आज उसे नहाने में और दिनों की अपेक्षा ज्यादा समय लगा। पूरे बदन से काम रस की बू आ रही थी। जय ने तो सुबह भी उसको दो बार चोदा था। पूरी रात में अकेले वो, छः बार चुदी और कविता चार बार। जब वो बाहर आई, तो टॉवल बांधे थी। अंदर कविता नहीं थी, और जय सोया हुआ था। ममता ने तौलिया नीचे गिरा दिया और पूरी नंगी हो गयी। उसने भी लाल रंग की ही पेटीकोट, साड़ी, ब्लाउज पहनी। फिर वो मेक अप करने लगी। जब मन भर श्रृंगार हो गया, तब पूजा करने चली गयी। वो पूजा कर ली, फिर कविता और ममता एक साथ जय के कमरे में गयी। 21 साल का जय अभी भी थकान से चूर सोया हुआ था। अब तक 11 बज चुके थे। ममता और कविता ने उसके पैर छुवे, लेकिन उसे उठाया नहीं ताकि उनके पति की नींद ना खुल जाए। फिर ममता और कविता कमरे के बाहर चली आयी। दोनों एक दूसरे की ओर देख नहीं रही थी। लेकिन अंत में कविता बोली," माँ, भूख लगी है, खाओगी?
ममता- नहीं, जब तक जय नहीं खायेगा, तब तक हम नहीं खाएंगे। तुम कहा लो।
कविता- अच्छा, क्यों?
ममता- पति भगवान होता है, जब तक वो भोग नहीं लगाते हम कैसे खा सजते हैं।
कविता- फिर तो हम भी नहीं खाएंगे।
ममता- हमको आदत है, तुमको नहीं है। तुम खा लो।
कविता - नहीं माँ, हम भी नहीं खाएंगे।
और दोनों खामोश हो गयी। फिर ममता आखिर कविता के करीब आ गयी और दोनों सोफे पर बैठ गए। दोनों बिल्कुल बहनें लग रही थी। ममता कविता की ओर देख बोली," तुम ठीक हो ना, कहीं कोई दर्द, तकलीफ तो नहीं है। पहली रात के बाद अक्सर औरतों को थोड़ी दिक्कत होती है।"
कविता- हां, थोड़ा सा दर्द हुआ, पर सब ठीक है। कोई चिंता की बात नहीं, उतना तो सबको होता है।"
फिर अचानक दोनों की नजरें मिली, एक सेकंड को दोनों बिल्कुल खामोश थी, और अगले ही पल दोनों की हंसी छूट गयी। दोनों एक दूसरे को पकड़कर हंस रही थी। तभी कविता की नज़र ममता के गर्दन पर बनी लव बाईट पर पड़ी। वो हंसते हुए ममता को दिखाई तो ममता ने भी उसके गालों पर, वैसा ही निशान दिखाया। दोनों फिर हंसी। दो सौतन का ऐसा मेल शायद ही किसीने देखा होगा। आखिर में दोनों शांत हुई, और कविता ने ममता की ओर देखकर कहा," हम दोनों अब माँ बेटी से सहेलियां बन चुकी हैं, फिर भी कल रात हम दोनों को शर्म आ रही थी। जबकि दोनों पहले सब कुछ खुल्लम खुल्ला कर रही थी। हम दोनों ने ही जय को अपना माना है, फिर भी। ऐसा क्यों??
ममता- क्योंकि, सहेलियां तो हम बाद में बनी, पहले तो हम दोनों माँ बेटी थी। और इस रिश्ते को हम दोनों चाहकर भी भुला नहीं सकते। तुम्हें भले ही हमारे सामने कुछ नहीं महसूस होता, पर हमको तुम्हारे सामने किसी से चुदवाते हुए शर्म तो आएगी ही।
कविता- माँ, ऐसा नहीं है हमको भी थोड़ा शर्म आ रहा था। जय के जादू ने हम दोनों को करीब तो ले आया, पर उसकी बीवी बनकर भी एक बिस्तर पर सोना शर्मनाक लगता है।
ममता- ये सोचकर तो हम शर्म से गड़ रहे थे, की हम माँ बेटी घर के मर्द की ही दुल्हन बन, एक साथ उसी मर्द जे साथ सुहागरात मना रहे थे। पर जब रात में चुदाई का नशा, चढ़ा था तो चुदाई के अलावा कुछ सूझ ही नहीं रहा था। बस लण्ड की प्यास लगी थी।
ममता- नहीं, जब तक जय नहीं खायेगा, तब तक हम नहीं खाएंगे। तुम कहा लो।
कविता- अच्छा, क्यों?
ममता- पति भगवान होता है, जब तक वो भोग नहीं लगाते हम कैसे खा सजते हैं।
कविता- फिर तो हम भी नहीं खाएंगे।
ममता- हमको आदत है, तुमको नहीं है। तुम खा लो।
कविता - नहीं माँ, हम भी नहीं खाएंगे।
और दोनों खामोश हो गयी। फिर ममता आखिर कविता के करीब आ गयी और दोनों सोफे पर बैठ गए। दोनों बिल्कुल बहनें लग रही थी। ममता कविता की ओर देख बोली," तुम ठीक हो ना, कहीं कोई दर्द, तकलीफ तो नहीं है। पहली रात के बाद अक्सर औरतों को थोड़ी दिक्कत होती है।"
कविता- हां, थोड़ा सा दर्द हुआ, पर सब ठीक है। कोई चिंता की बात नहीं, उतना तो सबको होता है।"
फिर अचानक दोनों की नजरें मिली, एक सेकंड को दोनों बिल्कुल खामोश थी, और अगले ही पल दोनों की हंसी छूट गयी। दोनों एक दूसरे को पकड़कर हंस रही थी। तभी कविता की नज़र ममता के गर्दन पर बनी लव बाईट पर पड़ी। वो हंसते हुए ममता को दिखाई तो ममता ने भी उसके गालों पर, वैसा ही निशान दिखाया। दोनों फिर हंसी। दो सौतन का ऐसा मेल शायद ही किसीने देखा होगा। आखिर में दोनों शांत हुई, और कविता ने ममता की ओर देखकर कहा," हम दोनों अब माँ बेटी से सहेलियां बन चुकी हैं, फिर भी कल रात हम दोनों को शर्म आ रही थी। जबकि दोनों पहले सब कुछ खुल्लम खुल्ला कर रही थी। हम दोनों ने ही जय को अपना माना है, फिर भी। ऐसा क्यों??
ममता- क्योंकि, सहेलियां तो हम बाद में बनी, पहले तो हम दोनों माँ बेटी थी। और इस रिश्ते को हम दोनों चाहकर भी भुला नहीं सकते। तुम्हें भले ही हमारे सामने कुछ नहीं महसूस होता, पर हमको तुम्हारे सामने किसी से चुदवाते हुए शर्म तो आएगी ही।
कविता- माँ, ऐसा नहीं है हमको भी थोड़ा शर्म आ रहा था। जय के जादू ने हम दोनों को करीब तो ले आया, पर उसकी बीवी बनकर भी एक बिस्तर पर सोना शर्मनाक लगता है।
ममता- ये सोचकर तो हम शर्म से गड़ रहे थे, की हम माँ बेटी घर के मर्द की ही दुल्हन बन, एक साथ उसी मर्द जे साथ सुहागरात मना रहे थे। पर जब रात में चुदाई का नशा, चढ़ा था तो चुदाई के अलावा कुछ सूझ ही नहीं रहा था। बस लण्ड की प्यास लगी थी।