"आई ..... गोट दीं जॉब!" मैंने उखड़ी-उखड़ी साँसों को काबू में करते हुए कहा. इतना सुनना था की आशु मेरी तरफ मुड़ी और कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया. "४०,००० पर मंथ स्याटर्डे इज हाल्फ डे!"
"थयांक गॉड!" आशु ने भगवान् को शुक्रिया करते हुए कहा.
"हाँ बस एक दिक्कत है, हेड ऑफिस उन्नाओ में हे. तो हफ्ते में एक दिन अप-डाऊन करना पडेगा." मैंने कहा.
"कोई बात नहीं!" एक-आध दिन सब्र कर लेंगे!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा.
"जान! सब कुछ सेट हो गया है अब! ४०००० ... उफ्फ्फ!! मुझे तो यक़ीन नहीं हो रहा!”
"तो चलो एक बार हिसाब कर लेते हैं की आपके क्या-क्या एक्सपेंसेस हैं?" आशु ने बैग से कॉपी पेन निकालते हुए कहा. ये हरकत बचकानी थी पर मैं तो पहले से ही सब हिसाब किये बैठा था. मैंने अपना फ़ोन निकला और आशु को एक मैसेज भेजा जिसमें सारा हिसाब पहले से ही लिखा था. जब आशु ने वो पढ़ा तो वो हैरानी से मुझे देखने लगी:
१. घर का किराया: ८,५००/- (इस महीने से बढ़ रहा हे.)
२. राशन (मैक्सिमम): ३,०००/-
३. बाइक की मेंटेनेंस: ३,०००/- जिसमें १,०००/- रीइमबर्स होगा.
४. अतिरीक्त खर्चा: ४,०००/- (प्रोव्हिजन फॉर एनी अनएक्सपेकटेड एक्सपेंस)
हर महीने बचत: (कम से कम) २२,५००/- इस हिसाब से ३१ महीने (आशु के थर्ड ईयर के पेपर देने तक) के हुए ६,९७,५००/
आशु ने जब ६ लाख की फिगर देखि तो उसकी आँखें छलक आईं; "जान ये फिगर और भी बढ़ेगी क्योंकि ये जो मैंने अतिरिक्त खर्चा रखा है ये भी कभी न कभी बचेगा! तो कम से कम ये मान कर चलो की हमारे पास ७ लाख होंगे! इतने पैसों से हम नई जिंदगी आराम से शुरू कर सकते हे. अगर मैंने इन पैसों की एफडी करा दी तो ब्याज और भी मिलेगा!” उस समय मेरे दिमाग में जो अकाउंटेंट वाला दिमाग था वो बोलने लगा था और सारी प्लानिंग कर के बैठा था. आशु रोती हुई मुझसे लिपट गई; "जानू! मुझसे इन ३१ महीनों का सब्र नहीं होता!"
"जान! मैं हूँ ना तेरे साथ, ये ३१ महीने मैं अपने प्यार से भर दूँगा!" मैंने आशु के सर को चूमते हुए कहा.
"जोइनिंग कब से है?" आशु ने पूछा.
"नेक्स्ट मंथ से! शुरू में तुम्हें थोड़ी दिक्कत होगी, क्योंकि काम समझने में थोड़ा टाइम लगेगा."
"कोई बात नहीं! कम से कम आधा शनिवार और पूरा रविवार तो होगा हमारे पास!" आशु ने मुस्कुराते हुए कहा.
अब ये ख़ुशी सेलिब्रेट करनी तो बनती थी. इसलिए हम दोनों पिक्चर देखने गए और पिक्चर के बाद मैंने खुद हॉस्टल आंटी जी को फ़ोन कर दिया ये बोल कर की आशु मेरे साथ है और मैं उसे डिनर के बाद छोड़ दूंगा. हमने अच्छे से डिनर किया और फिर मैंने एक मिठाई का डिब्बा लिया और आशु को हॉस्टल छोड़ने चल दिया. वहाँ पहुँच के आंटी जी के पाँव छुए और उनका मुँह मीठा कराया की मेरी जॉब लग गई हे. तभी सुमन भी आ गई और वो भी खुश हुई की मेरी नौकरी लग गई है और पूरा का पूरा मिठाई का डिब्बा ले कर खाने लगी.
इसी तरह दिन गुजरने लगे और दिवाली का दिन भी जल्द ही आ गया.मैं आशु को हॉस्टल से लेकर सीधा प्रसाद की दूकान पर पहुँचा और माँ, ताई जी और भाभी के लिए साड़ियां खरीदी. एक साडी मैंने आशु के लिए भी खरीदी पर किसी तरह नजर बचा कर ताकि वो देख न ले, ताऊ जी, पिताजी और नारायण भैया के लिए सूट का कपडा लिया. वैसे तो मैं नारायण भैया और भाभी के लिए कुछ लेना नहीं चाहता था पर मजबूरी थी वरना सब कहते की इनके लिए क्यों कुछ नहीं लाया. ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों घर पहुँचे तो देखा घर का रंग-रोगन कराया जा चूका था. आशु तो सीधा घर घुस गई और में बाईक खडी कर पिताजी से मिला और उनके पाँव को हाथ लगाए. फिर उन्हें और ताऊ जी को ले कर मैं आँगन में आ गया और चारपाई पर बिठा दिया.
"आशु, दरवाजा बंद कर दे!" मैंने आशु से कहा और फिर सभी को आवाज दे कर मैंने आंगन में बिठा दिया. एक-एक कर सब को उनके तौह्फे दिए तो सभी खुश हुए, सबसे ज्यादा अगर कोई खुश हुआ तो वो थी आशु जब मैंने उसे सबके सामने साडी दी. घर में उसने आज तक कभी साडी नहीं पहनी थी पर ये बात हमेशा की तरह भाभी को खटकी; "इसे साडी पहनना भी आता है?" उन्होंने कहा तो मुझे बड़ी मिर्ची लगी और मैंने उन्हें सुनाते हुए कहा; "आप कौन सा माँ के पेट से सीख कर आये थे? इसी दुनिया में सीखा ना? आप चिंता ना करो आशु आपको तंग नहीं करेगी की उसे साडी पहना दो, ताई जी हैं और माँ हैं वो सीखा देंगी" अब ये बात भाभी को चुभी पर ताई जी ने बीच में पड कर बात आगे बढ़ने नहीं दी वरना ताऊजी से डाँट पड़ती! "ये बता की तुम दोनों ने कुछ खाया भी था?" ताई जी पूछा. मैंने बस ना में गर्दन हिलाई तो ताई जी ने खुद देसी घी के परांठे बनाये और मैंने डट के खाये!
चूँकि आज धनतेरस थी तो शाम को खरीदारी करने जाना था. हर साल पिताजी और ताऊ जी जाय करते थे पर इस बार मैं बोला; "ताऊ जी सारे चलें?" अब ये सुन कर वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगे. अब बाजार घर के इतने नजदीक तो नहीं था की सारे एक साथ पैदल चले जाये. बाइक से ही मुझे आधा घंटा लगता था. जब कोई कुछ नहीं बोला तो मुझे ही रास्ता सुझाना था. "नारायण भैया आपका वो दोस्त है ना ...क्या नाम है...अशोक! उसे बुला लो ना?" ये सुनते ही वो मुस्कुरा दिए और फ़ोन निकाल कर उसे आने को कहा. अशोक का भाई मेरा दोस्त था और शादी-ब्याह में वो अपने ट्रेक्टर-ट्राली बारातियों के लाने-लेजाने के लिए किराये पर देते थे. "तू ज्यादा होशियार नहीं हो गया?" पिताजी ने प्यार से मेरे कान पकड़ते हुए कहा. ताऊ जी हँस दिए और उन्होंने सब को तैयार होने का आदेश दे दिया. सब तैयार हुए पर अब भी एक दिक्कत थी. वो ये की ट्रेक्टर चलाएगा कौन? नारायण भैया को तो आता नहीं था. इसलिए मैंने ही पहल की. जब स्कूल में पढता था तब कभी-कभी मस्ती किया करता था और हम दो-चार दोस्त मिल कर अशोक भैया का ट्रेक्टर खेतों में घुमाया करते थे. "तुझे ट्रेक्टर चलाना आता है?" ताऊ जी ने पूछा. मैंने हाँ में गर्दन हिलाई; "अरे तो पहले क्यों नहीं बताया? हम बेकार में ही दूसरों को इसके पैसे देते थे, इतने में तो नया ट्रेक्टर आ जाता." ताऊ जी बोले. "पर राज भैया घर पर होंगे तब तो?" पीछे से भाभी की आवाज आई अब मन तो किया की उन्हें कुछ सुना दूँ पर चुप रहा ये सोच कर की आज त्यौहार का दिन है क्यों खामखा सब का मूड ख़राब करू.
मैं ड्राइविंग सीट पर बैठा था और मेरे दाहिने हाथ पर ताऊ जी बैठ थे, बाईं तरफ पिताजी बैठ थे और बाकी सब एक-एक कर पीछे ट्राली में बैठ गये. इतने दिनों बाद ट्रेक्टर चला रहा था तो शुरू में बहुत धीरे-धीरे चलाया, फिर जैसे ही मैं रोड पकड़ा तो जो भगाया की एक बार को तो ताऊ जी बोल ही पड़े; "बेटा! धीरे!" तब जाके मैंने स्पीड कम की और हम सही सलामत बाजार पहुँच गए! बाजार में पिताजी के जान पहचान की एक दूकान थी और मैंने वहीँ ट्रेक्टर रोका और एक-एक कर सब उतरने लगे. सबसे आखरी में आशु रह गई थी और मुझे आज कुछ ज्यादा ही रोमांस चढ़ रहा था. जब वो उतरने लगी तो मैंने जानबूझ कर उसे कमर से पकड़ लिया और नीचे उतारा.हालाँकि इसकी कोई जरुरत नहीं थी पर आशिक़ी आज कुछ ज्यादा ही सवार थी. भाभी ने मुझे ऐसे करते हुए देखा तो बोली; "हाय! कभी मुझे भी उतार दो ऐसे!" ये सुनते ही आशु को मुँह फीका पड़ गया."आप बहुत मोटे हो!!! आपको उठाने जाऊँगा तो मेरी कमर अकड़ जाएगी!" ये सुन कर माँ और ताई जी हँसने लगे और बेचारी भाभी शर्म से नीचे देखने लगी. पिताजी, नारायण भैया और ताऊ जी तो आगे चल दिए और इधर माँ, ताई जी, भाभी और आशु को साड़ियों का माप देना था. तो उनके साथ रहने की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई. पिताजी एंड पार्टी तो अपने जान पहचान वाले दूकान दारों से मिलने लगे तो मैंने सोचा की हम सारे कुछ खा-पी लेते हे. पर पहले माप देना था. सब एक-एक कर अपना माप लिखवा रहे थे और मैं बाहर खड़ा था और मोहित-प्रफुल के मैसेज पढ़ रहा था.
माप दे कर सबसे पहले ताई जी आईं और उन्होंने पुछा की ताऊ जी कहाँ हैं तो मैंने कह दिया वो तो आगे चले गए सब से मिलने. "तो बेटा उन्हें फ़ोन कर." ताई जी ने कहा. "छोडो ना ताई जी, चलो चल के कुछ खाते हैं." ताई जी मुस्कुरा दी और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं; "बाकियों को आने दे, फिर चलते हैं." इतने में माँ आ गई और ताई जी ने हँसते उन्हें कहा; "तेरा लड़का समझदार हो गया हे. इसके लिए समझदार बहु लानी होगी." मैं ये सुन कर हँस पड़ा, क्योंकि मैं जानता था की मेरी पसंद थोड़ी नासमझ है! पीछे से भाभी और आशु भी आ गये. फिर हम एक जगह बैठ के चाट खाने लगे, तभी नारायण भैया हमें ढूँढ़ते हुए आ गए और हमें मज़े से चाट खाते हुए देख बोले; "वहाँ पिताजी आप सब को ढूँढ रहे हैं और आप सारे यहाँ बैठे चाट खा रहे हो?"
"अरे भूख लगी है तो कुछ खाये नहीं?!" ताई जी नारायण भैया को डाँटते हुए कहा. इतने में हम सबका खाना हो गया और हम सारे के सारे उठ के चल दिए, ताऊ जी ने जब पुछा तो ताई जी ने कह दिया की भूख लगी थी तो कुछ खा रहे थे. ताऊ जी ने फिर कुछ नहीं कहा और हमने खरीदारी की. पर इस बार ताई जी बहुत ज्यादा ही खुश थीं इसलिए वो माँ, भाभी और आशु को ले कर एक सुनार की दूकान में घुस गई. ये हमारी खानदानी जान पहचान की दूकान थी तो सारा परिवार अंदर जा कर बैठ गया.हम सब की बड़ी आव-भगत हुई और मालिक ने खुद सब औरतों को जेवर दिखाये. आशु बेचारी चुप-चाप पीछे बैठी थी. इस डर से की कहीं कोई उसे डाँट ना दे.पर डाँट तो उसे फिर भी पड़ी, प्यार भरी डाँट! "डॉली ! तू वहाँ पीछे क्या कर रही है? यहाँ तेरे लिए ही आये हैं और तू है की पीछे बैठी है? चल जल्दी आ और बता कौनसी अच्छी है तेरे लिए?" ये सुन कर आशु का सीना गर्व से चौड़ा हो गया.वो उठ के आगे आई और बोली; "दादी ... आप ही बताइये...मुझे तो कुछ पता नहीं!" ताई जी ने उसे माँ और अपने बीच बिठाया और उसे समझाते हुए बालियाँ पहनने को कहा. उसने एक-एक कर सब पहनी पर वो अब भी कन्फ्युज थी तो मुझे उसकी मदद करनी थी... पर कैसे? मैं इधर-उधर देखने लगा फिर सामने नजर शीशे पर पडी. आशु की नजर अब भी सामने आईने पर नहीं थी बल्कि वो ताई जी और माँ की बात सुनने में व्यस्त थी. मैं बस इंतजार करने लगा की आशु उस आईने में देखे ताकि मैं उसे बता सकूँ की कौन सी बाली बढिया हे.आखिर में उसने देख ही लिया, उसके दोनों हाथों में एक-एक डिज़ाइन था. मैंने उसे आँख के इशारे से बाएँ वाले को ट्राय करने को कहा, पर वो मुझे इतना नहीं जचा तो मैंने गर्दन के इशारे से दूसरे ट्राय करने को कहा. ये वाला मुझे बहुत पसंद आया तो मैंने हाँ में गर्दन हिला कर अपनी स्वीकृति दी! माँ ने मुझे आशु की मदद करते हुए देख लिया और बोल पड़ीं; "क्या बात है? तेरी पसंद बड़ी अच्छी है इन चीजों में?" माँ ने मजाक करते हुए कहा पर पता नहीं कैसे मेरे मुँह से निकला; "माँ कल को शादी होगी तो बीवी को इन सब चीजों में मदद करनी पड़ेगी ना? इसलिए अभी से प्रैक्टिस कर रहा हूँ!" ये सुनते ही सारे लोग जो भी वहाँ थे सब हँस पडे. आशु के गाल भी शर्म से लाल हो गए थे क्योंकि वो समझ गई थी की ये बात मैंने उसी के लिए कही हे. हँसते-खेलते हम घर लौटे और रात को खाने के बाद ताऊ जी, नारायण भैया और पिताजी सोने चले गये. मैं अब भी आंगन में बैठा था. ताई जी और सभी औरतें खाना खा रहीं थी. थकावट हो रही थी सो मैं अपने कमरे में आ कर सो गया, रात को आशु ने मेरा दरवाजा खटखटाया पर मैं बहुत गहरी नींद में था इसलिए मुझे पता नहीं चला.
अगली सुबह जब मैंने आशु से गुड मॉर्निंग कहा तो वो मुँह फूला कर रसोई में चली गई. मैं सोचता रह गया की अब मैंने क्या कर दिया? जब वो चाय देने आई तो बोली; "मुझे कल रात को आपसे कितनी बातें करनी थी. पर आपको तो सोना है!" ये सुन कर मेरे मुँह से 'उपसस....' निकला! पर आगे कुछ कहने से पहले ही वो चली गई. इधर पिताजी आये और मुझे अपने साथ चलने को कहा. मैंने अपनी बुलेट उठाई और पिताजी के साथ निकल पड़ा, दिन भर पिताजी ने जाने किस-किस को मिठाई देनी थी? कितनों के यहाँ बैठ के चाय पि शाम को घर आते-आते पेट में गैस भर गई! घर आते ही मैं पिताजी से बोला: "कान पकड़ता हूँ पिताजी! आज के बाद मैं आपके साथ दिवाली पर किसी के घर नहीं जाऊँगा!" ये सुन कर सारे हँस पडे. "क्यों?" पिताजी ने अनजान बनते हुए पुछा; "इतनी चाय...इतनी चाय! मैंने ऑफिस में कभी इतनी चाय नहीं पि जितनी आपके जानने वालों ने पिला दी! मुझे तो चाय से नफरत हो गई." तभी आशु जान बूझ कर एक कप में पानी ले कर आई और मुझे ऐसा लगा जैसे उसमें चाय हो, मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा; "ले जा इस कप को मेरे सामने से नहीं तो आज बहुत मारूँगा तुझे!" ये सुन कर आशु और सभी लोग खिल-खिला कर हँस पड़े! रात को खाना खाने की बिलकुल इच्छा नहीं थी. इसलिए मैं ऊपर छत पर चूरन खा रहा था.
सब के खाना खाने तक मुझे नींद आ गई और मैं छत पर ही पैरापेट वॉल से टेक लगा कर सो गया.आशु ने आ कर मुझे जगाया तब मेरी नींद खुली, मैंने अंगड़ाई लेते हुए उसे देखा; "आप यहाँ क्यों सो रहे हो?" उसने पूछा.
"कल बिना बात किये सो गया था ना, इसलिए मैं यहाँ तेरा इंतजार कर रहा था. पता नहीं कब नींद आ गई! अब बता क्या बात करनी थी?"
"कल बात करेंगे, अभी आप सो जाओ." आशु ने कहा तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपने सामने आलथी-पालथी मार के बैठने को कहा.
"कल दिवाली है और कल टाइम नहीं मिलेगा, बोल अब!" मैंने कहा.
"कल.... मेरे पास शब्द नहीं....दादी ने मेरे लिए पहली बार बालियाँ खरीदी ....सब आपकी वजह से!!!" आशु का गला भर आया था इसलिए उसने बस टूटे-फूटे शब्द कहे...
"अरे पागल! मैंने कुछ नहीं किया! देर से ही सही ये खुशियाँ तुझे मिलनी थी और तुझे तो खुश होना चाहिए ना की रोना चाहिए!" मैंने उठ के आशु के आँसू पोछे.
"नहीं.... इस घर में एक बस आप हो जो मुझे इतना प्यार करते हो, हर बात पर मेरा बचाव करते हो. आपके इसी बर्ताव के कारन दादी का और बाकी सब का दिल मेरे लिए पसीजा हे. आप अगर नहीं होते तो कोई मेरे बारे में कभी नहीं सोचता, पहले सब यही चाहते थे की मेरी शादी हो जाए और मैं इस घर से निकल जाऊँ पर आपके प्यार के कारन अब सब मुझे इस घर का हिस्सा समझने लगे हैं." आशु ने अब रोना शुरू कर दिया था.
"अच्छा मेरी माँ! अब बस चुप हो जा!" मैंने आशु को अपने सीने से चिपका लिया तब जा कर उसका रोना बंद हुआ.
"तू ना...जितना हँसती नहीं उससे ज्यादा तो रोती हे. ग्लोबल वाटर क्राईसीस सोल्व करना है क्या तूने?" मैंने मजाक में कहा तो आशु की हँसी निकल गई. इस तरह हँसते हुए मैंने उसे उसके कमरे के बाहर छोड़ा और मैं अपने कमरे में घुस गया.सुबह हुई और मैं जल्दी उठ गया, एक तो भूख लगी थी और दूसरा आज सुबह काम थोड़े ज्यादा बचे थे. सारा काम निपटा के आते-आते दोपहर हो गई और फिर सब ने एक साथ खाना खाया और रात की पूजा के लिए तैयारियाँ शुरू हो गई. वही लालची पंडित आया और हम सब पूजा के लिए बैठ गये. सबसे आगे माँ-पिताजी और ताई जी-ताऊ जी थे, उनके पीछे नारायण भैया-भाभी और उनकी बगल में मैं और आशु बैठे थे. पूजा सम्पन्न हुई और पंडित अपनी दक्षिणा ले कर चला गया, इधर मैंने और आशु ने पूरी छत दीयों से सजा दी और सारा घर जगमग होगया.नीचे आ कर सब ने खाना खाया और फिर सब छत पर आ गए और आतिशबाजी देखने लगे. मैं नीचे से सब के लिए फूलझड़ी और अनार ले आया, फूलझड़ियां मैंने आशु, माँ, ताई जी और भाभी को जला कर दी तथा अनार जलाने का काम नारायण भैया और मैं कर रहे थे. "राज अगर बम ले आता तो और मजा आता" नारायण भैया ने कहा तो ताऊ जी ने मना कर दिया; "बिलकुल नहीं! वो बहुत आवाज करते हैं, यही काफी है!" नारायण भैया अपना मुँह झुका कर अनार जलाने लगे.
रात के नौ बजे थे और सब थके हुए थे इसलिए जल्दी ही सो गये. रात बारा बजे मैं उठा क्योंकि मुझे मिठाई खानी थी. तो मैं दबे पाँव नीचे आया और मिठाई का डिब्बा खोल कर मिठाई खाने ही जा रहा था की आशु आ गई. दोनों हाथ कमर पर रखे वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखती रही. मुझे उसे ऐसा देख कर कॉलेज की टीचर की याद आ गई और हँस पडा. "टीचर जी! सॉरी!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा तो आशु मुस्कुराती हुई मेरे पास आई और मिठाई के डिब्बे से मिठाई निकाल कर खाने लगी. अब तो हम दोनों मुस्कुरा रहे थे और मिठाई खा रहे थे, दोनों ने मिल कर आधा डिब्बा साफ़ कर दिया और फिर पानी पी कर दोनों ऊपर आ गये. मैंने झट से आशु का हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे में खींच लिया. दरवाजे के साथ वाली दिवार से उसे सटा कर खड़ा किया और उसके गुलाबी होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा. आशु ने तुरंत अपने हाथ मेरी पीठ पर फिराने शुरू कर दिये. मेरा मन तो उसके निचले होंठ को पीने पर टिका था इधर आशु का जिस्म जलने लगा था. उसका हाथ अब मेरे लिंग पर आ गया और वो उसे दबाने लगी. अब उस समय संभोग करना बहुत बड़ा रिस्क था इसलिए मैं रुक गया; "जान! ये नहीं प्लीज! शहर जा कर!" आशु का दिल टूट गया और उसने अपना हाथ मेरे लिंग के ऊपर से हटा लिया. मैं मजबूर था इसलिए मैंने उसे बस "प्लीज!!!" कहा तो शायद वो समझ गई और धीमे से मुस्कुराई! अब आगे अगर मैं उसे किस करता तो फिर वही आग सुलग जाती इसलिए मैं रूक गया और उसे गुड नाईट कहा. मैं समझ गया था की आशु को बुरा लगा है पर उसने अगले ही पल पलट कर पंजों पर खड़े होते हुए मेरे होठों को चूम लिया और खिल-खिलाती हुई अपने कमरे में भाग गई. मैं भी खड़ा-खड़ा कुछ पल मुस्कुराता रहा और फिर सो गया.
अगली सुबह मैं उठा और जैसे ही नीचे आया की आशु ने मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया. "दादी जी...आपको पता है, रात को एक चोर आया था और देखो आधी मिठाई साफ़ कर दी!" ये सुन कर सारे लोग हँसने लगे और मैं भी मुस्कुराता हुआ चारपाई पर बैठ गया."ताई जी, चोर अकेला नहीं था! एक चोरनी भी थी उसके साथ!" ये सुन के तो सब ने ठहाका मार के हँसना शुरू कर दिया. "तुम दोनों की बचपन की आदत गई नहीं?" माँ ने मेरे कान पकड़ते हुए कहा. "ये दोनों जब छोटे थे तब ऐसे ही रात को रसोई में घुस जाते थे और मिठाई चुरा कर खाते थे!" माँ ने कहा. तभी भाभी बोली; "अरे! तो घर में चोरी कौन करता है? मांग कर खा लेते?" ये बात सब को बुरी लगी क्योंकि वहां तो बस मजाक चल रहा था. ताई जी को गुस्सा आया और वो भाभी को झिड़कते हुए बोलीं; "भक! ज्यादा बकवास की ना तो मारब एक कंटाप!"
"चुप कर जा हरामजादी!" नारायण भैया ने भी उन्हें झिड़क दिया और भाभी मुँह फूला कर चली गईं! पता नहीं क्यों पर भाभी से इस परिवार की ख़ुशी देखि नहीं जाती थी और मुझसे तो उनका ३६ का आंकड़ा था! पर फिर वो क्यों मुझे अपने जिस्म की नुमाइश किया करती थीं? ये ऐसा सवाल था जिसका जवाब जानने में मुझे कटाई रूचि नहीं थी. इसलिए मैं बस इस सवाल से बचता रहता था.
शाम को मंदिर में पूजा थी सो सब वहाँ चले गए, मुझे तो रास्ते में जय मिल गया तो मैं उससे बात करने में लग गया.उससे मिल कर मैं मंदिर पहुँचा पर वहाँ तो बहुत भीड़ थी. इसलिए मैं बाहर ही खड़ा रहा. सारी शाम भगवान के दर्शन मे बीत गयी. रात को खाने के बाद मैं छत पर टहल रहा था की आशु मिठाई का डिब्बा ले कर आ गई और मुझे डिब्बा खोल कर देते हुए गंभीर हो गई. "क्या हुआ?" मैंने पुछा तो वो सर झुकाये हुए बोली; "कल भाई-दूज है, घर में सब कह रहे थे की चूँकि मेरा कोई भाई नहीं इसलिए कल आपको तिलक...." इतना कहते हुए वो रुक गई! अब ये सुन कर तो मैं सन्न रह गया! मैं अपना सर पकड़ के खड़ा आशु को देखता रहा की शायद वो आगे कुछ और बोले पर वो सर झुकाये खामोश खड़ी रही. मैं नीचे जा कर भी कुछ नहीं कह सकता था वरना सब उसका 'सही' मतलब निकालते! 'सही' मेरे नितुसार होता, उनके नितुसार तो ये 'गलत' ही होता! मैं बिना आशु को कुछ कहे नीचे आ गया और फिर घर से बाहर निकल गया.कुछ देर बाद मैं घर आया तो माँ ने पुछा की कहाँ गया था. तो मैंने झूठ बोल दिया की ऐसे ही टहलने गया था. कुछ देर बाद मुझे जय का फ़ोन आया और मैं उससे जूठ-मूठ की बात करने लगा. मैंने घर में सब को ऐसे दिखाया जैसे की मेरा ऑफिस से कॉल आया हो और मैं झूठ-मूठ की बात करते हुए कल सुबह ही निकलने का प्लान बनाने लगा. बात खत्म हुई तो मुझे कैसे भी ये बात घर में सब को बतानी थी पर ये भी ध्यान रखना था की कहीं भाई-दूज के चक्कर में फँस जाऊ. "पिताजी कल कुछ ऑफिस के काम से मुझे बरेली निकलना होगा." मैं झूठ बोला.