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Incest पापी परिवार की पापी वासना complete

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84 तांक-झांक



जय शीग्रता से टॉयलेट में घुसा, और अपने स्विमिंग ट्रैक को नीचे उतारकर कमोड पर जा बैठा। उसने पीठ को आराम से पीछे टेककर अपनी घुटनों को फैला दिया, उसका लौह की छड़ जैसा कठोर और तना हुआ लिंग विजय पताका की तरह उसके पेड़ से ऊपर निकल कर फहरा रहा था। जय ने उसपर उंगलियाँ लपेटीं और अभ्यासानुसार रगड़ता हुआ हस्थमैथुन करने लगा।

हस्तमैथुन क्रिया करते हुए, जय के युवा मस्तिष्क में रह-रह कर रजनी जी की तस्वीरें उभर रही थीं, जिनमें वे उत्कट कामुक मुद्रा में दिखलायी देती थीं। उन अश्लील मैगजीनों जैसी ही, जिनकी सहायता से वो अक्सर हस्तमैथुन करते हुए अपनी यौन कल्पनाओं को प्रेरित करता था। जय ने रजनी जी को बिस्तर पर लेटा हुआ कल्पित किया, एक हाथ से अपनी योनि की कोपलों को फैलाते हुए, और दूसरे से जय को बिस्तर के निकट, अपनी तरफ़ आमंत्रित करते हुए। वे उसे नाम लेकर पुकार रही थीं, अपनी देह पर चढ़कर यौन क्रिया करने का आग्रह कर रही थीं। जैसे-जैसे वो अपनी लिंग को रगड़ता गया, उसकी कल्पनाओं की उड़ान और ऊपर होती गयी, उसने शीघ्र ही उनकी जाँघों के बीच स्थान ग्रहण किया, और अपने लिंग को उनकी लाल, कसी हुई योनि में प्रविष्ट करा कर, बलपूर्वक और तीव्र गति से सम्भोग करने लगा।

“ओहहह! मादरचोद! रजनी आँटी! साली रन्डी की चूत !”, वो कराहा। “मेरे लन्ड को तेरी चूत की जरूरत

उसका मस्तिष्क यौन क्रीड़ा की हर उस संभावना से भर गया था जो किसी कामतत्पर नवयुवक की कल्पनाओं में आ सकती थी। अपने काल्पनिक लोक में, जय ने पड़ोस में रहने वाली दो बच्चों की माँ की देह के हर छिद्र में अपने लिंग को घुसा कर, और हर संभावित मुद्रा में, संभोग किया। ऐसी अनेक कल्पनाएं उसके मन में मादक धुएं की तरह फैल गयी थीं, उसकी मुट्ठी लिंग पर अति - तीव्र गति से चल रही थी। फिर आखिरकार उसे अपनी जाँघों के मध्य वही चिरपरिचित अनुभूति हुई। रिकर्ड समय में उसने हस्तमैथुन से यौन तृप्ति प्राप्त कर ली थी!

*

*

*

उधर दूसरे बेडरूम में, डॉली ने भी अपने कपड़े उतार कर बिकीनी पहनी ही थी, और रूम में तौलिया खोज रही थी, जो कहीं नहीं दीख रहा था। हालांकि सोनिया ने उससे कहा अवश्य था कि तौलिये बेडरूम में ही हैं।

कम्बख्त !”, वो बुदबुदायी, और निराश होकर बाथरूम की दिशा में चल पड़ी। ‘इधर नहीं तो बाथरूम में तो होना ही चाहिये।', उसने सोचा, और बाथरूम का दरवाजा खोला। डॉली बाथरूम में प्रविष्ट हुई तो उसके नंगे पाँवों ने फ़र्श की टाइलों पर तनिक भी पदचाप नहीं की। टॉयलेट के दरवाजे के पास दीवार में बने आलों में चार-पाँच तौलिये तह करे रखे हुए थे। डॉली ने एक तौलिया उठाकर झट से निकल जाना चाहा, पर जैसे ही बाथरूम से निकलने को पलटी, तो टॉयलेट से निकले एक स्वर ने उसे चौंका दिया। उसने सावधानी से कान लगाकर सुनने का प्रयत्न किया, पर जब कोई आहट नहीं हुई, तो सर हिलाती हुई बाहर निकलने को अग्रसर हुई। जैसे ही उसने दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखा, तो उसे वही आहट फिर सुनाई दी, इस बार कहीं अधिक ऊंचे स्वर में।

 
लगता था जैसे आहट टॉयलेट से आयी है, सो डॉली शटर के समीप आ खड़ी हुई। दरवाजा थोड़ा सा खुला हुआ था, बस इतना ही, कि झाँक कर अंदर देखा जा सकता था। अंदर का बल्ब भी जल रहा था, रहस्यमयी आहट के स्रोत को देखकर डॉली अत्यंत कुटिलतापूर्वक मुस्कुरायी। अंदर जय था, सम्पूर्णतय नग्नावस्था में टॉयलेट की सीट पर बैठा हुआ अपने विकराल लिंग को बायें हाथ से रगड़ा जा रहा था। उसने पलकें कस के मुंद रखी थीं, और मुंह खुला हुआ था। कर्कष और पाश्विक कराहें उसके खुले होठों से निकल रही थीं, और जय अपनी मुट्ठी को तीव्रता से लिंग के ऊपर और नीचे फटके जा रहा था, बाह्य जगत से पुरी तरह अनभिज्ञ होकर हस्तमैथुन कर रहा था। नवयुवक जय के विकट आकार व लम्बाई को देख डॉली की आँखें फटी की फटी रह गयीं।

अतिथी होने के नाते, डॉली के अंतःकरण ने उसे चुपचाप निकल जाने, और जय को एकांत में अपनी निजी गतिविधियों को निर्विघ्नता से करते रहने देने की राय दी। परन्तु जय के तने हुए स्थूलाकार लिंग की छवि ने उसके कदमों को रोक लिया, कैसा मोटा लम्बा और सम्मोहक था :: लगभग उसके भाई जितना ही बड़ा। जय सचमुच अब बच्चा नहीं रहा था! डॉली ने अपनी दृष्टि उसके विकराल लिंग से फेर ली, और उसके बदन के अन्य भागों पर फेरने लगी। उसने अपनी निगाह उसकी लम्बी पुट्ठेदार टाँगों पर, सरपट पेट और मजबूत कमर पर, चौड़े विशाल सीने, ताक़तवर भुजाओं पर फेरीं, और उसके हट्टे-कट्टे डील-डौल को सराहा। उसके देखते-देखते , जय के सीने और भुजाओं की माँसपेशियाँ उसके उग्रतापूर्वक हस्तमैथुन करते हाथों की गति के साथ-साथ फूलती सिकुड़ती जाती।

डॉली ने उसके युवा आकर्षक मुख को देखा, कितना हैंडसम है', डॉली ने सोचा। यौन तृप्ति के समय पुरुष के मुख भाव को देखना उसे बहुत भाता था। उसे एक बार फिर बाथरूम से निकलने की सूझी, पर उसकी योनि में रोमांच की एक टीस उठ रही थी और वो अपने आप को बाहर जाने के लिये नहीं मना पायी। किसी भी कीमत पर वो नौजवान जय को हस्तमैथुन करते हुए देखने का अवसर नहीं गंवाना चाहती थी। उसने अपना एक हाथ अपनी बिकीनी की जाँघिया के इलास्टिक को उठाकर अंदर को घुसाया और अपनी रोममम्डित योनि स्थल को सहलाने लगी। बड़ी सावधानी से हस्थमिथुनरत जय को देखते हुए, डॉली ने अपनी एक उंगली को अपनी संकरी योनि की मांद में घुसेड़ा और अपने चोंचले को उत्तेजित करते हुए कड़ा कर दिया।

जैसे जैसे वो उसे सहलाती गयी, उसकी योनि और नम होती गयी, उसकी उंगली हलके हलके छपाके करने लगी, जब वो उसे अपनी टपकती योनि में घुमा-घुमा कर फेरने लगी। डॉली अचानक ठिठक कर रुक गयी, जब उसे संदेह हुआ कि कहीं जय ने उसकी उपस्थिति भाँप तो नहीं ली, किंतु फिर उसके मुख के भाव को देखकर डॉली आश्वस्त हो गयी कि उस क्षण यदि हाथीयों का झुंड भी वहाँ आ धमकता, तो भी जय का सचेत होना बड़ा कठिन था।

अब वो सुरक्षित महसूस कर रही थी, इस कारण डॉली ने अपनी योनि से हतमैथुन फिर जारी किया, और यथासंभव स्वयं को उत्तेजित करती हुई जय से पहले यौन तृप्ति प्राप्त करने की चेष्टा करने लगी। और उसके पास चारा भी क्या था, जानती थी कि अन्यथा, उसे अपनी यौन तृप्ति से पहले ही नौ-दो-ग्यारह होना पड़ेगा। परंतु वो ऑरगैस्म के वास्ते ऐसे तरस रही थी, कि यह विकल्प उसे क़तई स्वीकर नहीं था! उसकी उंगलियों के दबाव के तले उसका चोंचला सूज कर फड़क रहा था, और उसका दूसरा हाथ स्तनों की प्रेमपूर्वक मालिश कर रहा था। डॉली की दृष्टि जय के फड़कते लिंग पर लगी हुई थी। सोचती थी कि अगर मिस्टर शर्मा का लिंग भी अपने पुत्र के जैसा ही दीर्घाकार है, तो अवश्य वो और उसकी मम्मी इस रात रतिक्रीड़ा से विलक्षण आनन्द का भोग करने वाली हैं।

 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
पूर्वाभ्यास

नवयुवक जय के लम्बे फड़कते लिंगस्तम्भ को घुरते-घूरते सोनिया के ज्वर-तप्त मस्तिष्क में जंगली विचार पनप रहे थे। वो स्वयं को जय की जाँघों के बीच बैठी, उसके अद्भुत लिंग को मुँह में लिये हुए चूसता, और उसके लिंग से गाढ़े वीर्य के प्रचुर प्रवाह का पान करता हूआ कल्पित कर रही थी। विश्वास के साथ कह सकती थी कि उसके चूसते मुख में वीर्य भर जायेगा, तो उसके गरम नमकीन व मलाईदार स्वाद का भरपूर आनन्द लेगी। उसने जय को अपने दानवाकार, कड़क लिंग को रगड़ते हुए देखा, तो डॉली की कल्पनाएं और भी अधिक भ्रष्ट व कमीनगी से परिपूर्ण होती चली गयीं, और उसने स्वयं को यौन तृप्ति की आकांक्षा और काम की लोलुपता में खो डाला। वो स्वयं को उसके लिंग के ऊपर अपनी जाँघं फैला कर योनि में ग्रहण करते, उसके फूले हुए बैंगनी रंग के सुपाड़े को उसकी योनि की कोपलों को पाटते , जैसे कुशल तैराक जल की लहरों को पाट लेता है, कल्पित कर रही थी।

डॉली ने उसे स्वयं से संभोग करते हुए कल्पित किया, वो अपने लम्बे, स्थूलाकार लिंग को उसकी तप्त, गीली योनि की संकराहट में डाले हए था और अपने कठोर, फड़कते लिंग से उसकी योनि को भर रखे था। ‘हाँ मेरे प्यारे ऊपर वाले, अब तो लौन्डे से चुदे बगैर रहा नहीं जाता !’, उसका तड़पता मस्तिष्क चीख चीख कर कह रहा था। डॉली अब अपने ऑरगैस्म के इतने निकट थी, कि उसे शटर का सहारा लेकर खड़ा होना पड़ा। वो अपनी पलकें खोले हुए, वासना-विह्वल नेत्रों से जय के फड़कते कठोर लिंग को एकटक देखती जा रही थी।

उसने जय को ऊंचे स्वर में हुंकार भरते हुए और अपने लिंग से हवा में वीर्य की मोटी फुहार फेंकते देखा, जो ‘छप्प' के तेज स्वर के साथ टॉयलेट के फ़र्श पर जा गिरी। इस अति रोमांचक दृष्य को देखकर डॉली की इंद्रियों में कामतृप्ति की अनुभूतियाँ फूट पड़ीं, मुख से सहसा निकल पड़ी आनन्द भरी चीख, जो उसके भेद को खोल सकती थी, को रोकने के लिये उसने अपने मुंह पर हाथ दबा लिया।

जब उसके फड़कते लिंग के शीर्ष से वीर्य की बौछार के बाद बौछार निकलती गयी, डॉली उसे खेद और सराहना के सम्मिश्र भाव से देखती गयी। उसे लगा कि हाथ से मलाईदार वीर्यपान का अवसर निकल गया। ठंडी टाइलों के फ़र्श पर निरर्थक व्यय होने से तो बेहतर होता कि वीर्य उसके मुँह अथवा योनि में स्खलित होता। डॉली ने अपनी उंगलियाँ अपनी कुलबुलाती योनि में से निकालीं और बाथरूम से निकल बाहर हुई। यह सोचकर उसे सांत्वना हुई की इस आयु में जय को अपनी कामतत्परता की पुनस्र्थापना अधिक समय नहीं लगना चाहिये। यही नहीं, यदि सब कुछ उसकी योजनानुसार होता रहा, तो रात होते होते, उसे अपनी यौन तृप्ति के लिये इतने ही कामतत्पर, दो और लिंग उपलब्ध हो जायेंगे।

फ़िलहाल अपनी कामेच्छा को शांत कर लेने के पश्चात, जय अपनी सरगर्मियों के सुबूत मिटाने लगा, टिशू पेपर से फ़र्श पर गिरे वीर्य को पोंछ कर कमोड में फ़्लश किया, और इससे पहले कि दूसरों को उसपर संदेह होता, एक तौलिये को कंधे पर डालकर स्विमिंग पूल की दिशा में चल पड़ा।

जब जय फ़ार्महाउस के पिछवाड़े स्विमिंग पूल पहुंचा, तो उसके पिता और रजनी जी पूल के समीप की मेज पर हाथों में जाम थामे बैठे थे।

“किधर फंस गये थे बेटे ?”, मिस्टर शर्मा चिल्लाये, “तुम्हारी रजनी आँटी तो समझ रही थीं कि नन्हें नवाब शरमा कर मैदान छोड़ भाग खड़े हुए।” जय ने रजनी जी की ओर देखा, और निर्भीकता से उनके आकर्षक वक्षस्थल को निहारने लगा।

 


“अमः::, डैडी, बस स्विमिंग टूक ढूंढ रहा था।”, उसने झूठ कहा, प्रार्थना कर रहा था कि रजनी शर्मा जी के छरहरे बदन को देखते ही उसके पेड़ पर जो उभार होने लगा था, उसे कोई देख न ले। अपने मन से वो उनकी नग्न योनि की छवि नहीं निकाल पा रहा था।

“स्विमिंग ट्रैक की क्या जरूरत थी जय बेटा, यूं ही चले आते, अपनी आँटी से भला क्या शर्माना ?”, रजनी जी मुस्कुरायीं, और उसकी जाँघों के बीच के फुलाव को एकटक देखकर बोलीं, “हम कोई पराये तो नहीं, जो हमें साथ-साथ तैरने के लिये पर्दा करना पड़े !” मिस्टर शर्मा ठहाका लगा हँस पड़े।

जय ने अपने शुष्क कंठ को थूक गटक कर भिगाया। असीम सौन्दर्य व छरहरे बदन की स्वामिनि रजनी जी को अपने स्विमिंग पूल में नग्नावस्था में तैरता हूआ कल्पित कर उसका लिंग आकार में और भी बड़ा हो चला ! वो हड़बड़ा कर कुर्सी पर बैठा, और अपनी टूक के भीत तेजी से फूलते उभार को छुपाने के लिये अपनी जंघा पर तौलिया रख लिया।

रजनी जी उसे देख कर मुस्कायीं। ‘या ऊपर वाले, कैसा दिलकश छोकरा है!', उन्होंने सोचा। उसकी हट्टी-कट्टी देह का भोग करने को बेसब्र हो रही थीं वे। और उसके स्विमिंग ट्रंक में फूलते उभार को देखकर वे दावे के साथ कह सकती थीं, कि ये उनके बायें हाथ का खेल होगा, निश्चय ही उनकी देह जय की कामोत्तेजना को प्रबल कर रही थी। रजनी जी अपनी टांगे तनिक अलग कर के और अपने स्तनों को कुछ आगे खींच कर बैठी हुई थीं, वे जान बूझ कर अपने अंग-अंग को उसके कमलोलुप नेत्रों के समक्ष प्रदर्शित कर रही थीं। ‘मादरचोद, देखती हूँ अब मुस्टंडे का लन्ड कैसे नहीं उछलता!', वे सोच रही थीं, और कुर्सी पर बैठी अपने नितम्बों को इस प्रकार कसमसा रही थीं, कि उनकी जाँघिया का वस्त्र उनकी नम योनि के द्वार में गड़-गड़ पर कसने लगा।

जय उनकी योनि के आकार को उसपर कसी हुई जाँघिया के महीन पारदर्शी वस्त्र के पार से देख पा रहा था। वो उनके कड़े हुए चोंचले के उभार को भी साफ़ देख पा रहा था, जो उनकी योनि के द्वार के शीर्ष पर सुसज्जित था। शिष्टाचारवश वो अत्याधिक रुचि प्रकट करने से कतरा रहा था, पर किसी चुम्बक की तरह रजनी जी की देह के निर्लज्जता से प्रदर्शित अतिमोहक अंग उसकी दृष्टि को बार-बार आकृष्ट कर ही लेते थे!

बाकी लोग कहाँ रह गये, जय?”, मिस्टर शर्मा ने उसे जाम थमाते हुए पूछा। “अरे.. शायद कपड़े बदल रहे होंगे।”, सावधानी से जाम का एक घूट लेकर वो बोला। “लगता है माँ बेटी अंदर बैठकर मार रहे हैं ... ?” उसका वाक्य पुरा होने से पहले ही रजनी जी खिलखिला कर हँस पड़ीं, जय अपने अधूरे वाक्य का अन्य अर्थ समझ कर सकपकाया और स्पष्टीकरण किया, ६ .. अब::: गप्पें ।” उसने विश्वास भरी मुस्कान देने की चेष्टा की पर एक झेपी हुई हँसी ही निकल पायी।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
86 आँखमिचौली

“शर्मा जी, आपका बेटा तो बड़ा शर्मीला है। इसके बारे में तुम्हारा क्या खयाल है बेटा ?”, रजनी जी ने अपनी बाहें खोलकर फैलायीं और पूछा। जब उसने देखा की रजनी जी के स्तन लगभग उछल कर उनकी बिकीनी के बाहर ही कूद पड़े थे, तो जय ने गले में थूक को गटका और चौंक कर उनकी ओर देखा। जाम उसकी साँस की नली में जाते-जाते बचा।

“अ :: : अम ::: मैं समझा नहीं आँटी ?”, वो हकला कर बोला। रजनी जी फिर मुस्कायीं।

“अरे बुडू, तुम्हारे डैडी मुझे बता रहे थे कि हमारी पिछली मुलाकात के बाद इस फ़ार्म हाउस में उन्होंने कैसे ऐश-ओ-आराम के साधन जुटाये हैं ?”

सुनकर उसकी हड़बड़ाहट कुछ कम हुई, किन्तु जय उत्तर देते हुए अब भी उनके वक्षस्थल की ओर निगाहें एकटक गाड़े हुए था।

“अरे::: हा! डैडी ने तो सुनसान जगह में महल खड़ा कर दिया है आँटी ::: आप बेफ़िक्र होकर जंगल में मंगल कर सकती हैं।” जय बोला, उसका ध्यान अब भी सौन्दर्या की सुडौल लम्बी टांगों के मध्य स्थित उष्मित मांद पर केन्द्रित था।

“अरे अब बन्द भी करो मुझे आँटी कहना। क्या मैं इतनी बूढ़ी हो गयी हूँ?” अपने काजल भरे नैनों को देह की दिशा में मटका कर वे बोलीं।

“ठीक है आं ::: मेरा मतलब है रजनी जी ।” वो बोला।

मेहमान नवाजी हो तो ऐसी, शहर की घुटन भरी जिंदगी से दूर इस खुशगवार जगह और कुदरती माहौल में आकर तो हमें बड़ा सुकून, एक नयी आजादी महसूस होती है। इस जंगल में तो हम दोनों के परिवार मिलकर सचमुच मंगल करेंगे! है ना जय बेटा ?”

“अम्म ::: हाँ, हा! जरूर रजनी जी !”

तुम्हारे डैडी कह रहे थे कि पिछले महीने ही उन्होंने स्टीम-बाथ और जैकूजी भी बनाया है।”, रजनी जी ने ऐसा कहकर और अपनी जाँघों को तनिक और फैलाया। बाद में मुझे दिखाओगे ना बेटा ?”

रजनी जी ने हाथ बढ़ाकर जय की जाँघ पर रखा, और एक बार फिर, उनके मादा स्पर्श ने युवा जय के बदन में कामेच्छा की आग की गरम लपटें उठा दीं।

जय ने अपने गिलास से एक लम्बा घूट लिया और झेप कर पिता की दिशा में देखने लगा। मिस्टर शर्मा मुस्कुराते हुए सराहनात्मक भाव में सर हिलाते हुए उसका उत्साह वर्धन कर रहे थे।

 
जरूर, रजनी जी !”, जय ने उत्तर दिया। जब आपका मन करे, मुझे कहियेगा !” जय फूला नहीं समा रहा था यह सोचकर की रजनी जी अपना पूरा ध्यान उसपर दे रही थीं। जिस प्रत्यक्षता से वो उसमें असाधारण रुचि ले रही थीं, वो अत्यन्त रोमांचित हो रहा था, और अपनी पहले की झेप को भूल चुका था। वो अपनी जाँघों पर से तौलिया हटा कर आराम से पीठ को कुर्सी पर टेककर मदिरा का आनन्द ले रहा था, और उनके भावों को देख रहा था। रजनी जी भी खुल्लम-खुला उसकी जाँघों के बीच घूरे जा रही थीं, और उसके लिंग के अति-उग्र उभार को, जो अब अत्यंत प्रत्यक्ष रूप से दिखलायी दे रहा था, सराहती जा रही थीं।

“बड़ी सैक्सी स्विमिंग टूक पहन रखी है, जय बेटा।” रजनी जी ने गिलास से मदिरा का घुट लेकर धीमे स्वर में कहा, उनकी मादक हरी आँखें कभी उसकी जाँघों के बीच, कभी उसके चेहरे को देखतीं। “आपकी बिकीनी भी ग़जब की मस्त है, रजनी जी !”, जय मुस्कुराया, और शब्दों के द्वन्द्व का मजा लेने लगा।

रजनी जी ने झट से नवयुवक जय के बर्ताव में आये बदलाव को पहचान लिया और बड़ी प्रसन्न हुई कि किस शीघ्रता से उन्होंने उनके बीच में शिष्टाचार के बंधनों को तोड़ दिया था। उनकी अभिरुचि के उत्तर में उसका पहले-पहल का संकुचित बर्ताव उन्हें अरुचि का संकेत देता था, पर जय ने शीघ्र ही अपनी गर्मजोशी भरे व्यवहार द्वारा उनमें नयी आशा जगा दी थी। अब उन्हें लगने लगा था कि बात आसानी से जम जायेगी!

रजनी जी के मन में अपना हाथ बढ़ा कर लड़के के स्पष्ट रूप से उत्तेजित लिंग पर फेरने जैसे अनेक दुष्ट विचार आ ही रहे थे कि, डॉली और सोनिया ने वहाँ पदार्पण किया। दोनों सूक्ष्म बिकीनी पहने अत्यंत आकर्षक प्रतीत हो रही थीं। मिस्टर शर्मा और जय मुंह स्तब्ध होकर अपने समक्ष प्रस्तुत लुभावने यौवन और छरहरी मादा देह की प्रचुर माँसलाता को देख रहे है। मिस्टर शर्मा ने दोनो के लिये एक- एक जाम बनाया, उनकी गिद्ध निगाहें डॉली की बिकीनी पहनी असाधारण रूपवान देह पर दौड़ रही थीं।

जैसे डॉली ने आगे झुक कर मिस्टर शर्मा के हाथों से मदिरा छलकाते जाम को लिया, उसके स्तन जैसे बिकीनी के टॉप से बाहर उछल पड़े। मिस्टर शर्मा के हाथों से तो गिलास गिरते-गिरते बचा, और जय का लिंग और भी कस के उसकी ट्रंक में तनने लगा। दोनो वासना-लिप्त नरों की आँखें डॉली के परिपक्व स्तनों पर गड़ी हुई थीं। रजनी जी मुस्कुरायीं, बाप-बेटा ऐसे लगते थे मानो दो कुत्ते एक मस्त कुतिया के इर्द-गिर्द चक्कर लगाकर उसके गुप्तांगों को सुंघ-सूंघ कर यौन क्रीड़ा का पूर्वाभ्यास कर रहे हों, “हम्म, देखो तो, कैसे दोनो लन्डबाज जीभ निकाले मेरी गुड़िया को घूर रहे हैं; लगता है डॉली के एक इशारे भर की देर है, और ये घुटनों के बल चले आयेंगे इसकी चूत को चाटने!', उन्होंने कुटिलता से मुस्कुराते हुए सोचा।।

जल्द ही राज और सोनिया भी वहाँ चले आये और सब मिलकर इधर-उधर की गप्पें लड़ाने लगे, और हर एक शख्स पर शैम्पेन का सुरूर छाने लगा। डॉली ने सहसा अपनी दृष्टि को मिस्टर शर्मा की जाँघों के बीच की दिशा में फिसलता हुआ पाया। वो उनके भरपूर लिंग की बनावट को उनके ट्रैक के भीतर साफ़-साफ़ देख सकती थी, जो उसे रोमांचित कर रही थी। कामेच्छा की नम ऊष्मा के मारे उसकी योनि बेचैन होने लगी। वो आत्मनियंत्रण त्याग कर, खुल्लम-खुल्ला मिस्टर शर्मा के पेड़ पर निकले उभार को एकटक निहारने लगी, सोच रही थी, ये जय के लिंग से • या फिर उसके भाई के लिंग से, तो बड़ा ही होगा :: और उसकी गरमा-गरम योनि में ठेलता हुआ कैसा लगेगा।

जब शैम्पेन की बोतल खाली हो गयी, तो मिस्टर शर्मा कहीं से एक हवा से भरी और पानी पर तैरने वाली बड़ी गेंद उठा लाये।

“अरे भई, तुम सब तो बूढ़ों की तरह बैठ कर गप्पें मार रहे हो। चलो कुछ स्विमिंग पूल में मौज-मस्ती हो जाये। उन्होंने प्रस्ताव रखा, “मैं भी देखें आजकल के जवान बच्चों में कितना दम है !” उन्होंने जल में छलांग लगायी, और अपने पीछे पूल में कूद पड़ने वालों पर पानी फेंकने लगे। लोग उत्साह से चिल्ला-चिल्ला कर पूल में तैरते हुए गेंद से खेलने लगे।

 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
87 जैकूजी



फिर जय, मिस्टर शर्मा और राज गेंद को आपस में ही फेंक कर खेलने लगे। तीनों गेंद छूने का अवसर लड़कियों को दे ही नहीं रहे थे। गेंद को पाने की चेष्टा का अभिनय करते हुए रजनी जी जय के साथ गोंद जैसी चिपक गयी थीं, और बार-बार अवसर पाकर अपने स्तनों और नितम्बों को उसके हट्टे-कट्टे मजबूत तन पर रगड़ती जा रही थीं।

जय अब गेंद में कम, और अपनी कामुक पड़ोसन में अधिक रुचि लेने लगा। राज भी टीना जी के संग इसी रीति में पीछे से अपनी बाहें उनकी कमर पर बांधे हुए, उनके ठोस और वक्राकार नितम्बों को अपने लिंग पर दबा रहा था। प्रथम तो जैसे संयोगवश दबाया, फिर जब उसने पुष्टी कर ली कि उन्हें आनन्द आया, तो निर्भय होकर स्पष्ट रूप से दबाने लगा। | मिस्टर शर्मा और डॉली ने तो अभिनय की आवश्यकता ही नहीं समझी, अलबत्ता :: दोनो अधिकतर पूल के अंधेरे कोनों में ही रहे, और एक दूसरे की टाँगों के बीच हाथों से टटोलते हुए नशे में धुत होकर हंसते ही रहे।

शीघ्र ही, अधिकतर गतिविधियाँ पानी की सतह के नीचे ही हो रही थीं। रजनी जी ने अपने नितम्बों को जय की ट्रैक के बीतर तेजी से बढ़ते उभार पर कस के दबा रखा था, मिस्टर शर्मा ने शबनमे के स्तनों को हाथों की गिरफ़्त में ले रखा था, और उन्हें प्रेम से निचोड़ते हुए अपने तनते लिंग को उस किशोरी के सुडौल नितम्बों पर रगड़ते जा रहे थे। राज का एक हाथ टीना जी की जाँघों के बीच फंसा हुआ था, और पानी की सतह के नीचे उनके लिसलिसे तप्त योनि माँस को मसल-मसल कर निचोड़ रहा था।

सोनिया ने रजनी जी को आँख मारी, यह उस घटनाक्रम को प्रारम्भ करने का संकेत सूचक था, जिसकी एक सप्ताह से दोनों को प्रतीक्षा थी। पारिवारिक सरगर्मियों और रंगरेलियों का समय आ गया था! रजनी जी जय की दिशा में पलटी और अपनी बाहें उसके कंधों पर सजा कर अपने स्तनों को उसके जवान रोमदार सीने पर रगड़ने लगीं।

“अपना जैकूजी नहीं दिखाओगे मुझे, जानेमन ?”, उन्होंने फंकार कर पूछा, और आमंत्रणपूर्वक उसके कान को जिह्वा से चाटने लगीं।

“आपका हुक्म सर आँखों पर रजनी जी”, जय मुस्कुराया। “बन्दे के पीछे-पीछे चले आइये !”

वो रजनी जी के हाथ को पकड़कर उन्हें स्विमिंग पूल के किनारे की ओर ले गया। जय ने उन्हें स्विमिंग पूल से बाहर निकलने में सहायता दी, और अपने हाथों द्वारा रजनी जी के ठोस गोलाकार नितम्बों को आवश्यकता से कहीं अधिक समय तक सहारा दिया।

जैकूजी में पहुँचने पर, रजनी जी नवयुवा जय की ओर पलट कर खड़ी हुईं, और अपने बिकीनी के टॉप को उतार फेंका। जैसे ही उनके अतिविशाल स्तन सूक्ष्म वस्त्र से बन्धनमुक्त हुए, उन्होंने जय के मुख पर उत्कट काम लोलुपता के भाव को देखा।

यः'' ये आप क्या कर रही हैं ?”, जय हकलाता हुआ बोला, वो अपने नेत्रों को उनके नग्न स्तनों की ऊष्मा पर सेक रहा था। शैम्पेन की मादकता और रजनी जी की निर्भीक अगवाई के बावजूद, वो अब भी कतराता था.. उसकी हिचकिचाहट आड़े आ रही थी। अपनी माता और बहन के साथ यौन संबन्ध स्थापित कर लेना अब उसे कहीं अधिक सहज लगता था। उसके लिये रजनी जी एक टेढ़ी खीर साबित हो रही थीं जानता था कि वे भी उसे चाहती थीं, किन्तु असमंजस में पड़ गया था कि अगला क़दम कैसे उठाये।

अरे बुडू, जैकूजी में मैं हमेशा बिकीनी उतार लेती हूँ। भई जैकूजी का असली मजा तो कपड़े उतार कर ही है। ना:- देखो, बदन पर ये छोटे-छोटे बुलबुले कैसे सुहावने लगते हैं तुम्हें कोई ऐतराज तो नहीं, जय बेटा ?” |

नहीं रजनी जी, मुझे भला ऐतराज़ क्यों होगा !” उसने गले में घूट भरा, और उनके अकड़ते निप्पलों को एकटक घूरने लगा। रजनी जी ने उसके मुख के भावों में उसकी असीम दैहिक भूख को पढ़ा।

“कैसे लगे मेरे मम्मे?", रजनी जी ने गर्म साँसें फेंकते हुए पूछा, और धीरे-धीरे उसके निकट आने लगीं। बोलो जय बेटा, कैसे लगते हैं तुझे आँटी के मोटे-मोटे मम्मे ?”

ओह, हाँ, रजनी जी! :: • बहुत, माँ कसम, बला के खूबसूरत हैं !”, उत्तेजित किशोर ऐसा कह कर कराह पड़ा।

जय की निगाहें उनके ठोस, गोलाकार स्तनों पर जमी हुई थीं। रजनी जी उसके ट्रंक के अंदर तनते हुए उग्र लिंग के उभार को घूरती हुईं, उसके और निकट बढ़ीं। उन्होंने अपने हाथों में अपने भरपूर स्तनों को भरकर भेंटस्वरूप उसके समक्ष प्रस्तुत किया, ठीक उसी रीति से जैसा उसने उन्हें आईने के सामने करते हुए देखा था।

जय को तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था, कि क्या कहे और क्या करे! दरसल, उसे कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं थी, क्योंकि रजनी जी उस नौजवान को अपनी देह द्वारा रिझाने और लुभाने में ऐसे अद्वितीय रोमांच का अनुभव रही थीं, कि उन्होंने आगे की गतिविधियों की बागडोर अपने अनुभवी हाथों में ले ली। अपनी देह को उसकी देह पर दबाकर उन्होंने अपने भरपूर विशाल स्तनों को उसके खुले हुए मुँह की दिशा में उठा दिया।

“इन्हें चूस, जय बेटा!”, रजनी जी ने आदेश दिया। देखता क्या है, चूस ले आँटी के मम्मों को, और चबा मस्ती से इन निप्पलों को !” ।


जय को तो जैसे साँप सूंघ गया हो
 
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