• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest अनैतिक संबंध

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
शाम से ले कर रात तक आशु मुझसे बात नहीं कर रही थी और मुँह फुला कर घूम रही थी. मैंने एक दो बार उससे बात करनी चाही तो वो बिदक कर चली गई. खाना परोस कर मुझे देने के टाइम भी वो अपनी आँखों से मुझे अपना गुस्सा दिखा रही थी. खाना खाने के बाद वो बर्तन धो रही थी. और उसके बर्तन धोना खत्म हो गया था. वो उठने लगी तभी मैंने अपना जूठा गिलास उसे दिया तो वो बुदबुदाते हुए बोली; "अब घर में आपको सब नहीं दिख रहे जो मुझे गिलास दे रहे हो?" मैं बस मुस्कुराया और वापस आंगन में सबके साथ बैठ गया.रात को सब एक-एक कर अपने कमरों में चले गए बस मैं, भाभी और आशु ही रह गए थे. भाभी का कमरा नीचे था तो वो मेरे सामने से इठलाते हुए गईं जो की आशु ने देख लिया और गुस्से में तमतमाते हुए गिलास नीचे फेंका.भाभी ने उसे ऐसा करते हुए नहीं देखा बस आवाज सुन के उस पर चिल्लाईं; "हाथ में खून है की नहीं!" आशु कुछ नहीं बोली और मेरे सामने से होती हुई सीढ़ी चढ़ने लगी. मैं मिनट भर आंगन में टहलता रहा और फिर ऊपर अपने कमरे की तरफ चल दिया. मैं अपने कमरे में ना घुस कर आशु के कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो कर उसे पलंग पर सर झुकाए बैठा देखने लगा. मैं दो कदम अंदर आया और बोला; "यार मैं सोच रहा हूँ की शादी के बाद अपने हाथ पर लिखवा लूँ: 'आशु का आदमी!'" ये सुन कर आशु हँस पड़ी फिर अगले ही पल कोशिश करने लगी की मुझे फिर से अपना गुस्सा दिखाए पर उस का चेहरा उसे ऐसा करने नहीं दे रहा था. वो हँसना चाह रही थी पर अपना गुस्सा भी दिखाना चाहती थी. वो उठी और आ कर मेरे सीने से लग गई; "आपको पता है मैं बार-बार आपके सीने से क्यों लगती हूँ?"

"हाँ...बहुत बार बताया है तुमने!" मैंने कहा.

"आपके सीने की आँच से मेरे दिल में हो रही उथल-पुथल शांत हो जाती हे. जिस गर्मी के लिए मैं तड़पती हूँ वो बस यहीं मिलती हे." आशु ने फिर से दोहराते हुए कहा.

"चलो अब सो जाओ! सुबह से काम कर कर के थक गए होंगे!" मैंने आशु को खुद से दूर करते हुए कहा.

"ना..आपके सीने से लगते ही सारी थकावट दूर हो जाती हे." आशु फिर से मेरी छाती से चिपक गई. अब मुझे कैसे भी कर के उसे खुद से दूर करना था वरना अगर कोई आ जाता तो बखेड़ा खड़ा हो सकता था.

"माँ.. आप?!!!" मैंने झूठ बोला जिससे आशु मुझसे एक दम से छिटक कर दूर हो गई. पर जब उसने दरवाजे की तरफ देखा और वहाँ किसी को नहीं पाया तो वो गुस्सा हो गई. "सॉरी जान! पर कोई हमें देख लेगा तो बखेड़ा खड़ा हो जायेगा." मैंने उसे मनाते हुए कहा पर वो दूसरी तरफ मुँह कर खड़ी हो गई. मैं पलट के जाने लगा तो वो बोली; "दरवाजा बंद कर के सोना! माँ प्यासी शेरनी की तरह आपका इंतजार कर रही हे." मैंने पलट कर देखा तो आशु की आँखों में जलन साफ़ झलक रही थी. मैं उसे गले लगाने को जैसे ही आगे बढ़ा की आशु एक दम से पलट गई. मुझे डर था की कहीं कोई आ ना जाये इसलिए मैं अपने कमरे में आ गया और दरवाजा बंद कर लिया और लेट गया.मुझे पता था की अगली सुबह मुझे क्या करना है?

सुबह फटाफट उठा और नाहा-धो के तैयार हो गया.सब आंगन में बैठे चाय पी रहे थे की मैंने बात शुरू की;

मैं: ताऊ जी शाम को सारे रावण दहन देखने चलें?

ताऊ जी: सारे क्यों? तुझे जाना है तो जा, यहाँ अपनी छत से सब नजर आता हे.

मैं: पर राम-लीला भी तो देखनी है!

ताऊ जी: नहीं..कोई जरुरत नहीं! वहाँ भीड़-भाड़ में कौन जाएगा!

मैं: हमारे लिए भीड़-भाड़ कैसी? आपको बस मुखिया को एक फ़ोन करना है और राम-लीला की आगे वाली लाइन में सीट मिल जाएगी!

पिताजी: इतने से काम के लिए कौन एहसान ले?

मैं: ठीक है एक मुखिया थोड़े ही है?

मैंने अपना फ़ोन निकाला और जय को फ़ोन किया;

मैं: सुन यार वो राम-लीला की आगे वाली ८ सीटें चाहिए!

संकेत: अबे तू वहाँ आ कर मुझे कॉल कर दीओ सीटें मिल जाएँगी.

मैंने फ़ोन रखा और ताऊ जी और पिताजी मेरी तरफ हैरानी से देख रहे थे.

मैं: होगया जी सीटों का इंतजाम, अब तो सारे चलें?

ताऊ जी: बड़े जुगाड़ लगाने लगा है तू?

पिताजी: शहर में भी यही करता होगा?

मैं आगे कुछ नहीं बोला और चुप-चाप चाय पीने लगा. चूँकि हम अयोध्या वासी हैं तो दशहरे पर बहुत धूम-धाम होती हे. हमारे गाँव के मुखिया हर साल इन दिनों में रामलीला का आयोजन जोर-शोर से करते हे. रावण का एक बहुत बड़ा पुतला बना कर फूँका जाता है, पर हमारे घर का हाल ये था की कोई भी सम्मिलित नहीं होता था. मैं जब छोटा था तब आशु को अपने साथ ले जाया करता था और वो भी जैसे ही रावण के पुतले में आग लगती तो भाग खडी होती! बाकी बचीं घर की औरतें तो वो छत पर खडी हो जातीं और पटाखों का शोर सुन लिया करती. इस बार मैंने पहल की थी तो ताऊ जी मान ही गए, ताई जी. माँ और भाभी खुश थीं और मैं इसलिए खुश था की मेरा आशु को मनाने का प्लान कामयाब होने वाला था.
 
शाम ४ बजे सारे मैदान में पहुँच गए जो की घर से करीब १० मिनट ही दूर था. मैंने जय को इशारे से बुलाया तो उसने पिताजी, ताऊ जी और नारायण भैया को आगे की लाइन में बिठा दिया. मुझे, आशु, भाभी, माँ और ताई जी को उसने पीछे वाली लाइन में बिठा दिया अपनी बीवी और माँ के साथ. इस बार के दशहरे की तैयारी उसी के परिवार ने की थी इसलिए वहाँ सिर्फ उसी का हुक्म चल रहा था. रामलीला शुरू हुई और मैंने सब की नजर बचाते हुए आशु का हाथ पकड़ लिया. पहले तो आशु हैरान हुई पर जब उसे एहसास हुआ की ये मेरा हाथ है तो वो मुस्कुरा दी और फिर से रामलीला देखने लगी. मैं धीरे-धीरे उसके हाथ को दबाता रहा और उसे इसमें बहुत आनंद आ रहा था. हम दोनों रामलीला के खत्म होने के दौरान ऐसे ही चुप-चाप एक दूसरे के हाथ को बारी-बारी दबाते रहे. जब रामलीला खत्म हुई तो बारी है रावण दहन की तो सभी उठ के उस तरफ चल दिये. पर घरवाले सभी वहीँ खड़े हो गए जहाँ हम बैठे थे, इधर आशु को उसकी कुछ सहेलियाँ मिल गईं और वो उनके साथ थोड़ा नजदीक चली गई जहाँ बाकी सब गाँव वाले थे. मैं आशु के पीछे धीरे-धीरे उसी तरफ बढ़ने लगा, "डॉली तू तो शहर जा कर मोटी हो गई है!" आशु की एक दोस्त ने कहा. "चल हट!" डॉली ने उस लड़की को कंधा मरते हुए कहा. "सच कह रही हूँ, ये देख कितना बड़े हो गए हैं तेरे!" ये कहते हुए उसने आशु के कूल्हों को सहलाया. "तेरी स्तन भी पहले से बढ़ गईं हैं...और तेरे होंठ! क्या करती है तू वहाँ शहर में? कोई यार ढूँढ लिया क्या?" आशु ने गुस्से से दोनों को कंधे पर घुसा मारा. "ज्यादा बकवास ना कर मुँह नोच लूँगी दोनों का!" तीनों खड़े-खड़े हँस रहे और उनकी बात सुन कर मैं भी मन ही मन हँस रहा था. जैसे ही दहन शुरू हुआ और पटाखों की आवाज तक हुई मैंने आशु का हाथ पीछे से पकड़ा और उसे खींच कर ले जाने लगा. आशु पहले तो थोड़ा हैरान थी की आखिर कौन उसे खींच रहा है पर जब उसने मुझे देखा तो मेरे साथ चल पडी. भीड़ में कुछ भगदड़ मची क्योंकि सब लोग बहुत नजदीक खड़े थे और ऐसे में जिस किसी ने भी हमें वहाँ से जाते देखा वो यही सोच रहा होगा की ये दोनों शोर सुन कर जा रहे हे.

मैं आशु को घर की बजाये दूर जय के खेतों में ले गया, वहाँ जय के खेतों में एक कमरा बना था जहाँ वो अपना माल छुपा कर रखता था. उस कमरे में आते ही मैंने दरवाजा बंद कर दिया और कमरे में घुप अँधेरा छा गया.मैंने फ़ोन की टोर्च जला कर उसे चारपाई पर रख दिया और आशु के चेहरे को थाम कर उसके होठों को बेतहाशा चूमने लगा. समय कम था. इसलिए मैं जमीन पर घुटनों के बल बैठा गया और आशु को अभी भी दरवाजे के बगल में खड़ा रखा. उसके कुर्ते में हाथ डाल कर उसकी पजामी का नाडा खोला और उसे जल्दी से नीचे सरकाया फिर आशु की योनी पर अपने होंठ रखे. पर तभी उसकी कच्छी बीच में आ गई! मैंने जल्दी से उसे भी नीचे सरकाया और अपनी लपलपाती हुई जीभ से आशु की योनी को चाटा. मिनट भर में ही उसकी योनी पनिया गई और उसने मुझे ऊपर खींच कर खड़ा किया. मैंने उसे गोद में उठाया और चारपाई पर लिटा दिया. में आशु के ऊपर छा गया, दोनों की सांसें धोकनी की तरह चल रही थी. मैंने और देर न करते हुए अपने लिंग को आशु की योनी में ठेल दिया. लिंग सरसराता हुआ आधा अंदर चला गया और इधर आशु ने जोश में आते हुए अपने दोनों हाथों से मुझे अपने जिस्म से चिपका लिया. मैंने नीचे से कमर को और ऊपर ठेला और पूरा का पूरा लिंग जड़ समेत उसकी योनी में उतार दिया. आशु ने मेरे चेहरे को अपने हाथों में थामा और मेरे होठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी. मैंने नीचे से तेज-तेज झटके मारने शुरू किये और ७-८ मिनट में ही दोनों का छूट गया! साँसों को दुरसुत कर दोनों खड़े हुए और अपने-अपने कपडे ठीक किये. आशु और मैं दोनों तृप्त हो चुका थे.उसके चेहरे पर वही ख़ुशी लौट आई थी. बाहर निकलने से पहले उसने फिर से मुझे अपनी बाहों में कैद किया और मेरे होंठों को अपने मुँह में भर के चूसने लगी. मुझे फिर से जोश आया और मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और दिवार से सटा कर उसके निचले होंठ को अपने मुँह में भर के चूसने लगा. मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी और आशु उसे चूसने लगी. तभी मेरा फ़ोन वाइब्रेट करने लगा तो हम दोनों अलग हुए पर दोनों की साँसे फिर से तेज हो चली थीं, प्यार की आग फिर भड़क गई थी. पर समय नहीं था इसलिए मैंने आशु से कहा; "आज रात!" इतना सुनते ही आशु खुश हो गई. मैंने दरवाजा खोला और बाहर आ कर देखा की कोई है तो नहीं, फिर आशु को बाहर आने का इशारा किया. आशु को घर की तरफ चल दी और मैं दूसरे रास्ते से घूमता हुआ घर पहुंचा. घर पर सब आ चुके थे. और बाहर अभी भी थोड़ी आतिशबाजी जारी थी. 'कहाँ रह गया था तू?" माँ ने पूछा. "वो में जय के साथ था." इतना कह कर मैं आंगन में मुँह-हाथ धोने लगा तो नजर आशु पर गई जो अब बहुत खुश थी! रात को खाना खाने के समय भी आशु के चेहरे से उसकी ख़ुशी टप-टप टपक रही थी जो वहाँ किसी से देखि ना गई;

भाभी: तू बड़ी खुश है आज?

ये सुनते ही आशु की ख़ुशी काफूर हो गई.

मैं: इतने दिनों बाद अपनी सहेलियों के साथ समय बिताया है, खुश तो होना ही है!मैंने आशु का बचाव किया, पर भाभी को ये जरा भी नहीं जचा और इससे पहले की वो कुछ बोलती ताई जी बोल पड़ी;

ताई जी: इस बार का दशहेरा यादगार था! वैसे तुम दोनों कहाँ गायब हो गए थे?

भाभी: हाँ...मैंने फ़ोन भी किया पर तुमने उठाया ही नहीं?

ताई जी ने मुझसे और आशु से पुछा, अब बेचारी आशु सोच में पड़ गई की बोले तो बोले क्या? ऊपर से भाभी के कॉल वाली बात से तो आशु सुलगने लगी थी. इसलिए मुझे ही बचाव करना पड़ा;

मैं: आशु तो अपनी सहेलियों के साथ आगे चली गई थी और मैं जय के साथ था. भाभी का फ़ोन आया था पर शोर-शराबे में सुनाई ही नहीं दिया!

ताई जी: अच्छा... वैसे बिटवा तूने आज बड़े सालों बाद रामलीला दिखाई.

अब ताई जी क्या जाने की मेरा असली प्लान क्या था इसलिए मैं बस मुस्कुरा दिया. खाना खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था. तभी आशु ऊपर आई और मुझसे कुछ दूरी पर खड़ी हो गई; "आज रात का वादा याद है ना?" आशु ने मुझे मेरा किया वादा याद दिलाया, मन तो कर रहा था की थोड़ा और मजाक करूँ ये कह के की कौन सा वादा पर जानता था की ये सुन कर आशु बिदक जाएगी! मैंने बस हाँ में सर हिलाया और फिर आशु मुस्कुराती हुई नीचे चली गई. अभी सब लोग आंगन में ही बैठे थे की पिताजी ने मुझे नीचे से आवाज दे कर बुलाया. मैं नीचे आया तो कुछ जरुरी बातें हुई जमीन को ले कर और फिर मुझसे पुछा गया की मैं वापस कब जा रहा हूँ? "कल सुबह" मैंने बस इतना कहा और फिर सब अपने-अपने कमरों में जाने को चल दिये. मैं भी अपने कमरे में आ गया और कुछ देर बाद आशु भी ऊपर आ गई. वो मेरे दरवाजे की चौखट पर हाथ रख खड़ी हो गई; "बारह बजे मैं आपका इंतजार करूँगी!" मैंने बस मुस्कुरा कर हाँ कहा और वो अपने कमरे में चली गई और मुझे उसके दरवाजा बंद करने की आवाज आई. रात बारह बजे तक मैं जागा रहा और फ़ोन में कुछ मैसेज देखने लगा. ठीक बारह बजे मैं उठा और आशु के कमरे का दरवाजा धीरे से खोला, आशु पलंग पर बैठी थी:

आशु मुस्कुराती हुई मेरा ही इंतजार कर रही थी. उसके कमरे में एक लाल रंग का जीरो वाट का बल्ब जल रहा था. उसे ऐसे देखते ही मैं एक पल के लिए दरवाजे पर ही रूक गया और चौखट से सर लगा कर उसे निहारने लगा. मैं धीरे से उसके नजदीक पहुँचा पर नजरें उस पर से हट ही नहीं रही थी. आशु ने अपना दायाँ हाथ बढ़ा कर मुझे अपने पास बुलाना चाहा. मैंने उसका हाथ थाम लिया और फिर उसके पास पलंग पर बैठ गया.मैंने आशु के चेहरे को थामा और उसे किस करने ही जा रहा था की नीचे से मुझे बड़ी जोर की खाँसने की आवाज आई. ये आवाज ताऊ जी की थी जिसे सुनते ही हम दोनों के तोते उड़ गए! मैं छिटक कर आशु के पलंग से खड़ा हुआ और आशु भी बहुत घबरा गई थी और मेरी तरफ डर के मारे देख रही थी. मैंने उसे ऊँगली से छुपा रहने का इशारा किया और धीरे से दरवाजे की तरफ बढ़ा, बाहर झाँका तो वहाँ कोई नहीं था. मैंने चैन की साँस ली, फिर थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए मैंने नीचे आंगन में झाँका तो पाया की ताऊ जी बाथरूम में घुस रहे थे. मैं वापस आशु के कमरे में आया और उसे बताया की ताऊ जी बाथरूम में घुसे हे. अब ये तो साफ़ था की अब कुछ नहीं हो सकता इसलिए मैं दबे पाँव अपने कमरे में आ गया और लेट गया.

रात के एक बजे थे और मुझे झपकी लगी थी की आशु मेरे कमरे में आई और और झुक कर मेरे होठों को चूसने लगी. मैंने तुरंत आँख खोली और जब नजरें आशु पर पड़ीं तो मैं निश्चिंत हो गया और उसके होठों को चूसने लगा. दरअसल मैं दरवाजा बंद करना भूल गया था. इसलिए आशु चुप-चाप अंदर आ गई थी. इधर आग दोनों के जिस्म में भड़क चुकी थी पर कुछ भी करना खतरे से खाली नहीं था! मैंने आशु को रोका और उठ बैठा; "जान! मेरा भी बहुत मन है पर यहाँ घर पर कुछ भी करना ठीक नहीं है! कल कॉलेज की छुट्टी कर ले और फिर वो पूरा दिन हम दोनों एक साथ होंगे!" ये सुन कर आशु का मुंह फीका पड़ गया और वो मुड़ कर जाने लगी. अब मुझसे उसका ये उदास चेहरा देखा नहीं गया, मैं पलंग से उतरा और आशु का हाथ पकड़ कर खींच कर उसे छत पर ले गया.छत की पैरापेट वाल थोड़ी ऊँची थी. करीब ४ फुट की होगी, मैं वहाँ नीचे बैठ गया और आशु को भी अपने पास बिठा लिया. हम दोनों कुछ इस तरह बैठे थे की अगर कोई ऊपर चढ़ कर आता तो हमें साफ़ दिखाई दे जाता पर वो हमें नहीं देख पाता.उससे हमें इतना समय तो मिल जाता की हम एक दूसरे से अलग हो कर बैठ जाये. हाँ वो इंसान जब छत पर आ जाता तो ये सवाल जरूर आता की तुम दोनों छत पर अकेले क्या कर रहे हो? ये वो एक सवाल था जिसका हमारे पास कोई जवाब नहीं होता, पर जब प्यार किया है तो रिस्क तो लेना ही पड़ता हे. सवाल के जवाब में झूठ बोलने के अलावा कोई और चारा नहीं था हमारे पास. खेर मे नीचे बैठा था और अपनी दोनों टांगें 'वी' के अकार में खोल रखी थी. मैंने आशु को ठीक बीच में बैठने को कहा, आशु बैठ गई और अपना सर मेरे सीने से टिका दिया. हम दोनों ही आसमान में देख रहे थे. चांदनी रात में टीम-टिमाते तारे देखने का मजा ही कुछ और था. ऊपर से चारों तरफ सन्नाटा और हलकी-हलकी हवा ने समा बाँध रखा था.

आशु: जानू! आपको पता है आज क्या हुआ?

मैं: क्या हुआ? (मैंने आशु के गाल को चूमते हुए कहा)

आशु: ससस... मेरी सहेलियाँ कह रही थी की मैं मोटी हो गई हूँ? मेरी नितंब , स्तन और मेरे ओंठ मोटे हो गए हैं, और ये सब आपकी वजह से हुआ है?

मैं: शिकायत कर रही हो या कॉम्पलिमेंट दे रही हो?

आशु: कॉम्पलिमेंट

मैं: आई फील यू आर रेडी टू बी अ मदर!

आशु: सच? तो कब बंद करूँ वो प्रेगनेंसी वाली गोली लेना? (उसने मजाक में कहा.)

मैं: पागल! (मैंने आशु के दूसरे को गाल को चूमते हुए कहा.)

आशु: ससस... सच्ची जानू! आपने मेरे बदन को तराशने में बड़ी मेहनत की है!

मैं: हम्म्म... (मैं आशु की जुल्फों की महक सूंघते हुए बोला.)

अब आशु ने अपने दाहिने हाथ को मेरी जाँघ पर रख उसे सहलाने लगी जिसका सीधा असर मेरे लिंग पर हुआ. उसे फूल कर खड़ा होने में सेकंड नहीं लगा और वो आशु की कमर पर अपनी दस्तक देने लगे. आशु मेरी तरफ घूमी और प्यासी नजरों से मुझे देखने लगी. पर वहाँ कुछ भी कर पाना बहुत बड़ा रिस्क था! पर प्यास तो लगी थी. और उसे बुझाना तो था ही! मैंने आशु को ऐसे ही बैठे रहने को कहा और मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी पजामी के नाड़े को खोलना शुरू कर दिया. नाडा खोल कर मैंने अपना दाहिना हाथ अंदर डाला तो पाया की आशु ने पैंटी नहीं पहनी, मतलब वो पहले से ही तैयारी कर के बैठी थी! मैंने अपनी बीच वाली ऊँगली को आशु की योनी में सरकाया तो पाया की वो तो पहले से ही गीली हे. "मेरी जान को प्यार चाहिए?" मैंने पुछा तो आशु ने सीसियाते हुए 'हाँ' कहा. मैंने अपनी ऊँगली से आशु की योनी की फांकों को सहलाना शुरू कर दिया और आशु ने अपने आप को मेरी छाती से दबाना शुरू कर दिया. मैंने अपनी तीनों उँगलियों से आशु की योनी की फाँकों को धीरे-धीरे मनसलना शरू कर दिया. और आशु का कसमसाना शुरू हो गया.मैंने अपनी दो उँगलियाँ उसके योनी में डाली और उन्हें आशु की योनी में गोल-गोल घुमाने लगा. अब आशु ने अपनी कमर को मेरे लिंग पर और दबाना शुरू कर दिया. "जानू...ससस....!!!! आपको नहीं पता ये नौ दिन मैंने कैसे तड़प-तड़प के निकाले हैं!" मुझे आशु की प्यास का अंदाज हो चला था तो मैंने अपनी दोनों उँगलियाँ उसकी योनी में तेजी से अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी. "उम्ममम ...ससस... और कितना ...स..ससस...तड़पाओगे?" आशु ने धीमी आवाज में सिसकते हुए कहा. "जान! प्लीज आज रात इसी से काम चला लो कल शहर पहुँच कर कपडे फाड़ के संभोग करेंगे!" मैंने अब भी आशु की योनी में अपनी ऊँगली अंदर-बाहर किये जा रहा था. आशु की आँखें बंद हो चलीं थी और उसके दोनों हाथ मेरी जाँघ पर थे. "ससस...जानू!! ....ससस...पिछले कुछ दिनों से में डरी हुई थी...स्स्स्साहह... मुझे लगा ....मेरे जिस्म का जादू आप पर से उतर गया!" आशु के मुँह से अनायास शब्दों ने मेरा ध्यान खींचा, अब मुझे जानना था की आशु किस जादू की बात कर रही है इसलिए मैंने और तेजी से उसकी योनी की ठुकाई अपनी उँगलियों से शुरू कर दी!| आशु इस आनंद से फिसल कर आगे की ओर जाने लगी तो मैंने अपने बाएँ हाथ को उसके पेट पर रखा और उसे आगे फिसलने नहीं दिया. "ममममममम.... उस सससस....हरामजादी .....ने मुझे एक बात सिखाई थी.... की अपने बंदे को अपने काबू में रखना है तो उसे अपनी योनी से बाँध कर रख! आअह..सससस...." अब मुझे सब कुछ समझ आने लगा था! आशु का अचानक से संभोग में इतना 'निपुण' हो जाना सिर्फ उसकी इनसिक्युरीटी को छुपाने के लिए एक पर्दा था. मैं उसे छोड़ कर किसी और के पास ना जाऊँ इसलिए आशु इस तरह मुझसे चिपकी रहती थी. मैंने उसे इतनी बार भरोसा दिलाया, कसमें खाईं पर उसे क्यों यक़ीन नहीं होता की मैं बस उसका हु. उसका ये पजेसिव होना अब सारी हदें पार कर रहा है, अगर इसने अपनी जलन और इनसिक्युरीटी के चलते किसी के सामने कुछ बक दिया तो? वो दिन हम दोनों का अंत होगा! पर आखिर कारन क्या है की आशु इस कदर इनसिक्युअर है? मैंने ऐसा क्या कर दिया की उसे ये इनसिक्युरीटी होती है? वेट अ मिनिट ..... ये मुझसे प्यार भी करती है या फिर ये सिर्फ इसकी संभोग की भूख है?!! मैं यही सब सोच रहा था और अपनी उँगलियों को आशु की योनी में तेजी से अंदर-बाहर किये जा रहा था. अब आशु छूटने वाली थी और उसने अपने नाखून मेरी जाँघ में गाड़ दिए थे जिससे मैं अपने ख्यालों से बाहर आया और अगले ही पल आशु झड़ गई और निढाल हो कर मेरी छाती पर सर रखे हुए लेटी रही.
 
ये तो साफ़ था की मैं चाहे कुछ भी कह लूँ या भले ही अपना दिल निकाल कर आशु के सामने रख दूँ ये मानने वाली नहीं हे. अगर इससे प्यार न करता तो अब तक इसे छोड़ देता पर साला अब करूँ क्या ये नहीं पता! ऊपर से मैं भी बावला हो चला था जो आशु के चक्कर में एक से बढ़कर एक बावलापे करने लगा था? क्या जरुरत थी तुझे हरामी यहाँ छत पर खुले में ये सब करने की? पर अगर ये ना करता तो मुझे ये सब कैसे पता चलता? तुझे जरा भी डर नहीं लगा की तू इस तरह आशु को अपने लिंग से चिपटाये पड़ा है? भूल गया वो खेत के बीचों बीच पेड़ की डाल पर लटक रहे भाभी और उनके प्रेमी की अस्थियाँ? वहीँ जा कर मरना है तुझे? और ये क्या तूने आशु को अपने सर पर चढ़ा रखा है? हरामी उसकी हर एक ख्वाइश पागलों की तरह पूरी करता है और बदले में उसे ही तेरे ऊपर विश्वास नहीं! ये कैसा प्यार है?

आशु की सांसें दुरुस्त होने तक मेरा ही दिमाग मेरे दिल को गरिया रहा था. "जानू! क्या सोच रहे हो?" आशु ने मुझे झिंझोड़ा तो मैं अपने 'मन की अदालत' से बाहर आया. मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बल्कि अपनी टांगें मोड़ कर आशु के इर्द-गिर्द से हटाईं और उठ खड़ा हुआ. आशु फटाफट खडी हुई और मेरा हाथ पकड़ के रोक लिया; "क्या हुआ? कहाँ जा रहे हो?" मैं अब भी कोई जवाब नहीं दिया और उसके हाथों की गिरफ्त से अपना हाथ छुड़ाया और आंगन में आ गया.आशु छत पर से नीचे झाँकने लगी और फिर उसे मैं बाथरूम में जाता हुआ नजर आया. आशु छत पर खडी नीचे देखती रही और इंतजार करने लगी की मैं बाथरूम से कब निकलुंगा. मैंने निकल कर ऊपर देखा तो वो अब भी वहीँ खड़ी थी और मेरे ऊपर आने का इंतजार कर रही थी. मैं अगर उस समय ऊपर जाता तो वो मुझसे पूछती की मेरे उखड़ जाने का कारन क्या है और तब मेरा कुछ भी कहना बवाल खड़ा कर देता, ऐसा बवाल जिसे सुन आज काण्ड होना तय था. इसलिए में आंगन में पड़ी चारपाई पर ही लेट गया पर आशु अपनी जगह से टस से मस ना हुई और टकटकी बांधे मुझे देखती रही. मैंने अपनी आँखें बंद की और सोने की कोशिश करने लगा, जो बात मेरे दिम्माग में चल रही थी वो ये थी की मुझे अपने दिल पर काबू रखना होगा वरना आशु मुझे कहीं फिर से अपनी जिस्म के जरिये पिघला ना ले.

पिछले नौ दिनों से जो हम दोनों के बीच जिस्मानी दूरियाँ आई थी उससे कुछ तो काम आसान हो गया था पर आज उस कर्म वाले काण्ड ने फिर से उस दबी हुई आग को हवा दे दी थी. शायद इस तरह उससे दूरियाँ बनाने से आशु को कुछ अक्ल आये, अब क्योंकि उसकी हर ख़ुशी पूरी करने के चक्कर में मैं अपनी और नहीं लगवाना चाहता था. शादी के बाद चाहे वो मुझसे जो करवा ले पर उससे पहले तो हम दोनों को म्याचुरिटी दिखानी होगी. पर दिमाग जानता था की कुछ होने वाला नहीं है...काण्ड तो होना ही है! इधर आशु की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो नीचे आ कर मुझसे पूछ सके की मैं क्यों उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहा हूँ? वो पैरापिट वाल पर अपनी कोहनियाँ टिकाये मुझे बस देखती रही! वो पूरी रात मैं बस करवटें बदलता रहा और बार-बार आशु को खुद को देखते हुए नोटीस करता रहा.

सुबह हुई तो ताई जी उठ के आंगन में आईं; "अरे बिटवा? तू यहाँ क्या कर रहा है?" उन्होंने पूछा. उन्हें देखते ही आशु नीचे आ गई; "ताई जी..वो रात को पेट ख़राब हो गया था इसलिए मैं नीचे ही लेट गया." मैंने झूठ बोला. ताई जी मेरे पास बैठ गईं और आशु बाथरूम में नहाने घुस गई और फ्रेश हो कर चाय बनाने लगी. मैं भी उठा और नहा धो के तैयार हो गया और अब तो घर वाले सब बारी-बारी नाहा के नाश्ते के लिए तैयार बैठे थे. "राज , नारायण भैया तुम लोगों के साथ जायेगा." ताऊ जी ने कहा और मैंने बस 'जी' कहा. पर ये सुनते ही आशु को बहुत गुस्सा आया, वो सोच रही थी की वो शहर जा कर मुझसे कल रात के उखड़ेपन का कारन पूछेगी पर नारायण भैया के साथ जाने से उसके प्लान पर पानी फिर गया था. पर मुझे तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा था. नाश्ता कर के हम तीनों निकले और बस स्टैंड तक पैदल चल दिये. आशु पीछे थी और आगे-आगे मैं और नारायण भैया थे. वो अपनी बातें किये जा रहे थे और मैं बस हाँ-हुनकुर ही कर रहा था. बस आई और हम तीनों चढ़ गए, आशु तो एक अम्मा के साथ बैठ गई. हम दोनों खड़े रहे और कुछ देर बाद हमें सीट मिल गई. मुझे नींद आ रही थी तो मैं खिड़की से सर लगा कर सो गया पर आशु के मन में उथल-पुथल मची थी. बस स्टैंड पहुँच कर नारायण भैया को तहसीलदार के जाना था और उसे वहाँ का कुछ पता नहीं था तो हमने एक ऑटो किया और उसमें बैठ गये. सबसे पहले आशु हुई, फिर मैं और आखरी में नारायण भैया घुसा. मैं आशु की तरफ ना देखकर सामने देख रहा था. अब आशु मुझसे बात करने को मरे जा रही थी पर अपने बाप के डर के मारे कुछ कह नहीं पा रही थी. आशु ने चुपके से मेरा दाहिना हाथ पकड़ लिया पर मैंने किसी तरह हाथ छुड़ा लिया और नारायण भैया से बात करने लगा. पहले आशु का कॉलेज आया और उसे वहाँ उतारने लगे तो लगा जैसे वो जाना ही ना चाहती हो! "जा ना?" मैंने कहा तो आशु सर झुकाये कॉलेज के गेट की तरफ चली गई और हमारा ऑटो तहसीलदार के ऑफिस की तरफ चल दिया. नारायण भैया को वहाँ छोड़ कर मैं घर आ गया और मेल देखने लगा की शायद कोई जॉब ओपनिंग आई हो. एक मेल आई थी तो मैं वहाँ इंटरव्यू के लिए चल दिया. शाम को ४ बजे घर पहुँचा और आ कर ऐसे ही लेट गया.ठीक ५ बजे दरवाजे पर दस्तक हुई और मैंने जब दरवाजा खोला तो सामने आशु खड़ी थी.

आशु बिना कुछ कहे अंदर आई और दरवाजा उसने लात मार कर मेरी आँखों में देखते हुए बंद किया. फिर अगले ही पल उसकी आँखें छल-छला गईं और उसने मेरी कमीज का कालर पकड़ लिया और मुझे पीछे धकेलने लगी. "क्या कर दिया मैंने जो आप मुझसे इस तरह उखड़े हुए हो? कल रात से ना कुछ बोल रहे हो न कुछ बात कर रहे हो? ऐसा क्या कर दिया मैंने? कम से कम मुझे मेरा गुनाह तो बताओ? आपके अलावा मेरा है कौन और आप हो की मुझसे इस तरह पेश आ रहे हो?" आशु एक साँस में रोते-रोते बोल गई पर उसका मुझे पीछे धकेलना अब भी जारी था. मैंने पहले खुद को पीछे जाने से रोका और फिर झटके से उसके हाथों से अपना कालर छुड़ाया और बोला; "गलती पूछ रही है अपनी? तूने मुझे समझ क्या रखा है? तुझे क्या लगता है की तू मुझे अपने जिस्म की गर्मी से पिघला लेगी? तुझे इतना समझाया, इतनी कसमें खाईं की मैं तुझसे प्यार करता हूँ और सिर्फ तेरा हूँ पर तेरी ये इनसिक्युरीटी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती? इसी लिए जयपुर से आने के बाद मुझसे इतना चिपक रही थी ना? मैं तो साला तेरे चक्कर में पागल हो गया था. तुझे गाँव छोड़ के उल्लू की तरह जागता रहता था. तेरे जिस्म ने तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ा था. वो तो शुक्र है की मैंने व्रत रखे और खुद पर काबू पाया वरना मैं भी तेरी तरह हरकतें करता! क्या-क्या नहीं किया मैंने तेरे प्यार में और तुझे ये सब मज़ाक लग रहा है? तुझे मनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया मैंने? इतना जोखिम उठा कर कल पहले तुझे खेतों में ले गया और फिर पहले तेरे कमरे में आना और वो रात को छत पर बैठना? पर तुझे तो बस अपने जिस्म की आग बुझानी है मुझसे! एक दिन अगर तुझे मैं ना छुओं तो तेरे बदन में आग लग जाती है! तुझे पता भी है की तू अपनी इस जलन के मारे कब क्या बोल देती है की तुझे खुद नहीं पता होता. क्या जरुरत थी तुझे आंटी जी से कहने की कि मेरी जॉब चली गई? अगर मैं बात नहीं पलटता तू तो वहाँ सब कुछ बक देती!

निशा को तू जानती है ना, वो मुँहफ़ट है पर दिल की साफ़ हे. वो जानबूझ कर मुझसे मज़ाक करती है और ये सुन कर तुझे किस बात का गुस्सा आता है? भाभी को भी तू अच्छे से जानती है ना? उसके मन में क्या-क्या है वो सब जानती है तू और तूने ही मुझे उनके बारे में आगाह किया था पर आज तक मैंने कभी उनकी तरफ आँख उठा के नहीं देखा. जब मैं बिमारी में गाँव गया था तो उसने क्या-क्या नहीं किया मुझे उकसाने के लिए. पर तेरे प्यार की वजह से मैं नहीं बहका, इससे ज्यादा तुझे और क्या चाहिए?

देख मैं तुझे आज एक बात आखरी बार बोल देता हूँ, आज के बाद अगर मुझे ये तेरी इनसिक्युरीटी दिखाई दी तो दिस विल् बी दीं एंड ऑफ अवर रिलेशनशिप!” मेरी बातें सुन आशु फफक के रोने लगी और अपने घुटनों के बल बैठ गई और हाथ जोड़ कर मिन्नत करते हुए बोली; "मुझे माफ़ कर दो! प्लीज ....मेरा आपके अलावा और कोई नहीं! ये सच है की मैं इनसिक्युअर हूँ आपको ले कर पर ये भी सच है की मैं आपसे सच्चा प्यार करती हु. मैंने आपसे प्यार संभोग के लिए नहीं किया, बल्कि इसलिए किया क्योंकि इस दुनिया में सिर्फ एक आप हो जो मुझसे प्यार करते हो."

"तो तुझे ये बात समझ में क्यों नहीं आती की मैं सिर्फ तुझसे प्यार करता हूँ? मैंने आज तक तेरे सामने कभी किसी से फ्लर्ट नहीं किया तो ये काहे बात की इनसिक्युरीटी है?! तुझे ऐसा क्यों लगता है की तुझ में कुछ कमी है? मैं तुझे छोड़ कर किसके पास जाऊँगा? बोल???"

"मुझे नहीं पता...बस डर लगता है की कोई आपको मुझसे छीन लेगा!" आशु ने अपने दोनों हाथों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट लिया.

"कोई और नहीं....तू खुद ही मुझे अपने से दूर कर देगी." मैंने खुद को उसकी गिरफ्त से आजाद करते हुए कहा.

"नहीं ...प्लीज ऐसा मत कहिये!"

"तुझे पता है मैं कितनी परेशानियों से जूझ रहा हूँ? कितनी जिम्मेदारियाँ मेरे सर पर हैं? जॉब नहीं है, सेविंग्स नहीं हैं और दो साल बाद हमें भाग कर शादी करनी है! क्या-क्या मैनेज करूँ मैं? मैंने तुझसे आजतक कुछ माँगा है? नहीं ना? फिर? "

"एक लास्ट चांस दे दो!आई प्रॉमिस ... अब ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी!आई प्रॉमिस ...!!!" आशु ने अपने आँसू पोछे और सुबकते हुए कहा. पर में जानता था की इसके मन की ये सोच कभी नहीं जा सकती. पर सिवाए कोशिश करने के मैं कुछ कर भी नहीं सकता था. प्यार जो करता था उस डफर से! मैं उसके सामन घुटनों पर बैठा और अपने बाएं हाथ से उसके बाल पकडे और उन्हें जोर से खींचा की आशु की गर्दन ऊपर को तन गई और उसकी नजरें ठीक मेरे चेहरे पर थीं;

"मैं बस तेरा हूँ...समझी?" आशु ने सुन कर हाँ में सर हिलाया पर मैं उससे 'हाँ' सुनने की उम्मीद कर रहा था. उसके कुछ न बोलने और सिर्फ सर हिलाने से मुझे गुस्सा आया और मैंने उसके बाएँ गाल पर एक चपत लगाईं और अपना सवाल दुबारा पुछा; "मैंने कुछ पुछा तुझसे? मैं सिर्फ तेरा हूँ.... बोल हाँ?" तब जा कर आशु के मुँह से हाँ निकला.

"तू सिर्फ मेरी है!" मैंने कहा.

"ह...हाँ!" आशु ने डर के मारे कहा.

"मैं किस्से प्यार करता हूँ?" मैंने आशु के गाल पर एक चपत लगाते हुए पूछा.

"म....मु...मुझसे!"

"तू किससे प्यार करती है?"

"आपसे!"

"और हम दोनों के बीच में कभी कोई नहीं आ सकता!" आशु ने ये सुन कर हाँ में गर्दन हिलाई पर मुझे ये जवाब नहीं सुनना था तो मैंने फिर से उसके गाल पर एक चपत लगाईं और तब जा कर आशु को समझ आया की मैं क्या सुनना चाहता हु.

"ह...हम दोनों के बीच...कोई नहीं आ सकता!" आशु ने घबराते हुए कहा.

आशु की आँखें रोने से लाल हो चुकी थीं और अब मुझे उस पर तरस आने लगा था. इसलिए मैंने उसके बाल छोड़ दिए और अपनी दोनों बाहें खोल दी. आशु घुटनों के बल ही मेरे सीने से लिपट गई और फिर से रोने लगी. मैंने आशु के बालों में हाथ फेरना शुरू किया ताकि उसका रोना काबू में आये; "बस ...बस... हो गया! और नहीं रोना!" ये सुन आशु ने धीरे-धीरे खुद पर काबू किया और रोना बंद किया. मैंने उसे अपने सीने से अलग किया और उसके आँसू पोछे फिर मैं खड़ा हुआ और उसे भी सहारा दे कर खड़ा किया. "जाके मुँह धो के आ फिर मैं तुझे हॉस्टल छोड़ देता हु." आशु मुँह-धू कर आई और फिर से मेरे गले लग गई; "आपने मुझे माफ़ कर दिया ना?" मैंने उसके जवाब में बस हाँ कहा और फिर उसे खुद से दूर किया और दरवाजा खोल कर बाहर उसके आने का इंतजार करने लगा. आशु बेमन से बाहर आई और शायद उसके मन में अब भी यही ख़याल चल रहा था की मैंने उसे माफ़ नहीं किया हे. मैंने पहले उसे उसका फ़ोन वापस किया और फिर नीचे से ऑटो कर उसे हॉस्टल छोडा. घर पहुँचा ही था की मेरा फ़ोन बज उठा, ये किसी और का नहीं बल्कि आशु का ही था. उसने सुमन के फ़ोन से मुझे कॉल किया था. ये सोच कर की मैं शायद उसका कॉल न उठाऊँ. मैंने कॉल उठाया" जानू! आपकी एक मदद चाहिए!"

"हाँ बोल" मैंने सोचा कहीं कोई गंभीर बात तो नहीं? पर अगर ऐसा कुछ होता तो वो उस वक़्त क्यों नहीं बोली जब वो यहाँ थी? "वो कॉलेज के असाइनमेंट्स में एक प्रोजेक्ट मिला था. बाकी साब तो हो गया बस एक वही प्रोजेक्ट बचा हे.तो कल आप मेरा प्रोजेक्ट शुरू कर व दोगे?" मैं समझ गया की ये कॉल बस उसका ये चेक करना था की मैंने उसे माफ़ किया है या नहीं? "कल शाम ५ बजे मुझे राम होटल पर मिल" अभी बात हो ही रही थी की मुझे पीछे से सुमन की आवाज आई; "डॉली तेरी बात हो जाए तो मुझे फ़ोन दियो." आशु ने बड़े प्यार से कहा; "मेरी बात हो गई दीदी!" और उसने फ़ोन सुमन को दे दिया. "राज जी! मैं तो आपको अपना दोस्त समझती थी और अपने ही मुझे पराया कर दिया?"

"अरे! मैंने क्या कर दिया?" मैंने चौंकते हुए कहा.

"आप ने अपनी जॉब के बारे में क्यों नहीं बताया?" सुमन ने सवाल दागा.

"अरे...वो...याद नहीं रहा?" मैंने बहाना मारा.

"क्या याद नहीं रहा? वो तो माँ ने मुझे बताया तब जाके मुझे पता चला. मैं देखती हूँ कुछ अगर होता है तो आपको बताती हु."
 
"थैंक यू" मैंने कहा. बस इसके बाद उसने मुझसे कहा की मैं उसे अपना रिज्यूमे भेज दूँ और वो एक बार अपनी कंपनी में बात कर लेगी. रात को बिना कुछ खाये-पीये ही लेट गया, आज जो मैं कहा और किया वो मुझे सही तो लग रहा था पर शायद मेरा आशु के साथ किया व्यवहार मुझे ठीक नहीं लग रहा था. मेरा उस पर गुस्सा निकालना ठीक नहीं था....शायद!

अगली सुबह उठा पर आज मुझे कहीं भी नहीं जाना था तो मैं घर के काम निपटाने लगा, झाडू-पोछा कर के घर बिलकुल चकाचक साफ़ किया फिर खाना खाया और फिर से सो गया.शाम को पाँच बजे मैं राम होटल पहुँचा तो देखा की आशु वहां पहले से ही खड़ी हे. हम दोनों पहले की ही तरह मिले और फिर उसने मुझे प्रोजेक्ट के बारे में बताया और हम दोनों उसी में लग गये. घण्टे भर तक हम उसी पर चर्चा करते रहे और थोड़ा हंसी मजाक भी हुआ जैसे पहले होता था. आगे कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा, हमारा प्यार भरा रिश्ता वापस से पटरी पर आ गया था पर आशु अब मुझे नार्मल लग रही थी. मतलब अब उसका वो पजेसिवनेस और इनसिक्युअर होना कम हो गया था. मुझे नहीं पता की सच में वो खुद को काबू कर रही थी या फिर नाटक, मैंने यही सोच कर संतोष कर लिया की कम से कम अब वो पहले की तरह तो बीह्याव नहीं कर रही.

करवाचौथ से दो दिन पहले की बात थी और आशु मुझे कुछ याद दिलाना चाहती थी. पर झिझक रही थी की कहीं मैं उस पर बरस न पडूँ| मैंने फ़ोन निकाला और घर फ़ोन किया; "नमस्ते पिताजी! एक बात पूछनी थी. दरअसल ऑफिस में काम थोड़ा ज्यादा है और बॉस ज्यादा छुट्टी नहीं देगा.तो अगर मैं करवाचौथ की बजाये दिवाली पर छुट्टी ले कर आ जाऊँ तो ठीक रहेगा?" मैंने जान बूझ कर बात बनाते हुए कहा, कारन साफ़ था की कहीं कोई यहाँ आशु को लेने ना टपक पडे. "तूने वैसे भी करवाचौथ पर आ कर क्या करना था? शादी तो तूने की नहीं! पर दिवाली पर अगर यहाँ नहीं आया तो देख लिओ!" पिताजी ने मुझे सुनाते हुए कहा. "जी जरूर! दिवाली तो अपने परिवार के साथ ही मनाऊँगा!" बस इतना कह कर मैंने फ़ोन रखा. आशु जो ये बातें सुन रही थी सब समझ गई और उसका चेहरा ख़ुशी से जगमगा उठा. "कल सुबह मैं लेने आऊँगा, तैयार रहना!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा और ये सुनके आशु इतना चिहुँकि की मुझे गले लगना चाहा, पर फिर खुद ही रूक गई क्योंकि हम बाहर पार्क में बैठे थे. मैंने मन ही मन सोचा की शायद आशु को अक्ल आ गई है!

अगली सुबह मैं जल्दी उठा और अपनी बुलेट रानी की अच्छे से धुलाई की, आयल चेक किया और फिर नाहा-धो कर आशु को लेने चल दिया. आशु पहले से ही अपना बैग टाँगे गेट पर खड़ी थी. मेरी बाइक ठीक हॉस्टल के सामने रुकी और वो मुस्कुराती हुई आ कर पीछे बैठ गई. मैंने बाइक सीधा हाईवे की तरफ मोड़ दी और आशु हैरानी से देखने लगी; "हम घर नहीं जा रहे?" उसने पीछे बैठे हुए पूछा. तो मैंने ना में गर्दन हिलाई और इधर आशु का मुँह फीका पड़ गया, उसे लगा की हम गाँव जा रहे हे. एक घंटे बाद मैंने हाईवे से गाडी स्टेट हाईवे १३ पर गाडी मोडी तो आशु फिर हैरान हो गई की हम जा कहाँ रहे हैं? आखिर आधे घंटे बाद जब बाइक रुकी तो हम एक शानदार साडी की दूकान के सामने खड़े थे. आशु बाइक से उत्तरी और सब समझ गई और मेरी तरफ हैरानी से देखने लगी; "जानू! आप.... थैंक यू!" वो कुछ कहने वाली थी पर फिर रूक गई. मैंने बाइक पार्क की और हम दूकान में घुसे और वहाँ आज बहुत भीड़भाड़ थी. ये दूकान मेरे कॉलेज के दोस्त की थी और मैं यहाँ से कई बार ताई जी और माँ के लिए साडी ले गया था.

मुझे देखते ही प्रसाद (मेरा दोस्त) काउंटर छोड़ कर आया और हम दोनों गले मिले "अरे भाभी जी! आइये-आइये!" उसने आशु से हँसते हुए कहा. "यार अभी शादी नहीं हुई है, होने वाली है!" मैंने कहा. "तभी मैं सोचूँ की तूने शादी कर ली और मुझे बुलाया भी नहीं!" ये सुन कर हम तीनों हँसने लगे, प्रसाद ने अपने एक लड़के को आवाज दी: "भाई और भाभी को साड़ियाँ दिखा और रेट स्पेशल वाले लगाना."

"यार एक हेल्प और कर दे, स्टिचिंग कल तक करवा दे यार जो एक्स्ट्रा लगेगा मैं दे दूँगा!" मैंने कहा और वो ये सुन कर मुस्कुरा दिया.

"हुस्ना भाभी के पास माप दिलवा दिओ और बोलिओ प्रसाद भैया के भाई हैं." मैंने उसे थैंक्स कहा, फिर वो वापस कॅश काउंटर पर बैठ गया और हम दोनों को वो लड़का साड़ियाँ दिखाने लगा. आज पहलीबार था की आशु अपने लिए साडी ले रही थी और बार-बार मुझसे पूछ रही थी की ये ठीक है? आखिर मैंने उसके लिए साडी पसंद की और फिर हम माप देने के लिए उस लड़के के साथ चल दिये. हुस्ना आपा बड़ी खुश मिज़ाज थीं और उन्होंने बड़ी बारीकी से माप लिया और ब्लाउज के कट के बारे में भी आशु को अच्छे से समझाया. जब मैंने पैसे पूछे तो उन्होंने २०००/- बोले जिसे सुनते ही आशु मेरी तरफ देखने लगी. पैसे ज्यादा थे पर साडी भी तो कल मिल रही थी. मैंने जेब से पैसे निकाल के उन्हें दिए और कल १२ बजे का टाइम फिक्स हुआ! हम वापस दूकान आये और कॅश काउंटर पर प्रसाद ने जबरदस्ती हमें बिठा लिया और चाय मँगा दी. मैंने जब उससे पैसे पूछे तो उसने २,५००/- कहा, जब की साडी पर ३,५००/- लिखा था. वो हमेशा जी मुझे होलसेल रेट दिया करता था. पर आशु के लिए तो ये भी बहुत था वो फिर से मेरी तरफ देखने लगी. मैंने पेमेंट कर दी और हम बाहर आ गए; "जानू! आपने इतने पैसे क्यों खर्च किये?" आशु ने पुछा तो मैंने उसके दोनों गाल उमेठते हुए कहा; "क्योंकि ये मेरी जान का पहला करवाचौथ है! इसे स्पेशल तो होना ही है?" आशु की आँखें भर आईं थी. मैंने उसके आँसू पोछे और हम घर के लिए निकल पडे. घर के पास ही बाजार था वहाँ मुझे मेहँदी लगाने वाली औरतें दिखीं तो मैंने आशु को मेहँदी लगवाने को कहा. मेहँदी लगवाने के नाम से ही वो खुश हो गई और फिर उसने अपने पसंद की मेहँदी लगवाई और मुझे दिखाने लगी. आखिर हम घर आ गए और अब भूख बड़ी जोर से लगी थी. इस सब में मैं कुछ खाने को लेना ही भूल गया, मैंने कहा की मैं खाना ले कर आता हूँ तो आशु मना करने लगी; "मेरा मन आज मैगी खाने का हे." आशु बोली और मैं समझ गया की वो क्यों मना कर रही है, मैं और पैसे खर्चा न करूँ इसलिए. मैंने मैगी बनाई और आशु को अपने हाथ से खिलाया क्योंकि उसके तो हाथों में मेहँदी लगी थी.

खाना खाने के बाद मैंने लैपटॉप पर एक पिक्चर लगा दी, आशु ने कहा की हम नीचे फर्श पर बैठें.मैं नीचे बैठा और अपनी दोनों टांगें वी के आकार में खोलीं और आशु मुझसे सट कर बीच में बैठ गई. लैपटॉप सेंटर टेबल पर रखा था. आशु ने अपना सर मेरी छाती पर रख दिया. अपने दोनों हाथ मेरी टांगों पर खोल कर रखे और सामने मुँह कर के पिक्चर देखने लगी. पिक्चर देखते-देखते आशु को नींद का झोंका आने लगा और उसकी गर्दन इधर-उधर गिरने लगी. मैंने अपने दोनों हाथों को आशु की गर्दन के इर्द-गिर्द से घुमाते हुए उसके होठों के सामने लॉक कर दिया. आशु ने मेरे हाथ को चूमा और फिर मेरी दाहिने बाजू का सहारा लेते हुए सो गई. शाम होने को आई थी और अब चाय बनाने का समय था. पर आशु ने बड़ी मासूमियत से अपने हाथ मुझे दिखाते हुए तुतला कर कहा: "जानू! मेरे हाथों में तो मेहँदी लगी है! आप ही बना दो ना!" उसके इस बचपने पर ही तो मैं फ़िदा था! मैंने मुस्कुराते हुए चाय बनाई और अब बारी थी उसे चाय पिलाने की. हम दोनों फिर से वैसे ही बैठ गए और मैंने फूँक मार के उसे चाय पिलाई. सात बज गए पर आशु जानबूझ कर अब भी अपने हाथ नहीं धो रही थी. उसे मुझसे काम कराने में मजा आ रहा था. जब मैंने उससे पुछा की रात में क्या बनाऊँ तब वो हँसने लगी और बाथरूम में जा कर हाथ धोये और नहा कर आ गई. "आप हटिये, मैं बनाती हूँ!" पर मेरी नजरें उसके हाथों पर थीं जिन पर मेहँदी फ़ब रही थी. मैंने उसके दोनों हाथों को पकड़ा और उन्हें चूम लिया. आशु शर्मा गई और फिर आशु ने भिंडी की सब्जी और उर्द दाल बनाई. खाना तैयार हुआ और हम दोनों बैठ गए खाने, पर इस बार खाना आशु ने मुझे खिलाया. पेट भर के खाना खाया और अब बारी थी सोने की पर आशु बस अपने मेहँदी वाले हाथ देखने में मग्न थी. "क्या देख रही है?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा. उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने पास बिठा लिया, फिर अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द लपेट कर मेरे कंधे पर सर रखते हुए बोली; "आज मैं बहुत खुश हूँ! आपने बिना मेरे मांगे मेरी हर इच्छा पूरी कर दी! मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की मुझे आज का दिन देखना नसीब होगा! साडी खरीदना... मेहंदी लगवाना...ये सब मेरे लिए लिए एक सपने जैसा हे. थैंक यू! फॉर मेकिंग दिस डे सो मेमोरेबल!" मैंने आशु के सर को चूमा और हम दोनों लेट गए, पर आज कमरे का वातावरण बहुत शांत था. पहले आशु लेटते ही जैसे अपना आपा खो देती थी और मुझसे चिपक कर चूमना शुरू कर देती थी. पर आज वो बस मुझसे कस कर लिपटी रही और सो गई. मैं इस उम्मीद में की आशु कोई पहल करेगी कुछ देर जागता रहा पर जब मुझे लगा वो सो चुकी है तो मैं भी चैन से सो गया.

अगली सुबह आशु पहले ही जाग चुकी थी और बाथरूम में नहा रही थी. मैं उठा और खिड़की से पीठ टिका कर हाथ बंधे आशु के बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. १० मिनट बाद आशु निकली, टॉवल अपने स्तनों के ऊपर लपेटे हुए और उसके गीले बाल जिन से अब भी पानी की बूँदें टपक रही थी. साबुन और शैम्पू की खुशबू पूरे कमरे में भर गई थी और मैं बस आशु को देखे जा रहा था. मुझे खुद को देखते हुए आशु थोड़ा शर्मा गई और शर्म से उसके गाल लाल हो गये. "क्या देख रहे हो आप?" उसने नजरें झुकाते हुए पूछा. "यार या तो शायद मैंने कभी गौर नहीं किया या फिर वाक़ई में आज तुम्हें पहली बार इस तरह देख रहा हूँ! मन कर रहा है की तुम्हें अपनी बाहों में कस लूँ और चूम लूँ!" मैंने कहा तो आशु हँसने लगी; "रात भर का सब्र कर लो, उसके बाद तो मैं आपकी ही हूँ!" "हाय! रात भर का सब्र कैसे होगा!" मैंने कहाँ और आशु की तरफ बढ़ने लगा, पर मैंने उसे छुआ नहीं बल्कि बाथरूम में घुस गया.आशु उम्मीद कर रही थी की मैं उसे अपनी बाहों में भर लूँगा पर जब मैं उसकी बगल से गुजर गया तो वो थोड़ा हैरान हुई. जब मैं नहा कर निकला तो आशु अपने बाल सूखा रही थी. मैं बाहर आया और आशु से बोला; "जल्दी से तैयार हो जाओ!"

"क्यों? अब कहाँ जाना है?" आशु ने रुकते हुए पूछा.

"पार्लर" ये सुन के आशु आँखें फाड़े मुझे देखने लगी!

"पर ...वहाँ...." आगे उसे समज ही नहीं आया की क्या बोलना हे.

"अरे बाबा! आज के दिन औरतें पार्लर जाती हैं और पता नहीं क्या-क्या करवाती हैं, तो तुम्हें भी तो करवाना होगा न?!" आशु ने तो जैसे सोचा ही नहीं था की उसे ऐसा भी करना होगा.

"पर ...मुझे तो पता नहीं...वहाँ क्या..." आशु ने डरी हुई आवाज में कहा क्योंकि वो आजतक कभी पार्लर नहीं गई थी. हमारे गाँव में तो कोई पार्लर था नहीं जो उसे ये सब पता होता.

"जान! वहाँ कोई एक्सपेरिमेंट नहीं होता जो तू घबरा रही है! जो सजने का काम तू घर पर करती है वही वो लोग करेंगे." अब पता तो मुझे भी ज्यादा नहीं था तो क्या कहता.

"तो मैं यहीं पर तैयार हो जाऊँगी, वहाँ जा कर पैसे फूँकने की क्या जरुरत है?"
 
मैंने थोड़ा गुस्सा करते हुए कहा. "अच्छा? कहाँ है तेरे मेक-अप का सामान? ये एक नेल पोलिश....और ये एक फेसवाश....ओह वेट ये...ये फेस क्रीम...बस?! फाउंडेशन कहाँ है? और...वो क्या बोलते हैं उसे...मस्कारा कहाँ है?" ये एक दो नाम ऐसे थे जो मैंने कहीं सुने थे तो मैंने उन्हीं को दोहरा दिया. ये सुन कर तो आशु भी सोच में पड़ गई क्योंकि उसके पास कोई सामान था ही नहीं, वो मुझे सिंपल ही बहुत अच्छी लगती थी पर आज तो उसका पहला करवाचौथ था तो सजना-सवर्ना तो बनता था.

"पर वहाँ जा कर मैं बोलूं क्या? की मुझे क्या करवाना है? मुझे तो नाम तक नहीं पता की वो क्या-क्या करते हैं." आशु ने पलंग पर बैठते हुए कहा.

'वहाँ जा कर पूछना की पायथ्यागोरस थ्योरम क्या होती है?" मैंने थोड़ा मजाक करते हुए कहा.

"वो तो मुझे आती है“ ये कहते हुए आशु हँसने लगी.

"तू ऐसे नहीं मानेगी ना? रुक अभी बताता हूँ तुझे मैं" इतना कह कर मैं आशु को पकड़ने को उसके पीछे भागा और हम दोनों पूरे घर में भागने लगे. मैं चाहता तो आशु को एक झटके में पकड़ सकता था पर उसके साथ ये खेल खलेने में मजा आ रहा था. वो कभी पलंग पर चढ़ जाती तो कभी दूसरे कोने में जा कर मुझे चीढाने की कोशिश करती.आखिर मैंने उस का हाथ पकड़ लिया और उसे बिस्तर पर बिठा दिया और उसके सामने मैं अपने घुटनों पर बैठ गया; "देख...पार्लर जा और वहाँ जा कर मेनीक्योर, पेडीक्युर, ब्लिचिंग, फेशियल, थ्रीडिंग वगैरह-वगेरा करवा| फिर भी कुछ समझ ना आये तो अपना दिमाग इस्तेमाल कर और जो भी तुझे वहाँ पर ऑल - इन वन पैक मिले उसे करवा ले| वहाँ जो भी आंटी या दीदी होंगी उनसे पूछ लिओ और ये जो तेरे फ़ोन में गूगल बाबा हैं इनमें सर्च कर ले.अब मैं तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ प्लीज चली जा!" मैंने आशु के आगे हाथ जोड़े और वो ये देख कर खिलखिलाकर हँस पडी. "ठीक है जी! पर पार्लर तक तो छोड़ दो, मुझे थोड़े पता है यहाँ पार्लर कहाँ हे." आशु ने हार मानते हुए कहा.

"इतने दिनों से या आती है तुझे ये नहीं पता की पार्लर कहाँ है?" मैंने आशु को प्यार से डांटा.

"आपके लिए चाय बना देती हूँ फिर चलते हैं." आशु ने कहा पर मेरा प्लान तो उसके साथ व्रत रखने का था.

"बिलकुल नहीं! मेरी बीवी भूखी-प्यासी बैठी है और मैं खाना खाऊँ?" मेरे मुँह से बीवी सुनते ही आशु का चेहरे ख़ुशी से दमकने लगा.

"आप प्लीज फास्टिंग मत करो! ये फ़ास्ट तो औरतें अपने पति की लम्बी उम्र के लिए करती हैं, ना की आदमी!"

"यार ये क्या बात हुई? मैं इतनी लम्बी उम्र ले कर क्या करूँगा अगर तुम ही साथ न हुई तो? बैलेंस बना कर रखना चाहिए ना?" मेरे तर्क के आगे उसका तर्क बेकार साबित हुआ पर फिर भी आशु ने बड़ी कोशिश की पर मैं नहीं माना और मैं भी ये व्रत करने लगा. आशु को पार्लर छोड़ा और मैं उसकी साडी लेने चल दिया.

हुस्ना आपा का शुक्रिया किया की उन्होंने इतने कम समय में काम पूरा किया और फिर वापस निकल ही रहा था की प्रसाद मिल गया.उससे कुछ बातें हुई और मुझे वापस आने में देर हो गई. दोपहर के ३ बजे थे और आशु का फ़ोन बज उठा. "जान! मैं बाहर ही खड़ा हु." ये सुनकर ही आशु ने फ़ोन काट दिया और जब वो बाहर निकली तो मैं उसे बस देखता ही रह गया.उसके चेहरे की दमक १००० गुना बढ़ गई थी. होठों पर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक देख मन बावरा होने लगा था. आज पहली बार उसने आई लायनर लगाया था जिससे उसकी आँखें और भी कातिलाना हो गई थी. उसकी भवें चाक़ू की धार जैसी पतली थीं और मैं तो हाथ बाँधे बस उसे देखता रहा. आशु शर्म से लाल हो चुकी थी और ये लालिमा उसके चेहरे पर चार-चाँद लगा रही थी. "जल्दी से घर चलिए!" आशु ने नजरें झुकाये हुए ही कहा.

"ना ...पहले मुझे आई लव यू कहो और एक किस दो!" मैंने आशु के सामने शर्त रखी.

"प्लीज ...चलो न...घर जा कर सब कुछ कर लेना...पर अभी तो चलो! मुझे बहुत शर्म आ रही है!"

"ना...मेरी गाडी बिना आई लव यू और 'किस' के स्टार्ट नहीं होगी." माने अपनी बुलेट रानी पर हाथ रखते हुए कहा.

"सब हमें ही देख रहे हैं!" आशु ने खुसफुसाते हुए कहा.

"तो? यहाँ तुम्हें जानने वाला कोई नहीं हे. किसी चाहिए मुझे!" मैंने अपने दाएँ गाल पर ऊँगली से इशारा करते हुए कहा. आशु जानती थी की मैं मानने वाला नहीं हूँ इसलिए हार मानते हुए उसने थोड़ा उचकते हुए मेरे गाल को जल्दी से चूम लिया और शर्म के मारे मेरे सीने में अपना चेहरा छुपा लिया. "अच्छा बस! इतनी मेहनत लगी है इस चाँद से चेहरे को निखारने में, इसे खराब ना कर." मैंने आशु को खुद से अलग किया. हम वापस बाइक से घर पहुँचे और बाइक से उतरते ही आशु भाग कर घर में घुस गई. मैं बस हँस के रह गया, बाइक खड़ी कर मैं ऊपर आया तो आशु शीशे में खुद को निहार रही थी उसे खुद यक़ीन नहीं हो रहा था की वो इतनी सुंदर हे. "१,२००/- लग गए! पर सच में जानू मैंने कभी सोचा नहीं था की मैं इतनी सूंदर हूँ!" आशु ने कहा. "अब तो मुझे इनसिक्युरीटी होने लगी है!" मैंने हँसते हुए कहा और आशु भी ये सुन कर खिलखिलाकर हँसने लगी. मैंने आशु को उसकी साडी दी और तैयार होने को कहा क्योंकि हमें मंदिर जाना था जहाँ की कथा होनी थी. इधर मैं भी तैयार होने लगा, पर जब आशु पूरी तरह से तैयार हो कर आई तो मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी.

दो मिनट तक जब मैं कुछ नहीं बोला तो आशु ने ही मेरा ध्यान भंग किया; "जानू???" उसके बुलाते ही मेरे मुँह से ये शेर निकला;

"उस हसीन चेहरे की क्या बात है

हर दिल अज़ीज़, कुछ ऐसी उसमें बात है

है कुछ ऐसी कशिश उस चेहरे में

के एक झलक के लिए सारी दुनिया बर्बाद हे."

ये सुनते ही आशु को उसकी खूबसूरती का एहसास हुआ और शर्म से उसके गाल फिर लाल हो गये. पर आज मेरा मेरे ही दिल पर काबू नहीं था आज तो उसने बगावत कर दी थी;

"जब चलती है गुलशन में बाहर आती है

बातों में जादू और मुस्कराहट बेमिसाल है

उसके अंग अंग की खुश्बू मेरे दिल को लुभाती है

यारो यही लड़की मेरे सपनो की रानी हे."

एक शेर तो जैसे आज उसके हुस्न के लिए काफी नहीं था.

"नज़र जब तुमसे मिलती है मैं खुद को भूल जाता हूँ

बस इक धड़कन धड़कती है मैं खुद को भूल जाता हूँ

मगर जब भी मैं तुमसे मिलता हूँ मैं खुद को भूल जाता हु."

आज तो वो शायर बाहर आ रहा था जो आशिक़ी की हर हद को फाँद सकता था.

"तेरे हुस्न का दीवाना तो हर कोई होगा लेकिन मेरे जैसी दीवानगी हर किसी में नहीं होगी."

मेरी एक के बाद एक शायरी सुन आशु का शर्म के मारे बुरा हाल था. उसके गाल और कान पूरे लाल हो गए थे. वो बस नजरें झुकाये सब सुन रही थी और अपने आप को मेरी बाहों में बहक जाने से रोक रही थी. वो कुछ सोचती हुई मेरे नजदीक आई और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "हमे कहाँ मालूम था की ख़ूबसूरती क्या होती है? आज आपने हमारी तारीफ कर हमें हसीन बना दिया." उसके इस शेर पर मेरा मन किया की उसके हसीन लबों को चूम लूँ पर फिर खुद पर काबू पाया. "पहली बार के लिए शेर अच्छा था!" मैंने आशु के शेर की तारीफ करते हुए कहा. मैंने आशु का दाहिना हाथ पकड़ा और टेबल पर से चूड़ियाँ उठा कर उसे पहनाने लगा, साइज थोड़ा बड़ा था पर चूँकि इमीटेशन जेवेलरी थी तो वो फिर भी अच्छी लग रही थी. "ये तो मैं लेना भूल ही गई थी!" आशु ने कहा पर मैंने तो इस दिन की प्लानिंग पहले से ही कर रखी थी. बस एक चीज बची थी वो था सिन्दूर! मैंने आते समय वो भी ले लिया था. डिब्बी से एक चुटकी सिन्दूर निकाल के मैंने आशु की मांग में भरा तो आशु ने अपनी आँखें बंद कर लीन और आसूँ के एक बूँद निकल कर नीचे जा गिरी. "हे??? क्या हुआ मेरी जान?" आशु ने खुद को रोने से रोका और फिर बोली; "आज से मैं आपकी पर्मनंट वाइफ बन चुकी हूँ!" उसने थोड़ा माहौल हल्का करने के लिए कहा. पर मैं उसका मतलब समझ गया था. उसका मतलब था की आज से हम दोनों का प्यार पुख्ता रूप ले चूका है और अब हम पति-पत्नी बन चुके हे. "नो...देर इज समथिंग मिसिंग!" मेरे मुँह से ये सुन आशु सोच में पड़ गई. पर जब मैंने जेब से उसके लिए लिया हुआ मंगलसूत्र निकाला तो वो सब समझ गई. "ये तो नया है! वो पुराना कहाँ गया?" आशु ने पूछा. "जान वो तो नकली था! ये असली वाला हे." ये सुन कर आशु चौंक गई और अपने होठों पर हाथ रखते हुए बोली; "ये सोने का है? पर पैसे?" मैं जवाब देने से पहले ही आशु के पीछे आया और उसे अपने हाथों से मंगलसूत्र पहनाते हुए कहा; "मेरी जान से तो महँगा नहीं हो सकता ना?" आशु ये सुन कर चुप हो गई और आगे कुछ नहीं बोली, वो जानती थी की आगे अगर कुछ बोली तो मैं नाराज हो जाऊंगा. वो फिर से मुस्कुराने लगी; "टेकनिकली नाऊ वी आर हसबंड अँड वाइफ!!!" ये सुन कर आशु बहुत-बहुत खुश हुई और हम दोनों का कतई मन नहीं था की ये समां कभी खत्म हो पर पूजा के लिए तो जाना ही था!

ख़ुशी-ख़ुशी आशु ने पूजा का सारा सामान एक बड़ी थाली में इकठ्ठा किया और हम घर से निकले| किसी संस्था ने एक मंदिर के बाहर बहुत बड़ा पंडाल लगाया था और वहीँ पर पूजा होनी थी. हम दोनों भी वहाँ पहुँच गए, वहीँ पर हमें कल्पना भाभी मिलीं जिससे आशु को एक कंपनी मिल गई. पूरे विधि-विधान से पूजा और कथा हुई और रात ८ बजे हम घर लौटे. अब एक दिक्कत थी. वो ये की चंद्र उदय होने के समय बिल्डिंग की सभी औरतें और आदमी वहाँ इकठ्ठा होने वाले थे और ऐसे में हम दोनों का वहाँ जाना शायद किसी न किसी को खलता.मैं अभी ये सोच ही रहा था की कल्पना भाभी ने दरवाजा खटखटाया; "अरे डॉली तू यहाँ क्या कर रही है, चल जल्दी से ऊपर." अब आशु तो कब से ऊपर जाना चाहती थी पर मैंने ही उसे मना कर दिया था; "भाभी वो... अभी वहाँ सब होंगे तो.... हम दोनों को देख कर कहीं कुछ ऐसा वैसा बोल दिया तो मुझे गुस्सा आ जायेगा!" मैंने अपनी चिंता जताई.

"कोई कुछ नहीं कहेगा, मैं बोल दूँगी ये मेरी बहन है और तुम तो मेरे छोटे देवर जैसे हो. पापा भी ऊपर ही हैं कोई कुछ बोला तो जानते हो ना पापा कैसे बरस पड़ते हैं?" भाभी की बात सुन कर मन को चैन आया की पुरुषोत्तम अंकल तो सब जानते ही हैं की हम दोनों की शादी होने वाली हे. इसलिए हम तीनों ऊपर आ गए और यहाँ तो लोगों का ताँता लगा हुआ हे. एक-एक कर सब हम दोनों से मिले, इधर आशु ने जा कर पुरुषोत्तम अंकल जी के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया. काफी लोगों से तो मैं आज पहली बार मिल रहा था इसका कारन था की मेरे पास कभी किसी से घुलने-मिलने का समय ही नहीं होता था. आशु के कॉलेज से पहले भी मैं घर पर बहुत कम ही रहता था. अकेले रहने से तो बाहर घूमना अच्छा था इसलिए मैं अक्सर फ्री टाइम में खाने-पीने निकल जाता और रात को आ कर सो जाया करता था. आज जब सब से मिला तो सब यही कह रहे थे की एक ही बिल्डिंग में रह कर कभी मिले नही. इधर आशु भाभी के साथ बाकी सब से मिलने में व्यस्त थी. भाभी सब को यही कह रही थी की हम दोनों की शादी होने वाली है और ये आशु का पहला करवाचौथ हे. सब हैरान थे की भला ये क्या बात हुई की शादी के पहले ही करवाचौथ तो भाभी ही बीच-बचाव करते हुए बोली; "जब दिल मिल गए हैं तो ये रस्में निभानी ही चाहिए."

खेर आखिर कर चाँद निकल ही आया और सब आदमी अपनी-अपनी बीवियों के पास जा कर खड़े हो गये. आज पहलीबार था की हम दोनों यूँ सबके सामने प्रेमी नहीं बल्कि पति-पत्नी बन के विधि-विधान से पूजा कर रहे हे. शर्म से आशु पूरी लाल हो चुकी थी और इधर थोड़ी-थोड़ी शर्म मुझे भी आने लगी थी. आशु ने जल रहे दीपक को छन्नी में रख के पहले चाँद को देखा और फिर मुझे देखने लगी. उस छन्नी से मुझे देखते ही उसकी आँखें बड़ी होगी ऐसा लगा जैसे वो मुझे अपनी ही आँखों में बसा लेना चाहती हो. उस एक पल के लिए हम दोनों बस एक दूसरे को देखे जा रहे थे, बाकी वहाँ कौन क्या कर रहा है उससे हमें कोई सरोकार नहीं था. आखिर भाभी ने हँसते हुए ही हम दोनों की तन्द्रा भंग की; "ओ मैडम! देखती रहोगी की आगे पूजा भी करोगी?" तब जा कर हम दोनों का ध्यान भंग हुआ, मैं तो मुस्कुरा रहा था और आशु शर्म से लाल हो गई! भाभी के बताये हुए तरीके से उसने पूजा की और अंत में मेरे पाँव छुए. अब ये पहली बार था की आशु मेरे पाँव छू रही थी और मुझे समझ नहीं आया की मैं उसे क्या आशीर्वाद दूँ? मैंने बस अपना हाथ उसके सर पर रख दिया और दिल ही दिल में कामना करने लगा की मैं उसे एक अच्छा और सुखद जीवन दू. बाकी सब लोग अपनी पत्नियों को पानी पिला रहे थे तो मैंने भी पानी का गिलास उठा कर आशु को पानी पिलाया और उसके बाद उसने भी मुझे पानी पिलाया. अब ये देख कर भाभी फिर से दोनों की टांग खींचने आ गई; "अच्छा जी!!! राज ने भी व्रत रखा था? वाह भाई वाह!" जिस किसी ने भी ये सुना वो हँसने लगा, पुरुषोत्तम अंकल बोले; "बेटा यूँ ही हँसते-खेलते रहो और जल्दी से शादी कर लो."

"बस अंकल जी २ साल और फिर तो शादी ...!!!" मैंने भी हँसते हुए कहा. आशु का शर्माना जारी था.... सारे लोग एक-एक कर नीचे आ गये.
 
नीचे आ कर मैंने सबसे पहले आशु के लिए दूध बनाया, ये पहलीबार था की उसने ऐसा व्रत रखा हो और मुझ उसके स्वास्थ्य की बहुत चिंता थी. आशु ने बहुत मना किया की इसकी कोई जरुरत नहीं पर मैंने फिर भी उसे जबरदस्ती दूध पिला दिया. "आप भी पियो न, व्रत तो आपने भी रखा था ना?" आशु ने कहा. "जान! मैं अभी अगर दूध पी लूँगा तो खाना नहीं खाऊँगा, इसलिए मेरी चिंता मत कर. अब ये बता की खाना क्या खाओगी?" मैंने खाना आर्डर करने के इरादे से कहा पर आशु एक दम से उठ खडी हुई; "कोई आर्डर-वॉर्डर करने की जरुरत नहीं है, मैं बनाऊँगी खाना!" आशु ने लाजवाब खाना बनाया और फिर हमेशा की तरह हमने एक दूसरे को अपने हाथों से खिलाया. अब बारी थी सोने की और आशु को सुबह से देख कर ही मेरा मन मचल रहा था. कुछ यही हाल आशु का भी था जो कब से मेरी बाहों में सिमट जाना चाहती थी.

आशु अपनी साडी उतारने लगी. उसका ध्यान मेरी तरफ नहीं था पर मेरी आँखें तो उसके बदन से चिपकी हुई थी. आशु ने साडी उतारी और उसे फोल्ड करने लगी. पेटीकोट और ब्लाउज में आज वो कहर ढा रही थी. मुझसे रुका न गया तो मैं उठा और जा कर उसके पीछे उससे सट कर खड़ा हो गया.मेरे जिस्म का एहसास पाते ही आशु सिंहर गई और उसके हाथ साडी फोल्ड करते हुए रूक गये. मैंने अपन दोनों हाथों से आशु की कमर को थामा और उसकी गर्दन को चूमा और फिर जैसे मुझे कुछ याद आया और मैं आशु को छोड़ कर किचन में गया.इधर आशु हैरान-परेशान से खड़ी अपने सवालों का जवाब ढूँढने लगी. की आखिर क्यों मैं उसे ऐसे छोड़ कर किचन में चला गया.मैं जब किचन से लौटा तो मेरे हाथ में एक पानी का गिलास था और आशु की आँखों में सवाल."आज दवाई नहीं ली ना?" मैंने आशु को उसकी प्रेगनेंसी वाली दवाई की याद दिलाई और उसने फटाफट अपने बैग से दवाई निकाली और पानी के साथ खा ली. अब और कोई भी काम नहीं बचा था. आशु ने साडी आधी ही फोल्ड की थी और जब वो उसे दुबारा फोल्ड करने को झुकी तो मैंने उसका हाथ पकड़ के झटके से अपनी तरफ खिंचा. आशु सीधा मेरे सीने से आ लगी और अपन असर मेरे सीने में छुपा लिया. अब तो मेरे लिए सब्र कर पाना मुश्किल था. मैंने आशु को गोद में उठाया और उसे पलंग पर लिटा दिया. आशु ने भी फटाफट अपना ब्लाउज खोलना शुरू किया और इधर मैंने उसके पेटीकोट का नाडा खोल दिया. ब्लाउज आशु ने निकाला तो उसका पेटीकोट मैंने निकाल कर कुर्सी पर रख दिया. अब आशु सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी और मैं अभी भी पूरे कपड़ों में था. मैंने एक-एक कर सारे कपडे निकाल कर कुर्सी पर रखे. आशु उठ के बैठी और अपनी ब्रा का हुक खोल उसे निकाल दिया. अभी मैं ये कपडे कुर्सी पर रख ही रहा था की आशु ने मेरे कच्छे के ऊपर से मेरे लिंग को चूम लिया और अपनी दोनों हाथों की उँगलियों को मेरे कच्छे की इलास्टिक में फँसा कर नीचे सरका दिया. आगे का काम मैंने खुद ही किया और कच्छा निकाल कर कुर्सी पर रख दिया.

"क्या बात है जानू! आज तो सारे कपडे आप कुर्सी पर रख रहे हो?"

"कल मेरी जान को उठा के ना रखने पड़े इसलिए कुर्सी पर रख रहा हु." ये कहते हुए मैं आशु की बगल में लेट गया.आशु ने एकदम से मेरी तरफ करवट ली और मेरे होठों को किस करने लगी. "आज पार्लर के बाहर आप बहुत नौटी हो गये थे?" आशु ने मेरे ऊपर वाले होंठ को चूमते हुए कहा. "पहले तुम नौटी हो जाए करती थी अब मैं हो जाता हूँ!" मैंने जवाब दिया और आशु को अपनी योनी मेरे मुँह पर रख कर बैठने को कहा. आशु बैठी तो सही पर उसका मुँह मेरे लिंग की तरफ था और इससे पहले की मैं उसकी योनी को अपनी जीभ से छु पाता वो आगे को झुक गई और तब मुझे एहसास हुआ की आशु ने अब भी पैंटी पहनी हुई थी. हम दोनों इतना बेसब्र हो गए थे की आशु की पैंटी उतारने के बारे में भूल गए थे. मेरा मन आज उसकी योनी का स्वाद चखने का था. ऐसा लग रहा था जैसे एक अरसा हुआ उसकी योनी का स्वाद चखे! मैंने आशु को सीधा बैठने को कहा, तो वो अपनी योनी मेरे मुँह पर टिका कर बैठ गई.

फिर मैंने उसे अपनी पैंटी को उसके योनी के छेद के ऊपर से हटाने को कहा ताकि मैं उसे अच्छे से चाट सकू. आशु ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से अपनी पैंटी को इस कदर साइड किया की मुझे आशु के योनी के द्वार साफ़ नजर आये. मैंने अपनी जीब निकाल कर आशु की योनी को चाटना शुरू किया, "ससससस...आह...सस्म्ममं मममम मममम" की आवाज मेरे कमरे में गूँजने लगी. मस्ती आकर आशु ने अपनी योनी को मेरे मुँह पर आगे-पीछे रगड़ना शुरू कर दिया. उसके ऐसा करने से मेरे होठों और उसकी योनी की पंखड़ियों में घर्षण पैदा होता और आशु सिस्याने लगती! अगले पांच मिनट तक आशु अपनी योनी को इसी तरह अपनी योनी को मेरे मुँह पर घिसती रही पर अब भी एक अड़चन थी.

आशु अब भी अपनी पैंटी पकड़ के बैठी थी जिससे उसे वो स्पीड हासिल नहीं हो रही थी जो वो चाहती थी. आशु उठी और गुस्से से अपनी पैंटी निकाल फेंकी और दुबारा मेरे मुँह पर बैठ गई. इस बार आसन दूसरा ग्रहण किया, इस बार वो मेरी तरफ मुँह कर के बैठी, उसका दायाँ हाथ मेरे मस्तक पर था और बाएं हाथ को उसने मेरे पेट पर रख कर सहारा लिया ताकि वो गिर ना जाये.

मैंने अपनी जीभ निकल के आशु की योनी के अंदर प्रवेश कराई की आशु की सिसकारी निकल पड़ी और उसने अपनी कमर को पहले की तरह आगे-पीछे चलाना शुरू कर दिया. ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जीभ मेरे लिंग का काम कर रही है और आशु की योनी छोड़ रही हे. आशु की नजर मेरे चेहरे पर टिकी थी और वो ये देख रही थी की मुझे इसमें कितना मज़ा आ रहा हे. दस मिनट तक आशु बिना रुके लय बद्ध तरीके से अपनी कमर को मेरे होठों पर आगे-पीछे करती रही और मैं उसकी योनी को किसी आइस-क्रीम की तरह चाटता रहा. "ससाह...ममः...मममममम...अअअअअअअअ ...!!!" कर के आशु ने पानी छोड़ा जो बहता हुआ मेरे मुँह में भर गया.

आशु मेरे ऊपर से लुढ़क कर लेट गई. इधर मेरा लिंग पूरी तैयारी में खड़ा था और इंतजार कर रहा था की उसका नंबर कब आएगा? आशु कुछ तक गई थी इसलिए वो अपनी साँसों को काबू कर रही थी पर उसकी नजर मेरे लिंग पर थी. मैंने अपने लिंग को पकड़ा और उसे हिला कर उसे उसके दर्द का एहसास दिलाया. थोड़ा प्यार तो उस बिचारे को भी चाहिए था.....

आशु को भी मेरे लिंग पर तरस आ गया, या ये कहे की उसके मुँह में पानी आ गया.वो उठ के बैठी मेरे लिंग को अपने मुट्ठी में पकड़ के उसका अच्छे से दीदार करने लगी. उसके हाथ लगते ही प्री-कम की एक बूँद लिंग के छेद से बाहर आई, आशु ने लिंग की चमड़ी पकड़ के उसे एक बार ऊपर-नीचे किया तो उस प्री-कम की बूँद ने पूरे लिंग को गीला कर दिया.

आशु ने अपने गर्म-गर्म साँस का भभका मेरे लिंग पर मारा तो उसमें खून का प्रवाह तेज हो गया.आशु ने आधा लिंग अपने मुँह भरा और अपने मुँह को मेरे लिंग पर ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे आशु मेरे लिंग को जितना हो सके उतना अपने मुँह में और अंदर लेती जा रही थी. फिर कुछ पलों के लिए आशु ने जोश में आ कर मेरा पूरा लिंग अपने गले तक उतार लिया और कुछ सेकण्ड्स के लिए रूक गई. जब उसे लगा की उसकी सांस रूक रही है तो उसने पूरा लिंग अपने मुँह से निकाला. मेरा पूरा लिंग उसके थूक से सन गया था और चमकने लगा था. पर उसका मन अभी भरा नहीं था. आशु ने अपने हाथ से चमड़ी को आगे-पीछे किया और फिर अपनी जीभ से पूरे लिंग को जड़ से ले कर छोर तक चाटने लगी. अगले पल उसने वो किया जिसकी उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी. उसने झुक कर मेरे अंडकोष को अपने मुँह में भर के चूसा! मैं आँखें फाड़े उसे देखने लगा और आशु बस मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दी. आशु ने फिर से मेरे लिंग को अपने मुँह में लिया और अपने मुँह को फिर से ऊपर-नीचे करते हुए लिंग चूसने लगी. आज तो मुझे बहुत मजा आ रहा था और लग रहा था की मैं छूट जाऊँगा इसलिए मैंने आशु को रोका और लिटा दिया. उसकी टांगों को चौड़ा कर मैं बीच में आ गया.लिंग को उसकी योनी पर सेट किया और एक झटका मार के अंदर ठेल दिया. चूँकि मेरा लिंग पहले से ही आशु के थूक और लार से भीगा हुआ था इसलिए मुझे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी. एक धक्का और आधे से ज्यादा लिंग अंदर पहुँच गया!

आशु की योनी अंदर से बहुत गीली हो चुकी थी और वो मेरा पूरा लिंग खाना चाहती थी. इसलिए अगले धक्के से पूरा लिंग अंदर चला गया "आह! ममममम ममममममममम ...ससस..!!!" अंदर की गर्माहट पा कर लिंग प्रफुल्लित हो उठा और मैंने अब अपने लिंग को जड़ तक अंदर पेलना शुरू कर दिया. जब लिंग अंदर पूरा पहुँचता तो आशु की योनी अंदर से टाइट हो जाती और लिंग बाहर निकालते ही उसकी योनी अंदर से ढीली हो जाती. अगले पाँच मिनट तक मैं इसी तरह आशु की योनी ठुकाई करता रहा. आशु की आँखों में मुझे कभी न खत्म होने वाली प्यास नजर आ रही थी इसलिए मैं उस पर झुका और उसके होठों को किस किया, मैंने वापस खड़ा होना चाहा पर आशु ने अपने अपनी एक बाँह को मेरे गले में डाल दिया और मुझे अपने ऊपर ही झुकाये रखा.

मैं उसके ऊपर झुके हुए ही अपनी कमर को चलाता रहा और आशु की योनी से पूछ-पूछ की आवाज आती रही. "स्सम्म्म हहहह ...मामामा..आह!" कहते हुए आशु उन्माद से भरने लगी! उसकी योनी में घर्षण बढ़ चूका था और वो किसी भी वक़्त छूट सकती थी पर मुझे अभी और समय चाहिए था. इतने दिनों से जो प्यासा था! मैं रूका और आशु को पलट के उसे घुटनों के बल आगे को झुका दिया. आशु के घुटने मुड़ के उसकी छाती से दबे हुए थे, मैंने पीछे से आशु के कूल्हों को पकड़ के उसके योनी के सुराख को उजागर किया और अपना लिंग अंदर पेल दिया!

हमला इतना तीव्र था की आशु दर्द से तड़प उठी; "अअअअअअअहहहहहहहह !!!" चिल्लाते हुए उसने बिस्तर की चादर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया. मेरा पूरा लिंग आशु की योनी में उतर चूका था इसलिए मैंने बिना रुके धक्के मारने शुरू कर दिये. हर धक्के से आशु का जिस्म कांपने लगा था और आनंद और दर्द के मिले जुले एहसास ने उसे छूटने के कगार पर पहुँचा दिया. मैं भी स्खलित होने के बहुत नजदीक था इसलिए मेरे धक्कों की गति और बढ़ गई थी! अगले कुछ पलों में पहले मैं और फिर आशु एक साथ स्खलित हुए और एक दूसरे से अलग हो कर पस्त हो गये. सांसें दुरुस्त हुई तो मैंने आशु को देखा, उसके चेहरे पर संतुष्टि की ख़ुशी दिखी| "कभी-कभी जान निकाल देते हो आप!" आशु ने प्यार भरी शिक़ायत की तो जवाब मैंने अपने दोनों कान पकडे और उसे सॉरी कहा. "पर मज़ा भी तभी आता है!" आशु ने शर्माते हुए कहा. मैंने उठ के आशु को अपने ऊपर खींच लिया और उसके गालों को चूमा और हम दोनों ऐसे ही सो गये.

अगली सुबह हुई तो हम अब भी उसी तरह लेटे हुए थे. आशु की आँख खुली और उसने मेरी गर्दन को चूमा तब मेरी आँख खुली. मैंने आशु के सर को चूमा और तब आशु उठ के बाथरूम में घुस गई. मैं भी अंगड़ाई लेता हुआ उठा और अपना फ़ोन देखा तो उसमें एक मेल आई थी. मुझे एक इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था. मेरे पास बस दो घंटों का समय था इसलिए जैसे ही आशु बाथरूम से निकली मैं तुरंत बाथरूम में घुस गया.१० मिनट में नहा कर बाहर आया, आशु मेरी टी-शर्ट पहने हुए चाय बना रही थी. "जान! प्लीज जल्दी से कपडे पहनो, आई हॅव एन इंटरव्ह्यू टू कॅच!" ये सुनते ही आशु ने फटाफट चाय बनाई और मेरे लिए टोस्ट भी बना दिये. मैंने कपडे पहने और खड़े-खड़े ही नाश्ता किया और दोनों साथ निकले, आशु को मैंने हॉस्टल छोड़ा; "बेस्ट ऑफ लक!!!" आशु ने कहा और मैंने मुस्कुरा कर थैंक यू कहा. फिर मैं इंटरव्यू के लिए पहुँच गया, वहाँ गिनती के लोग थे और जब मेरा नंबर आया तो उन्होंने मेरा रिज्यूमे देखा और फाइनली मैं सेलेक्ट हो गया! आज जितनी ख़ुशी मुझे पहले कभी नहीं हुई थी! मैंने तुरंत आशु को कॉल किया और उसे कॉलेज के बाहर बुलाया, वो भी मेरी आवाज से मेरी ख़ुशी समझ चुकी थी. मैं ख़ुशी से इतना बावरा हो गया था की मुझे कोई होश नहीं था. जैसे ही आशु कॉलेज के गेट से बाहर आई मैंने उसे गोद में उठा लिया और गोल-गोल घूमने लगा. "आई एम सो हॅपी!" कहते हुए मैंने आशु को नीचे उतारा, कॉलेज का गार्ड मुझे ऐसा करते हुए देख रहा था. जब मेरा ध्यान उस पर गया तो मैंने आशु का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर पार्क की तरफ भागा.आशु भी मेरे साथ ऐसे भाग रही थी जैसे मैं उसे लिटरली घर से भगा कर ले जा रहा हु. आस-पास जो भी कोई था वो हम दोनों को इस तरह भागते हुए देख रहा था. आखिर हम पार्क पहुँचे और वहाँ बेंच पर बैठ कर अपनी साँसों को काबू करने लगे.
 
"आई ..... गोट दीं जॉब!" मैंने उखड़ी-उखड़ी साँसों को काबू में करते हुए कहा. इतना सुनना था की आशु मेरी तरफ मुड़ी और कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया. "४०,००० पर मंथ स्याटर्डे इज हाल्फ डे!"

"थयांक गॉड!" आशु ने भगवान् को शुक्रिया करते हुए कहा.

"हाँ बस एक दिक्कत है, हेड ऑफिस उन्नाओ में हे. तो हफ्ते में एक दिन अप-डाऊन करना पडेगा." मैंने कहा.

"कोई बात नहीं!" एक-आध दिन सब्र कर लेंगे!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा.

"जान! सब कुछ सेट हो गया है अब! ४०००० ... उफ्फ्फ!! मुझे तो यक़ीन नहीं हो रहा!”

"तो चलो एक बार हिसाब कर लेते हैं की आपके क्या-क्या एक्सपेंसेस हैं?" आशु ने बैग से कॉपी पेन निकालते हुए कहा. ये हरकत बचकानी थी पर मैं तो पहले से ही सब हिसाब किये बैठा था. मैंने अपना फ़ोन निकला और आशु को एक मैसेज भेजा जिसमें सारा हिसाब पहले से ही लिखा था. जब आशु ने वो पढ़ा तो वो हैरानी से मुझे देखने लगी:

१. घर का किराया: ८,५००/- (इस महीने से बढ़ रहा हे.)

२. राशन (मैक्सिमम): ३,०००/-

३. बाइक की मेंटेनेंस: ३,०००/- जिसमें १,०००/- रीइमबर्स होगा.

४. अतिरीक्त खर्चा: ४,०००/- (प्रोव्हिजन फॉर एनी अनएक्सपेकटेड एक्सपेंस)

हर महीने बचत: (कम से कम) २२,५००/- इस हिसाब से ३१ महीने (आशु के थर्ड ईयर के पेपर देने तक) के हुए ६,९७,५००/

आशु ने जब ६ लाख की फिगर देखि तो उसकी आँखें छलक आईं; "जान ये फिगर और भी बढ़ेगी क्योंकि ये जो मैंने अतिरिक्त खर्चा रखा है ये भी कभी न कभी बचेगा! तो कम से कम ये मान कर चलो की हमारे पास ७ लाख होंगे! इतने पैसों से हम नई जिंदगी आराम से शुरू कर सकते हे. अगर मैंने इन पैसों की एफडी करा दी तो ब्याज और भी मिलेगा!” उस समय मेरे दिमाग में जो अकाउंटेंट वाला दिमाग था वो बोलने लगा था और सारी प्लानिंग कर के बैठा था. आशु रोती हुई मुझसे लिपट गई; "जानू! मुझसे इन ३१ महीनों का सब्र नहीं होता!"

"जान! मैं हूँ ना तेरे साथ, ये ३१ महीने मैं अपने प्यार से भर दूँगा!" मैंने आशु के सर को चूमते हुए कहा.

"जोइनिंग कब से है?" आशु ने पूछा.

"नेक्स्ट मंथ से! शुरू में तुम्हें थोड़ी दिक्कत होगी, क्योंकि काम समझने में थोड़ा टाइम लगेगा."

"कोई बात नहीं! कम से कम आधा शनिवार और पूरा रविवार तो होगा हमारे पास!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा.

अब ये ख़ुशी सेलिब्रेट करनी तो बनती थी. इसलिए हम दोनों पिक्चर देखने गए और पिक्चर के बाद मैंने खुद हॉस्टल आंटी जी को फ़ोन कर दिया ये बोल कर की आशु मेरे साथ है और मैं उसे डिनर के बाद छोड़ दूंगा. हमने अच्छे से डिनर किया और फिर मैंने एक मिठाई का डिब्बा लिया और आशु को हॉस्टल छोड़ने चल दिया. वहाँ पहुँच के आंटी जी के पाँव छुए और उनका मुँह मीठा कराया की मेरी जॉब लग गई हे. तभी सुमन भी आ गई और वो भी खुश हुई की मेरी नौकरी लग गई है और पूरा का पूरा मिठाई का डिब्बा ले कर खाने लगी.

इसी तरह दिन गुजरने लगे और दिवाली का दिन भी जल्द ही आ गया.मैं आशु को हॉस्टल से लेकर सीधा प्रसाद की दूकान पर पहुँचा और माँ, ताई जी और भाभी के लिए साड़ियां खरीदी. एक साडी मैंने आशु के लिए भी खरीदी पर किसी तरह नजर बचा कर ताकि वो देख न ले, ताऊ जी, पिताजी और नारायण भैया के लिए सूट का कपडा लिया. वैसे तो मैं नारायण भैया और भाभी के लिए कुछ लेना नहीं चाहता था पर मजबूरी थी वरना सब कहते की इनके लिए क्यों कुछ नहीं लाया. ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों घर पहुँचे तो देखा घर का रंग-रोगन कराया जा चूका था. आशु तो सीधा घर घुस गई और में बाईक खडी कर पिताजी से मिला और उनके पाँव को हाथ लगाए. फिर उन्हें और ताऊ जी को ले कर मैं आँगन में आ गया और चारपाई पर बिठा दिया.

"आशु, दरवाजा बंद कर दे!" मैंने आशु से कहा और फिर सभी को आवाज दे कर मैंने आंगन में बिठा दिया. एक-एक कर सब को उनके तौह्फे दिए तो सभी खुश हुए, सबसे ज्यादा अगर कोई खुश हुआ तो वो थी आशु जब मैंने उसे सबके सामने साडी दी. घर में उसने आज तक कभी साडी नहीं पहनी थी पर ये बात हमेशा की तरह भाभी को खटकी; "इसे साडी पहनना भी आता है?" उन्होंने कहा तो मुझे बड़ी मिर्ची लगी और मैंने उन्हें सुनाते हुए कहा; "आप कौन सा माँ के पेट से सीख कर आये थे? इसी दुनिया में सीखा ना? आप चिंता ना करो आशु आपको तंग नहीं करेगी की उसे साडी पहना दो, ताई जी हैं और माँ हैं वो सीखा देंगी" अब ये बात भाभी को चुभी पर ताई जी ने बीच में पड कर बात आगे बढ़ने नहीं दी वरना ताऊजी से डाँट पड़ती! "ये बता की तुम दोनों ने कुछ खाया भी था?" ताई जी पूछा. मैंने बस ना में गर्दन हिलाई तो ताई जी ने खुद देसी घी के परांठे बनाये और मैंने डट के खाये!

चूँकि आज धनतेरस थी तो शाम को खरीदारी करने जाना था. हर साल पिताजी और ताऊ जी जाय करते थे पर इस बार मैं बोला; "ताऊ जी सारे चलें?" अब ये सुन कर वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगे. अब बाजार घर के इतने नजदीक तो नहीं था की सारे एक साथ पैदल चले जाये. बाइक से ही मुझे आधा घंटा लगता था. जब कोई कुछ नहीं बोला तो मुझे ही रास्ता सुझाना था. "नारायण भैया आपका वो दोस्त है ना ...क्या नाम है...अशोक! उसे बुला लो ना?" ये सुनते ही वो मुस्कुरा दिए और फ़ोन निकाल कर उसे आने को कहा. अशोक का भाई मेरा दोस्त था और शादी-ब्याह में वो अपने ट्रेक्टर-ट्राली बारातियों के लाने-लेजाने के लिए किराये पर देते थे. "तू ज्यादा होशियार नहीं हो गया?" पिताजी ने प्यार से मेरे कान पकड़ते हुए कहा. ताऊ जी हँस दिए और उन्होंने सब को तैयार होने का आदेश दे दिया. सब तैयार हुए पर अब भी एक दिक्कत थी. वो ये की ट्रेक्टर चलाएगा कौन? नारायण भैया को तो आता नहीं था. इसलिए मैंने ही पहल की. जब स्कूल में पढता था तब कभी-कभी मस्ती किया करता था और हम दो-चार दोस्त मिल कर अशोक भैया का ट्रेक्टर खेतों में घुमाया करते थे. "तुझे ट्रेक्टर चलाना आता है?" ताऊ जी ने पूछा. मैंने हाँ में गर्दन हिलाई; "अरे तो पहले क्यों नहीं बताया? हम बेकार में ही दूसरों को इसके पैसे देते थे, इतने में तो नया ट्रेक्टर आ जाता." ताऊ जी बोले. "पर राज भैया घर पर होंगे तब तो?" पीछे से भाभी की आवाज आई अब मन तो किया की उन्हें कुछ सुना दूँ पर चुप रहा ये सोच कर की आज त्यौहार का दिन है क्यों खामखा सब का मूड ख़राब करू.

मैं ड्राइविंग सीट पर बैठा था और मेरे दाहिने हाथ पर ताऊ जी बैठ थे, बाईं तरफ पिताजी बैठ थे और बाकी सब एक-एक कर पीछे ट्राली में बैठ गये. इतने दिनों बाद ट्रेक्टर चला रहा था तो शुरू में बहुत धीरे-धीरे चलाया, फिर जैसे ही मैं रोड पकड़ा तो जो भगाया की एक बार को तो ताऊ जी बोल ही पड़े; "बेटा! धीरे!" तब जाके मैंने स्पीड कम की और हम सही सलामत बाजार पहुँच गए! बाजार में पिताजी के जान पहचान की एक दूकान थी और मैंने वहीँ ट्रेक्टर रोका और एक-एक कर सब उतरने लगे. सबसे आखरी में आशु रह गई थी और मुझे आज कुछ ज्यादा ही रोमांस चढ़ रहा था. जब वो उतरने लगी तो मैंने जानबूझ कर उसे कमर से पकड़ लिया और नीचे उतारा.हालाँकि इसकी कोई जरुरत नहीं थी पर आशिक़ी आज कुछ ज्यादा ही सवार थी. भाभी ने मुझे ऐसे करते हुए देखा तो बोली; "हाय! कभी मुझे भी उतार दो ऐसे!" ये सुनते ही आशु को मुँह फीका पड़ गया."आप बहुत मोटे हो!!! आपको उठाने जाऊँगा तो मेरी कमर अकड़ जाएगी!" ये सुन कर माँ और ताई जी हँसने लगे और बेचारी भाभी शर्म से नीचे देखने लगी. पिताजी, नारायण भैया और ताऊ जी तो आगे चल दिए और इधर माँ, ताई जी, भाभी और आशु को साड़ियों का माप देना था. तो उनके साथ रहने की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई. पिताजी एंड पार्टी तो अपने जान पहचान वाले दूकान दारों से मिलने लगे तो मैंने सोचा की हम सारे कुछ खा-पी लेते हे. पर पहले माप देना था. सब एक-एक कर अपना माप लिखवा रहे थे और मैं बाहर खड़ा था और मोहित-प्रफुल के मैसेज पढ़ रहा था.

माप दे कर सबसे पहले ताई जी आईं और उन्होंने पुछा की ताऊ जी कहाँ हैं तो मैंने कह दिया वो तो आगे चले गए सब से मिलने. "तो बेटा उन्हें फ़ोन कर." ताई जी ने कहा. "छोडो ना ताई जी, चलो चल के कुछ खाते हैं." ताई जी मुस्कुरा दी और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं; "बाकियों को आने दे, फिर चलते हैं." इतने में माँ आ गई और ताई जी ने हँसते उन्हें कहा; "तेरा लड़का समझदार हो गया हे. इसके लिए समझदार बहु लानी होगी." मैं ये सुन कर हँस पड़ा, क्योंकि मैं जानता था की मेरी पसंद थोड़ी नासमझ है! पीछे से भाभी और आशु भी आ गये. फिर हम एक जगह बैठ के चाट खाने लगे, तभी नारायण भैया हमें ढूँढ़ते हुए आ गए और हमें मज़े से चाट खाते हुए देख बोले; "वहाँ पिताजी आप सब को ढूँढ रहे हैं और आप सारे यहाँ बैठे चाट खा रहे हो?"

"अरे भूख लगी है तो कुछ खाये नहीं?!" ताई जी नारायण भैया को डाँटते हुए कहा. इतने में हम सबका खाना हो गया और हम सारे के सारे उठ के चल दिए, ताऊ जी ने जब पुछा तो ताई जी ने कह दिया की भूख लगी थी तो कुछ खा रहे थे. ताऊ जी ने फिर कुछ नहीं कहा और हमने खरीदारी की. पर इस बार ताई जी बहुत ज्यादा ही खुश थीं इसलिए वो माँ, भाभी और आशु को ले कर एक सुनार की दूकान में घुस गई. ये हमारी खानदानी जान पहचान की दूकान थी तो सारा परिवार अंदर जा कर बैठ गया.हम सब की बड़ी आव-भगत हुई और मालिक ने खुद सब औरतों को जेवर दिखाये. आशु बेचारी चुप-चाप पीछे बैठी थी. इस डर से की कहीं कोई उसे डाँट ना दे.पर डाँट तो उसे फिर भी पड़ी, प्यार भरी डाँट! "डॉली ! तू वहाँ पीछे क्या कर रही है? यहाँ तेरे लिए ही आये हैं और तू है की पीछे बैठी है? चल जल्दी आ और बता कौनसी अच्छी है तेरे लिए?" ये सुन कर आशु का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.वो उठ के आगे आई और बोली; "दादी ... आप ही बताइये...मुझे तो कुछ पता नहीं!" ताई जी ने उसे माँ और अपने बीच बिठाया और उसे समझाते हुए बालियाँ पहनने को कहा. उसने एक-एक कर सब पहनी पर वो अब भी कन्फ्युज थी तो मुझे उसकी मदद करनी थी... पर कैसे? मैं इधर-उधर देखने लगा फिर सामने नजर शीशे पर पडी. आशु की नजर अब भी सामने आईने पर नहीं थी बल्कि वो ताई जी और माँ की बात सुनने में व्यस्त थी. मैं बस इंतजार करने लगा की आशु उस आईने में देखे ताकि मैं उसे बता सकूँ की कौन सी बाली बढिया हे.आखिर में उसने देख ही लिया, उसके दोनों हाथों में एक-एक डिज़ाइन था. मैंने उसे आँख के इशारे से बाएँ वाले को ट्राय करने को कहा, पर वो मुझे इतना नहीं जचा तो मैंने गर्दन के इशारे से दूसरे ट्राय करने को कहा. ये वाला मुझे बहुत पसंद आया तो मैंने हाँ में गर्दन हिला कर अपनी स्वीकृति दी! माँ ने मुझे आशु की मदद करते हुए देख लिया और बोल पड़ीं; "क्या बात है? तेरी पसंद बड़ी अच्छी है इन चीजों में?" माँ ने मजाक करते हुए कहा पर पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकला; "माँ कल को शादी होगी तो बीवी को इन सब चीजों में मदद करनी पड़ेगी ना? इसलिए अभी से प्रैक्टिस कर रहा हूँ!" ये सुनते ही सारे लोग जो भी वहाँ थे सब हँस पडे. आशु के गाल भी शर्म से लाल हो गए थे क्योंकि वो समझ गई थी की ये बात मैंने उसी के लिए कही हे. हँसते-खेलते हम घर लौटे और रात को खाने के बाद ताऊ जी, नारायण भैया और पिताजी सोने चले गये. मैं अब भी आंगन में बैठा था. ताई जी और सभी औरतें खाना खा रहीं थी. थकावट हो रही थी सो मैं अपने कमरे में आ कर सो गया, रात को आशु ने मेरा दरवाजा खटखटाया पर मैं बहुत गहरी नींद में था इसलिए मुझे पता नहीं चला.

अगली सुबह जब मैंने आशु से गुड मॉर्निंग कहा तो वो मुँह फूला कर रसोई में चली गई. मैं सोचता रह गया की अब मैंने क्या कर दिया? जब वो चाय देने आई तो बोली; "मुझे कल रात को आपसे कितनी बातें करनी थी. पर आपको तो सोना है!" ये सुन कर मेरे मुँह से 'उपसस....' निकला! पर आगे कुछ कहने से पहले ही वो चली गई. इधर पिताजी आये और मुझे अपने साथ चलने को कहा. मैंने अपनी बुलेट उठाई और पिताजी के साथ निकल पड़ा, दिन भर पिताजी ने जाने किस-किस को मिठाई देनी थी? कितनों के यहाँ बैठ के चाय पि शाम को घर आते-आते पेट में गैस भर गई! घर आते ही मैं पिताजी से बोला: "कान पकड़ता हूँ पिताजी! आज के बाद मैं आपके साथ दिवाली पर किसी के घर नहीं जाऊँगा!" ये सुन कर सारे हँस पडे. "क्यों?" पिताजी ने अनजान बनते हुए पुछा; "इतनी चाय...इतनी चाय! मैंने ऑफिस में कभी इतनी चाय नहीं पि जितनी आपके जानने वालों ने पिला दी! मुझे तो चाय से नफरत हो गई." तभी आशु जान बूझ कर एक कप में पानी ले कर आई और मुझे ऐसा लगा जैसे उसमें चाय हो, मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा; "ले जा इस कप को मेरे सामने से नहीं तो आज बहुत मारूँगा तुझे!" ये सुन कर आशु और सभी लोग खिल-खिला कर हँस पड़े! रात को खाना खाने की बिलकुल इच्छा नहीं थी. इसलिए मैं ऊपर छत पर चूरन खा रहा था.

सब के खाना खाने तक मुझे नींद आ गई और मैं छत पर ही पैरापेट वॉल से टेक लगा कर सो गया.आशु ने आ कर मुझे जगाया तब मेरी नींद खुली, मैंने अंगड़ाई लेते हुए उसे देखा; "आप यहाँ क्यों सो रहे हो?" उसने पूछा.

"कल बिना बात किये सो गया था ना, इसलिए मैं यहाँ तेरा इंतजार कर रहा था. पता नहीं कब नींद आ गई! अब बता क्या बात करनी थी?"

"कल बात करेंगे, अभी आप सो जाओ." आशु ने कहा तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने सामने आलथी-पालथी मार के बैठने को कहा.

"कल दिवाली है और कल टाइम नहीं मिलेगा, बोल अब!" मैंने कहा.

"कल.... मेरे पास शब्द नहीं....दादी ने मेरे लिए पहली बार बालियाँ खरीदी ....सब आपकी वजह से!!!" आशु का गला भर आया था इसलिए उसने बस टूटे-फूटे शब्द कहे...

"अरे पागल! मैंने कुछ नहीं किया! देर से ही सही ये खुशियाँ तुझे मिलनी थी और तुझे तो खुश होना चाहिए ना की रोना चाहिए!" मैंने उठ के आशु के आँसू पोछे.

"नहीं.... इस घर में एक बस आप हो जो मुझे इतना प्यार करते हो, हर बात पर मेरा बचाव करते हो. आपके इसी बर्ताव के कारन दादी का और बाकी सब का दिल मेरे लिए पसीजा हे. आप अगर नहीं होते तो कोई मेरे बारे में कभी नहीं सोचता, पहले सब यही चाहते थे की मेरी शादी हो जाए और मैं इस घर से निकल जाऊँ पर आपके प्यार के कारन अब सब मुझे इस घर का हिस्सा समझने लगे हैं." आशु ने अब रोना शुरू कर दिया था.

"अच्छा मेरी माँ! अब बस चुप हो जा!" मैंने आशु को अपने सीने से चिपका लिया तब जा कर उसका रोना बंद हुआ.

"तू ना...जितना हँसती नहीं उससे ज्यादा तो रोती हे. ग्लोबल वाटर क्राईसीस सोल्व करना है क्या तूने?" मैंने मजाक में कहा तो आशु की हँसी निकल गई. इस तरह हँसते हुए मैंने उसे उसके कमरे के बाहर छोड़ा और मैं अपने कमरे में घुस गया.सुबह हुई और मैं जल्दी उठ गया, एक तो भूख लगी थी और दूसरा आज सुबह काम थोड़े ज्यादा बचे थे. सारा काम निपटा के आते-आते दोपहर हो गई और फिर सब ने एक साथ खाना खाया और रात की पूजा के लिए तैयारियाँ शुरू हो गई. वही लालची पंडित आया और हम सब पूजा के लिए बैठ गये. सबसे आगे माँ-पिताजी और ताई जी-ताऊ जी थे, उनके पीछे नारायण भैया-भाभी और उनकी बगल में मैं और आशु बैठे थे. पूजा सम्पन्न हुई और पंडित अपनी दक्षिणा ले कर चला गया, इधर मैंने और आशु ने पूरी छत दीयों से सजा दी और सारा घर जगमग होगया.नीचे आ कर सब ने खाना खाया और फिर सब छत पर आ गए और आतिशबाजी देखने लगे. मैं नीचे से सब के लिए फूलझड़ी और अनार ले आया, फूलझड़ियां मैंने आशु, माँ, ताई जी और भाभी को जला कर दी तथा अनार जलाने का काम नारायण भैया और मैं कर रहे थे. "राज अगर बम ले आता तो और मजा आता" नारायण भैया ने कहा तो ताऊ जी ने मना कर दिया; "बिलकुल नहीं! वो बहुत आवाज करते हैं, यही काफी है!" नारायण भैया अपना मुँह झुका कर अनार जलाने लगे.

रात के नौ बजे थे और सब थके हुए थे इसलिए जल्दी ही सो गये. रात बारा बजे मैं उठा क्योंकि मुझे मिठाई खानी थी. तो मैं दबे पाँव नीचे आया और मिठाई का डिब्बा खोल कर मिठाई खाने ही जा रहा था की आशु आ गई. दोनों हाथ कमर पर रखे वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखती रही. मुझे उसे ऐसा देख कर कॉलेज की टीचर की याद आ गई और हँस पडा. "टीचर जी! सॉरी!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा तो आशु मुस्कुराती हुई मेरे पास आई और मिठाई के डिब्बे से मिठाई निकाल कर खाने लगी. अब तो हम दोनों मुस्कुरा रहे थे और मिठाई खा रहे थे, दोनों ने मिल कर आधा डिब्बा साफ़ कर दिया और फिर पानी पी कर दोनों ऊपर आ गये. मैंने झट से आशु का हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में खींच लिया. दरवाजे के साथ वाली दिवार से उसे सटा कर खड़ा किया और उसके गुलाबी होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा. आशु ने तुरंत अपने हाथ मेरी पीठ पर फिराने शुरू कर दिये. मेरा मन तो उसके निचले होंठ को पीने पर टिका था इधर आशु का जिस्म जलने लगा था. उसका हाथ अब मेरे लिंग पर आ गया और वो उसे दबाने लगी. अब उस समय संभोग करना बहुत बड़ा रिस्क था इसलिए मैं रुक गया; "जान! ये नहीं प्लीज! शहर जा कर!" आशु का दिल टूट गया और उसने अपना हाथ मेरे लिंग के ऊपर से हटा लिया. मैं मजबूर था इसलिए मैंने उसे बस "प्लीज!!!" कहा तो शायद वो समझ गई और धीमे से मुस्कुराई! अब आगे अगर मैं उसे किस करता तो फिर वही आग सुलग जाती इसलिए मैं रूक गया और उसे गुड नाईट कहा. मैं समझ गया था की आशु को बुरा लगा है पर उसने अगले ही पल पलट कर पंजों पर खड़े होते हुए मेरे होठों को चूम लिया और खिल-खिलाती हुई अपने कमरे में भाग गई. मैं भी खड़ा-खड़ा कुछ पल मुस्कुराता रहा और फिर सो गया.

अगली सुबह मैं उठा और जैसे ही नीचे आया की आशु ने मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया. "दादी जी...आपको पता है, रात को एक चोर आया था और देखो आधी मिठाई साफ़ कर दी!" ये सुन कर सारे लोग हँसने लगे और मैं भी मुस्कुराता हुआ चारपाई पर बैठ गया."ताई जी, चोर अकेला नहीं था! एक चोरनी भी थी उसके साथ!" ये सुन के तो सब ने ठहाका मार के हँसना शुरू कर दिया. "तुम दोनों की बचपन की आदत गई नहीं?" माँ ने मेरे कान पकड़ते हुए कहा. "ये दोनों जब छोटे थे तब ऐसे ही रात को रसोई में घुस जाते थे और मिठाई चुरा कर खाते थे!" माँ ने कहा. तभी भाभी बोली; "अरे! तो घर में चोरी कौन करता है? मांग कर खा लेते?" ये बात सब को बुरी लगी क्योंकि वहां तो बस मजाक चल रहा था. ताई जी को गुस्सा आया और वो भाभी को झिड़कते हुए बोलीं; "भक! ज्यादा बकवास की ना तो मारब एक कंटाप!"

"चुप कर जा हरामजादी!" नारायण भैया ने भी उन्हें झिड़क दिया और भाभी मुँह फूला कर चली गईं! पता नहीं क्यों पर भाभी से इस परिवार की ख़ुशी देखि नहीं जाती थी और मुझसे तो उनका ३६ का आंकड़ा था! पर फिर वो क्यों मुझे अपने जिस्म की नुमाइश किया करती थीं? ये ऐसा सवाल था जिसका जवाब जानने में मुझे कटाई रूचि नहीं थी. इसलिए मैं बस इस सवाल से बचता रहता था.

शाम को मंदिर में पूजा थी सो सब वहाँ चले गए, मुझे तो रास्ते में जय मिल गया तो मैं उससे बात करने में लग गया.उससे मिल कर मैं मंदिर पहुँचा पर वहाँ तो बहुत भीड़ थी. इसलिए मैं बाहर ही खड़ा रहा. सारी शाम भगवान के दर्शन मे बीत गयी. रात को खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था की आशु मिठाई का डिब्बा ले कर आ गई और मुझे डिब्बा खोल कर देते हुए गंभीर हो गई. "क्या हुआ?" मैंने पुछा तो वो सर झुकाये हुए बोली; "कल भाई-दूज है, घर में सब कह रहे थे की चूँकि मेरा कोई भाई नहीं इसलिए कल आपको तिलक...." इतना कहते हुए वो रुक गई! अब ये सुन कर तो मैं सन्न रह गया! मैं अपना सर पकड़ के खड़ा आशु को देखता रहा की शायद वो आगे कुछ और बोले पर वो सर झुकाये खामोश खड़ी रही. मैं नीचे जा कर भी कुछ नहीं कह सकता था वरना सब उसका 'सही' मतलब निकालते! 'सही' मेरे नितुसार होता, उनके नितुसार तो ये 'गलत' ही होता! मैं बिना आशु को कुछ कहे नीचे आ गया और फिर घर से बाहर निकल गया.कुछ देर बाद मैं घर आया तो माँ ने पुछा की कहाँ गया था. तो मैंने झूठ बोल दिया की ऐसे ही टहलने गया था. कुछ देर बाद मुझे जय का फ़ोन आया और मैं उससे जूठ-मूठ की बात करने लगा. मैंने घर में सब को ऐसे दिखाया जैसे की मेरा ऑफिस से कॉल आया हो और मैं झूठ-मूठ की बात करते हुए कल सुबह ही निकलने का प्लान बनाने लगा. बात खत्म हुई तो मुझे कैसे भी ये बात घर में सब को बतानी थी पर ये भी ध्यान रखना था की कहीं भाई-दूज के चक्कर में फँस जाऊ. "पिताजी कल कुछ ऑफिस के काम से मुझे बरेली निकलना होगा." मैं झूठ बोला.
 
"कुछ दिन के लिए आता है और उसमें भी ये तेरे ऑफिस वाले तेरा पीछा नहीं छोड़ते!" पिताजी ने थोड़ा डाँटते हुए कहा.

"दरअसल पिताजी प्रमोशन का सवाल है, इसलिए जा रहा हु. कल सुबह जल्दी निकल जाऊँगा और रात तक लौट आऊँगा." इतना कह कर मैं अपने कमरे में भाग लिया ताकि कहीं वो ये ना कह दें की सुबह तिलक लगवा के निकलिओ! कमरे में आते ही मैंने दरवाजा बंद किया और औंधे मुँह बिस्तर पर लेट गया.मुझे कैसे भी कर के खुद को इस भाई-दूज के दिन से बचाना था. सुबह मैं ३ बजे उठ गया, अभी तक आशु नहीं उठी थी. मैं फटाफट नहाया और तैयार हो कर नीचे आ गया.सुबह के चार बजे थे और अभी सिर्फ ताई जी जगी थीं, मुझे तैयार देख कर वो समझ गईं और चाय बनाने जाने लगी तो मैंने उन्हें मना कर दिया. इस डर से की कहीं आशु जाग गई तो फिर फँस जाऊंगा. घर से तो निकल लिया पर अब समय भी तो काटना था. इसलिए में सीधा मंदिर चला गया और वहाँ जा कर बैठ गया.५ घंटे बाद मुझे जय का फ़ोन आया और उसने मुझे बजार से पिक करने बुलाया, मैं बुलेट रानी के संग बाजार पहुँचा और जय को पिक किया. जय को दरअसल कुछ काम से लखनऊ जाना था तो मैंने उसे ये झूठ बोल दिया की पिताजी कुछ काम से मुझे रिश्तेदारों के भेज रहे हैं, अब मैं वहाँ गया तो फिर वही शादी का रोना होगा. ये था तो बकवास बहाना पर जय को जरा भी शक नहीं हुआ. पूरा दिन उसके साथ ऐसे ही घुमते-फिरते बीता बस फायदा ये हुआ की मुझे खेती-बाड़ी के काम के बारे में कुछ सीखने को मिल गया की बीज कहाँ से लेते हैं, यूरिया कौन सा अच्छा होता है और मंडी कहाँ है, आदि.

शाम हुई तो जय ने कहा की चल दारु पीते हैं, पर मैं तो वचन बद्ध था! तो मैंने उसे ये बोल कर टाल दिया की मैं त्योहारों में दारु नहीं पीता! पर उसे तो पीनी थी. वो भंड हो के पीने लगा और रात ११ बजे तक पीता रहा. पीने के बाद उसे याद आई उसके जुगाड़ की! तो उसने मुझे उसकी गर्लफ्रेंड के घर ले चलने को कहा. ये कोई लड़की नहीं बल्कि एक विधवा भाभी थी जो उसी के रिश्ते में थी. नैन-नक्श से तो बड़ी कातिल थी और उसकी जवानी उबाले मार रही थी. जब बाइक उसके घर रुकी तो वो बाहर आई और हम दोनों को देख कर जैसे खुश हो गई. उसे लगा की आज तो उसे दो-दो लिंग मिलने वाले हैं, पर भैया हम तो पहले से ही आशु के हो चुका था.! मैंने जैसे-तैसे जय को उतारा और अंदर ले गया, बिस्तर पर छोड़ कर मैं पलट के बाहर आने लगा तो भाभी बोली; "आपका नाम राज है ना? जय ने आपके बारे में बहुत बताया हे." अब मैं उनसे बात करने के मूड में कतई नहीं था इसलिए मैं बिना कुछ कहे साइड से निकलने लगा; "रुक जाओ ना आज रात!" भाभी ने बड़ी अदा से कहा पर मैंने अपना भोला सा चेहरा बनाया और कहा: "भाभी घर जाना है, सब राह देख रहे होंगे."

"अरे तो कौन सा तुम्हारी लुगाई है जिसके पास जाने को उतावले हो रहे हो? तनिक रूक जाओ आज रात, कुछ बात करेंगे!" भाभी इठलाते हुए बोली.

"अरे दो प्रेमियों के बीच मेरा क्या काम? खामखा कबाब में 'हड्डा' लगूँगा"

"अरे काहे के प्रेमी! ई सार बस साडी उठात है और चढ़ी जात है!" भाभी ने जय पर गुस्सा निकालते हुए कहा.

"अब जउन बोओ है, सो काटो! इतना कह कर मैंने बाइक स्टार्ट की और घर के लिए निकल पडा. मेरे घर पहुँचते-पहुँचते १ बज गया था. सब सो चुका था. एक बस मेरी प्यारी जान थी जो जाग रही थी. रात के सन्नाटे में बुलेट की आवाज सुन उसने दरवाजा खोला. मैं अंदर आया तो उसने उदास मुखड़े से पुछा: "आपने खाना खाया?" तो मैंने हाँ कहा, फिर इस डर से की कहीं कोई जाग ना जाये मैं चुपचाप ऊपर आ गया और अपने कपडे उतारने लगा. तभी आशु ऊपर आ गई और मेरे लिए दूध ले आई, ये दूध वो मेरी परीक्षा लेने के लिए लाइ थी! दरअसल मेरे कपड़ों से दारु की महक आ रही थी और आशु को मुझसे ये सीधा पूछने में डर लग रहा था. मैं समझ गया की क्या माजरा है इसलिए मैंने दूध का गिलास उठाया और आशु को दिखते हुए गटागट पी गया.आशु को तसल्ली हो गई की मैंने शराब नहीं पि हे. "जानू!.... एक बात कहूँ? आप नाराज तो नहीं होंगे?" आशु ने सर झुकाये हुए कहा. मैने बस हाँ में सर हिलाया और आशु को अपनी नितुमति दी.

"मैं कल ....आपसे मजाक किया था .....की भाई-दूज के लिए ....." आशु इतना बोल कर चुप हो गई. ये सुन कर मुझे बहुत हँसी आई! पर अब मेरी बारी थी आशु से मजाक करने की. मैंने गुस्से से आशु को देखा, पर उसकी गर्दन झुकी हुई थी तो वो मेरा गुस्से से तमतमाता हुआ चेहरा देख नहीं पाई| मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर की और तब उसकी नजर मेरी गुस्से से लाल आँखों पर पड़ी; "तू पागल है क्या? तेरी वजह से में दिनभर मारा-मारा फिरता रहा! तुझे मजाक करने के लिए यही टॉपिक मिला था?" मैंने गुस्से से दबी हुई आवाज में दाँत पीसते हुए कहा. आशु बेचारी शं गई और लघभग रोने ही वाली थी की मैंने हँसते हुए अपनी छाती से चिपका लिया और उसके सर को सहलाते हुए कहा; "जान! मैं मजाक कर रहा था! आप मुझसे मज़ाक कर सकते हो तो मैं नहीं कर सकता?" ये सुन कर आशु को इत्मीनान हुआ की अभी मैं सिर्फ मज़ाक कर रहा था. "जानू! आप न बड़े खराब हो! मेरी तो जान ही निकाल दी थी आपने? दो मिनट आप और ये ड्रामा करते ना तो सच्ची में मैं रोने लगती!" आशु ने थोड़ा सिसकते हुए कहा. मैंने आशु के सर को चूमा और उसे जा कर सोने को कहा.

अगली सुबह हमें शहर वापस जाना था तो दोनों समय से उठ गए और नाहा-धो के नाश्ता कर के निकल लिए. कुछ दूर जाते ही आशु ने अपना बैठने का पोज़ बदल लिया और मुझसे कस कर चिपक गई. दोनों ही के मन में तरंगें उठ रहीं थी. क्योंकि शहर पहुँचते ही दोनों एक दूसरे में खो जाना चाहते थे. मैंने बाइक ढाबे के पास स्लो की तो आशु बोली; "प्लीज मत रुको! सीधा घर चलते हैं!" उसकी बात सुन के उसकी बेसब्री साफ़ जाहिर हो रही थी. मन तो मेरा भी उसे पाने को व्याकुल था. इसलिए मैंने बाइक फिर से हाईवे पर दौड़ा दी! घर पहुँच कर मैं बाइक खडी कर रहा था और आशु फटाफट ऊपर भागी, दरअसल उसे बाथरूम जाना था! मैं ऊपर पहुँचा तो आशु बाथरूम से निकल रही थी. मैंने दरवाजा बंद किया और हाथ धो ने के लिए बाथरूम जाने लगा. "कहाँ जा रहे हो?" आशु ने पुछा और मेरा हाथ पकड़ के मुझे बिस्तर पर खींच लिया. "जान! हाथ-मुँह तो धो लूँ?" मैंने कहा पर आशु के बदन की आग भड़कने लगी थी. "क्या करना है हाथ-मुँह धो के? बाद में अच्छे से नहा लेना, अभी तो आप मेरे पास रहो! बहुत तड़पाया है आपने!"

मैं ने आशु को पलट कर अपने नीचे किया और उसके ऊपर आ कर उसके थर-थर्राते होटों को देखा. मैंने नीचे झुक कर उन्हें चूमना शुरू किया और आशु ने मेरा पूरा सहयोग दिया.

हम दोनों अभी होठों से एक दूसरे के दिल की आग को भड़का रहे थे की आशु का फ़ोन बड़ी जोर से बज उठा.आशु को तो जैसे उस फ़ोन की कोई परवाह ही नहीं थी पर मेरे लिए उस फ़ोन की रिंगटोन बड़ी कष्टदाई थी! मैं आशु के ऊपर से उठ गया और आशु का फ़ोन उठा के उसे दिया. "क्या जानू? बजने देना था न?" आशु ने नाराज होते हुए कहा. "यार मुझसे ये शोर बर्दाश्त नहीं होता! इसे जल्दी से निपटा तब तक मैं हाथ-मुँह धो लेता हु." मैं इतना कह कर बाथरूम में घुस गया और इधर गुस्से में कॉल करने वाली पर बिगड़ गई! "तुझे ये नंबर दिया किसने? उस कुतिया की तो.....!!! हाँ ...ठीक है....बोला ना आ रही हूँ! तू फ़ोन रख!" मैं बाहर आया तो देखा आशु गुस्से में तमतमा रही हे. "क्या हुआ?" मैंने पुछा तो आशु गुस्से में बोली; "उस हरामज़ादी ने मेरा नंबर सब लड़कियों को बाँट दिया! ऊपर से प्रोफेसर ने आज असाइनमेंट्स सबमिट करने की लास्ट डेट कर दी है! नहीं जमा करने पर पेनल्टी लगा रहे है!"

"पर तेरे तो सारे असाइनमेंट्स पूरे हैं? फिर क्यों गुस्सा हो रही है?"

"पर मुझे आज का दिन आपके साथ बिताना करना था! कल से आपका ऑफिस है, फिर हम कब मिलेंगे?" मैंने अपनी बाहें खोलीं और आशु एक दम से मेरे गले लग गई. मैंने उसके सर को चूमते हुए कहा; "जान! मैं चाँद पर नहीं जा रहा की तुम से मिलने आ न सकूँ?! शुरू-शुरू थोड़ी दिक्कत होगी, पर तुम जानती हो ना मैंने तुम्हें कभी नाराज नहीं करता? फिर क्यों चिंता करती हो?"

हम दोनों ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे कुछ देर खड़े रहे और फिर मैंने आशु को उसके हॉस्टल ड्राप किया. "आप प्लीज कहीं जाना मत, मैं अपने असाइनमेंट्स ले कर आती हु." ये कह कर आशु हॉस्टल में भागती हुई घुसी और फिर अपना बैग ले कर आ गई. फिर मैंने उसे उसके कॉलेज छोड़ा और मैं अपने घर वापस आ गया.चूँकि अगले दिन ऑफिस था तो मैंने अपने कपडे वगैरह सब प्रेस कर के तैयार किये, बैग धो कर रेडी किया, थोड़ी बहुत घर की साफ़-सफाई की और दोपहर और रात का खाना बना लिया. शाम ४ बजे मैं आशु से मिलने निकल पड़ा, ठीक ५ बजे मैं उसके कॉलेज के गेट के सामने खड़ा था. तभी वहाँ अक्षय आ गया और आ कर मेरे पास खड़ा हो गया.उसे देखते ही मुझे याद आ गया की साले ने जो निशा से चुगली की थी!

मैं: तूने निशा से क्या कहा था मेरे बारे में?

अक्षय: क...क्या बोल रहे हो आप?

मैं: क्या बोल रहा था तू की मेरा किसी मैडम के साथ अफेयर चल रहा है और मेरे कारन उनका डाइवोर्स हो गया?

अक्षय: न....नहीं तो!

मैं: अगर बोला है तो कबूल करने का गूदा भी रख! (मैंने आवाज ऊँची करते हुए कहा.)

अक्षय: ब्रो...वो मैंने तो बस...

मैं: अबे तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरे बारे में ऐसी बात करने की? तूने मुझसे पुछा भी था की ये बात सच है या नहीं? लौंडा है तो जनानियों जैसी हरकत न कर! कहने को मैं भी कह सकता हूँ जो तेरी गर्लफ्रेंड ने जयपुर में रायता फैलाया था! (मैंने गुस्से से आशु के एक दम नजदीक जाते हुए कहा.)

अक्षय: तेरा बहुत ज्यादा हो रहा है अब?

अक्षय ने अपनी अकड़ दिखाते हुए कहा और ये सुन कर मेरा पारा और भी चढ़ गया.मैंने उसका कालर पकड़ लिया.

मैं: अपनी ये गर्मी मुझे मत दिखा, जा कर अपनी गर्लफ्रेंड को दिखा जिसकी आग तू बूझा नहीं पाता और वो इधर-उधर मुँह मारना चाहती हे. उस दिन जयपुर में उसने आशु से कहा था की वो एक रात मेरे साथ गुजारना चाहती है, तभी तो आशु गुस्से में निकल पड़ी थी.

अक्षय: य...ये झूठ है!

तभी पीछे से आशु आ गई;

आशु: ये सच है! तेरे साथ तो वो बस पैसों के लिए घूमती हे. पैसों के बिना तो वो तेरे जैसों को घास ना डाले!

आशु ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मैंने थोड़ा धक्का देते हुए उसका कालर छोडा.

मैं: आज के बाद दुबारा हम दोनों के बारे में कुछ बकवास की ना तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा!

इतना कह कर मैंने बुलेट को जोर से किक मारी और उसे बिना बोले ही चेतावनी दी! फिर हम दोनों अपनी पसंदीदा जगह पर आ गए और चाय पीने लगे. पता नहीं क्यों पर आशु को खुद पर गर्व महसूस हो रहा था और वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी. जब मैंने कारन पुछा तो वो बोली; "आज जब मैंने आपके कंधे पर हाथ रखा तो आपने उसे छोड़ दिया. आज मुझे पहली बार लगा जैसे मैं आपको कण्ट्रोल कर सकती हूँ!" ये सुन कर मैं मुस्कुरा दिया. क्योंकि मैंने अक्षय को इसलिए छोड़ा था क्योंकि मैं वहाँ कोई तमाशा खड़ा नहीं करना चाहता था. पर मैं चुप रहा ये सोच के की आशु को इस खुशफैमी में रहने दिया जाए! अगले दिन मैं समय से उठा और तैयार हो कर दस मिनट पहले ही ऑफिस पहुँच गया.सबसे मेरा इंट्रो हुआ और यहाँ का स्टाफ मेरी उम्र वाला था. कोई भी शादीशुदा आदमी या लड़की मुझे यहाँ नहीं दिखाई दी. एकाउंट्स में मेरे साथ एक लड़का और था. पहले दिन तो काम समझते-समझते निकल गया.लंच टाइम में आशु का फ़ोन आया और मैं उससे बात करते हुए बाहर आ गया.शाम को मिलना मुश्किल था पर मैंने उसे कहा की मैं हॉस्टल आऊँगा उसे पढ़ाने के बहाने, तो आशु खुश हो गई. शाम को साढ़े पाँच मैं निकला और आशु के हॉस्टल पहुंचा. आंटी जी के पाँव हाथ लगाए और फिर आशु अपनी किताब ले कर आ गई और मैं उसे पढ़ाने लगा, वो पढ़ाना कम और अपनी आँखें ठंडी करना ज्यादा था. फिर मैं घर लौटा और खाना खा कर सो गया.
 
ये पूरा हफ्ता मेरा और आशु का मिलना कुछ कम हो गया, ऑफिस से मुझे दो बार बरैली जाना पड़ा और डेढ़ घंटे की ये ड्राइव वो भी एक तरफ की बड़ी कष्टदाई होती थी. अब रोजो-रोज आशु से मिलने हॉस्टल भी नहीं जा सकता था. इसलिए अब हमारे लिए बस वीडियो कॉल ही एक सहारा था. एक दूसरे को बस वीडियो कॉल में ही देख लिया करते और दिल को सुकून मिल जाता. शनिवार आया तो आशु उम्मीद करने लगी थी की आज मैं हाफ डे में आऊँगा पर ये क्या उस दिन बॉस ने मुझे फिर बरैली जाने को कहा. मेरा बॉस खड़ूस तो था पर इज्जत से बात करता था. उसका दिया हर काम मैं निपटा देता था तो वो मुझसे खुश था. जब मैंने आशु से कहा की मैं आज नहीं आ पाऊँगा तो वो उदास हो गई पर मैंने उसे रविवार का प्लान पक्का करने को कहा, तब जा कर आशु मानी.उस रात जब मैं घर पहुँचा तो आशु ने कॉल किया: "कल पक्का है ना? कहीं आप फिर से तो कंपनी के काम से कहीं नहीं जा रहे ना?"

"जान! कल बस मैं और तुम! कोई काम नहीं, कोई ऑफिस नहीं!" मेरी बात सुन कर आशु को इत्मीनान हुआ उसके आगे बात हो पाती उससे पहले ही किसी ने उसे बाथरूम के बाहर से पुकारा इसलिए आशु फ़ोन काट कर चली गई. मैंने भी खाना खाया और जल्दी सो गया, सुबह उठा और ब्रश किया, चूँकि ठंड शुरू हो चुकी थी इसलिए मन नहीं किया की नहाऊँ! ठीक नौ बजे आशु ने दरवाजा खटखटाया, ये दस्तक सुनते ही दिल में मौजें उठने लगी. मैने दरवाजा खोला, आशु का हाथ पकड़ के उसे अंदर खींचा और दरवाजा जोर से बंद कर दिया. आशु को दरवाजे से ही सटा कर खड़ा किया और उसके होठों पर ताबड़तोड़ चूमना-चूसना शुरू कर दिया. आशु भी कामुक हो गई और उसने भी मेरी किस का जवाब अपनी किस से देना शुरू कर दिया. दो मिनट बाद ही हम दोनों का वहाँ खड़े रहना दूभर हो गया और मैं आशु को खींच कर बिस्तर पर ले आया. उसे धक्का देने से पहले उसके सारे कपडे उतारे, बस उसकी ब्रा और पेंटी ही बची थी. फिर उसे धक्का दे कर बिस्तर पर गिराया और मैं उसके जिस्म पर टूट पडा. उसके सारे नंगे जिस्म को मैंने चूमना शुरू कर दिया और इधर आशु का सीसियाना शुरू हो गया.मेरे हर बार उसके जिस्म को होंठों से छूने भर से उसकी; "सससस" निकल जाती. टांगों से होता हुआ मैं उसके पेट और फिर उसके स्तनों के बीच की घाटी पर पहुँचा तो आशु ने अपने दोनों हाथों से मेरे गालों को पकड़ा और अपने होठों के ऊपर खींच लिया. हम फिर से बेतहाशा एक दूसरे को चूमने लगे, एक दूसरे के होठों को चूसने लगे. हमारी जीभ एक दूसरे से लड़ाई करने लगी थीं, और नीचे मेरे लिंग ने आशु की योनी के ऊपर चुभना शुरू करा दिया था.

आशु ने अपने दोनों हाथों को मेरे सीने पर रख कर मुझे अपने ऊपर से बगल में धकेल दिया. वो उठ के बैठी और मेरे कच्छे को निकाल कर फेंक दिया. फिर आलथी-पालथी मार के मेरे लिंग के पास बैठ गई और अपने दाहिने हाथ से उसने लिंग की चमड़ी को नीचे किया, प्री-कम से गीला मेरा सुपाड़ा आशु की आँखों के सामने चमचमाने लगा. पर आज उसके मन में कुछ और था. आशु ने मेरे लिंग को चूसा नहीं बल्कि आज तो वो उसके साथ खेलने के मूड में थी. उसने अपने दोनों हाथों की उँगलियों से मेरे लिंग को पकड़ा और सिर्फ लिंग के सुपाड़ी को अपने मुँह में ले कर उसे चूसने लगी. मुझे ऐसा लगा मानो वो मेरे सुपाडे को टॉफ़ी समझ रही हो! उसका ऐसा करने से मेरी सिसकारियां कमरे में गूंजने लगी; "सससससस....आह!!!" मेरी सिकारियाँ सुन आशु को जैसे और मजा आने लगा और आशु ने अपने जीभ से मेरे सुपाडे की नोक को कुरेदना शुरू कर दिया. अब तो मेरा मजा दुगना हो गया था और मैं स्वतः ही अपनी कमर नीचे से उचकाने लगा ताकि मेरा लिंग पूरा का पूरा आशु के मुँह में चला जाये.

पर ना जी ना! आशु तो सोच कर आई थी की वो आज मुझे ऐसा कतई नहीं करने देगी. पर लिंग को तो गर्मी चाहिए थी. आशु के मुँह से ना सही तो उसकी योनी से ही सही! मैंने आशु के मुँह से अपना लिंग छुड़ाया और उसे लेटने को कहा.

आशु मेरी जगह लेट गई और मैं उसकी टांगों के बीच आ गया, अब मैंने सोचा जितना आशु ने मुझे तड़पाया है उतना उसे भी तो तड़पाया जाए! इसलिए मैंने आशु की टांगें चौड़ी कीं और लिंग को उसकी योनी पर मिनट भर रगड़ने लगा. आशु बेचारी सोच रही थी की अब ये अंदर जायेगा...अब अंदर जायेगा...पर मैं बस रगड़-रगड़ के उसके मजे ले रहा था. “ऊँह..उन्हह ..उम्!!!" आशु प्यार भरे गुस्से बोली और मैं उठ कर बिस्तर से नीचे आ गया.आशु एक दम से अवाक मुँह फाड़े मुझे देखती रही और सोचने लगी की मैं क्यों नाराज हो गया? पर अगले ही पल मैंने उसे पकड़ के खींचा और बिस्तर से उठा के उसे कुर्सी पर बिठा दिया. फिर मुस्कुराते हुए उसकी टांगें चौड़ी कीं और अपना लिंग उसके योनी में ठेल दिया.

आशु की योनी इतनी पनियाई हुई थी की एक ही धक्के में पूरा लिंग अंदर पहुँच गया, पर आशु चूँकि इस धक्के के लिए मेंटली प्रेपरेड़ नहीं थी तो उसकी 'आह!' निकल गई. शुरू-शुरू में मैंने पूरे धक्के मारे, जिससे मेरा लिंग पूरा का पूरा उसकी योनी में उत्तर जाता और फिर पूरा बाहर आता. पर शायद इतने दिन से हमने संभोग नहीं किया था तो आशु को इसकी आदत नहीं रही थी इसलिए वो कुछ ज्यादा ही कराह रही थी. जबकि मेरा मानना ये था की अब तक तो आशु की योनी को मेरे लिंग का आदि हो जाना चाहिए था! पर मैं फिर भी लगा रहा और करीब ५ मिनट बाद ही आशु ने पानी छोड़ दिया. अब मेरा लिंग अंदर अच्छे से विचरण कर सकता था और मैंने जोर-जोर से धक्के मारने शरू किये, पूरी कुर्सी मेरे धक्कों से हिलने लगी थी और आशु अपने दूसरे चरम-आनंद पर खुसंह गई थी! अगले धक्के के साथ हम दोनों साथ ही फारिग हुए और अपना सारी पानी उसकी योनी में भर कर मैं पलंग पर बैठ गया.कुर्सी पर टांगें चौड़ी कर के बैठी आशु की योनी से हम दोनों का रस टप-टप कर गिरने लगा और आशु इससे बेखबर अपनी साँसों पर काबू पाने लगी.

कुछ देर बाद मैं उठा और बाथरूम में फ्रेश होने लगा, इधर आशु ने चाय-नाश्ता बनाना शुरू कर दिया था. मेरे नहा के आते-आते आशु ने नाश्ता तैयार कर दिया था और फिर हमने बैठ के एक साथ नाश्ता किया. नाश्ते के बाद आशु ने बर्तन सिंक में रखे और मुझे खींच कर बिस्तर पर बिठा लिया; "जानू! मैं है ना....वो...मुझे है न....कुछ...मेकअप का समान खरीदना था...जैसे वो...मस्कारा ...ऑय लाइनर...काजल...और वो..एक टैंक टॉप (शर्माते हुए)....और...एक जीन्स....एक स्लीवलेस वाला टॉप...!!" आशु ने अपनी ये फरमाइश किसी बच्चे की तरह की.

"मेले जान को मॉडर्न दिखना है?!" मैंने तुतलाते हुए आशु से पुछा तो जवाब में आशु ने शर्म से गर्दन हाँ में हिला दी. "अच्छा...तो अभी ना...मेरे पास न...ज्यादा पैसे नहीं हैं! नेक्स्ट मंथ सैलरी आएगी ना ...तब आप ले लेना...ओके?" मेने भी आशु की तरह बच्चा बनते हुए सब कहा, ये सब सुन कर आशु मुस्कुराने लगी और फिर मेरे गले लग गई. "तो जानू! हम फ़ोन पर प्रोडक्ट्स देखें?" आशु ने पुछा तो मैंने फटाफट अपना फ़ोन निकाला और हम अमेज़न पर उसकी पसंद के प्रोडक्ट्स देखने लगे और सब के सब कार्ट में एड कर दिये. अगले महीने सैलरी आते ही मैं वो आर्डर करने वाला था. हम दोनों ऐसी ही कुछ और प्रोडक्ट्स देख रहे थे की आशु का फ़ोन बज उठा और जो नाम और नंबर स्क्रीन पर फ़्लैश हो रहा था उसे देख वो तमतमा गई; "क्या है? मना किया था न की मुझे कॉल मत करिओ, फिर क्यों कॉल किया तूने?.... मैंने क्या किया? सब तेरी करनी है!.... बहुत खुजली थी ना तुझे? अब भुगत!!! ....अच्छा? क्यों न कहूँ? तू क्यों मरी जा रही है उसके लिए, तेरे लिए बंदे फंसाना कोई मुश्किल काम है?! पहले उसके साथ सोइ थी अब किसी और के साथ सो जा!!!" इतना कह कर आशु ने फ़ोन काट दिया. अब मुझे थोड़ा-थोड़ा तो समझ आ गया था की ये कौन है और क्या बात आ रही है, तो मैंने इस बात का ना कुरेदना ही ठीक समझा.

पर आशु को ये बात कहनी थी; "निशा का फ़ोन था! कह रही थी की तूने क्यों अक्षय को सब बोल दिया? उस कामिनी को दर्द हो रहा है की अच्छा ख़ासा बकरा उसके हाथ से निकल गया.हरामजादी!"

"बस मैडम! आपके मुँह से गालियाँ अच्छी नहीं लगती!" मैंने आशु को टोका!

"सॉरी जी! पर उसका नाम सुनते ही मुझे बहोत गुस्सा आता है!"

"अच्छा छोड़ उसे, और सुन मुझे इस कमिंग वीक में रोज बरैली जाना है इसलिए अब नेक्स्ट मुलाक़ात रविवार को ही होगी!" मैंने कहा.

"आऊच.... !!!! फिर .....???" आशु एक दम से उदास हो गई.

"जान! थोड़ा टाइम दो मुझे ताकि ये नई जॉब संभाल सकूँ!" मैंने आशु के गाल को सहलाते हुए कहा.

"हम्म!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा.

उस दिन के बाद पूरे एक महीने तक हमारा मिलना बस रविवार तक के लिए सीमित हो गया.हम फ़ोन पर रोज बात किया करते, और रात में सोने से पहले आशु मुझसे बाथरूम में छुपकर वीडियो कॉल पर बात करती. फिर जब हम रविवार को मिलते तो पूरे हफ्ते की कसर निकाल देते. हम एक दूसरे को बेतहाशा चूमते और प्यार करते मानो जैसे जन्मों के प्यासे हों! आखिर सैलरी वाला दिन आ गया और मैं उस दिन अपनी सैलरी अकाउंट में देख कर बहुत खुश हुआ. मैंने बिना आशु को बताये उसके सेलेक्ट किये हुए सारे सामान का आर्डर दे दिया और रविवार को उसकी डिलीवरी भी होनी थी. आशु इस सब से अनजान थी और जब वो रविवार को आई तो प्यासी हो कर मुझ पर टूट पड़ी पर मैं जानता था की आज हमें एक दूसरे को प्यार करने का समय नहीं मिलेगा इसलिए मैंने उसे रोकते हुए कहा; "जान! आज नहीं!" ये सुन कर आशु परेशान हो गई और बोली; "क्यों क्या हुआ? आपकी तबियत तो ठीक है ना?"

"मैं ठीक हूँ जान! बस आज कोई आने वाला हे." मैंने बात बनाते हुए कहा.

"कौन आ रहा है? और आपने क्यों बुलाया उसे? एक तो दिन मिलता है उस दिन भी आपके दोस्त हमें अकेला नहीं छोड़ते?" आशु ने नाराज होते हुए कहा. ठीक उसी वक़्त दरवाजे पर दस्तक हुई और आशु का गुस्सा आसमान छूने लगा, मैंने उसे दरवाजा खोलने को कहा तो आशु ने गुस्से से दरवाजा खोला" सामने डिलीवरी बॉय खड़ा था और उसने कहा; "डॉली जी का आर्डर है!" ये सुनते ही आशु का गुस्सा काफूर हो गया और उसने हँसते हुए डिलीवरी ली और दरवाजा बंद कर के मेरे पास आ गई और गले लग गई. "थैंक यू जानू!!!" कहते हुए आशु ने पंजों पर खड़े होते हुए मेरे होठों को चूम लिया. एक-एक कर तीन लोग और आये....फाइनली आशु का सारा सामान आ गया.अब आशु उन सबको पहन कर मुझे दिखाने को आतुर हो गई.

सबसे पहले उसने टी-शर्ट और जीन्स पहनी, आज लाइफ में पहलीबार वो जीन्स पहन रही थी. जीन्स बहुत टाइट थी जिसके कारन उसका पिछवाड़ा बहुत ज्यादा उभर कर दिख रहा था. उसे देखते ही मेरे मुँह से निकला; "दंगे करवाएँगी क्या आप?"

ये सुन कर जब आशु का ध्यान अपनी उभरी हुई नितंब पर गया तो वो बुरी तरह शर्मा गई! "इसे रिटर्न कर दो!" आशु ने शर्माते हुए कहा और मैंने भी उसकी बात मान ली क्योंकि ये जीन्स उसके लिए कुछ ज्यादा ही कामुक थी! बाकी बचे हुए टॉप्स उसने एक-एक कर पहने और मुझे दिखाने लगी.

वो सब अच्छे थे पर जो उसने स्लीवलेस पहना तो मेरी आँखें उस पर गड़ गई. आशु ने आज पहली बार स्लीवलेस पहना था और मैं उसे बस देखे ही जा रहा था. "आपको ये वाली पसंद आई ना?" उसने पुछा और मैंने हाँ में गर्दन हिलाते हुए मुस्कुरा दिया.

मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई की आशु अब अपनी खूबसूरती को पहचानने लगी है पर एक अजीब सा एहसास भी दिल में होने लगा था. वो ये की मेरी गाँव की भोली-भाली आशु जिसे मैं बहुत प्यार किया करता था वो अब शहरी रंग में रंगने लगी है! चलो अच्छा है.... जमाने के साथ बदलना ही चाहिए! ये सोच कर मैंने इत्मीनान कर लिया....

दिन बीतते गए और क्रिसमस का दिन आया, पर ऑफिस की छुट्टी तो थी नहीं और ना ही मैं छुट्टी ले सकता था. हरसाल मैं आज के दिन चर्च जाया करता था और वहाँ प्रेयर अटेंड किया करता था. वापसी में वहाँ से केक खरीद लेता और फिर घर आ जाता था. अब अकेला इंसान था तो टाइम पास हो जाता था और इसी बहाने गॉड जी से भी मन ही मन कुछ बातें कर लिया करता था. पर इस बार मेरे पास प्रेयर करने का कारन था. मैं ऑफिस से सीधा आशु के पास हॉस्टल पहुंचा. आज आंटी जी घर पर ही थीं, मैंने उनसे आशु को थोड़ी देर ले जाने को कहा तो उन्होंने पुछा की कहाँ जा रहे हो? तो मैंने उन्हें सच बता दिया; "वो आंटी जी दरअसल मैं हरसाल क्रिसमस पर चर्च जाता हूँ, सोचा इस बार आशु को भी ले जाऊँ?" ये सुन कर आंटी अचरज करने लगीं; "चर्च? पर क्यों?" उनका इशारे मेरे धर्म से था; "आंटी जी मैं सब धर्मों को मानता हु. भगवान् तो एक ही हैं ना?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो आंटी जी ने हाँ में सर हिला दिया. उन्होंने आशु को आवाज दी और आशु मुझे देखते ही खिल गई. "चल जल्दी से तैयार हो जा, चर्च जाना है!" मैंने कहा तो आशु तुरंत तैयार होने चली गई. "मैं आधे-पौने घंटे में आशु को छोड़ जाऊंगा." मैंने आंटी जी से कहा. "कोई बात नहीं बेटा! तेरे साथ जा रही है इसलिए जाने दे रही हूँ!" आंटी जी ने मुस्कुराते हुए कहा. आशु तुरंत तैयार हो कर आ गई और हम दोनों चर्च की तरफ चल दिये. जब मैंने बाइक चर्च के पास रोकी और उसे उतरने को कहा तो आशु भी अचरज से मुझे देखने लगी. "मुझे तो लगा की आपने ये झूठ सिर्फ इसलिए बोलै ताकि हम बाहर मिल सकें? पर आप तो सच में चर्च ले आये!"
 
"तुम्हें पता नहीं है पर कॉलेज के दिनों से मैं साल में एक बार आज ही के दिन यहाँ आता हु. याद है तेरा वो दसवीं का रिजल्ट वाला काण्ड? तेरा रिजल्ट आने से पहले ही मैं जानता था की कोई तुझे आगे पढ़ने नहीं देंगे, तब यहीं मैंने तेरे लिए प्रेयर किया था की तुझे आगे अच्छे से पढ़ने को मिले और देख दुआ क़बूल भी हुई. आज के दिन तुझे साथ इसलिए लाया हूँ ताकि आज तू भी गॉड को शुक्रिया अदा कर दे|"

आशु का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा, उसने अपने दुपट्टे से अपना सर ढका जैसे की वहाँ सब लड़कियों और औरतों ने ढक रखा था और हम चर्च में घुसे. आशु को कुछ नहीं पता था की वहाँ कैसे पूजा की जाती थी. इसलिए अंदर जाने से पहले ही वो चर्च के बाहर अपनी चप्पल उतारने लगी. पर मैंने उसे मना किया और हम दोनों ही अंदर घुसे, अब आशु को बस मुझे देख रही थी. हम दोनों वहाँ सबसे पीछे वाली लाइन में सब के साथ बैठ गये. आगे की तरफ था स्टैंड था जहाँ लोग अपने घुटने मोड़ कर टिका कर प्रेयर करते थे. आशु मुझे देखते हुए वैसे ही करने लगी. पता नहीं कैसे पर उस दिन वहाँ उस तरह बैठे हुए प्रेयर करते हुए मेरी आँख से आँसू बह निकले. आशु ये देख रही थी पर वो उस समय खामोश रही, प्रेयर कर के हम दोनों बाहर आये और मैंने वहाँ से कँडल खरीदीं और बाहर मदर मैरी के पास जलाने लगा, आशु ने भी ठीक वैसे ही किया. जब हम बाहर आये तो वहाँ से मैंने केक खरीदा और आशु को खाने को दिया.

आज पहलीबार आशु ने ऐसा केक खाया था और उसे ये बहुत टेस्टी भी लगा था. "एक और करना था तुझे यहाँ लाने का, वो ये की तुझे आज तक पता नहीं होगा की क्रिसमस पर होता क्या है? पर आज तुझे एटलीस्ट आईडिया हो गया की आज के दिन की रेलीवंस क्या है?"

"आज तक मैंने क्रिसमस ट्री मैंने सिर्फ किताब में देखा था पर आज पता चला की वो कितना सुंदर होता है! चर्च को किस तरह सजाया जाता है और वो जो वहाँ बच्चों ने जीसस क्राइस्ट के बचपन को दिखने के लिए खिलौने सजाया था उसे देख कर मुझे मेरे बचपन की याद आ गई जब मैं गुड़ियों के साथ खेलती थी."

"चलो अब तुझे हॉस्टल छोड़ दू." ये कहते हुए मैंने जैसे ही बाइक स्टार्ट की तो आशु बोली: "थोड़ी देर और रुकते हैं ना?"

"यार मैंने आंटी जी को बोला था की मैं आधे-पौने घंटे में आ जाऊँगा, ज्यादा देर रुकना ठीक नही. कहीं आंटी जी कुछ सोचने लगीं तो?

"आपके बारे में उनके मुँह से सिर्फ तारीफ ही निकलती हे. इतने महीनों में मैंने बस ये ही सुना है की राज बेटा ऐसा है राज बेटा वैसा है, ईमानदार है, मेहनती है और पता नहीं क्या-क्या! कई बार तो लगता है की वो आपको दमाद बनाने के चक्कर में हे. पर सुमन दीदी का शायद कोई चक्कर चल रहा है, तभी तो वो हर बार अपनी शादी की बात टाल जातीं हे. कुछ दिन पहले तो वो शराब पी कर आईं थीं, मैंने दरवाजा खोला और वो चुप-चाप अपने कमरे में जा कर सो गई."

"उसे आंटी जी से प्रॉब्लम है, आंटी जी उस पर रोक-टोक लगतीं हैं और इसे तो अपनी लाइफ एन्जॉय करनी हे."

हम दोनों ऐसे ही बात करते हुए हॉस्टल पहुंचे और मैं अंदर आ गया और आंटी जी को केक दिया. हैरानी की बात ये थी की जहाँ वो कुछ देर पहले कह रहीं थीं की मैं क्यों क्रिसमस पर चर्च जा रहा हूँ वहीँ अब बड़े चाव से केक खा रही थी. तभी सुमन भी आ गई; "अरे राज जी आप?! और केक!!!!! वाओ!!! ये आप ही लाये होंगे.... माँ तो...." वो आगे आंटी जी के डर से कुछ नहीं बोली और केक खाने लगी.

"राज जी एक बात सच-सच बताना, आप मुझ से ही रोज-रोज मिलने के लिए बहाना कर के आते हो ना?" सुमन बोली. उस समय आंटी जी किचन में थी और हम तीनों बैठक में बैठे केक खा रहे थे. उसके ये कहते ही मुझे खाँसी आ गई और आशु को शायद गुस्सा आने लगा था.

आशु भाग कर गई और मेरे लिए पानी ले आई. एक घूँट पानी पीने के बाद मैं बोला; "यार क्या कुछ भी बोल देते हो आप? इसने (आशु ने) अगर घर में बता दिया ना तो गाँव वाले भाला ले कर यहाँ आ जायेंगे. बताया था न आपको हमारे गाँव में प्यार करना पाप है!" ये सुन कर सुमन चुप हो गई. तभी आंटी जी खाना परोस कर ले आईं और बिना खाये उन्होंने जाने नहीं दिया. चलो इसी बहाने घर जा कर खाना बनाने से तो छुट्टी मिली! कुछ दिन और बीते और २९ दिसंबर आ गया, ऑफिस वाले लड़कों ने पार्टी का प्लान बनाया और मुझे भी उसमें शामिल होना था. सब लड़के अपनी-अपनी बीवियों या गर्लफ्रेंड के साथ आने वाले थे तो जाहिर था की मैं भी आशु के ले जाने वाला था. इसी बहाने आशु को आज पता चल जाता की न्यू इअर की पार्टी में क्या होता है?!

मैंने आशु को सारा प्लान समझा दिया. ३० दिसंबर की शाम को मैं आशु के कॉलेज पहुँचा और उसे वहाँ से पिक कर के घर ले आया. उस दिन पुरुषोत्तम अंकल के घर जन्मदिन की पार्टी थी तो मैं और आशु उसमें शरीक हो गए, पार्टी के बाद हम घर आये और एक दुसरे पर टूट पडे.

दरवाजा बंद होते ही आशु मेरी गोद में चढ़ गई और उसका निशाना मेरे होंठ थे. मैंने भी आशु के कूल्हों को कस कर पकड़ लिया और खुद से चिपका लिया. मैं उसके होठों को चूसते हुए पलंग पर आया और उसे अपनी गोद से उतार कर बिस्तर पर पटक दिया. मैंने फटाफट अपने कपडे निकाल फेंके और आशु ने भी लेटे-लेटे अपने कपडे उतार दिये. मैं उस पर चढ़ने लगा तो आशु ने अपने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया. वो उठ कर बिस्तर पर खड़ी हुई, अपने थूक से चुपड़ी उँगलियाँ अपनी योनी पर मलने लगी. फिर अगले ही पल वो मेरी गोद में चढ़ गई. मैंने बाएँ हाथ को उसके कूल्हे के नीचे ले जा कर उसे सपोर्ट दिया और दाएँ हाथ से अपने लिंग को पकड़ के उसकी योनी से सटा दिया. मेरे झटका मारने से पहले ही आशु ने अपनी योनी मेरे लिंग पर दबानी शुरू कर दी. कुछ ही सेकंड में लिंग पूरा का पूरा आशु की योनी में समा गया पर मुझसे नीचे से झटके लगाना मुश्किल हो रहा था. मैं बिस्तर की तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया, जिससे आशु को अपने पंजे टिकाने का सहारा मिल गया.आशु ने अपने पंजों को गद्दे से टिकाया और अपनी बाहों को मेरे गर्दन से लपेटे उसने अपनी योनी उछालनी शुरू की. अब मेरा लिंग बड़े आराम से सटा-सट अंदर बाहर होने लगा. हम दोनों ही लय से लय मिलाते हुए अपनी कमर आगे-पीछे हिला रहे थे. आशु की योनी पनियाती चली गई और मेरा लिंग अंदर बड़े आराम से फिसलने लगा था. “आईईईईईईई ....आहनननननन...धीरे....जानू....!!!!” आशु कराही|

मेरी गति इस कदर तेज थी की आशु के लिए सहन कर पाना मुश्किल हो गया था. वो ज्यादा देर टिक न पाई और झड़ने लगी; “सससस...आह!...मााााााााााा ...हम्म्म.....नननन” पर मैं अभी और देर तक उसे भोगना चाहता था. मैंने उसे अपनी गोद से उतारा और उसे पलट दिया. मैं उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया, आशु को आगे की तरफ झुकाया जिससे उसकी योनी उभर कर पीछे आ गई. मैंने पहले तो दोनों हाथों को आशु के लव ह्यांडल पर जमा दिया और फिर अपना लिंग पीछे से आशु की योनी में पेल दिया और तेजी से झटके मारने लगा. मेरी गति इतनी तेज थी की हर झटके से आशु का बुरा जिस्म बुरी तरह हिलने लगा था. उसके स्तन तेजी से झूलने लगे थे.

आशु से ये सब बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था क्योंकि उसके झड़ने के बाद मैंने उसे जरा सा समय भी नहीं दिया था की वो अपनी सांसें तक दुरुस्त कर ले.आशु अब मेरी पकड़ से छूटने के लिए कुलबुलाने लगी थी. "ससस...जााााााााााााााााााााआनननन नननननननुउउउऊऊऊऊऊऊऊऊऊ..... प्लीज...ईइइइइइ ...रुक्खक्क....!!!" इससे आगे उससे बोला ही नहीं गया! अपने आखरी झटके के साथ मैंने अपना वीर्य आशु की योनी में भर दिया और लिंग बाहर खींच कर मैं पीछे कुर्सी पर फैल गया.आशु भी औंधे मुँह बिस्तर पर गिर गई और अपनी साँसों पर काबू करने लगी. दोनों ही पिछले कुछ दिनों से बहुत प्यासे थे तो ये तूफ़ान आना तो तय था. पर इस तूफ़ान के शांत होने के बाद जब मैं उठा तो आशु ने कराहते हुए कहा; "आह! हहहहमममम... जानू! मेरी कमर!!!!" तब मुझे एहसास हुआ की आशु की कमर में मोच आ चुकी हे. मैंने किसी तरह से आशु को सीधा कर के उसे बिठाया; "सॉरी...सॉरी....सॉरी....सॉरी यार ...." मैंने कान पकड़ते हुए आशु से कहा, पर वो मुस्कुराते हुए बोली; "जान निकाल दी थी आपने मेरी! पर.......... मजा बहुत आया!!!!" ये कहते हुए आशु की हँसी निकल गई. मैंने तुरंत पानी गर्म करने को रखा और आशु की पीठ पर लगाने के लिए आयोडेक्स निकाली. आशु को बाथरूम जाना था तो उसे बड़ी मुश्किल से मैंने सहारा दे कर खड़ा किया और उसे बाथरूम ले गया.सहारा दे कर मैंने आशु को कमोड पर बिठाया, पिशाब की पहली धार के साथ मेरा और आशु का माल बाहर आया और फिर आशु की योनी हलकी हुई. मैंने पानी से खुद उसकी योनी को धीरे-धीरे साफ़ किया, पर आशु की योनी को छूते ही आशु ने सिसीकी ली; "स्स्स्सस्साः!!!" आशु मुस्कुराती हुई मुझे अपनी आँखों से इशारे करने लगी की उसे अब अंदर जाना हे.

मैंने उसे इस बार गोद में उठाया पर बहुत संभाल कर! मैंने आशु को बहुत आहिस्ते से बिस्तर पर लिटाया और उसे पेट के बल लेटने को कहा. फिर मैंने उसकी कमर पर आयोडेक्स लगाई और गर्म पानी की बोतल रख कर उसे सेंक देने लगा. कमरे में ब्लोअर चल रहा था जिससे कमरे गर्म था. मैं आशु की बगल में लेट गया और हम दोनों के ऊपर रजाई डाल ली. आशु ने औंधे लेटे हुए ही मेरी तरफ गर्दन घुमा ली, माने भी आशु की तरफ करवट ले ली; "सो सॉरी जान!" आशु ने प्यार से अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाते हुए कहा; "इस कमर दर्द को छोड़ दो तो मजा बहुत आया!"

"तू सच में पागल है!" मैंने आशु के गाल को चूमा और हम दोनों सो गये.

अगली सुबह मैं जल्दी उठ गया क्योंकि मुझे ऑफिस जाना था. मैं उठ कर तैयार होने लगा तो आशु आँख मलते-मलते उठी: "आप कहाँ जा रहे हो?"

"ऑफिस और कहाँ?"

"आह! पर आज तो ३१ तारीख है? आज तो छुट्टी होती है?" आशु ने सम्भल कर बैठते हुए कहा.

"जान आज कोई सरकारी छुट्टी नहीं है? ये सब छोडो और ये बताओ की तुम्हारा कमर का दर्द कैसा है?"

"पहले से ठीक है.... मैं चाय बना देती हु." आशु उठी पर चाय तो पहले से ही तैयार थी. बस उसे कप में छानना था. आशु ने चाय छनि और मुझे कप दे कर फ्रेश होने चली गई. मैं कपडे पहनने लगा तो उसने नाश्ता बनाना शुरू कर दिया. "अरे छोडो ये नाश्ता!" मैंने कहा.

"रोज आप बिना खाये ऑफिस जाते हो?" आशु ने हैरानी से पूछा.

"हाँ! कभी-कभी कुछ बना लेता हु."

"तभी इतने कमजोर हो रहे हो! आप बैठो मैं नाश्ता बनाती हु." ये कह कर आशु बेसन घोलना शुरू किया. पर मैं कहाँ चैन लेने वाला था. मैंने आशु को पीछे से जा कर पकड़ लिया और अपनी ठुड्डी को में आशु की गर्दन पर रखे हुए उसके गाल को चूम रहा था. आशु ने फटाफट ब्रेड पकोड़े बनाये और मैंने ऐसे ही खड़े-खड़े उसे भी खिलाये और खुद भी खाये. नाश्ता कर के चलने को हुआ तो आशु बोली; "आप कुछ भूल नहीं रहे?" मैंने फटाफट अपना रुमाल, पर्स और मोबाइल चेक किया पर वो मुझे प्यार भरे गुस्से से घूरने लगी. "ओह! सॉरी!" मैंने आशु को अपने आगोश में लिए और उसके होंठों को चूम लिया. आशु ने तुरंत अपने हाथों को मेरी गर्दन पर लॉक कर दिया और मेरे होठों को चूसने लगी. मेरा उस वक़्त बहुत मन था की मैं उसे गोद में उठा लूँ और बिस्तर पर लिटा कर खूब प्यार करूँ, पर जानता था की उसकी कमर का दर्द उसे और परेशान करेगा.दो मिनट तक इस प्यार भरे चुंबन के बाद तो जैसे मन ही नहीं था की कहीं जाऊँ की तभी फ़ोन बज उठा. मेरा कलिग मेरा बस स्टैंड पर इंतजार कर रहा था. जैसे मैंने जाने के लिए मुदा की आशु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली; "जानू! वो....मुझे कुछ पैसे चाहिए थे!" मैंने फ़ौरन बटुए में हाथ डाला और आशु की तरफ देखते हुए पुछा; "कितने?" आशु झट से बोली; "१,०००/-" और मैंने उसे २०००/- दे दिए और फटाफट निकल गया.

ऑफिस पहुँच कर मैंने आशु को कॉल किया और उसे वोलीनी स्प्रे लगा कर गर्म पानी का सेक करने को कहा वरना हम रात को पार्टी में नहीं जा पाते. वो दिन कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला, शाम को जब निकलने का समय हुआ तो सारे लड़के बाहर इकठ्ठा हो गये. सर ने सब का जमावड़ा देखा तो वो भी वहीँ आ गए और पूछने लगे की हम सब यहाँ खड़े क्या कर रहे हे. हम सब में जो सबसे ज्यादा 'चटक बावला' था वो बोला; "सर वो रात को हम सारे पार्टी कर रहे थे तो उसी की बात हो रही थी की कहाँ जाना है?" अब हमारे सर ठहरे चटोरे तो वो कहने लगे की ब्रेक पॉइंट ढाबा चलते हे. अब सब उस गधे को मन ही मन गाली देने लगे, कहाँ तो सब सोच रहे थे की पब जायेंगे मस्ती करेंगे और कहाँ सर ने ढाबे जाने का सुझाव दे दिया. "सर बारबेक्यू नेशन चलते हैं, पर हेड १,५००/- आएगा और अनलिमिटेड खाना मिलेगा” मैंने कहा. अब सब का मन फीका हो गया क्योंकि वो सब दारु पीना चाहते थे और सब मेरी ही तरफ देख रहे थे. मैंने आँख मारते हुए हाँ में गर्दन हिलाई तो वो समझ गए. अब उसी चटक गधे की ड्यूटी लगाईं गई की वो हम सब के लिए टेबल बुक करेगा. सब के दबाव में आ कर उसने हाँ कर दी और ऑफिस से सीधा वहीँ चला गया और बाकी सब अपने-अपने घर चल दिये.
 
Back
Top