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incest -ना भूलने वाली सेक्सी यादें complete

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Guest
ना भूलने वाली सेक्सी यादें

बंधुओ भाइयो और प्यारे पाठको मैं आरएसएस पर बहुत दिनों से एक साइलेंट यूज़र बन कर आनंद ले रहा हूँ . सभी लेखक बंधु कितनी मेहनत कर रहे हैं कुछ बंधु अपनी कहानी ला रहे हैं कुछ बंधु अच्छी कहानियों को हिन्दी में परवर्तित करके पाठकों का मनोरंजन कर रहे है . कुछ नये बंधु भी अपनी कहानियाँ ला रहे हैं . ये आरएसएस के लिए शुभ संकेत हैं .

सभी बंधुओं को से एक गुज़ारिश हैं कि मैं भी आपका थोड़ा सा मनोरंजन करने की कोशिस करने जा रहा हूँ . अतः आप सब से निवेदन है कि आप सब मेरा साथ ज़रूर दें . अब मैं आपको बोर ना करते हुए कहानी शुरू करने जा रहा हूँ पर एक बात और कहना चाहता हूँ कि ये कहानी माँ , बहन की चुदाई पर आधारित है इसीलिए जिन बंधुओ को पारवारिक रिश्तों की कहानियाँ पसंद ना हों वो इस कहानी को ना पढ़ें
 


यह मेरे अठारहवें जनमदिन के कुछ ही दिनो बाद की बात है जब मैने ग़लती से अपने पिता के एक छोटे से गुपत स्थान को ढूँढ लिया. इस छोटी सी जगह मे मेरे पिता जी अपने राज़ छिपा कर रखते थे. ये गुपत स्थान बेहद व्यक्तिगत चीज़ों का ख़ज़ाना था. इनमे कुछ सस्ती ज्वेलरी थी जिनकी कीमत बाज़ारु कीमत से ज़्यादा शायद जज़्बाती तौर पर थी. कुछ उनके पुराने दोस्तो के फोटोग्रॅफ्स थे, कुछ कभी नज़दीकी लोगो द्वारा लिखी गयी चिट्ठियाँ थी. कुछ अख़बारों के कटाउट थे जो शायद उनके मतलब के थे. एक खास किसम का मार्का लिए दो रुमाल थे, इस मार्क को मैं जानता नही था. कुछ सिनिमास के, प्लेस के, और क्रिकेट मॅचस के टिकेट थे जो उन्होने इस्तेमाल नही किए थे.

उसके बाद कुछ ख़ास चीज़ें सामने आई. तीन प्रेम पत्र जो उनकी माशूकों ने उनको लिखे थे. दो खत किसी एक औरत के लिखे हुए थे जिसने नीचे, खत के अंत में अपने नाम के सुरुआती अक्षर स से साइन किए हुए थे जो मेरी मम्मी के तो यकीनी तौर पर नही थे. तीसरा खत किसी ऐसी औरत का था जिसका दिल मेरे पिता ने किसी मामूली सी बात को लेकर तोड़ दिया था और वो मेरे पिता से वापस आने की भीख माँग रही थी. इसके अलावा मुझे तीन तस्वीरे या यूँ कहे कि तीन महिलाओं की तस्वीरें मिली. सभी एक से एक सुंदर और जवान, और यही मेरे पिता का असली राज़ था जिसे उन्होने दुनिया से छिपाया हुआ था. उनमे से एक तस्वीर को देख कर मैने फ़ौरन पहचान लिया, वो मेरी आंटी थी, मेरे पिताजी के बड़े भाई की पत्नी यानी उनकी बड़ी भाबी. लेकिन तस्वीर देखकर मैं यह नही कह सकता था कि तस्वीर उसकी मेरे ताऊ से शादी करने के पहले की थी या बाद की.

इन सबको देखना कुछ कुछ दिलचस्प तो था मगर उतना नही जितना मैने जगह ढूढ़ने पर सोचा था. मुझे अपने पिता के अतीत से कुछ लेना देना नही था मगर मुझे ताज्जुब था कि यह सब मेरी मम्मी की नज़रों से कैसे बचा रह गया और अगर उसे मिला तो उसने इनको जलाया क्यों नही. या तो उन्होने ने इस समान की कोई परवाह नही की थी क्योंकि मेरे पिता भी अब अतीत का हिस्सा बन चुके थे या शायद यह जगह अभी तक उनकी निगाह से छिपी हुई थी.

इस सब समान मे जिस चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा वो थी एक बेहद पुरानी काले रंग की जिल्द वाली किताब. वो किताब जब मैने खोलकर देखी तो मालूम चला कि कामसूत्र पर आधारित थी. किताब मे पेन्सिल से महिला और पुरुष को अलग अलग मुद्राओं मे संभोग करते हुए दिखाया गया था या पेन्सिल से अलग अलग आसनों में संभोग की ड्रॉयिंग्स बनाई हुई थी. मेरे जवान जिस्म में हलचल सी हुई, मुझे लगा मेरे हाथ में कोई किताब नही बल्कि दुनिया का कोई अजूबा लग गया था.

हमारा गाँव जो सूरत से कोई चालीस किमी की दूरी पर था, कोई 200 परिवारों का आशियाना था. गाँव में खेतीबाड़ी और पशुपालन का काम था. जवान लोग ज़्यादातर सूरत मे काम धंधा करते थे. इसलिए गाँव में मेरे जैसे जवान मर्द कम नही तो ज़्यादा भी नही थे. उस ज़माने में वो किताब एक तरह से मेरे मनोरंजन का खास साधन बन गयी थी. मेरी माँ सुबह मे खेतो में काम करती थी और मेरी बड़ी बेहन घर पर एक दुकान चलाती थी जो मेरे पिताजी की विरासत थी. दुपहर मे मेरी माँ दुकान पर होती और बेहन घर में खाना तैयार करती. मेरा काम था दुपहर मे खेतो मे काम करना और फिर अपनी दुधारू गाय भैसो को चारा पानी देना जो अक्सर शाम तक चलता था जैसा कयि बार जानवरों के चरते चरते दूर निकल जाने पर होता है. शाम में हमारा परिवार एक ही रुटीन का पालन करता था. मैं खेतो से बुरी तरह थका हारा कीचड़ से सना घर आता और ठंडे पानी से नहाता. मेरी बेहन मुझे गरमा गर्म खाना परोसती और फिर से अपने सिलाई के काम मे जुट जाती जिसमे से उसे अच्छी ख़ासी कमाई हो जाती थी. कई परिवार जिनके मरद सहर में अच्छी ख़ासी कमाई करते थे उनकी औरते महँगे कपड़े सिल्वाती और अच्छी ख़ासी सिलाई देती. मेरी मम्मी शाम को हमारे पड़ोसी और उसकी एक ख़ास सहेली शोभा के घर चली जाती और फिर दोनो आधी रात तक गाँव भर की बाते करती. इसलिए मम्मी से सुबह में जल्दी उठा नही जाता था जिस कारण सुबह मेरी बेहन दुकान चलाती थी. मेरी माँ खेतो में सुबह को काम करती जो कि काम कम ज़्यादा बहाना था.

अब मेरा संध्या का समय किताब के पन्नो को पलटते हुए बीतता. मैं निकट भविष्य मे खुद को उन मुद्राओं में तजुर्बा करने की कल्पना करता. मगर असलियत में निकट भविष्य मे एसी कोई संभावना नज़र नही आती. मेरे गाँव में और घरो मे आना जाना कम था, और ना ही मेने किसी को दोस्त बनाया था. गाँव में कुछ औरतें थीं जो काफ़ी सुंदर थी मगर ज़्यादातर वो शादीशुदा थी और अगर कोई कुँवारी थी तो यह पता लगाना बहुत मुश्किल था कि उसका पहले ही किसी के साथ टांका ना भिड़ा हो. हमारी पड़ोसन और मम्मी की फ्रेंड सोभा गाँव की सबसे खूबसूरत औरतों में से एक थी मगर माँ के डर से वो मेरी लिस्ट से बाहर थी.

सबसे ज़यादा सुंदर और सबसे जवान हमारे गाँव में मेरी खुद की बेहन थी जो अपनी एक अलग ही दुनिय में खोई रहती थी. सौंदर्य और मादकता से भरपूर उसका बदन शायद अपनी माँ पर गया था. जी हाँ मेरी माँ जो अब 41 साल की हो चुकी थी अब भी बहुत बहुत खूबसूरत थी बल्कि पूरनी शराब की तरह उमर बढ़ने के साथ साथ उसकी सुंद्रता बढ़ती जा रही थी, उसका रंगरूप और बदन निखरता जाता था. खेतो में काम करने से वो गाँव की और औरतो की तरह मोटी नही हुई थी. अगर आप लोग हैरान हैं कि हमने और लोगों की तरह शहर का रुख़ क्यों नही किया तो इसका सीधा सा जवाब है कि सहर में हमारा कोई जानकार या रिश्तेदार नही है जो हमे कुछ दिनो के लिए सहारा दे सके जब तक हम कोई ढंग का काम कर सकते. मेरे माता पिता हमारे जनम से भी पहले अपने रिश्तेदारों को छोड़ यहाँ बस गये थे और अब हम बस इस जगह जहाँ रहना और गुज़र बसर करना दिन ब दिन मुश्किल हो रहा था फँस गये थे, ना हम ये गाँव छोड़ सकते थे और ना यहाँ हमारा कोई भविष्य था.

 
बंधुओ अपडेट दे दिया है

शुरुआत है आपके लिए नया हूँ पर आप ही का बंधु हूँ आपकी तरफ से पूरा सहयोग चाहूँगा .
 
मेरी बेहन मुझसे चार साल बड़ी थी और अपनी एक अलग दुनिया में रहती थी, वो दुनिया जो उन न्यूज़ पेपर और मॅगज़ीन्स के किरदारों से बनी थी जो हम अपनी दुकान मे बेचते थे. दरअसल हम अपनी दुकान मे दो तीन मन्थलि मॅगज़ीन्स और तीन वीक्ली के अख़बार बेचते थे. यह अख़बार एक हाथ से होता हुआ दूसरे तक पहुँचता जाता जब तक पूरा गाँव इसे सुरू से आख़िर तक पढ़ ना लेता. मॅगज़ीन्स और न्यूसपेपर ज़्यादातर अंत मे वापिस हमारी दुकान पर पहुँच जाते जहाँ मेरी बेहन उनसे सिलाई का कोई नया डिज़ाइन बनाने की प्रॅक्टीस करती. मेरी बेहन अपनी इस खून पसीने की कमाई को किसी अग्यात स्थान पर हमारी माँ से छुपा कर रखती. वो उस दिन का इंतज़ार कर रही थी जब उसके पास इतना पैसा हो जाए कि वो हमारे गाँव को छोड़ किसी दूसरी जगह जा सके जहाँ उसका भविष्य शायद उसकी कल्पनाओं जैसा सुखद और आनंदमयी हो. जबकि मैं पूरी तरह बेपरवाह था. स्कूल मैं कब का छोड़ चुका था और किसी किस्म की मुझे चिंता थी नही. मेरा काम सिर्फ़ ये सुनिश्चित करना होता था कि हमारे जानवरों का पेट भरा होना चाहिए ऑर बरसात से पहले खेत जुते हुए होने चाहिए नयी फसल की जुताई के लिए. इसके अलावा मेरा काम था गाँव के बाहर खुले आसमान के नीचे किसी युवा शेर की तरह आवारा घूमना.

किसी कारण वश मैं किताब को वापस उसी जगह रख देता जहाँ मैने उसे खोजा था. अब यह मेरे पिता का छिपाने का गुपत स्थान नही मेरा छिपाने का गुप्त स्थान भी था. वो किताब अब मेरा राज़ थी और उसे मैं हमेशा उसी जगह छिपाए रखता. हर शाम मैं किताब निकालता और हर सुबह वापिस उसी जगह रख देता. मैं ना सिरफ़ अपने राज़ की हिफ़ाज़त करता बल्कि उसे उस जगह मे कैसे कहाँ किस पोज़ीशन मे रखा इस बात का भी पूरी शिद्दत से ध्यान रखता. इसीलिए यह बात मुझसे छिपी ना रह सकी कि मेरे उस गुपत स्थान की किसी और को भी जानकारी है और मेरे उस राज़ की भी. मैं खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था.

मैं जानता था कि वो मेरी मम्मी नही है जिसे इस जगह की मालूमात हो गयी थी, यह ज़रूर मेरी बेहन थी अथवा वो चीज़ें उस जगह ना रहती. मेरी मम्मी बिना शक उन सब चीज़ों को नष्ट कर देती.

मेरी बेहन किताब के साथ उतनी ही सावधानी वरत रही थी जितनी मैं. मेरे ख्याल से वो इसे दोपहर में देखती होगी जब मैं खेतों में काम कर रहा होता था. मेरे घर लौटने से पहले वो किताब को वापिस उसी जगह रख देती हालाँकि मैं इतना नही कह सकता था कि उसे इस बात की जानकारी थी कि वो किताब मैं भी पढ़ता था. मगर अब समस्या यह थी कि मेरा राज़ अब सिरफ़ मेरा राज़ नही था, अब हम दोनो का राज़ था और यह जानने के बाद कि वो उन्ही तस्वीरों को देखती है जिन्हे मैं देखता था और मेरी तरह यक़ीनन वो भी कल्पना करती होगी खुद को उन संभोग की विभिन्न मुद्राओं में बस फ़र्क था तो इतना कि वो खुद को उन मुद्राओं में औरत की जगह रखती होगी जबकि मैं खुद को मर्द की जगह रखता था. इसका नतीज़ा यह हुआ कि उन पोज़िशन्स को आज़माने के लिए मुझे एक पार्ट्नर मिल गयी थी चाहे वो काल्पनिक ही थी. मगर समस्या यह थी कि वो पार्ट्नर मेरी बेहन थी.

यह कुछ ऐसा था जैसे मैं कहूँ कि मुझे एक आसन या एक पोज़िशन में दिलचपसी थी जिसमे आदमी औरत के पीछे खड़ा होता है और औरत अपने हाथों और पावं पर चौपाया हो खड़ी हो एक घोड़ी की तरह. मेरा लिंग उसकी योनि से एक या दो इंच की दूरी पर हो और उसके अंदर जाने के लिए तैयार हो. अब मेरी कल्पना में वो आदमी मैं था. मैं ही वो था जिसके हाथ उस औरत की कमर को पीछे से ज़ोर से पकड़ते हैं, जिसकी पूरी ताक़त उसकी कमर में इकट्ठा हो जाती है और वो तैयार होता है एक जबरदस्त धक्के के साथ अपने लिंग को उस योनि की जड़ तक पेल देने के लिए. अब इसी पोज़ में मेरी बेहन खुद को उस औरत की जगह देखती होगी जो अपने पीछे खड़े एक तक़तबार मर्द से ठुकने वाली हो जिसका लिंग अविस्वसनीय तौर पर लंबा, मोटा हो. मेरी बेहन उस औरत की तरह ज़रूर मुस्कुराएगी जब उस मर्द का लंबा लिंग उसकी योनि की परतों को खोलता हुआ उसके पेट के अंदर पहुँचेगा और उसका दिल मचल उठेगा.

अब इसे दूसरी तरह से देखते हैं. मान लीजिए मेरी बेहन को वो पोज़िशन पसंद है जिसमे मर्द पीठ के बल लेटा हुआ है और औरत उसके सीने पर दोनो तरफ़ पैर किए हुए उसके लिंग पर नीचे आती है और उस लिंग को अपनी योनि की गहराइयों में उतार लेती है. मेरी बेहन की कल्पना मे वो खुद वोही औरत है जो मर्द के उपर झुकती है और उसके लिंग को अपनी योनि में समेट लेती है. अब मेरी कल्पना में वो सख्स मैं था जो उसकी चुचियों को मसल रहा था और जिसका लिंग उस गीली, गरम और अत्यधिक आनंदमयी योनि में डूबा हुआ था. किताब की उस तस्वीर मे मेरी कल्पना अनुसार मैं वो जीता जागता मर्द था जो उस तस्वीर की औरत की योनि के अंदर दाखिल होता है. उसी तस्वीर मे मेरी बेहन की सोच अनुसार वो खुद वो जीती जागती औरत थी जिसके अंदर किताब का वो मर्द दाखिल होता है. मैं उस औरत के अंदर अपना लिंग डालता हूँ और वो मर्द मेरी बेहन के अंदर अपना लिंग डालता है. मैं अपना लिंग डालता हूँ और जबकि मेरी बेहन डलवाती है. इस तरह मैं अपनी बेहन के अंदर दाखिल होता हूँ. अपनी बेहन के बारे में ऐसे विचार ऐसे ख़यालात अविस्वसनीय तौर पर कामुक थे और इन विचारों के साथ होने वाला अपराध बोध भी अविस्वसनीय था. उस अपराध बोध के बिना अपनी बेहन के अंदर दाखिल होने की मैं कल्पना नही कर सकता था क्यॉंके मैं अपनी बहन के साथ ऐसा नही कर सकता था. अपनी बेहन, अपनी सग़ी बेहन के अंदर दाखिल होने का आनंद किसी दूसरी औरत जैसे सोभा के अंदर दाखिल होने से कहीं ज़्यादा था. मेरी बेहन जैसी किसी जवान, खूबसूरत और अल्लहड़ लड़की से संभोग की संभावना शोभा जैसी किसी प्रौढ़ उमर की औरत से कहीं ज़्यादा उत्तेजित करने वाली थी. और अगर मैं सोभा के साथ संभोग कर सकता था तो निश्चय ही अपनी मम्मी के साथ भी कर सकता था. आख़िर उन दोनो की उमर और सूरत सीरत में ज़्यादा फरक नही था. मुझे फिर से अपराधबोध का एहसास हुआ और खुद पर शरम आई जब मैने कामसूत्र की उन पोजीशंस मे अपनी मम्मी की कल्पना की. मुझे अपनी कल्पनाओं के साथ होने वाला वो अपराध बोध अच्छा नही लगता. पहले मैं संभोग की उन विभिन्न मुद्राओं को किसी एसी औरत के साथ भोगने की कल्पना करता जिसके जिस्म की कोई पहचान नही थी, जो अंतहीन थी, जिसका कोई वजूद संभव नही था मगर अब जो मेरी कल्पनाओं में थी वो एक काया थी, एक देह थी, जिसका वजूद था और उस काया के लिए मेरी कल्पनाएं अदुभूत आनंदमयी होने के साथ साथ बहुत दर्द देने वाली भी थी. मुझे इस समस्या का जल्द ही कोई हल निकालना था.



• अंत मैं मेने एक हल ढूंड निकाला. मैं अपनी कल्पनायों में अपनी बेहन के जिस्म पर सोभा का सिर रख देता इससे मेरे अंदर का अपराधबोध का एहसास कम होता. अब मैं उस औरत को अपनी एक साइड पर लेटे हुए देखता जिसकी एक टाँग हवा में लहरा रही होती तो कैंची के उस पोज़ में उसके साथ संभोग करने वाला मर्द मैं होता. मेरी कमर के नीचे या मेरे कंधे पर रखी टाँग मेरी बेहन की होती, बेड पर लेटी नारी की देह मेरी बेहन की होती मगर उसकी चूत, उसका चेहरा शोभा का होता. इस तरह मैं बिना किसी पाप बिना किसी आत्मग्लानी के उस रोमांच उस आनंद को महसूस करता. जब मैं कुर्सी पर बैठा होता और वो मेरे सामने अपने घुटनो पर खड़ी मेरे लंड को अपने मुँह मे लिए कामुकता और मदहोशी से मेरी आँखो में झाँकती तो वो जिस्म मेरी बेहन का होता मगर वो मुख सोभा का होता जिसके अंदर मैं अपना वीर्य छोड़ता. सीधे लेटे हुए मेरी बेहन की टाँगे मेरी कमर के गिर्द कसी होती मगर मेरा लंड सोभा की चूत के अंदर होता. मैं अपनी बेहन को सहलाता, चूमता मगर चोदता सोभा को.

यही एक तरीका था जो मुझे मेरे दिमाग़ ने सुझाया था उस आत्मग्लानि को दूर करने का. मैं अपनी बेहन को छू सकता था, चूम सकता था , मगर उसे चोद नही सकता था. कई बार मैने सिर्फ़ रोमांच के लिए सोभा के जिस्म को भोगने की कोशिस की जिस पर चेहरा मेरी बेहन का होता, मगर मैं अपनी बेहन की आँखो मे नही देख सकता था और शर्म से अपना चेहरा घुमा लेता. इसी तरह मेने जाना कि मैं सोभा के जिस्म को चोदते हुए अगर मैं अपनी मम्मी का चेहरा उसके जिस्म पर लगाऊ तो मुझे वो पापबोध महसूस नही होता. मगर मुझे सबसे अधिक रोमांच और मज़ा तभी आता जब मैं सोभा के जिस्म पर अपनी बेहन का चेहरा लगा कर कल्पनाओं मे उसे चोदता. मगर जल्द ही सोभा का चेहरा भी गुम होने लगा, अब मेरे ख्यालों में सिर्फ़ मेरी बेहन का जिस्म होता जिसका चेहरा किसी नक़ाब से ढका होता. यह सबसे बढ़कर रोमचित कर देने वाली कल्पना थी क्यॉंके इसमे मैं सोभा या किसी और के बिना सीधा अपनी अपनी बेहन के साथ संभोग करता. नक़ाब के अंदर वो चेहरा मेरी बेहन का भी हो सकता था या किसी और का भी मगर ढका होने की वजह से मुझे कोई चिंता नही थी. अब मेरी कल्पनाओं में अगर कभी मेरी बेहन का मुस्कराता चेहरा मेरी आँखो के सामने आ जाता तो मैं अपनी शरम को नज़रअंदाज़ कर देता, अब मैं अपनी बेहन को एक नयी रोशनी में देख रहा था.



और यह जानकर कि मेरी बेहन उन्ही तस्वीरों को देखती है जिन्हे मैं देखता था और शायद मेरी तेरह ही वो भी उन पोज़ो मैं खुद की कल्पना करती थी, मैं एक तरह से यह जानने के लिए हद से ज़्यादा व्याकुल हो उठा था कि वो किन पोज़िशन्स या मुद्राओं में खुद को चुदवाने की कल्पना करती थी. मैं अधीर था यह जानने के लिए कि कामसूत्र की उस किताब में उसकी सबसे पसंदीदा पोज़ीशन कॉन सी है. मेरी इच्छा थी कि मेरी कल्पनाएं बेकार के अंदाज़ों मे भटकने की बजाए ज़्यादा ठोस हों और ज़्यादा केंद्रित हो और यह तभी मुमकिन था जब मुज़े यह पता चलता कि उसके ध्यान का केंदर बिंदु कॉन सी पोज़ीशन है ताकि मैं भी उसी पोज़ीशन पर ज़्यादा ध्यान दूं, उस पोज़िशन पर ज़्यादा समय ब्यतीत करूँ औरों की तुलना में.

पर अब समस्या यह थी कि मैं सीधे मुँह जाकर उससे तो पूछ नही सकता था कि बेहन तुम किस आसान में चुदवाने के सपने देखती हो. असलियत में तो हमे यह भी मालूम नही होना चाहिए था कि दूसरा हमारे राज़ को जानता है. मैं जानता था कि वो भी ज़रूर उस किताब को पढ़ती थी, इसी तरह शायद वो भी इस बात से अंजान नही थी कि मैं भी उस किताब को पढ़ता था. मगर यह बात हम एक दूसरे के सामने मान नहीं सकते थे, कबूल नही कर सकते थे, यह बहुत ही शर्मशार कर देने वाली बात होती.

क्रमशः.........
 
मुझे कोई ख़ास कोई रहस्यमयी, कोई गुप्त तरीका अपनाना था जिससे कि मैं उससे कोई संकेत कोई इशारा हासिल कर सकूँ कि उसकी पसंदीदा पोज़िशन कोन्सि है. और बिना किसी सीधी बातचीत के बिना किसी तरह सीधे सीधे यह जताए कि मैं क्या पूछना चाहता हूँ यह काम बेहद मुश्किल था. जब मैं इस बात को लेकर हैरान परेशान था कि उसकी पसंदीदा पोज़िशन कोन्सि है तो एक सवाल और भी था जिसने मुझे परेशान किया हुया था वो कैसे कल्पना करती थी या असल में किसके साथ कल्पना करती थी. मेरी तरह उसकी कल्पनाओं का कोई पार्ट्नर इस गाँव से तो कम से कम नही हो सकता था.

मैं तो सोभा के बारे में सोच सकता था मगर उसकी जिंदगी मे तो कोई सोभा का हमउम्र मरद भी नही था जिसके बारे में ख्वाइश कर सके, खुद को उस मरद के साथ उन पोज़ में सोच सके. तो फिर वो किसके साथ खुद की कल्पना करती थी, कॉन था जो उसके ख़यालों में मरद का रोल अदा करता था. अगर यह जानना बेहद मुश्किल था कि उसकी पसंदीदा पोज़िशन कोन्सि है तो यह जानना कि उस पोज़िशन में मरद कॉन होता था, लगभग नामुमकिन था. यह वो समय था जब गुजरात में गर्मी पूरे जोरों पर थी. सूर्य की तेज़ झुलसा देने वाली किरणोसे धरती तप जाती. इस तेज़ धूप में हमारी गाय भैसे खेतो में हमारे पुराने भीमकाय पेड़ो के नीचे छाँव मे बैठी रहती और मैं भी. इन्ही सुस्त दिनो में कयि महीने सोचने के पाश्चामत्त अचानक एक दिन वो विचार मेरे दिमाग़ में कोंधा. मुझे इतने महीनो बाद सुघा के मेरे और मेरी बेहन के बीच बातचीत का एक ज़रिया वो किताब खुद थी. मेरा मतलब मेरी तरह वो भी उस किताब में लिखा हुआ हर शब्द पढ़ती थी. क्या होगा अगर मैं एक बेहद सूक्ष्म, बेहद रहस्यमय, लगभग ना मालूम होने वाला एक इशारा उस किताब के ज़रिए उस को करूँ, बिना कोई संदेह जताए? अगर वो भी मेरी तरह उस किताब में उस गहराई तक डूबी हुई थी जिसकी मुझे पूर्ण आशा थी तो वो मेरे इशारे को ज़रूर भाँप जाती. हालाँकि वो उस इशारे का कोई जबाब देती या ना देती यह अलग बात थी. मगर मैं अपनी तरफ से तो कोशिस तो करने वाला था, कितनी और किस हद तक इसका अंदाज़ा भी मुझे नही था.

मैं अपनी बेहन को अपनी कल्पनाओं में अपनी पार्ट्नर मानता था, इसलिए मैं जानना चाहता था कि उसे सबसे अच्छा क्या लगता है और फिर अपनी कल्पना में वोही करते हुए मैं उसे खुश करना चाहता था. यहाँ पर मेरी पार्ट्नर का मतलब सिर्फ़ मेरी कल्पनाओं की उस युवती से है जिसके साथ मैं कामसूत्र की उन पोज़िशन को आजमाना चाहता था जो मेरी बेहन थी. मगर यहाँ सिर्फ़ मैं अपनी कल्पनाओं की ही बात कर रहा था, असल में हम भाई बेहन के बीच एसा होना संभव ना था.

अपनी कल्पनाओं में मुझे वो काम करने माएँ ज़्यादा मज़ा आता जो मेरी बेहन को पसंद था, ना कि वो काम अपनी बेहन से करवाने में जो मुझे पसंद था. आप सोच सकते हैं कि अगर हमारी सोचों और कल्पनाओं में समानता थी तो मेरी बेहन ज़रूर समझ जाती कि मैं उसे क्या संदेश भेज रहा हूँ और वो भी बिना किसी हिचकिचाहट से उसका जवाब देती. दूसरी तरफ अगर वो मेरा संदेश जान लेने के बाद भी कोई जवाब ना देती तो इसका सीधा मतलब होता वो मुझे अपने काम से मतलब रखने को कह रही है और मुझे ये गंवारा नही था.

अपने काँपते हाथों और धड़कते दिल के साथ मैने पेन्सिल उठाई और अपनी पसंदीदा पोज़िशन या आसान के आगे एक स्टार का निशान बना दिया. मेरे उस स्टार का मतलब उसे यह बताना था कि वो पोज़ मेरा पसंदीदा था. मैं उम्मीद लगाए बैठा था कि वो उस स्टार को देखेगी और उसे बातचीत का ज़रिया मानेगी. मैं एक तरह से हमारे बीच एक संपर्क स्थापित कर रहा था यह बताते हुए कि मेरी पसंदीदा पोज़िशन कोन्सि है और उम्मीद कर रहा था कि वो उत्तर में अपनी पसंदीदा पोज़िशन के आगे स्टार का निशान लगा कर इस बातचीत को आगे बढ़ाएगी. इस तरह हम बिना किसी परेशानी के बिना कोई ख़तरा मोल लिए एक दूसरे को अपनी पसंद नापसंद बता सकते थे. अगर हम मे से कोई उस बातचीत को नापसंद करता तो दूसरा बड़ी आसानी से अंजान बन कर उस निशान की मोजूदगी की जानकारी से इनकार कर सकता था. मैने सुबह वो किताब उसी जगह वापस रख दी. अब मुझे रात तक इंतज़ार करना था, और यह इंतज़ार बहुत ज़्यादा मुश्किल था. मैने पूरे दिन कोशिस करी कि अपने आप को बिज़ी रखू और किताब से अपना ध्यान हटा लूँ मगर लाख चाहने पर भी मेरा ध्यान उधर से हट नही पाया. मैं हद से ज़्यादा व्याकुल और अधीर था अपनी बेहन का रेस्पॉन्स देखने के लिए.

अगले दिन शाम को जब मैने किताब उठाई तो मेरे हाथ किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहे थे. मेरी साँस उखड़ी हुई थी. मेरा खून इतनी तेज़ी से नसों में दौड़ रहा था कि मेरे कानो में साय साय की आवाज़ आ रही थी. मैं इतना कामोत्तेजित था जितना शायद जिंदगी मे कभी नही हुआ था. मैं अपनी आँखे किताब के पन्नो पर केंद्रित नही कर पा रहा था जब मैं जल्दबाज़ी में किताब के पन्ने पलटते हुए अपनी बेहन दुबारा लगाए किसी निशान को ढूँढ रहा था. मगर मुझे कोई निशान नही मिला. मुझे अत्यधिक निराशा हुई जिस कारण मेरे दिमाग़ पर सवार कामोत्तेजना थोड़ी कम हो गयी. मैने फिर से बड़े ध्यान से किताब को जाँचा मगर मैं कोई निशान कोई इशारा ढूँडने में नाकामयाब रहा. मैं निराश था और इस निराशा ने मुझे हताश कर दिया था. सच में मैं तनावग्रस्त हो गया था. मैं खुद नही जानता था क्यों मैने अपनी बेहन से कोई इशारा पाने के लिए इतनी उँची उम्मीद लगा रखी थी, जो ना मिलने पर मैं खुद को ठुकराया हुआ महसूस कर रहा था, लगता था मेरी परछाई ने मेरा साथ निभाने से मना कर दिया था.

मेरे दस वार ढूँढने पर भी किताब के पन्नो पर कोई इशारा कोई निशान ना मिला. मुझे लगा शायद उस दिन उसने वो किताब देखी ही नही थी शायद इस लिए उसे मेरे इशारे की जानकारी नही थी. इस से मुझे थोड़ी आस बँधी कि शायद मुझे कल कोई इशारा मिल जाएगा. मगर कयि दिनो के इंतज़ार के बाद भी ना उम्मीदी और हताशा ही हाथ आई. आख़िरकार एक साप्ताह बाद मैने हार मान ली, शायद इस विषय पर हम भाई बेहन आपस में बातचीत नही कर सकते थे. शायद मुझसे बड़ी और अधिक समझदार होने के कारण उसने मुझे बढ़ावा देने की बजाए मुझे चुप करा देने में ही भलाई समझी थी, शायद कोई इशारा ना देकर उसने मुझे उस से दूर रहने का संकेत दिया था. खैर कुछ भी हो अब वो विषय बंद हो चुका था. अंत में जब मैने एक साप्ताह गुजर जाने के बाद बाद उसे किए इशारे की उम्मीद छोड़ी तो मेरा मन कुछ शांत पड़ गया था. मैं अपने सपनो, अपनी रंग बिरंगी काल्पनिक दुनिया में लौट गया जहाँ उसकी मौजूदगी अब बहुत कम हो गयी थी और मैं अब सिर्फ़ सोभा को ही अपनी ख़याली दुनिया में अलग अलग आसनों में चोदता. और यह थोड़ा अच्छा भी था क्यों कि शोभा मुझे दूर रहने को नही बोलती थी, मैं कम से कम ठुकराया हुआ महसूस तो नही करता था.

इसीलिए, शायड, अपनी पसंदीदा तस्वीर के आगे निशान लगाने के दस दिन बाद जब मैने एक दूसरी तस्वीर के आगे एक चेक या सही का निशान देखा तो मैं लगभग उसे नज़रअंदाज़ कर गया. किताब में किसी दूसरे निशान की मौजूदगी जान कर मेरा कलेजा गले को जा लगा. ना जाने क्यों मगर मैने उसी एक पल में अपने अंदर जबरदस्त उत्तेजना महसूस की. किताब के पन्ने वापस पीछे पलटते हुए मैं लगभग उन्हे फाड़ ही रहा था. मुझे वो निशान देखना था. जब वो निशान मेरी आँखो के सामने आया तो एक पल के लिए मुझे यकीन नही आया, मैने अपने हाथ से पोंछ कर देखा तो मुझे यकीन हुआ वाकई वो निशान असली है. खुशी के मारे मेरे मुख से घुटि हुई चीख निकल गयी. मेरा पसंदीदा आसान था जिसमे औरत घोड़ी बन कर खड़ी हो और मरद उसकी कमर थामे उसके पीछे खड़ा हो उसके अंदर पेलने के लिए. मेरी बेहन का पसंदीदा आसन था जिसमे आदमी बेड के बीचो बीच टाँगे सीधी पसार कर बैठा हो, और औरत उसकी कमर के इर्द गिर्द टाँगे लपेटे उसकी गोद में बैठी हो. मर्द का लंड औरत की चूत में घुसा हुआ था और उसके हाथ उसके मॅमन को मसल रहे थे जबकि औरत की बाहें मर्द की गर्दन पर कसी हुई थी और दोनो एक जबरदस्त गहरे चुंबन में डूबे हुए थे.

मेरा तन मन आनंदित हो उठा. मैं इतना खुश था जितना शायद जिंदगी में कभी नही हुआ था. बेहन के जवाब से मेरा जोश कयि सौ गुना बढ़ गया था. हमारे बीच उस किताब के मध्यम से बना संपर्क जीवंत हो उठा था. उस पल घर के किसी हिस्से में बैठी शायद वो मेरे द्वारा उसका जबाब ढूँढे जाने के बारे में सोच रही होगी और जवाब ढूँढने पर मेरी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा लगा रही होगी. मैं अंदाज़ा लगा रहा था उसकी प्रतिक्रिया का जब उसने मेरा स्टार उस किताब में देखा होगा. असल में उसके उत्तर का मुझे एहसास था और मैं उसके लिए तैयार भी था मगर वो मेरे छोड़े गये इशारे के लिए तैयार नही थी. उसके लिए तो वो पल बेहद अप्रत्याशित रहा होगा और शायद उसका रोमांच भी मेरे निशान ढूँढने के रोमांच से कहीं ज़्यादा होगा. मुझे थोड़ा ताज्जुब हो रहा था कि मेरा इशारा मिलने के बाद उसके दिमाग़ में क्या चल रहा था. मुझे ताज्जुब हो रहा था क्यों उसने जबाब देने में इतना वक़्त लगाया. शायद उसे ये समझने में वक़्त लगा था कि मैं उस इशारे के मध्यम से उसे क्या कहना चाहता हूँ.

और मेरे दिमाग़ में क्या चल रहा था उसका इशारा मिलने के बाद. मेरे दिमाग़ में उस वक़्त सिर्फ़ एक ही बात थी कि मेरी बेहन मेरी गोद में बैठी हुई है और मेरे हाथ उसके मम्मे मसल रहे हैं और हम एक कभी ना ख़तम होने वाले गहरे चुंबन में डूबे हुए हैं. अब सोभा को मेरे ख़यालों के इर्द गिर्द भी भटकने की इजाज़त् नही थी. वो सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी बेहन थी जिसके ख्यालों में मैं पूरी तरह डूबा हुआ था. मैने कल्पना करने की कोशिस की कि मेरी बेहन असलियत में मेरी गोद में बैठी है और उसके नंगे चूतड़ मेरी जाँघो पर टिके हुए हैं. मेरे हाथ उसके नंगे मम्मों को मसल रहे थे और मेरा नंगा लंड उसकी नंगी चूत में था.

मैने हम दोनो के बीच संपर्क बिंदु स्थापित कर दिया था, बातचीत का एक गुप्त ज़रिया बना लिया था जिसके अस्तित्व से हम दोनो ज़रूरत पड़ने पर सॉफ मुकर सकते थे. मगर अब जब संपर्क स्थापित हो चुका था और उसने मेरे उस जटिल सवाल का जवाब भी दे दिया था तो अब क्या? अब इसके आगे क्या? अब मुझे बातचीत जारी रखनी थी नही तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाता. मगर अब मुझे ये नही सूझ रहा था कि मुझे अब उसे क्या कहना चाहिए या इससे आगे कैसे बढ़ाना चाहिए. अपने अगले कदम के बारे में सोचते हुए मैने पूरी रात लगभग जागते हुए निकाली.

बंधुओ इससे आगे की अपडेट कल मिलेगी.......................

 
अगले दिन जब मैने अपनी बेहन को देखा तो मैने उसके व्यवहार मे कोई तब्दीली कोई बदलाव ढूँढने की कोशिस की. मगर उसका आचरण वोही पहले वाला था अगर कोई बदलाव था तो वो उसे बड़े अच्छे से छुपा रही थी. मगर मैं जानता था कि वो जानती है कि अब हम दोनो भाई बेहन के बीच एक सूक्षम, एक रहस्यमयी संपर्क स्थापित हो चुका था जिसके माध्यम से हम ने एक दूसरे को अपने चुदाई के पसंदीदा आसान के बारे में बताया था. अब इसका मतलब क्या था ये मेरी समझ से बाहर था और ये हमे किस दिशा मे ले जा रहा था ये भी मेरी समझ से बाहर था. मैं तो अपनी बेहन की पसंदीदा सेक्स पोज़िशन को जानकार हद से ज़्यादा कामोत्तेजित था और अपने सपनो में उसका सहभागी बन उसी पोज़ मे उसे पूर जोशो खरोष से चोद रहा था. मगर अत्यधिक इच्छा होने पर भी मैं हस्तमैथुन से बच रहा था, मैं अपने अंदर दहक रही उस आग को, उस जोश को हस्तमैथुन से कम नही करना चाहता था.

मेरे अंदर आगे बढ़ कर अपनी बेहन के जिस्म को छू लेने की ख्वाइश भी ज़ोर पकड़ रही थी. मैं अपनी बेहन के जिस्म के कुछ खास अंगो को छू कर उस एहसास को महसूस करना चाहता था ता कि उसी एहसास को अपने सपनो में इस्तेमाल कर उनमे थोड़ी वास्तविकता डाल सकूँ. अगले दिन जब मैने अपनी बेहन को अपनी कामाग्नी में जलती आँखो से देखा तो मैने पाया मेरे सामने यौवन से लबरेज एक ऐसी युवती खड़ी है जिसका हर अंग बड़ी शिद्दत से तराषा गया था, जिसके हुश्न को पाने के कोई भी लड़ाई लड़ी जा सकती थी, जिसके लिए मरा और मारा जा सकता था. मैं उसे छूना चाहता था, उसे चूमना चाहता था, उसके अंग अंग को मसलना चाहता था और उसे चोदना चाहता था, उसके दहकते जिसम की आग में खुद को जलाकर उसे भोगना चाहता था.

तीन दिन बाद कहीं जाकर मुझे बातचीत आगे बढ़ाने का तरीका सूझा. मैने कल्पना की हम दोनो भाई बेहन एक साथ उस किताब को देखते हुए बातें कर रहे हाँ. मगर हमारी बातचीत किताब में लगे निशानो या संकेतो के ज़रिए हो रही थी ना कि मुख से निकलने वाले शब्दों से. मेरे स्टार के संकेत से उसने जाना होगा कि यह मेरा पसंदीदा आसन है. उस स्टार के ज़रिए उसने मुझे कहते सुना होगा कि यह मेरा पसंदीदा आसन है, तुम्हारा पसंदीदा आसन कौन सा है. जिसके ज्वाब मे वो अपने पसंदीदा आसन के आगे एक निशान लगाएगी जिसे देखकर मुझे लगेगा जैसे वो कह रही हो मुझे यह आसन अच्छा लगता है या यह आसन मेरा पसंदीदा है. अब उसके संकेत का जवाब देने की बारी मेरी होगी. अगर हम असलियत में बातचीत कर रहे होते तो शायद मेरा जवाब होता हाँ, यह आसन मुझे भी अच्छा लगता है. जब मेने थोड़ा और सोचा तो मेरा असल जवाब था...... हाँ यह आसन अछा है, मगर?.......

पहले मैने किताब में उसके लगाए संकेत के आगे एक स्टार लगाया जिसका मतलब था .......हाँ यह आसन मुझे भी अच्छा लगता है. ....... मगर मैं सिर्फ़ इतना ही नही कहना चाहता था मेरे जवाब में एक 'मगर' भी था. इसलिए मैने उस स्टार के आगे एक प्रश्न चिन्हप (?) लगा दिया. अब मेरा जवाब उसके संकेत के आगे एक स्टार और उसके साथ एक प्रश्न चिन्हअ था जो कह रहा था...हाँ मुझे भी यह आसान पसंद है मगर......

इस बार उसका जबाब जल्दी आया. अगले दिन मैने किताब में अपने प्रश्न चिन्ह के आगे एक तीर का निशान देखा, उस तीर के दूसरे सिरे पर एक और प्रश्न चिन्ह बना हुआ था. उस प्रश्न चिन्ह को देख मुझे लगा जैसे वो मुझसे पूछ रही हो "मगर......मगर क्या?"

अब उसके सवाल के जबाब में मेरा उत्तर थोड़ा जटिल था जिसे मैं एक या दो संकेत लगा कर नही समझा सकता था. मेरा जवाब इस योग्य होना चाहिए था कि वो मेरी बात पूरी तेरह समझ जाए और बिना शब्दों के इस्तेमाल के यह नामुमकिन था. लेकिन अगर मैं उसके सांकेतिक सवाल के उत्तर में सांकेतिक ज्वाब ना देकर शब्दों द्वारा लिखा हुआ जबाब देता तो मैं हमारे बीच की उस बातचीत को अगले स्तकर तक ले जाता. मुझे नही मालूम था इसका परिणाम क्या निकलता. अब तक हमारे बीच हुई उस संकेतिक बातचीत को हम बचकाना खेल कह सकते थे, यह बात अलग है कि बातचीत किसी भी तरह से बचकाना नही थी. मगर शब्द............ अनिश्चित और अस्पष्ट संकेतो की तुलना में शब्द कहीं अधिक वज़नी होते. और यह गैर ज़िम्मेदाराना बातचीत ना रहती. हम उन संकेतो के असली मतलब से अंजान होने का बहाना कर सकते थे मगर शब्द एक खास मतलब लिए होते हैं. कामुकता में डूबा हुआ मैं अब एक सीमा पार करने जा रहा था, अपने अंदर उठे उस तूफान को अनदेखा करते हुए जो मुझे चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था "वो तुम्हारी सग़ी बड़ी बेहन है" . मुझे नही मालूम था कि उसके अंदर भी कोई ऐसा तूफान चल रहा है.

आम हालातों में अगर हम साथ बैठे होते तो शायद मेरा जवाब हल्का सा होता मगर काम मेरे सिर चढ़ कर बोल रहा था. मैने उसके प्रश्न चिन्ह के आगे एक तीर लगाया जिसके अंत में मैने एक गोला बनाया और उस गोले में एक नंबर लिखा. वो नंबर उस किताब में एक दूसरे पेज की ओर इशारा था. उस पेज पर औरत और मर्द लेटे हुए संभोग कर रहे थे. मर्द औरत की चूत में पूरी गहराई तक लंड घुसेडे पड़ा था, उसका एक हाथ उस औरत की चूची को मसल रहा था और दूसरा हाथ उसकी गर्दन को लिपटा हुआ था. औरत की टाँगे मर्द की कमर के गिर्द लिपटी हुई थी और उसकी बाहें उसके कंधो को कस कर पकड़े हुए थी. दोनो एक गहरे चुंबन में डूबे हुए थे. मैने उस संभोग की मुद्रा के आगे पहले एक स्टार का संकेत लगाया जिसका मतलब था कि मुझे ये आसन भी पसंद है और उसके आगे लिखा "पूरी गहराई तक चुदाई".

मैने एक लंबी सांस ली. मैने एक सीमा पर की थी. मैने उसे लिख दिया था बल्कि उसे कहा था कि मुझे फलाना पेज का आसान दूसरे पेज के आसान से अच्छा लगता है क्योंकि..........क्योंकि इसमे अति गहराई तक चुदाई होती है.

मैने अपने ख्यालो को शब्दों मे प्रकट कर दिया था, हमारे बीच संभोग की विभिन्न मुद्राओं या आसनो संबंधी प्राथमिकताओं को लेकर एक खुली बातचीत को शुरू किया था. मुझे नही मालूम था उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी या वो मेरे इस खुलेपन से आपत्ति जताएगी. अगर उसको आपत्ति होती और वो बातचीत से किनारा कर लेती तो.......तो यही सही.......यह ख़तरा उठाने लायक था.

उसका जबाब भी बड़ी शीघ्रता से आया. उसने मेरे शब्दों के आगे एक तीर का निशान लगा कर एक गोले के अंदर एक दूसरे पेज का नंबर लिखा था. जब मेने उसके संकेत किए हुए पेज पर देखा तो मैने एक संभोग मुद्रा के आगे उसके लिखे शब्दों को पाया. इस मुद्रा मे मर्द कमर आगे धकेलते हुए अपना लंड पूरा औरत की चूत में घुसेडे हुए खड़ा था, औरत के चुतड़ों को कस कर पकड़े हुए उसे अपनी ओर खींच रहा था ताकि जितना हो सके वो उसकी चूत में गहराई तक अपना लंड डाल सके. औरत ने टाँगे मोड़ रखी थी और उसके घुटने मर्द की छाती को टच कर रहे थे. मर्द के लंड पर बैठी वो अपनी बाहें उसके गले मे डाले पीछे को झूल रही थी. मेरी बेहन ने लिखा था "और भी गहराई तक चुदाई, शायद सबसे ज़्यादा गहराई तक"

अब कोई बाधा नही थी, कोई सीमा नही थी, कोई हद नही थी.

जब हम अगले दिन मिले तो हम ने उदासीनता का दिखावा किया. हम ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे हमारे बीच कुछ भी ना चल रहा हो. मैं आँखे बचा कर उसके जिस्म को निहार रहा था. वो भी चोरी चोरी मुझे ताक रही थी. मगर यह सब रहस्यमयी तरीके से हो रहा था. हमारे बीच होने वाली वो बातचीत एक रहस्य थी और उसको रहस्य ही रहना था. हम छिप कर गोपनीय तरीके से उस रहस्य को बाँट सकते थे मगर उसे खुले में लाने का दम नही भर सकते थे. हमारे बीच प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई सहमति नही थी कि इस बातचीत को खुले मे किया जा सके क्योंकि यह संभोग या कामक्रीड़ा की विभिन्न मुड्डराओं या आसनों का मामला था और इसमे कामुक भावनाएँ भी शामिल थी इसलिए एक बड़ी बेहन और छोटे भाई के बीच यह बातचीत एक रहस्य ही रहना चाहिए थी.

कल्पना करना सपने देखना ठीक था मगर उसे असलियत में करना ठीक नही था.

मेरी बेहन और मैने संभोग में पूर्णतया गहराई तक होने वाली चुदाई के आसन के बारे में एक दूसरे को बताया था. उस रात सपना देखते हुए मेरे जिस्म से असीम वीर्य निकला जब मैं अपनी बेहन को उसी आसन में चोदते हुए उस गहराई तक पहुँच गया. हमारे बीच ये विचारों का आदान प्रदान या यह बातचीत मुझे हद से ज़्यादा कामोत्तेजित किए हुई थी. मगर मेरी बेहन कैसा महसूस करती है यह मुझे मालूम नही था. हमारे बीच होने वाली यह बातचीत उसको भी उत्तेजित करती है, या यह सिर्फ़ उसके मन बहलाने का साधन मात्र थी और उसके दिल में मेरे जैसे कोई ख़याल नही थे, मैं नही जानता था.

मगर अब मैं जानना चाहता था और अब मैं और ज़्यादा सबर नही कर सकता था.

मैने अपने प्रश्न को व्यक्त करने के हज़ारों तरीकों के बारे में सोचा , मगर कोई भी तरीका या वाक्य मुझे जॅंच नही रहा था. असल बात बिना खुले शब्दों का इस्तेमाल किए मैं व्यक्त नही कर सकता था. इस बार भी वोही समस्या या जटिलता मेरे सामने थी और मुझे कोई एसा तरीका ढूँढना था कि मैं जान सकूँ कि यह सब उसे किस तरह से प्रभावित कर रहा है और वो बिना हिचकिचाए मुझे जबाब दे सके. तब मुझे यह ख़याल आया. अब तक हमारे बीच होने वाली बातचीत में पहला कदम हमेशा मैने उठाया था, अगर मैं अगला कदम ना उठाऊँ तो? क्या वो हमारी बात चीत को जारी रखने के लिए अगला कदम उठाएगी.

उसके द्वारा अगला कदम उठाने की संभावना ज़्यादा रोमांचित कर देने वाली थी. उसके द्वारा अगला सवाल पूछने का सोचते ही मेरे अंदर कोतुहुल और उत्तेजना की जैसे सिहरन सी दौड़ गयी.

मैने चुप्पी धर ली. मैने ना कुछ लिखा और ना ही कोई संकेत बनाया.मैं बस इंतज़ार करने लगा.

 


मेरी यह चुप्पी मेरी असली ज़िंदगी में भी दिखाई देने लगी थी. बहन का ध्यान भी इस ओर गया और कुछ दिनो बाद जब हम खाना खा रहे थे तो उसने पूछा " तुम ठीक तो हो?"

"मैं ठीक हूँ" मेने जवाब दिया "बस यह हल्का सा सरदर्द कयि दिनो से परेशान कर रहा है"

उस रात जब मैं अपने बेड में लेटा हुआ था तो वो मेरे कमरे में आई. उसके एक हाथ में पानी का गिलास था और दूसरे हाथ में कुछ देसी दवाई थी जिसका नुस्ख़ा हमारे पिताजी ने इज़ाद किया था.

"यह लो, इससे तुम्हे राहत मिलेगी. मेरे सरदर्द में मुझे हमेशा इससे आराम आता है" दोनो चीज़ें मुझे पकड़ाते हुए वो बोली.

"मेरे सरदर्द" उसका क्या मतलब था मैं नही जानता था. या तो उसे मेरे जैसा सिरदर्द था जिसका मतलब उसे भी मेरे वाली ही बीमारी थी. या वो साधारण सरदर्द की बात कर रही थी और वो बस बड़ी बेहन के नाते मेरी मदद कर रही थी.

अगली सुबह मैं देर तक सोता रहा. वो मेरे रूम में आई और मेरे पास बैठ गयी.

"कुछ फरक पड़ा?' उसने पूछा.

मैं उसके जिस्म से निकलने वाली गर्मी को महसूस कर रहा था. वो मेरे इतने नज़दीक बैठी थी कि मेरा दिल करता था कि हाथ आगे बढ़ा कर बस उसे छू लूँ. "नही अभी भी पहले जैसा ही है" मेने उसे जवाब दिया

उसने हाथ बढ़ा कर मेरे माथे को छुआ और बोली "शुक्र है तुम्हे बुखार नही है, इसलिए चिंता मत करो जल्दी ठीक हो जाओगे"

उसका हाथ नाज़ुक और गरम महसूस हो रहा था. हाथ की कोमलता का एहसास बिल्कुल नया था. ना जाने कितने समय बाद हम दोनो किसी शारीरिक संपर्क में आए थे. और हमारे उन संकेतो के आदान प्रदान के बाद उसका स्पर्श बहुत सुखद था.

उस शाम जब मैने वो किताब खोली तो मैने पेजस के बीच एक काग़ज़ के छोटे टुकड़े को तय लगा कर रखे देखा. मैने काग़ज़ का टुकड़ा निकाला और उसे खोला तो देखा उसमे सिवाय एक बड़े से प्रश्न चिन्ह के और कुछ नही था. उस संकेत के ज़रिए जैसे वो पूछ रही हो कि 'क्या हो रहा है'. प्रश्न चिन्ह का इतना बड़ा होना इस बात की ओर इशारा करता था कि वो हमारी बातचीत के इस तरह अचानक बंद हो जाने और उसके मेरे उपर पड़ रहे प्रभाव से चिंतत थी. उसके सवाल पूछने से हमारी बातचीत अब अगले स्तर तक जा पहुँची थी.

वो जानना चाहती थी 'आख़िर माजरा क्या है'.

मैं कहना चाहता था "बस अब मैं और बर्दाशत नही कर सकता! मेरे दिमाग़ में हो रही उथल पुथल मुझे पागल किए दे रही है" मैं उसे कहना चाहता था "यह संकेत यह इशारे मुझे हद से ज़्यादा कामोत्तेजित कर रहे हैं और मुझे इतना भी नही मालूम कि इन सब का तुम पर भी वोही असर हो रहा है जो मुझ पर हो रहा रहा है. मैं जानना चाहता हूँ कि यह सब तुम्हे कैसे प्रभावित कर रहा है क्योंकि तुम्हारे बारे में प्रचंड कामुक भावनाए, कामोन्माद ख़यालात मुझे पागल किए दे रहे हैं. क्या तुम्हारे दिल में भी मेरे बारे में ऐसे ख़यालात हैं?" मैं उसे बताना चाहता था कि मेरी भावनाए मुझे भड़का रही थी मुझे विवश कर रही थी उसके साथ किताब के वो आसान आज़माऊं. मैं चाहता था कि वो अपनी टाँगे मेरी कमर के इर्दगिर्द लपेट कर मुझे इतनी गहराई तक अपने अंदर लेले जितना शारीरिक तौर पर संभव हो सकता था. मैं उसे बताना चाहता था कि मैं उसकी चूत में अपना लंड डालकर उसे चोदना चाहता था और यही बात मेरे दिलो दिमाग़ पर छाई हुई थी.

सिर्फ़ वो प्रश्न चिन्ह लगाकर उसने गेंद मेरे पाले में डाल दी थी. उसने मुझे अपने जाल में फँसाकर बिना अपनी कोई भावना व्यक्त किए मुझे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने पर मजबूर कर दिया था.

मैने वो किया जो मेरे करने के लिए बचा था. मैने काग़ज़ के उस टुकड़े पर 'नींद' शब्द लिख कर उसके उपर एक गोला बनाया और फिर गोले के एक तरफ से दूसरी तरफ तक नींद शब्द को कटती लाइन लगा दी जिसका अंतरराष्ट्रीय मतलब होता है 'नो'. कहने का मतलब मैने उसे जवाब दिया था कि मैं सो नही सकता, मुझे नींद नही आती है.

उस रात खाने के बाद जब वो मेरे कमरे में आई तो उसके हाथ में गरम दूध का ग्लास था.

जाने अंजाने, उसे इस बात का एहसास था या नही मगर उसने वो कर दिया था जो शायद हम नही कर सकते थे. वो हमारे रहस्य को सामने ले आई थी. जो बात मैने उसे गुप्त और रहस्यमयी तरीके से बताई थी उसका जवाब उसने खुले में हमारी असली ज़िंदगी में दिया था.

"यह लो, इससे तुम्हे सोने मैं मदद मिलेगी" दूध का ग्लास मुझे थमाते हुए बो बोली.

मैं बेड पर उठकर बैठ गया और उससे ग्लास ले लिया. दूध पीते हुए अचानक मेरा ध्यान अपने बैठने के तरीके पर गया. हालाँकि मैने जानबूझ कर एसा नही किया था, मगर उस समय मैं उसकी पसंदीदा पोज़िशन में बैठा था.

मुझे नही मालूम उसने इस बात की ओर ध्यान दिया कि नही मगर वो बेड पर मेरे पास बैठ गई. उसके नरम और टाइट चूतड़ मेरी टाँग के साथ स्पर्श कर रहे थे. मैं अपने अंदर जबरदस्त गर्मी महसूस करने लगा.

उसने मेरे माथे पर पसीने की बूंदे चमकते देखी तो हाथ बढ़ा कर उन्हे पोंछने लगी. "तुम्हे बुखार तो नही है? कहीं मलेरिया तो नही हो गया?" वो बोली

यह बल्कुल बेतुकी बात थी. शायद वो कुछ और कहना चाहती थी या मुझे कुछ समझाना चाहती थी.

वहाँ उस समय उस पल हमारे बीच कुछ घटित हो रहा था, इतना मैं ज़रूर जानता था. मगर हमारे बीच रिश्ते का अवरोध था, एक बहुत बड़ी बाधा थी जो किसी असाधारण अनोखे तरीके से ही दूर हो सकती थी.

मगर वो अवरोध वो बाधा जितनी बड़ी थी उतनी ही आसानी से दूर हो गयी.

यह एक तपती गर्मी की दोपेहर थी. मैं खेतों में जानवरों के साथ ज़यादा समय तक ना रह सका, इसलिए जल्दी जल्दी काम ख़तम करके मैं घर लौट आया. घर पहुँचते पहुँचते मैं पसीने से तर बतर हो चुका था. मैं जल्दी से नाहया और घर के उस एकलौते कमरे में चला गया जहाँ पर पंखा लगा था. वो वहाँ पर पहले से ही मोजूद थी, नंगे फर्श पर टाँगे घुटनो से मोड़ कर एक दूसरे के उपर रख वो पालती मार कर बैठी थी. गर्मी की वजह से वो सिर्फ़ ब्लाउस और स्कर्ट में थी.

उसका ब्लाउस पतला और झीना सा था. उसने अपनी स्कर्ट घुटनो के उपर तक खींची हुई थी ताकि उसके बदन के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्से को हवा लग सके. बालों मैं धीरे धीरे कंघी करते वो अपना समय बिता रही थी. वो उन्हे संवारने के लिए कंघी नही कर रही थी बल्कि सिर्फ़ समय बिताने के लिए खुद को व्यस्त रखे हुए थी. कंघी चलाते हुए जब उसकी बाहें उपर उठती या सर के पीछे जाती तो उसकी छाती आगे को हो जाती जैसे सीना ताने कोई सिपाही सावधान मुद्रा मे खड़ा हो. मैने महसूस किया कि उसने ब्लाउस के नीचे कोई ब्रा नही पहनी है शायद इतनी गर्मी में ब्रा जैसे संकीर्ण कपड़े से बचने के लिए. उसके निपल ब्लाउस के उपर से बाहर को निकले हुए थे और उसके मम्मे झीने कपड़े में हल्के हल्के से दूधिया रंगत लिए झाँक रहे थे. पंखे की हवा में ब्लाउस हिल डुल कर उसके भारी मम्मों का साइज़ बता रहा था साथ ही साथ पतली कमर के पास थोड़ी सी नंगी पीठ भी दिखा रहा था. मुझे नही मालूम मुझे अचानक क्या हो गया या किस कारणवश मैने यह किया.

मैने एक कुर्सी उठाई और बिल्कुल उसके पीछे रख दी. कुर्सी पर बैठ मैने उसके हाथों से कंघी ले ली. पंखे की हवा लेते हुए मैं उसके बालों में कंघी करने लगा. मैं उसके बालों में कंघी कर रहा था और वो मुझे एसा करने दे रही थी.

जब मैं उसके बालों में कंघी फेर रहा था तो मुझे अपने घुटनो पर उसकी पीठ का दवाब महसूस हुआ. यह स्पर्श रोमांचित कर देने वाला था. जब मैने उसके बालों को कंघी करने की सोची थी तो यह बात मेरे दिल में नही आई थी मगर मुझे उसका स्पर्श अत्यंत सुखद लग रहा था. थोड़े समय बाद उसने अपना बदन ढीला छोड़ दिया, आँखे बंद कर ली और मैं इतमीनान से उसके बालों में कंघी करने लगा. ऐसे ही टाँगे पसार कर और बदन पीछे की ओर झुका कर मेरी टाँगो से टेक लगाए वो आराम से बैठी थी और मैं उसकी ज़ुल्फो से खेल रहा था, कुछ समय बीता होगा जब अचानक हम ने अपनी माँ के घर आने की आवाज़ सुनी. वो एकदम से उछल पड़ी जैसे कोई अपराध करते हुए अपराधी रंगे हाथों पकड़ा जाए, मेरे हाथों से कंघी छीन वो दूसरे कमरे में भाग गयी इससे पहले कि माँ वहाँ आकर हम दोनो को देख लेती.

मुझे नही लगता था कि उसे इस तरह वहाँ से भागने की कोई ज़रूरत थी. चाहे हमारी माँ मुझे उसके बालों में कंघी करते देख भी लेती, क्यॉंके इसमे कोई ग़लत बात या बुराई नही थी. मेरे द्वारा बड़ी बेहन के बालों में कंघी करना नादानी या मूर्खता कहा जा सकता था मगर एसा करना वर्जित या निषिद्ध हरगिज़ नही था. जिस तरह वो उछली थी, जिस तरह उसे अपराध बोध हुआ था और जिस तरह वो वहाँ से दूसरे रूम में भागी थी इससे मुझे एहसास हो गया था कि उसके दिमाग़ में क्या चल रहा है.

उस शाम जब मेरी माँ सोभा के घर गयी तो मेरी बेहन मेरे कमरे में आई. उसने एक हाथ में कंघी पकड़ी हुई थी और वो मुस्करा रही थी. मैं उसका इशारा समझते हुए बेड के सिरे पर टाँगे नीचे लटका कर बैठ गया. वो फर्श पर दोपेहर वाली मुद्रा में बैठ गयी. बेड कुर्सी के मुक़ाबले थोड़ा उँचा था इसलिए उसे पीछे को झुक कर बैठना पड़ा ताकि मेरे हाथ उसके सर तक पहुँच सके. मैं उसके बालों में कंघी करने लगा और वो आँखे बंद किए मेरी टाँगो से सट कर बैठ गयी. मैं अपने पावं के पास उसकी जाँघो और चुतड़ों की सुदृढ मांसपेसियों को महसूस कर रहा था और मेरे घुटने उसकी बाहों को स्पर्श कर रहे थे. कुछ समय बाद वो थोड़ा शांत हो गयी और बदन ढीला छोड़ते हुए पीछे की ओर झुकती चली गयी. मगर पीछे बेड होने के कारण वो इतना ही झुक सकी कि मैं अपनी जाँघो पर उसके बदन की दोनो साइड्स को महसूस कर सकता.

अब हम अगले स्तर पर पहुँच गये थे. मैं उसके जिसम का स्पर्श अपने जिस्म के साथ कर पा रहा था. कंघी करने के बहाने मैं उसकी ज़ुल्फो में उंगलियाँ फेर सकता था. यहाँ तक यह सब मज़ेदार था----मगर बहुत मज़ेदार नही था, उतना मज़ेदार नही था जितना मैं चाहता था.

मैं उसके कंधो को स्पर्श करना चाहता था, उसकी पीठ को सहलाना चाहता था. मैं उसके कोमल मम्मों को दबाना चाहता था. मगर मेरे लिए उस स्तर तक बढ़ना तब तक संभव ना था जब तक मुझे उससे कोई इशारा या संकेत ना मिल जाता कि मुझे एसा करने की इज़ाज़त है. हम एक दूसरे को छेड़ रहे थे मगर उतना जितना अनुकूल परिस्थितिओ में स्वीकार्य होता, उससे बढ़कर या कुछ खुल्लम खुल्ला करने के लिए उनका स्वीकार्य होना अति अवशयक था, और जो सब मैं करना चाहता था वो उन हालातों में तो स्वीकार्य नही होता.

मैने अंदाज़ा लगाया वो भी उसी दिशा में सोच रही थी जिसमे मैं सोच रहा था और शायद वो कोई रास्ता जानती थी जिससे कम से कम हम दोनो के बीच शारीरिक संपर्क बढ़ाया जा सकता था.

 


अगले दिन मैं दोपेहर को बहुत जल्दी घर लौट आया. मैने उसे उसी कमरे में पंखे के नीचे बैठे पाया. उसने पिछले दिन वाला वोही ब्लाउस और स्कर्ट पहना हुआ था, मैं जब खेतों के लिए घर से निकला था तो वो धो कर तार पर सूखने के लिए डाले हुए थे. मैने कुर्सी उठाकर उसके पीछे रखी तो उसने मूड कर उसे दूर हटा दिया. फिर उसने मुझे उसके पीछे बिना कुर्सी के नीचे बैठने का इशारा किया.

मैं फटाफट उसके पीछे बैठ गया. उसने अपनी टाँगे सीधी फैला कर उन्हे घुटनो से मोड़ कर थोड़ा उपर उठाया और फिर मेरी जाँघो के दोनो और हाथ रखते हुए पीछे को थोड़ा झुकते हुए उसने अपना सिर मेरी ओर बढ़ाया ताकि मुझे कंघी करने में आसानी हो सके नतीजतन उसकी छाती सामने से उभर गई. उसके भारी मम्मे ब्लाउस के उपर से अपना आकार दिखा रहे थे. मेरे घुटने उसके चुतड़ों की साइड्स को टच कर रहे थे और मैं उसके कोमल और जलते जिस्म को अपनी जाँघो के बीच महसूस कर रहा था.

"ये अभी नही तो कभी नही" का मौका था.

मेरी साँसे भारी हो चली थी, मैं अपनी बाहें उसकी पीठ के दोनो और से आगे ले गया और अपने काँपते हाथ उसके ठोस मम्मों पर रख दिए.

वो एक दम से स्थिर हो गयी, बिना हिले डुले उसी तरह बैठी रही. मैं धीरे धीरे सावधानी पूर्वक उसके मम्मों को दबाने लगा, दुलार्ने लगा. वो बस थोड़ा सा कसमसाई. मेरा उत्साह बढ़ गया और मैने उसके ब्लाउस में हाथ डाले और उपर करते हुए उसके नंगे मम्मों को पकड़ लिया. मेरे हाथ नग्न मम्मों को छूते ही उसका जिस्म लरज गया उसने छाती को आगे से उभार दिया. त्वचा से त्वचा का स्पर्श होने पर मेरी साँसे उखड़ रही थी. मैं लाख कोशिस करने पर भी ज़िंदगी भर उस अविश्वसनीय एहसास की कल्पना नही कर सकता था जो एहसास आज मुझे असलियत में उसके मम्मे अपने उत्सुक हाथों में थामने पर हुआ था. उसकी साँसे भी मेरी तरह उखड़ी हुई थी और वो मेरे हाथो मे मम्मे दिए तड़प रही थी.

जितनी तेज़ी से मैने अपनी कमीज़ उतारी उतनी ही तेज़ी से उसका ब्लाउज उतर गया. वो मेरी ओर घूमी और घुटनो के बल खड़ी हो गयी, मैं भी उसके सामने घुटनो के बल हो गया और उसके जिस्म को अपनी बाहों में भर लिया. उसके मम्मे मेरी नग्न छाती पर और भी सुखद और आनंदमयी एहसास दिला रहे थे. हमारे भूखे और लालायित मुँह ने एक दूसरे को ढूँढ लिया और हम ऐसे जुनून से एक एक दूसरे को चूमने और आलिंगंबद्ध करने लगे कि शायद हमारे जिस्मो पर खरोन्चे लग गयी थी. हमारा जुनून हमारी भावनाएँ जैसे किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी और हम एक दूसरे के उपर होने के चक्कर में फ़राश पर करवटें बदल रहे थे.

हमारी साँसे इस हद तक उखड़ चुकी थी कि हमें एक दूसरे से अलग होना पड़ा ता कि हम साँस ले सके. मुझे बहुत तेज़ प्यास भी महसूस हो रही थी और मुझे पानी पीना था. इतना समय काफ़ी था हमारी दहकती भावनाओं को थोड़ा सा ठंडा होने के लिए और वापस ज़मीन पर आने के लिए.

हम ने फिर से एक दूसरे को चूमना और सहलाना चालू कर दिया, पहले कोमलता से मगर जल्द ही हम उत्तेजना के चरम पर पहुँच गये. हम एक दूसरे की जीभों को काटते हुए चूस रहे थे. हम ने अपनी भावनाएँ अपने जज़्बातों को इतने लंबे समय तक दबाए रखा था कि अब सिर्फ़ चूमने भर से हमें राहत नही मिलने वाली थी. हमें अपनी भावनाएँ अपना जुनून व्यक्त करने के लिए कोई प्रचंड, हिंसक रुख़ अपनाना था. हमें अपने अंदर के उस भावनात्मक तूफान को प्रबलता से निकालने की ज़रूरत थी.

उसकी स्कर्ट मेरी पेंट के मुक़ाबले कहीं आसानी से उतर गयी. जब तक मैं कपड़े निकाल पूरा नंगा हुआ, वो फर्श पर टाँगे पूरी चौड़ी किए लेटी हुई थी. मैं जैसे ही उसकी टाँगो के बीच पहुँचा तो उसने एक हाथ आगे बढ़ा मेरा लंड थाम लिया और उसे अपनी चूत के मुँह पर लगा दिया. उसकी चूत अविश्वसनीय हद तक गीली थी और मेरा लंड किसी लोहे की रोड की तरह सख़्त था और मैं कामोत्तेजना के चरम पर था. मैने अपनी बेहन के कंधे पकड़े और पूरा ज़ोर लगाते हुए लंड अंदर घुसेड़ने लगा. जैसे जैसे मेरा लंड अंदर जा रहा था उसके चेहरे पर पीड़ा की लकीरे उभरती जा रही थी. कुछ दूर जाकर मेरा लंड रुक गया, मैने आगे ठेलना चाहा मगर वो जा नही रहा था, जैसे बीच में कोई अवरोध था. लंड थोड़ा पीछे खींचकर मैने एक ज़ोरदार धक्का मारा और मेरा लंड उस अवरोध को तोड़ता हुआ आगे सरकता चला गया. मेरी बेहन जिसके हाथ मेरे कुल्हों पर थे, उस धक्के के साथ ही उसने मेरे कंधे थाम लिए. उसके मुख से एक घुटि सी चीख निकल गयी. वो सर इधर उधर पटक रही थी.

"क्या हुआ? दर्द हो रहा है? अगर ज़्यादा दर्द है तो मैं बाहर निकाल लूँ"

"बाहर नही निकालना" वो मेरी बात काटते हुए लगभग चिल्ला पड़ी "पूरा अंदर डाल दो, रुकना नही" उसके होंठ भिंचे हुए थे जैसे वो असीम दर्द सहन करने की चेस्टा कर रही थी. मैने जो थोड़ा सा बाकी लंड था वो भी उसकी चूत में उतार दिया. जितना शारीरिक तौर पर संभव हो सकता था मैं उसकी चूत के अंदर गहराई तक पहुँच चुका था. जल्दी ही मैने उसकी चूत में ज़ोरदार धक्के लगाने शुरू कर दिए. बेहन की चूत जितनी टाइट थी उतनी ही वो गीली थी. कुछ पलों बाद उसके चेहरे से दर्द के भाव धीरे धीरे कम होने लगे. उसके हाथ वापिस मेरे कुल्हो को थाम कर अपनी ओर खींचने लगे ता कि मैं पूरी गहराई तक उसके अंदर अपना लंड डाल सकूँ. उस रात मैने उसे पूरी कठोरता से चोदा. उसे मैने पूरी गहराई तक चोदा. मैने उसे खूब देर तक चोदा. मैने उसे ऐसे चोदा जैसे वो हमारी ज़िंदगी का आख़िरी दिन हो. उसकी चूत से रस निकल निकल कर मेरे लंड को भिगोते हुए फर्श पर गिर रहा था और वो मेरे लंड के ज़ोरदार धक्के खाती आहें भरती, सिसकती मेरे नीचे किसी जल बिन मछली की तरह मचल रही थी.

मैं नही जानता उसका सखलन कब हुआ, हुआ भी या नही हुआ. मगर मैं इतना जानता हूँ मुझे सखलित होने में काफ़ी समय लग गया हालांकि उसकी चूत में लंड डालते ही मुझे अपने लंड पर ऐसी तपिश महसूस हुई कि मुझे लगा मैं उसी पल झड जाउन्गा. मैं उसे इतनी देर तक तो चोद सका कि उसकी अति सन्करी चूत मे अपने लंड के घर्सन से होने वाली सनसनी का आनंद ले सकूँ.

मेरा स्खलन प्रचंड वेग से आया. जब मेरा स्खलन शुरू हुआ तो मैं जितनी कठोरता और जितनी तेज़ी से धक्के लगा सकता था मैने लगाए. आनंद और दर्द से मेरा शरीर कांप रहा था, हिचकोले खा रहा था जब मैने अपनी बेहन की चूत के अंदर मन भर वीर्य निकाला और वो मुझसे कस कर चिपकी हुई थी.

बुरी तरह थका मांदा मैं अपनी बेहन के उपर लेट गया. मेरी साँसे उखड़ी हुई थी. उसने मेरी टाँगो के गिर्द अपनी टाँगे कस कर मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया और मेरी पीठ सहलाते हुए मुझे शांत करने लगी ताकि मैं वापस धरती पर आ जाऊं. आख़िर में जब मैं उसके उपर से हटा और अपने लंड की ओर देखा तो मुझे एहसास हुआ कि मेरी बेहन को इतनी पीड़ा क्यों हो रही थी. मेरे लंड और उसकी चूत के मुख पर खूब सारा खून लगा हुआ था. मैने अपनी बेहन का कौमार्य भंग किया था. मैने कभी नही सोचा था कि वो अब तक कुँवारी होगी. एक तरफ तो मैं अपनी बेहन को हुई तकलीफ़ के लिए थोड़ा शर्मसार हो गया मगर वहीं मुझे अपने पर गर्व महसूस हुआ कि मैं वो पहला मर्द था जिसने उसे भोगा था जिसने किसी अप्सरा से भी बढ़ कर उस औरत का प्यार पाया था. मेने अपने होंठ अपनी बेहन के होंटो पर रख दिए और जब तक हमारी माँ न आ गयी मैं उसे चूमता रहा, उसे सहलाता रहा, उसे दुलारता रहा.

वो रात और उसके बाद की रातें हमारी रातें बन गयी. जब मेरी माँ शाम को शोभा के घर चली जाती तो मैं और मेरी बड़ी बेहन किताब में दिखाए उन विभिन्न आसनो या संभोगिक मुद्राओं को आज़माते. हम दोनो ने भी कयि नये आसनो को खोजा मगर रात का अंत या तो मेरी पसंदीदा पोज़िशन में चुदाई करते होता या फिर उसकी पसंदीदा पोज़िशन में

जब मैने और मेरी बेहन ने एक साथ सोना शुरू किया तो नियमित तौर पर शारीरिक ज़रूरतें पूरे होने का फ़ायदा मुझे पहले हफ्ते में दिखाई देने लगा. मैं अब तनावग्रस्त नही था और मेरे अंदर मचलने वाला वो कोलाहल अब मुझे परेशान नही करता था. बेहन से चुदाई करके मैं जैसे एक नयी तरह की उर्जा महसूस करने लगा था. मैं पूर्णतया संतुष्ट था, ना सिर्फ़ शारीरिक तौर पर संतुष्ट था बल्कि भावनात्मक तौर पर भी ---और मेरी बेहन भी. हम दोनो हर तरह से खुश थे. हमारे चलने में खाना खाने में हर काम में उत्साह होता था जिसे मेरी माँ ने भी महसूस किया था. यकायक हमें अपने गाँव जैसी उस घटिया जगह में भी संतोष की अनुभूति होने लगी थी. यहाँ तक कि मैं सुबह को जल्दी उठने लगा था क्योंकि मुझसे दिन चढ़ने का इंतज़ार नही होता था.

शुरुआत में हमारा संभोग थोड़ा अटपटा होता था. एक तो हम दोनो नये थे और दूसरा एक दूसरे को समझने की कोशिस कर रहे थे. हम हद से ज़्यादा जोश से भरे थे और अक्सर इसी जोश में संभोग के समय हम गड़बड़ा जाते . एक दूसरे के जिस्म को कैसे छूना है कैसे प्यार जताना है, कैसे शुरुआत करनी है, कैसे आगे बढ़ना है इन सब बातों का हमे पूर्ण ज्ञान नही था इसलिए हर नयी खोज में विस्मय के साथ हमारा फूहड़पन भी शामिल होता. मगर जब लावा पूरी तरह फूट कर हमारे अंदर से बाहर आ गया तो हम दोनो शांत होने लगे थे. जब सब कुछ एकसाथ जल्दी जल्दी कर लेने का जोश थोड़ा ठंडा पड़ने लगा तो हम ने कुछ बातों पर ध्यान देना शुरू किया. बिस्तर में हमारा तालमेल सुधरने लगा और हम एक दूसरे के साथ एसी हरकतें करने लगे जिससे हमारा संभोग अत्यंत आनंदमयी होने लगा. अब एक दूसरे के साथ समय बिताना बेहद मज़ेदार और रोमांचित होता था.

बहुत जल्द हम एक दूसरे के बदन की सुगंध, एक दूसरे की पसंद-नापसंद और आदतों के आदि हो गये थे. मुझे वो अति स्वादिष्ट या रुचिकार लगती थी. हमारे अंतरंग पलों में उसका साथ कितना सुखद कितना आनंदमयी होता था, मैं बयान नही कर सकता. मुझे उसे अपनी बाहों में भर कर सीने से लगाना, उसके भारी मम्मों को अपनी छाती पर महसूस करना बहुत अच्छा लगता था, सबसे ज़यादा मुझे अच्छा लगता था जब मेरा लंड उसकी चूत के अंदर होता था. कई बार एसा होता था जब मैं उसके पसंदीदा आसान में बैठकर अपना लंड उसकी चूत में गहराई तक उतार देता और हम दोनो सुबह होने तक एक दूसरे को चूमते और सहलाते रहते. चरम पर पहुँचने की कोई जल्दबाज़ी ना होती जब तक धीरे धीरे गरम होता पानी उबलने ना लग जाता, हम अपने अंदर गहराई में वो कम्मोतेजना का चरम बिंदु महसूस करते. और फिर जब भी मैं उसके अंदर छूटता तो इतने ज़ोरदार तरीके से मेरी भावनाओं का उफान बाहर आता और मुझे उस समय ऐसा मज़ा ऐसा आनंद आता जिससे बढ़कर दुनिया में कोई मज़ा कोई आनंद नही हो सकता था, इससे बढ़कर दुनिया में कुछ सुंदर नही हो सकता था.

मेरी बड़ी बेहन पर उत्तेजना के उस चरम का प्रभाव अविश्वसनीय था. संभोग से पहले और संभोग के समय वो बहुत स्नेह बहुत प्यार जताती मगर चरम हासिल करने के बाद तो वो इबादत की, अति प्रेम की आराधना की जिंदा मिसाल बन जाती. वो इतना प्यार इतना स्नेह, इतनी इज़्ज़त देती कि मैं हैरान हो जाता. मैं उन पलों का खूब आनंद लेता, खुद पर गर्व महसूस करता कि उसे उस खास रूप में ढालने वाला मैं था. मुझे ख़ुसी महसूस होती कि मैं ना सिर्फ़ उसे चरम सुख देने में सफल होता था या इस बात का कि खुद आलोकिक आनंद लेते हुए वो इस बात का भी ध्यान रखती थी कि मैं भी उसी आलोकिक आनंद को महसूस कर सकूँ, बल्कि मुझे असल खुशी तब महसूस होती जब मैं उसके मुख से निकलने वाली संतुष्टि की उन आवाज़ों को सुनता जब उसका जिस्म उसकी देह जैसे किसी जादू की तरह मेरे जिस्म के नीचे मचलती. कई बार चरम सुख के आनंद से अविभूत उसकी आँखो में आँसू आ जाते और वो रो पड़ती. उन खास मौकों पर मैं उसे अत्यधिक समय तक अपने सीने से चिपटाये रखता और हम एक दूसरे को देर तक दुलारते और सहलाते रहते.

पूरे संसार की नज़रों से बचते हुए हम एक पति पत्नी की तरह रह रहे थे. वो मेरी प्रेमिका थी, मेरी पत्नी थी, मेरी हमसाया थी. मैं उसका साथी था, उसका प्रेमी था, उसका मर्द था. हम दोनो पति पत्नी की तरह रहते हुए घर के काम काज किसी पति पत्नी तरह करते थे. हमारी माँ भी उसी घर में रहती थी मगर वो हमारे आड़े नही आती थी क्यॉंके उसका ज़्यादातर समय सोभा के साथ कटता था. जब भी वो हमारे साथ होती तो हम वापस उसके बेटा बेटी बन जाते और उसी तेरह पेश आते मगर जैसे ही वो वहाँ से जाती, वो हमारे मिलन का समय होता, हमारे एक दूसरे के प्रति उस दिली प्यार को एक दूसरे के लिए उन इच्छाओं को दिखाने का समय होता.

मेरी बहन संभोग को मेरे से ज़्यादा नही तो कम सा कम मेरे जितना तो पसंद करती थी. वो सब काम जल्द से जल्द निपटाने की कोशिश करती ताकि ज़्यादा से ज़्यादा समय हम एक दूसरे के साथ बिता सके. पहले पहल हमारा ज़्यादातर समय प्यार करते हुए बीतता. मगर जब हम ने उस कामनीय भूख पर विजय पा ली तो हालत कुछ सामान्य होने लगे, जब हमें इस बात का यकीन हो गया कि यह सब असलियत है, हमारा रिश्ता, हमारा प्यार असलियत है, हमारा साथ असलियत है और हम जब तक चाहे अपना रिश्ता कायम रख सकते हैं तो हमारा मिलन चुदाई तक सिमट ना रहकर एक दूसरे के प्रति असीम प्यार दर्शाने की निरंतर गतिबिधि बन गया. हम एक दूसरे को ज़्यादा से समय तक छेड़ छाड़ करने पर ध्यान देते, एक दूसरे को ज़्यादा से ज़्यादा कामोत्तेजित करते, ना कि जल्दी जल्दी चूत में लंड डाल कर चुदाई करने की.

और अब मैं अपने सामने सब कुछ सॉफ देख सकता था, समझ सकता था.

अब मेरा पूरा समय संभोग के बारे में सोचते हुए नही गुज़रता था और ना ही सोभा, अपनी बहन या अपनी माँ के बारे में कल्पनाएं करते हुए. अब मेरा मन अपने पिता की उस गुप्त किताब में दिखाए आसनो को किसी के साथ आज़माने के लिए नही तरसता था . अब मैं यह सब अपनी बड़ी बहन के साथ असलियत में कर रहा था और इससे मेरी भूख पूरी तरह मिट रही थी. पहले मैं खेतों में खाली बैठकर बिना कुछ किए समय ब्यतीत करता था. मेरे बदन में लबालब भरा वीर्य जो बाहर निकलने के लिए उबलता रहता था जैसे मेरा ध्यान किसी और चीज़ की ओर जाने ही नही देता था. अब वो वीर्य नियमित तौर पर मेरे शरीर से बाहर निकल रहा था और इसलिए मेरे दिमाग़ ने उन सब दूसरी चीज़ों की ओर भी ध्यान देना शुरू किया जो ज़िंदगी में मायने रखती हैं. सबसे अद्भुत बात यह थी कि अपनी पूरी ऊर्जा अपनी बहन के अंदर खाली करने के बाद भी मैं अपने को ज़्यादा फुर्तीला, ज़्यादा ताकतवर महसूस करता. यहाँ तक कि मैं बहुत मेहनती होने लगा था.

अब मैने अपनी जीवन की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया था..यह किस ओर जा रहा था. मैं इसे कैसे सुधार सकता था और किस तरह मेरा और मेरी बड़ी बेहन का भविष्य उज्वल हो सकता था.

बदक़िस्मती से हमारे गाँव में कोई ऐसा मौका नही मिलने वाला था जिससे हमारा भविष्य सुधर सकता और किसी दूसरी जगह जहाँ हमें कोई ऐसा मौका मिलता, जाने के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन नही थे. मैं बहुत कुछ करना चाहता था मगर वहाँ कुछ करने के लिए ही नही था. मैं यात्रा पर निकलने के लिए तैयार था मगर मंज़िल कोई नही थी. मैने और बेहन ने इस मुद्दे पर बहुत विचार विमर्श किया मगर हम कुछ नतीजा ना निकाल सके. हमें कुछ भी सूझ नही रहा था. बिना किसी बदलाव के हमें वोही ज़िंदगी वैसे ही चालू रखनी थी. मगर उस बात ने मुझे हताश नही किया जैसे अक्सर पहले ऐसे हालातों में मेरे साथ होता था. वो हमेशा मेरे साथ होती थी और उसका साथ मुझे ना सिर्फ़ निराशा से बचाता था बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाता था.

मैं सुबह बहन के साथ उठकर तैयार हो जाता, वो दुकान पर चली जाती और मैं खेतों को. पहले मेरा जल्दी जाने का इरादा इसलिए होता था कि मैं जल्द से जल्द पशुओं को चारा पानी डाल दूं, और उसके बाद जल्द से जल्द घर वापुस आ जाऊं ताकि अपनी बेहन के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ार सकूँ उससे अच्छी बात यह होती थी कि मैं अपना दिन बहन के साथ शुरू करता और उसकी साथ अंत करता. मगर इतनी सुबह जाने की हानि यह हुई कि मेरी माँ ने जब मुझे खेतों में इतनी सुबह जाते देखा तो उसने खेतों में जाना बंद कर दिया जैसे वो सुबह के समय करती थी. वो उस समय को भी सोभा के साथ बिताने लगी जबकि अब उसके हिस्से का काम मुझे करना पड़ता या कुछ और काम भी जो करना ज़रूरी होता.

जब मैं खेती संबंधी काम करने लगा तो मुझे खेतों के बारे में जानकारी होने लगी. चाहे यह मूर्खता लग सकती है मगर यह सच था. मैने ज़िंदगी मे पहली बार खेतों में एक नाला खोदा ता कि बारिश का पानी ज़्यादा होने पर निकाला जा सके और हमारी थोड़ी बहुत होने वाली फसल बचाई जा सके. इससे पहले मैने कभी ध्यान नही दिया था कि हमारे पास क्या है. पहले खेतों में जहाँ तक मेरी नज़र जाती थी सिर्फ़ घास और झाड़ियाँ थी मगर अब बरसात शुरू होने वाली थी और मुझे चिंता लगी थी कि मैं कैसे बल्कि कहाँ फसल बोउँगा ताकि हमारे आने वाले साल भर का गुज़ारा चल सके. तब मुझे एहसास हुआ कि इस घास और इन झाड़ियों के नीचे ज़मीन है जो धन के बिना भी बहुत कुछ उगा सकती है. मेरी बेहन हमेशा ताज़ी सब्ज़ियों की कमी के लिए परेशान रहती थी जो वो स्टोर में बेचती थी, मैं उसका पूर्तिकर बन सकता था उसे वो सब सप्लाइ कर सकता था. मैं कुछ फलों के पेड भी लगा सकता था जिनके फल पकने पर बेचे जा सकते थे. हमारी दुकान और हमारी ज़मीन के बीच एक कड़ी थी, एक संपर्क था और यही कड़ी मेरे और मेरी बेहन के बीच थी. हम दोनो मिलकर बेहतर भविशय के लिए काम कर सकते थे ----और एक दूसरे के बिना भी. मैं उसे उन सभी वस्तुओं की पूर्ति कर सकता था जिसे बेचने की उसे ज़रूरत होती और वो वो सब बेच सकती थी जो मैं उसे मुहैया कराता. मैं दुकान में सामान देकर पैसा कमा सकता था और वो उस समान को आगे बेचकर अपने ग्राहकों से कमाई कर सकती थी जो हमेशा ताज़ी सब्ज़ियों, ताज़े फलों, ताज़े दूध और ताज़े मीट की कमी के लिए दुकान को कोसते रहते थे. इसी ज़मीन पर हमारे पशुओं का झुंड चरता था जो हमारे ग्राहकों के लिए ताज़ा दूध और मीट का बंदोबस्त कर सकता था. मैं इस झुंड को बढ़ा सकता था, बहुत ज़यादा बढ़ा सकता था सिर्फ़ गाय ही नही बल्कि भेड़, बकरियाँ और मुर्गियाँ भी पाल सकता था. मैं सिर्फ़ अपनी दुकान को ही नही बल्कि आस पास के गाँव और फिर शहर को भी सप्लाइ कर सकता था!!!!!!

 
बंधुओ मेगा अपडेट दे दिया है आज के अपडेट के बारे में आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतजार रहेगा
 
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