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Incest पापी परिवार की पापी वासना complete

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साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
तीनो के तीनो जोर-जोर से कराह रहे थे। रजनी जी ने अपनी कंपकंपाती योनि के भीतर जय के ऑरगैस्म को पनपते हुए आभास किया। उन्होंने वासना भरी एक हुंकार भरी और सोनिया के मुँह को अपने मुंह पर खींच कर अत्यंत भावावेश से किशोरी का चुम्बन लेते हुए अपनी ऑरगैस्म पाती योनि को किशोर जय के फड़कते और थूकते लिंग पर मसलने लगीं। सोनिया ने भी उनके साथ-साथ अपने शीर्ष आनन्द को प्राप्त किया, और अपनी जिह्वा को रजनी जी के तप्त मुँह में गहरा घुसेड़ कर अपने भाई के मुंह पर अपनी जवान योनि से मादा दवों का छिड़काव करने लगी।

रजनी जी की कम्पायमान योनि के भीतर वीर्य की अंतिम बून्दों को स्खलित करने के कई मिनट बाद तक जय के लिंग ने बेतहाशा फड़क - फड़क कर फुदकना जारी रखा। रजनी जी कराहीं, वे अति आह्लाद से अपनी कसमसाती योनि की प्रत्येक फड़कन का भरपूर आनन्द उठा रही थीं। अपने दैहिक आनन्द के प्रभाववश उन्होंने अपनी लाज को त्याग दिया था, और मुख से किलकारियाँ निकालती हुई बेहूदी व अभद्र तिप्पणियाँ कर रही थीं। वे अपनी योनि को आगे और पीछे झुलातीं, फिर दायें -बायें कूटतीं और अपनी काम-गुहा को बड़ी अदा से जय । के मोटे स्तम्भ की सम्पूर्ण लम्बाई पर ऊपर से नीचे तक फिसलातीं।

सोनिया भी ऐसे ही अनुभव से गुजर रही थी, कोई अंतर था तो बस इतना ही जय की जिह्वा शीथील नहीं परी थी, वो अब भी कुशलतापूर्वक बहन की योनि पर मैथुनरत थी। सोनिया की काम अनुभूतियाँ मुख्यतय उसकी योनि के चोंचले पर केन्द्रित थीं, और अपने चरमानन्द के शीर्ष की घड़ी में उसने धीरे से खिसक कर अपने संवेदनशील चोंचले को उसकी निरन्तर मैथुन करती जिह्वा के ऐन विपरीत ला टेका था।

जय ने स्वाभाविक रूप से उसकी मनोकामना को जान लिया और उसकी बहन को जो चाहिये था, वही किया। उसकी कामेन्द्रियों के केन्द्रीय बिन्दू पर उसने अपनी जिह्वा से सहलाना प्रारम्भ कर दिया। सोनिया के सूजे हुए चोंचले पर वो अपनी जिह्वा को आगे-पीछे घसीटता गया जब तक कि दैहिक आनन्द की अनुभूतियों की प्रचण्डता उसकी बर्दाश्त के बाहर नहीं हो गयी।

“ऊ ऊहहह, जय भैया। और मत तड़पाओ मुझ बेचारी को !” वो कराही, और अपनी पीठ को तना कर कस के अपनी योनि को उसके चेहरे पर रौन्दने लगी।

रजनी जी आगे की ओर झुकीं, उन्होंने जय के युवा लिंग पर अपनी योनि की सशक्त गिरफ़्त का कब्जा बरकरार रखा, और सोनिया के होठों का कामुक चुम्बन लिया। उन्होंने किशोरी के नारंगी जैसे स्तनों को निचोड़कर सहलाया। दोनो मादाओं की देह हौले-हौले जय के ऊपर कसमसा रही थीं, और वे अपने ऑरगैस्म के उपरांत की मधुर सुखद अनुभूतियों का आनन्द उठा रहे थे। |

ऑरगैस्म के लम्बे सिलसिले का आनन्द ले लेने के पश्चात जय का नवयौवन और पौरुष भी अब शीथील पड़ने लगा था, और उसका लिंग कुम्हला कर ढीला पड़ा और धीरे से रजनी जी की योनि से निकल बाहर हुआ। मारे थकान के वो हाँफ़ता हुआ आँखें मून्द कर लेट गया।

“बरखुरदार, लगता है इस बेचारे की तो चोदते - चोदते हवा निकल गयी, क्यों सोनिया ?”, रजनी जी मुस्कुरायीं , और छेड़खानी करती हुई अपनी उंगलियों को जय के शीथील लिंग पर फेरते हुए बोलीं।

“हाँ आँटी! आखिर दुनिया में कितने ऐसे लड़के होंगे जिन्हें इस उमर में इतनी चूतों के हमले को झेलने का नसीब हुआ हो :- मैने ठीक कहा जय?”, सोनिया खिलखिला पड़ी।
 
“सच सोनिया, ऐसी गरम पटाखेदार चूतों को झेलना बड़ा मुश्किल है।” जय पलट कर अपनी छोटी बहन की ओर मुड़ा और उसने उत्तर दिया। “भई मुझे तो आँखों देखी पर यक़ीन नहीं होता! लगता है सपना देख रहा हूँ, बस जागने का मन नहीं करता !”

“सपना नहीं, ये सच है भैया!”, सोनिया ने उत्तर दिया, वो उसके लिंग को रजनी जी की कुशल उंगलियों के तले पुनः जीवित होते देख रही थी। “और बड़े भैया, ध्यान रखिये, आज के बाद आपको टिपटॉप कन्डीशन में रहना है। क्योंकि अब आपको अपना दमखम दिखाने के ऐसे कईं मौके मिलेंगे !” ।

“बाद दमखम की निकली है तो,” रजनी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों न हम बाहर जाकर देखें कि बाक़ी लोग क्या हरकतें कर रहे हैं।

हाँ!”, जय ने स्वीकृति भरी। “अब भाई मुझे तो तुम दोनो ने इतना थका डाला कि मुझे दो घड़ी दम लेने की सख्त जरूरत है।”

“ममममम! जनाब जरूर आराम फ़र्माइये, पर कहीं हमें भुला न बैठियेगा! समझे मेरे पहलवान, तुझे तेरी रन्डी माँ का तक़ाजा है !” रजनी जी ने ऐसा कह कर जय के अर्ध-तैनात लिंग को प्रेम से निचोड़ दिया।

तीनो नग्नावस्था में ही एक दूसरे के गले में बाहें डाले जैकूजी से निकल पड़े और फ़ार्महाउस के भीतर को चल पड़े।

101 सिंह और सिंहनी जैसे तीनो स्विमिंग पूल के निकट से गुजरे, उन्होंने उसे खाली पाया। लगता था मिस्टर शर्मा और डॉली ने फ़ार्महाउस के भीतर आरामदेह स्थान का चयन किया था। बाक़ी के लोग ड्राइंग रूम में रंगरेलियाँ मना रहे थे।

“आइये, आइये, बस आप तीनों की ही कमी थी यहाँ!”, टीना जी ने हँस कर उनका स्वागत किया, वे अपने पुत्र के आधे तने हुए लिंग को खुल्लम-खुल्ला घूर रही थीं। । हालांकि वे राज के लिंग को अब भी अपनी योनि की गहराई में ग्रहण किये हुए थीं, फिर भी टीना जी अपने सौन्दर्यवान पुत्र के प्रति प्रचण्ड वासना का अनुभव कर रही थीं। इस तथ्य के ज्ञान -मात्र से, कि उनके सुन्दर बलिष्ठ पुत्र ने निश्चय ही अभी-अभी सोनिया और रजनी जी के संग सम्भोग सम्पन्न किया था, उनकी योनि बेलगाम हवस के मारे फड़कने लगी। उन्होंने अपनी योनि को राज के ढीले लिंग पर से खींच निकाला और हाथों में जय के हाथ को लेकर उठ खड़ी हुईं।

“आजा, मेरे लाल, टीना जी ने गुर्रा कर कहा, और अपने नग्न पुत्र को कमरे के खाली भाग की ओर खीं ले चलीं। “मम्मी को बड़ी खुजली हो रही है, जिसका इलाज बस तेरे पास है !”

रजनी जी, सोफ़े पर लेट कर कामुकतापूर्वक एक दूसरे का चुम्बन लेते हुए मिस्टर शर्मा और डॉली के निकाट जाकर बैठ गयीं और अपनी उंगलियों को मिस्टर शर्मा के वज्र से कठोर लिंग पर लपेट डाला।
 
सोनिया ने भी उनके साथ-साथ अपने शीर्ष आनन्द को प्राप्त किया, और अपनी जिह्वा को रजनी जी के तप्त मुँह में गहरा घुसेड़ कर अपने भाई के मुंह पर अपनी जवान योनि से मादा दवों का छिड़काव करने लगी।

रजनी जी की कम्पायमान योनि के भीतर वीर्य की अंतिम बून्दों को स्खलित करने के कई मिनट बाद तक जय के लिंग ने बेतहाशा फड़क - फड़क कर फुदकना जारी रखा। रजनी जी कराहीं, वे अति आह्लाद से अपनी कसमसाती योनि की प्रत्येक फड़कन का भरपूर आनन्द उठा रही थीं। अपने दैहिक आनन्द के प्रभाववश उन्होंने अपनी लाज को त्याग दिया था, और मुख से किलकारियाँ निकालती हुई बेहूदी व अभद्र तिप्पणियाँ कर रही थीं। वे अपनी योनि को आगे और पीछे झुलातीं, फिर दायें -बायें कूटतीं और अपनी काम-गुहा को बड़ी अदा से जय । के मोटे स्तम्भ की सम्पूर्ण लम्बाई पर ऊपर से नीचे तक फिसलातीं।

सोनिया भी ऐसे ही अनुभव से गुजर रही थी, कोई अंतर था तो बस इतना ही जय की जिह्वा शीथील नहीं परी थी, वो अब भी कुशलतापूर्वक बहन की योनि पर मैथुनरत थी। सोनिया की काम अनुभूतियाँ मुख्यतय उसकी योनि के चोंचले पर केन्द्रित थीं, और अपने चरमानन्द के शीर्ष की घड़ी में उसने धीरे से खिसक कर अपने संवेदनशील चोंचले को उसकी निरन्तर मैथुन करती जिह्वा के ऐन विपरीत ला टेका था।

जय ने स्वाभाविक रूप से उसकी मनोकामना को जान लिया और उसकी बहन को जो चाहिये था, वही किया। उसकी कामेन्द्रियों के केन्द्रीय बिन्दू पर उसने अपनी जिह्वा से सहलाना प्रारम्भ कर दिया। सोनिया के सूजे हुए चोंचले पर वो अपनी जिह्वा को आगे-पीछे घसीटता गया जब तक कि दैहिक आनन्द की अनुभूतियों की प्रचण्डता उसकी बर्दाश्त के बाहर नहीं हो गयी।

“ऊ ऊहहह, जय भैया। और मत तड़पाओ मुझ बेचारी को !” वो कराही, और अपनी पीठ को तना कर कस के अपनी योनि को उसके चेहरे पर रौन्दने लगी।

रजनी जी आगे की ओर झुकीं, उन्होंने जय के युवा लिंग पर अपनी योनि की सशक्त गिरफ़्त का कब्जा बरकरार रखा, और सोनिया के होठों का कामुक चुम्बन लिया। उन्होंने किशोरी के नारंगी जैसे स्तनों को निचोड़कर सहलाया। दोनो मादाओं की देह हौले-हौले जय के ऊपर कसमसा रही थीं, और वे अपने ऑरगैस्म के उपरांत की मधुर सुखद अनुभूतियों का आनन्द उठा रहे थे। | ऑरगैस्म के लम्बे सिलसिले का आनन्द ले लेने के पश्चात जय का नवयौवन और पौरुष भी अब शीथील पड़ने लगा था, और उसका लिंग कुम्हला कर ढीला पड़ा और धीरे से रजनी जी की योनि से निकल बाहर हुआ। मारे थकान के वो हाँफ़ता हुआ आँखें मून्द कर लेट गया।
 
“बरखुरदार, लगता है इस बेचारे की तो चोदते - चोदते हवा निकल गयी, क्यों सोनिया ?”, रजनी जी मुस्कुरायीं , और छेड़खानी करती हुई अपनी उंगलियों को जय के शीथील लिंग पर फेरते हुए बोलीं।

“हाँ आँटी! आखिर दुनिया में कितने ऐसे लड़के होंगे जिन्हें इस उमर में इतनी चूतों के हमले को झेलने का नसीब हुआ हो :- मैने ठीक कहा जय?”, सोनिया खिलखिला पड़ी।

“सच सोनिया, ऐसी गरम पटाखेदार चूतों को झेलना बड़ा मुश्किल है।” जय पलट कर अपनी छोटी बहन की ओर मुड़ा और उसने उत्तर दिया। “भई मुझे तो आँखों देखी पर यक़ीन नहीं होता! लगता है सपना देख रहा हूँ, बस जागने का मन नहीं करता !”

“सपना नहीं, ये सच है भैया!”, सोनिया ने उत्तर दिया, वो उसके लिंग को रजनी जी की कुशल उंगलियों के तले पुनः जीवित होते देख रही थी। “और बड़े भैया, ध्यान रखिये, आज के बाद आपको टिपटॉप कन्डीशन में रहना है। क्योंकि अब आपको अपना दमखम दिखाने के ऐसे कईं मौके मिलेंगे !” ।

“बाद दमखम की निकली है तो,” रजनी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों न हम बाहर जाकर देखें कि बाक़ी लोग क्या हरकतें कर रहे हैं।

हाँ!”, जय ने स्वीकृति भरी। “अब भाई मुझे तो तुम दोनो ने इतना थका डाला कि मुझे दो घड़ी दम लेने की सख्त जरूरत है।”

“ममममम! जनाब जरूर आराम फ़र्माइये, पर कहीं हमें भुला न बैठियेगा! समझे मेरे पहलवान, तुझे तेरी रन्डी माँ का तक़ाजा है !” रजनी जी ने ऐसा कह कर जय के अर्ध-तैनात लिंग को प्रेम से निचोड़ दिया।

तीनो नग्नावस्था में ही एक दूसरे के गले में बाहें डाले जैकूजी से निकल पड़े और फ़ार्महाउस के भीतर को चल पड़े।

जैसे तीनो स्विमिंग पूल के निकट से गुजरे, उन्होंने उसे खाली पाया। लगता था मिस्टर शर्मा और डॉली ने फ़ार्महाउस के भीतर आरामदेह स्थान का चयन किया था। बाक़ी के लोग ड्राइंग रूम में रंगरेलियाँ मना रहे थे।

“आइये, आइये, बस आप तीनों की ही कमी थी यहाँ!”, टीना जी ने हँस कर उनका स्वागत किया, वे अपने पुत्र के आधे तने हुए लिंग को खुल्लम-खुल्ला घूर रही थीं। । हालांकि वे राज के लिंग को अब भी अपनी योनि की गहराई में ग्रहण किये हुए थीं, फिर भी टीना जी अपने सौन्दर्यवान पुत्र के प्रति प्रचण्ड वासना का अनुभव कर रही थीं। इस तथ्य के ज्ञान -मात्र से, कि उनके सुन्दर बलिष्ठ पुत्र ने निश्चय ही अभी-अभी सोनिया और रजनी जी के संग सम्भोग सम्पन्न किया था, उनकी योनि बेलगाम हवस के मारे फड़कने लगी। उन्होंने अपनी योनि को राज के ढीले लिंग पर से खींच निकाला और हाथों में जय के हाथ को लेकर उठ खड़ी हुईं।

“आजा, मेरे लाल, टीना जी ने गुर्रा कर कहा, और अपने नग्न पुत्र को कमरे के खाली भाग की ओर खीं ले चलीं। “मम्मी को बड़ी खुजली हो रही है, जिसका इलाज बस तेरे पास है !”

रजनी जी, सोफ़े पर लेट कर कामुकतापूर्वक एक दूसरे का चुम्बन लेते हुए मिस्टर शर्मा और डॉली के निकाट जाकर बैठ गयीं और अपनी उंगलियों को मिस्टर शर्मा के वज्र से कठोर लिंग पर लपेट डाला।

“आदाब अर्ज है, शर्मा जी !”, वे उनके कान में फुसफुसायीं। मिस्टर शर्मा ने अपने होठों को डॉली के होठों से अलग किया और उसकी मम्मी की दिशा में मुड़ गये।।

“जहे नसीब, रजनी जी ? आपको मेरा भी आदाब !” वे हँस पड़े, और अपने बायें हाथ को नीचे रजनी जी की पटी हुई जाँघों के बीच सरकाने लगे। उन्होंने अपनी एक उंगली को उस स्त्री की पटी हुई कामगुहा में घुसाया और लगे उनके चोंचले को रगड़ने । उनका दायाँ हाथ डॉली की तप्त किशोर योनि से खेलने में व्यस्त था। मिस्टर शर्मा माँ-बेटी पर एक ही समय हस्त-मैथुन कर रहे थे। रजनी जी ने कराह कर अपने नरम कोमल होठों को मिस्टर शर्मा के होठों पर सटा दिया। जब वे आवेशपूर्वक चुम्बन कर रहे थे, डॉली ने अपने सर को मिस्टर शर्मा की टाँगों के बीच घुसेड़ा और उनके विशाल लिंग को अपने मुख में ग्रहण कर, उत्सुकता से लगी चूसने।।
 
सोनिया ने घुटनों के बल झुककर राज के संग ठीक ऐसा ही किया। वो राज के चमचमाते काले लिंग पर अपनी माँ की योनि के स्वाद को चखकर और भी उत्तेजित हो गयी। उसे वह स्वाद इतना भा गया कि, उसने प्रण किया कि भोर फटने से पहले वो अपनी माँ की योनि का स्वाद सीधे चख कर रहेगी।

“या ऊपर वाले !” जब आखिरकार उन्होंने अपने गरम चूसते मुख को मिस्टर शर्मा के होठों से अलग किया तो रजनी जी कराह कर बोल पड़ीं। “जानेमन मुद्दत से तुझसे चुदने का अरमान था! अब चोद भी डाल मुझे ! इसी वक़्त, इसी जगह चोद डाल !!” । | सोनिया ने माँ की काम क्षुधा की तीव्रता को भाँप लिया। मिस्टर शर्मा के फड़कते लिंग पर से अपने मुँह को हटा कर वो नटखट लहजे में मुस्कुराने लगी।

“मम्मी, आप मेरी चूत को चाटिये ! सोनिया ने आह भरी। “जब शर्मा अंकल आपको चोद रहे होंगे, तो आप मेरी चूत चाटिये, फिर मैं आपकी चूत से अंकल का वीर्य साफ़ करूंगी, और अंकल मुझे चोदेंगे !” | अपने पड़ोसी के विलक्षण लिंग के साथ कामक्रीड़ा करने, और साथ में अपनी कामुक पुत्री पर मुखमैथुन करने के विचार मात्र से रजनी जी अति उत्तेजित हो उठीं, और अपनी पीठ के बल लेटकर बेहदी निर्लज्जता से अपनी सुडौल जाँघों को खोल कर फैला दिया।

* ऊहह, शब्बो, मेरी जान! आ मम्मी के मुँह बर बैठ मेरी बच्ची !” उन्होंने हाँफ़कर कहा।। | जैसे डॉली ने अपनी चूती योनि को अपनी मम्मी के मुंह पर रखा, मिस्टर शर्मा रेंग कर रजनी जी की टाँगों के बीच आ पहुँचे और अपने फूले हुए लिंग को उनकी योनि की चौड़ी पटी हुई कोपलों के बीचों-बीच साधा। रजनी जी ने उनके विकराल लिंग के मोटे तने को देखकर लम्बी साँस भरी और उनके फूले सुपाड़े को अपनी योनि की कोपलों की फिसलन भरे आलिंगन में भर लिया।

मिस्टर शर्मा ने आगे की ओर ठेला और रजनी जी उनके मोटे गात्र के लिंगस्तम्भ को अपनी तप्त योनि की लिसलिसी संकराहट के भीतर गहरे, और गहरे घुसते हुए अनुभव करके हौले से कराह उठीं। अपने अंदर उन्हें लिंग का आकार अतिविशाल प्रतीत होता था, परन्तु जैसे-जैसे मिस्टर शर्मा का दानवाकार लिंग उनकी योनि को भरता गया, उस वासना से बेसुध स्त्री ने पल-दर-पल का पूरा-पूरा आनन्द लिया।

ऊ ऊ ऊ ऊ ऊह, शाबाश,” जब उस वयस्क पुरुष का लिंग उनकी ज्वलन्त कामगुहा में सम्पूर्णतय विलीन हो गया, तो वे कराह कर बोल उठीं। “बस, अब शुरू हो जा! चोद चोद कर बेहाल कर दे मुझे, मैं भी देखें तेरी बीवी ने कैसा मर्द पाया है !” ।

मिस्टर शर्मा ने प्रारम्भ में संयम बरतते हुए अपने लिंग से टटोलते हुए ठेला, अब तक उन्हें अपनी पड़ोसन के काम अनुभव और प्रवीणता का अच्छा अनुमान हो चुका था, और अपने समक्ष इस कामांगना के वास्ते वे अपने पूरे पौरुष बल को जुटा रहे थे, अपने स्वयं के अनुभव का प्रयोग कर वे इस प्रवीणा की देह को तृप्त करने तथा अपने कामबल को प्रमाणित करने के लक्ष्य से अपनी रणनीति तय कर रहे थे। अपनी आरम्भिक लय स्थापित कर लेने के कुछ ही देर बाद वे रजनी जी के झूमते पेड़ में अपने पूरे सामर्थ्य से ठेलने लगे। उन्होंने अपनी निगाह रजनी जी की अकड़ी हई जिह्वा पर लगा रखी थी, जो बड़ी अदा से डॉली की रिसती योनि - कोपलों के मध्य विचर रही थी। रजनी जी को अपनी पुत्री की योनि में मुखमैथुन करते देख मिस्टर शर्मा अतिरोमांचित हो रहे थे। साथ ही उनकी कस के जकड़ती योनि का चिकनाहट से सना और तप्त माँस उनके मोटी-मोटी नसों वाले लिंगस्तम्भ, जिससे वे उनके संग रौद्र काम-क्रीड़ा कर रहे थे, की लम्बाई को प्रेमपूर्वक निचोड़ता हुआ चूस रहा था।

मिस्टर शर्मा को उनकी योनि की संकराहट पर विश्वास नहीं होता था, और जिस प्रकार रजनी जी किसी जंगली सिंहनी ही तरह अपनी आक्रामक योनि द्वारा उनपर झपट्टे मार-मार कर उनके बलशाली ठेलों का उचित प्रत्युत्तर दे रही थी, वह भी रजनी जी की रूहानी कैफ़ियत का सूचक थी। उनकी रौद्र प्रणय-लीला के छपाकेदार स्वर पूरे कमरे में गूंज रहे थे।
 
102 दो परिवारों का मिलन

राज के शीथील पड़े लिंग को अपने मुँह में पुनर्जीवित कर के उसके विकराल आकार की पुनस्र्थापना कर लेने के उपरांत किशोरी सोनिया अब उस नौजवान के दानवी लिंग पर चढ़कर घोड़े की तरह उसकी सवारी कर रही थी।

“और दम लगा! और कस के चोद मुझे !” वो बिलबिलायी। “ऊ ऊ ऊहहहह ! रन्डी की औलाद, क्या मस्त है तेरा मोटा लन्ड !”

उसके आकर्षक नग्न नितम्ब उत्कृष्टता से सिहर रहे थे, और उसकी तप्त जकड़ती योनि बड़े उत्साह से राज के घोंपते हुए काले लिंग की लम्बाई पर चढ़-चढ़ कर नीचे फटकती जाती थी। उस कामुक किशोरी को तो स्मरण भी नहीं था कि पहले कब उसे ऐसे विलक्षण उन्माद का अनुभव हुआ जिसका अनुभव वो उस समय कर रही थी।

“ऊ ऊ ऊ ऊह, बड़वे की औलाद !” वो बिलबिलायी, अपनी योनि को राज के घोंपते लिंग पर चारों ओर से सिकुड़ते ढिलते हुए अनुभव कर रही थी। “ले मैं झड़ी! झड़ गयी साले! ऊ ऊ ऊ ऊ ऊह! झड़ी ये झड़ी !” | रन्डी कहीं की !” जय खिलखिलाया, वो अपनी माँ के पीछे घुटने टेककर अपने लम्बे तने हुए लिंग को उनकी मोटी-मोटी कोपलों वाली योनि के भीतर घुसेड़ रहा था। “देखो मम्मी, अपनी सोनिया कैसी मद-मस्त होकर राज से चुद रही है।”

“उम्म! उहहह! हाँ जय बेटा, आखिर उपज है खानदानी रन्डियों की, इसको तो रोज नये मर्द चाहियें।” टीना जी ने गुर्रा कर जवाब दिया, और अपने नितम्बों को पीछे धकेल कर अपने पुत्र के सशक्त लिंग - प्रहारों झेलने लगीं। “पर बेटा तू' :: उहहह मादरचोद ! ::: तू ब : ‘बस मुझे चोदने में अपना ध्यान लगा, समझा मेरे लाल ! बाद में तसल्ली से अपनी बहन को भी चोद लेना! उहहह ऊँहहह! ईश्वर! आहहह! चोद अपनी माँ को मादरचोद रन्डी की औलाद !”

जय ने अपना पूरा सामर्थ लगा कर अपने लिंग को माँ की योनि में पीटना प्रारम्भ कर दिया। साथ-साथ वो अपने अंगूठे द्वारा अपनी माँ के तंग और कसैल गुदा-छिद्र को भी टटोल रहा था।

“घुसा अपनी उंगली माँ की गाँड के अंदर, मेरे लाल। जानता नहीं तेरी मम्मी को गाँड में उंगल करवाने से कैसी मस्ती चढ़ती है !”, टीना जी ने हाँफ़ते हुए कहा, और हाथों को पीछे बढ़ा कर अपने नितम्बों को जय के लिये फैला कर गुदा-द्वार को खोल दिया।

जय ने अपने अंगूठे को उनकी योनि पर रगड़ा ताकि वो उनके द्रवों से चुपड़ कर चिकनाहट से सन जाये, फिर अपने अंगूठे को अपनी माँ की गर्मायी हुई कसैल गुदा में दे घुसाया।
 
ऊ ऊ ऊ ऊह, शाबाश !” टीना जी चीखीं। “हिचकता क्यों है मादरचोद, घुसा और अंदर, टटोल अपनी रन्डी माँ की गाँड ।” ।

वो अपने लिंग को तो उनकी योनि के भीतर फुर्ती से ठेल ही रहा था, साथ में जय ने अपने अंगूठे की समूची लम्बाई को भी अपनी माँ की गुदा में दे घोंपा। फिर जब उसने अपने अंगूठे को घुमा- घुमा कर उनकी संकरी और मक्खन सी चिकनी गुदा के भीतर कुरेदना शुरू किया, तो कुछ ही पलों में उसकी माँ प्रसन्नता के मारे बिलबिलाने लगी।

“ओहहहह, जय,” उन्होंने उत्तेजित स्वर में पूछा। “बड़ी मस्ती आ रही है! जानता है मेरा दिल तुझसे क्या करवाने को चाहता है ?”

“क्या ?”

* मादरचोद, मैं चाहती हूँ तू मेरी गाँड मारे !” उन्होंने आह भरी, और उत्कट कामुकता से पलट कर अपने कन्धों के ऊपर से अपने हृष्ट-पुष्ट पुत्र को स्वागतपूर्ण निगाहों से देखने लगीं। “चोद मम्मी की गाँड अपने काले मोटे लन्ड से, मेरे लाल !”

“जरूर !!!”, जय हँसता हुआ बोला, और के लिसलिसी ‘स्लप्प' की बेहूदी आवाज के साथ अपने लिंग को माता की योनि से खींच निकाला।

उसने एक हाथ उनके नीचे बढ़ाया और अपनी उंगलियों को उनके रिसते योनि स्थल पर फेरा, वो अपनी माता के चिपचिपे योनि-द्रवों को उनके तंग गुदा-छिद्र और अपने सुपाड़े पर चुपड़-चुपड़ कर मलता जा रहा था, ताकि सहजता से गुदा को भेद सके और गुदा-मैथुन का पर्याप्त आनन्द भी उठा सके।

“मम्मी, आपको थोड़ा दर्द तो होगा” अपने लिंग के सुपाड़े को उनके तंग गुदा-छिद्र पर सटाता हुआ जय बोला।

* कोई बात नहीं, मेरे पहलवान पट्ठे,” उन्होंने जवाब दिया। “जो हरामजादी तुझ जैसे मोटे लन्ड वाले पहलवान को जनम दे सकती है, वो अपनी गाँड में उस लन्ड को झेलने का दम भी रखती है! तुझे कोई शक़ हो तो घुसेड़ अपना लौड़ा और आजमा ले अपनी माँ को! साले मेरी गाँड में ऐसी गर्मी है, कि अच्छे अच्छे झड़ जाते हैं! बड़ा आया भोंसड़ी वाला दर्द करने ! घुसा अपना लौड़ा, मादरचोद !”
 
अपने पंजों में टीना जी के सुडौल कूल्हों को दबोच कर जय ने अपने चिकनाहट से सने हुए लिंग को आगे की ओर धकेला। उसने अपने फूले हुए सुपाड़े को अचानक अपनी माता की बेहद - कसी हुई गुदा-द्वार की माँसपेशियों को भेदते हुए अनुभव किया। उसका लिंग माँ के गुदा- छिद्र को भेद कर गुदा की आग्नेय गहरायी में उतर गया।

कुछ देर जय बिना हिले-डुले ज्यों का त्यों जमा रहा जब तक कि उसकी माँ की गुदा उसके मोटे लिंग द्वारा अचानक हुए अतिक्रमण की आदी नहीं हो जाती। फिर आखिरकार जय ने अपने लिंग को धीरे-धीरे टीना जी की चिकनी जकड़ती संकराहट में से वापस पीछे खींचना आरम्भ किया, जब तक केवल उसका सुपाड़ा मात्र अंदर धंसा रह गया। फिर उसने आगे की ओर ठेल दिया, जैसे ही उसका लिंग उनकी ज्वालामुखी जैसी सुलगती गुदा के भीतर घुसा, तुरंत उसे अपने लिंग की सम्पूर्ण लम्बाई पर एक गुदगुदाती रोमांचक अनुभूति का अनुभव हुआ।

“दर्द तो नहीं हो रहा, मम्मी ?” वो हाँफ़ता हुआ बोला, और अपने लिंग को और जोर से टीना जी की तंग गुदा में और गहरा घोंपने लगा।

“मादरचोद, तूने अपना साँड जैसे लौड़ा मेरी बेचारी गाँड में घुसेड़ रखा है और पूछता है दर्द तो नहीं होता !” टीना जी चीख पड़ीं। “अपने पहलवान बेटे से गाँड मरवाने से जो दर्द होता है, बड़ा मीठा होता है! तू लगे रह, एक सैकन्ड भी नहीं रुकना! देखो दीपक हमारा बेटा कैसे माँ की गाँड मार रहा है !”

“चक दे पट्ठे, मार माँ की गाँड ऐसी गरम गाँड तुझे इस शहर के किसी रन्डी खाने में नहीं मिलने की! तेरे बाप ने हर घाट का पानी पिया है, पर तेरी माँ जैसी टाइट गाँड नसीब से मिलती है !” मिस्टर शर्मा ने पुत्र का उत्साहवर्धन किया।

अपनी माँ की सिकोड़ती गुदा की मक्खन सी कोमलता के भीतर लयबद्ध रीती से ठेलते-ठेलते जय के नवयुवा स्नायुओं में शीघ्र ही लैंगिक आनन्द की लहरियाँ उमड़ने लगीं। अपने लिंग पर मातृ - गुदा की तप्त चिकनाहट द्वारा मालिश करवाता हुआ जय कामोत्साह से अपने कठोर लिंग को टीना जी की तंग गुदा के भीतर - बाहर रौन्दता चला जा रहा था। वो अपने क्रुद्ध लिंग पर टीना जी की गुदा के कोमल पुचकारते माँस की नमी को जकड़ता हुआ अनुभव कर रहा था। अपनी माँ की तप्त गुदा में हर झटके के साथ जय के पुरुष स्तम्भ पर ऊपर और नीचे दौड़ते हुए तीव्र लैंगिक आनन्द की तीक्षणता में वृद्धि हो रही थी।
 
103 अंतिम अध्याय

टीना जी स्वयं अपने ऑरगैस्म की प्राप्ति के निकट थीं। जिस कोण से जय का लिंग उनकी गुदा में प्रविष्ट हुआ था, और उनके पुत्र के पुरुषांग की विलक्षण मोटाई के फलस्वरूप उनके चोंचले पर बेहतरीन मालिश जारी थी। शीघ्र ही, पापमय लैंगिक आनन्द की लहरों पर लहरें उनके तन बदन में उमड़ने लगीं। जैसे-जैसे उनका बलिष्ठ पुत्र उनकी संकरी जकड़ती गुदा के भीतर और अधिक बलपूर्वक तथ अधिक गहरा ठेलता जाता, टीना जी अपने स्नायुओं में तीव्र कामोन्माद के गुबार को पनपता हुआ महसूस करने लगी थीं।।

“हरामजादी, जय हाँफ़ कर बोला, उसका लिंग माता की गुदा को छेदता जा रहा था। “आज तो गजब की टाइट हो मम्मी !

“जानती हूँ जानेमन वे खिलखिलायीं। “पर तू अपनी बेचारी माँ की गाँड की अच्छी खींचतान कर रहा है, क्यों बे, माँ के बड़वे ?”

टीना जी ऊत्तेजित होकर अपनी टुंसी हई गुदा को उचका-उचका कर पुत्र की रौन्दती छड़ के विपरीत झटकने लगीं। उनके वासना से ओतप्रोत बदन के रोम-रोम में पाप भरा दैहिक आनन्दप्रवाह होने लगा। जब-जब वे अपने कुलबुलाते नितम्बों को पुत्र के ठेलते लिंग पर दे पीटतीं, उनके परालौकिक आनन्द की तीक्षणता बढ़ती जाती।

“ऊ ऊ ऊ ऊह, जय, मेरे लाल !” वे हाँफ़ीं, और बेक़रारी से अपनी गुदा को पुत्र के कौन्धते लिंग पर घुमाने लगीं। “हे ईश्वर, कितना मोटा, कितना सॉलिड है तेरा ये लौड़ा :: ऊ ऊहहहहहहह! मादरचोद, मैं झड़ने वाली हूँ! ::: मैं झड़ने वाली हूँ! चोद साले! चोद कस के रन्डी की औलाद !” ।

जय माँ के तन पर आगे हाथ बढ़ाकर उनके सुडौल गोलाकार स्तनों को दबोचा और गुदामैथुन की गति को और अधिक कर दिया।

ओहहह, सदके जावाँ! ओ ओहहह, मादरचोद! उहहहहहह! चोद अपनी माँ को !” टीना जी निर्लज्जता से अपने नितम्बों को फटकती हुई बिलबिलायीं।।
 
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