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Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

हर्षा, लाली और होली

होली पर पिछले तीन साल से घर नहीं जा पाया था. उस बार माँ का फ़ोन आ ही गया. कह रही थी 'सुरेश बेटा इस होली पर जरूर आ जाना. और हाँ वो अपनी हर्षा भी आई हुयी है, तुझे पूछ रही थी'

हर्षा का नाम सुनते ही मेरे तन बदन में एक मादक तरंग दौड़ गयी. मैंने तुरंत फैसला किया की इस बार होली पर जरूर घर जाऊंगा.

'ठीक है माँ, मै कोशिश करता हूँ, अगर दफ्तर से छुट्टी मिल गयी तो जरूर आऊंगा' मैंने माँ से फ़ोन पर कह दिया.

होली को अभी पूरा एक हफ्ता बाकी था....मै स्टेशन पर ट्रेन का इन्तजार कर रहा था. मन में हर्षा उमड़ घुमड़ रही थी. तभी ट्रेन आने का अनाउंसमेंट हुआ, ट्रेन के आते ही मै अपनी कोच में अपनी बर्थ पर जा के बैठ गया. ट्रेन चल पड़ी और मै फिर से हर्षा के ख्यालों में खो गया

हर्षा, मेरे अज़ीज़ दोस्त मेघ सिंह ठाकुर की बेटी हर्षा.

मेघ सिंह ठाकुर हमारे गाँव के जमींदार थे. खूब बड़ी हवेली, सैकड़ों एकड़ जमीन जिस पर खेती होती थी. बाग़ बगीचे; सब कुछ. मेघ सिंह से मेरी पुरानी यारी थी. हम लोग शाम को अक्सर एक साथ बैठते कुछ पीने पिलाने का दौर चलता, हसी मजाक होती, कहकहे लगते. ना जाने कितनी हसीनाओं का मान मर्दन हम दोनों ने मिल कर किया था....अब तो वो सब बातें इक ख्वाब सी लगती हैं.

बात हर्षा की है, उस दिन से पहले मेरे मन में हर्षा के प्रति ऐसा वैसा कुछ भी नहीं था....मैंने उसे उस नज़र से कभी देखा भी नहीं था.

हर्षा ने इंटर पास करने के बाद पास के शहर में बी काम में दाखिला ले लिया था. उन दिनों वो गर्मिओं की छुट्टी में आई हुयी थी.

उस दिन जून का तपता महिना, लू के थपेड़े अभी भी चल रहे थे....हालाँकि शाम के ६ बजने वाले थे. मेरी तबियत ठीक नहीं थी. शायद लू लग गयी थी. सोचा की कच्चे आम का पना (पना.....कच्चे आम भून कर बनाया जाने वाला शर्बत) पी लूँ तो मेरी तबियत ठीक हो जाएगी. यही सोच कर मै हर्षा की अमराई (आम का बगीचा) में कच्चे आम तोड़ने के इरादे से चला गया. चारों तरफ सन्नाटा था. माली भी कहीं नज़र नहीं आया.

मन ही मन सोच रहा था की अब मुझे ही पेड़ पर चढ़ कर आम तोड़ने पड़ेंगे.

तभी मुझे कुछ लड़कियों के हंसने खिलखिलाने के आवाजें सुनाई दी. 'हर्षा, तुम देखो ना मेरी चूत को....तुमसे बड़ी है, और गहरी भी' कोई लड़की कह रही थी.

'हाँ हाँ...मुझे पता है तू अपने जीजाजी से चुदवाती है...तभी तो तेरी चूत ऐसी भोसड़ा बन गयी है' किसी दूसरी लड़की की आवाज आई. 'ऐ कमली, अब तू रहने दे..मेरा मुहं ना खुलवा. मुझे पता है तुम अपने चाचू का लण्ड चूसती हो और अपनी बुर में लेती हो' वो लड़की बोल उठी.

'देखो, तुम लोग झगडा मत करो, "चूत-चूत" खेलना हो तो बोलो वर्ना मै तो घर जा रही हूँ' हर्षा बोल रही थी.

मेरे कदम जहाँ के तहां ठहर गए....मै दबे पांव उस तरफ चल दिया जहाँ से आवाजें आ रहीं थी. पेड़ों की ओट में छुपता हुआ मै आगे बड़ने लगा...फिर जो देखा, उसे देख कर मेरा गला सूख गया. मेरी साँसे थम गयीं. दिल की धड़कन तेज हो गयी.

हर्षा और उसकी सात आठ सहेलियां एक गोल घेरा बना के बैठी थी. सब लड़कियों ने अपनी अपनी सलवार और चड्डी उतार रखी थी और अपनी अपनी टाँगे फैला के अपनी अपनी चूत अपने हाथो से खोल रखी थी. और आपस में बतिया रहीं थी.

'सरस्वती, अब तू ही समझा इस पुष्पा को...ये तो आज "चूत-चूत" खेलने नहीं झगडा करने आई लगती है' कमली बोल पड़ी

सभी लड़कियों को मैं जनता पहचानता था. सरस्वती उम्र में सबसे बड़ी थी, उसने भी अपनी चूत दोनों हाथों से खोल रखी थी. कमली की बात सुन कर उसने अपना एक हाथ चूत पर से हटाया और सबको समझाने के अंदाज़ में बोली 'देखो तुम लोग लड़ो मत, हम लोग यहाँ खेलने आयीं हैं झगड़ने नहीं...समझीं सब की सब'

तभी हर्षा बोल पड़ी 'तो अब खेल शुरू, मै तीन तक गिनुंगी फिर खेल शुरू और अब कोई झगडा नहीं करेगा....एक दो तीन'

हर्षा के तीन बोलते ही सब लड़कियों ने अपनी अपनी चूत में ऊँगली करना शुरू कर दी. किसी ने एक ऊँगली डाल रखी थी किसी किसी ने दो. जिस पेड़ के पीछे मै छुपा हुआ था वहां से सिर्फ तीन लड़कियां ही मेरे सामने थीं. बाकी सब की नंगी कमर और हिप्स ही दिख रहे थे. हर्षा मेरे ठीक सामने थी.

हर्षा, मेरे खास मित्र की बेटी...जिसे मैं आज तक एक भोली भाली मासूम नादान लड़की समझता आया था उसका कामुक रूप मेरे सामने था. वो भी अपनी चूत की दरार में अपनी ऊँगली चला रही थी. हर्षा की गोरी गोरी पुष्ट जांघो के बीच में उसकी चूत पाव रोटी की तरह फूली हुयी दिख रही थी. उसकी चूत पे हलकी हलकी मुलायम रेशमी झांटे थी...तभी...सुनयना बोल पड़ी...

'ऐ, शबनम तेरा हाथ बहुत धीरे चल रहा है....जरा जाके अपना हथियार तो उठा ला' सुनयना बोली

यह सुन कर शबनम उठी और पास की झाड़ियों में से कुछ उठा लायी. मै उत्सुकता से देख रहा था....शबनम के हाथ में लाल कपडे में लिपटा हुआ लम्बा सा कुछ था. वो उसने लाकर सुनयना को दे दिया. सुनयना ने उस हथियार के ऊपर से कपडा हटाया...वो हथियार एक लकड़ी का बना हुआ डिल्डो, (कृत्रिम लण्ड) था....लगभग बारह अंगुल लम्बा और तीन अंगुल मोटा...एकदम चिकना...कांच की तरह.

सुनयना ने वो हथियार अपनी चूत में दन्न से घुसेड लिया और उसे अन्दर बाहर करने लगी....

मुझे भी दो. मुझे भी दो...सब लड़कियां कह रही थी...फिर सुनयना ने वो डिल्डो अपनी चूत से बाहर निकाल कर हवा में उछाल दिया...कई लड़कियों ने केच करने की कोशिश की. लेकिन बाजी शबनम के हाथ लगी. शबनम उस डिल्डो को अपनी चूत में सरका कर मजे लेने लगी.

उफ्फ्फफ्फ्फ्फ़ मेरी कनपटियाँ गरम होने लगी थी...मेरा गला सूख चुका था...जैसे तैसे मैंने थूक निगला...जिन लड़कियों को मै आज तक सीधी सादी भोली भाली समझता आया था...उनका असली रूप मेरे सामने था.

'हर्षा, तू भी ले ना इसे अपनी बुर में...बहुत मज़ा आता है' शबनम बोली

'ना, बाबा...ना. मुझे तो इसे देख कर ही डर लगता है...मै तो शादी के बाद ही असली चीज लुंगी अपने भीतर' हर्षा बोली

सब लड़कियां बारी बारी से उस डिल्डो को अपनी चूत में चलाती रही...सिर्फ हर्षा ने वो डिल्डो अपनी चूत में नहीं घुसाया. जब लडकियों की मस्ती पूरे शवाब पे आई तो वो एक दुसरे के ऊपर लेट के चूत से चूत रगड़ने लगीं....ये खेल लगभग पंद्रह बीस मिनिट तक चला...जब सब की सब झड गयीं तो सबने अपनी अपनी चड्डी और सलवार पहिन ली.

अच्छा सखियों, आज का अपना खेल ख़तम...कल फिर हम लोग चूत-चूत खेलेंगी....हर्षा बोल पड़ी

सब लड़कियों के जाने के बाद मै भी दबे पांव अपने घर को चल दिया उस रात. नींद मेरी आँखों से कोंसों दूर थी. रह रह कर "चूत-चूत" का खेल मेरे दिमाग में चल रहा था. जिसकी कभी कल्पना भी ना की थी उसे प्रत्यक्ष देख चुका था. हर्षा की भरी भरी चूत मेरी आँखों में नाच रही थी. उसकी गुलाबी सलवार उसके पांव के पास पड़ी थी, और उसने अपनी धानी रंग की कुर्ती अपनी कमर के ऊपर तक समेट ली थी...उसकी चुचियों पे मैंने ज्यादा गौर नहीं किया था...लेकिन हर्षा की कुर्ती काफी ऊंची उठी हुयी दिख रही थी...
 
तभी मेरे लण्ड ने खड़े होकर हुंकार सी भरी...और मेरे पेट से सट गया....जैसे मुझे उलाहना दे रहा था.....

मैंने अपने लण्ड को प्यार से थपथपाया....'सब्र करो छोटू...बहुत जल्दी तुम हर्षा की चूत की सैर करोगे'

लेकिन कैसे....? ये सवाल मेरे सामने मुह बाए खड़ा था. हर्षा...जो मेरे सामने पैदा हुई थी...मेरी गोद में नंगी खेली थी...मेरे खास दोस्त की बिटिया...मैंने कभी आज तक उसके बारे में ऐसा सोचा भी नहीं था....लेकिन आज जो खेल उसकी अमराई में देखा...हर्षा ने अपनी चूत अपने हाथों से खोल रखी थी...उसकी चूत के भीतर वो तरबूज जैसा लाल और भीगा भीगा सा द्वार. वो उसकी छोटी अंगुली की पोर जैसा उसकी चूत का दाना (Clit)

अनचाहे ही मै हर्षा की चूत का स्मरण करता हुआ मुठ मारने लगा. मेरे लण्ड से जब लावा निकल गया तब कुछ चैन मिला.

अब मेरा मन...हर्षा की रियल चुदाई करने के ताने बाने बुनने लगा..

अगली सुबह मै जल्दी उठ गया और घूमने के बहाने हर्षा की अमराई में जा पहुंचा. मै झाड़ियों में डिल्डो की तलाश करने लगा...वो मुझे वैसा ही कपडे में लिपटा मिल गया. मैंने डिल्डो को कपडे से बाहर निकल कर देखा, बड़ा मस्त डिल्डो था...उस में से लड़कियों की चूत के रस की गंध अभी भी आ रही थी...मैंने उसे अपनी नाक से लगा कर एक गहरी सांस ली....और डिल्डो अपनी जेब में रख लिया.

इतना तो मै समझ ही गया था की हर्षा एक सेक्सी लड़की है और लण्ड लेने की चाहत उसे भी होगी. आखिर अब वो भरपूर जवान हो चुकी थी. मुझे अपनी राह आसान नज़र आने लगी.

मैंने कुछ कुछ सोच लिया था की मुझे क्या करना है. उसी दिन मैं हर्षा के घर जा पहुंचा, इत्तफाक से हर्षा से अकेले में बात करने का मौका मिल ही गया...

'हर्षा, कैसी हो तुम...तुम्हारी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है' मैंने पूछा

'ठीक चल रही है अंकल जी, मै दिन भर मन लगा के पड़ती हूँ' हर्षा बोली

'ठीक है हर्षा, खूब मन लगा के पढो तुम्हे ज़िन्दगी में बहुत आगे बढ़ना है' मैंने कहा

'जी अंकल' वो बोली

'वैसे हर्षा, कल मैंने तुम्हे तुम्हारी अमराई में सहेलियों के साथ पढ़ते देखा था' मैंने कह दिया

यह सुन कर हर्षा सकपका गयी और उसका चेहरा फक पढ़ गया. उसके मुंह से बोल ना फूटा. फिर मैंने वो डिल्डो निकाल कर हर्षा को दिखाया...

'ये तुम्हारा ही है ना?' मैंने पूछा

'अंकल जी, वो वो.....' इसके आगे हर्षा कुछ ना बोल सकी

'हर्षा, ये आदतें अच्छी नहीं...मुझे तुम्हारे पिताजी से बात करनी पड़ेगी इस बारे में' मैंने कहा

'नहीं अंकल जी, आप पिताजी से कुछ मत कहना इस बारे में...मैं आपके पांव पड़ती हूँ' वो बोली

'हर्षा, तुम उन गन्दी लड़कियों के साथ ये सब गंदे गंदे काम करती हो...मुझे तुम्हारे पिताजी को ये सब बताना ही पड़ेगा' मैंने अपनी बात पर जोर देकर कहा.

'नहीं, अंकल जी, प्लीज....आप पिताजी से कुछ मत कहना...अब मैं कभी भी वैसा नहीं करुँगी' हर्षा रुआंसे स्वर में बोली और मेरे पैरों पर झुक गयी...मेरा तीर एकदम सही जगह लगा था..

'देखो, हर्षा मैं तुमसे इस बारे और बात करना चाहता हूँ.....तुम कल दोपहर को मुझे अपनी अमराई में मिलना' मैंने उससे कहा

'अंकल जी, अब क्या बात करनी है आपको...' वो बोली

'हर्षा, तुम कल मुझे वही पे मिलना....अब तुम छोटी बच्ची तो हो नहीं.....अपने आप समझ जाओ' मैंने उसकी आँखों में आँखे डाल कर कहा..

कुछ देर वो चुप रही.....फिर धीरे से बोली...'ठीक है अंकल जी, मै कल दोपहर को आ जाउंगी वही पर, लेकिन आप पिता जी से कुछ मत कहना'

'ठीक है, नहीं कहूँगा....लेकिन तुम समझ गयीं ना मेरी बात को ठीक से' ?

'जी, अंकल....मै तैयार हू' वो बड़ी मुश्किल से बोली...यह सुन कर मैंने हर्षा को अपनी बहो में भर लिया और उसका गाल चूम लिया. वो थोड़ी कसमसाई लेकिन कुछ नहीं बोली फिर मैंने धीरे से उसकी चुचिओं पर हाथ फिराया और उसकी जांघो के बीच में हाथ ले जाकर उसकी चूत अपनी मुट्ठी में भर ली...हर्षा के मुह से एक सिसकारी निकली

'हर्षा...अपनी इसे भी चिकनी कर के आना' मै उसकी चूत पर हाथ फिरते हुए बोला. हर्षा ने अपना सर झुका लिया, बोली कुछ नहीं.

मै फिर अपने घर लौट आया....अब मुझे कल का इंतज़ार था.

अगले दिन मै नहा धोकर तैयार हुआ, खूब रगड़ रगड़ के मल मल के नहाया और फिर अपने लण्ड पर चमेली के तेल की मालिश की,सुपाडे पर खूब सारा तेल चुपड़ लिया....आखिर हर्षा की चूत की सील तोड़ने जा रहा था मेरा छोटू. मैं हर्षा की अमराई में लगभग एक बजे ही पहुँच गया. चारों तरफ सुनसान था, चिलचिलाती धूप पड रही थी और गरम हवाएं चल रही थी.

करीब आधे घंटे बाद मुझे हर्षा आती दिखाई दी, उसने अपने सर पर दुपट्टा ढँक रखा था, गुलाबी रंग के सलवार सूट में ताजा खिला गुलाब सी लग रही थी. 'आओ हर्षा...तुमने तो मुझे बहुत इंतजार करवाया, मैं कब से यहाँ अकेला बैठा हू' मैंने कहा.

'अंकल जी, वो तैयार होने में देर लग गयी' वो धीरे से बोली. हर्षा की कातिल जवानी गजब ढहा रही थी, खूब सज संवर के आई थी वो.

मैंने उसे अपनी बाँहों में खींच लिया, उसकी कड़क कठोर चूचिया मेरे सीने से आ लगीं, उसके तन की तपिश मुझे दीवाना बनाने लगी.

'अंकल जी, कोई देख लेगा' वो बोली और मुझसे छूटने की कोशिश करने लगी. 'अरे, यहाँ तो कोई भी नहीं है...तुम बेकार डर रही हो' मैंने उसे समझाया
 
'नहीं, अंकल यहाँ नहीं....हम लोग मचान पर चलते हैं. वहां हमें कोई डर नहीं रहेगा' हर्षा बोली. 'ठीक है चलो' मैंने कहा मचान का नाम सुन कर मै भी खुश हो गया. वहीँ पास में एक आम के पेड़ पर मचान बनी थी....मैंने हर्षा को सहारा देकर ऊपर मचान पर चडा दिया और फिर मैं भी ऊपर चढ़ गया. अब हमें देखने वाला कोई नहीं था....

मचान पर नर्म नर्म पुआल बिछी थी, जिस पेड़ पर मचान बनी थी उसमे ढेर सारे बड़े बड़े आम लटक रहे थे....इक्का दुक्का तोते आमों को कुतर रहे थे.

हर्षा सहमी सिकुड़ी सी मचान पर बैठ गयी. मै उसके पास में लेट गया और उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया. वो मेरे सीने से आ लगी. मैं धीरे धीरे उसके अंगों से खेलने लगा. वो हल्का फुल्का विरोध भी कर रही थी...उसके मुंह से ना नुकुर भी निकल रही थी,मैंने हर्षा की कुर्ती में हाथ डाल दिया और उसके दूध दबाने लगा. उसका निचला होठ अपने होठो में लेकर मैं उसकी निप्पलस चुटकी में भर कर धीरे धीरे मसलने लगा. धीरे धीरे हर्षा भी सुलगने लगी. आखिर जवान लड़की थी, मेरे हाथों का असर तो उस पर होना ही था.

फिर मैंने उसकी सलवार का नाडा पकड़ कर खींच दिया....और उसकी चड्ढी में हाथ डाल दिया. हर्षा को मानो करेंट सा लगा....उसका सारा बदन सिहर उठा....हर्षा की चिकनी चूत मेरी मुट्ठी में थी. वो सच में अपनी चूत को शेव कर के आई थी. मैंने खुश होकर हर्षा को प्यार से चूम लिया..और उसकी चूत से खेलने लगा.

हर्षा का विरोध अब ख़तम हो चुका था और वो भी मेरे साथ रस लेने लगी थी. फिर मैंने उसकी सलवार निकाल दी...और जब चड्ढी उतारने लगा तो हर्षा ने मेरा हाथ पकड़ लिया....'अंकल जी, मुझे नंगी मत करो प्लीज' वो अनुरोध भरे स्वर में बोली. लेकिन अब मैं कहाँ मानने वाला था. मैंने जबरदस्ती उसकी चड्ढी उतार के अलग कर दी. और फिर उसकी कुर्ती और ब्रा भी जबरदस्ती उतार दी.

उफ्फ्फ, कितना मादक हुस्न था हर्षा का. उसके दूध कैद से आजाद होकर मानो फूले नहीं समां रहे थे. हर्षा की गोरी गुलाबी पुष्ट जांघो के बीच में उसकी चिकनी गुलाबी चूत....मैं तो हर्षा को निहारता ही रह गया.....तभी वो शरमा के दोहरी हो गयी और उसने अपने पैर मोड़ कर अपने सीने से लगा लिए. और अपना मुंह अपने घुटनों में छिपा लिया.

मैंने भी अपने सारे कपडे उतार दिए और हर्षा को जबरदस्ती सीधा करके मैं उसके नंगे बदन से लिपट गया. जवान कुंवारी अनछुई लड़की के बदन से जो मनभावन मादक गंध आती है....हर्षा के तन से भी उसकी हिलोरें उठ रही थी....मै हर्षा के पैरों को चूमने लगा...उसके पैरों की अँगुलियों को मैंने अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगा. फिर मेरे होंठ उसकी टांगो को चूमते हुए उसकी जांघो को चूमने लगे.

हर्षा के बदन की सिहरन और कम्पन मै महसूस कर रहा था. फिर मैंने अपनी जीभ उसकी चूत पे रख दी. हर्षा की चूत के लब आपस में सटे हुए थे...मैंने धीरे से उसकी चूत के कपाट खोले और अपनी जीभ से उसका खजाना लूटने लगा....तभी मानो हर्षा के बदन में भूकंप सा आ गया. उसने मेरे सिर के बाल कस कर अपनी मुट्ठियों में जकड लिए.

उसने अपनी कमर ऊपर उठा दी...फिर मैंने अपनी अंगुली की एक पोर उसकी चूत में घुसा दी और उसके दूध चूसने लगा...हर्षा का दायाँ दूध मेरे मुंह में था और उसके बाएं दूध से मै खेल रहा था...

तभी हर्षा मेरी पीठ को सहलाने लगी.....'अंकल जी, हटो आप..बहुत देर हो गयी, अब मुझे जाने दो' वो थरथराती आवाज में बोली....औरअपनी टाँगे मेरी कमर में लपेट दीं. हर्षा अपने मुंह से कुछ और कह रही थी लेकिन उसका नंगा बदन कुछ और ही कह रहा था. मै हर्षा को जिस मुकाम पे लाना चाहता था वहां वो धीरे धीरे आ रही थी.

फिर मैं उसके ऊपर लेट गया...मेरे लण्ड में भरपूर तनाव आ चुका था. और मेरा लण्ड हर्षा की चूत पे टकरा रहा था. मैं उसके ऊपर लेटे लेटे ही उसके गाल काटने लगा.

'अंकल जी, गाल मत काटो ऐसे...निशान पड जायेंगे' वो बोली....लेकिन मैंने अपनी मनमानी जारी रखी

'अब नहीं रहा जाता...' वो बोल उठी.

हर्षा की आँखों में वासना के गुलाबी डोरे तैरने लगे थे. उसकी कजरारी आँखे और भी नशीली हो चुकी थी. फिर मैं उठ कर बैठ गया और हर्षा को खींच कर मैंने उसका मुंह अपनी गोद में रख लिया. और मैं अपना लण्ड उसके गालों पर रगड़ने लगा...

'हर्षा, मेरा लण्ड अपने मुंह में लेकर चूसो ' मैंने कहा.

'नहीं, अंकल जी ये नहीं' वो बोली.

'तो ठीक है...मत चूसो, अपने कपडे पहिन लो और जाओ अब' मैंने कहा

तब हर्षा ने झट से मेरा लण्ड पकड़ लिया और झिझकते हुए अपने मुह में ले लिया....और चूसने लगी. मै तो जैसे पागल सा हो उठा...कुछ देर बाद उसने मेरी foreskin नीचे करके मेरा सुपाडा अपने मुंह में भर लिया और वो बड़ी तन्मयता से मेरा लण्ड चूमते चाटते हुए चूसने लगी.

मैंने भी हर्षा का सिर पकड़ लिया और उसे अपने लण्ड पर ऊपर नीचे करने लगा. मेरा लण्ड हर्षा के मुंह में आ जा रहा था.

कुछ देर मै यू ही हर्षा का मुंह चोदता रहा...और साथ में उसकी चूत की दरार में अपनी अंगुली भी फिराता रहा...

'अंकल जी, अब नहीं होता सहन....आप और मत तरसाओ मुझे....जल्दी से मुझे अपनी बना लो' हर्षा कांपती सी आवाज में बोली.

'ठीक है मेरी जान...मैं भी तड़प रहा हू तुम्हे अपनी बनाने के लिए.....हर्षा, अब तुम सीधी लेट जाओ और अपने पैर अच्छी तरह से फैला कर अपनी चूत की फांके खोल दो पूरी तरह से' मैंने कहा

'जी, अंकल...हर्षा शरमाते हुए बोली' और फिर उसने अपनी टाँगे फैला के अपनी चूत के होंठ अपनी अँगुलियों से खोल ही दिए

मुझे लड़की का ये पोज सदा से ही पसंद है...जब लड़की नंगी होकर अपनी चूत अपने हाथों से खोल कर लेटती है....

फिर मैंने हर्षा की खुली हुयी चूत के छेद से अपना सुपाडा सटा दिया और उसकी हथेलियाँ अपनी हथेलियों में फंसा कर धीरे धीरे अपना लण्ड उसकी चूत में घुसाने की कोशिश करने लगा. कुंवारी चूत के साथ थोड़ी मुश्किल तो होती ही है. मैंने अपने लण्ड को खूब सारा चमेली का तेल पिलाया था....और फिर हर्षा के चूसने के बाद मेरा लण्ड काफी चिकना हो चुका था.

अंततः मेरी मेहनत रंग लायी. और मेरा लण्ड हर्षा की चूत की सील को वेधता हुआ, उसका कौमार्य भंग करता हुआ उसकी चूत में समां गया.

हर्षा के मुंह से एक घुटी घुटी सी चीख निकली, उसने मुझे परे धकेलने की कोशिश की लेकिन मेरे हथेलियों में उसकी हथेलियाँ फंसी हुयी थी....वो बस तड़प के ही रह गयी.

'उई माँ...मर गयी...' हर्षा के मुंह से निकला...'हाय अंकल, निकाल लो अपना बाहर ...मुझे नहीं चुदवाना आपसे'

लेकिन मै बहुत धीरे धीरे आहिस्ता आहिस्ता उसकी चूत में अपने लण्ड को चलाता रहा. मेरा लण्ड हर्षा की चूत में रक्त-स्नान कर रहा था..और वो मेरे नीचे बेबस थी.

'आह, अंकल...बहुत दुख रही है...' हर्षा बोली. उसकी आँखों में आंसू छलक आये. मुझसे उसकी तड़प देखी नहीं जा रही थी; लेकिन मै कर भी क्या सकता था. मैंने प्यार से उसकी आँखों को चूम लिया, उसके गालों को अपना प्यार दिया..और अपनी धीमी रफ़्तार जारी रखी.

जैसा की आदि काल से होता आया है, कामदेव ने अपना रंग दिखाना शुरू किया तो हर्षा को भी मस्ती चड़ने लगी...उसके निप्पलस जो पहले किशमिश की तरह थे अब कड़क हो कर बेर की गुठली जैसे हो चुके थे. और उसका पूरा बदन कमान की तरह तन चुका था. अब हर्षा के हाथ भी मेरी पीठ पर फिसलने लगे थे.

थोड़ी देर बाद उसके मुंह से धीमी धीमी किलकारियां निकलने लगीं. तब मैंने चुदाई की स्पीड थोड़ी तेज कर दी. और अपने लण्ड को पूरा बाहर तक खींच कर फिर से उसकी चूत में पूरी गहराई तक घुसा कर उसे चोदने लगा...

'हाँ, अंकल जी, ऐसे ही करो...थोडा और जल्दी जल्दी करो ना' हर्षा अपनी कमर उठाते हुए बोली.

'हाँ, ये लो मेरी जान...' मैंने कहा और फिर मैंने अपने स्पेशल शोट्स मारने शुरू कर दिए.

'अंकल जी, अब बहुत मजा दे रहे हो आप...हाँ '

'तो ये लो मेरी रानी ...और लूटो मजा...क्या मस्त जवानी है तेरी, हर्षा' मैंने कहा

'अंकल जी, ये हर्षा ठाकुर आपके लिए ही जवान हुयी है.....आप लूटो मेरी जवानी को, जी भर कर भोग लो मेरे शरीर को ... खेलो मेरे जिस्म से, रौंद डालो मेरी चूत को, फाड़ दो मेरी चूत आह.........जैसे आप चाहो वैसे खेलो मेरी अस्मत से...

जी भर के लूटो मेरी इज्जत को...अंकल कुचल के रख दो मेरी चूत को; बहुत सताती है ये चूत मुझे' हर्षा पूरी मस्ती में आके बोले जारही थी....

फिर मैं हर्षा के क्लायीटोरिस को अपनी झांटो से रगड़ रगड़ के उसकी चूत मारने लगा, उछल उछल कर उसकी चूत कुचलने लगा. (बनाने वाले ने भी क्या चीज बनाई है चूत भी...कितनी कोमल, कितनी नाजुक, कितनी लचीली, कितनी रसभरी लेकिन कितनी सहनशील...कठोर लण्ड का कठोर से कठोरतम प्रहार सहने में सक्षम...)

'आईई अंकल....उफ्फ्फ....हाँ ऐसे ही...' वो बोली और मेरे धक्कों से ताल में ताल मिलाती हुयी नीचे से अपनी कमर चलाते हुए टाप देने लगी
 
चुदो चुदाओ होली में - गांड मराओ होली में



भाभी, आज मैं तुम्हे नहीं छोडूंगा, आज तो मैं तेरे सारे बदन पर रंग लगा कर रहूँगा . चाहे तू मुझसे नाराज़ हो जाये, चाहे मुझे डांटे, चाहे मुझे अपने घर से निकाल दे, लेकिन आज मैं तेरे ब्लाउज के अन्दर हाथ दाल कर तेरी मस्त मस्त और इन बड़ी बड़ी चूंचियों पर रंग जरुर लगाऊंगा . फिर पेटीकोट के अन्दर हाथ घुसेड कर तेरी चूत में रंग लगाऊंगा . आज मैंने ठान लिया है की भाभी की चूत और चूंचियां रंग कर ही आऊँगा .

भाभी ने कहा अच्छा तो तू बड़ा सयाना बनता है रे ? तूने ही अपनी माँ का दूध पिया है क्या ? अगर तू मेरी चूत में लगाएगा रंग तो मैं भी तेरे लण्ड को रंग दूँगी . तेरे पेल्हड़ रंग दूँगी . तेरी गांड में घुसेड दूँगी रंग . तुझे नंगा करके और तेरे सारे बदन पे रंग लगाकर ही भेजूंगी यहाँ से ? मैं तेरे इस मादर चोद लण्ड से डरती नहीं हूँ . मैं पहले भी कई लण्ड रंग चुकी हूँ .ऐसा रंग लगाऊंगी तेरे लण्ड में की तू महीनो अपना लण्ड ही धोता रहेगा .

मैंने मन में सोचा बड़ी जबरदस्त है मेरी भाभी इसे चोदने में तो वाकई बड़ा मज़ा आएगा .

बस मेरा मन गुनगुनाने लगा :-

चुदो चुदाओ होली में - गांड मराओ होली में .

भाभी की बुर होली में, मेरा लौड़ा होली में .

लौड़ा चूसो होली में, चूत चुदाओ होली में.

चूंची मसलों होली में, लौडा पेलो होली में .

इतने में मैंने देखा की भाभी ने बाहर का दरवाजा बंद कर दिया . अब घर में केवल मैं और भाभी . मेरी नीयत तो भाभी पर पहले ही खराब हो चुकी थी . मेरा लण्ड पैजामा के नीचे गुलाचे मार रहा था . मैंने कहा भाभी मैं तुम्हे एक कविता सुनाता हूँ . मैंने यही कविता भाभी को सुना दी तो वह बोली मैं इसमें कुछ और जोड़ देती हू

. चूंची चूसो होली में, लण्ड हिलाओ होली में

झांट बनाओ होली में, चूंची चोदो होली में

भाभी के मुह से यह सुन कर तो मेरा लण्ड आपे से बाहर हो गया . भाभी जैसे ही मेरे पास आयी मैं उसके चेहरे पर रंग लगाना चाहता था . मैंने हाथ बढाया तो उसने हाथ रोक लिया . मैंने कहा भाभी ये क्या ? बभी ने कहा अबे भोषड़ी के मादर चोद अगर मुझे मुह में रंग लगवाना होता तो मैं दरवाजा क्यों बंद करती ? मुझे अपनी चूत में रंग लगवाना है . अपनी चूंचियों में रंग लगवाना है . चल लगा पहले मेरी चूंचियों पर रंग . भाभी मेरे सामने खड़ी हो गयी . मेरा हाथ ही नहीं बढ़ रहा था . तब भाभी बोली अरे क्या हुआ रे क्या तेरी गांड फट रही है . चल खोल न मेरा ब्लाउज . फाड़ दे मेरा ब्लाउज . फाड़ दे मेरी ब्रा . फिर बाद में जो कुछ फाड़ना हो फाड़ते रहना . मैंने उसका ब्लाउज खोला . और फिर ब्रा खोल दी . उसकी नंगी चूंचियां दखी तो मेरे तन बदन में आग लग गयी . मैं पहली बार किसी औरत की नंगी चूंचियां देख रहा था .

मैंने हाथ बढाया और चूंचियां मसलने लगा . चूमने लगा चूसने लगा चूंचियां . मैं मस्त होने लगा . मैंने थोडा रंग लगाया और फिर खूब सहलाया चूंची . उसके बाद मैंने पेटीकोट का नाडा खोल दिया . भाभी बिलकुल नंगी हो गयी . उसकी चूत बिना झांट की थी . मेरे तो होश उड़ गए . पहली बार बुर देख रहा था . मैंने हाथ लगाया तो भाभी ने कहा अरे साले पहले रंग लगा .

आज रंग दो मेरी बुर चोदी बुर को .

मैं जब रंग लगाने लगा तो भाभी बोली अबे साले चूत में रंग अपना लौडा खोल कर लगाया जाता है . बस भाभी ने मेरी कमीज फाड़ डाली और मेरा पैजामा खोल दिया . मैं बिलकुल नंगा हो गया . मेरा लण्ड पकड़ लिया भाभी ने . लण्ड साला बढ़ने लगा . जब खूब टन्ना गया तो भाभी बोली हाय दईया कितना बड़ा है तेरा लण्ड ? ये तो भोषड़ी चोदने वाला हो गया है . मोटा भी है रे . इसका सुपाडा एकदम मुर्गी का अंडा लगता है . भाभी ने जैसे ही लण्ड चूमा तो मेरा बदन जलने लगा . उसने मुझे सोफा पर बैठा दिया और नीचे बैठ कर मेरा लण्ड मुह में ले लिया . मेरा लण्ड चूसने लगी भाभी .

दोस्तों, ये है मेरी नेहा भाभी औरमैं हूँ इसका देवर राकी . नेहा भाभी मेरी सगी भाभी नहीं है लेकिन सगी से भी बढ़कर है . मेरे मोहल्ले में रहती है . मुझसे उम्र में २ साल बड़ी है . मैं इनके घर बहुत दिनों से आता जाता था . मैं काफी घुलमिल गया था नेहा भाभी से . उसका सारा काम कर देता था . भाभी किसी भी काम के लिए केवल मुझे ही याद करती थी . हमारी नजदीकियां बढाती गयी . मैं उसकी ओर खिंचता चला गया . मैं जवान हो गया तो भाभी को मन ही मन प्यार करने लगा . चाहने लगा भाभी को . मुझे उसकी उभरी हुई चूंचियां और उभरी हुई गांड बड़ी अच्छी लगती थी . उससे भी ज्यादा अच्छी लगती थी उसकी प्यारी प्यारी बातें . धीरे धीरे भाभी मजाक करने लगी . मैं भी उसी लहजे में जबाब देने लगा . सही बात तो यह है की मेरा लण्ड भाभी के नाम से खड़ा होने लगा . मेरी इच्छा होने लगी की भाभी किसी दिन मेरा लण्ड पकड़ें ? मैं उसकी चूंचियां पकडूँ . लेकिन कभी हिम्मत नहीं हुई . मैं भाभी के नाम का सड़का मारने लगा . उसका नाम ले ले कर मुठ्ठ मारने लगा . मुझे मज़ा आता था . मैं भाभी की चूंचियां देखना चाहता था . भाभी की मैं बुर देखने के लिए मैं तड़प रहा था . मैं भाभी को चोदना चाहता था .

एक दिन किसी काम से भाभी मेरे कमरे पर आ गयी . मैं अकेले ही रहता था . मैंने अपना लैपटाप खोल रखा था . मैं एम् टी वी का वीडियो देख रहा था और उसकी गालियाँ सुन रहा था . मुझे मज़ा आ रहा था . आवाज़ पूरी खोल रखी थी . मैं काम भी करता जा रहा था और गालियाँ भी सुनता जा रहा था . भूल से दरवाजे की सिटकनी खुली रह गयी . अचानक भाभी आ गयी . मैं उस समय बाथ रूम में था . भाभी भी मजे से गालियाँ सुनने लगी . मैं जब बाहर आया तो भाभी को देख कर अवाक रह गया . लैपटाप बंद कर दिया .

मैंने कहा भाभी, आप ? इस समय ? मुझे बुला लिया होता ?

भाभी बोली :- अगर बुला लिया होता तो ये गालियाँ कहाँ सुनने को मिलती ? खोलो खोलो इसे मैं गालियाँ और सुनना चाहती हूँ .

मैंने कहा :- भाभी मुझे क्यों शर्मिंदा कर रही है आप ?

भाभी बोली :- जल्दी खोलो नहीं तो मैं तेरी गांड मारूँगी .

मैंने कहा :- सॉरी भाभी अब आगे से ऐसा नहीं होगा ?

भाभी बोली :- अरे तेरी गांड क्यों फट रही है . अब तू खोल दे नहीं तो मैं भी उसी की तरह तेरी माँ चोदूंगी . भाभी ने यह बात बड़ी सेक्सी अंदाज़ में और आँख मार कर कहा . मेरा लण्ड टन्ना गया . मैंने दरवाजा बंद किया और आवाज़ खोल दी . भाभी ने सारी गालियाँ सुनी और बोली राकी आज से तुम मुझसे गालियों में ही बात करोगे . मैं गालियों में जबाब दिया करूंगी . बड़ा मज़ा आएगा यार ?

यह कह कर भाभी चली गयी . लेकिन मेरा लण्ड खड़ा था और खड़ा ही रह गया .

दो दिन बाद मैं भाभी के घर गया .

भाभी बोली :- आओ भोषड़ी के राकी, कहाँ से गांड मरा के आ रहे हो ?

मैंने कहा :- नहीं भाभी मैं सीधे घर से ही आरह हूँ .

भाभी बोली :- मैंने कुछ सुना नहीं ? पहले गाली दो फिर बात कहो . नहीं तो तेरी मेरी खुट्टी ?

मैंने कहा :- अरे मेरी बुर चोदी भाभी, मैं तो खुद ही किसी की गांड मारने गया था लेकिन उसने उलटे मेरी गांड मार दी .

भाभी बोली :- अबे साले गांडू, तू पहले मुझसे गांड मारना सीख ले . बुर चोदना सीख ले नहीं तो बिना बुर चोदे ही रह जायेगा ज़िन्दगी भर .

मैंने कहा :- भाभी मैं तेरी बुर से ही बुर चोदना सीखूंगा .

भाभी बोली :- अबे माँ के लौड़े, पहले अपना लण्ड तो बुर चोदना वाला बना . मैं बड़े बड़े लण्ड से चुदवाती हूँ किसी छोटे लण्ड से नहीं ?

भाभी ने ऐसा कह कर मेरे सामने अपनी चूंचियां तान कर खड़ी हो गयी . मैंने उसकी चूंचियों पर हाथ रख दिया . सहलाने लगा चूंचियां . भाभी ने मेरे लण्ड पर हाथ मारा . ऊपर से लण्ड दबा कर कहा अरे यार तेरा लौडा तो खड़ा है . इसको बाहर निकालो मैं अभी देखूँगी तेरा लण्ड ? मैं पैंट खोलने ही वाला था की भाभी के मोबाईल की घंटी बज गयी . वह फोन पर बातें करने लगी . कुछ गंभीर मसला था . भाभी ने कहा राकी तुम शाम को आना .मैं अपना मन मसोस कर चला गया . दूसरे दिन अचानक मुझे नौकरी के लिए बहार जाना पड़ा . मैं भाभी से बगैर मिले चला गया और बाद में भाभी को टेलीफोन से बताया . भाभी ने कहा :- राकी तुम्हारे जाने से मुझे बहुत तकलीफ हो गयी है . अब तुम जल्दी ही वापस आ जाओ . मैं तो तेरा लण्ड भी नहीं देख सकी . उस दिन मैं बड़े मूड में थी . मैं तो चूत खोल कर चुदाने वाली थी लेकिन क्या करती मादर चोद फोन आ गया . और मैं उसी में उलझ गयी

.ख़ुशी की बात यह रही की एक साल बाद मेरा ट्रांसफर वापस यही हो गया . मैंने भाभी को बताया तो वह बहुत खुश हो गयी . हम दोनों और नजदीक आ गए . एक हफ्ते बाद होली आ गयी और मैं भाभी के साथ होली खेलने उसके घर आ गया .

तो दोस्तों, मैं सोफा पर बैठे हुए अपना लण्ड भाभी को चूसा रहा था . भाभी की मस्ती बढती जा रही थी . वह मुझे बेड पर ले गयी . मुझे चित लिटा दिया और मेरे मुह पर अपनी चूत रख कर मेरे ऊपर चढ़ बैठी . खुद झुक कर मेरा लण्ड चूसने लगी और मैं भी इधर उसकी चूत चाटने लगा . मेरा यह पहला मौका था बुर चाटने का . भाभी तो मेरे लण्ड की निकलती हुई लार बार बार चाट लेती थी .मैं फिर घूम गया और भाभी के ऊपर हो गया . मैंने दोनों हाथों से उसकी टाँगे फैलाई और चूत में मुह घुसेड दिया . उसे भी चूत चटवाने में मज़ा आ रहा था . इधर मैंने लण्ड पूरा का पूरा उसके मुह में डाल दिया था . मैं धीरे धीरे उसका मुह ही चोदने लगा .

थोड़ी देर में भाभी उठ बैठी और मुझे खड़ा कर दिया . खुद नीचे घुटनों के बल बैठ कर मेरा लण्ड चूसने लगी . पेल्हड़ चाटने लगी . जब भाभी एक हाथ से पेल्हड़ थाम कर लण्ड चूस रही थी तो मुझे बड़ा मज़ा आने लगा . मैंने कहा भाभी अब मैं झड जाऊंगा . भाभी लण्ड मुह से निकाल लो . नहीं तो मैं मुह में ही झड जाऊंगा . भाभी ने इशारा किया झड जाओ कोई बात नहीं . तेरा लण्ड बड़ा मस्त हो गया है . मैं लण्ड पीना नहीं छोडूंगी . थोड़ी देर में मैंने कहा भाभी प्लीज मेरा मुठ्ठ मार दो . तब भाभी ने लण्ड मुह से निकाला और मुठ्ठी से पकड़ कर लगाने लगी दनादन्न सड़का . वह जिस तरह से मुठ्ठ मार रही थी उससे लग रहा था की भाभी कई लण्ड का मुठ्ठ मार चुकी है . मैंने कहा हां भाभी जल्दी जल्दी मारो, और तेज और तेज हां भाभी तेरे हाथ में लण्ड बड़ा मज़ा कर रहा है . ऊई , ओ' ओहो, आ, ऊ , हूँ, आ, आहा ओ हो, उई लो भाभी मैं झड गया . भाभी जबान निकाल कर मेरा लण्ड चाटने लगी

.मैंने कहा लो भाभी, मैं तेरी बुर अभी चोद नहीं पाया ? भाभी बोली ऐसा पहली बार होता ही है . बुर तो दूसरी बार ही लण्ड खड़ा करके चोदी जाती है पगले ? अब नंबर आएगा बुर चोदने का ?

उस दिन मैंने तीन बार चोदा भाभी को . मैंने कहा हां अब आया है मज़ा होली का . होली में लण्ड और चूत दोनों बड़ी मस्ती में होते है .होली में बुर सबको अच्छी लगती है . .

यह सही बात है--
 
होली में जम कर

प्रेषक : नैनसी

हाय रीडर्स. में आप के लिये एक और कहानी लेकर आई हूँ मुझे आशा है की ये आप को बहुत पसन्द आयेगी ससुराल मे यह मेरी पहली होली थी. शादी को 8 महीने हो चुके थे. होली वाले दिन सुबह से ही में बेकरार थी. दरअसल आज अपनी माँ के घर पर जाने का मौका जो मिल रहा था. ऊपर से में होली भी बड़ी धूमधाम से मनाती हूँ. सुबह करीब 10.30 बजे में और मेरा पति हमारे घर पहुँचे. हमारे घर पर सब लोग बड़ी बेसब्री से हमारा इन्तजार कर रहे थे. वहा पहुँचने पर हमारा जोरदार स्वागत हुआ. मेरी बहनों और मेरी सहेलियो ने हम दोनो को रंगो से बुरी तरह रंग दिया. में पूरी तरह से रंग में हो गयी थी.

मैने उस वक़्त एक सफेद टी-शर्ट और जीन्स पहन रखी थी. टी-शर्ट भीग कर मेरे कपड़ो से चिपक गयी थी और मेंरी ब्रा चमकने लगी थी. मेरी माँ ने मुझे इशारा किया और ऊपर के कमरे में जा कर कपड़े बदलने को कहा. में ऊपर छत पर चली गयी और दरवाजा बंद करके कमरे की लाइट चालू करके जैसे ही मैने अपनी टी-शर्ट उतार कर फैंकी, दीवार के पीछे से कोई निकल कर मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. ये रोहित था. उसे देख कर मेरे होश उड़ गये पर फिर खुद को संभाल कर पास पड़ी चादर से अपनी ब्रा को ढकते हुये मैने उससे कहा, “तू यहा क्या कर रहा है?”

कुछ नही मेरी जान. तुझे मिलने को आया हूँ. और क्या तू ये चादर से खुद को ढक रही है. ज़रा मुझे भी तो देख लेने दे अपनी ये कातिल जवानी.” उसने जवाब दिया.

“तू जाता है यहा से या में माँ को बुलाऊँ.” मैने कहा.

“हाये हाये… कैसे नखरे कर रही है. वो दिन भूल गयी, जब हर दुसरे दिन खुद ही मेरे सामने नंगी हो जाया करती थी.” उसने बड़ी बेशर्मी से कहा.

में कुछ बोलती इससे पहले वो मेरे पास आ गया और मेरे कंधे पर पड़ी चादर उठा कर एक तरफ फैंक दी. फिर बोला, “देख नैनसी, एक बार तुझे नंगी देख लू तो चला जाऊंगा. और तुझे वादा है की तुझे टच भी नही करूँगा.”

में फँस गयी थी. दरअसल रोहित मेरा कजन था और शादी से पहले का यार भी था और में करीब साल भर तक उसके साथ सेक्स का खेल खेलती रही थी. उसने ही मुझे जवानी का असली मज़ा लेना सिखाया था. पर अब में एक शादीशुदा औरत थी. किसी और की बीवी थी.

में थोड़ी देर तक चुपचाप खड़ी सोचती रही और फिर उससे बोली, “देख रोहित, तू सिर्फ़ देखेगा. करेगा कुछ नही.”

“तेरी कसम नैनसी…” वो बोला.

में उसकी तरफ घूमी और अपनी जीन्स खोल कर एक तरफ डाल दी. अब में सिर्फ़ ब्रा और पेन्टी में उसके सामने थी. काले रंग की मेंचिंग ब्रा और पेन्टी मेरे गोरे बदन पर क़यामत ढा रही थी. मेरी ब्रा मेरे साइज़ से छोटी थी और मेरे बूब्स उसमे समा ही नही रहे थे और मानो बाहर आने को बेताब थे. ऊपर से ब्रा के नेट के कपड़े में से मेरे हल्के भूरे निपल्स भी झाँक रहे थे.

फिर मैने अपनी पेन्टी भी उतार कर एक तरफ रख दी. उसके बाद जब मैने अपनी ब्रा उतारी तो मेरे दोनो भारी भारी बूब्स बाहर उछल पड़े. उनकी थिरकन देख कर वो मदहोश हो गया. उसने मुझे इशारा किया. मैने अपनी ब्रा उसकी तरफ उछाल दी.

उसने मेरी ब्रा लपक ली और उसे सूंघ कर बोला, “क्या बात है साली, तेरे बूब्स तो काफ़ी बड़े और भारी हो गये हैं. लगता है तेरा पति जी भर कर मसलता है इनको.”

फिर अपनी जगह पर खड़ा होता हुआ बोला, “नैनसी मेरी जान, मुझ से रहा नही जा रहा. एक बार अपनी जवानी का रस मुझे पीला दे.”

मैने कहा, “देख रोहित, तुने वादा किया था की तू सिर्फ़ देखेगा. कुछ करेगा नही.”

“कुतिया ऐसे वादे तो में पहले भी करता था और उसके बावजुद तू खुद आ कर मेरे नीचे पड़ती थी.”

“तब की बात और थी रोहित. तब में कुंवारी थी पर अब एक शादीशुदा औरत हूँ. प्लीज़ तू जा यहाँ से.”

“नैनसी, ये तो और भी अच्छा है की तू अब शादीशुदा है. अब तो तेरे पास लाइसेन्स है खुल कर ये खेल खेलने का.” इतना कह कर वो मेरे पास आ गया. में पलटी तो उसने मेरी कमर में हाथ डाल कर मुझे अपनी और खींच लिया. मेरी पीठ उसकी तरफ थी और उसने तुरन्त ही मेरे दोनो बूब्स पकड़ लिये. वही उसका खड़ा लंड में अपनी गांड की दीवार में रगड़ ख़ाता महसूस कर सकती थी.

में खुद को उससे छुडवाने की कोशिश करने लगी पर उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी. वो बुरी तरह मेरे बूब्स को मसल रहा था और कह रहा था, “साली रांड़, शादी के बाद मस्त हो गयी है. बूब्स का साइज़ भी बड़ गया है और तेरी गांड भी गोल सी हो गयी है. बहनचोद किसी ब्लू फिल्म की रांड़ जैसी लग रही है. आज तो तुझे चोद के ही रहूगां.

वो ठीक ही कह रहा था. असल में में हो भी कुछ कुछ वेसी ही हो गयी थी. थी तो में शादी से पहले भी सेक्सी पर शादी के बाद तो में और ज़्यादा मस्त हो गयी थी. हालाँकि मेरा पति चुदाई में कोई खास एक्सपर्ट नही था और 10 मिनिट में मुश्किल से मुझे 1-2 बार ही ठंडी कर पाता था पर वो दिन रात मेरे बदन से खेलता था. तो मेरे 32 साइज़ के बूब्स अब 34 के हो गये थे. मेरा शरीर भी भर गया था और मेरे अंग अंग पर निखार सा आ गया था.

जिस तरह से रोहित मेरे बूब्स मसल रहा था और उनके निपल्स से खेल रहा था में गर्म सी होने लगी थी. उपर से उसकी पेन्ट मे कसा लंड मेरी गांड के छेद मे रगड़ ख़ाता बड़ा लंड मुझे और मदहोश कर रहा था. मेरे बूब्स टाइट हो गये थे और उनके निपल्स भी तन गये थे. मेरे मुँह से हल्की हल्की सिसकारियां निकलने लगी थी और अब मैने उसे अपने से दूर करने की कोशिश करनी बंद कर दी थी, बल्कि मैने अपने हाथ उसके हाथो पर रख दिये थे और अपनी गांड पीछे को निकाल कर उसका लंड अच्छे से महसूस करने लगी थी.

जब में पूरी तरह से गर्म हो गयी तो मै पलटी और उसकी तरफ मुँह करके खड़ी हो गयी. अचानक ही उसके बालो मे हाथ फँसा दिया और उसे किस करने लगी. उसने भी मेरे बाल पकड़ लिये और बस फिर हम एक दूसरे की जीभ चुस रहे थे. वही मैने एक हाथ से पेन्ट के उपर से उसका खड़ा लंड पकड़ा हुआ था और उसे सहला रही थी.

रोहित से में शादी से पहले भी कई बार चुद चुकी थी और मुझे मालूम था की वो चुदाई मे एक्सपर्ट था. ऊपर से उसका लंड भी मेरे पति के लंड से करीब 1.5 गुना बड़ा था. थोड़ी देर बाद हम अलग हुये और में उसके सामने घुटनो पर बैठ गयी. उसकी पेन्ट की चैन खोल कर उसका बड़ा लंड बाहर निकाला और उसे चाट कर बोली, “रोहित, बड़े दिन हो गये है लंड लिये हुये.”

“क्यो तेरा पति तुझे चोदता नही है क्या.” उसने पूछा.

“ऐसी बात नही है पर तेरे लंड के हिसाब से देखे तो उसके पास लुल्ली है. और वो सिर्फ़ चूत मारने का शौकीन है जब की तुझे तो पता है की में तो अपने बूब्स चुदवाती हूँ चूत और गांड में भी लंड लेती हूँ और लंड की मलाई की तो में दीवानी हूँ. तो तू बता मुझे मज़ा कैसे आता होगा पर साले से कह भी तो नही सकती.” इतना कह कर मैने उसका लंड मुँह मे भर लिया और अभी उसे चुसना शुरू किया ही था की दरवाजे पर किसी ने लॉक किया. में तुरन्त सीधी हो गयी और रोहित को अलमारी के पीछे छुपा दिया.

फिर अन्दर से ही अवाज़ लगाई, “कौन है.”

“अरे नैनसी में हूँ.” ये मेरे पति की अवाज़ थी.

“जी में कपड़े बदल रही हूँ.” मैने कहा.

“तो क्या हुआ. दरवाजा खोल और मुझे अन्दर आने दे. मेरे सामने कपड़े बदल लेना.” उसने कहा.

मैने धीरे से दरवाजा खोला तो वो अन्दर आ गया. में नंगी ही उसके सामने खड़ी थी. वो मुझे देख कर बोला, “नैनसी मेरा बड़ा दिल कर रहा है तेरी चूत मारने का.”

“दिल तो मेरा भी कर रहा है चुदाई करवाने का पर क्या करूं. सब लोग है घर पर.” मैने जवाब दिया.

उसने मुझे बाहों मे भर लिया और मेरे बूब्स मसलते हुये बोला, “पाँच मिनिट ही तो लगेंगे. मार लेने दे ना मुझे एक बार अपनी चूत.”
 
मैने उसे पीछे धकेलते हुये कहा, “जाओ भी. कोई आ गया तो मुसीबत हो जायेगी. बाद में घर जाकर सारी रात नंगी ही रखना मुझे. फिर जी भर के मारना मेरी चूत…..”

इतना कह कर मैने उसे किसी तरह कमरे से बाहर निकाला और दरवाजा बन्द कर दिया. तब रोहित अलमारी के पीछे से निकल कर मेरे पास आ गया और एक बार फिर मुझे पकड़ लिया और किस करने की कोशिश करने लगा. उसका लंड अब भी पेन्ट से बाहर था. मैने उसका खड़ा लंड पकड़ कर हिलाते हुये कहा, “देख रोहित अभी कोई भी आ सकता है. तो बाद मे……..”

“हट रंडी, अब मेरा मन बना है तुझे चोदने का और तू कह रही है बाद मे.”

“तो ठीक है.. में मम्मी से पूछती हूँ की वो ही कोई प्रोग्राम बना दे हम दोनो का…” इतना कह कर में कपड़े पहन कर और नीचे आ गयी.

मम्मी किचन मे थी. में तुरन्त अपनी माँ के पास किचन मे गयी और उससे कहा, “मम्मी, रोहित मिला था छत पर.”

“मुझे पता है. बड़ी ज़िद कर रहा था. तो मैने ही उसे ऊपर भेजा था और इसीलिए तुझे भी ऊपर जा कर ही कपड़े बदलने को कहा था.” मम्मी ने जवाब दिया.

तो मैने माँ से कहा कोई सेटिंग करवा दे. तेरी कसम जब से शादी हुई है ढंग से ठुकाई नही हुई मेरी. पूरा शरीर तड़पता है किसी सही मर्द के लिये. आज में भी इन्जॉय करने के मूड मे हूँ. ऊपर से रोहित ने अपना बड़ा लंड दिखा कर पागल कर दिया है.” इतना कह कर मैने अपनी माँ को आँख मारी.

दरअसल मेरी माँ एक चुदक्कड़ किस्म की औरत है जो की किसी जमाने मे हमारे इलाक़े की सबसे सेक्सी और रंडी हुआ करती थी. कई मर्दो से उसके नाजायज़ संबंध थे और आज भी है. अपने बचपन मे मैने कई बार अपनी माँ को बाहर वालो के लंड लेते देखा है. में अपनी माँ के बारे मे सब कुछ जानती हूँ और कई बार मैने इसका फायदा भी उठाया है. कही ना कही मेरे रंडी बनने मे मेरी माँ का बहुत बड़ा हाथ है. यहा तक की मैने और मेरी माँ ने कई बार एक साथ एक ही लंड से भी चुदी हैं. जहा तक रोहित का सवाल है तो वो मेरे मामा का बेटा है और वो सिर्फ़ मेरा ही यार नही है, कई बार वो मेरी माँ को भी चोद चुका है. में और मेरी माँ आपस मे बिल्कुल खुली हुई हैं और चूत लंड की बातें बड़े खुल कर करती हैं.

मम्मी ने हंसते हुये कहा, “कोई बात नही. मेरी रंडी बेटी को आज बाहर वाला लंड ही चोदेगा.” फिर मेरी तरफ देख कर बोली, “लेकिन उस दिन जब मैने तुझे कहा था की मेरी एक पार्टी निपटा दे तब तो बड़ी सती सावित्री बन रही थी की नही माँ अब में शादीशुदा औरत हूँ. रांड़ तू है उस दिन में कम से कम 50 हज़ार कमा लेती.”

मैने हंसते हुये कहा, “सॉरी मम्मी, आज के बाद तू जिस किसी से चुदने को कहेगी, में ना नही करूँगी.”

ये सुनकर मम्मी ने अपना फोन उठाया और किसी को फोन लगाया, “तुझे जवान लड़की चाहिये थी ना. इन्तजाम हो गया है. कल रात की बुकिंग कर ले.”

उधर से पता नही क्या अवाज़ आई पर फोन काटने के बाद मम्मी ने मुझे कहा, “कल रात को चुदने के लिये तैयार रहना. इस बार कोई नाटक नही चाहिये.”

उसके बाद मम्मी ने रोहित को फोन करके कुछ समझाया. फिर मुझे बोली, “जा इन्जॉय कर. तेरा काम हो गया.”

करीब 12.30 बजे रोहित हमारे घर आ गया. उस वक़्त तक मेरा बाप अपने दोस्त के घर चला गया था जहा उसका दारू पीने का प्रोग्राम था. वही मेरी सब सहेलियां भी अपने अपने घर चली गयी थी और अब घर पर में, मेरा पति, मेरी माँ और रोहित ही थे.

रंग से खेलने के बाद रोहित और मेरे पति ने पीने का प्रोग्राम बनाया. बस में समझ गयी की मेरा काम बन जायेगा. वो दोनो ड्राइंग रूम मे बैठे थे और दारू पी रहे थे. रोहित ने मेरे पति के गिलास मे दो नशे की गोलियाँ मिला दी थी और थोड़ी ही देर बाद मेरा पति भी बेहोशी की हालत मे हो गया था. तब रोहित ने मुझे आवाज़ लगाई.

में और मम्मी ड्राइंग रूम मे आ गये और उसके पास खड़ी हो गयी. उसने मुझे खींच कर अपने पैरो पर बिठा लिया और मेरे एक बूब्स को ज़ोर से मसल कर बोला, “कभी अपने पति के सामने किसी और से चुदने के बारे मे सोचा है.”

में कुछ जवाब देती इससे पहले ही मम्मी बोल पड़ी, “चोद ले बेटा… इसे इसके पति और माँ के सामने चोद ले.”

अब तक रोहित मेरी टी-शर्ट उतार कर एक तरफ फैंक चुका था और मेरी ब्रा का एक स्ट्रॅप मेरे कंधे से उतार कर मेरा एक बूब्स निकाल कर मसल रहा था. मैने अपनी ब्रा की हुक खोल कर अपने पति की तरफ फैंक दी और रोहित ने मेरे दोनो बूब्स पकड़ लिये.

तब मैने रोहित से कहा, “बहनचोद सिर्फ़ दबायेगा ही या चुसेगा भी इनको.”

इतना कह कर में खड़ी हुई और घूम कर उसकी तरफ मुँह करके उसकी गोद मे बैठ गयी. अब उसका लंड मेरे नीचे दब रहा था और में उस पर अपनी चूत रगड़ रही थी वही उसने मेरा एक बूब्स पकड़ लिया था और उसके निपल को मुँह मे ले कर चुसने लगा था. मैने उसका सर पकड़ रखा था और उसे अपने बूब्स पर दबा रही थी.

मम्मी हमारे पास खड़ी थी पर मुझे उसकी कोई शर्म नही थी. दरअसल मुझे तो इस वक़्त बस लंड चाहिये था. जी भर के उसे अपने बूब्स चुसवाने के बाद में खड़ी हो गयी और अपने कपड़े उतारने लगी. इस बीच मम्मी उसके सामने ज़मीन पर बैठ गयी और उसका लंड निकाल कर चाटने लगी.

कपड़े उतार कर में नंगी हुई और मम्मी की इस हरकत पर मुझे गुस्सा आ गया. मैने चिल्लाते हुये उसे कहा, “ओ रांड़, कुछ तो शर्म कर. अपनी बेटी के माल पर ही हाथ साफ कर रही है.”

“हट रंडी , तेरा माल तो वहा बेहोश पड़ा है और जिस लंड से में खेल रही हूँ वो मेरे यार का है. तुझे चाहिये तो तू भी ले ले. पर हक़ मत जमा. समझ गयी कुतिया.” माँ ने उसका लंड मुँह से निकालते हुये कहा.

“मम्मी प्लीज़…. इस वक़्त मुझे लंड की ज़्यादा ज़रूरत है.. इससे पहले की मेरा पति होश मे आये. में इस लंड का पूरा मज़ा लेना चाहती हूँ. तू तो मेरे जाने के बाद भी रोहित का लंड ले सकती है…..प्लीज……”

“आ गयी ना अपनी औकात पर..” इतना कह कर मम्मी वहा से खड़ी हो गयी और अब में मम्मी की जगह आ कर रोहित के सामने बैठ गयी. उसके बड़े लंड को पकड़ कर में चाटने लगी और फिर धीरे से उसे अपने मुँह मे भर लिया. उसके बाद तो में मानो पागल सी हो गयी और बड़ी तेज़ी से उसका लंड चुसने लगी. में उसका लंड गले तक अपने मुँह मे ले रही थी. फिर अचानक ही रोहित ने मेरे बाल पकड़ लिये और मेरा मुँह चोदने लगा. मेरे मुँह से गू गू की आवाज़े आ रही थी.
 
फिर अचानक ही रोहित ने अपना लंड मेरे मुँह से निकाल लिया मुझे अपने सामने खड़ा करके मेरी माँ से बोला, “बुआ, देख ये रांड़ कैसी मस्त जवान हो गयी है ना. बूब्स भी पहले से भारी हो गये है और गांड भी भर गयी है.”

मम्मी ने मेरे पास आ कर कहा, “हाँ रोहित, ये तो सच मे मस्त हो गयी है. अब तो इसके पैसे भी मन मर्ज़ी के मिलेंगे. अगर अब ये धन्धे पर लग जाये तो पूरे शहर मे इससे मस्त रंडी नही मिलेगी.”

रोहित का लंड मेरे थूक से सना हुआ चमक रहा था. में फिर से उसके सामने बैठ गयी और इस बार उसका लंड अपने बूब्स में फँसा लिया. रोहित ने मेरे दोनो बूब्स पकड़ लिये और मेरे बूब्स चोदने लगा. अब तक मेरी चूत से रस की धार बहने लगी थी और मेरे लिये बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था. तो में खड़ी हो गयी और उसका लंड पकड़ कर उसे अपनी चूत पर रख कर उसकी गोद में बैठ गयी. पूरा लंड मेरी चूत मे समता चला गया.

मेरे मुँह से सिसकारियां निकलने लगी.”आआआआअहह………. म्‍म्म्ममममममममममाआआआआआआआआआआआअ…………. रोहित तेरा लंड बड़ा मस्त है रे………. बड़े दिनो बाद मिला है ऐसा लंड………………… मेरी चूत की प्यासस्स्स्स्सस्स……… बुझा दे रे मेरे राजा………. एयाया…..हह………..”

में उसके लंड पर उछलते हुये चिल्ला रही थी. रोहित भी नीचे से धक्के लगा रहा था. करीब 3-4 मिनिट तक उसी हालत में मुझे चोदने के बाद उसने मुझे अपने ऊपर से उठा दिया. फिर मुझे सोफे पर बिठा कर मेरे सामने बैठ गया और मेरी चूत के होठों को अपनी उंगलियों से फेलाता हुआ बोला, “नैनसी डार्लिंग क्या चूत है तेरी… खा जाने को दिल कर रहा है….”

मैने उसका सर पकड़ कर अपनी चूत की तरफ धकेलते हुये कहा, “तो खा ले ना…. तुझे मना कहा किया है…..”

जैसे ही उसकी जीभ ने मेरी चूत को टच किया मेरी चूत ने रस की धार छोड़ दी. मेने उसका सर अपनी जांघो मे फँसा लिया और गांड उछाल उछाल कर अपनी चूत उससे चटवाने लगी. बस 2 ही मिनिट मे में झड़ने लगी.

तब वो मेरे सामने खड़ा हो गया और मेरी चूत पर अपना लंड रख कर एक ही झटके मे अपना लंड मेरी चूत मे डाल दिया.

में चिल्ला पड़ी, ‘क्या कर रहा है मादरचोद…. फाड़ेगा क्या मेरी…. प्यार से मार हरामजादे…….. तेरे लिये ही खोल कर पड़ी हूँ अपनी….. आआआआअ………..हह…………….. म्‍म्म्मममममममम ……………….. म्‍म्माआआआआआआआ………………….. ”

साथ साथ अपनी गांड को नीचे से उछालते हुये उसके हर धक्के का जवाब भी दे रही थी. जब वो लंड अन्दर डालता तो में अपनी चूत को फैला देती और जब वो बाहर निकलता तो में अपनी चूत को कस लेती थी. इस तरह में चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थी.

वही दूसरी तरफ मेरी माँ ने मेरे पति की पेन्ट खोल कर उसका लंड निकाल लिया और उसे चूसने लगी. में चिल्लाई, “ओ रांड़… क्या कर रही है…..”

“तू चुद रही है और में चुपचाप खड़ी देखती रहूँ क्या…. मुझे भी लंड लेना है… फिर क्यो ना अपने दामाद के लंड को अपनी चूत में ले लू….” मम्मी ने हंस कर जवाब दिया.

तभी रोहित ने मेरी एक टाँग उठा कर अपने कंधे पर रख ली. वो पूरे जोर से मुझे चोद रहा था और मेरे बड़े बड़े बूब्स हर धक्के के साथ हिल रहे थे. मैने अपने बूब्स पकड़ लिये और एक बूब्स का निपल अपनी जीभ से चाटा. फिर निपल्स को उंगलियो से मसलने लगी.

रोहित ने मुझे घोड़ी बना दिया और पीछे से मेरी चूत में अपना लंड डाल दिया. अब वो मुझे किसी कुतिया की तरह चोद रहा था. में पूरी मस्ती मे उसके बड़े लंड का मज़ा अपनी चूत मे ले रही थी. इस बीच में 2 बार झड़ चुकी थी और रोहित भी झड़ने के करीब था. तभी उसने अपना लंड मेरी चूत से निकाला और मेरे सामने आ कर मेरे मुँह मे डाल दिया. मेने उसका लंड पकड़ लिया और ज़ोर से हिलाने लगी. तभी उसके लंड ने वीर्य की धार छोड़ दी और मेरा पूरा मुँह उसके लंड की मलाई से भर गया. मेरे मुँह मे, चेहरे पर और बालो मे भी उसके लंड का माल लगा हुआ था. जिसे मेने बड़े प्यार से अपनी उंगलियो से साफ करके खाया.

वही मेरी माँ अब मेरे पति का लंड चुस कर झड़ चुकी थी और अब हमारे पास आ गयी. रोहित मेरे बगल मे लेटा था. मेरी माँ ने सोफे के किनारे पर बैठते हुये रोहित का लंड पकड़ा तो रोहित ने कहा, “बुआ…. आज नही…. आज तो नैनसी को चोदुंगा सिर्फ़…”

“चोद तो लिया है अब….” मम्मी ने खीचते हुये कहा.

रोहित ने मुझे उल्टा लेटा दिया और मेरे गांड के छेद मे उंगली करते हुये बोला, “बुआ तेरी लड़की का हर छेद मस्त है…. अभी तो इसकी गांड मारनी बाकी है….”

तब में रोहित की तरफ देख कर हँसी… करीब 5 मिनिट के बाद में उसका लंड फिर से पकड़ कर हिलाने लगी. उसका लंड फिर से तैयार था. पर इस बार जब उसने मुझे घोड़ी बनाया, मैने अपने पैरो को फैला कर अपनी गांड खोल दी. उसने मेरी गांड के छेद पर क्रीम लगाई और फिर अपना लंड टीका कर एक ही झटके मे अपना लंड मेरी गांड मे डाल दिया.

अब में अपने यार से गांड मरवा रही थी. में पूरी मस्ती मे चिल्ला रही थी, “रोहित…. एयाया…. हह……. गांड कैसी लगी मेरी…… शादी के बाद पहली बार गांड मरवा रही हूँ…. बहुत तड़पती हूँ गांड मे लंड लेने को…… चोद दे मेरी गांड….. फाड़ दे इसको…. मार ले मेरी गांड…. आआआ हह………..आआआ………हह……………..”

रोहित ने मेरे नाचते हुये दोनो भारी बूब्स पकड़ रखे थे और उनके निपल्स मसलता हुआ मेरी गांड मार रहा था.. वही में अपनी चूत को अपने एक हाथ से खोद रही थी…. थोड़ी देर बाद रोहित ने मेरी कसी हुई गांड मे ही अपना लंड झाड़ दिया और हम दोनो सोफे पर ही लेट गये…

फिर मैने रोहित का लंड चाट कर साफ किया. आधे घंटे बाद रोहित ने एक बार फिर मुझे पकड़ लिया और एक बार फिर मुझे चोदा.. अपने पति के होश में आने तक में करीब 5 बार झड़ चुकी थी और बुरी तरह थक गयी थी. तुम सब के लंड की प्यासी… भारी बूब्स और मस्त गांड वाली तुम्हारी रंडी नैनसी. मुझे आशा हे की तुम्हे मेरी यह कहानी जरुर पसन्द आई होगी.

 
ननद ने खेली होली--1

सबसे पहले तो मुझे अप सब लोगों का धन्यवाद देना चाहिए की अप ने किस तरह से मैंने अपनी किशोर ननद को ट्रेन किया ....लेकिन अचानक हम लोगों को वापस आना पड़ा| जैसा की तय हुआ था की होली में जब हम लोग आएंगे तब तक उस का इन्ट्र्कोरस मेरा मतलब है इंटर का कोर्स खत्म हो चुका होगा और वो साल भर के लिए हम लोगों के पास आके रहेगीं जब हम उस की अच्छी तरह कोचिंग करायेंगें|

शादी में आप सब को ये भी याद होगा की मेरी ननद गुड्डी ने अपने जीजा जित से भी वादा किया था की ....इस साल जब वो होली में आयेंगे तो वो उनसे जम के होली खेलेगी,और आखिर खेलेगी भी क्यों नहीं, क्यों की उन्होंने ही तो उसकी सील पहले पह्लाल तोडी थी, और उस के बाद जो उसने चलना शुरू किया तो अपने प्यारे भइया और मेरे सेक्सी सैंया के साथ चुदावा के दम लिया. लेकिन वादा होली का इस लिए भी था की जब वो नौवें में थी और जीत उस के जीजा पहली बार होली खेलने आये तो , होली में जीत का हाथ साली के चिकने गाल से फिसल के फ्राक के अन्दर नए उभरते मॉल तक पहुँच गया और एक बार जब जीजा का हाथ साली के मॉल तक पहुँचा जाय, मामला होली का हो, भंग की तरंग का हो, तो बिना रगडन मसलन के ....लेकिन बुद्धू साली बुरा मान गई ....और वो तो जब शादी के माहोल में अपनी उस बुद्धू ननद को बुर के मजे के बारे में बताया तो ख़ुद वो अपने जीजा से सैट और पट गई ....लेकिन ये सारी बातें तो मैं आपको बता ही चुकी हूँ ननद की ट्रेनिंग में ....अब दास्ताँ उसके आगे की ....कैसे होली में हम फ़िर दुबारा उनके , राजीव के मायके गए, और राजीव मेरी ननद कम .गुड्डी के लिए तो ललचा रहे ही थे, मेरी नई बनी बहन और अपनी एक लौटी छोटी साली, मस्त पंजाबी कुड़ी अल्पना और ....उस से भी ज्यादा उस की छोटी बहन कम्मो के लिए, जिसके लिए मैंने कहा था की होली में जब आयेंगे तो ....मैं उस की भी दिल्वौंगी . तो क्या हुआ जब होली में मैं अपने ससुराल गई साजन के साथ और कैसे मनी होली मेरी ननद की ....तो ये साडी दस्ताना ....ननद ने खेली होली ...

राजीव बड़े बेताब थे और बेताब तो मैं भी थी .होली का मजा तो ससुराल में ही आता है ....ननद, नन्दोई, देवर ....और एक तरह से अब वो उनकी भी ससुराल ही हो गयी थी ....नहीं मैं सिर्फ़ उनके माल के बारे में बात नहीं कर रही थी, आख़िर वहाँ मेरी मुंहबोली छोटी बहन अल्पी भी तो थी ....जिसने ना सिर्फ़ उनकी साल्ली का पूरा पूरा हक़ अदा किया था, बल्की मेरी ननद को फंसाने पटाने में भी ....और उसकी छोटी बहन कम्मो ....थी तो अभी कच्ची कली ....लेकिन टिकोरे निकालने तो शुरू ही हो गये थे और जब से उन्होंने एक सेक्स सर्वे में ये पध्हा था की मंझोले शहरों में भी २ फीसदी लडकियां अपना पहला सेक्स संबध १४ से १६ साल की उमर में बना लेती हैं तो बस ....एक दम बेताब हो रहा था उनका हथियार. मैं चिढाती भी थी ....तय कर लो होली किसके साथ खेलनी है मेरी छिनाल ननद गुड्डी के साथ या सेक्सी साली अल्पी के साथ या सबसे छोटी साली उस कमसिन कम्मो के साथ .तो वो हंस के बोलते तीनों के साथ।

और मैं हंस के बोलती लालची ....और गप्प से उनके मोटे मस्ताये लंड का सुपाड़ा गडप कर लेती.

तो हम लोग पहुँच गये होली के ६ दिन पहले ससुराल मैं ये नहीं बताऊंगी की होली के पहले मैंने क्या तैयारी की, भांग की गुझिया, गुड्डी, अल्पी और कम्मो के लिए खूब सेक्सी ड्रेसेस और भी बहोत सारी चीजें ....ये सब मैं अपने सुधी पाठकों के लिए छोड़ती हूँ, होली का किस्सा सुनाने की जल्दी मुझे भी है और सुनाने की बेताबी आपको भी ....हाँ एक बात जरुर ज़रा कान इधर लाइये थोडी प्राइवेट बात है ....ससुराल पहुँचने के पहले बेचारे वो पाँच दिन पूरे उपवास पे थे...मेरी मासिक छुट्टी जो थी, और मैं बस उनसे ये कहती थी अरे चलिए ना वहाँ मेरी ननद बेताब होगी, इस होली में अपने भैया की पिचकारी का सफ़ेद रंग घोंटने के लिए.

सबसे पहले रास्ते में अल्पी का घर पङता था. मैंने कहा, पहले अल्पी के यहाँ रुक लेते हैं, वो बिचारी बेताब भी होगी और उसके लिए जो गिफ्ट लिया था वो दे भी देंगें।

उनकी तो बांछे खिल गयीं...अरे नेकी और पूछ पूछ...और गाडी उस के घर की और मोड़ ली।

शाम होने को थी, उसके घर पहुँच के हमने दस्तक दी, और दरवाजा खोला कम्मो ने,

सफ़ेद ब्लाउज और नेवी ब्लू स्कर्ट में क्या गजब लग रही थी. राजीव बिचारे उनकी निगाहें तो बस दोनों...अब टिकोरे नहीं रह गये थे....कबूतर के बच्चे...और चोंचें भी हल्की हल्की ...टेनिस बाल की साइज...

अल्पी है....दरवाजे पे खडे खडे उन्होंने पूछा।

और अगर मैं कह दूँ नहीं है तो....बढ़ी अदा से अपने दोनों हाथ उभारों के नीचे क्रॉस कर उन्हें और उभारते हुए वो आँख नचा के बोली, तो क्या फ़िर आप अन्दर नहीं आयेंगें. और फ़िर दोनों हाथों से उनका हाथ पकड़ के बडे इसरार से बोली,

जीजू अरे अन्दर आइये ना,कब तक खडे रहेंगे बाहर और फ़िर आख़िर आपकी सबसे छोटी साली तो मैं ही हूँ ना.

एकदम....और फ़िर साली अन्दर बुलाए और जीजा मना कर दे ये तो हो नहीं सकता. राजीव कौन सा मौका चुकने वाले थे. वो बोले और हम दोनों अन्दर घुस गये।

असल में जीजी एक गाइड कैंम्प में गयी है, कल दोपहर तक आयेगी. मैं भी अभी स्कूल से आई ही हूँ. सोफे पे राजीव के ठीक सामने बैठ के वो बोली. उसने टाँगे एक के ऊपर एक चढ़ा रखी थीं, जिससे स्कर्ट और ऊपर चढ़ गयी. उसकी गोरी गोरी जांघे साफ साफ दिख रही थीं, खूब चिकनी और थोड़ी मांसल भी हो गयी थीं. उसने दोनों हाथों से पकड़ के स्कर्ट थोड़ी नीचे भी करने की कोशिश की पर....

और मम्मी कहाँ हैं...सो रही हैं क्या मैंने पूछा।

जैसे मेरे सवाल के जवाब में फोन की घंटी बज उठी.

अच्छा मम्मी....नहीं कोई बात नहीं....कम्मो बोल रही थी.

हाँ मैं अभी स्कूल से आई...आप ६ सात बजे तक आंटी के यहाँ से आने वाली थीं ना....क्या सब लोग उस के बाद सेल में....हाँ आज तो आख़िरी दिन है....

साध्हे सात, आठ तक....कोई बात नहीं ....अरे मेरी चिंता मत करिये ....अब मैं बड़ी हो गयी हूँ.

धत मम्मी ....कोई बात नहीं दूध पी लूंगी मैं. बाई...और उसने फोन रख दिया. और अब की आके सीधे राजीव के पास ....एक दम सट के बैठ गयी और बोली ....मम्मी का फोन था।

इतना तो हम भी समझ गये थे.

 
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