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Incest क्या ये गलत है ? (completed)

दोनों चूचियों को भींचकर, चूचक मुंह में भर चूसने लगा। ममता ये देख, मुस्कुराई फिर जय के कमर और जांघों को धोने लगी। कविता उसे अपनी बांहों में भर ली और उसके माथे को चूमने लगी। ममता ने इस समय कविता की आंखों में जय के लिए जो प्यार देखा था, उसे देख वो सोचने लगी," हाय रे दोनों की किस्मत, कविता जय को प्यार दीवानियों की तरह करती है, पर दोनों हमारे कोख से ही पैदा हुए और भाई बहन हुए। दोनों की किस्मत की एक ही माँ के बच्चे हैं, पर पैदा हुए थे एक दूजे के लिए।" दोनों बहुत ही खोए हुए थे। ममता की आंखों से आंसू गिर गए। वो जय के आंड़ औ लण्ड को सहलाने लगी। वो बड़े प्यार से लण्ड को घूर रही थी। तब जय को एहसास हुआ उसने ममता को लण्ड चूसने का इशारा किया। ममता बिना एक पल गवाए, झटके से लण्ड के फूले सुपाड़े को मुंह में धर ली। ममता लण्ड को पूरा मगन होकर चूसने लगी। जय आनंद के सागर में डूबा था, और ममता की बुर को अपने पैरों की उंगलियों से छेड़ रहा था।

ममता तो उसके अंगूठे को बुर में घुसता महसूस की तो उसपर बैठ गयी। जय के पैर की दो उंगलियां ममता की बुर में घुस चुकी थी। ये होते ही जय के हाथ कविता की बुर को टटोलने लगे। चुच्ची का मर्दन जैसे कविता के लिए काफी ही नहीं था, उसने खुद ही सिसकते हुए चूचियों को मसलना शुरू कर दिया। नीचे से बुर के अंदर जय की उंगलियां अंदर बाहर हो रही थी। दोनों की चुच्चियाँ चूस कर वो पूरा आनंद उठा चुका था। फिर जय ने ममता के बाल पकड़के अपने लण्ड से उठाया और कविता के भी बाल पकड़ बोला," दोनों खड़ी हो जाओ। दोनों माँ बेटी कामुकता से लबरेज़ उसके इशारे पर खड़ी हो गयी। जय ने दोनों को पीछे घूमने को कहा ताकि दोनों की गाँड़ उसकी ओर हो। जय बोला," चिपक कर खड़ी रहो। आआहह, हाँ शाबाश अब दोनों अपने कमर को झुका गाँड़ बाहर की ओर निकालो। दोनों के बुर और गाँड़ साफ दिखने लगा, क्योंकि दोनों ने अपने हाथों से चूतड़ों को फैलाया हुआ था। जय ने पहले ममता के बुर को जीभ से चाटा और कविता की बुर में उंगली घुसा दी। दोनों माँ बेटी के मुंह से लंबी सिसकारी निकल गयी। ईईसससससससस........ उनके मुंह से लगातार सिसकारियां निकल रही थी। जय ममता की बुर में भी उंगली घुसाए था। दोनों के भीगे बुर से मादक गंध आ रही थी।
 
जय ममता के चुच्चियों को देख पागल हो रहा था, तो उधर कविता अपने नन्हे बुर को मसलते हुए अटखेलियां कर रही थी। फिर उन दोनों ने उसे लेटने का इशारा किया। जय पानी के अंदर बैठ लेट गया। उसके लेटने के साथ दोनों, भी पीठ टब के किनारों पर टिका बैठ गयी। जय का सर ममता और पैर कविता की ओर था। उसका सर ममता की चूचियों पर टिक गया। पैर कविता की कोमल जांघों पर। कविता उसके पैर धोने लगी। ममता उसकी ओर कामुकता से देखते हुए, उसकी छाती रगड़ रही थी। जय के हाथ ममता के ममतामयी चूचियों पर शिकंजा कस हुए थे। वो उनमें से दूध निचोड़ने की कोशिश में लगा था। ममता ने बड़े प्यार से अपनी बांयी चुच्ची के चूचक को उसके होंठों के बीच दे दिए और बोली," बहुत दिन हो गए ने बेटा सैयांजी, माँ का दूध पिये। पीलो बेटा, माँ का दूध। तब तो ताक़त आएगी और दोनों बीवियों को जमकर चोदोगे।" और मुस्कुराने लगी। जय मुंह से चूचक चूसते हुए, हंस पड़ा। ममता भी हंसते हुए, उसकी छाती पीठ सहला रही थी। नीचे कविता उसके तलवे रगड़ रही थी। जिससे उसे हल्की गुदगुदी भी हो रही थी। तीनों का बदन पानी में पूरी तरह भीग चुका था। ममता और कविता की नग्नता पानी में भीगने से और भी कामुक हो चुकी थी। वैसे उनमें कामुकता की कोई कमी नहीं थी, पर पानी में गीले होकर उनके उभार, चुच्चियाँ, गाँड़ और जांघें कामुकता की नई परिभाषा लिख रहे थे। भूरे चूचकों के कड़क होने से पानी की बूंदे मोतियों जैसे उस पर लटकी हुई थी। चुच्ची चूसते हुए वो कविता, की ओर देख रहा था। कविता की जवान कड़क, सुडौल, गोल चुच्चियाँ को इस तरह देख, उसका लण्ड खड़ा होने लगा। कविता इस बात से अंजान, किसी दासी की तरह, अपने छोटे भाई के पैरों को साफ कर रही थी। उधर ममता, अपने बेटे की छाती सहलाते हुए, दूसरे हाथ से उसके बाल भी सहला रही थी। कविता पैरों को साफ करते हुए अब जांघों तक आ पहुंची थी। उसकी नज़र जय के सलामी देते हुए लण्ड, पर पड़ी। वो देख, उसके होंठों पर मुस्कान तैर गयी। पर उसने उसे छुवा नहीं, बल्कि उसकी जांघों को रगड़ते हुए साफ करने लगी।
उधर ममता भी अब जय की पीठ पर अपने कोमल हाथों से सफाई कर रही थी। जय के लिए तो ये किसी राजा के हरम जैसा था। कविता और ममता भी उत्तेजित हो चुकी थी। हालांकि, कविता कुछ देर पहले ही जय से चुदी थी, पर इस माहौल में तो कोई भी कामुक हो जाये। तभी जय उठा और कविता की ओर बढ़ा, वो कविता के चुचकों पर बाज की तरह लपका।
 
ममता- तुम्हारा अधिकार पहला है, और ज़्यादा भी। आखिर तुम राज़ी नहीं होती, तो हमदोनो की शादी कैसे हो पाती?
कविता- शादी तो तुम दोनों कर चुके थे, खजुराहो में। और रहा बात राज़ी होने का, तो जय के साथ हमारी शादी की मंजूरी तूम ही दी थी। तो दोनों बराबर हैं।
ममता- पर......
कविता- पर.....वर..... कुछ नहीं। आजसे हमारा हमदोनों के पति के साथ हनीमून है। और हनीमून में पति को इंतज़ार नहीं कराते। चलो ना मज़ा करना है।" बोलकर वो जैसे ही ममता का हाथ पकड़ बाहर निकलने को हुई, तो देखा सामने, जय था। वो जय को देख मुस्कुराई और बोली," चलो खाना खाते हैं।" उसने दोनों की ओर देखा, और बोला," दोनों बाथरूम में क्या बातें कर रही थी? सब ठीक है ना।
कविता- आपकी दूसरी पत्नी, हमारी माँ को लगता है कि वो हमदोनों के बीच कबाब में हड्डी हैं, इस हनीमून पर। अब आप समझाइए इनको।"
जय- माँ ये क्या सोच रही हो तुम? तुमदोनों अब हमारे जीवन के हर हिस्से की बराबर की हक़दार हो। तुमको ये सब सोचना बंद कर देना चाहिए। तुम दोनों को अंतिम साँस तक...."

ममता और कविता दोनों ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया, और एक साथ बोली," क्या अनाप शनाप बोलते हैं, आपको हमारी उम्र लग जाये।" जय ने उनका हाथ हटाकर, उन दोनों को अपने गले से लगा लिया। दोनों के माथे को चूम लिया और उसके होंठ बुदबुदाए," भारतीय नारी" फिर मुस्कुराने लगा।
ममता और कविता ने बदले में उसके दोनों गालों को चूम लिया। जय बोला," खाना आ गया है। लेकिन उसके पहले हमको नहाना है। क्या तुम दोनों हमको नहलाना चाहोगी? हम बहुत थक चुके हैं।"
ममता बोली," आइए हुज़ूर हम दोनों मिलके अपने स्वामी को खूब मज़े से नहलायेंगी। क्यों कविता ?
कविता,"इसमें तो बहुत मज़ा आएगा। अपने पति का, भाई का हर अंग हम खुद अपने हाथों से साफ करेंगे। चलिए ना जल्दी से अंदर।
दोनों जय की बांह पकड़ अंदर ले गयी। अंदर टब में पानी भरा हुआ था। कविता ने जय का तौलिया निकाल दिया। उसको फिर टब में उतारने के लिए दोनों माँ बेटी ने अपने कंधे झुकाए। जय उनके कंधों पर हाथ रखके, आराम से टब में उतर गया। वो लेटने ही वाला था कि, कविता ने उसे रोक दिया। फिर ममता और कविता भी टब में उतर आई। ममता और कविता दोनों किनारों पर थी। फिर दोनों ने बेशर्मों की तरह हंसते हुए अपने बदन से कपड़े उतार फेंक दिए। जय दोनों की ओर बारी बारी से देख रहा था। दोनों ने बाल खोल दिये। दोनों अपने अपने किनारों पर खड़ी अपने नंगे बदन की कामुक नुमाइश में लगी थी।
 
दरवाज़े पर दस्तक हुई, जय ने पूछा," कौन है??
उधर से आवाज़ आई," सर, रूम सर्विस, योर डिनर।"
कविता ने खुद को सफेद चादर से ढक लिया। और हड़बड़ाते हुए उठकर जल्दबाजी में बाथरूम में घुस गई। वो बाथरूम में घुसी तो, दरवाज़े की ओर ही देख रही थी। तभी उसे लगा कि उसके पैरों को किसीने पकड़ लिया। उसने झटके से नीचे देखा तो ममता उसके पैरों में गिरकर रो रही थी। कविता ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा फिर उसे उठाने की कोशिश की पर वो उसके पैर नहीं छोड़ रही थी।
कविता- माँ, ये क्या कर रही हो तुम? चलो उठो ना।
ममता- नहीं, दीदी हम आपके चरण की धूल के बराबर हैं। जो पाप हम किये हैं, उसके लिए माफी माँगना चाहते हैं।
कविता- क्या किया तुमने माँ? कौनसा पाप, कैसी माफी?
ममता- दीदी, कोई भी औरत अपने हनीमून पर अपनी सौतन को नहीं ले जाती। ये हनीमून तो आप दोनों का था पर हम बीच में आ गए। आपका हक़ पहले बनता है, जय पर। आप अपना हनीमून भी सौतन के साथ मना रही है। और हम बेशर्म चले भी आये, ये भी नहीं सोचा कि हम सौतन होने से पहले तुमदोनों की माँ भी है। अपने बच्चों के बीच, हम भी किसी बच्चे की तरह चले आये। यहां तो तुमदोनों का हक़ है।
कविता- माँ, हमारे पैर छोड़ो, हमको तुम्हारा पैर छूना चाहिए। और उल्टा तुम हमारा पैर छू रही हो। तुम हमसे बड़ी हो, और ये क्या आप आप बोल रही हो....उठो ना प्लीज...
ममता- नहीं, हम आपके माँ जरूर हैं, आपसे उम्र में बड़े हैं, पर आप हमसे बहुत बड़ी हैं सोच से। हमको माफ करेंगी की नहीं। तभी हम पैर छोड़ेंगे।
कविता- माँ, उफ्फ्फ अच्छा ठीक है, माफ कर देंगे पहले हमारी बात तो सुनो।
ममता- नहीं, पहले माफ करो।
कविता- अच्छा, ठीक है । उठो
ममता के कंधे पकड़के उसने उसको उठाया और फिर उसके आंसू पोछने लगी। फिर उसकी ओर देखा कविता बोली," ये बताओ, तुम जय की बीवी हो और हम भी उसकी पत्नी हैं। उसने तो हमदोनों को अपनी जीवनसंगिनी बनाया है। हम दोनों को ही उसका खुशी का ध्यान रखना है। हम दोनों पर उसका समान अधिकार है। और जितना अधिकार हमारा उसपर है, उतना ही तुम्हारा भी है। वो भले ही हम दोनों को अभी भी माँ और बहन माने,पर हमको तो अब उसकी पत्नी बनकर रहना है। ये बात सच है कि उसने हमसे पहले शादी की पर, उसने तुम्हारे साथ भी सात फेरे ही लिए, और मांग में वही लाल सिंदूर डाला, और गले में वैसे ही मंगलसूत्र डाला। अब ये कौन तय करेगा, कि उसपर हममें से किसका अधिकार पहले या ज्यादा है?
 
गोवा में जय ममता और कविता हनीमून का असली मज़ा देता है।दोनों को होटल के कमरे में तो पेलता ही है साथ मे समुंदर की लहरों में भी एकांत में ले जाकर दोनों की जबरदस्त चुदाई करता है।दिन के समय खुले आकाश के नीचे अपनी सगी माँ और बहन को अपनी बीबी बनाकर शायद ही किसी ने चोदा होगा।

इधर माया सत्य से होटल में अपनी गाँड़ मरवा रही है।वह कुतिया बनी हुई है और सत्य उसकी गाँड़ मार रहा है।कुछ देर बाद माया झड़ जाती है और सत्य भी उसके गाँड़ में झड़ जाता है।

तभी फोन बजता है और कंचन की घबराई हुई आवाज़ आती है। माँ डैड का एक्सीडेंट हो गया है आप जितना जल्दी हो सके हॉस्पिटल आ जाओ। सत्य माया को लेकर गोवा से माया के घर चल देते है लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था।हॉस्पिटल में शशिकान्त की मौत हो जाती है। माया और सत्य जब पहुँचते है तो कंचन का रो रोकर बुरा हाल था।सभी दुखी मन से शशिकांत का अंतिम संस्कार करते है।

कुछ दिन बाद सबकुछ नार्मल हो जाता है और माया और सत्य कमरे में सेक्स कर रहे है ।कंचन अपनी सहेली के घर गई हुई है लेकिन सहेली के नही होने पर वह लौट आती है और अपने माँ और मामा को सेक्स करते देखने लगती है और उनकी बातें सुनने लगती है।

माया-अब तो मुझे कंचन की बड़ी चिंता है उसकी शादी की और तेरी शादी की भी.............

तभी माया को कुछ याद आता है और बोलती है कि सत्य क्या तू मेरी एक बात मानेगा।
सत्य-बोलो दीदी। मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ।
माया-तू कंचन से शादी कर ले। फिर हमलोग यहाँ से सबकुछ बेच कर जय ममता और कविता की तरह एक साथ रहेंगे।
सत्य-(कुछ सोचकर) मैं तैयार हुँ दीदी लेकिन एक शर्त पर की आपको भी मुझसे शादी करनी होगी और कंचन को तैयार करने की जिम्मेदारी भी आपकी होगी।

माया-ठीक है।मैं ममता से बात करती हुँ।ममता कविता और जय मिलकर ये काम कर सकते है क्योंकि कविता और कंचन काफी क्लोज है और जब कंचन को कविता जय और ममता के बारे में पता चलेगा तो वह जरूर राज़ी हो जाएगी।

कंचन सभी राज़ जान जाती है कि कैसे जय अपनी माँ और बहन से शादी करके मज़े कर रहा है।उसकी भी चूत गरम हो जाती है।अपने मामा का लंड उसे भी पसंद आ जाता है।

माया ममता से बात करती है और फिर तीनों ममता के घर दिल्ली के लिए रवाना हो जाते है।

सबके समझाने पर कंचन अपने मामा सत्य के साथ शादी करने को राजी हो जाती है।

फिर सत्य कंचन और माया से शादी कर लेता है और जय कविता और ममता के घर के पास एक घर लेकर रहने लगते है।

ममता का पेट धीरे धीरे फूलने लगता है।उसके पेट मे जय का बच्चा पल रहा है।कुछ दिन बाद जय सिर्फ अपनी एक बीबी कविता को ही रंडियों की तरह पेलता है ममता सिर्फ कभी कभार उसका लण्ड चूसती है।

नौ महीने बाद जय को अपनी माँ ममता से एक लड़का होता है जिसे सभी बहुत प्यार करते है।इधर कंचन भी माँ बननेवाली है।सत्य भी कंचन और माया को एक ही विस्तर पर मज़े से चोदता है।

The end
 
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