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80 चढ़ गया ऊपर रे •••
राज अपनी पूरी ताक़त और हिम्मत से अपने लन्ड को अपनी मम्मी की कस के चूसती गाँड में ठेले जा रहा था, जिसके कारण वे बिलबिलाती हुई आहें भर रही थीं। राज आगे झुका और उनके झूलते मम्मों को अपने हाथों में भर लिया, और उन्हें झूलते हुए महसूस कराता हुआ लन्ड को और फुर्ती से गाँड में मारने लगा।
रजनी जी ने अपने कन्धे झुका कर बिस्तर पर टेक दिये, और अपनी गाँड को उचका कर बेटे के दमदार झटकों को झेलने लगीं। राज के हाथों ने उन्हें दुरुस्ती से दबोचा हुआ था, मानो अपनी मम्मी की तंग और जकड़ती गाँड को अपने लन्ड पर खींच-खींच कर अपनी मोटी चमचमाती काली छड़ को उनकी उचकती गाँड के सुराख में सिलसिलेवार घोंपे जा रहा था।
“शाबाश मम्मी! देख ले सोनिया, ये है खानदानी रन्डी, देख किस अदा से बेटे के सामने सजदा कर के गाँड मरवा रही है! कुछ सीख धन्धे के गुर मेरी मम्मी से ! शाबाश मम्मी, फेंक अपनी गाड मेरे लन्ड पर !”, ऐसे जलील अल्फ़ाज़ बोल कर वो कराहा, “या ऊपर वाले, मेरे लन्ड को तो मम्मी की गाँड में ही सुकून मिलता है !”
राज ने खुद को अपने सर में बैठे शैतान के हवाले कर दिया था, जो उसकी जाँघों के बीच उससे इन्तेहाई गुनाह को अंजाम दे रहा था। हवस की आग की लपटे उसके गहरे घुपे हुए लन्ड की लम्बाई पर ऊपर और नीचे लपक रही थीं, लगता था जैसे टट्टे अलाव पर सेक ले रहे हों। गुनाहगार हवस किसी बहते पिघले लोहे के समान उसके बदन में फूटी और उसके दिमाग में धमाका कर गयी। टट्टों से निकल कर आग का भंवर उसके पूरे बदन पर फैल रहा था। उसकी आँखें चकाचौंध हुईं, पलकों पर अंधेरा छा गया, और मन में भयानक जलजला आ गया।
तभी उसके लन्ड से गरम, उबलते वीर्य का एक सैलाब फूटा और उसकी प्यारी मम्मी की टाइट और उचकती गाँड के सुराख को लीटर-दर-लीटर भरने लगा।
रजनी जी उछलती और फुदकती हुई, अपने चूतड़ों को अपने बेटे के वीर्य उगलते लन्ड पर लपकाने लगीं। राज ने झड़ते हुए, अपने पहलवान लन्ड को उनकी जकड़ती गाँड में पूरा का पूरा अंदर उतार लिया था। रजनी जी हवस के सुरूर में झूलती हुई कराह रही थीं, उन्होंने अपने निचले होंठ को दाँतों तले दबा रखा था।
बौछार-दर-भौछार, उसके उपजाऊ जवाँ टट्टे अपनी माँस की थैली की कैद में झटक-झटक कर उसकी मम्मी की तरसती गाँड के सुराख में वीर्य उडेल रहे थे। रजनी जी को महसूस हुआ जैसे जन्नत में पहुँच कर सैक्स का सुकून ले रही हों, ऐसा सुकून जो कभी न थमे, ऐसी जन्नत जिसका बादशाह उनका बेटा राज हो। उनकी गाँड ने राज के लन्ड को इस कदर कस के जकड़ रखा था, और लन्ड इस क़दर ठूसा हुआ था, कि जल्द ही राज का वीर्य गाँड से छलक कर बाहर रिसने लगा। हर नयी फुहार उनकी कस कर खिंची हुई गाँड के सुराख़ से हलके पीले रंग के वीर्य की धार बहा कर निकाल देती थी।
अपनी गाँड में गहरे गड़े और वीर्य उगलते लन्ड के अहसास से रजनी जी दुनिया जहान भुला बैठी थीं। उन्होंने अपने जब्त को आखिरकार तोड़ दिया। ‘भाड़ में जाये साले पड़ोसी', रजनी जी ने सोचा, और गला फाड़ कर खूब देर चीखीं। अपने भीतर बैठे वीर्य थूकते लन्ड से उनकी गाँड गुदगुदा रही थी। वे हवस की बेसुधी और जिस्मानी लुफ्त की नशीली शराब में गोते लगा रही थीं।
राज अपनी पूरी ताक़त और हिम्मत से अपने लन्ड को अपनी मम्मी की कस के चूसती गाँड में ठेले जा रहा था, जिसके कारण वे बिलबिलाती हुई आहें भर रही थीं। राज आगे झुका और उनके झूलते मम्मों को अपने हाथों में भर लिया, और उन्हें झूलते हुए महसूस कराता हुआ लन्ड को और फुर्ती से गाँड में मारने लगा।
रजनी जी ने अपने कन्धे झुका कर बिस्तर पर टेक दिये, और अपनी गाँड को उचका कर बेटे के दमदार झटकों को झेलने लगीं। राज के हाथों ने उन्हें दुरुस्ती से दबोचा हुआ था, मानो अपनी मम्मी की तंग और जकड़ती गाँड को अपने लन्ड पर खींच-खींच कर अपनी मोटी चमचमाती काली छड़ को उनकी उचकती गाँड के सुराख में सिलसिलेवार घोंपे जा रहा था।
“शाबाश मम्मी! देख ले सोनिया, ये है खानदानी रन्डी, देख किस अदा से बेटे के सामने सजदा कर के गाँड मरवा रही है! कुछ सीख धन्धे के गुर मेरी मम्मी से ! शाबाश मम्मी, फेंक अपनी गाड मेरे लन्ड पर !”, ऐसे जलील अल्फ़ाज़ बोल कर वो कराहा, “या ऊपर वाले, मेरे लन्ड को तो मम्मी की गाँड में ही सुकून मिलता है !”
राज ने खुद को अपने सर में बैठे शैतान के हवाले कर दिया था, जो उसकी जाँघों के बीच उससे इन्तेहाई गुनाह को अंजाम दे रहा था। हवस की आग की लपटे उसके गहरे घुपे हुए लन्ड की लम्बाई पर ऊपर और नीचे लपक रही थीं, लगता था जैसे टट्टे अलाव पर सेक ले रहे हों। गुनाहगार हवस किसी बहते पिघले लोहे के समान उसके बदन में फूटी और उसके दिमाग में धमाका कर गयी। टट्टों से निकल कर आग का भंवर उसके पूरे बदन पर फैल रहा था। उसकी आँखें चकाचौंध हुईं, पलकों पर अंधेरा छा गया, और मन में भयानक जलजला आ गया।
तभी उसके लन्ड से गरम, उबलते वीर्य का एक सैलाब फूटा और उसकी प्यारी मम्मी की टाइट और उचकती गाँड के सुराख को लीटर-दर-लीटर भरने लगा।
रजनी जी उछलती और फुदकती हुई, अपने चूतड़ों को अपने बेटे के वीर्य उगलते लन्ड पर लपकाने लगीं। राज ने झड़ते हुए, अपने पहलवान लन्ड को उनकी जकड़ती गाँड में पूरा का पूरा अंदर उतार लिया था। रजनी जी हवस के सुरूर में झूलती हुई कराह रही थीं, उन्होंने अपने निचले होंठ को दाँतों तले दबा रखा था।
बौछार-दर-भौछार, उसके उपजाऊ जवाँ टट्टे अपनी माँस की थैली की कैद में झटक-झटक कर उसकी मम्मी की तरसती गाँड के सुराख में वीर्य उडेल रहे थे। रजनी जी को महसूस हुआ जैसे जन्नत में पहुँच कर सैक्स का सुकून ले रही हों, ऐसा सुकून जो कभी न थमे, ऐसी जन्नत जिसका बादशाह उनका बेटा राज हो। उनकी गाँड ने राज के लन्ड को इस कदर कस के जकड़ रखा था, और लन्ड इस क़दर ठूसा हुआ था, कि जल्द ही राज का वीर्य गाँड से छलक कर बाहर रिसने लगा। हर नयी फुहार उनकी कस कर खिंची हुई गाँड के सुराख़ से हलके पीले रंग के वीर्य की धार बहा कर निकाल देती थी।
अपनी गाँड में गहरे गड़े और वीर्य उगलते लन्ड के अहसास से रजनी जी दुनिया जहान भुला बैठी थीं। उन्होंने अपने जब्त को आखिरकार तोड़ दिया। ‘भाड़ में जाये साले पड़ोसी', रजनी जी ने सोचा, और गला फाड़ कर खूब देर चीखीं। अपने भीतर बैठे वीर्य थूकते लन्ड से उनकी गाँड गुदगुदा रही थी। वे हवस की बेसुधी और जिस्मानी लुफ्त की नशीली शराब में गोते लगा रही थीं।