जय मदहोश होकर सब देखता रहा और मन में बोल आज देसी बुर के दर्शन हो गए वो भी अपने ही दीदी की।
जय ने बुर को अपने हाँथ के शिकंजे में ले लिया और उसे मसलने लगा। और कविता की बांयी चूची की घुंडी को मुंह मे भर लिया और चूसने लगा। दूसरे से कविता की दायीं चूची को दबाने लगा। कविता ने कोई विरोध नही किया। बल्कि उसका हाथ जय के सर पर आ गया। जय ने चूची चूसते हुए कविता की ओर देखा क्योंकि उसे कविता से किसी प्रोत्साहन की उम्मीद नहीं थी। पर उसका हाथ उसके सिर पर रखना कविता की सहमति का प्रतीक था। कविता को कूलर चलने के बावजूद पसीने आ रहे थे, शायद ये डर, विषमय और सुख का मिला जुला असर था। जय ने कविता की चुचियों की अदला बदली की। करीब 7 - 8 मिनट चूची की चुसाई के बाद उसने एक बार फिर कविता को बोला, प्लीज आंखें खोलो ना दीदी। पर कविता ने कोई जवाब नही दिया बल्कि वो लगातार आहें भर रही थी। अपनी चूची की चुसाई का आनंद ले रही थी। आज उसे मालूम हुआ कि इन चुचियों का चुदाई में मर्द कैसे इस्तेमाल करते हैं। जय ने फिर कविता की टांगो के बीच जगह बनाई और खुद बैठ गया।वो कविता की जांघों को सहला रहा था। कविता के बुर के करीब अपना चेहरा लाकर उसने उसे सूँघा। बिल्कुल यही खुसबू उसकी पैंटी से आ रही थी जब उसने बाथरूम से उसकी पैंटी में मूठ मारा था। उसने ब्लू फिल्मो में देखा था कि मर्द बुर को खूब मज़े से चूसते हैं पर उसकी हिम्मत नहीं हुई, वैसे भी उसके लिए ये उत्तेजना संभालना मुश्किल हो रहा था। उसने अपने लौड़ा कविता के बुर पर सटाया। कविता आह कर उठी।
जय ने कविता की बुर पर थूक दिया जैसा उसने कविता को करते हुए देखा था। और थूक जाकर बुर के रस से मिलकर बुर को चिकना कर गयी। कविता कुंवारी जरूर थी पर खीरे और गाजर की वजह से झिल्ली टूट चुकी थी। जय ने अपना लण्ड जब घुसाया तो बस हल्की दिक्कत हुई। बाकी लौड़ा पूरा अंदर घुस गया। जय को तो लगा जैसे जन्नत के दरवाजे किसीने खोल दिये हो। बुर की गर्मी का एहसास उसे अपने लण्ड पर पागल बना रहा था। कविता की आंखे इस एहसास के साथ खुल गयी कि एक लौडा अभी अभी ज़िन्दगी में पहली बार उसकी बुर में समा गया है। कविता को अपनी तरफ़ देखते जय का हौसला और जोश बढ़ गया। कविता की आंखों से अब शर्म जा चुकी थी, वो आँहें भर रही थी। आआहह.... आआदह ...ऊफ़्फ़फ़फ़.. आआहह........
कविता बोल रही थी, और ज़ोर से आआहह.......... और ज़ोर से......ऊईई माँ..... आईई
जय कुछ बोले बिना ही उसकी इन बातों से उत्तेजित होने लगा । उसने कविता की आंखों में आंखे डालकर उसे चोदना शुरू किया। कविता ने भी अपने भाई को बाहों में भर लिया और आहें भर रही थी। उसने अपनी टांगो को जय के कमर के इर्द गिर्द कैंची बना ली। और उसे चुम्मा देने लगी। दोनों के नंगे जिस्म अब वासना के खेल की चरम सीमा पर पहुंचने ही वाले थे।
जय ने बुर को अपने हाँथ के शिकंजे में ले लिया और उसे मसलने लगा। और कविता की बांयी चूची की घुंडी को मुंह मे भर लिया और चूसने लगा। दूसरे से कविता की दायीं चूची को दबाने लगा। कविता ने कोई विरोध नही किया। बल्कि उसका हाथ जय के सर पर आ गया। जय ने चूची चूसते हुए कविता की ओर देखा क्योंकि उसे कविता से किसी प्रोत्साहन की उम्मीद नहीं थी। पर उसका हाथ उसके सिर पर रखना कविता की सहमति का प्रतीक था। कविता को कूलर चलने के बावजूद पसीने आ रहे थे, शायद ये डर, विषमय और सुख का मिला जुला असर था। जय ने कविता की चुचियों की अदला बदली की। करीब 7 - 8 मिनट चूची की चुसाई के बाद उसने एक बार फिर कविता को बोला, प्लीज आंखें खोलो ना दीदी। पर कविता ने कोई जवाब नही दिया बल्कि वो लगातार आहें भर रही थी। अपनी चूची की चुसाई का आनंद ले रही थी। आज उसे मालूम हुआ कि इन चुचियों का चुदाई में मर्द कैसे इस्तेमाल करते हैं। जय ने फिर कविता की टांगो के बीच जगह बनाई और खुद बैठ गया।वो कविता की जांघों को सहला रहा था। कविता के बुर के करीब अपना चेहरा लाकर उसने उसे सूँघा। बिल्कुल यही खुसबू उसकी पैंटी से आ रही थी जब उसने बाथरूम से उसकी पैंटी में मूठ मारा था। उसने ब्लू फिल्मो में देखा था कि मर्द बुर को खूब मज़े से चूसते हैं पर उसकी हिम्मत नहीं हुई, वैसे भी उसके लिए ये उत्तेजना संभालना मुश्किल हो रहा था। उसने अपने लौड़ा कविता के बुर पर सटाया। कविता आह कर उठी।
जय ने कविता की बुर पर थूक दिया जैसा उसने कविता को करते हुए देखा था। और थूक जाकर बुर के रस से मिलकर बुर को चिकना कर गयी। कविता कुंवारी जरूर थी पर खीरे और गाजर की वजह से झिल्ली टूट चुकी थी। जय ने अपना लण्ड जब घुसाया तो बस हल्की दिक्कत हुई। बाकी लौड़ा पूरा अंदर घुस गया। जय को तो लगा जैसे जन्नत के दरवाजे किसीने खोल दिये हो। बुर की गर्मी का एहसास उसे अपने लण्ड पर पागल बना रहा था। कविता की आंखे इस एहसास के साथ खुल गयी कि एक लौडा अभी अभी ज़िन्दगी में पहली बार उसकी बुर में समा गया है। कविता को अपनी तरफ़ देखते जय का हौसला और जोश बढ़ गया। कविता की आंखों से अब शर्म जा चुकी थी, वो आँहें भर रही थी। आआहह.... आआदह ...ऊफ़्फ़फ़फ़.. आआहह........
कविता बोल रही थी, और ज़ोर से आआहह.......... और ज़ोर से......ऊईई माँ..... आईई
जय कुछ बोले बिना ही उसकी इन बातों से उत्तेजित होने लगा । उसने कविता की आंखों में आंखे डालकर उसे चोदना शुरू किया। कविता ने भी अपने भाई को बाहों में भर लिया और आहें भर रही थी। उसने अपनी टांगो को जय के कमर के इर्द गिर्द कैंची बना ली। और उसे चुम्मा देने लगी। दोनों के नंगे जिस्म अब वासना के खेल की चरम सीमा पर पहुंचने ही वाले थे।