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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

माया ने आंखें बंद की, फिर थोड़ी देर बाद मुस्कुराते हुए, आंखें खोली। वो भले ही मुस्कुराई पर आंखों में आंसू छलक उठे थे।
सत्य- कोई दिखा??
माया सर हिलाके बोली," ह्हम्म"।
सत्य- कौन??
माया मुस्कुराई और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिए। दोनों का चुम्बन बेहद गहरा और लंबा था। फिर बाथरूम के अंदर माया की आँहें जोर पकड़ने लगी।
करीब एक घंटे बाद सब लंच पर मिले। कविता ने टॉप और डेनिम शॉर्ट्स पहना हुआ था। जबकि माया और ममता साड़ी में थी। तीनों मस्त लग रही थी। जय और सत्य बस अपनी किस्मत पर खुश थे। सबने खाना खाया और उस दिन कहीं बाहर का ट्रिप नहीं था, तो सब वापिस कमरों में चले गए। कमरे में आकर सब सो गए, क्योंकि रात में सब बहुत व्यस्त होने वाले थे।
एक ओर जहां माया और सत्य एक दूसरे की बांहों में सोए थे, वहीं दूसरी ओर ममता और कविता जय को अपने बीच लेकर सोईं हुई थी। शाम के तकरीबन सात बजे उनकी नींद खुली। अब सब फ्रेश हुए और आपस में बातें करने लगे। ममता बाथरूम में थी। जय और कविता बाहर कॉफ़ी पी रहे थे। कविता उसे देख बोली," जय तुमको कॉफ़ी अच्छी लग रही है?
जय- हां, क्यों अच्छी तो है??
कविता- तुम चाहो तो और अच्छी बन सकती है??
जय- कैसे??
कविता उसके सामने आ गयी और हंसते हुए, अपनी टॉप उतार दी और अपनी नंगी चुच्चियाँ दिखाते हुए बोली," अपनी दीदी की चुच्चियों की चुस्कियां लोगे तो और मज़ा आएगा।"
जय ने उसके शॉर्ट्स पैंटी के साथ जांघों तक कर दिया और बोला," कॉफी के साथ, दीदी के रसीली बुर का नमकीन पानी मिलेगा तो और मज़ा आएगा।" और बुर को उंगलियों से टटोलकर, उसके बुर का पानी चख लिया। कविता तो यही चाहती थी, वो तो बेशर्मों की तरह खुलकर चुदवाने आई थी। उसने खुदको पूरा नंगा कर लिया, फिर जय को अपना बुर फैलाकर दिखाते हुए बोली," बहन की बुर हाज़िर है, अपने चोदू भाई के लिए। यहीं चूसोगे, की हमको उठाके बिस्तर तक ले जाओगे।" जय ने कविता की ओर देखा, कविता की मांग में उसका सिंदूर था, बाल खुले हुए थे और उसके कमर तक लहरा रहे थे। आंखों में चुदने की प्यास, कांपते होंठ उसके छलकते जाम की तरह होंठों का सहारा ढूंढ रहे थे। गले में चुच्ची की गलियों में लटकता चमकता मंगलसूत्र। सुहागन होकर उसका ये रूप जय को पागल कर गया। उसने कविता को अपनी गोद में उठाया, कविता ने उसके चेहरे को पकड़ चूम लिया। जय के हाथ कविता के चूतड़ों पर टिके थे। जय ने बिस्तर पर कविता को पटक दिया और कविता मचलकर उसके गले में बांहे डाले थी। दोनों इस स्थिति में एक दूसरे को देख रहे थे। तभी ममता ने दरवाजा खोला, उसने सामने उन दोनों को देखा, तो देखती रह गयी। दोनों युवा नवविवाहित युगल को देख उसको सुकून मिला। आखिर हनीमून युवा लोगों के लिए है। उसने देखा, कविता बेहद खुश थी। और हो भी क्यों ना, उसके जीवन में शादी का पहला अनुभव था।
 
जय कमरे से बाहर आया, तो देखा ममता फोन पर बात कर चुकी थी और ठीक है, बोलकर फोन काट दी। जय ने उसकी ओर देखा, और पूछा," कौन था?"
ममता- तेरी मौसी बोलें या साली। वो लोग भी हमारे साथ गोआ चलेंगे और वहीं हनीमून मनाएंगे।
कविता- अच्छा, लेकिन ऐसा हुआ तो हमलोग एन्जॉय कैसे करेंगे। उनलोगों को कोई और जगह जाना चाहिए था। वो लोग भी खुलके मज़ा कर पाते।
जय- कोई बात नहीं, तुम दोनों तो हमारे साथ रहोगी और दिन में साथ घूमेंगे रात को तो हम तीनों अलग और वो अलग। कोई टेंशन नहीं है।
कविता- हां ये भी ठीक है। चलो मौसी भी साथ में रहेगी, तो इतना बुरा भी नहीं है।
फिर सब तैयार हुए। थोड़ी देर बाद घर के बाहर हॉर्न सुनाई दी। सब बाहर आये सामान के साथ, तो देखा सत्य और माया कैब में थे। सब सामान रख तीनों कार में सवार हुए। बैठने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी। पर सब किसी तरह एयरपोर्ट पहुँच गए। फिर अगले तीन घंटों में सब पणजी एयरपोर्ट पर थे। जहां उनके रिसोर्ट की गाड़ी उनका इंतजार कर रही थी। सब उसमें सवार होकर रिसोर्ट पहुंचे।

तीनों औरतें आपस में हंसी मजाक कर रही थी। उनके खिलखिलाने की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। जय और सत्य उनको देख सुकून महसूस कर रहे थे। जय ने ममता को होटल के रजिस्टर में बहन लिखा। और कविता को अपनी बीवी बताया। सत्य और माया तो खुद को पति पत्नी ही बताया। सबने निर्णय लिया कि पहले नहाया जाय और फिर इकट्ठे लंच करेंगे। सब अपने अपने कमरों में चल दिये। सत्य और माया दोनों एक साथ बाथरूम में घुस गए। पलभर के अंदर माया और सत्य नग्न होकर बाथ टब में घुस गए। माया सत्य के ऊपर लेटी थी। दोनों एक दूसरे में खोए हुए थे। माया के तन बदन पर सत्य के हाथ रेंग रहे थे, और उसकी छाती पर माया उंगलियों से जलेबियाँ बना रही थी।
माया- सत्य, हम कोई बुरी औरत तो नहीं है। कल तक तुम्हारा हमारा भाई बहन का रिश्ता था, पर अब दोनों प्रेमी प्रेमिका हो चुके हैं। क्या ये सही है?
सत्य- तुम्हारा दिल क्या कहता है? क्या हमारे प्यार में तुमको कोई खोट नज़र आता है दीदी? क्या पिछले कुछ दिनों से तुम्हारे हमारे बीच जो रिश्ता उभरा है, वो एक धोखा या छलावा है? क्या प्रेमी प्रेमिका का रिश्ता पवित्र नहीं? तुम्हारे मन मंदिर में ना जाने किसकी तस्वीर लगी है, पर हमारे अंदर शुरू से तुम्हारी प्रतिमा रखी है। अपने दिल से पूछो दीदी, क्या तुम पहले खुश थी, या अब हो? इस पल को महसूस करो, इसमें तुम्हारे और हमारे सिवा बस हमारा प्यार है। और तुम्हारी ये बढ़ती दिल की धड़कन हमारे प्यार की दस्तक है। दरवाज़े खोल दो, देखो कौन आया है, दिल में। झांको अपने मन में देखो कौन है। एक बार देखो अगर हम दिखें तो समझना तुम्हारा प्यार हमारे लिए है।
 
जय उसके गाँड़ पर लण्ड सेट करके बोला," और तुम बहुत अच्छे से गाँड़ मरवाती हो, गांडू दीदी।"
जय का लण्ड, कविता की फैली, गाँड़ में पहले की अपेक्षा आराम से घुस गया। जय उसके चूतड़ों को पकड़ चोद रहा था। तभी कविता बोली," भैया तुम कुछ भूल रहे हो, अपनी घोड़ी की लगाम तो पकड़ो।" जय ने उसके बाल पकड़ लिए, कविता के बाल खिंच गए, उसके चेहरे पर दर्द की हल्की शिकन आ गयी। पर बियर की मस्ती में वो सब जाती रही। जय ने उसको इसी तरह आधे घंटे तक चोदा, कविता की गाँड़ की भी वही हालात हुई, जो ममता की हुई थी। उसके पेट में भी प्रेशर से मलाशय भर गया और जय का लण्ड उसमें तर हो गया। जय ने लण्ड निकाल फिर ममता को चटवाया। दोनों ने ऐसे एक दूसरे की गाँड़ का स्वाद चखा। इसी तरह उन दोनों को बारी बारी वो पूरी रात चोदता रहा। और वो दोनों भी, सुध बुध खोकर चुदवाती रही। आखिर उसके अलावे उनके पास कोई चारा नहीं था। पूरी रात हुई इस गंदी और घमासान चुदाई से तीनों आखिर थक चुके थे, जय ने उन दोनों को उनका हक दिया जो उसके आंड़ से उबलकर लण्ड के माध्यम से उनके पेट में समा गया। सुबह के चार बजे तक, उन दोनों की इतनी पेलाई हुई कि कब दोनों नंग धरंग हो सो गई, उनको पता ही नहीं चला। दोनों के बाल पूरी तरह अस्त व्यस्त थे, और चेहरे से दोनों सस्ती कोठे की रंडियां लग रही थी।

वो दोनों जय के दोनों जांघों पर सर रखे सोई थी। जय का लण्ड उनके चेहरे के करीब ही था, कविता के होंठों से थूक के धागे जय के लण्ड से चिपके हुए थे। उनके चेहरे पर कहीं कहीं मूठ सूख चुका था, और फेविकॉल की तरह कड़क हो चुका था। जय भी सोया हुआ था।
इस तरह खूब चुदाई के बीच तीन दिन बाद उनके गोवा जाने का समय, आ गया था। वो तीनों काफी उत्साहित थे। तभी, उनके यहां एक फोन आया।
 
इसके तुरंत बाद ही कविता ने देखते देखते, पूरा मुट्ठी गाँड़ में घुसा ली। फिर आगे पीछे करने लगी। उसकी गाँड़ का लचीलापन अद्भुत था। पूरी की पूरी मुट्ठी घुस गई थी। उसको ऐसा महसूस हुआ, की जैसे उसका हाथ किसी गद्देदार रुई में फंसा है। उसका हाथ उसके मलाशय की गहराई नाप रहा था। जय ने उसका हाथ पकड़के पहले धीरे धीरे आगे पीछे किया, फिर तेजी से। कविता को मज़ा आ रहा था। दर्द काफूर था। तीनों नशे में थी। उधर ममता की गाँड़ भी जय भका भक मारे जा रहा था। उसके अंदर भी एक अजीब सी मस्ती चढ़ी थी। तभी जय ने लण्ड निकाला और कविता की ओर दे दिया। कविता समझ गयी उसे क्या करना है। उसने जय का लण्ड पकड़ा, और चाटने लगी। कविता ने देखा, की जय के लण्ड पर पीलापन था। कविता समझ गयी, पर भोली बनकर पूूूछ बैठी," भैया ये पीला पीला क्या लगा हैै ?
जय- ये माँ की गाँड़, में लण्ड से कुटाई की वजह से तैयार हलवा है।
कविता- वाओ, हमको हलवा पसंद है, हम तो पूरा सफाचट कर जाएंगे। और वो चाटने लगी। पहले उसने थोड़ा सा जीभ निकाल कर चाटा। फिर बोली," ह्हम्म, ये तो बहुत मीठा है।" और जोर से ठहाका मारते हुए हंसी। फिर जय की ओर देख पूरा लण्ड अपने जीभ से चाटने लगी, और साफ कर दिया। फिर कविता जय की ओर देखकर बोली," ह्हम्म, हम बहुत गंदी लड़की हैं। बहुत..... बहुत ...... गंदी।" फिर मुस्कुराई और लण्ड चूसने लगी। जय को ये देख बड़ा अच्छा लगा कि कविता को बिल्कुल घिन्न नहीं आया, ये जानते हुए भी की वो क्या था। जय फिर से ममता की अधखुली गाँड़ के छेद में लण्ड घुसा दिया, और थप्पड़ मारते हुए ममता की गाँड़ चोदने लगा। कविता ममता के चूतड़ों को चाट रही थी।

जय के लण्ड का दबाव बहुत था, इस बार ममता को अपने पेट मे एहसास हुआ कि प्रेशर बन रहा था। जय की ताबड़तोड़ चुदाई से उसका मलाशय कब भर गया, पता ही नहीं चला। उसकी गाँड़ में जय का लण्ड कहर बरपा रहा था। जय ने ममता की परवाह नहीं, किया और उसकी आहों को दरकिनार करते हुए पेलम पेलाई चालू रखा। हालात ये हो गयी कि ममता की गाँड़ के छेद के चारों तरफ हल्का पीला पीला पदार्थ लग गया। लण्ड बार बार अंदर बाहर होने की वजह से गाँड़ का छेद पूरी तरह खुल गया था, बिल्कुल किसी सांप की बिल की तरह। जय का लण्ड सांप ही तो था, और ममता की गाँड़ बिल। जय ने फिर लण्ड निकाल ममता, को चूसने का इशारा किया।
ममता ने लण्ड की ओर देखा पर नशे की हालत में लण्ड को सीधे मुंह में ले ली और अपने गाँड़ का स्वाद चख ली। जय ने लण्ड को ममता के गालों पर भी रगड़ दिया। ममता के पूरे चेहरे पर गाँड़ का रस लग गया। वो बेचारी तो उसकी हरकतों से हंस रही थी। कविता भी पास में आ गयी और जय के हाथ से लण्ड निकाल खुद चूसने लगी। जय ने फिर कविता से कहा," अरे हमारी रंडी दीदी, तुमको चुदवाने के लिए निमंत्रण देंगे क्या? चलो कुतिया बन जाओ और अपनी गाँड़ हमारे लण्ड के लिए परोस दो। ही ही
कविता बिना देर किए, कुत्ती बन गयी और, बोली," अपनी दीदी को रंडियों की तरह चोदो, हमारे राजा भैया। हमारी गाँड़, तुम्हारे लण्ड के स्वागत के लिए बेताब है। तुम गाँड़ बहुत अच्छे से चोदते हो।
 
जय- आज तो तुम्हारा खाली गाँड़ चोदेंगे।
ममता- तो मारो ना हमारी गाँड़, ये तो मरवाने के लिए ही बनी है।
जय- बिल्कुल सही, और तुमको पता है, औरतों के बाल लंबे क्यों होते हैं, ताकि हम चुदाई के दौरान इनको हैंडल की तरह इस्तेमाल कर सकें।" कहकर उसने ममता के बाल कसके खींच लिए, जिससे उसका सर ऊपर की ओर तन गया। जय ने उसके गाँड़ पर थूक दिया और लण्ड से फैला दिया। कविता ने अपने मुंह से थूक निकालकर ममता की गाँड़ के छेद पर मल दिया। उसने अपनी दो उंगलियां भी गाँड़ में घुसा दी, ताकि थोड़ा ढीला हो जाये। कुछ ही देर में ममता की गाँड़ की भूरी छेद, तैयार हो चुकी थी। जय ने अपना लण्ड उसकी गाँड़ में घुसाने लगा। ममता के मुंह से आँहें निकल रही थी, आखिर लण्ड को गाँड़ में एडजस्ट करने तक हर औरत कराहती है। जय इससे परिचित था, इसलिए कुछ देर रुका। जब ममता की कराह, मस्ती भरी आहों में तब्दील हो गयी, तो उसकी कमर में भी चाल आ गयी। चोदते हुए उसने कविता से कहा," कविता दीदी अपना बट्ट प्लग गाँड़ में डाल के रखो। हम चाहते हैं, की तुम अपना गाँड़ लण्ड के लिए तैयार रखो।" कविता प्यासी नज़रों से देख कर बोली," जय, बट्ट प्लग बाहर है।

जय- तो चली जाओ, और लगाके आओ।" कविता बोली," हम बाहर नहीं जाएंगे अभी।" ये बोलकर उसने अपनी गाँड़ में थूक लगाकर सीधे तीन उंगलियों को घुसा लिया। जय की ओर देखते हुए अंदर बाहर करने लगी। जय को ये बहुत उत्तेजक लग रहा था।जय उसकी बुर पर थप्पड़ मारते हुए बोला," क्या मस्त गाँड़ और बुर पाई हो तुम, बिल्कुल चिकने चूतड़, और रसेदार बुर। तुम दोनों बिल्कुल पोर्नस्टार जैसी हरक़तें कर रही हो। दीदी तुमको तो मॉडलिंग करनी चाहिए। माँ भी थोड़ी फिट हो जाये, तो हम तुम दोनों को न्यूड मॉडलिंग करवाएंगे।"
कविता- तुम जो चाहे करवाओ, अब तो हम बीवी है तुम्हारे, हमको बीच बाजार नंगी करवाओगे, तो भी होना पड़ेगा। अब तो तुम्हारी इच्छा को पूरा करना, हमारी मान मर्यादा से कहीं ऊपर है।
जय- सच।
कविता- आजमा के देख लो।
जय- तो फिर तुम अपनी गाँड़ में अब मुट्ठी बनाके घुसा लो। तुम्हारी गाँड़ देखते हैं, कितना सह पाती है।
कविता मुस्कुराते हुए," बड़े, गंदे हो भैया। गाँड़ में मुट्ठी से गाँड़ का तो छेद पूरा फैल जाएगा और दर्द भी होगा।"
जय- तो क्या हुआ तुम्हारा हाथ और हमारा लण्ड एक ही साइज तो है। घुसाओ ना।
कविता ने और थूक मला, और बची हुई दोनों उंगली, गाँड़ की कसी हुई छेद में किसी तरह घुसानी चाही। उसका दर्द से बुरा हाल हो गया। पर उस बेचारी का समर्पण, था कि वो हिली नहीं। दर्द को सहते हुए, पांचों उंगली गाँड़ में घुसा ली। ममता चुदते, हुए अपनी बेटी से बनी सौतन का हौसला बढ़ा रही थी। ममता,"बेटी, तुम बहुत, लायक बीवी हो, जो अपने पति, के लिए हर हद पार कर रही हो।"
 
कविता- आपका मस्त लौड़ा, चुदवाने के लिए।
जय- क्या चुदवायेगी?
कविता- अपनी बुर और गाँड़ मरवाऊंगी जमके।
जय- और तू रे रंडी की माँ। तुमको भी गाँड़ मरवाने का मन है।
ममता मुस्कुराते हुए- हमसे पूछ रहे हो, की अपनी मर्ज़ी बता रहे हो?
जय चुच्ची पर एक थप्पड़ मारा, जिससे ममता कराह उठी।" जितना पूछे उतना बोल कुत्ती की बच्ची, बुरमरानी गदही, हरामखोर की पिल्ली।
ममता- हहम्म, हां गाँड़ मरवाने को बेताब हैं। मारो ना।
जय- लौड़ा चाहिए, तो तुमदोनों को अब हमको खुश करना पड़ेगा। कविता चल हमारा गाँड़ चाटो, ममता तुम हमारा लौडा चुसो।"
दोनों बिना देर किये घुटनों पर बैठ गयी। और ममता सीधा लंड के पीछे पड़ गयी। उससे भी फुर्ती दिखाई, कविता ने उसने जय के पीछे जाकर, उसके चूतड़ अलग किये। वहां जय के गाँड़ के छेद के पास काफी बाल थे। कविता ने बिना देर किए, उसके गाँड़ के छेद को, अपनी जीभ से चाटा। वहां से बदबू आ रही थी, पसीने की पर नशे में वो सब सूंघ रही थी। आगे उसकी मां, जय के लण्ड को प्यार करने में मशगूल थी।

दोनों जय को अपने स्तर से खुश करने में लगी थी। जय का ये सपना था, की दो औरतें उसको ऐसे प्यार करें। जय तो सातवें आसमान पर था। उसने दोनों के माथे को दाएं और बाएं हाथ से पकड़ रखा था। कविता धीरे धीरे और आक्रामक तरीके से चूसने लगी। जय के चूतड़ों को बीच की दरार को जीभ से साफ कर रही थी। जय की गाँड़ में ज़ुबान भी घुसाना चाह रही थी। उधर ममता अपने कौशल का परिचय दे रही थी। वो जय का पूरा लण्ड समेत आंड़ भी मुंह में भर ली थी। और जय के झाँटों तक होंठ चिपकाए हुए थी।

इस तरह की माँ और बहन पाकर, किसको मज़ा ना आये। दोनों, एक से बढ़कर एक सेक्स की प्यासी, रंडियों की तरह चुदनी की तड़प शायद ही जय ने ब्लू फिल्म की हीरोइनों में भी देखी हो। जय खुद को किसी जन्नत में महसूस कर रहा था। उसने ममता को देखा और इनाम के तौर पर मुंह से थूक फेंका, जो सीधा ममता के माथे पर गिरा।
जय- तुम दोनों से हम कितना खुश हो रहे हैं, ये तय ऐसे होगा, की जब हमको अच्छा लगेगा, हम उसके मुंह पर थूकेंगे। और जिसके ऊपर जितना बार थूकेंगे, इसका मतलब वो हमको खूब खुश कर रही है। ये सुनकर दोनों के कान खड़े हो गए। कविता अपने भाई के गाँड़ को चाट चाटके साफ कर रही थी। उसकी जीभ जय के गाँड़ के छेद के अंदरूनी हिस्से को छू गयी। जिससे उसकी जीभ पर बदबूदार महक फैल गयी। पर बेचारी ने उसको सुगंध समझ चाट लिया। जय को ये पसंद आया, उसने कविता के ऊपर भी गर्दन घुमाकर थूका, कविता जैसे इसी इंतज़ार में थी। वो उसके थूक को सीधे मुंह खोलकर ले ली और पी गयी।

जय उन दोनों का समर्पण देख बहुत खुश था। उसकी थूक को अपना मैडल समझ रही उसकी माँ बेक़रार थी, की कब जय और थूके। इस तरह कुछ ही देर बाद दोनों का चेहरा जय की थूक से तर हो चुका था। जय ममता के चेहरे पर लौडे से पिटाई कर रहा था। कभी गालों पर, तो कभी होंठों पर, कभी माथे पर तो कभी ठुड्ढी पर। जय ने आखिर ममता और कविता को कुत्ती की तरह चौपाया कर दिया और दोनों के बाल पकड़ उनको बिस्तर की ओर ले चला। दोनों के बदन में मस्ती चढ़ चुकी थी। दोनों बिस्तर में चढ़ गई, और अपने अपने चूतड़ों को मसल रही थी। दोनों लण्ड की प्यासी हो गई थी। उनके बुर से पानी लगातार चू रहा था। उनदोनों के पिछवाड़े को आपस में चिपका दिया। और उनके बुर और गाँड़ एक साथ चाटने लगा। इस चटाई के दौरान उनका मुंह कभी बन्द ही नहीं हुआ, दोनों कराह रही थी और मौका मिलने पर किस कर लेती थी। जय की जीभ ने अपना जादू कर दिया आखिर ममता बोल उठी," अब देर ना करो, चोदो ना।
 
कविता झटपट बैठते हुए बोली," यही तो पीना चाहते हैं हम। आज हम दोनों आपका कीमती मूठ पीकर, ही खाना खाएंगे।" और मुंह खोलकर जीभ बाहर निकाल ली।
ममता- ये इसीका आईडिया है, की हम दोनों अबसे रोज़ आपके मूठ का सेवन करें। ये हमारे लिए पौष्टिक, है। अगर हम दोनों गर्भवती भी रहेंगे तो, भी मूठ पीते रहेंगे।
जय- ये तो तुम दोनों के लिए ही है। जितना चाहो निकालो और पीओ। ये लो रानी.. आ गया तुम दोनों के लिए स्वादिष्ट पौष्टिक आहार...आआहह
जय के लण्ड से मूठ की मोटी गढ़ी 8-9 धार निकली, जो कविता के मुंह में भर गया। ममता मुस्कुराई और कविता को चूमने के लिए आगे बढ़ी। कविता ने पूरा का पूरा मूठ, ममता के मुंह में भर दिया, चुम्बन के दौरान। दोनों एक दूसरे को पकड़ चूम रही थी। फिर ममता ने भी ऐसा ही किया। फिर दोनों ने आधा आधा हिस्सा बांट लिया और जय को दिखाके पी गयी।
जय उनकी ओर देखा और बोला," तुम दोनों को मूठ पीना बहुत पसंद है ना? तुमदोनों जब चाहो, इसे पी सकती हो। ये तुम्हारा है कितना प्यारी लगती हो दोनों जब मेरा मुठ पीती रहती हो।"
ममता- यही तो हम औरतों का असली सम्मान है। चुदाई के बाद औरत को ये मूठ पीने को मिल जाये तो, उसका चुदना सफल हो जाता है। ये हमारी फसल है, जिसे चुदाई के बाद काटा जाता है।
कविता- ये औरतों के बीच की बातें हैं। आप नहीं समझेंगे। जाइये आप अब हम दोनों को नहाने दीजिए।
जय हंसता हुआ बोला," जाऊंगा पर हमको अभी मूत लग रहा है। चलो दोनों बाहर आओ। पहले हमारे मूत से नहा लो।"
दोनों को टब से बाहर निकालकर,घुटनों पर बिठाके, जय उनके ऊपर हंसते हुए मूतने लगा। जय की मूत की धार उनके गोर मुखड़े पर बरसने लगी। गर्म मूत से पूरा बदन गीला होने लगा। जय उन दोनों के चेहरे पर बार बार पीली धार मार रहा था। दोनों आंखें मूंदे हुए, अंदाज़ा लगती की मूत की धार किधर से आएगी। उन दोनों का सारा मेक अप धुल चुका था। देखते ही देखते दोनों पूरी गीली हो गयी। जय की धार को दोनों ने कई बार पिया भी, पर उबकाई के साथ। कभी मूत की धार उनके आँखों पर बरसता, तो कभी गालों पर, कभी होंठों पर, कभी गर्दन पर, कभी पूरे जिस्म पर, कभी माथे पर। दोनों को मूत से नहलाने के बाद, जय फिर उनपर थूक दिया।
कविता और ममता मुस्कुराती रही। फिर जय बाहर निकल आया और दोनों माँ बेटी अंदर नहाने लगी।
 
जय- ममता तुम और तुम्हारी ये बेटी, हमारी मस्त छिनालों की तरह रहना सिख जाओ। दोनों को कोई कमी नहीं होने देंगे। तुम तो हमारी सास और माँ दोनों हो।
कविता- अरे भैया सैयांजी, अपनी इस बीवी को तो पेलो। कबसे बुर में लण्ड घुसा झुके हुए हम।
जय कविता की बात सुन उसकी कमर को पकड़ ताबड़तोड़ धक्के मारने लगा। कविता के मुंह से आँहें निकलने लगी। उसकी चूचियों और गाँड़ में धक्कों की वजह से थिरकन होने लगी। उसका नंगा शरीर भीगने की वजह से, चमक रहा था। जय उसके चूतड़ों को दबोचे हुए, धक्के मार रहा था। इस तरह दोनों माँ बेटी, झुके हुए दीवार से चिपकी हुई, अपना नंगा नारीत्व लुटा रही थी। जय लगातार चोदते हुए उन दोनों की काम पिपासा शांत कर रहा था। इस क्रम में उसने कविता की गाँड़ में उंगली भी घुसा दी।
कविता बोली," हाँ, आआहह.... तुम्हारा लण्ड बुर में और उंगली गाँड़ में एक साथ हो तो क्या मज़ा आता है...आआ.... उई... अमामाँ ये क्या गाँड़ के भीतर चिकोटी काट रहे हो, आह दर्द हो रहा है।
जय अपनी दो उंगलियां उसकी गाँड़ में घुसाए था। उसे अंदर गुदा मांस की सतह छेड़ने में मज़ा आ रहा था। जय ने तभी उसको पकड़के चिकोटी काट ली। उसे कविता को इस तरह छेड़ने में बड़ा मजा आ रहा था। कविता को दर्द तो हुआ, पर उसे भी इसमें मज़ा आ रहा था। फिर जय ने लण्ड निकालकर ममता के खुले मुंह में दे दिया। कविता को उसकी गाँड़ से उंगली निकाल उसे ही चटवाने लगा। कविता पूरे लगन से चटखारे ले लेकर उसका स्वाद लेने लगी। वो किसी भूखी भिखारन की तरह लग रही थी, जिसे कोई आइस क्रीम दे दिया हो। जय की उंगलियों पर लगे अपने गाँड़ के रस को चट कर गयी। उधर उसकी माँ जय के भीगे लण्ड को चूस रही थी जो कविता के बुर के पानी से भीगा हुआ था। जय उन दोनों की भूखी नज़रों की तत्परता देख मंत्रमुग्ध हो गया।
कविता- ऐसे क्या देख रहे हो?
जय- कुछ नहीं।
जय ने फिर ममता की बुर में लण्ड पेल दिया। इस बार उसने ममता को घोड़ी बनाया। उसका आधा शरीर पानी मे डूबा हुआ था। बुर तक पानी का स्तर था। जय के लण्ड का निचला आधा हिस्सा, पानी में डूबा था। धक्का मारने की वजह से पानी छलक कर बाहर गिर रहा था। कविता अपने बुर को फैलाये हुए अपने भाई को अपना बुर चखने के लिए परोस दी थी। जय उसकी बुर को चाट रहा था। एक तरफ माँ की बुर चोद रहा था और दूसरी ओर अपनी दीदी की बुर चाट रहा था। ममता और कविता की आँहें पूरे बाथरूम की दीवारें फाड़कर बाहर आना चाहती थी। इस तरह ना जाने कितने देर तक वो ममता को चोद रहा था। ममता तब तक दो बार झर चुकी थी, और कविता बुर चटाते हुए, लगभग मूतते हुए झड़ी थी। अंत मे जय के अंदर का सैलाब फूट पड़ा।
जय- दोनों सामने बैठ जाओ, हमारा निकलने वाला है। पीना चाहती हो ना हमारा मूठ।
 
ममता- ऊँह...ऊँह...ऊऊ आ... हां हमको तो बच्चा चाहिए। हमारे बच्चे का बच्चा। तुमको भी तो बच्चा पैदा करना होगा।
कविता- माँ, हमको बच्चा अभी 2- 3 साल नहीं चाहिए। अभी तो खूब मस्ती करना है।
जय-अरे अभी तो हमको सेक्स का मज़ा लेने दो। बच्चा ठहरेगा, तो दोनों पेट फुलाकर बैठ जाओगी।
कविता- तभी तो, हम तीन साल का समय मांग रहे हैं। जब माँ प्रेग्नेंट होगी, तब तुम हमको चोदना।
जय- आआहह.... आह... आह... क्या मस्त बीवियां पाए हैं हम। मौज मस्ती के लिए तुमदोनों एकदम तैयार रहती हो।
ममता- उफ़्फ़फ़.... ऊँह.. यही तो पत्नी का काम है। पति के साथ हनीमून पर मौज मस्ती करना।
जय- सही कहा तुमने ममता। तुम अब पहले से ज्यादा खुल गयी हो और नटखट भी।
कविता- माँ की आदत है खाने में मसाला तेज डालने की।
ममता- अच्छा इधर आ तो। अभी बताती हूँ मसाला तेज़ कैसे होता है।
ये बोलकर ममता कविता को चुम्मा लेने लगी। बहुत ही तेज चुम्मा।
जय ये देखकर पागल हो उठा। उसने ममता की गाँड़ पर पांच छह थप्पड़ जड़ दिए। ममता की गाँड़ लाल हो गयी। वो सिसकारी मारती हुई, कविता को चूम रही थी, पर उसने ऊफ़्फ़ नहीं की। जय ममता की बुर को हुमच हुमच कर चोद रहा था। वो करीब 10 मिनट तक, ममता की बुर का फैलाव बढ़ा रहा था। उधर उन दोनों का चुम्बन टूटते ही, कविता बोली," हमारी बुर को भी तो चोदोगे ना, इस लण्ड पर हमारी बुर का हक़ है। खाली अपनी माँ की ही बुर चोद रहें हैं।"
जय कविता के गाल पर एक तमाचा मारा और बोला," साली, कुत्ती की बच्ची, अभी अभी तो चोदा था, तुम्हारी बुर को। बहुत ज़्यादा बुर चोदवाने के लिए मचल रही हो। पहले तुम्हारे माँ को चोदेंगे, फिर तुमको।"
कविता अपना गाल सहलाते हुए बोली," छब्बीस साल की हो गए हैं। अब तक हमको तीन बच्चों की माँ बन जाना था। लेकिन ले देकर अब एक लौड़ा मिला है, वो भी अपने सगे भाई का। सारा कसर पूरा करेंगे।" ये बोलकर वो जय का लण्ड पकड़ ली, और निकालकर अपने बुर में घुसा ली।
कविता- अब हमारे बुर की खबर लो, अपने लण्ड से।"
ममता- चोदो बेटा, हमारी बेटी को चोदो। अपनी दीदी को चोदो। हम माँ बेटी को अदल बदल कर चोदो। हाय रे औरतों की बुर, क्या क्या करवाती है? माँ से बेटी, भाई का लौड़ा छीन अपने बुर में पेलवाती है। हमारी बेटी को, लण्ड की कमी मत होने देना।" ममता जय का हाथ थाम बोली।" ये हमारी बच्ची अब आपके, पल्ले बांध दी है, जमाईजी।"
 
वो बुर की गीलेपन का सहारा लेकर उंगलियां बार बार घुसा के निकाल रहा था। वो दोनों इसका बड़े अच्छे से आनंद उठा रही थी। कभी कविता की बुर जय की जीभ का शिकार होती तो कभी उसकी माँ की बुर। पर दोनों ही उसका भरपूर सहयोग कर रही थी। बुर के पानी को वो चूसकर कामुकता का जाम पी रहा था। तब जय ने उनकी भूरी सिंकुड़ी कली के जैसे गाँड़ की सिंकुड़ी छेद पर गयी। जय ने उनके अंदर भी मोटी वाली उंगलियां घुसा दी। दोनों का सिसकना अब अचानक आहों में बदल गया। अपनी नन्हें छेदों में हमले से उनको थोड़ा दर्द हुआ, पर कुछ बोला नहीं। बल्कि दोनों एक दूसरे के चेहरे की ओर देख एक दूसरे के चेहरे को सहला रही थी। जय का हमला अब तेज हो रहा था। दोनों के छेदों को बरी बारी से चूसते हुए, वो उंगलियों को बुर और गाँड़ में तेज़ी से अंदर बाहर करने लगा। क्या स्वाद था! वो औरत के इस स्वाद का दीवाना था। उसकी लप्लापायी जीभ कभी गाँड़ के छेद के भीतर घुसती तो कभी बाहरी सिंकुड़ी सतह को चूसती। ऐसे करने से उन दोनों की कमर मस्ती में डोलने लगी थी। कभी भीगी बुर से रिसते पानी से वो अपनी प्यास बुझाता तो कभी बुर पर अपनी लार लगाता। तीनों एक दम मस्ती में डूबे थे। असली काम क्रीड़ा का असल आनंद ले रहे थे। गाँड़ और बुर से अंदर बाहर होती उंगलियां बहुत कामुक लग रही थी, और उससे भी कामुक उनकी आँहें थी। जय का लण्ड अब तनकर लोहा हो चुका था। ममता और कविता भी बुर में लण्ड लेने को मचलने लगी थी। जय ने ममता को झुकाया, ममता दीवार पकड़ झुक गयी। जय ने लण्ड सीधा अपनी जन्मस्थली में घुसा दिया, जिससे शायद बहुत जल्दी उसका बच्चा जन्म लेनेवाला था।
ममता- उफ़्फ़फ़, आआहह, हे भगवान ऊयईई....

जय- आआहहहहह.... ममता तुम्हारा बुर तपता हुआ भट्ठी है। पूरे लण्ड को तुम्हारे बुर की गर्मी का एहसास हो रहा है। तुम्हारे बुर में एक नयापन लग रहा है।
ममता- बेटा सैयांजी, आज आपने हमको हमारे नाम से बुलाया है, और हमको आपकी पत्नी होने का एहसास हुआ है। इसी तरह हमको चोदिये। अपने लण्ड से बुर को छितरा दीजिए। बुर टाइट करने के लिए कविता ने एक क्रीम दिया था, वही लगाए हैं। इसलिए आपको नयापन का एहसास हो रहा है। हमको खुद बुर में लण्ड होने का एहसास पहली रात जैसा हो रहा है। इस औरत को बिल्कुल जवान लड़की की तरह महसूस हो रहा है। कविता तुम्हारा धन्यवाद।" कविता की ओर मुड़कर बोली।
कविता उन दोनों को कामुकता से देखते हुए बोली," अरे हमारी सौतन माँ, अब तो उसका इस्तेमाल सीख गई ना। अब खूब चुदवाओ अपने बेटे के लण्ड से। तुमको तो इस बार जय, अपने बच्चे की माँ बना देगा। और हमको एक भाई मिलेगा या भतीजा।"
 
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