारों ने जीवन भर उसे सिर्फ दुख ही दिया हो वो उन्हीं को अपना मित्र कैसे बना लेगा?"

"गांव के साहूकारों से उसका ख़राब संबंध आपको और दुनिया वालों को दिखाने के लिए भी तो हो सकता है।" मैंने फिर से तर्क़ किया____"जबकि असल बात ये हो कि उनके बीच गहरा मैत्री भाव हो। ऐसा भी हो सकता है कि हमारी तरह साहूकारों ने मुंशी से भी अपने संबंध सुधार लिए हों और अब वो उनके साथ मिल कर हमारे खिलाफ़ कोई खेल खेल रहा हो।"

"अगर ऐसा कुछ होता।" पिता जी ने कहा____"तो कभी न कभी हमारे आदमियों को ज़रूर उस पर संदेह होता। अब तक ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया है तो ज़ाहिर है कि उसका साहूकारों से कोई ताल्लुक नहीं है।"

"चलिए मान लेता हूं कि वो ऐसा नहीं हो सकता।" मैंने ख़ास भाव से कहा____"लेकिन आप भी ये समझते हैं कि पहले में और अब में ज़मीन आसमान का फ़र्क हो गया है। पहले हम मुंशी के प्रति इतने सजग नहीं थे क्योंकि पहले कभी ऐसे हालात भी नहीं थे किंतु अब हैं और इस लिए अब हमें हर उस व्यक्ति की जांच करनी होगी जिसका हमसे ज़रा सा भी संबंध है।"

"मौजूदा समय में जिस तरह के हालात हैं।" पिता जी ने कहा____"उसके हिसाब से यकीनन हमें मुंशी पर भी खास तरह से निगरानी रखनी ही होगी।"

"दोनों नौकरानियों की मौत के बाद" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"मणि शंकर का अपने बेटे के साथ उसी समय हमारी हवेली पर यूं टपक पड़ना क्या आभास कराता है आपको? रात को उसने उन दोनों की मौत हो जाने से उस संबंध में जो कुछ कहा क्या आप उसकी बातों से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं?"

"उन दोनों नौकरानियों की मौत के संबंध में उसने जो कुछ कहा उससे उसका यही मतलब था कि उसका उस कृत्य से या उस हादसे से कोई संबंध नहीं है।" पिता जी ने सोचने वाले भाव से कहा____"यानि वो चाहता है कि हम किसी भी तरीके से उस पर इस हादसे के लिए शक न करें। हालाकि अगर उसका उन दोनों नौकरानियों की मौत में कोई हाथ भी होगा तब भी हमारे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे हम ये पक्के तौर पर कह सकें कि उन दोनों की हत्या उसी ने की है अथवा करवाई है।"

"चोर की दाढ़ी में तिनका वाली बात भी तो हो सकती है पिता जी।" मैंने कहा____"इस हादसे के संबंध में हमारे पास कोई सबूत नहीं है ये बात सिर्फ़ हम जानते हैं किंतु वो इस बारे में पूरी तरह आस्वस्त नहीं होगा। संभव है कि उसे शक हो कि हमारे पास ऐसा कोई सबूत हो इस लिए उसने खुद ही आ कर इस संबंध में अपनी सफाई देना अपनी बुद्धिमानी समझी। या ये भी हो सकता है कि उसने यहां आ कर यही जानने समझने की कोशिश की हो कि इस हादसे के बाद उसके प्रति हमारे कैसे विचार हैं?"

"संभव है कि ऐसा ही हो।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए कहा____"किंतु ये बात तो सत्य ही है कि हमारे पास इस हादसे के संबंध में कोई सबूत नहीं है और ना ही हम पक्के तौर पर ये कह सकते हैं कि ऐसा किसने किया होगा?"

"क्या आप ये मानते हैं कि हमारी हवेली में उन दोनों नौकरानियों को रखवाने वाले साहूकार हो सकते हैं?" मैंने पिता जी की तरफ गौर से देखते हुए कहा____"और क्या आपको ये भी शक है कि हमारे खिलाफ़ षडयंत्र करने वाले गांव के ये साहूकार ही होंगे?"

"क्या फ़र्क पड़ता है?" पिता जी ने मानों बात को टालने की गरज से कहा____"शक होगा भी तब भी क्या हो जाएगा? हमारे पास ऐसा कोई सबूत तो है ही नहीं।"
"यानि आप ये मानते हैं कि हमारे खिलाफ़ षडयंत्र करने वाले गांव के ये साहूकार ही हो सकते हैं?" मैंने फिर से उनकी तरफ गौर से देखा।

"किसी और से हमारी कोई दुश्मनी ही नहीं है।" पिता जी ने कहा____"जब से हमने होश सम्हाला है तब से हमने यही देखा है कि गांव के साहूकारों के अलावा बाकी सबसे हमारे अच्छे संबंध रहे हैं। हमसे पहले बड़े दादा ठाकुर के समय में भी यही हाल था। ये अलग बात है कि उनकी सोच में और हमारी सोच में काफ़ी फ़र्क है। जब तक वो थे तब तक दूर दूर तक लोगों के मन में उनके प्रति ऐसी दहशत थी कि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ़ जाने का सोच भी नहीं सकता था। उनके बाद जब हमने दादा ठाकुर का ताज पहना तो हमने अपनी सोच के अनुसार लोगों के मन से उनकी उस छवि को दूर करने की ही कोशिश की। हमें ये बिलकुल पसंद नहीं था कि लोगों के अंदर हमारे प्रति बड़े दादा ठाकुर जैसी दहशत हो बल्कि हमने हमेशा यही कोशिश की है कि लोग बेख़ौफ हो कर हमारे सामने अपनी बात रखें और हम पूरे दिल से उनकी बातें सुन कर उनका दुख दूर करें। ख़ैर तो हमारे कहने का यही मतलब है कि हमारी कभी किसी से ऐसी कोई दुश्मनी नहीं हुई जिसके चलते कोई हमारे खिलाफ़ इस तरह का षडयंत्र करने लगे। गांव के साहूकारों से भी हमारा ऐसा कोई झगड़ा नहीं रहा है। ये अलग बात है कि उनकी बुरी करनी के चलते ही हमें कई बार उनके खिलाफ़ ही पंचायत में फ़ैसला सुनाना पड़ा है। अब अगर वो सिर्फ इसी के चलते हमें अपना दुश्मन समझने लगे हों तो अलग बात है।"

"जैसा कि आपने बताया कि आपके पहले बड़े दादा ठाकुर की दहशत थी लोगों के अंदर।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"तो क्या ये नहीं हो सकता कि बड़े दादा ठाकुर के समय में कभी ऐसा कुछ हुआ हो जिसका नतीजा आज हमें इस रूप में देखने को मिल रहा है? आपने एक बार बताया था कि गांव के साहूकारों से हमारे संबंध बहुत पहले से ही ख़राब रहे हैं तो ज़ाहिर है कि इन ख़राब संबंधों की वजह इतनी मामूली तो नहीं हो सकती। संभव है कि बड़े दादा ठाकुर के समय में इन लोगों में इतनी हिम्मत न रही हो कि ये उनके खिलाफ़ कुछ कर सकें किंतु अब उनमें यकीनन ऐसी हिम्मत है।"

"पिता जी के समय का दौर ही कुछ अलग था।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"हर तरफ उनकी तूती बोलती थी। यह तक कि शहर के मंत्री लोग भी हवेली में आ कर उनके पैरों के नीचे ही बैठते थे। उनकी दहशत का आलम ये था कि हम दोनों भाई कभी भी उनकी तरफ सिर उठा कर नहीं देखते थे। गांव के ये साहूकार उन्हें देख कर जूड़ी के मरीज़ की तरफ कांपते थे। ख़ैर, हमारे संज्ञान में तो ऐसा कोई वाक्या नहीं है जिसके चलते हम ये कह सकें कि उनके द्वारा गांव के साहूकारों का क्या अनिष्ट हुआ था जिसका बदला लेने के लिए वो आज इस तरह से हमारे खिलाफ़ षडयंत्र कर रहे होंगे।"

"मुझे तो अब यही लग रहा है कि अगर गांव के साहूकार ही ये सब कर रहे हैं तो ज़रूर इस दुश्मनी के बीज बड़े दादा ठाकुर के समय पर ही बोए गए थे।" मैंने गंभीरता से कहा____"किंतु एक बात समझ नहीं आ रही और वो ये कि हमारा दुश्मन उस रेखा नाम की नौकरानी के द्वारा आपके कमरे से कागज़ात क्यों निकलवाना चाहता था? भला उसका कागज़ात से क्या लेना देना?"

"यही तो सब बातें हैं जो हमें सोचने पर मजबूर किए हुए हैं।" पिता जी ने कहा_____"मामला सिर्फ़ किसी का किसी से दुश्मनी भर का नहीं है बल्कि मामला इसके अलावा भी कुछ है। साहूकार लोग अगर हमसे अपनी किसी दुश्मनी का बदला ही लेना चाहते हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा वो हमें और हमारे खानदान को ख़त्म कर देने का ही सोचेंगे। उनका हमारे कागज़ातों से कोई लेना देना नहीं हो सकता।"

"लेना देना क्यों नहीं हो सकता पिता जी?" मैंने संतुलित भाव से कहा____"ज़ाहिर है हमारे ख़त्म हो जाने के बाद हमारी सारी ज़मीन जायदाद लावारिश हो जाएगी, इस लिए वो चाहते होंगे कि हमारे बाद हमारा सब कुछ उनका हो जाए।"

"हां ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए हामी भरी।
"वैसे क्या आपने भी एक बात पर गौर किया है?" मैंने उनकी तरफ देखा तो उन्होंने सिर उठा कर मुझे देखा और पूछा____"कौन सी बात पर?"

"यही कि हमारा जो भी दुश्मन है।" मैंने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"उसने अब तक सिर्फ़ और सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही अपना शिकार बनाने की कोशिश की है। यदि इसे स्पष्ट रूप से कहूं तो वो ये है कि उसने आपके बेटों को ही मौत के मुंह तक पहुंचाने की कोशिश की है जबकि जगताप चाचा के दोनों बेटों में से किसी पर भी आज तक किसी प्रकार की आंच तक नहीं आई है। आपकी नज़र में इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"यकीनन, हमने तो इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया था।" पिता जी के चेहरे पर एकाएक चौंकने वाले भाव उभर आए थे, बोले____"तुम बिलकुल सही कह रहे हो। अभी तक हमारे दुश्मन ने सिर्फ़ हमारे बेटों को ही नुकसान पहुंचाने की कोशिश की है। इससे यही ज़ाहिर होता है कि हमारा दुश्मन सिर्फ़ हमें और हमारी औलाद को ही अपना दुश्मन समझता है, जबकि जगताप को नहीं।"

"क्या लगता है आपको?" मैंने उनकी तरफ अपलक देखते हुए कहा____"ऐसा क्यों होगा अथवा ये कहें कि ऐसा कैसे हो सकता है? क्या इसका ये मतलब हो सकता है कि जगताप चाचा हमारे दुश्मन से मिले हुए हो सकते हैं या फिर जगताप चाचा ही वो शख़्स हैं जो हमें अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं? अगर ऐसा है तो ये भी समझ आ जाता है कि उन्हें कागज़ातों की ज़रूरत क्यों होगी? ज़ाहिर है वो सब कुछ अपने नाम पर कर लेना चाहते हैं, किंतु जब तक आप हैं या आपकी औलादें हैं तब तक उनका अपने मकसद में कामयाब होना लगभग असम्भव ही है।"

मेरी इन बातों को सुन कर पिता जी कुछ न बोले। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो किसी गहरे समुद्र में डूब गए हों। कुछ पलों तक तो मैं उनकी तरफ से किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करता रहा किन्तु जब वो सोच में ही डूबे रहे तो मैंने उनका ध्यान भंग करते हुए कहा____"क्या अभी भी आप उन्हें त्रेता युग के भरत या लक्ष्मण समझते हैं जो अपने बड़े भाई को ही अपना सब कुछ समझते हैं और खुद के बारे में किसी भी तरह की चाहत नहीं रखते?"

"हमारा दिल तो नहीं मानता।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन आज कल हम जिस तरह के हालातों के चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं उसकी वजह से हम अपनों पर ही संदेह करने पर मजबूर से हो गए हैं। यही वजह थी कि उस समय बैठक में जगताप की मौजूदगी में हमने तुम्हें चुप रहने का इशारा किया था। हम हमेशा जगताप को त्रेता युग के भरत और लक्ष्मण की तरह ही मानते आए हैं और अब तक हमें इस बात का यकीन भी था कि जगताप जैसा हमारा भाई हमें ही अपना सब कुछ समझता है। हमें हमेशा उसके जैसा भाई मिलने का गर्व भी था लेकिन हमारे लिए ये बड़े ही दुख की बात है कि अब हम अपने उसी भाई पर संदेह करने पर मजबूर हो गए हैं। अगर आने वाले समय में उसके प्रति हमारा ये संदेह मिथ्या साबित हुआ तो हम कैसे अपने उस भाई से नज़रें मिला पाएंगे?"

इतना सब कहते कहते सहसा पिता जी की आवाज़ भारी हो गई। मैंने पहली बार उन्हें इतना भावुक होते देखा था। मेरी नज़र में उनकी छवि एक पत्थर दिल वाले इंसान की थी लेकिन आज पता चला कि वो सिर्फ़ बाहर से ही पत्थर की तरह कठोर नज़र आते थे जबकि अंदर से उनका हृदय बेहद ही कोमल था। मुझे समझ न आया कि उनकी इन बातों के बाद अब मैं क्या कहूं लेकिन मैं ये भी जानता था कि ये समय भावुकता के भंवर में फंसने का हर्गिज़ नहीं था।

"मैं इतना बड़ा तो नहीं हो गया हूं कि आपको समझा सकूं।" फिर मैंने झिझकते हुए कहा____"लेकिन ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि एक अच्छा इंसान कभी भी अपनों के प्रति ऐसी नकारात्मक सोच नहीं रख सकता। हमें वक्त और हालात के आगे मजबूर हो जाना पड़ता है और उसी के चलते हम कुछ ऐसा भी कर गुज़रते हैं जो सामान्य वक्त में हम करने का सोच भी नहीं सकते।"

"हमें खुशी हुई कि जीवन के यथार्थ के बारे में अब तुम इतनी गंभीरता से सोचने लगे हो।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारे बदले हुए इस व्यक्तित्व के बारे में हम जब भी सोचते हैं तो हमें हैरत होती है। ख़ैर, तो अब हमें न चाहते हुए भी जगताप के क्रिया कलापों पर भी नज़र रखनी होगी।"

"उससे भी पहले कल सुबह हमें बड़े भैया को किसी ऐसे तांत्रिक या झाड़ फूंक करने वाले के पास ले कर जाना होगा।" मैंने कहा____"जो बड़े भैया पर किए गए तंत्र मंत्र का बेहतर इलाज़ कर सके। इस तंत्र मंत्र के प्रभाव की वजह से जाने वो कैसा कैसा बर्ताव करने लगे हैं। एक बात और, मुझे लगता है कि उनकी तरह मुझ पर भी कोई तंत्र मंत्र किया गया है।"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी मेरी आख़िरी बात सुन कर चौंक पड़े थे, बोले____"तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम पर भी तंत्र मंत्र का प्रयोग किया गया है?"

"पिछले कुछ समय से मुझे एक ही प्रकार का सपना आ रहा है।" मैंने गंभीर भाव से कहा____"आप तो जानते हैं कि हर किसी को कोई न कोई सपना आता ही रहता है लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता है कि किसी को एक ही सपना बार बार आए। ज़ाहिर है इसके पीछे कुछ तो वजह होगी ही। मुझे अंदेशा है कि ज़रूर इसके पीछे कोई तंत्र मंत्र वाला चक्कर है।"

"अगर ऐसा है तो यकीनन ये बहुत ही गंभीर बात है।" पिता जी ने गहन विचार के साथ कहा____"हमारा दुश्मन जब हमारा या तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाया तो उसने ऐसे तंत्र मंत्र का सहारा लिया जिसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। ख़ैर, कल सुबह तुम भी अपने बड़े भाई के साथ चलना। तुमने जब हमें अपने बड़े भाई के साथ तंत्र मंत्र की क्रिया होने के बारे में बताया था तब पिछली रात हमें यही सोच सोच कर रात भर नींद नहीं आई थी कि दुनिया में लोग किसी के साथ क्या कुछ कर गुज़रते हैं।"

"दुनिया में ऐसे न जाने कितने ही अजीब लोग भरे पड़े हैं।" मैंने कहा____"जो ऐसी ही मानसिकता वाले हैं। ख़ैर, कल सुबह जब हम यहां से किसी तांत्रिक या झाड़ फूंक करने वाले के पास जायेंगे तो हमें अपनी सुरक्षा का भी ख़ास इंतजाम रखना होगा। संभव है कि अपनी नाकामी से बौखलाया या गुस्साया हुआ हमारा दुश्मन रास्ते में कहीं हम पर हमला करने का न सोचे। दूसरी बात, जगताप चाचा को भी हमें अपने साथ ही ले चलना होगा। ऐसा न हो कि उन्हें किसी तरह का शक हो जाए हम पर।"

"कल शाम उस नौकरानी के साथ क्या हुआ था?" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए पूंछा____"हम जानना चाहते हैं कि उस नौकरानी के द्वारा हमारा दुश्मन हमारे साथ असल में क्या करवा रहा था?"

"माफ़ कीजिएगा पिता जी।" मैंने इस बार थोड़ा शख़्त भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, जल्दी ही इस बारे में आपको सारी बातों से अवगत करा दूंगा।"

पिता जी मेरी बात सुन कर मेरी तरफ एकटक देखने लगे थे। उनके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं थी। ख़ैर, उन्होंने इस बारे में मुझसे कुछ नहीं कहा और फिर वो पलंग से उतर कर चल दिए। दरवाज़े तक मैं उन्हें छोड़ने आया। उनके जाने के बाद मैंने दरवाज़े को अंदर से बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें चलने लगीं थी। उस दूसरी वाली नौकरानी के सारे चक्कर को मैं अपने तरीक़े से सम्हालना चाहता था। अब समय आ गया था कि अपने दोनों चचेरे भाईयों का हिसाब किताब ख़ास तरीके से किया जाए।

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अध्याय - 45
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अब तक....

"माफ़ कीजिएगा पिता जी।" मैंने इस बार थोड़ा शख़्त भाव से कहा____"इस वक्त इस बारे में मैं आपको कुछ भी नहीं बता सकता लेकिन फ़िक्र मत कीजिए, जल्दी ही इस बारे में आपको सारी बातों से अवगत करा दूंगा।"

पिता जी मेरी बात सुन कर मेरी तरफ एकटक देखने लगे थे। उनके इस तरह देखने से मेरी धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं थी। ख़ैर, उन्होंने इस बारे में मुझसे कुछ नहीं कहा और फिर वो पलंग से उतर कर चल दिए। दरवाज़े तक मैं उन्हें छोड़ने आया। उनके जाने के बाद मैंने दरवाज़े को अंदर से बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें चलने लगीं थी। उस दूसरी वाली नौकरानी के सारे चक्कर को मैं अपने तरीक़े से सम्हालना चाहता था। अब समय आ गया था कि अपने दोनों चचेरे भाईयों का हिसाब किताब ख़ास तरीके से किया जाए।


अब आगे.....

पिता जी के जाने के बाद रात बड़ी मुश्किल से गुज़री थी। अपनी बदली हुई ज़िंदगी और मौजूदा वक्त के बारे में सोचते सोचते ही जाने कब मेरी आंख लग गई थी। सुबह किसी ने दरवाज़ा खटखटाया तो मेरी आंख खुली। अलसाए मन से मैं उठा और जा कर दरवाज़ा खोला। बाहर मेरी लाडली और मासूम बहन कुसुम खड़ी थी। उसे देखते ही मेरे जहन में शीला के द्वारा बताई गई वो सब बातें उभरने लगीं जो उसने कुसुम के संबंध में बताई थी। पलक झपकते ही उन बातों के चलते मेरे मन में उसके प्रति अजीब से ख़्याल उभरे किंतु मैंने फ़ौरन ही उन ख़्यालों को शख़्ती से दबा दिया। उसके बाद मैंने अपने होठों पर हल्की सी मुस्कान सजा कर उसे देखा जिसे देख वो भी मुस्कुरा उठी।

"मेरे सबसे अच्छे वाले भैया के लिए गरमा गर्म चाय हाज़िर है।" उसने मेरी तरफ अपना एक हाथ बढ़ाया जिसमें उसने चाय का कप लिया हुआ था। मैंने मुस्कुराते हुए उसके हाथ से चाय का वो कप लिया तो उसने आगे कहा____"चाय पी कर जल्दी से नित्य क्रिया से फुर्सत हो जाइए। दादा ठाकुर जी का आदेश है कि जल्द से जल्द आप तैयार हो कर उनके सामने हाज़िर हो जाएं।"

"जो हुकुम मेरी बहना।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे देख रहा हूं कि आज तेरे चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी झलक रही है। कुछ ख़ास बात है क्या?"

"अपने सबसे अच्छे वाले भैया को सुबह सुबह देख लिया।" कुसुम ने मेरी तरफ देखते हुए उसी मुस्कान में कहा_____"मेरे लिए यही खुशी की और ख़ास वाली बात होती है, पर लगता है मेरे सोचन देव भैया को अपनी इस मासूम सी बहन को खुश देखना अच्छा नहीं लगा।"

"क्या सच में तुझे ऐसा लगता है?" मैंने उसकी गहरी आंखों में झांकते हुए कहा____"अरे! पगली मेरा बस चले तो मैं अपने हिस्से की सारी खुशियां तुझे दे दूं और तेरे हिस्से के सारे दुख दर्द को अपनी किस्मत बना लूं।"

"ऐसा मत कहिए भैया।" कुसुम एकदम से मुझसे छुपक गई और फिर गंभीर भाव से बोली____"भगवान ऐसा कभी न करे कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया को कोई दुख दर्द मिले और जहां तक मेरी बात है तो आपका ये प्यार और स्नेह ही काफी है मुझे खुशियां देने के लिए।"

"अच्छा एक बात बता।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"अगर कोई किसी को जान बूझ कर ऐसा दुख दे जिससे कि सामने वाले की आत्मा तक उसके द्वारा दिए गए दुख से छलनी हो जाए तो ऐसे इंसान को कैसी सज़ा मिलनी चाहिए?"

"ये...ये आप क्या कह रहे हैं भैया?" कुसुम ने मुझसे छुपके हुए ही कहा था। मैंने महसूस किया कि मेरी बात सुन कर उसका समूचा जिस्म कांप गया था। फिर जैसे अंजान बन कर बोली____"आख़िर किस बारे में बात कर रहे हैं आप?"

"महत्वपूर्ण ये नहीं है बहना कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूं।" मैंने कहा____"महत्वपूर्ण ये है कि मेरे द्वारा पूछे गए सवाल पर तेरा जवाब क्या है? मैं तुझसे जानना चाहता हूं कि ऐसे इंसान की कैसी सज़ा होनी चाहिए?"

"मेरे हिसाब से तो।" कुसुम ने मुझसे अलग हो कर मासूम अंदाज़ से कहा____"ऐसे इंसान को कोई सज़ा नहीं मिलनी चाहिए भैया, बल्कि ऐसे इंसान के उस कर्म को उसकी पहली और आख़िरी ग़लती मान कर उसे माफ़ कर देना चाहिए।"

"और यदि उसका कर्म इतना संगीन हो जिसकी कोई माफ़ी ही ना हो तो?" मैंने कुसुम के चेहरे पर बदल रहे भावों को देखते हुए कहा____"क्या तब भी उसे माफ़ कर देना चाहिए?"

"ह्...हां तब भी।" कुसुम ने उसी मासूमियत से किन्तु लरज़ते स्वर में कहा___"कर्म भले ही संगीन से संगीन हो किंतु पहली दफा माफ़ कर के उसे आइंदा ऐसा कर्म न करने की हिदायत दे देनी चाहिए।"

कुसुम की इस बात से मैं तुरंत कुछ न बोला बल्कि उसके चेहरे पर गर्दिश कर रहे भावों को समझने की कोशिश करता रहा। इस वक्त जिस तरह के भाव उसके चेहरे पर तैर रहे थे उससे साफ़ ज़ाहिर था कि वो अंदर ही अंदर किसी बात से जद्दोजहद कर रही थी। मैं ये भी समझ गया था कि वो मेरे सवाल का असली मतलब समझ गई थी और मतलब समझ लेने के बाद ही उसने ऐसा जवाब दिया था। यानि वो चाहती थी कि मैं उसके दोनों भाईयों को माफ़ कर दूं। मुझे उसके जैसे पाक चरित्र वाली लड़की से यही उम्मीद थी। मैं ये सोचने लगा कि जिन भाईयों ने उसकी आत्मा तक को छलनी कर दिया था ये उन्हीं भाईयों को माफ़ कर देने की बात कह रही थी। ख़ैर मैंने इस वक्त उसको ज़्यादा परेशान या व्यथित करना ठीक नहीं समझा इस लिए उसे ये कह कर वापस भेज दिया कि मैं जल्दी ही तैयार हो कर आता हूं।

क़रीब एक घंटे बाद तैयार हो कर मैं अपने कमरे से निकला। यूं तो मैं कभी भी किसी देवी देवता की पूजा अर्चना नहीं करता था लेकिन आज मन ही मन मैं ईश्वर से फ़रियाद कर रहा था कि जिस काम से आज मैं बड़े भैया को ले कर जाने वाला था वो काम पूरी सफलता से पूर्ण हो जाए। अपने कमरे से निकल कर मैं लंबी राहदारी से चलते हुए सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला। आगे चल कर एक ऐसा मोड़ आया जिस तरफ भैया भाभी का कमरा था। मैंने दो पल रुक कर भाभी के कमरे की तरफ नज़र डाली और फिर आगे बढ़ चला। अभी मैं सीढ़ियों पर उतरने ही वाला था कि नीचे से भाभी ऊपर की तरफ आती हुई दिखीं। उनके हाथ में पूजा की थाली थी। उन्हें ऊपर की तरफ आते देख मैं अपनी जगह पर रुक गया। रागिनी भाभी की नज़र भी मुझ पर पड़ चुकी थी।

"प्रणाम भाभी।" वो जैसे ही ऊपर मेरे पास पहुंचीं तो मैंने बड़े अदब से उन्हें प्रणाम किया जिस पर वो हल्की मुस्कान में बोलीं____"हमेशा खुश रहो और ईश्वर तुम्हें हर क़दम पर कामयाबी प्रदान करे।"

"बड़े भैया कहां हैं भाभी?" मैंने उनसे पूछा।
"वो अभी कुछ देर पहले ही तैयार हो कर नीचे गए हैं।" भाभी ने कहा____"पिता जी ने उन्हें तलब किया था। शायद वो उन्हें अपने साथ कहीं ले जाने वाले हैं।"

"हां भाभी।" मैंने कहा____"और पिता जी के साथ मैं भी जा रहा हूं। बहुत जल्द आपको एक खुश ख़बरी सुनने के मिलेगी।"

"ऐसा मेरा नसीब कहां।" भाभी ने सहसा उदास भाव से कहा_____"बल्कि मेरा भाग्य तो बहुत जल्द एक ऐसे दुख का दामन थाम लेने वाला है जो ताउम्र मुझे बस दुख ही देता रहेगा।"

"ऐसा कुछ भी नहीं होगा भाभी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"और ऐसा मैं होने भी नहीं दूंगा। मेरे रहते ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता जिसकी वजह से मेरी भाभी का चांद की मानिंद चमकता हुआ चेहरा मलिन पड़ जाए।"

"अपने नसीब पर किसी का ज़ोर नहीं होता वैभव।" भाभी ने गंभीरता से कहा____"तुम ये सब सिर्फ़ भावनाओं में बह कर कह रहे हो और मुझे अच्छा भी लगता है कि थोड़ी देर के लिए ही सही तुम अपनी इन बातों से मेरा मन बहला देते हो।"

"शायद आपको अपने इस देवर पर यकीन नहीं है भाभी।" मैंने उनके चेहरे को देखते हुए कहा____"पर बहुत जल्द आपको यकीन भी हो जाएगा। हमारी वापसी का इंतज़ार कीजिएगा। अच्छा अब चलता हूं, प्रणाम।"

भाभी से आशीर्वाद ले कर मैं तेज़ी से सीढ़ियां उतरता हुआ नीचे आया। उनकी बेयकीनी के चलते मेरे मन में एक अजीब तरह की दृढ़ता पैदा हो गई थी। मैंने निश्चय कर लिया था कि अब चाहे जो भी करना पड़े लेकिन भाभी को इस बात का यकीन दिला के रहूंगा कि जो कुछ मैंने उनसे कहा है वो सिर्फ़ उनका मन बहलाने के लिए नहीं कहा है बल्कि मेरे हर लफ्ज़ में कूट कूट कर सच्चाई भरी हुई थी।

नीचे पिता जी के साथ जगताप चाचा और बड़े भैया नास्ते के लिए बैठे हुए थे। मैं भी जा कर एक कुर्सी पर बैठ गया। जल्दी ही हम सबके सामने नास्ते की थाली आ गई और हम सबने नास्ता शुरू कर दिया। खाते वक्त हमेशा की तरह ख़ामोशी ही छाई रही। नाश्ता खत्म होने के बाद पिता जी ने मुझे जीप निकालने को कहा। मां और मेनका चाची को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि हम लोग कहां और किस सिलसिले में जा रहे हैं और न ही उन्होंने पूछने की कोशिश की थी। पिता जी के किसी भी काम में या कहीं आने जाने के बारे में कोई कुछ भी नहीं पूछता था। जगताप चाचा को पिता जी ने शायद इस बारे में बता दिया था। ख़ैर जल्दी ही हवेली से हमारा काफ़िला निकल पड़ा। एक जीप में मैं पिता जी और बड़े भैया बैठे हुए थे जबकि दूसरी जीप में जगताप चाचा थे। उनके पीछे दो जीपों में हमारे वो आदमी थे जो हथियारों से लैस थे।

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उस दिन जब मैंने जगन को किसी तांत्रिक का पता लगाने का काम सौंपा था तब उसने मुझे दो तांत्रिकों के बारे में पता कर के बताया था। पिछले दिन जब हम लोग तांत्रिक के पास गए थे तो सबसे पहले उस तांत्रिक से मिले थे जिसका आशियाना थोड़ा पास में पड़ता था। उससे जब हमने पुछतांछ की थी तो यही पता चला था कि उसके यहां ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं आया था जिसने उससे किसी पर तंत्र मंत्र करने के लिए कहा हो। उसका कहना था कि वो तंत्र मंत्र और झाड़ फूंक वाला काम सिर्फ लोगों के हित के लिए करता है। आस पास के कुछ लोगों से भी इस बात की पुष्टि हुई थी। हमारे पूछने पर उसने बताया था कि नाहरपुर के जंगल में एक तांत्रिक ज़रूर ऐसा है जो धन के लालच में किसी के भी कहने पर तंत्र मंत्र या जादू टोना जैसी क्रिया करता है। जगन से मुझे पहले ही नाहरपुर वाले तांत्रिक के बारे में पता चल चुका था किंतु उसने ये नहीं बताया था कि वो तांत्रिक किसी के कहने पर ऐसा कुछ करता है। संभव है जगन को ये सब न पता रहा हो।

हमारे गांव से बीस या बाईस किलो मीटर की दूरी पर बजरंगपुर नाम का एक गांव था। बजरंगपुर गांव पहाड़ी इलाका था किंतु उन पहाड़ों पर पेड़ पौधे न के बराबर ही थे। उन पहाड़ों में ज्यादातर कंकड़ पत्थर या मुरुम जैसी कंक्रीट की भरमार थी। कई रंग के गेरु और सफेद छुई की छोटी बड़ी खदानें भी थीं उन पहाड़ों में। गांव के समीप ही एक टीलेनुमा छोटा सा पहाड़ था जिसमें हनुमान जी का एक बड़ा सा मंदिर बना हुआ था। लोगों का कहना था कि हनुमान जी के मंदिर में रहने वाला पुजारी ही झाड़ फूंक का काम करता था। कुछ लोग उसे तांत्रिक भी मानते थे। उसके द्वारा की गई झाड़ फूंक से लोगों पर छाया हुआ जादू टोना एकदम छू मंतर हो जाता था।

हम क्योंकि पिछले दिन भी यहां आ चुके थे इस लिए हमें यहां पहुंचने में कोई समस्या नहीं हुई थी। यद्यपि सारे रास्ते हमें इसी बात का अंदेशा था कि हमारा शातिर दुश्मन कहीं रास्ते में हम पर हमला न करे लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ था और ये हमारे लिए हैरानी की बात भी थी। ख़ैर हमारा काफ़िला उस हनुमान जी के मंदिर के पास ही जा कर रुका था। गांव से हो कर जब हमारा काफ़िला गुज़रा था तो गांव के लोग चकित से हमें ही देखने लगे थे। ज्यादातर लोग पिता जी और जगताप चाचा के बारे में जानते थे और उन्हें पहचानते भी थे इस वजह से सब उन्हें सलाम भी कर रहे थे।

सारे रास्ते बड़े भैया शांत बैठे हुए थे जबकि मैं पिता जी से थोड़ी बहुत बातें करता रहा था। ख़ैर मंदिर में पहुंचने के बाद हम सब जीप से उतरे। हमारी सुरक्षा के लिए आए हमारे कुछ आदमियों को पिता जी ने जीपों के पास ही रुक कर कड़ी निगरानी रखने के लिए कह दिया था और कुछ आदमी हमारे साथ चल पड़े थे।

सुबह का समय था इस लिए मंदिर में गांव के लोग पूजा अर्चना के लिए आ जा रहे थे और कुछ लोग पुजारी से झाड़ फूंक करवाने के लिए थोड़ी दूरी पर बैठे थे। हम लोग जैसे ही वहां पहुंचे तो पुजारी ने हमें देख कर दूर से ही अभिनंदन किया और अपने बाएं तरफ खड़े एक आदमी से कुछ कहा जिस पर उस आदमी ने आ कर हमें एक जगह बैठाया। पुजारी एक औरत के साथ झाड़ फूंक कर रहा था। कुछ समय बाद जब वो फारिग़ हुआ तो खड़े हो कर हमें बुलाया। पिता जी ने जगताप चाचा से कुछ कहा जिस पर जगताप चाचा उठे और हम दोनों भाईयों को इशारे से अपने पीछे आने को कह कर पुजारी के पास चल दिए। कुछ ही देर में मैं और बड़े भैया जगताप चाचा के साथ उस पुजारी के पास पहुंच गए। जगताप चाचा ने पहले बड़े भैया को उस जगह पर बैठने को कहा जहां पर कुछ देर पहले वो औरत बैठी झाड़ फूंक करवा रही थी। चाचा जी के कहने पर बड़े भैया चुप चाप उस जगह पर बैठ गए। मैंने पलट कर देखा तो पिता जी भी अपनी जगह से उठ कर हमारे पीछे आ गए थे।

पुजारी के इशारे पर उसका एक आदमी मंदिर के अंदर गया और जब वापस आया तो उसके हाथ में एक पन्नी थी जिसमें कुछ चीज़ें डली हुई थीं। जिनमें नारियल अगरबत्ती और कुछ फूल थे। पुजारी ने उस पन्नी को जगताप चाचा को दिया और कहा कि वो मंदिर में जा कर बजरंगबली की पूजा करें। जगताप चाचा के जाने के बाद पुजारी ने बड़े भैया की दाहिनी कलाई अपने हाथ में ली और फिर अपनी आंखें बंद कर ली।

"क्या बात है पुजारी जी?" पुजारी ने बड़े भैया की कलाई छोड़ कर जैसे ही अपनी आंखें खोली तो पिता जी पूंछ बैठे____"क्या सच में हमारे बेटे पर उसी का असर है जिसके चलते हम यहां आए हैं?"

"जी बिलकुल ठाकुर साहब।" पुजारी ने गंभीर भाव से कहा____"इन पर काला जादू किया गया है। शुक्र है कि आप इन्हें समय पर यहां ले आए अन्यथा अनर्थ हो जाता। इन पर किए गए काले जादू का अब अंतिम चरण लगने वाला था और उस चरण में पहुंचने के बाद इनका बच पाना संभव नहीं होता।"

पुजारी की ये बातें सुन कर हम सब स्तब्ध रह गए थे। मुझे तो पक्का यकीन था कि बड़े भैया पर तंत्र मंत्र का ही प्रभाव था किन्तु पिता जी को शायद अभी भी संदेह था और यही वजह थी कि पुजारी की ऐसी बातें सुन कर वो अवाक से रह गए थे। उधर जगताप चाचा का भी कुछ उनके जैसा ही हाल था। बड़े भैया पर इस बारे में क्या प्रतिक्रिया हुई थी ये हम में से कोई नहीं देख सकता था क्योंकि उनका चेहरा पुजारी की तरफ था।

"फ़िक्र मत कीजिए ठाकुर साहब।" पिता जी को यूं अवाक देख पुजारी ने कहा____"जैसा कि मैंने कहा आप इन्हें समय पर ले आए हैं इस लिए अब कोई अनर्थ नहीं हो पाएगा।"

"आप हमारे बेटे को इस काले जादू से मुक्त कीजिए पुजारी जी।" पिता जी अधीरता से बोले____"और साथ ही ये भी बताने का कष्ट करें कि हमारे बेटे पर काले जादू का प्रयोग करने वाला वो दुष्ट कौंन है, ताकि हम उसे ऐसी भयावह मौत दे सकें जिसकी उसने कल्पना भी ना की हो।"

"धीरज से काम लीजिए ठाकुर साहब।" पुजारी ने नम्रता से कहा____"आपके बेटे को मैं पूरी तरह काले जादू से मुक्त कर दूंगा। रही बात इन पर काला जादू करने वाले के बारे में बताने की तो माफ़ कीजिए ये मैं नहीं बता सकता।"

"क्यों?" पिता जी से पहले जगताप चाचा थोड़े नाराज़ लहजे में बोल पड़े____"क्यों नहीं बता सकते आप? क्या कोई मजबूरी है आपकी जो आप उस दुष्ट व्यक्ति के बारे में बता नहीं सकते?"

"ऐसा ही समझ लीजिए ठाकुर साहब।" पुजारी ने कहा____"मैं अपने बजरंगबली की कृपा से सिर्फ़ लोगों के कष्ट दूर करता हूं। मुझे मेरे ईष्ट का ये आदेश नहीं है कि मैं कष्ट देने वाले का नाम पता बताऊं। वो कहते हैं कि बुरा कर्म करने वालों को सजा देने का अधिकार इंसानों को नहीं है। मैं आपसे इतना ज़रूर कह सकता हूं कि ये सब आपके दुश्मनों का ही किया हुआ है।"

पुजारी की इन बातों ने हम सबको मानों गहरी सोच में डाल दिया था। उसने जो कहा था वो अपनी जगह यकीनन सही था लेकिन हमारे लिए ये जानना बेहद ज़रूरी था कि बड़े भैया पर तंत्र मंत्र करवाने वाला कौन है? ये तो स्पष्ट हो चुका था कि उन पर काले जादू का प्रयोग नाहरपुर के जंगल में रहने वाले उस तांत्रिक ने ही किया था किंतु उसे ऐसा करने के लिए किसने कहा था ये जानना अति आवश्यक था।

पुजारी ने बड़े भैया पर किए गए काले जादू को दूर करने की क्रिया शुरू कर दी थी। हम लोगों के पास ख़ामोशी से वो सब देखने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था। क़रीब आधे घंटे बाद पुजारी की क्रियाएं समाप्त हुई और उसने बड़े भैया को उठ जाने का इशारा किया।

"इसको आप हमेशा अपने गले पर ही पहने रहिएगा।" पुजारी ने बड़े भैया को एक विशेष तरह का धागा देते हुए कहा____"इसके प्रभाव से किसी भी तरह का जादू आप पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेगा।"

पुजारी के ऐसा कहने पर बड़े भैया ने उस विशेष धागे को सिर से डाल कर गले में धारण कर लिया और फिर हाथ जोड़ कर पुजारी को प्रणाम कर वो हमारे पास आ गए। मैंने देखा उनका चेहरा पहले से कुछ अलग ही नज़र आ रहा था।

"अब हमारे इस बेटे को भी देखिए।" पिता जी ने मेरी तरफ संकेत करते हुए पुजारी से कहा____"क्या इस पर भी ऐसा कोई जादू किया गया है?"

पिता जी के इशारे पर मैं आगे बढ़ा और उसी जगह पर जा कर बैठ गया जहां इसके पहले बड़े भैया बैठे हुए थे। पुजारी ने मुझे अपना दाहिना हाथ बढ़ाने को कहा तो मैंने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया। पुजारी ने मेरी कलाई पकड़ अपनी आंखें बंद कर ली। मेरी धड़कनें ये सोच कर थोड़ा तेज़ हो गईं थी कि क्या सच में मुझ पर भी ऐसा कोई जादू किया गया होगा या फिर ये सिर्फ़ मेरा वहम था?

"ह्म्म्म।" पूजारी ने अपनी आंखें खोल कर हुंकार सी भरी____"उसका असर तो तुम भी डाला गया है लेकिन वैसा नहीं जैसा तुम्हारे बड़े भाई पर डाला गया था।"
"हम कुछ समझे नहीं पुजारी जी।" पिता जी ने उलझनपूर्ण भाव से पूछा।

"आपके बड़े बेटे पर काले जादू का प्रभाव डाला गया था जिससे एक निश्चित समय आने पर उनकी मौत होनी तय थी।" पुजारी ने मानों समझाते हुए कहा____"लेकिन आपके दूसरे बेटे पर काले जादू का असर थोड़ा सा ही डाला गया था। काले जादू के उस थोड़े प्रभाव से इन्हें बस थोड़ा बहुत ही प्रभाव पड़ता रहा होगा। ख़ैर चिंता करने की कोई बात नहीं है ठाकुर साहब, मैं इन्हें भी एक ताबीज बना के दे देता हूं।"

पुजारी की बात सुन कर पिता जी ने सहमति में सिर हिलाया। उधर पुजारी अपने पास रखी कुछ अजीब सी चीज़ों को ले कर कुछ करने लगा। जल्दी ही उसने एक छोटी सी ताबीज बना दी और मेरी तरफ बढ़ाया जिसे मैंने उसके हाथ से उठा लिया।

"ये क्या है?" पुजारी ने अचानक मेरी उंगली में फंसी अंगूठी को देखते हुए कहा____"ज़रा इसे उतार कर दिखाइए मुझे।"

"क्या बात है पुजारी जी?" पुजारी के ऐसा कहने पर पिता जी एकदम से बोल पड़े थे जबकि पुजारी कुछ देर तक मेरी अंगूठी को देखता रहा उसके बाद सिर उठा कर पिता जी से बोला____"ज़्यादा गंभीर बात नहीं है ठाकुर साहब लेकिन थोड़ी बहुत तो है ही। आपके बेटे ने जो अंगूठी पहनी हुई है वो मामूली अंगूठी नहीं है। इस अंगूठी पर जड़ा हुआ ये पत्थर बहुत ही खास है। इसकी खासियत ये है कि अगर इसे सही मात्रा में कोई धारण करता है तो उसके बहुत से लाभ होते हैं किंतु अगर इसकी मात्रा उचित न हो तो इसको धारण करने से हानि भी होती है।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" जगताप चाचा चौंकते हुए बोल पड़े____"भला किसी अंगूठी से ऐसा कैसे हो सकता है?"
"आप बड़े लोग हैं ठाकुर साहब।" पुजारी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"संभव है कि आप इन सब बातों को नहीं मानते होंगे लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी भी होती हैं जो अप्रतक्ष रूप से अपना असर दिखाती हैं। ये अलग बात है कि लोगों का ध्यान उस तरफ नहीं जाता या लोग उस पर यकीन नहीं करते।"

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं पुजारी जी?" पिता जी ने कहा____"आखिर इस अंगूठी में ऐसा क्या है जिसके बारे में आप ऐसा कह रहे हैं?"

"इस अंगूठी में लगे पत्थर में खास बात है ठाकुर साहब।" पुजारी ने अंगूठी को पिता जी की तरफ उठा कर दिखाते हुए कहा____"इस पत्थर को सुलेमानी हकीक पत्थर कहा जाता है। यूं तो ये जिसके भी पास होता है वो बेहद ही भाग्यशाली होता है लेकिन इस पत्थर को अंगूठी के साथ पहनने के भी कुछ धार्मिक नियम होते हैं। बिना किसी ज्योतिषी की सलाह लिए इसे नहीं पहनना चाहिए। अगर कोई इंसान इस पत्थर को अंगूठी के रूप में धारण करने का इच्छुक है तो सबसे पहले किसी अच्छे ज्योतिषी के पास जा कर उसे अपनी कुंडली दिखानी चाहिए, उसके बाद ज्योतिषी की सलाह और उसके निर्देश पर ही इस पत्थर को धारण करना चाहिए।"

"बड़ी अजीब और हैरत की बात है।" पिता जी ने हैरानी भरे भाव से कहा____"तो क्या इसकी वजह से भी हमारे बेटे के साथ कुछ बुरा होता रहा होगा?"

"आप मानें या न मानें किंतु मुझे पूरा यकीन है ठाकुर साहब।" पुजारी ने दृढ़ता से कहा____"जैसा कि मैंने पहले बताया कि सुलेमानी हकीक जिसके पास भी होगा वो बहुत ही भाग्यशाली होगा किंतु ऐसा तभी होगा जब उस पत्थर को धारण करने वाले इंसान ने उसे ज्योतिषी के परामर्श से उचित माप में पहना हो, अन्यथा इसके दुष्प्रभाव भी होते हैं।"

"शायद आप सही कह रहे हैं।" पिता जी ने ठंडी सांस लेते हुए कहा____"संभव है इस पत्थर का ही प्रभाव हो कि इसके साथ अब तक जो कुछ भी हुआ है वो बुरा ही हुआ है। हालाकि ऐसा हमेशा से नहीं था, इसका क्या मतलब हो सकता है?"

"हो सकता है कि इन्होंने सुलेमान हकीक पत्थर वाली ये अंगूठी अभी कुछ समय पहले ही अपनी उंगली पर पहनी हो।" पुजारी ने मानों अपनी संभावना ज़ाहिर की थी और उसकी ये बात सुन कर मैं चौंकते हुए एकदम से बोल पड़ा था____"आपने बिलकुल सही कहा। ये अंगूठी मैंने आज से क़रीब छह महीने पहले पहनी थी। असल में मेरा एक पूराना मित्र था जो मुझे शहर में मिला था। ये अंगूठी उसी की है, मुझे पसंद आ गई थी तो उसने खुशी से मुझे दे दिया था।"

"इसका मतलब मेरा अंदेशा सही था।" पुजारी ने मुस्कुराते हुए कहा____"ये अंगूठी आपके मित्र की है और निश्चित तौर पर उसने किसी ज्योतिषी की सलाह से ये पत्थर एक निश्चित और उचित माप पर अंगूठी में डलवाया रहा होगा।"

"अब ये तो मुझे नहीं पता।" मैंने कहा___"लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा कि वो काफी खुश था और उसका काम धंधा भी ठीक ठाक चल रहा है।"

"ख़ैर जो भी हो।" सहसा पीछे से पिता जी ने कहा____"लेकिन अब से तुम इस अंगूठी को नहीं पहनोगे।"
"ठाकुर साहब, आज के युग में इंसान ऐसी बातों को नहीं मानता।" पुजारी ने कहा____"जबकि इस बात को सच मनाइए कि इंसान जिन्हें छोटी और मामूली चीज़ें समझता है और उन पर ध्यान नहीं देता असल में वही मामूली चीज़ें हमारा बहुत कुछ नुकसान कर रही होती हैं।"

कुछ देर और पुजारी से बात चीत हुई उसके बाद हम सब ने मंदिर में पूजा अर्चना की। इस सबसे फुर्सत होने के बाद हमारा काफ़िला वापस हमारे गांव की तरफ चल पड़ा। यहां आने का सिर्फ यही एक फ़ायदा हुआ था कि बड़े भैया पर छाया हुआ मौत का संकट अब पूरी तरह से टल गया था किंतु इस बात से हमें निराशा ही हुई थी कि हमारे साथ ये सब करने या करवाने वाला आख़िर कौन था?

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अध्याय - 46
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अब तक....

कुछ देर और पुजारी से बात चीत हुई उसके बाद हम सब ने मंदिर में पूजा अर्चना की। इस सबसे फुर्सत होने के बाद हमारा काफ़िला वापस हमारे गांव की तरफ चल पड़ा। यहां आने का सिर्फ यही एक फ़ायदा हुआ था कि बड़े भैया पर छाया हुआ मौत का संकट अब पूरी तरह से टल गया था किंतु इस बात से हमें निराशा ही हुई थी कि हमारे साथ ये सब करने या करवाने वाला आख़िर कौन था?

अब आगे....

हमें अपने दुश्मनों के द्वारा भले ही शिकस्त मिली हो लेकिन बड़े भैया के पूरी तरह ठीक हो जाने पर हम सब बेहद खुश थे। पिता जी का चेहरा एक अलग ही तरह से चमक रहा था। वो बार बार मेरी तरफ ऐसी नज़रों से देखने लगते थे मानों मुझसे बहुत कुछ कहना चाहते हों लेकिन फिर कुछ सोच कर जैसे अपना इरादा बदल लेते थे। बड़े भैया भी बेहद खुश थे। मंदिर से जब हम चले थे तो उन्होंने सबसे पहले मुझे अपने गले से लगाया था। उस समय वो बहुत ही ज़्यादा भावुक हो गए थे और बार बार मुझे इस सबके के लिए धन्यवाद दे रहे थे। अपने बड़े भैया को वापस पा कर मैं भी बहुत खुश था। मुझे ये सोच सोच कर अब कुछ ज्यादा ही खुशी महसूस हो रही थी कि मैंने भाभी से किए गए अपने वादे को पूरा कर दिया था और उनसे जो कहा था वो कर दिखाया था। मेरा जी चाह रहा था कि कितना जल्दी मैं भाभी के पास पहुंच जाऊं और उनसे कहूं कि आपने जिस दुख को अपना भाग्य समझ लिया था उस भाग्य को मैंने उनसे इतना दूर कर दिया है कि अब वो फिर से उन्हें दुख देने के लिए वापस लौट कर नहीं आएगा।

दोपहर का समय था। हवेली में पहुंच कर हमारा काफ़िला रुका। पिता जी बड़े भैया को ले कर हवेली के अंदर की तरफ चल दिए। जीप को खड़ी कर के मैं भी भागते हुए उनके पास ही आ गया था। पीछे से जगताप चाचा भी आ गए थे। उनके चेहरे पर भी खुशी के भाव उजागर हो रहे थे। यूं तो बड़े भैया पिता जी के सामने ज़्यादा नहीं बोलते थे लेकिन आज वो खुल कर बातें करते हुए आए थे। ज़ाहिर है अब वो किसी बुरी शक्ति के प्रभाव में नहीं थे। ख़ैर हम सब अंदर पहुंचे। मां, मेनका चाची, कुसुम और रागिनी भाभी हमारा ही इंतज़ार कर रहीं थी।

अंदर एक तरफ एक लंबा चौड़ा हाल था जहां पर किनारे किनारे कतार से कुर्सियां लगी हुईं थी और उन सभी कुर्सियों के सामने लकड़ी के नक्काशीदार स्टूल रखे हुए थे। हम सब उस हाल में आ कर ही अपनी अपनी जगह पर बैठ गए। पिता जी का आसन बाकी सबसे अलग था। हम लोगों के बैठते ही हवेली की नौकरानियां जल्दी जल्दी काम पर लग गईं। पिता जी के कहने पर मां, मेनका चाची, कुसुम और रागिनी भाभी भी वहीं आ कर बैठ गईं। विभोर और अजीत हवेली में नहीं थे, जिसके लिए जगताप चाचा फिर से नाराज़ हो गए लेकिन पिता जी ने उन्हें शांत किया। सब लोगों के बैठ जाने के बाद पिता जी ने मां, मेनका चाची और कुसुम को वो सब बताना शुरू किया जो कुल गुरु ने बड़े भैया के संबंध में भविष्यवाणी के रूप में पिता जी को बताया था। सारा किस्सा बताने के बाद पिता जी ने उन्हें ये भी बताया कि कैसे मुझे बड़े भैया पर तंत्र मंत्र किए होने का पता चला और फिर कैसे आज हम उस सबके लिए एक ख़ास पुजारी के पास गए थे जिसने बड़े भैया पर किए गए तंत्र मंत्र को दूर किया है।

पिता के बताने के बाद हाल में कुछ पलों के लिए सन्नाटा सा छा गया था लेकिन फिर एकदम से मां के चिल्ला उठने और उनके रोने की आवाज़ों से पूरा हाल गूंज उठा। मां अपनी जगह से उठ कर भागती हुई बड़े भैया के पास आईं और उन्हें अपने कलेजे से लगा कर बुरी तरह रोने लगीं थी। मेनका चाची और कुसुम भी रो रहीं थी। रागिनी भाभी को तो पहले से ही ये सब पता था लेकिन जब उन्हें पिता जी के द्वारा ये ज्ञात हुआ कि बड़े भैया अब ठीक हैं और उन्हें कुछ नहीं होगा तो वो जैसे स्तब्ध रह गईं थी। उन्हें जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था मगर सच तो सच ही था। उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो उनकी आंखों से आसूं छलक पड़े। वो दुख के आंसू नहीं थे बल्कि खुशी के थे और मेरे प्रति कृतज्ञता के थे। अगर उनका बस चलता तो वो सबके सामने दौड़ कर मेरे पास आतीं और मुझे खुशी के मारे गले से लगा लेतीं।

काफी देर तक मां बड़े भैया को अपने कलेजे से लगाए रोती रहीं। उधर बड़े भैया मां को ये कह कर शांत्वना देते रहे कि अब वो ठीक हैं और उन्हें छोड़ कर कभी कहीं नहीं जाएंगे, बल्कि हमेशा वो उनकी और पिता जी की सेवा में हाज़िर रहेंगे। आख़िर बड़ी मुश्किल से मां शांत हुईं। उनके बाद मेनका चाची और कुसुम भी बड़े भैया के पास आ कर मां के जैसे ही उनसे लिपटी रोती रहीं। कुछ देर बाद जब सब कुछ सामान्य हो गया तो पिता जी ने सबसे कहा कि आज कल जिस तरह के हालात हैं उससे हवेली के हर सदस्य को सतर्क रहने की ज़रूरत है। रात में कोई भी अकेले हवेली से बाहर न जाए और अगर जाए भी तो अपने साथ अपने सुरक्षा करने वाले आदमियों को साथ ले कर जाए।

पिता जी काफी देर तक सबको इस सबके के बारे में समझाते बुझाते रहे उसके बाद खाना खाने का कार्यक्रम शुरू हुआ। भोजन के बाद हम सब आराम करने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए।

अपने कमरे में पलंग पर लेटा मैं आज जो कुछ हुआ उसके बारे में ही सोच रहा था। पिछली रात पिता जी से हुई बातों के बाद हम इसी नतीजे पर पहुंचे थे कि ये सब करने वाले यकीनन जगताप चाचा ही होंगे। शक की सुई सबसे ज़्यादा जगताप चाचा की तरफ ही घूम रही थी और इसके कई सारे कारण थे। पहला यही कि अब तक सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह में पहुंचाने की कोशिश की गई थी जबकि जगताप चाचा के बेटों पर किसी प्रकार की कोई आंच तक नहीं आई थी। अगर कोई हमें और हमारे सुमूचे खानदान को ही ख़त्म कर देना चाहता है तो वो हम दोनों भाईयों के साथ साथ जगताप चाचा के बेटों को भी क्षति पहुंचाने की कोशिश करता, जबकि ऐसा आज तक न हुआ था। ज़ाहिर है या तो जगताप चाचा दुश्मन से मिले हुए थे या फिर वो खुद ही ये सब कर रहे थे। ज़मीन जायदाद के कागज़ातों को प्राप्त करना सबसे ज़्यादा उनके लिए ही ज़रूरी था और इसी बात से शक की सुई उन पर ही घूम कर रुक जा रही थी। दूसरी बात, उनके दोनों बेटे जिस तरह से बर्ताव कर रहे थे अथवा जिस तरह से मुझे नामर्द बना देने की कोशिश में लगे हुए थे उससे यही लगता था कि वो ये सब किसी के कहने पर ही कर रहे थे। संभव है जगताप चाचा गुप्त रूप से ऐसा करने के लिए उन्हें कह रखा हो किंतु प्रत्यक्ष में वो उन दोनों पर नाराज़गी और गुस्सा इसी लिए दिखाते होंगे ताकि हम उन पर शक न कर सकें। अब सवाल ये है कि अगर ऐसा ही है तो इसके लिए उन्होंने अपनी बेटी या अपनी बहन का सहारा क्यों लिया? कुसुम से ऐसा घटिया काम क्यों करवाया होगा? ये ऐसी बात थी जो मुझे सोचने पर मजबूर कर रही थी और यही लगता था कि नहीं वो इस हद तक नहीं गिर सकते कि अपनी ही बेटी को ऐसे गंदे दलदल में डुबाने का सोचेंगे। यकीनन वो इसके लिए कोई दूसरा रास्ता चुनते। विभोर और अजीत का तो समझ में आता था कि वो कुसुम से ऐसा करवाने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाएंगे लेकिन इसके लिए जगताप चाचा ने भी सहमति दी होगी ये मैं मानने को तैयार नहीं था। इससे यही बात स्पष्ट होती थी कि ये सब विभोर और अजीत ने खुद ही किया होगा, ये अलग बात है कि इसके लिए उन दोनों ने साहूकार के बेटे गौरव से हाथ मिलाया था। अब सवाल ये भी है कि क्या गौरव अपनी मर्ज़ी से विभोर और अजीत का साथ दे रहा है या इसके लिए उसे अपने घर वालों की भी सहमति प्राप्त है? मुझे गौरव और रूपचंद्र पर ज़रा भी भरोसा नहीं था। हालाकि रूपचंद्र को मैंने शीशे में उतारा था लेकिन वो कुत्ते की दुम की तरह था। यानि वो अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं था। मौजूदा वक्त में भले ही उसने मुझे अपना दोस्त स्वीकार कर लिया था लेकिन मुझे यकीन था कि इसके बावजूद उसके मन में मेरे प्रति ईर्ष्या और द्वेष की भावना ही होगी।

मेरे मन में एक ख़्याल और भी उभर रहा था और वो ये कि जिस तरह से जगताप चाचा पर सबसे ज़्यादा शक की सुई घूम कर अटकी हुई थी उससे क्या ये नहीं हो सकता कि हमारा असली दुश्मन यही चाहता हो कि हम उन पर ही शक करें? मौजूदा हालात में तर्क वितर्क के द्वारा भले ही हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हों कि ये सब जगताप चाचा ही कर रहे होंगे पर ऐसा भी तो संभव है कि हमारा दुश्मन जान बूझ कर उन्हें हमारे शक के दायरे में ला रहा हो। दुश्मन का मकसद यही हो सकता है कि वो हमारे बीच फूट डालना चाहता होगा ताकि हम आपस में ही मन मुटाव रखने लगें जिससे नौबत यहां तक पहुंच जाए कि एक दिन हम एक दूसरे के ही दुश्मन बन जाएं। एक दूसरे का दुश्मन बन जाने के बाद क्या होगा ये किसी को भी समझने या समझाने की ज़रूरत नहीं थी।

इस सबके बारे में सोचते विचारते जाने कब मेरी आंख लग गई। उसके बाद किसी के द्वारा दरवाज़ा खटखटाए जाने पर ही मेरी आंखें खुली। दरवाज़ा खोला तो देखा बाहर रागिनी भाभी खड़ी थीं। मैंने देखा वो अपलक मुझे ही देखे जा रहीं थी। उनकी आंखों में आंसू झिलमिलाते हुए नज़र आए। उनके सुंदर से चेहरे पर ग्रहण पड़ा हुआ नज़र आया तो मैं सहसा चौंका।

इससे पहले कि मैं उनसे कुछ कहता वो तेज़ी से आगे बढ़ीं और एक झटके से मुझसे लिपट गईं। मैं उनके इस बर्ताव से पहले तो हड़बड़ा ही गया था किंतु अगले ही पल उनकी सिसकियां सुन कर शांत पड़ गया। मुझे समझते देर न लगी कि वो मेरे द्वारा किए गए कार्य पर इस तरह से अपनी खुशी और अपना दुख व्यक्त कर रहीं थी।

"ये...ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने शिकायती लहज़े में कहा____"आपने मुझसे वादा किया था कि आप मेरी प्यारी सी भाभी को बिलकुल भी नहीं रुलाएंगी और अब आप अपना वो वादा तोड़ रहीं हैं।"

"न..नहीं वैभव।" भाभी ने मुझसे छुपके हुए ही रूंधे गले से कहा____"मैं रो नहीं रही हूं और ना ही तुम्हारा वादा तोड़ रही हूं। ये तो खुशी के आंसू हैं। तुमने मुझे खुशी ही इतनी ज़्यादा दे दी है कि ये मुझसे सम्हाले ही नहीं गई। तुमने मेरी वीरान पड़ी दुनिया में बहार ला दी है। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा कि मेरे भाग्य में जो दुख लिख गया था वो पलक झपकते ही मुझसे दूर हो गया है। ऐसा लगता है जैसे मैं कोई ख़्वाब देख रही हूं।"

"शांत हो जाइए भाभी।" मैंने अपने हाथों को बढ़ा कर उनकी पीठ को सहलाते हुए कहा____"मुझे ये बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा कि आप मेरी इतनी प्यारी भाभी को रुला रही हैं।"

मेरी बात सुन कर भाभी मुझसे अलग हुईं तो मैंने देखा उनका चेहरा आंसुओं से भींग गया था। मुझे उनकी ऐसी हालत देख कर ज़रा भी अच्छा नहीं लगा। मैंने अपने दोनों हाथों से उनके आंसू पोंछे। वो बड़ी मासूमियत से मुझे ही देखे जा रही थीं।

"ये वो चेहरा है जिसे न तो उदास होने का हक़ है और ना ही इस तरह आंसुओं से भींग जाने का।" मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"बल्कि इस चेहरे को तो हर वक्त और हर पल सिर्फ़ और सिर्फ़ चांद की तरह चमकते ही रहना चाहिए।"

"अब से मेरा ये चेहरा तुम्हारे कहे अनुसार चांद की तरह ही चमकता रहेगा वैभव।" भाभी ने अपने एक हाथ से मेरे दाएं गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा____"आज तुमने मुझे वो खुशी दी है जिसके मिलने की मुझे ज़रा सी भी उम्मीद नहीं थी।"

"मैंने सिर्फ़ अपना फर्ज़ निभाया है भाभी।" मैंने कहा____"जबकि सच तो ये है कि ये खुशी आपके भाग्य में पहले से ही लिखी हुई थी। ख़ैर ये सब छोड़िए और ये बताइए कि अब बड़े भैया कैसे हैं?"

"वो अब ठीक हैं वैभव।" भाभी ने कहा____"जब से आए हैं तब से खुशी उनके चेहरे से जा ही नहीं रही है। मुझसे बहुत ही अच्छे से बातें की उन्होंने। अपने रूखे बर्ताव के लिए उन्होंने मुझसे माफ़ी भी मागी। ये भी कह रहे थे कि उनके छोटे भाई ने उन्हें नया जीवन दिया है और वो इसके लिए बहुत खुश हैं। उनके चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक दिख रही है।"

"चलिए अच्छी बात है भाभी।" मैंने कहा____"और हां, आप उनका ख़ास ख़्याल रखिएगा। काले जादू की वजह से उनके अंदर काफी कमज़ोरी आ गई होगी इस लिए ज़रूरी है कि उनका अच्छे से ख़्याल रखा जाए।"

"तुम्हें ये कैसे पता चला था वैभव कि उन पर तंत्र मंत्र किया गया है?" भाभी ने पूछा____"दादा ठाकुर के जहन में ऐसा विचार क्यों नहीं आया था?"

"बड़े भैया के बारे में की गई कुल गुरु की भविष्यवाणी ऐसी थी जिस पर मुझे बिलकुल भी यकीन नहीं हो रहा था।" मैंने कहा____"पता नहीं क्यों पर मुझे यही लगता था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है? यानि इसके पीछे कोई तो कारण ऐसा ज़रूर है जो फिलहाल समझ से परे है। ख़ैर ये तो संयोग की बात है कि एक दिन मेरी गांव के एक ऐसे आदमी से मुलाक़ात हो गई जिसने इस तरह के रहस्य के बारे में बताया। उसके बाद बड़े भैया को ठीक करवाना कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन इस सबकी वजह से हमें ये भी समझ आया कि कोई ऐसा ज़रूर है जो हमें नुकसान पहुंचाना चाहता है।"

"आख़िर ये सब क्या हो रहा है वैभव?" भाभी ने सोचने वाले भाव से कहा____"हमारी हवेली की दो दो नौकरानियों की अचानक से मौत हो गई। हम सब तो घबरा ही गए थे उस दिन।"

"फ़िक्र मत कीजिए भाभी।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आपसे बस इतनी ही गुज़ारिश है कि बड़े भैया का ख़्याल रखिए और उन्हें विभोर तथा अजीत के साथ कहीं भी आने जाने से रोक के रखिए।"

"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?" भाभी ने चौंक कर मेरी तरफ देखा____"विभोर और अजीत के साथ उन्हें कहीं आने जाने से रोकने से तुम्हारा क्या मतलब है?"
"ज़्यादा मत सोचिए भाभी।" मैंने कहा____"जल्दी ही कुछ बातें आपको भी पता चल जाएंगी।"

कुछ देर और भाभी से बातें हुईं उसके बाद भाभी वापस चली गईं। भाभी के जाने के बाद मैं कुछ पलों तक उनके बारे में सोचता रहा फिर कपड़े पहन कर और पिता जी का दिया हुआ रिवॉल्वर शर्ट में छुपा कर कमरे से निकल गया।

नीचे आया तो देखा सब चाय पी रहे थे। कुसुम ने मुझे भी चाय दी। चाय के दौरान सबसे थोड़ी बहुत बातचीत हुई उसके बाद मैं बाहर की तरफ चल पड़ा। अभी मैं बैठक से होते हुए बाहर ही निकला था कि तभी एक दरबान सामने से आता हुआ दिखा। मुझ पर नज़र पड़ते ही पहले उसने मुझे सलाम किया और फिर बताया कि बाहर एक आदमी मुझसे मिलना चाहता है। मैं दरबान की बात सुन कर फ़ौरन ही बाहर उस आदमी के पास पहुंचा। वो आदमी मुझे देख कर थोड़ा एकांत में जा कर खड़ा हो गया। मैं जब उसके क़रीब पहुंचा तो उसने धीमी आवाज़ में मुझे जो कुछ बताया उसे सुन कर मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई। अंत में मैंने उसे अपना ख़्याल रखने को कहते हुए विदा किया और खुद वापस हवेली के अंदर की तरफ चल पड़ा।

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आसमान में चांद नहीं था इस लिए चारो तरफ अंधेरा फैल चुका था। उसी अंधेरे में दो इंसानी साए तेज़ी से एक तरफ को बढ़े चले जा रहे थे। दोनों के चेहरे पर चिंता और परेशानी के साथ साथ डर और घबराहट के भाव भी गर्दिश कर रहे थे। जल्दी ही वो पेड़ों के बीच से चलते हुए एक मकान के पास पहुंचे। दरवाज़े पर लगी लोहे की शांकल को पकड़ कर उन्होंने उसे दरवाज़े पर सावधानी से बजाया। परिणामस्वरूप कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुला। दरवाज़े के दूसरी तरफ एक युवक नज़र आया। युवक के चेहरे पर भी वैसे ही भाव थे जैसे उन दो इंसानी सायों के चेहरे पर थे। दरवाज़ा खुलते ही वो दोनों इंसानी साए जल्दी से अन्दर दाखिल हो गए। दोनों के अंदर जाते ही युवक ने दरवाज़ा बंद कर दिया। अंदर लालटेन का पीला प्रकाश फैला हुआ था जिसके चलते तीनों के चेहरे अब स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

"क्या हुआ तुम दोनों अभी तक वापस हवेली नहीं गए?" युवक ने चिंतित भाव से उन दोनों की तरफ देखते हुए पूछा था।
"कैसे जाएं गौरव?" दो में से एक ने घबराए हुए लहजे से कहा____"हवेली जाने का मतलब है अपनी दुर्दशा करवाना। अब तो भगवान भी हम दोनों को बचा नहीं सकता। हमने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि वक्त और हालात अचानक से यूं बदल जाएंगे और पलक झपकते ही हमारी गर्दनें किसी तेज़ धार वाली तलवार के निशाने पर आ जाएंगी।"

"सब कुछ ख़त्म हो गया विभोर।" गौरव ने हताश हो कर कहा____"तुम्हारी मित्रता के चलते मैंने तुम दोनों के साथ मिल कर जो कुछ किया है उसका अंजाम अब मुझे भी भुगतना पड़ेगा। दुनिया की कोई भी ताक़त अब हमें नहीं बचा सकती।"

"ऐसा मत कहो गौरव।" विभोर ने सहमे हुए भाव से कहा____"तुम तो शायद किसी तरह बच भी जाओ लेकिन हम दोनों तो सच में अब किसी भी तरह से नहीं बचने वाले। वो हरामज़ादा वैभव हम दोनों का बहुत बुरा हाल करेगा। पता नहीं कैसे उसे शीला पर शक हो गया? उसने उससे सब कुछ उगलवा लिया होगा।"

"आज मेरे एक दोस्त ने बताया कि शीला की हत्या एक ऐसे रहस्यमई आदमी ने की है जिसके समूचे जिस्म पर काला कपड़ा था।" गौरव ने कहा____"और हम यही समझ रहे थे कि शीला के द्वारा जब वैभव को सारा सच पता चला होगा तो वैभव ने गुस्से में आ कर उसकी हत्या कर दी होगी। मेरे दोस्त ने बताया कि वो शाम को दिशा मैदान के लिए गया हुआ था और उसने साफ देखा था कि एक काले कपड़ों से ढंके हुए आदमी ने एक औरत के गले को पलक झपकते ही अपने चाकू से चीर दिया था। पहले उसे उस औरत के बारे में पता नहीं था किंतु जब गांव में शीला की हत्या हो जाने की ख़बर फैली तो वो समझ गया कि जिस औरत को उसने देखा था वो शीला ही थी। ख़ैर अब सोचने वाली बात ये है कि काले कपड़ों से ढंका हुआ वो आदमी कौंन था और उसने शीला की हत्या क्यों की होगी?"

गौरव की बातें सुन कर विभोर और अजीत भौचक्के से उसकी तरफ देखते रह गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनों के दिमाग़ ने काम ही करना बंद कर दिया था। शायद ये उन दोनों के लिए ऐसी ख़बर थी जिसके बारे में उन्होंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था।

"ये तो सच में हैरतंगेज बात है गौरव।" फिर अजीत ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आख़िर कौन हो सकता है वो काले कपड़े वाला और उसने शीला की इस तरह से हत्या क्यों की होगी?"

"मैं क्या बताऊं?" गौरव ने कहा____"मैं तो खुद ही दोपहर से इस बारे में सोच सोच कर परेशान हूं। वैसे इतना तो समझा ही जा सकता है कि शीला से उसकी कोई तो दुश्मनी ज़रूर रही होगी या फिर ये भी हो सकता है कि शीला से उसको किसी बात का ख़तरा रहा होगा।"

"अगर तुम्हारी बात सच है।" विभोर ने कुछ सोचते हुए कहा____"तो शायद हम बेकार में ही इतना परेशान और डरे हुए हैं।"
"क्या मतलब??" गौरव और अजीत ने एक साथ चौंक कर विभोर की तरफ देखा था।

"मतलब ये कि हो सकता है कि शीला वैभव के हाथ ही न लगी हो।" विभोर ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"बल्कि उससे पहले ही उस काले कपड़े वाले के द्वारा मार दी गई हो। अब जबकि शीला वैभव के हाथ ही न लगी होगी तो उसके द्वारा वैभव को कुछ पता चलने का सवाल ही नहीं पैदा होता। यानि हम सब बेकार में ही उससे इतना डरे हुए हैं।"

"हां, शायद तुम सही कह रहे हो।" गौरव के चेहरे पर सहसा चमक उभर आई थी, किंतु फिर जल्दी ही वो चमक गायब हो गई, बोला____"लेकिन एक समस्या तो अभी भी है।"
"कौन सी समस्या?" अजीत पूछे बगैर न रह सका था।

"तुम्हारी बहन कुसुम।" गौरव ने उन दोनों की तरफ देखते हुए कहा____"जैसा कि तुमने बताया था कि शीला के द्वारा मजबूर किए जाने पर ही कुसुम वैभव को चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर देती थी। अब जबकि उसको मजबूर करने वाली ही नहीं रही तो संभव है कि कुसुम वैभव के पूछने पर हमारा भेद खोल दे।"

"मेरे ख़्याल से वो ऐसा नहीं करेगी।" विभोर ने कहा____"क्योंकि उसे भी पता है कि भेद खोलने पर उसे ये भी बताना पड़ेगा कि वो किस बात से मजबूर थी? मैं अपनी बहन को अच्छी तरह जानता हूं। वो मजबूरी में कोई भी काम करने को तैयार हो जाएगी लेकिन वैभव को इस बारे में कुछ नहीं बताएगी। वो किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहेगी कि जो भाई उसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है उसकी नज़र में उसकी कोई औकात ही न रह जाए।"

"हो सकता है कि ऐसा ही हो।" गौरव ने कहा____"पर मुझे वैभव पर भरोसा नहीं है। अगर उसे शीला पर शक हुआ है तो वो कहीं न कहीं से सब कुछ पता कर ही लेगा और अगर ऐसा हुआ तो समझो हमारा अंजाम बहुत बुरा होगा।"

विभोर की बातों ने जहां कुछ पलों के लिए उनको राहत का आभास कराया था वहीं गौरव की इन बातों ने एक बार फिर से उनकी हालत ख़राब कर दी। विभोर और अजीत के चेहरों पर एक बार फिर से डर और घबराहट ने कब्जा कर लिया था।

"तुम दोनों को यहां नहीं आना चाहिए था।" दोनों को ख़ामोश देख कर गौरव ने कहा____"बल्कि वापस हवेली जाना चाहिए था। चेहरे पर ऐसे भाव रखने चाहिए ताकि किसी को भी किसी बात का शक ना हो। बाकी अब तो ये निश्चित है कि जो होना होगा वो हो के ही रहेगा। तुम दोनों की तरह मेरी भी हालत ख़राब है। अगर मेरे ऐसे कार्य की ख़बर मेरे घर वालों को लग गई तो बहुत कुछ बुरा हो जाएगा। तुम्हें तो पता है कि अब हम दोनों के परिवारों के बीच अच्छे संबंध बन गए हैं। मेरे इस कार्य से यकीनन हमारे परिवार के बीच फिर से दुश्मनी की दीवार खड़ी हो जाएगी।"

विभोर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बाहर से किसी के द्वारा दरवाज़ा बजाए जाने से तीनों के तीनों ही उछल पड़े। पलक झपकते ही तीनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ती हुई नज़र आने लगीं। दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए वो अपलक देखने लगे थे। डर और घबराहट के मारे कुछ ही पलों में तीनों का बुरा हाल हो गया। सबकी आंखों में एक ही सवाल मानों ताण्डव सा करने लगा था कि कौन हो सकता है बाहर?


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अध्याय - 47
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अब तक....

विभोर अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी बाहर से किसी के द्वारा दरवाज़ा बजाए जाने से तीनों के तीनों ही उछल पड़े। पलक झपकते ही तीनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ती हुई नज़र आने लगीं। दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए वो अपलक देखने लगे थे। डर और घबराहट के मारे कुछ ही पलों में तीनों का बुरा हाल हो गया। सबकी आंखों में एक ही सवाल मानों ताण्डव सा करने लगा था कि कौन हो सकता है बाहर?

अब आगे....

बाहर से कोई बार बार दरवाज़ा बजाए जा रहा था किंतु विभोर अजीत और गौरव में से किसी में भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि जा कर दरवाज़ा खोलें। सबके चेहरों पर बारह बजे हुए थे। डर और घबराहट के मारे चेहरा पसीने पसीने हुआ पड़ा था। गुज़रते वक्त के साथ उन तीनों की हालत और भी ज़्यादा ख़राब हुई जा रही थी।

"क...क..कौन हो सकता है गौरव?" विभोर के हलक से बड़ी मुश्किल से मरी हुई आवाज़ निकली____"क.. कहीं वो तो नहीं आ गया?"

"य..ये क्या कह रहे हो विभोर भाई?" गौरव को अपनी गांड़ फटती हुई महसूस हुई, बोला____"भ..भला वो यहां कैसे आ सकता है? उसे क्या पता हम यहां होंगे? नहीं नहीं, ये कोई और ही होगा।"

"ले..लेकिन कौन?" अजीत हिम्मत कर के पूछ ही बैठा____"इस वक्त कौन हो सकता है? और तो और बोल भी नहीं रहा, बस दरवाज़ा ही बजाए जा रहा है।"

"अ..अब क्या करें?" गौरव जब कोई जवाब न दे सका तो विभोर दबी हुई आवाज़ में बोला____"क्या हमें दरवाज़ा खोल कर देखना चाहिए कि बाहर कौन है?"

"इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है विभोर भाई।" गौरव मानों बेबस भाव से बोला____"दरवाज़ा तो हमें खोलना ही पड़ेगा। संभव है बाहर कोई ऐसा व्यक्ति हो जो हमारा ही आदमी हो।"

गौरव की बात सुन कर विभोर और अजीत के चेहरों पर तनिक राहत के भाव उभरते नज़र आए लेकिन डर और घबराहट में कोई कमी न हुई। इस बीच दरवाज़ा फिर से बजाया गया। उन तीनों के लिए सबसे ज़्यादा परेशानी वाली बात ये थी कि बाहर जो कोई भी था वो बोल कुछ नहीं रहा था बल्कि सिर्फ़ दरवाज़ा ही बजाए जा रहा था। इधर ये तीनों एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे और ये उम्मीद भी कर रहे थे कि दरवाज़ा खोलने कौन जाने वाला है? आख़िर हिम्मत जुटा कर गौरव ही दरवाज़े की तरफ बढ़ा। धीमें क़दमों से चलते हुए वो दरवाज़े के क़रीब पहुंचा। अपनी घबराहट को बड़ी मुश्किल से काबू करने का प्रयास करते हुए उसने कांपते हाथ से दरवाज़े की शांकल को पकड़ा और फिर उसे बहुत ही आहिस्ता से खींच कर कुंडे से अलग किया। दिल की धड़कनें उसकी कनपटियों पर मानों हथौड़ा बरसा रहीं थी। सूखे हलक को उसने थूक निगल कर तर किया और शांकल को अपनी तरफ खींच कर दरवाज़े के पल्ले को धड़कते दिल के साथ खोला।

अभी दरवाज़े का पल्ला थोड़ा ही खुला था कि तभी वो पल्ला भड़ाक से उसके चेहरे पर बड़ी तेज़ी से टकराया जिससे दो बातें एक साथ हुईं। पहली तो गौरव के हलक से दर्दनाक चीख निकली और दूसरी उसका जिस्म हवा में लहराते हुए पीछे कमरे में जा कर धड़ाम से गिरा। कमरे के अंदर मौजूद विभोर और अजीत अचानक हुए इस कृत्य से बुरी तरह उछल पड़े। दहशत के चलते उनके हलक से चीख भी निकल गई थी।

गौरव को कमरे की ज़मीन पर यूं धड़ाम से गिर गया देख उन दोनों की जान हलक में आ कर फंस गई थी। बात सिर्फ़ इतनी ही होती तो शायद उन्हें अपने ज़िंदा होने का आभास भी हो जाता लेकिन दरवाज़े से जिस शख़्स को अंदर आते देखा उसे देख उन दोनों की आत्मा उनका शरीर छोड़ देने के लिए मानो बगावत कर उठी।

"कैसे हो मेरे खानदान के नमूनों?" मैंने उन दोनों की तरफ देखते हुए सर्द लहजे में कहा____"स्वागत नहीं करोगे हमारा?"
"व..व..वैभव..भ..भैया।" विभोर के हलक से अटकता हुआ स्वर निकला। मुझे किसी जिन्न की तरह प्रगट हो गया देख उसकी घिग्घी सी बंध गई थी। चेहरा कागज़ की तरह एकदम सफेद पड़ गया था।

"न न, वैभव भैया नहीं, हरामज़ादा।" मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर उसी सर्द लहजे में कहा____"तुमने यही नाम रखा है न मेरा?"

मेरी बात सुन कर विभोर से कुछ कहते न बन पड़ा। मुझसे आंख तक मिलाने की हिम्मत न हुई उसमें। फ़ौरन ही बगले झांकने लगा था वो। अपनी धड़कनें उसे रुकती हुई सी महसूस हुईं। हलक किसी रेगिस्तान की तरह सूख गया था, जिसे तर करने के लिए मुंह में थूक का एक क़तरा भी ना बचा था। यही हाल अजीत का भी था। उधर ज़मीन पर गिरा पड़ा गौरव खुद को उठा कर कमरे के एक कोने में खड़ा कर लिया था। गांड के बल ज़मीन पर गिरा था वो इस लिए अभी भी गांड में दर्द हो रहा था उसके जिसका असर उसके बिगड़े हुए चेहरे से साफ़ नज़र आ रहा था। वैभव सिंह नाम की दहशत ने सिर्फ़ उसे ही नहीं बल्कि तीनों को ही जैसे नपुंसक बना दिया था। तीनों के जिस्म जूड़ी के मरीज़ की तरह थर थर कांपे जा रहे थे। उनकी ये हालत देख मैं मन ही मन हंसा तो ज़रूर लेकिन उनकी करनी का ख़्याल आते ही मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।

"सांप सूंघ गया क्या तुझे?" मैं गुस्से में विभोर का कालर पकड़ कर गुर्राया____"बोल यही नाम रखा है न तूने मेरा?"
"म..मु...मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" विभोर मिमियाते हुए बड़ी मुश्किल से बोला।

"ठीक है, माफ़ कर दूंगा तुझे।" मैं उसी तरह उसका कालर पकड़े गुर्राया____"लेकिन ये तो बता कि ऐसा कौन सा अच्छा काम किया है तूने जिसके लिए तुझे माफ़ कर दूं? तुम दोनों ने साहूकार के इस लड़के के साथ मिल कर मुझे नामर्द बनाने का कार्य किया। इसके लिए तो मैं तुझे माफ़ भी कर सकता हूं लेकिन तूने अपनी ही बहन को घटिया काम करने पर मजबूर किया। क्या तुझे ज़रा सा भी एहसास है कि तेरे मजबूर करने पर जब उस मासूम ने ऐसे घटिया काम किए तब उस पर क्या क्या गुज़रती रही होगी? तूने अपनी ही बहन की आत्मा को छलनी किया, क्या तुझे लगता है कि इसके लिए तुझे माफ़ी मिलनी चाहिए?"

विभोर सिर झुकाए खड़ा रह गया। उसमें जैसे बोलने की अब हिम्मत ही न बची थी। मेरा मन तो कर रहा था कि उन दोनों भाईयों को वहीं ज़मीन पर जिंदा गाड़ दूं लेकिन बड़ी मुश्किल से मैं अपने गुस्से को काबू किए हुए था।

"अब बोलता क्यों नहीं हरामखोर?" उसे कुछ न बोलता देख गुस्से से मैंने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया जिससे वो लहरा कर एक तरफ ज़मीन में जा गिरा। गुस्से से तमतमाया हुआ मैं उसके क़रीब पहुंचा। इससे पहले कि मैं झुक कर उसको उठाता मेरे सिर पर ज़ोर से प्रहार हुआ। मेरे हलक से दर्द भरी चीख निकल गई। दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर लहरा गया मैं।

सिर पर हुए तीव्र प्रहार से मैं दर्द से चीखा भी था और लहरा भी गया था किंतु जल्दी ही सम्हल कर पलटा। मेरी नज़र अजीत पर पड़ी। उसके हाथ में एक मोटा सा डंडा था और चेहरे पर गुस्सा तो था लेकिन उस गुस्से में भी डर और घबराहट के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। उसके पीछे दीवार से लगा गौरव आंखें फाड़े कभी अजीत को देखता तो कभी मुझे। शायद उसे अजीत से ऐसे कार्य की उम्मीद नहीं थी और उसे ही क्या मुझे खुद भी उससे ऐसी उम्मीद नहीं थी, लेकिन जल्दी ही समझ गया कि ऐसा करने की हिम्मत उसमें क्यों आई होगी। असल में उसे लगा होगा कि मैं अकेला ही यहां आया हूं और वो तीन लोग हैं जिससे वो मुझ पर भारी पड़ सकते हैं। मैं समझ सकता था कि मेरे प्रति इतने समय से पल रही उनकी नफ़रत ने आज शायद अपने सब्र का बांध तोड़ दिया था।

"रु..रुक क्यों गया अजीत?" अपने भाई के हाथों मुझे मार खाया देख विभोर फ़ौरन ही उठ कर खड़ा हो गया था। पलक झपकते ही उसके चेहरे पर भी नफ़रत के भाव उभर आए थे। मेरी तरफ उसी नफ़रत से देखते हुए उसने अजीत से कहा____"मार इस हरामजादे को। ये अकेला हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इससे डरने की ज़रूरत नहीं है छोटे। आज तसल्ली से इसको सबक सिखाएंगे हम दोनों। इसकी वजह से हवेली में कभी हमारी कोई अहमियत नहीं रही। सब इसके ही गुणगान गाते थे जैसे ये कोई इंसान नहीं बल्कि भगवान हो।"

"बहुत खूब।" विभोर की ज़हर में घुली बातें सुन कर मैं मुस्कुराते हुए बोल पड़ा____"आज पहली बार गीदड़ ने शेर बनने की कोशिश की है। ख़ैर अच्छा प्रयास है, अब इससे पहले कि तेरा और तेरे भाई का जोश ठंडा पड़ जाए दोनों अपनी मर्दानगी दिखाओ मुझे।"

"लगता है तुझे हमारी मर्दानगी देखने की बड़ी जल्दी है।" अजीत डंडे को पकड़े मेरी तरफ दो क़दम आगे बढ़ कर बोला____"फ़िक्र मत कर, आज हम तेरी वो हालत करेंगे कि तुझे अपने जन्म लेने पर अफ़सोस होगा।"

"पीछे से वार करने वाले हिंजड़े होते हैं बेटा।" मैंने उसकी खिल्ली उड़ाने वाले भाव से कहा____"सच्चा मर्द है तो अब आगे से वार कर के दिखा। मैं भी तो देखूं कि बिल में रहने वाले चूहों में कितना कसबल है?"

मेरी बात सुन कर दोनों भाई बुरी तरह तिलमिला उठे और यही तो मैं चाहता था। गुस्से में तिलमिलाए हुए अजीत ने तेज़ी से डंडे को घुमा कर मुझ पर प्रहार किया लेकिन मैंने आराम से झुक कर उसके वार से खुद को बचा लिया। इससे पहले कि वो संभल पाता मेरी टांग घूम गई जोकि सीधा उसके डंडे पर पड़ी, परिणामस्वरुप डंडा उसके हाथ से छूट कर दूर फिसल गया। उसके बाद जल्दी ही मैंने उसकी पीठ पर दुहत्थड़ जमा दिया जिससे वो ज़मीन चाटता नज़र आया। अभी मैं सम्हला ही था कि पीछे से विभोर ने मुझे दबोच लिया।

"अजीत जल्दी से उठ और डंडे को उठा कर इसका सिर फोड़ दे।" मुझे मजबूती से पकड़े विभोर ज़ोर से चिल्लाते हुए अजीत से बोला था____"आज या तो ये नहीं या फिर हम नहीं।"

विभोर की बात पर अजीत ने फ़ौरन ही अमल किया। वो तेज़ी से उठा और दूर पड़े डंडे को उठा लिया। इधर मैं विभोर से छूटने की कोशिश कर रहा था। विभोर पूरी ताक़त से मुझे पकड़े हुए था। शायद करो या मरो वाली बात उसके ज़हन में समा गई थी। उसे पता था कि अगर उन दोनों भाईयों ने मुझे मौका दिया तो ये उनके लिए ठीक नहीं होगा। इधर मैं भी जानता था कि इस वक्त वो दोनों होश में नहीं हैं। मेरे प्रति उनके अंदर जो नफ़रत भरी हुई थी वो उन्हें होश में आने ही नहीं दे सकती थी।

अजीत डंडे को मजबूती से पकड़े मेरी तरफ बढ़ा। मैंने जब देखा कि वो मेरे क़रीब ही आ गया है तो मैने जल्दी से अपनी कुहनी का वार पीछे विभोर के चेहरे पर किया जिससे उसने दर्द से बिलबिलाते हुए जल्दी ही मुझे छोड़ दिया। अभी मैं उससे छूट कर सम्हला ही था कि उधर अजीत का डंडा घूम गया जो तेज़ी से मेरी तरफ आया। मैं बिजली की सी तेज़ी से एक तरफ को हट गया जिससे डंडे का वार कच्ची ज़मीन पर ज़ोर से पड़ा।

मेरे ख़्याल से तमाशा बहुत हो गया था और अब इस तमाशे को ख़त्म करने का वक्त आ गया था। मैंने देखा विभोर फिर से मुझे पकड़ने के लिए मेरी तरफ लपका लेकिन मैंने एक लात उसके पेट पर जमा दी जिससे वो पेट पकड़ कर दोहरा हो गया। इधर अजीत एक बार फिर से डंडा लिए मेरी तरफ लपका मगर हवा में ही मैने उसके डंडे को थाम लिया और एक लात उसके पेट पर जमा दिया जिससे वो भी अपना पेट पकड़ कर दर्द से दोहरा हो गया। मैंने उसके हाथ से डंडा छुड़ाया और फिर दे दनादन दोनों भाईयों पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए। कमरे में दोनों की चीखें गूंजने लगीं। दीवार से पीठ टिकाए खड़ा गौरव उन दोनों को इस तरह दर्द से चीखते देख थर थर कांपे जा रहा था। मैंने विभोर और अजीत पर तब तक डंडे बरसाए जब तक कि वो दोनों मुझसे रहम की भीख न मांगने लगे। कमरे की ज़मीन पर दोनों लहू लुहान हुए पड़े थे। मुझे उन दोनों पर इतना गुस्सा आया हुआ था कि मैं एक बार फिर से दोनों पर डंडे बरसाने ही चला था कि तभी कमरे के दरवाज़े से आई एक भारी आवाज़ को सुन कर रुक गया।

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दरवाज़े पर पिता जी यानि दादा ठाकुर खड़े थे और उनके पीछे जगताप चाचा के साथ साथ और भी कई सारे लोग थे। पिता जी का चेहरा जहां शांत था वहीं जगताप चाचा के चेहरे पर गुस्सा दिख रहा था। दरवाज़े पर उन सबको खड़ा देख कमरे में मौजूद विभोर अजीत और गौरव तीनों की ही नानी मर गई।

कुछ ही पलों में एक एक कर के सब कमरे में आ गए। गौरव ने जब अपने ताऊ मणि शंकर को देखा तो उसकी हालत और भी ज़्यादा ख़राब हो गई। कमरे में हमारे अलावा पिता जी, जगताप चाचा, बड़े भैया (अभिनव सिंह) और साहूकार मणि शंकर थे। पिता जी के साथ सुरक्षा के लिए जो हमारे आदमी आए थे वो बाहर ही रुक गए थे।

जगताप चाचा विभोर और अजीत की तरफ गुस्से से देखे जा रहे थे। प्रतिपल उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। अचानक वो आगे बढ़े और मेरे हाथ से डंडा छीन लिया। इससे पहले कि वो गुस्से में कुछ करते पिता जी की शख़्त आवाज़ सुन कर अपनी जगह पर रुक गए।

"मुझे मत रोकिए बड़े भैया।" फिर वो गुस्से से कह उठे____"आज इन दोनों ने मुझे आपकी नज़रों से गिरा दिया है। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि ये मेरी अपनी औलादें हैं जिन्होंने इतना घटिया कर्म किया है। इससे अच्छा तो यही है कि मैं ऐसा कुकर्म करने वाली अपनी औलादों की अपने हाथों से ही जान ले लूं।"

"होश में आओ जगताप।" पिता जी ने शख्त लहजे में कहा____"इस मामले को शांति से और ठंडे दिमाग़ से देखना है हमें। हम जानना चाहते हैं कि इन लोगों ने जो कुछ भी किया है वो क्यों किया है और किसके कहने पर किया है?"

"अब सुनने को रह ही क्या गया है भैया?" जगताप चाचा ने सहसा दुखी भाव से कहा____"सब कुछ तो बाहर से सुन ही लिया है हम सबने। मुझे बस इजाज़त दीजिए ताकि ऐसी औलादों को मैं अपने हाथों से मार मार कर ख़त्म कर सकूं।"

"हमने क्या कहा तुम्हें समझ में नहीं आया क्या?" पिता जी ने इस बार जगताप चाचा की तरफ गुस्से से देखते हुए कहा____"अब ख़ामोश रहो और हमें इन लोगों से बात करने दो।"

जगताप चाचा पिता जी की बात सुन कर ख़ामोश रह गए। एक तरफ जहां बड़े भैया सोचो में गुम से हो कर खड़े थे वहीं दूसरी तरफ मणि शंकर भी चेहरे पर अजीब से भाव लिए ख़ामोश खड़ा था। इधर विभोर अजीत और गौरव एक कोने में सिमटे हुए बैठे हुए थे। चेहरों पर मुर्दानगी छाई हुई थी उनके।

"हमने ये तो सुन लिया है कि तुम दोनों ने वैभव के साथ वो सब इस लिए किया क्योंकि तुम दोनों इससे नफ़रत करते थे।" पिता जी ने विभोर और अजीत दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा____"और ये भी सुन लिया है कि इसके लिए तुमने खुद अपनी ही बहन और हमारी बेटी कुसुम को भी मजबूर कर रखा था। अब हम ये जानना चाहते हैं कि इसके अलावा और क्या किया है तुमने और साथ ही ऐसे काम में गौरव के अलावा और कौन कौन तुम्हारे साथ शामिल है?"

पिता जी की बातें सुन कर विभोर और अजीत दोनों ही कुछ न बोले। डर और घबराहट से उन दोनों का बुरा हाल था और साथ ही शर्मिंदगी के मारे उनका चेहरा झुका हुआ था। जब काफी देर गुज़र जाने पर भी वो दोनों कुछ न बोले तो पिता जी ने तेज़ आवाज़ में घुड़कते हुए दुबारा वही सब पूछा।

"इसके अलावा और कुछ नहीं किया हमने।" विभोर ने दबी हुई आवाज़ में बोलने का साहस किया____"हमारे इस काम में सिर्फ़ गौरव ही हमारे साथ रहा है। इसका काम सिर्फ दवा लाना ही था। हमें नहीं पता कि ये कहां से वो दवा ले कर आता था जिसे चाय में हर रोज़ थोड़ा थोड़ा मिला कर पिलाने से इंसान की मर्दानगी समाप्त हो जाती है।"

"और बड़े भैया को ऐसी कौन सी घूंटी पिलाते थे तुम लोग?" मैंने उन दोनों की तरफ देखते हुए शख़्त भाव से पूछा____"जिसके प्रभाव से ये हमेशा तुम दोनों के साथ ही चिपके रहते थे?"

"इसका जवाब मैं देता हूं वैभव।" पिता जी के पीछे खड़े बड़े भैया अचानक से बोल पड़े तो मैं और पिता जी पलट कर उनकी तरफ देखने लगे, जबकि उन्होंने आगे कहा____"जब मुझे पता चला था कि मेरा जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है तो मैं इस बात से बेहद दुखी हो गया था। एकदम से ऐसा लगने लगा था जैसे दुनिया में अब मेरे लिए कुछ रह ही नहीं गया है। मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक से मेरे साथ ये क्या हो गया था? उधर तू अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था। मुझे तुझसे हमेशा ईर्ष्या होती थी लेकिन ये भी सोचता था कि सबके नसीब में जीवन का ऐसा आनंद कहां? अगर तू अपने ऐसे जीवन से खुश है तो मुझे तुझसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, बल्कि खुश होना चाहिए। आख़िर तू मेरा छोटा भाई है। ख़ैर, अपने साथ ऊपर वाले के द्वारा की गई इस नाइंसाफी की वजह से मैं बहुत व्यथित था। तेरी भाभी भी इस सबसे बेहद दुखी थी लेकिन अब भला इसमें किसी का क्या ज़ोर चल सकता था? पिता जी ने इस बारे में किसी को कुछ भी बताने से मना कर रखा था लेकिन इन्हें भला इस बात का एहसास कैसे हो सकता था कि मुझ पर क्या गुज़र रही थी? सोचा था अपने दिल का हाल तुझे बताऊंगा और तेरे साथ अपनी ज़िंदगी के बचे हुए दिन गुज़ारुंगा लेकिन तभी एक दिन तुझे भी पिता जी ने बहिष्कृत कर के गांव से निकाल दिया। सबको ये भी कह दिया कि जो कोई भी तुझसे मिलने की या संबंध रखने की कोशिश करेगा उसको भी वही सज़ा दी जाएगी। तेरे यूं अचानक से चले जाने के बाद मैं एकदम से अकेला पड़ गया। हर गुज़रते दिनों के साथ ये सोच सोच कर मेरी हालत बद से बदतर होती जा रही थी कि एक दिन ऐसा आ जाएगा जब मैं सबको छोड़ कर इस दुनिया से चला जाऊंगा। अंदर ही अंदर मुझे ये दुख खाए जा रहा था जिसकी वजह से मैं चिड़चिड़ा हो गया।हर रोज़ तेरी भाभी पर गुस्सा करने लगा, जबकि उस बेचारी का तो कोई कसूर ही नहीं था। ख़ैर एक दिन मैंने विभोर और अजीत को जीप से कहीं जाते हुए देखा तो मैंने इन दोनों को रुकने को कहा और फिर इनके साथ मैं भी जीप में बैठ कर चल दिया। मैं नहीं जानता था कि ये लोग कहां जा रहे थे अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयों के साथ जाना चाहिए था कि नहीं लेकिन खुद को बहलाने के लिए उस वक्त मुझे जो सही लगा मैंने वही किया। इन दोनों के साथ सारा दिन मैं इधर से उधर घूमता रहा। हवेली के कमरे में इतनों दिनों तक पड़े पड़े मैं ऊब गया था इस लिए उस दिन मुझे इनके साथ घूमने से थोड़ा अच्छा महसूस हुआ। उसके बाद मैं हर रोज़ इन दोनों के साथ घूमने जाने लगा। फिर एक दिन गौरव से मुलाक़ात हुई। शुरू शुरू में गौरव मेरी वजह से असहज महसूस करता था लेकिन फिर हमारे बीच सब कुछ सामान्य हो गया। मैं नहीं जानता था कि ये तीनों जब एक साथ होते थे तो क्या करते थे लेकिन एक दिन मैंने इन्हें बगीचे वाले मकान में गांजा पीते हुए देख लिया। इन तीनों की तो हालत ही ख़राब हो गई थी लेकिन मैंने इन लोगों को उसके लिए कुछ नहीं कहा। कहता भी क्यों, सबको अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का हक़ है। उनके पास बहुत बड़ा जीवन था इस लिए वो हर चीज़ का आनंद उठा रहे थे, लेकिन मेरे पास तो कुछ ही समय का जीवन था। मैंने सोचा अपने इन छोटे भाइयों के साथ मैं भी खुशी के कुछ पल गुज़ार लेता हूं। बस, उसके बाद से यही सिलसिला चलने लगा। मैं भी इन लोगों के साथ गांजा पीने लगा। धीरे धीरे मुझे गांजा पीने की लत लग गई तो मैं खुद ही इन लोगों को साथ ले कर हवेली से निकल लेता और कहीं एकान्त में जा कर हम तीनों गांजा पीते। विभोर ने बताया था कि गांजे का जुगाड़ गौरव करता था। मैंने इससे कभी नहीं पूछा कि ये कहां से ऐसा गांजा ले कर आता था जिसे पीने के बाद मैं अपने सारे दुख दर्द भूल जाता था। गांजा पीने के बाद मैं एक अलग ही तरह की रंगीन दुनिया में खो जाता था। एक ऐसी रंगीन दुनिया में जहां जीवन बहुत ही सुंदर दिखता था और इस बात का एहसास ही नहीं रह जाता था कि एक दिन मुझे हक़ीक़त वाली दुनिया से रुखसत भी हो जाना है।"

बड़े भैया चुप हुए तो कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा छा गया। सबके चेहरों पर गभीरता के भाव गर्दिश करते नज़र आ रहे थे। इधर मैं ये सोचने लगा था कि मेरे न रहने पर मेरे भैया को कितना कुछ सहना पड़ा था। मैं समझ सकता था कि वो उस समय कितनी बुरी स्थित से गुज़रे रहे होंगे।

"हमें माफ़ करना बेटे, हमने कभी तुम्हारी तकलीफ़ों को दूर करने या उन्हें साझा करने का प्रयत्न नहीं किया।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"लेकिन यकीन मानों कुल गुरु की उस भविष्यवाणी को सुन कर हम भी बेहद दुखी थे। किसी के सामने अपने सीने के नासूर बन गए दर्द को दिखा नहीं सकते थे और यही हमारे लिए सबसे बड़े दुःख का कारण बन गया था। हर पल ऊपर वाले से यही पूछते थे कि आख़िर क्यों उसने हमारे बेटे का जीवन इतना कमतर बनाया?"

"आपको माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है पिता जी।" बड़े भैया ने कहा____"मैं समझ सकता हूं कि ये सब आपके लिए भी कितना असहनीय रहा होगा।"

"बड़े भैया, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं?" मैंने झिझकते हुए बड़े भैया से कहा तो वो मेरी तरफ देख कर मुस्कुराए और फिर बोले____"बेझिझक हो के पूछ छोटे। तुझे मुझसे इजाज़त लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।"

"क्या इसके अलावा भी आप इन दोनों के साथ कुछ करते थे?" मैंने एक बार फिर से झिझकते हुए कहा____"मेरा मतलब है कि ये लोग हवेली की नौकरानी शीला को कुसुम के कमरे में ले जा कर उसके साथ रंगरलियां मनाते थे तो क्या आप भी इस काम में इनका साथ देते थे?"

"मैं तो रात में इनके पास गांजा पीने जाता था वैभव।" बड़े भैया ने कहा____"जैसा कि मैंने बताया मुझे गांजा पीने की लत लगी हुई थी इस लिए तेरी भाभी के सो जाने के बाद मैं इनके कमरे में गांजा पीने के लिए जाता था। एक दिन मुझे इन दोनों का ये राज़ भी नज़र आ गया कि ये लोग हवेली की एक नौकरानी के साथ मौज मस्ती भी करते हैं। पहले तो मुझे ये सोच कर हैरानी हुई थी कि ये दोनों भी तेरे नक्शे क़दम पर चल रहे हैं लेकिन फिर ये सोच कर इन्हें कुछ नहीं कहा कि जीवन इनका है इस लिए मुझे इनके किसी भी तरह के काम में हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। वैसे भी मैं ज़्यादा समय का मेहमान नहीं था इस लिए मैं किसी से बैर भाव या मन मुटाव जैसी बात नहीं रखना चाहता था। ख़ैर, मैंने इन्हें कुछ नहीं कहा और इनके पास से गांजा ले कर एक दूसरे खाली कमरे में चला गया। कई बार तो जब मैं गांजे के नशे में होता था तो ये लोग मेरे सामने ही शीला के साथ रंगरलियां मनाते थे। मुझे अंधेरे में ठीक से कुछ दिखता तो नहीं था किंतु आवाज़ों से पता चलता रहता था कि क्या हो रहा है।"

"क्या इन लोगों ने कभी आपको शीला के साथ वो सब करने के लिए नहीं कहा?" मैंने बड़ी हिम्मत कर के पूछा तो बड़े भैया ने पहले वहां मौजूद सबकी तरफ देखा उसके बाद शांत भाव से कहा____"कई बार इन दोनों ने हंसी मज़ाक में मुझसे कहा था लेकिन मैं कभी इसके लिए राज़ी नहीं हुआ। एक दिन मैंने देखा कि ये लोग कुसुम के कमरे में शीला के साथ लगे हुए थे तो मैं इन दोनों पर बेहद गुस्सा हुआ। ये दोनों डर तो गए थे लेकिन फिर इन्होंने मुझे यकीन दिलाया कि कुसुम को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है। मैंने जब डांटते हुए इनसे ये कहा कि कुसुम को पता हो या न हो लेकिन ऐसा गंदा काम उसके कमरे में नहीं करना चाहिए तो इन लोगों ने कहा कि ये ऐसा इस लिए करते हैं ताकि इससे अलग तरह का एहसास हो और एक अलग ही तरह का मज़ा आए।"

अपने से बड़ों के सामने खुल कर ऐसी बातें करने और सुनने में यकीनन मुझे और शायद भैया को भी शर्म और झिझक महसूस हो रही थी किंतु इसके बावजूद मैं ये सब बातें सबके सामने करवा रहा था ताकि असलियत सबको पता चल जाए। हालाकि मणि शंकर की मौजूदगी में ऐसी बातें नहीं होनी चाहिए थीं लेकिन अब जब बातें खुल ही गईं थी तो भला किसी की मौजूदगी से क्या फ़र्क पड़ता था?

"और क्या आपको भी ये पता था कि ये दोनों कुसुम के द्वारा चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर मुझे पिलाते थे?" मैंने एक एक नज़र विभोर और अजीत की तरफ डालते हुए बड़े भैया से कहा____"क्या आपको कभी इन पर उस सबके अलावा और किसी भी चीज़ का शक नहीं हुआ?"

"शक तो तब होता है छोटे जब किसी से ऐसे किसी काम की उम्मीद हो।" बड़े भैया ने कहा____"मैं तो ज़्यादातर गांजे के नशे में ही गुम रहता था। ऐसा भी कह सकते हो कि मैं हर किसी से विरक्त हो गया था। मुझे भला ये कैसे पता हो सकता था कि ये लोग मेरे पीठ पीछे और क्या क्या कारनामें करते थे?"

"हे ईश्वर!" जगताप चाचा सहसा आहत भाव से बोल पड़े____"ये कैसी नीच औलादों को मेरी औलादें बना कर भेजा है तूने? मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे ये दोनों सपूत इतने गंदे और घटिया काम भी करते होंगे। आज इनकी वजह से मेरा सिर शर्म से झुक गया है। मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा। मुझे अपने देवता समान बड़े भैया की नज़रों से ऐसा गिराया है कि अब शायद ही मैं कभी सिर उठा पाऊं।"

कहने के साथ ही जगताप चाचा का चेहरा एकाएक गुस्से से भभक उठा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता वो तेज़ी से आगे बढ़े और ज़मीन पर पड़े डंडे को उठा कर विभोर और अजीत को मारना शुरू कर दिया। कमरे में एकदम से दर्द भरी चीखें गूंज उठीं। मैं, बड़े भैया और मणि शंकर तो अपनी जगह पर ही खड़े रहे किंतु पिता जी जगताप चाचा की तरफ तेज़ी से बढ़े।

"रुक जाओ जगताप रुक जाओ।" उनके क़रीब पहुंचते ही पिता जी ने जगताप चाचा के उस हाथ को थाम लिया जिस हाथ में उन्होंने डंडा ले रखा था, फिर कठोर भाव से बोले____"बस बहुत हुआ। अब अगर तुमने इन दोनों पर हाथ उठाया तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"मुझे मत रोकिए भैया।" जगताप चाचा क्रोध से खीझते हुए बोले____"आज मैं इन लोगों को जान से मार दूंगा। मुझे ऐसे बेटों के मर जाने का ज़रा सा भी दुख नहीं होगा जिन्होंने ऐसे ऐसे नीच कर्म किए हैं। मुझे तो सोच कर ही शर्म आती है कि इन लोगों ने क्या क्या किया है जबकि ऐसा नीच और गंदा काम करने पर इन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आई। मुझे मत रोकिए भैया, इन्हें जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"तुमने किसी के बारे में फ़ैसला सुनाने का अधिकार कब से अपने हाथ में ले लिया?" पिता जी ने इस बार गुस्से से कहा____"मत भूलो कि इस गांव का ही नहीं बल्कि आस पास के अठारह गांव के लोगों के बारे में फ़ैसला सुनाने का हक़ सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें है।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" जगताप चाचा की आंखों से सहसा आंसू छलक पड़े____"इस वक्त मुझे किसी बात का होश नहीं है। मुझे बस इतना पता है कि मेरे इन कपूतों ने ऐसा कुकर्म किया है जिसके लिए इन्हें इस धरती पर जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"इन दोनों के साथ क्या करना है इसका फ़ैसला हम करेंगे।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"मगर उससे पहले हम मणि शंकर जी के उस भतीजे से भी जानना चाहते हैं कि उसने इन दोनों का ऐसे काम में साथ क्यों दिया? क्या उसे ज़रा भी इस बात का ख़्याल नहीं रहा था कि इस सबका अंजाम क्या हो सकता है?"

पिता जी की बातें सुन कर जगताप चाचा कुछ न बोले बल्कि गुस्से से डंडे को एक तरफ फेंक दिया। विभोर और अजीत जो कि पहले ही मेरे द्वारा की गई कुटाई से लहू लुहान हो गए थे वो जगताप चाचा के डंडों की मार से फिर से दर्द में कराहने लगे थे। उधर उन दोनों के पीछे दीवार से टिका गौरव अपनी सांसें रोके खड़ा था। डर और घबराहट से उसका बुरा हाल था।

"हमने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया है मणि शंकर जी कि हमारे परिवारों के बीच अच्छे संबंध बने रहें।" पिता जी घूम कर मणि शंकर से मुखातिब हुए____"और दोनों ही परिवारों के बच्चे एक दूसरे से अच्छा बर्ताव करते हुए आपस में मैत्री भाव रखें लेकिन मैत्री भाव का मतलब ये नहीं होता कि किसी एक की मित्रता के लिए दूसरे के साथ इतना बड़ा धोखा या इतना बड़ा कुकर्म किया जाए।"

"ठाकुर साहब, इस बारे में मैं अपने भतीजे का बिलकुल भी पक्ष नहीं लूंगा।" मणि शंकर ने गंभीरता से कहा____"मैं ये भी नहीं कहूंगा कि ये लोग अभी बच्चे हैं क्योंकि बच्चों वाला इन्होंने काम ही नहीं किया है। जो लड़के किसी लड़की अथवा किसी औरत के साथ ऐसे संबंध बनाते फिरते हों वो बच्चे तो हो ही नहीं सकते। इस लिए ना तो मैं अपने भतीजे का पक्ष ले कर ये कहूंगा कि आप इसके अपराधों के लिए इसे क्षमा कर दीजिए और ना ही आपके भतीजों का पक्ष लूंगा। ये सब अपराधी हैं और इनके अपराधों के लिए आप इन्हें जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार होगा।"

मणि शंकर की बात पूरी होते ही एक बार फिर से कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा पसर गया। मैं मणि शंकर के चेहरे को ही अपलक निहारे जा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि उसकी बातें उसके चेहरे पर मौजूद भावों से समानता रखती हैं अथवा नहीं?

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अध्याय - 48
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अब तक....

"ठाकुर साहब, इस बारे में मैं अपने भतीजे का बिलकुल भी पक्ष नहीं लूंगा।" मणि शंकर ने गंभीरता से कहा____"मैं ये भी नहीं कहूंगा कि ये लोग अभी बच्चे हैं क्योंकि बच्चों वाला इन्होंने काम ही नहीं किया है। जो लड़के किसी लड़की अथवा किसी औरत के साथ ऐसे संबंध बनाते फिरते हों वो बच्चे तो हो ही नहीं सकते। इस लिए ना तो मैं अपने भतीजे का पक्ष ले कर ये कहूंगा कि आप इसके अपराधों के लिए इसे क्षमा कर दीजिए और ना ही आपके भतीजों का पक्ष लूंगा। ये सब अपराधी हैं और इनके अपराधों के लिए आप इन्हें जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार होगा।"

मणि शंकर की बात पूरी होते ही एक बार फिर से कमरे में ब्लेड की धार की मानिंद पैना सन्नाटा पसर गया। मैं मणि शंकर के चेहरे को ही अपलक निहारे जा रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था कि उसकी बातें उसके चेहरे पर मौजूद भावों से समानता रखती हैं अथवा नहीं?


अब आगे....


"हमारे घर के इन बच्चों ने।" पिता जी ने मणि शंकर की तरफ देखते हुए गंभीर भाव से कहा____"और आपके इस भतीजे ने जो कुछ भी किया है वो बहुत ही संगीन अपराध है मणि शंकर जी। अगर बात सिर्फ लड़ाई झगड़े की होती तो इसे नज़रअंदाज़ भी किया जा सकता था लेकिन ऐसे कुत्सित कर्म को भला कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? एक तरफ हमारे भतीजे हैं जो अपने ही बड़े भाई को नफ़रत की वजह से नामर्द बना देना चाहते थे और दूसरी तरफ आपका भतीजा है जिसने हमारे भतीजों के ऐसे निंदनीय कर्म में उनका साथ दिया। हमें समझ नहीं आ रहा कि अपने ही भाईयों के बीच ऐसी नफ़रत आख़िर कैसे हो गई? आख़िर ऐसा क्या ग़लत कर दिया था वैभव ने जिसके लिए हमारे इन भतीजों ने उसे नामर्द बना देने के लिए इतना कुछ कर डाला?"

पिता जी बोलते हुए कुछ पलों के लिए रुके। उनकी इन बातों पर जवाब के रूप में किसी ने कुछ नहीं कहा जबकि सबकी तरफ बारी बारी से देखते हुए उन्होंने आगे कहा____"और उसके ऐसे काम में आपके भतीजे गौरव ने हर तरह से सहायता की। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि ये सब कितना ग़लत है और इसका क्या अंजाम हो सकता है। मित्रता का मतलब सिर्फ़ ये नहीं होता कि मित्र के हर काम में उसकी सहायता की जाए बल्कि सच्चा मित्र तो वो होता है जो अपने मित्र को हमेशा सही रास्ता दिखाए और ग़लत रास्ते पर जाने से या ग़लत काम करने से उसे रोके।"

"शायद मेरी परवरिश में ही कोई कमी रह गई थी बड़े भैया।" जगताप चाचा ने दुखी भाव से कहा____"जिसकी वजह से आज मेरे इन कपूतों ने मुझे ऐसा दिन दिखा कर आपके सामने मुझे शर्मसार कर दिया है। जी करता है ये ज़मीन फटे और मैं उसमें समा जाऊं।"

"धीरज रखो जगताप।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"इनकी वजह से सिर्फ़ तुम ही नहीं बल्कि हम भी शर्मसार हुए हैं। इन्होंने वैभव के साथ जो किया उसे तो हम भुला भी देते लेकिन इन लोगों ने हमारी फूल सी कोमल बेटी के दिल को भी बुरी तरह दुखाया है जिसके लिए इन्हें हम किसी भी कीमत पर माफ़ नहीं कर सकते।" कहने के साथ ही पिता जी मणि शंकर की तरफ पलटे और फिर बोले_____"हम सच्चे दिल से चाहते हैं मणि शंकर जी कि हमारे परिवारों के बीच संबंध अच्छे बने रहें इस लिए आपके भतीजे ने जो कुछ किया है उसका फ़ैसला हम आप पर छोड़ते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे किसी फ़ैसले के बाद आपके मन में ऐसी वैसी कोई ग़लत बात या ग़लत सोच पैदा हो जाए।"

"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ठाकुर साहब?" मणि शंकर ने चौंकते हुए कहा____"भला मेरे मन में ऐसी वैसी बात क्यों आ जाएगी? मैं तो आपसे पहले ही कह चुका हूं कि आप इन लोगों को जो भी दंड देंगे वो मुझे स्वीकार होगा। ऐसा इस लिए क्योंकि मुझे अच्छी तरह एहसास है कि इन लोगों ने कितना ग़लत काम किया है और ऐसे ग़लत काम की कोई माफ़ी नहीं हो सकती। आपकी जगह मैं होता तो मैं भी इनके ऐसे ग़लत काम के लिए इन्हें कभी माफ़ नहीं करता।"

"इसी लिए तो हमने आपको अपने भतीजे का फ़ैसला करने को कहा है।" पिता जी ने कहा____"आप इसे अपने साथ ले जाइए और इसके साथ आपको जो सही लगे कीजिए। हम अपने परिवार के इन बच्चों का फ़ैसला अपने तरीके से करेंगे।"

मणि शंकर अभी कुछ कहना ही चाहता था कि पिता जी ने हाथ उठा कर उसे कुछ न कहने का इशारा किया जिस पर मणि शंकर चुप रह गया। उसके चेहरे पर परेशानी के साथ साथ बेचैनी के भी भाव उभर आए थे। ख़ैर कुछ ही पलों में वो अपने भतीजे गौरव को ले कर कमरे से चला गया। उन दोनों के जाने के बाद कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा, तभी...

"हमें माफ़ कर दीजिए ताऊ जी।" विभोर और अजीत एक साथ पिता जी के पैरों में गिर कर रोते हुए बोल पड़े____"हमसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है। हम हमेशा वैभव भैया से ईर्ष्या करते थे और ये ईर्ष्या कब नफ़रत में बदल गई हमें खुद इसका कभी आभास नहीं हो पाया। उसके बाद हम जाने क्या क्या करते चले गए। हमें इस सबके लिए माफ़ कर दीजिए ताऊ जी। आगे से भूल कर भी ऐसा कुछ नहीं करेंगे हम। हमेशा वही करेंगे जो हमारे कुल और खानदान की मान मर्यादा और इज्ज़त के लिए सही होगा।"

"चुप हो जाओ तुम दोनों।" पिता जी ने शांत भाव से कहा____"और चुपचाप हवेली चलो। तुम दोनों के साथ क्या करना है इसका फ़ैसला बाद में होगा।"

उसके बाद हम सब वहां से हवेली की तरफ चल दिए। रात घिर चुकी थी। हमारी सुरक्षा के लिए हमारे काफी सारे आदमी थे। वक्त और हालात की नज़ाकत को देखते हुए रात में हवेली से बाहर अकेले रहना ठीक नहीं था इस लिए इतने सारे लोग हथियारों से लैस हमारे साथ आए थे और अब वापस हवेली की तरफ चल पड़े थे। कुछ ही समय में हम सब हवेली पहुंच गए।

रास्ते में पिता जी ने जगताप चाचा से कह दिया था कि वो इस बारे में हवेली में बाकी किसी से भी कोई ज़िक्र न करें। ख़ैर हवेली पहुंचे तो मां ने स्वाभाविक रूप से विभोर और अजीत के बारे में पूछा क्योंकि वो दोनों सारा दिन हवेली से गायब रहे थे। मां के पूछने पर पिता जी ने बस इतना ही कहा कि दूसरे गांव में अपने किसी मित्र के यहां उसकी शादी में मौज मस्ती कर रहे थे।

रात में खाना पीना हुआ और फिर सब अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए। कमरे में पलंग पर लेटा मैं इसी सबके बारे में सोच रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पिता जी ने गौरव के बारे में फ़ैसला करने के लिए मणि शंकर को क्यों कहा था और इतनी आसानी से उसे छोड़ क्यों दिया था? विभोर और अजीत के बारे में भी उन्होंने जो कुछ किया था उससे मैं हैरान था और अब सोच में डूबा हुआ था। आख़िर क्या चल रहा था उनके मन में?

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सोचते विचारते पता ही नहीं चला कब मेरी आंख लग गई थी किंतु शायद अभी मैं गहरी नींद में नहीं जा पाया था तभी तो सन्नाटे में हुई आहट से मैं फ़ौरन ही होश में आ गया था। मैंने सन्नाटे में ध्यान से सुनने की कोशिश की तो कुछ ही पलों में मुझे समझ आ गया कि कोई कमरे के दरवाज़े को हल्के से थपथपा रहा है। मेरे ज़हन में बिजली की तरह पिता जी का ख़्याल आया। पिछली रात भी वो ऐसे ही आए थे और हल्के से दरवाज़े को थपथपा रहे थे। मैं फ़ौरन ही पलंग से उठा किंतु फिर एकाएक जाने मुझे क्या सूझा कि मैं एकदम से सतर्क हो गया। मैं ये कैसे भूल सकता था कि आज कल हालात कितने नाज़ुक और ख़तरनाक थे। दरवाज़े के क़रीब पहुंच कर मैंने बहुत ही आहिस्ता से दरवाज़े को खोला और जल्दी ही एक तरफ को हट गया।

बाहर नीम अंधेरे में सच में पिता जी ही खड़े थे किंतु उनके पीछे बड़े भैया को खड़े देख मुझे थोड़ी हैरानी हुई। दरवाज़ा खुलते ही पिता जी अंदर दाखिल हो गए और उनके पीछे बड़े भैया भी। उन दोनों के अंदर आते ही मैंने दरवाज़े को बंद किया और फिर पलंग की तरफ पलटा। पिता जी जा कर पलंग पर बैठ गए थे, जबकि बड़े भैया पलंग के किनारे पर बैठ गए थे। मैं भी चुपचाप जा कर पलंग के दूसरी तरफ किनारे पर ही बैठ गया। मुझे पिता जी के साथ इस वक्त बड़े भैया को देख कर हैरानी ज़रूर हो रही थी लेकिन मैं ये भी समझ रहा था कि अब शायद पिता जी भी चाहते थे कि बड़े भैया को भी उन सभी बातों और हालातों के बारे में अच्छे से पता होना चाहिए जो आज कल हमारे सामने मौजूद हैं।

"हमने तुम्हारे बड़े भाई को वो सब कुछ बता दिया है जो अब तक हुआ है और जिस तरह के हालात हमारे सामने आज कल बने हुए हैं।" पिता जी ने धीमें स्वर में मेरी तरफ देखते हुए कहा____"हमारे पूछने पर इसने भी हमें वो सब बताया जो इसने विभोर और अजीत के साथ रहते हुए किया है। इसके अनुसार इसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि वो दोनों इसकी पीठ पीछे और क्या क्या गुल खिला रहे थे।"

"हां वैभव।" बड़े भैया ने भी धीमें स्वर में किंतु गंभीरता से कहा____"मुझे ये बात बिल्कुल भी पता नहीं थी कि विभोर और अजीत अपनी ही बहन को मजबूर किए हुए थे और उसके हाथों चाय में नामर्द बनाने वाली दवा मिला कर तुझे देते थे। जब से मुझे इस बात के बारे में पता चला है तभी से मैं इस बारे में सोच सोच कर हैरान हूं। मैं ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि वो दोनों ऐसा भी कर सकते थे।"

"सोच तो मैं भी नहीं सकता था भैया।" मैंने भी धीमें स्वर में किंतु गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सच तो यही है कि ऐसा उन्होंने किया है। दोनों ने कबूल किया है कि ऐसा उन्होंने इसी लिए किया है क्योंकि वो मुझसे नफ़रत करते थे। दोनों के अनुसार हवेली में हमेशा सब मेरा ही गुणगान गाते थे जबकि आप सबको पता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। मैंने आज तक भला ऐसा कौन सा काम किया है जिसके लिए हवेली में कभी कोई मेरा गुणगान गाता? मैंने तो हमेशा वही किया है जिसकी वजह से हमेशा ही हमारा और हमारे खानदान का नाम मिट्टी में मिला है। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि उन दोनों के मन में इस तरह की बात आई कैसे? जहां तक मुझे याद है मैंने कभी भी उन दोनों को ना तो कभी डांटा है और ना ही किसी बात के लिए उन्हें नीचा दिखाने का सोचा है। सच तो ये है कि मैं किसी से कोई मतलब ही नहीं रखता था बल्कि अपने में ही मस्त रहता था।"

"जैसा कि तूने कहा कि तू अपने में ही मस्त रहता था।" बड़े भैया ने कहा_____"तो भला तुझे ये कैसे समझ में आएगा कि तेरी कौन सी बात से अथवा तेरे कौन से काम से उनके मन में एक ऐसी ईर्ष्या पैदा हो गई जो आगे चल कर नफ़रत में बदल गई? तू जिस तरह से बिना किसी की परवाह किए अपने जीवन का आनंद ले रहा था उसे देख कर ज़ाहिर है कि उन दोनों के मन में भी तेरी तरह जीवन का आनंद लेने की सोच भर गई होगी। अब क्योंकि वो तेरी तरह बेख़ौफ और निडर हो कर वो सब नहीं कर सकते थे इस लिए वो तुझसे ईर्ष्या करने लगे और उनकी यही ईर्ष्या धीरे धीरे नफ़रत में बदल गई। नफ़रत के चलते उन्हें अच्छे बुरे का ज्ञान ही नहीं रह गया था तभी तो उन दोनों ने वो किया जो कोई सोच भी नहीं सकता था।"

"हम तुम्हारे बड़े भाई की इन बातों से पूरी तरह सहमत हैं।" पिता जी ने अपनी भारी आवाज़ में किंतु धीमें स्वर में कहा____"यकीनन ऐसा ही कुछ हुआ है। वो दोनों जिस उमर से गुज़र रहे हैं उसमें अक्सर इंसान ग़लत रास्ते ही चुन बैठता है।"

"ये सब तो ठीक है पिता जी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि आपने गौरव के बारे में खुद कोई फ़ैसला करने की बजाय मणि शंकर को ही उसका फ़ैसला करने को क्यों कहा?"

"इसकी दो वजहें थी।" पिता जी ने ठंडी सांस खींचते हुए कहा____"एक तो यही कि हम समझ गए थे कि गौरव ने अपनी मित्रता के चलते ही उन दोनों का साथ दिया था और उन तीनों के ऐसे काम में किसी चौथे का कोई हाथ नहीं था। किसी चौथे के हाथ से हमारा मतलब है कि ऐसे काम के लिए उन लोगों की मदद ना तो साहूकारों ने की है और ना ही जगताप ने। सदियों बाद हमारे साथ बने अपने अच्छे संबंधों को साहूकार लोग इस तरह से नहीं ख़राब कर सकते थे। जगताप भी ऐसी बचकानी हरकत करने या करवाने का नहीं सोच सकता था, खास कर तब तो बिलकुल भी नहीं जबकि ऐसे काम में उसकी अपनी बेटी का नाम भी शामिल हो। दूसरी वजह ये थी कि अगर साहूकार अपनी जगह सही होंगे तो वो ऐसे काम के लिए गौरव को ज़रूर ऐसी सज़ा देंगे जिससे हमें संतुष्टि मिल सके। यानि गौरव के बारे में किया गया उनका फ़ैसला ये ज़ाहिर कर देगा कि उनके दिल में हमारे प्रति किस तरह के भाव हैं?"

"यानि एक तीर से दो शिकार जैसी बात?" मैंने कहा____"एक तरफ आप ये नहीं चाहते थे कि आपके द्वारा गौरव को सज़ा मिलने से मणि शंकर अथवा उसके अन्य भाईयों के मन में हमारे प्रति कोई मन मुटाव जैसी बात पैदा हो जाए? दूसरी तरफ मणि शंकर को गौरव का फ़ैसला करने की बात कह कर आपने उसके ऊपर एक ऐसा भार डाल दिया है जिसके चलते अब उसे सोच समझ कर अपने भतीजे का फ़ैसला करना पड़ेगा?"

"बिलकुल ठीक समझे।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर हमारी स्थिति ऐसी है कि हमारे पास हमारे दुश्मन के बारे में अब ऐसा कोई भी सुराग़ नहीं है जिससे कि हम उस तक किसी तरह पहुंच सकें इस लिए इस सबके बाद भी हमें उनसे अच्छे संबंध ही बनाए रखना होगा। तुम दोनों उनके और उनके बच्चो के साथ वैसा ही ताल मेल बना के रखोगे जैसे अच्छे संबंध बन जाने के बाद शुरू हुआ था। उन्हें ये बिलकुल भी नहीं लगना चाहिए कि गौरव के ऐसा करने की वजह से हम उनके बारे में अब कुछ अलग सोच बना बैठे हैं।"

"आज के हादसे के बाद।" बड़े भैया ने कहा____"जगताप चाचा भी हीन भावना से ग्रसित हो गए होंगे। संभव है कि वो ये भी सोच बैठें कि आज के हादसे के बाद अब हम उन्हें ही अपना वो दुश्मन समझेंगे जो हमारे चारो तरफ षडयंत्र की बिसात बिछाए बैठा है। इस लिए ज़रूरी है कि हमें उनसे भी अच्छा बर्ताव करना होगा।"

"बड़े भैया सही कह रहे हैं पिता जी।" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए संजीदा भाव से कहा____"हालातों के मद्दे नज़र हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जगताप चाचा ही वो षड्यंत्रकारी हैं जबकि ऐसा था नहीं। साफ़ ज़ाहिर है कि असल षड्यंत्रकर्ता ने अपनी चाल के द्वारा जगताप चाचा को हमारे शक के घेरे में ला कर खड़ा कर दिया है। वो चाहता है कि हमारा आपस में ही मन मुटाव हो जाए और फिर हमारे बीच एक दिन ऐसी स्थिति आ जाए कि गृह युद्ध ही छिड़ जाए।"

"सही कहा तुमने।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमारे दुश्मन की यकीनन यही चाल है इस लिए हमें अपने अपनों के साथ बहुत ही होशो हवास में और बुद्धिमानी से ताल मेल बना के रखना होगा। ख़ैर जैसा कि हमने कहा हमारे पास दुश्मन के बारे में कोई सुराग़ नहीं है इस लिए अब हमें इस बात का ख़ास तौर से पता करना होगा कि हमारे बीच मौजूद हमारे दुश्मन का ख़बरी कौन है और वो किस तरह से हमारी ख़बरें उस तक पहुंचाता है?"

"अगर ख़बरी हमारे हाथ लग जाए तो शायद उसके द्वारा हम अपने दुश्मन तक पहुंच सकते हैं।" बड़े भैया ने कहा____"वैसे जिन जिन लोगों पर हमें शक है उन पर नज़र रखने के लिए आपने अपने आदमी तो लगा दिए हैं न पिता जी?"

"हमने अपने आदमी गुप्तरूप से उनकी नज़र रखने के लिए लगा तो दिए हैं।" पिता जी ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"लेकिन हमें नहीं लगता कि इसके चलते हमें जल्द ही कोई बेहतर नतीजा मिलेगा।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" बड़े भैया ने उलझ गए वाले अंदाज़ से कहा____"भला ऐसा करने से हमें कोई नतीजा क्यों नहीं मिलेगा?"

"ये सच है कि हमने दुश्मन के मंसूबों को पूरी तरह से ख़ाक में मिला दिया है।" पिता जी ने हम दोनों भाईयों की तरफ बारी बारी से देखते हुए कहा____"और इसके चलते यकीनन वो बुरी तरह खुंदक खाया हुआ होगा लेकिन हमें यकीन है कि वो अपनी इस खुंदक के चलते फिलहाल ऐसा कोई भी काम नहीं करेगा जिसके चलते हमें उस तक पहुंचने का कोई मौका या कोई सुराग़ मिल सके।"

"मुझे भी ऐसा ही लगता है पिता जी।" मैंने सोचपूर्ण भाव से सिर हिलाते हुए कहा____"हमारे दुश्मन ने या ये कहें कि षड्यंत्रकर्ता ने अब तक जिस तरीके से अपने काम को अंजाम दिया है उससे यही ज़ाहिर होता है कि वो हद से भी ज़्यादा शातिर और चालाक है। भले ही हमने उसके मंसूबों को नेस्तनाबूत किया है जिसके चलते वो बुरी तरह हमसे खुंदक खा गया होगा लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी वो ठंडे दिमाग़ से ही सोचेगा कि खुंदक खा कर अगर उसने कुछ भी हमारे साथ उल्टा सीधा किया तो बहुत हद तक ऐसी संभावना बन जाएगी कि वो हमारी पकड़ में आ जाए। इतना तो अब वो भी समझ ही गया होगा कि हमारे पास फिलहाल ऐसा कोई भी सुराग़ नहीं है जिससे कि हम उस तक पहुंच सकें और अब हम भी इसी फ़िराक में ही होंगे कि हमारा दुश्मन गुस्से में आ कर कुछ उल्टा सीधा करे ताकि हम उसे पकड़ सकें। ज़ाहिर है उसके जैसा शातिर व्यक्ति ऐसी ग़लती कर के हमें कोई भी सुनहरा अवसर नहीं प्रदान करने वाला।"

"यानि अब वो फिलहाल के लिए अपनी तरफ से कोई भी कार्यवाही नहीं करेगा।" बड़े भैया ने मेरी तरफ देखते हुए अपनी संभावना ब्यक्त की____"बल्कि कुछ समय तक वो भी मामले के ठंडा पड़ जाने का इंतज़ार करेगा।"

"बिलकुल।" पिता जी ने कहा____"लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम उसकी तरफ से ये सब सोच कर बेफ़िक्र हो जाएं अथवा अपनी तरफ से उसके बारे में कुछ पता लगाने की कोशिश ही न करें। एक बात अच्छी तरह ध्यान में रखो कि जब तक हमारा दुश्मन और हमारे दुश्मन का सहयोग देने वाला कोई साथी हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक हम न तो बेफ़िक्र हो सकते हैं और ना ही बिना किसी सुरक्षा के कहीं आ जा सकते हैं।"

"आप दारोगा से मिले कि नहीं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा____"वो हमारी नौकरानी रेखा की लाश पोस्टमार्टम के लिए ले कर गया था। उसकी रिपोर्ट से और भी स्पष्ट हो जाएगा कि रेखा की मौत ज़हर खाने के चलते ही हुई थी अथवा उसकी मौत के पीछे कोई और भी कारण था।"

"रेखा ने तो खुद ही ज़हर खा कर खुद खुशी की थी ना?" बड़े भैया ने मेरी तरफ सवालिया भाव से देखते हुए कहा____"फिर तू ये क्यों कह रहा है कि उसकी मौत के पीछे कोई और भी कारण हो सकता है?"

"मेरे ऐसा कहने के पीछे कारण हैं भैया।" मैंने उन्हें समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"सबसे पहले सोचने वाली बात यही है कि रेखा के पास ज़हर आया कहां से? ज़हर एक ऐसी ख़तरनाक चीज़ है जो उसे हवेली में तो मिलने से रही, तो फिर उसके पास कहां से आया वो ज़हर? अगर वो सच में ही खुद खुशी कर के मरना चाहती थी तो उसने हवेली में ही ऐसे तरीके से मरना क्यों पसंद किया? अपने घर में भी तो वो ज़हर खा कर मर सकती थी। दूसरी सोचने वाली बात ये कि आख़िर सुबह के उस वक्त ऐसा क्या हो गया था जिसकी वजह से खुद खुशी करने के लिए वो हवेली के ऐसे कमरे में पहुंच गई जो ज़्यादातर बंद ही रहता था? मेनका चाची के अनुसार हम लोग जब सुबह हवेली से निकल गए थे तभी कुछ देर बाद उसको खोजना शुरू किया गया था। खोजबीन करने में ज़्यादा से ज़्यादा आधा पौन घंटा लग गया होगा। उसके बाद वो एक कमरे में मरी हुई ही मिली थी। अब सवाल ये है कि उस समय जबकि हम लोग भी नहीं थे जिनसे उसे पकड़े जाने का ख़तरा था तो फिर ऐसा क्या हुआ था कि उसके मन में उसी समय खुद खुशी करने का खयाल आ गया था?"

"बात तो तुम्हारी तर्क़ संगत हैं।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा_____"लेकिन ये सब कहने से तुम्हारा मतलब क्या है? आख़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"

"मैं स्पष्ट रूप से यही कहना चाहता हूं कि मुझे पूरा यकीन है कि रेखा ने खुद अपनी जान नहीं ली है बल्कि किसी ने उसे ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था।" मैंने ये कह कर मानों धमाका सा किया____"उस वक्त हवेली में कोई तो ऐसा था जो रेखा को अब जीवित नहीं रखना चाहता था। माना कि उस वक्त रेखा को हमारे द्वारा पकड़े जाने का डर नहीं था किंतु इसके बावजूद उसे हवेली में नौकरानी बना कर रखने वाला उसे जीवित नहीं रखना चाहता था। शायद वो रेखा को अब और ज़्यादा जीवित रखने का जोख़िम नहीं लेना चाहता था।"

"शायद तुम सही कह रहे हो।" पिता जी ने सोचने वाले भाव से सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अगर सच यही है तो क्या ये बात पोस्टमार्टम करने से से पता चलेगी? हमारा ख़्याल है हर्गिज़ नहीं, ये ऐसी बात नहीं है जो लाश का पोस्टमार्टम करने से पता चले। यानि दारोगा जब आएगा तो वो भी यही कहेगा कि रेखा की मौत ज़हर खाने से हुई है। वो ये नहीं कह सकता कि रेखा ने अपनी मर्ज़ी से ज़हर खाया था या किसी ने उसे ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था।"

"बेशक वो दावे के साथ ऐसा नहीं कह सकता।" मैंने कहा____"लेकिन पोस्टमार्टम में ज़हर के अलावा भी शायद कुछ और पता चला हो उसे। जैसे कि अगर किसी ने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया था तो किस तरीके से किया था? मेरा मतलब है कि क्या किसी ने उसके साथ जोर ज़बरदस्ती की थी अथवा उस पर बल प्रयोग किया था? अगर ऐसा हुआ होगा तो बहुत हद तक संभव है कि रेखा के जिस्म पर मजबूर करने वाले के कोई तो ऐसे निशान ज़रूर ही मिले होंगे जिससे हमें उसके क़ातिल तक पहुंचने में आसानी हो जाए।"

"मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ मिलेगा दारोगा को।" बड़े भैया ने कहा____"और अगर मान भी लिया जाए कि रेखा के साथ किसी ने जोर ज़बरदस्ती की होगी तब भी इससे कुछ भी पता नहीं चलने वाला। ये मत भूलो कि पास के कस्बे में पोस्टमार्टम करने वाला चिकित्सक इतना भी काबिल नहीं है जो इतनी बारीक चीज़ें पकड़ सके। मैंने सुना है कि ये सब बातें बड़े बड़े महानगरों के डॉक्टर ही पता कर पाते हैं। यहां के डॉक्टर तो बस खाना पूर्ति करते हैं और अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और कुछ देर के लिए अगर ये मान भी लें कि यहां के डॉक्टर ने ये सब पता कर लिया तब भी ये कैसे पता चल पाएगा कि रेखा के साथ जोर ज़बरदस्ती करने वाला असल में कौन था? सीधी सी बात है छोटे कि इतना बारीकी से सोचने का भी हमें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है।"

"हमें भी यही लगता है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा_____"ख़ैर, अब सोचने वाली बात ये है कि हवेली में उस वक्त ऐसा कौन रहा होगा जिसने रेखा को ज़हर खा कर मर जाने के लिए मजबूर किया होगा? क्या वो हवेली के बाहर का कोई व्यक्ति था अथवा हवेली के अंदर का ही कोई व्यक्ति था?"

"सुबह के वक्त हवेली में बाहर का कौन व्यक्ति आया था ये तो पता चल सकता है।" मैंने कहा____"लेकिन अगर वो व्यक्ति हवेली के अंदर का ही हुआ तो उसके बारे में पता करना आसान नहीं होगा।"

"हवेली में जो नौकर और नौकरानियां हैं वो भी तो बाहर के ही हैं।" बड़े भैया ने कहा____"क्या उनमें से ही कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है?"

"बेशक हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हवेली के जो पुरुष नौकर हैं वो हवेली के अंदर नहीं आते और अगर आते भी हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें बैठक तक ही आने की इजाज़त है। इस हिसाब से अगर सोचा जाए तो फिर नौकरानियां ही बचती हैं। यानि उन्हीं में से कोई रही होगी जिसने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया होगा।"

"रेखा और शीला के बाद।" बड़े भैया ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"मौजूदा समय में हवेली पर अभी लगभग छह नौकरानियां हैं, जिनमें से चार तो ऐसी हैं जो कई सालों से पूरी वफादारी के साथ काम करती आई हैं जबकि दो नौकरानियां ऐसी हैं जिन्हें हवेली में काम करते हुए लगभग दो साल हो गए हैं। अब सवाल है कि क्या उन दोनों में से कोई ऐसी हो सकती है जिसने रेखा को ज़हर खाने के लिए मजबूर किया होगा? वैसे मुझे नहीं लगता कि उनमें से किसी ने ऐसा किया होगा। रेखा और शीला ही ऐसी थीं जिन्हें हवेली में आए हुए लगभग आठ महीने हो गए थे। वो दोनों हमारे दुश्मन के ही इशारे पर यहां काम कर रहीं थी और ये बात पूरी तरह से साबित भी हो चुकी है।"

"मामला काफी पेंचीदा है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"इसमें कोई शक नहीं कि हम फिर से घूम फिर कर वहीं पर आ गए हैं जहां पर आगे बढ़ने के लिए हमें कोई रास्ता नहीं दिख रहा है और ये भी हैरानी की ही बात है कि एक बार फिर से हालात हमें जगताप चाचा पर ही शक करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। न चाहते हुए भी मन में ये ख़्याल उभर ही आता है कि कहीं जगताप चाचा ही तो वो षड्यंत्रकारी नहीं हैं?"

"यकीनन।" पिता जी ने कहा_____"लेकिन अक्सर जो दिखता है वो सच नहीं होता और ना ही हमें उस पर ध्यान देना चाहिए जिस पर कोई बार बार हमारा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करता हो। कोई भी व्यक्ति जो ऐसा कर रहा होता है वो अपने खिलाफ़ इतने सारे सबूत और इतना सारा शक ज़ाहिर नहीं होने देता। ज़ाहिर है कोई और ही है जो हमारे भाई को बली का बकरा बनाने पर उतारू है और खुद बड़ी होशियारी से सारा खेल खेल रहा है।"

पिता जी ने जो कहा था वो मैं भी समझ रहा था लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कर कौन रहा था? आख़िर क्या दुश्मनी थी हमारी उससे? आख़िर ऐसा क्यों था कि उसने सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह तक पहुंचा दिया था जबकि जगताप चाचा के बेटों पर उसने किसी तरह की भी आंच नहीं लगाई थी? ये क्या रहस्य था? क्या वो जगताप चाचा और उनके परिवार को अपना समझता था या फिर ऐसा वो जान बूझ कर रहा था ताकि हम जगताप चाचा पर ही शक करें और उनके अलावा किसी और के बारे में न सोचें? कुछ देर पिता जी और बड़े भैया इसी विषय में बातें करते रहे उसके बाद वो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। सोचते विचारते पता ही न चला कब आंख लग गई मेरी।

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अध्याय - 49
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अब तक....

पिता जी ने जो कहा था वो मैं भी समझ रहा था लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कर कौन रहा था? आख़िर क्या दुश्मनी थी हमारी उससे? आख़िर ऐसा क्यों था कि उसने सिर्फ़ हम दोनों भाईयों को ही मौत के मुंह तक पहुंचा दिया था जबकि जगताप चाचा के बेटों पर उसने किसी तरह की भी आंच नहीं लगाई थी? ये क्या रहस्य था? क्या वो जगताप चाचा और उनके परिवार को अपना समझता था या फिर ऐसा वो जान बूझ कर रहा था ताकि हम जगताप चाचा पर ही शक करें और उनके अलावा किसी और के बारे में न सोचें? कुछ देर पिता जी और बड़े भैया इसी विषय में बातें करते रहे उसके बाद वो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर आ कर लेट गया। सोचते विचारते पता ही न चला कब आंख लग गई मेरी।

अब आगे....

सुबह हम सब नाश्ता कर रहे थे। एक लंबी आयताकार मेज के चारो तरफ नक्काशी की हुई लकड़ी की कुर्सियां रखी हुईं थी जिन पर हम सब बैठे नाश्ता कर रहे थे। नाश्ता करते वक्त कोई बात नहीं कर सकता था किंतु मैं महसूस कर रहा था कि जगताप चाचा बार बार पिता जी की तरफ देख कर कुछ कहने की हिम्मत जुटाते और फिर बिना कुछ बोले ही सिर झुका कर थाली पर रखे परांठे को यूं ही तोड़ने का नाटक करने लगते। उधर पिता जी को भी शायद ये आभास हो गया था इस लिए वो भी कुछ पलों के अंतराल में उनकी तरफ देख लेते थे लेकिन ये संयोग अथवा इत्तेफ़ाक ही था कि इतनी देर में अब तक उन दोनों की नज़रें आपस में टकरा नहीं पाईं थी। मैंने देखा एक तरफ विभोर और अजीत भी सिर झुकाए नाश्ता करने में व्यस्त थे। उन दोनों ने अब तक सिर ही नहीं उठाया था। मैं समझ सकता था कि कल के हादसे के बाद दोनों के अंदर अब इतनी हिम्मत ही ना बची होगी कि वो हम में से किसी से नज़रें मिला सकें।

"पहले अपने मन को शांत करके नाश्ता कर लो जगताप।" तभी सहसा ख़ामोशी को चीरते हुए पिता जी ने जगताप चाचा की तरफ देखते हुए अपनी भारी आवाज़ में कहा____"उसके बाद जो भी तुम्हारे मन में हो उसे हमसे बेझिझक कह देना।"

"ज...जी बड़े भैया।" जगताप चाचा ने धीमें स्वर में किंतु सम्मान से कहा और फिर चुपचाप नाश्ता करने लगे। पिता जी कुछ पलों तक उन्हें देखते रहे उसके बाद वो भी ख़ामोशी से नाश्ता करने लगे।

आख़िर किसी तरह हम सब का नाश्ता हुआ और फिर हम सब कुर्सियों से उठे। विभोर और अजीत ऊपर अपने कमरे की तरफ जाने लगे तो जगताप चाचा ने उन्हें रोक लिया। मैं समझ गया कि कुछ तो होने वाला है। मैंने बड़े भैया की तरफ देखा तो उन्होंने भी मुझे देखा। हमने आंखों के इशारे से ही एक दूसरे से पूछा कि जगताप चाचा आख़िर क्या करने वाले हैं पर शायद इसका जवाब न उनके पास था और ना ही मेरे पास। ख़ैर पिता जी के कहने पर कुछ ही देर में हम सब बैठक में आ गए।

"हम नहीं जानते कि तुम्हारे मन में नाश्ता करते वक्त ऐसा क्या था जिसके लिए तुम कुछ ज़्यादा ही बेचैन दिख रहे थे।" पिता जी ने अपनी सिंघासननुमा कुर्सी पर बैठने के बाद कहा____"हम ज़रूर तुम्हारे मन की बात जानना चाहेंगे किंतु उससे पहले तुम ये जान लो कि हमारे भतीजों ने वैभव के साथ जो कुछ भी किया है उसके लिए हमने उन्हें माफ़ कर दिया है और यकीन मानों तुम्हारे भतीजे ने भी अपने छोटे भाइयों को माफ़ कर दिया होगा।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं बड़े भैया?" जगताप चाचा ने हैरान परेशान से लहजे में कहा____"आप ऐसा कुकर्म करने वाले मेरे कपूतों को कैसे माफ़ कर सकते हैं? मैं तो कल ही उन दोनों को उनके किए की सज़ा देना चाहता था लेकिन आपने ही मुझे रोक लिया था। मुझे रात भर ये सोच सोच कर नींद नहीं आई कि मेरी अपनी औलादों ने इतना गन्दा कुकर्म किया है। मैं रात भर ऊपर वाले से यही सवाल करता रहा कि आख़िर मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था जिसकी वजह से उसने मुझे ऐसा कुकर्म करने वाली औलादें प्रदान की है? ऐसी औलाद होने से तो अच्छा था कि मेरी कोई औलाद ही न होती। मैं तो शुरू से वैभव को ही अपने बेटे की तरह प्यार और स्नेह करता आया हूं और सच कहूं तो मुझे उसके जैसा भतीजा पाने पर गर्व भी है। माना कि उसने अपने जीवन में कुछ ग़लतियां की थीं लेकिन उसकी वो ग़लतियां ऐसी तो हर्गिज़ नहीं थी जिसके लिए किसी की अंतरात्मा को ही चोट लग जाए।"

"शांत हो जाओ जगताप।" पिता जी ने कहा____"तुम्हारे जैसे इंसान को इस तरह भावनाओं में बहना शोभा नहीं देता। हम मानते हैं कि विभोर और अजीत ने जो किया है वो बहुत ही ग़लत है किंतु तुम भी जानते हो कि ग़लतियां हर इंसान से होती हैं। इंसान ग़लती करता है तो उस ग़लती से उसे अच्छे बुरे का सबक भी मिलता है। अगर कोई किसी तरह की ग़लती ही न करे तो भला कैसे किसी को अच्छे बुरे का ज्ञान हो पाएगा। इंसान को अपने जीवन में ग़लतियां करना भी ज़रूरी है लेकिन हां, ग़लतियों से हमें सबक सीखना चाहिए और फिर दुबारा वैसी ग़लतियां ना करने का संकल्प भी लेना चाहिए।"

"पर इन्होंने ग़लती कहां की है बड़े भैया?" जगताप चाचा ने आहत भाव से कहा____"इन्होंने तो अपराध किया है। हद दर्जे का पाप किया है इन लोगों ने और पाप करने पर माफ़ी नहीं दी जाती।"

"पाप से याद आया।" पिता जी ने कुछ सोचते हुए सहसा मेरी तरफ देखा____"हमने इन दोनों के मुख से और खुद तुम्हारे मुख से ये तो सुना था कि इन लोगों ने कुसुम को मजबूर किया हुआ था। हम जानना चाहते हैं कि इन दोनों ने हमारी फूल सी कोमल बेटी को आख़िर किस तरह से मजबूर किया हुआ था? हम सब जानते हैं कि कुसुम तुम्हारी लाडली है और वो खुद भी अपने सभी भाइयों में सबसे ज़्यादा तुम्हें ही मानती हैं तो ज़ाहिर है कि वो इतनी आसानी से इस बात के लिए तैयार नहीं हुई होगी कि वो तुम्हें चाय में नामर्द बना देने वाली दवा मिला कर पिलाए। हमें यकीन है कि हमारी बच्ची मर जाना पसंद करती लेकिन वो ऐसा काम इनके कहने पर हर्गिज़ नहीं करती। इस लिए हम जानना चाहते हैं कि ऐसी कौन सी बात थी जिसकी वजह से वो मासूम इतना बड़ा अपराध करने पर मजबूर हो गई थी? ऐसी कौन सी बात थी जिसके द्वारा मजबूर हो कर वो अपने उस भाई को ही नामर्द बनाने की राह पर चल पड़ी थी जिस भाई को वो दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार और स्नेह करती है?"

"माफ़ कीजिए पिता जी।" मैंने सहसा दृढ़ भाव से कहा____"लेकिन मैं आपको इस बारे में कुछ भी नहीं बता सकता और मेरी आपसे विनती भी है कि इस बारे में आप इन दोनों से भी कुछ नहीं पूछेंगे।"

"आख़िर बात क्या है?" पिता जी के साथ साथ जगताप चाचा के भी चेहरे पर गहन हैरानी के भाव उभर आए थे____"तुम इस बारे में कुछ भी बताने से और हमारे द्वारा इनसे पूछने के लिए क्यों मना कर रहे हो?"

"सिर्फ़ इतना समझ लीजिए पिता जी कि मैं अपनी मासूम बहन को किसी की भी नज़रों से गिराना नहीं चाहता।" मैंने गंभीरता से कहा____"मैं नहीं चाहता कि उसके प्रति सबके दिल में जो प्यार और स्नेह है उसमें कमी आ जाए।"

मेरी बात सुन कर विभोर और अजीत के अलावा बाकी सब सोच में पड़ गए थे। बैठक में एकदम से सन्नाटा सा छा गया था। विभोर और अजीत ने तो जैसे शर्म से अपना चेहरा ही ज़मीन पर गाड़ लिया था।

"अगर हमारी फूल सी कोमल बेटी की प्रतिष्ठा का सवाल है।" फिर पिता जी ने गंभीर भाव से कहा____"तो हमें इस बारे में कुछ भी नहीं जानना और हम ये भी चाहते हैं कि कोई उससे भी इस बारे में कोई बात न करे। हम किसी भी कीमत पर अपनी बेटी के चेहरे से उसकी हंसी और उसका चुलबुलापन मिटाना नहीं चाहते। ख़ैर, हमने फ़ैसला कर लिया है कि जो कुछ भी इन दोनों ने किया है उसके लिए हम इन्हें माफ़ करते हैं और आइंदा से हम इनसे बेहतर इंसान बनने की उम्मीद करते हैं।"

"आपने भले ही इन्हें माफ़ कर दिया है बड़े भैया।" जगताप चाचा ने शख़्त भाव से कहा____"लेकिन मैं इन्हें कभी माफ़ नहीं कर सकता और ना ही इनकी शक्ल देखना चाहता हूं। मुझे माफ़ कीजिए भैया क्योंकि मैं आपके फ़ैसले के खिलाफ़ जा रहा हूं लेकिन मैं बता नहीं सकता कि इनकी वजह से मेरी अंतरात्मा को कितनी ठेस पहुंची है। मैंने फ़ैसला किया है कि अब से ये दोनों इस हवेली में ही क्या बल्कि इस गांव में ही नहीं रहेंगे।"

"तुम होश में तो हो जगताप?" पिता जी एकदम कठोर भाव से बोल पड़े थे____"ये क्या अनाप शनाप बोल रहे हो तुम?"

"माफ़ कीजिए भैया।" जगताप चाचा की आंखें छलक पड़ीं, बोले____"पर आप समझ ही नहीं सकते कि इस वक्त मेरे दिल पर क्या बीत रही है। मैंने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे अपनी ही औलाद की करनी की वजह से इस क़दर शर्मिंदा होना पड़ जाएगा कि मैं आपके सामने ही क्या बल्कि किसी के भी सामने सिर उठा कर खड़ा नहीं रह पाऊंगा। काश! ऐसी स्थिति आने से पहले मुझे मौत आ गई होती।"

"ज..जगताप।" पिता जी एकदम सिंहासन से उठ कर चाचा के पास आए और उनके कंधे पर हाथ रख कर अधीरता से बोले_____"क्या हो गया है तुम्हें? आख़िर इतना हताश और दुखी क्यों हो रहे हो तुम? तुम ये सोच भी कैसे सकते हो कि महज इतनी सी बात पर तुम हमारी नज़रों से गिर जाओगे? ये जो कुछ भी हुआ है उसके बारे में तुम्हें इतना कुछ सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। एक बात अच्छी तरह याद रखो कि तुम जैसा भाई पा कर हम हमेशा से गर्व करते आए हैं और तुम्हारे प्रति हमारे दिल में जो ख़ास जज़्बात हैं वो कभी नहीं मिट सकते। इस लिए ये सब बेकार की बातें सोच कर तुम खुद को हताश और दुखी मत करो। विभोर और अजीत जितना तुम्हारे बेटे हैं उतना ही वो हमारे भी बेटे हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि उनके अंदर वैभव के प्रति जो ईर्ष्या पैदा हुई थी उसने एक दिन नफ़रत का रूप ले लिया और फिर उस नफ़रत ने उनसे ऐसा कर्म करवा दिया था। हमें यकीन है कि अब वो ऐसी ग़लती दुबारा नहीं करेंगे, इसी लिए उनकी इस ग़लती को उनकी आख़िरी ग़लती समझ कर हमने उन्हें माफ़ कर देना बेहतर समझा।"

"आप सच में महान हैं भैया।" जगताप चाचा आंसू भरी आंखों से देखते हुए बोले____"मुझे अपनी सेवा और अपनी क्षत्रछाया से कभी दूर मत कीजिएगा। आप मेरे सब कुछ हैं। मैं मरते दम तक आपकी छाया बन कर आपके साथ रहना चाहता हूं।"

"एकदम पागल हो तुम।" पिता जी ने लरजते स्वर में कहा और जगताप चाचा को अपने गले से लगा लिया। उनकी आंखें भी नम हो गईं थी। मैं और बड़े भैया दोनों भाईयों के इस प्रेम को देख कर एक अलग ही तरह का सुखद एहसास महसूस करने लगे थे। उन्हें इस तरह एक दूसरे के गले से लगा हुआ देख मैंने बड़े भैया की तरफ देखा। उन्होंने भी मुझे बड़े ही प्रेम भाव से देखा और फिर हल्के से मुस्कुराए। जाने क्यों मेरे अंदर के जज़्बात मचल उठे और मैं एकदम से उनसे लिपट गया। उनके सीने से लगा तो बड़ा ही सुखद एहसास हुआ जिसके चलते मेरी आंखें सुकून से बंद हो गईं।

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हवेली के बाहर अचानक शोर गुल सुनाई दिया तो बैठक में बैठे हम सब चौंके। अभी मैं शोर गुल सुन कर बाहर जाने ही वाला था कि तभी एक दरबान अंदर आया। पिता जी के पूछने पर उसने बताया कि गांव के कुछ लोग चेहरे पर आक्रोश लिए हाथी दरवाज़े के अंदर आ गए हैं और बार बार दादा ठाकुर से न्याय चाहिए की बातें कह रहे हैं। दरबान की बात सुन कर पिता जी एक झटके में अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। उसके बाद फ़ौरन ही हम सब उनके पीछे बाहर की तरफ चल दिए।

बाहर आए तो देखा सच में गांव के काफी सारे लोग हवेली के मुख्य दरवाज़े से थोड़ी दूरी पर खड़े थे। उन लोगों में शीला और रेखा के पति भी थे। उन दोनों को देख कर मैं समझ गया कि वो लोग कौन से न्याय पाने की चाहत में यहां आए हैं।

"क्या बात है? तुम सब यहां एक साथ किस लिए आए हो?" पिता जी ने उन सबकी तरफ देखते हुए थोड़ा ऊंची आवाज़ में पूछा।
"हम सब यहां आपसे न्याय मांगने आए हैं दादा ठाकुर।" उन लोगों में से उस व्यक्ति ने तेज़ आवाज़ में कहा जिसका नाम सरजू था।

"आख़िर बात क्या है?" पिता जी ने ऊंची आवाज़ में ही पूछा____"किस तरह का न्याय मांगने आए हो तुम लोग हमसे?"

"छोटे मुंह बड़ी बात होगी दादा ठाकुर।" सरजू ने सहसा अपने हाथ जोड़ते हुए कहा____"आज तक हम गांव वाले कभी आपके सामने इस तरह नहीं आए और ना ही कभी आपसे ज़ुबान लड़ाने की हिम्मत की है लेकिन हमारे साथ जो कुछ हुआ है उसका इंसाफ़ कौन करेगा? आप हमारे माई बाप हैं, इस लिए आपसे ही तो न्याय के लिए गुहार लगाएंगे न?"

"बिलकुल।" पिता जी ने कहा____"और ये तुम सबका अधिकार भी है। तुम सबकी तक़लीफों को सुनना और उन्हें दूर करना हमारा फर्ज़ है। इस लिए अगर तुम लोगों के साथ किसी प्रकार की नाइंसाफी हुई है तो उसके लिए तुम लोग बेझिझक हो कर इंसाफ़ की मांग कर सकते हो। ख़ैर, अब बताओ कि तुम लोगों के साथ क्या नाइंसाफी हुई है और किसने नाइंसाफी की है?"

"माफ़ कीजिए दादा ठाकुर पर नाइंसाफी तो आपके द्वारा ही की गई है।" उन लोगों में से एक कलुआ नाम के आदमी ने कहा____"हमारे घर की औरतें आपकी हवेली में काम करती हैं और फिर बेवजह ही अचानक से उनकी मौत हो जाती है। क्या हमारा ये जानने का भी हक़ नहीं है कि रेखा और शीला की इस तरह से मौत कैसे हो गई? अभी कल शाम की ही बात है, छोटे ठाकुर शीला को खोजते हुए उसके घर आए थे और उसके कुछ ही समय बाद उसकी हत्या हो गई। उसके पहले सुबह रेखा के बारे में पता चला था कि उसने ज़हर खा कर खुद खुशी कर ली थी। हम जानना चाहते हैं दादा ठाकुर कि हम ग़रीबों के घर की औरतों के साथ अचानक ये सब क्यों और कैसे हो गया? आख़िर क्यों रेखा ने खुद खुशी की और क्यों शीला की हत्या कर दी गई?"

"रेखा और शीला के साथ जो कुछ भी हुआ है।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"वो यकीनन बहुत बुरा हुआ है और हम खुद इस बात से हैरान और परेशान हैं कि उनके साथ ये अचानक से क्यों हो गया? हम इस सबके बारे में पता लगा रहे हैं। जिस किसी का भी उन दोनों की मौत में हाथ होगा उसे शख़्त से शख़्त सज़ा दी जाएगी।"

"हमें इन बातों से मत बहलाइए दादा ठाकुर।" रंगा नाम के आदमी ने पिता जी को घूरते हुए कहा____"रेखा ने आपकी हवेली में खुद खुशी की थी तो ज़ाहिर है कि हवेली में ही कुछ ऐसा हुआ होगा जिसके चलते उसे खुद खुशी कर के अपनी जान देनी पड़ी। क्या पता हवेली में किसी ने उसे ज़हर खिला कर जान से मार दिया हो और अफवाह ये उड़ा दी गई कि उसने खुद खुशी की है। इसी तरह देवधर की बीवी को खोजने आपके छोटे बेटे कुंवर आए थे और उसके कुछ ही देर बाद आपके ही बाग़ में उसकी गला रेत कर हत्या कर दी गई। ज़ाहिर है कि शीला की हत्या का मामला भी हवेली से ही जुड़ा है। हम जानना चाहते हैं दादा ठाकुर कि असलियत क्या है?"

"तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई दादा ठाकुर पर आरोप लगाने की?" जगताप चाचा एकाएक गुस्से से चीख पड़े थे। रंगा की बातें सुन कर गुस्सा तो मुझे भी बहुत ज़्यादा आ गया था किंतु मुझसे पहले जगताप चाचा बोल पड़े थे_____"क्या तुम लोग रेखा और शीला की मौत का जिम्मेदार हमें समझते हो?"

"शांत हो जाओ जगताप।" पिता जी ने बड़े धैर्य से कहा_____"इन पर इस तरह गुस्से से चिल्लाना ठीक नहीं है।"
"क्यों ठीक नहीं है बड़े भैया?" जगताप चाचा मानों बिफर ही पड़े____"इन लोगों की हिम्मत कैसे हुई हम पर इस तरह से आरोप लगाने की? इनके कहने का तो यही मतलब है कि रेखा और शीला की मौत के जिम्मेदार हम ही हैं। ये साफ़ साफ़ हमें उन दोनों का हत्यारा कह रहे हैं।"

"तो क्या ग़लत कह रहे हैं ये लोग?" पिता जी ने शांत भाव से कहा____"रेखा ने हवेली में खुद खुशी की तो इसके जिम्मेदार हम हैं, इसी तरह शीला की हत्या हमारे बाग़ में हुई तो उसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। दोनों का हवेली से संबंध था यानि हमसे। ये लोग अगर उन दोनों की मौत का जिम्मेदार हमें ठहरा रहे हैं तो ग़लत नहीं है। हमें इन सबको जवाब देना पड़ेगा जगताप। हमें इनको बताना पड़ेगा कि हमारी हवेली में काम करने वाली दो दो नौकरानियां अचानक से मौत का ग्रास क्यों बन गईं?"

"तो जवाब देने से इंकार कहां कर रहे हैं हम बड़े भैया?" जगताप चाचा ने कहा____"हम खुद भी तो जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ है लेकिन इसके लिए ये लोग सीधे तौर पर आप पर आरोप नहीं लगा सकते।"

"जिनके घर की औरतों की इस तरह मौत हो गई हो उनकी मनोदशा के बारे में सोचो जगताप।" पिता जी ने कहा____"ये सब दुखी हैं। इस दुख में इन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि ये लोग क्या कह रहे हैं? इनकी जगह पर खुद को रख कर सोचोगे तो समझ जाओगे कि ये लोग अपनी जगह ग़लत नहीं हैं।"

पिता जी जगताप चाचा को समझा रहे थे और मैं ख़ामोशी से खड़ा ये सोच रहा था कि पिता जी गांव वालों पर गुस्सा क्यों नहीं हुए? वो चाहते तो एक पल में इन लोगों की हेकड़ी निकाल देते, ये कह कर कि जिन रेखा और शीला की मौत का आरोप वो हम पर लगा रहे हैं वही रेखा और शीला हमारे दुश्मन के कहने पर हमारे खिलाफ़ जाने क्या क्या गुल खिला रहीं थी। मैं इस बात से थोड़ा हैरान था कि पिता जी इस बात को उनसे कहने की बजाय उनसे ऐसा कोमल बर्ताव कर रहे थे? मुझे लगा ज़रूर उनके ऐसा करने के पीछे कोई ना कोई ख़ास कारण होगा, पर क्या?

"हम तुम लोगों का दुख अच्छी तरह समझते हैं।" पिता जी की इस बात से मैं ख़्यालों से बाहर आया। उधर वो गांव वालों से कह रहे थे____"और हमें इस बात का भी बुरा नहीं लगा कि तुम लोग रेखा और शीला की मौत का आरोप हम पर लगा रहे हो। तुम्हारी जगह हम होते तो हम भी ऐसा ही करते। इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि उन दोनों की मौत हमारी हवेली और हमारे बाग़ पर हुई है लेकिन ऐसा क्यों और कैसे हुआ है इस बात का हम पता लगा कर ही रहेंगे। तुम लोग हमारे पास इंसाफ़ के लिए आए हो तो यकीन मानो हम ज़रूर इंसाफ़ करेंगे लेकिन उसके लिए हमें थोड़ा वक्त चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि तब तक के लिए तुम सब शांति और धैर्य से काम लोगे।"

पिता जी की ये बातें सुन कर गांव वाले आपस में कुछ खुसुर फुसुर करने लगे। कुछ देर बाद रंगा नाम के आदमी ने कहा____"ठीक है दादा ठाकुर, अगर आप हमसे थोड़ा वक्त चाहते हैं तो हमें मंजूर है और कृपया हमें माफ़ कीजिए कि हमने आपसे ऐसे तरीके से बातें की लेकिन यकीन मानिए हम में से किसी का भी इरादा आपका अपमान करने का नहीं था और ना ही कभी हो सकता है।"

रंगा की इस बात के बाद पिता जी ने सबको खुशी खुशी अपने अपने घर लौट जाने को कहा जिससे वो सब वापस चले गए। उन लोगों के चले जाने के बाद हम लोग भी वापस बैठक में आ गए। गांव वालों का इस तरह से हवेली पर आना और उन लोगों द्वारा इस तरीके से हम पर आरोप लगाते हुए बातें करना कोई मामूली बात नहीं हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि गांव के लोग बेख़ौफ हो कर हमारी हवेली पर आए थे और पूरी निडरता से हमसे ऐसी बातें की थी। ज़ाहिर है ये सब हमारे लिए काफी गंभीर बात हो गई थी।

पिता जी ने जगताप चाचा को इस मामले के बारे में पता लगाने का काम सौंपा तो वो बड़े अदब के साथ सिर नवा कर चले गए। विभोर और अजीत भी अंदर चले गए थे। अब बैठक में हम सिर्फ़ तीन लोग ही थे।

"आपने जगताप चाचा को इस मामले के बारे में पता लगाने का काम क्यों सौंपा पिता जी?" मैंने पिता जी को कुछ सोचते हुए देखा तो उनसे पूछा____"क्या आपको यकीन है कि वो इस मामले का पूरी ईमानदारी से पता लगाएंगे?"

"हम जानते हैं कि तुम दोनों के मन में इस वक्त कई सवाल होंगे।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"किंतु वक्त और हालात को देखते हुए हमारा ऐसा करना ज़रूरी था। जगताप को भी हमने इसी लिए ये काम सौंपा ताकि उसके मन में ये ख़्याल न उभरे कि हम उस पर संदेह करने लगे हैं। उसे ये काम सौंप कर हमने उसके मन में यही बात बैठाई है कि हमारी नज़र में अभी भी उसकी वही अहमियत है जो हमेशा से रही है। इससे वो खुश भी होगा और अपने काम में लगा भी रहेगा। अगर वो अपनी जगह बेकसूर है तो इस मामले में वो कुछ न कुछ तो करेगा ही और अगर वो हमारे खिलाफ़ है तब भी उसके द्वारा कुछ न कुछ करने से हमें लाभ हो सकता है। उसके लिए ज़रूरी है कि उस पर बारीकी से नज़र रखी जाए।"

"आपको क्या लगता है आज के वक्त में गांव के लोग हमारे बारे में क्या सोचते होंगे?" बड़े भैया ने पिता जी की तरफ देखते हुए थोड़ा झिझकते हुए पूछा____"अभी जिस तरह से गांव के कुछ लोगों ने हवेली में आ कर आपसे ऐसे लहजे में बातें की उससे क्या आपको नहीं लगता कि उनके अंदर से हमारे प्रति मान सम्मान और डर जैसी बात जा चुकी है?"

"हमारी सोच एवं नज़रिए में और तुम्हारी सोच तथा नज़रिए में यही तो फ़र्क है बर्खुरदार।" पिता जी ने हम दोनों को अजीब भाव से देखते हुए कहा____"तुम दोनों वो देख रहे थे जो फिलहाल मायने नहीं रखता था जबकि हम वो देख रहे थे जो उन लोगों में ख़ास नज़र आ रहा था। तुम दोनों ने शायद इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि गांव के जो लोग आए हुए थे उनमें से सिर्फ़ वही लोग ऐसी बातें कर रहे थे जो रेखा और शीला के कुछ भी नहीं लगते थे। उन लोगों के बीच रेखा का पति मंगल और शीला का पति देवधर दोनों ही मौजूद थे लेकिन उन दोनों ने एक बार भी इस मामले में हमसे कुछ भी नहीं कहा। क्या तुम लोग इस बात को समझते हो कि ऐसा क्यों हुआ होगा?"

पिता जी की बातें सुन कर तथा उनके इस सवाल पर मैं और बड़े भैया एक दूसरे की तरफ देखने लगे और समझने की कोशिश करने लगे। उधर पिता जी हम दोनों की तरफ कुछ देर ख़ामोशी से देखते रहे उसके बाद हल्के से मुस्कुराए।

"हर समय जोश से नहीं बल्कि होश से काम लेना चाहिए।" फिर उन्होंने जैसे हम दोनों भाईयों को समझाते हुए कहा____"जिस वक्त वो लोग उस लहजे में हमसे बातें कर रहे थे उस वक्त हमें भी बुरा लगा था और हमारा भी दिमाग़ ख़राब हुआ था। मन में एकदम से ख़्याल उभर आया था कि उन लोगों की हिम्मत कैसे हुई हमसे ऐसे लहजे में बात करने की लेकिन हमने अपने अंदर मचल उठे गुस्से को रोका और ठंडे दिमाग़ से काम लिया। तभी तो हमें नज़र आया कि उन लोगों के यहां आने का असल मकसद क्या था?"

"आप ये क्या कह रहे हैं पिता जी?" बड़े भैया बोल ही पड़े____"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।"
"पर शायद मुझे समझ आ गया है भैया।" मैंने बड़े भैया की तरफ देखते हुए कहा____"शायद पिता जी के कहने का मतलब ये है कि गांव वालों का हवेली में आना और उनके द्वारा हमसे ऐसे लहजे में बात करने के पीछे एक ख़ास कारण है। जैसा कि पिता जी ने कहा उन लोगों में वही लोग हमसे ऐसे लहजे में बातें कर रहे थे और इंसाफ़ की मांग कर रहे थे जो रेखा और शीला के कुछ भी नहीं लगते थे जबकि रेखा और शीला दोनों के ही पति चुप थे। इसका मतलब ये हुआ कि किसी ने उनमें से कुछ लोगों को हमारे खिलाफ़ भड़काया है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब है कि सरजू कलुआ और रंगा तीनों ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें हमारे खिलाफ़ भड़काया गया है?" बड़े भैया ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मैंने कहा_____"बिलकुल, शायद यही सच पिता जी हमसे ज़ाहिर करना चाहते हैं।"

"हां, लेकिन ज़रूरी नहीं कि सिर्फ सरजू कलुआ और रंगा ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें हमारे खिलाफ़ भड़काया गया होगा।" पिता जी ने कहा_____"संभव है कि गांव के कुछ और लोगों को भी इसी तरह भड़काया गया हो। अभी तो फिलहाल तीन लोग ही नज़र में आए हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि ये हमारे लिए निहायत ही गंभीर बात है। उन तीनों की भड़काने वाली बातों से मंगल और देवधर उस वक्त कुछ बोले नहीं थे इससे उन लोगों को अपने मकसद में आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला था लेकिन ऐसी स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली है। अगर सच में उनका इरादा मंगल और देवधर को हमारे खिलाफ़ कर देना ही है तो वो देर सवेर अपने इस इरादे में ज़रूर सफल हो जाएंगे।"

"ये तो सच में विकट समस्या वाली बात हो गई पिता जी।" बड़े भैया गंभीरता से कह उठे____"ऐसी स्थिति में अब हमें क्या करना चाहिए?"

"हमें सरजू कलुआ और रंगा पर नज़र रखनी होगी।" पिता जी ने कहा____"वो भी कुछ इस तरीके से कि उन्हें खुद पर नज़र रखी जाने की भनक तक न लग सके। अगर वाकई में उन तीनों के इरादे नेक नहीं हैं और वो किसी के कहने पर ही ऐसा कर रहे हैं तो ज़रूर उन पर नज़र रखे जाने से हमें कुछ न कुछ फ़ायदा मिलेगा।"

"फिर तो हमें जल्द ही अपने कुछ भरोसे के आदमियों को उन पर नज़र रखने के काम पर लगा देना चाहिए पिता जी।" मैंने जोशपूर्ण भाव से कहा____"हमारे पास फिलहाल अपने असल दुश्मन तक पहुंचने का कोई रास्ता या सुराग़ नहीं है तो अगर इस तरह में हमारे हाथ कुछ लग जाता है तो ये बड़ी बात ही होगी।"

कुछ देर और इस संबंध में पिता जी से हमारी बातें हुईं उसके बाद हम दोनों भाई बैठक से चले गए। एक तरफ जहां मैं इस मामले से गंभीर सोच में डूब गया था वहीं दूसरी तरफ इस बात से खुश भी था कि मेरे बड़े भैया अब मेरे साथ थे और ऐसे मामले में वो भी हमारे साथ क़दम से क़दम मिला कर चल रहे थे।
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